शनिवार, 13 नवंबर 2021

👉 जीवन साधना के त्रिविध पंचशील (भाग ३)

परिवार निर्माणः-
    
(१) परिवार को अपनी विशिष्टताओं को उभारने का अभ्यास करने एवं परिपुष्ट बनाने की प्रयोगशाला, पाठशाला समझे। इस उद्यान में सत्प्रवृत्तियों के पौधे लगाये। हर सदस्य को स्वावलम्बी सुसंस्कारी एवं समाजनिष्ठ बनाने का भरसक प्रयत्न करें। इसके लिए सर्वप्रथम ढालने वाले साँचे की तरह आदर्शवान बने ताकि स्वयं कथनी और करनी की एकता का प्रभाव पड़े। स्मरण रहे साँचे के अनुसार ही खिलौने ढलते हैं। पारिवारिक उत्तरदायित्व में सर्वप्रथम है संचालक का आदर्शवादी ढाँचे में ढलना। दूसरा है माली की तरह हरे पौधे का शालीनता के क्षेत्र में विकसित करना।
    
(२) परिवार की संख्या न बढ़ायें। अधिक बच्चे उत्पन्न न करें। इसमें जननी का स्वास्थ्य, सन्तान का भविष्य, गृहपति का अर्थ सन्तुलन एवं समाज में दारिद्र्य, असन्तोष बढ़ता है। दूसरों के बच्चे को अपना मानकर उनके परिपालन से वात्सल्य कहीं अधिक अच्छी तरह निभ सकता है। लड़की- लड़कों में भेद न करें। पिछली पीढ़ी और वर्तमान के साथियों के प्रति कर्तृत्व पालन तभी हो सकता है, जब नये प्रजनन को रोकें। अन्यथा प्यार और धन प्रस्तुत परिजनों का ऋण चुकाने में लगने की अपेक्षा उनके लिए बहने लगेगा, जिनका अभी अस्तित्व तक नहीं है। इसलिए उस सम्बन्ध में संयम बरतें और कड़ाई रखें।
    
(३) संयम और सज्जनता एक तथ्य के दो नाम हैं। परिवार में ऐसी परम्पराएँ प्रचलित करें जिसमें इन्द्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम और विचार संयम का अभ्यास आरम्भ से ही करते रहने का अवसर मिले। घर में चटोरेपन का माहौल न बनाया जाये। भोजन सात्विक बने और नियत समय पर सीमित मात्रा में खाने का ही अभ्यास बने। कामुकता को उत्तेजना न मिले, सभी की दिनचर्या निर्धारित रहे। समय के साथ काम और मनोयोग जुड़ा रहे। किसी को आलस्य- प्रमाद की आदत न पड़ने दी जाय और न कोई आवारागर्दी अपनाये व कुसंग में फिरे। फैशन और जेवर को बचकाना, उपहासास्पद माना जाय, केश विन्यास और अश्लील, उत्तेजक पोशाक कोई न पहनें और न जेवर आभूषणों से लदें। नाक, कान छेदने और उनके चित्र- विचित्र लटकन लटकाने का पिछड़ेपन का प्रतीत फैशन कोई महिला न अपनाये।
    
(४) पारिवारिक पंचशीलों में श्रमशीलता, मितव्ययिता, सुव्यवस्था, शालीन शिष्टता और उदार सहकारिता की गणना की गयी है। इन पाँच गुणों को हर सदस्य के स्वभाव में कैसे सम्मिलित किया जाय। इसके लिए उपदेश देने से काम नहीं चलता, ऐसे व्यावहारिक कार्यक्रम बनाने पड़ते हैं, जिन्हें करते रहने से वे सिद्धान्त व्यवहार में उतरें।
    
(५) उत्तराधिकार का लालच किसी के मस्तिष्क में नहीं जमने देना चाहिए, वरन् हर सदस्य के मन मे यह सिद्धान्त जमना चाहिए कि परिवार की संयुक्त सम्पदा में उसका भरण- पोषण, शिक्षण एवं स्वावलम्बन सम्भव हुआ है। इस ऋण को चुकाने में ही ईमानदारी है। बड़ों की सेवा और छोटों की सहायता के रूप में यह ऋण हर वयस्क स्वावलम्बी को चुकाना चाहिए। कमाऊ होते ही आमदनी जेब में रखना और पत्नी को लेकर मनमाना खर्च करने के लिए अलग हो जाना प्रत्यक्ष बेईमानी है। उत्तराधिकार का कानून मात्र कमाने में असमर्थों के लिए लागू होना चाहिए, न कि स्वावलम्बियों की मुफ्त की कमाई लूट लेने के लिए। अध्यात्मवाद और साम्यवाद दोनों ही इस मत के हैं कि पूर्वजों की छोड़ी कमाई को असमर्थ आश्रित ही तब तक उपयोग करें जब तक कि वे स्वावलम्बी नहीं बन जाते।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

सोमवार, 8 नवंबर 2021

👉 जीवन साधना के त्रिविध पंचशील (भाग २)

व्यक्तित्व का विकास
    
(१) प्रातः उठने से लेकर सोने तक की व्यस्त दिनचर्या निर्धारित करें। उसमें उपार्जन, विश्राम, नित्य कर्म, अन्यान्य कामकाजों के अतिरिक्त आदर्शवादी परमार्थ प्रयोजनों के लिए एक भाग निश्चित करें। साधारणतया आठ घण्टा कमाने, सात घण्टा सोने, पाँच घण्टा नित्य कर्म एवं लोक व्यवहार के लिए निर्धारित रखने के उपरान्त चार घण्टे परमार्थ प्रयोजनों के लिए निकालना चाहिए। इसमें भी कटौती करनी हो, तो न्यूनतम दो घण्टे तो होने ही चाहिये। इससे कम में पुण्य परमार्थ के, सेवा साधना के सहारे बिना न सुसंस्कारिता स्वभाव का अंग बनती है और न व्यक्तित्व का उच्चस्तरीय विकास सम्भव होता है।
    
(२) आजीविका बढ़ानी हो तो अधिक योग्यता बढ़ायें। परिश्रम में तत्पर रहें और उसमें गहरा मनोयोग लगायें। साथ ही अपव्यय में कठोरता पूर्वक कटौती करें। सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त समझें। अपव्यय के कारण अहंकार, दुर्व्यसन, प्रमाद बढ़ने और निन्दा, ईर्ष्या, शत्रुता पल्ले बाँधने जैसी भयावह प्रतिक्रियाओं का अनुमान लगायें। सादगी प्रकारान्तर से सज्जनता का ही दूसरा नाम है। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह ही अभीष्ट है। अधिक कमाने वाले भी ऐसी सादगी अपनायें जो सभी के लिए अनुकरणीय हो। ठाट- बाट प्रदर्शन का खर्चीला ढकोसला समाप्त करें।
    
(३) अहर्निश पशु प्रवृत्तियों को भड़काने वाले विचार ही अन्तराल पर छाये रहते है। अभ्यास और समीपवर्ती प्रचलन मनुष्य को वासना, तृष्णा और अहंकार की पूर्ति में निरत रहने का ही दबाव डालता है। सम्बन्धी मित्र परिजनों के परामर्श प्रोत्साहन भी इसी स्तर के होते हैं। लोभ, मोह और विलास के कुसंस्कार निकृष्टता अपनाये रहने में ही लाभ तथा कौशल समझते हैं। ऐसी ही सफलताओं को सफलता मानते हैं। इसे एक चक्रव्यूह समझना चाहिये। भव- बन्धन के इसी घेरे से बाहर निकलने के लिए प्रबल पुरुषार्थ करना चाहिये। कुविचारों को परास्त करने का एक ही उपाय है- प्रज्ञा साहित्य का न्यूनतम एक घण्टा अध्ययन अध्यवसाय। इतना समय एक बार न निकले तो उसे जब भी अवकाश मिले, थोड़ा- थोड़ा करके पूरा करते रहना चाहिये।
    
(४) प्रतिदिन प्रज्ञायोग की साधना नियमित रूप से की जाय। उठते समय आत्मबोध, सोते समय तत्त्वबोध। नित्य कर्म से निवृत्त होकर जप, ध्यान। एकान्त सुविधा का चिन्तन- मनन में उपयोग। यही है त्रिविध सोपानों वाला प्रज्ञायोग। यह संक्षिप्त होते हुए भी अति प्रभावशाली एवं समग्र है। अपने अस्त- व्यस्त बिखराव वाले साधना क्रम को समेटकर इसी केन्द्र बिन्दु पर एकत्रित करना चाहिये। महान के साथ अपने क्षुद्र को जोड़ने के लिए योगाभ्यास का विधान है। प्रज्ञा परिजनों के लिए सर्वसुलभ एवं सर्वोत्तम योगाभ्यास ‘प्रज्ञा योग’ की साधना है। उसे भावनापूर्वक अपनाया और निष्ठा पूर्वक निभाया जाय।
    
(५) दृष्टिकोण को निषेधात्मक न रहने देकर विधेयात्मक बनाया जाय। अभावों की सूची फाड़ फेंकनी चाहिये और जो उपलब्धियाँ हस्तगत है, उन्हें असंख्य प्राणियों की अपेक्षा उच्चस्तरीय मानकर सन्तुष्ट भी रहना चाहिये और प्रसन्न भी। इसी मनःस्थिति में अधिक उन्नतिशील बनना और प्रस्तुत कठिनाइयों से निकलने वाला निर्धारण भी बन पड़ता है। असन्तुष्ट, खिन्न, उद्विग्न रहना तो प्रकारान्तर से एक उन्माद है, जिसके कारण समाधान और उत्थान के सारे द्वार ही बन्द हो जाते है।
   
कर्तृत्व पालन को सब कुछ मानें। असीम महत्त्वाकाँक्षाओं के रंगीले महल न रचें। ईमानदारी से किये गये पराक्रम से ही परिपूर्ण सफलता मानें और उतने भर से सन्तुष्ट रहना सीखें। कुरूपता नहीं, सौन्दर्य निहारें। आशंकाग्रस्त, भयभीत, निराश न रहें। उज्ज्वल भविष्य के सपने देखें। याचक नहीं दानी बने। आत्मावलम्बन सीखें। अहंकार तो हटाएँ पर स्वाभिमान जीवित रखें। अपना समय, श्रम, मन और धन से दूसरों को ऊँचा उठायें। सहायता करे पर बदले की अपेक्षा न रखें। बड़प्पन की तृष्णाओं को छोड़े और उनके स्थान पर महानता अर्जित करने की महत्त्वाकांक्षा सँजोये। स्मरण रखें, हँसते- हँसाते रहना और हल्की- फुल्की जिन्दगी जीना ही सबसे बड़ी कलाकारिता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 भक्तिगाथा (भाग ८४)

भगवत्कृपा के स्रोत हैं- भक्ति और भक्त

देवर्षि के ये कुछ वाक्य सभी के भावों में प्रकाश रेखाओं की भांति उतर गए। काफी देर तक कोई कुछ नहीं बोला। फिर महर्षि अंगिरा ने इस मौन को अपने शब्दों से बेधा एवं बींधा। वे बोले- ‘‘मैं अपने युग में ऐसे ही एक भगवद्भक्त महापुरुष की अलौकिक कृपा का साक्षी रहा हूँ। यदि आप सब अनुमति दें तो मैं वह कथा सुनाऊँ।’’ ब्रह्मर्षि अंगिरा, सभी उनके तप के महासामर्थ्य से सुपरिचित थे। मंत्रविद्या के तो जैसे वह परमाचार्य थे। ऋषियों, देवों एवं सिद्धों के समुदाय में से सभी को पता था कि महर्षि अंगिरा अपने अमोघ मन्त्रों के प्रभाव से विधि के अकाट्य विधान को भी काटने में समर्थ हैं। उनका ज्ञान अश्रुतपूर्व है। ऐसे परमादरणीय महर्षि को सुनने के लिए सभी उत्सुक थे बल्कि अब तो सभी में यह जिज्ञासा भी जाग उठी थी कि भला ऐसे कौन से महामानव हुए हैं, जिन्होंने अग्नि की भांति महातेजस्वी एवं परम तपस्वी सभी पराविद्याओं के ज्ञाता इन महर्षि अंगिरा को भी प्रभावित किया था।

इधर महर्षि कह रहे थे कि ‘‘यह घटना त्रेतायुग की है। उस समय मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के पूर्वज महाराज दिलीप का शासन था। ब्रह्मर्षि अंगिरा के इस कथन ने ऋषिश्रेष्ठ वशिष्ठ को भी सचेत एवं सचेष्ट किया। महाराज दिलीप के सुशासन में सभी सुखी थे परन्तु उन दिनों सुदूर ग्रामीण अंचल में एक दस्यु ने भारी उपद्रव मचा रखा था। उसका नाम था दुर्दम्य। जैसा नाम, वैसा ही गुण। वह सचमुच ही दुर्दमनीय था। उसके आतंक-अत्याचार एवं क्रूरता ने सभी को पीड़ित कर रखा था। उस ग्रामीण अंचल के लोक उससे किसी भी तरह पीछा छुड़ाना चाहते थे पर यह सम्भव नहीं दिख रहा था। उन्हीं दिनों उस ग्रामीण क्षेत्र में महर्षि शिरीष नाम के सन्त पधारे। सरल, सौम्य, भगवद्भावों से सर्वथा परिपूर्ण इन महर्षि को अपने सान्निध्य में पाकर गांवों के सरल भोले लोग आह्लादित हो गए। उन्होंने महर्षि से निवेदन किया कि वे उन्हीं के गांव में रह जाएँ। वहाँ की प्राकृतिक सुरम्यता, ग्रामीण जनों का यह निश्छल आचरण देखकर सन्त शिरीष ने भी उनकी बात मान ली। परन्तु उन्होंने यह अवश्य कहा कि गांव से बाहर रहेंगे। भला गांव के लोगों को इसमें क्या आपत्ति हो सकती थी?

उन सबने मिलकर गांव के बाहर शिव मन्दिर में उनकी व्यवस्था कर दी। महात्मा शिरीष वेदमाता गायत्री के अनुरक्त भक्त थे। वह ब्रह्ममुहूर्त से लेकर मध्याह्न बेला तक गायत्री साधना करते थे। दिन में एक समय थोड़ा कुछ फल-फूल खाकर, सायं प्रदोष बेला में भगवान शिव का नित्यार्चन, अभिषेक आदि करते। रात्रि महानिशा में पुनः भगवती गायत्री की साधना चतुष्पाद सहित करते। दिन में थोड़े समय के लिए आगन्तुक जनों से मुलाकात करते। महर्षि के इस तपस्वी जीवन को देखकर सभी आनन्दित थे, ग्रामीणजन सन्त शिरीष के सत्संग से एक ओर जहाँ आनन्दित थे, वहीं दस्यु दुर्दम्य की धमकियों से भयभीत। जब भी वे इसकी चर्चा उनसे करते, तो वह उन्हें यह कहकर चुप करा देते कि आदिशक्ति जगन्माता की कृपा पर भरोसा रखो। यह सन्तवाणी उन्हें आश्वस्ति तो देती, फिर भी चिन्ता तो थी ही।

इन्हीं दिनों पता नहीं कैसे दैवसंयोगवश दस्यु दुर्दम्य बुरी तरह से अस्वस्थ हो गया। गांव के लोगों ने समझा कि यह सब उसके बुरे कर्मों का कुफल है। किसी ने उससे मिलना भी उचित नहीं समझा परन्तु सन्त शिरीष उसे अपने पास शिवमन्दिर ले आए। उनकी अहर्निश चलने वाली साधना में यह सेवासाधना भी जुड़ गयी। अपने आयुर्वेद ज्ञान से वह उसकी चिकित्सा करते, साथ ही स्वयं उसके लिए भोजन पकाते। गांववालों में से कोई भी उनके पास भी नहीं जाना चाहता था। उन सब ने ऋषि शिरीष को मना भी किया। परन्तु जब वे किसी भी तरह से न माने तो उन सबने सोचा महात्मा शिरीष तपस्वी सन्त हैं, उनसे हठ करना ठीक नहीं है। परन्तु दुर्दम्य के लिए उनके मन में भारी आक्रोश था। परन्तु इस सबसे अछूते महात्मा शिरीष उसकी दिन-रात सेवा किये जा रहे थे। उनकी चिकित्सा एवं सेवा के परिणाम से वह कुछ महीनों में स्वस्थ हो गया। महर्षि के सान्निध्य एवं सेवा से उसके अन्तःकरण में प्रायश्चित्त के स्वर फूटने लगे। हालांकि महर्षि ने उससे इस बारे में कुछ नहीं कहा था। हाँ, जब वह पूर्णतया स्वस्थ हो गया तो उन्होंने यह अवश्य कहा- अब तुम चाहो तो यहाँ से जा सकते हो। दुर्दम्य ने पूछा- परन्तु यदि मैं आपके पास रहना चाहूँ तो? उत्तर में सन्त शिरीष ने मातृवत स्नेह से कहा- अवश्य रह सकते हो पुत्र।

महर्षि की भक्तिभावना ने उसमें आश्चर्यजनक बदलाव किया। अब तो वह भी गायत्री साधना सीख गया, सेवा में उसकी अभिरुचि होने लगी। जब उसके बदलाव की खबरें गांव के लोगों को मिलतीं, तो वे समझते कि यह उसका ढोंग है। परन्तु थोड़े समय के बाद उसके बदलाव ने उन्हें भी आश्चर्य में डाल दिया। इधर कभी दस्यु रहे दुर्दम्य ने जब उनसे पूछा कि मेरे विगत कर्मों का क्या प्रायश्चित्त है? तो सन्त शिरीष ने बड़े प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- पुत्र! यदि तुम कुछ कर सकते हो तो बस अपनी निन्दा, अपमान एवं तिरस्कार को धैर्यपूर्वक सहन करो, साथ ही अपने विरोधियों की सेवा करने का प्रयत्न करो। यही तुम्हारा तप है, तुम्हारा प्रायश्चित्त है।

दुर्दम्य ने उनकी बातों को श्रद्धापूर्वक स्वीकार किया। वह ग्रामीणजनों का तिरस्कार, दुत्कार सहकर भी उनकी सेवा करने का प्रयत्न करने लगा। कुछ सालों के प्रयास से उनका तिरस्कार, विश्वास में बदलने लगा। उन सबने महसूस किया कि दस्यु दुर्दम्य सचमुच ही अब भक्त दुर्दम्य बन गया है। महर्षि अंगिरा के इस कथाक्रम से पुलकित होते हुए ब्रह्मर्षि वशिष्ठ उत्साह से बोले- ‘‘महाराज दिलीप से यह चर्चा मैंने भी सुनी थी। हाँ ब्रह्मर्षि! मैंने स्वयं उन आदिशक्ति जगन्माता गायत्री के भक्त शिरीष के सान्निध्य को, चमत्कार को देखा है। सचमुच भक्त का स्पर्श स्वयं भगवान के स्पर्श से किंचित न्यून नहीं।’’ ब्रह्मर्षि अंगिरा की इस भक्तिकथा ने सभी को एक अनूठे भावलोक में पहुँचा दिया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १५६

शुक्रवार, 5 नवंबर 2021

👉 जीवन साधना के त्रिविध पंचशील (भाग १)

साधना चाहे घर पर की जाय अथवा एकान्तवास में रहकर, मनःस्थिति का परिष्कार उसका प्रधान लक्ष्य होना चाहिए। साधना का अर्थ यह नहीं कि अपने को नितान्त एकाकी अनुभव कर वर्तमान तथा भावी जीवन को नहीं, मुक्ति- मोक्ष को, परलोक को लक्ष्य मानकर चला जाय। साधना विधि में चिन्तन क्या है, आने वाले समय को साधक कैसा बनाने और परिष्कृत करने का संकल्प लेकर जाना चाहता है, इसे प्रमुख माना गया है। व्यक्ति, परिवार और समाज इन तीनों ही क्षेत्रों में बँटे जीवन सोपान को व्यक्ति किस प्रकार परिमार्जित करेंगे, उसकी रूपरेखा क्या होगी, इस निर्धारण में कौन कितना खरा उतरा इसी पर साधना की सफलता निर्भर है।
   
कल्प साधना में भी इसी तथ्य को प्रधानता दी गयी है। एक प्रकार से यह व्यक्ति का समग्र काया कल्प है, जिसमें उसका वर्तमान वैयक्तिक जीवन, पारिवारिक गठबंधन तथा समाज सम्पर्क तीनों ही प्रभावित होते हैं। कल्प साधकों को यही निर्देश दिया जाता है कि उनके शान्तिकुञ्ज वास की अवधि में उनकी मनःस्थिति एकान्त सेवी, अन्तर्मुखी, वैरागी जैसी होनी चाहिए। त्रिवेणी तट की बालुका में माघ मास की कल्प साधना फूस की झोपड़ी में सम्पन्न करते हैं। घर परिवार से मन हटाकर उस अवधि में मन को भगवद् समर्पण में रखते हैं। श्रद्धा पूर्वक नियमित साधना में संलग्न रहने और दिनचर्या के नियमित अनुशासन पालने के अतिरिक्त एक ही चिन्तन में निरत रहना चाहिये, कि काया कल्प जैसी मनःस्थिति लेकर कषाय- कल्मषों की कीचड़ धोकर वापस लौटना है। इसके लिए भावी जीवन को उज्ज्वल भविष्य की रूपरेखा निर्धारित करने का ताना- बाना बुनते रहना चाहिये।
   
व्यक्ति, परिवार और समाज के त्रिविध क्षेत्रों में जीवन बंटा हुआ हैं, इन तीनों को ही अधिकाधिक परिष्कृत करना इन दिनों लक्ष्य रखना चाहिये। इस सन्दर्भ में त्रिविध पंचशीलों के कुछ परामर्श क्रम प्रस्तुत हैं। भगवान बुद्ध ने हर क्षेत्र के लिए पंचशील निर्धारित किये थे। प्रज्ञा साधकों के लिए उपरोक्त तीन क्षेत्र के लिए इस प्रकार हैं:-

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 भक्तिगाथा (भाग ८३)

भगवत्कृपा के स्रोत हैं- भक्ति और भक्त

भगवत्कृपा के स्रोत हैं- भक्ति और भक्त। इस सच की अनुभूति सभी के अन्तःकरण में प्रकाशित हो उठी। सप्तर्षियों के साथ देवगण, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर एवं महर्षियों का समुदाय पुलकित हो उठा। उन्हें यह प्रगाढ़ता से अनुभव हुआ कि भक्ति जीवन को रूपान्तरित करने वाला रसायन है। इससे मानव जीवन दिव्य एवं पावन बनता है। देवर्षि ने भक्तिगाथा के जो कथासूत्र बुने थे, उनमें अनगिन मन सहजता से गुंथ गए। कृषक पति-पत्नी की भक्तिकथा ने सभी के चिन्तन को एक नवीन दिशा दी। वे सोचने लगे लगे कि भक्ति सचमुच ही असम्भव को सहज सम्भव बना देती है। इस भक्ति का निर्मल स्रोत है भक्त, जिसके माध्यम से भगवत्कृपा का अजस्र स्रोत प्रवाहित होता है। भक्ति एवं भक्त दोनों ही ऐसे माध्यम हैं- जिनसे भगवान की कृपा का स्पर्श पाया जा सकता है। प्रभु के पावन स्पर्श की, उनके सान्निध्य की अनुभूति पायी जा सकती है। भक्तों का सान्निध्य भी भगवान के सान्निध्य से कहीं कम नहीं है क्योंकि भगवान तो सदा ही अपने भक्तों के अन्तःकरण में विराजते हैं।

भक्त-भक्ति एवं भगवान की ये विचारकड़ियाँ अनायास ही गुंथती-जुड़ती रहीं। देवर्षि नारद द्वारा उच्चारित भक्तिसूत्र सभी की अन्तर्चेतना में प्रकाश किरणों की तरह जगमगाते रहे। इस बीच स्वयं देवर्षि मौन रहे। सप्तर्षियों में सभी के लिए समादरणीय महर्षि पुलह ने देवर्षि के मुख की ओर देखा, पर बोले कुछ नहीं। हालांकि उनकी दृष्टि में एक नेह भरा आह्लाद था। सम्भवतः वह भक्ति के नए सूत्र को सुनना चाहते थे। महर्षि पुलह की इन विचारविथियों ने अन्य महर्षिजनों को भी छुआ। उनके भाव भी स्पन्दित हुए और तब ब्रह्मर्षि मरीचि ने सभी की वाणी को शब्द देते हुए कहा, ‘‘देवर्षि हम सभी आपके नए सूत्र का सत्योच्चार सुनने के लिए उत्सुक हैं। आप भक्तिकथा की नयी कड़ी से हम सभी को कृतार्थ करें।’’ ब्रह्मर्षि मरीचि के इस कथन समाप्ति के साथ ही एक हिमपक्षी की मधुर ध्वनि वातावरण में स्पन्दित हुई। कुछ ऐसे कि जैसे उसने भी अपनी वाणी से ब्रह्मर्षि मरीचि के कथन का अनुमोदन किया हो।

उत्तर में देवर्षि के अधरों पर एक मीठी सी स्मित रेखा झलकी। और उन्होंने अपने हृदय कोष से नए सूत्र रत्न को प्रकाशित किया-
‘मुख्यतस्तु महत्कृपयैव भगवत्कृपालेशाद्वा’॥ ३८॥

‘परन्तु (प्रेमाभक्ति का साधन) मुख्यतया (भगवद्भक्त) महापुरुषों की कृपा से अथवा भगवत्कृपा के लेशमात्र से होता है।’ भक्त महापुरुषों का संग, सदा ही भगवत्कृपा की पारसमणि की भांति होता है, जिसका तनिक सा स्पर्श भी रूपान्तरण करने में समर्थ है। इस अमोघ सामर्थ्य को सभी अनुभवी जानते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १५५

गुरुवार, 4 नवंबर 2021

👉 दिया धरती का, ज्योति आकाश की

दीपावली पर दीये जलाते समय दीये के सच को समझना निहायत जरूरी है। अन्यथा दीपावली की प्रकाशपूर्ण रात्रि के बाद केवल बुझे हुए मिट्टी के दीये हाथों में रह जाएँगे। आकाशीय-अमृत ज्योति खो जाएगी। अन्धेरा फिर से सघन होकर घेर लेगा। जिन्दगी की घुटन और छटपटाहट फिर से तीव्र और घनी हो जाएगी। दीये के सच की अनुभूति को पाए बिना जीवन के अवसाद और अन्धेरे को सदा-सर्वदा के लिए दूर कर पाना कठिन ही नहीं नामुमकिन भी है।
    
दीये का सच दीये के स्वरूप में है। दीया भले ही मरणशील मिट्टी का हो, परन्तु ज्येाति तो अमृतमय आकाश की है। जो धरती का है, वह धरती पर ठहरा है, लेकिन ज्योति तो निरन्तर आकाश की ओर भागी जा रही है। ठीक दीये की ही भाँति मनुष्य की देह भी मिट्टी ही है, किन्तु उसकी आत्मा मिट्टी की नहीं है। वह तो इस मिट्टी के दीये में जलने वाली अमृत ज्योति है। हालांकि अहंकार के कारण वह इस मिट्टी की देह से ऊपर नहीं उठ पाती है।
    
मिट्टी के दीये में मनुष्य की जिन्दगी का बुनियादी सच समाया है। ‘अप्प दीपो भव’ कहकर भगवान् बुद्ध ने इसी को उजागर किया है। दीये की माटी अस्तित्त्व की प्रतीक है, तो ज्योति चेतना की। परम चेतना परमात्मा की करूणा ही स्नेह बनकर वाणी की बातों को सिक्त किए रहती है। चैतन्य ही प्रकाश है, जो समूचे अस्तित्त्व को प्रभु की करूणा के सहारे सार्थक करता है।
    
मिट्टी सब जगह सहज सुलभ और सबकी है, किन्तु ज्योति हर एक की अपनी और निजी है। केवल मिट्टी भर होने से कुछ नहीं होता। इसे कुम्भकार गुरु के चाक पर घूमना पड़ता है। उसके अनुशासन के आँवे में तपना पड़ता है। तब जाकर कहीं वह सद्गुरु की कृपा से परमात्मा की स्नेह रूपी करुणा का पात्र बनकर दीये का रूप ले लेती है। ऐसा दीया, जिसमें आत्म ज्योति प्रकाशित होती है। दीपावली पर दीये तो हजारों-लाखों जलाये जाते हैं, पर इस एक दीये के बिना अन्धेरा हटता तो है, पर मिटता नहीं। अच्छा हो कि इस दीपावली में दीये के सच की इस अनुभूति के साथ यह एक दीया और जलाएँ, ताकि इस मिट्टी के देह दीप में आत्मा की ज्योति मुस्करा सके।

✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ ११३

स्व प्रकाश का प्रेरणा पर्व दीपावली

भारतीय संस्कृति में पर्वों त्योहारों का विशेष महत्त्व है। पर्वों के साथ उल्लासमय क्रिया-काण्ड  एवं प्रेरक सूत्र दोनों समाए हैं। कर्मकाण्ड और उससे जुड़ी प्रेरणाएँ ये दोनों स्कूटर के दो चक्के के समान हैं। अँधे और पंगे की जोड़ी की तरह दोनों के सम्यक् तालमेल से ही लक्ष्य तक पहुँचा जा  सकता है। दीपावली की प्रेरणाएँ की जीवन को दिशाबोध कराती है।
    
दीपावली को पर्वों का राजा कह सकते हैं। भगवान् राम  राष्ट्र के आध्यात्मिक उत्थान अनौचित्य के विनाश तथा औचित्य की स्थापना के लिए राज्य सुख त्याग कर चौदह वर्षों का वनवास स्वीकार किये थे। जब वे असुरता के प्रतीक रावण पर विजय प्राप्त कर अयोध्या लौटे, तब उनका स्वागत दीपमालाओं से सजाकर किया गया। कहते हैं कि तभी से लोग दीपावली मनाते आ रहे हैं। आज भी समाज में धर्म के नाम पर वितण्डा फैलाने वाले रावणों, राजनीति के नाम पर राष्ट्र का शोषण करने वाले जरासंधों, कंसों, दुर्योधनों तथा राष्ट्र की अस्मिता का अपहरण करने वाले दुःशासनों की बाढ़ है। हम सबको इनके उन्मूलन के लिए समर्पित भाव से अपनी प्रतिभा, पुरुषार्थ, धन तथा समय सब कुछ न्यौछावर करना चाहिए, ताकि इतिहास हमें भी दीप मालिका सजाकर याद करे।
    
विशेषकर आज के भौतिकवादी युग में जब लोगों की वृत्ति भोगवादी होती जा रही है, लोग बिना कष्ट-कठिनाई सहन किये ऊँची सफलताएँ हस्तगत करना चाहते हो, वहाँ दीपावली के दीपक का महत्त्व बढ़ जाता है। दीपक स्वयं जलता है, कष्ट सहता है और संसार को प्रकाश देता है। हम भी यदि सफलता हस्तगत करना चाहते हैं, अपने भीतर बाहर को प्रकाशित करना चाहते हैं, तो दीपक की भाँति जलना पड़ेगा, तपना पड़ेगा, कठिनाइयों को चुनौती के रूप में स्वीकार करना पड़ेगा। कविवर गुप्त जी के शब्दों में-
    
जितने कष्ट कण्टकों में हैं, उनका जीवन सुमन खिला।
गौरव गंध उन्हें उतना ही, यत्र-तत्र-सर्वत्र मिला॥
    
आशावादिता का सबसे सशक्त प्रतीक भी है दीपक। अंधकार चाहे जितना सघन क्यों न हो, नन्हा-सा दीपक उसे सदा चुनौती देता एवं अस्तित्व रहते तक उस पर विजय प्राप्त करता है। हमें भी समाज में व्याप्त अनाचार, अनैतिकता, घूसखोरी, भ्रष्टाचार, आतंकवादी जैसी विसंगतियों से न  घबराते हुए दीपक बनकर इनसे जूझना चाहिए। यदि हम एक सच्चे दीपक बन गये, तो निश्चय ही  अपने चारों ओर व्याप्त अंधकार पर विजय प्राप्त कर सकेंगे। हमें देखकर और भी प्रेरित होंगे, तब दीप से दीप चलते चले जाएँगे और जिधर चल पड़ेगे कारवाँ चल पड़ेगा। सामयिक कवि श्री वीरेश्वर उपाध्याय ने शब्दों में कहें तो-
जीवन पथ जो कण्टकमय हो, अंधकारों का घोर प्रलय हो, किन्तु साधना एक यही बस, पग प्रति पग गतिमान चाहिए। माँ बस यह वरदान चाहिए।
    
दीपावली लक्ष्मी का पर्व है। युग निर्माण योजना मिशन के संस्थापक पं० श्रीराम शर्मा आचार्य ने धन को माँ के दूध की संज्ञा देते हुए कहा है कि हम लक्ष्मी को माँ समझकर अपने जीवन को विकसित, सामर्थ्यवान बनाने के लिए उपयोग करें, न कि भोग विलास तथा ऐशोआराम के लिए। हम इस पर्व में लेखा-जोखा तो करते हैं, वर्ष भर के लाभ-हानि का विचार भी करते हैं, किन्तु यहीं तक सीमित न रहकर हमें अर्थ के संयमित उपभोग की प्रेरणा भी लेनी चाहिए। ईशोपनिषद् में उपनिषद्कारों ने यही प्रेरणा दी है-
ईशावास्यामिदं सर्वं यत्किंचजगत्यांजगत।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृदः कस्य स्विद्धनम्॥
    
वस्तुतः दीपावली प्रकाश का पर्व है। युगों से हम इसे मानते आ रहे हैं, किन्तु उक्त संकल्पों एवं प्रेरणाओं के अभाव में हमारी दीपावली प्राणहीन होती जा रही है। पूजा-पाठ करना, दीपक जलाना आदि श्रद्धा एवं उत्साह प्रकट करने के सारे उपक्रम निरर्थक हो जाते हैं यदि हमारे अन्दर अंधकार से जूझने की प्रेरणा नहीं उभरी। अतः इस पर्व पर हम सब संकल्प लें, दीपक बनने का, प्रकाश स्तंभ बनने का, मील का पत्थर बनने का तभी दीपावली पर्व सार्थक होगा।  हर संकल्वान व्यक्ति को नेपोलियन के ये शब्द Nothing is impossible हमेशा याद रखना चाहिए।
शैल दीदी पण्ड्या

सोमवार, 1 नवंबर 2021

👉 स्वाध्याय मंडल, प्रज्ञा संस्थान और प्रज्ञा केन्द्र (अन्तिम भाग)

स्वाध्याय क्रम के पैर जमते ही सभी प्रज्ञा संस्थानों को उपरोक्त कार्य पद्धति हाथ में लेनी चाहिए। उसके लिए साधन जुटाने चाहिए। हर प्रज्ञा संस्थान को स्वाध्याय शुभारंभ करके अग्रिम चरणों में सृजनात्मक और सुधारात्मक कार्यक्रम हाथ में लेने होंगे, इसके लिए दस सूत्री योजना की चर्चा होती रही है, उनमें से चार तो ऐसे है जिन्हें छोटे प्रज्ञा संस्थान भी अपने न्यूनतम ३० सदस्यों की परिधि में कार्यान्वित कर सकते हैं। प्रौढ़ शिक्षा, बाल संस्कार शाला, व्यायाम शाला, खेलकूद, तुलसी आरोपण, हरीतिमा संवर्धन। शादियों में दहेज और धूमधाम का विरोध इन चार कार्यक्रमों में जन- जन को भागीदार बनाने का कार्य स्वाध्याय मंडलों को अपने तीस सदस्यों के परिवार से आरंभ करना चाहिए। इन कार्यक्रमों के सहारे यह छोटे संगठन भी अपनी गौरव गरिमा का परिचय देंगे। जन- जन का समर्थन सहयोग प्राप्त करेंगे और बीज से वृक्ष, चिनगारी से दावानल का नया उदाहरण बनेंगे।
   
स्वाध्याय के दो और सत्संग के चार चरण मिलकर छः बनते हैं। अगले दिनों हर मंडल को पर्व आयोजनों, नवरात्रि सत्रों और वार्षिकोत्सवों की व्यवस्था बनानी होगी। इन सब कार्यों के लिए, साधन जुटाने के लिए पैसों की जरूरत पड़ती रहेगी। इसका सरल और स्थायी रूप ज्ञानघट ही हो सकते हैं। प्रज्ञा परिवार को सदस्यता के लिए एक घण्टा समयदान और बीस पैसे की अंशदान नित्य नियमित रूप से करते रहने की शर्त है। ऐसे सच्चे प्रज्ञा परिवार विनिर्मित करने चाहिए जो बातों के बताशे ही न बनाते रहे, वरन् श्रद्धा का प्रमाण परिचय देने वाला भाव भरा अनुदान भी प्रस्तुत करें। बीस पैसे वाले ज्ञानघट पुरुषों के और एक मुट्ठी अनाज वाले धर्मघट महिलाओं के द्वारा चलें, तो प्रज्ञा संस्थानों को अगले दिनों जो कतिपय नये उपकरण खरीदने तथा नये कार्यक्रम चलाने होंगे, उनके लिए समयानुसार पैसा मिलता रहेगा। इस न्यूनतम अनिवार्य अंशदान के अतिरिक्त उदार मना परिजनों से कुछ अधिक खर्च करने की बात भी गले उतारनी चाहिए। ताकि स्वाध्याय मंडल, प्रज्ञा संस्थान साहित्य पढ़ाने के प्रथम चरण तक ही न सीमित रहे। वर्ण माला और गिनती पहाड़ा ही न रटता रहे। अन्ततः इन छोटे संगठनों को विकसित होना है। हर सदस्य को एक से पाँच की विकास विस्तार प्रक्रिया को कार्यान्वित करना है। नवजात शिशु तो खिलौनों से खेलता और गोदी में चढ़ता रहता है, पर समय बीतने पर वह किशोर और प्रौढ़ भी तो बनता है। तदनुसार उसकी गतिविधियाँ भी भारी भरकम बनती चली जाती है।
   
स्वाध्याय मंडल प्रज्ञा संस्थान की समर्थता पाँच साथियों का सहयोग प्राप्त करने और तीस का कार्यक्षेत्र बनाने की विधि व्यवस्था पर अवलम्बित माना गया है। किसी भी प्रतिभाशाली के लिए इतने संगठन और योजना चला सकना कठिन नहीं पड़ना चाहिए। इतने पर भी यह हो सकता है कि कोई नितान्त व्यस्त, संकोची, रुग्ण, अविकसित, असमर्थ एवं महिलाओं की तरह प्रतिबंधित होने की स्थिति में संगठन क्रम न चला सके। उन्हें भी मन मसोस कर बैठने की आवश्यकता नहीं है। उनके लिए एकाकी प्रयत्न से चल सकने वाली प्रज्ञा केन्द्र व्यवस्था का प्रावधान रखा गया है। इसमें संगठित प्रयत्न के बिना भी एकाकी प्रयास से काम चल सकता है। ऐसे लोग बीस पैसे के स्थान पर अपनी तथा कुटुम्बियों की ओर से चालीस पैसा प्रतिदिन की व्यवस्था करे। और उतने भर से हर महीने प्रकाशित होने वाली तीस फोल्डर पुस्तिकाएँ मँगाये और परिवार पड़ोस के बारह व्यक्तियों को उन्हें पढ़ाते सुनाते रहें। इस प्रकार भी प्रज्ञापीठ संस्थान वाली प्रक्रिया का एकाकी स्तर पर निर्वाह हो जाता है। इस आधार पर घरेलू प्रज्ञा पुस्तकालय बनता और बढ़ता रह सकता है।
   
स्मरण रहे प्रज्ञा संस्थानों और प्रज्ञा केन्द्र द्वारा पढ़ाने के लिए खरीदा गया साहित्य उन्हीं की पूँजी के रूप में उन्हीं के पास रहता है। कोई चाहे तो लागत से थोड़े कम मूल्य में किसी भी दिन कहीं भी बेच भी सकता है। अस्तु यह दान नहीं सम्पदा संचय है। ऐसी सम्पदा जिसे सोने चाँदी की तुलना में कहीं अधिक श्रेयस्कर एवं सत्परिणाम उत्पन्न करने वाली कहा जा सकता है। हर विचारशील को अपने निजी परिवार को सुसंस्कारी बनाने के लिए इस संचय को करना ही चाहिए।
   
प्रज्ञा केन्द्र, प्रज्ञा संस्थान, प्रज्ञापीठ के गठन का कोई भी स्वरूप क्यों न हो, उसे चलाने वाले अनायास ही विचारशीलों के सम्पर्क में आते हैं, उनके साथ घनिष्ठता स्थापित करते, सहानुभूति अर्पित करते और मित्रता करते हैं। यह उपलब्धि आरंभ में तो कम महत्त्व की दीखती है, पर जब आने वाले समय में उन मित्रों के सहयोग से विपत्ति निवारण और प्रगति लाभ के सुयोग बनते है तब प्रतीत होता है कि इस सेवा साधना में जो श्रम समय एवं पैसा लगा, वह अनेक गुना होकर वापिस लौटने लगा। विचारशीलों की सद्भावना एवं घनिष्ठता उपलब्ध करने वाले प्रकारान्तर से सुखद वर्तमान एवं उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करते और अनुदान का प्रतिदान हाथों हाथ प्राप्त करते हैं।

.....समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 भक्तिगाथा (भाग ८२)

👉 भक्ति के अपूर्व सोपान हैं-श्रवण और कीर्तन

देवर्षि भी बिना क्षण गवाएँ कहने लगे- ‘‘आज मेरी स्मृतियों में जिस भक्त का बिम्ब उभरा है, उनकी कहीं कोई चर्चा नहीं है। न शास्त्रों ने उनके बारे में कुछ कहा है और न ही कोई पुराणकथाएँ उनकी कोई बात करती हैं। विशेषताओं के किन्हीं विशेषणों से उनका कोई भी वास्ता नहीं है। बस उनकी विशेषता अगर कहीं थी तो वह उनके हृदय में थी। मैं यहाँ जिन भक्त की चर्चा कर रहा हूँ, वह एक सामान्य से गांव में सामान्य से कृषक थे। उन दिनों उनके परिवार में अनगिन परेशानियाँ थीं। वह स्वयं भी बिस्तर पर बीमार लेटे थे। राह चलते मेरी दृष्टि उन पर और उनके परिवार पर गयी। मैंने सहज स्वभाववश उनके द्वार पर पहुँच कर नारायण नाम का नामोच्चार किया। मेरी वाणी को सुनकर उनकी पत्नी द्वार पर आयी। उसके मुख पर दुर्भाग्य की कालिमा के साथ पीड़ा की कड़वाहट घुली थी।

मेरी ओर उसने विचित्र दृष्टि से देखा। उसकी इस दृष्टि में कई सकारात्मक-नकारात्मक भाव एक साथ घुले थे। पर मैंने इस सबकी परवाह किए बिना उससे कहा- देवी! मैं तुम्हारे पति से मिलता चाहता हूँ। वह बिना कुछ बोले द्वार से एक तरफ हट गयी। मैं भीतर गया। उसका पति आंगन में लेटा था। दीर्घकालीन बीमारी ने उसे असमय बूढ़ा कर दिया था। उसने एक क्षीण-सी दृष्टि मेरी ओर डाली। पीड़ा से उसकी आँखें तो छलकीं पर कण्ठ से एक भी शब्द न निकला। मैंने ही उससे पूछा- भद्र! मैं तो बस तुम्हें नारायण का नाम सुनाने आया हूँ। अगर हो सके तो इस नाम का सतत उच्चार करो। ऐसा करके मैं वहाँ से चल दिया। पर उस व्यक्ति ने न जाने किन शुभ संस्कारोंवश मेरी बात मान ली। इस घटना को गुजरे कई साल गुजर गए। एक बार पुनः मेरा उधर से जाना हुआ। संयोगवश या भगवत्कृपावश, मैं पुनः उसके द्वार पर पहुँचा। उसके द्वार पर कुछ उत्सव जैसा था। कई लोग एकत्रित होकर भगवन्नाम संकीर्तन कर रहे थे। पूछने पर पता चला कि यहाँ पर प्रत्येक एकादशी को ऐसा होता है और आज एकादशी जो है।

तब की और उस दिन की परिस्थितियों में भारी अन्तर था। वह किसान और उसकी पत्नी मुझे घर के अन्दर ले गये। उन्होंने मुझे बिठाकर जलपान कराया। और अपने आपबीती सुनाने लगे और बोले- जब पिछली बार आपने मुझे नारायण नाम का स्मरण करने के लिए था तो मैंने पता नहीं किन संस्कारोंवश आपकी बात मान ली। जब तक मुझे होश रहता मैं भावभरे मन से प्रभुनाम लेता रहता। इस नामरटन ने मेरे देह-मन एवं प्राणों का शोधन शुरू कर दिया। बीमारी पता नहीं कहाँ गयी। पत्नी के स्वभाव में भी परिवर्तन आ गया। स्वस्थ होने पर मैं काम-काज करने लगा, तो घर की स्थिति भी बदल गयी। फिर तो मैंने नारायण नाम का नुस्खा औरों को भी देना प्रारम्भ कर दिया। इस तरह कीर्तन की शुरूआत हो गयी।

इस श्रवण एवं कीर्तन भक्ति ने मेरे साथ न जाने कितनों के जीवन बदल दिए। यह ऐसा सच है कि जिसे मेरे साथ बहुतों से अनुभव किया। और अब तो बस मेरा जीवन श्रवण एवं कीर्तन भक्ति का पर्याय बन गया। घर-परिवार में रहकर भगवान की भक्ति का इससे अच्छा उपाय भला और क्या है? इससे सब कुछ स्वतः मिल जाता है, घर-परिवार का सुख एवं मन की शान्ति। भगवत्कृपा से जीवन के दुःख कब सुखों में बदल जाते हैं पता ही नहीं चलता।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १५३

शनिवार, 30 अक्टूबर 2021

👉 स्वाध्याय मंडल, प्रज्ञा संस्थान और प्रज्ञा केन्द्र (भाग ३)

अपने समय में विचार क्षेत्र की भ्रान्तियाँ और विकृतियाँ ही लोक चिन्तन को भ्रष्ट और आचरण प्रचलन को दुष्ट बनाने के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं। अन्यथा विज्ञान शिक्षा और उद्योग क्षेत्र की वर्तमान प्रगति के रहते मनुष्य हर दृष्टि से सुखी सम्पन्न रह सकता था। आस्था संकट ही अपने समय का सबसे बड़ा विग्रह है। उसी ने व्यक्ति और समाज के सम्मुख अगणित समस्याएँ, विपत्तियाँ और विभीषिकाएँ खड़ी की हैं। समाधान के लिए प्रचलित सुधार इसी से सफल नहीं हो पाते कि भावनाओं, मान्यताओं, विचारणाओं, आकांक्षाओं में सुधार परिष्कार का प्रयत्न नहीं हुआ। मात्र अनाचारों के दमन, सुधार की बात सोची जाती रही। सड़ी कीचड़ यथा स्थान बनी रहे तो मक्खी मच्छर पकड़ने, मारने, पीटने से क्या काम बने? रक्त में विषाक्तता भरी रहे तो फुन्सियों पर मरहम लगाने भर से क्या बात बने? एक सुधार पूरा होने से पूर्व ही सौ नये बिगाड़ उठे तो चिरस्थायी सुधार की संभावना नहीं रहेगी।
   
अपने समय की समस्त समस्याओं का एक ही हल है विचारक्रान्ति अभियान, लोक मानस का परिष्कार। इसके लिए स्वाध्याय और सत्संग की ढाल तलवार का प्रयोग करना होगा। युगान्तरीय चेतना का प्रतिनिधित्व प्रज्ञा साहित्य करता है। उसे पढ़ने- पढ़ाने की प्रक्रिया यदि द्रुतगामी बनाई जा सके, तो अब तक चल रही प्रगति में तूफानी उभार आ सकता है। नगण्य से साधनों पर पिछले दिनों २४ लाख व्यक्तियों का प्राणवान देव परिवार खड़ा किया जा सका है, तो कोई कारण नहीं कि उसी कार्य को व्यवस्थित प्रज्ञा संस्थान संभाल ले तो देखते- देखते जन जागरण की प्रक्रिया को सैकड़ों गुनी अधिक प्रचंड बनाया जा सकेगा। देखने में यह छोटा सा उपचार कितना महत्त्वपूर्ण है, उसका संदर्भ घने अंधकार से निपटने में छोटे से दीपक की भूमिका से समझा समझाया जा सकता है।
   
स्वाध्याय मंडल प्रज्ञा संस्थानों को भी बड़े प्रज्ञापीठों के लिए निर्धारित कार्य पद्धति अपनानी होगी। जन जागरण के लिए जन सम्पर्क, जन सम्पर्क से जन समर्थन और सहयोग मिलने, उस आधार पर युग परिवर्तन का ढाँचा खड़ा होने का सरंजाम जुटने की बात बार- बार कही जाती रही है। इस प्रयोजन के लिए प्रज्ञा साहित्य का पठन- पाठन और दीवारों पर आदर्श वाक्य लेखन की प्रक्रिया को स्वाध्याय कहा जा सकता है। प्रज्ञापीठों की पंच सूत्री योजना में सत्संग को व्यापक बनाने के लिए स्लाइड प्रोजेक्टर, टेपरिकार्डर, प्रदर्शनी और जन्म दिवसोत्सवों को प्रमुखता दी गई है। इनके माध्यम से एक व्यक्ति भी सैकड़ों को हर दिन युग चेतना से अवगत अनुप्राणित करते रहने की प्रक्रिया नियमित रूप से चलाता रह सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 भक्तिगाथा (भाग ८१)

👉 भक्ति के अपूर्व सोपान हैं- श्रवण और कीर्तन

इस भक्तिसूत्र ने सभी के भावसूत्रों को स्वयं में गूंथ लिया। सच यही है कि यदि भगवान की कथा को ठीक-ठीक सुना गया, हृदय के पट खोलकर सुना गया, केवल कानों से नहीं प्राणों से सुना गया तो निश्चित ही भगवान के गुणों को सुनते-सुनते, अन्तःकरण में उनके स्मरण का सातत्य बनने लगेगा। जो सुना जाता है, वही बोध बन जाता है और हृदय से सुना हुआ धीरे-धीरे जीवन में रमता जाता है। जो गहराइयों में सुना जाता है, वह रोएँ-रोएँ में व्याप्त हो जाता है। सतत सुना हुआ धीरे-धीरे घेर लेता है और फिर समूचा जीवन उसमें डूब जाता है।

श्रवण की जितनी महिमा है, उतनी ही कीर्तन की भी है। श्रवण के साथ कीर्तन भी जरूरी है। श्रवण एवं कीर्तन दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। सुनना निष्क्रिय है तो कीर्तन सक्रिय है। निष्क्रियता में सुनें तो सक्रियता में अभिव्यक्त करें। व्यर्थ की चर्चा, व्यर्थ की बातों से भला क्या होगा। बातें हों, चर्चा हो तो अपने प्रिय प्रभु के सौन्दर्य की। चर्चा हो तो उनके विराट् अस्तित्त्व की। ऐसी चर्चा होती है तो कहने वाले को, सुनने वाले को, दोनो को ही भगवान का बरबस स्मरण हो आता है। यह स्मरण होता रहे तो धीरे-धीरे भगवान और भक्त कब एकात्म-एकाकार हो जाते हैं पता ही नहीं चलता।

देवर्षि के इस सूत्र के साथ अनेकों की भावनाओं के ये अनगिन धागे भी गुंथते चले गए। भावों में भक्ति का उफान उठा और उफनता ही चला गया। देवर्षि अपने साथ बैठे अन्य ऋषियों के साथ इसे अनुभव करते रहे। तभी उनके स्मृतिसरोवर में एक तरंग उठी। इस तरंग का बिम्ब उनके माथे की लकीरों में भी प्रकट हुआ। ये लकीरें किंचित गहरी हुईं। इस सूक्ष्म परिवर्तन को ऋषि धौम्य ने अनुभव किया और वे बोल उठे- ‘‘देवर्षि नारद निरन्तर भगवन्नाम का संकीर्तन करते रहते हैं। उन्हें सहज ही भगवान और उनके भक्तों का सहज सान्निध्य मिलता रहता है। इस सान्निध्य की स्मृतियाँ भी अनेकों होंगी। ऐसी ही किसी स्मृतिकथा का श्रवण कराकर देवर्षि हम सबको धन्य करें।’’ ऋषि धौम्य का यह विचार सभी को प्रीतिकर लगा। इसीलिए सभी ने उत्साहपूर्वक उसका अनुमोदन किया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १५२

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2021

👉 स्वाध्याय मंडल, प्रज्ञा संस्थान और प्रज्ञा केन्द्र (भाग २)

प्रमुख कार्यक्रम प्रज्ञा साहित्य का सम्पर्क क्षेत्र के लोगों को नियमित स्वाध्याय कराना है। संगठन का नामकरण इसी प्रमुख कार्यक्रम के आधार पर किया गया है। आयुर्वेद में औषधियों के नामकरण उनमें पड़ने वाले द्रव्यों में से जो प्रमुख होता है, उसके आधार पर किया जाता है। द्राक्षासव, अमृतारिष्ट, लवंगादिवटी, सितोपलादि चूर्ण, हींग आदि में पहले जिस प्रकार प्रमुख द्रव्य की चर्चा है, उसी प्रकार विचार क्रान्ति के लिए स्वाध्याय को सीधी और गहरा प्रभाव छोड़ने वाली प्रक्रिया माना गया है और इन संगठनों को इसी कार्यक्रम को सर्व प्रधान मानने के लिए कहा गया है।
   
संचालक मंडली के पाँच सदस्यों में से प्रत्येक को अपने परिवार सम्पर्क के पाँच- पाँच ऐसे व्यक्ति ढूँढ़ने चाहिए, जिनकी स्वाध्याय में विचारशीलता में रुचि है अथवा पैदा की जा सके। इस प्रकार पाँच सदस्यों की पाँच- पाँच की मंडली से तीस सदस्य हो जाते हैं। तीस फूलों का यह हार यदि युग देवता के गले में पड़ सके, तो अपनी गरिमा और देवता की शोभा बढ़ाने में पूरी तरह सफल हो सकता है। पाँचों संचालक अपनी- अपनी क्यारियों को ठीक तरह सँभालें संजोये। उन तक नियमित रूप से घर बैठे बिना मूल्य प्रज्ञा साहित्य पहुँचाने और वापिस लेने के व्रत निर्वाह का प्रथम चरण इतने भर से पूरा हो जाता है।
   
सर्व विदित है कि कार्लमार्क्स के विचारों ने एक शताब्दी के भीतर प्रायः आधी दुनियाँ को अपने विचारों में समेट लिया। रूसो के प्रतिपादन से प्रजातंत्र की जड़ जमी। ईसाई पादरियों ने विश्व के कोने- कोने में अपने धर्म की विशेषता समझाई। प्रायः दो तिहाई मनुष्य जाति को कुछ ही शताब्दियों के अन्दर ईसाई धर्मावलम्बी बना लिया। अमेरिका में से दास प्रथा समाप्त करने का बहुत कुछ श्रेय हैरियट स्टो को जाता है। बुद्ध और गाँधी ने अपने- अपने समय के विचारक्रान्ति प्रतिपादनों को जन- जन को परिचित करा सकने के कारण ही सफल बनाया था। इतिहास साक्षी है कि बन्दूक की तुलना में प्राणवान विचारों की सामर्थ्य कही अधिक समर्थ सिद्ध हुई है। जब सभी लोग बिना पढ़े थे, तब नारद की तरह वाणी ही प्रमुख सामर्थ्य थी, पर जब से शिक्षा का, प्रेस का साहित्य का विस्तार हुआ है तब से वाणी की तुलना में अधिक स्थायी, अधिक गंभीर, अधिक प्रभावी विचार देने में लेखनी की, साहित्य की शक्ति ही विश्व की सबसे बड़ी सामर्थ्य बन कर उभरी है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 भक्तिगाथा (भाग ८०)

👉 भक्ति के अपूर्व सोपान हैं-श्रवण और कीर्तन

कुन्ती की कथा सभी के दिलों को छू गयी। हिमालय के श्वेत शिखरों की छांव में बैठे ऋषियों, सिद्धों, सन्तों, ज्ञानियों एवं भक्तों के समुदाय की भावनाएँ भीग गयीं। वे सोचने लगे कि एकान्त में, वन में, पर्वतों की गुफाओं-कन्दराओं में रहकर भगवान के नाम का जाप करना सहज है परन्तु लोक में, संसार में, समाज के बीच रहकर भगवान का सतत स्मरण करते रहना कठिन है। घर-परिवार के कर्त्तव्यों एवं दायित्वों के बीच, पीड़ा और परेशानियों के बीच, दारूण शोक-सन्ताप से घिरे रहकर, भगवान का गुणानुवाद करना सहज नहीं है। जो अपमान, तिरस्कार के दंश को, जिन्दगी की हर विपदा को अपने प्यारे प्रभु का उपहार मानते हैं, उनसे श्रेष्ठ भक्त भला और कौन होगा? जो जीवन के कष्टों में भावविह्वल मन से भगवान का कीर्तन करते हैं, वही भगवान के सच्चे भक्त हैं क्योंकि वे जानते हैं कि भगवान अपने प्रिय भक्तों के हैं और भक्त अपने प्यारे भगवान के।

भक्त तो वह है जो जानता है कि भगवत्कृपा ही भगवद्विधान है। वह यह भी जानता है कि भगवान का विधान ही उनकी कृपा है, फिर शिकायत कैसी और किससे? वह जीता है इस अनुभूति में- कि चलते जाना है और शिकायत नहीं करनी है। चलते जाना है और अहोभाव से भरे रहना है। चलते जाना है और धन्यवाद देते जाना है। ओठ पर गीत रहे धन्यवाद का और पैर कभी रुके ही न। ऐसा हो सके तो भक्ति। कुन्ती की कथा में सभी को इस भक्ति का स्वाद लगा। दिल भींगे और आँखें छलकीं, गले रूंधे और वाणी मौन हुई। बस मन में विचारों के आरोह-अवरोह के स्वर उठते रहे। भावों में भक्तिकथा के कण बिखरते रहे। इसमें कब कितना समय बीता किसी को पता ही न चला। यह तो जैसे भावसमाधि की दशा थी जिसमें भक्ति-भक्त एवं भगवान मिल रहे थे। सप्तर्षियों सहित देवों-गन्धर्वोंे व सिद्धों का समूह विभोर होता रहा। देवर्षि नारद को भी जैसे अपनी सुधि न रही।

पर महर्षि वशिष्ठ का अन्तर्मन जैसे कथासूत्र को थामे था। वे इसमें आगे की और कई कड़ियाँ पिरोना चाहते थे। उन्होंने बड़ी सहजता से भावभरे नेत्रों से नारद को देखा। ब्रह्मापुत्र नारद, वशिष्ठ के नेत्रों का संकेत समझ गए। उन्होंने नजर उठाकर सभी की ओर देखा। सभी के मुख पर उत्सुकता की आभा थी, जिज्ञासा का प्रकाश था। वे सुनना चाहते थे देवर्षि की देववाणी को। सब के अन्तस के सकारात्मक संवेदनों ने नारद को भी पुलकित किया और उन्होंने भक्तिसूत्र के नवीन सत्य का उच्चार किया-
‘लोकेऽपि भगवद्गुणश्रवणकीर्तनात्’॥ ३७॥
लोक समाज में भी भगवद्गुण ‘श्रवण’ और ‘कीर्तन’ से (भक्ति साधन) सम्पन्न होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १५१

सोमवार, 25 अक्टूबर 2021

👉 स्वाध्याय मंडल, प्रज्ञा संस्थान और प्रज्ञा केन्द्र (भाग १)

भव्य भवन थोड़े से या झोंपड़े बहुत से, इन दोनों में से एक का चयन जन कल्याण की दृष्टि से करना है, तो बहुलता वाली बात को प्रधानता देनी पड़ेगी। राम के पीछे वानर, कृष्ण के पीछे ग्वाल-बाल, शिव के भूत- पलीत वाले चयन का उद्देश्य समझने पर तथ्य स्पष्ट होता है कि बहुजन सुखाय बहुजन हिताय की नीति ही वरिष्ठ है। विद्वानों को निष्णात बनाने में भी हर्ज नहीं, पर निरक्षरों को साक्षर बनाना ही लोक हित की दृष्टि से प्रमुखता पाने योग्य ठहरता है।

विशालकाय गायत्री शक्तिपीठों और बड़े प्रज्ञा पीठों को अब क्षेत्रीय गतिविधियों का मध्य केन्द्र बना कर चला जायेगा। वे अपने- अपने मंडलों के केन्द्रीय कार्यालय रहेंगे। हर गाँव मुहल्ले में सृजन और सुधार व्यवस्था के लिए बिना इमारत के स्वाध्याय मंडल, प्रज्ञा संस्थान ही प्रमुख भूमिका सम्पन्न करेंगे। विशालकाय समारोहों की व्यवस्था दूर- दूर से जन समुदाय एकत्रित करके उत्साह उत्पन्न करने की दृष्टि से आवश्यक है, पर जब जन- जन से सम्पर्क साधने और घर- घर का द्वार खटखटाने की आवश्यकता पड़े तो निजी परिवार जैसे छोटे विचार परिवार ही काम देते हैं। इस प्रयोजन की पूर्ति स्वाध्याय मंडल ही कर सकते हैं।
   
एक अध्यापक प्रायः तीस छात्रों तक को पढ़ाने में समर्थ हो पाता है। स्वाध्याय मंडली को एक अध्यापक माना गया है और संस्थापक को चार अन्य भागीदारों की सहायता से एक छोटे विचार परिवार का गठन करके युगान्तरीय चेतना से उस समुदाय को अवगत अनुप्राणित करने के लिए कहा गया है। यही है स्वाध्याय मंडलों का संगठन।

प्रज्ञा परिजनों में से जिनमें भी प्रतिभा, कर्मठता, साहसिकता हो उसे इसी स्वाध्याय संगठनों में तत्काल नियोजित करना चाहिए। इसमें उनकी सृजन शक्ति को प्रकट प्रखर होने का अवसर मिलेगा। बड़े संगठनों में आये दिन खींचतान और दोषारोपण के झंझट चलते हैं। निजी सम्पर्क और निजी प्रयत्न से एक प्रकार का निजी विचार परिवार बना लेने में किसी प्रकार के विग्रह की आशंका नहीं है। हर दम्पत्ति अपना नया परिवार बनाता और नया वंश चलाता है। प्रज्ञा परिजनों में से जो भी मानसिक बौनेपन से बढ़कर प्रौढ़ता परिपक्वता की स्थिति तक पहुँच चुके हैं, उन्हें अपने निजी पुरुषार्थ का विशिष्ट परिचय देना चाहिए। हर प्रौढ़ होने पर अपना एक नया घोंसला बनाता है।
   
स्वाध्याय मंडल के संस्थापन संचालन की प्रक्रिया बहुत ही सरल है। इस सृजन के लिए जिसकी भी श्रद्धा उमगे, उसे अपने प्रभाव क्षेत्र के और अपने जैसी प्रकृति के चार साथी ढूँढ़ निकालने चाहिए। पाँच की संचालक मंडली गठित करनी चाहिए। इन पाँच पाण्डवों में से प्रत्येक को बीस- बीस पैसा नित्य अंशदान और न्यूनतम एक घंटा समयदान करते रहने के लिए सहमत करना चाहिए इतनी भर पूँजी जुटाने पर स्वाध्याय मंडल की निर्धारित गतिविधियाँ निर्बाध रूप से चल पड़ेंगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 भक्तिगाथा (भाग ७९)

प्रभु के भजन का, स्मरण का क्रम अखण्ड बना रहे

अखण्ड भजन का यह सूत्र विलक्षण था क्योंकि भजन अखण्ड हो सके यह व्यवस्था जरा कठिन है। क्योंकि कोई कितना भी तप करे, कितना भी जप करे, कितनी देर भी ध्यान लगाए परन्तु कभी न कभी, कहीं न कहीं तो विराम लेगा ही। एक पल के लिए ही सही, रुकाव-ठहराव तो आएगा ही। यह ठहराव न आए, भजन की भक्तिधारा अविराम प्रवाहित रहे यह तो तभी सम्भव है, जब भक्त मिट जाए और रहे केवल भगवान ही। यह तभी सम्भव है, जब भगवान का स्मरण, भक्त के अन्य कृत्यों में से एक कृत्य न हो, नहीं तो व्याघात पड़ेगा ही। क्योंकि जब कभी भक्त अन्य कृत्यों में उलझेगा तो परमात्मा भूल जाएगा। देवस्थान पर जाओ तो भगवान की याद, कृषि कर्म में लगो तो भगवान की याद, नहीं तो फिर अखण्ड न रह सकेगा- भगवान का स्मरण। स्मरण तो ऐसा हो कि देव मन्दिर में रहें या फिर कृषि कर्म में, मित्र से मिलें या फिर शत्रु से, परमात्मा की याद में कोई फर्क न पड़े। उनकी याद सदा ही घेरे रहे। उनकी याद ही चारों तरफ का एक माहौल बन जाय। श्वास-श्वास में समा जाए। क्योंकि परमात्मा की याद विविध स्मृतियों में से एक स्मृति नहीं है, यह तो महास्मृति है।

देवर्षि का सूत्र सुनकर ऋषि धौम्य के अन्तःसरोवर में भाव-चिन्तन की ये उर्मियाँ उमगती रहीं। वे काफी समय तक स्वयं में खोए रहे। तभी हिमपक्षी के स्वरों ने उनकी स्मृति को कुरेदा और उनके स्मृतिपटल पर महारानी कुन्ती का भावप्रवण मुख दमक उठा। हालांकि उन्होंने कहा कुछ भी नहीं। बस मौन भाव से अपनी स्मृतियों मे मन को भक्तिसूत्र में पिरोते रहे। ऋषि धौम्य की इस भावदशा ने देवर्षि सहित अनेकों ऋषियों के मर्म को छुआ। इस छुअन ने उनके मनों में एक भक्तिपूर्ण सिहरन पैदा की और उनमें से एक महर्षि पुलह कह उठे- ‘‘महर्षि अपनी स्मृति कथा से हम सबको भी अनुगृहीत करें।’’

उत्तर में धौम्य मुस्कराए और कह उठे- ‘‘हमें तो बस महारानी कुन्ती का स्मरण हो आया। पाण्डवों की माता कुन्ती, महाराज पाण्डु की धर्मपरायणा पत्नी कुन्ती, श्रीकृष्ण की बुआ कुन्ती, और सर्वेश्वर लीलापुरुषोत्तम श्रीकृष्ण की परमभक्त कुन्ती। कुन्ती के कितने ही रूप मैंने अनेक अवसरों पर देखे हैं परन्तु कभी भी मैंने उनके अन्तःसरोवर को भक्ति से रिक्त नहीं देखा। हमेशा ही विपद में, सम्पद में, उनका अन्तःसरोवर भावों से, भक्ति से उफनता-उमगता ही रहा है। इस समय मुझे जिस घटना का स्मरण हो रहा है, वह महाभारत युद्ध के पश्चात् की है। महाभारत का महासमर समाप्त हो चुका था। गंगापुत्र भीष्म, धर्मराज युधिष्ठिर को तत्त्वोपदेश देने के पश्चात्, राजधर्म-नीतिज्ञान की शिक्षा देने के पश्चात, महाप्रयाण कर चुके थे। महर्षि वेदव्यास सहित अन्य ऋषियों ने युधिष्ठिर को सम्राट के पद पर अभिषिक्त कर दिया था।

यह सम्राट युधिष्ठिर का द्वितीय अभिषेक था। पहले वह राजसूय यज्ञ करने के बाद इन्द्रप्रस्थ नगरी में सम्राट पद ग्रहण कर चुके थे। उस समय चारों ओर खुशियाँ ही खुशियाँ थीं। ऋषियों, भक्तों एवं ज्ञानियों, तपस्वियों का महासमुदाय भी आ जुटा था। उल्लास जैसे सब ओर बिखरा पड़ रहा था। इस महोल्लास के बीच धर्मराज युधिष्ठिर, महारानी द्रौपदी के साथ राजसिंहासन पर आसीन हुए थे। अवसर आज भी कुछ वैसा ही था, फिर से महाराज युधिष्ठिर एवं महारानी द्रौपदी राजसिंहासन पर आसीन थे। बन्दीजन सम्राट का जयघोष कर रहे थे। महावीरों, महाज्ञानियों, महातपस्वियों से सुदा सुशोभित रहने वाली हस्तिनापुर की राजसभा में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने राजामाता कुन्ती से पूछा- बुआ! अब तुम्हारे पुत्र विजेता हैं। आप राजमाता हैं। ऐसे में आपको और क्या चाहिए?

राजमाता कुन्ती ने श्रीकृष्ण की ओर देखा और मुस्कराई। फिर कुछ क्षण रुककर वह बोली- हे कृष्ण! यदि तुम मुझे देना ही चाहते हो, तो मुझे दुःखों का वरदान दो। श्रीकृष्ण ने पूछा- वह क्यों बुआ, आपने तो सारे जीवन दुःख ही उठाए हैं। दीर्घकाल के बाद ये सुख के क्षण आए हैं, तब ऐसा क्यों कह रही हैं? इसके उत्तर में कुन्ती बोलीं- वह इसलिए क्योंकि दुःखों में तुम्हारे भजन का क्रम अखण्ड बना रहता है। परिस्थितियों में भले ही दुःखों की काली छाया बनी रहे, परन्तु मनःस्थिति में भक्ति का उजाला निरन्तर बना रहता है। कुन्ती के इस कथन पर श्रीकृष्ण मौन रहे। परन्तु कुन्ती ने आगे बढ़ कर युधिष्ठिर से कहा- पुत्र! तुम अपने राजधर्म का पालन करो और ज्येष्ठश्री धृतराष्ट्र, जेठानीजी गान्धारी एवं देवर विदुर के साथ मैं वन को प्रस्थान करूँगी। कुन्ती के इस कथन में जो दृढ़ता थी, उसे सभी ने अनुभव किया। उन्होंने जो कहा, वही किया भी। उन्होंने धृतराष्ट्र, गान्धारी और विदुर के साथ वन को प्रस्थान किया। प्रस्थान करते समय उन्होंने बस एक नजर श्रीकृष्ण को निहारा और बोली, हे कृष्ण तुम्हारा भजन निरन्तर बना रहे, यही वर देना। उत्तर में परमात्मा श्रीकृष्ण ने अपनी प्रिय भक्त कुन्ती की ओर बस आँसू भरी आँखों से देखा।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १४८

शनिवार, 23 अक्टूबर 2021

👉 विशेष अनुदान विशेष दायित्व

भगवान् ने मनुष्य के साथ कोई पक्षपात नहीं किया है, बल्कि उसे अमानत के रूप में कुछ विभूतियाँ दी हैं। जिसको सोचना, विचारणा, बोलना, भावनाएँ, सिद्धियाँ-विभूतियाँ कहते हैं। ये सब अमानतें हैं। ये अमानतें मनुष्यों को इसलिए नहीं दी गई हैं कि उनके द्वारा वह सुख-सुविधाएँ कमाये और स्वयं के लिए अपनी ऐय्याशी या विलासिता के साधन इकट्ठे करे और अपना अहंकार पूरा करे। ये सारी की सारी चीजें सिर्फ इसलिए उसको दी गयी हैं कि इन चीजों के माध्यम से वो जो भगवान् का इतना बड़ा विश्व पड़ा हुआ है, उसकी दिक्कतें और कठिनाइयों का समाधान करे और उसे अधिक सुन्दर और सुव्यवस्थित बनाने के लिए प्रयत्न करे।
    
बैंक के खजांची के पास धन रखा रहता है और इसलिए रखा रहता है कि सरकारी प्रयोजनों के लिए इस पैसे को खर्च करे। उसको उतना ही इस्तेमाल करने का हक है, जितना कि उसको वेतन मिलता है। खजाने में अगर लाखों रुपये रखे हों, तो खजांची उन्हें कैसे खर्च कर सकता है? पुलिस और फौज का कमाण्डर है, उसको अपना वेतन लेकर जितनी सुविधाएँ मिली हैं, उसी से काम चलाना चाहिए और बाकी जो उसके पास बहुत सारी सामर्थ्य और शक्ति बंदूक चलाने के लिए मिली है, उसको सिर्फ उसी काम में खर्च करना चाहिए, जिस काम के लिए सरकार ने उसको सौंपा है।
    
हमारी सरकार भगवान् है और मनुष्य के पास जो कुछ भी विभूतियाँ, अक्ल और विशेषताएँ हैं, वे अपनी व्यक्तिगत ऐय्याशी और व्यक्तिगत सुविधा और व्यक्तिगत शौक-मौज के लिए नहीं हैं और व्यक्तिगत अहंकार की तृप्ति के लिए नहीं है। इसलिए जो कुछ भी उसको विशेषता दी गई है। उसको उतना बड़ा जिम्मेदार आदमी समझा जाए और जिम्मेदारी उस रूप में निभाए कि सारे के सारे विश्व को सुंदर बनाने में, सुव्यवस्थित बनाने में, समुन्नत बनाने में उसका महान् योगदान संभव हो।
    
भगवान् का बस एक ही उद्देश्य है- निःस्वार्थ प्रेम। इसके आधार पर भगवान् ने मनुष्य को इतना ज्यादा प्यार किया। मनुष्य को उस तरह का मस्तिष्क दिया है, जितना कीमती कम्प्यूटर दुनिया में आज तक नहीं बना। करोड़ों रुपये की कीमत का है, मानवीय मस्तिष्क। मनुष्य की आँखें, मनुष्य के कान, नाक, आँख, वाणी एक से एक चीज ऐसी हैं, जिनकी रुपयों में कीमत नहीं आँकी जाती है। मनुष्य के सोचने का तरीका इतना बेहतरीन है, जिसके ऊपर सारी दुनिया की दौलत न्योछावर की जा सकती है।
    
ऐसा कीमती मनुष्य और ऐसा समर्थ मनुष्य- जिस भगवान् ने बनाया है, उस भगवान् की जरूर ये आकांक्षा रही है कि मेरी इस दुनिया को समुन्नत और सुखी बनाने में यह प्राणी मेरे सहायक के रूप में, और मेरे कर्मचारी के रूप में, मेरे असिस्टेण्ट के रूप में मेरे राजकुमार के रूप में काम करेगा और मेरी सृष्टि को समुन्नत रखेगा।
    
मानव जीवन की विशेषताओं का और भगवान् के द्वारा विशेष विभूतियाँ मनुष्य को देने का एक और भी उद्देश्य है। जब मनुष्य इस जिम्मेदारी को समझ ले और ये समझ ले कि ‘मैं क्यों पैदा हुआ हूँ, और यदि मैं पैदा हुआ हूँ? तो मुझे अब क्या करना चाहिए?’ यह बात अगर समझ में आ जाए, तो समझना चाहिए कि इस आदमी का नाम मनुष्य है और इसके भीतर मनुष्यता का उदय हुआ और इसके अंदर भगवान् का उदय हो गया और भगवान् की वाणी उदय हो गयी, भगवान् की विचारणाएँ उदय हो गयीं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भक्तिगाथा (भाग ७८)

प्रभु के भजन का, स्मरण का क्रम अखण्ड बना रहे

सदा श्वेत वस्त्र धारण करने वाले गंगापुत्र-देवव्रत-भीष्म की भक्तिगाथा सुनकर हिमालय के श्वेत शिखर भी भावों में भीग गए। ऋषि धौम्य से भीष्म की भावकथा सुनकर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के अन्तःकरण में भावों की तीव्र हिलोर उठी। वह सोचने लगे कि अष्टवसुओं का अपराध बड़ा था या कि उनका शाप? सात वसुओं को तो भगवती गंगा ने अपनी परम पावन जलधारा में प्रवाहित कर मुक्त कर दिया पर आठवें वसु को अपने मोक्ष का पुण्यक्षण पाने के लिए सुदीर्घ यात्रा करनी पड़ी। सहनी पड़ी उन्हें अनगिन यातनाएँ, भावों की मर्मान्तक व्यथाएँ, जीवन भर पल-पल रचे जाने वाले कुचक्रों के कुटिल कंटक उन्हें चुभते रहे। हाँ! इन कंटको के बीच श्रीकृष्ण उन्हें सदा याद रहे। अपने अतीत के पृष्ठ निहारते हुए ब्रह्मर्षि वशिष्ठ को यह स्मरण तो आया कि अपने ही शाप से वह कितने दुःखी हुए थे और तब उन्होंने पीड़ित-विकल मन से सर्वेश्वर परमात्मा को पुकारते हुए प्रार्थना की थी- ‘‘मेरे शाप को भी वरदान बना दो हे करूणासिन्धु!’’ और सचमुच ही प्रभु ने उनकी पुकार सुन ली। उन्होंने वशिष्ठ के शाप को वरदान में बदलते हुए आठवें वसु को महान शूरवीर और अपना परमभक्त बना दिया।

ब्रह्मर्षि वशिष्ठ अपनी इन चिन्तन कड़ियों में खोए हुए थे। सप्तर्षियों में उनके छः सहयोगियों ने उनके मुख की ओर देखा। उन ऋषिश्रेष्ठ की भावदशा उनसे छुपी न रही। वे सोचने लगे कि सचमुच ही ब्रह्मर्षि सच्चे भगवद्भक्त हैं। क्योंकि भक्त ही है जिसके भावपूर्ण अन्तःकरण में द्वेष, वैर और क्रोध आ ही नहीं सकते। असमय और विषमता में आया हुआ उसके मन का क्रोध भी सहज ही करूणा में रूपान्तरित हो जाता है। ऋषि धौम्य ने ब्रह्मर्षि वशिष्ठ सहित सप्तर्षिमण्डल के अन्य सदस्यों के अन्तःकरण में उठ रही भावतंरगों के आरोह-अवरोह को देखा। साथ ही उन्होंने अपने हृदय में एक अनूठी आध्यात्मिक भावदशा को अनुभव किया। कुछ पलों के मौन के बाद उन्होंने ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की ओर देखते हुए कहा- ‘‘ब्रह्मर्षि! गंगापुत्र अपने जीवन के अन्तिम पल तक सदा ही आपके कृतज्ञ रहे। एक अवसर पर तो उन्होंने योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण से भी कहा था- हे लीलामय! आपकी मेरे ऊपर यह अहैतुकी कृपा ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के उस आशीष का सुफल है, जो उन्होंने अतीत में मुझे दिया था।’’

इन स्मृतियों के झरोखों से अतीत अपनी और झलकियाँ दिखा पाता, इसके पहले ही ब्रह्मर्षि वशिष्ठ स्वयं को संयत करते हुए देवर्षि नारद से बोले- ‘‘हे भक्तश्रेष्ठ! हम सभी को आपके नवीन भक्ति सूत्र की प्रतीक्षा है।’’ ऋषि वशिष्ठ के कथन पर देवर्षि ने अपनी मौन सहमति जताई। अन्य सभी ऋषियों, देवों, सिद्धों एवं तपस्वियों ने अपनी सम्मति दी। हिमालय के हिमशिखर भक्तिगंगा के नवीन प्रवाह के साक्षी बनने के लिए उत्सुक थे। देवर्षि ने सभी की इस उत्सुकता को शान्त करते हुए अपने नए सूत्र सत्य का उच्चारण किया-

‘अव्यावृतभजनात्’॥ ३६॥
अखण्ड भजन से (भक्ति का साधन) सम्पन्न होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १४७

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ७७)

भक्तवत्सल भगवान के प्रिय भीष्म

देवर्षि ने उन्हें सत्कारपूर्वक अपने पास बिठाया और इसी के साथ भक्तिसूत्र के अगले सत्य का उच्चारण किया-

‘तत्तु विषयत्यागात् सङ्गत्यागाच्च’॥३५॥
वह (भक्ति-साधन) विषय त्याग और सङ्गत्याग से सम्पन्न होता है।

इस सूत्र को सुनकर न जाने क्यों महर्षि धौम्य की आँखें भींग आयीं। महर्षि की आँखों में अचानक छलक आए इन आँसुओं को सभी ने देखा। सप्तऋषियों सहित सभी देवगण-सिद्धगण महर्षि के इन भावबिन्दुओं को निहारने लगे परन्तु किसी ने कहा कुछ नहीं। थोड़ी देर तक सब ओर मौन पसरा रहा। इसे बेधते हुए ब्रह्मर्षि विश्वामित्र और पुलह लगभग एक साथ कह उठे- ‘‘लगता है इन क्षणों में किन्हीं स्मृतियों ने आपको विकल किया है।’’ ‘हाँ’ कहते हुए ऋषि धौम्य ने अपना सिर उठाया और बोले, ‘‘देवर्षि के सूत्र से मुझे विषय और सङ्ग का सम्पूर्ण रूप से त्याग करने वाले भक्त भीष्म की याद आ गयी।’’ भीष्म का नाम सुनकर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ से भी न रहा गया। आखिर उन्होंने ही तो अष्टवसुओं को श्राप दिया था। इन अष्टवसुओं में से सात को तो जगन्माता श्रीगंगा जी मुक्त कर पायीं परन्तु आठवें वसु ‘धौ’ को शान्तनु के आग्रहवश वह अपने जल प्रवाह में न प्रवाहित कर सकीं।
यही गंगापुत्र देवव्रत थे। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ को भीष्म के अतीत का यह प्रसंग भूला न था। वह भी उन्हें याद कर भावविह्वल हो उठे और कहने लगे, ‘‘निश्चय ही गंगापुत्र महान भक्त थे। सारे जीवन उन्होंने पीड़ाएँ सहीं, घात-प्रतिघात सहे, किन्तु सत्य से कभी न विचलित हुए। इन पीड़ाओं ने ही उनके अन्तःकरण को भक्ति-सरोवर बना दिया था। महर्षि धौम्य आपने तो उनका सान्निध्य-संग पाया है। उन परमभागवत भीष्म की भक्तिगाथा हम सबको अवश्य सुनाएँ।’’ ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के वचनों का सभी ने अनुमोदन किया। गायत्री के महाभर्ग को धारण करने वाले विश्वामित्र और पुलह भी कह उठे, ‘‘अवश्य ऋषि धौम्य! उन महान भक्त की गाथा सुनाकर हम सब को तृप्ति दें।’’ ऋषि धौम्य ने यह सब सुनकर उन सभी की ओर देखा, फिर देवर्षि की तरफ निहारा। उनकी इस दृष्टि को देवर्षि ने अपना अहोभाग्य समझा और कहने लगे, ‘‘गंगापुत्र भीष्म तो सदा ही माता गंगा की भाँति पवित्र हैं। उनके जीवन की भक्तिलहरों से हम सभी अभिसिंचित होना चाहेंगे ऋषिवर!’’

सभी के आग्रह से महर्षि की भावनाएँ शब्द बन कर झरने लगीं। वे कहने लगे, ‘‘गंगापुत्र देवव्रत को उनकी सत्यनिष्ठा ने, उनकी अटल प्रतिज्ञा ने भीष्म बनाया। यूँ तो उनके सुदीर्घ जीवन के अनेको अविस्मरणीय प्रसंग हैं, जिन्हें महर्षि वेदव्यास ने ‘जय’ काव्य में कहा है परन्तु एक प्रसंग सबसे अनूठा है, जिसमें स्वयं भगवान श्रीकृष्ण अपने इस भक्त के वश में हो गए थे। उन दिनों महाभारत का महासमर चल रहा था।’’ ऋषि धौम्य की वाणी अपने स्मृति रस में भीगने लगी। ‘‘दुर्योधन प्रायः ही पितामह को पाण्डवों के वध के लिए उकसाता रहता था। एक दिन उसने कहा-पितामह! आपने तो अपने गुरू भार्गव परशुराम को भी युद्घ में पराजित किया है। आपके सामने मनुष्य तो क्या स्वयं देवगण भी नहीं टिक सकते। तब फिर पाण्डवों की क्या मजाल? कहीं हस्तिनापुर के प्रति आपकी निष्ठा तो नहीं डिग रही। कुटिल शकुनि की चालों में आकर दुर्योधन ने भीष्म के मर्म पर चोट की।

भीष्म व्यथित हो उठे। उन्होंने पाँच बाण अपने तूणीर से अलग करते हुए प्रतिज्ञा की-कल के युद्घ में इन पाँच बाणों से पाण्डवों का वध होगा। यदि ऐसा न हो सका तो?- दुर्योधन की जिह्वा को काल ने कीलित करते हुए नया प्रश्न किया। दुर्योधन के प्रश्न का भीष्म ने उत्तर दिया- तो फिर स्वयं श्रीकृष्ण को शस्त्र उठाना पड़ेगा। दुर्योधन को वचन देने के उपरान्त भीष्म और भी व्यथित हो उठे। वह अपने शिविर में बैठे हुए श्रीकृष्ण को पुकारने लगे- हे जनार्दन! हे माधव!! अपने भक्त की लाज रखो गोविन्द, भक्त की पुकार भगवान ने सुनी। उन लीलापुरुषोत्तम ने अपनी लीला रची। इस प्रतिज्ञा की चर्चा सुनकर महारानी द्रोपदी व्यथित हो उठी। वह उन्हें लेकर भीष्म के शिविर में पहुँची। भीष्म आँख मूँदे श्रीकृष्ण का ध्यान कर रहे थे। द्रोपदी के प्रणाम करने पर उन्होंने आँख मूँदे ही उसे सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दे डाला। इस आशीर्वाद को सुनकर द्रोपदी बिलख उठी और बोली, यह कैसा आशीर्वाद? द्रोपदी की वाणी को सुनकर भीष्म चौंके, उन्होंने आँखें खोलीं और बोले, पुत्री! तुम्हें जो यहाँ तक लाए हैं, वे स्वयं कहाँ हैं? भक्त की विकल पुकार सुनकर योगेश्वर श्रीकृष्ण उनके सम्मुख आए और बोले-पितामह! आप सम्पूर्ण जीवन सांसारिक भोग विषयों से, उनके कुत्सित संग से दूर रहे हैं। दुर्योधन और शकुनि जैसे दुराचारी और कुटिल जनों के बीच भी आपने भक्ति की सच्ची साधना की है। विश्वास रखिए, मेरा मान भले ही भंग हो, मेरे भक्त का मान कभी भंग नहीं हो सकता।

अगले दिन प्रातः जब रणभेरियाँ बजीं, युद्घ का प्रारम्भ हुआ तब महाभक्त और परमशूरवीर भीष्म ने महासंग्राम किया। पाण्डव सेना के पाँव उखड़ने लगे। अर्जुन का रथ भी स्थिर न रह सका। भीष्म के सम्मुख अर्जुन की सारी धनुर्विद्या विफल होने लगी। ऐसे में स्वयं श्रीकृष्ण ने हुंकार भरी और अपनी प्रतिज्ञा भंग करते हुए वह हाथ में चक्र लेकर दौड़ पड़े। सेना में हाहाकार मच गया। भक्त भीष्म अपने भक्तवत्सल भगवान को भक्तिपूर्वक निहारने लगे-
वा धीतपट की कहरान।

कर धरि चक्र चरन की धावनि,नहि विसरति वह बान॥
रथ ते उतरि अवनि आतुर ह्वै, कच रज की लपटान।
मानों सिंह सैल तें निकस्यों, महामत्त गज जान॥
हे प्रभु तुम मेरो पन राख्यो, मेटि वेद की वान।

भीष्म के मन मन्दिर में भगवान की मूर्ति सदा के लिए बस गयी। अर्जुन के आग्रह पर भगवान तो अपने रथ पर वापस लौट गए, परन्तु भीष्म का मन पुनः वापस नहीं लौटा। अन्त क्षण में वे प्रभु का यही रूप निहारते रहे। शरशय्या पर पड़े हुए भीष्म भगवान के इसी रूप का ध्यान करते रहे। जीवन में उन्हें अनगिनत और असहनीय पीड़ाएँ मिलीं पर इन पीड़ाओं से उनकी भक्ति निखरती गयी। भगवान की कृपा वर्षा उन पर और भी सघन होती गयी। अन्तिम क्षणों में भी पितामह भीष्म चक्रधारी के उसी स्वरूप का चिन्तन करते हुए उन्हीं के दिव्य स्वरूप में विलीन हो गए।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १४४

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ७६)

भक्तवत्सल भगवान के प्रिय भीष्म

भक्तिरस में भीगी देवर्षि नारद की वाणी सभी को भगवद्रस में भिगोती गयी। शरद पूर्णिमा के चन्द्रमा की किरणों से भक्ति चन्द्रिका की उजास सभी के अन्तःकरण में उतरती रही। भगवान का ‘रसो वै सः’ स्वरूप उस भक्ति समागम में उपस्थित जनों की अन्तर्चेतना में प्रकट होता गया। चन्द्रदेव अपने अमृतरस के पूर्ण कलश हिमालय के हिमशिखरों पर बिखेरते हुए तारकगणों के साथ विहार करते रहे। हिमवान के आंगन में बैठे भक्तिरस में भीगे हुए ऋषि-महर्षि, सिद्घ देवगण अपनी आध्यात्मिक रात्रिचर्या में लग गए। सदा ही इनके दिवस भगवान का गुणगान करने में, भगवद्भक्तों की कथावार्ता में व्यतीत होते थे। इनकी रात्रियाँ सदा ही भक्ति की भावसमाधि की निमग्नता में डूबी होती थीं। यह लोकोत्तरजनों का समागम था। इसकी विशिष्टताएँ, अलौकिकताएँ तो केवल समाधि में ही जानी जा सकती थीं।

रात्रि के साथ ही भक्ति-समाधि के क्षण भी बीते। गगन में भगवान सूर्यदेव का सात रश्मि अश्वों का रथ हांकते हुए सूर्य सारथी अरुण ने पदार्पण किया। गगन में उनके पहला पग धरते ही निशा का सम्पूर्ण साम्राज्य तिरोहित होने लगा। अरुण आभा से श्वेत हिमशिखर रक्तिम-स्वर्णिम होने लगे। इसी के साथ सभी प्रातकृत्य, सन्ध्यावन्दन, सूर्यार्घ्यदान से निवृत्त हुए। समूचे वातावरण की सूक्ष्मता में गायत्री महामंत्र के चौबीस मन्त्राक्षरों की अनुगूँज फैल गयी। साथ ही महाभर्ग सूर्य का तेजस और भी सघन होता गया। सप्तऋषियों की भक्तिसभा देवर्षि नारद के भक्तिसूत्र में गुँथती गयी, जुड़ती गयी। जुड़ने के इस क्रम में इस भक्ति समागम में एक अन्य महिमामय और पधारे। अरुण देव के पदार्पण के साथ ही हिमवान के आंगन में इनका भी आगमन हो गया था। प्रायः सभी इनकी तपसाधना और भक्तिभावना से परिचित थे।

ये महर्षि धौम्य थे, जो इस धराधाम पर महाभारत काल में विचरण किया करते थे, जिन्होंने पाण्डुपुत्रों को वनवास काल में अनेकों आध्यात्मिक शिक्षाएँ और सहायताएँ दी थीं। महारानी द्रोपदी को अक्षयपात्र इनकी ही सहायता-कृपा से प्राप्त हुआ था। देवर्षि इन्हें परम प्रिय थे। इनके सुखद, भावपूर्ण भक्तिरस में भीगे सान्निध्य का आकर्षण ही सम्भवतः इन्हें यहाँ ले आया था। अन्यथा इनका स्वाभाविक निवास तो इन दिनों तपोलोक में था। यह तपस्वी महर्षियों का दिव्यलोक है। इस उच्चतर प्रकाशलोक में भी हिमवान के आँगन में बह रही भक्तिगंगा की लहरें पहुँचने लगी थीं। तभी तो वहाँ के महर्षि आज यहाँ इस भक्तिसभा में पधारे थे। देवर्षि ने उन्हें सत्कारपूर्वक अपने पास बिठाया और इसी के साथ भक्तिसूत्र के अगले सत्य का उच्चारण किया-

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १४

शनिवार, 16 अक्टूबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ७५)

महारास की रसमयता से प्रकट हुआ है भक्तिशास्त्र

देवर्षि का यह सूत्र सभी को भक्तिकाव्य की मधुर-सम्मोहक पंक्ति की तरह लगा। यह सच सभी अनुभव कर रहे थे कि अन्य शास्त्रों की तो चर्चा होती है, विचार किया जाता है, विमर्श होता है, उनके उपदेश होते हैं, पर भक्ति की तो बात ही अनूठी है। इसमें भला चर्चा और विमर्श क्या? तर्कों के गणितीय समीकरणों का भला भक्ति में क्या काम? बात भक्ति की चले तो स्वयं ही गीत गूंजने लगते हैं। बात भक्ति की हो तो साधना की पथरीली राहों पर स्वयं ही सुमन सज जाते हैं। कदम भक्ति की डगर पर बढ़े तो ग्रीष्म का आतप, शिशिर की ठिठुरन, वर्षा का प्रचण्ड वेग, सबके सब ऋतुराज वसन्त में रूपान्तरित हो जाते हैं। सत्य यही है कि भक्ति बोलती नहीं, गाती है। भक्ति बोलती नहीं, नाचती है।

भक्ति की यह अनुभूति समष्टि में तरंगित होती रही। जल-थल और नभ में यह भक्तिधुन तैरती रही। हिमवान के शैलशिखरों में भी आज भक्ति का अन्तःस्रोत प्रकाशित हो उठा। अपनी किरणों से अमृतवृष्टि कर रहे चन्द्रदेव का अस्तित्त्व भी भावों में भीग गया। और ऐसा स्वाभाविक भी था- ‘चन्द्रमा मनसो जातः’ इस वेदवाणी के अनुसार चन्द्रमा प्रभु के मन का बिम्ब ही तो है। भक्ति की इस भावचर्चा में जब भक्तों के मन भीगे हुए हैं तो भला भगवान का मन क्यों न भीगे। देवर्षि नारद ने भक्तिरस में सिक्त चन्द्रमा की ओर देखा, फिर मुस्करा कर मौन हो गए।

उनकी यह मुस्कराहट और फिर उनका मौन होना, इसे सभी ने देखा। जहाँ अन्यों ने कुछ नहीं कहा, वहीं ब्रह्मर्षि वसिष्ठ तनिक मुखर होकर किन्तु मृदु स्वर में बोले- ‘‘कुछ कहें देवर्षि! आखिर आप भी तो भक्ति के आचार्य हैं। आपकी अनुभूतियों में तो भक्ति के साधन के गीत सदा ही गूंजते होंगे।’’ वसिष्ठ के इस कथन को शिरोधार्य करते हुए देवर्षि ने विनम्र भाव से कहा, ‘‘आप सदृश ब्रह्मर्षियों का आशीष अवश्य भगवत्कृपा बनकर मेरे अन्तर्भावों में गूँजता है। परन्तु जहाँ तक भक्ति के साधन गीतों के गायन की बात है, तो आज तो वह समस्त सृष्टि में गूँज रहे हैं।’’ ऐसा कहते हुए देवर्षि ने आकाश में तारागणों के साथ मुक्त विहार करते हुए चन्द्रमा की ओर निहारा।

देवर्षि की इस दृष्टि और उनके मन के अन्तर्भावों को ब्रह्मर्षि वसिष्ठ सहित सभी महर्षि एवं देवगण समझ गए, उन्हें भान हुआ कि आज शरद पूर्णिमा है। उसी की ओर इंगित कर रहे हैं। शरद पूर्णिमा तो सदा ही भक्ति का महारास बनकर सृष्टि में अवतरित होती है। इन पावन क्षणों में प्रकृति अनगिन रूप धर कर विराट पुरुष को अपनी भक्ति अर्पित करती है। इस महारास में प्रकृति स्वयं भक्त बनकर भक्ति के अनन्त-अनन्त रूपों को प्रस्तुत करती है और उसके सभी रूपों को स्वयं भगवान स्वीकारते हैं। भक्ति और भक्त उन भगवान में समाते हैं, उनसे एकात्म होते हैं। जिनके पास आध्यात्मिक दृष्टि है, सृष्टि की सूक्ष्मता का ज्ञान है, जो प्रकृति और पुरुष के अन्तर्मिलन को निहारने में समर्थ हैं, केवल वे ही उनके बाह्य मिलन को अनुभव कर सकते हैं। भक्ति के सभी आचार्यों ने इन सूक्ष्मताओं को देख परख कर ही तो भक्ति के साधनों का गान किया है।

शरद पूर्णिमा की इस अनुपम छटा ने देवर्षि को अपने आत्मभावों में निमज्जित कर दिया है। वे जैसे स्वयं से ही कह रहे थे- ‘‘द्वापर युग में ब्रजमण्डल में एक परमदिव्य शरद पूर्णिमा की निशावेला में विराट पुरुष एवं प्रकृति का यह सम्मिलन साकार हुआ था। इस विरल मुहूर्त में भक्ति के अनोखे गीत गूँजे थे और भक्ति के सभी साधनों ने नृत्य किया था। कालिन्दी की लहरों के सान्निध्य में, कदम्ब के वृक्षों की छांव में, यह महारास हुआ था। विराट पुरुष स्वयं योगेश्वर कृष्ण का रूप लेकर आए थे। प्रकृति ने ब्रजबालाओं का बाना पहना था। चन्द्रदेव उस घड़ी में सर्वथा मुक्त भाव से अमृतवृष्टि कर रहे थे।

उन पलों में भक्ति-भक्त एवं भगवान तीनों ही सम्पूर्ण रूप से एकाकार हो रहे थे। जीवन चेतना का हर पहलू जुड़ रहा था, मिल रहा था, समा रहा था। वहाँ हास्य था, उल्लास था, उछाह था, मुक्त मिलन था। महारास था, परन्तु आसक्ति का लेश भी न था, विषय वासना तनिक भी न थी। चन्द्रदेव की धवल चन्द्रिका की भाँति अन्तः-बाह्य सभी आयामों में सम्पूर्ण निर्मलता थी। गोपिकाएँ अपने गोपेश्वर के प्रति अर्पित हो रही थीं। जैसे समस्त सरिताएँ एक साथ ही सागर में समा जाती हैं, ठीक वैसे ही गोपबालाएँ योगेश्वर कृष्ण में समा रही थीं। प्रकृति का कण-कण, रसमय-प्रभुमय हो रहा था। यह रसमयता, यह प्रभुमयता ही तो भक्ति है। जहाँ यह है, वहाँ भक्ति के समस्त साधन स्वयं ही प्रकट हो जाते हैं। वहाँ सहज ही भक्ति के गीत गूँजते हैं।’’ धाराप्रवाह बोलते-बोलते देवर्षि अचानक रुके, फिर मुस्कराए और अपने प्रिय नारायण का स्मरण करते हुए बोले- ‘‘मेरा सम्पूर्ण भक्तिशास्त्र उस महारास की रसमयता से ही तो प्रकट हुआ है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १४०

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