सोमवार, 5 अगस्त 2019

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ४४)

👉 तंत्र एक सम्पूर्ण विज्ञान, एक चिकित्सा पद्धति

अध्यात्म चिकित्सा के विशेषज्ञ सदियों से यही करते आ रहे हैं और इन क्षणों में भी यही कर रहे हैं। तंत्र का समूचा विज्ञान मूल रूप से पाँच तत्त्वों पर टिका हुआ है। जिस तरह से पृथ्वी, जल, अग्रि, वायु एवं आकाश इन पाँच तत्त्वों से सृष्टि बनती है, उसी तरह से १. पदार्थ, २. स्थान, ३. शब्द, ४. अंक एवं ५. काल, इन पाँच अवयवों के सहारे तंत्र की वैज्ञानिक प्रक्रिया क्रियाशील होती है। तंत्र के क्षेत्र में इन पाँचों का अपना विशिष्ट अर्थ है। जिसे जानकर ही इसके प्रयोग किये जा सकते हैं। इस क्रम में सबसे पहला है पदार्थ। इस सम्बन्ध में आधुनिक वैज्ञानिकों की भाँति तंत्र विशेषज्ञ भी मानते हैं कि ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की विभिन्न धाराओं ने एक विशिष्ट क्रम से मिलकर इस सृष्टि के विभिन्न पदार्थों की सृष्टि की है। इस सृष्टि का प्रत्येक अवयव भले ही वह वस्तु हो या प्राणी अथवा वनस्पति ऊर्जा का ही सघन रूप है।

जगत् और जीवन की इस सच्चाई को स्वीकारते तो वैज्ञानिक भी हैं, पर वे सृष्टि के प्रत्येक अवयव को समपूर्णतया या आँशिक रूप से ऊर्जा में परिवर्तित करने की कला नहीं जानते। लेकिन तांत्रिक ऐसा करने में सक्षम होते हैं। वे अपने प्रयोगों में सृष्टि के प्रत्येक अवयव का चाहे वह जीवित हो या मृत उसमें निहित ऊर्जा का इस्तेमाल कर सकते हैं। वृक्षों की जड़ें या पत्तियाँ, पशु- पक्षियों एवं मनुष्यों के नाखून या बाल तक में निहित ऊर्जा का वह समुचित प्रयोग कर लेते हैं। इन प्रयोगों में दूसरा क्रम स्थान का है। विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रह्माण्डीय ऊर्जाधाराएँ प्रत्येक स्थान पर एक सुनिश्चित रीति से केन्द्रीभूत होती हैं। इसलिए किस ऊर्जा का किस तरह से क्या उपयोग करना है, उसी क्रम में स्थल का चयन किया जाता है। यह स्थान मंदिर, देवालय भी हो सकता है और पीपल, वट आदि वृक्षों की छाँव भी अथवा नदी का किनारा या श्मशान भी हो सकता है।

तंत्र विज्ञान में तीसरा किन्तु सबसे महत्त्वपूर्ण शब्द है। शब्द की तन्मात्रा आकाश है। आकाश परम तत्त्व है, इसी से अन्य तत्त्व उपजे हैं। इसी वजह से तंत्र ने आकाश तत्त्व को अपनी साधना के आधार के रूप में स्वीकारा है। शब्द से बने बीजाक्षर एवं मंत्राक्षरों के सविधि प्रयोग से तंत्र विशेषज्ञ ब्रह्माण्ड की ऊर्जाधाराओं की दिशा को नियंत्रित एवं नियोजित करते हैं। पढ़ने वाले भले इसे असम्भव माने, पर ऐसा होता है। इसे कोई भी अनुभव कर सकता है। तंत्र विद्या में शब्द के प्रयोग अतिरहस्यमय हैं और तुरन्त प्रभाव प्रकट करने वाले हैं। इसमें कोई बीजाक्षर तो ऐसे हैं जो एक- डेढ़ अक्षर के होते हुए भी सिद्ध हो जाने पर कुछ ही सेकण्डों में चमत्कार पैदा करने लगते हैं।

इस क्रम में चौथे तत्त्व के रूप में अंक का स्थान है। शब्दों की भाँति अंक भी तंत्र विद्या में महत्त्व रखते हैं। इन अंकों और कुछ निश्चित रेखा कृतियों के संयोग से यंत्रों का निर्माण होता है। इन यंत्रों की पूजा- प्रतिष्ठा एवं सविधि साधना के द्वारा विशिष्ट ऊर्जाधारा को इसमें केन्द्रित किया जाता है। इसी को यंत्र की जागृति कहते हैं। ऐसा होने पर फिर यंत्र ट्रांसफार्मर जैसा काम करने लगता है, यानि कि वह अपने में केन्द्रित ऊर्जा को काम्य प्रयोजन की पुर्ति के योग्य बनाता है। इस विज्ञान का पाँचवा तत्त्व है काल, जिस पर सारी प्रयोग प्रक्रिया निर्भर करती है। इसके अन्तर्गत यह जानना होता है कि उपरोक्त सभी चारों तत्त्वों का संयोग कब- किन विशेष क्षणों में किया जाय।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ६४

👉 आत्मचिंतन के क्षण 5 Aug 2019

■  मनुष्य में एक छोटी सी समस्या है, वो कभी स्वयं की निंदा सुन नहीं पाता। यदि कोई उसके विषय में बुरा कहे, सह नहीं पाता। सदैव भयभीत रहता है कि जो चार लोग हैं, कहीं मेरे विषय में बुरा न सोचें और यदि उसे पता लग जाए कि कोई उसकी पीठ पीछे उसकी बुराई कर रहा है, तो दुःखी हो जाता है। अब क्या इस कारण से स्वयं को दुखी कर लेना क्या उचित है? कदापि नहीं। क्योंकि सबसे पहली बात जो आपको स्मरण रखनी है। यदि कोई पीठ पीछे आपकी बुराई करता है, वो आपसे दो कदम पीछे है, है न? जो आपके बारे में आपसे सारी बातें कर सकता है। यदि ऐसा नहीं है, यदि वो सत्य कह रहे हैं, तो सर्वप्रथम अपनी भूलों को समझें। उस सत्य को समझें और निकाल फेंकें इन अवगुणों को और फिर देखें आप उनसे दो कदम और आगे बढ़ जाएँगे। क्योंकि ये जीवनरथ आगे देखकर चलाया जाता है, पीछे देखकर नहीं। तो ये पीछे देखना छोड़ दीजिये। जो वर्तमान है इसे देखिये इसे जीयें। जो आपका लक्ष्य है उसे साधिये।

◇ मनुष्य जो है ये भूलों का पिटारा है। मनुष्य जो है, गलतियों का पुतला है और ये सत्य है। भूल भला किससे नहीं होती? हर एक से होती है और एक नहीं अनेक भूलें होती हैं। किन्तु स्मरण रखियेगा उनके वस्त्रों पर कीचड़ लगता है, जो कीचड़ साफ करने का प्रयास करते हैं। तो जहाँ प्रयास वहाँ भूलें तो होंगी ही। अब यदि आप कोई नया संकल्प करने जा रहे हैं, कोई बड़ा कार्य करने जा रहे हैं, और आपसे कोई भूल हो जाए, तो कोई बात नहीं। पश्चाताप न करें। अपनी भूल को पहचानें, उसे समझें, उसे सुधारने का प्रयास करें और सबसे महत्वपूर्ण बात अपनी भूलों से सीखें। उन्हीं के हाथों से लहू बहता है, जो काँटों में छिपे उस पुष्प को निकालने का प्रयास करते हैं। स्मरण रखिये जिसने जीवन में कभी कोई भूल नहीं की उसने कभी कोई नया करने का प्रयास ही नहीं किया। ये भूल आपका सबसे बड़ा शिक्षक है। इससे दुःखी न होइये। पश्चाताप ना करें, इस भूल का आदर करना सीखें, फिर देखें आप स्वयं को जीवन में और ऊँचा पायेंगे।

★ दूध को जल से अधिक श्रेष्ठ माना जाता है, और इसीलिये दूध का मूल्य जल से तनिक अधिक है। अब दूध को यदि दही बनाओगे तो इस दूध की आयु कुछ और अधिक बढ़ जाती है। इसका मूल्य कुछ और मुद्राएँ अधिक, अब इस दही का माखन बनाओगे तो इसकी आयु कुछ सप्ताहों तक और बढ़ जाती है, और मूल्य कुछ और मुद्राएँ अधिक, अब यदि इस माखन का घी बनाएँगे तो इसकी आयु वर्षों तक चलती है, और मूल्य माखन से कुछ और अधिक होता है। अब इन सबका मूल दूध ही है। तो इन सबकी जीवन आयु एवं इनके मूल्य में इतना अंतर क्यों? इसका कारण ये दूध को दही बनने के लिए खटास सहनी पड़ी, दही को माखन बनने के लिए बिलोने के आघात सहने पड़े, और माखन को घण्टों तक ताप सहना पड़ा। तब जाके इसकी आयु इतनी बढ़ी, तब जाके इसका मूल्य इतना बढ़ा। अब हम सारे मनुष्य एक समान दूध की भाँति किन्तु महान वही बनते हैं, जो कठिनाइयों का सामना करते हैं। संकटों का सामना करते हैं। जो इन चुनौतियों पर खरे उतरते हैं। यदि ये सब करोगे तभी जीवन में आगे बढ़ोगे। तभी आपके यश की आयु बढ़ती जायेगी, और तभी ये संसार आपको महत्व देता जायेगा।

👉 पुण्य की कमाई

" टिकट कहाँ है ? " -- टी सी ने बर्थ के नीचे छिपी लगभग तेरह - चौदह साल की लडकी से पूछा।"
नहीं है साहब।

"काँपती हुई हाथ जोड़े लडकी बोली।
"तो गाड़ी से उतरो।" टी सी ने कहा।
इसका टिकट मैं दे रहीं हूँ।............पीछे से ऊषा भट्टाचार्य की आवाज आई जो पेशे से प्रोफेसर थी ।

"तुम्हें कहाँ जाना है ?" लड़की से पूछा" पता नहीं मैम ! "" तब मेरे साथ चल बैंगलोर तक ! ""
तुम्हारा नाम क्या है ? "" चित्रा

"बैंगलोर पहुँच कर ऊषाजी ने चित्रा को अपनी एक पहचान के स्वंयसेवी संस्थान को सौंप दिया । और अच्छे स्कूल में एडमीशन करवा दिया। जल्द ही ऊषा जी का ट्रांसफर दिल्ली होने की वजह से चित्रा से कभी-कभार फोन पर बात हो जाया करती थी ।करीब बीस साल बाद ऊषाजी को एक लेक्चर के लिए सेन फ्रांसिस्को (अमरीका) बुलाया गया । लेक्चर के बाद जब वह होटल का बिल देने रिसेप्सन पर गई तो पता चला पीछे खड़े एक खूबसूरत दंपत्ति ने बिल भर दिया था।"तुमने मेरा बिल क्यों भरा ? ? ""

मैम, यह बम्बई से बैंगलोर तक के रेल टिकट के सामने कुछ नहीं है ।
""अरे चित्रा ! ! ? ? ? . . . .

चित्रा कोई और नहीं इंफोसिस फाउंडेशन की चेयरमैन सुधा मुर्ति थी, एवं इंफोसिस के संस्थापक श्री नारायण मूर्ति जी की पत्नी थी।

यह उन्ही की लिखी पुस्तक "द डे आई स्टाॅप्ड ड्रिंकिंग मिल्क" से लिया गया कुछ अंश

कभी कभी आपके द्वारा भी की गई सहायता किसी की जिन्दगी बदल सकती है।

👉 Solving Life’s Problems - Part 2

I once met a woman who had virtually no problems. I was on a late-night radio program in New York City. This woman called the station and wanted me to come to her home. I was intending to spend the night at the bus station, so I said okay. She sent her chauffeur for me, and I found myself in a millionaire’s home, talking to a middle-aged woman who seemed like a child. She was so immature, and I wondered at her immaturity, until I realized that the woman had been shielded from all problems by a group of servants and lawyers. She had never come to grips with life. She had not had problems to grow on, and therefore had not grown. Problems are blessings in disguise!

Were I to solve problems for others they would remain stagnant; they would never grow. It would be a great injustice to them. My approach is to help with cause rather than effect. When I help others, it is by instilling within them the inspiration to work out problems by themselves. If you feed a man a meal, you only feed him for a day — but if you teach a man to grow food, you feed him for a lifetime.

It is through solving problems correctly that we grow spiritually. We are never given a burden unless we have the capacity to overcome it. If a great problem is set before you, this merely indicates that you have the great inner strength to solve a great problem. There is never really anything to be discouraged about, because difficulties are opportunities for inner growth, and the greater the difficulty the greater the opportunity for growth.

To be continued...
📖 From Akhand Jyoti

👉 धर्म का सच्चा स्वरूप

संसार में हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, ताओ, कन्फ्यूशियस, जैन, बौद्ध, यहूदी आदि विभिन्न नामों से प्रचलित धर्म-सम्प्रदायों पर दृष्टिपात करने से यही पता चलता है कि उनके बाह्यस्वरूप एवं क्रिया-कृत्यों में जमीन-आसमान जितना अंतर है। यह अंतर होना उचित भी है, क्योंकि जिस वातावरण, जिन परिस्थितियों में वे पनपे और फैले हैं, उनकी छाप उन पर पड़ना स्वाभाविक है। मनीषी, अवतारी, महामानवों ने देश काल, परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए श्रेष्ठता-संवर्द्धन एवं निकृष्टता-निवारण के लिए जो सिद्धान्त एवं आचार शास्त्र विनिर्मित किए, कालान्तर में वे ही धर्म-सम्प्रदायों के नाम से पुकारे जाने लगे। इस कारण उनके बाह्य कलेवर में विविधता होना स्वाभाविक है। फिर भी, जहाँ तक मौलिक सिद्धान्तों की बात है, वह सभी तथाकथित धर्मों में एक ही है। सभी ने एक सार्वभौम सत्ता के साथ तादात्म्य स्थापित करना, मानव का अंतिम लक्ष्य स्वीकार किया है।
  
सभी प्रचलित धर्मों में ‘प्रार्थना’ को किसी न किसी रूप में स्वीकार किया एवं अपने दैनिक क्रिया-कृत्यों में सम्मिलित किया गया है। अमेरिका के विख्यात साइक्रियेटिस्ट डॉ. ब्रिल के अनुसार- ‘कोई भी व्यक्ति, जो वास्तव में धार्मिक है, मनोरोगों का शिकार नहीं हो सकता।’ मनःचिकित्सकों एवं मनोविश्लेषकों ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है कि धार्मिक कर्मकाण्डों में जो प्रार्थना की जाती है। प्रसिद्ध विचारक डेल कारनेगी ने लिखा है- ‘जीवन की जटिलताओं और विषमताओं से संघर्ष करके सफलता पाने में कोई भी व्यक्ति अकेले समर्थ नहीं है, आस्था और विश्वास के साथ इस संघर्ष में विजय प्राप्त करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना की जाए।’ मौलाना रूम ने कहा है- ‘रूह की दोस्ती इल्म और ईमान से है, उसके लिए हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई आदि में कोई फर्क नहीं है।’
  
प्रसिद्ध ईसाई धर्मोपदेशक जस्टिन ने कहा है- ‘जितनी भी श्रेष्ठ विचारणाएँ हैं, वे चाहे किसी भी देश या धर्म की हों, सब मनुष्यों के लिए ईश्वरीय निर्देश की तरह हैं।’ शिव महिमा में उल्लेख है-जिस प्रकार बहुत सी नदियाँ भिन्न-भिन्न प्रकार से घूमकर अंततः समुद्र में ही जाकर गिरती हैं, उसी प्रकार मनुष्य अपने स्वभाव के अनुसार अलग-अलग धर्म, पंथों से चलकर उसी एक ईश्वर तक पहुँचते हैं।
  
इंजील ने लिखा है- ‘मनुष्य के नथुनों में जितने श्वास आते हैं, उतने ही ईश्वर तक पहुँचने के रास्ते हैं।’ चीन के प्रसिद्ध दार्शनिक कन्फ्यूशियस का कथन है- ‘अलग-अलग धर्मों की प्रेरणाएँ एक-दूसरे की विरोधी नहीं, पूरक हैं।’ प्रसिद्ध संत जरथ्रुस्त के अनुसार-‘हम संसार के उन सभी धर्मों को मानते और पूजते हैं, जो नेकी सिखलाते हैं।’ योगेश्वर श्रीकृष्ण जी ने भगवद्गीता में स्पष्ट कहा  है-‘सभी मनुष्य भिन्न-भिन्न पथों से चलकर अंततः मुझ तक ही पहुँचते हैं।’
  
अनेकों मनीषियों, युगद्रष्टा ऋषियों ने इसे स्वीकार किया है कि विभिन्न धर्मों में वर्णित आदर्श एवं सिद्धान्त सनातन हैं। एक्लेजियास्टिक्स ने उल्लेख किया है- क्या कोई ऐसा आदर्श है, जिसके संदर्भ में यह कहा जा सके कि यह नया है? हर सिद्धान्त सनातन है, जिसका उल्लेख विभिन्न धर्मों में मिलता है।
  
हजरत मोहम्मद ने सभी धर्मानुयायियों को संबोधित करते हुए कहा- ‘आओ हम सब मिलकर उन बातों पर विचार करें, जो हममें और तुममें एक सी हैं।’ ‘शोतोकु’ नामक संत ने कहा- ‘शिनतो, कन्फ्यूशियस व बौद्ध ये तीनों धर्म एक धर्म रूपी वृक्ष के विभिन्न अवयव हैं।  जापानी जनता ने धर्म के मूल तत्त्व को आत्मसात् कर लिया और धर्मों के बाह्य कलेवरों की भिन्नता को समझ लेने के फलस्वरूप विभेदता की कुचाल में न फँसी, उत्तरोत्तर प्रगति पथ पर बढ़ती गई।’
  
उक्त विवेचनों से यही निष्कर्ष निकलता है कि विविध धर्मों के बाह्य कलेवर एवं क्रिया-कृत्यों में न्यूनाधिक भिन्नता भले ही हो, परन्तु सबका प्राण तत्त्व एक ही है। धर्म का सच्चा स्वरूप वस्तुतः वही है, जो शाश्वत सिद्धान्तों के रूप में सभी धर्मों में विद्यमान है। धर्म के उस प्राण तत्त्व को हृदयंगम कर व्यावहारिक जीवन में समाविष्ट किए जाने से ही सबका कल्याण संभव हो सकेगा और मानवीय समाज सुख-शांति का रसास्वादन कर सकेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 3 अगस्त 2019

कुरीतियों का अंत | Anti Curruption | Kuritiyon Ka Ant



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Balance Your Thoughts and Action | विचार और कार्य संतुलित करो | हारिये न...



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👉 बुजुर्गों को समय चाहिए

छोटे ने कहा," भैया, दादी कई बार कह चुकी हैं कभी मुझे भी अपने साथ होटल ले जाया करो." गौरव बोला, " ले तो जायें पर चार लोगों के खाने पर कितना खर्च होगा. याद है पिछली बार जब हम तीनों ने डिनर लिया था , तब सोलह सौ का बिल आया था. हमारे पास अब इतने पैसे कहाँ बचे हैं." पिंकी ने बताया," मेरे पास पाकेटमनी के कुछ पैसे बचे हुए हैं." तीनों ने मिलकर तय किया कि इस बार दादी को भी लेकर चलेंगे, पर इस बार मँहगी पनीर की सब्जी की जगह मिक्सवैज मँगवायेंगे और आइसक्रीम भी नहीं खायेंगे.

छोटू, गौरव और पिंकी तीनों दादी के कमरे में गये और बोले," दादी इस' संडे को लंच बाहर लेंगे, चलोगी हमारे साथ." दादी ने खुश होकर कहा," तुम ले चलोगे अपने साथ." " हाँ दादी " .

संडे को दादी सुबह से ही बहुत खुश थी. आज उन्होंने अपना सबसे बढिया वाला सूट पहना, हल्का सा मेकअप किया, बालों को एक नये ढंग से बाँधा. आँखों पर सुनहरे फ्रेमवाला नया चश्मा लगाया. यह चश्मा उनका मँझला बेटा बनवाकर दे गया था जब वह पिछली बार लंदन से आया था. किन्तु वह उसे पहनती नहीं थी, कहती थी, इतना सुन्दर फ्रेम है, पहनूँगी तो पुराना हो जायेगा. आज दादी शीशे में खुद को अलग अलग एंगिल से कई बार देख चुकी थी और संतुष्ट थी.

बच्चे दादी को बुलाने आये तो पिंकी बोली," अरे वाह दादी, आज तो आप बडी क्यूट लग रही हैं". गौरव ने कहा," आज तो दादी ने गोल्डन फ्रेम वाला चश्मा पहना है. क्या बात है दादी किसी ब्यायफ्रैंड को भी बुला रखा है क्या." दादी शर्माकर बोली, " धत. "

होटल में सैंटर की टेबल पर चारो बैठ गए. थोडी देर बाद वेटर आया, बोला, " आर्डर प्लीज ". अभी गौरव बोलने ही वाला था कि दादी बोली," आज आर्डर मैं करूँगी क्योंकि आज की स्पेशल गैस्ट मैं हूँ." दादी ने लिखवाया__ दालमखनी, कढाईपनीर, मलाईकोफ्ता, रायता वैजेटेबिल वाला, सलाद, पापड, नान बटरवाली और मिस्सी रोटी. हाँ खाने से पहले चार सूप भी.

तीनों बच्चे एकदूसरे का मुँह देख रहे थे. थोडी देरबाद खाना टेबल पर लग गया. खाना टेस्टी था, जब सब खा चुके तो वेटर फिर आया, "डेजर्ट में कुछ सर". दादी ने कहा,  " हाँ चार कप आइसक्रीम ". तीनों बच्चों की हालत खराब, अब क्या होगा, दादी को मना भी नहीं कर सकते पहली बार आईं हैं.

बिल आया, इससे पहले गौरव उसकी तरफ हाथ बढाता, बिल दादी ने उठा लिया और कहा," आज का पेमेंट मैं करूँगी. बच्चों मुझे तुम्हारे पर्स की नहीं, तुम्हारे समय की आवश्यकता है, तुम्हारी कंपनी की आवश्यकता है. मैं पूरा दिन अपने कमरे में अकेली पडे पडे बोर हो जाती हूँ. टी.वी. भी कितना देखूँ, मोबाईल पर भी चैटिंग कितना करूँ. बोलो बच्चों क्या अपना थोडा सा समय मुझे दोगे," कहते कहते दादी की आवाज भर्रा गई.

पिंकी अपनी चेयर से उठी, उसने दादी को अपनी बाँहों में भर लिया   और फिर दादी के गालों पर किस करते हुए बोली," मेरी प्यारी दादी जरूर." गौरव ने कहा, " यस दादी, हम प्रामिस करते हैं कि रोज आपके पास बैठा करेंगे और तय रहा कि हर महीने के सैकंड संडे को लंच या डिनर के लिए बाहर आया करेंगे और पिक्चर भी देखा करेंगे."

दादी के होठों पर 1000 वाट की मुस्कुराहट तैर गई, आँखों में फ्लैशलाइट सी चमक आ गई और चेहरे की झुर्रियाँ खुशी के कारण नृत्य सा करती महसूस होने लगीं...-

बूढ़े मां बाप रूई के गटठर समान होते है, शुरू में उनका बोझ नहीं महसूस होता, लेकिन बढ़ती उम्र के साथ रुई भीग कर बोझिल होने लगती है. बुजुर्ग समय चाहते हैं पैसा नही, पैसा तो उन्होंने सारी जिंदगी आपके लिए कमाया-की बुढ़ापे में आप उन्हें समय देंगे।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 3 August 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 3 Augest 2019


👉 अपना विचार क्षेत्र बढ़ाना है

हमें अपना विचार क्षेत्र बढ़ाना है। अब तक केवल अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिका से ही अपना संपर्क क्षेत्र विनिर्मित करते रहें। जो इन्हें पढ़ते हैं उन्हीं तक अपने विचार पहुँचते हैं। इस छोटे वर्ग से ही समस्त विश्व को परिवर्तित करने का स्वप्न साकार नहीं हो सकता। हमें प्रचार के लिए बड़े कदम उठाने होंगे। प्रस्तुत विज्ञप्ति योजना और झोला पुस्तकालय प्रक्रिया इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए है। हर परिजन से इनमें आवश्यक रस लेने और उत्साहपूर्वक प्रयत्न करने को अनुरोध किया गया है। समय के साथ अपनी गाड़ी कमाई का एक छोटा अंश लोक-मंगल के इस छोटे दीखने वाले, किन्तु अत्यधिक महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए खर्च करने को कहा गया है। व्यक्ति को अपने लिए ही नहीं कमाते रहना चाहिये। उसकी कमाई में समाज का भी अधिकार है। इस अधिकार को संतुलित बनाने के लिए दान को एक अनिवार्य धर्म कर्तव्य माना गया है। जो दान नहीं करता-अपनी कमाई आप ही खाता रहता है, उसे मनीषियों और शास्त्रों ने चोर माना है। हमारा कोई परिजन चोर न कहलायेगा, उसे दानी ही बनना चाहिये और दान की सार्थकता तभी है, जब उसके पीछे उपयोगिता और विवेक का पुट हो।

सद्ज्ञान प्रसार करने जनमानस को बदलने से बढ़कर दान की और कहीं सार्थकता हो नहीं सकती। यह ब्रह्म दान सबसे बड़ा परमार्थ है। इसलिये परिजनों को दस पैसा रोज एवं थोड़े दिन के लिए, महीने में एक दिन की आमदनी खर्च करते रहने के लिए कहा गया है। यदि यह बात समझ में आ सके और थोड़ा समय एवं थोड़ा पैसा सभी लोग नियमित रूप से खर्च करने लगें तो अपने ज्ञान-यज्ञ की लपटें आकाश को छूने लगेंगी और पाताल तक को प्रभावित करने लगेंगी। इसलिए गत पूरे अंक में और इस अंक की इन पंक्तियों में बहुत जोर देकर यह कहा जा रहा है कि यह पंक्तियाँ पढ़ कर ही पत्रिका उठाकर एक कोने में रख दी जाय वरन् कुछ करने के लिए आवश्यक साहस और उत्साह पैदा किया जाय। विश्वास यही किया जाना चाहिये कि अपने अति आवश्यक अनुरोध परिजनों द्वारा उपेक्षित नहीं किये गये हैं और इस बार ज्ञान यज्ञ की हमारी संकल्पित प्रक्रिया को अधूरी न रहने दिया जाएगा उसके लिए भी स्वजनों में आवश्यक उत्साह पैदा होगा और नवनिर्माण की विचार धारा विश्वव्यापी होकर रहेगी।

यह विचार-धारा और जनमानस की प्रबुद्धता को दिशा में घसीट ले जाने की प्रक्रिया अखण्ड-ज्योति परिवार, गायत्री परिवार अथवा युग-निर्माण योजना के कुछ लाख सदस्यों तक सीमित नहीं रहने दी जा सजती। इसे देशव्यापी-विश्व-व्यापी बनना है। इसके लिए एक भाषा की सीमा बद्धता भी पर्याप्त नहीं है। अब तक अपने पास केवल हिन्दी माध्यम रहा है। अब भारत की 14 प्रमुख भाषाओं में अपना कार्यक्षेत्र बढ़ाना पड़ेगा। इतना ही नहीं संसार की दस प्रमुख भाषाओं का भी सहारा लेना पड़ेगा ताकि अपना सन्देश भारतवर्ष तक ही सीमित न रहकर विश्व-व्यापी बन सके। विज्ञप्तियाँ, ट्रैक्ट तथा सभी प्रचार साहित्य अब हमें इस सब भाषाओं में प्रकाशित प्रचारित करना है। इसके लिए पूँजी की जरूरत पड़ेगी यज्ञ आयोजनों के संयोजन लोग अपनी बचत गतवर्ष में इस कार्य के लिए देने लगे हैं। यह अच्छी परम्परा है। दूसरे लोग जिनमें सामर्थ्य और उदारता हो इस अहम् प्रयोजन के लिए कुछ अनुदान देने का साहस कर सकते हैं। ज्ञान-यज्ञ से बढ़कर दानशीलता को चरितार्थ करने का और कोई माध्यम शायद ही इस संसार में दूसरा होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, सितंबर १९६९, पृष्ठ 66

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/September/v1.66

👉 देव दर्शन के पीछे दिव्य दृष्टि भी रहे

दर्शन शब्द का अर्थ जहाँ देखना है वहाँ उसका एक अर्थ विवेचना या विचारणा भी है। अनेक लोग देव प्रतिमाओं, तीर्थ स्थानों, संत एवं सत्पुरुषों के दर्शन करने आया करते हैं, वे इसमें पुण्य लाभ का विश्वास करते हैं। शुभ व्यक्तियों अथवा शुभ स्थानों का दर्शन करना शुभ ही है। किन्तु उसका वास्तविक लाभ तभी हो सकता है जब दर्शन को देखने तक ही सीमित न रखा जाये, बल्कि उसके अन्दर निहित विचारणा पर भी ध्यान दिया जाये। जितनी ही श्रद्धा, भक्ति एवं भावना से किसी देव प्रतिमा, संत पुरुष अथवा तीर्थ स्थान के दर्शन क्यों न किये जायें, उसके वास्तविक लाभ तब तक सम्भव नहीं जब तक उस व्यक्ति प्रतीक अथवा स्थान की उन विशेषताओं को हृदयंगम न किया जायेगा जिनके कारण उनका महात्म्य है। केवल  दर्शनीय स्थल को देख भर लेने से प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता।
   
दर्शन मात्र से स्वर्ग, मोक्ष, सुख, शान्ति, सम्पत्ति अथवा प्रसिद्धि आदि का लाभ पाने का विश्वास रखने वालों की श्रद्धा को विवेक सम्मत नहीं माना जा सकता। उनकी अति श्रद्धा अथवा अति विश्वास एक प्रकार से अज्ञानजन्य ही होता है, जिसे अन्ध-विश्वास अथवा अन्ध-श्रद्धा भी कहते हैं। श्रद्धा जहाँ आत्मा की उन्नति करती है, मन-मस्तिष्क को सुसंस्कृत एवं स्थिर करती है, ईश्वर प्राप्ति के लिये व्यग्र एवं जिज्ञासु बनाती है, वहाँ मूढ़-श्रद्धा अथवा अंध विश्वास उसे अवास्तविकता के गर्त में गिरा देती है। अन्धविश्वासियों अथवा अंध श्रद्धालुओं को अपनी अविवेकपूर्ण धारणाओं से लाभ की अपेक्षा हानि ही अधिक होती है।
   
आज धर्म के नाम पर जो कुछ देखी जाती है, उसका बहुत कुछ उत्तरदायित्व उन अन्ध श्रद्धालुओं पर ही है, जो धर्म के सत्य स्वरूप एवं कर्म की विधि और उसका परिणाम नहीं जानते। जनता की अंध-श्रद्धा के आधार पर न जाने कितने आडम्बरी एवं प्रवचक लोग अर्थ एवं आदर का लाभ उठाया करते हैं। यही कारण है कि शास्त्रों में जहाँ श्रद्धा की प्रशंसा की गई, वहीं अंध-श्रद्धा की निन्दा भी।
   
दर्शन करने के सम्बन्ध में भी भोले लोगों की यह अंध-श्रद्धा उन्हें दर्शन के मूल प्रयोजन एवं उससे होने वाले लाभ से वंचित ही रखती है। लाखों-करोड़ों लोग प्रति वर्ष तीर्थों तथा तीर्थ पुरुषों के दर्शन करने देश के कोने-कोने से आते-जाते हैं। अनेकों लाभ तो प्रतिदिन प्रातः, सायं मंदिरों में देव प्रतिमा के दर्शन करने जाया करते हैं। किन्तु क्या कहा जा सकता है कि इन लोगों को वह लाभ होता होगा, जो उन्हें अभीष्ट रहता है। निश्चय ही नहीं। उन्हें इस बाह्य दर्शन द्वारा एक भ्रामक आत्म-तुष्टि के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिल सकता।
   
यदि केवल देव प्रतिमा, देव स्थान अथवा देवपुरुष को देखने मात्र से, हाथ जोड़ने, दण्डवत प्रणाम करने, पैसा अथवा पूजा प्रसाद चढ़ा देने भर से ही किसी के पापों का क्षरण हो जाता, दुःख दारिद्रय दूर हो जाता और पुण्य, परमार्थ, स्वर्ग मुक्ति आदि मिल सकते व जीवन में तेजस्विता, देवत्व अथवा निर्द्वन्दता का समावेश हो सकता, तो दिन-रात देव प्रतिमाओं की परिचर्या करने वाले पुजारियों, मन्दिरों की सफाई-देखभाल करने वाले सेवकों को यह सभी लाभ अनायास ही मिल जाते। उनके सारे दुःख द्वन्द्व दूर हो जाते और सुख-शान्ति पूर्ण स्वर्गीय जीवन के अधिकारी बन जाते हैं, किन्तु ऐसा देखने में नहीं आता। मंदिरों के सेवक और प्रतिमाओं के पुजारी भी अन्य सामान्य जनों की भाँति ही अविशेष जीवन में पड़े-पड़े दुःखों तथा शोक संतापों को सहते रहते हैं। उनके वक्त जीवन में रंचमात्र भी परिवर्तन नहीं होता, यद्यपि उनकी पूरी जिन्दगी देव प्रतिमाओं के सान्निध्य एवं देवस्थापन की सेवा करने बीत जाती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 चरित्र

नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनने के बाद, अपने सुरक्षा कर्मियों के साथ एक रेस्तरां में खाना खाने गए। सबने अपनी अपनी पसंद के खाना का आर्डर दिया और खाना के आने का इंतजार करने लगे।

उसी समय मंडेला की सीट के सामने एक व्यक्ति भी अपने खाने आने का इंतजार कर रहा था। मंडेला ने अपने सुरक्षा कर्मी को कहा उसे भी अपनी टेबल पर बुला लो। ऐसा ही हुआ, खाना आने के बाद सभी खाने लगे, वो आदमी भी अपना खाना खाने लगा, पर उसके हाथ खाते हुए कांप रहे थे।

खाना खत्म कर वो आदमी सिर झुका कर होटल से निकल गया। उस आदमी के खाना खा के जाने के बाद मंडेला के सुरक्षा अधिकारी ने मंडेला से कहा कि वो व्यक्ति शायद बहुत बीमार था, खाते वक़्त उसकी हाथ लगातार कांप रहे थे और वह कांप भी रहा था।

मंडेला ने कहा नहीं  ऐसा नहीं है। वह उस जेल का जेलर था, जिसमें मुझे रखा गया था। कभी मुझे जब यातनाएं दी जाती और मै कराहते हुवे पानी मांगता तो ये मेरे ऊपर पेशाब करता था।

मंडेला ने कहा मै अब राष्ट्रपति बन गया हूं, उसने समझा कि मै भी उसके साथ ऐसा ही व्यवहार करूंगा। पर मेरा यह चरित्र नहीं है। मुझे लगता है बदले की भावना से काम करना विनाश की ओर ले जाता है। वहीं धैर्य और सहिष्णुता की मानसिकता हमें विकास की ओर ले जाती है।

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 43)

👉 तंत्र एक सम्पूर्ण विज्ञान, एक चिकित्सा पद्धति

तंत्र की तकनीकें प्रत्येक स्थिति में असरकारक सिद्ध होती हैं। आध्यात्मिक चिकित्सक इनका इस्तेमाल व्यक्ति के दुःख, दुर्भाग्य, दोष- दैन्य, पीड़ा- पतन, विकृति- विरोध आदि के निवारण के लिए करते हैं। यदि इन तकनीकों का प्रयोग सविधि किया गया है, तो इनका प्रभाव अचूक होता है। स्थिति कैसी भी हो, व्यक्ति कोई भी हो इनके सटीक असर हुए बिना नहीं रहते। इस दुर्लभ विज्ञान के आधिकारिक विद्वान इस युग में कम ही हैं, पर जो हैं, उनके सान्निध्य में इसके चमत्कार अनुभव किये जा सकते हें। इन विशेषज्ञों का कहना है कि अध्यात्म विद्या के दो आयाम हैं- एक आत्मिकी, दूसरा भौतिकी। आत्मिकी को योग विज्ञान एवं भौतिकी को तंत्र विज्ञान कहते हैं। इस वैज्ञानिक युग में भौतिकी शब्द थोड़ा भ्रमित करने वाला है, क्योंकि इससे फिजिक्स का बोध होता है। ऐसी स्थिति में इसको पराभौतिकी का नाम दिया जा सकता है।

तंत्र महाविद्या की स्थिति भी सचमुच में कुछ ऐसी ही है। जिन चीजों को हम उपेक्षित एवं अवाँछनीय मानते हैं, तंत्र की तकनीकों में उनका बड़ा कारगर इस्तेमाल होता है। पदार्थ विज्ञान ने अणु भौतिकी, कण भौतिकी एवं क्वाण्टम यांत्रिकी की खोजें अभी कुछ ही दशकों पूर्व की हैं। पर तंत्र विशेषज्ञों ने सहस्राब्दियों पूर्व न केवल इन सत्यों को पहचाना, बल्कि इनके प्रयोग की तकनीकें भी विकसित कर लीं। तंत्र विद्या प्रत्येक पदार्थ को ऊर्जा स्रोत के रूप में देखती और मानती है। और इसके व्यावहारिक जीवन में प्रयोग की तकनीकों के अनुसंधान में निरत रहती है।

तंत्र अपने सिद्धान्त एवं प्रयोग में सम्पूर्ण विज्ञान है। जिन्हें इसकी वैज्ञानिकता पर संदेह होता है, उन्हें विज्ञान एवं वैज्ञानिकता की इबारत को नये सिरे से पढ़ना- सीखना चाहिए। सार्थक वैज्ञानिक दृष्टि यह कहती है कि सिद्धान्त की प्रायोगिक पड़ताल किये बगैर उसे नकारा नहीं जाना चाहिए। वैज्ञानिक दृष्टि कोण में किसी आग्रह या मान्यताओं का कोई स्थान नहीं है। यहाँ प्रायोगिक निष्कर्ष ही सब कुछ होते हैं। यहाँ प्रत्यक्षीकरण ही सिद्धान्तों का आधार बनते हैं। जो विज्ञान के दर्शन को स्वीकार करते हैं। तंत्र विद्या उनके लिए नये अनुसंधान क्षेत्र के द्वार उन्मुक्त करती है। उन्हें चुनौती देती है कि आओ, प्रयोग करो और परखो कि सच क्या है? हाँ जो सच मिले उसे स्वीकारने में शरमाना और हिचकिचाना मत। मानवता की भलाई के लिए इनका प्रयोग करना।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 63

👉 Solving Life’s Problems - Part 1

THE PURPOSE OF PROBLEMS is to push you toward obedience to God’s laws, which are exact and cannot be changed. We have the free will to obey them or disobey them. Obedience will bring harmony; disobedience will bring you more problems.

Likewise, when societies get out of harmony, problems develop within the society. Collective problems. Their purpose is to push the whole society toward harmony. Individuals can discover that they can not only grow and learn through individual problem solving, they can learn and grow through collective problem solving. I often say I’ve run out of personal problems; then every once in a while a little one presents itself somewhere. But I hardly recognize it as a problem, because it seems so insignificant. Actually, I want to do all my learning and growing now by helping to solve collective problems.

There was a time when I thought it was a nuisance to be confronted with a problem. I tried to get rid of it. I tried to get somebody else to solve it for me. But that time was long ago. It was a great day in my life when I discovered the wonderful purpose of problems. Yes, they have a wonderful purpose.

Some people wish for a life of no problems, but I would never wish such a life for any of you. What I wish for you is the great inner strength to solve your problems meaningfully and grow. Problems are learning and growing experiences. A life without problems would be a barren existence, without the opportunity for spiritual growth.

To be continued...
📖 From Akhand Jyoti

👉 Sign of nobility

England’s famous Royal Academy of Arts was being prepared for an art exhibition. Many paintings were shortlisted to be displayed in the show. They hung almost every painting except for one. There was no place left in the gallery to hang it. This painting belonged to a new artist. The committee was deciding to reject the painting. At this time, England’s best artist, Sir Turner, removed one of his paintings and gave that space away for the painting. He said, “I am willing to remove this painting of mine. It’s important that the novices get some appreciation and encouragement for their work too”.

👉 Moments of self-expression 3 Aug 2019

■ ये मोती देख रहे हैं आप शुभ्र, श्वेत, ओजस्वी और इसे ऐसा ही बनाए रखने के लिए क्या कुछ नहीं करते, इसे ऐसे किसी मखमल के वस्त्र में लपेट देते हैं, किसी पिटारी में अच्छे से बंद करके रखते हैं, क्यों? ताकि इन पर खरोंच न आने पाए, ताकि ये मोती टूटे न क्योंकि ये अनमोल हैं। इसी प्रकार है ये दूध। ये दूध फटे न इसलिए हम इसे गरम करके रखते हैं। ग्रीष्म ऋतु में हम इसे शीतल जल में रखते हैं, क्योंकि ये अनमोल है। ये दोनों अनमोल हैं और इसे हम सहेजकर रखते हैं। दूध हमारे तन को और पुष्ट करता है, उसी तन की सुन्दरता बढ़ाते हैं ये मोती। अब मोती और दूध की भाँति होते हैं हमारे अपनों के मन। इन्हें भी हमें सहेजकर रखना चाहिए। इनकी रक्षा भी हमें करनी चाहिए। मीठे वचन, स्नेह, आदरपूर्ण व्यवहार से इन्हें सहेजकर रखें। क्योंकि एक बार जैसे दूध फट जाए तो पुनः उसे ठीक नहीं किया जा सकता, एक बार यदि मोती टूट जाए तो कुछ भी कर लो उसे पुनः जोड़ा नहीं जा सकता, उसी प्रकार एक बार मन में भेद हो जाए तो उसे पुनः पूर्व स्थिति में ले जाना अत्यंत कठिन होता है। मन के मतों में भेद हो सकता है, किन्तु मन में भेद नहीं होना चाहिए। इसलिये अपनों के मन सहेजकर रखें। क्योंकि ये अत्यंत अनमोल होते हैं।

◇ बड़ी ऊँचाईयों पर पहुँचने के लिए हमें किसकी आवश्यकता होती है? अब इसका उत्तर बड़ा ही सरल है सीढ़ियों की। अब इसमें एक गूढ़ रहस्य छिपा है। हम जब तेजी से सीढ़ियों पर चढ़ते हैं, तो क्या किसी को पीछे छोड़ देते हैं? तो क्या उसे देखकर हम उसको हीन समझ लेते हैं?? क्या उसे हीन दृष्टि से देखते हैं? यदि हम किसी को धक्का देकर आगे बढ़ें तो क्या हम उसका उपहास बनाते हैं? यदि आपका उत्तर हाँ है, तो ये बहुत बड़ी भूल है। आप सीढ़ियों में जिनसे भी मिलें, मधुर संबंध बनाए रखियेगा, संयमपूर्वक व्यवहार रखिएगा, विनम्र रहियेगा। क्योंकि जिस सीढ़ी से आप चढ़ रहे हैं, उसी सीढ़ी से पुनः आपको नीचे भी उतरना है। यदि ये सीढ़ी ही ना रही तो? अपनी विजय का उत्सव अवश्य मनाएँ, किन्तु जो पीछे छूट जाएँ उसका उपहास कभी मत करें।

★ जीवन में बहुत सारे लोग धन और बल से मूल्यांकन करते हैं किसी भी व्यक्ति का, स्वयं का भी, दूसरों का भी, पर कई बार इस धन और बल अर्जित करने की इस प्रक्रिया में हम समय, संबंध और स्वास्थ्य को पीछे छोड़ देते हैं, अनदेखा कर देते हैं, सोचते हैं कि एक बार हम धन और बल अर्जित कर लें, उसके पश्चात समय भी हमारे अनुसार चलेगा, संबंध में और मधुरता भी आएगी और स्वास्थ्य भी हमारी मुट्ठी में होगा। किन्तु इस धन के कारण हम इन तीनों को खो देते हैं, तब हमें ज्ञात होता है कि हम कितने निर्धन थे? उसके पश्चात संसार का सारा धन एकत्रित कर लीजिये, फिर भी अपना खोया हुआ समय पुनः नहीं ला सकते, ना वो संबंध, ना वो स्वास्थ्य। इसलिये इन तीनों का मूल्य समझ लीजिये, इससे पहले कि विलंब हो जाए।

◇ पौधे को देखिये कितना कोमल, कितना लचीला, यदि इस पर थोड़ा सा भी दबाव डालें तो यह झुक जाता है। पौधे तो होते ही ऐसे हैं, थोड़ा सा दबाव डालोगे, झुक जाएँगे। इनके लचीलेपन के कारण। किन्तु इनका यही लचीलापन आँधियों में इन्हें टूटने से बचाता है। यदि इनके स्थान पर कोई अकड़े हुए वृक्ष को देखो तो वो पवन की तीव्र गति को वो सहन नहीं कर पाता, उसका सामना नहीं कर पाता, टूटकर गिर जाता है। कुछ इसी प्रकार होते हैं हमारे संबंध भी। यदि इनमें वो लचीलापन ना हो, अभिमान की दृढ़ता हो, तो ये संबंध बिखर जाते हैं। लाइये ये लचीलापन अपने संबंधों में ताकि कल कोई समस्या आए तो ये संबंध टूटे नहीं। तनिक इस आकाश में देखिये सूर्य भी इस चन्द्रमा को देखकर झुक जाता है। हम तो साधारण से मनुष्य हैं? तो संबंध को झुकाना नहीं, संबंध के समक्ष झुकना सीखिये।

गुरुवार, 1 अगस्त 2019

👉 बिना चप्पलों के गुजरा बचपन, पढ़ाई के दम पर पाया मुकाम और बन गए इसरो अध्यक्ष

तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले के सराक्कलविलाई गांव के एक किसान के बेटे कैलाशवडीवू सिवन (के सिवन) आज भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अध्यक्ष का पद संभाल रहे हैं। इसके अलावा वह चंद्रयान-2 मिशन का नेतृत्व भी कर रहे हैं। सिवन ने एक सरकारी स्कूल में तमिल माध्यम से पढ़ाई की है। नागेरकोयल के एसटी हिंदू कॉलेज से उन्होंने स्नातक किया। सिवन ने 1980 में मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की।

इसके बाद उन्होंने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसिज (आईआईएससी) से इंजीनियरिंग में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की। 2006 में उन्होंने आईआईटी बॉम्बे से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। सिवन स्नातक करने वाले अपने परिवार के पहले सदस्य हैं। उनके भाई और बहन गरीबी के कारण अपनी उच्च शिक्षा पूरी नहीं कर पाए।

उन्होंने कहा, 'जब मैं कॉलेज में था तो मैं खेतों में अपने पिता की मदद किया करता था। यही कारण था कि पिता ने मेरा दाखिला घर के पास वाले कॉलेज में कराया था। जब मैंने 100 प्रतिशत अंकों के साथ बीएससी (गणित) पूरी कर ली तो उन्होंने अपना मन बदल लिया। मेरा बचपन बिना जूतों और सैंडल के गुजरा है। मैं कॉलेज तक धोती पहना करता था। जब मैं एमआईटी में गया तब पहली बार मैंने पैंट पहनी थी।'

सिवन 1982 में इसरो में शामिल हुए थे। यहां उन्होंने लगभग हर रॉकेट कार्यक्रम में काम किया है। जनवरी 2018 में इसरो अध्यक्ष का पदभार संभालने से पहले वह विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (वीएसएससी) के निदेशक थे। यह सेंटर रॉकेट बनाता है। उन्हें साइक्रोजेनिक इंजन, पीएसएलवी, जीएसएलवी और रियूसेबल लॉन्च व्हीकल  कार्यक्रमों में योगदान देने के कारण इसरो का रॉकेट मैन कहा जाता है।

उन्होंने 15 फरवरी 2017 को भारत द्वारा एकसाथ 104 उपग्रहों को प्रक्षेपित करने में अहम भूमिका निभाई थी। यह इसरो का विश्व रिकॉर्ड भी है। रॉकेट विशेषज्ञ सिवन को खाली समय में तमिल क्लासिकल गाने सुनना और गार्डनिंग करना पसंद है। उनकी पसंदीदा फिल्म राजेश-खन्ना की 1969 में आई आराधना है। उन्होंने कहा, 'जब मैं वीएसएससी का निदेशक था तब मैंने तिरुवनंतपुरम स्थित अपने घर के बगीचे में कई तरह के गुलाब उगाए थे। अब बंगलूरू में मुझे समय नहीं मिल पाता है।'

15 जुलाई को जब चंद्रयान-2 अपने मिशन के लिए उड़ान भरने ही वाला था कि कुछ घंटों पहले तकनीकी कारणों से इसे रोकना पड़ा। इसके बाद सिवन ने एक उच्च स्तरीय टीम बनाई ताकि दिक्कत का पता लगाया जा सके और इसे 24 घंटे के अंदर ठीक कर दिया और सात दिनों बाद चंद्रयान-2 को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया। मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 घंटे में तकनीकी खामी को दूर करने के लिए इसरो के वैज्ञानिकों की प्रशंसा की थी।

👉 प्रभु कृपा....

रात नौ बजे लगभग अचानक मुझे एलर्जी हो गई। घर पर दवाई नहीं, न ही इस समय मेरे अलावा घर में कोई और। श्रीमती जी बच्चों के पास दिल्ली और हम रह गए अकेले।

ड्राईवर मित्र भी अपने घर जा चुका था। बाहर हल्की बारिश की बूंदे सावन महीने के कारण बरस रही थी। दवा की दुकान ज्यादा दूर नहीं थी पैदल भी जा सकता था लेकिन बारिश की वज़ह से मैंने रिक्शा लेना उचित समझा।

बगल में राम मन्दिर बन रहा था। एक रिक्शा वाला भगवान की प्रार्थना कर रहा था। मैंने उससे पूछा, "चलोगे?", तो उसने सहमति में सर हिलाया और बैठ गए हम रिक्शा में!

रिक्शा वाला काफी़ बीमार लग रहा था और उसकी आँखों में आँसू भी थे। मैंने पूछा, "क्या हुआ भैया! रो क्यूँ रहे हो और तुम्हारी तबियत भी ठीक नहीं लग रही।"

उसने बताया, "बारिश की वजह से तीन दिन से सवारी नहीं मिली और वह भूखा है बदन दर्द भी कर रहा है, अभी भगवान से प्रार्थना कर रहा था क़ि आज मुझे भोजन दे दो, मेरे रिक्शे के लिए सवारी भेज दो"।

मैं बिना कुछ बोले रिक्शा रुकवाकर दवा की दुकान पर चला गया।

वहां खड़े खड़े सोच रहा था...

"कहीं भगवान ने तो मुझे इसकी मदद के लिए नहीं भेजा। क्योंकि यदि यही एलर्जी आधे घण्टे पहले उठती तो मैं ड्राइवर से दवा मंगाता, रात को बाहर निकलने की मुझे कोई ज़रूरत भी नहीं थी, और पानी न बरसता तो रिक्शे में भी न बैठता।"मन ही मन भगवांन को याद किया और पूछ ही लिया भगवान से! मुझे बताइये क्या आपने रिक्शे वाले की मदद के लिए भेजा है?"मन में जवाब मिला... "हाँ"...।

मैंने भगवान को धन्यवाद दिया, अपनी दवाई के साथ रिक्शेवाले के लिए भी दवा ली।

बगल के रेस्तरां से छोले भटूरे पैक करवाए और रिक्शे पर आकर बैठ गया। जिस मन्दिर के पास से रिक्शा लिया था वही पहुंचने पर मैंने रिक्शा रोकने को कहा।

उसके हाथ में रिक्शे के 30 रुपये दिए, गर्म छोले भटूरे का पैकेट और दवा देकर बोला,"खाना खा कर यह दवा खा लेना, एक एक गोली ये दोनों अभीऔर एक एक कल सुबह नाश्ते के बाद,उसके बाद मुझे आकर फिर दिखा जाना।

रोते हुए रिक्शेवाला बोला, "मैंने तो भगवान से दो रोटी मांगी थी मग़र भगवान ने तो मुझे छोले भटूरे दे दिए। कई महीनों से इसे खाने की इच्छा थी। आज भगवान ने मेरी प्रार्थना सुन ली।
और जो मन्दिर के पास उसका बन्दा रहता था उसको मेरी मदद के लिए भेज दिया।"

कई बातें वह बोलता रहा और मैं स्तब्ध हो सुनता रहा।

घर आकर सोचा क़ि उस रेस्तरां में बहुत सारी चीज़े थीं, मैं कुछ और भी ले सकता था,
समोसा या खाने की थाली ..
पर मैंने छोले भटूरे ही क्यों लिए?

क्या सच में भगवान ने मुझे रात को अपने भक्त की मदद के लिए ही भेजा था..?

हम जब किसी की मदद करने सही वक्त पर पहुँचते हैं तो इसका मतलब उस व्यक्ति की प्रार्थना भगवान ने सुन ली, और हमें अपना प्रतिनिधि बनाकर उसकी मदद के लिए भेज दिया।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 1 August 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 1 Augest 2019


👉 आन्तरिक स्तर ऊँचा उठाये

कितने व्यक्ति चमत्कारी साधनाओं के विधान जानने और प्रगति में सहायता करने वाले आशीर्वाद पाने के इच्छुक रहते हैं। उन्हें हम सदा यही कहते रहे हैं कि माँगने मात्र से नहीं, पात्रता के अनुरूप ही कुछ मिलता है। चमत्कारी साधनाओं के विधान हमें मालूम है। बताने में भी कोई आपत्ति नहीं, पर वे सफल तभी हो सकेंगे, जब प्रयोग कर्ता केवल कर्मकाण्डों तक ही सीमित न रहकर अपनी भाव भूमिका को भी आध्यात्मिक बनायें। केवल विधान और कर्मकाण्ड कोई सिद्धी नहीं दे। सकते उनके पीछे साधक की उच्च मनोभूमि का होना आवश्यक है और उस प्रकार की भूमिका बनाने की अनिवार्य शर्त उदार, परोपकारी, स्वार्थ-त्यागी और सहृदय होना हैं।

जो कंजूस, अनुदार, निष्ठुर, स्वार्थी और धूर्त प्रकृति के हैं, उन्हें किसी उच्च स्तरीय आध्यात्मिक विभूति का लाभ नहीं मिल सकता। इसी प्रकार आशीर्वाद भी केवल वाणी से कह कर या लेखनी से लिखकर नहीं दिये जाते, उनके पीछे तप की पूँजी लगाई गई हो तभी वे वरदान सफल होंगे। तप की पूँजी हर किसी के लिए नहीं लगाई जा सकती। गाय अपने ही बछड़े को दूध पिलाती है। दूसरे बछड़ों के लिए उसके थन में दूध नहीं उतरता। आशीर्वाद भी अपने ही वर्ग और प्रकृति के लोगों के प्रति झरते हैं। केवल चालाकी और चापलूसी के आधार पर किसी का तप लूटते जाने की घात तो कदाचित ही किसी की लगती है।

इन तथ्यों के आधार पर हम अपने उन प्रियजनों को जो चमत्कारी विधानों की जानकारी तथा लाभकारी आशीर्वादों की उपलब्धि के इच्छुक रहते हैं, हमें एक ही बात समझानी पड़ती है कि वे इन दोनों सफलताओं को यदि वस्तुतः चाहते हों तो अपना आन्तरिक स्तर थोड़ा ऊँचा उठाये और यह ऊँचाई बढ़ सके, उसके लिए हम उन्हें ज्ञान-यज्ञ सरीखे पुनीत परमानों की साधना करने उनमें सक्रिय भाग लेने के लिए अनुरोध करते रहते हैं। लोक-मंगल परमार्थ और युग की पुकार पूरी करने का कर्तव्य पालन करने के लिए ही नहीं हमारा प्रस्तुत मार्ग-दर्शन आध्यात्मिक लाभों से लाभान्वित होने के लिए आवश्यक पात्रता उत्पन्न करने की दृष्टि से भी इसकी नितान्त आवश्यकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, सितंबर १९६९, पृष्ठ 64



http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/September/v1.64

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 42)

👉 ज्योतिर्विज्ञान की अति महती भूमिका

वह ज्योतिष के तीनों आयामों- १. गणित ज्योतिष, २. योग ज्योतिष एवं देव ज्योतिष में पारंगत थे। गणित ज्योतिष को तो सभी जानते हैं। इसमें जन्म समय के अनुसार गणना करके फलाफल का विचार किया जाता है। योग ज्योतिष में योग विद्या के द्वारा व्यक्ति के माता- पिता के मिलन का पता करते हैं, इसकी गणना गर्भाधान के क्षण से की जाती है, न कि जातक के भूमिष्ट होने के क्षण से। देव ज्योतिष में कई आश्चर्य प्रकट होते हैं। जैसे व्यक्ति के नाम से ही उसकी कुण्डली बना देना। उसके वस्त्र अथवा किसी परिचित व्यक्ति को आधार मानकर उसके जन्म चक्र एवं फलाफल का ठीक- ठीक विवेचन कर देना। व्यक्ति को देखकर उसकी पत्नी अथवा किसी दूर- दराज के रिश्तेदान की जन्म कुण्डली बना देना और उसका सही फलाफल बता देना।

स्वामी विशुद्धानन्द अपनी अध्यात्म चिकित्सा में ज्योतिष के इन आयामों का समयानुसार उपयोग करते थे। रोहणी कुमार चेल महाशय ने उनके साथ हुए अपने अनुभव को बताते हुए कहा है, कि जब वह पहली बार उनसे मिलने गये तो अपने हैण्ड बैग में स्वयं की एवं पत्नी की कुण्डली लेकर गये थे। मकसद जिन्दगी की कुछ समस्याओं का समाधान पाना था। पर ज्यों ही वह बैठे और कुण्डली निकालने लगे, त्यों ही विशुद्धानन्द जी ने उन्हें टोक दिया और कहा रुको यह कहते हुए उन्होंने किताब के अन्दर रखा कागज निकाला। इस कागज में न केवल उनकी वरन् उनकी पत्नी की कुण्डली थी बल्कि फलाफल आदि का विवरण लिखा था। आश्चर्यचकित रोहणी कुमार चेल ने अपने पास रखी एवं विशुद्धानन्द महाराज द्वारा बतायी गयी कुण्डलियों को मिलाया। इसमें पत्नी की कुण्डली तो एकदम वही था, पर उनकी कुण्डली में जन्म लग्र अलग थी।

जिज्ञासा करने पर उन्होंने कहा कि मेरी बनायी कुण्डली ही सही है, क्योंकि तुम्हारे पास की कुण्डली यदि सही होती तो तुम साधारण इंसान न होकर अवतार होते। और तुम हमारे पास न आते, बल्कि मैं स्वयं तुम्हारे पास आता। क्योंकि तुम्हारे पास की जो कुण्डली है उसमें वर्णित जन्म लग्र के साथ ब्रह्माण्ड की जो ऊर्जाधाराएँ जिस क्रम में मिल रही थीं, वह सब कुछ असाधारण था। ऐसे समय में तो मानव जन्म घटित ही नहीं होता। वह तो एक असाधारण क्षण था। इस वार्तालाप के साथ ही उन्होंने उनकी आध्यात्मिक चिकित्सा के सारे सरंजाम जुटा दिये। इस चिकित्सा की प्रक्रिया में कतिपय तंत्र की तकनीकें भी शामिल थीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 60

👉 Short Stories

“The most dangerous people in the world are not the tiny minority instigating evil acts, but those who do the acts for them. For example, when the British invaded India, many Indians accepted to work for the British to kill off Indians who resisted their occupation. So in other words, many Indians were hired to kill other Indians on behalf of the enemy for a paycheck. Today, we have mercenaries in Africa, corporate armies from the western world, and unemployed men throughout the Middle East killing their own people - and people of other nations - for a paycheck. To act without a conscience, but for a paycheck, makes anyone a dangerous animal. The devil would be powerless if he couldn’t entice people to do his work. So, as long as money continues to seduce the hungry, the hopeless, the broken, the greedy, and the needy, there will always be war between brothers.”

Suzy Kassem

बुधवार, 31 जुलाई 2019

👉 गायत्री निवास

बच्चों को स्कूल बस में बैठाकर वापस आ शालू खिन्न मन से टैरेस पर जाकर बैठ गई. सुहावना मौसम, हल्के बादल और पक्षियों का मधुर गान कुछ भी उसके मन को वह सुकून नहीं दे पा रहे थे, जो वो अपने पिछले शहर के घर में छोड़ आई थी.

शालू की इधर-उधर दौड़ती सरसरी नज़रें थोड़ी दूर एक पेड़ की ओट में खड़ी बुढ़िया पर ठहर गईं. ‘ओह! फिर वही बुढ़िया, क्यों इस तरह से उसके घर की ओर ताकती है?’

शालू की उदासी बेचैनी में तब्दील हो गई, मन में शंकाएं पनपने लगीं. इससे पहले भी शालू उस बुढ़िया को तीन-चार बार नोटिस कर चुकी थी. दो महीने हो गए थे शालू को पूना से गुड़गांव शिफ्ट हुए, मगर अभी तक एडजस्ट नहीं हो पाई थी.

पति सुधीर का बड़े ही शॉर्ट नोटिस पर तबादला हुआ था, वो तो आते ही अपने काम और ऑफ़िशियल टूर में व्यस्त हो गए. छोटी शैली का तो पहली क्लास में आराम से एडमिशन हो गया, मगर सोनू को बड़ी मुश्किल से पांचवीं क्लास के मिड सेशन में एडमिशन मिला. वो दोनों भी धीरे-धीरे रूटीन में आ रहे थे, लेकिन शालू, उसकी स्थिति तो जड़ से उखाड़कर दूसरी ज़मीन पर रोपे गए पेड़ जैसी हो गई थी, जो अभी भी नई ज़मीन नहीं पकड़ पा रहा था.

सब कुछ कितना सुव्यवस्थित चल रहा था पूना में. उसकी अच्छी जॉब थी. घर संभालने के लिए अच्छी मेड थी, जिसके भरोसे वह घर और रसोई छोड़कर सुकून से ऑफ़िस चली जाती थी. घर के पास ही बच्चों के लिए एक अच्छा-सा डे केयर भी था. स्कूल के बाद दोनों बच्चे शाम को उसके ऑफ़िस से लौटने तक वहीं रहते. लाइफ़ बिल्कुल सेट थी, मगर सुधीर के एक तबादले की वजह से सब गड़बड़ हो गया.

यहां न आस-पास कोई अच्छा डे केयर है और न ही कोई भरोसे लायक मेड ही मिल रही है. उसका केरियर तो चौपट ही समझो और इतनी टेंशन के बीच ये विचित्र बुढ़िया. कहीं छुपकर घर की टोह तो नहीं ले रही? वैसे भी इस इलाके में चोरी और फिरौती के लिए बच्चों का अपहरण कोई नई बात नहीं है. सोचते-सोचते शालू परेशान हो उठी.

दो दिन बाद सुधीर टूर से वापस आए, तो शालू ने उस बुढ़िया के बारे में बताया. सुधीर को भी कुछ चिंता हुई, “ठीक है, अगली बार कुछ ऐसा हो, तो वॉचमैन को बोलना वो उसका ध्यान रखेगा, वरना फिर देखते हैं, पुलिस कम्प्लेन कर सकते हैं.” कुछ दिन ऐसे ही गुज़र गए.

शालू का घर को दोबारा ढर्रे पर लाकर नौकरी करने का संघर्ष  जारी था, पर इससे बाहर आने की कोई सूरत नज़र नहीं आ रही थी.

एक दिन सुबह शालू ने टैरेस से देखा, वॉचमैन उस बुढ़िया के साथ उनके मेन गेट पर आया हुआ था. सुधीर उससे कुछ बात कर रहे थे. पास से देखने पर उस बुढ़िया की सूरत कुछ जानी पहचानी-सी लग रही थी. शालू को लगा उसने यह चेहरा कहीं और भी देखा है, मगर कुछ याद नहीं आ रहा था. बात करके सुधीर घर के अंदर आ गए और वह बुढ़िया मेन गेट पर ही खड़ी रही.

“अरे, ये तो वही बुढ़िया है, जिसके बारे में मैंने आपको बताया था. ये यहां क्यों आई है?” शालू ने चिंतित स्वर में सुधीर से पूछा.

“बताऊंगा तो आश्चर्यचकित रह जाओगी. जैसा तुम उसके बारे में सोच रही थी, वैसा कुछ भी नहीं है. जानती हो वो कौन है?”

शालू का विस्मित चेहरा आगे की बात सुनने को बेक़रार था.

“वो इस घर की पुरानी मालकिन हैं.”

“क्या? मगर ये घर तो हमने मिस्टर शांतनु से ख़रीदा है.”

“ये लाचार बेबस बुढ़िया उसी शांतनु की अभागी मां है, जिसने पहले धोखे से सब कुछ अपने नाम करा लिया और फिर ये घर हमें बेचकर विदेश चला गया, अपनी बूढ़ी मां गायत्री देवी को एक वृद्धाश्रम में छोड़कर.

छी… कितना कमीना इंसान है, देखने में तो बड़ा शरीफ़ लग रहा था.”

सुधीर का चेहरा वितृष्णा से भर उठा. वहीं शालू याद्दाश्त पर कुछ ज़ोर डाल रही थी.

“हां, याद आया. स्टोर रूम की सफ़ाई करते हुए इस घर की पुरानी नेमप्लेट दिखी थी. उस पर ‘गायत्री निवास’ लिखा था, वहीं एक राजसी ठाठ-बाटवाली महिला की एक पुरानी फ़ोटो भी थी. उसका चेहरा ही इस बुढ़िया से मिलता था, तभी मुझे लगा था कि  इसे कहीं देखा है, मगर अब ये यहां क्यों आई हैं?

क्या घर वापस लेने? पर हमने तो इसे पूरी क़ीमत देकर ख़रीदा है.” शालू चिंतित हो उठी.

“नहीं, नहीं. आज इनके पति की पहली बरसी है. ये उस कमरे में दीया जलाकर प्रार्थना करना चाहती हैं, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली थी.”

“इससे क्या होगा, मुझे तो इन बातों में कोई विश्वास नहीं.”

“तुम्हें न सही, उन्हें तो है और अगर हमारी हां से उन्हें थोड़ी-सी ख़ुशी मिल जाती है, तो हमारा क्या घट जाएगा?”

“ठीक है, आप उन्हें बुला लीजिए.” अनमने मन से ही सही, मगर शालू ने हां कर दी.

गायत्री देवी अंदर आ गईं. क्षीण काया, तन पर पुरानी सूती धोती, बड़ी-बड़ी आंखों के कोरों में कुछ जमे, कुछ पिघले से आंसू. अंदर आकर उन्होंने सुधीर और शालू को ढेरों आशीर्वाद दिए.

नज़रें भर-भरकर उस पराये घर को देख रही थीं, जो कभी उनका अपना था. आंखों में कितनी स्मृतियां, कितने सुख और कितने ही दुख एक साथ तैर आए थे.

वो ऊपरवाले कमरे में गईं. कुछ देर आंखें बंद कर बैठी रहीं. बंद आंखें लगातार रिस रही थीं.

फिर उन्होंने दिया जलाया, प्रार्थना की और फिर वापस से दोनों को आशीर्वाद देते हुए कहने लगीं, “मैं इस घर में दुल्हन बनकर आई थी. सोचा था, अर्थी पर ही जाऊंगी, मगर…” स्वर भर्रा आया था.

“यही कमरा था मेरा. कितने साल हंसी-ख़ुशी बिताए हैं यहां अपनों के साथ, मगर शांतनु के पिता के जाते ही…” आंखें पुनः भर आईं.

शालू और सुधीर नि:शब्द बैठे रहे. थोड़ी देर घर से जुड़ी बातें कर गायत्री देवी भारी क़दमों से उठीं और चलने लगीं.

पैर जैसे इस घर की चौखट छोड़ने को तैयार ही न थे, पर जाना तो था ही. उनकी इस हालत को वो दोनों भी महसूस कर रहे थे.

“आप ज़रा बैठिए, मैं अभी आती हूं.” शालू गायत्री देवी को रोककर कमरे से बाहर चली गई और इशारे से सुधीर को भी बाहर बुलाकर कहने लगी, “सुनिए, मुझे एक बड़ा अच्छा आइडिया आया है, जिससे हमारी लाइफ़ भी सुधर जाएगी और इनके टूटे दिल को भी आराम मिल जाएगा.

क्यों न हम इन्हें यहीं रख लें? अकेली हैं, बेसहारा हैं और इस घर में इनकी जान बसी है. यहां से कहीं जाएंगी भी नहीं और हम यहां वृद्धाश्रम से अच्छा ही खाने-पहनने को देंगे उन्हें.”

“तुम्हारा मतलब है, नौकर की तरह?”
“नहीं, नहीं. नौकर की तरह नहीं. हम इन्हें कोई तनख़्वाह नहीं देंगे. काम के लिए तो मेड भी है. बस, ये घर पर रहेंगी, तो घर के आदमी की तरह मेड पर, आने-जानेवालों पर नज़र रख सकेंगी. बच्चों को देख-संभाल सकेंगी.

ये घर पर रहेंगी, तो मैं भी आराम से नौकरी पर जा सकूंगी. मुझे भी पीछे से घर की, बच्चों के खाने-पीने की टेंशन नहीं रहेगी.”

“आइडिया तो अच्छा है, पर क्या ये मान जाएंगी?”

“क्यों नहीं. हम इन्हें उस घर में रहने का मौक़ा दे रहे हैं, जिसमें उनके प्राण बसे हैं, जिसे ये छुप-छुपकर देखा करती हैं.”

“और अगर कहीं मालकिन बन घर पर अपना हक़ जमाने लगीं तो?”

“तो क्या, निकाल बाहर करेंगे. घर तो हमारे नाम ही है. ये बुढ़िया क्या कर सकती है.”

“ठीक है, तुम बात करके देखो.” सुधीर ने सहमति जताई.

शालू ने संभलकर बोलना शुरू किया, “देखिए, अगर आप चाहें, तो यहां रह सकती हैं.”

बुढ़िया की आंखें इस अप्रत्याशित प्रस्ताव से चमक उठीं. क्या वाक़ई वो इस घर में रह सकती हैं, लेकिन फिर बुझ गईं.

आज के ज़माने में जहां सगे बेटे ने ही उन्हें घर से यह कहते हुए बेदख़ल कर दिया कि अकेले बड़े घर में रहने से अच्छा उनके लिए वृद्धाश्रम में रहना होगा. वहां ये पराये लोग उसे बिना किसी स्वार्थ के क्यों रखेंगे?

“नहीं, नहीं. आपको नाहक ही परेशानी होगी.”

“परेशानी कैसी, इतना बड़ा घर है और आपके रहने से हमें भी आराम हो जाएगा.”

हालांकि दुनियादारी के कटु अनुभवों से गुज़र चुकी गायत्री देवी शालू की आंखों में छिपी मंशा समझ गईं, मगर उस घर में रहने के मोह में वो मना न कर सकीं.

गायत्री देवी उनके साथ रहने आ गईं और आते ही उनके सधे हुए अनुभवी हाथों ने घर की ज़िम्मेदारी बख़ूबी संभाल ली.

सभी उन्हें  अम्मा कहकर ही बुलाते. हर काम उनकी निगरानी में सुचारु रूप से चलने लगा.

घर की ज़िम्मेदारी से बेफ़िक्र होकर शालू ने भी नौकरी ज्वॉइन कर ली. सालभर कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला.

अम्मा सुबह दोनों बच्चों को उठातीं, तैयार करतीं, मान-मनुहार कर खिलातीं और स्कूल बस तक छोड़तीं. फिर किसी कुशल प्रबंधक की तरह अपनी देखरेख में बाई से सारा काम करातीं. रसोई का वो स्वयं ख़ास ध्यान रखने लगीं, ख़ासकर बच्चों के स्कूल से आने के व़क़्त वो नित नए स्वादिष्ट और पौष्टिक व्यंजन तैयार कर देतीं.

शालू भी हैरान थी कि जो बच्चे चिप्स और पिज़्ज़ा के अलावा कुछ भी मन से न खाते थे, वे उनके बनाए व्यंजन ख़ुशी-ख़ुशी खाने लगे थे.

बच्चे अम्मा से बेहद घुल-मिल गए थे. उनकी कहानियों के लालच में कभी देर तक टीवी से चिपके रहनेवाले बच्चे उनकी हर बात मानने लगे. समय से खाना-पीना और होमवर्क निपटाकर बिस्तर में पहुंच जाते.

अम्मा अपनी कहानियों से बच्चों में एक ओर जहां अच्छे संस्कार डाल रही थीं, वहीं हर व़क़्त टीवी देखने की बुरी आदत से भी दूर ले जा रही थीं.

शालू और सुधीर बच्चों में आए सुखद परिवर्तन को देखकर अभिभूत थे, क्योंकि उन दोनों के पास तो कभी बच्चों के पास बैठ बातें करने का भी समय नहीं होता था.

पहली बार शालू ने महसूस किया कि घर में किसी बड़े-बुज़ुर्ग की उपस्थिति, नानी-दादी का प्यार, बच्चों पर कितना सकारात्मक प्रभाव डालता है. उसके बच्चे तो शुरू से ही इस सुख से वंचित रहे, क्योंकि उनके जन्म से पहले ही उनकी नानी और दादी दोनों गुज़र चुकी थीं.

आज शालू का जन्मदिन था. सुधीर और शालू ने ऑफ़िस से थोड़ा जल्दी निकलकर बाहर डिनर करने का प्लान बनाया था. सोचा था, बच्चों को अम्मा संभाल लेंगी, मगर घर में घुसते ही दोनों हैरान रह गए. बच्चों ने घर को गुब्बारों और झालरों से सजाया हुआ था.

वहीं अम्मा ने शालू की मनपसंद डिशेज़ और केक बनाए हुए थे. इस सरप्राइज़ बर्थडे पार्टी, बच्चों के उत्साह और अम्मा की मेहनत से शालू अभिभूत हो उठी और उसकी आंखें भर आईं.

इस तरह के वीआईपी ट्रीटमेंट की उसे आदत नहीं थी और इससे पहले बच्चों ने कभी उसके लिए ऐसा कुछ ख़ास किया भी नहीं था.

बच्चे दौड़कर शालू के पास आ गए और जन्मदिन की बधाई देते हुए पूछा, “आपको हमारा सरप्राइज़ कैसा लगा?”

“बहुत अच्छा, इतना अच्छा, इतना अच्छा… कि क्या बताऊं…” कहते हुए उसने बच्चों को बांहों में भरकर चूम लिया.

“हमें पता था आपको अच्छा लगेगा. अम्मा ने बताया कि बच्चों द्वारा किया गया छोटा-सा प्रयास भी मम्मी-पापा को बहुत बड़ी ख़ुशी देता है, इसीलिए हमने आपको ख़ुशी देने के लिए ये सब किया.”

शालू की आंखों में अम्मा के लिए कृतज्ञता छा गई. बच्चों से ऐसा सुख तो उसे पहली बार ही मिला था और वो भी उन्हीं के संस्कारों के कारण.
केक कटने के बाद गायत्री देवी ने अपने पल्लू में बंधी लाल रुमाल में लिपटी एक चीज़ निकाली और शालू की ओर बढ़ा दी.

“ये क्या है अम्मा?”

“तुम्हारे जन्मदिन का उपहार.”
शालू ने खोलकर देखा तो रुमाल में सोने की चेन थी.

वो चौंक पड़ी, “ये तो सोने की मालूम होती है.”

“हां बेटी, सोने की ही है. बहुत मन था कि तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हें कोई तोहफ़ा दूं. कुछ और तो नहीं है मेरे पास, बस यही एक चेन है, जिसे संभालकर रखा था. मैं अब इसका क्या करूंगी. तुम पहनना, तुम पर बहुत अच्छी लगेगी.”

शालू की अंतरात्मा उसे कचोटने लगी. जिसे उसने लाचार बुढ़िया समझकर स्वार्थ से तत्पर हो अपने यहां आश्रय दिया, उनका इतना बड़ा दिल कि अपने पास बचे इकलौते स्वर्णधन को भी वह उसे सहज ही दे रही हैं.

“नहीं, नहीं अम्मा, मैं इसे नहीं ले सकती.”

“ले ले बेटी, एक मां का आशीर्वाद समझकर रख ले. मेरी तो उम्र भी हो चली. क्या पता तेरे अगले जन्मदिन पर तुझे कुछ देने के लिए मैं रहूं भी या नहीं.”

“नहीं अम्मा, ऐसा मत कहिए. ईश्वर आपका साया हमारे सिर पर सदा बनाए रखे.” कहकर शालू उनसे ऐसे लिपट गई, जैसे बरसों बाद कोई बिछड़ी बेटी अपनी मां से मिल रही हो.

वो जन्मदिन शालू कभी नहीं भूली, क्योंकि उसे उस दिन एक बेशक़ीमती उपहार मिला था, जिसकी क़ीमत कुछ लोग बिल्कुल नहीं समझते और वो है नि:स्वार्थ मानवीय भावनाओं से भरा मां का प्यार. वो जन्मदिन गायत्री देवी भी नहीं भूलीं, क्योंकि उस दिन उनकी उस घर में पुनर्प्रतिष्ठा हुई थी.

घर की बड़ी, आदरणीय, एक मां के रूप में, जिसकी गवाही उस घर के बाहर लगाई गई वो पुरानी नेमप्लेट भी दे रही थी, जिस पर लिखा था
‘गायत्री निवास’

यदि आपकी आंखे इस कहानी को पढ़कर थोड़ी सी भी नम हो गई   हो तो अकेले में 2 मिनट चिंतन करे कि पाश्चात्य संस्कृति की होड़ में हम अपनी मूल संस्कृति को भुलाकर,  बच्चों की उच्च शिक्षा पर तो सभी का ध्यान केंद्रित हैं किन्तु उन्हें संस्कारवान बनाने में हम पिछड़ते जा रहे हैं। 

👉 आज का सद्चिंतन 31 July 2019

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 31 July 2019


👉 गुरुदेव की वाणी अपनों से अपनी बात

हम अपने परिजनों से लड़ते-झगड़ते भी रहते हैं और अधिक काम करने के लिए उन्हें भला-बुरा भी कहते रहते हैं, पर वह सब इस विश्वास के कारण ही करते हैं कि उनमें पूर्वजन्मों के महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक संस्कार विद्यमान् हैं, आज वे प्रसुप्त पड़े हैं पर उन्हें झकझोरा जाय तो जगाया जा सकना असम्भव नहीं है। कड़ुवे-मीठे शब्दों से हम अक्सर अपने परिवार को इसलिये को झकझोरते रहते हैं कि वे अपनी अंतःस्थिति और गरिमा के अनुरूप कुछ अधिक साहसपूर्ण कदम उठा सकने में समर्थ हो सकें। कटु प्रतीत होने वाली भाषा में और अप्रिय लगने वाले शब्दों में हम अक्सर परिजनों का अग्रगामी उद्बोधन करते रहते हैं। उस सन्दर्भ में रोष या तिरस्कार मन में नहीं रहता वरन् आत्मीयता और अधिकार की भावना ही काम करती रहती है। लोग भले ही भूल गये हों, पर हम तो नहीं भूले हैं।

लम्बी अवधि से चली आ रही ममता और आत्मीयता हमारे भीतर जमी भी पूर्वजन्मों की भाँति सजग है। सो हमें अपनी पूर्वकालीन घनिष्ठता की अनुभूति के कारण वैसा ही कुछ जब भी लगता रहता है कि यह अपनी ही आत्मा के अविच्छिन्न अंग हैं। और इन पर हमारा उतना ही अधिकार है, जितना निकटतम आत्मीय एवं कुटुम्बी-सम्बन्धियों का हो सकता है। अपने इस अधिकार की अनुभूति के कारण ही आग्रह और अनुरोध ही नहीं करते वरन् निर्देश भी देते रहते हैं और उनके प्रति उपेक्षा करते जाने पर लाल-पीले भी होते रहते हैं। इन कटु प्रसंगों के पीछे हमारा कोई व्यक्तिगत राम-द्वेष या स्वार्थ-लोभ नहीं रहना विशुद्ध रूप से लोक-मंगल और जनकल्याण की भावना ही काम करती रहती है। जिस प्रकार लोभी बाप में अपने बेटे को अमीर देखने की लालसा रहती है, उसी प्रकार हमारे मन में भी अपने परिजनों को उत्कृष्ट स्तर के महामानव देखने की आकांक्षा बनी रहती है। और उसी के लिए आवश्यक अनुरोध आग्रह करते रहते हैं।

इस बार झोला पुस्तकालयों की पूर्णता के लिए जो अनुरोध किया गया है, उसके पीछे भी यही भावना काम कर रही है कि हमारा शरीर कहीं सुदूर प्रदेश में भले ही चला जाय पर हमारी आत्मा विचारणा, प्रेरणा, भावना और रोशनी प्रिय परिजनों के घरों में पीछे भी जमी बैठी रहे और हमारी अनुपस्थिति में भी उपयुक्त मार्ग दर्शन करती रहे। जो उपेक्षा और आलस्य करते हैं, उन्हें कटु शब्द भी इसीलिये कह देते हैं कि थोड़ी सी पूँजी में घर की एक बहुमूल्य सम्पदा स्थिर करने में जो कंजूसी बरती जाती है। वहीं हमें रुचती नहीं। अनेक आकस्मिक कार्यों में किसी भी सद्गृहस्थ को बहुत व्यय करना पड़ जाता है। उसे किसी प्रकार करते ही हैं। फिर एक घरेलू पुस्तकालय परिपूर्ण कर लेने के लिए आना-कानी की जाती है तो उसे हमें उपेक्षा मात्र मानते हैं और भर्त्सना करते हैं। हमारी भावनाओं का गलत अर्थ न लगाया जाय और जो बात जैसी है, उसे वैसा ही समझा जाय।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, सितंबर १९६९, पृष्ठ 64


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/September/v1.64

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 41)

👉 ज्योतिर्विज्ञान की अति महती भूमिका
ज्योतिष के मर्मज्ञ एवं आध्यात्मिक ज्ञान के विशेषज्ञ दोनों ही एक स्वर से इस सच्चाई को स्वीकारते हैं कि मनुष्य के जन्म के क्षण का विशेष महत्त्व है। यूँ तो महत्त्व प्रत्येक क्षण का होता है, पर जन्म का क्षण व्यक्ति को जीवन भर प्रभावित करता रहता है। ऐसा क्यों है? तो इसका आसान सा जवाब यह है कि प्रत्येक क्षण में ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की विशिष्ट शक्तिधाराएँ किसी न किसी बिन्दु पर किसी विशेष परिमाण में मिलती हैं। मिलन के इन्हीं क्षणों में मनुष्य का जन्म होता है। इस क्षण में ही यह निर्धारित हो पाता है कि ऊर्जा की शक्तिधाराएँ भविष्य में किस क्रम में मिलेंगी और जीवन में अपना क्या प्रभाव प्रदर्शित करेंगी।

बात केवल मनुष्य की नहीं है, उस क्षण में जन्मने वाले मिट्टी, पत्थर, मकान- दुकान, कुत्ता, बिल्ली, वृक्ष- वनस्पति सभी का सच एक ही है। यही कारण है कि ज्योतिष के मर्मज्ञ व विशेषज्ञ प्रत्येक जड़ या चेतन का ऊर्जा चक्र या कुण्डली तैयार करते हैं। यह चक्र प्रायः ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की नव मूल धाराओं या नवग्रह एवं बारह विशिष्ट शक्तिधाराओं या राशियों को लेकर होता है। यदि गणना सही ढंग से की गई है तो इन ऊर्जा धाराओं के सांयोगिक प्रभाव इन पर देखने को मिलते हैं। परन्तु मनुष्य की स्थिति थोड़ी सी भिन्न है। वह न तो जड़ पदार्थों की तरह एकदम अचेतन है और न वृक्ष- वनस्पतियों या अन्य प्राणियों की तरह अर्धचेतन। इसे तो आत्मचेतन कहा गया है। इसमें दूरदर्शी विवेकशीलता का भण्डार है। यही वजह है कि वह स्वयं को अपने ऊपर पड़ने वाले ब्रह्माण्डीय ऊर्जा प्रवाहों के अनुसार समायोजित करने में सक्षम है।

जहाँ तक ज्योतिष की बात है तो वह जन्म क्षण के अनुसार बनाये गये ऊर्जा चक्र के क्रम में यह निर्धारित करती है कि इस व्यक्ति पर कब कौन सी ऊर्जा धाराएँ किस भाँति प्रभाव डालने वाली हैं। इस चक्र से यह भी पता चलता है कि विगत में किये गये किन कर्मों, संस्कारों अथवा प्रारब्ध के किन कुयोगों अथवा सुयोगों के कारण उसका जन्म इस क्षण में हुआ। यह ज्ञान ज्योतिष का एक भाग है। इसी के साथ इसका दूसरा हिस्सा भी जुड़ा हुआ है। यह दूसरा हिस्सा इन विशिष्ट ऊर्जाधाराओं के साथ समायोजन के तौर- तरीकों से सम्बन्धित है। अर्थात् इसमें यह विधि विज्ञान है कि किन स्थितियों में हम क्या करें? यानि कि क्या उपाय करके मनुष्य अपने जीवन में आने वाले सुयोगों व सौभाग्य को बढ़ा सकता है। और किन उपायों को अपना कर वह अपने कुयोगों को कम अथवा निरस्त कर सकता है।

प्रत्येक स्थिति को सँवारने के लिए अनेकों विधियाँ हैं और सभी प्रभावकारी हैं। आध्यात्मिक चिकित्सक इनमें से किसी भी विधि को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं। यह सब उनकी विशेषज्ञता पर निर्भर है। हालाँकि इन पंक्तियों में इस सच को स्वीकारने में कोई संकोच नहीं हो रहा है कि आज के दौर में ऐसे विशेषज्ञ व मर्मज्ञ नहीं के बराबर हैं, जो अध्यात्म साधना और ज्योतिष विद्या दोनों में निष्णात हों, पर कुछ दशक पूर्व भारतीय विद्या के महा पण्डित महामहोपाध्याय डॉ. गोपीनाथ कविराज के गुरु स्वामी विशुद्धानन्द जी महाराज के जीवन में यह दुर्गम सुयोग उपस्थित हुआ था। हिमालय के दिव्य क्षेत्र ज्ञानगंज के साधना काल में उन्होंने अपने गुरुओं से अध्यात्म चिकित्सा के साथ ज्योतिष विद्या में भी मर्मज्ञता प्राप्त की थी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 59

👉 Short Stories

Once, Dr. Sarvapalli Radhakrishnan, former President of India, was on a visit to a developed country. A high ranking official of the host country wanted to have his views on the progress of that country. With due regards and modesty, Dr. Radhakrishnan responded: “The scientific and technological development of your country is indeed remarkable. It has enabled man to fly in the skies like the birds and float in the seas like the fishes. However, due to lack of corresponding growth of the inner soul, it has not been able to teach its people to live as cultured human beings on the earth.”

मंगलवार, 30 जुलाई 2019

👉 मन की ऊँचाई:-

मंदिरों के शिखर और मस्जिदों की मिनारें ही ऊँची नहीं करनी हैं, मन को भी ऊँचा करना हैं ताकि आदर्शों की स्थापना हो सकें।

एक बार गौतम स्वामी ने महावीर स्वामी से पूछा, ‘भंते ! एक व्यक्ति दिन-रात आपकी सेवा, भक्ति, पूजा में लीन रहता हैं, फलतः उसको दीन-दुखियों की सेवा के लिए समय नहीं मिलता और दूसरा व्यक्ति दुखियों की सेवा में इतना जी-जान से संलग्न रहता हैं कि उसे आपकी सेवा-पूजा, यहां तक कि दर्शन तक की फुरसत नहीं मिलती। इन दोनों में से श्रेष्ठ कौन है।

भगवान महावीर ने कहा, वह धन्यवाद का पात्र हैं जो मेरी आराधना-मेरी आज्ञा का पालन करके करता हैं और मेरी आज्ञा यही हैं कि उनकी सहायता करों, जिनको तुम्हारी सहायता की जरूरत हैं।

अज्ञानी जीव-अमृत में भी जहर खोज लेता हैं और मन्दिर में भी वासना खोज लेता हैं। वह मन्दिर में वीतराग प्रतिमा के दर्शन नहीं करता, इधर-उधर ध्यान भटकाता हैं और पाप का बंधन कर लेता हैं। पता हैं  चील कितनी ऊपर उड़ती हैं ? बहुत ऊपर उड़ती हैं, लेकिन उसकी नजर चांद तारों पर नहीं, जमीन पर पड़े, घूरे में पड़े  हुए मृत चूहे पर होती हैं।

यहीं स्थिति अज्ञानी मिथ्या दृष्टि जीव की हैं। वह भी बातें तो बड़ी-बड़ी करता हैं, सिद्वान्तों की विवेचना तो बड़े ही मन को हर लेने वाले शब्दों व लच्छेदार शैली में करता हैं, लेकिन उसकी नजर घुरे में पड़े हुए मांस पिण्ड पर होती हैं, वासना पर होती हैं और ज्ञानी सम्यकदृष्टि जीव भले ही दलदल में रहे, लेकिन अनुभव परमात्मा का करता हैं।

👉 आज का सद्चिंतन 30 July 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 July 2019


👉 शपथ पूर्वक सृजन यात्रा:-

अब हम सर्वनाश के किनारे पर बिलकुल आ खड़े हुए हैं। कुमार्ग पर जितने चल लिए उतना ही पर्याप्त है। अगले कुछ ही कदम हमें एक दूसरे का रक्तपान करने वाले भेड़ियों के रूप में बदल देंगे। अनीति और अज्ञान से ओत-प्रोत समाज सामूहिक आत्महत्या कर बैठेगा। अब हमें पीछे लौटना होगा। सामूहिक आत्महत्या हमें अभीष्ट नहीं। नरक की आग में जलते रहना हमें अस्वीकार है। मानवता को निकृष्टता के कलंक से कलंकित बनी न रहने देंगे। पतन और विनाश हमारा लक्ष्य नहीं हो सकता।  दुर्बुद्धि एवं दुष्प्रवृत्तियों को सिंहासन पर विराजमान रहने देना सहन न करेंगे। अज्ञान और अविवेक की सत्ता शिरोधार्य किए रहना अब अशक्य है। हम इन परिस्थितियों को बदलेंगे, उन्हें बदलकर ही रहेंगे।
  
शपथपूर्वक परिवर्तन के पथ पर हम चले हैं और जब तक सामर्थ्य की एक बूँद भी शेष है, तब तक चलते ही रहेंगे। अविवेक को पदच्युत करेंगे। जब तक विवेक को मूर्धन्य न बना लेंगे, तब तक चैन न लेंगे। उत्कृष्टता और आदर्शवादिता की प्रकाश किरणें हर अंतःकरण तक पहुँचाएँगे और वासना और तृष्णा के निकृष्ट दलदल से मानवीय चेतना को विमुक्त करके रहेंगे। मानव समाज को सदा के लिए दुर्भाग्यग्रस्त नहीं रखा जा सकता। उसे महान आदर्शों के अनुरूप ढलने और बदलने के लिए बलपूर्वक घसीट ले चलेंगे। पाप और पतन का युग बदला जाना चाहिए। उसे बदल कर रहेंगे।
  
इसी धरती पर स्वर्ग का अवतरण और इसी मानव प्राणी में देवत्व का उदय हमें अभीष्ट है और इसके लिए भागीरथ तप करेंगे। ज्ञान की गंगा को भूलोक में लाया जाएगा और उसके पुण्य जल में स्नान कराके कोटि-कोटि नर-पशुओं को नर-नारायणों में परिवर्तित किया जाएगा। इसी महान शपथ और व्रत को ज्ञानयज्ञ के रूप में परिवर्तित किया गया है। विचारक्रान्ति की आग में गंदगी का कूड़ा-करकट जलाने के लिए होलिका-दहन जैसा अपना अभियान है। अनीति और अनौचित्य के गलित कुष्ठ से विश्वमानव का शरीर विमुक्त करेंगे। समग्र कायाकल्प का युग परिवर्तन का, लक्ष्य पूरा ही किया जाएगा। ज्ञानयज्ञ की चिनगारियाँ विश्व के कोने-कोने में प्रज्वलित होंगी। विचारक्रांति का ज्योतिर्मय प्रवाह जन-जन के मन को स्पर्श करेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, अक्टूबर १९६९, पृष्ठ ५७, ५८

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 40)

👉 ज्योतिर्विज्ञान की अति महती भूमिका
ज्येातिष की उपयोगिता आध्यात्मिक चिकित्सा के लिए असंदिग्ध है। यदि आध्यात्मिक चिकित्सक की ज्योतिष का सही और समुचित ज्ञान है तो वह रोगी के जीवन का काफी कुछ आकलन कर सकता है। हालाँकि आज के दौर में ज्योतिष विद्या के बारे में अनेकों भ्रान्तियाँ फैली हैं। कई तरह की कुरीतियों, रूढ़ियों व मूढ़ताओं की कालिख ने इस महान विद्या को आच्छादित कर रखा है। यदि लोक प्रचलन एवं लोक मान्यताओं को दरकिनार कर इसके वास्तविक रूप के बारे में सोचा जाय तो इसकी उपयोगिता से इंकार नहीं किया जा सकता। यह व्यक्तित्व के परीक्षा की काफी कारगर तकनीक है। इसके द्वारा व्यक्ति की मौलिक क्षमताएँ, भावी सम्भावनाएँ आसानी से पता चल जाती हैं। साथ ही यह भी मालूम हो जाता है कि व्यक्ति के जीवन में कौन से घातक अवरोध उसकी राह रोकने वाले हैं अथवा प्रारब्ध के किन दुर्योगों को उसे किस समय सहने के लिए विवश होना है।
लेकिन इसके लिए इसके स्वरूप एवं प्रक्रिया के विषय को जानना जरूरी है।

आज का विज्ञान व वैज्ञानिकता इस सत्य को स्वीकारती है कि अखिल ब्रह्माण्ड ऊर्जा का भण्डार है। यह स्वीकारोक्ति यहाँ तक है कि आधुनिक भौतिक विज्ञानी पदार्थ के स्थान पर ऊर्जा तरंगों के अस्तित्व को स्वीकारते हैं। उनके अनुसार पदार्थ तो बस दिखने वाला धोखा है, यथार्थ सत्य तो ऊर्जा ही है। इस सृष्टि में कोई भी वस्तु हो या फिर प्राणि- वनस्पति, वह जन्मने के पूर्व भी ऊर्जा था और मरने के बाद भी ब्रह्माण्ड की ऊर्जा तरंगों का एक हिस्सा बन जायेगा। विज्ञानविद् एवं अध्यात्मवेत्ता दोनों ही इस सत्य को स्वीकारते हैं कि ब्रह्माण्डव्यापी इस ऊर्जा के अनेकों तल- स्तर एवं स्थितियाँ हैं जो निरन्तर परिवॢतत होती रहती हैं। इनमें यह परिवर्तन ही सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं लय का कारण है।

हालाँकि यह परिवर्तन क्यों होता है- इस बारे में वैज्ञानिकों एवं अध्यात्मविदों में सैद्धान्तिक असहमति है। वैज्ञानिक दृष्टि जहाँ इस परिवर्तन के मूल कारण मात्र सांयोगिक प्रक्रिया मानकर मौन धारण कर लेती है। वहीं आध्यात्मिक दृष्टिकोण इसे ब्राह्मीचेतना से उपजी सृष्टि प्रकिया की अनिवार्यता के रूप में समझता है। इसके अनुसार मनुष्य जैसे उच्चस्तरीय प्राणी की स्थिति में परिवर्तन उसके कर्मों, विचारों, भावों एवं संकल्प के अनुसार होता है। ज्योतिष विद्या का आधारभूत सब यही है। यद्यपि इस विद्या के विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि जीवन व्यापी परिवर्तन के इस क्रम में ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के विविध स्तर भी किसी न किसी प्रकार से मर्यादित होते हैं। ऊर्जा के इन विभिन्न स्तरों को ज्योतिष के विशेषज्ञों ने प्रतीकात्मक संकेतों में वर्गीकृत किया है। नवग्रह, बारह राशियाँ, सत्ताइस नक्षत्र इस क्रमिक वर्गीकरण का ही रूप है। प्रतीक कथाओं, उपभागों एवं रूपकों में इनके बारे में कुछ भी क्यों न कहा गया हो, पर यथार्थ में ये ब्रह्माण्डीय ऊर्जा धाराओं के ही विविध स्तर व स्थितियाँ हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 58

👉 success.

Don’t aim at success. The more you aim at it and make it a target, the more you are going to miss it. For success, like happiness, cannot be pursued; it must ensue, and it only does so as the unintended side effect of one’s personal dedication to a cause greater than oneself or as the by-product of one’s surrender to a person other than oneself. Happiness must happen, and the same holds for success: you have to let it happen by not caring about it. I want you to listen to what your conscience commands you to do and go on to carry it out to the best of your knowledge. Then you will live to see that in the long-run—in the long-run, I say!—success will follow you precisely because you had forgotten to think about it

Viktor E. Frankl

👉 भावनाओं से संचालित जीवनधारा

शरीर और उसकी गतिविधियों के संबंध में सामान्य रूप से हमारी स्थिति ऐसी रहती है, जैसी बच्चों के प्यारे मामाजी की। जिन्होंने अपनी ऐनक आँखों पर चढ़ा रखी है और सारे घर में ऐनक को ढूँढ़ने के लिए उलट-पुलट कर रहे हैं। भन्नाये हुए मामाजी जब बच्चों से ऐनक का पता पूछते हैं, तो बच्चे भी उनकी इस अनभिज्ञता का खूब आनंद लेकर खिलखिलाते हैं। आँखों पर चश्मा चढ़ा है और दुनिया में ढूँढ़ा जा रहा है।
  
अध्यात्मवेत्ताओं ने लगभग यही स्थिति सामान्य लोगों के संबंध में पायी है। ज्ञान और विभूतियों का अथाह सागर मानवीय काया में भरा हुआ है और मनुष्य दर-दर की ठोकरें खा रहा है। पदार्थों में सुख, शांति, संतोष खोजता फिरता अभावग्रस्त जीवन जी रहा है।
  
शरीर गतिशील रहता है, बुद्धि निर्णय लेकर उसकी दिशा निर्धारित करती है, किन्तु वास्तविकता तो यह है कि यह निर्णय मानवीय अंतराल की गहराइयों में छिपी भावनाओं के अनुरूप होते हैं। शराबी की बुद्धि नशा किये जाने के विरुद्ध लाख तर्क प्रस्तुत करे या अन्यों के तर्कों से प्रभावित हो, किन्तु अंतः में समायी कुसंस्कार जनित भावना उसके कदम मदिरालय तक खींच ले जाती है। यदि कहा जाये कि व्यक्ति की जीवन धारा भावनाओं पर ही आधारित है, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। जिन मूलभूत भावनाओं पर जीवन सत्ता का आधिपत्य है, वे हैं-
  
पहली शारीरिक प्रवृत्ति सहकारिता- शरीर का प्रत्येक कोश अपने आप में पूर्ण है। यदि उपयुक्त सेल कल्चर में रखा जाये, तो प्रत्येक कोश अमीबा की तरह अपना स्वाभाविक जीवन व्यतीत कर सकता है। फिर भी सभी कोश सहकारिता का परिचय देते हुए अपने आपको विभिन्न ऊतकों, अवयवों एवं संस्थानों में गठित कर लेते हैं।
  
दूसरी प्रवृत्ति संघर्ष की है। जीवकोशों में रसायन, हारमोन्स, विटामिन आदि का सुनिश्चित परिणाम है। यदि विजातीय तत्त्व इस संतुलन को बिगाड़ते हैं,तो सेल मेम्ब्रेन में पाये जाने वाले एन्जाइम निरंतर उन तत्त्वों से जूझते रहते हैं।      जीवन साधना का एक बड़ा  साधन संघर्ष है, जिसके द्वारा अपनी इंद्रियों एवं भावनाओं को नियंत्रित किया जाता है।
  
सामंजस्य  की सुंदर प्रवृत्ति शारीरिक गतिविधियों में देखी जाती है। रक्त किसी कारण से शरीर से बीस  प्रतिशत तक निकल भी जाये, तो रक्त आयतन यथावत् बना रहता है। लगभग दस घण्टे के भीतर उसकी पूर्ति मज्जा कोशों द्वारा कर दी जाती है। एक गुर्दा या एक फेफड़ा किसी कारणवश निकाल भी दिया जाये, तो दूसरा दोनों की पूरी व्यवस्था सँभाल लेता है। दुर्गंध पाते ही श्वास नलियाँ सिकुड़ जाती हैं व खाँसी आने लगती है।
  
अंग-अवयवों की सतत सक्रियता उसकी पराक्रम भावना पर आधारित है। पराक्रम का घटना रोग है तथा रुकना मृत्यु, चाहे वह कोशिका संबंधी हो, अंग अवयव या जीवन संबंधी। निरंतर सक्रियता बनाये रखे बिना निर्बाध जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। भौतिक जीवन में आलस्य, प्रमाद व मानसिक थकान अनुभव करना एक तरह से पराक्रम भावना का घटना है।
  
शरीर की प्रत्यावर्तन  की भावना शरीर को नित नूतनता प्रदान करती है। अस्थियों में जमे कैल्शियम का तो क्त्त् प्रतिशत भाग हर साल नया हो जाता है। रक्तकण एवं शरीर के प्रत्येक कोश की आयु अल्प होती है। नये कोशों का निर्माण एवं पुराने कोशों के अवसान का क्रम चलता रहता है। अस्सी दिनों में शरीर की प्रायः सारी चमड़ी नई हो जाती है।
  
नियमित अनुशासन  बने रहना जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। हृदय को ही लें, उसकी सामान्य धड़कन गति स्त्र0  से त्त्0 बार प्रति मिनट है। यदि यह ताल रहित  हो जाये, तो व्यक्ति कार्डियक फेल्योर की स्थिति में पहुँच जाता है।
  
स्रष्टा की सर्वोच्च कृति मानव शरीर है। उसकी गतिविधियाँ निर्वाह करने में समर्थ है। इनको पोषण देकर परिवार, समाज एवं विश्व व्यवस्था तक फैलाया जा सके, तो स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज की सरंचना असंभव नहीं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 29 जुलाई 2019

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 39)

👉 चिकित्सक का व्यक्तित्व तपःपूत होता है

अंगुलीमाल क्रूर व निर्मम दस्यु था। उसके बारे में यह प्रचलित था कि वह मिलने वालों को मारकर उसकी तर्जनी अंगुली काट लेता है। ऐसी अनगिनत अंगुलियों को काट कर उसने माला बना रखी थी। सेनाएँ उससे डरती थीं। स्वयं कोशल नरेश प्रसेनजित उससे भय खाते थे। उसकी निर्ममता- क्रूरता एवं हत्यारे होने के सम्बन्ध में अनेकों लोक कथाएँ जन- जन में कही- सुनी जाती थी। लेकिन जब इन किवदन्तियों को बुद्ध ने सुना तो उन्हें अंगुलीमाल में एक हत्यारे के स्थान पर मनोरोगी नजर आया। भगवान् तथागत ने सम्पूर्ण तत्परता के साथ उसकी स्थिति का ऑकलन कर लिया। उन्होंने सोचा अंगुलीमाल की यह दशा किन्हीं क्रियाओं की प्रतिक्रिया है। न जाने कितनों ने कितनी बार उसकी भावनाओं को आहत किया होगा। कितनी बार उसका दिल दुखा होगा। कितनी बार उसकी संवेदनाएँ कुचली, मसली और रौंदी गयी होगी। अंगुलीमाल का वह दर्द जिसे अब तक कोई महसूस न कर सका, भगवान् बुद्ध ने पलक झपकते इसे अपने प्राणों में अनुभव कर लिया।

अंगुलीमाल की पीड़ा उनके अपने प्राणों की पीर बन गयी और वह चल पड़े। वन में उन्हें देखते ही अंगुलीमाल ने अपना गंडासा उठाया, पर बुद्ध खड़े रहे। उनकी आँखों से करूणा झलकती रही। अंगुलीमाल उन्हें डांटता, डपटता, धमकाता रहा, बुद्ध उसे सुनते- सहते रहे। अन्त में जब वह चुप हो गया तो उन्होंने कहा- वत्स तुमको सबने बहुत सताया है। अनगिन लोगों ने अनगिन बार तुम्हारी भावनाओं को चोट पहुँचाई है। मैं तुम्हारे दर्द को बांटने आया हूँ। करूणा से सने ऐसे स्वरों को अंगुलीमाल ने कभी न सुना था। उसने तो सिर्फ घृणा, उपेक्षा एवं अपमान के दंश झेले थे, पर बुद्ध के स्वरों में तो मां की ममता छलक रही थी। उनके ज्योतिपूर्ण नेत्रों से तो उसके लिए सिर्फ प्रेम छलक रहा था।
पल भर में उस दस्यु कहे जाने वाले पीड़ित मानव के आवरण गिर गए। उसका व्यक्तित्व भगवान् तथागत की करूणा से स्नात हो गया।

एक क्षण में अनेकों चमत्कार घटित हो गए। अनास्था आस्था में बदली, अविश्वास विश्वास में, अश्रद्धा श्रद्धा में बदली तो द्वेष मित्रता में और घृणा प्रेम में परिवर्तित हो गयी। दस्यु का व्यक्तित्व भिक्षु के व्यक्तित्व में रूपान्तरित हो गया। लेकिन इस रूपान्तरण का स्रोत आध्यात्मिक चिकित्सक के रूप में बुद्ध का व्यक्तित्व था। जिन्होंने उस मानसिक रोगी के अन्तर्मन को अपनी पवित्रता एवं प्रामाणिकता के धागों से जोड़ लिया था। बाद में विज्ञजनों ने कहा कि वह क्षण ही विशेष था, जिसे भगवान् ने अंगुलीमाल के रूपान्तरण के लिए चुना था। यही कारण है कि यह भी सच है कि आध्यात्मिक चिकित्सा की सफलता के लिए कोई ज्योतिष की उपादेयता को नकार नहीं सकता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 56

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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