शनिवार, 17 दिसंबर 2022

👉 जीवन में सेवा का महत्त्व

प्राणी मात्र की सेवा करना मनुष्य का परम कर्त्तव्य है। इसे ही विराट ब्रह्म की आराधना कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है- ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्व भूत हिते रता:। जो सब जीवों का हित-चिंतन करते हैं, मुझे प्राप्त होते हैं। अत: साधक के लिए तो यह और भी आवश्यक हो जाता है कि वह लोक-आराधक बनें, सेवा भावी बनें।
  
विभिन्न दुर्गुणों का त्याग करने पर ही सेवा व्रत का पालन किया जा सकता है। स्वार्थ को छोड़े बिना सेवा का कार्य नहीं हो सकता। जिन्हें अपने इन्द्रिय सुखों की चिंता रहती है, वे व्यक्ति सेवा कार्य में कभी भी सफल नहीं हो सकते। सेवा व्रती का हृदय करुणा और दया से ओत-प्रोत होता है। वह विषयों के प्रति आसक्त नहीं रहता। वह सब भोगों से निवृत्त रहता है। त्याग के कारण उसमें गुण-ग्राहकता बढ़ती जाती है।
  
दु:खियों की सेवा, निर्बल की रक्षा और रोगियों की सहायता सेवा का मुख्य लक्ष्य है। सेवा व्रती साधक किसी की हानि नहीं करता, किसी का निरादर नहीं करता। वह निरभिमानी, विनयी और त्यागी होता है। उसका अंत:करण पवित्र होने से मन की चंचलता भी नष्टï हो जाती है।
  
सेवा व्रती का शरीर स्वच्छ रहना आवश्यक है। उसे अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान करना चाहिए। अपवित्र और  रोगी मनुष्य की प्रवृत्ति कभी स्वच्छ नहीं रहती। उनमें क्रोध, ईर्ष्या आदि की उत्पत्ति हो जाती है। इससे विभिन्न वासनाएँ भडक़ उठती हैं। फिर मनुष्य अपनी इन्द्रियाँ पर नियंत्रण नहीं रख पाता। जब असंयम का अधिकार बढ़ता है, तब दुष्कर्मों की वृद्धि होती है। सुख की कामना से की गई सेवा भोग में परिवर्तित हो जाती है तब साधक में अहंकार जाग्रत होता है। सत्य का लोप हो जाता है, पाप-वृत्तियाँ अपना पंजा कठोर करती हुई उसे बुरी तरह जकड़ लेती है।
  
स्थूल शरीर की इच्छाएँ मनुष्य के धर्म का अपहरण कर लेती हैं, उस समय अन्याय और दुराचार का बोलबाला होता है। यदि अपने मन पर नियंत्रण नहीं हो तो सेवा कुसेवा बन जायेगी और जीवन की सुख-शांति का लोप हो जायेगा। मन शुद्ध हो तो अपने-पराये में भेद नहीं रहता। जब वस्तुओं का लोभ नष्ट हो जाता है, तब सत् को अपनाना और शुद्ध संकल्पों में लीन रहना साधक के अभ्यास में आ जाता है। उसमें कर्त्तव्य परायणता का उदय होता है और विषमता मिट जाती है। भेदभाव दूर होकर परम तत्व के अस्तित्व का बोध होता है।
  
अहं का शोधन होने पर मान-अपमान की चिंता नहीं रहती, असत्य से मोह मिट जाता है। अनित्य वस्तुओं के प्रति विरक्ति उत्पन्न हो जाती है और राग-द्वेष, तेरा-मेरा का झंझट समाप्त हो जाता है। जीवन में निर्विकल्पता का आविर्भाव हो जाता है। सेवा द्वारा सुखों के उपभोग की आसक्ति समाप्त हो जाती है, अत: सब प्राणियों में  परमात्मा को स्थित मानते हुए जो तुम्हारी सेवा चाहे, उसी की  सेवा करो। सच्ची सेवा वह है जो संसार के आसक्ति पूर्ण संबंधों को समाप्त कर देती है। इसलिए किसी को अपना मान कर सेवा न करो, बल्कि सेवा को कर्त्तव्य मानकर सभी की सेवा करो। परमात्मा के अंश भूत होने के नाते सब प्राणियों को अपना समझना ही सद्बुद्धि है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

गुरुवार, 15 दिसंबर 2022

👉 लक्ष्य में तन्मय हो जाइए

मन बड़ा शक्तिवान है परन्तु बड़ा चञ्चल । इसलिए उसकी समस्त शक्तियाँ छितरी रहती हैं और इसलिए मनुष्य सफलता को आसानी से नहीं पा लेता। सफलता के दर्शन उसी समय होते हैं, जब मन अपनी वृत्तियों को छोड़कर किसी एक वृत्ति पर केन्द्रित हो जाता है, उसके अलावा और कुछ उसके आमने-सामने और पास रहती ही नहीं, सब तरफ लक्ष्य ही लक्ष्य, उद्देश्य ही उद्देश्य रहता है।

मनुष्य अनन्त शक्तियों का घर है, जब मनुष्य तन्मय होता है तो जिस शक्ति के प्रति तन्मय होता है, वह शक्ति जागृत होती और उस व्यक्ति को वह सराबोर कर देती है। पर जो लोग तन्मयता के रहस्य को नहीं जानते अपने जीवन में जिन्हें कभी एकाग्रता की साधना का मौका नहीं मिला, वे हमेशा डाल डाल और पात पात पर डोलते रहे परन्तु सफलता देवी के वे दर्शन नहीं कर सके।

जिन्हें हम विघ्न कहते हैं, वे हमारे चित्त की विभिन्न वृत्तियाँ हैं जो अपने अनेक आकार प्रकार धारण करके सफल नहीं होने देतीं। यदि हम लक्ष्य सिद्ध करना चाहते हैं तो यह आवश्यक है कि लक्ष्य से विमुख करने वाली जितनी भी विचार धारायें उठें और पथ-भ्रष्ट करने का प्रयत्न करें हमें उनसे अपना सम्बन्ध विच्छेद करते जाना चाहिए। और यदि हम चाहें अपनी दृढ़ता को कायम रखें, अपने आप पर विश्वास रखें तो हम ऐसा कर सकते हैं, इसमें किसी प्रकार का कोई सन्देह नहीं है। एक ऐतिहासिक घटना इस सम्बन्ध में हमें विशेष प्रकाश दे सकती है।

मन की अपरिमित शक्ति को जो लक्ष्य की ओर लगा देते हैं और लक्ष्य भ्रष्ट करने वाली वृत्तियों पर अंकुश लगा लेते हैं अथवा उनसे अपना मुँह मोड़ देते हैं वे ही जीवन के क्षेत्र में विजयी होते हैं, सफल होते हैं।

धनुष से छूटा बाण अपनी सीध में ही चलता जाता है, वह आस-पास की किसी वस्तु के साथ अपना संपर्क न रख कर सीधा वहीं पहुँचता है जो कि उसके सामने होती है। अर्थात् सामने की तरफ ही उसकी आँख खुली रहती है और सब ओर से बन्द। इसलिये जो लोग लक्ष्य की तरफ आँख रखकर शेष सभी ओर से अपनी इन्द्रियों को मोड़ लेते है और लक्ष्य की ओर ही समस्त शक्ति लगा देते हैं वे ही सफल होते हैं। उस समय अर्जुन से पूछे गये द्रोण के प्रश्न-उत्तर में अर्जुन की तरह उनकी अन्तरात्मा में एक ही ध्वनि गूँजती है अतः अपना लक्ष्य ही दिखाई देता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 10

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

बुधवार, 14 दिसंबर 2022

👉 सद्ज्ञान का संचय करो

सुख, धन के ऊपर निर्भर नहीं, वरन् सद्ज्ञान के ऊपर, आत्मनिर्माण के ऊपर निर्भर है। जिसने आत्मज्ञान से अपने दृष्टिकोण को सुसंस्कृत कर लिया है, वह चाहे साधन-संपन्न हो चाहे न हो, हर हालत में सुखी रहेगा। परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही प्रतिकूल क्यों न हों, वह प्रतिकूलता में अनुकूलता का निर्माण कर लेगा। उत्तम गुण और उत्तम स्वभाव वाले मनुष्य बुरे लोगों के बीच रहकर भी अच्छे अवसर प्राप्त कर लेते हैं।

विचारवान मनुष्यों के लिए सचमुच ही इस संसार में कहीं कोई कठिनाई नहीं है। शोक, दु:ख, चिंता और भय का एक कण भी उन तक नहीं पहुँच पाता। प्रत्येक दशा में वे प्रसन्नता, संतोष और सौभाग्य अनुभव करते रहते हैं।

सद्ज्ञान द्वारा आत्मनिर्माण करने का लाभ, धन जमा करने के लाभ की अपेक्षा अनेक गुना महत्त्वपूर्ण है। सचमुच जो जितना ही ज्ञानवान है, वह उतना ही बड़ा धनी है। यही कारण है कि निर्धन ब्राह्मण को अन्य संपन्न वर्णों की अपेक्षा अधिक सम्मान दिया जाता है।

मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी ज्ञान है। इसलिए वास्तविकता को समझो, धन के पीछे रात-दिन पागल रहने की अपेक्षा, सद्ज्ञान का संचय करो। आत्मनिर्माण की ओर अपनी अभिरूचि को मोड़ो।  

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति-जुलाई 1947 पृष्ठ 2


All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

रविवार, 11 दिसंबर 2022

👉 दृष्टिकोण मे परिवर्तन

संसार में हर दुर्जन को सज्जन बनाने की, हर बुराई के भलाई में बदल जाने की आशा करना वैसी ही आशा करना है जैसी सब रास्तों पर से काँटे-कंकड़ हट जाने की। अपनी प्रसन्नता और सन्तुष्टि का, यदि हमने इसी आशा को आधार बनाया हो, तो निराशा ही हाथ लगेगी।

हाँ, यदि हम अपने स्वभाव एवं दृष्टिकोण को बदल लें तो यह कार्य जूता पहनने के समान सरल होगा और इस माध्यम से हम अपनी प्रत्येक परेशानी को बहुत अंशो में हल कर सकेंगे।

अपने स्वभाव और दृष्टिकोण में परिवर्तन कर सकना कुछ समयसाध्य और निष्ठासाध्य अवश्य है, पर असम्भव तो किसी प्रकार नहीं है। मनुष्य चाहे तो विवेक के आधार पर अपने मन को समझा सकता है, विचारों को बदल सकता है और दृष्टिकोण में परिवर्तन कर सकता है।

इतिहास के पृष्ठ ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं जिनसे प्रकट है की आरम्भ से बहुत हलके और ओछे दृष्टिकोण के आदमी अपने भीतर परिवर्तन करके संसार के श्रेष्ठ महापुरुष बने हैं।

✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 संस्कृति - संजीवनी श्रीमद् भागवत एवं गीता वांग्मय - 31- 1.127

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo


👉 इस ढोंग से क्या फायदा?

माथे पर चन्दन पोतने से क्या फायदा? जब कि मन में बुराइयों के ढेर जमा हो रहे हैं। बाहरी बनावट से कुछ काम न सरेगा जबकि दिल मक्कारियों की गठरी बना हुआ है। चेहरे को विशेष आकृति का बनाकर धर्मात्मा नहीं बना जा सकता है। ढोंग करना सज्जनों का काम नहीं, ठगों का व्यापार है। बाहर से उजला और भीतर से मैला मनुष्य उस गधे के तुल्य है जो शेर की खाल ओढ़े फिरता है, पर घरों पर चरता है। धर्मात्मा बनने वाला दुराचारी उस बधिक की तरह है कि जो जाल बिछा कर झाड़ियों के पीछे छिपा रहता है और भोली चिड़ियों को फँसाता है। अपवित्र मन को लेकर तीर्थ में जाने से कुछ लाभ न होगा।

मन में वासनायें भरी रहे और बाहर से त्याग का आडंबर करें, तो उससे क्या प्रयोजन? ढोंगी आदमी समझता है कि मैं दूसरों को खूब चकमा देता हूँ, परन्तु यथार्थ में वह अपने सिवाय और किसी को नहीं ठग सकता। जो दूसरों की दृष्टि में धर्मात्मा बनता है, पर अपनी दृष्टि में पापी है, वह अन्त समय बहुत पछतावेगा और कहेगा-हाय! मैंने अपने हाथों अपना नाश क्यों किया? जिनका हृदय पवित्र है, उन्हें आडम्बर की क्या जरूरत? अगर तुम्हारे हृदय में त्याग मौजूद है, तो न सिर घुटाने की जरूरत है और न जटा रखने की।

ऋषि तिरुवल्लुवर
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1942 पृष्ठ 25

http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1942/July.25

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

शनिवार, 10 दिसंबर 2022

👉 आत्मनिर्माण सबसे बड़ा पुण्य-परमार्थ है

इस संसार में अनेक प्रकार के पुण्य और परमार्थ हैं। दूसरों की सेवा-सहायता करना पुण्य कार्य है, इससे कीर्ति, आत्मसंतोष तथा सद्गति की प्राप्ति होती है। इन सबसे भी बढ़कर एक पुण्य-परमार्थ है और वह है-`आत्मनिर्माण’। अपने दुर्गुणों को, विचारों को, कुसंस्कारों को, ईर्ष्या, तृष्णा, क्रोध, द्रोह, चिंता, भय एवं वासनाओं को, विवेक की सहायता से आत्मज्ञान की अग्नि में जला देना इतना बड़ा धर्म है, जिसकी तुलना सहस्र अश्वमेधों से नहीं हो सकती। 

अपने अज्ञान को दूर करके मन-मंदिर में ज्ञान का दीपक जलाना, भगवान की सच्ची पूजा है। अपनी मानसिक-तुच्छता, दीनता, हीनता, दासता को हटाकर निर्भयता, सत्यता, पवित्रता एवं प्रसन्नता की आत्मिक प्रवृत्तियाँ बढ़ाना, करोड़ मन सोना दान करने की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है।

हर मनुष्य अपना-अपना आत्मनिर्माण करे, तो यह पृथ्वी स्वर्ग बन सकती है। फिर मनुष्यों को स्वर्ग जाने की इच्छा करने की नहीं, वरन् देवताओं को पृथ्वी पर आने की आवश्यकता अनुभव होगी। दूसरों की सेवा-सहायता करना पुण्य है, पर अपनी सेवा-सहायता करना, इससे भी बड़ा पुण्य है। अपनी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक नैतिक और आध्यात्मिक स्थिति को ऊँचा उठाना, अपने को एक आदर्श नागरिक बनाना, इतना बड़ा धर्म-कार्य है, जिसकी तुलना अन्य किसी भी पुण्य-परमार्थ से नहीं हो सकती। 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति-फरवरी 1947 पृष्ठ 1


All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 जीवन में सच्ची शांति के दर्शन

मुनष्य के अंत:स्थल में जो शुद्ध-बुद्ध-चैतन्य, सत् -चित् -आनंद, सत्य-शिव-सुंदर, अजर-अमर सत्ता है, वही परमात्मा है। मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार के चतुष्टय को जीव कहते हैं। यह जीव-आत्मा से भिन्न भी है और अभिन्न भी। इसे द्वैत भी कह सकते हैं और अद्वैत भी। अग्नि में लकड़ी जलने से धुँआ उत्पन्न होता है। धुँए को अग्नि से अलग कहा जा सकता है, यह द्वैत है। धुँआ अग्नि के कारण उत्पन्न हुआ है, अग्नि बिना उसका कोई अस्तित्व नहीं, वह अग्नि का ही अंग है, अत: अद्वैत है। आत्मा अग्नि है और जीव धुँआ है। दोनों अलग भी हैं और एक भी। उपनिषदों में इसे एक वृक्ष पर बैठे हुए दो पक्षियों की उपमा दी गई है। गीता में इन दोनों का अस्तित्व स्वीकार करते हुए एक को क्षर (नाशवान्) एक को अक्षर (अविनाशी) कहा गया है।

भ्रम से, अज्ञान से, माया से, शैतान के बहकावे से, इन दोनों की एकता पृथकता में बदल जाती है। यही दु:ख का, शोक का, संताप का, क्लेश का, वेदना का कारण है। जहाँ मन और आत्मा का एकीकरण होता है, जहाँ दोनों की इच्छा, रुचि एवं कार्य-प्रणाली एक होती है, वहाँ अपार आनंद का स्रोत उमड़ता रहता है। जहाँ दोनों में विरोध होता है, जहाँ नाना प्रकार के अंतर्द्वन्द्व चलते हैं, वहाँ आत्मिक शांति के दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं। दोनों का दृष्टिकोण एक होना चाहिए, दोनों की इच्छा रुचि एवं कार्य-प्रणाली एक होनी चाहिए, तभी जीवन में सच्ची शांति के दर्शन हो सकते हैं। 

📖 अखण्ड ज्योति-अप्रैल 1947 पृष्ठ 3


All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 हम पुरुष से पुरुषोत्तम बनें।

मानवीय शक्तियों का कोई अन्त नहीं, वे इतनी ही अनन्त हैं जितना यह आकाश। ईश्वरीय चेतना का प्रतीक प्रतिनिधि मानव प्राणी उन सब सामर्थ्यों को अपने अन्दर धारण किये हुए है, जो उनके पिता परमेश्वर में विद्यमान हैं। यदि आत्मा और परमात्मा का संयोग सम्भव हो सके तो साधारण सा दीन दीख पड़ने वाला व्यक्ति नर से नारायण बन सकता है और उसकी महानता परमात्मा जितनी ही विशाल हो सकती है।

आत्मा और परमात्मा में अन्तर उत्पन्न करने वाली माया और कुछ नहीं, केवल अज्ञान का एक इतना कलेवर मात्र है। भौतिक आकर्षणों, अस्थिर संपदाओं और उपहासास्पद तृष्णा वासनाओं में उलझे रहने से मनुष्य के लिए यह सोच समझ सकना कठिन हो जाता है कि वह जिस अलभ्य अवसर को - मनुष्य शरीर को प्राप्त कर सकता है। वह एक विशेष सौभाग्य है और उसका सदुपयोग जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, विशेष उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही होना चाहिए। शरीर का ही नहीं आत्मा का भी आनन्द ध्यान में रखना चाहिए।

यदि हम अपने स्वरूप और कर्तव्य को समझ सकें और तदनुकूल करने के लिए तत्पर हो सकें तो इस क्षुद्रता और अशांति से सहज ही छुटकारा पाया जा सकता है जिसके कारण हमें निरन्तर क्षुब्ध रहना पड़ता है। अज्ञान की माया से छुटकारा पाना ही मनुष्य का परम पुरुषार्थ है। ऐसे पुरुषार्थी को ईश्वरीय महानता उपलब्ध हो सकती है और वह पुरुष से पुरुषोत्तम बन सकता है।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति नवम्बर 1964 पृष्ठ 1

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 भगवान पवित्रता के क्षीर सागर में विराजते हैं

मनुष्य जीवन व्यापार में सतत् अपने आपको एक धोखा देता रहता है कि कहीं न कहीं से उस पर उसकी बाह्योपचार प्रधान पूजा-प्रार्थना-आरती आदि से अनुदान बरसेंगे एवं उसके अभाव दूर हो जायेंगे। भगवान का नाम लेकर लोग लाटरी का टिकट खरीदते देखे जाते हैं व यह मान बैठते हैं कि इसके बदले उन्हें जरूर कहीं न कहीं से छप्पर फाड़ कर भगवान धन बरसा देंगे।

बाहरी पूजा स्वयं करने का मौका नहीं मिलता तो किसी और से करवा के यह समझते हैं कि उसका लाभ अपने को मिल गया, चाहे स्वयं ने कितने ही पाप क्यों न किये हों, अचिन्त्य चिन्तन क्यों न विगत में किया जाता रहा हो तथा वर्तमान के क्रिया−कलाप भी वैसे ही क्यों न चल रहे हों। यह एक छलावा है, भ्रान्ति है तथा आत्मप्रवंचना मात्र है। भगवान को नितान्त घटिया मान बैठना, यही समझ बैठना कि जरा-सी प्रार्थना से बिना अन्तरंग साफ किये बिना औरों के प्रति संवेदना जीवन में धारण किये भगवान प्रसन्न हो अनुदान बरसा देगा तो फिर इससे बड़ी नासमझी दुनिया में कोई नहीं हो सकती।

आज बहुसंख्य व्यक्ति धर्म के इसी रूप को जीवन में धारण किये-दिखाई देते हैं। यदि इनने सही मायने में धर्म समझा होता तो सबसे पहले अपने अन्तरंग को निर्मल बनाया होता। भगवान तो इतने दयालु-क्षमा वत्सल हैं कि वे भक्त के निष्काम भाव से, उनकी शरण में आ जाने पर उसके पूर्व के सब पापों का बोझ अपने पर लेकर उसे न जाने कहाँ से कहाँ पहुँचा देते हैं। शर्त एक ही है कि निश्छल भाव से समर्पण कर फिर खोदी खाई को पाटने का पुरुषार्थ किया जाता रहे तो भगवत्कृपा व सत्कर्म दोनों मिलकर व्यक्ति की आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त कर देते हैं।

भगवान ने गीता में स्वयं यह कहा है कि पापियों से भी अधिक पाप करने वाला भी मेरी शरण में आ जाय तो वह ज्ञान रूपी नौका द्वारा सम्पूर्ण पाप समुद्र से भली भाँति स्वयं को तार सकता है(4/35)। फिर व्यक्ति आत्मोन्मुख हो उस ज्ञान को प्राप्त करने का प्रयास क्यों नहीं करता जो उसे पवित्रता के अनन्त स्रोत से जोड़ता है। यदि अध्यात्म का यह मर्म समझा जा सके तो बहुत से व्यर्थ के समयक्षेप करने वाले उपचारों से बचकर स्वयं को अपने समय व सारी विभूतियों को भगवत्परायण बनाते हुए निहाल हुआ जा सकता है। इस तत्व दर्शन को समझने में ही मनुष्य का हित है।

अखण्ड ज्योति – अक्टूबर 1995 पृष्ठ 1

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

सोमवार, 5 दिसंबर 2022

👉 आध्यात्मिक साधना के त्रिदोष

👉 आध्यात्मिक साधना के त्रिदोष 

प्रत्येक प्राणी उन्नति की ओर अग्रसर होना चाहता है, पर जहाँ तक बाधक कारणों का सम्यक् परिज्ञान न हो एवं उनको दूर न किया जाये, उन्नति असंभव है। आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी उसके बाधक कारणों को जानना परमावश्यक होता है। लेख में वैसे तीन दोषों पर संक्षेप में प्रकाश डाला जा रहा है। 1.ममत्व, 2.कपट और 3.अवगुणग्राही दृष्टि। जहाँ तक ये दोष रहेंगे, वहाँ तक साधना अग्रसर एवं फलवती नहीं होगी।

1.ममत्व- जहाँ तक साँसारिक पदार्थों में आत्मा की आशक्ति रहेगी, आत्मा का लक्ष्य बहिर्मुखी रहने के कारण आत्मानुभव का मार्ग बन्द ही रहेगा। इसलिए सारे भौतिक पदार्थों भाषों से अपनी आत्मा को अलग, भिन्न, समस्त कर उनके आकर्षण को रोकना बहुत ही आवश्यक है पर पदार्थों की आसक्ति हटते ही आत्मा के स्वरूप का दर्शन एवं अनुभव होगा, आत्मोन्नति का प्रथम सोपान है। जिन-जिन वस्तुओं को आत्मा मेरी अपनी समझता है उनकी प्राप्ति अभिवृद्धि में हर्ष एवं विनाश-क्षीणता में होता है। जहाँ ममत्व भाव नहीं वहाँ हर्ष शोक का प्रादुर्भाव नहीं होता है होता है तो अत्यल्प एवं क्षणिक।

आत्मा द्रव्य वास्तव में इन पाँच द्रव्यों से सर्वथा भिन्न है दृश्यमान सभी पदार्थ पौद्गलिक (भौतिक) है, क्योंकि पुद्गल के सिवाय सभी पदार्थ अरूपी हैं अरूपी पदार्थों पर आसक्ति नहीं होती । जिसे हम देखते हैं, सुनते हैं, खाते हैं, सूँघते हैं और स्पर्श करते हैं अर्थात् पाँचों इन्द्रियों द्वारा जिनके साथ हम अपना किसी प्रकार का सम्बन्ध करते हैं उन्हीं का मन विचार करता है अच्छे या बुरे मेरे या तेरे की कल्पना करता है उस कल्पना के द्वारा ही आत्मा अपने स्वरूप (विचार) से च्युत होकर उनके प्रति आकर्षित होती है। इसीलिए “मैं और मेरा” इसी को मोह का मूलमन्त्र माना गया है और मोह ही आत्मा का परम शत्रु सबसे प्रबल बाधक कारण माना गया है।

पर पदार्थों के संयोग से आत्मा विभाव दशा को प्राप्त होती है। इसीलिए सर्व संग परित्याग-अपरिग्रहता-निर्ग्रन्धता को जैन धर्म में प्रमुख स्थान दिया गया है। जैन तीर्थंकर स्वयं इनका आदर्श उपस्थित करते हैं अर्थात् साधना का आरम्भ सर्वसंग परिसंग परित्याग से ही करते हैं। आसक्ति का परिहार पदार्थों-द्रव्यों के स्वरूप को ज्ञान एवं परिणामों के द्वारा होता है। इनका मूलमन्त्र है “एगोहूँ नत्थि में कोह नाह मनस्स कस्सवि”-मैं किसी का नहीं-मेरी आत्मा अकेली है।” मनुष्य जरा सा विचार करे तो इस अकेलेपन का सहज अनुभव हो जाता है। जन्म-ग्रहण के समय आत्मा अकेली ही उत्पन्न होती है सत्य के समय भी सारे पदार्थों को छोड़कर वह अकेली ही परलोक जाती है। रोगादि दुख भी आत्मा को अकेले ही भोगने पड़ते है अतः आत्मा अकेली ही है बाह्य संयोग धन, दौलत, कुटुम्ब परिवार यावत् देह भी अपना नहीं हैं। तब उन पर समत्व रखना मूर्खता व अज्ञानता नहीं तो क्या है। योगी पुरुषों ने सबसे बड़ी भूल इसी को बतलाया है कि जो पदार्थ अपने नहीं उन्हें अपना मान लेना और अपने स्वरूप को भूल जाना

बहिर्मुखी वृति के कारण आत्मा की सारी शक्ति बाह्य पदार्थों की ओर लगी है और वह उनके लाभ हानि में ही सुख-दुख मान बैठा है, अन्यथा सुख व आनन्द कहीं बाहर से आने वाली चीज नहीं। सच्चे स्वरूप के अज्ञान के कारण ही वह इधर दौड़ धूप कर रहा है। यदि मैं अकेला हूँ, कोई भी चीज मेरी नहीं है तब उन पर आसक्ति कैसी? आनन्द यदि मेरे पास है तो उसकी प्राप्ति के लिए दौड़ धूप क्यों? इसी पर विचार करिये। पोद्गलिक-सभी पदार्थ रूप वाले विनाशी हैं, आत्मा अरूपी एवं अविनाशी है दृश्यमान सभी चीजें पुद्गल की बनी हुई हैं अतः ममत्व को हटाकर आत्मा का अन्तर्मुखी होना आध्यात्मिक साधना के लिए परमावश्यक कार्य है।

2. कपट- वस्तु के स्वरूप को अन्य प्रकार से दिखलाने का प्रयत्न कपट है मेरे हृदय में कुछ और ही। यह आत्मोन्नति का परम बाधक कारण है इस प्रपंच जाल से आत्मा बड़ी मलिन हो जाती है। भूमिका की शुद्धि के बिना सुभग चित्रों का आलेखन संभव नहीं। इसी प्रकार आत्मा का सरल-निष्कपट होना उसकी भूमिका शुद्धि है। जहाँ तक बकता है भ्रम फैलाने की वृति काम कर रही है, वहां तक सद्वृत्तियाँ पनप नहीं सकती। चित्त बहिर्मुखी बना रहता है। कैसे अपने दोषों को छिपाया जाये दूसरे को ठगा जाये, इसी में चित्त फंसा रहता है। वहाँ सुविचारों को अवकाश कहाँ? जो पापी है और अपने आपको छिपाने का प्रयत्न कर लोगों के समक्ष अपने को धर्मी दिखलाने की कोशिश करता है, उसका सुधार बहुत ही कठिन है।

3. अवगुणग्राही दृष्टि- यह भी एक बड़ा भारी अवगुण है इसके कारण मनुष्य अवगुणों की ओर अग्रसर होता है। ऐसी आत्मा हजार गुणों को नहीं देखती बल्कि छिद्रान्वेषी होकर अवगुण की ओर ही झुकती है। यह नहीं सोचती कि दोष हम सब में है किसी में कम और किसी में अधिक और पराये दोषों को देखने से लाभ ही क्या? एक सन्त ने इस सम्बन्ध में बहुत ही सुन्दर कहा है, “हे आत्मा दूर जलती हुई अग्नि को क्या देखता है। तेरे स्वयं पैरों में द्वेषों की अग्नि सुलग रही है उसे देखो, पराये मैल में कपड़े धोने से वे उज्ज्वल कैसे होंगे। थोड़े बहुत अवगुण सभी में होते हैं तुम्हारे में भी हैं तो अपने दोषों को क्यों नहीं देखते पराई निन्दा में क्यों लगे हो। निन्दा करने की यदि तुम्हारी आदत ही पड़ गई है तो अपने दोषों की निन्दा करो। अतः अपने दोषों की ओर दृष्टि डालों और दूसरे की निन्दा को छोड़ो।

“मनुष्य जैसे विचारों में रहता है वैसा ही बन जाता है” अवगुणों को ढूँढ़ने की दृष्टि रखने से स्वयं अवगुण का भाजन हो सकता है। इसीलिए इस दृष्टि दोष को निवारण कर हमें अपनी दृष्टि को गुण ग्राहक बनाना आवश्यक है। अवगुण देखने हो तो अपने देखो, जिससे उन्हें छोड़ने की भावना जगे तथा आत्मा दोष रहित बने। औरों के तो गुण ही देखो जिससे गुणी बने और गुणों के प्रति तुम्हारा आकर्षण बढ़े।

इन तीनों विवेचना का सार यही है कि इनके द्वारा आत्मा को बढ़ने का अवकाश भी नहीं होता। अतएव बहिर्मुखी वृत्तियों की ओर से हटकर अन्तर्मुखी होने का लक्ष्य रखा जाय। महत्व, कपट और अवगुण ग्राही दृष्टि से बचा जाय तभी आत्मोन्नति होगी।

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1950 पृष्ठ 14

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 अध्यात्म क्षेत्र की सफलता का सुनिश्चित मार्ग

अध्यात्म का एक पक्ष है- योग और तप। दूसरा है पुण्य परमार्थ। दोनों की संयुक्त शक्ति से ही समग्र शक्ति उभरती और स्थायी सफलता की पृष्ठभूमि बनती है। एक पहिये की गाड़ी कहाँ चलती है? एक पैर से लम्बी यात्रा करना और एक हाथ से तलवार चलाते हुए युद्ध जीतने का उपक्रम कहाँ बनता है?  

योग का तात्पर्य है- भावना, आकाँक्षा, विचारणा की उत्कृष्टता के साथ जोड़ देने वाला चिन्तन प्रवाह। ताप का अर्थ है- संयम, अनुशासन, परिशोधन, साहस और अनौचित्य के साथ संकल्प युक्त संघर्ष। यहाँ उतना बन पड़े तो समझना चाहिए कि आत्मोत्कर्ष का सुनिश्चित आधार खड़ा हो गया। आत्मबल का भण्डार भरा और व्यक्ति सर्व समर्थ-सिद्ध पुरुष- महामानव बना।   

इस उपार्जित आत्म-शक्ति का उपयोग विलास, वैभव, यश सम्मान के लिए करना निषिद्ध है। उसे ईश्वर के खेत में बीज की तरह बोया और हजार गुना बनाने के लिए सोचा संजोया जाना चाहिए। यही है- पुण्य परमार्थ  का मार्ग। साधु ब्राह्मण-योगी-यती आजीवन लोक मंगल के प्रयोजनों में अपनी क्षमता नियोजित करते रहे हैं। यही है समग्रता का मार्ग जो भी साधक इस अध्यात्म तत्व दर्शन के सिद्धान्त एवं विज्ञान को समझेंगे अपनायेंगे। वे इस क्षेत्र में चरम सफलता प्राप्त कर सकने में समर्थ होंगे, यह निश्चित है। निराशा तो भ्रमग्रस्त में -टकराव में उलझने वाले-सस्ते रास्ते ढूंढ़ने वालों को ही हैरान करती है 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- नवम्बर 1983 पृष्ठ 1


All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

रविवार, 4 दिसंबर 2022

👉 आध्यात्मिकता की कसौटी

कोई भी मनुष्य इसलिए बड़ा नहीं कि वह अधिक से अधिक सांसारिक पदार्थों का उपभोग कर सकता है। अधिक से अधिक ऐश्वर्य जुटाने वाले तो बहुधा लुटेरे होते हैं। वे संसार को जितना देते हैं, उससे कहीं अधिक उससे छीन लेते हैं।

हम मनुष्य की सेवा-शक्ति को दृष्टि में रख कर ही उसे महान नहीं कह सकते। उसकी महानता की कसौटी यह नहीं हो सकती, क्योंकि इसके द्वारा परखे जाने पर तो अनेक पशु-पक्षी भी उसकी श्रेणी में आ विराजेंगे। सभी जानते हैं कि चूहे, शृगाल, सुअर, कुत्ते, कौए, गिद्ध आदि पशु-पक्षी भी सड़े-गले और मल-मूत्रादि पदार्थों को खाकर वातावरण को शुद्ध कर देते हैं। यह भी प्रकट है कि सड़े-गले पदार्थों को शीघ्र ही हटा देने का जो उत्साह इन पशु-पक्षियों में पाया जाता है, वह प्राय: हम मनुष्य कहलाने वालों में भी नहीं पाया जाता। अतएव न तो कर्म का परिणाम और न कर्मोत्साह ही महानता की कसौटी हो सकता है।

अत: मनुष्य की परख उसके कार्य के परिणाम से नहीं, किन्तु उस कार्य को प्रेरणा देने वाली भावनाओं से की जानी चाहिए। जैसा मनुष्य का भाव हो, उसे वैसा ही समझना चाहिए। भगवान कृष्ण ने भी तो कहा है कि `सभी मनुष्यों की भावना (श्रद्धा) उनके अंत:करण के अनुरूप होती है। इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धा वाला है, वह स्वयं भी वही है।’

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति-मार्च 1948 पृष्ठ 17   

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 आत्म-ज्ञान को प्राप्त करो। (भाग 1)

हे सौम्य! हे सत्यकाम! ‘मैं कौन हूँ’ यह मालूम कर। अपने भीतर टटोल। इस संसार व शरीर की वास्तविकता को बूझ। जैसे ही तू जाग जाता है तेरा स्वप्न झूठा हो जाता है। इसी प्रकार जब तुझे आत्म ज्ञान हो जायगा तब यह संसार असत्य हो जायगा- अदृश्य हो जायगा। संसार केवल मन की उपज है। इसका अस्तित्व केवल सम्बन्ध रखता हुआ, परिवर्तनशील एवं परतन्त्र तथा दृष्टि विषयक और निर्भर रहने वाला है। यह ब्रह्म से निकला है, उसी में रहता है तथा अन्त में उसी में मिल जाता है।

हे सत्यकाम! तेरा प्रथम कर्त्तव्य अपनी आत्मा को पहचानना है। यह आत्मा अनन्त है तथा आत्मप्रकाश है। इस तुच्छ अपनेपन को नष्ट कर दें और सच्चिदानन्द आत्म से संपर्क रख। शरीर, स्त्री, सन्तान, तथा धन में जो आसक्ति है उसका त्याग कर दे। इच्छाओं स्वार्थ व ‘अपनेपन’ को तिलाँजलि दे दे तथा उस पूर्णज्ञान ‘निर्विकल्प समाधि’ को प्राप्त कर जिसमें न कोई विषय है, न उद्देश्य, न प्रसन्नता है, न दुःख, न सर्दी है न गर्मी, न भूख है न प्यास। तब तू सर्वश्रेष्ठ आनन्द, अनन्त शान्ति, असीम ज्ञान तथा अमर गति का भोग करेगा।

तू अज्ञान के आवरण से कृत्रिम निद्रा के वशीभूत है। तू आत्म ज्ञान द्वारा कृत्रिम निद्रा से जाग और ‘अमर गति’ को जान। तू कब तक माया के फन्दे में फंसा रहना चाहता है। बहुत हो चुका। अब तू इन बन्धनों को तोड़। अविधा की जंजीर को तोड़ दे-उन पाँच पर्दों को फाड़ दे और इस हाड़-माँस के पिंजरे से विजयी होकर निकल आ। मेमने की भाँति ‘मैं-मैं’ न कर, बल्कि ओऽम्-ओऽम्-ओऽम् की गर्जना कर, ओऽम्-ओऽम्-ओऽम् का स्मरण कर, स्वीकार कर, सिद्ध कर और पहचान। अपनी आत्मा को पहचान और इसी क्षण बन्धन से मुक्त हो जा। तू ही सम्राटों का सम्राट है- तू ही सर्वश्रेष्ठ है। उपनिषदों के अन्तिम शब्द ध्यान में ला। ‘तत् त्वं असि’- ‘तू’ ही ‘वह’ है। मेरे प्रिय सत्यकाम! ‘उसे’ जान- ‘उसे’ जानना ही ‘वह’ बन जाना है।

अपने भीतर टटोल। अपने को समस्त विचारों से विमुक्त कर ले। विचार शून्य बन जा। सत्य और असत्य की पहचान कर। अनन्त और अदृश्य में भेद कर। इस बहते हुए मन को बार-बार केन्द्रित करने की चेष्टा कर। विपरीत की द्वन्द्वता से ऊपर उठ। नेति-नेति, के पाठ का अध्ययन कर। धोखे के चक्रों का नाश कर दे। अपने को सर्वव्यापक आत्मा से मिला। आत्म ज्ञान प्राप्त कर और उस सर्वश्रेष्ठ आनन्द का भोग कर।

धर्म की प्रथम घोषणा यही है कि आत्मा एक है। ‘एक’ अनेक नहीं हो सकता। यह कैसे सम्भव है? एक अनेक के समान प्रतीत अवश्य होता है। जैसे रेगिस्तान में जल का आभास किसी स्थिति विशेष में मनुष्य, आकाश में नीलिमा, सीप की चाँदी तथा रस्सी का साँप। इसे ‘अध्यात्म’ कहते हैं। इस अध्यात्म को ब्रह्म- चिन्तन अथवा ज्ञान-अध्यात्म द्वारा नष्ट कर दे और ब्रह्मशक्ति द्वारा चमत्कृत हो। ब्रह्म अवस्था को पुनः प्राप्त करने की चेष्टा कर। अपने सत्-चित्त आनन्द स्वरूप में रमण कर।

अज्ञान के कारण ही दुख और क्लेश व्यापते हैं। अपनी वास्तविक प्रकृति को पहचान और अनुभव कर। वास्तव में अस्तित्व, ज्ञान और सुख सम्पूर्ण हैं। तू वास्तव में अमर है तथा सर्वव्यापक आत्मा है। उपनिषद् के इस उपदेश को स्मरण रख “जीव और ब्रह्म एक है” ओऽम् के रहस्य पर विचार कर और अपने स्वरूप में स्थित हो। केवल आत्म-ज्ञान द्वारा ही अज्ञान तथा तीनों क्लेशों का नाश किया जा सकता है। आत्म ज्ञान ही तुझे अमर गति, अनन्त सुख, चिरस्थायी शान्ति और सुख दे सकेगा।

तू वह अमर आत्मा है जो समय, स्थान और उत्पत्ति से भी परे है। तू इसमें तनिक भी संदेह न कर। समय, स्थान और उत्पत्ति मन की उपज है। वह केवल मन में ही रहते हैं। दूरदर्शिता को प्राप्त कर। ढूँढ़ने वाले को ढूँढ़, जानने वाले को जान, सुनने वाले को अनुभव कर। इन नामों और आकारों में जो एकता है उसको पहचान। उद्देश्य विषय से भिन्न नहीं है, तू सर्वदा ही विषय को समझता रहा है।

अज्ञान की इस दीर्घ निद्रा से जाग। जन्म-मरण तथा उसके साथ के पापों से मुक्ति प्राप्त कर। आकारों के भ्रम से छुटकारा पा ले। मोह, ममता, मेरा तथा अपनेपन का त्याग कर। अपने को सर्वव्यापक जाग्रति जान। आत्म-ज्ञान के साम्राज्य के सिंहासन पर आरुढ़ हो जा। यही तेरा सर्व प्रथम घर है-अनन्त प्रकाश तथा असीम घर का अमिट स्थान है।

इस “मैं” को क्रूरता के साथ नष्ट कर दे। अगर “मैं” अदृश्य हो जाएगा तो तेरे लिए ‘वह’ और ‘तू’ अथवा ‘यह’ और ‘वह’ नहीं रहेंगे। यह एक अभूतपूर्व असाधारण एवं अवर्णनीय अनुभव होगा। तब तू संसार की अन्तिम सुन्दरता को पा लेगा। तू तब ‘जीवन मुक्त’ हो जाएगा- एक स्वतंत्र पुण्यात्मा हो जायेगा। इस ज्ञान को दूसरों के साथ बाँट कर उन्हें भी ऊपर उठा। सत्य का सूर्य बन कर प्रकाश को चारों ओर फैला। इस अमित आनन्द और शाश्वत शाँति को जन-जन में बाँट, तू अमर हो जायगा।

स्वामी शिवानन्द जी
अखण्ड ज्योति सितम्बर 1942 पृष्ठ 3

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...