देखिये और जरा ध्यान से देखिये कि आपके अन्दर ‘दोष-दर्शन’ करने की दुर्बलता, तो नहीं घर पर बैठी है। क्योंकि ‘दोष-दर्शन’ का दृष्टिकोण भी जीवन को कुछ-कुछ ऐसा ही बना देता है। दोष-दर्शन और संतोष, दोष-दर्शन और प्रसन्नता, दोष-दर्शन तथा सामंजस्य का नैसर्गिक विरोध है। दोष-दृष्टि मनुष्य के हृदय पर उसके मानस पर एक ऐसा आवरण है, जो न हो बाहर की प्रसन्न- किरणों को भीतर प्रतिबिम्बित होने देता है और न भीतर का उल्लास बाहर ही प्रकट होने देता है। इसे मनुष्य एवं आनन्द के बीच एक लौह दीवार ही समझना चाहिये। लीजिये दोषदर्शी व्यक्तियों की दशा से अपना मिलान कर लीजिये और यदि अपने में दोष पायें तो तुरन्त सुधार कर डालिये, जिससे, अगले दिनों में आप भी उस प्रकार प्रसन्न रह सकें, जिस प्रकार लोग रहते हैं और उन्हें रहना ही चाहिये।
दोष-दर्शन से दूषित व्यक्ति जब किसी व्यक्ति के संपर्क में आता है, तब अपने मनोभाव के अनुसार उसके अन्दर बुराइयाँ ढूँढ़ने लगता है और हठात् कोई न कोई बुराई निकाल ही लेता है। फिर चाहे वह व्यक्ति कितना ही अच्छा क्यों न हो। उदाहरण के लिये किसी विद्वान महात्मा को ही ले लीजिये। लोग उसे बुलाते, आदर सत्कार करते और उसके व्याख्यान से लाभ उठाते हैं। महात्मा जी का व्याख्यान सुन कर सारे लोग पुलकित, प्रसन्न व लाभान्वित होते हैं।
उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते और अपने उतने समय को बड़ा सार्थक मानते। अनेक दिनों, सप्ताहों तथा मासों तक उस सुखद घटना का स्मरण करते और ऐसे संयोग की पुनरावृत्ति चाहने लगते। अधिकाँश लोग उस व्याख्यान का लाभ उठा कर अपना ज्ञान बढ़ाते, कोई गुण ग्रहण करते और किसी दुर्गुण से मुक्ति पाते हैं। वह उनके लिए एक ऐसा सुखद संयोग होता है जो गहराई तक अपनी छाप छोड़ जाता है, ऐसे ही सुव्यक्ति गुणाग्राही कहे जाते हैं।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मई 1968 पृष्ठ 22
दोष-दर्शन से दूषित व्यक्ति जब किसी व्यक्ति के संपर्क में आता है, तब अपने मनोभाव के अनुसार उसके अन्दर बुराइयाँ ढूँढ़ने लगता है और हठात् कोई न कोई बुराई निकाल ही लेता है। फिर चाहे वह व्यक्ति कितना ही अच्छा क्यों न हो। उदाहरण के लिये किसी विद्वान महात्मा को ही ले लीजिये। लोग उसे बुलाते, आदर सत्कार करते और उसके व्याख्यान से लाभ उठाते हैं। महात्मा जी का व्याख्यान सुन कर सारे लोग पुलकित, प्रसन्न व लाभान्वित होते हैं।
उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते और अपने उतने समय को बड़ा सार्थक मानते। अनेक दिनों, सप्ताहों तथा मासों तक उस सुखद घटना का स्मरण करते और ऐसे संयोग की पुनरावृत्ति चाहने लगते। अधिकाँश लोग उस व्याख्यान का लाभ उठा कर अपना ज्ञान बढ़ाते, कोई गुण ग्रहण करते और किसी दुर्गुण से मुक्ति पाते हैं। वह उनके लिए एक ऐसा सुखद संयोग होता है जो गहराई तक अपनी छाप छोड़ जाता है, ऐसे ही सुव्यक्ति गुणाग्राही कहे जाते हैं।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मई 1968 पृष्ठ 22
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