शुक्रवार, 6 मई 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग १२८)

भक्त के लिए जरूरी है दंभ का त्याग

‘‘सुशान्त तीव्रतर क्रम में जीवन के घने अंधेरे में घिरता-फँसता, उलझता जा रहा था। स्त्री, धन, वैरी व नास्तिक के विचारों व भावों में उसकी जीवनचेतना जकड़ गयी थी। इस जकड़न ने उसके व्यक्तित्व को बुरी तरह विषाक्त कर दिया था। अब वह पहले की तरह शान्त, शिष्ट, शालीन ब्राह्मणकुमार सुशान्त नहीं रहा। अब तो उसके व्यवहार में अभिमान व दम्भ की दुर्गन्ध फैलने लगी थी। उसे देखने वाले यकीन ही न कर पाते कि यही विप्रकुल शिरोमणि वेदाचार्य पंडित शशांक शर्मा का पुत्र सुशान्त शर्मा है। पंडित शशांक शर्मा का यश अभी भी आस-पास के क्षेत्र में चहुँ ओर व्याप्त था। जन-जन में उनकी चरित्रनिष्ठा, श्रद्धा-आस्था का विषय था। ऐसे विद्वान, तपस्वी ब्राह्मण के कुल में ऐसा पातक, ऐसा घना अंधियारा।

पर आज का सच यही था। जो पंडित शशांक शर्मा के हितैषी थे, उन्होंने उनके पुत्र सुशान्त को समझाने, सही राह पर लाने की बहुतेरी कोशिशें की। लेकिन उन्हें कोई कामयाबी न मिली। बल्कि उल्टे उन्हें सुशान्त के मित्रों के हाथों अपमानित व तिरस्कृत होना पड़ा। यद्यपि उन सबने इसका कोई बुरा नहीं माना। क्योंकि इन सब पर पंडित शशांक शर्मा ने अनेकों उपकार किए थे। उनका हार्दिक स्नेह व अपनत्व इन सबने पाया था। अभी तक इनमें से किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा कैसे हो गया? बचपन से इतना अधिक सदाचरण में निरत रहने वाले सुशान्त में यह विषाक्तता आयी कैसे? लेकिन इसका उत्तर अभी तक किसी के पास न था।

रही बात सुशान्त की तो वह अभी भी नगरवधू लावण्या के रूपजाल में उलझा था। लावण्या और उसके सहयोगी मिलकर सुशान्त का धन-वैभव लूट रहे थे। वासना का विष, द्युत-क्रीड़ा का व्यसन, वैरियों के प्रति द्वेष उसकी चिन्तन चेतना में हावी हो चुका था। नास्तिकों के संग साथ के कारण नारायण का पावन नाम कब का विस्मृत-विलीन हो चुका था। जितने भी हितैषी थे, वे सभी परेशान-हैरान थे। जितने कुटिल कुचाली थे, उनकी खुशी का कोई ठिकाना न था।’’ ब्रह्मर्षि क्रतु सुशान्त शर्मा की स्थिति का वर्णन-विवरण दिए जा रहे थे। अन्य सभी शान्त भाव से उन्हें सुन रहे थे। लेकिन अचानक न जाने क्यों महर्षि क्रतु ने देवर्षि की ओर देखते हुए कहा- ‘‘हे भक्तश्रेष्ठ! आप भक्ति का अगला सूत्र कहें। मेरा विश्वास है कि आपका अगला सूत्र भक्ति के आचारशास्त्र को और भी अधिक प्रकट व प्रकाशित करेगा।’’

महर्षि के इस कथन पर देवर्षि गम्भीर हुए और बोले- ‘‘हे ऋषिश्रेष्ठ! आप परम भागवत हैं। आपसे अधिक भक्त के आचरण का ज्ञान किसे होगा? फिर भी आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके मैं कहता हूँ’’-
‘अभिमानदम्भादिकं त्याज्यं’॥ ६४॥
अभिमान दम्भ आदि का त्याग करना चाहिए।

देवर्षि के इस सूत्र ने प्रायः सभी के चिन्तन सरोवर में अनेको विचारउर्मियों को अठखेलियाँ करने पर विवश कर दिया, हालांकि बोला कोई कुछ भी नहीं- सबके सब मौन बने रहे। काफी देर तक यूं ही नीरवता वातावरण में व्याप्त रही। फिर इस चुप्पी को तोड़ते हुए ऋषि क्रतु बोले- ‘‘जिस तरह से यह सच है कि भक्त को अभिमान व दम्भ आदि का त्याग कर देना चाहिए। उसी तरह से इस सच का दूसरा पहलू यह भी है कि भक्ति के अभाव में व्यक्ति अभिमान-दम्भ आदि से घिर जाता है जैसा कि सुशान्त शर्मा के जीवन में घटित हुआ।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २५२


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बुधवार, 4 मई 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग २५

प्रशंसा का मिठास चखिए और दूसरों को चखाइए

कोरे कागज पर काली स्याही के अक्षर छपाकर इस माध्यम द्वारा हम अपने हृदयगत भावों को आपकी अंतःचेतना में उड़ेलने का प्रयत्न कर रहे हैं। हमारा लिखना और आपका पढना निःस्सार है यदि किसी कर्म प्रवृत्ति के लिए इससे प्रेरणा न मिले। आज इस पुस्तक को साक्षी बनाकर हम-आप हृदय से हृदय का वार्तालाप कर रहे हैं। आपके विचार इस समय एकांत की शांति में हैं इस अवसर पर हम अपनी समस्त सद्भावनाओं को एकत्रित करके, आपके सच्चे हित चिंतन से प्रेरित होकर, घुटने टेक कर विनयपूर्वक यह प्रार्थना कर रहे हैं कि बंधु जीवन की अमूल्य घडियो का महत्त्व समझो, सुर दुर्लभ मानव जीवन को यो ही बर्बाद मत करो, नरक की यातना में मत तपो, यह बिलकुल आपके हाथ की बात है कि आज के अव्यस्थित जीवन को स्वर्गीय आनंद से परिपूर्ण बना लें। पिछले दिनों आपसे गलतियाँ हो चुकी हैं इसके लिए न तो लज्जित होने की जरूरत है और न दु:खी, या निराश होने की। सच्चा पश्चाताप यह है कि गलती की पुनरावृत्ति न होने दी जाए। बुरे भूतकाल को यदि आप नापसंद करते और अच्छे भविष्य की आशा करते हैं तो वर्तमान काल का सुव्यवस्थित रीति से निर्माण करना आरंभ कर दीजिए। वह शुभ आज ही है, अब ही है, इसी क्षण ही है जबकि अपने चिर संचित सद्ज्ञान को कार्य रूप में लाना चाहिए। अब आप इसके लिए तत्पर हो जाइए कि उत्तम श्रेणी का, उच्चकोटि का, सद्गुणों से परिपूर्ण जीवन बिताते हुए इस लोक और परलोक में दिव्य आनंद का उपभोग करेंगे।

सात्विक जीवन में प्रवेश पाने के लिए आप अच्छे गुणों को अपने में धारण करने का प्रयत्न आरंभ कर दीजिए। विनय, नम्रता, मुस्कराहट, प्रसन्नता, मधुर भाषण, प्रेमभाव, आत्मीयता-यह सब प्रशंसनीय गुण हैं, यदि आपके भीतर पुराने दुर्भावों के संचित संस्कार भरे हैं और वे मन ही मन झुँझलाहट, क्रोध, स्वार्थ जैसी निम्नकोटि की आदतों को भड़काते रहते हैं तो हताश मत हूजिए ।
 
बाहरी मन से ही सही, बनावट से ही सही, इन गुणों को नकली तौर से प्रकट करना आरंभ कीजिए। मन में चिड़चिड़ाहट हो भीतर ही भीतर क्रोध आ रहा हो, इतने में कोई बाहर का आदमी आता है तो आप भीतर की वृत्तियों को बदल दीजिए और चेहरे पर प्रसन्नता की रेखाएँ प्रकट करिए मुस्कराइए और हँसते उसका अभिवादन कीजिए। किसी अन्य कारण से क्रोध आ रहा है तो भी  मधुर भाषण करिए नाराजी को दबा दीजिए। यदि किसी के प्रति प्रेम या आत्मीयता की न्यूनता है तो भी उसे कुछ बढा कर प्रकट करने का प्रयत्न करिए। मन में बसने वाले दुर्भावों को दबा कर उनके स्थान पर सद्भावों को जरा बढा-चढा कर प्रकट करने का अभ्यास आरंभ कीजिए। अभ्यास से किसी काम में सफलता मिलती है। जो गुण सोए हुए पड़े हैं, उन्हें जगाने के लिए बनावटी सहारा लगाने की आवश्यकता पड़े तो वैसा करना चाहिए। छोटे बालक को खड़ा होना और चलना सिखाने के लिए लकड़ी की गाडी का सहारा दिया जाता है या उँगली पकड़ कर चलाया जाता है। निस्संदेह यह बनावटी सहायता है, इसकी तुलना अपने आप दौड़ने वाले बालक की सफलता से नहीं हो सकती तो भी अपने समय पर वह भी आवश्यक है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ३७

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👉 भक्तिगाथा (भाग १२७)

भक्ति का आचारशास्त्र

ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की यह बात सुनेकर ऋषि क्रतु ने कहा- ‘‘इस सन्दर्भ में मुझे ब्राह्मणपुत्र सुशान्त शर्मा के जीवन की घटनाओं का स्मरण हो रहा है।’’ सुशान्त शर्मा का जीवनक्रम सम्पूर्ण तो नहीं, परन्तु थोड़ा-बहुत ब्रह्मर्षि वशिष्ठ को भी पता था। उन्होंने भी इसे सुनने में अपनी रूचि दिखायी। ऋषि क्रतु कह रहे थे- ‘‘सुशान्त शर्मा का जन्म संस्कारवान ब्राह्मण कुल में हुआ था। यह ब्रह्मनिष्ठ श्रोत्रिय ब्राह्मणों का पावन कुल था। वेद-शास्त्र का पठन-पाठन, नित्य यज्ञ, अग्निहोत्र, भगवान नारायण की भक्ति, इस परिवार के सभी सदस्यों के जीवन के अनिवार्य व अविभाज्य अंग थे। यहाँ इस परिवार की नारियाँ भी नित्य त्रैकालिक संन्ध्या वंदन करती थीं। परिवार के सभी सदस्य यहाँ तक कि पालतु-पशु भी एकादशी के दिन निराहार रहते थे।

सुशान्त शर्मा को इस कुल के पावन संस्कार मिले थे। उसका जीवन अपने परिवार के सदस्यों के साथ आव्याहत गति से चल रहा था। लेकिन बीच में दैव का दुर्विपाक आ गया। क्रूर काल ने अपने कठोर कर्म विधान का कुटिल कुचक्र चलाया। सुशान्त शर्मा के पिता असमय बीमार हुए और चल बसे। उसकी माता, पिता का वियोग न सहन कर सकी और उन्होंने देह का त्याग कर दिया। अब तक सुशान्त किशोरवय का हो चुका था। रिश्तेदारों की दृष्टि उसके धन की ओर थी, सो उन्होंने किशोर सुशान्त को सत्पथ से जीवन के कुपथ पर लाने की सोची।

उभरते युवक सुशान्त से सुसंस्कार कुसंग के प्रभाव से धूमिल होने लगे। रिश्तेदारों व उनके सहयोगी मिलकर उसे नगरवधू लावण्या के रूप व यौवन के चर्चे सुनाने लगे। उसे बार-बार उकसाते कि एक बार वह रूपवती लावण्या के रूप को निहार ले। बार-बार लावण्या के रूप की चर्चा ने युवक सुशान्त के मन को डिगा दिया। उन लोगों ने उसे यह भी समझाया कि यदि वह द्यूत क्रीड़ा सीख ले तो अपने धन को थोड़े समय में कई गुना कर सकता है। जो लोग उसे ये सारी बातें बता रहे थे वे सबके सब नास्तिक थे। प्रकारान्तर से स्त्री, धन व नास्तिक का चरित्र उसके जीवन में घुलने लगा।

जैसे विष शरीर के रक्त प्रवाह में घुल जाता है, वैसे ही स्त्री, धन व नास्तिकता का विष उसके चिन्तन व भावनाओं में घुलने लगा। दिन-पक्ष व मास बीतते गए। धीरे-धीरे सुशान्त के सुसंस्कारों पर उसके कुसंगी संगी-साथियों के कुसंस्कारों का लेप चढ़ने लगा। उसकी अन्तर्चेतना में प्रकाश घटने लगा और अन्धकार की तीव्रता बढ़ती गयी। घर-परिवार और उसके माता-पिता के वैरी भी इस कुचक्र में शामिल हो गए। अब तो उसके अन्तर्मन में दोष और द्वेष की भरमार हो गयी।

हालांकि इसका प्रारम्भ स्त्रीचरित्र के श्रवण से ही हुआ था। रूपवती नगरवधू लावण्या के रूप की चर्चा ने उसे सम्मोहित कर दिया। इन कुटिल कुचक्र रचने वालों की प्रेरणा और इनके कुसंग से वशीभूत होकर आखिरकार वह एक दिन लावण्या के यहाँ चला गया। बस फिर क्या, कुसंग का विष तीव्र से तीव्रतर होता गया। धन की लालसा ने उसे द्युत की ओर मोड़ दिया। नास्तिकों के संग में नारायण स्मरण तो पहले ही विलीन हो चुका था। अब तो पुराने वैरी, जिसे उसने कभी देखा भी न था, उनसे बदला लेने की आग उसे झुलसाने लगी।

इस महाकल्मष में भक्ति, भक्त व भगवान की पावनता विलीन होने लगी। उसका चिन्तन-चरित्र व व्यवहार जो पहले आस्तिकता, धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता की त्रिवेणी में नित्य स्नात रहता था, अब उसकी स्थिति परिवर्तित हो गयी। अब तो बस वासना, तृष्णा व अहंता ही बची थी। यहाँ तक कि स्त्री, धन, वैरी व नास्तिक के चरित्र में आकण्ठ डूब जाने के कारण उसे अब कभी याद भी नहीं रहता था कि बीते दिन वह नित्य यज्ञ-अग्निहोत्र भी किया करता था। एकादशी व्रत व नारायण नाम स्मरण तो अब शायद उसकी स्मृतियों में भी न बचे थे। काल प्रवाह में उभरी कर्म की कुटिल रेखाओं ने उसकी मति, गति व नियति बदल दी। चिन्तन, भाव एवं कर्म, सभी क्षेत्रों में विकृति फैल गयी। अब उसे जो देखता वही हैरान हो जाता। किसी को विश्वास भी न होता कि यही ब्राह्मणश्रेष्ठ शशांक का संस्कारवान पुत्र सुशान्त है। पर कोई क्या करता, स्त्री, धन, नास्तिक एवं वैरी के चरित्र का प्रभाव ही कुछ ऐसा होता है। इस फेर में उसके भविष्य के पथ पर अंधेरा घना होता जा रहा था।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २४९

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मंगलवार, 3 मई 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग २४

प्रशंसा का मिठास चखिए और दूसरों को चखाइए

अपनी मनुष्यता को उत्तमोत्तम 'सद्गुणों से सुसज्जित करने के लिए यह आवश्यक है कि उन विशेषता' को अपने में क्रियात्मक रूप से धारण किया जाए। सद्ज्ञानमयी पुस्तकें पढने से, सदुपदेश सुनने से, सत्संग करने से विचारधारा परिमार्जित होती है, यह समझ मे आता है कि सन्मार्ग पर चलना चाहिए। परंतु यदि वे विचार, कार्य रूप में परिणत न हों, मनोभावों का आचरण के साथ समन्वय न हो तो उस जानकारी से लाभ नहीं। वैसे तो हर कोई जानता है कि अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य अपरिग्रह बहुत धर्म कार्य हैं,अनेक ग्रंथों में इनकी महिमा सविस्तार गाई गई है। आप उपरोक्त धर्म लक्षणों को जानते हैं या अमुक  पुस्तक को बार-बार पाठ करके इनकी उपयोगिता को दुहराते है परंतु इतने मात्र से कुछ लाभ नहीं हो सकता, जब तक कि उनको कार्य रूप में प्रयोग करना आरंभ न किया जाए। सत्संग, स्वाध्याय, कथा श्रवण का महात्म इसलिए है कि इनके द्वारा उत्तम आचरण की प्रेरणा मिलती है। यदि वह उद्देश्य सफल न हो, ज्ञान का कर्म के साथ मेल न हो पावे तो कागज के हाथी की तरह वह निरर्थक है। केवल जानकारी होने मात्र से कुछ विशेष लाभ नहीं होता।

अनेक 'सद्गुणों की रचना का प्रयोजन यह है कि लोग इनकी सहायता से आचरण को उत्तम बनावें। यदि आप अनेक शास्त्र पढ लेते हैं, असाधारण ज्ञान संपादन कर लेते हैं किंतु उसको काम में नहीं लाते तो सोने से लदे हुए गधे का उदाहरण उपस्थित करते हैं। गधे की पीठ पर सोना लदा है पर वह स्वयं उससे कोई अच्छा पदार्थ नहीं खरीद सकता,अपनी पद वृद्धि नहीं कर सकता, वह सोना उसके लिए भार रूप है, जब तक लदा है तब .तक बोझ से और अपने को दबाए हुए है:। आपका बढा-चढ़ा ज्ञान दूसरे लोगों को मनोरंजन का साधन हो सकता है पर यदि उस पर अमल नहीं करते तो आपके निजी लाभ का उससे कोई विशेष प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। गणेशजी को पीठ पर लादे फिरने वाला चूहा आखिर चूहा ही रहेगा। ज्ञान की पयोनिधि को अपने अत्यंत समीप रखने पर भी उस बेचारे को विद्या से उत्पन्न होने वाला कोई सुख थोड़े ही प्राप्त होता है।
 
आपने अनेक उत्तम पुस्तकों का स्वाध्याय करके एवं अनेक सुयोग्य व्यक्तियों के समीप रहकर बहुत सारा ज्ञान एकत्रित कर लिया है। हम समझते हैं कि जितना आप जानते हैं उसका एक चौथाई भाग भी क्रिया रूप में ले आवें तो इस जीवन को सब दृष्टियों से सफल बना सकते हैं। इसके विपरीत आप ज्ञान का भण्डार जमा करते जावें और आचरण वैसे ही निम्न कोटि के रखें तो आप में और एक साधारण अशिक्षित व्यक्ति में क्या अंतर रहेगा?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ३६

👉 भक्तिगाथा (भाग १२६)

भक्ति का आचारशास्त्र

श्रुतसेन की भक्तिकथा सभी के मन को भा गयी। सत्संग-सुसंग से भक्ति अंकुरित-पल्लवित-पुष्पित होती है। प्रह्लाद को देवर्षि का सुसंग मिला, जबकि श्रुतसेन ने भक्त प्रह्लाद का सत्संग पाया। इस सुसंग-सत्संग से दोनों के जीवन में भक्ति का प्रवाह प्रवाहित हो उठा। ऐसा पावन प्रवाह जिसमें जीवन के सभी कषाय-कल्मष, सांसारिक भावनाएँ व उनके संस्कार बह गए। बची रह गयीं तो केवल शुद्ध-भावनाएँ व भगवान का पावन नामस्मरण। भक्त प्रह्लाद की कथा तो प्रायः सभी पुराणाचार्यों ने अपने अनूठे अन्दाज में कही है। हाँ! श्रुतसेन की कथा अभी तक केवल देवर्षि नारद के स्मृतिकोष में सुरक्षित थी जिसे उन्होंने इन क्षणों में कहा और इसे सभी ने सुना।

सुनने के साथ सब ने सत्संग की महिमा गुनी और गायी। इसे सुनते-सुनते महर्षि पुलह तो पुलकित हो गए। वे भावविभोर हुए और बोल उठे- ‘‘भक्ति, भक्त और भगवान धन्य हैं और धन्य हैं उनकी कथा-गाथा।’’ इतना कह कर वे चुप हो गए। हालांकि उनके चेहरे के भावों से लग रहा था कि अभी वे और कुछ भी कहना चाहते हैं। इसे देखकर महर्षि क्रतु ने उनसे कहा- ‘‘आप कुछ और बोलें महर्षि! आपकी बातें आशीर्वचन की तरह हैं।’’ ऋषि क्रतु की ये बात सुनकर महर्षि पुलह पहले तो मुस्कराए, फिर कहने लगे- ‘‘सुसंग-सत्संग जितना भक्तिपथ के लिए सहायक हैं, वैसे ही कुसंग इसके लिए उतना ही घातक। भक्तिपथ के पथिक को कुसंग से, कुविचारों से दूर रहना चाहिए।’’

ऋषि क्रतु जब ये बातें कह रहे थे- तब देवर्षि उन्हें ध्यान से देख रहे थे। जब वह चुप हुए तो देवर्षि ने कहा- ‘‘हे ऋषिश्रेष्ठ! आपने तो अपनी बातों में भक्ति का आचारशास्त्र प्रकाशित कर दिया है। मैं अपने इस सूत्र में कुछ ऐसा ही कहना चाह रहा था।’’ ‘‘अवश्य कहें देवर्षि!’’ नारद के कथन के बीच में ही कई स्वर समवेत रूप से उभरे। इसे सुनकर देवर्षि ने कहा- ‘‘आप सब साधुजनों का मत शिरोधार्य है।’’ इतना कहते हुए उन्होंने वीणा के मधुर गुंजन के साथ कहा-

स्त्रीधननास्तिकवैरिचरित्रं न श्रवणीयम्॥ ६३॥
अर्थात् स्त्री, धन, नास्तिक और वैरी का चरित्र नहीं सुनना चाहिए।

देवर्षि का यह सूत्र सुनने के साथ कुछ देर तक नीरव मौन पसरा रहा। थोड़ी देर तक सब चुप बने रहे। फिर अन्ततः देवर्षि ने ही मौन तोड़ते हुए कहा- ‘‘मेरा निवेदन है कि ऋषिश्रेष्ठ क्रतु इस सूत्र पर कुछ कहें।’’ महर्षि क्रतु के मन में इस समय कहने लायक बहुत बातें थीं। देवर्षि के आग्रह ने उनके भावों को उद्वेलित कर दिया। उन्होंने साभिप्राय ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की ओर देखा। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने उनके अभ्रिपाय को समझते हुए कहा- ‘‘हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षि आप सब भाँति से समर्थ व अनुभवी हैं। देवर्षि के इस सूत्र की व्याख्या आप अपने अनुभव के प्रकाश में करें।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २४८

शनिवार, 30 अप्रैल 2022

👉 अभिमान

एक राजा को यह अभिमान था मैं ही राजा हूँ और सब जगत् का पालक हूँ, मनु आदि शास्त्रकारों के व्यर्थ विष्णु को गत् पालक कहकर शास्त्रों में घुसेड़ दिया है। एकबार एक संन्यासी शहर के बाहर एक पेड़ के नीचे जा बैठे। लोग उनकी शान्तिप्रद मीठी-मीठी बातें सुनने के लिए वहाँ जाने लगे। एक दिन राजा भी वहाँ गया और कहने लगा कि मैं ही सब लोगों का पालक हूँ।

यह सुनकर सन्त ने पूछा- तेरे राज्य में कितने कौए, कुत्ते और कीड़े हैं? राजा चुप हो गया। सन्त ने कहा-’जब तू यही नहीं जानता तो उनको भोजन कैसे भेजता होगा ? राजा ने लज्जित होकर कहा-’तो क्या तेरे भगवान कीड़े-मकोड़े को भी भोजन देते हैं ? यदि ऐसा है तो मैं एक कीड़े को डिबिया में बंद करके रखता हूं, कल देखूँगा भगवान इसे कैसे भोजन देते हैं? 

दूसरे दिन राजा ने सन्त के पास आकर डिबिया खोली तो वह कीड़ा चावल का एक टुकड़ा बड़े प्रेम से खा रहा था। यह चावल डिबिया बन्द करते समय राजा के मस्तक से गिर पड़ा था। तब उस अभिमानी ने माना कि भगवान ही सबका पालक है।

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👉 आज का सद्चिंतन 30 April 2022


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 30 April 2020



 
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👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग २३

अपने सदगुणों को प्रकाश में लाइए

यह मानी हुई बात है कि संसार के अन्य समस्त मनुष्यों की भाति न्यूनाधिक मात्रा में आप में भी कोई छोटे-बड़े दोष होंगे ही, पर वे एक दिन बिलकुल दूर होकर रहेंगे, पर जब तक फसल पकने की प्रतीक्षा है तब तक उन्हें इस प्रकार रखिए कि किसी के लिए हानिकर परिणाम उपस्थित न करें। शरीर में मल-मूत्र की गंदी इंद्रियाँ मौजूद हैं, इन्हें ढक कर रखने का नियम चला आता है। अपान वायु सभी कोई त्यागते हैं पर सभ्यता का तकाजा है कि जरा धीरे से उस वायु को निकलने देना चाहिए ताकि उसका शब्द दूसरों के चित्त मे घृणा उत्पन्न न करे। फोड़े पर पट्टी बँधी रहने देते हैं ताकि सडा हुआ मवाद और विकृत घाव देखने वालों को नाक-भौं सिकोडंने का अवसर न दे।
 
गंदी नालियाँ ढक कर रखी जाती हैं, शौचालय खुले हुए नहीं रखे जाते। जिधर भी डालिए इस सर्वमान्य नियम की प्रमुखता पावेंगे कि ' बुराई प्रकाशित मत करो वरन उसे ढक कर रखो। ' इस नियम का अपने चरित्र और विचारों का प्रकटीकरण करते हुए भी ध्यान रखा करें तो निःसंदेह जन समाज का एक बड़ा भारी उपकार करेंगे। इस प्रकार बुराई का प्रभाव कम होगा वह छूत की बीमारी की तरह उड-उड़कर चारों ओर न फैलने पावेगी। स्वस्थ स्थानों में अस्वस्थता उत्पन्न न करेगी।

गंदगी को ढक दो और दफना दो ' इस डॉक्टरी नियम का जीवन क्षेत्र में भी प्रयोग कीजिए और प्रसंगों को वीर्यपात की तरह गुप्त रखिए। दुनियाँ आपसे सौंदर्य की, सत की, प्रमोद की, प्रफुल्लता की, प्रोत्साहन की आशा करती है आप उसे वही दीजिए। अल्प बुद्धि के दुकानदार को देखि,ए वह अपना अच्छा- अच्छा माल कैसे सुदर ढंग से सजाकर आगे रखता है ताकि देखने वालों को प्रसन्नता हो। रास्ता चलते व्यक्ति को भले ही उस दुकान से कुछ खरीदना न हो पर उस सजावट से नेत्रों को तृप्त करता है और मन ही मन प्रसन्न होता जाता है। आप अपने को उस से अधिक बुद्धिमान समझते हैं तो अपने सद्गुणों को दुनिया की दुकान मे इस प्रकार सजावट के साथ रखिए कि देखने वाले उसके सौंदर्य से कुछ आनंद अनुभव करते जावें। अपने कमरे को सजाकर रखने में आप कुशल हैं त्यौहार और उत्सवों के अवसर पर शरीर और घर की सजधज करना खूब जानते हैं फिर क्या ऐसा नहीं कर सकते कि अपनी उत्तमताओं को कलापूर्ण ढंग से सजाकर एक मनमोहक चित्रशाला बना दें और विश्व सौंदर्य में एक और मात्रा जोड़ देने का यश ग्रहण करें।

हम कहते हैं कि आप झूँठी झिझक संकोच, ' नम्रता को छोड दीजिए। यह विनय का बहुत वीभत्स रूप है कि अपने को दीन, रोगी, अयोग्य कह कर सुनने वाले को यह जताया जाए कि हम नम्र हैं। आप सचमुच ही बहुत अधिक मात्रा में उत्तम, भले एवं सुयोग्य हैं, अपनी अच्छाइयों को प्रकाश में लाइए दूसरों को उन्हें जानने दीजिए उत्तमता को प्रकट होने दीजिए। इससे आपको सन्मार्ग पर चलने में प्रोत्साहन, प्रगति और प्रकाश की प्राप्ति होगी। आदर, प्रतिष्ठा और श्रद्धा के भाजन बनने से आपका अंतःकरण ऊर्ध्वमुखी होकर परमार्थ की ओर अग्रसर होगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ३६

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👉 भक्तिगाथा (भाग १२५)

लोक व्यवहार की मर्यादाओं से जुड़ी है भक्ति

श्रुतसेन की भक्तिगाथा सुनते हुए सभी के भावों में भक्ति की अनूठी लहर उठी। भक्ति के अमृतकण उनके अस्तित्त्व में बिखरने लगे। सुनने वालों के अन्तर्मन में अनोखी मिठास सी घुल रही थी। इस बीच देवर्षि दो पल के लिए रूके तो सभी को एक साथ लगा कि जैसे इस घुमड़ते-उफनते भावप्रवाह में अचानक कोई अवरोध आ गया। महर्षि क्रतु से तो रहा ही न गया। वह बोले- ‘‘देवर्षि! श्रुतसेन के बारे में कुछ अधिक सुनने का मन है।’’ ऋषि क्रतु के इस कथन की सहमति में अनेकों स्वर उभरे। जिसे सुनकर नारद ने कहा- ‘‘जिस तरह से आप सब वत्स श्रुतसेन के बारे में कुछ अधिक सुनना चाहते हैं, ठीक उसी तरह मैं उस महान भक्त के बारे में कुछ और अधिक कहना चाहता हूँ।’’

‘‘अहा! यह तो अति उत्तम बात हुई।’’ गन्धर्वश्रेष्ठ चित्रसेन ने सुमधुर स्वर में कहा- ‘‘भक्त का जीवन होता ही इतना पावन है। उसके जीवन के प्रत्येक घटनाक्रम एवं प्रसंग में भगवान की भक्ति एवं भगवान् की चेतना घुली होती है। इसका प्रत्यक्ष या परोक्ष सान्निध्य जितना अधिक हो जीवन के लिए उतना ही श्रेष्ठ एवं शुभ है।’’ ‘‘निश्चित ही गन्धर्वराज चित्रसेन सर्वथा उचित कह रहे हैं।’’ गायत्री के महातेज को स्वयं में समाहित करने वाले विश्वामित्र ने कहा। उन्होंने देवर्षि नारद को स्नेहपूर्ण दृष्टि से देखते हुए बोला- ‘‘हे भक्ति के आचार्य! सचमुच ही भक्ति से श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं है। यह सत्य मैं स्वतः के अनुभव से कह सकता हूँ। मैंने स्वतः के जीवन में तप एवं ज्ञान के अनेक शिखरों को पार किया है। इनके सौन्दर्य से मैं अभिभूत भी हुआ हूँ। लेकिन भक्ति के सौन्दर्य के सामने यह सभी तुच्छ हैं।’’

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के इस कथन की प्रायः सभी ने सराहना करते हुए उनकी विनम्रता एवं सदाशयता की प्रशंसा की। ऋषिमण्डल एवं देवमण्डल में सभी उनकी महानता से सुपरिचित थे। सभी को उनकी सामर्थ्य का ज्ञान था। इतना ही नहीं प्रायः सब को इस महान सत्य का भी पता था कि महर्षि का बाह्य व्यक्तित्व दुर्धर्ष तपस्वी एवं परम ज्ञानी का होते हुए भी उनका आन्तरिक व्यक्तित्व सुकोमल भक्त का है। भक्त, भक्ति एवं भगवान उन्हें प्राणों से भी अधिक प्रिय है। यही वजह है कि वह भक्त श्रुतसेन के बारे में कुछ और जानना-सुनना चाहते थे।

देवर्षि नारद को भी यह सत्य पता था। इसलिए उन्होंने बिना एक क्षण की देर लगाए अपनी स्मृतियों के कोष को निहारा, जहाँ श्रुतसेन की सुनहली स्मृतियाँ अपनी स्वर्णिम आभा बिखेर रही थी। इसे समेटते हुए उन्होंने कहा- ‘‘सचमुच ही वत्स श्रुतसेन का व्यक्तित्व भगवान से ओत-प्रोत था। जो भी विपत्तियाँ उनके जीवन में आ रही थीं, उनसे वह तनिक भी विचलित न थे। बाधाओं, विषमताओं से उन्हें कोई भी शिकायत न थी। विनयशीलता तो उनमें कूट-कूट कर भरी थी। सम्राट हिरण्यकश्यप हों या फिर भार्गव शुक्राचार्य, इन दोनों का वह हृदय की गहराइयों से सत्कार व सम्मान करते थे।

ऐसे कई अवसर आए जब सम्राट हिरण्यकश्यप एवं भार्गव शुक्राचार्य को उनके विनय ने विचलित कर दिया। उन्होंने अपने सेवकों एवं शिष्यों को बड़ी कड़ाई से हिदायत देते हुए कहा, श्रुतसेन को मेरे सम्मुख न लाया करो। मुझे भय है कि कहीं उसका विनय, उसके द्वारा पूरी सच्चाई से किया सत्कार, मेरे हृदय को ही न परिवर्तित कर दे। अलग-अलग अवसरों पर यह सत्य सम्राट हिरण्यकश्यप एवं भार्गव शुक्राचार्य दोनों ने ही शब्दों की थोड़ी फेर-बदल के साथ व्यक्त किया। श्रुतसेन के इस अनूठे लोकव्यवहार पर स्वयं मुझे भी आश्चर्य हुआ।

इसलिए जब मैं उससे मिला तो जानना चाहा- वत्स! तुम इतनी विषमाताओं में इतना लोकव्यवहार किस तरह से निभा लेते हो? उत्तर में श्रुतसेन ने हल्की सी मधुर मुस्कान से साथ कहा- देवर्षि! यह सब बहुत आसान है। हृदय में भक्ति का उदय हो जाय तो फिर लोकव्यवहार में कोई अड़चन नहीं रहती। उसका पहला कारण यह है कि भक्त को अपने भगवान के सिवा अन्य कोई चाहत नहीं रहती। इसका दूसरा कारण यह है कि भक्त सभी में अपने आराध्य को ही निहारता है और भक्त कभी भी अपने आराध्य के साथ कठोर तो हो ही नहीं सकता।

श्रुतसेन की ये बातें उसी क्षण मेरे दिल को छू गयीं। मैंने सोचा जब श्रुतसेन जैसे सिद्धभक्त इतना लोकव्यवहार निभाते हैं तब उन्हें तो लोकव्यवहार का पालन करना ही चाहिए, जिन्होंने अभी भक्ति के मार्ग में पाँव रखा है। फिर उसी पल मेरे हृदय में इस भक्ति सूत्र का आविर्भाव हुआ-

‘न तदसिद्धौ लोकव्यवहारौ हेयः
किन्तु फलत्यागस्तत्साधनं च कार्यमेव’॥ ६२॥

जब तक भक्ति में सिद्धि न मिले, तब तक लोक व्यवहार का त्याग नहीं करना चाहिए बल्कि फलत्याग कर, निष्काम भाव से उस भक्ति का साधन करना चाहिए।

श्रुतसेन से बातें करते हुए, अनायास ही यह सूत्र मेरे मुख से उच्चारित हो गया। इसे सुनकर श्रुतसेन ने साधु! साधु!! अतिश्रेष्ठ!!! ऐसा कहते हुए मेरी सराहना की। तब मैने पूछा- वत्स! इसमें सराहना की क्या बात है? उत्तर में उन्होंने कहा- देवर्षि! सराहना सूत्र के शब्दों की नहीं बल्कि इनमें निहित गूढ़ अर्थ की है। ऐसा क्या गूढ़ अर्थ अनुभव किया तुमने? इस पर श्रुतसेन ने कहा- भक्ति की महाबाधा अहंकार है। जो लोकव्यवहार की मर्यादाओं एवं वर्जनाओं का सम्मान करता है, उसका अहंकार स्वतः ही विगलित हो जाता है। इस अहंता के साथ दो अन्य बाधाएँ वासना एवं तृष्णा भी स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं क्योंकि लोकव्यवहार की प्रायः सभी मर्यादाएँ एवं वर्जनाएँ इन्हीं तीनों वासना, तृष्णा एवं अहंता के नियमन व नाश के लिए हैं।

जो भी भगवत्स्मरण करते हुए लोकव्यवहार की मर्यादाओं एवं वर्जनाओं को हृदय से मान लेता है, उसके लिए भक्ति का सुपथ स्वतः ही प्रकाशित हो जाता है। सच कहें तो देवर्षि! लोकव्यवहार एवं भक्ति का परस्पर कोई विरोध है ही नहीं, बल्कि उल्टे ये दोनों तो एक दूसरे के परस्पर सहयोगी एवं पूरक हैं। सारी लोकमर्यादाएँ एवं वर्जनाएँ इसलिए हैं कि परिवार एवं समाज के कलह एवं संघर्ष को मिटाया जा सके। गहराई से देखें तो कलह एवं संघर्ष का कारण सुख की चाहत है। व्यक्ति में सुख की चाहत असीमित एवं समाज में सुख के साधन सीमित। अब सुख के साधन तो असीमित किए नहीं जा सकते। हाँ! सुख की चाहत अवश्य नियंत्रित की जा सकती है। लोकव्यवहार की सभी मर्यादाएँ एवं वर्जनाएँ इसी उद्देश्य के लिए हैं।

श्रुतसेन का यह चिन्तन देवर्षि को बहुत भाया। वह कुछ और अधिक सोच पाते, इससे पहले ही अपनी वार्ता के सूत्र को आगे बढ़ाते हुए श्रुतसेन ने कहा- भक्त का सुख तो अपने भगवान में होता है। भक्त की भक्ति स्वतः ही उसकी वासना, तृष्णा एवं अहंता को नियंत्रित व रूपान्तरित कर देती है। ऐसी स्थिति में लोकव्यवहार उसके लिए सर्वदा सुलभ एवं सहज हो जाता है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २४६

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शुक्रवार, 29 अप्रैल 2022

👉 भगवान का पुत्रः क्रूसारोही मानव−पुत्र

मैं तुमसे कहता हूँ, अपने जीवन की चिन्ता न करो, मत सोचो कि तुम क्या खाओगे और क्या पियोगे? मत सोचो कि तुम अपने शरीर पर क्या पहनोगे। क्या जीवन भोजन से अधिक नहीं है? क्या शरीर वसन से अधिक नहीं है?

अरे, इन हवा के पंखियों को तो देखो, न तो ये बीज बोते हैं, न फसल काटते हैं, न खलिहान में धान जमा करते हैं; फिर भी तुम्हारे स्वर्गीय परम पिता उनका पोषण करते हैं। ओरे मानवो, क्या तुम उन पंखियों से बेहतर नहीं हो?

अरे कौन है तुम में ऐसा, जो अपने जीवन का सोच−विचार करके भी, अपने जीवन की स्थिति एक अणु भर भी बढ़ाने या घटाने में समर्थ हो सका है?

इसी से कहता हूँ, कि इस चिन्ता में न पड़ो, कि हम क्या खायेंगे? हम क्या पियेंगे? हमारे तन को ढकने को वस्त्र कहाँ से आयेगा? क्योंकि अश्रद्धालु जन ही इन चीजों के पीछे जाते हैं। जान लो, कि तुम्हारे स्वर्गीय परम पिता अच्छी तरह जानते हैं, कि तुम्हें इन चीजों की जरूरत है।

मैं कहता हूँ, कि पहले तुम भगवान के राज्य को खोजो, उनकी सत्याचरण की राह पर चलो और तुम्हारी आवश्यकता की ये सारी चीजें आपो आप ही तुम्हारे पास चली आयेगी।

इसी से मैं कहता हूँ, कि आने वाले कल की चिन्ता में न पड़ो, क्योंकि वह कल स्वयं अपने साथ आने वाली चीजों की चिन्ता करेगा।

अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1974 पृष्ठ 1

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गुरुवार, 28 अप्रैल 2022

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 28 April 2020


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👉 आज का सद्चिंतन 28 April 2020

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👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग २२

अपने सदगुणों को प्रकाश में लाइए

अपने अच्छे गुणों को प्रकट होने देने में आपका भी लाभ है और दूसरों' का भी। हानि किसी की कुछ नहीं। यदि आपके योग्यताओं का पता दूसरों को चलता है तो उनके सामने एक आदर्श उपस्थित होता है, एक की नकल करने की प्रथा समाज में खूब प्रचलित है, संभव है उन गुणों और योग्यता,ओं का अप्रत्यक्ष प्रभाव किन्हीं पर पडे और वे उसकी नकल करने के प्रयास में अपना लाभ करें। सद्गुणी व्यक्ति के लिए स्वभावत: श्रद्धा, प्रेम और आदर की भावना उठती हैं, जिनके मन में यह उठती है उसे शीतल करती हैं, बल देती हैं, पुष्ट बनाती हैं। दुनियाँ में भलाई अधिक है या बुराई ? इसका निर्णय करने में अक्सर लोग आसपास के व्यक्तियों देखकर ही कुछ निष्कर्ष निकालते हैं। आपके संबंध में यदि अच्छे विचार फैले हैं तो सोचने वाले को अच्छाई का पक्ष भी मजबूत मालूम देता है और  वह संसार के संबंध में अच्छे विचार बनाता है एवं खुद भी भलाई पर विश्वास करके भली दुनियों के साथ त्याग और सेवा सत्कर्म करने को तत्पर होता है।

इसके विपरीत यदि उसके सामने लोगों के दुष्ट आचरणों का ही सा जमाव हो तो स्वभावत: वह झुँझला उठेगा, दुनियाँ को स्वार्थी,निकम्मी, धूर्त मानकर उसके साथ वैसा ही व्यवहार करने की सोचेगा, जबकि चारों ओर बुरे ही बुरे आचरण वाले लोग दीख रहे हैं तो संभव है कि सत्कर्म वाला निराश हो जाए, चिढकर बदला लेने, जैसे के साथ तैसा व्यवहार करने को उतारू होकर बुरे काम करने लगे। यदि आपके दुर्गुण ही उसके सामने पहुँचते हैं तो स्वभावत: घृणा, क्रोध, द्वेष, भय के भाव उसके मन मे उठेंगे और वे जहाँ से उत्पन्न हुए हैं उस स्थान को भी उसी प्रकार जलावेंगे जैसे अग्नि की चिनगारी जहाँ रखी है पहले उसी स्थान को जलाना शुरू करती है।
 
यदि आप दुर्गुणी प्रसिद्ध हैं तो किसी न किसी कमजोर स्वभाव के आदमी पर अप्रत्यक्ष रूप से उसका असर पड़ेगा और संभव है कि नकल करने की प्रवृत्ति से प्रेरित होकर वह उन दुर्गुणों' को अपनाने लगे। यह तो बिलकुल साधारण बात है कि मित्र लोग उन दुर्गुणों को तरह देकर आपसे स्नेह संबंध कायम रखेंगे, बुराई को तरह देने की आदत धीरे- धीरे संस्कार का रूप धारण करेगी और फिर उस बुराई या उससे मिलती-जुलती अन्य बुराई को बिना घृणा या क्रोध किए सहन करने की आदत मजबूत हो जाएगी। पाप को तरह देना, अर्द्ध, रूप से उसमें सम्मिलित होना ही है।

ध्यानपूर्वक विचार करके देखिए यदि आप अपने को दुर्गुणी प्रकाशित करते हैं, लोगों में अपनी अयोग्यताएँ फैलाते हैं तो इसका अर्थ यह है कि उनके साथ अपकार करते हैं। दोष जान लेने से किसी का कोई फायदा नहीं वरन हानि बहुत। यह समझना भ्रम है कि दोष प्रकट हो जाने से लोग सावधान रहेंगे '। सच बात यह है कि बुद्धिमान आदमी दुर्गुणी और किसी से धोखा नहीं खाएगा। मुर्ख को ईश्वर से भी धोखा होने का डर है। कई मूर्ख महात्मा गाँधी सरीखे प्रात: स्मरणीय महात्मा को गालियाँ देते हुए कहते हैं कि उनके कारण हमारी अमुक हानि हुई। ईश्वर पर अनुचित भरोसा करने वाले भी हानि उठाते हैं। निश्चय ही अपने को, अयोग्य या बुरे रूप में प्रकट होने देना, सचमुच बुरा होने की अपेक्षा भी बहुत बुरा है। इसमें अपनी हानि से भी अधिक दूसरों की हानि है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ३४

👉 भक्तिगाथा (भाग १२४)

भक्त को लोकहानि की कैसी चिन्ता

इसे सुनकर देवर्षि ने वीणा की मधुर झंकृति के साथ उच्चारित किया-
‘लोकहानौ चिन्ता न कार्या निवेदितात्मलोकवेदत्वात्’॥ ६१॥

लोकहानि की चिन्ता (भक्त) को नहीं करनी चाहिए क्योंकि वह (भक्त) अपने आपको और लौकिक-वैदिक (सब प्रकार के) कर्मों को भगवान को अर्पण कर चुका है।
सूत्र के उच्चारण के साथ देवर्षि नारद के मन में ब्राह्मणकुमार श्रुतसेन की स्मृति और भी सघन हो गयी। उनके मन मानस में चलती इस विचार श्रृंखला को ऋषि पुलह भली-भांति समझ पा रहे थे। तभी तो उन्होंने फिर से देवर्षि नारद को याद कराया- ‘‘किसकी स्मृतियाँ आपकी भावनाओं को भिगो रही हैं।’’ पुलह के इस कथन पर देवर्षि ने अश्रु पोंछते हुए कहा- ‘‘सचमुच ही ऋषिश्रेष्ठ। मुझे प्रह्लाद के प्रिय सखा श्रुतसेन की स्मृतियों ने घेरा हुआ है। अभी मैंने अपने इस सूत्र में जिस सत्य की चर्चा की, वह उसका मूर्त रूप था।’’ वहाँ उपस्थित जन इस सत्य से सुपरिचित थे कि भक्त, भक्ति व भगवान की स्मृति देवर्षि को विभोर करती है। साथ ही असत्य तो कभी देवर्षि का स्पर्श ही नहीं करता।

सभी के मन में प्रह्लाद के प्रिय सखा श्रुतसेन की भक्तिकथा जानने की जिज्ञासा तीव्र हो उठी। देवर्षि ने भी बिना कोई देर लगाए कहना शुरू किया- ‘‘श्रुतसेन की भक्ति अतुलनीय थी। उसके लिए उसके आराध्य ही जीवन थे। प्रह्लाद के साथ ही श्रुतसेन को भी सम्राट हिरण्यकश्यप एवं भार्गव शुक्राचार्य का कोपभाजन बनना पड़ा। उसे गहरी शारीरिक एवं अनेक मानसिक यातनाएँ दी गयीं। उसके परिवार को भी अकारण पीड़ित होना पड़ा। एक तरफ शुक्राचार्य के प्रचण्ड तांत्रिक प्रहार उस पर होते तो दूसरी ओर सम्राट के सैनिक उसे व उसके परिवार को पीड़ित करते। एक बार प्रह्लाद ने उससे पूछा भी- हे मित्र! तुम्हे भय तो नहीं लगता तो उत्तर में वह हँस पड़ा और बोला- मैंने इतना जान लिया है कि नारायण की इच्छा के बिना इस सृष्टि में कभी कुछ भी घटित नहीं होता।

भक्त का जीवन तो भगवान के लिए सदा विशेष होता है। उसके जीवन में कोई भी घटनाक्रम घटित हो, किसी के भी द्वारा घटित हो, पर यथार्थ में सब कुछ भगवान के अनुसार ही घटित होता है। अन्य सब तो बस केवल कठपुतलियाँ हैं जो भगवान के मंगलमय विधान को रचित करने व घटित होने में सहयोग देते हैं। कहीं कोई दोषी होता ही नहीं। भगवान जिसे अपने प्रिय भक्त के लिए उचित एवं आवश्यक समझते हैं, उसे ही किसी न किसी माध्यम से अपने भक्त तक पहुँचा देते हैं। इसलिए मैं तो सदा-सर्वदा भगवत्कृपा की ही अनुभूति करता हूँ। श्रुतसेन की बात सुनकर प्रह्लाद को बड़ा सन्तोष हुआ। इसी के साथ श्रुतसेन के कष्ट तीव्र होते गए। रिश्ते-नाते छूटे-टूटे, लोकापवाद की बाढ़ सी आ गयी। सम्पदा जाती गयी, विपदा आती गयी पर श्रुतसेन सर्वथा निश्चिन्त था। कुछ दिनों तक उसे कारागार में रखने के बाद उसे गहन डरावने वन में छोड़ दिया। लेकिन इतने पर भी न तो उसकी प्रसन्नता कम हुई और न ही उसका ईश्वरविश्वास घटा।’’

श्रुतसेन की कथा सुनाते-सुनाते ऋषिवर थोड़ा ठहरे और फिर आगे बोले- ‘‘इन विपदाओं में भी वह भगवान नारायण के प्रति कृतज्ञ भाव से प्रार्थना करता- हे भगवान! मैं अति सौभाग्यशाली हूँ, जो मुझे आपने विपदाओं का वरदान देने के लिए चुना है। हे प्रभु! मेरा तो सभी कुछ आपका है, फिर इसका आप मेरे साथ चाहे जो और जैसे करें। श्रुतसेन के जीवन की विपत्तियों के साथ श्रुतसेन का चित्त, चिन्तन एवं चेतना नारायण में निमग्न होती गयी। इस अवस्था में भला नारायण उनसे कैसे दूर रह पाते सो वे भी अपने प्रिय भक्त श्रुतसेन के चित्त व चेतना में विहार करने लगे। सर्वसमर्पण का यही सुफल होना था। जो लोक और वेद को अपने प्रभु के लिए छोड़ देता है, प्रभु सदा के लिए उसके अपने हो जाते हैं। श्रुतसेन के अस्तित्व एवं व्यक्तित्व में भक्ति का यही सत्य मुखर हुआ।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २४४

सोमवार, 25 अप्रैल 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग २१

अपने सदगुणों को प्रकाश में लाइए

बाहरी रहन-सहन के कारण उन्हें गरीब ही समझा जाता है ' मरने के बाद जब घड़ों भरी हुई धन-दौलत जमीन में से निकलती है तब आश्चर्य करना पड़ता है कि लोगों को जिंदगी भर इसके इतने धनी होने का भेद प्रकट न हो पाया। बहुत लोग ऐसे रहस्यमय भेद अपने अंदर छिपाए पड़े रहते हैं जिनका पता उनके सगे- संबंधियों तक को नहीं लग पाता। गुप्त पुलिस के आदमी इस विद्या में बडे होते हैं वे अपनी असलियत का पता नहीं लगने देते और दूसरों सगे-संबंधी बनकर ऐसे घुल-मिल जाते हैं कि बड़े- बड़े भेदों को निकाल लाते हैं।

इससे प्रकट होता है कि दूसरों को उतनी बात का पता चल पाता है जितनी आसानी से उनके सामने आ जाती है। सामने रखी गेंद का अगला भाग देखा जा सकता है पर उसका पृष्ठ भाग है यह तब तक नहीं मालूम हो सकता जब तक कि उसे उलट-पलट कर न देखा जाए। सच तो यह है कि किसी वस्तु के बारे में हम बहुत ही थोडे अंशों में जानकारी रखते हैं। अपने शरीर के भीतरी अंग किस गतिविधि से कार्य कर रहे हैं, अपने रक्त में किन रोगों के कीटाणु प्रवेश कर रहे हैं? निजी बातों का इतना पता नहीं तो दूसरे लोगों के मनोभाव, आचरण, कैसे हैं इसको ठीक-ठीक मालूम करना और भी कठिन है  मोटी-मोटी प्रकट बातों को देखकर किसी के गुण- अवगुणों के बारे में लोग अपनी सम्मति निर्धारित करते हैं और एक से एक सुनकर दूसरा भी अपनी सहमति वैसी ही बना लेता है। दो-चार पूर्ण- अपूर्ण बातों के आधार पर ही अक्सर सारा समाज अपनी भली- बुरी धारणा बना लेता है। व्यक्ति चाहे बदल गया हो पर वह धारणा मुद्दतों तक चलती जाती है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए आप अपने सुद्गुणों को प्रकाश में लाने का प्रयत्न कीजिए। जो अच्छाइया, भलाइयाँ योग्यताएँ उत्तमताएँ विशेषताएँ हैं उन्हें छिपाया मत कीजिए वरन इस प्रकार रखा करिए जिससे वे अनायास ही लोगों की दृष्टि में आ जावें। अपने बारे में बढ-चढ कर बातें करना ठीक नहीं, शेखीखोरी ठीक नहीं, अहंकार से प्रेरित होकर अपनी बड़ाई के पुल बाँधना यह भी ठीक नहीं, अच्छी बात को बुरी तरह रखने में उसका सौंदर्य नष्ट हो जाता है।
 
दूसरे प्रसंगों के सिलसिले में कलापूर्ण ढंग से, मधुर वाणी से इस कार्य को बड़ी सुंदरता पूर्वक किया जा सकता है । अप्रिय सत्य को प्रिय सत्य बना कर कहने मैं बुद्धि-कौशल की परीक्षा है, बुराई की इसमें कुछ बात नहीं। जो गाय पाँच सेर दूध देती है क्या हर्ज है यदि इस बात से दुसरे लोग भी परिचित हो जाएँ?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ३२

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👉 भक्तिगाथा (भाग १२३)

भक्त को लोकहानि की कैसी चिन्ता

भक्त प्रह्लाद की भक्तिकथा को सुनकर सबके मन आह्लादित हो उठे। उन क्षणों में वहाँ सभी के मनों में एक ही सत्य स्पन्दित होने लगा कि सच्चा भक्त कभी चिन्तित नहीं होता। फिर भला ऐसा हो भी क्यों न? जिसकी सारी चिन्ताओं का भार स्वयं भगवान वहन करें, वह क्यों चिन्तित हो। वैसे भी भक्त का दायित्व अपने भगवान का सतत चिन्तन करना है, व्यर्थ की चिन्ता करना नहीं। इन्हीं विचार वीथियों में सभी की मानसिक चेतना देर तक भ्रमण करती रही। इन भक्ति तरंगों के संग-संग ऋषिमण्डल व देवमण्डल सहित अन्य जनों ने भी अपना सन्ध्या वन्दन सम्पन्न किया। ऐसा करते हुए भगवान् सूर्यदेव धरती के दूसरी छोर पर प्रकाश, प्रखरता एवं पवित्रता का वितरण करने के लिए प्रस्थान कर गए। उनके प्रस्थान करते ही नील गगन में निशा देवी के धीमे पगों की आहट सुनायी देने लगी। इसी के साथ उनका तारों जड़ा श्याम परिधान समूचे नभमण्डल पर छा गया।

क्षण बीते-पल बीते। इसी के साथ नभ में चन्द्रोदय हो गया और तब भगवती निशा का श्याम परिधान धवल चन्द्रिका में नहा उठा। यह सर्वथा अनूठा व अनोखा दृश्य था। हिमालय के रजत शृंगों पर निशानाथ राशि की राशि चाँदनी उड़ेलने लगे। आस-पास के पर्वत शिखरों से प्रवाहित होने निर्झर, चन्द्रदेव की चन्द्रिका को अपनी जलराशि में समेटने-घोलने एवं प्रवाहित करने लगे। ऋषियों-देवों, सिद्धों व गन्धर्वों का समुदाय इस मनमोहक दृश्य को निहार रहा था। यह मनोहर दृश्य उनके भावों में और भी अधिक पुलकन उत्पन्न कर रहा था। देवर्षि नारद को अभी भी अपने प्रिय प्रह्लाद की स्मृतियाँ घेरे थीं। इन्हीं स्मृतियों में एक मीठी सी याद ब्राह्मण कुमार श्रुतसेन की भी उभरी। उन्हें याद आने लगा कि श्रुतसेन सदा प्रह्लाद के साथ अपना समय व्यतीत करते थे। नारायण नाम संकीर्तन में सबसे आगे थे। भार्गव शुक्राचार्य का शिष्य होने के बावजूद उसमें तमस व रजस का लेश भी न था। उसमें थी तो केवल शुद्ध सात्त्विकता।

भगवान श्रीनारायण के नाम का सत्प्रभाव कहें या फिर पिछले जन्मों के शुभ संस्कारों से मिली प्रतिभा अथवा भार्गव शुक्राचार्य जैसे महामनस्वी आचार्य के सान्निध्य का सुफल, वह देवशास्त्र, दर्शन, उपनिषद् आदि के साथ अन्य सभी विद्याओं व कलाओं में पारंगत हो गया। शुक्राचार्य चाहते थे कि श्रुतसेन अपने जीवन की सभी उपलब्धियों को उनकी कृपा माने। जाने-अनजाने बार-बार वह यह प्रयास भी करते पर श्रुतसेन बार-बार विनम्रतापूर्वक दुहरा देता, गुरुदेव सभी कुछ आपके आशीष एवं भगवान् नारायण की मंगलमय कृपा से सम्भव हो सका है। श्रुतसेन के इस कथन से शुक्राचार्य का अहं आहत हो जाता। यहाँ तक कि वह अपने चोटिल अहं के साथ श्रुतसेन का अनिष्ट करने पर विचार करने लगते।
देवर्षि को अभी भी वे सारी बातें याद थीं। बल्कि यूं कहें कि वे सारी बातें उनके मन के क्षितिज पर अपने आप ही उभर रही थीं। देवर्षि इन्हीं में स्वयं को पता नहीं कब तक भूले रहते, यदि महर्षि पुलह ने उन्हें टोका न होता। महर्षि उन्हें काफी देर से देखे जा रहे थे। कुछ देर तक यूं ही देखते रहने के बाद उन्होंने धीमे स्वर में कहा- ‘‘किस चिन्तन में खोये हैं देवर्षि!’’ ऋषिश्रेष्ठ पुलह के इस तरह टोकने पर देवर्षि कुछ बोल तो नहीं पाये बस मुस्करा दिए। तभी महात्मा सत्यधृति ने विनम्र स्वर में कहा- ‘‘हम सबको आपके अगले सूत्र की प्रतीक्षा है।’’ ‘‘यह सत्य है।’’ ऐसा कहते हुए अनेकों ने सत्यधृति का समर्थन किया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २४३

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शनिवार, 23 अप्रैल 2022

👉 कर्मफल हाथों-हाथ

अहंकार और अत्याचार संसार में आज तक किसी को बुरे कर्मफल से बचा न पाये। रावण का असुरत्व यों मिटा कि उसके सवा दो लाख सदस्यों के परिवार में दीपक जलाने वाला भी कोई न बचा। कंस, दुर्योधन, हिरण्यकशिपु की कहानियाँ पुरानी पड़ गयीं। हिटलर, सालाजार, चंगेज और सिकन्दर, नैपोलियन जैसे नर-संहारकों को किस प्रकार दुर्दिन देखने पड़े, उनके अन्त कितने भयंकर हुए, यह भी अब अतीत की गाथाओं में जा मिले हैं। नागासाकी पर बम गिराने वाले अमेरिकन वैमानिक फ्रेड ओलीपी और हिरोशिमा के विलेन (खलनायक) मेजर ईथरली का अन्त कितना बुरा हुआ, यह देखकर सुनकर सैंकड़ों लोगों ने अनुभव कर लिया कि संसार संरक्षक के बिना नहीं है। शुभ-अशुभ कर्मों का फल देने वाला न रहता होता, तो संसार में आज जो भी कुछ चहल-पहल, हंसी खुशी दिखाई दे रही है, वह कभी की नष्ट हो चुकी होती।

इन पंक्तियों में लिखी जा रही कहानी एक ऐसे खलनायक की है जिसने अपने दुष्कर्मों का बुरा अन्त अभी-अभी कुछ दिन पहले ही भोगा है। जलियावाला हत्याकाँड की जब तक याद रहेगी तब तक जनरल डायर का डरावना चेहरा भारतीय प्रजा के मस्तिष्क से न उतरेगा। पर बहुत कम लोग जानते होंगे कि डायर को भी अपनी करनी का फल वैसे ही मिला जैसे सहस्रबाहु, खर-दूषण, वृत्रासुर आदि को।

पंजाब में जन्मे, वहीं के अन्न और जल से पोषण पा कर अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर में सिख धर्म में दीक्षित होकर भी जनरल डायर ने हजारों आत्माओं को निर्दोष पिसवा दिया था, उसे कौन नहीं जानता। इंग्लैंड उसकी कितनी ही प्रशंसा करता पर वह भगवान के दण्ड-विधान से उसी प्रकार नहीं बच सकता था, जैसे संसार का कोई भी व्यक्ति अपने किये हुए का फल भोगने से वंचित नहीं रहता। भगवान की हजार आँखें, हजार हाथ और कराल दाढ़ से छिपकर बचकर कोई जा नहीं सकता। जो जैसा करेगा, उसे वैसा भरना ही पड़ेगा। यह सनातन ईश्वरीय नीति कभी परिवर्तित न होगी।

हंटर कमेटी ने उसके कार्यों की सार्वजनिक निन्दा की, उससे उसका मन अशान्त हो उठा। तत्कालीन भारतीय सेनापति ने उसके किये हुए काम को बुरा ठहराकर त्यागपत्र देने का आदेश दिया। फलतः अच्छी खासी नौकरी हाथ से गई, पर इतने भर को नियति की विधि-व्यवस्था नहीं कहा जा सकता। आगे जो हुआ, प्रमाण तो वह है, जो यह बताता है कि करने के फल विलक्षण और रहस्यपूर्ण ढंग से मिलते हैं।

सन 1921 में जनरल डायर को पक्षाघात हो गया, उससे उसका आधा शरीर बेकार हो गया। प्रकृति इतने से ही सन्तुष्ट न हुई फिर उसे गठिया हो गया। उसके मित्र उसका साथ छोड़ गये। उसके संरक्षक माइकेल ओडायर की हत्या कर दी गई। उसे तो चलना-फिरना तक दूभर हो गया। ऐसी ही स्थिति में एक दिन उसके दिमाग की नस फट गई और लाख कोशिशों के बावजूद वह ठीक नहीं हुई। डायर सिसक-सिसक कर, तड़प-तड़प कर मर गया। अन्तिम शब्द उसके यह थे-

मनुष्य को परमात्मा ने यह जो जीवन दिया है, उसे बहुत सोच-समझ कर बिताने वाले ही व्यक्ति बुद्धिमान होते हैं, पर जो अपने को मुझ जैसा चतुर और अहंकारी मानते हैं, जो कुछ भी करते न डरते हैं न लजाते हैं, उनका क्या अन्त हो सकता है? यह किसी को जानना हो तो इन प्रस्तुत क्षणों में मुझसे जान ले।’

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, अक्टूबर १९७० पृष्ठ २३

गुरुवार, 21 अप्रैल 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग २०

अपने सदगुणों को प्रकाश में लाइए

इस ईश्वरीय प्रयोजन पर विश्वास करिए आत्मा की प्रगतिशीलता पर भरोसा करिए आप सतोगुणी हैं उन्नतिशील हैं सफलता के अधिकारी हैं, विजय यात्रा के लिए निर्वाध गति से आगे बढ़ रहे हैं।

आइए अब एक पेचीदा प्रश्न पर कुछ विचार-विमर्श करें। कई व्यक्तियों में साधारण योग्यताएँ होते भी उनकी कीर्ति बहुत विस्तृत होती है और कईयों में अधिक  योग्यता होते हुए भी उन्हें कोई नहीं पूछता,कोई दुर्गुणी होते हुए भी श्रेष्ठ समझे जाते हैं, कोई सद्गुणी होते हुए भी बदनाम हो जाते हैं, आपने विचार किया कि इस अटपटे परिणाम का क्या कारण है? शायद आप यह कहें कि-' ' दुनियाँ मूर्ख है, उसे भले-बुरे की परख नहीं '' तो आपका कहना न्याय संगत न होगा क्योंकि अधिकांश मामलों में उसके निर्णय ठीक होते हैं। आमतौर से भलों के प्रति भलाई और बुरों के प्रति बुराई ही फैलती है, ऐसे अटपटे निर्णय तो कभी-कभी ही होते हैं।

कारण यह कि वही वस्तुएँ चमकती हैं जो प्रकाश में आती हैं। सामने वाला भाग ही दृष्टिगोचर होता है। जो चीजें रोशनी में खुली रखी हैं वे साफ-साफ दिखाई देती हैं, हर कोई उनके अस्तित्व पर विश्वास कर सकता है परंतु जो वस्तुएँ अंधेरे में, पर्दे के पीछे, कोठरी में बंद रखी हैं उनके बारे में हर किसी को आसानी से पता नहीं लग सकता। बहुत खोजने वाले, खासतौर से ध्यान देने वाले, तीक्षा परीक्षक बुद्धि वाले लोग ही उन अप्रकट वस्तुओं के संबंध में थोडा- थोडा जान सकते हैं, सर्वसाधारण के लिए वह जानकारी सुलभ नहीं है। दुनियाँ में हर एक मनुष्य के सामने उसकी निजी परिस्थितियाँ और समस्याएँ भी पर्याप्त मात्रा में सुलझाने को पडी रहती हैं, सारा समय लगाकर वे ही कठिनाई से हल हो पाती हैं, इतनी फुरसत किसे है जो दूसरों को गहराई से देखकर तब उस पर कुछ मत निश्चित करे। आमतौर से यही होता है कि जो बात जिस रूप में सामने आ गई, उसे वैसे ही रूप में मान लिया गया। डॉक्टर लोग अपनी दुकानों को सजाने के लिए खाली बोतलों में रंगीन पानी भर कर रख लेते हैं, ग्राहक उन्हें दवाएँ ही समझते हैं, किसे इतनी फुरसत है कि उन बोतलों की जाँच करता फिरे कि इनमें पानी है या दवा? कोई कोई कंजूस लोग बहुत धन-दौलत जमा किए होते हैं,
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ३०

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