शनिवार, 10 अगस्त 2019

👉 हम बदलेंगे युग बदलेगा

बड़े आदमी बनने की हविस और ललक स्वभावतः हर मनुष्य में भरी पड़ी है। उसके लिये किसी को सिखाना ही पड़ता। धन, पद, इन्द्रिय सुख, प्रशंसा, स्वास्थ्य आदि कौन नहीं चाहता? वासना और तृष्णा की पूर्ति में कौन व्याकुल नहीं है? पेट और प्रजनन के लिये किसका चिंतन योचित नहीं है। अपने परिवार को हमने बड़े आदमियों के समूह बनाने की बात कभी नहीं सोची। उसे महापुरुषों का देव समाज देखने की ही अभिलाषा सदा से रही वस्तुतः महा मानव बनना ही व्यक्तिगत जीवन का संकल्प और समाज का सौभाग्य माना जा सकता है। मनुष्य जीवन की सार्थकता महा मानव बनने में है। इसके अतिरिक्त आज की परिस्थितियां महा मानवों की इतनी आवश्यकता अनुभव करती है कि उन्हीं के लिये सर्वत्र त्राहि-त्राहि मची हुई है। हर क्षेत्र उन्हीं के अभाव में वीरान और विकृत हो रहा है ओछे स्तर के- बड़प्पन के भूखे लोग बरसाती उद्भिजों की तरह अहर्निश बढ़ते चले जा रहे हैं पर महामानवों की उद्भव स्थली सूनी पड़ी है। गीदड़ों के झुण्ड बढ़ चले पर सिंहों की गुफाएं सुनसान होती चली जा रही है। इस युग की सब से बड़ी आवश्यकता महामानवों का उद्भव होना ही है। वे बढ़ने तो ही विश्व के हर क्षेत्र में संव्याप्त उलझनों और शोक सन्तापों का समाधान होगा। अपने परिवार का गठन हमने इसी प्रयोजन के लिये किया था इस खान से नर रत्न निकले और विश्व इतिहास का एक नया अध्याय आरम्भ करें। युग-परिवर्तन जैसे महान् अभियान को उथले स्तर के व्यक्तियों द्वारा नहीं केवल उन्हीं लोगों से सम्पन्न किया जा सकता है जिनको महापुरुषों की श्रेणी में खड़ा किया जा सके।

हर विभूति कुछ मूल्य देकर खरीदी जाती है। उपहार पाने के लिये भी पात्रता उत्पन्न करनी पड़ती है। समय आ गया कि अपने विशाल परिवार के सामने उन प्रयोगों को प्रस्तुत करें जो आत्मबल सम्पन्न तथा लोक निर्माण में समर्थ व्यक्तियों के लिये अनिवार्य रूप से आवश्यक है। हमने अपनी जीवन साधना में इन तत्वों का समावेश किया और मंजिल की एक सन्तोष जनक लम्बाई पार कर चुके। अपने हर अनुयायी से इस अवसर पर यही अनुरोध कर सकते हैं कि जितना अधिक सम्भव हो इसी मार्ग पर कदम बढ़ायें जिस पर हम चलते रहे है। महामानव बनने के लिए जिन त्याग बलिदानोँ का मूल्य चुकाना पड़ता है आत्म परिष्कार का जो प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है, उसी की चर्चा यहाँ कर रहे है।

हम अपने जीवन का भावी कार्यक्रम निर्धारित कर चुके है, अपनी धर्म-पत्नी को एक निश्चित कार्य-पद्धति में जुटा दिया। हमारे साथ चल सकने की हिम्मत जिनने दिखाई उन्हें बुला कर युग-निर्माण योजना में जुटा दिया। गायत्री तपोभूमि में एक ऐसी टीम छोड़ दी जो हमारे संगठनात्मक, प्रचारात्मक, रचनात्मक और संघर्षात्मक मोर्चों पर समर्थ चतुरंगिणी की तरह लड़ती रहेगा। अब हमारा विशाल परिवार ही शेष रह गया है जिसे कुछ अन्तिम निर्देश देकर जाना है। कितने व्यक्ति कहते रहते हैं कि हम आपके साथ हिमालय चलेंगे। उनसे यही कहना है कि वे आदर्शों के हिमालय पर उसी तरह चढ़ें जिस तरह हम जीवन भर चढ़ते रहे। तपश्चर्या का मार्ग अति कठिन है। हमारी हिमालय यात्रा काश्मीर की सैर नहीं है जिसका मजा लूटने हर कोई विस्तार बाँधकर चलदे। उसकी पात्रता उसी में हो सकती है। जिसने आदर्शों के हिमालय पर चढ़ने की प्राथमिक पात्रता एकत्रित कर ली। सो हम अपने हर अनुयायी से अनुरोध करते रहे है और अब अधिक कहें और अधिक सजीव शब्दों में अनुरोध करते हैं कि वे बड़प्पन की आकाँक्षा को बदल कर महानता की आराधना शुरू करदें। यह युग परिवर्तन का शुभारम्भ है जो हमारे परिजनों को तो आरम्भ कर देना चाहिए। हम बदलेंगे युग बदलेगा’ का नारा-हमें अपने व्यक्तिगत जीवन कि विचार पद्धति और कार्य-प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन प्रस्तुत करके सार्थक बनाना चाहिए। निःसन्देह अपने परिवार में इस प्रकार का बदलाव यदि आ जाये तो फिर कोई शक्ति युग-परिवर्तन एवं नव-निर्माण को सफल बनाने में बाधक न हो सकेंगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जून १९७१, पृष्ठ ५६

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/June/v1.56

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ४६)

👉 मंत्रविद्या असम्भव को सम्भव बनाती हैं

मंत्र चिकित्सा अध्यात्म विद्या का महत्त्वपूर्ण आयाम है। इसके द्वारा असाध्य रोगों को ठीक किया जा सकता है। कठिनतम परिस्थितियों पर विजय पायी जा सकती है। व्यक्तित्व की कैसी भी विकृतियाँ व अवरोध दूर किये जा सकते हैं। अनुभव कहता है कि मंत्र विद्या से असम्भव- सम्भव बनता है, असाध्य सहज साध्य होता है। जो इस विद्या के सिद्धान्त एवं प्रयोगों से परिचित हैं वे प्रकृति की शक्तियों को मनोनुकूल मोड़ने में समर्थ होते हैं। प्रारब्ध उनके वशवर्ती होता है। जीवन की कर्मधाराएँ उनकी इच्छित दिशा में मुड़ने और प्रवाहित होने के लिए विवश होती हैं। इन पंक्तियों को पाठक अतिशयोक्ति समझने की भूल न करें। बल्कि इसे विशिष्ट साधकों की कठिन साधना का सार निष्कर्ष मानें।

मंत्र है क्या? तो इसके उत्तर में कहेंगे- ‘मननात् त्रायते इति मंत्रः’ जिसके मनन से त्राण मिले। यह अक्षरों का ऐसा दुर्लभ एवं विशिष्ट संयोग है, जो चेतना जगत् को आन्दोलित, आलोड़ित एवं उद्वेलित करने में सक्षम होता है। कई बार बुद्धिशील व्यक्ति मंत्र को पवित्र विचार के रूप मं परिभाषित करते हैं। उनका ऐसा कहना- मानना गलत नहीं है। उदाहरण के लिए गायत्री महामंत्र सृष्टि का सबसे पवित्र विचार है। इसमें परमात्मा से सभी के लिए सद्बुद्धि एवं सन्मार्ग की प्रार्थना की गयी है। लेकिन इसके बावजूद इस परिभाषा की सीमाएँ सँकरी हैं। इसमें मंत्र के सभी आयाम नहीं समा सकते। मंत्र का कोई अर्थ हो भी सकता है और नहीं भी। यह एक पवित्र विचार हो भी सकता है और नहीं भी। कई बार इसके अक्षरों का संयोजन इस रीति से होता है कि उससे कोई अर्थ प्रकट होता है और कई बार यह संयोजन इतना अटपटा होता है कि इसका कोई अर्थ नहीं खोजा जा सकता।

दरअसल मंत्र की संरचना किसी विशेष अर्थ या विचार को ध्यान में रख कर की नहीं जाती। इसका तो एक ही मतलब है- ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की किसी विशेष धारा से सम्पर्क, आकर्षण, धारण और उसके सार्थक नियोजन की विधि का विकास है। मंत्र कोई भी हो वैदिक अथवा पौराणिक या फिर तांत्रिक इसी विधि के रूप में प्रयुक्त होते हैं। इस क्रम में यह भी ध्यान रखने की बात है कि मंत्र की संरचना या निर्माण कोई बौद्धिक क्रियाकलाप नहीं है। कोई भी व्यक्ति भले ही कितना भी प्रतिभावान् या बुद्धिमान क्यों न हो, वह मंत्रों की संरचना नहीं कर सकता। यह तो तप साधना के शिखर पर पहुँचे सूक्ष्म दृष्टाओं व दिव्यदर्शियों का काम है।

ये महासाधक अपनी साधना के माध्यम से ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की विभिन्न व विशिष्ट धाराओं को देखते हैं। इनकी अधिष्ठातृ शक्तियाँ जिन्हें देवी या देवता कहा जाता है, उन्हें प्रत्यक्ष करते हैं। इस प्रत्यक्ष के प्रतिबिम्ब के रूप में मंत्र का संयोजन उनकी भावचेतना में प्रकट होता है। इसे ऊर्जाधारा या देवशक्ति का शब्द रूप भी कह सकते हैं। मंत्र विद्या में इसे देव शक्ति का मूल मंत्र कहते हैं। इस देवशक्ति के ऊर्जा अंश के किस आयाम को और किस प्रयोजन के लिए ग्रहण- धारण करना है उसी के अनुरूप इस देवता के अन्य मंत्रों का विकास होता है। यही कारण है कि एक देवता या देवी के अनेकों मंत्र होते हैं। यथार्थ में इनमें से प्रत्येक मंत्र अपने विशिष्ट प्रयोजन को सिद्ध व सार्थक करने में समर्थ होते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ६७

👉 आत्मचिंतन के क्षण 10 Aug 2019

■  हम आज जहाँ हैं वही से आगे बढ़ने का प्रयत्न करें। पूर्णता की ओर चलने की यात्रा आरम्भ करें। दोषों को ढूँढें और उन्हें सुधारे। गुणों का महत्व समझें और उन्हें अपनाएँ। इस प्रकार आन्तरिक पवित्रता में जितनी कुछ अभिवृद्धि हो सकेगी उतने का भी दूसरों पर अच्छा प्रभाव पडे़गा। सन्मार्ग की दिशा में चलने के लिए उठाया हुए प्रत्येक कदम अपने लिए ही नहीं, समस्त संसार के लिए श्रेयस्कर होता है।

◇ ओ,  मानवधारी परमात्मा के अमरपुत्र। अपने पिता की सम्पत्ति को सम्भालो। यह सब तुम्हारे पिता की है, इसलिये तुम्हारी है। सबको अपना समझो और अपनी वस्तु की तरह विश्व की समस्त वस्तुओं को अपनी प्रेम की छाया में रखों। सबकों आत्मभाव और आत्मदृष्टि से देखो। 

★ आग बुझाने के लिए पानी डालना पड़ता है। अन्धकार होते ही दिया जलाना पड़ता है। ये बातें किसे नहीं मालूम है? और यदि ये बातें समझ में आती हैं तो सन्तों को यह बात क्यों नहीं समझाना चाहिए कि क्रोध को प्रेम से, बुराई को भलाई से, कृपणता को उदारता से और असत्य को सत्य से जीतना चाहिए। ये बातें भी व्यवहार की हैं।

◇ यदि आप यह जानना चाहें कि आप उन्नति कर रहे या नहीं, तो इसके लिए अधिक आत्म विवेचन करने की आवश्यकता नहीं है। इस बात को आप केवल यह देखकर समझ सकते है कि आपकी रुचि उत्तरोत्तर परिमार्जित हो रही है या नहीं। यदि आपकी रुचि सुसंस्कृत और निर्मल हो रही है तो आश्वास होकर अपने से कह सकते है कि मैं उन्नति कर रहा हूँ।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Solving Life’s Problems - Part 4

Many common problems are caused by wrong attitudes. People see themselves as the center of the universe and judge everything as it relates to them. Naturally you won’t be happy that way. You can only be happy when you see things in proper perspective: all human beings are of equal importance in God’s sight, and have a job to do in the divine plan.

I’ll give you an example of a woman who had some difficulty finding out what her job was in the divine plan. She was in her early forties, single, and needed to earn a living. She hated her work to the extent that it made her sick, and the first thing she did was to go to a psychiatrist who said he would adjust her to her job. So after some adjustment she went back to work. But she still hated her job. She got sick again and then came to me. Well, I asked what her calling was, and she said, “I’m not called to do anything.”

That was not true. What she really meant was she didn’t know her calling. So I asked her what she liked to do because if it is your calling you will do it as easily and joyously as I walk my pilgrimage. I found she liked to do three things. She liked to play the piano, but wasn’t good enough to earn her living at that. She liked to swim, but wasn’t good enough to be a swimming instructor, and she liked to work with flowers.

To be continued...
📖 From Akhand Jyoti

मंगलवार, 6 अगस्त 2019

उपासना का महत्त्व | Intercession & its Significance | Pt Shriram Sharma ...



Title

He Prabhu Apni Krupa Ki | हे प्रभु! अपनी कृपा की | Pragya Geet



Title

👉 राम का स्थान कहाँ?

एक सन्यासी घूमते-फिरते एक दुकान पर आये, दुकान मे अनेक छोटे-बड़े डिब्बे थे, सन्यासी के मन में जिज्ञासा उतपन्न हुई, एक डिब्बे की ओर इशारा करते हुए सन्यासी ने दुकानदार से पूछा, इसमे क्या है?

दुकानदारने कहा - इसमे नमक है ! सन्यासी ने फिर पूछा, इसके पास वाले मे क्या है? दुकानदार ने कहा, इसमे हल्दी है! इसी प्रकार सन्यासी पूछ्ते गए और दुकानदार बतलाता रहा, अंत मे पीछे रखे डिब्बे का नंबर आया, सन्यासी ने पूछा उस अंतिम डिब्बे मे क्या है? दुकानदार बोला, उसमे राम-राम है!

सन्यासी ने हैरान होते हुये पूछा राम राम? भला यह राम-राम किस वस्तु का नाम है भाई? मैंने तो इस नाम के किसी समान के बारे में कभी नहीं सुना। दुकानदार सन्यासी के भोलेपन पर हंस कर बोला - महात्मन! और डिब्बों मे तो भिन्न-भिन्न वस्तुएं हैं, पर यह डिब्बा खाली है, हम खाली को खाली नही कहकर राम-राम कहते हैं! संन्यासी की आंखें खुली की खुली रह गई !

जिस बात के लिये मैं दर दर भटक रहा था, वो बात मुझे आज एक व्यपारी से समझ आ रही है। वो सन्यासी उस छोटे से किराने के दुकानदार के चरणों में गिर पड़ा,,, ओह, तो खाली मे राम रहता है !

सत्य है भाई भरे हुए में राम को स्थान कहाँ? (काम, क्रोध,लोभ,मोह, लालच, अभिमान, ईर्ष्या, द्वेष और भली- बुरी, सुख दुख, की बातों से जब दिल-दिमाग भरा रहेगा तो उसमें ईश्वर का वास कैसे होगा? राम यानी ईश्वर तो खाली याने साफ-सुथरे मन मे ही निवास करता है!)

एक छोटी सी दुकान वाले ने सन्यासी को बहुत बड़ी बात समझा दी थी! आज सन्यासी अपने आनंद में था।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 6 August 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 6 Augest 2019


👉 स्वर्णिम ऊषा का उदय

अगले क्षणों जिस स्वर्णिम ऊषा का उदय होने वाला है, उसके स्वागत की तैयारी में हमें जुट जाना चाहिये। अपना ज्ञान-यज्ञ इसी प्रकार का शुभारम्भ मंगलाचरण है। असुरता की पददलित और मानता की पुण्य प्रतिष्ठापना का अपना व्रत संकल्प ईश्वरीय प्रेरणा का प्रतीक है। उसकी व्यापकता एवं सफलता सुनिश्चित है। प्रश्न केवल इतना भर है कि जिन आत्माओं में उसके लिए आवश्यक प्रकाश आगे बढ़कर अपने शौर्य प्रक्रियाएँ अपने ढंग से सम्पन्न होना है, वे परिपूर्ण होकर रहेंगी। किसी व्यक्ति के साहस या कार्यपन्न की प्रतीक्षा किये बिना गति अपने पथ पर अग्रसर होती रहेगी, उठा हुआ तूफान अपने वेग से बढ़ता रहेगा। प्रश्न इतना भर है कि जिन्हें कुछ महत्त्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करनी थी, वे समय रहते सजग हुए या अवसाद की मूर्छा में पड़े हुए, अपने को कलंक एवं पश्चाताप का भागी बनाने का दुर्भाग्य पूर्ण खेल खेलते रहें।

हम भाग्यशाली हैं, जो सस्ते में निपट रहे हैं। असली काम और बढ़े-चढ़े त्याग बलिदान अगले लोगों को करने पड़ेंगे। अपने जिम्मे ज्ञान-यज्ञ का समिधाधान और आज्याहुति होम मात्र प्रथम चरण आया है। आकाश छूने वाली लपटों में आहुतियाँ अगले लोग देंगे। हम प्रचार और प्रसार की नगण्य जैसी प्रक्रियाएँ पूरी करके सस्ते में छूट रहे हैं। रचनात्मक और संघर्षात्मक अभियानों का बोझ तो अगले लोगों पर पड़ेगा। कोई प्रबुद्ध व्यक्ति नव-निर्माण के इस महाभारत में भागीदार बने बिना बच नहीं सकता। इस स्तर के लोग कृपणता बरतें तो उन्हें बहुत महंगी पड़ेगी। लड़ाई के मैदान से भाग खड़े होने वाले भगोड़े सैनिकों की जो दुर्दशा होती है, अपनी भी उससे कम न होगी। चिरकाल बाद युग परिवर्तन की पुनरावृत्ति हो रही है। रिजर्व फोर्स के सैनिक मुद्दतों से मौज-मजा करते रहें, कठिन प्रसंग साथ ने आया तो कतराने लगे, यह अनुचित है। परिजन एकान्त में बैठकर अपनी वस्तुस्थिति पर विचार करें, वे अन्न कीट और भोग कीटों की पंक्ति में बैठने के लिए नहीं जन्मे हैं। उनके पास जो आध्यात्मिक सम्पदा है, वह निष्प्रयोजन नहीं है। अब उसे अभीष्ट विनियोग में प्रयुक्त किये जाने का समय आ गया, सो उसके लिये अग्रसर होना ही चाहिये।

हमारा आज का ज्ञान-यज्ञ छोटा-सा है। उसका उत्तर दायित्व भी नगण्य सा हम लोगों के कन्धों पर आया है। युग-निर्माण की विशालकाय प्रक्रिया में यह बीजारोपण मात्र है। इसका श्रेय, सुअवसर हमें मिला हो तो उसे करने के लिए उत्साह के साथ आगे आना चाहिये। प्रस्तुत छोटे से क्रिया-कलाप को-ज्ञान-यज्ञ के प्रस्तुत कार्यक्रम को गतिशील बनाने के लिए हमें बिना कुषण्ता दिखाये अपने उत्तरदायित्व निबाहने के लिये निष्ठा और उल्लासपूर्वक अग्रसर होना चाहिये। अपना ज्ञान-यज्ञ अधूरा न रहना चाहिये।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, सितंबर १९६९, पृष्ठ ६७



http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/September/v1.67

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ४५)

👉 तंत्र एक सम्पूर्ण विज्ञान, एक चिकित्सा पद्धति

इस प्रवाहमान सृष्टि में इसमें संव्याप्त ऊर्जा धाराएँ भी प्रवाहित हैं। इनमें से प्रत्येक की स्थिति, क्षमता, प्रकृति, दिशा सभी कुछ अलग है। कुछ निश्चित क्षणों में एक विशिष्ट रीति से इनका मिलन होता है। इन पलों में इनके विशेष प्रभाव पदार्थ पर भी पड़ते हैं और स्थान पर भी। मंत्र या यंत्र साधना भी इससे प्रभावित होती हैं। यही वजह है कि विशेष साधना के लिए विशेष क्षणों का चयन करना पड़ता है। जैसे ग्रहण का समय, दीवाली या होली की रातें अथवा फिर शिवरात्रि या नवरात्रि के अवसर। कुछ विशेष योग भी इसमें उपादेय माने गये हैं। जैसे- गुरुपुण्य, रविपुण्य योग, सर्वार्थ सिद्धि, अमृतसिद्धि योग। इन पुण्य क्षणों में तंत्र तकनीकें शीघ्र फलदायी होती हैं।

जिन्हें इन सबका सम्पूर्ण ज्ञान होता है, वही अपनी आध्यात्मिक चिकित्सा में तंत्र की तकनीकों का प्रयोग करने में सक्षम हो पाते हैं। तांत्रिकों के आराध्य बाबा कीनाराम इस प्रक्रिया के परम विशेषज्ञ थे। उनके बारे में कहा जाता है कि जो बाबा विश्वनाथ कर सकते हैं, वही बाबा कीनाराम भी कर सकते हैं। अपने बारे में इस उक्ति पर वह हँसते हुए कहते हैं- अरे! यहाँ है ही क्या रे, यहाँ सब तो कणों की धूल का बवण्डर है। महामाया की ऊर्जा का खेल भर है। उन्होंने जो दिखा दिया है, मैं वही करता रहता हूँ। एक बार उनके यहाँ एक प्रौढ़ महिला अपने बीस वर्षीय बेटे को लेकर आयी। उसका लड़का लगभग मरणासन्न था। सभी चिकित्सकों ने उसे असाध्य घोषित कर दिया था। वह जब बाबा कीनाराम के पास आयी तो उन्होंने कहा- अभी जा शाम के समय आना। वह बहुत रोयी, गिड़गिड़ाई, पर वे नहीं माने। एक नजर सूरज की ओर देखा और शाम को आने को बोल दिया।

लाचार महिला क्या करती। रोती- कलपती चली गयी और शाम को पहुँची। बाबा कीनाराम ने वही घाट के पास से एक पत्ती तोड़ी और उसका रस उस युवक के मुँह में निचोड़ दिया। सभी को भारी अचरज तब हुआ जब वह मरणासन्न युवक उठ बैठा। उपस्थित जन उनकी जयकार करने लगे। इस पर वह सभी को डपटते हुए बोले- अरे जय बोलते हो तो महाकाल की बोलो। इस क्षण की बोलो। इस क्षण का विशेष महत्त्व है। इसमें प्रयोग किया जाने वाली औषधि एवं मंत्र मुर्दे में भी जान डाल सकती है। दरअसल यह बाबा कीनाराम के द्वारा प्रयोग की गई चिकित्सा की विशेष विधि थी, जो मंत्र चिकित्सा पर आधारित थी। इसके सफल प्रयोग ने उस युवक को नवजीवन दे दिया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 65

👉 आत्मचिंतन के क्षण 6 Aug 2019

■  इस चिर-दुर्लभ मानव-जीवन को पाकर छोटे-छोटे कर्म फलों के लिये लालायित रहता है, वह परमात्मा के साक्षात्कार जैसे परमलाभ से वंचित रह जाता है। प्रत्येक कर्म को परमात्मा का समझकर करने और उसके फल को भी उसका समझ लेने में मनुष्य का अपना कुछ बिगड़ता नहीं, तब न जाने वह क्यों कर्माभिमानी बनकर अनमोल मानव-जीवन का दुरुपयोग किया करता है?

◇ मनुष्य जीवन एक बहुमूल्य अवसर है। यह बार-बार नहीं आता। मनुष्य जीवन एक ऐसा अवसर है, जिसका सदुपयोग करके कोई भी सच्चिदानन्द परमात्मा को पा सकता है। तुच्छ शारीरिक भोगों की तुलना में जो सर्वसुख रुप परमात्मा के साक्षात्कार और परामद मोक्ष की उपेक्षा करता है, जो चिन्तामणि को गुंजा फल के लोभ में त्याग देता है।

★ सर्वांगीण  मनुष्यत्व की साधना के लिए शरीर, वाक् और मन से सत्य को ग्रहण करना होगा। सत्य को केवल बुद्धि के द्वारा जानने से ही काम नहीं चलेगा वरन उसके लिए आंतरिक अनुराग होना चाहिए और उसका आश्रय ग्रहण करके परम आनन्द प्राप्त करना चाहिए।
स्वयं शान्ति से रहना और दूसरों को शान्ति से रहने देना यही जीवन जीने की सर्वोत्तम नीति है। दूसरों के साथ वह व्यवहार न करें जो हमें अपने लिये पसन्द नहीं। सत्य ही बोलना चाहिए। सभी से प्रेम करना चाहिए और अन्याय के मार्ग पर एक कदम भी नहीं धरना चाहिए। श्रेष्ठ, सदाचारी और परमार्थयुक्त जीवन ही मनुष्य की उपयुक्त बुद्धिमत्ता कही जा सकती है।

◇ धर्म का तात्पर्य है-सदाचरण, सज्जनता, संयम, न्याय , करुणा और सेवा। मानव प्रवृत्ति में इन सत्तत्त्वों को समाविष्ट बनाये रखने के लिये धर्म मान्यताओं को मजबूती से पकडे़ रहना पड़ता है। मनुष्य-जाति की प्रगति उसकी इसी प्रवृत्ति के कारण संभव हो सकी है। यदि व्यक्ति अधार्मिक, अनैतिक एवं उद्धत मान्यताएँ अपना ले तो उसका ही नहीं समाज का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Solving Life’s Problems - Part 3

Difficulties with material things often come to remind us that our concentration should be on spiritual things instead of material things. Sometimes difficulties of the body come to show that the body is just a transient garment, and that the reality is the indestructible essence which activates the body. But when we can say, “Thank God for problems which are sent for our spiritual growth,” they are problems no longer. They then become opportunities.

Let me tell you a story of a woman who had a personal problem. She lived constantly with pain. It was something in her back. I can still see her, arranging the pillows behind her back so it wouldn’t hurt quite so much. She was quite bitter about this. I talked to her about the wonderful purpose of problems in our lives, and I tried to inspire her to think about God instead of her problems. I must have been successful to some degree, because one night after she had gone to bed she got to thinking about God.

“God regards me, this little grain of dust, as so important that he sends me just the right problems to grow on,” she began thinking. And she turned to God and said, “Oh, dear God, thank you for this pain through which I may grow closer to thee.” Then the pain was gone and it has never returned. Perhaps that’s what it means when it says: ‘In all things be thankful.’ Maybe more often we should pray the prayer of thankfulness for our problems.

Prayer is a concentration of positive thoughts.

To be continued...
📖 From Akhand Jyoti

👉 एकता और समता का आदर्श

राष्ट्रीय एकता का वास्तविक तात्पर्य है-मानवीय एकता। मनुष्य की एक जाति है। उसे किन्हीं कारणों से विखण्डित नहीं होना चाहिए। भाषा, क्षेत्र, सम्प्र्रदाय, जाति, लिंग, धन, पद आदि के कारण किसी को विशिष्ट एवं किसी को निकृष्ट नहीं माना जाना चाहिए। सभी को समाज में उचित स्थान और सम्मान मिलना चाहिए। उपरोक्त कारणों में से किसी को भी यह अधिकार नहीं मिलना चाहिए कि अपने को बड़प्पन के अहंकार से भरे और दूसरे को हेय समझे।
  
कई प्रान्तों में सम्प्रदाय विशेष के सदस्य होने के कारण अथवा पृथक् भाषा-भाषी होने के कारण अपने वर्ग-वर्ण को पृथक् मानने और राष्ट्रीय धारा से कटकर अपनी विशेष पहचान बनाने की प्रवृत्ति चल पड़ी है। इसे शान्त करने के लिए वैसे ही प्रयत्न कि ए जाने चाहिए, जैसे अग्निकाण्ड आरम्भ होने पर उसके फै लने से पूर्व ही किए जाते हैं। समता और एकता के उद्यान उजाड़ डालने की छूट किसी को भी नहीं मिलनी चाहिए। द्वेष को प्रेम से जीता जाता है। विग्रह को तर्क, तथ्य, प्रमाण प्रस्तुत करते हुए विवेकपूर्वक शान्त किया जाता है। इसलिए दुर्भाव और विग्रहों के पनपते ही उनके शमन समाधान का प्रयत्न करना चाहिए।
  
यह सामयिक उभार है, जो देश का बुरा चाहने वालों को दुरभिसंधि के कारण उठ खड़े हुए हैं। यह विषवेलि पानी न मिलने पर समयानुसार सूख जायेगी। पर कुछ व्याधियाँ ऐसी हैं, जो चिरकाल से चली आने के कारण प्रथा परिपाटी बन गई हैं और उनके कारण देश की क्षमता तथा एकता दुर्बल होती चली आई है। समय आ गया है कि उन भूलों को अब समय रहते सुधार लिया जाय। अन्यथा यह सड़ते हुए फोड़े समूचे शरीर को विषैला कर सकते हैं।
  
जब सभी मनुष्यों की संरचना, रक्त-माँस की बनावट एक जैसी है, तो उनमें से किसे ऊँचा, किसे नीचा कहा जा सकता है? ऊँच-नीच तो सत्कर्म और कुकर्म के कारण बनते हैं। उसका जाति-वंश से कोई सम्बन्ध नहीं। धर्म एक है। सम्प्रदायों का प्रचलन तो समय और क्षेत्रों की आवश्यकता के अनुरूप हुआ है। उनमें से जो जिसे भावे, वह उसे अपनावे। खाने-पहनने सम्बन्ध विभिन्न रुचि को जब सहन किया जाता है, तो भिन्न-भिन्न देवताओं की पूजा, भिन्न परम्पराओं का अपनाया जाना किसी को क्यों बुरा लगना चाहिए? एक बगीचे में अनेक रंगों के फूल हो सकते हैं, तो एक देश में अनके सम्प्रदायों के प्रचलन में ऐसी क्या बात है, जिसके कारण परस्पर विद्वेष किया जाय और एक-दूसरे को नास्तिक या  अधर्मी कहकर निन्दित बताया जाय। सम्प्रदायों की एकता पर हम सबको पूरा जोर देना चाहिए। भाषाओं की भिन्नता पर लड़ने की आवश्यकता नहीं। अनेकता को हटाकर हमें भाषायी एकता अपनानी चाहिए ताकि समूचे देशवासी अपने विचारों का आदान-प्रदान सरलता के साथ कर सकें।
  
नर-नारी के बीच बरता जाने वाला भेद-भाव तो और भी निन्दनीय है। हम अपनी ही माताओं, पुत्रियों, बहिनों, पत्नियों को हेय दृष्टि से देखें, यह कैसी अनीति है? इस भूल को अपनाये रहने पर  आधा समाज पक्षाघात पीड़ित की तरह अपंग रह जाता है। परिवार वैसे नहीं बन पाते जैसे कि सुयोग्य गृहलक्ष्मी के नेतृत्व में वे बन सकते हैं।
  
भारतीय संस्कृ ति के दो प्रमुख आदर्श हैं। एक ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ दूसरा ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’। इन दोनों को हृदयंगम करने पर एक ता और समता को ही मान्यता देनी पड़ती हैै। इन आदर्शों को हमें किसी देश, क्षेत्र, सम्प्रदाय के सुधार तक ही सीमित न रखकर विश्वव्यापी बनाना चाहिए, ताकि समूची मनुष्य जाति सुख-शान्ति से रह सके और सर्वतोमुखी कर सके।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 5 अगस्त 2019

👉 अच्छाई-बुराई :-

एक बार बुरी आत्माओं ने भगवान से शिकायत की कि उनके साथ इतना बुरा व्यवहार क्यों किया जाता है, जबकी अच्छी आत्माएँ इतने शानदार महल में रहती हैं और हम सब खंडहरों में, आखिर ये भेदभाव क्यों है, जबकि हम सब भी आप ही की संतान हैं।

भगवान ने उन्हें समझाया- ”मैंने तो सभी को एक जैसा ही बनाया पर तुम ही अपने कर्मो से बुरी आत्माएं बन गयीं। सो वैसा ही तुम्हारा घर भी हो गया।“

भगवान के समझाने पर भी बुरी आत्माएँ भेदभाव किये जाने की शिकायत करतीं रहीं और उदास होकर बैठ गयी।

इसपर भगवान ने कुछ देर सोचा और सभी अच्छी-बुरी आत्माओं को बुलाया और बोले- “बुरी आत्माओं के अनुरोध पर मैंने एक निर्णय लिया है, आज से तुम लोगों को रहने के लिए मैंने जो भी महल या खँडहर दिए थे वो सब नष्ट हो जायेंगे, और अच्छी और बुरी आत्माएं अपने अपने लिए दो अलग-अलग शहरों का निर्माण नए तरीके से स्वयं करेंगी।”

तभी एक आत्मा बोली- “ लेकिन इस निर्माण के लिए हमें ईटें कहाँ से मिलेंगी?”

भगवान बोले- “जब पृथ्वी पर कोई इंसान अच्छा या बुरा कर्म करेगा तो यहाँ पर उसके बदले में ईटें तैयार हो जाएंगी। सभी ईटें मजबूती में एक सामान होंगी, अब ये तुम लोगों को तय करना है कि तुम अच्छे कार्यों से बनने वाली ईंटें लोगे या बुरे कार्यों से बनने वाली ईटें!”

बुरी आत्माओं ने सोचा, पृथ्वी पर बुराई करने वाले अधिक लोग हैं इसलिए अगर उन्होंने बुरे कर्मों से बनने वाली ईटें ले लीं तो एक विशाल शहर का निर्माण हो सकता है, और उन्होंने भगवान से बुरे कर्मों से बनने वाली ईंटें मांग ली।

दोनों शहरों का निर्माण एक साथ शुरू हुआ, पर कुछ ही दिनों में बुरी आत्माओं का शहर वहाँ रूप लेने लगा, उन्हें लगातार ईंटों के ढेर के ढेर मिलते जा रहे थे और उससे उन्होंने एक शानदार महल बहुत जल्द बना भी लिया। वहीँ अच्छी आत्माओं का निर्माण धीरे-धीरे चल रहा था, काफी दिन बीत जाने पर भी उनके शहर का केवल एक ही हिस्सा बन पाया था।

कुछ दिन और ऐसे ही बीते, फिर एक दिन अचानक एक अजीब सी घटना घटी। बुरी आत्माओं के शहर से ईटें गायब होने लगीं… दीवारों से, छतों से, इमारतों की नीवों से,… हर जगह से ईंटें गायब होने लगीं और देखते ही  देखते उनका पूरा शहर खंडहर का रूप लेने लगा।

परेशान आत्माएं तुरंत भगवान के पास भागीं और पुछा- “हे प्रभु! हमारे महल से अचानक ये ईटें क्यों गायब होने लगीं …हमारा महल और शहर तो फिर से खंडहर बन गया?”

भगवान मुस्कुराये और बोले-
“ईटें गायब होने लगीं!!  अच्छा! दरअसल जिन लोगों ने बुरे कर्म किए थे अब वे उनका परिणाम भुगतने लगे हैं यानी अपने बुरे कर्मों से उबरने लगीं हैं उनके बुरे कर्म और उनसे उपजी बुराइयाँ नष्ट होने लगे हैं। सो उनकी बुराइयों से बनी ईटें भी नष्ट होने लगीं हैं। आखिर को जो आज बना है वह कल नष्ट भी होगा ही। अब किसकी आयु कितनी होगी ये अलग बात है।“

इस तरह से बुरी आत्माओ ने अपना सिर पकड़ लिया और सिर झुका के वहा से चली गई|

मित्रों! इस कहानी से हमें कई ज़रूरी बातें सीखने को मिलती है, बुराई और उससे होने वाला फायदा बढता तो बहुत तेजी से है। परंतु नष्ट भी उतनी ही तेजी से होता है।

वही सच्चाई और अच्छाई से चलने वाले धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं पर उनकी सफलता स्थायी होती है. अतः हमें हमेशा सच्चाई की बुनियाद पर अपने सफलता की इमारत खड़ी करनी चाहिए, झूठ और बुराई की बुनियाद पर तो बस खंडहर ही बनाये जा सकते हैं।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 5 August 2019



👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 5 Augest 2019



👉 रचनात्मक एवं संघर्षात्मक कदम उठाने होंगे

नया युग लाने के लिए धरती पर स्वर्ग का अवतरण करने के लिए-सतयुग की पुनरावृत्ति आँखों के सामने देखने के लिए-हमें कुछ अधिक महत्त्वपूर्ण, दुस्साहस भरे रचनात्मक एवं संघर्षात्मक कदम उठाने होंगे। शत-सूत्री कार्यक्रमों के अंतर्गत उसकी कुछ चर्चा हो चुकी है। बड़े परिवर्तनों के पीछे बड़ी कार्य पद्धतियाँ भी जुड़ी रहती हैं। निश्चित रूप से हमें ऐसे अगणित छोटे-बड़े आन्दोलन छेड़ने पड़ेंगे, संघर्ष करने पड़ेंगे, प्रशिक्षण संस्थाएँ चलानी पड़ेंगी जन करना अभियान में लाखों मनुष्यों का जन, सहयोग, त्याग-बलिदान सूझ-बूझ एवं प्रयत्न, पुरुषार्थ नियोजित किया जाएगा भारत के पिछले राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में कितनी जनशक्ति और कितनी धन-शक्ति लगी थी। यह सर्वविदित है, यह भारत तक और उसके राजनैतिक क्षेत्र तक सीमित थी। अपने अभियान का कार्यक्षेत्र उससे सैकड़ों गुना बड़ा है।

अपना कार्यक्षेत्र समस्त विश्व है और परिवर्तन राजनीति में ही नहीं वरन् व्यक्ति तथा समाज के हर क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन प्रस्तुत करने हैं। इसके लिये कितने सृजनात्मक और कितने संघर्षात्मक मोर्चे खोलने पड़ेंगे, इसी कल्पना कोई भी दूरदर्शी कर सकता है। वर्तमान अस्त-व्यस्तता को सुव्यवस्था में परिवर्तित करना एक बड़ा काम है। मानवीय मस्तिष्क की दिशा, विचारणा, आकांक्षा अभिरुचि ओर प्रवृत्ति को बदल देना-निष्कृष्टता के स्थान पर उत्कृष्टता की प्रतिष्ठापना करना-सो भी समस्त पृथ्वी पर रहने वाले चार अरब व्यक्तियों में निस्सन्देह एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक काम है। इसमें अग्रणी व्यक्तियों, असंख्य आन्दोलनों और असीम क्रिया तन्त्रों का समन्वय होगा।

यह एक अवश्यम्भावी प्रक्रिया है, जिसे महाकाल अपने ढंग से नियोजित कर रहे हैं। हर कोई देखेगा कि आज की वैज्ञानिक प्रगति की तरह कल भावनात्मक उत्कर्ष के लिए भी प्रबल प्रयत्न होंगे और उसमें एक से एक बढ़कर व्यक्तित्व एवं संगठन गज़ब की भूमिका प्रस्तुत कर रहे होंगे। यह सपना नहीं, सच्चाई है। जिसे अगले दिनों हर कोई मूर्तिमान् होते हुए देखेगा। इसे भविष्यवाणी नहीं समझना चाहिये, एक वस्तुस्थिति है जिसे हम आज अपनी आँखों पर चढ़ी दूरबीन से प्रत्यक्षतः देख रहे हैं। कल वह निकट आ पहुँचेगी और हर कोई उसे प्रत्यक्ष देखेगा। अगले दिनों संसार का समग्र परिवर्तन करके रख देने वाला एक भयंकर तूफान विद्युत गति से आगे बढ़ता चला आ रहा है। जो इस सड़ी दुनियाँ को समर्थ, प्रबुद्ध, स्वस्थ और समुन्नत बनाकर ही शान्त होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, सितंबर १९६९, पृष्ठ ६६


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/September/v1.66

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ४४)

👉 तंत्र एक सम्पूर्ण विज्ञान, एक चिकित्सा पद्धति

अध्यात्म चिकित्सा के विशेषज्ञ सदियों से यही करते आ रहे हैं और इन क्षणों में भी यही कर रहे हैं। तंत्र का समूचा विज्ञान मूल रूप से पाँच तत्त्वों पर टिका हुआ है। जिस तरह से पृथ्वी, जल, अग्रि, वायु एवं आकाश इन पाँच तत्त्वों से सृष्टि बनती है, उसी तरह से १. पदार्थ, २. स्थान, ३. शब्द, ४. अंक एवं ५. काल, इन पाँच अवयवों के सहारे तंत्र की वैज्ञानिक प्रक्रिया क्रियाशील होती है। तंत्र के क्षेत्र में इन पाँचों का अपना विशिष्ट अर्थ है। जिसे जानकर ही इसके प्रयोग किये जा सकते हैं। इस क्रम में सबसे पहला है पदार्थ। इस सम्बन्ध में आधुनिक वैज्ञानिकों की भाँति तंत्र विशेषज्ञ भी मानते हैं कि ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की विभिन्न धाराओं ने एक विशिष्ट क्रम से मिलकर इस सृष्टि के विभिन्न पदार्थों की सृष्टि की है। इस सृष्टि का प्रत्येक अवयव भले ही वह वस्तु हो या प्राणी अथवा वनस्पति ऊर्जा का ही सघन रूप है।

जगत् और जीवन की इस सच्चाई को स्वीकारते तो वैज्ञानिक भी हैं, पर वे सृष्टि के प्रत्येक अवयव को समपूर्णतया या आँशिक रूप से ऊर्जा में परिवर्तित करने की कला नहीं जानते। लेकिन तांत्रिक ऐसा करने में सक्षम होते हैं। वे अपने प्रयोगों में सृष्टि के प्रत्येक अवयव का चाहे वह जीवित हो या मृत उसमें निहित ऊर्जा का इस्तेमाल कर सकते हैं। वृक्षों की जड़ें या पत्तियाँ, पशु- पक्षियों एवं मनुष्यों के नाखून या बाल तक में निहित ऊर्जा का वह समुचित प्रयोग कर लेते हैं। इन प्रयोगों में दूसरा क्रम स्थान का है। विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रह्माण्डीय ऊर्जाधाराएँ प्रत्येक स्थान पर एक सुनिश्चित रीति से केन्द्रीभूत होती हैं। इसलिए किस ऊर्जा का किस तरह से क्या उपयोग करना है, उसी क्रम में स्थल का चयन किया जाता है। यह स्थान मंदिर, देवालय भी हो सकता है और पीपल, वट आदि वृक्षों की छाँव भी अथवा नदी का किनारा या श्मशान भी हो सकता है।

तंत्र विज्ञान में तीसरा किन्तु सबसे महत्त्वपूर्ण शब्द है। शब्द की तन्मात्रा आकाश है। आकाश परम तत्त्व है, इसी से अन्य तत्त्व उपजे हैं। इसी वजह से तंत्र ने आकाश तत्त्व को अपनी साधना के आधार के रूप में स्वीकारा है। शब्द से बने बीजाक्षर एवं मंत्राक्षरों के सविधि प्रयोग से तंत्र विशेषज्ञ ब्रह्माण्ड की ऊर्जाधाराओं की दिशा को नियंत्रित एवं नियोजित करते हैं। पढ़ने वाले भले इसे असम्भव माने, पर ऐसा होता है। इसे कोई भी अनुभव कर सकता है। तंत्र विद्या में शब्द के प्रयोग अतिरहस्यमय हैं और तुरन्त प्रभाव प्रकट करने वाले हैं। इसमें कोई बीजाक्षर तो ऐसे हैं जो एक- डेढ़ अक्षर के होते हुए भी सिद्ध हो जाने पर कुछ ही सेकण्डों में चमत्कार पैदा करने लगते हैं।

इस क्रम में चौथे तत्त्व के रूप में अंक का स्थान है। शब्दों की भाँति अंक भी तंत्र विद्या में महत्त्व रखते हैं। इन अंकों और कुछ निश्चित रेखा कृतियों के संयोग से यंत्रों का निर्माण होता है। इन यंत्रों की पूजा- प्रतिष्ठा एवं सविधि साधना के द्वारा विशिष्ट ऊर्जाधारा को इसमें केन्द्रित किया जाता है। इसी को यंत्र की जागृति कहते हैं। ऐसा होने पर फिर यंत्र ट्रांसफार्मर जैसा काम करने लगता है, यानि कि वह अपने में केन्द्रित ऊर्जा को काम्य प्रयोजन की पुर्ति के योग्य बनाता है। इस विज्ञान का पाँचवा तत्त्व है काल, जिस पर सारी प्रयोग प्रक्रिया निर्भर करती है। इसके अन्तर्गत यह जानना होता है कि उपरोक्त सभी चारों तत्त्वों का संयोग कब- किन विशेष क्षणों में किया जाय।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ६४

👉 आत्मचिंतन के क्षण 5 Aug 2019

■  मनुष्य में एक छोटी सी समस्या है, वो कभी स्वयं की निंदा सुन नहीं पाता। यदि कोई उसके विषय में बुरा कहे, सह नहीं पाता। सदैव भयभीत रहता है कि जो चार लोग हैं, कहीं मेरे विषय में बुरा न सोचें और यदि उसे पता लग जाए कि कोई उसकी पीठ पीछे उसकी बुराई कर रहा है, तो दुःखी हो जाता है। अब क्या इस कारण से स्वयं को दुखी कर लेना क्या उचित है? कदापि नहीं। क्योंकि सबसे पहली बात जो आपको स्मरण रखनी है। यदि कोई पीठ पीछे आपकी बुराई करता है, वो आपसे दो कदम पीछे है, है न? जो आपके बारे में आपसे सारी बातें कर सकता है। यदि ऐसा नहीं है, यदि वो सत्य कह रहे हैं, तो सर्वप्रथम अपनी भूलों को समझें। उस सत्य को समझें और निकाल फेंकें इन अवगुणों को और फिर देखें आप उनसे दो कदम और आगे बढ़ जाएँगे। क्योंकि ये जीवनरथ आगे देखकर चलाया जाता है, पीछे देखकर नहीं। तो ये पीछे देखना छोड़ दीजिये। जो वर्तमान है इसे देखिये इसे जीयें। जो आपका लक्ष्य है उसे साधिये।

◇ मनुष्य जो है ये भूलों का पिटारा है। मनुष्य जो है, गलतियों का पुतला है और ये सत्य है। भूल भला किससे नहीं होती? हर एक से होती है और एक नहीं अनेक भूलें होती हैं। किन्तु स्मरण रखियेगा उनके वस्त्रों पर कीचड़ लगता है, जो कीचड़ साफ करने का प्रयास करते हैं। तो जहाँ प्रयास वहाँ भूलें तो होंगी ही। अब यदि आप कोई नया संकल्प करने जा रहे हैं, कोई बड़ा कार्य करने जा रहे हैं, और आपसे कोई भूल हो जाए, तो कोई बात नहीं। पश्चाताप न करें। अपनी भूल को पहचानें, उसे समझें, उसे सुधारने का प्रयास करें और सबसे महत्वपूर्ण बात अपनी भूलों से सीखें। उन्हीं के हाथों से लहू बहता है, जो काँटों में छिपे उस पुष्प को निकालने का प्रयास करते हैं। स्मरण रखिये जिसने जीवन में कभी कोई भूल नहीं की उसने कभी कोई नया करने का प्रयास ही नहीं किया। ये भूल आपका सबसे बड़ा शिक्षक है। इससे दुःखी न होइये। पश्चाताप ना करें, इस भूल का आदर करना सीखें, फिर देखें आप स्वयं को जीवन में और ऊँचा पायेंगे।

★ दूध को जल से अधिक श्रेष्ठ माना जाता है, और इसीलिये दूध का मूल्य जल से तनिक अधिक है। अब दूध को यदि दही बनाओगे तो इस दूध की आयु कुछ और अधिक बढ़ जाती है। इसका मूल्य कुछ और मुद्राएँ अधिक, अब इस दही का माखन बनाओगे तो इसकी आयु कुछ सप्ताहों तक और बढ़ जाती है, और मूल्य कुछ और मुद्राएँ अधिक, अब यदि इस माखन का घी बनाएँगे तो इसकी आयु वर्षों तक चलती है, और मूल्य माखन से कुछ और अधिक होता है। अब इन सबका मूल दूध ही है। तो इन सबकी जीवन आयु एवं इनके मूल्य में इतना अंतर क्यों? इसका कारण ये दूध को दही बनने के लिए खटास सहनी पड़ी, दही को माखन बनने के लिए बिलोने के आघात सहने पड़े, और माखन को घण्टों तक ताप सहना पड़ा। तब जाके इसकी आयु इतनी बढ़ी, तब जाके इसका मूल्य इतना बढ़ा। अब हम सारे मनुष्य एक समान दूध की भाँति किन्तु महान वही बनते हैं, जो कठिनाइयों का सामना करते हैं। संकटों का सामना करते हैं। जो इन चुनौतियों पर खरे उतरते हैं। यदि ये सब करोगे तभी जीवन में आगे बढ़ोगे। तभी आपके यश की आयु बढ़ती जायेगी, और तभी ये संसार आपको महत्व देता जायेगा।

👉 पुण्य की कमाई

" टिकट कहाँ है ? " -- टी सी ने बर्थ के नीचे छिपी लगभग तेरह - चौदह साल की लडकी से पूछा।"
नहीं है साहब।

"काँपती हुई हाथ जोड़े लडकी बोली।
"तो गाड़ी से उतरो।" टी सी ने कहा।
इसका टिकट मैं दे रहीं हूँ।............पीछे से ऊषा भट्टाचार्य की आवाज आई जो पेशे से प्रोफेसर थी ।

"तुम्हें कहाँ जाना है ?" लड़की से पूछा" पता नहीं मैम ! "" तब मेरे साथ चल बैंगलोर तक ! ""
तुम्हारा नाम क्या है ? "" चित्रा

"बैंगलोर पहुँच कर ऊषाजी ने चित्रा को अपनी एक पहचान के स्वंयसेवी संस्थान को सौंप दिया । और अच्छे स्कूल में एडमीशन करवा दिया। जल्द ही ऊषा जी का ट्रांसफर दिल्ली होने की वजह से चित्रा से कभी-कभार फोन पर बात हो जाया करती थी ।करीब बीस साल बाद ऊषाजी को एक लेक्चर के लिए सेन फ्रांसिस्को (अमरीका) बुलाया गया । लेक्चर के बाद जब वह होटल का बिल देने रिसेप्सन पर गई तो पता चला पीछे खड़े एक खूबसूरत दंपत्ति ने बिल भर दिया था।"तुमने मेरा बिल क्यों भरा ? ? ""

मैम, यह बम्बई से बैंगलोर तक के रेल टिकट के सामने कुछ नहीं है ।
""अरे चित्रा ! ! ? ? ? . . . .

चित्रा कोई और नहीं इंफोसिस फाउंडेशन की चेयरमैन सुधा मुर्ति थी, एवं इंफोसिस के संस्थापक श्री नारायण मूर्ति जी की पत्नी थी।

यह उन्ही की लिखी पुस्तक "द डे आई स्टाॅप्ड ड्रिंकिंग मिल्क" से लिया गया कुछ अंश

कभी कभी आपके द्वारा भी की गई सहायता किसी की जिन्दगी बदल सकती है।

👉 Solving Life’s Problems - Part 2

I once met a woman who had virtually no problems. I was on a late-night radio program in New York City. This woman called the station and wanted me to come to her home. I was intending to spend the night at the bus station, so I said okay. She sent her chauffeur for me, and I found myself in a millionaire’s home, talking to a middle-aged woman who seemed like a child. She was so immature, and I wondered at her immaturity, until I realized that the woman had been shielded from all problems by a group of servants and lawyers. She had never come to grips with life. She had not had problems to grow on, and therefore had not grown. Problems are blessings in disguise!

Were I to solve problems for others they would remain stagnant; they would never grow. It would be a great injustice to them. My approach is to help with cause rather than effect. When I help others, it is by instilling within them the inspiration to work out problems by themselves. If you feed a man a meal, you only feed him for a day — but if you teach a man to grow food, you feed him for a lifetime.

It is through solving problems correctly that we grow spiritually. We are never given a burden unless we have the capacity to overcome it. If a great problem is set before you, this merely indicates that you have the great inner strength to solve a great problem. There is never really anything to be discouraged about, because difficulties are opportunities for inner growth, and the greater the difficulty the greater the opportunity for growth.

To be continued...
📖 From Akhand Jyoti

👉 धर्म का सच्चा स्वरूप

संसार में हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, ताओ, कन्फ्यूशियस, जैन, बौद्ध, यहूदी आदि विभिन्न नामों से प्रचलित धर्म-सम्प्रदायों पर दृष्टिपात करने से यही पता चलता है कि उनके बाह्यस्वरूप एवं क्रिया-कृत्यों में जमीन-आसमान जितना अंतर है। यह अंतर होना उचित भी है, क्योंकि जिस वातावरण, जिन परिस्थितियों में वे पनपे और फैले हैं, उनकी छाप उन पर पड़ना स्वाभाविक है। मनीषी, अवतारी, महामानवों ने देश काल, परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए श्रेष्ठता-संवर्द्धन एवं निकृष्टता-निवारण के लिए जो सिद्धान्त एवं आचार शास्त्र विनिर्मित किए, कालान्तर में वे ही धर्म-सम्प्रदायों के नाम से पुकारे जाने लगे। इस कारण उनके बाह्य कलेवर में विविधता होना स्वाभाविक है। फिर भी, जहाँ तक मौलिक सिद्धान्तों की बात है, वह सभी तथाकथित धर्मों में एक ही है। सभी ने एक सार्वभौम सत्ता के साथ तादात्म्य स्थापित करना, मानव का अंतिम लक्ष्य स्वीकार किया है।
  
सभी प्रचलित धर्मों में ‘प्रार्थना’ को किसी न किसी रूप में स्वीकार किया एवं अपने दैनिक क्रिया-कृत्यों में सम्मिलित किया गया है। अमेरिका के विख्यात साइक्रियेटिस्ट डॉ. ब्रिल के अनुसार- ‘कोई भी व्यक्ति, जो वास्तव में धार्मिक है, मनोरोगों का शिकार नहीं हो सकता।’ मनःचिकित्सकों एवं मनोविश्लेषकों ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है कि धार्मिक कर्मकाण्डों में जो प्रार्थना की जाती है। प्रसिद्ध विचारक डेल कारनेगी ने लिखा है- ‘जीवन की जटिलताओं और विषमताओं से संघर्ष करके सफलता पाने में कोई भी व्यक्ति अकेले समर्थ नहीं है, आस्था और विश्वास के साथ इस संघर्ष में विजय प्राप्त करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना की जाए।’ मौलाना रूम ने कहा है- ‘रूह की दोस्ती इल्म और ईमान से है, उसके लिए हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई आदि में कोई फर्क नहीं है।’
  
प्रसिद्ध ईसाई धर्मोपदेशक जस्टिन ने कहा है- ‘जितनी भी श्रेष्ठ विचारणाएँ हैं, वे चाहे किसी भी देश या धर्म की हों, सब मनुष्यों के लिए ईश्वरीय निर्देश की तरह हैं।’ शिव महिमा में उल्लेख है-जिस प्रकार बहुत सी नदियाँ भिन्न-भिन्न प्रकार से घूमकर अंततः समुद्र में ही जाकर गिरती हैं, उसी प्रकार मनुष्य अपने स्वभाव के अनुसार अलग-अलग धर्म, पंथों से चलकर उसी एक ईश्वर तक पहुँचते हैं।
  
इंजील ने लिखा है- ‘मनुष्य के नथुनों में जितने श्वास आते हैं, उतने ही ईश्वर तक पहुँचने के रास्ते हैं।’ चीन के प्रसिद्ध दार्शनिक कन्फ्यूशियस का कथन है- ‘अलग-अलग धर्मों की प्रेरणाएँ एक-दूसरे की विरोधी नहीं, पूरक हैं।’ प्रसिद्ध संत जरथ्रुस्त के अनुसार-‘हम संसार के उन सभी धर्मों को मानते और पूजते हैं, जो नेकी सिखलाते हैं।’ योगेश्वर श्रीकृष्ण जी ने भगवद्गीता में स्पष्ट कहा  है-‘सभी मनुष्य भिन्न-भिन्न पथों से चलकर अंततः मुझ तक ही पहुँचते हैं।’
  
अनेकों मनीषियों, युगद्रष्टा ऋषियों ने इसे स्वीकार किया है कि विभिन्न धर्मों में वर्णित आदर्श एवं सिद्धान्त सनातन हैं। एक्लेजियास्टिक्स ने उल्लेख किया है- क्या कोई ऐसा आदर्श है, जिसके संदर्भ में यह कहा जा सके कि यह नया है? हर सिद्धान्त सनातन है, जिसका उल्लेख विभिन्न धर्मों में मिलता है।
  
हजरत मोहम्मद ने सभी धर्मानुयायियों को संबोधित करते हुए कहा- ‘आओ हम सब मिलकर उन बातों पर विचार करें, जो हममें और तुममें एक सी हैं।’ ‘शोतोकु’ नामक संत ने कहा- ‘शिनतो, कन्फ्यूशियस व बौद्ध ये तीनों धर्म एक धर्म रूपी वृक्ष के विभिन्न अवयव हैं।  जापानी जनता ने धर्म के मूल तत्त्व को आत्मसात् कर लिया और धर्मों के बाह्य कलेवरों की भिन्नता को समझ लेने के फलस्वरूप विभेदता की कुचाल में न फँसी, उत्तरोत्तर प्रगति पथ पर बढ़ती गई।’
  
उक्त विवेचनों से यही निष्कर्ष निकलता है कि विविध धर्मों के बाह्य कलेवर एवं क्रिया-कृत्यों में न्यूनाधिक भिन्नता भले ही हो, परन्तु सबका प्राण तत्त्व एक ही है। धर्म का सच्चा स्वरूप वस्तुतः वही है, जो शाश्वत सिद्धान्तों के रूप में सभी धर्मों में विद्यमान है। धर्म के उस प्राण तत्त्व को हृदयंगम कर व्यावहारिक जीवन में समाविष्ट किए जाने से ही सबका कल्याण संभव हो सकेगा और मानवीय समाज सुख-शांति का रसास्वादन कर सकेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 3 अगस्त 2019

कुरीतियों का अंत | Anti Curruption | Kuritiyon Ka Ant



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Balance Your Thoughts and Action | विचार और कार्य संतुलित करो | हारिये न...



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👉 बुजुर्गों को समय चाहिए

छोटे ने कहा," भैया, दादी कई बार कह चुकी हैं कभी मुझे भी अपने साथ होटल ले जाया करो." गौरव बोला, " ले तो जायें पर चार लोगों के खाने पर कितना खर्च होगा. याद है पिछली बार जब हम तीनों ने डिनर लिया था , तब सोलह सौ का बिल आया था. हमारे पास अब इतने पैसे कहाँ बचे हैं." पिंकी ने बताया," मेरे पास पाकेटमनी के कुछ पैसे बचे हुए हैं." तीनों ने मिलकर तय किया कि इस बार दादी को भी लेकर चलेंगे, पर इस बार मँहगी पनीर की सब्जी की जगह मिक्सवैज मँगवायेंगे और आइसक्रीम भी नहीं खायेंगे.

छोटू, गौरव और पिंकी तीनों दादी के कमरे में गये और बोले," दादी इस' संडे को लंच बाहर लेंगे, चलोगी हमारे साथ." दादी ने खुश होकर कहा," तुम ले चलोगे अपने साथ." " हाँ दादी " .

संडे को दादी सुबह से ही बहुत खुश थी. आज उन्होंने अपना सबसे बढिया वाला सूट पहना, हल्का सा मेकअप किया, बालों को एक नये ढंग से बाँधा. आँखों पर सुनहरे फ्रेमवाला नया चश्मा लगाया. यह चश्मा उनका मँझला बेटा बनवाकर दे गया था जब वह पिछली बार लंदन से आया था. किन्तु वह उसे पहनती नहीं थी, कहती थी, इतना सुन्दर फ्रेम है, पहनूँगी तो पुराना हो जायेगा. आज दादी शीशे में खुद को अलग अलग एंगिल से कई बार देख चुकी थी और संतुष्ट थी.

बच्चे दादी को बुलाने आये तो पिंकी बोली," अरे वाह दादी, आज तो आप बडी क्यूट लग रही हैं". गौरव ने कहा," आज तो दादी ने गोल्डन फ्रेम वाला चश्मा पहना है. क्या बात है दादी किसी ब्यायफ्रैंड को भी बुला रखा है क्या." दादी शर्माकर बोली, " धत. "

होटल में सैंटर की टेबल पर चारो बैठ गए. थोडी देर बाद वेटर आया, बोला, " आर्डर प्लीज ". अभी गौरव बोलने ही वाला था कि दादी बोली," आज आर्डर मैं करूँगी क्योंकि आज की स्पेशल गैस्ट मैं हूँ." दादी ने लिखवाया__ दालमखनी, कढाईपनीर, मलाईकोफ्ता, रायता वैजेटेबिल वाला, सलाद, पापड, नान बटरवाली और मिस्सी रोटी. हाँ खाने से पहले चार सूप भी.

तीनों बच्चे एकदूसरे का मुँह देख रहे थे. थोडी देरबाद खाना टेबल पर लग गया. खाना टेस्टी था, जब सब खा चुके तो वेटर फिर आया, "डेजर्ट में कुछ सर". दादी ने कहा,  " हाँ चार कप आइसक्रीम ". तीनों बच्चों की हालत खराब, अब क्या होगा, दादी को मना भी नहीं कर सकते पहली बार आईं हैं.

बिल आया, इससे पहले गौरव उसकी तरफ हाथ बढाता, बिल दादी ने उठा लिया और कहा," आज का पेमेंट मैं करूँगी. बच्चों मुझे तुम्हारे पर्स की नहीं, तुम्हारे समय की आवश्यकता है, तुम्हारी कंपनी की आवश्यकता है. मैं पूरा दिन अपने कमरे में अकेली पडे पडे बोर हो जाती हूँ. टी.वी. भी कितना देखूँ, मोबाईल पर भी चैटिंग कितना करूँ. बोलो बच्चों क्या अपना थोडा सा समय मुझे दोगे," कहते कहते दादी की आवाज भर्रा गई.

पिंकी अपनी चेयर से उठी, उसने दादी को अपनी बाँहों में भर लिया   और फिर दादी के गालों पर किस करते हुए बोली," मेरी प्यारी दादी जरूर." गौरव ने कहा, " यस दादी, हम प्रामिस करते हैं कि रोज आपके पास बैठा करेंगे और तय रहा कि हर महीने के सैकंड संडे को लंच या डिनर के लिए बाहर आया करेंगे और पिक्चर भी देखा करेंगे."

दादी के होठों पर 1000 वाट की मुस्कुराहट तैर गई, आँखों में फ्लैशलाइट सी चमक आ गई और चेहरे की झुर्रियाँ खुशी के कारण नृत्य सा करती महसूस होने लगीं...-

बूढ़े मां बाप रूई के गटठर समान होते है, शुरू में उनका बोझ नहीं महसूस होता, लेकिन बढ़ती उम्र के साथ रुई भीग कर बोझिल होने लगती है. बुजुर्ग समय चाहते हैं पैसा नही, पैसा तो उन्होंने सारी जिंदगी आपके लिए कमाया-की बुढ़ापे में आप उन्हें समय देंगे।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 3 August 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 3 Augest 2019


👉 अपना विचार क्षेत्र बढ़ाना है

हमें अपना विचार क्षेत्र बढ़ाना है। अब तक केवल अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिका से ही अपना संपर्क क्षेत्र विनिर्मित करते रहें। जो इन्हें पढ़ते हैं उन्हीं तक अपने विचार पहुँचते हैं। इस छोटे वर्ग से ही समस्त विश्व को परिवर्तित करने का स्वप्न साकार नहीं हो सकता। हमें प्रचार के लिए बड़े कदम उठाने होंगे। प्रस्तुत विज्ञप्ति योजना और झोला पुस्तकालय प्रक्रिया इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए है। हर परिजन से इनमें आवश्यक रस लेने और उत्साहपूर्वक प्रयत्न करने को अनुरोध किया गया है। समय के साथ अपनी गाड़ी कमाई का एक छोटा अंश लोक-मंगल के इस छोटे दीखने वाले, किन्तु अत्यधिक महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए खर्च करने को कहा गया है। व्यक्ति को अपने लिए ही नहीं कमाते रहना चाहिये। उसकी कमाई में समाज का भी अधिकार है। इस अधिकार को संतुलित बनाने के लिए दान को एक अनिवार्य धर्म कर्तव्य माना गया है। जो दान नहीं करता-अपनी कमाई आप ही खाता रहता है, उसे मनीषियों और शास्त्रों ने चोर माना है। हमारा कोई परिजन चोर न कहलायेगा, उसे दानी ही बनना चाहिये और दान की सार्थकता तभी है, जब उसके पीछे उपयोगिता और विवेक का पुट हो।

सद्ज्ञान प्रसार करने जनमानस को बदलने से बढ़कर दान की और कहीं सार्थकता हो नहीं सकती। यह ब्रह्म दान सबसे बड़ा परमार्थ है। इसलिये परिजनों को दस पैसा रोज एवं थोड़े दिन के लिए, महीने में एक दिन की आमदनी खर्च करते रहने के लिए कहा गया है। यदि यह बात समझ में आ सके और थोड़ा समय एवं थोड़ा पैसा सभी लोग नियमित रूप से खर्च करने लगें तो अपने ज्ञान-यज्ञ की लपटें आकाश को छूने लगेंगी और पाताल तक को प्रभावित करने लगेंगी। इसलिए गत पूरे अंक में और इस अंक की इन पंक्तियों में बहुत जोर देकर यह कहा जा रहा है कि यह पंक्तियाँ पढ़ कर ही पत्रिका उठाकर एक कोने में रख दी जाय वरन् कुछ करने के लिए आवश्यक साहस और उत्साह पैदा किया जाय। विश्वास यही किया जाना चाहिये कि अपने अति आवश्यक अनुरोध परिजनों द्वारा उपेक्षित नहीं किये गये हैं और इस बार ज्ञान यज्ञ की हमारी संकल्पित प्रक्रिया को अधूरी न रहने दिया जाएगा उसके लिए भी स्वजनों में आवश्यक उत्साह पैदा होगा और नवनिर्माण की विचार धारा विश्वव्यापी होकर रहेगी।

यह विचार-धारा और जनमानस की प्रबुद्धता को दिशा में घसीट ले जाने की प्रक्रिया अखण्ड-ज्योति परिवार, गायत्री परिवार अथवा युग-निर्माण योजना के कुछ लाख सदस्यों तक सीमित नहीं रहने दी जा सजती। इसे देशव्यापी-विश्व-व्यापी बनना है। इसके लिए एक भाषा की सीमा बद्धता भी पर्याप्त नहीं है। अब तक अपने पास केवल हिन्दी माध्यम रहा है। अब भारत की 14 प्रमुख भाषाओं में अपना कार्यक्षेत्र बढ़ाना पड़ेगा। इतना ही नहीं संसार की दस प्रमुख भाषाओं का भी सहारा लेना पड़ेगा ताकि अपना सन्देश भारतवर्ष तक ही सीमित न रहकर विश्व-व्यापी बन सके। विज्ञप्तियाँ, ट्रैक्ट तथा सभी प्रचार साहित्य अब हमें इस सब भाषाओं में प्रकाशित प्रचारित करना है। इसके लिए पूँजी की जरूरत पड़ेगी यज्ञ आयोजनों के संयोजन लोग अपनी बचत गतवर्ष में इस कार्य के लिए देने लगे हैं। यह अच्छी परम्परा है। दूसरे लोग जिनमें सामर्थ्य और उदारता हो इस अहम् प्रयोजन के लिए कुछ अनुदान देने का साहस कर सकते हैं। ज्ञान-यज्ञ से बढ़कर दानशीलता को चरितार्थ करने का और कोई माध्यम शायद ही इस संसार में दूसरा होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, सितंबर १९६९, पृष्ठ 66

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/September/v1.66

👉 देव दर्शन के पीछे दिव्य दृष्टि भी रहे

दर्शन शब्द का अर्थ जहाँ देखना है वहाँ उसका एक अर्थ विवेचना या विचारणा भी है। अनेक लोग देव प्रतिमाओं, तीर्थ स्थानों, संत एवं सत्पुरुषों के दर्शन करने आया करते हैं, वे इसमें पुण्य लाभ का विश्वास करते हैं। शुभ व्यक्तियों अथवा शुभ स्थानों का दर्शन करना शुभ ही है। किन्तु उसका वास्तविक लाभ तभी हो सकता है जब दर्शन को देखने तक ही सीमित न रखा जाये, बल्कि उसके अन्दर निहित विचारणा पर भी ध्यान दिया जाये। जितनी ही श्रद्धा, भक्ति एवं भावना से किसी देव प्रतिमा, संत पुरुष अथवा तीर्थ स्थान के दर्शन क्यों न किये जायें, उसके वास्तविक लाभ तब तक सम्भव नहीं जब तक उस व्यक्ति प्रतीक अथवा स्थान की उन विशेषताओं को हृदयंगम न किया जायेगा जिनके कारण उनका महात्म्य है। केवल  दर्शनीय स्थल को देख भर लेने से प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता।
   
दर्शन मात्र से स्वर्ग, मोक्ष, सुख, शान्ति, सम्पत्ति अथवा प्रसिद्धि आदि का लाभ पाने का विश्वास रखने वालों की श्रद्धा को विवेक सम्मत नहीं माना जा सकता। उनकी अति श्रद्धा अथवा अति विश्वास एक प्रकार से अज्ञानजन्य ही होता है, जिसे अन्ध-विश्वास अथवा अन्ध-श्रद्धा भी कहते हैं। श्रद्धा जहाँ आत्मा की उन्नति करती है, मन-मस्तिष्क को सुसंस्कृत एवं स्थिर करती है, ईश्वर प्राप्ति के लिये व्यग्र एवं जिज्ञासु बनाती है, वहाँ मूढ़-श्रद्धा अथवा अंध विश्वास उसे अवास्तविकता के गर्त में गिरा देती है। अन्धविश्वासियों अथवा अंध श्रद्धालुओं को अपनी अविवेकपूर्ण धारणाओं से लाभ की अपेक्षा हानि ही अधिक होती है।
   
आज धर्म के नाम पर जो कुछ देखी जाती है, उसका बहुत कुछ उत्तरदायित्व उन अन्ध श्रद्धालुओं पर ही है, जो धर्म के सत्य स्वरूप एवं कर्म की विधि और उसका परिणाम नहीं जानते। जनता की अंध-श्रद्धा के आधार पर न जाने कितने आडम्बरी एवं प्रवचक लोग अर्थ एवं आदर का लाभ उठाया करते हैं। यही कारण है कि शास्त्रों में जहाँ श्रद्धा की प्रशंसा की गई, वहीं अंध-श्रद्धा की निन्दा भी।
   
दर्शन करने के सम्बन्ध में भी भोले लोगों की यह अंध-श्रद्धा उन्हें दर्शन के मूल प्रयोजन एवं उससे होने वाले लाभ से वंचित ही रखती है। लाखों-करोड़ों लोग प्रति वर्ष तीर्थों तथा तीर्थ पुरुषों के दर्शन करने देश के कोने-कोने से आते-जाते हैं। अनेकों लाभ तो प्रतिदिन प्रातः, सायं मंदिरों में देव प्रतिमा के दर्शन करने जाया करते हैं। किन्तु क्या कहा जा सकता है कि इन लोगों को वह लाभ होता होगा, जो उन्हें अभीष्ट रहता है। निश्चय ही नहीं। उन्हें इस बाह्य दर्शन द्वारा एक भ्रामक आत्म-तुष्टि के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिल सकता।
   
यदि केवल देव प्रतिमा, देव स्थान अथवा देवपुरुष को देखने मात्र से, हाथ जोड़ने, दण्डवत प्रणाम करने, पैसा अथवा पूजा प्रसाद चढ़ा देने भर से ही किसी के पापों का क्षरण हो जाता, दुःख दारिद्रय दूर हो जाता और पुण्य, परमार्थ, स्वर्ग मुक्ति आदि मिल सकते व जीवन में तेजस्विता, देवत्व अथवा निर्द्वन्दता का समावेश हो सकता, तो दिन-रात देव प्रतिमाओं की परिचर्या करने वाले पुजारियों, मन्दिरों की सफाई-देखभाल करने वाले सेवकों को यह सभी लाभ अनायास ही मिल जाते। उनके सारे दुःख द्वन्द्व दूर हो जाते और सुख-शान्ति पूर्ण स्वर्गीय जीवन के अधिकारी बन जाते हैं, किन्तु ऐसा देखने में नहीं आता। मंदिरों के सेवक और प्रतिमाओं के पुजारी भी अन्य सामान्य जनों की भाँति ही अविशेष जीवन में पड़े-पड़े दुःखों तथा शोक संतापों को सहते रहते हैं। उनके वक्त जीवन में रंचमात्र भी परिवर्तन नहीं होता, यद्यपि उनकी पूरी जिन्दगी देव प्रतिमाओं के सान्निध्य एवं देवस्थापन की सेवा करने बीत जाती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 चरित्र

नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनने के बाद, अपने सुरक्षा कर्मियों के साथ एक रेस्तरां में खाना खाने गए। सबने अपनी अपनी पसंद के खाना का आर्डर दिया और खाना के आने का इंतजार करने लगे।

उसी समय मंडेला की सीट के सामने एक व्यक्ति भी अपने खाने आने का इंतजार कर रहा था। मंडेला ने अपने सुरक्षा कर्मी को कहा उसे भी अपनी टेबल पर बुला लो। ऐसा ही हुआ, खाना आने के बाद सभी खाने लगे, वो आदमी भी अपना खाना खाने लगा, पर उसके हाथ खाते हुए कांप रहे थे।

खाना खत्म कर वो आदमी सिर झुका कर होटल से निकल गया। उस आदमी के खाना खा के जाने के बाद मंडेला के सुरक्षा अधिकारी ने मंडेला से कहा कि वो व्यक्ति शायद बहुत बीमार था, खाते वक़्त उसकी हाथ लगातार कांप रहे थे और वह कांप भी रहा था।

मंडेला ने कहा नहीं  ऐसा नहीं है। वह उस जेल का जेलर था, जिसमें मुझे रखा गया था। कभी मुझे जब यातनाएं दी जाती और मै कराहते हुवे पानी मांगता तो ये मेरे ऊपर पेशाब करता था।

मंडेला ने कहा मै अब राष्ट्रपति बन गया हूं, उसने समझा कि मै भी उसके साथ ऐसा ही व्यवहार करूंगा। पर मेरा यह चरित्र नहीं है। मुझे लगता है बदले की भावना से काम करना विनाश की ओर ले जाता है। वहीं धैर्य और सहिष्णुता की मानसिकता हमें विकास की ओर ले जाती है।

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 43)

👉 तंत्र एक सम्पूर्ण विज्ञान, एक चिकित्सा पद्धति

तंत्र की तकनीकें प्रत्येक स्थिति में असरकारक सिद्ध होती हैं। आध्यात्मिक चिकित्सक इनका इस्तेमाल व्यक्ति के दुःख, दुर्भाग्य, दोष- दैन्य, पीड़ा- पतन, विकृति- विरोध आदि के निवारण के लिए करते हैं। यदि इन तकनीकों का प्रयोग सविधि किया गया है, तो इनका प्रभाव अचूक होता है। स्थिति कैसी भी हो, व्यक्ति कोई भी हो इनके सटीक असर हुए बिना नहीं रहते। इस दुर्लभ विज्ञान के आधिकारिक विद्वान इस युग में कम ही हैं, पर जो हैं, उनके सान्निध्य में इसके चमत्कार अनुभव किये जा सकते हें। इन विशेषज्ञों का कहना है कि अध्यात्म विद्या के दो आयाम हैं- एक आत्मिकी, दूसरा भौतिकी। आत्मिकी को योग विज्ञान एवं भौतिकी को तंत्र विज्ञान कहते हैं। इस वैज्ञानिक युग में भौतिकी शब्द थोड़ा भ्रमित करने वाला है, क्योंकि इससे फिजिक्स का बोध होता है। ऐसी स्थिति में इसको पराभौतिकी का नाम दिया जा सकता है।

तंत्र महाविद्या की स्थिति भी सचमुच में कुछ ऐसी ही है। जिन चीजों को हम उपेक्षित एवं अवाँछनीय मानते हैं, तंत्र की तकनीकों में उनका बड़ा कारगर इस्तेमाल होता है। पदार्थ विज्ञान ने अणु भौतिकी, कण भौतिकी एवं क्वाण्टम यांत्रिकी की खोजें अभी कुछ ही दशकों पूर्व की हैं। पर तंत्र विशेषज्ञों ने सहस्राब्दियों पूर्व न केवल इन सत्यों को पहचाना, बल्कि इनके प्रयोग की तकनीकें भी विकसित कर लीं। तंत्र विद्या प्रत्येक पदार्थ को ऊर्जा स्रोत के रूप में देखती और मानती है। और इसके व्यावहारिक जीवन में प्रयोग की तकनीकों के अनुसंधान में निरत रहती है।

तंत्र अपने सिद्धान्त एवं प्रयोग में सम्पूर्ण विज्ञान है। जिन्हें इसकी वैज्ञानिकता पर संदेह होता है, उन्हें विज्ञान एवं वैज्ञानिकता की इबारत को नये सिरे से पढ़ना- सीखना चाहिए। सार्थक वैज्ञानिक दृष्टि यह कहती है कि सिद्धान्त की प्रायोगिक पड़ताल किये बगैर उसे नकारा नहीं जाना चाहिए। वैज्ञानिक दृष्टि कोण में किसी आग्रह या मान्यताओं का कोई स्थान नहीं है। यहाँ प्रायोगिक निष्कर्ष ही सब कुछ होते हैं। यहाँ प्रत्यक्षीकरण ही सिद्धान्तों का आधार बनते हैं। जो विज्ञान के दर्शन को स्वीकार करते हैं। तंत्र विद्या उनके लिए नये अनुसंधान क्षेत्र के द्वार उन्मुक्त करती है। उन्हें चुनौती देती है कि आओ, प्रयोग करो और परखो कि सच क्या है? हाँ जो सच मिले उसे स्वीकारने में शरमाना और हिचकिचाना मत। मानवता की भलाई के लिए इनका प्रयोग करना।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 63

👉 Solving Life’s Problems - Part 1

THE PURPOSE OF PROBLEMS is to push you toward obedience to God’s laws, which are exact and cannot be changed. We have the free will to obey them or disobey them. Obedience will bring harmony; disobedience will bring you more problems.

Likewise, when societies get out of harmony, problems develop within the society. Collective problems. Their purpose is to push the whole society toward harmony. Individuals can discover that they can not only grow and learn through individual problem solving, they can learn and grow through collective problem solving. I often say I’ve run out of personal problems; then every once in a while a little one presents itself somewhere. But I hardly recognize it as a problem, because it seems so insignificant. Actually, I want to do all my learning and growing now by helping to solve collective problems.

There was a time when I thought it was a nuisance to be confronted with a problem. I tried to get rid of it. I tried to get somebody else to solve it for me. But that time was long ago. It was a great day in my life when I discovered the wonderful purpose of problems. Yes, they have a wonderful purpose.

Some people wish for a life of no problems, but I would never wish such a life for any of you. What I wish for you is the great inner strength to solve your problems meaningfully and grow. Problems are learning and growing experiences. A life without problems would be a barren existence, without the opportunity for spiritual growth.

To be continued...
📖 From Akhand Jyoti

👉 Sign of nobility

England’s famous Royal Academy of Arts was being prepared for an art exhibition. Many paintings were shortlisted to be displayed in the show. They hung almost every painting except for one. There was no place left in the gallery to hang it. This painting belonged to a new artist. The committee was deciding to reject the painting. At this time, England’s best artist, Sir Turner, removed one of his paintings and gave that space away for the painting. He said, “I am willing to remove this painting of mine. It’s important that the novices get some appreciation and encouragement for their work too”.

👉 Moments of self-expression 3 Aug 2019

■ ये मोती देख रहे हैं आप शुभ्र, श्वेत, ओजस्वी और इसे ऐसा ही बनाए रखने के लिए क्या कुछ नहीं करते, इसे ऐसे किसी मखमल के वस्त्र में लपेट देते हैं, किसी पिटारी में अच्छे से बंद करके रखते हैं, क्यों? ताकि इन पर खरोंच न आने पाए, ताकि ये मोती टूटे न क्योंकि ये अनमोल हैं। इसी प्रकार है ये दूध। ये दूध फटे न इसलिए हम इसे गरम करके रखते हैं। ग्रीष्म ऋतु में हम इसे शीतल जल में रखते हैं, क्योंकि ये अनमोल है। ये दोनों अनमोल हैं और इसे हम सहेजकर रखते हैं। दूध हमारे तन को और पुष्ट करता है, उसी तन की सुन्दरता बढ़ाते हैं ये मोती। अब मोती और दूध की भाँति होते हैं हमारे अपनों के मन। इन्हें भी हमें सहेजकर रखना चाहिए। इनकी रक्षा भी हमें करनी चाहिए। मीठे वचन, स्नेह, आदरपूर्ण व्यवहार से इन्हें सहेजकर रखें। क्योंकि एक बार जैसे दूध फट जाए तो पुनः उसे ठीक नहीं किया जा सकता, एक बार यदि मोती टूट जाए तो कुछ भी कर लो उसे पुनः जोड़ा नहीं जा सकता, उसी प्रकार एक बार मन में भेद हो जाए तो उसे पुनः पूर्व स्थिति में ले जाना अत्यंत कठिन होता है। मन के मतों में भेद हो सकता है, किन्तु मन में भेद नहीं होना चाहिए। इसलिये अपनों के मन सहेजकर रखें। क्योंकि ये अत्यंत अनमोल होते हैं।

◇ बड़ी ऊँचाईयों पर पहुँचने के लिए हमें किसकी आवश्यकता होती है? अब इसका उत्तर बड़ा ही सरल है सीढ़ियों की। अब इसमें एक गूढ़ रहस्य छिपा है। हम जब तेजी से सीढ़ियों पर चढ़ते हैं, तो क्या किसी को पीछे छोड़ देते हैं? तो क्या उसे देखकर हम उसको हीन समझ लेते हैं?? क्या उसे हीन दृष्टि से देखते हैं? यदि हम किसी को धक्का देकर आगे बढ़ें तो क्या हम उसका उपहास बनाते हैं? यदि आपका उत्तर हाँ है, तो ये बहुत बड़ी भूल है। आप सीढ़ियों में जिनसे भी मिलें, मधुर संबंध बनाए रखियेगा, संयमपूर्वक व्यवहार रखिएगा, विनम्र रहियेगा। क्योंकि जिस सीढ़ी से आप चढ़ रहे हैं, उसी सीढ़ी से पुनः आपको नीचे भी उतरना है। यदि ये सीढ़ी ही ना रही तो? अपनी विजय का उत्सव अवश्य मनाएँ, किन्तु जो पीछे छूट जाएँ उसका उपहास कभी मत करें।

★ जीवन में बहुत सारे लोग धन और बल से मूल्यांकन करते हैं किसी भी व्यक्ति का, स्वयं का भी, दूसरों का भी, पर कई बार इस धन और बल अर्जित करने की इस प्रक्रिया में हम समय, संबंध और स्वास्थ्य को पीछे छोड़ देते हैं, अनदेखा कर देते हैं, सोचते हैं कि एक बार हम धन और बल अर्जित कर लें, उसके पश्चात समय भी हमारे अनुसार चलेगा, संबंध में और मधुरता भी आएगी और स्वास्थ्य भी हमारी मुट्ठी में होगा। किन्तु इस धन के कारण हम इन तीनों को खो देते हैं, तब हमें ज्ञात होता है कि हम कितने निर्धन थे? उसके पश्चात संसार का सारा धन एकत्रित कर लीजिये, फिर भी अपना खोया हुआ समय पुनः नहीं ला सकते, ना वो संबंध, ना वो स्वास्थ्य। इसलिये इन तीनों का मूल्य समझ लीजिये, इससे पहले कि विलंब हो जाए।

◇ पौधे को देखिये कितना कोमल, कितना लचीला, यदि इस पर थोड़ा सा भी दबाव डालें तो यह झुक जाता है। पौधे तो होते ही ऐसे हैं, थोड़ा सा दबाव डालोगे, झुक जाएँगे। इनके लचीलेपन के कारण। किन्तु इनका यही लचीलापन आँधियों में इन्हें टूटने से बचाता है। यदि इनके स्थान पर कोई अकड़े हुए वृक्ष को देखो तो वो पवन की तीव्र गति को वो सहन नहीं कर पाता, उसका सामना नहीं कर पाता, टूटकर गिर जाता है। कुछ इसी प्रकार होते हैं हमारे संबंध भी। यदि इनमें वो लचीलापन ना हो, अभिमान की दृढ़ता हो, तो ये संबंध बिखर जाते हैं। लाइये ये लचीलापन अपने संबंधों में ताकि कल कोई समस्या आए तो ये संबंध टूटे नहीं। तनिक इस आकाश में देखिये सूर्य भी इस चन्द्रमा को देखकर झुक जाता है। हम तो साधारण से मनुष्य हैं? तो संबंध को झुकाना नहीं, संबंध के समक्ष झुकना सीखिये।

गुरुवार, 1 अगस्त 2019

👉 बिना चप्पलों के गुजरा बचपन, पढ़ाई के दम पर पाया मुकाम और बन गए इसरो अध्यक्ष

तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले के सराक्कलविलाई गांव के एक किसान के बेटे कैलाशवडीवू सिवन (के सिवन) आज भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अध्यक्ष का पद संभाल रहे हैं। इसके अलावा वह चंद्रयान-2 मिशन का नेतृत्व भी कर रहे हैं। सिवन ने एक सरकारी स्कूल में तमिल माध्यम से पढ़ाई की है। नागेरकोयल के एसटी हिंदू कॉलेज से उन्होंने स्नातक किया। सिवन ने 1980 में मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की।

इसके बाद उन्होंने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसिज (आईआईएससी) से इंजीनियरिंग में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की। 2006 में उन्होंने आईआईटी बॉम्बे से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। सिवन स्नातक करने वाले अपने परिवार के पहले सदस्य हैं। उनके भाई और बहन गरीबी के कारण अपनी उच्च शिक्षा पूरी नहीं कर पाए।

उन्होंने कहा, 'जब मैं कॉलेज में था तो मैं खेतों में अपने पिता की मदद किया करता था। यही कारण था कि पिता ने मेरा दाखिला घर के पास वाले कॉलेज में कराया था। जब मैंने 100 प्रतिशत अंकों के साथ बीएससी (गणित) पूरी कर ली तो उन्होंने अपना मन बदल लिया। मेरा बचपन बिना जूतों और सैंडल के गुजरा है। मैं कॉलेज तक धोती पहना करता था। जब मैं एमआईटी में गया तब पहली बार मैंने पैंट पहनी थी।'

सिवन 1982 में इसरो में शामिल हुए थे। यहां उन्होंने लगभग हर रॉकेट कार्यक्रम में काम किया है। जनवरी 2018 में इसरो अध्यक्ष का पदभार संभालने से पहले वह विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (वीएसएससी) के निदेशक थे। यह सेंटर रॉकेट बनाता है। उन्हें साइक्रोजेनिक इंजन, पीएसएलवी, जीएसएलवी और रियूसेबल लॉन्च व्हीकल  कार्यक्रमों में योगदान देने के कारण इसरो का रॉकेट मैन कहा जाता है।

उन्होंने 15 फरवरी 2017 को भारत द्वारा एकसाथ 104 उपग्रहों को प्रक्षेपित करने में अहम भूमिका निभाई थी। यह इसरो का विश्व रिकॉर्ड भी है। रॉकेट विशेषज्ञ सिवन को खाली समय में तमिल क्लासिकल गाने सुनना और गार्डनिंग करना पसंद है। उनकी पसंदीदा फिल्म राजेश-खन्ना की 1969 में आई आराधना है। उन्होंने कहा, 'जब मैं वीएसएससी का निदेशक था तब मैंने तिरुवनंतपुरम स्थित अपने घर के बगीचे में कई तरह के गुलाब उगाए थे। अब बंगलूरू में मुझे समय नहीं मिल पाता है।'

15 जुलाई को जब चंद्रयान-2 अपने मिशन के लिए उड़ान भरने ही वाला था कि कुछ घंटों पहले तकनीकी कारणों से इसे रोकना पड़ा। इसके बाद सिवन ने एक उच्च स्तरीय टीम बनाई ताकि दिक्कत का पता लगाया जा सके और इसे 24 घंटे के अंदर ठीक कर दिया और सात दिनों बाद चंद्रयान-2 को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया। मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 घंटे में तकनीकी खामी को दूर करने के लिए इसरो के वैज्ञानिकों की प्रशंसा की थी।

👉 प्रभु कृपा....

रात नौ बजे लगभग अचानक मुझे एलर्जी हो गई। घर पर दवाई नहीं, न ही इस समय मेरे अलावा घर में कोई और। श्रीमती जी बच्चों के पास दिल्ली और हम रह गए अकेले।

ड्राईवर मित्र भी अपने घर जा चुका था। बाहर हल्की बारिश की बूंदे सावन महीने के कारण बरस रही थी। दवा की दुकान ज्यादा दूर नहीं थी पैदल भी जा सकता था लेकिन बारिश की वज़ह से मैंने रिक्शा लेना उचित समझा।

बगल में राम मन्दिर बन रहा था। एक रिक्शा वाला भगवान की प्रार्थना कर रहा था। मैंने उससे पूछा, "चलोगे?", तो उसने सहमति में सर हिलाया और बैठ गए हम रिक्शा में!

रिक्शा वाला काफी़ बीमार लग रहा था और उसकी आँखों में आँसू भी थे। मैंने पूछा, "क्या हुआ भैया! रो क्यूँ रहे हो और तुम्हारी तबियत भी ठीक नहीं लग रही।"

उसने बताया, "बारिश की वजह से तीन दिन से सवारी नहीं मिली और वह भूखा है बदन दर्द भी कर रहा है, अभी भगवान से प्रार्थना कर रहा था क़ि आज मुझे भोजन दे दो, मेरे रिक्शे के लिए सवारी भेज दो"।

मैं बिना कुछ बोले रिक्शा रुकवाकर दवा की दुकान पर चला गया।

वहां खड़े खड़े सोच रहा था...

"कहीं भगवान ने तो मुझे इसकी मदद के लिए नहीं भेजा। क्योंकि यदि यही एलर्जी आधे घण्टे पहले उठती तो मैं ड्राइवर से दवा मंगाता, रात को बाहर निकलने की मुझे कोई ज़रूरत भी नहीं थी, और पानी न बरसता तो रिक्शे में भी न बैठता।"मन ही मन भगवांन को याद किया और पूछ ही लिया भगवान से! मुझे बताइये क्या आपने रिक्शे वाले की मदद के लिए भेजा है?"मन में जवाब मिला... "हाँ"...।

मैंने भगवान को धन्यवाद दिया, अपनी दवाई के साथ रिक्शेवाले के लिए भी दवा ली।

बगल के रेस्तरां से छोले भटूरे पैक करवाए और रिक्शे पर आकर बैठ गया। जिस मन्दिर के पास से रिक्शा लिया था वही पहुंचने पर मैंने रिक्शा रोकने को कहा।

उसके हाथ में रिक्शे के 30 रुपये दिए, गर्म छोले भटूरे का पैकेट और दवा देकर बोला,"खाना खा कर यह दवा खा लेना, एक एक गोली ये दोनों अभीऔर एक एक कल सुबह नाश्ते के बाद,उसके बाद मुझे आकर फिर दिखा जाना।

रोते हुए रिक्शेवाला बोला, "मैंने तो भगवान से दो रोटी मांगी थी मग़र भगवान ने तो मुझे छोले भटूरे दे दिए। कई महीनों से इसे खाने की इच्छा थी। आज भगवान ने मेरी प्रार्थना सुन ली।
और जो मन्दिर के पास उसका बन्दा रहता था उसको मेरी मदद के लिए भेज दिया।"

कई बातें वह बोलता रहा और मैं स्तब्ध हो सुनता रहा।

घर आकर सोचा क़ि उस रेस्तरां में बहुत सारी चीज़े थीं, मैं कुछ और भी ले सकता था,
समोसा या खाने की थाली ..
पर मैंने छोले भटूरे ही क्यों लिए?

क्या सच में भगवान ने मुझे रात को अपने भक्त की मदद के लिए ही भेजा था..?

हम जब किसी की मदद करने सही वक्त पर पहुँचते हैं तो इसका मतलब उस व्यक्ति की प्रार्थना भगवान ने सुन ली, और हमें अपना प्रतिनिधि बनाकर उसकी मदद के लिए भेज दिया।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 1 August 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 1 Augest 2019


👉 आन्तरिक स्तर ऊँचा उठाये

कितने व्यक्ति चमत्कारी साधनाओं के विधान जानने और प्रगति में सहायता करने वाले आशीर्वाद पाने के इच्छुक रहते हैं। उन्हें हम सदा यही कहते रहे हैं कि माँगने मात्र से नहीं, पात्रता के अनुरूप ही कुछ मिलता है। चमत्कारी साधनाओं के विधान हमें मालूम है। बताने में भी कोई आपत्ति नहीं, पर वे सफल तभी हो सकेंगे, जब प्रयोग कर्ता केवल कर्मकाण्डों तक ही सीमित न रहकर अपनी भाव भूमिका को भी आध्यात्मिक बनायें। केवल विधान और कर्मकाण्ड कोई सिद्धी नहीं दे। सकते उनके पीछे साधक की उच्च मनोभूमि का होना आवश्यक है और उस प्रकार की भूमिका बनाने की अनिवार्य शर्त उदार, परोपकारी, स्वार्थ-त्यागी और सहृदय होना हैं।

जो कंजूस, अनुदार, निष्ठुर, स्वार्थी और धूर्त प्रकृति के हैं, उन्हें किसी उच्च स्तरीय आध्यात्मिक विभूति का लाभ नहीं मिल सकता। इसी प्रकार आशीर्वाद भी केवल वाणी से कह कर या लेखनी से लिखकर नहीं दिये जाते, उनके पीछे तप की पूँजी लगाई गई हो तभी वे वरदान सफल होंगे। तप की पूँजी हर किसी के लिए नहीं लगाई जा सकती। गाय अपने ही बछड़े को दूध पिलाती है। दूसरे बछड़ों के लिए उसके थन में दूध नहीं उतरता। आशीर्वाद भी अपने ही वर्ग और प्रकृति के लोगों के प्रति झरते हैं। केवल चालाकी और चापलूसी के आधार पर किसी का तप लूटते जाने की घात तो कदाचित ही किसी की लगती है।

इन तथ्यों के आधार पर हम अपने उन प्रियजनों को जो चमत्कारी विधानों की जानकारी तथा लाभकारी आशीर्वादों की उपलब्धि के इच्छुक रहते हैं, हमें एक ही बात समझानी पड़ती है कि वे इन दोनों सफलताओं को यदि वस्तुतः चाहते हों तो अपना आन्तरिक स्तर थोड़ा ऊँचा उठाये और यह ऊँचाई बढ़ सके, उसके लिए हम उन्हें ज्ञान-यज्ञ सरीखे पुनीत परमानों की साधना करने उनमें सक्रिय भाग लेने के लिए अनुरोध करते रहते हैं। लोक-मंगल परमार्थ और युग की पुकार पूरी करने का कर्तव्य पालन करने के लिए ही नहीं हमारा प्रस्तुत मार्ग-दर्शन आध्यात्मिक लाभों से लाभान्वित होने के लिए आवश्यक पात्रता उत्पन्न करने की दृष्टि से भी इसकी नितान्त आवश्यकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, सितंबर १९६९, पृष्ठ 64



http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/September/v1.64

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 42)

👉 ज्योतिर्विज्ञान की अति महती भूमिका

वह ज्योतिष के तीनों आयामों- १. गणित ज्योतिष, २. योग ज्योतिष एवं देव ज्योतिष में पारंगत थे। गणित ज्योतिष को तो सभी जानते हैं। इसमें जन्म समय के अनुसार गणना करके फलाफल का विचार किया जाता है। योग ज्योतिष में योग विद्या के द्वारा व्यक्ति के माता- पिता के मिलन का पता करते हैं, इसकी गणना गर्भाधान के क्षण से की जाती है, न कि जातक के भूमिष्ट होने के क्षण से। देव ज्योतिष में कई आश्चर्य प्रकट होते हैं। जैसे व्यक्ति के नाम से ही उसकी कुण्डली बना देना। उसके वस्त्र अथवा किसी परिचित व्यक्ति को आधार मानकर उसके जन्म चक्र एवं फलाफल का ठीक- ठीक विवेचन कर देना। व्यक्ति को देखकर उसकी पत्नी अथवा किसी दूर- दराज के रिश्तेदान की जन्म कुण्डली बना देना और उसका सही फलाफल बता देना।

स्वामी विशुद्धानन्द अपनी अध्यात्म चिकित्सा में ज्योतिष के इन आयामों का समयानुसार उपयोग करते थे। रोहणी कुमार चेल महाशय ने उनके साथ हुए अपने अनुभव को बताते हुए कहा है, कि जब वह पहली बार उनसे मिलने गये तो अपने हैण्ड बैग में स्वयं की एवं पत्नी की कुण्डली लेकर गये थे। मकसद जिन्दगी की कुछ समस्याओं का समाधान पाना था। पर ज्यों ही वह बैठे और कुण्डली निकालने लगे, त्यों ही विशुद्धानन्द जी ने उन्हें टोक दिया और कहा रुको यह कहते हुए उन्होंने किताब के अन्दर रखा कागज निकाला। इस कागज में न केवल उनकी वरन् उनकी पत्नी की कुण्डली थी बल्कि फलाफल आदि का विवरण लिखा था। आश्चर्यचकित रोहणी कुमार चेल ने अपने पास रखी एवं विशुद्धानन्द महाराज द्वारा बतायी गयी कुण्डलियों को मिलाया। इसमें पत्नी की कुण्डली तो एकदम वही था, पर उनकी कुण्डली में जन्म लग्र अलग थी।

जिज्ञासा करने पर उन्होंने कहा कि मेरी बनायी कुण्डली ही सही है, क्योंकि तुम्हारे पास की कुण्डली यदि सही होती तो तुम साधारण इंसान न होकर अवतार होते। और तुम हमारे पास न आते, बल्कि मैं स्वयं तुम्हारे पास आता। क्योंकि तुम्हारे पास की जो कुण्डली है उसमें वर्णित जन्म लग्र के साथ ब्रह्माण्ड की जो ऊर्जाधाराएँ जिस क्रम में मिल रही थीं, वह सब कुछ असाधारण था। ऐसे समय में तो मानव जन्म घटित ही नहीं होता। वह तो एक असाधारण क्षण था। इस वार्तालाप के साथ ही उन्होंने उनकी आध्यात्मिक चिकित्सा के सारे सरंजाम जुटा दिये। इस चिकित्सा की प्रक्रिया में कतिपय तंत्र की तकनीकें भी शामिल थीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 60

👉 Short Stories

“The most dangerous people in the world are not the tiny minority instigating evil acts, but those who do the acts for them. For example, when the British invaded India, many Indians accepted to work for the British to kill off Indians who resisted their occupation. So in other words, many Indians were hired to kill other Indians on behalf of the enemy for a paycheck. Today, we have mercenaries in Africa, corporate armies from the western world, and unemployed men throughout the Middle East killing their own people - and people of other nations - for a paycheck. To act without a conscience, but for a paycheck, makes anyone a dangerous animal. The devil would be powerless if he couldn’t entice people to do his work. So, as long as money continues to seduce the hungry, the hopeless, the broken, the greedy, and the needy, there will always be war between brothers.”

Suzy Kassem

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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