🔸 बातें बनाना बड़ा सरल है, दूसरों को उपदेश देने में बहुतेरे कुशल होते हैं, किन्तु वास्तविक तथ्य तो यह है कि जो बात अंतरात्मा को लगे उसे कार्य रूप में परिणत कर प्रत्यक्ष किया जाय। कर्म ही संसार में मुख्य तत्त्व है। सफलता के लिए यदि कोई आवश्यक चीज है तो वह कठोर कर्म ही है। बातें बनाना तो शेखचिल्लियों-ढपोरशंखों का काम है। असली मनुष्य वही है जो बात कम करता है, किन्तु काम बहुत अधिक करता है।
◼️ हमारा जीवन भी हर घड़ी थोड़ा-थोड़ा करके मर रहा है। इस दीपक का तेल शनैः-शनैः चूकता चला जा रहा है। भविष्य की ओर हम चल रहे हैं और वर्तमान को भूत की गोदी में पटकते जाते हैं। यह सब देखते हुए भी हम नहीं सोचते कि क्या वर्तमान का कोई सदुपयोग हो सकता है? जो बीत गया सो गया, जो आने वाला है वह भविष्य के गर्भ में है। वर्तमान हमारे हाथ में है। हम चाहें तो उसका सदुपयोग करके इस नश्वर जीवन में से कुछ अनश्वर लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
🔹 सच्ची कमाई है उत्तम से उत्तम सद्गुणों का संग्रह। संसार का प्रत्येक प्राणी किसी न किसी सद्गुण से संपन्न है, परन्तु आत्म गौरव का गुण मनुष्यों के लिए प्रभु की सबसे बड़ी देन है। इस गुण से विभूषित प्रत्येक प्राणी को संसार के समस्त जीवों को अपनी आत्मा की भाँति ही देखना चाहिए। सदैव उसकी ऐसी धारणा रहे कि उसके मन, वचन एवं कर्म किसी से भी जगत् के किसी जीव को क्लेश न हो। ऐसी प्रकृति वाला अंत में परब्रह्म को पाता है।
🔸 चाहे किसी भी धर्म को न मानना, परन्तु मनुष्य बनकर रहना बहुत अच्छा है। मूढ़ धर्म को मानना अच्छा नहीं है। मूढ़ धर्म का अर्थ है-धर्म का सत्य, सुंदर और शिव रूप नष्ट करके अथवा धर्म में से मनुष्यता निकालकर उसे मिथ्याचार, पशुता और क्रूरता से जोड़ देना। आजकल वास्तविक धर्म का स्थान इसी मूढ़ धर्म ने ले लिया है और निस्संदेह यह घृणा करने के योग्य है।
🔹 जब कभी आपको क्रोध आवे तो मन ही मन कहिए-दूसरों से गलती हो ही जाती है, मुझे दूसरों की गलतियों पर कु्रद्ध नहीं होना चाहिए। यदि दूसरे गलती करते हैं तो उसका यह मतलब नहीं कि मैं और भी बड़ी गलती कर उसका प्रतिशोध लूँ। मैं शुभ संकल्प वाला साधक हूँ। शुभ संकल्प के फलित होने के लिए उद्विग्न मन होना उचित नहीं। हम सहिष्णु बनेंगे। दूसरे स्वयं अपनी गलती का अनुभव करेंगे।
◼️ जब भाइयों-भाइयों, मित्रों-मित्रों में भी सभी बातें समान नहीं होती तो साधारण मनुष्यों में तो सदा विचारों का मेल खाते जाना असंभव ही है। यदि विवाद में सफल होना चाहते हो तो विवाद निष्कर्ष के लिए करो, केवल बकवास के लिए नहीं। यदि अपनी बात की सच्चाई में तुम्हें विश्वास हो तो उस पर अड़े मत रहो। दूसरों को उसे समझाने का प्रयत्न करो। अपने पक्ष को स्थापित करना चाहते हो तो युक्तियों से काम लो, अपने अभिमान के कारण उसे थोपने का प्रयत्न न करो।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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