गुरुवार, 23 फ़रवरी 2023

👉 इन तीन का ध्यान रखिए (भाग 2)

🔶 इन तीनों को त्याग दीजिए- कुढ़ना, बकझक और हँसी मजाक।

(1) कुढ़ना एक भयंकर मानसिक विकार है। इससे मनुष्य की शक्ति का ह्रास, चिंता और व्यग्रता में वृद्धि होती है। निश्चयबल का क्षय होता है और अपने प्रति अविश्वास उत्पन्न होता है। कुढ़ने का अभिप्राय है हीनत्व की भावना से ग्रसित होना। यह उसी की प्रतिक्रिया है। मनुष्य के किए जब कुछ नहीं होता, तो वह कुढ़ता है। यही मानसिक व्याधि विकसित होने पर नैराश्य का रूप धारण कर लेती है।

(2) व्यर्थ की बकझक से मनुष्य का थोथापन प्रकट होता है। बातूनी व्यक्ति जबानी जमा खर्च में चतुर होता है, ठोस कर्म कम करता है क्योंकि बकझक ही में शक्ति नष्ट हो जाती है।

(3) अनियंत्रित हँसी मजाक आत्मिक दृष्टि से गर्हित है। गन्दा हँसी मजाक कटुता का रूप धारण कर लेता है। इससे मनुष्य की गुप्त वासना का पर्दाफाश होता है। अतः इन तीनों को-कुढ़ना, व्यर्थ की बकझक और अनियंत्रित हँसी मजाक की अधिकतर आदतों को त्याग देना उचित है।

🔶 इन तीनों को ग्रहण कीजिए- चरित्र के उत्थान एवं आत्मिक शक्तियों के उत्थान के लिए इन तीनों सद्गुणों- होशियारी, सज्जनता और सहनशीलता- का विकास अनिवार्य है।

(1) यदि आप अपने दैनिक जीवन और व्यवहार में निरन्तर जागरुक, सावधान रहें, छोटी छोटी बातों का ध्यान रखें, सतर्क रहें, तो आप अपने निश्चित ध्येय की प्राप्ति में निरन्तर अग्रसर हो सकते हैं। सतर्क मनुष्य कभी गलती नहीं करता, असावधान नहीं रहता। कोई उसे दबा नहीं सकता।

(2) सज्जनता एक ऐसा दैवी गुण है जिसका मानव समाज में सर्वत्र आदर होता है। सज्जन पुरुष वन्दनीय है। वह जीवन पर्यंत पूजनीय होता है। उसके चरित्र की सफाई, मृदुल व्यवहार, एवं पवित्रता उसे उत्तम मार्ग पर चलाती हैं।

(3) सहनशीलता दैवी सम्पदा में सम्मिलित है। सहन करना कोई हँसी खेल नहीं प्रत्युत बड़े साहस और वीरता का काम है केवल महान आत्माएँ ही सहनशील होकर अपने मार्ग पर निरन्तर अग्रसर हो सकती हैं। इनके अतिरिक्त इन तीन पर श्रद्धा रखिये-धैर्य, शान्ति, परोपकार।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 13


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बुधवार, 22 फ़रवरी 2023

👉 सफल मनुष्य जीवन

विचारों में हम उठते हैं और विचारों से ही गिरते हैं। उनसे ही खड़े होते हैं और उनसे ही चलते हैं। उनकी जबरदस्त शक्ति से सबका भाग्य बनता है। जो आदमी अपने विचार का स्वामी बनकर रहता है, जो आदमी इच्छाओं को अपने वश में रखता है और जो प्रेमपूर्ण सचाई के तथा साहस भरे विचार करता है वह अपने आदर्श को सत्य के प्रकाश में ढूंढ़ लेता है।

तुम्हारे जीवन के जो क्षण व्यतीत हो रहे हैं उनको सादे, मधुर, पवित्र, सुन्दर, श्रेष्ठ आशापूर्ण, उच्च तथा नम्र विचारों से भरो। वे विचार तुम्हारे जीवन क्षेत्र में अपने अनुरूप फल पैदा करेंगे फल। स्वरूप तुम्हारा दैनिक जीवन आन्तरिक शुभ विचारों का जीता जागता चित्र बन जायेगा। ऐसा जीवन ही ‘सफल मनुष्य जीवन’ होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1940 पृष्ठ 13

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👉 इन तीन का ध्यान रखिए। (भाग 1)

उत्पादन की जड़-इन तीनों को सदैव अपने अधिकार में रखिये-
अपना क्रोध, अपनी जिह्वा और अपनी वासना।

(1) ये तीनों ही भयंकर उत्पादक की जड़ हैं। क्रोध के आवेश में मनुष्य कत्ल करने तक नहीं रुकता। ऊटपटाँग बक जाता है और बाद में हाथ मल मल कर पछताता है।

(2) जीभ के स्वाद के लालच में भक्ष्य अभक्ष्य का विवेक नष्ट हो जाता है। अनेक व्यक्ति चटपटे मसालों, चाट पकौड़ी और मिठाइयाँ खा खाकर अपनी पाचन शक्ति सदा के लिये नष्ट कर डालते हैं।

(3) सबसे बड़े मूर्ख वे हैं जो अनियंत्रित वासना के शिकार हैं। विषय-वासना के वश में मनुष्य का नैतिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक पतन तो होता ही है, साथ ही गृहस्थ सुख, स्वास्थ्य और वीर्य नष्ट होता है। समाज ऐसे भोग विलासी पुरुष को घृणा की दृष्टि से अवलोकता है। गुरुजन उसका तिरस्कार करते हैं। ऐसे पापी मदहोश को स्वास्थ्य लक्ष्मी और आरोग्य सदा के लिये त्याग देते हैं। इन तीनों ही शत्रुओं पर पूरा पूरा नियंत्रण रखिये।

🔴 इन तीनों को झिड़को :-

निर्दयता, घमण्ड और कृतघ्नता

(1) ये मन के मैल हैं। इनसे बुद्धि प्राप्त करने में फंस जाती है। निर्दयी व्यक्ति अविवेकी और अदूरदर्शी होता है। वह दया और सहानुभूति का मर्म नहीं समझता।

(2) घमण्डी हमेशा एक विशेष प्रकार के नशे में मस्त रहता है, धन, बल, बुद्धि में अपने समान किसी को नहीं समझता।

(3) कृतघ्न पुरुष दूसरों के उपकार को शीघ्र ही भूल कर अपने स्वार्थ के वशीभूत रहता है। वह केवल अपना ही लाभ देखता है। वस्तुतः उस अविवेकी का हृदय सदैव मलीन और स्वार्थ-पंक में कलुषित रहता है। दूसरे के किए हुए उपकार को मानने तथा उसके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकाशित करने में हमारे आत्मिक गुण-विनम्रता, सहिष्णुता और उदारता प्रकट होते हैं।

क्रमशः जारी
अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 13

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मंगलवार, 21 फ़रवरी 2023

👉 पुस्तक-प्रेम

दार्शनिक एमर्सन कहा करते थे, कि “पुस्तकों का स्नेह ईश्वर के राज्य में पहुँचने का विमान है।” निस्संदेह मनुष्य की अपूर्णता को पूर्णता की ओर ले जाने में, अज्ञ से विज्ञ बनाने में जितना काम पुस्तक ने किया उतना और पदार्थ द्वारा नहीं हुआ। निस्संदेह मनुष्य की अपूर्णता को पूर्णता की ओर ले जाने में, अज्ञ से विज्ञ बनाने में जितना काम पुस्तक ने किया उतना और पदार्थ द्वारा नहीं हुआ। श्रेष्ठ महापुरुषों, दिव्य दार्शनिकों और खोज करने वाले तपस्वियों के घोर परिश्रम द्वारा प्राप्त हुए बहुमूल्य रत्न पुस्तकों की तिजोरी में बन्द हैं। यह हमारा सौभाग्य है कि इतने अनुभव पूर्ण ज्ञान को हम इतनी आसानी से पुस्तकों द्वारा प्राप्त कर लेते हैं।

सिसरो ने कहा है कि अच्छी पुस्तकों को घर में इकट्ठा करना मानो घर को देव मंदिर बना लेना है। कार्लाईल ने लिखा है—”जिन घरों में अच्छी किताबें नहीं वे जीवित मुर्दों के रहने के कब्रिस्तान हैं।” जीवन कला एवं सरसता का समावेश पुस्तकों की सहायता से होता है। जिन्दगी की पेचीदा समस्याओं के ऊपर विचार करने के लिए पुस्तकें प्रोत्साहन देती हैं और प्रकाश—दीप की भाँति सत्मार्ग की ओर हमारा पथ प्रदर्शन करती हैं।

कैम्पिस ने एक बार लोगों को उपदेश दिया था कि—’अपना कोट बेचकर भी अच्छी किताबें खरीदो।’ उनका कहना था कि कोट के अभाव में जाड़े के कारण आपके शरीर को कुछ कष्ट होगा, परन्तु पुस्तकों के अभाव में आत्मा को भूखा मरना पड़ेगा। भौतिक जगत की जड़ता नीरसता ओर बहिरंगता की कर्कशता से छुड़ाने की शक्ति पुस्तकों में हैं उन्हीं में जीवन का अमृत रस भरा हुआ है जिसे पान करके तुच्छ जीव से ऊँचे उठकर हम महामानव बनते हैं। हर मनुष्य को पुस्तक प्रेमी होना चाहिए विचारपूर्ण सत ग्रन्थों का संग्रह और स्वाध्याय करना अपने को पशुता से देवत्व की ओर ले जाना का स्पष्ट चिन्ह है।

📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1944 पृष्ठ 8

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👉 अवकाश के क्षण

हम अपने निर्धारित काम करते हैं। किन्तु काम को करते हुए भी बहुत सी फुरसत की घड़ियाँ मिलती हैं यदि उनका उपयोग ठीक प्रकार किया जावे तो इस थोड़े-थोड़े समय से ही बहुत काम हो सकता है।

पार्लियामेण्ट के प्रमुख वक्ता एल हुवरिट का ओजस्वी भाषण सुनकर उसके भाई प्रभावित हुए और प्रशंसा करते हुए बोले-”हमारे कुटुम्ब में सबसे प्रतिभावान हुवरिट है। मुझे याद है कि जब हम लोग खेला करते थे तब उस फुरसत के वक्त में वह अपना काम किया करता था।” हेरेट बीचरस्होव ने अपनी सर्वोत्तम कृति ‘टाम काका की कुटिया’ की रचना घर गृहस्थी के झंझटों के बीच फंसे रहते हुए ही की है। भोजन की प्रतीक्षा में जितना समय लगता था उतने ही क्षणों के नियमपूर्वक काम में लाकर वीचर महोदन ने एक महाग्रन्थ को पढ़ डाला। महाशय लाँग फेलो ने चाय उबलने तक की फुरसत को काम में लाकर ‘इन करनो’ नामक ग्रन्थ का अनुवाद कर डाला था। कवि वर्न्स खेती का काम करते थे जब जहाँ मौका मिलता तो कविता करने लगते उनकी अमर रचनाओं का बड़ा मान है। महाकवि मिल्टन राज्य मंत्री था उसे बड़ा काम रहता था फिर भी उसने कुछ घड़ियाँ नित्य बचाकर ‘पेरेडाइज लाँस्ट’ नामक महाकाव्य रच डाला। ईस्ट इण्डिया हाउस में क्लर्की करते करते जान स्टुअर्ट मिल ने अपना सर्वोत्तम ग्रन्थ लिखा।

डॉक्टर गेलीलियो को अपने बीमारों की देख-भाल में बड़ा सर पचाना पड़ता था फिर भी वह कुछ समय बचाकर विज्ञान की शोध करता। अन्त में उसने ऐसे-ऐसे आविष्कार किये जिनके लिये संसार सदा उनका कृतज्ञ रहेगा। माइकिल फेर्ड नामक जिल्द साज ने कुछ घंटे बचाकर बड़ी-बड़ी वैज्ञानिक शोधे कर डाली। चार्ल्स फास्ट नामक चमार एक घंटे प्रतिदिन अध्ययन करके अमेरिका का सर्वोपरि गणिताचार्य हो गया। रोज थोड़ा-थोड़ा काम करने से कुछ ही दिनों में उसका आश्चर्यजनक परिणाम दिखाई देता है। प्रति दिन एक घंटा भी किसी काम के सीखने में लगाया जाये तो मनुष्य उसमें बहुत उन्नति प्राप्त कर सकता है।

मि. माजर्ट प्रतिक्षण कुछ न कुछ करते रहते थे उन्होंने अपनी मृत्यु शैय्या पर ‘रेक्यूयम’ नामक पुस्तक को लिखा। डॉक्टर मारसन गुड लंदन में एक बीमार को देखने गये रास्ते में उन्होंने ‘लुक्रेशियश’ का अनुवाद कर डाला। हेनरी क्रिक ह्वाइट ने दफ्तर आने जाने के समय में ग्रीक भाषा सीखी थी और डॉक्टर वर्नें ने इटालियन और फ्रेंच भाषाओं को घोड़े की पीठ पर पढ़ा था। समय जैसी अमूल्य वस्तु दुनियाँ में और कोई नहीं हो सकती। जार्ज स्टीफ नसन कहते हैं-फुरसत के वक्त को मैं सुवर्ण समझता हूँ और उसे कभी व्यर्थ नहीं जाने देता। सिसरो कहता था- ‘जिस समय को अन्य व्यक्ति दिखावे तथा आराम में खर्च करते हैं उसे ही मैं तत्वज्ञान के अध्ययन में लगाता हूँ। इटली के एक विद्वान ने अपने दरवाजे पर लिख रखा था-’जो यहाँ आवे वह मेरे काम में मदद करे।’ जान एड्यस का समय जब कोई नष्ट करता था तो उसे बड़ा बुरा लगता था। ह्टियर कहता है-’आज के दिन में हमारा भविष्य छिपा हुआ है। आज का दिन नष्ट करने का अर्थ है अपने भाग्य को कुचलना।’

समय ही सम्पत्ति है। सच बात तो यह है कि पैसे की अपेक्षा समय कहीं अधिक मूल्यवान है समय को बरबाद करने के माफिक हैं-शक्ति को नष्ट करना, योग्यता को नष्ट करना, सौभाग्य को नष्ट करना, और अपना लोक परलोक नष्ट करना। समझदार व्यक्ति फुरसत के समय के छोटे-छोटे टुकड़ों को बचाकर महान् बन जाते हैं किन्तु उन्हें योंही लापरवाही में उड़ा देने वाले अपनी असफलता पर रोते हैं और भाग्य को कोसते हैं। समय मित्र के वेश में हमारे सम्मुख उपस्थित होता है और ईश्वर की भेजी हुई बहुमूल्य नियामतें हमारे लिए लाता हैं किन्तु जब हम उसका उचित आदर नहीं करते तो उलटे पावों लौट जाता है। फ्रेंकलिन कहते हैं-”क्या तुम्हें अपने जीवन से प्रेम है? यदि है तो समय को व्यर्थ नष्ट न करो क्योंकि जीवन समय से ही बना हुआ है।” शेक्सपियर के यह शब्द कितने मार्मिक हैं-”मैंने समय को नष्ट किया और अब समय मुझे नष्ट कर रहा है।”

✍🏻 स्वेट मार्डेन
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1941 पृष्ठ 13

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सोमवार, 20 फ़रवरी 2023

👉 क्षमा, क्षांति

क्षमा आत्मा का नैसर्गिक गुण है. यह आत्मा का स्वभाव है. जब हम विकारों से ग्रस्त हो जाते है तो स्वभाव से विभाव में चले जाते है. यह विभाव क्रोध, भय, द्वेष, एवं घृणा के विकार रूप में प्रकट होते है. जब इन विकारों को परास्त किया जाता है तो हमारी आत्मा में क्षमा का शांत झरना बहने लगता है।

क्रोध से क्रोध ही प्रज्वल्लित होता है. क्षमा के स्वभाव को आवृत करने वाले क्रोध को, पहले जीतना आवश्यक है. अक्रोध से क्रोध जीता जाता है. क्योंकि क्रोध का अभाव ही क्षमा है. अतः क्रोध को धैर्य एवं विवेक से उपशांत करके, क्षमा के स्वधर्म को प्राप्त करना चाहिए. बडा व्यक्ति या बडे दिल वाला कौन कहलाता है? वह जो सहन करना जानता है, जो क्षमा करना जानता है. क्षांति जो आत्मा का प्रथम और प्रधान धर्म है. क्षमा के लिए ”क्षांति” शब्द अधिक उपयुक्त है. क्षांति शब्द में क्षमा सहित सहिष्णुता, धैर्य, और तितिक्षा अंतर्निहित है।

क्षमा में लेश मात्र भी कायरता नहीं है. सहिष्णुता, समता, सहनशीलता, मैत्रीभाव व उदारता जैसे सामर्थ्य युक्त गुण, पुरूषार्थ हीन या अधैर्यवान लोगों में उत्पन्न नहीं हो सकते. निश्चित ही इन गुणों को पाने में अक्षम लोग ही प्रायः क्षमा को कायरता बताने का प्रयास करते है. यह अधीरों का, कठिन पुरूषार्थ से बचने का उपक्रम होता है. जबकि क्षमा व्यक्तित्व में तेजस्विता उत्पन्न करता है. वस्तुतः आत्मा के मूल स्वभाव क्षमा पर छाये हुए क्रोध के आवरण को अनावृत करने के लिए, दृढ पुरूषार्थ, वीरता, निर्भयता, साहस, उदारता और दृढ मनोबल चाहिए, इसीलिए “क्षमा वीरस्य भूषणम्” कहा जाता है।

दान करने के लिए धन खर्चना पडता है, तप करने के लिए काया को कष्ट देना पडता है, ज्ञान पाने के लिए बुद्धि को कसना पडता है. किंतु क्षमा करने के लिए न धन-खर्च, न काय-कष्ट, न बुद्धि-श्रम लगता है. फिर भी क्षमा जैसे कठिन पुरूषार्थ युक्त गुण का आरोहण हो जाता है।

क्षमा ही दुखों से मुक्ति का द्वार है. क्षमा मन की कुंठित गांठों को खोलती है. और दया, सहिष्णुता, उदारता, संयम व संतोष की प्रवृतियों को विकसित करती है। क्षमापना से निम्न गुणों की प्राप्ति होती है-

◼ चित्त में आह्लाद– मन वचन काय के योग से किए गए अपराधों की क्षमा माँगने से मन और आत्मा का बोझ हल्का हो जाता है. क्योंकि क्षमायाचना करना उदात्त भाव है. क्षमायाचक अपराध बोध से मुक्त हो जाता है परिणाम स्वरूप उसका चित्त प्रफुल्ल हो जाता है।

◼ मैत्रीभाव- क्षमापना में चित्त की निर्मलता ही आधारभूत है. क्षमायाचना से वैरभाव समाप्त होकर मैत्री भाव का उदय होता है. “आत्मवत् सर्वभूतेषु” का सद्भाव ही मैत्रीभाव की आधारभूमि है।

◼ भावविशुद्धि– क्षमापना से विपरित भाव- क्रोध,वैर, कटुता, ईर्ष्या आदि समाप्त होते है और शुद्ध भाव सहिष्णुता, तितिक्षा, आत्मसंतोष, उदारता, करूणा, स्नेह, दया आदि उद्भूत होते है. क्रोध का वैकारिक विभाव हटते ही क्षमा का शुद्ध भाव अस्तित्व में आ जाता है।

◼ निर्भयता– क्रोध, बैर, ईर्ष्या और प्रतिशोध में जीते हुए व्यक्ति भयग्रस्त ही रहता है. किंतु क्रोध निग्रह के बाद सहिष्णुता और क्षमाशीलता से व्यक्ति निर्भय हो जाता है. स्वयं तो अभय होता ही है साथ ही अपने सम्पर्क में आने वाले समस्त सत्व भूत प्राणियों और लोगों को अभय प्रदान करता है।

◼ द्विपक्षीय शुभ आत्म परिणाम– क्रोध शमन और क्षमाभाव के संधान से द्विपक्षीय शुभ आत्मपरिणाम होते है. क्षमा से सामने वाला व्यक्ति भी निर्वेरता प्राप्त कर मैत्रीभाव का अनुभव करता है. प्रतिक्रिया में स्वयं भी क्षमा प्रदान कर हल्का महसुस करते हुए निर्भय महसुस करता है. क्षमायाचक साहसपूर्वक क्षमा करके अपने हृदय में निर्मलता, निश्चिंतता, निर्भयता और सहृदयता अनुभव करता है. अतः क्षमा करने वाले और प्राप्त करने वाले दोनो पक्षों को सौहार्द युक्त शांति का भाव स्थापित होता है।

क्षमाभाव मानवता के लिए वरदान है. जगत में शांति सौहार्द सहिष्णुता सहनशीलता और समता को प्रसारित करने का अमोघ उपाय है।

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👉 मन निर्मल तो दु:ख काहे को होय

इस जगत में व्याप्त हर प्राणी अपने आपको सुखी रखने का प्रयास करते हैं, लेकिन प्रयास व्यर्थ हो जाता है। जब तक हम अपने चंचल मन को वश में नहीं कर लेते तब तक हम सुख की अनुभूति नहीं प्राप्त कर सकते। सुख प्राय: दो तरह के होते हैं, दिव्यानुभूति सुख और आत्मिक सुख। आत्मिक सुख को हम भौतिक सुख के सन्निकट रख सकते हैं। दिव्यानुभूति सुख के लिए इस सांसारिक जगत के मोह से ऊपर उठना होता है, लेकिन भौतिक सुख के लिए मन का संतुलित होना आवश्यक है। खुशी सुखी मन का संवाहक होती है। एक संतुलित मन हमेशा प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता है, जो सुख का कारण बनता है। अपने आपको खुश रखने की कोशिश करने वाला इंसान अपने कर्तव्यों और दायित्वों से बंधा होता है। लेकिन, जो इंसान अपने मन को वश में नहीं रखता, वह परिस्थिति में विचलित हो जाता है और विचलित मन खुशी की अनुभूति नहीं कर सकता।

मन को संतुलित रखने के लिए जीवन में नित्य अभ्यास की जरूरत होती है। अपने मन को कभी-कभी हम इतना भारी कर लेते हैं कि घुटन-सी होने लगती है। प्राकृतिक गुणों के हिसाब से हल्की चीजें सदैव ऊपर होती हैं। जब मन हल्का होने लगता है, तब वह धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठ जाता है और मन स्वच्छ एवं निर्मल प्रतीत होने लगता है। निर्मल मन वाला व्यक्ति हर चीज की बारीकियों को इसी तरह समझने लगता है। उसके बाद वह संसार के द्वंद्व से मुक्त हो जाता है और सुख का आभास करने लगता है।

कभी-कभी बहुत आगे की सोच हमें भयाक्रांत कर देती है। इस क्षणभंगुर दुनिया में जो भी घटता है वह परमात्मा की इच्छानुरूप घटित होता है। इसलिए स्वयं को निमित्तमात्र समझकर अपने कर्त्तव्य-पथ पर चलकर इस सुख का अनुभव कर सकते हैं। भविष्य हमारे हाथ में नहीं होता। रात्रिकाल के बाद सुबह का सूर्य देखना भी परमात्मा के निर्देशानुसार होता है। प्रलय, तूफान, भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाएं और आतंकवादी हमलों जैसी मानवकृत घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि किसी भी पल कुछ भी हो सकता है। मनुष्य चाहे जो करे, लेकिन इन घटनाओं के सामने नि:सहाय हो जाता है। इसलिए सिर्फ अपने कत्र्तव्यों का निर्वाह करते रहना चाहिए।

अपने जीवन को सुखद बनाने के लिए सबसे पहले अपने आस-पड़ोस के लोगों को सुखी बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। आचरण से ही वातावरण का निर्माण होता है। दूसरों को खुशी देकर हम अपनी खुशी को भी कई गुणा बढ़ा लेते हैं। सांसारिक लिप्ता में लिप्त व्यक्तियों के लिए दूसरों की खुशी उसके स्वयं के दुखी होने का कारण बन जाती है। एक  सुंदर कोठी में रहने वाली और स्वयं एक अच्छी नौकरी करने वाली महिला, एक कामवाली को प्रतिदिन ध्यान से देखा करती थी। उस महिला को प्रतिदिन उसका पति छोडऩे के लिए और काम समाप्त होने के बाद उसे लेने के लिए आता था। इसे देखकर कोठी वाली महिला बहुत व्यथित रहती थी। उसे इस बात का दु:ख था कि एक काम करने वाली महिला भी उससे अधिक खुश है। वह सोचती रहती थी इतना धन होने के बावजूद उसके पति के पास उसके लिए समय नहीं है। इस धन-संपदा का क्या अर्थ है, जब अपने पति के साथ अधिकांश समय नहीं गुजार सकती। इस बात को लेकर वह महिला अपने पति के साथ अक्सर झगड़ा करने लगी। एक दिन महिला ने देखा कि काम करने वाली महिला का हाथ टूटा हुआ है। वह अचंभित हुई। दूसरे लोगों से ज्ञात हुआ कि कामवाली महिला का पति उस पर बहुत अत्याचार करता था। उसके पति को डर था कि इसके कारण उसकी पत्नी उसे छोड़कर न चली जाए, इसलिए वह सुबह-शाम उसे लेकर आता और लेकर जाता था। सत्य को जानकर महिला को बहुत पश्चताप हुआ।

कभी-कभी हम दूसरों को देखकर अपनी स्थिति की तुलना उसके साथ करने लगते हैं। यह भी दुख का कारण बनता है। दरअसल सुख और दुख हमारे मन के ही अंदर होते हैं। सच्चे मन से और दूसरों के साथ प्रेमपूर्वक मिलकर परिश्रम करने वाले इंसान के पास कभी दु:ख पहुंच ही नहीं सकता।

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👉 अपने वचन का पालन करिए!

आत्म-सम्मान को प्राप्त करने और उसे सुरक्षित रखने का एक ही मार्ग है, वह यह कि-’ईमानदारी’ को जीवन की सर्वोपरि नीति बना लिया जाये। आप जो भी काम करें, उसमें सच्चाई की पर्याप्त मात्रा होनी चाहिए, लोगों को जैसा विश्वास दिलाते हैं, उस विश्वास की रक्षा कीजिए। विश्वासघात, दगा करना, वचन पलटना, कुछ कहना और कुछ करना, मानवता का सबसे बड़ा पातक है।

आजकल वचन पलटना एक फैशन सा बनता जा रहा है। इसे हलके दर्जे का पाप समझा जाता है पर वस्तुतः अपने वचन का पालन न करना, जो विश्वास दिलाया है उसे पूरा न करना बहुत ही भयानक, सामाजिक पाप है। धर्म-आचरण की अ, आ, इ, ई, वचन पालन से आरंभ होती है। यह प्रथम कड़ी है जिस पर पैर रखकर ही कोई मनुष्य धर्म की ओर, आध्यात्मिकता की ओर, बढ़ सकता है।

आप जबान से कहकर या बिना जबान से कहे या किसी अन्य प्रकार दूसरों को जो कुछ विश्वास देते हैं, उसे पूरा करने का शक्ति भर प्रयत्न कीजिए, यह मनुष्यता का प्रथम लक्षण है। जिसमें यह गुण नहीं, सच्चे अर्थों में मनुष्य नहीं कहा जा सकता और न उसे वह सम्मान प्राप्त हो सकता है जो एक सच्चे मनुष्य को होना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1943 पृष्ठ 1

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/October/v1.1

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शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2023

👉 पाप कर्मों से बचते रहो

‘मैं भूखा हूँ, इसलिए चोरी करूंगा’ ऐसा मत विचारो। क्योंकि इससे तुम्हारी भूख घटेगी नहीं, बढ़ ही जायगी। कीचड़ खाकर किसने दुर्भिक्ष को काटा है? पाप कर्म तो तुम्हें और भी अधिक कंगाल बना देंगे। आग से आग की उत्पत्ति होती है और पाप से पाप की, इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि भूख के मूल कारण पाप से ही दूर रहा जाय। ओस चाटने से तृप्ति नहीं हो सकती और न अधर्म का धन संतोष करा सकता है। तुम्हारा पेट चोरी से नहीं परिश्रम से भरेगा। किसी की तिजोरी को मत झाँको, अपनी भुजाओं को देखो, उनमें पेट के भर देने की भरपूर क्षमता है।

पाप कर्मों से दूर रहो जैसे साँप से दूर रहते हो। यदि तुमने पाप का भूत पाल लिया, तो यह बड़ा दुख देगा। जहाँ जाओगे वहीं छाया की तरह घेरे फिरेगा और हर घड़ी नारकीय यातनाओं से झुलसाता रहेगा। यदि तुम्हें अपने आप से प्रेम है तो देखो, पाप कर्मों की ओर मत झुकना। आपत्तियों को सहना, पर कर्तव्य धर्म से विचलित मत होना। वे मूर्ख हैं, जो पाप को पसंद करते हैं और दुख भोगते हैं, तुम्हारे लिए दूसरा मार्ग मौजूद है, वह यह कि आधे पेट खाना पर पाप कर्मों के पास न जाना।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड-ज्योति अक्टूबर 1941 पृष्ठ 1

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👉 सत्य नारायण का व्रत

सत्य की साधना में प्रवृत्त होते ही अनेक प्रलोभन और विघ्न आपको सत्य मार्ग से डिगाने की चेष्टा करेंगे। कभी ऐसा भी देखोगे कि मिथ्या का आश्रय लेने से ही आप धन, ऐश्वर्य, यश, गौरव आदि पार्थिव सुख भोग की वस्तुएं अनायास प्राप्त कर सकते हैं। किन्तु उस दशा में ऐसे प्रलोभन के हाथ से बचने की चेष्टा करो। मिथ्या का आश्रय लेकर समस्त पृथ्वी का आधिपत्य भी मिले तो उसे तुच्छ समझो। सत्य-धर्म के आश्रय में रह कर यदि सदा दरिद्री रहना पड़े, भिक्षा से निर्वाह करना पड़े, लाच्छिंत होना पड़ो, चाहे मृत्यु भी हो जाय तो उसे सहस्र गुण श्रेय समझो, ऐसा मनोबल लाने की चेष्टा करो।

यदि तुम देखो कि असत्य के प्रलोभन से तुम्हारा चित्त दुर्बल हो गया है तो काय-मनो-वाक्य से दुर्बल के बल भगवान, के चरणों में सर्वतो भाव से शरणागत हो जाओ। ‘प्रभो हमें बल दीजिये, हमारा मन मिथ्या के जाल पर मुग्ध होना चाहता है। जानते हैं कि यह मिथ्या है, असत्य है, इसका परिणाम बुरा है, तथापि दुर्बल मन किसी प्रकार मिथ्या का प्रलोभन त्याग नहीं सकता। इस मिथ्या प्रलोभन से हमारी रक्षा कीजिये। ऐसी प्रार्थना करने से भगवान् निश्चय ही रक्षा करेंगे, और यदि उनकी शरण लेने पर अनेक बार सफलता न भी हो तो भी हताश न होइये, भगवान को दोष न दीजिये बल्कि कहिये कि यथार्थ रूप से हम प्रार्थना नहीं कर सके हैं, इस कारण सफलता नहीं हुई। याद रखिए कि बार-बार की अकृत कार्यता ही अभीष्ट-सिद्धि का पूर्व लक्षण है।

📖 अखण्ड-ज्योति अक्टूबर 1941 पृष्ठ 17

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गुरुवार, 16 फ़रवरी 2023

👉 दूसरों की नाराज़गी

यदि हमसे कोई नाराज़ होता है, तो उसका उत्तर वैसी ही नाराज़गी में न देना चाहिए, वरन् गम्भीरता-पूर्वक विचार करना चाहिए कि इसका वास्तविक कारण क्या है। बहुत करके हमें अपने दोष दिखाई नहीं पड़ते और दूसरों पर दोषारोपण आसानी से कर देते हैं। एकान्त में न्यायबुद्धि से आत्म-चिन्तन करने पर यह मालूम हो सकता है कि इस नाराज़गी में हमारा कितना दोष है। अपनी त्रुटियों को सुधारना हर मनुष्य का धर्म है। हमारी भूल से यदि दूसरों को दुख पहुँचता हो, तो अपना सुधार करना चाहिए और नाराज़ होने वाले से निःसंकोच क्षमा माँग लेनी चाहिए।

किन्तु कई बार इसके विपरीत परिस्थितियाँ भी सामने आती हैं। दूसरे लोग अपनी भूलों का दण्ड हमें देना चाहते हैं। अपनी अनुचित इच्छाओं की पूर्ति के लिए हमारी आत्मा का हनन करना चाहते हैं। ऐसे अवसरों पर गिड़गिड़ाने या परास्त हो जाने से काम न चलेगा। सत्य मार्ग पर पर्वत की तरह दृढ़ता के साथ खड़े होकर अपने कर्तव्य का पालन करना ही योग्य है। बालकों की इच्छानुसार अध्यापक नहीं चलता और न अपराधियों की इच्छानुकूल शासक अपना धर्म छोड़ देता है। कर्तव्यनिष्ठ मनुष्य भूले भटके और भ्रमवश दोषारोपण करने वालों की रत्ती भर भी परवाह नहीं करता, वरन् उन्हें सुधारने के लिए कड़ुवे कार्यों को भी करता है, फिर भले ही उसे इसके लिए विरोध, उपहास या कष्टों का सामना करना पड़े।
  
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1941

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👉 दिव्य विभूतियां कैसे प्राप्त हों?

तुम अपने मन में जैसे विचार करते हो वैसे ही बन जाते हो। इसलिए वैसे विचार करो जैसे कि तुम बनना चाहते हो। मन की भावनाओं का असर जीवन के कार्यों पर और उन कार्यों का असर शरीर पर पड़ता है। यदि तुम अपने शरीर को उन्नत बनाना चाहते हो, जीवन की गतिविधि में महत्वपूर्ण परिवर्तन करना चाहते हो तो पत्ते-पत्ते पर मत भटको! जड़ को तलाश करो। जीवन की सम्पूर्ण समस्याओं का आधार मन है और उस मन कार्य विचार है। छोटी परिस्थिति में हो तो भी कुछ हर्ज नहीं। विचार उच्च रखो। स्वार्थ, कपट, ढोंग और हिंसा के विचार मनुष्य के सब से बड़े शत्रु हैं, सिंह और सर्प की तरह इनसे दूर रहो।

परोपकार, प्रेम, दया और त्याग के शुभ विचारों से अपना हृदय भरपूर रक्खो। किसी की सक्रिय सहायता न कर सको तो भी दूसरों के लिये दो बूँद सहानुभूति के आँसू बहा दो। तुम्हारे विचार जितने पवित्र होते जायेंगे उतना ही हृदय विशाल बनता जायगा। तुम्हारा हृदय जितना विशाल होगा उसमें उतनी ही अधिक विभूतियाँ परमात्मा द्वारा भर दी जायेंगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवंबर 1940 पृष्ठ 1

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👉 दर्पण के माध्यम से आत्म परिष्कार की साधना

पशु-पक्षियों और कीट, पतंगों की तुलना में अशिक्षित एवं अनगढ़ व्यक्ति भी कहीं अधिक साँसारिक जानकारियाँ संग्रह किये होता है। पर वे होतीं सब बाहरी क्षेत्र की ही हैं। अपने संबंध में प्रायः सभी महत्वपूर्ण जानकारियों से वह अनभिज्ञ ही रहता है। कुछ जानता भी है तो वह मात्र प्रयोगात्मक ही होता है। वस्तुस्थिति समझ सकने योग्य गहराई में प्रवेश पाना प्रायः उससे बन ही नहीं पड़ता। जो आँखें केवल सामने की हलचलों, स्थापनाओं को ही देख पाती हैं वे उलट कर भीतर कैसे देखें? गह्वर में कैसे प्रवेश करें? पर्दे के पीछे छिपी हुई यथार्थताओं को कैसे समझें?

त्वचा के भीतर किस अंग अवयव में क्या गड़बड़ है, उसे जानने के लिए टटोलना भर पर्याप्त नहीं होता। इसके लिए कितने ही पैथालॉजीकल टेस्ट कराने पड़ते हैं। एक्सरेज तथा थर्मोग्राफी के माध्यम से अन्दर की स्थिति का मापन कर परिस्थितियों को समझा जाता है। यही बात मानव जीवन के अन्तराल पर भी लागू होती है। दूसरों की समीक्षा में प्रवीण अपनी निजी जाँच-पड़ताल में व्यक्ति उतनी ही असफल रहता है। समझा जाता है कि संसार भर में बुद्धि का परिमाण डेढ़ है। इसमें से एक अपने हिस्से में आई है और बाकी आधी से संसार के सब लोग मिल बाँट कर काम चलाते हैं। यही बात दोष, दुर्गुणों के संबंध में भी है। दो तिहाई दोष दूसरों में हैं और अपने में तो वे नगण्य सी मात्रा में हैं। इसी भ्रम में सारी दुनिया आकण्ठ मग्न है। अपने दोष और दूसरों के गुण तो किसी की समझ में आते ही नहीं।

किन्तु जब तक वस्तुस्थिति न समझी जाय, तब तक अवगति से उबरना और प्रगति पथ पर आगे बढ़ चलना सम्भव कैसे हो? सुधार परिष्कार यदि अभीष्ट हो तो उसके लिए आत्म-समीक्षा नितान्त आवश्यक है। यह बन पड़े तो ही परिमार्जन बन पड़े और उसी स्थिति में अभ्युदय के लिए आवश्यक सरंजाम जुटे।

इस प्रयोजन के लिए साधना क्षेत्र का एक सरल उपाय है-दर्पण का अवलम्बन। एक बड़ा-सा शीशा इसके लिए प्रयुक्त करना चाहिए। दर्पण ऐसा हो कि पालथी मार कर बैठने पर पूरा शरीर दीख सके। किन्तु दूरी अधिक न हो। ऐसे बड़े आकार का वह मिल सके तो सर्वोत्तम, अन्यथा छोटे साइज से भी काम चलाया जा सकता है। गरदन तक चेहरा साफ-साफ दीखे तो भी समझना चाहिए कि काम चल गया।

दर्पण में दीखने वाले अपने प्रतिबिम्ब को अपना नहीं अपने किसी निकटवर्ती घनिष्ठ संबंधी का मानना चाहिए और भाव यह रखना चाहिए कि इसकी त्रुटियों का परिमार्जन करना है। सत्प्रवृत्तियों के बीजाँकुर विकसित करना है। सही राह पर चलने से यदि भटकाव हो गया है, तो उसे यथार्थता समझा कर सही रास्ते लाया जाता है। जो सम्पदा पास में है, उसके सदुपयोग का अभिवर्धन का उपाय समझाया जाता है। इन उद्देश्यों को ध्यान में रखकर अपना प्रतिबिम्ब गंभीरतापूर्वक देखा जाय और उसे समुन्नत सुसंस्कृत बनाने का दृष्टिकोण अपनाया जाय। आदर्शों की कसौटी पर जितनी खोट मिले, उसे सुधारने के लिए उपयुक्त प्रयास करने हेतु संकल्पित हुआ जाय।

सबसे बड़ी भूल आम आदमी से यह होती है कि वह अपने स्वरूप, जीवन के उद्देश्य और शरीर के साथ इसके प्रयोजन संबंध के बारे में जो समझना चाहिए, जिस प्रकार तालमेल बिठाने चाहिए उसे प्रायः पूरी तरह भूल जाता है। मनुष्य जीवन एक ऐसा सुयोग है, जो चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करने के उपरान्त एक बार अमानत के रूप में मिला है। यह सृष्टा की सर्वोपरि कलाकृति है। इसे सौंपा इसीलिए गया है कि निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति में उसका उपाय समग्र सतर्कता के साथ किया जाय। प्रसुप्त विभूतियों को जगाने के लिए तपश्चर्या का आश्रय लिया जाय। जन्म जन्मान्तरों के संचित कुसंस्कारों को धोने के लिए आत्मशोधन का प्रबल प्रयास किया जाय। अपूर्णता को पूर्णता में बदला जाय। साथ ही सेवा, संवेदना को उभार कर अपने स्वभाव में अधिकाधिक पुण्य परमार्थ का समावेश किया जाय। मानव की गरिमा इसी में सन्निहित है कि वह संकीर्ण स्वार्थपरता के भव बंधनों से निकल कर लोक हित में जन कल्याण में-कितना निष्ठापूर्वक संलग्न होता है। सृष्टा के विश्व उद्यान को सींचने, सँजोने में कितनी तत्पर तन्मयता का परिचय देता है। जीवन के इस उच्च उद्देश्य को निबाहने में जो जिस सीमा तक सफल होता है, वह उसी सीमा तक मनुष्य जन्म को सार्थक बनाने में सफल होता है। इस सफलता का उपहार पुरस्कार उसे देव मानव बनने के रूप में और सब प्रकार भविष्य को उज्ज्वल बनाने के रूप में उपलब्ध करता है। शालीनता अपनाने के फलस्वरूप व्यक्ति अपने लोक और परलोक दोनों को सुधारता है। निजी क्षेत्र में उल्लास भरा संतोष, संपर्क क्षेत्र में सम्मान भरा सहयोग और दैवी क्षेत्र में अदृश्य अनुग्रह के रूप में उतना कुछ मिलता है जिससे कि तुष्टि, तृप्ति और शान्ति का-हर घड़ी उल्लास भरे आनन्द का-रसास्वादन किया जा सके।

दर्पण में दीख पड़ने वाले अपने परम आत्मीय छाया पुरुष से यही पूछना चाहिए। उसके उत्तर न देने पर भी अपनी तीव्र दृष्टि से यह परखना चाहिए कि इन प्रश्नों का सकारात्मक उत्तर इसके पास है या नहीं? यदि नहीं तो उसे परम प्रिय होने के नाते इस हितैषिता की शिक्षा देनी चाहिए कि मृत्यु का कोई ठिकाना नहीं। बिस्तर किसी भी समय गोल करना पड़ सकता है। ऐसी दशा में यही उचित है कि जो बीत गया, उसमें हुई भूलों के लिए पश्चाताप करते हुए शेष है, उसे श्रेष्ठतम बनाने के लिए इसी क्षण से मुड़ पड़ा जाय। समय को आलस प्रमाद में न बिताया जाय। यह वर्तमान ही है, जिसमें दिशा बदलने का काम अविलम्ब आरम्भ किया जा सकता है और तेजी से कदम बढ़ाते हुए निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है।

माता बच्चे को गोद में उठाने से पहिले उसके शरीर से लिपटी हुई गंदगी को साफ कर लेती है। कीचड़ से, मल मूत्र से सने हुए व्यक्ति को कोई व्यक्ति प्रसन्नतापूर्वक पास नहीं बैठने देता। उससे वार्त्तालाप, व्यवहार करने से पूर्व यह चाहता है कि वह शुद्ध होकर आये। स्वच्छ घर, स्वच्छ पात्र, स्वच्छ परिधान, स्वच्छ शरीर सभी को सुहाता है, भगवान को भी। इसलिए प्रथम दृष्टि यही डाली जानी चाहिए कि गुण, कर्म, स्वभाव में कहाँ-कहाँ ऐसी दुष्प्रवृत्तियों का समावेश हो रहा है, जो मानवी गरिमा के अनुरूप नहीं हैं। इन्हें खोजने के लिए तनिक भी पक्षपात नहीं बरतना चाहिए। निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह स्वयं ही अपने छाया पुरुष की समीक्षा करनी चाहिए और उसका अतिशय शुभ चिन्तक परमप्रिय होने के नाते हित कामना से इतना दबाव देना चाहिए कि वह परामर्श मात्र सुनकर इस कान से सुने उस कान से न निकाल दे वरन् अभ्युदय की महत्ता समझने हुए अपने सुधार परिवर्तन के लिए सुनिश्चित संकल्प और सुदृढ़ संकल्प करे। यह प्रयास निरन्तर जारी रखा जाय, तो उसका प्रतिफल आश्चर्य जनक होता है। वाल्मीकि, अंगुलिमाल, बिल्व मंगल, जैसे कारण नहीं कि दर्पण में विराजमान अपना अभिन्न आत्म परिष्कार के द्वारा उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में निरत न हो सके।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖  अखण्ड ज्योति मई 1987 

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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