रविवार, 21 अगस्त 2022

👉 आत्मचिंतन के क्षण 21 Aug 2022

■ विचार आपसे कहते हैं-हमें मन के जेलखाने में ही घोटकर मत मारिए, वरन् शरीर के कार्यों द्वारा जगत् में आने दीजिए। मनुष्य उत्तम लेखक, योग्य वक्ता, उच्च कलाविद् एवं वह जो भी चाहे सरलतापूर्वक बन सकता है, लेकिन एक शर्त पर, वह शर्त है कि वह अपने शुभ संकल्पों को क्रियाशील कर दे। उन्हें दैनिक जीवन में कर दिखावे। जो कुछ सोचता-विचारता है, उसे परिश्रम द्वारा, प्रयत्न द्वारा, अपनी सामर्थ्य द्वारा साक्ष्य का रूप प्रदान करे। शुद्ध विचारों की उपयोगिता तभी प्रकट होगी, जब अंतःकरण के चित्रों को शरीर के कार्यों द्वारा क्रियान्वित करने का प्रयत्न किया जाएगा।

◆ क्षमा न करना और प्रतिशोध लेने की इच्छा रखना दुःख और कष्टों के आधार हैं। जो व्यक्ति इन बुराइयों से बचने की अपेक्षा उन्हें अपने हृदय में पालते-बढ़ाते रहते हैं वे जीवन के सुख और आनंद से वंचित रह जाते हैं। वे आध्यात्मिक प्रकाश का लाभ नहीं ले पाते। जिसके हृदय में क्षमा नहीं, उसका हृदय कठोर हो जाता है। उसे दूसरों के प्रेम, मेलजोल, प्रतिष्ठा एवं आत्म-संतोष से वंचित रहना पड़ता है।

■ स्वर्ग और नरक मनुष्य के आगे-पीछे रहते हैं और सदा साथ-साथ चलते हैं। आगे स्वर्ग है, पीछे नरक। जब मनुष्य आगे की ओर अर्थात् उच्चता, महानता और श्रेष्ठता के प्रकाश-पूर्ण सत्पथ पर चलता है तो उसका हर एक कदम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करता हुआ  पड़ता है। इसके विपरीत जब मनुष्य पीठ पीछे की ओर नीचता के, पाप के, मलीनता के निकृष्ट एवं अंधकार के गर्त में फिसलता है, तो उसका हर एक कदम भयंकर नरक में धँसता जाता है।

■ कष्ट और कठिनाई का व्यवधान उन्नति की हर दिशा में मौजूद रहता है। ऐसी एक भी सफलता नहीं है जो कठिनाइयों से संघर्ष किये बिना ही प्राप्त हो जाती है। जीवन के महत्त्वपूर्ण मार्ग विघ्न-बाधाओं से सदा ही भरे रहते हैं। यदि परमात्मा ने सफलता का कठिनाई के साथ गठबंधन न किया होता, उसे सर्वसुलभ बना दिया होता तो मनुष्य जाति का वह सबसे बड़ा दुर्भाग्य होता। तब सरलता से मिली हुई सफल्ता बिलकुल नीरस एवं उपेक्षणीय हो जाती। जो वस्तु जितनी कठिनता से जितना खर्च करके मिलती है, वह उतनी ही आनंददायक होती है।

◆ आकस्मिक विपत्ति का सिर पर आ पड़ना मनुष्य के लिए सचमुच बड़ा दुःखदायी है। इससे उसकी बड़ी हानि होती है, किन्तु उस विपत्ति की हानि से अनेकों गुनी हानि करने  वाला एक और कारण है, वह है-विपत्ति की घबराहट। विपत्ति कही जाने वाली मूल घटना चाहे वह कैसी ही बड़ी क्यों न हो, किसी का अत्यधिक अनिष्ट नहीं कर सकती, परन्तु विपत्ति की घबराहट ऐसी दुष्टा, पिशाचिनी है कि वह जिसके पीछे पड़ती है उसके गले से खून की प्यासी जोंक की तरह चिपक जाती है और जब तक उस मनुष्य को पूर्णतया निःसत्व नहीं कर देती, तब उस उसका पीछा नहीं छोड़ती।

■ सफलता का मार्ग खतरों का मार्ग है। जिसमें खतरों से लड़ने का साहस और संघर्ष में पड़ने का चाव हो, उसे ही सिद्धि के पथ पर कदम बढ़ाना चाहिए। जो खतरों से डरते हैं, जिन्हें कष्ट सहने से भय लगता है, कठोर परिश्रम करना जिन्हें नहीं आता, उन्हें अपने जीवन को उन्नतिशील बनाने की कल्पना नहीं करनी चाहिए। अदम्य उत्साह, अटूट साहस, अविचल धैर्य, निरन्तर परिश्रम और खतरों से लड़ने वाला पुरुषार्थ ही किसी का  जीवन सफल बना सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 क्षुद्र हम, क्षुद्रतम हमारी इच्छाएँ (भाग 2)

🔴 घड़ा पक्का होना चाहिए

कच्चा घड़ा लेकर वह व्यक्ति कुएँ पर गया। रस्सी बाँधी और रस्सी बाँधकर के उसको कुएँ में डुबोया। खींचते- खींचते घड़े का बहुत सारा हिस्सा, कोना टूट- फूट गया। किसी तरीके से थोड़ा- बहुत पानी लेकर वह घड़ा ऊपर आया। घड़े को उसने सिर पर रखा, हाथ पर रखा। सुकरात के पास उसे लेकर जब तक वह पहुँचा, मिट्टी का वह घड़ा बिखर गया। उसने सुकरात से कहा कि- भगवन्! जो घड़ा आपने मुझे पानी भरने के लिए दिया था वह रास्ते में ही बिखर गया। उन्होंने कहा- ‘ठीक यही फिलॉसफी भगवान् का प्यार प्राप्त करने और भगवान् का अनुग्रह प्राप्त करने की है।’ कच्चा घड़ा अपने भीतर पानी को धारण नहीं कर सका। उसके लिए जरूरत इस बात की पड़ती है कि घड़ा पक्का हो। अगर हमारे पास पक्का घड़ा है, तो पानी भर जायेगा, ठंडा रहेगा, बेतकल्लुफ खड़ा रहेगा और पानी हमको मिल जायेगा। अगर घड़ा कच्चा है, तो पानी बिखर जायेगा। सुकरात ने यह बात उस व्यक्ति से कही।

🔵 संव्याप्त भ्रान्तियाँ 

मित्रो! भगवान् को अपने भीतर धारण करने के लिए पक्का अर्थात् चरित्रवान, पक्का अर्थात् त्यागी, पक्का अर्थात् निष्ठावान्, पक्का अर्थात् व्यक्तित्व से सम्पन्न व्यक्ति होना चाहिए। यही हैं भगवान् की पूजा- उपासना के माध्यम। लेकिन क्या किया जाय? लोगों ने पिछले दिनों हमको गलत बातें बता दीं, गलत नियम सिखा दिये कि पूजा- उपासना के खेल जैसे कर्मकाण्ड भगवान् का प्यार प्राप्त करने में समर्थ हो सकते हैं और हमारे जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करा सकते हैं। हमको अपने जीवन को सुधारने की आवश्यकता नहीं है। हमको अपने आपको महान बनाने की आवश्यकता नहीं है। हम केवल थोड़े से कर्मकाण्ड कर लिया करें, तो हमको शान्ति मिल जायेगी और हमको भगवान् का अनुग्रह मिल जायेगा। इस अज्ञान और भ्रम ने हमारा रास्ता भटका दिया और हम एक मंजिल पर चल सकते थे, थोड़ी दूर तक पहुँच सकते थे, उससे महरूम और वंचित रह गये।

🔵 तीर्थ स्नान से मिलेगी मन की शान्ति? 

मित्रो! एक बार ऐसा हुआ- एक था मल्लाह। बहुत दुःखी बैठा हुआ था और कह रहा था कि मेरे मन में बड़ी अशांति है और मुझे बड़ा दुःख है। अब मुझे भगवान् की तरफ चलना चाहिए और भगवान् से शान्ति प्राप्ति करके लानी चाहिए। क्या किया जाय? क्या न किया जाय? उसके जी में आया कि तीर्थयात्रा के लिए चलना चाहिए और भगवान् के दर्शन करना चाहिए। उसकी स्त्री केशिका ने कहा कि पतिदेव! तीर्थयात्रा जाने से आपको शान्ति नहीं मिलेगी। शान्ति तो अपने भीतर भरी हुई पड़ी है। जब तक हम अपने भीतर के कपाट नहीं खोलेंगे, जब तक अपनी अंतरंग शान्ति के द्वार नहीं खोलेंगे, तब तक किस तरीके से आपको शान्ति मिल सकती है? बाहर शान्ति है कहाँ? जिसको तलाश करने के लिए आप जा रहे हैं? उसने कहना नहीं माना। उसने कहा कि मैं तो तीर्थयात्रा के लिए जाऊँगा और वहाँ से शान्ति लेकर के आऊँगा। मैं तो गंगा स्नान करूँगा और मैं तो जगन्नाथपुरी जाऊँगा और वहाँ से शान्ति ले करके आऊँगा। स्त्री ने मना किया, लेकिन उसका पति बड़ा दुःखी था और खिन्न था और उसको बहुत जल्दी भगवान् की कृपा प्राप्त करने की इच्छा थी।

🔴 पत्नी ने दी शिक्षा

वह तीर्थयात्रा की तैयारियाँ करने लगा। उसकी स्त्री केशिका भी साथ जाने के लिए तैयार हो गयी। उसने एक रूमाल में चार बैंगन बाँधकर रख दिए और जहाँ- जहाँ पतिदेव ने तीर्थयात्रा की, वहाँ- वहाँ वह स्वयं भी नहायी और पानी में बैंगनों को भी स्नान कराया। जहाँ- जहाँ दर्शन के लिए पतिदेव गये, वहाँ स्वयं भी दर्शन किया और उन चार बैंगनों को भी दर्शन कराया। सारे के सारे तीर्थ यात्रा करने के बाद उसका पति भी आ गया और केशिका भी आ गयी। जब घर आकर के बैठे, तब क्या हुआ कि उसने अपने पति के लिए भोजन बनाया। और वे चार बैंगन जो थे, जो कि सारे के सारे तीर्थों की यात्रा कर चुके थे और सब नदियों में स्नान कर चुके थे, उन बैंगनों की उसने साग बनाया। साग बनाकर पतिदेव की थाली में परोसकर रख दिया, तो पतिदेव को बड़ी दुर्गन्ध आयी।

पतिदेव ने कहा- अरे भागवान्! तूने यह क्या रख दिया? बदबू के मारे मेरी नाक सड़ी जा रही है और मुझे उल्टी होने वाली है। पत्नी ने कहा कि ये वह बैंगन हैं, जो चारों धाम की यात्रा करके आये हैं। ये वह बैगन हैं, जो भगवान् के जितने भी सारे तीर्थ हैं, उनके दर्शन करके आये हैं। इनमें तो सुगंध होनी चाहिए थी? इनमें तो स्वाद होना चाहिए था? उसने कहा- परन्तु इनमें न तो सुगंध है और न स्वाद है, तो मैं किस तरीके से मान लूँ? पत्नी ने कहा कि जब ये बैंगन सुगंध न प्राप्त कर सके, खुशबू प्राप्त न कर सके और स्वाद न प्राप्त कर सके, तो फिर यह तीर्थयात्रा आपको शान्ति दे पायेंगे क्या? भगवान् के दर्शन, कर्मकाण्ड आपको शान्ति दे पायेंगे क्या? मल्लाह के हृदय कपाट खुल गये और उसने अपने भीतर भगवान् को तलाश करना शुरू कर दिया और उसको शान्ति मिली।

🔵 गहराई में प्रवेश करें

मित्रो! भगवान्, जिसके आधार पर यह सारा विश्व टिका हुआ है और मानव की सारी उन्नति उसके कृपा कटाक्ष के ऊपर अवलम्बित है, उसको हमको तलाश करना चाहिए और प्राप्त करना चाहिए। मेरे जीवन का सारे का सारा समय इसी काम में समाप्त हो गया और मेरी साठ साल की जिन्दगी सिर्फ इसी काम में समाप्त हो गयी। भगवान् कहाँ है? और भगवान् को किस तरीके से प्राप्त किया जाये? हमको इसके बारे में थोड़ी गहराई तक जाना पड़ेगा, जैसे कि मुझे मेरे गुरुजी ने गहराई में धकेलने की कोशिश की। मैं चाहता हूँ कि आपको भी गहराई तक धकेल दूँ, ताकि आप वास्तविकता को समझ सकें।

मित्रो! एक बार ऐसा हुआ कि भगवान् जी की इच्छा हुई कि मेरा प्यारा मनुष्य इस पृथ्वी पर निवास करता है और उसके पास मैं चलूँ, उसके पास रहूँ और उसकी खोज- खबर लिया करूँ, उसको शिक्षा दिया करूँ। मैंने बड़ी उम्मीदों और तमन्नाओं से उसको बनाया था। मैं उसको रास्ता बताऊँगा, उसको उसके कर्तव्य बताऊँगा और उसको यह बताऊँगा कि मनुष्य का जीवन कितना महान है और मनुष्य के जीवन से क्या किया जा सकता है? भगवान् जो कार्य स्वयं करता है, उसको मानव भी स्वयं कर सकता है, मैं जा करके ऐसा शिक्षण मनुष्य को दूँगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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शुक्रवार, 19 अगस्त 2022

👉 आत्मचिंतन के क्षण 19 Aug 2022

■ संसार की सारी सफलताओं का मूलमंत्र है-प्रबल इच्छा शक्ति। इसी के बल पर विद्या, सम्पत्ति और साधनों का उपार्जन होता है। यही वह आधार है जिस पर आध्यात्मिक तपस्याएँ और साधनाएँ निर्भर रहती हैं। यही वह दिव्य संबल है, जिसे पाकर संसार में खाली हाथ आया मनुष्य वैभवशाली  बनकर संसार को चकित कर देता है। यही वह मोहक और वशीकरण मंत्र है, जिसके बल पर एक अकेला पुरुष कोटि-कोटि जनगण को अपना अनुयायी बना लेता है।

□ हमारा प्रत्येक विचार हमारे पथ में काँटे या पुष्प बिखेरता है। हम जैसा चाहें अपने विचारों की शक्ति द्वारा बन सकते हैं। कोई भी विस्फोटक पदार्थ मनुष्य के प्रचण्ड विचारों से बढ़कर शक्ति नहीं रखता। कोई भी संबंधी, देवी, देवता हमारी इतनी सहायता नहीं कर सकता, जितने हमारे विचार। विचारों द्वारा ही हम शक्ति का केन्द्र मन से निकालते हैं और अपने सबसे बड़े मित्र बन सकते है। अतः जब तक हम अपने विचारों को निम्न, निकृष्ट, खोटी वस्तुओं से हटाकर ऊँचे विषयों में नहीं लगाते, तब तक हमारे विचार परमात्मा की निःसीम शक्ति में सामंजस्य प्राप्त नहीं करते।

◆ हमारी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हम शुभ विचारों को क्रियात्मक स्वरूप प्रदान नहीं करते। उनको जीवन व्यतीत करने का मौका नहीं देते। पुस्तकों में वर्णित स्वर्ण सूत्रों को कार्य रूप में परिवर्तित करने के लिए प्रयत्नशील नहीं होते। उनके अनुसार जीवन को नहीं मोड़ते। शिक्षाओं पर दत्तचित्त, एकाग्र, दृढ़तापूर्वक अमल नहीं करते। शास्त्रीय विधियों का पूर्ण दिल लगाकर अभ्यास नहीं करते, अपने आचरण को उनके अनुसार नहीं बनाते। केवल पढ़कर या जानकर ही संतुष्ट हो जाते हैं। यही बुजदिली आलस्य, कर्महीनता हमें अग्रसर नहीं होने देती।

◇ आलस्य और दुर्भाग्य एक ही वस्तु के दो नाम हैं। जो आलसी है वह न श्रम का महत्त्व समझता है, न समय का मूल्य। ऐसे मनुष्य को कोई सफलता नहीं मिल सकती। सौभाग्य का पुरस्कार उनके लिए सुरक्षित है, जो उसका मूल्य चुकाने के लिए तत्पर हैं। यह मूल्य कठोर श्रम के रूप में चुकाया जाता है। समय ही भगवान् की दी हुई सम्पदा है। हमारी हर श्वास बड़ी मूल्यवान है। यदि प्रस्तुत क्षणों का ठीक तरह उपयोग करते रहा जाय, तो बूँद-बूँद से घट भरने की तरह अगणित सफलताएँ और समृद्धियाँ अनायास ही इकट्ठी होने लगेंगी।

■ आलसी का भविष्य अंधकारपूर्ण है। जिसे श्रम करने में रुचि नहीं, जो मेहनत से डरता है, आरामतलबी जिसे पसंद है, जो समय को ज्यों-त्यों करके अस्त-व्यस्त करता रहता है, समझना चाहिए दुर्भाग्य इसके पीछे लग गया। यह कुछ उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकना तो दूर, यदि संयोगवश उत्तराधिकार में कुछ मिल गया है तो उसे भी स्थिर न रख सकेगा। कहते हैं-लक्ष्मी आलसी के घर नहीं रहती। सुना जाता है कि दारिद्र्य वहाँ घोंसला बनाता है, जहाँ आलस्य की सघनता छाई रहती है।

□ आराम की जिन्दगी बिताना केवल निर्जीव, निरुद्देश्य और निकम्मे लोगों को रुचिकर हो सकता है। वे ही उसे सौभाग्य गिन सकते हैं। प्रगतिशील, महत्त्वाकांक्षी लोगों की दृष्टि में तो यह एक मानसिक रुग्णता है, जिसके कारण व्यक्ति का भाग्य, भविष्य, बल और वर्चस्व निरन्तर घटता ही जाता है। अपने देश का दुर्भाग्य श्रम के प्रति उपेक्षा करने की दुष्प्रवृत्ति के साथ आरंभ हुआ है और वह तब तक बना ही रहेगा, जब तक कि हम प्रगतिशील लोगों की तरह परिश्रम के प्रति प्रगाढ़ आस्था उत्पन्न न करेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 क्षुद्र हम, क्षुद्रतम हमारी इच्छाएँ (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ- साथ
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

🔴 मन की साधना कैसे करें?

देवियो, भाइयो! मैंने आपको शरीर की साधना के दो माध्यम बताए हैं- आहार और विहार। वैसे ही मन की साधना के भी दो माध्यम हैं- एक का नाम है- विवेक और दूसरे का नाम है- साहस। साहस और विवेक- इनकी जितनी मात्रा हम अपने भीतर इकट्ठी करते हुए चले जाते हैं, उतना ही हमारा जीवन विभूतियों से- समृद्धियों से, ऋद्धियों से और सिद्धियों से भरता हुआ चला जाता है। मित्रो! इस सम्बन्ध में मैं आपको इतिहास की बात बताना चाहता हूँ, कुछ घटनाएँ सुनाना चाहता हूँ।

🔵 विवेकवान् की रीति−नीति

समर्थ गुरु रामदास के ब्याह की तैयारियाँ चल रही थीं। बुआ ने कहा कि उनका ब्याह तो जरूर होना चाहिए। अम्मा ने कहा- ‘‘मेरे बेटे का ब्याह नहीं होगा, तो काम कैसे चलेगा?’’ ढोलक बजायी जा रही थी और हल्दी चढ़ाई जा रही थी। घोड़ी चढ़ाने के लिए बारात निकाली और बारात वहाँ जा पहुँची बेटी वालों के यहाँ। बेटी वालों के यहाँ मंडप सजाया गया। समर्थ गुरु रामदास व्याह करने के लिए वहाँ जा पहुँचे। एक पुरोहित ने कहा कि महाराज! यहाँ ब्याह करने पर एक आवाज लगाई जाती है। उन्होंने कहा- ‘‘लड़का लड़की सावधान’’! लड़के ने कहा कि पल भर की देरी है, लेकिन सावधान क्यों कहा गया? अरे! जीवन के मोल का यही अंत? चार छोकरी- चार छोकरे और एक पंडित-  नौ ग्रह, नौ की दुहाई, नौ तरह की बीमारियाँ। मर जायेगा। अरे अभागे! दो तरीके से मारा जायेगा। इसीलिए भगवान् चिल्ला रहा है- सावधान! सावधान! अरे, दोनों तरफ की दिशाएँ क्या देख रहा है? एक तरफ चल और समर्थ गुरु रामदास ये भागे, वो भागे। लोगों ने बाजा बजाना बन्द कर दिया। वह गया, सो गया। बुआ ने कहा- बेवकूफ, अम्मा ने कहा पागल, बाप ने कहा- सिरफिरा, रिश्तेदारों ने कहा कि उल्लू है। सबने जाने क्या- क्या कहा। दुनिया वाले क्या- क्या कहते हैं, लेकिन विवेकवानों की विचार करने की शैली अलग होती है। वे अपना रास्ता अलग बनाते हैं और अपने रास्ते पर आप चला करते हैं।

🔴 पात्रता की अनिवार्यता

मित्रो! जो विवेकवान् लोग अपने रास्ते पर चले हैं, वे संसार के इतिहास में उज्ज्वल तारे की तरह टिमटिमाते रहे हैं और टिमटिमाते रहेंगे। यह परम्पराएँ पहले भी चलीं थीं और आगे भी चलती रहेंगी। मैंने आपको मन की, मस्तिष्क की, सूक्ष्म शरीर की उपासना के साथ साधना करने की विधि पहले भी बताई थी और विवेकशीलता को उसका एक अंग बताया था। एक दूसरा अंग है, पात्रता का विकास, व्यक्तित्व का विकास। इसके अभाव में सारी साधना, उपासना निष्फल चली जाती है।

एक बड़े सम्भ्रान्त व्यक्ति ने सुन रखा था कि संसार में सबसे बड़ा लाभदायक काम भगवान् का प्यार प्राप्त करना है। भगवान् सारी दुनिया का स्वामी है, मालिक है। सारी संपदाएँ और सारी सुविधाएँ उसके एक इशारे पर चलती रहती हैं। मनुष्य को भी जिन सुविधाओं की आवश्यकता है, जिन लाभों की जरूरत है, जिन वस्तुओं की जरूरत है, वह भगवान् के एक कृपांश के ऊपर, भगवान् के एक इशारे के ऊपर, इशारे की एक किरण के ऊपर टिके हुए हैं। भगवान् अगर हमसे नाराज हो जाये, तो हमारा अच्छा भला शरीर देखते ही देखते बरबाद हो जाये। गठिया आदि लग जाये, लकवा आदि हो जाये। हमारा सारा खाना- पीना भी बट्टे खाते में चला जाये। हमारी पढ़ाई- लिखाई सब बेकार चली जाये। सोलह वर्ष तक पढ़ाई की। एम.ए. की पढ़ाई की और डिवीजन खराब हो जाये, थर्ड डिवीजन पास हो जाये और नौकरी के लिए जगह न मिले। चपरासी के लिए मारा- मारा फिरना पड़े, तब? भगवान् की एक कृपा का कण यदि हमारे विरुद्ध हो जाये, तो हमारा सब कुछ चौपट हो जायेगा।

🔵 कैसे मिले भगवान् का प्यार

उस व्यक्ति को मालूम था कि भगवान् का प्यार पाना और भगवान् का अनुग्रह प्राप्त करना मनुष्य के लिए जीवन का सबसे बड़ा लाभ है। उस लाभ को प्राप्त करने के लिए अपने समय के सबसे बड़े उदार संत और भगवान् के सबसे बड़े भक्त सुकरात के पास वह व्यक्ति गया और कहने लगा कि भगवन्! मुझे ऐसा उपाय बताइये, जिससे मैं भगवान् की कृपा प्राप्त कर सकूँ और भगवान् का साक्षात्कार कर सकूँ। भगवान् तक पहुँच सकूँ। सुकरात चुप हो गये। उन्होंने कहा कि फिर कभी देखा जायेगा। कई दिनों बाद वह व्यक्ति फिर आया। उसने कहा- ‘‘भगवन्! आपने भगवान् को देखा है और भगवान् का प्यार पाया है। क्या आप मुझे भी प्राप्त करा सकेंगे?’’ क्या भगवान् का अनुग्रह मेरे ऊपर न होगा? सुकरात ने कहा- ‘अच्छा तुम कल आना और मेरी एक सेवा करना, फिर मैं तुम्हें उसका मार्गदर्शन करूँगा।’ दूसरे दिन वह व्यक्ति सुकरात के पास पहुँचा। सुकरात ने मिट्टी का कच्चा वाला एक घड़ा पहले से ही मँगाकर रखा था। वह पकाया नहीं गया था, वरन् मिट्टी का बना हुआ कच्चा था। सुकरात ने कहा- ‘ बच्चे जाओ मेरे लिए एक घड़ा पानी लाओ और मैं उससे स्नान कर लूँ, पानी पी लूँ, पीछे मैं तुम्हारा मार्गदर्शन करूँगा।’

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मंगलवार, 16 अगस्त 2022

👉 निन्दक का बुरा क्यों मानें?

यदि कोई हमारे दोष बताता है तो उसका यह उत्तर नहीं है कि वह दोष उस बताने वाले में भी हैं या अन्य लोगों में भी है। ऐसा उत्तर देने का अर्थ है उसके दोष बताने का बुरा मानना, उलाहना देना और विरोध करना। यह आत्म शुद्धि का मार्ग नहीं है। बताने वाला यदि सदोषं है या अन्य लोग भी उस दोष में ग्रस्त हैं तो इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें भी उस दोष को अपनाये रहना चाहिए।

दीपक द्वारा फैलाये हुए प्रकाश का क्या इसीलिए बहिष्कार किया जाना उचित है कि वह अपने नीचे अंधकार क्यों छिपाये हुए हैं ? ठीक है, यदि दीपक अपने नीचे का अंधकार भी दूर कर सका होता तो उसे सर्वांगपूर्ण कहा जाता। पर यदि वह ऐसा नहीं है तो भी उसके फैलाये हुए प्रकाश का लाभ उठाने से हम वंचित रहें इसका कोई कारण नहीं है। यह भी कोई कारण नहीं है कि दीपक सब जगह का अँधेरा दूर क्यों नहीं करता। यदि वह सुयोग से हमारे घर में जल रहा है तो इसे सौभाग्य ही मानना चाहिए।

दोष बताने वाला यदि स्वयं निर्दोष रहा होता तो उसकी महानता असाधारण होती, पर यदि वह ऐसा नहीं है तो भी उसके इस उपकार को हमें मानना ही चाहिए कि उसने हमारे दोष बताये और उनकी हानि समझने एवं छोड़ने के लिए हमें उकसाया। ऐसा उपकार यदि कड़ुवे शब्दों में किया गया है तो भी इससे रुष्ट होने की कोई बात नहीं है। गिलोय कड़वी होती है पर उसके अन्य गुण मूल्यवान होने के कारण उसे त्याज्य नहीं माना जाता। हमारे दोष यदि कड़ुवे शब्दों में-निंदा या आक्षेप के रूप में बताये हैं तो भी उचित यही है कि उन पर बारीकी से ध्यान दिया जाए, और उस निंदा में जितना भी अंश सच हो उस बुराई को छोड़ने का प्रयत्न किया जाय।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1961 Page 32

सोमवार, 15 अगस्त 2022

👉 सच्चा परोपकार

परोपकार और पुण्य के नाम पर मनुष्य कुछ धार्मिक कर्मकाण्ड, थोड़ा सा दान या कोई ऐसा काम करते हैं जिसे बहुत से लोग देखें और प्रशंसा करें। कई ऐसे आदमी जिनका नित्य का कार्यक्रम लोगों का गला काटना, झूठ, फरेब, दगाबाजी, बेईमानी से भरा होता है, अनीतिपूर्वक प्रचुर धन कमाते हैं और उसमें से एक छोटा सा हिस्सा दान पुण्य में खर्च करके धर्मात्मा की पदवी भी हथिया लेते हैं।

तात्विक दृष्टि से विचार करने पर स्पष्ट हो जाता है कि ऐसा धर्म संचय वास्तविक धर्म संचय नहीं है। यह तो प्रतिष्ठा बढ़ाने और वाहवाही लूटने का एक सस्ता सा नुस्खा है। वास्तविक धर्म का अस्तित्व अन्तरात्मा की पवित्रता से संबंधित है। जिसके मन में सच्चे धर्म का एक अंकुर भी जमा है वह सबसे पहला काम ‘अपने आचरण को सुधारने’ का करेगा। अपने कर्त्तव्य और जिम्मेदारी को भली भाँति पहचानेगा और उसे ठीक रीति से निबाहने का प्रयत्न करेगा।

परोपकार करने से पहले हमें अपने मनुष्योचित कर्त्तव्य और उत्तरदायित्त्व को उचित रीति से निबाहने की बात सोचनी चाहिए। भलमनसाहत, का मनुष्यता का, ईमानदारी का, बर्ताव करना और अपने वचन का ठीक तरह से पालन करना एक बहुत ही ऊंचे दर्जे का परोपकार है। एक पैसा या पाई किसी भिखमंगा की झोली में फेंक देने से या किसी को भोजन वस्त्र बाँट देने मात्र से कोई आदमी धर्म की भूमिका में प्रवेश नहीं कर सकता। सच्चा परोपकारी तो वह कहा जायेगा जो स्वयं मानवोचित कर्त्तव्य धर्म का पालन करता है और ऐसा ही करने के लिए दूसरों को भी प्रेरणा देता है।

अखण्ड ज्योति 1945 फरवरी पृष्ठ 13

👉 सबसे बड़ी सेवा

🔵 दूसरों के संकल्प और विचार जान लेना बहुत कठिन है। किन्तु अपने मन की भावनाओं को बहुत स्पष्ट समझा, सुना और परखा जा सकता है, यदि औरों की सेवा करना चाहते हैं तो पहले अपनी सेवा की योजना बनाओ, अपना सुधार सबसे सरल है। साथियो! तुम जितना अपने अन्तःकरण का परिमार्जन और सुधार कर लोगे, यह संसार तुम्हें उतना ही सुधरा हुआ परिलक्षित होगा।

🔴 जब तुम दर्पण में अपना मुख देखते हो तो, चेहरे की सुन्दरता के साथ उसके धब्बे और मलिनता भी प्रकट होती है, तब तुम उसे प्रयत्नपूर्वक साफ कर डालते हो। मुख उज्ज्वल साफ और सुन्दर निकल आता है। प्रसन्नता बढ़ जाती है, बहुत अच्छा लगने लगता है।

🔵 अन्तःकरण भी एक मुख है। उसे चेतना के दर्पण में देखने और परखने से उसकी महानतायें भी दिखाई देने लगती हैं और सौंदर्य भी। आत्म-निरीक्षण की आवश्यकता इसलिये पड़ी कि उन छोटी-छोटी मलीनताओं को दूर करें, जो एक पर्त की तरह आत्मा के अनन्त सौंदर्य को प्रभावित और आच्छादित किये रहते हैं। जब वह महानतायें मिट जाती हैं तो आत्मा का उज्ज्वल, साफ और सुन्दर स्वरूप परिलक्षित होने लगता है और संसार का सब कुछ अच्छा और प्रिय मालूम होने लगता है।

🔴 मन से प्रश्न करना चाहिये- क्या तुम भयभीत हो? क्या तुम्हें इन्द्रिय-जन्य वासनाओं में मोह है? क्या तुम्हारे विचार गन्दे हैं? यदि हाँ तो सुधार के प्रयत्न में तत्काल जुट जाओ। अपना सुधार ही संसार की सबसे बड़ी सेवा है। जिस दिन इन प्रश्नों का उत्तर ‘नहीं’ मिलने लगेगा, उस दिन से तुम संसार में सबसे सुखी व्यक्ति होंगे।

🌹 ~महात्मा बुद्ध
🌹 अखण्ड ज्योति 1968 अगस्त पृष्ठ 1

रविवार, 14 अगस्त 2022

👉 जीवन की महत्ता समझें और उसका सदुपयोग करें

🔵 मनुष्य-जीवन नगण्य सी- ऐसी तुच्छ वस्तु नहीं है, जिसे हलकी दृष्टि से देखा जाय और हलके कार्यों में खर्च कर दिया जाय। यह निरन्तर प्रगति और निरन्तर तप का परिणाम है। उसके मूल्य और महत्व को समझा जाना चाहिए, यह सोचा जाना चाहिए कि इस सुअवसर का लाभ किस प्रकार उठाया जाय। ऐसे अवसर जो बार-बार हाथ नहीं आते, उपेक्षा और उपहास में गँवाने नहीं चाहिए। वरन् सतर्कतापूर्वक यह चेष्टा करनी चाहिए कि उसका समुचित सदुपयोग हो और परिपूर्ण लाभ मिले।

🔴 मनुष्य-जीवन इसलिए है कि उसे पाकर जीवात्मा अपनी महान् उत्कृष्टता को विकसित करने पर निर्भर अलौकिक शान्ति और सन्तोष का आनन्द लाभ करे। आन्तरिक उत्कृष्टता सत्कार्यों के निरन्तर अभ्यास पर निर्भर है। पढ़ते-सुनते या सोचते-विचारते रहने में आत्म-कल्याण की हलकी जानकारी तो प्राप्त होती है, पर उससे जीवन-क्रम में किसी महानता का अवतरण होने की आशा नहीं की जा सकती।

🔵 श्रेष्ठ कार्यों की श्रृंखला का दिनचर्या में अविच्छिन्न सम्बन्ध होना ही केवल मात्र वह उपाय है, जिससे मनुष्य ऊँचा उठता है और सफल जीवन का लक्ष्य प्राप्त कर सकने में समर्थ होता है। उचित है कि हम इस दृष्टि बिन्दु को विकसित करें और इस सुअवसर का परिपूर्ण लाभ उठावें जो हमें मनुष्य-जीवन के रूप में आज उपलब्ध है।

🌹 ~सन्त वास्वानी
🌹 अखण्ड ज्योति 1968 अगस्त पृष्ठ 1

गुरुवार, 11 अगस्त 2022

👉 मूल-स्रोत का सम्बल

🔵 एक बीज डाला जाता है, तब वृक्ष खड़ा होता है। बीज सारे वृक्ष का मूल है। मनुष्य-जीवन का भी एक वैसा ही मूल है, चाहे उसे परमात्मा कहें, ब्रह्म या चेतना-शक्ति। जीवन के मूल-स्रोत से बिछुड़ जाने के कारण ही मनुष्य शाँति और जीवन की पवित्रता से अलग पड़ जाता है। मृत्यु के भय और जड़त्व के शून्य में निर्वासित हो जाता है।

🔴 मनुष्य अपने आपको जीवन मूल-स्रोत के साथ संयुक्त कर देता है तो वह विशाल प्रजा के सुख-दुःख के साथ एक तन हो जाता है। समष्टि में डूब कर व्यक्तिगत अहंता, स्वार्थ, संग्रह, हिंसा, छल की क्षुद्रताओं से बच जाता है। स्रोत के साथ एकात्म हो जाने पर मृत्यु, शून्यता और एकाकीपन का भय तिरोहित होता है।

🔵 वृक्ष का गुण है चारों ओर फैलना। हम भी फैलें। घर, परिवार, समाज, देश और विश्व के साथ प्रेम करें, स्नेह करें, आदर और सद्भाव भरें। किसी की छाया की आवश्यकता होती है, उसे छाया दें, सहारे की आवश्यकता होती है, उसे सहारा दें। अपनी व्यष्टि को विश्व-आत्मा के साथ घुलाने के लिये जितना फैल सकते हों, हमें फैलना चाहिये। वह हमारे जीवन का धर्म है। समष्टि में अपने को विसर्जित कर देना ही जीवन की सार्थकता है।

🔴 किन्तु जब हम फैलें तब भी अपने मूल-स्रोत को न भूलें, नहीं तो फिर उसी जड़ता और भय में खो जायेंगे, जिससे निकलने के लिये ही मनुष्य जीवन का आविर्भाव हुआ है।

🌹 ~रोम्यां रोल
🌹 अखण्ड ज्योति 1968 मई पृष्ठ 1

रविवार, 7 अगस्त 2022

👉 आन्तरिक सामर्थ्य ही साथ देगी

एक दिन मैं किसी पहाड़ी से गुजर रहा था। एक बड़ा विशाल बरगद का पेड़ खड़ा तलहटी की शोभा बढ़ा रहा था। उसे देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई संसार में कैसे कैसे सामर्थ्यवान् लोग हैं, ऐसे लोग दूसरों का कितना हित करते हैं। इस तरह सोचता हुआ मैं आगे बढ़ गया।

कुछ दिन बीते उसी रास्ते से पुनः लौटना हुआ। जब उस पहाड़ी पर पहुँचा तो वहाँ वट वृक्ष न देखकर बड़ा विस्मय हुआ। ग्रामवासियों से पूछने पर पता चला कि दो दिन पहले तेज तूफान आया था, वृक्ष उसी में उखड़ कर लुढ़क गया। मैंने पूछा - "भाई वृक्ष तो बहुत मजबूत था फिर वह उखड़ कैसे गया।” उन्होंने बताया- "उसकी विशालता दिखावा मात्र थी। भीतर से तो वह खोखला था। खोखले लोग हल्के आघात भी सहन नहीं कर सकते।”

तब से मैं बराबर सोचा करता हूँ कि जो बाहर से बलवान्, किन्तु भीतर से दुर्बल हैं, ऐसे लोग संसार में औरों का हित तो क्या कर सकते हैं, वे स्वयं अपना ही अस्तित्व सुरक्षित नहीं रख सकते। खोखले पेड़ की तरह एक ही झोंके में उखड़ कर गिर जाता है और फिर कभी ऊपर नहीं उठ पाता। जिसके पास भावनाओं का बल है, साहस की पूँजी है, जिसने मानसिक शक्तियों को, संसार की किसी भी परिस्थिति से मोर्चा लेने योग्य बना लिया है, उसे विपरीत परिस्थितियों से लड़ने में किसी प्रकार परेशानी अनुभव न होगी। भीतर की शक्ति सूर्य की तेजस्विता के समान है जो घने बादलों को चीर कर भी अपनी शक्ति और अस्तित्व का परिचय देती है। हम में जब तक इस तरह की आन्तरिक शक्ति नहीं आयेगी, तब तक हम उस खोखले पेड़ की तरह ही उखड़ते रहेंगे, जो उस पहाड़ी पर उखड़ कर गिर पड़ा था।

✍🏻 सुभाषचन्द्र बोस
📖 अखण्ड ज्योति 1969 मई पृष्ठ 1

शनिवार, 6 अगस्त 2022

👉 व्यक्तित्व का परिष्कार

मित्रो ! सर्वत्र पात्रता के हिसाब से मिलता है। बर्तन आपके पास है तो उसी बर्तन के हिसाब से आप जो चीज लेना चाहें तो ले भी सकते हैं। खुले में रखें तो पानी उसके भीतर भरा रह सकता है। दूध देने वाले के पास जाएँगे तो जितना बड़ा बर्तन है उतना ही ज्यादा दूध देगा। ज्यादा लेंगे तो वह फैल जाएगा और फिर वह आपके किसी काम नहीं आएगा। इसलिए पात्रता को अध्यात्म में सबसे ज्यादा महत्त्व दिया गया है।

जो आदमी अध्यात्म का प्रयोग करते हैं, वे अपने व्यक्तिगत जीवन में अपनी पात्रता का विकास कर रहे हैं कि नहीं कर रहे हैं-यह बात बहुत जरूरी है। आदमी का व्यक्तित्व अगर सही नहीं है तो यह सब बातें गलत हैं। कपड़े को रंगने से पहले धोना होगा। धोएँ नहीं और मैले कपड़े पर रंग लगाना चाहें तो रंग कैसे चढ़ेगा? रंग आएगा ही नहीं, गलत-सलत हो जाएगा।

इसी प्रकार से अगर आप धातुओं को गरम नहीं करेंगे तो उससे जेवर नहीं बना सकते। हार नहीं बना सकते। क्यों? इसलिए कि आपने सोने को गरम नहीं किया है। गरम करने से आप इन्कार करते हैं। फिर बताइए जेवर किस तरीके से बनेगा? इसलिए गरम करना आवश्यक है। जो आदमी साधना के बारे में दिलचस्पी रखते हैं या उससे कुछ लाभ उठाना चाहते हैं, उन्हें सबसे पहला जो कदम उठाना पड़ेगा, वह है अपने व्यक्तित्व का परिष्कार।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 गुरुवर की धरोहर-1/57

शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

👉 निःस्वार्थ प्रेम

यथार्थ ईश्वर भक्त या भगवत् प्रेमी अकेला ही लाखों योद्धाओं की शक्ति रखता है। वह किसी पार्थिव सहायता का मुखापेक्षी नहीं रहता। वह तो केवल उस सर्व-शक्तिमान विश्व-नियामक परमेश्वर की कृपा का ही भिखारी होता है, उस महाशक्ति के प्रभाव सो ही वह प्रेम एवं विरह रहित होकर अपने समस्त कर्तव्यों को पूर्ण करता है। कोई भी दुःख उसे अभिभूत एवं प्रलोभन उसे विपन्न नहीं कर सकता।

उस भगवद्-भक्त का हृदय किसी निष्फल भाव अथवा किसी विपक्ष चेष्टा से कातर नहीं होता है। इसी प्रकार आरम्भ किये हुए किसी कार्य में वह असफल भी नहीं होता। अतः हे हमारे विरही दीन-हृदय जिससे प्रेम किया है, उस प्रेमी का एक बार परिचय तो दो! अपने उस ईश्वर के लिए तुमने कौन सा कर्तव्य पूर्ण किया है, और किस प्रलोभन के संग्राम में विजय प्राप्त की है, सो तो बताओ। एक बार उसकी महिमा की दीप्ति उज्ज्वल बनाने के लिए किस शत्रु को पराजित किया है, एवं कौन सा दुख सहन कर किस रूप में कीर्ति स्थापित की है, उसका भी तो हिसाब दो। अरे, तुम्हारे मुख का प्रेम केवल शब्द मात्र ही है। तभी तो तुम साधारण से दुःख या तुच्छ से द्वन्द्व अथवा स्वल्प मात्र परिश्रम से शान्त जो जाते हो।

तुम आक्षेप करते हो कि तुम्हारी शक्ति किसी प्रतिकूलता के सम्मुख ठहर नहीं सकती। किसी परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो सकती। भला, जो प्रेम जीवन की प्रबल शक्ति नहीं होता, उसे मिथ्या के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है? जो प्रेम स्वार्थ विमुख (निस्वार्थ) नहीं है, वह नितान्त बलहीन ही होता है।

✍🏻 योगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969 पृष्ठ 1

गुरुवार, 4 अगस्त 2022

👉 महात्मा महान आत्मा वाला पुरुष

प्रेम और समता मनुष्य को ज्ञान देता है कि वह अपनी सीमाओं से बाहर भी है और वह अखिल जगत की आत्मा का ही भाग है। समता की यह अनुभूति मानव की आत्मा में उमड़ कर ही कला, विज्ञान, साहित्य

और श्रेष्ठ रचना द्वारा संसार में सद्गुण, सद्विचार तथा सद्प्रेरणा देने में सहायक होती है। तभी हमारी महान आत्माएं स्वार्थ, निष्कपटता, उदारतादि द्वारा संसार में सहायक होती हैं। तभी हमारी महान आत्माएं स्वार्थ त्याग, निष्कपटता, उदारतादि द्वारा संसार में प्यार-प्रेम, परोपकार और सद्व्यवहार का प्रसार करती हैं। महान आत्माओं ने प्रेम के मार्ग में अनेक कष्ट, शारीरिक-यंत्रणाएं सहकर, यही नहीं मृत्यु तक का भी स्वागत कर मनुष्य के सच्चे स्वरूप को समझा और आदर्श जीवन व्यतीत करके मानवता के परम सत्य की पुष्टि की। इसीलिए हम उन्हें महात्मा अर्थात् महान आत्मा वाला महापुरुष कहकर संबोधित करते हैं।

हमारी आत्मा जब संकीर्णता का वरण करती है तो निज की विशेषता खो देती है। इसकी विशेषता, समत्व में ही है। हम विश्व से समभाव होकर ही अपने वास्तविक स्वरूप का बोध कर सकेंगे और तभी हमें वास्तविक आनन्दानुभूति होगी। हम भययुक्त और संघर्ष की विषम स्थितियों में तभी तक रहते हैं जब तक कि प्रकृति के व्यापक-समत्व के सिद्धाँत को नहीं समझ पाते और तभी तक हमें सारा संसार पराया जान पड़ता है। अपने और पराये तथा अपने अन्तःकरण और विश्व की व्याख्या के बीच जो सहज समता है उसे अनुभव कर इसी एक मंगलमय सूत्र के द्वारा जीवन को धन्य बनाता है।

रवीन्द्रनाथ टैगोर
अखण्ड ज्योति जून 1964 पृष्ठ 1

बुधवार, 3 अगस्त 2022

👉 आत्म विश्वास का शास्त्र

जीवन संग्राम का सबसे बड़ा शस्त्र आत्मविश्वास है। जिसे अपने ऊपर-अपने संकल्प बल और पुरुषार्थ के ऊपर भरोसा है वही सफलता के लिये अन्य साधनों को जुटा सकता है। आत्म संयम भी उसी के लिये सम्भव है जिसे अपने ऊपर भरोसा है। जिसने अपने गौरव को भुला दिया, जिसे अपने में कोई शक्ति दिखाई नहीं पड़ती जिसे अपने में केवल दीनता, अयोग्यता, एवं दुर्बलता ही दिखाई पड़ती है। ह किस बलबूते पर आगे बढ़ सकेगा? और कैसे इस संघर्ष भरी दुनियाँ में अपना अस्तित्व यम रख सकेगा। बहती धार में जिसके पैर उखड़ गया, उसे पानी बहा ले जाता है पर जो अपना हर कदम मजबूती से रखता है वह धीरे-धीरे तेज धार को भी पार कर लेता है।

हमें परमात्मा ने उतनी ही शक्ति दी है जितना कि किसी अन्य मनुष्य को। जिस मंजिल को दूसरे पार कर चुके हैं उसे हम क्यों पार नहीं कर सकते? फौज के प्रत्येक सैनिक को एक सी बन्दूक दी जाती है। निशाना लगाना हर सिपाही की अपनी सूझबूझ और योग्यता का काम है। सभी व्यक्ति अनन्त सामर्थ्य लेकर इस भूतल पर अवतीर्ण हुए हैं। प्रश्न केवल पहचानने, भरोसा करने और उसके सदुपयोग का है। जिन्हें अपने ऊपर भरोसा है वे अपनी उपलब्ध सामर्थ्य का सदुपयोग करके कठिन से कठिन मंजिल को पार कर सकते हैं।

दुनियाँ को चलाने और सुधारने की हमारी जिम्मेदारी नहीं है। पर अपने लिए जो कर्तव्य सामने आते हैं उन्हें पूरा करने में सच्चे मन से लगना और उन्हें बढ़िया ढंग से करके दिखाना निश्चय ही हमारी जिम्मेदारी है। अपने आपको व्यवस्थित करके हम दुनियाँ के संचालन और सुधार में सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण योग दे सकते है। अधूरे और भद्दे काम करना अपने आप को कलंकित करना है। परमात्मा ने हमारी रचना अपूर्ण नहीं सर्वांग और उच्चकोटि की सामग्री से की है। उसने हमें सजाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। फिर हमीं अपने गौरव को मलीन क्यों न होने दें। हमें जैसा अच्छा बनाया गया है उसी के अनुरूप हमारे काम भी गौरवपूर्ण होने चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1961 मई Page 19

मंगलवार, 2 अगस्त 2022

👉 उदारता और कठोरता।

दूसरों के साथ उदारता का व्यवहार केवल वे कर सकते है जो अपने प्रति कठोर होते है। जो अपने साथ रियायत चाहते है उन्हें दूसरों के साथ कठोर बनना पड़ता है। तराजू का एक पलड़ा ही झुक सकता है और वह भी तब, जब दूसरा ऊपर उठता है। यदि मनुष्य अपने लिए अधिक सुविधायें चाहेगा तो स्वभावतः उसे दूसरों की उपेक्षा करनी पड़ेगी दूसरों के प्रति जितनी अधिक ममता और करुणा होगी उतनी ही अपनी जरूरतें घटाकर, अपनी सुविधाएँ हटा कर उन्हें जरूरतमन्दों के लिए लगाने का भाव जागेगा उदार हृदय व्यक्ति अन्ततः बिल्कुल खाली हाथ और निरन्तर सेवा परायण हो जाता है। इसलिए उसकी महानता है।

जब तक आक्रमण की, प्रतिहिंसा की, बदला लेने की या किसी को चोट पहुँचाकर सन्तुष्ट होने की इच्छा जीवित है तब तक हमारे अन्दर असुरता एवं दुष्टता विद्यमान है यह मानना होगा। जब इस दिशा में उत्पन्न होने वाला उत्साह उपेक्षा में बदलने लगे तो समझना चाहिये वह दुष्टता शांत होती जाती है। जब दूसरों की भूलों के प्रति क्षमा का, दूसरों के प्रति करुणा का, और दूसरों के अभावों के प्रति सहानुभूति का भाव उदय होने लगे तो समझना चाहिए कि मानवता विकसित हो रही है। यह विकास इस सीमा तक पहुँच जाय कि हानि पहुँचाने और शत्रुता रखने वालों को भी सुख पहुँचाने का प्रयत्न किया जाय तो समझना चाहिए कि साधुता प्रकट होने लगी।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1961 जून Page 18

👉 दृष्टिकोण का अन्तर

बाहर की परिस्थितियों में अपने अपने दृष्टिकोण के कारण भिन्न भिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ होती है। एक भिखारी को देखकर किसी के मन में दया उपजती है और उसकी यथाशक्ति सहायता करता है। किन्तु दूसरा उसे निकम्मा और आलसी मानकर घृणा करता है। सहायता करना उसके निकम्मेपन को बढ़ाने वाला मानकर अनुचित समझता है। कोई दूसरा उसे दे रहा हो तो उसे भी रोकता है। यह भिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ भिन्न दृष्टिकोणों के कारण ही है। बुद्धि बेचारी तो खरीदे हुए गुलाम की तरह है, उसे भावनाओं की हाँ में हाँ मिलानी पड़ती है। भाग्य के की हाँ में हाँ मिलानी पड़ती है।

 भाग्य के सताये हुए भिक्षुक की सहायता करना सहृदय और मानवता की पुकार है, इस आदर्श के पक्ष में बुद्धि के द्वारा बहुत कुछ कहा जा सकता है। इसी प्रकार निकम्मे लोगों की गति विधियों पर अंकुश लगाने के लिए उन्हें अपनी गतिविधियाँ छोड़ने के लिए बाध्य करने के पक्ष में भी बहुत कुछ मसाला बुद्धि के पास निकल आयेगा। अन्तिम निर्णय कैसे हो, दोनों से कौन सा पक्ष सही है, इसका निष्कर्ष निकालना सरल नहीं है। वह भिखारी वस्तुतः भीख माँगने के लिए मजबूर था या निकम्मा था? दूसरा निर्णय क्षण भर में उसकी शक्ल देखने मात्र से नहीं हो सकता। इसके लिए उनकी परिस्थितियों को समझने के लिए गहराई तक जाना होगा और बहुत खोज बीन करनी पड़ेगी। इतना अवकाश न होने पर वास्तविकता तक पहुँचना कठिन है।

वास्तविकता के समुचित जानकर न होते हुए भी एक भिखारी के सम्बन्ध में दो मनुष्यों ने दो अलग अलग प्रकार के जो निष्कर्ष निकाले और अलग अलग प्रकार के व्यवहार किये उसमें उनकी मान्यता और भावना ही प्रधान कारण थी। आमतौर से होता यही है कि अपने दृष्टिकोण के अनुसार ही संसार के पदार्थों की, परिस्थितियों की तथा व्यक्तियों की परख की जाती है और उसी के आधार पर उन्हें भला या बुरा माना जाता है। यों हर वस्तु में गुण और अवगुण, भलाई और बुराई, उपयोगिता और अनुपयोगिता को न्यूनाधिक मात्रा मौजूद है और उसका विश्लेषण तार्किक बुद्धि से हो भी सकता है, पर आम तौर से दूसरों के विषय में जो अभिमत प्रकट किए जाते है उनमें अपना दृष्टिकोण ही प्रधान कारण होता है। उसी के आधार पर हम दूसरों को भला या बुरा समझते है और तदनुसार ही घृणा, उपेक्षा, सहानुभूति या प्रेम का व्यवहार करते है।

🌹 अखण्ड ज्योति 1961 मई पृष्ठ 24

बुधवार, 27 जुलाई 2022

👉 धर्म प्रसार का प्रमुख आधार

प्राचीन काल के जिन महापुरुषों की छाप हमारे हृदय पर लगी हुई है, उसका कारण उनकी विद्या, प्रतिभा, वाणी या चातुरी नहीं वरन् उनका आदर्श जीवन निर्मल चरित्र, उज्ज्वल लक्ष्य एवं तप त्याग ही है। चरित्रहीन व्यक्ति प्रचार द्वारा क्षणिक भावावेश तो उत्पन्न कर सकते हैं, पर उसका प्रभाव कभी भी स्थायी नहीं हो सकता।

धर्म प्रचार के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने जीवन को आदर्श बना कर दूसरों के सामने अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करें। काम ही सबसे बड़ा प्रचार है। श्रेष्ठ काम करके ही हम दूसरों को श्रेष्ठ बनने के लिए सच्ची और ठोस शिक्षा दे सकते हैं। उपदेशकों की नहीं अब उन आदर्शवादियों की आवश्यकता है जो धर्म कर्तव्यों को अपने जीवन में ओत-प्रोत करते हुए कुछ जनता का व्यावहारिक मार्ग दर्शन कर सकें।

हम आज जहाँ हैं वहीं से आगे बढ़ने का प्रयत्न करें। पूर्णता की ओर चलने की यात्रा आरम्भ करें। दोषों को ढूँढ़ें और उन्हें सुधारें। गुणों का महत्व समझें और उन्हें अपनायें। इस प्रकार आन्तरिक पवित्रता में जितनी कुछ अभिवृद्धि हो सकेगी उतने का भी दूसरों पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा। सन्मार्ग की दिशा में चलने के लिए उठाया हुआ प्रत्येक कदम अपने लिए ही नहीं, समस्त संसार के लिए श्रेयस्कर होता है।

लोकमान्य तिलक
अखण्ड ज्योति मई 1964 पृष्ठ 1

शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

👉 मनुष्य का व्यक्तित्व

जो व्यक्ति वास्तव में अपने से प्रेम नहीं करते वे ही मन, वचन तथा कर्म से बुरा काम करके अपने लिए पतन का पथ प्रशस्त करते हैं। किन्तु ऐसे व्यक्ति मुँह से यही कहते हैं कि “मैं अपने को प्यार करता हूँ।” इसके विपरीत ऐसा व्यक्ति जो कहता है कि “मैं अपने को प्यार नहीं करता” बुरे कर्मों से बच कर मन, वचन तथा कर्म से शुभ कर्त्तव्यों में संलग्न रहते हैं भोग, विलास, प्रमाद जैसी प्रवृत्तियों से दूर रहते हैं, वे ही वास्तव में अपने आप से प्रेम करने वाले माने जा सकते हैं। इसलिए यह निश्चय रूप से समझ लो कि जो आदमी अपनी आत्मा को प्यार करता है वह सदैव उसे दुराचरण से दूर रखेगा, क्योंकि बुरा काम करने वाला कभी भी आनन्द नहीं पा सकता।

जिस समय मौत आ घेरती है, मनुष्य उसके पंजे में बेबस होकर फँस जाता है तो उस समय वह किस चीज को अपनी कह सकता है? वह कौन सी चीज है जिसे वह अपने साथ ले जा सकता है और जो छाया की तरह कभी उसका साथ नहीं छोड़ती? जो काम वह करता है, चाहे वे भले हों या बुरे, उन्हीं को वह अपने साथ ले जा सकता है, उन्हीं को वह अपना कह सकता है और वे ही छाया की तरह उसके साथ रहते है। इसलिए हर एक मनुष्य को उचित है कि वह अच्छे कार्य करके भविष्य के सुख के लिए एक खजाना इकट्ठा कर ले।

भगवान बुद्ध
अखण्ड ज्योति जुलाई 1963 पृष्ठ 1

सोमवार, 18 जुलाई 2022

👉 आत्मचिंतन के क्षण 18 July 2022

हँसना एक दैवी गुण है। हँसाना एक उत्कृष्ट स्तर का उपकार है। मुस्कराता हुआ चेहरा भले ही काला-कुरूप क्यों न हो, सदा अति सुंदर लगेगा। प्रसन्नता एक आदत है, जो कुछ समय के निरन्तर अभ्यास से अपने अंदर उत्पन्न की जा सकती है। अपनी सुविधाओं को देखें और प्रसन्न रहें। शुभ और प्रिय देखें। उज्ज्वल भविष्य की कल्पना करें, सद्भावना और सत्प्रवृत्तियों का चिंतन करें । यदि हम हँसता और हँसाता जीवन जी सकें, तो समझना चाहिए कि हमने सच्चे कलाकार  जैसी मंगलमयी सफलता एवं उल्लास भरी उपलब्धि प्राप्त कर ली।

योग का उद्देश्य मानसिक परिष्कार है। उसमें संग्रहीत कुसंस्कारों का शमन करना पड़ता है। स्वभाव का अंग बनी हुई दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन में जुटना होता है। भौतिक लिप्साओं की ललक शान्त करनी पड़ती है। चिंतन को उत्कृष्टता में रस लेने के लिए सहमत किया जाता है। आत्मा और परमात्मा के बीच की खाई पाटनी होती है। यह सारे कार्य अंतःपरिशोधन और आत्म परिष्कार से संबंधित हैं। इसलिए योग साधना वस्तुतः मन को साधने की ही विद्या है।

बुराई को लेकर सक्रिय रहने वाले व्यक्ति के भी सुधरने की आशा की जा सकती है, किन्तु आदर्शों, सिद्धान्तों को बघारने वाले, उपदेश देने वाले अकर्मण्य-आलसी लोगों के सुधरने की कोई गुंजाइश नहीं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 7 जुलाई 2022

👉 बुरे विचारों से दूर रहिए। (अंतिम भाग)

संसार के अत्याधिक मनुष्यों को यह समझाना ही कठिन है कि उनके विचार ही उनके सुख-दुख के कारण हैं। मनुष्यमात्र में अपने आप पर विवेचना करने की शक्ति का अभाव होता है। हम सभी बहिर्मुखी हैं। हम अपने कष्टों का कारण दूसरों को मानने में सन्तोष पाते हैं। अपने दोषों को दूसरे में देखते हैं। जिस अवाँछनीय घटना की जड़ हमारे विचारों में ही है उसे हम दूसरे व्यक्तियों में देखते हैं। इस प्रकार की मानसिक प्रवृत्ति को दोषारोपण की प्रवृत्ति कहते हैं अथवा प्रोजेक्शन कहते है।

वही मनुष्य बुरे विचारों के निरोध में समर्थ होता है, जो अपने आपके विषय में सदा चिन्तन करता है और जो परोक्ष रूप से भी यह जानता है कि मनुष्य का मन ही दुख और दुखों का कारण है। ऐसे ही मनुष्य में भले ओर बुरे विचारों के पहचानने की शक्ति उत्पन्न होती है।

किसी भी ऐसे विचार को बुरा विचार कहना चाहिये जो आत्मा को दुःख देता हो, उसको भ्रम में डालता हो। बीमारी के विचारों और असफलता के विचारों को सभी बुरा कहेंगे यह प्रत्यक्ष ही है कि इन विचारों से मन को दुख होता है और अनहोनी घटना होके रहती है। किन्तु इस बात को मानने के लिये कम लोग तैयार होंगे कि शत्रुता के विचार, दूसरों को क्षति पहुंचाने के विचार भी बुरे विचार है। ये विचार भी उसी प्रकार हमारी आत्मा का बल कम कर देते हैं जिस प्रकार कि असफलता और बीमारी के विचार आत्मा का बल कम कर देते हैं।

समाप्त
अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 14

👉 बुरे विचारों से दूर रहिए। (भाग 2)

हमारे जीवन का सुख और दुःख हमारे विचारों पर ही निर्भर रहता है। आधुनिक मनोविज्ञान की खोजों से पता चलता है कि मनुष्य का न सिर्फ आन्तरिक जीवन वरन् उसके समस्त जीवन के व्यवहार तथा शारीरिक स्वास्थ्य भी मन की कृष्ट तथा अकृष्ट गतियों का परिणाम मात्र है। अशुभ विचारों का लाना ही अपने जीवन को दुखी बनाना है, तथा शुभ विचारों का लाना सुखी बनाना है।

अब प्रश्न यह आता है कि हम अशुभ विचारों को आने से कैसे रोकें जिससे कि उनसे पैदा किये दुखों से हम बच सकें? यह प्रश्न बड़े महत्व का है और संसार के समस्त मनस्वी लोगों ने इस प्रश्न पर गम्भीर विचार किया है। किन्तु इस विषय पर जितना ही विचार किया जाय श्रेयस्कर है। प्रत्येक मनुष्य को इस विषय पर विचार करना चाहिये। दूसरों के विचारों से हमें लाभ अवश्य होता है किन्तु जब तक हम दूसरों के विचारों का मनन नहीं करते, उनसे भली प्रकार लाभ नहीं उठा सकते। लेखक पहले इस विषय पर अपने विचारों का उल्लेख करेगा इस लेख का तात्पर्य यहाँ है कि प्रत्येक पाठक को इस विषय पर विचार करने को प्रस्तुत किया जाय, ताकि जीवन की सबसे महत्वपूर्ण समस्या को अपने आप सुलभ कर सकें।

बुरे विचारों के निरोध का उपाय सबसे प्रथम उनको पहचानना ही है। जिनके विचारों को। हम बुरे विचार मानते ही नहीं, उन्हें हम अपने मनोमन्दिर में प्रवेश करने से क्योंकर रोक सकेंगे? यदि दूसरों के धनापहरण के विचार को हम उत्तम विचार मानते हैं तो उसे अपने मन में आने से रोकने की जगह भली प्रकार से उसका स्वागत करेंगे। जो विचार बुरे होते हैं। वे उनके प्रथम स्वरूप में ही बुरे नहीं लगेंगे, उनके परिणाम बुरे होते हैं। विचारवान व्यक्ति ही इस बात को जान सकता है कि अमुक विचार अन्त में दुखदायी होगा। 

क्रमशः जारी
अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 14 

👉 बुरे विचारों से दूर रहिए। (भाग 1)

हमारा मन अभ्यास का दास है। जिस प्रकार का अभ्यास मन को कराया जाता है उसी प्रकार उसका अभ्यास सदा के लिए बन जाता है। जिस मनुष्य को पढ़ने-लिखने का अभ्यास रहता है, उसका मन रुचि के साथ ऐसे काम को करने लगता है। ऐसे व्यक्ति से बिना पढ़े-लिखे रहा ही नहीं जाता। जिस मनुष्य को दूसरों की निन्दा करने का अभ्यास है, जो दूसरों के अहित का सदा चिन्तन किया करता है, वह भी उन कर्मों को किये बिना रह नहीं सकता ऐसे कार्य उसकी एक प्रकार की नशा जैसे व्यसन हो जाते हैं, वह व्यक्ति अनायास ही दूसरों की निंदा और अकल्याण सोचने में लग जाता है। दूसरों की स्तुति सुनकर उसे बुखार जैसा आ जाता है।

जिस व्यक्ति का इस प्रकार का अभ्यास हो जाता है वह जब अपने आपके विष में अशुभ विचार लाता है तो उन विचारों का भी विरोध नहीं कर सकता। जिनको दूसरों की बुराई का चिन्तन भला लगता है, वह अपनी बुराई का भी चिन्तन करने लगता है फिर इस प्रकार के विचार उसके मन को नहीं छोड़ते। अब यदि वह चाहे कि अमुक अशुभ विचार को हम छोड़ दें तो भी अब वह उसे छोड़ने में असमर्थ होता है। वहीं मनुष्य अपने विचारों पर नियन्त्रण कर सकता है जिसकी आत्मा बलवान और विवेकी है। जिस साँप को हम दूसरों के काटने के लिये पाले हैं, वहीं साँप किसी असावधानी की अवस्था में अपने आपको काट सकता है। दूसरों को दुःख देने के विचार साँप के सदृश है। अतएव सबका सदा कल्याण सोचना, किसी का भी अहित न सोचना, बुरे विचारों के निराकरण का पहला उपाय है।

जिस व्यक्ति के प्रति हम बुरे विचार लाते हैं उससे हम घृणा करने लगते हैं। घृणा की वृत्ति उलट कर भय की वृत्ति बन जाती है। जो दूसरों की मानहानि का इच्छुक है उसके मन में अपने आप ही अपनी मान हानि का भय उत्पन्न हो जाता है। जो दूसरों की शारीरिक क्षति चाहता है, उसे अपने शरीर के विषय में अनेक रोगों की कल्पना अपने आप उठने लगती है। जो दूसरों की असफलता चाहता है वह अपनी सफलता के विषय में सन्देहात्मक हो जाता है।

हमें यहाँ ध्यान रखना चाहिये कि कोई भी भावना व्यक्ति विशेष से सम्बन्धित नहीं रहती। हम किसी समय एक विशेष व्यक्ति से डर रहे हों, संभव है वह व्यक्ति हमारा कुछ बुरा न कर सके वह किसी कारण से हमसे दूर हो जाये। किन्तु इस प्रकार व्यक्ति विशेष से दूर हो जाने पर हम अपनी दुर्भावना से मुक्त नहीं होते। यह भावना अपना एक दूसरा विषय खोज लेगी।

क्रमशः जारी
अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 13

👉 मनुष्य तुच्छता को छोड़े और महान बने

भारत माता चाहती हैं कि उसके पुत्रों की नस-नस में एक नवीन शक्ति का विद्युत सञ्चार हो। लोग साहसी बनें। कायरता से घृणा करें। संकीर्णता और स्वार्थपरता कायरता के चिह्न हैं। आदर्श के मार्ग पर चलते हुए जो कष्ट उठाने पड़ते हैं, उन्हें प्रसन्नतापूर्वक शिरोधार्य करना ही साहस और वीरता है। कायर घड़ी-घड़ी मरते रहते हैं पर वीर पुरुष केवल एक ही बार मरते हैं और वह भी शानदार परंपरा स्थापित करते हुए।

मनुष्य तभी तक मनुष्य है जब तक वह पशु प्रवृत्ति से ऊपर उठने के लिए संघर्ष करता रहता है। संसार पर विजय प्राप्त करना गौरव-पूर्ण है पर अपनी दुर्बलताओं ही को जीत लेना सब से बड़ी विजय है। साहित्य, विज्ञान और कला-कौशल में निष्णात होना अच्छी बात है पर मनुष्य जीवन की समस्याओं वासनाओं, भावनाओं और आकाँक्षाओं को समझना और उनके नियन्त्रण करने की विधि जानना सब से बड़ी बात है। आज की सब से बड़ी आवश्यकता है कि लोग साहसी बनें। संकीर्णता, स्वार्थपरता और तुच्छता से घृणा करें और महान बनने के लिए साहसपूर्वक कदम बढ़ाते चलें।

स्वामी विवेकानन्द
अखण्ड ज्योति जून 1963 पृष्ठ 1

👉 सच्चा आनन्द प्राप्त करने का मार्ग

कर्म करना—कर्तव्य धर्म का पालन मनुष्य का धर्म है। इसको छोड़ने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है। पर काम करते समय आत्म-भाव को न भुलाना चाहिए और इसके लिए प्रतिदिन नियमपूर्वक ध्यान करना भी जरूरी है। इस प्रकार के ध्यान से आत्मिक विचारधारा दूसरे कार्य करते समय भी बहती रहेगी।

इससे दुनिया को मनुष्यों एवं घटनाओं को तुम दूसरी ही दृष्टि से देखने लगोगे। इससे स्वार्थ भी छूट जायगा और दुनिया के बन्धन भी कष्ट नहीं देंगे। सच्चा आनन्द प्राप्त करने का यही मार्ग है। संसार में कोई जाने या अनजाने आनन्द प्राप्त करने की ही चेष्टा कर रहे हैं। कोई शराब पीकर उस आनन्द का भागी बनना चाहता है और कोई उत्तम मार्ग का अवलम्बन करके उसे प्राप्त करता है। आनन्द ही मनुष्यों का सच्चा और सहज स्वभाव है।

सभी लोग ऐसा निर्मल सुख चाहते हैं जिसमें किसी दुःख का पुट न हो। सभी ऐसे ही आनन्द की खोज में हैं। पर यह केवल उन्हीं को मिल सकता है जो कर्म और ज्ञान का—लौकिकता और आध्यात्म का उचित सामञ्जस्य करने में सक्षम होते हैं।

महर्षि रमण
अखण्ड ज्योति अप्रैल 1963 पृष्ठ 1

👉 बेहूदा मजाक

द्वापर के अन्त की बात है। युधिष्ठिर को राज सिंहासन मिलने वाला था। चारों ओर खूब सजावट हो रही थी, राजमहल तो अद्भुत कला कौशल के साथ सजाया गया था। कलाकारों ने बहुमूल्य काँच और मणियों से इस प्रकार के नक्षत्र बनाये थे जहाँ जल से भरे हुए स्थान थल, और थल दिखाई पड़ने वाले स्थान जलाशय प्रतीत होते। बड़े-बड़ों की बुद्धि वहाँ चकरा जाती थी। दुर्योधन को यह सब पता न था, जब वे उधर से निकले थे, सूखी जमीन के धोखे जलाशय में चले गये। कपड़े भीगकर तर हो गये, दर्शकों की दन्तावली उपहास करती हुई खुल पड़ी। उतावली द्रौपदी से न रहा गया उसने कह ही तो दिया- “अन्धे के अन्धे ही होते हैं।”

मजाक करना उच्चकोटि की कला है। किसी को चिढ़ाना मजाक नहीं मूर्खता है और खासतौर से जब कोई व्यक्ति किसी कष्ट में पड़ गया हो तब उसे चिढ़ाना तो परले सिरे का बेहूदापन है। दुर्योधन के कलेजे में द्रौपदी के शब्द तीर की तरह पार निकल गये। एक स्त्री द्वारा अपने पिता तक का अपमान होते सुनकर दुर्योधन का कलेजा जल-भुनकर खाक हो गया। मुँह से उस समय वह कुछ न बोला पर विषधर सर्प की तरह प्रतिहिंसा की आग स्थायी रूप से उसकी छाती में सुलग गई।

हर आदमी जानता है कि महाभारत में कैसी रोमाँचकारी रक्त की नदियाँ बहीं और अनेक दृष्टियों के कैसे-कैसे दुष्परिणाम निकले। इस सब की मूल में एक बहुत ही छोटी वस्तु थी, और वह थी- ‘बेहूदा मजाक।’ हममें से बहुत आदमी द्रौपदी की गलती को अक्सर दुहराया करते हैं और अकारण मित्रों को शत्रु बनाया करते हैं।

अखण्ड ज्योति से

सोमवार, 4 जुलाई 2022

👉 आध्यात्मिकता की मुस्कान

इस संसार में सब कुछ हँसने को लिए उपजाया गया है। जो बुरा और अशुभ है वह हमारी प्रखरता की चुनौती के रूप में है। परीक्षा के प्रश्न पत्रों के देखकर जो छात्र रोने लगे, उसे अध्ययनशील नहीं माना जा सकता। जिसने थोड़ी-सी आपत्ति-असफलता एवं प्रतिकूलता को देखकर रोना-धोना शुरू कर दिया, उसकी आध्यात्मिकता पर कौन विश्वास कर सकता है? प्रतिकूलता हमारा साहस बढ़ाने, धैर्य को मजबूत करने और सामर्थ्य को विकसित करने आती है। सरल जिन्दगी यदि संयत हो सके तो वह सबसे भद्दे ढंग की ही होगी क्योंकि वह जो सरलता पूर्वक दिन गुजारता रहता है उसमें न तो किसी प्रकार की विशेषता रह जाती है और न प्रतिभा। संघर्ष के बिना भी भला कहीं, इस दुनिया में किसी का जीना सम्भव हुआ है।

नई उपलब्धियों में हमें हँसना चाहिए, अब तक मिल चुका उससे सन्तोष व्यक्त करना चाहिए और भविष्य की शुभ सम्भावनाओं की कल्पना करके सदा प्रमुदित होते रहना चाहिए। रोना एक अभिशाप है जो केवल अविवेकी लोगों को शोभा देता है। जिसे आत्मा के स्वरूप का ज्ञान है और परमात्मा की महत्ता, कुशलता और विनोद को समझता है उसे हँसने मुस्कराने की परिस्थितियों के अतिरिक्त और कुछ इस जीवन में अनुभव ही क्या हो सकता है?

~ महर्षि रमण
~ अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 1

👉 जड़े गहरी जानी चाहिए

जापान में जहाँ देवदारु के पेड़ तीन-चार सौ फीट तक ऊँचे होते है, वहाँ कुछ ऐसे भी होते हैं जो बहुत पुराने होने पर भी दो-चार फीट के ही रह जाते हैं। इन बौने पेड़ों के बारे में मुझे बड़ा अचम्भा हुआ और उनके न बढ़ने का कारण मालूम किया तो बताया गया कि जापानी लोग जान बूझकर कौतूहलवश इन्हें छोटा बनाये रहते हैं, अपनी कारिस्तानी से बढ़ने नहीं देते। कारिस्तानी यह कि वे पेड़ की टहनियाँ और पत्तों को जरा भी नहीं छेड़ते पर उसकी जड़ों को जमीन में बढ़ने नहीं देते और उनकी बराबर काट-छाँट करते रहते हैं।

इंसानों में से अनेकों ऐसे होते हैं जिन्हें बहुत छोटा या ओछा कहा जाता है। जापान के देवदारु पेड़ों की तरह उनकी भी जड़ें भीतर ही भीतर कटती रहती हैं और वे बौनी जिन्दगी बिताते रहते हैं। जो पेड़ बढ़ना और फलना-फूलना चाहता है उसकी जड़ों को गहराई तक जाना जरूरी हैं। जो मनुष्य उन्नतिशील बनना चाहता है उसके लिए यही उचित है कि अन्तरात्मा की जमीन में सद्गुणों को जड़ों की निरन्तर बढ़ाता चले, जब तक जड़ें न बढ़ेंगी पेड़ के बढ़ने और फलने फूलने की आशा कैसे की जा सकती है?

~ स्वामी रामतीर्थ
~ अखण्ड ज्योति सितम्बर 1963 पृष्ठ 1

👉 देने से ही मिलता है

यदि हम कुछ प्राप्त करना चाहते हैं तो उसका एक ही उपाय है- ‘देने के लिए तैयार होना।’ इस जगत में कोई वस्तु बिना मूल्य नहीं मिलती। हर वस्तु का पूरा-पूरा मूल्य चुकाना पड़ता है। जो देना नहीं चाहता वरन् लेने की योजनाएं ही बनाता रहता है वह सृष्टि के नियमों से अनजान ही कहा जायेगा।

यदि समुद्र बादलों को अपना जल देना न चाहे तो उसे नदियों द्वारा अनन्त जल राशि प्राप्त करते रहने की आशा छोड़ देनी पड़ेगी। कमरे की किवाड़ें और खिड़कियाँ बंद करली जायें तो फिर स्वच्छ वायु का प्रवेश वहाँ कैसे हो सकेगा? जो मलत्याग नहीं करना चाहता उसके पेट में तनाव और दर्द बढ़ेगा, नया, सुस्वादु भोजन पाने का तो उसे अवसर ही न मिलेगा। झाडू न लगाई जाय तो घर में कूड़े के ढेर जमा हो जायेंगे। जिस कुंए का पानी खींचा नहीं जाता उसमें सड़न ही पैदा होती है।

त्याग के बिना प्राप्ति की कोई सम्भावना नहीं। घोर परिश्रम करने के फलस्वरूप ही विद्यार्थी को विद्या, व्यापारी को धन, उपकारी को यज्ञ और साधक को ब्रह्म की प्राप्ति होती है। कर्त्तव्य पालन करने के बदले में अधिकार मिलता है और निःस्वार्थ प्रेम के बदले में दूसरों का हृदय जीता जाता है। जो लोग केवल पाना ही चाहते हैं देने के लिए तैयार नहीं होते उन्हें मिलता कुछ नहीं, खोना पड़ता है।

आनन्द देने में है। जो जितना देता है उससे अनेक गुना पाता है। पाने का एकमात्र उपाय यही है कि हम देने के लिए तैयार हों। जो जितना अधिक दे सकेगा उसे उसके अनेक गुना मिलेगा। इस जगत का यही नियम अनादि काल से बना और चला आ रहा है। जो इसे जान लेते हैं उन्हें परिपूर्ण तृप्ति पाने की साधना सामग्री भी प्राप्त हो जाती है।

~ स्वामी विवेकानन्द
~ अखण्ड ज्योति नवम्बर 1963 पृष्ठ 1

👉 जीवन का स्वरूप और अर्थ

जीवन का अर्थ है आशा, उत्साह और गति। आशा, उत्साह और गति का समन्वय यही जीवन है। जिसमें जीवन का अभाव है उसमें इन तीनों गुणों का न होना निश्चित है। साथ ही जिनमें यह गुण परिलक्षित न हों समझ लेना चाहिए कि उनमें जीवन का तत्व नष्ट हो चुका है।

 केवल श्वास-प्रश्वास का आवागमन अथवा शरीर में कुछ हरकत होते रहना ही जीवन नहीं कहा जा सकता। जीवन की अभिव्यक्ति ऐसे सत्कर्मों में होती है, जिससे अपने तथा दूसरों के सुख में वृद्धि हो!

अपनी वर्तमान परिस्थिति से आगे बढ़ना, आज से बढ़कर कल पर अधिकार करना, अच्छाई को शिर पर और बुराई को पैरों तले दबाकर चलने का नाम जीवन है। कुकर्म करने तथा बुराई को प्रश्रय देने वाला मनुष्य जीवित दीखता हुआ भी मृत ही है। क्योंकि कुकर्म और कुविचार मृत्यु के प्रतिनिधि हैं इनको आश्रय देने वाला मृतक के सिवाय और कौन हो सकता है।

~ सुब्रह्मण्य भारती
~ अखण्ड ज्योति फरवरी 1966 पृष्ठ 1

शुक्रवार, 24 जून 2022

👉 अनुशासन सीखिये

एक बार मेढ़कों को अपने समाज की अनुशासनहीनता पर बड़ा खेद हुआ और वे शंकर भगवान के पास एक राजा भेजने की प्रार्थना लेकर पहुँचे।

प्रार्थना स्वीकृत हो गई। कुछ समय बाद शिवजी ने अपना बैल मेढ़कों के लोक में शासन करने भेजा। मेढ़क इधर-उधर निःशंक भाव से घूमते फिरे सौ उसके पैरों के नीचे दब कर सैकड़ों मेढ़क ऐसे ही कुचल गये।

ऐसा राजा उन्हें पसंद नहीं आया मेढ़क फिर शिवलोक पहुँचे और पुराना हटा कर नया राजा भेजने का अनुरोध करने लगे।

वह प्रार्थना स्वीकार कर ली गई। बैल वापिस बुला लिया गया। कुछ दिन बाद स्वर्गलोक  से एक भारी शिला मेढ़कों के ऊपर गिरी उससे हजारों की संख्या में वे कुचल कर मर गये।

इस नई विपत्ति से मेढ़कों को और भी अधिक दुःख हुआ और वे भगवान के पास फिर शिकायत करने पहुँचे।

शिवजी ने गंभीर होकर कहा-बच्चों पहले हमने अपना वाहन बैल भेजा था, दूसरी बार, हम जिस स्फटिक शिला पर बैठते हैं उसे भेजा। इसमें शासकों का दोष नहीं है। तुम लोग जब तक स्वयं अनुशासन में रहना न सीखोगे और मिल-जुलकर अपनी व्यवस्था बनाने के लिए स्वयं तत्पर न होगे तब तक कोई भी शासन तुम्हारा भला न कर सकेगा। मेढ़कों ने अपनी भूल समझी और शासन से बड़ी आशायें रखने की अपेक्षा अपना प्रबंध करने में जुट गये।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 1

👉 प्रगति के पाँच आधार

अरस्तू ने एक शिष्य द्वारा उन्नति का मार्ग पूछे जाने पर उसे पाँच बातें बताई।

(1) अपना दायरा बढ़ाओ, संकीर्ण स्वार्थ परता से आगे बढ़कर सामाजिक बनो।

(2) आज की उपलब्धियों पर संतोष करो और भावी प्रगति की आशा करो।

(3) दूसरों के दोष ढूँढ़ने में शक्ति खर्च न करके अपने को ऊँचा उठाने के प्रयास में लगे रहो।

(4) कठिनाई को देख कर न चिन्ता करो न निराश होओ वरन् धैर्य और साहस के साथ उसके निवारण का उपाय करने में जुट जाओ।

(5) हर किसी में अच्छाई खोजो और उससे कुछ सीख कर अपना ज्ञान और अनुभव बढ़ाओ। इन पाँच आधारों पर ही कोई व्यक्ति उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच सकता है।

अखण्ड ज्योति अप्रैल 1973 पृष्ठ 1

👉 आदतों के गुलाम न बनें (भाग 1)

जिन कार्यों या बातों को मनुष्य दुहराता रहता है, वे स्वभाव में सम्मिलित हो जाती हैं और आदतों के रूप में प्रकट होती हैं। कई मनुष्य आलसी प्रवृत्ति के होते हैं। यों जन्मजात दुर्गुण किसी में नहीं हैं। अपनी गतिविधियों में इस प्रवृत्ति को सम्मिलित कर लेने और उसे समय कुसमय बार बार दुहराते रहने से वैसा अभ्यास बन जाता है। यह समग्र क्रिया−कलाप ही अभ्यास बन कर इस प्रकार आदत बन जाते हैं मानो वह जन्मजात ही हो। या किसी देव दानव ने उस पर थोप दिया हो। पर वस्तुतः यह अपना ही कर्तृत्व होता है जो कुछ ही दिन में बार-बार प्रयोग से ऐसा मजबूत हो जाता है मानो वह अपने ही व्यक्तित्व का अंग हो और वह किसी अन्य द्वारा ऊपर से लाद दिया गया हो।

जिस प्रकार बुरी आदतें अभ्यास में आते रहने के कारण स्वभाव बन जाती है और फिर छुड़ायें नहीं छूटती, वैसी ही बात अच्छी आदतों के सम्बन्ध में है।

अच्छी आदतों के संबंध में भी यही बात है। हँसते मुस्कराते रहने की आदत ऐसी ही है। उसके लिए कोई महत्वपूर्ण कारण होना आवश्यक नहीं। आमतौर से सफलता या प्रसन्नता के कोई कारण उपलब्ध होने पर ही चेहरे पर मुसकान उभरती है। किन्तु कुछ दिनों बिना किसी विशेष कारण के भी मुसकराते रहने की स्वाभाविक पुनरावृत्ति करते रहने पर वैसी आदत बन जाती हैं फिर उनके लिए किसी कारण की आवश्यकता नहीं पड़ती है और लगता है कि व्यक्ति कोई विशेष सफलता प्राप्त कर चुका है। साधारण मुसकान से भी सफलता मिलकर रहती है।

क्रोधी स्वभाव के बारे में भी यही बात है। कोई व्यक्ति अनायास ही चिड़चिड़ाते रहते देखे गये हैं। अपमान, विद्वेष या आशंका जैसे कारण रहने पर तो खीजते रहने की बात समय में आती है, पर तब आश्चर्य होता है कि कोई प्रतिकूल परिस्थिति न होने पर भी लोग खीचते झल्लाते चिड़चिड़ाते देखे जाते हैं। यह और कुछ नहीं उसके कुछ दिन के अभ्यास का प्रतिफल है।

शेष कल
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1990 नवम्बर पृष्ठ 38

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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