शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ७०)

मंत्र में छिपी है विघ्न विनाशक शक्ति

इन विक्षेपों में सबसे पहला है- रोग। योगिवर पतंजलि कहते हैं कि रोग का सही मतलब है- जैव विद्युत् के चक्र का अव्यवस्थित हो जाना। इसके प्रवाह में व्यतिक्रम व व्यतिरेक उठ खड़े होना। जैव विद्युत् की लयबद्धता का लड़खड़ा जाना। यही रोग की दशा है। जीवन में जब-जब ऐसी स्थिति आती है, व्यक्ति रोगी हो जाता है। यदि किसी भी तरह से जैव विद्युत् के चक्र को ठीक कर दिया जाय, तो रोग भी ठीक हो जाएगा। योगविज्ञान के अलावा वैकल्पिक चिकित्सा की अन्य विधियाँ भी हैं, जो इस सत्य को समझती हैं और इसी विधि से रोग को ठीक करती हैं। इन्हीं विधियों में से एक है- एक्यूप्रेशर व एक्यूपंचर। इस विधि के प्रवर्तकों ने शरीर में सात सौ ऐसे बिन्दु खोज लिए हैं, जिनसे होकर प्राणविद्युत् सम्पूर्ण शरीर में प्रवाहित होती है।

इन केन्द्रों के माध्यम से ही प्राण विद्युत् भौतिक शरीर का स्पर्श करती है। एक्यूपंचर के विशेषज्ञों का कहना है कि रोग के दौरान प्राण विद्युत् के प्रवाह में बाधा पड़ती है और सात सौ में से कई बिन्दु प्राण विद्युत् से विहीन हो जाते हैं और रोग घटता है। इस विद्या के विशेषज्ञ अपनी विधियों से इस चक्र को फिर से पूरा करते हैं। मंत्र विद्या इस सम्बन्ध में कीं अधिक उच्चस्तरीय प्रयास है। मंत्र के माध्यम से एक ओर तो प्राण विद्युत् के चक्र में आने वाली बाधाओं का निराकरण होता है, तो दूसरी ओर साधक को ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का एक बड़ा अंश मिलता है।

दूसरा विक्षेप अकर्मण्यता का है। दरअसल अकर्मण्यता तभी आती है, जब हममें ऊर्जा का तल बहुत निम्न हो जाता है। ऐसी स्थिति में ही हम स्वयं को निर्जीव या शिथिल अनुभव करते हैं। मंत्र जप के माध्यम से ब्रह्माण्डीय ऊर्जा प्रवाह को ग्रहण-धारण करके इस ऊर्जा के तल को ऊँचा उठाया जा सकता हैं और अकर्मण्यता को उत्साह में बदला जा सकता है। तीसरा विक्षेप संशय का है। निश्चितता, दृढ़ता के विरुद्ध है संशय। इससे मानसिक ऊर्जा कई भागों में बँट जाती है। जो साधक मंत्र का प्रयोग करते हैं, उनके अन्तःकरण में संशय का कोई स्थान नहीं रह जाता।

चौथा विक्षेप प्रमाद का रूप लेकर आता है। प्रमाद हमेशा मन का होता है। यह ऐसी अवस्था है, जिसमें कि मन सम्मोहित जैसा हो जाता है। इसे मन की मूर्छा भी कह सकते हैं। होश गँवाया हुआ मन हमेशा ही प्रमादी होता है। अर्थ चिन्तन करते हुए किया मंत्र जप मन को होश में लाने का उत्तम उपाय है। यदि मंत्र का जप मंत्र की भावना के साथ किया जा रहा है, तो फिर मन के प्रमादी होने की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती। हाँ, यदि मंत्र के साथ उसकी भावना जुड़ी हुई न हो, तो फिर यह केवल एक अचेतन क्रिया भर रह जाती है और प्रमाद का सिलसिला चलता रहता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ११८
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

गुरुवार, 19 नवंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ६९)

मंत्र में छिपी है विघ्न विनाशक शक्ति

अन्तर्यात्रा का विज्ञान मंत्र विज्ञान के बारे में एक अनूठा रहस्य उजागर करता है। भौतिक विज्ञानी कहते हैं कि ध्वनि और कुछ नहीं है सिवाय विद्युत् के रूपान्तरण के। अध्यात्म विज्ञान के विशेषज्ञ योगी जन कहते हैं कि विद्युत् और कुछ नहीं है सिवाय ध्वनि के रूपान्तरण के। यानि कि ध्वनि और विद्युत् एक ही ऊर्जा के दो रूप हैं। और इनका पारस्परिक रूपान्तरण सम्भव है। हालाँकि इस सच को अभी विज्ञानवेत्ता ठीक तरह से अनुभव नहीं कर पाए हैं। लेकिन अध्यात्म विज्ञान के विशेषज्ञों ने इस सच को न केवल स्वयं अनुभव किया है, बल्कि ऐसी अद्भुत तकनीकें भी खोजी हैं, जिसके इस्तेमाल से हर कोई यह अद्भुत अनुभूति कर सकता है।
    
मंत्र विज्ञान का सच यही है। यह ध्वनि के विद्युत् रूपान्तरण की अनोखी विधि है। हमारा शरीर, हमारा जीवन जिस ऊर्जा के सहारे काम करता है, उसके सभी रूप प्रकारान्तर से जैव विद्युत् के ही विविध रूप हैं। इसके सूक्ष्म अन्तर-प्रत्यन्तर मंत्र विद्या के अन्तर-प्रत्यन्तरों के अनुरूप प्रभावित, रूपान्तरित व परिवर्तित किए जा सकते हैं। मंत्र की प्रयोग विधि का विस्तार बहुत व्यापक है। इन पंक्तियों में उतनी व्यापक चर्चा सम्भव नहीं है।  समस्या शारीरिक हो या मानसिक या फिर सामाजिक अथवा आर्थिक मंत्र बल से सभी कुछ सहज सम्भव हो पाता है। यहाँ परिदृश्य योग साधना का है। इस सन्दर्भ में महर्षि योग साधकों को आश्वासन भरे स्वर में कहते हैं कि मंत्र जप से सभी विघ्न स्वयं ही नष्ट हो जाते हैं। ये विघ्न क्या हैं? इसकी चर्चा योगिवर पतंजलि अपने अगले सूत्र में करते हैं-

व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरति भ्रान्तिदर्शनालब्ध
भूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः॥  (१/३०)

शब्दार्थ- (१) व्याधि = शरीर अथवा मन में किसी रोग का पनपना व्याधि है। (२) स्त्यान = अकर्मण्यता अर्थात् काम न करने की प्रवृत्ति स्त्यान है। (३) संशय = साधना की प्रक्रिया व परिणाम तथा स्वयं की क्षमता पर सन्देह करना संशय है। (४) प्रमाद= आध्यात्मिक अनुष्ठानों की अवहेलना करना प्रमाद है। (५) आलस्य = तमोगुण की अधिकता से चित्त और शरीर का भारी हो जाना और इसके कारण साधना छोड़ देना आलस्य है। (६) अविरति = विषय-वासना में आसक्ति होना और इस वजह से वैराग्य का अभाव होना अविरति है। (७) भ्रान्तिदर्शन = अध्यात्म साधना को किसी कारण अपने अनुकूल न मानना भ्रान्तिदर्शन है। (८) अलब्धभूमिकत्व = साधना करने पर भी यौगिक उपलब्धियाँ न मिलने से निराश होना अलब्धभूमिकत्व है। (९) अनवस्थितत्व = साधना में किसी उच्चभूमि में चित्त की स्थिति होने पर भी वहाँ न ठहर पाना अनवस्थितत्त्व है। ये नौ (जो कि) चित्तविक्षेपाः = चित्त के विक्षेप हैं; ते = वे ही; अन्तरायाः = अन्तराय (विघ्न) हैं।

अर्थात् रोग, अकर्मण्यता, संदेह, प्रमाद, आलस्य, विषयासक्ति, भ्रान्ति, उपलब्धि न होने से उपजी दुर्बलता और अस्थिरता वे बाधाएँ हैं, जो मन में विक्षेप लाती हैं।

महर्षि अपने पहले के सूत्र में कहते हैं कि ये सभी विक्षेप मंत्र जप से समाप्त हो जाते हैं। इस सच को और अधिक स्पष्टता से समझने के लिए प्रत्येक विक्षेप पर विचार करना जरूरी है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ११७
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

सोमवार, 16 नवंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ६८)

आत्मसाक्षात्कार का साधन जप
    
गुरुदेव बताया करते थे कि स्वामी सर्वानन्द पर माँ गायत्री की महती कृपा थी। वे सदा-सर्वदा माँ के आँचल की छाया में रहते थे। हालाँकि बचपन में इनकी ऐसी स्थिति न थी। ये शारीरिक रूप से दुर्बल एवं बीमार रहा सकते थे। पिता इनके जन्म के साथ ही परलोक सिधार गए थे। माँ पर पालन-पोषण का सम्पूर्ण बोझ था। घर में आय का कोई विशेष साधन न था। इसी वजह से माँ इनका ठीक से इलाज भी न करा पाती थी। बचपन में एक महात्मा इनके घर आए। उन्होंने इनकी दुर्दशा देखी। ये बिछौने में लेटे हुए अपनी मृत्यु का इन्तजार किया करते थे। और माँ शोकाकुल हो आँसू बहाया करती थी। जिन्दगी में सब ओर अँधेरा था। कहीं से कोई आशा की किरण नहीं दिखाई देती थी।
    
ऐसे में किसी पूर्वकर्मों के संयोग से एक महात्मा इनके घर आए। उन्होंने घर की दुर्दशा देखी। और कृपापूर्वक इनकी माँ को गायत्री महामंत्र बताया। बालक सर्वानन्द को भी उन्होंने गायत्री महामंत्र सिखाया, और बोले- बेटा, तुम इसे जपा करो। इस महामंत्र के स्वरों में तुम जगन्माता भगवती आदिशक्ति गायत्री को पुकारो। पर महाराज यह बालक तो स्नानादि कुछ नहीं कर पाएगा। ‘मानसे तु नियम नास्ति’ मानसिक जप में कोई नियम नहीं है बेटी! महात्मा जी ने शास्त्र वचन समझाते हुए उनसे कहा- माँ को पुकारने के लिए कोई नियम नहीं है। तुम तो बस पूरी विकलता से पुकारो। जब माँ तुम्हें ठीक कर दे, तब तुम विधि सहित नियम पूर्वक उनकी आराधना करना।
    
क्या मेरा बच्चा ठीक हो जाएगा महाराज? माँ के इस सवाल पर वे महात्मा हँसे और बोले- जो हमने कहा है, उसे करके देख लो। तुम्हें स्वयं पता चल जाएगा। महात्मा जी के उपदेशानुसार इस छः वर्षीय बालक ने गायत्री महामंत्र का मानसिक जप प्रारम्भ किया। उसके दिन-रात अब गायत्री की रटन में बीतने लगे। महामंत्र की दार्शनिक व्याख्या उसे भले ही मालूम न थी, पर उसकी श्रद्धा में कमी न थी। वह तो बस अपनी माँ को पुकार रहा था। पुकारते हुए उसे छः वर्ष बीत गए। चार वर्षों तक कुछ खास पता न चला। पर छः साल बाद तो वह भला चंगा हो गया।
    
तेरह वर्ष की आयु में उसका यज्ञोपवीत संस्कार हुआ। फिर तो गायत्री की सविधि उपासना उसका जीवन बन गयी। चौबीस वर्षों में उसने चौबीस पुरश्चरण कर डाले। इसी बीच उसकी माँ का देहावसान हो गया था। चौबीस पुरश्चरणों की पूर्णाहुति के रूप में उसने संन्यास ले लिया। और उसका नाम हो गया स्वामी सर्वानन्द। हिमालय यात्रा के समय जब गुरुदेव से इनकी मुलाकात हुई, तो उन्होंने अपने जीवन का सच बताते हुए गुरुदेव से कहा- आचार्य जी! साधक को केवल भक्तिपूर्वक जप करना पड़ता है। बाकी उसके जीवन के सभी कार्य जप स्वयं कर देता है। इससे जीवन के आन्तरिक एवं बाहरी विघ्न स्वयं ही समाप्त हो जाती है। जप से उसकी सभी इच्छाएँ स्वयं ही पूरी होती रहती हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ११६
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

रविवार, 15 नवंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ६७)

आत्मसाक्षात्कार का साधन जप

मंत्र जप के विषय में बाबा कबीर कहते हैं- माला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुख मांहि। मनुवां तो चहुँ दिशि फिरै, यह तो सुमिरन नाहिं॥ यानि कि माला तो हाथ में घूमती रहती है और जीभ मुख में घुमती रहती है। मन चारों दिशाओं में घूमता-फिरता है। इस स्थिति को न तो जप कहा जा सकता है और न प्रभु स्मरण।
    
जप तो मंत्र के शब्दों के साथ विचारों और भावनाओं की एकाग्रता है। जप सकते समय प्रगाढ़ भावनाओं के साथ जो कुछ सोचा-विचारा जाता है, वही घटित होता है। इस सत्य का अनुभव कोई भी अपने जीवन में कर सकता है। बस बात इतनी भर है कि जप करने वाले साधक का जो संकल्प है, उसे उसकी चाहत है, उसके बारे में वह पूरे जप काल में सोचता रहे। इसमें यह भी जरूरी है कि इस सबके साथ उसकी गहरी भावनाएँ जुड़ी हों। यदि ऐसा है, तो समझो कि मंत्र की ऊर्जा से साधक का संकल्प सुनिश्चित रूप से साकार होकर रहेगा। यदि कोई विशेष चाहत नहीं है, तो समझो कि उसकी साधना के समस्त विघ्न स्वयमेव ही समाप्त होते रहेंगे।

इसी सत्य को महर्षि अपने अगले सूत्र में बताते हैं-
ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमयोऽप्यन्तरायाभावश्च॥ १/२९॥
शब्दार्थ-ततः= उक्त साधन से; अन्तरायाभावः= विघ्नों का अभाव; च= और प्रत्यक्चेतनाधिगमः= अन्तरात्मा के स्वरूप का ज्ञान; अपि= भी (हो जाता है)।
अर्थात् प्रभु नाम की जप साधना से साधना की सारी बाधाओं की समाप्ति होती है और आत्म साक्षात्कार हो जाता है।
    
जो जप साधना को सामान्य समझने की भूल करते हैं, उन्हें बार-बार इस सूत्र पर चिन्तन-मनन करना चाहिए। जो गहरी आस्था, श्रद्धा व सम्पूर्ण मानसिक एकाग्रता के साथ जप करते हैं, उनके लिए जप स्वयं ही सब कुछ कर देता है। ब्रह्मर्षि परम पूज्य गुरुदेव इसकी व्याख्या में एक ऐसे महासाधक का उदाहरण देते थे, जो पहले किसी गम्भीर बीमारी से ग्रस्त थे। पर बाद में वे न केवल निरोगी हुए, बल्कि उन्होंने अध्यात्म तत्त्व का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया। इनका संन्यास नाम स्वामी सर्वानन्द था। परम पूज्य गुरुदेव से इनकी मुलाकात हिमालय यात्रा के समय हुई। तभी इन्होंने गुरुदेव को अपने जीवन का यह प्रसंग सुनाया।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ११४
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

गुरुवार, 12 नवंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ६६)


यदि जान सकें जप की कला
    
परम पूज्य गुरुदेव मंत्र विद्या के परम ज्ञाता थे। मंत्र विज्ञान के सूक्ष्म अन्तर-प्रत्यान्तरों के विशेषज्ञ-मर्मज्ञ थे। उनका कहना था कि मंत्र साधना के तीन आयाम हैं। पहला- मंत्र का मन ही मन अथवा अति धीमे स्वर में उच्चारण। दूसरा, इसका अर्थ अनुसन्धान। यह अर्थ अनुसन्धान, अर्थ चिन्तन से कहीं अधिक सूक्ष्म तत्त्व है। इसमें साधक क्रमिक रूप से अर्थ की गूढ़ता व रहस्यमयता में प्रवेश करता है। और उसकी अन्तर्चेतना में मंत्र के नए रहस्यार्थ प्रकट होते हैं। इसका तीसरा आयाम है- प्रगाढ़ भावना। यानि कि मंत्र के अधिदेवता के प्रति साधक के मन-अन्तःकरण में भक्ति की हिलोरे उठनी चाहिए। ये तीनों तत्त्व परस्पर गुँथे रहे, तो ही मंत्र की सार्थक साधना बन पड़ती है।
    
गुरुदेव मंत्र साधना की इन बारीकियों को बताते हुए नरपतगढ़ के महान् सिद्ध सन्त स्वामी कृष्णबोधानन्द के साधना प्रसंग सुनाते थे। वह कहते थे कि कृष्णबोधानन्द जी मंत्र विद्या के महान् ज्ञाता थे। उन्होंने गायत्री महामंत्र की पुरश्चरण साधनाओं के साथ अन्य मंत्रों की साधनाएँ भी सम्पन्न की थी। कई वैदिक, तांत्रिक, पौराणिक, जैन, बौद्ध एवं इस्लामिक मंत्र उन्होंने सिद्ध किए थे। मंत्रविद्या की साधना एवं अनुसन्धान उनका प्रिय कार्य क्षेत्र था। गुरुदेव के अनुसार इन महान् आत्मा का उनके साथ वर्षों का संग साथ रहा।
    
मंत्र साधना के बारे में ये कई प्रेरक बातें बताते थे। इन बातों में सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि गायत्री महामंत्र के पाँच पुरश्चरण कर लेने पर अन्य मंत्रों की साधना में सफलता सुनिश्चित हो जाती है। जिसने भी गायत्री मंत्र की विधिपूर्वक साधना कर ली, वह किसी भी धर्म के किसी भी मंत्र की साधना कर सकता है, सिद्धि पा सकता है। कृष्णबोधानन्द जी का अपने अनुभव के आधार पर कहना था कि यदि धर्म, मजहब, जाति-देश आदि की संकीर्ण मान्यताएँ दरकिनार कर दी जाएँ और एक विज्ञानवेत्ता की भाँति निष्कर्ष प्रतिपादित किया जाय, तो यही कहना होगा कि गायत्री मंत्र विश्व भर के सभी मंत्रों का सार है।
    
इस सम्बन्ध में कृष्णबोधानन्द जी के अनुभव का एक अन्य निष्कर्ष भी था। वह कहा करते थे कि सन्ध्योपासना गायत्री में लय होती है और गायत्री का लय ओम् सहित व्याहृतियों (ॐ भूर्भुवः स्वः) में होता है। और अन्त में ये व्याहृतियाँ ॐ में लय हो जाती हैं। साधना करते-करते यह ॐकार साधक के सम्पूर्ण अस्तित्व में प्रकाशित हो जाता है। यही नहीं साधक का अस्तित्व भी ॐकार में विलीन हो जाता है। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति की सभी अवस्थाओं में विलीनता तुरीय अवस्था में हो जाती है।
    
गुरुदेव बताते थे कि विश्व भर के विभिन्न धर्मों, मतों, पंथों में बताए हुए अनगिनत मंत्रों की साधना करने वाले एवं इनकी सिद्धि पाने वाले कृष्णबोधानन्द जी अद्भुत व्यक्ति थे। जीवन के अन्तिम वर्षों में केवल ॐकार ही इनके जीवन में रह गया था। ॐकार का अर्थ चिन्तन एवं ध्यान ही इनके जीवन का पर्याय था। ये महापुरूष अपने शरीर में केवल एक टाट का टुकड़ा भर लपेटते थे। वे कहते थे कि ॐकार ही सूर्य है, यही गायत्री है, यही वेद है। मंत्र जप के प्रभाव से वृद्धावस्था में भी इनका शरीर सभी व्याधियों से मुक्त होकर एक अनोखी आभा बिखेरता था जिसे जो भी देखता, एक अलौकिक चुम्बकत्व से बँध जाता था। 

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ११२
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

बुधवार, 11 नवंबर 2020

👉 लोग निंदा करें तो करने दो।

सब लोगों को अपनी तरफ से छुट्टी दे दो, वे चाहे निंदा करें, चाहे प्रसंशा करें, जिसमे वे राजी हों करें।

आप सबको छुट्टी दे दो तो आपको छुट्टी (मुक्ति) मिल जाएगी! प्रशंसा में तो मनुष्य फँस सकता है पर निंदा में पाप नष्ट होते हैं। कोई झूंठी निंदा करे तो चुप रहो सफाई मत दो। कोई पूछे तो सत्य बात कह दे। बिना पूछे लोगों में कहने की जरुरत नहीं। बिना पूछे सफाई देना (सत्य की सफाई देना) सत्य का अनादर है भरत जी कहते हैं –

जानहुँ रामु कुटिल करी मोही।
लोग कहउ गुरु साहिब द्रोही।।
सीता राम चरण रति मोरें। 
अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें।

दूसरा आदमी हमें खराब समझे तो इसका कोई मूल्य नहीं है। भगवान दूसरे की गवाही नहीं लेते। दूसरा आदमी अच्छा कहे तो आप अच्छे हो जाओगे, ऐसा कभी नहीं होगा। अगर आप बुरे हो तो बुरे ही रहोगे। अगर आप अच्छे हो तो अच्छे ही रहोगे, भले ही पूरी दुनियां बुरी कहे। लोग निंदा करे तो मन में आनंद आना चाहिए। एक संत ने कहा है –

मेरी निंदा से यदि किसी को संतोष होता है, तो बिना प्रयत्न के ही मेरी उन पर कृपा हो गयी। क्योंकि कल्याण चाहने वाले पुरुष तो दूसरों के संतोष के लिए अपने कष्टपूर्वक कमाए हुए धन का भी परित्याग कर देते हैं। (मुझे तो कुछ करना ही नहीं पड़ा)

हम पाप नहीं करते, किसी को दुःख नहीं देते, फिर भी हमारी निंदा होती है तो उसमें दुःख नहीं होना चाहिए, प्रत्युत प्रसन्नता होने चाहिए। भगवान की तरफ से जो होता है, सब मंगलमय ही होता है। इसलिए मन के विरुद्ध बात हो जाए तो उसमें आनंद मनाना चाहिए।

स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ६५)

यदि जान सकें जप की कला

अन्तर्यात्रा विज्ञान साधकों के लिए पुकार है। पुकार के ये स्वर बड़े आश्चर्यों से भरे हैं। इन्हें सब नहीं सुन सकते। इन्हें सुन पाने के लिए साधक का अन्तःकरण चाहिए। जिनमें साधक की अन्तर्चेतना, साधक की अन्तर्भावना है- वही इन्हें सुन पाएँगे। उन्हीं को अपने अस्तित्व के मर्म में महर्षि पतंजलि एवं ब्रह्मर्षि परम पूज्य गुरुदेव की छुअन महसूस होगी। वही अपने आपको इन महायोगियों की वरद छाया में अनुभव कर पाएँगे। उन्हीं को इन महान् विभूतियों का नेह-निमंत्रण सुनायी देगा। योग न तो लौकिक ज्ञान है और न ही कोई सामान्य सांसारिक विद्या है। यह महान् आध्यात्मिक ज्ञान है और अतिविशिष्ट परा विद्या है। वाणी से इसका उच्चारण भले ही किया जा सकता हो, पर इसके अर्थ बौद्धिक चेतना में नहीं खुलते। इसके रहस्यार्थों का प्रस्फुटन, तो गहन भाव चेतना में होता है।

अन्तर्यात्रा के पथ पर उन्हीं को प्रवेश मिलता है, जो साधक होने की परीक्षा पास करते हैं। अपनी पात्रता सिद्ध करते हैं। हालाँकि इस सम्बन्ध में महर्षि पतंजलि परम उदार हैं। उन्होंने अन्तर्यात्रा के पथ के पथिकों के लिए अनेकों वैज्ञानिक अनुसन्धान किए हैं। अनगिनत तकनीकें खोजी हैं। इन तकनीकों में से किसी एक का इस्तेमाल करके कोई भी व्यक्ति इस पात्रता की परीक्षा में उत्तीर्ण हो सकता है। इन्हीं तकनीकों में से एक है- ॐकार का जप। ॐकार में अनगिनत गुह्य निधियाँ, गुह्य शक्तियाँ समायी हैं। यदि इसका विधिपूर्वक जप हो, तो योग की सभी बाधाओं का बड़ी आसानी से निराकरण किया जा सकता है। प्रभु की महिमा, गरिमा सभी कुछ बीज रूप में इसमें निहित है। यह बीज विकसित कैसे हो, प्रस्फुटित किस भाँति हो? इसका विधान महर्षि अपने अगले सूत्र में बताते हैं-

तज्जपस्तदर्थभावनम्॥ १/२८॥
शब्दार्थ- तज्जपः= उस (ॐकार का) जप (और), तदर्थभावनम्= उसके अर्थ स्वरूप परमेश्वर की भावना के साथ करना चाहिए।
अर्थात् ॐकार का जप इसके अर्थ का चिन्तन करते हुए परमेश्वर के प्रति प्रगाढ़ भावना के साथ करना चाहिए।
    
महर्षि ने इस सूत्र में जप की विधि, जप के विज्ञान का खुलासा किया है। मंत्र को दोहराने भर का नाम जप नहीं है। केवल दोहराते रहना एक अचेतन क्रिया भर है। यह साधक को चैतन्यता देने की बजाय सम्मोहन जैसी दशा में ले जाती है। जो केवल मंत्र को दुहराते रहते हैं, उन्हें परिणाम में सम्मोहन, निद्रा मिलती है। हाँ यह सच है कि इससे थकान मिटती है। जगने पर थोड़ी स्फूर्ति भी लगती है। किन्तु यह जप का सार्थक परिणाम नहीं है। इसका सार्थक परिणाम तो जागरण है। चेतना की परम जागृति है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १११
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

सोमवार, 9 नवंबर 2020

👉 उज्ज्वल भविष्य की आशा

जिनने आशा और उत्साह का स्वभाव बना लिया है वे उज्ज्वल भविष्य के उदीयमान सूर्य पर विश्वास करते हैं। ठीक है, कभी−कभी कोई बदली भी आ जाती है और धूप कुछ देर के लिए रुक भी जाती है पर बादलों के कारण क्या सूर्य सदा के लिए अस्त हो सकता है? असफलताऐं और बाधाऐं आते रहना स्वाभाविक है उनका जीवन में आते रहना वैसा ही है जैसा आकाश में धूप−छाँह की आँख मिचौली होते रहना। कठिनाइयाँ मनुष्य के पुरुषार्थ को जगाने और अधिक सावधानी के साथ आगे बढ़ने की चेतावनी देती जाती है। उनमें डरने की कोई बात नहीं। आज असफलता मिली है, आज प्रतिकूलता उपस्थित है, आज संकट का सामना करना पड़ रहा है तो कल भी वैसी ही स्थिति बनी रहेगी, ऐसा क्यों सोचा जाय? आशावादी व्यक्ति छोटी−मोटी असफलताओं की परवाह नहीं करते। वे रास्ता खोजते हैं और धैर्य, साहस, विवेक एवं पुरुषार्थ को मजबूती के साथ पकड़े रहते हैं क्योंकि आपत्ति के समय में साथ पकड़े रहते है क्योंकि आपत्ति के समय में यही चार सच्चे मित्र बताये गये हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ६४)

ॐकार को जाना, तो प्रभु को पहचाना
    
गोस्वामी जी महाराज ने अपनी मंत्रमय कृति रामचरित मानस में इस नाम महिमा की बड़ी विस्तृत विवेचना की है। बालकाण्ड के दोहा क्रमांक १८ से दोहा क्रमांक २७ तक इस प्रकरण को बड़े भक्तिपूर्ण ढंग से उकेरा गया है। २८ चौपाइयों का यह प्रसंग भक्तों के मन को सब भाँति मोहने वाला है। जिन्हें प्रभु के नाम की महिमा के यथार्थ के बारे में तुलसी बाबा की अनुभूति को जानने की जिज्ञासा है, उन्हें बालकाण्ड के नाम महिमा के प्रसंग को अवश्य पढ़ना चाहिए। हम तो यहाँ विस्तारभय के कारण तुलसी बाबा की केवल एक चौपाई को उद्धृत करना चाहेंगे। जिसमें वह कहते हैं-

अगुन सगुन दुई ब्रह्म सरूपा। 
अकथ अगाध अनादि अनूपा॥
मोरे मत बढ़ नाम दुहूँ ते। 
किए जेहिं जुग निजबस  बूते॥

अर्थात्- परम ब्रह्म परमेश्वर के दो ही स्वरूप है- निर्गुण और सगुण। प्रभु के ये दोनों ही रूप अकथनीय, अथाह, अनादि एवं अनुपम हैं। गोस्वामी जी कहते हैं कि  मेरी सम्मति में नाम इन दोनों से ही बड़ा है। क्योंकि इसने अपने बल से दोनों को वश में कर रखा है। अर्थात् नाम साधना से प्रभु के दोनों रूपों का ज्ञान सहज ही हो जाता है।
    
प्रभु के पावन नाम के इस प्रसंग में ब्रह्मर्षि परम पूज्य गुरुदेव के अमृत वचनों का स्मरण हो रहा है। उन्होंने ये बातें अपनी निजी चर्चा में कही थीं। बात योग साधना की चल रही थी। गुरुदेव सदा की भाँति अपने पलंग पर बैठे थे। प्रश्नकर्त्ता उनके चरणों के समीप एक टाट के टुकड़े पर बैठा हुआ थ। उसने जिज्ञासा की कि वह प्रभावकारी योग साधना किस तरह से करे? इस  जिज्ञासा के समाधान में गुरुदेव ने कहा—बेटा! इन दिनों प्राण अन्तगत है। लोगों के दैनिक काम-काज का भी कोई ठीक नहीं है। कठिन, कठिन आसन, प्राणायाम, बन्ध मुद्राओं का अभ्यास करके ईश्वर तत्त्व की अनुभूति करना आज के दौर में सुलभ नहीं है।
    
शरीर चिकित्सा के लिए कुछ समय के लिए आसन-प्राणायाम या बन्ध, मुद्रा का अभ्यास करना अलग बात है और इन क्रियाओं से कुण्डलिनी जागरण, चक्रबेधन, सहस्रार सिद्धि एकदम अलग बात है। गुरुदेव बोले- ऐसा करने के चक्कर में ज्यादातर लोग रोगी हो जाते हैं। वायु कुपित होने के कारण उन्हें अनेकों शारीरिक, मानसिक परेशानियाँ घेर लेती हैं। तब फिर रास्ता क्या है गुरुदेव? पूछने वाले ने निराश स्वर में कहा। क्योंकि उसे गुरुदेव की बातों से लगने लगा था कि योग साधना के लिए वह सत्पात्र नहीं है। उसके लिए यह सब दूर की कौड़ी है। यह ऐसा आकाश कुसुम है, जिसे वह कभी भी नहीं पा सकता।
    
उसकी इस निराशा को तोड़ते हुए गुरुदेव बोले-  एक उपाय है बेटा! गुरुदेव के इन वचनों से प्रश्नकर्त्ता के निराश मन में आशा संजीवनी का संचार हुआ। उसने आतुरता से पूछा कौन सा? वह बोले- भगवान् के नाम का स्मरण। यह ऐसी साधना है, जिसे तुलसी, मीरा, सूर, रहीम, रसखान, कबीर, रैदास आदि अनगिनत भक्तों को योग सिद्धि प्राप्त हुई। नाम साधना के कारण ही उन्हें भगवान् का सहचर्य मिला। भगवान् उनके साथ रहे। सच तो यह है, नाम साधना से बड़ी कोई दूसरी साधना है ही नहीं। पर बहुतेरे लोग इसे आसान समझकर यूँ ही छोड़ देते हैं और उलटी-पलटी साधनाओं के चक्कर में उलझ कर बाद में मदद के लिए करुण पुकार करते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १०९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शनिवार, 7 नवंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ६३)

ॐकार को जाना, तो प्रभु को पहचाना

अन्तर्यात्रा अचेतन की परतों में चेतनता की स्फूर्ति लाती है। यह एक ऐसा सच है, जिसकी समग्र बौद्धिक व्याख्या तो सम्भव नहीं है, लेकिन इसकी सम्पूर्ण अनुभूति बड़ी सहज है। जो अन्तर्यात्रा में संलग्न हैं, वे सब यही कहते हैं। अनुभव कहता है कि अन्तर्यात्रा का पथ अनगिन रहस्यों से भरा है। इस पथ पर कुछ दूर चलने पर एक ऐसा नया अनजान मोड़ जाता है कि सब कुछ बदला नजर आता है। सारे नजारे बदल जाते हैं। मनःस्थिति ही नहीं, परिस्थिति भी अपना एक नया रूप सामने लाती है।

ऐसे में यदा-कदा ही नहीं बल्कि बहुधा इस यात्रा के अवरुद्ध होने की घटना घटती है। अन्तर्यात्रा के इस दौर में चलने वाले पाँव थकते ही नहीं, बहकते भी हैं। पथ की थकान एवं पाँवों के बहकावे से बचना-उबरना आसान नहीं होता है। सच्चे योग साधक कब योगभ्रष्ट हो जाएँगे कोई ठिकाना नहीं। ऐसी स्थिति में एक ही उपाय है- परमात्मा के प्रति अविचलित श्रद्धा, प्रभु के नाम के प्रति अडिग निष्ठा।     

प्रभु के सामने साधक भी बालक ही है। वह जानना चाहता है कि 
प्रभु को किस नाम से जानें? किस तरह से उसका स्मरण करें? इसकी चर्चा महर्षि अपने अगले सूत्र में करते हैं। वह इसमें कहते हैं-

तस्य वाचकः प्रणवः ॥ १/२७॥

शब्दार्थ- तस्य= उस (ईश्वर का); वाचकः =  वाचक (नाम); प्रणवः = प्रणव (ॐकार) है।
अर्थात् उसे ‘ॐ’ के नाम से जाना जाता है।
    
महर्षि ने इस सूत्र में बताया है कि ‘ॐ’ है नाम प्रभु का। इस ॐ में उतने ही रहस्य हैं, जितने कि स्वयं प्रभु में है। ॐ को जान लिया, तो समझो स्वयं प्रभु को पहचान लिया। वेद, पुराण, उपनिषद् सभी एक स्वर से ओम् की महिमा का गान करते हैं। जो नाम का स्मरण करते हैं, उन्हें अपने आप ही नामी का परिचय मिल जाता है। प्रभु के नाम का स्मरण साधना की सबसे सरल किन्तु प्रभावकारी है। इस रीति से भी योग के शिखर तक पहुँचा जा सकता है। समाधि की सिद्धि पायी जा सकती है। नाम की रटन, नाम की लगन, नाम की धुन, नाम का ध्यान में यदि मन रम जाए, तो समझो कि साधना से सिद्धि का द्वार खुल गया।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १०८
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 परीक्षा की कसौटी

परीक्षा में फेल हो गये, घाटा लग गया, नौकरी नहीं मिली, बीमार पड़ गये, स्वजनों से लड़ाई हो गई, जैसा चाहते थे वैसा प्रसंग न बन पड़ा तो उसमें निराश होने की क्या बात है। अगला प्रयास और भी उत्साह और श्रम से करने पर आज न सही, कल फिर सफलता का अवसर प्राप्त हो सकता है। एक राजा जब लड़ाई में 13 बार हार गया और शत्रु के सिपाही उसका पीछा कर रहे थे तब वह अपनी जान बचाये एक खोह में छिपा बैठा था। सब साधन नष्ट हो जाने से उसे निराशा घेरने लगी थी और भविष्य अन्धकारमय दीखता था। इतने में उसने सामने की दीवार पर देखा कि मकड़ी बार−बार जाला बुनती है और वह बार−बार टूट जाता है। फिर भी मकड़ी निराश नहीं होती और हर असफलता के बाद उसी हिम्मत के साथ फिर अपने काम में जुट जाती है। तेरह बार असफल होने के बाद चौदहवीं बार मकड़ी अपना टूटा तागा जोड़ने और जाला बनाने का काम आगे बढ़ाने में सफल हो गई। इस दृश्य का राजा के मन पर बड़ा प्रभाव पड़ा। उसने सोचा छोटी−सी कौड़ी−मकड़ी जब हिम्मत नहीं छोड़ती तो मेरे जैसे बुद्धिमान और क्षमता सम्पन्न मनुष्य के लिए हिम्मत छोड़ बैठना क्योंकर उचित हो सकता है?

राजा ने हिम्मत समेटी और फिर लड़ाई की तैयारी में पूरे उत्साह के साथ लग गया। चौदहवीं बार उसे सफलता मिल गई। हमारे लिए यह उदाहरण मार्गदर्शन का काम दे सकता है। पहलवान कई बार कुश्ती में पिछड़ जाते हैं पर क्या इससे वे कुश्ती लड़ना छोड़ देते हैं? घुड़ सवारी सीखते समय गिर पड़ने से कौन सवार घोड़े पर चढ़ना छोड़ बैठता है? छोटे बच्चे जब चलना और खड़ा होना सीखते हैं तो बार−बार गिरते और असफल रहते हैं पर इतने में ही वे कहाँ हिम्मत हारते हैं। कब अपना प्रयत्न छोड़ते हैं। वरन् हर असफलता के बाद और अधिक उत्साह तथा प्रसन्नता के साथ उठने चलने का उपक्रम करते हैं। हम इन छोटे बच्चों से बहुत कुछ सीख सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

👉 उचित मार्ग पर पदार्पण

उचित दिशा में चलता हुआ मन आशावादी, दूरदर्शी, पुरुषार्थ, गुणग्राही, और सुधारवादी होता रहने वाला, तुरन्त की बात सोचने वाला, भाग्यवादी, कठिनाइयों की बात सोच−सोचकर खिन्न रहने वाला और आपका पक्षपात करने वाला होता है। वह परिस्थितियों के निर्माण में अपने उत्तरदायित्व को स्वीकार नहीं करता। मन पत्थर या काँच का बना नहीं होता जो बदला न जा सके। प्रयत्न करने पर मन को सुधारा और बदला जा सकता है। यह सुधार ही जीवन का वास्तविक सुधार है। युग−निर्माण का प्रमुख आधार यह मानसिक परिवर्तन ही है। दुमुँहे साँप की उलटी चाल को यदि सीधी कर दिया जाय तो वह पीछे लौटने की अपेक्षा स्वभावतः आगे बढ़ने लगेगा। 

हमारा मन यदि अग्रगामी पथ पर बढ़ने की दिशा पकड़ ले तो जीवन के सुख शान्ति और भविष्य के उज्ज्वल बनने में कोई सन्देह नहीं रह जाता। कई लोग ऐसा सोचते रहते हैं कि आज जो कठिनाइयाँ सामने हैं वे कल और बढ़ेंगी, इसलिए परिस्थिति दिन−दिन अधिक खराब होती जावेंगी और अन्त बहुत दुखमय होगा। जिनके सोचने का क्रम यह है कल्पना शक्ति उनके सामने वैसे ही भयंकर संभावनाओं के चित्र बना-बनाकर खड़ी करती रहती है, जिससे दिन−रात भयभीत होने और परेशान रहने का वातावरण बना रहता है। निराशा छाई रहती है। भविष्य अन्धकारमय दीखता है। दुर्भाग्य की घटाऐं चारों ओर से घुमड़ती आती हैं। इस प्रकार के कल्पना चित्र जिसके मन में उठते रहेंगे वह खिन्न और निराश ही रहेगा और बढ़ने एवं पुरुषार्थ करने की क्षमता दिन−दिन घटती चली जायगी। अन्त में वह इसी मानसिक दुर्बलता के कारण लुञ्ज−पुञ्ज एवं सामर्थ्यहीन बन जायेगा किसी काम को आरंभ करते ही उसके मन में असफलता की आशंका सामने खड़ी काम करते न बन पड़ेगा। ऐसे लोगों का शंका शंकित मन से किया हुआ कार्य सफलता की मंजिल तक पहुँच सकेगा इसकी संभावना कम ही रहेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ६२)

गुरुओं के गुरु हैं—प्रभु

ऐसे ही एक गुरु की कथा गुरुदेव सुनाते थे। उसे यहाँ प्रस्तुत करने का मन है। उच्च शिक्षित ये गुरु एक ख्यातिनामा संस्था के संचालक थे। देश-विदेश में उन्हें प्रवचन के लिए आमंत्रित किया जाता था। आमंत्रित अतिथि के रूप में ये एक बार विदेश में किसी पागलखाने में गए। वहाँ उन्हें सुनने वालों में कर्मचारियों एवं चिकित्सकों के साथ पागलखाने के पागल भी थे। प्रवचन करते समय इन गुरु महोदय का उस समय भारी अचरज हुआ जब उन्होंने देखा कि पागलखाने के सारे पागल उन्हें बड़े ध्यान से सुन रहे हैं। कर्मचारी एवं चिकित्सकों का सुनना तो उन्हें स्वाभाविक लगा, पर पागलों का इस तरह से सुनना....? आखिर इसमें रहस्य क्या है?

इस खोज में उन गुरु ने पागलखाने के अधीक्षक से अपनी जिज्ञासा कही। और उनसे निवेदन किया कि आप जरा इन पागलों से पूछकर तो देखिए कि इन्हें मेरी क्या बात पसन्द आयी। उनके निर्देशानुसार अधीक्षक ने पागलों से बात की और उनके पास आए। बताइए न क्या बातें हुई- गुरु महोदय में भारी उत्सुकता थी। अधीक्षक ने थोड़ा हिचकिचाते हुए बोला- महोदय! आप मुझे क्षमा करें, ये सभी पागल यह कह रहे थे कि ये प्रवचन करने वाले तो बिल्कुल हम लोगों जैसे हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि हम लोग यहाँ भीतर हैं और ये बाहर घूम रहे हैं।

गुरुदेव ने इस हास्य कथा को सुनाते हुए कहा था कि आज के दौर में ज्यादातर गुरुओं की यही स्थिति है। दूसरी श्रेणी के गुरु वे होते हैं, जिन्हें भगवान् अपने प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त करता है। इस श्रेणी में रमण महर्षि, श्री अरविन्द, सन्त गुरजिएफ आदि महापुरुष आते हैं। स्वयं गुरुदेव की चर्चा भी इस कोटि में की जा सकती है। ये सब ईश्वरीय चेतना में निवास करते हैं। श्री रामकृष्ण परमहंस के शब्दों में इनका शरीर भगवान् का घर होता है। भगवान् ही इनके शरीर के माध्यम से कार्य करता है।

तीसरी श्रेणी में ईश्वर स्वयं गुरु होते हैं। अपनी देह विसर्जित करके ब्राह्मी चेतना में विलीन महापुरुष भी इस कोटि में जा पहुँचते हैं। यह स्थिति सभी कालों से परे होती है। क्योंकि ब्राह्मी चेतना की परम भावदशा में काल का अस्तित्व लोप होता है। ईश्वर इसी परम भावदशा का नाम है। जिन साधकों ने उन्हें इस रूप में जान लिया, वे भी उसी स्थिति में जा पहुँचते हैं। अपने गुरु को ईश्वर के रूप में जानकर भी यह स्थिति पायी जा सकती है, वस्तुतः तब प्रयास स्वतःस्फूर्त होने लगते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १०६
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

गुरुवार, 5 नवंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ६१)

गुरुओं के गुरु हैं—प्रभु

साधक का क्षण-क्षण उत्सव में परिवर्तित करने वाले ईश्वर तत्व का गुह्य रहस्य स्पष्ट करते हुए महर्षि पतंजलि अपने अगले सूत्र में कहते हैं-
पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्॥ १/२६॥
शब्दार्थ - (वह ईश्वर सबके) पूर्वेषाम् = पूर्वजों का; अपि = भी; गुरुः = गुरु है; कालेन अनवच्छेदात् = क्योंकि उसका काल से अवच्छेद नहीं है।
अर्थात् समय की सीमाओं के बाहर होने के कारण वह गुरुओं का गुरु है।

इस सूत्र में महर्षि ने मुख्यतया तीन संकेत किए हैं। १. ईश्वर गुरु है। जो अभी तक गुरु विहीन है, वे उन परात्पर प्रभु को अपने गुरु के रूप में वरण कर सकते हैं। २. वे गुरुओं के गुरु हैं। अभी तक सम्पूर्ण सृष्टि में जितने भी सद्गुरु हुए हैं, ईश्वर उन सभी के गुरु हैं। क्योंकि सभी सद्गुरु ईश्वर से ही उपजते, ईश्वर में ही वास करते और उन्हीं परम प्रभु में विलीन हो जाते हैं। ३. ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे प्रभु काल की सभी सीमाओं से परे हैं। सच तो यह है कि ईश्वरीय चेतना में काल की सीमाएँ ही विलीन हो जाती हैं।

ये तीन बातें आध्यात्मिक जगत् के तीन रत्न हैं। जो इनके रहस्य को जान जाता है- वह योग के सत्य को पा लेता है। ईश्वर को गुरु के रूप में बताकर महर्षि साधकों को गुरु की गरिमा को बोध कराना चाहते हैं। ईश्वर गुुरु है और गुरु ईश्वर है। इस सुपरिचित सत्य से बहुधा साधक अपरिचित रहते हैं। इसी के साथ एक बात और भी देखी जाती है कि कई बार ईश्वरत्व में विलीन हुए बगैर भी कई लोग अपने आपको गुरु के रूप में प्रचारित करने लग जाते हैं।

युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव इस सम्बन्ध में कहते थे कि दरअसल गुरु तीन तरह के होते हैं। इनमें से पहली श्रेणी है—शिक्षक की, जो बौद्धिक ज्ञान देता है। इसके पास तर्कों का जादू होता है, शब्दों का मायाजाल होता है। बोलने में प्रवीण ऐसे लोग कई बार अपने आप को गुरु के रूप में भी प्रस्तुत कर लेते हैं। उनके कथा-प्रवचन, उनकी लच्छेदार वाणी अनेकों को अपने प्रति आकर्षित करती है। ऐसों का मन्तव्य एक ही होता है कि ज्यादा से ज्यादा लोग उन्हें मानें, उनकी सुनें, उन्हें पूजें, उनके प्रति श्रद्धा करें। श्रद्धा का सन्दोहन करने वाले ऐसे गुरुओं की आज कमी नहीं है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १०५
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 देने की नीति

कड़ाके की ठंड पड़ी। पृथ्वी पर रेंगने वाले कीटक उससे सिकुड़ कर मरने लगे। वन्य प्राणियों के लिए आहार की समस्या उत्पन्न हो गई। लोग शीत निवारण के लिए जलावन ढूंढ़ने निकले। सब के शरीर अकड़ रहे थे तो भी कष्ट निवारण का उपाय किसी से बन नहीं पड़ रहा था।

वृक्ष से यह सब देखा न गया। इन कष्ट पीड़ितों की सहायता के लिए उसे कुछ तो करना ही चाहिए। पर करें भी तो क्या। उसके पास न बुद्धि थी न पुरुषार्थ न धन न अवसर।

फिर भी वह सोचता ही रहा- क्या मेरे पास कुछ भी नहीं है? भला ऐसा कैसे होगा सर्वथा साधन हीन तो इस सृष्टि में एक कण भी नहीं रचा गया है? गहराई से विचार किया तो लगा कि वह भी साधनहीन नहीं है। पत्र-पल्लवों की प्रचुर संपदा प्रकृति ने उसे उन्मुक्त हाथों से प्रदान की है। वृक्ष ने संतोष की साँस ली। पुलकन उसके रोम-रोम में दौड़ गई।

वृक्ष ने अपने सारे पत्ते जमीन पर गिरा दिए। रेंगने वालों ने आश्रय पाया, पशुओं को आहार मिला, जलावन को समेट कर मनुष्यों ने आग तापी और जो रहा बचा सो खाद के गड्ढे में डाल दिया। दुम हिलाते रंग बदलते गिरगिट अपनी कोतर से निकला और वृक्ष से पूछने लगा- अपनी शोभा सम्पदा गँवाकर तुम ढूँठ बन गये। इस मूर्खता में आखिर क्या पाया।

वृक्ष गिरगिट को निहारता भर रहा पर उत्तर कुछ नहीं दिया। कुछ समय उपरान्त बसन्त आया। उसने ढूँठ बनकर खड़े हुए वृक्ष को दुलारा और पुराने पके पत्तों के स्थान पर नई कोपलों से उसका अंग प्रत्यंग सजा दिया। यह तो उसके दान का प्रतिदान था। अभी उपहार का अनुदान शेष था सो भी बसन्त ने नये बसंती फूलों से मधुर फलों से लाद कर पूरा कर दिया। वृक्ष गौरवान्वित था और सन्तुष्ट भी।

गिरगिट फिर एक दिन उधर से गुजरा। वृक्ष पहले से अधिक सम्पन्न था। उसने देने की नीति अपना कर खोया कम और पाया ज्यादा यह उसने प्रत्यक्ष देखा।

पूर्व व्यंग की निरर्थकता का उसे अब आभास हुआ सो लज्जा से लाल पीला होता हुआ वह फिर अपने पुराने कोंतर में वापिस लौट गया।

मंगलवार, 3 नवंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ६०)

बाँसुरी बनें, तो गूँजे प्रभु का स्वर

योग पथ पर चलने के लिए जितनी भी तकनीकें हैं, उनके शुरूआती दौर में अहंकार को बड़ा रस मिलता है। लेकिन भक्ति मार्ग में ऐसा कोई रस नहीं है। यहाँ अहंता को प्रारम्भ से ही निराश होना पड़ता है। जबकि दूसरे मार्गों में अहंता अन्तिम छोर पर निराश होती है। जब बात योग साधना की हो, तो अहंता को तो निराश होना ही पड़ेगा। पर हठयोग, राजयोग, ज्ञानयोग, नादयोग आदि जितनी भी योग विधियाँ हैं, वहाँ शुरूआत में बड़ी विचित्रताएँ हैं। तकनीक की विचित्रता, अनुभूति की विचित्रता, पथ की  विचित्रता- बड़े ही विचित्र लोभ यहाँ है। तमाशो से भरी जादूगरी यहाँ पर है। यहाँ पर ऐसा बहुत कुछ है, जहाँ अहंकार को रस मिले। उसे मजा आए। इसीलिए इन सबके लिए उसमें भारी आकर्षण है।
    
लेकिन ईश्वर भक्ति में ऐसा कोई आकर्षण नहीं है। यहाँ तो पहले ही कदम पर अहंकार को जलना-गलना एवं मरना-मिटना पड़ता है। अहंकार की मौत, ‘जो सिर काटे भुईं धरै’ के कबीर वचन यहाँ पर, इस पथ पर पाँव रखते ही सार्थक होते हैं। यही वजह है कि अहंकारी को भक्ति सुहाती नहीं है। उसे यह सब बड़ा अटपटा-बेतुका लगता है। अहंकारी के लिए भक्ति बुद्धिहीनता से भरा क्रियाकलाप है। यहाँ पर उसे हानि ही हानि नजर आती है। पर जो निष्कपट हृदय है, उनके लिए यह परम तृप्ति का मार्ग है। प्रभु में समर्पित, प्रभु में विसर्जित एवं प्रभु में विलीन। इससे बड़ा सुख और भला कहाँ हो सकता है।
    
ब्रह्मर्षि गुरुदेव स्वयं अपने बारे में कहा करते थे कि लोग मुझे लेखक समझते हैं, ज्ञानी मानते हैं। किसी की नजरों में मैं महायोगी हूँ। पर अपनी नजर में मैं केवल एक भक्त हूँ। अपने गुरु का, अपने भगवान् का निष्कपट भक्त। मैंने अपनी जिन्दगी का कण-कण, क्षण-क्षण, अणु-अणु अपने प्रभु की भक्ति में गुजारा है। मैंने तो स्वयं को बस केवल एक पोली बाँसुरी भर बना लिया। सच तो यह है कि अपने पूरे जीवन में मैंने कुछ किया ही नहीं। बस, प्रभु जो करते रहे, वही होता रहा। मैंने स्वयं को भगवान् के हाथों में सौंप दिया। मेरे जीवन में वही साधना बने, वही साधक और वही साध्य रहे। एक में तीन और तीन में एक, यही गणित मेरे जीवन में इस्तेमाल होती रही।
    
परम पूज्य गुरुदेव के इस जीवन दर्शन में महर्षि पतंजलि के इस सूत्र की सहज व्याख्या है। ईश्वर में समाकर जीव स्वयं ईश्वर बन जाता है। गुरुदेव कहते हैं, गंगाजल में समा जाने वाले गन्दे नाले को भी लोग गंगाजल कहने लगते हैं। इसमें महिमा गंगा की है और भावभरे समर्पण की। समर्पण करने से केवल क्षुद्रताओं का नाश होता है। केवल दुर्बलताएँ-हीनताएँ तिरोहित होती हैं, मिलता बहुत कुछ है। बस जो यह समझ सके। यह समझ में आने पर एक पल में सब कुछ घटित हो जाता है। जो ईश्वर में समर्पित होते हैं- उनके जीवन का अवसाद उत्सव में रूपान्तरित हो जाता है। 

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १०३
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

सोमवार, 2 नवंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ५९)

बाँसुरी बनें, तो गूँजे प्रभु का स्वर

अन्तर्यात्रा के पथ पर मार्गदर्शन करने वाले प्रदीप भी अनोखे हैं। बाहरी जीवन में हम जो यात्रा करते हैं, उसकी रीतियों से हम सभी प्रायः परिचित होते हैं। मंजिल का पता, राह की तैयारी, रास्ते के अवरोध इन सभी की पड़ताल करनी पड़ती है। सभी से परिचित होना होता है। तभी यात्रा सफल होती है। अन्तर्यात्रा में भी बातें तो लगभग यही है, परन्तु यहाँ सब कुछ अपरिचित सा है। जिन्हें देखा नहीं, जिसे जाना नहीं, जो सुना हुआ नहीं है- ऐसा सब कुछ है यहाँ। पथ अपरिचित है, चलना भी अकेले है। शायद इसीलिए इस पथ को प्रकाशित करने वाले प्रदीप भी अनोखे होने चाहिए।

गोस्वामी जी महाराज कहते हैं- ‘राम नाम मनि दीप धरू’। यानि कि राम नाम रूपी मणियों के दीप रखो। सचमुच ही अन्तर्यात्रा पथ को प्रकाशित करने वाले दीपक मणियों के होने चाहिए। जिसमें न तेल की जरूरत है, न बाती की और मिट्टी के दीए का भी यहाँ कोई काम नहीं। मणियों के दीपक तो स्व प्रकाशित होते हैं। ये तो बिना किसी दूसरे की सहायता के पथ को प्रकाशित करते रहते हैं। 
    
मणिदीप रूपी यह ईश्वर कैसे हैं इस विषय में और प्रकाश डालते हुए महर्षि कहते हैं-
तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम्॥ १/२५॥
    
शब्दार्थ-तत्र= उस (ईश्वर) में, सर्वज्ञबीजम्= सर्वज्ञता का बीज (कारण) अर्थात् ज्ञान, निरतिशयम् = निरतिशय (सर्वोच्च) है। अर्थात्- ईश्वर में सर्वज्ञता का बीज अपने उच्चतम विस्तार में विकसित होता है।
    
यह योग सूत्र साधना का परम रहस्य है। हालाँकि इसमें सब कुछ सरल, सहज एवं स्पष्ट है फिर भी इसे आत्मसात कर लेना विरल है। इन्सानी फितरत ही कुछ अजीब है। उसे कठिनताएँ, जटिलताएँ लुभाती हैं, ललचाती हैं। सहजता, सरलता को वह प्रायः बेकार समझ लेता है। जीवन की प्रत्येक गतिविधि में, प्रत्येक क्षेत्र में उसे अपने अहं की प्रतिष्ठा करना भाता है। और अहं को प्रतिष्ठता प्रायः कठिनाइयों के बीच ही मिल पाती है। इसी वजह से सहजता को अनावश्यक समझने की भूल की जाती है। इस भूल की वजह से भक्ति पथ पर चलने का विवेक विरले ही साधक जाग्रत् कर पाते हैं। ज्यादातर तो भस्त्रिका, भ्रामरी के चक्करों में ही भ्रमण करते रहते हैं।
    
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १०२
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ५८)

ऐसा है, वह घट-घट वासी
    
योगिवर कहते हैं कि ईश्वर ऐसे बदलते मुखौटों में बँधा नहीं है। वह पुरुषोत्तम है, पुरुषों में सर्वश्रेष्ठ है। और साथ ही चेतना की एक परम पवित्र अवस्था। यह अवस्था ऐसी है, जिसे न तो क्लेश छू पाते हैं, न कर्म और न विपाक तथा न ही आशय। इन सभी से ईश्वरीय चेतना अछूती है। क्लेश, कर्म, विपाक और आशय ये क्या हैं? अच्छा हो इन सबको हम महर्षि के सूत्रों की भाषा में ही जानें। तो पहले स्थान पर है क्लेश। इसका विस्तृत ब्योरा पतंजलि ने दूसरे पाद के तीसरे सूत्र से नवे सूत्र तक दिया है। उन्होंने इस प्रकरण में पाँच क्लेश गिनाये हैं- १. अविद्या, २. अस्मिता, ३. राग, ४. द्वेष एवं ५. अभिनिवेश। ये पाँचों क्लेश हम सभी को कभी न कभी व्यापते हैं। परन्तु ईश्वर को इनमें से कोई क्लेश छू भी नहीं सकता।
    
जहाँ तक कर्म की बात है, तो महर्षि ने अपने योग सूत्र के चतुर्थ पाद के ७ वें सूत्र में इसकी चर्चा की है। वह कहते हैं कि कुल चार तरह के कर्म होते हैं- १. पुण्य कर्म, २. पाप कर्म, ३. पुण्य एवं पापमिश्रित कर्म एवं ४. पुण्य एवं पाप से रहित कर्म। ईश्वरीय चेतना कभी भी, किसी भी तरह इन कर्मों से लिप्त नहीं होती। इन चारों प्रकार के कर्मों में कोई भी कर्म उसे छू-पाने में समर्थ नहीं होते। तीसरा क्रम विपाक का है। विपाक यानि कि कर्मों का फल। तो जब कर्म ही नहीं तो कर्मों का फल कहाँ? कर्म के लिए किसी फल की पहुँच ईश्वर तक नहीं है। ये तो बस जीवों को ही बाँधते हैं। इस कर्म विपाक के स्वरूप की चर्चा महर्षि पतंजलि ने द्वितीय पाद के १३ वें सूत्र में की है।
    
चौथे क्रम में आशय है। महर्षि के अनुसार कर्म संस्कारों के समुदाय का नाम आशय है। इसकी व्याख्या योगसूत्र के द्वितीय पाद के १२ वें सूत्र में मिलती है। यह आशय ही जीवात्मा को बाँधता है। उसको यत्र-तत्र घसीटता फिरता है। उसकी परिस्थितियों एवं मनःस्थिति में बदलाव के सारे सरंजाम आशय के द्वारा ही जुटते हैं। इसी से हँसने-रोने की स्थिति बनती है। यह न हो तो फिर आनन्द ही आनन्द है। ईश्वर इससे अछूता रहने के कारण आनन्द का परम स्रोत है। सामान्य जीवों को इन चारों के बंधन में बँधना पड़ता है। परन्तु ईश्वर इनसे सर्वथा मुक्त है। इतना ही नहीं जो उसका चिन्तन करते हैं, जो उसमें समर्पित होते हैं, वे सब भी उसी अवस्था को प्राप्त हो जाते हैं।
    
ईश्वरीय चेतना को जो इस रूप में जानते हैं, वे ही साथ से परिचित होने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं। यही नहीं उनका सम्पूर्ण जीवन एक उत्सव का रूप ले लेता है। युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि नदियाँ, झरने, वृक्ष, बहारें सभी आनन्द मना रहे हैं। एक इन्सान ही चिन्तित-परेशान है। ऐसा सिर्फ  इसलिए है क्योंकि वह जीवन को कर्म की भाँति देखता है, जबकि जगत् तो ईश्वर की लीला है। यदि हम उसकी लीला के सहचर हो सके, तो हमारा अपना जीवन अभी इसी क्षण आनन्द का निर्झर बन जाए। 

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १००
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

बुधवार, 28 अक्टूबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ५७)

ऐसा है, वह घट-घट वासी

महर्षि पतंजलि और गुरुदेव के स्वरों में आमंत्रण के मधुर गीत मुखरित हैं। यह आमंत्रण उनके लिए है, जो अन्तर्यात्रा पथ पर चलने के लिए उत्सुक हैं। अपने आपसे इसी समय पूछिए कि क्या आपमें यह उत्सुकता है? यदि जवाब हाँ है, तो महर्षि पतंजलि एवं ब्रह्मर्षि गुरुदेव आपकी अंगुली थामने के लिए तैयार हैं। ये महायोगिराज आपकी अन्तर्यात्रा को सुगम करने के लिए प्रत्येक सरंजाम जुटाएँगे। बस आपमें श्रद्धा और साहस की सम्पदा होनी चाहिए। ध्यान देने की बात यह है कि ऐसा कुछ आप में है, तो ही आप आमंत्रण के इन गीतों को सुन पाएँगे। तभी इन गीतों की स्वर लहरियाँ आपकी अन्तर्भावना में प्रभु प्रेम का रस घोलेंगी। ऐसा होने पर ही आपकी अन्तर्चेतना में जागरण का महोत्सव मनाया जा सकेगा।    

जीवन को महोत्सव बनाने वाले भगवान् की शरण में जाने के लिए उनकी स्पष्ट धारणा जरूरी है। साधक के मन में यह प्रश्न सदा से कौंधता रहा है—उन सर्वेश्वर का स्वरूप क्या है?  इस सवाल के जवाब में महर्षि अगला सूत्र कहते हैं-
क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः 
पुरुषविशेष ईश्वरः॥ १/२४॥
क्लेशकर्मविपाकाशयै= क्लेश, कर्म, विपाक और आशय- इन चारों से, अपरामृष्टः = जो सम्बन्धित नहीं है (तथा), पुरुषविशेषः = जो समस्त पुरुषों में उत्तम है, वह  ईश्वरः = ईश्वर है।

अर्थात् ईश्वर सर्वोत्कृष्ट है। वह दिव्य चेतना की वैयक्तिक इकाई है। वह जीवन के दुःखों से तथा कर्म उसके परिणाम से अछूता है।
    
अध्यात्म विज्ञान के महावैज्ञानिक महर्षि पतंजलि ईश्वर को बड़ी स्पष्ट रीति से परिभाषित करते हैं। यह परिभाषा साधकों के लिए आवश्यक ही नहीं, बल्कि अनिवार्य भी है। क्योंकि यह ऐसा शब्द है, ऐसा सत्य है जिसके बारे में ज्यादातर लोग भ्रमित हैं। शास्त्र, पुराण, धर्म, मजहब सबने मिलकर ईश्वर की अनेकों धारणाएँ गढ़ी है। कोई तो उसे सातवें आसमान में खोजता है, तो कोई मन्दिरों, पूजागृहों में ढूँढता है। कोई उसकी कल्पना मानवीय रूप में करता है, तो कोई आकार विहीन मानता है। बड़ी जहमत है-किसे कहें सही और किसे ठहराएँ गलत। सामान्य जनों की बात तो जाने दें, अध्यात्मवेत्ताओं तक का मन इस बारे में साफ नहीं है। वे भी कई तरह की भ्रान्तियों में उलझे हैं।
    
महर्षि पतंजलि अपने इस सूत्र में सभी की सभी तरह की भ्रान्तियों का एक साथ निराकरण करते हैं। वह कहते हैं कि पहले तो ईश्वर को किसी व्यक्तित्व में न बाँधो। वह सभी बन्धनों से मुक्त है। व्यक्तित्व के लिए जो पर्सनल्टी शब्द है, वह यूनानी शब्द पर्सोना से आया है। यूनान के गुजरे जमाने में वहाँ नाटक मण्डलियों में अभिनेता अपने चेहरों पर एक मुखौटा लगाया करते थे। इन मुखौटों को कहते थे ‘पर्सोना’ यानि वह चेहरा जो दिखावटी है, जिसे हम ओढ़े रहते हैं। विचार करने पर इस सम्बन्ध में कई मजेदार बातें सामने आएँगी। उदाहरण के लिए जब हम दूसरों के साथ कार्यालय में या कहीं और व्यवहार करते हैं, तो स्थिति कुछ और होती है। पर जब हम अपने बाथरूम में होते हैं, रात सोते समय बिस्तर पर होते हैं, तो स्थिति बदली हुई होती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ९९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

👉 क्षुद्रता की ठंडी आग से बचें

आज इसी प्रकार की क्षुद्र मनोवृत्तियों क  साम्राज्य है। कुढ़न और ईर्ष्या की आग में झुलसते रहने वाले व्यक्ति अपना मानसिक अहित तो करते ही हैं अपनी जलन बुझाने के लिए जो षडयंत्र रचते हैं उसमें उनकी उनकी इतनी शक्ति खर्च होती रहती है जिसकी बचत करके उपयोगी मार्ग में लगाया गया होता तो अपनी बहुत उन्नति हुई होती। लोगों का जितना समय और मनोयोग इन दुष्प्रवृत्तियों में लगता है यदि उतना आत्म−कल्याण अथवा दूसरों की सेवा-सहायता में लगता तो कितना बड़ा हित साधन हो सकता था। ईर्ष्या और कुढ़न की मूर्खता पर जितना ही गम्भीरता से विचार किया जाता है उतनी ही उसकी व्यर्थता और हानि स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगती है।

इन द्वेष वृत्तियों का परित्याग करके यदि मनुष्य अपने अन्दर सत्प्रवृत्तियों को बढ़ाने में लग जाय तो उसकी दुनियाँ आज की अपेक्षा कल दूसरी ही हो सकती है। दृष्टिकोण के बदलने से दृश्य बदलते हैं। नाव के मुड़ने से किनारे पलट जाते हैं। हमें इस प्रकार का सुधार अपने आप में निरन्तर करते चलना चाहिए। सुधार के लिए हर दिन शुभ है उसके लिए कोई आयु अधिक नहीं। बूढ़े और मौत के मुँह में खड़े हुए व्यक्ति भी यदि अपने में सुधार करें तो उन्हें भी आशाजनक सफलता प्राप्त हो सकती है। फिर जिनके सामने अभी लम्बा जीवन पड़ा है वे तो इस आत्म−सुधार की प्रक्रिया को धीरे−धीरे चलाते रहें तो भी अपने जीवन क्रम का कायाकल्प ही कर सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ५६)

समर्पण से सहज ही मिल सकती है—सिद्घि
    
परम पू. गुरुदेव ने अपनी व्यक्तिगत चर्चाओं के क्रम में एक दिन बताया था कि श्रद्धा वह अलौकिक तत्त्व है, जिससे पल-पल चमत्कार घटित होते हैं। एक शिष्य की जिज्ञासा में उन्होंने कहा-श्रद्धा क्या है? कैसी है? इसे लोग जानते ही कहाँ हैं बेटा! बस खाली जबान से श्रद्धा-श्रद्धा रटते रहते हैं, इसकी सच्चाई से कहाँ कोई वाकिफ है! यह सच्चाई समझ में आ जाये, तो फिर बाकी क्या बचता है। सब कुछ अपने आप ही हो जाता है। महायोगी परम पू. गुरुदेव के शब्दों में कहें, तो जिस प्रकार संकल्प सूक्ष्म शरीर की ऊर्जा है, उसी प्रकार श्रद्धा कारण शरीर की ऊर्जा की घनीभूत स्थिति है।

साधक जब अपने कारण शरीर पर केन्द्रित होता है, तो श्रद्धा जन्म लेती है। यह स्थिति भावुकता से विपरीत है। भावुकता भावनाओं की चंचल और अस्थिर स्थिति में उठती हैं, जबकि श्रद्धा के जन्मते ही भावनाएँ स्थिर, एकाग्र एवं लक्ष्य परायण होने लगती हैं। श्रद्धा की सघनता के क्रम में ये सभी तत्व बढ़ते हैं। साधक स्मरण रखे कि कारण शरीर हमारी मानवीय चेतना का केन्द्र है। हमारे अस्तित्व का गहनतम तल है। यहाँ संघनित होने वाली ऊर्जा का अन्य सभी तलों की ऊर्जा की अपेक्षा सर्वोपरि महत्त्व है। इसकी सामर्थ्य भी कहीं ज्यादा बढ़ी-चढ़ी है। यहाँ जो हो सकता है, वह कहीं और नहीं हो सकता।
    
स्थूल शरीर का सम्बन्ध कर्म जगत् यानि कि व्यवहार जगत् है, सूक्ष्म शरीर सीधे विचार जगत् यानि कि चिंतन जगत् से जुड़ा है, जबकि कारण शरीर सीधा महाकारण अर्थात् ब्राह्मी चेतना से है। यहाँ होने वाली हलचलें विचारों एवं कर्मों की दिशा तय करती है। ध्यान रहे, विचार हमें समर्पण के लिए प्रेरित तो कर सकते हैं, परन्तु समर्पण करा नहीं सकते। कर्म और विचार यानि कि स्थूल व सूक्ष्म की सभी शक्तियाँ मिलाकर भी कारण शरीर का मुकाबला नहीं कर सकती, जबकि कारण शरीर में उपजी हलचलें सूक्ष्म व स्थूल यानि कि कर्म व विचारों को अपने पीछे आने के लिए बाध्य व विचार कर सकती है।    
    
यही कारण है कि श्रद्धा व समर्पण परस्पर जुड़े है। सम्पूर्ण श्रद्धा सम्पूर्ण समर्पण को साकार करती है। और यह समर्पण या तो ईश्वर के प्रति होता है अथवा ईश्वरीय भावनाओं के प्रति जिसके साकार व सघन स्वरूप गुरुदेव होते हैं। श्रद्धा अपनी सघनता के अनुक्रम में ब्राह्मी चेतना में घुलने-मिलने लगती है। इस घुलने-मिलने का अर्थ है-ब्राह्मी चेतना के प्रवाह का साधक में प्रवाहित होना। ऐसी स्थिति बन पड़े, तो फिर सभी असम्भव स्वयं ही सम्भव बन जाते हैं। कृष्ण और मीरा का मिलन इसी तल पर हुआ था। श्री रामकृष्ण माँ काली से चेतना के इसी सर्वोच्च शिखर पर मिले थे। ऐसा होने पर समाधि सहज सम्भव होती है। क्योंकि जो प्रभु अर्पित है-जो ईश्वर की शरण में हैं, उनके लिए सब कुछ भगवान् स्वयं करते हैं। समाधि तो इस क्रम में बहुत ही सामान्य बात है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ९७
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 सिद्धान्तों और व्यवहार कुशलता में सामञ्जस्य हो

एक जंगल में एक महात्मा रहा करते थे। वे नित्य अपने शिष्यों को उपदेश दिया करते थे। एक दिन उन्होंने अपने शिष्यों को उपदेश दिया कि सर्वप्राणियों में परमात्मा का निवास है। अतः सभी का सम्मान करो और नमन करो। एक दिन उनका एक शिष्य बन में लकड़ियाँ लेने गया। उस दिन वहाँ यह शोर मचा हुआ था कि जंगल में एक पागल हाथी घूम रहा है। उससे बचने के लिए भागो। शिष्य ने सोचा कि हाथी में भी तो परमात्मा का निवास है मुझे क्यों भागना चाहिए। वह वहाँ ही खड़ा रहा। हाथी उसी की ओर चला आ रहा था। लोगों ने उसे भागने को कहा किन्तु वह टस से मस नहीं हुआ। इतने में हाथी पास में आया और उसे सूँड़ से पकड़कर दूर फेंक दिया। शिष्य चोट खाकर बेहोश हो गया। यह खबर गुरु को लगी तो वे उसे तलाश करते हुए जंगल में पहुँचे। कई शिष्यों ने उसे उठाया और आश्रम में ले आये और आवश्यक चिकित्सा की तब कहीं शिष्य होश में आया। एक शिष्य ने कुछ समय बाद उससे पूछा “क्यों भाई जब पागल हाथी तुम्हारी ओर आ रहा था तो तुम वहाँ से भागे क्यों नहीं?” उसने कहा—

“गुरुजी ने कहा था कि सब भूतों में नारायण का वास है यही सोचकर मैं भागा नहीं वरन् खड़ा रहा।” गुरुजी ने कहा “बेटा हाथी नारायण आ रहे थे यह ठीक है किन्तु अन्य लोगों ने जो भी नारायण ही थे तुम्हें भागने को कहा तो क्यों नहीं भागे?”

सब भूतों में परमात्मा का वास है यह तो ठीक है किन्तु मेल−मिलाप भले और अच्छे आदमियों से ही करना चाहिए। व्यावहारिक जगत में साधु−असाधु, भक्त −अभक्त , सज्जन-दुर्जनों का ध्यान रखकर व्यवहार व सम्बन्ध रखना चाहिए। जैसे किसी जल से भगवान की पूजा होती है, किसी से नहा सकते हैं, किसी से कपड़ा धोने एवं बर्तन माँजने का ही काम चलाते हैं। किसी जल को व्यवहार में ही नहीं लाते। वैसे जल देवता एक ही है। इसी प्रकार संसार में भी व्यवहार करना चाहिए।

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1962  

शनिवार, 24 अक्टूबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ५५)

समर्पण से सहज ही मिल सकती है—सिद्घि

सिद्घ योगियों द्वारा अपनाये गये इस पथ पर प्रकाश ही प्रकाश है। प्रकाशित पथ पर भी अन्धी आँखों वाले ठोकर खाते रहते हैं। यह अड़चन तब आती है-जब अपने आँखें तो होती हैं, पर पथ पर अँधेरा होता है। ऐसी स्थिति में बस भटकन ही गले पड़ती है।     
    
वस्तुतः आध्यात्मिक जीवन में तीन आँखों की जरूरत पड़ती है। इसमें पहला नेत्र है-आध्यात्मिक जीवन के प्रति निष्कपट जिज्ञासा। ऐसी जिज्ञासा वाले ही इस पथ पर चलने के लिए उत्सुक होते हैं। दूसरा नेत्र है-प्रचण्ड संकल्प। ऐसा संकल्प जगने पर ही अन्तर्यात्रा पर पहला कदम पड़ता है। यात्रा अविराम रहे, इसके लिए तीसरे नेत्र यानि भावभरी श्रद्धा की जरूरत पड़ती है।
    
भावभरी श्रद्धा के महत्त्व को अन्तर्यात्रा विज्ञान के महानतम वैज्ञानिक महर्षि पतंजलि भी स्वीकारते हैं। यह सत्य है कि संकल्प की ऊर्जा जिसकी जितनी है, वह उसी क्रम में अपनी साधना में सफल होगा। महासंकल्पवान् प्रचण्ड संकल्प के धनी अपने साधना पथ पर तीव्र गति से चलने में समर्थ होते हैं। संकल्प की इस ऊर्जा का स्रोत साधक का सूक्ष्म शरीर होता है। जिसका सूक्ष्म शरीर जितना प्रखर और पवित्र होता है, उसके संकल्प उतने ही ऊर्जावान् होते हैं। लेकिन इसके अलावा भी एक मार्ग है-क्या? इस प्रश्न के समाधान में महर्षि कहते हैं-

ईश्वरप्रणिधानाद्वा॥ १/२३॥
शब्दार्थ-वा= इसके सिवा; ईश्वरप्रणिधानात्=ईश्वर प्रणिधान से भी (समाधि में सफलता मिल सकती है)।
अर्थात् सफलता उन्हें भी उपलब्ध होती है, जो ईश्वर के प्रति समर्पित होते हैं।
    
महर्षि का यह सूत्र ‘गागर में सागर’ की तरह है। रत्नाकर कहे जाने वाले सागर में जितने रत्न भण्डार है, वे सभी इस सूत्र की गागर में है। ईश्वर समर्पण में बड़े ही गहन भाव समाये हैं। साधक इनके विस्तार का इसी से अनुमान कर सकते हैं कि आध्यात्मिक जगत् की दो महादुर्लभ विभूतियों महर्षि शाण्डिल्य एवं देवर्षि नारद ने इन पर अलग-अलग सूत्र लिखे हैं। शाण्डिल्य भक्ति सूत्र एवं नारद भक्ति सूत्र इन दोनों ग्रन्थों का आध्यात्मिक साहित्य में अनूठा स्थान है। यदि सार-संक्षेप में स्थिति बयान करें तो ये दोनों ही सूत्र ग्रन्थ-महर्षि पतंजलि के इस सूत्र की सरस व्याख्या भर है। यदि भगवान् महाकाल-परम बोधमय गुरुदेव की करुणा हुई, तो जिज्ञासु इस सत्य पर अनुभव भविष्य में कर सकेंगे।
    
अभी यहाँ पर तो इस सूत्र के विज्ञान का विवेचन ही अपेक्षित है। ईश्वर प्रणिधान या प्रभु को भावभरा समर्पण साधक की सघन श्रद्धा से ही सम्भव होता है। श्रद्धा है, तो ही समर्पण की बात बनेगी। श्रद्धा के अभाव में भला समर्पण की सम्भावनाएँ कहाँ। श्रद्धा और समर्पण ये दोनों ही आध्यात्मिक साहित्य में सुपरिचित शब्द हैं, परन्तु कम ही साधक होंगे, जो इनकी वैज्ञानिक स्थिति से परिचित होंगे। जबकि इनके विज्ञान को जानने वाला ही श्रद्धा के आध्यात्मिक प्रयोग कर सकता है। इस वैज्ञानिक प्रक्रिया से अपरिचित व्यक्ति के लिए ‘श्रद्धा’ या तो केवल एक शब्द है अथवा फिर कोरी भावुकता का दूसरा नाम।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ९६
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ५४)

चाहत नहीं, तड़प जगे 
    
यह साधना की गति के अनुसार ही होगा। इस संदर्भ में परम पूज्य गुरुदेव का एक कथन बड़ा ही बोधप्रद है। एक बार परस्पर की चर्चा में किसी शिष्य ने उनसे जानना चाहा कि गुरुदेव साधना से सिद्धि के बीच कितने समय का फासला है। उन्होंने जवाब दिया- बेटा! यह तो फासला तय करने वाले पर निर्भर है। इसी के साथ उन्होंने उससे एक प्रतिप्रश्न किया- अच्छा, चल तू यह बता कि हरिद्वार से रामेश्वरम् कितनी देर में पहुँचा जा  सकता है। पास बैठे शिष्य ने कहा- गुरुदेव लगभग तीन-चार दिन लग सकते हैं। बस-ट्रेन बदलते हुए इतना समय तो लग ही जाएगा। क्यों, यह समय कम-ज्यादा भी तो हो सकता है। इस वाक्य के साथ ही उन्होंने अपनी बात का खुलासा किया। यदि अपना सफर हवाईजहाज या हेलीकाप्टर से तय करें, तो यह समय अपने आप ही कम हो जाएगा। इसके विपरीत यदि सफर पैदल तय किया जाय, तो यह समय कई गुना बढ़ जाएगा।
    
सुनने वाले को गुरुदेव की बात का मर्म समझ में आ गया। पर अभी वह इसे और भी स्पष्ट करना चाहते थे। सो उन्होंने कहा- बेटा! साधना से सिद्धि का सफर इस पर निर्भर करता है कि साधना के कर्म, विचार व भाव में त्वरा एवं तीव्रता कितनी है। जिनकी गति मन्द है, उनके लिए यह फासला जन्मों लम्बा हो सकता है। जिनकी गति मध्यम है, वे घिसते, पिटते जीवन के अन्तिम छोर में सिद्धि के दर्शन कर पाएँगे। पर कुछ ऐसे भी महावीर, परम पराक्रमी होते हैं, जो अपने विचार एवं भाव तीर की तरह बना लेते हैं और इन्हें कर्म के धनुष पर चढ़ाकर इस गति से लक्ष्य की ओर बढ़ाते हैं कि सिद्धि मिलने में देर नहीं लगती। ऐसों के लिए जीवन का हर पल, हर क्षण, हर कर्म, हर विचार, हर भाव साधना का ही पर्याय बन जाता है। इनके लिए कुछ भी-कहीं भी असम्भव नहीं है। जो सच्चे साधक हैं, वे इस सच्चाई को अनुभव करते हैं कि गुनगुने-गुनगुने होकर रहने का नाम तप नहीं है। यह तो खौलते हुए, उबलते हुए जीने का नाम है। ऐसे व्यक्ति अपने स्थूलता जीवन की सीमाएँ लाँघ कर पलक झपकते सूक्ष्म व कारण के द्वार खोल लेता है।
    
परम पूज्य गुरुदेव की इन बातों को सुनकर सुनने वाले को स्वामी विवेकानन्द के जीवन की एक घटना का स्मरण हो आया। स्वामी जी अपने एक भाषण में बता रहे थे कि यदि कोई अपने सम्पूर्ण अस्तित्व का समग्र नियोजन कर सके, तो छह मास के भीतर आत्मज्ञान पाया जा सकता है। इस भाषण को सुनने वाले अनेकों थे। सभी ने इस वाक्य को अपने-अपने ढंग से सुना। कइयों ने तो इसे सुनकर भी अनसुना कर दिया। एक व्यक्ति ऐसा भी था, जिसे इस वाक्य में महावाक्य का बोध नजर आया। वह उठकर खड़ा हुआ और बोला- स्वामी जी, इज़ इट पासिबल? स्वामी जी का उत्तर था- यस इट इज़।
    
बस, उसने वहीं खड़े-खड़े उन्हें प्रणाम किया। और उस प्रवचन सभा से अपने कदम बढ़ाए। उसके मुख मण्डल पर संकल्प एवं समर्पण का मिश्रित तेज था। इस तेज को उस समय स्वामी जी को छोड़कर कोई नहीं देख पाया। दूसरों ने जो देखा, वह केवल इतना भर था कि वह व्यक्ति फिर अगले दिनों प्रवचन सभाओं में दिखाई नहीं पड़ा। रोज आने वाले लोग उसे भूल भी गए। इस क्रम में छह मास कब बीते पता ही न चला। हाँ, इस अवधि के बीतते-बीतते वह स्वयं एक दिन आ पहुँचा। अब की बार उसके मुख का आत्म ज्योति प्रकाशित थी। उसे देखते ही स्वामी जी ने उसे अपनी बाँहों में ले लिया और बोले- स्टर्डी, आफ्टर ऑल यू डिड दिस। हाँ स्वामी आपके आशीष से यह हो सका—ई.टी. स्टर्डी का उत्तर था। तो आपकी साधना से सिद्धि की समय अवधि आप पर निर्भर है। 

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ९४
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शनिवार, 17 अक्टूबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ५३)

चाहत नहीं, तड़प जगे 

योग के मार्ग पर नया-नया चलना आरम्भ किये  साधकों के लिए यह समाधि का महाद्वार खुल जाना सहज नहीं है। उनकी कतिपय आदतें, अतीत के संस्कार, पुरातन प्रवृत्तियाँ यह स्थिति पनपने नहीं देती। उनमें चाहत तो जगती है, लेकिन थोड़े ही दिनों में धूमिल और धुँधली होकर बिखर जाती है। ऐसों को समाधान कैसे मिले? इस यक्ष प्रश्न के समाधान में महर्षि बताते हैं-

मृदुमध्याधिमात्रात्वात्ततोऽपिविशेषः॥ १/२२॥
शब्दार्थ- मृदुमध्याधिमात्रत्वात्= साधना की मात्रा हलकी, मध्यम और उच्च होने के कारण; ततः= तीव्र संवेग वालों में; अपि= भी; विशेषः= (काल का) भेद हो जाता है।
    
अर्थात् योग साधना के प्रयास की मात्रा मृदु, मध्यम और उच्च होने के अनुसार सफलता की सम्भावना अलग-अलग होती है।
    
इस सूत्र में कई उलझी हुई गुत्थियों का समाधान है। जो साधक हैं, साधना करते हैं, उनके लिए इस समाधान को जानना जरूरी है। इस समाधान की पहली बात यह है कि साधना के लिए अपने आप का समग्र नियोजन जरूरी है। आधे-अधूरेपन से, ढीले-ढाले ढंग से काम चलने वाला नहीं है; पर साथ ही एक आश्वासन भी है। यह आश्वासन उनके लिए है, जिनकी साधना में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। जिनकी मनोभूमि अभी समग्र रूप से साधना के लिए नियोजित नहीं हुई है। ऐसे साधक जिनकी साधना कभी हल्की चलती है, तो कभी उसकी गति मध्यम हो जाती है। फिर कभी यकायक उसमें तीव्रता आ जाती है। इस उलट-पुलट की स्थिति से गुजरने वालों को महर्षि भरोसा दिलाते हैं कि द्वार तुम्हारे लिए भी खुलेंगे, पर इसमें समय लग सकता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ९३
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ५२)

तीव्र प्रयासों से मिलेगी, समाधि में सफलता

परम पूज्य गुरुदेव इस बारे में एक कहानी सुनाते थे। एक साधु थे बनारस में, नाम था हरिबाबा। उनके एक शिष्य ने उनसे पूछा कि मैं बहुत जप-तप करता हूँ, पर सब अकारण जाते हैं। भगवान् है भी या नहीं मुझे संदेह होने लगा है। हरिबाबा ने इस बात पर जोर का ठहाका लगाया और बोले- चल मेरे साथ आ, थोड़ी देर गंगा में नाव चलायेंगे और तेरे सवाल का जवाब भी मिल जायेगा।
    
बाढ़ से उफनती गंगा में हरिबाबा ने नाव डाल दी। उन्होंने पतवार उठाई, पर केवल एक। नाव चलानी हो तो दोनों पतवारें चलानी होती हैं, पर वह एक ही पतवार से नाव चलाने लगे। नाव गोल-गोल चक्कर काटने लगी। शिष्य तो डरा-पहले तो बाढ़ से उफनती गंगा उस पर से गोल-गोल चक्कर। वह बोला-अरे आप यह क्या कर रहे हैं, ऐसे तो हम उस किनारे कभी भी न पहुँचेंगे। हरिबाबा बोले- तुझे उस किनारे पर शक आता है या नहीं? शिष्य बोला-यह भी कोई बात हुई, जब यह किनारा है तो दूसरी भी होगा। आप एक पतवार से नाव चलायेंगे, तो नाव यूँ ही गोल चक्कर काटती रहेगी। यह एक दुष्चक्र बनकर रह जायेगी।
    
हरिबाबा ने दूसरी पतवार उठा ली। अब तो नाव  तीर की तरह बढ़ चली। वह बोले-मैं तुझसे भी यही कह रहा हूँ कि तू जो परमात्मा की तरफ जाने की चेष्टा कर रहा है-वह बड़ी आधी-अधूरी है। एक ही पतवार से नाव चलाने की कोशिश हो रही है। आधा मन तेरा इस किनारे पर उलझा है, आधा मन उस किनारे पर जाना चाहता है। तू आधा-आधा है। तू बस यूँ ही कुनकुना सा है। जबकि साधना में साधक की जिन्दगी खौलती हुई होनी चाहिए।
    
गुरुदेव कहते थे- साधना भी और वासना भी, बस आधा-आधा हो गया। यह आधापन छोड़ना ही पड़ेगा। साधना करनी है, तो पूरी साधना करो। तीव्र, प्रगाढ़ और सच्ची। साधक की साधना धुएँ से घुधुँआती आग नहीं, धधकती हुई ज्वालाएँ होनी चाहिए। साधना जिस किसी तरह न करके उसे तीव्रतम और प्रचण्डतम होना चाहिए। कुछ इस तरह जैसा कि शायर ने कहा है-
लज्जते-काम और तेज करो
तल्खि-ए जाम और तेज करो
जेरे दीवार आँच कम-कम है
शोला-ए बाम और तेज करो
उस तपिश को जो खूँ रुलाती है
सहर-ओ-शाम और तेज करो
परा-तक्पीले-पुख्ताकशी-ए शौक
हवसे-खाम और तेज करो
हम पे हो जाये खत्म नाकामी
सई-ए नाकाम और तेज करो
ज्वदा खुद ही है साजिशे खमो पेच
साजिशे गाम और तेज करो
सुस्त-गामी हमें पसन्द नहीं
रक्से अय्याम और तेज करो
गर्दिशे वक्त ले न डूबे कहीं
गर्दिशे-जाम और तेज करो॥
    
बड़ी ही प्रेरणाप्रद हैं ये पंक्तियाँ। जो इसके मूल को नहीं समझ पा रहे हैं, उनके लिए इसका संक्षिप्त भाव है कि अपने प्रयासों में तेजी लाओ, समग्रता लाओ। अगर  इच्छा की है, तो इच्छा के स्वाद को और तीव्र करो। अगर उस तरफ बढ़े ही हो, तो फिर डरो मत तिक्त स्वाद से। उन्माद की परिपक्वता के लिए-पागलपन पूरा होना चाहिए। कच्ची चाहत से काम चलने वाला नहीं है; चाहत पक्की होनी चाहिए। भला ऐसे धीरे-धीरे क्या चलना? एक पाँव इधर, तो एक पाँव उधर। समय के नृत्य को और तेज करो। अब समय ज्यादा नहीं है, चूको मत- जल्दी करो तेजी लाओ। साधना अपनी पूरा त्वरा पर ही होनी चाहिए। सौ डिग्री पर पानी उबलता है, तो भाप बन पाता है। साधना भी जब सौ प्रतिशत होती है, तो अहंकार विलीन हो जाता है। सम्पूर्णता में पहुँचना ही होगा। इसके सिवा कोई अन्य मार्ग नहीं है। 

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ९१
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...