मंगलवार, 11 जून 2019

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 24)

YOUR WORLD – A REFLECTION OF YOUR MIND

In this world, we find people complaining about many types of misfortunes and feeling euphoric on insignificant occasions of pleasure. There are habitual pessimists blaming everyone for everything. Expressions like “This world is very bad”; “Times are bad”; “Honesty is a virtue of the past”; “Religion has been buried for good”- are very commonly bandied about. If someone is in the habit of repeating such phrases, he is expressing only the impressions of his mind and you can safely assume that he himself is a cheat and dishonest person.

Man has systematically built the image of his unhappy world by interacting with pessimistic people around himself. If someone is in the habit of complaining about lack of opportunities for work, widespread unemployment, failure of good industries and non-availability of good jobs, take it for granted that his ideosphere is full of thick clouds of indolence, torpor and incompetence. This he finds reflected everywhere in the world. If someone sees this world as full of self-centered hypocrites or sinners or evil and uncivilized persons, infer that the individual himself has an abundance of corresponding negative attributes in his own self. This world is like a magnificent large mirror, which faithfully reflects your ideosphere. As mentioned earlier, elements of this world
precipitate three types of qualitative attributes (Sat, Raj and Tam) in life. Whichever attribute dominates in the personality
of an individual, it attracts its counterpart from the world at large.

Wherever a short-tempered person goes, he finds someone to quarrel with. One who has hatred in mind will always find out an object to be hated. To an unfair person everyone appears, ill-mannered, uncivil and worthy of punishment. Whenever an individual interacts with someone, he/she views the latter in the same light with which his own personality is coloured. A person of impeccable morality rarely comes across a woman of fallen virtue. Scholars do get avenues for right information. Seekers of truth always find opportunities for quenching their thirst for wisdom. Enlightened souls have always been living on this earth. Wherever they live, environment around them attracts virtuous persons.

However, it is not our intention to prove that there is absolutely no evil on this earth and whatever good or bad we find here is totally a reflection of our own field of view. It has been repeatedly stated that in this world, good, average and bad (Sat, Raj and Tam) coexist and one receives what one gets tuned into.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 42-43

सोमवार, 10 जून 2019

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 23)

WHO ARE YOU?

Each individual has different identities for different roles in life. This identity depends on the relationship with the person with whom he/she interacts. For mother he/she may be an object of maternal affection, for father an obedient child, for the teacher an intelligent pupil and for friends a dependable good-humoured buddy. Wife looks at a man as her beloved darling, whereas his son relates to him as his father. The same person appears to his enemy as an adversary; to the shopkeeper as a customer; to the servant as a master; to the horse as a rider; to the caged bird as the jailor. Bed bugs and mosquitoes find him as nothing else but a source of delicious blood. If one could visualize the various mental images, which people have for an individual, it would be found that each person has one’s own peculiar concept and none of these conform to the other. Besides, none of these images identifies the whole individual accurately.

Everyone conceptualizes an individual according to the particular bend with which they are mutually related to each other. It is even more amusing that man himself lives confused in his multi-personal bends. Throughout life he lives with multiple self-identifications. Various thoughts like “I am an adulterer”; “I am wealthy”; “I am old”; “I have no family”; “I am ugly”; “I am popular”; “I am unhappy”; “I am surrounded by vile persons”;……….keep on changing and churning his ideosphere. As other persons form an image about an individual according to their interests, the individual too builds an eccentric lop-sided image of himself based on perceptions of his sense organs. Like a drugged person he keeps on hallucinating in his numerous momentary identities. If he could truly identify with his own inner self, he would be surprised to know how far he has strayed away from Truth. (Read, “What am I” by the author).

Man always lives in a make-believe world created by his own imagination. In this dream world, one man builds castles in the air, the other fights with the windmills like Don Quixote and yet other derives pleasure of embracing and kissing his beloved while fondling his pet dog. Deluded by ignorance, we are all hallucinating in an imaginary world. One thinks that he is living in a palace.

The other trembles because of imaginary fears. Yet another daydreams of being engaged to the most beautiful damsel in the world. Some insane person is found rejoicing in showing off wealth and ‘kingdom’. This world is like a mental asylum where we find all types of mad caps. Each has one’s own eccentricity. Everyone considers himself as the most intelligent person. Go to a mental asylum and observe the fantasies of the long-term inmates. You will find a close parallel to the daydreamers of this world, who very much consider themselves as sane and sober.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 40-41

👉 Bapu Roti Laya बापू रोटी लाया...

डाइनिंग टेबल पर खाना देखकर बच्चा भड़का, फिर वही सब्जी, रोटी और दाल में तड़का...? मैंने कहा था न कि मैं पिज्जा खाऊंगा, रोटी को बिलकुल हाथ नहीं लगाउंगा! बच्चे ने थाली उठाई और बाहर गिराई...

बाहर थे कुत्ता और आदमी, दोनों रोटी की तरफ लपके.. कुत्ता आदमी पर भोंका, आदमी ने रोटी में खुद को झोंका और हाथों से दबाया.. कुत्ता कुछ भी नहीं समझ पाया उसने भी रोटी के दूसरी तरफ मुहं लगाया..

दोनों भिड़े जानवरों की तरह एक तो था ही जानवर, दूसरा भी बन गया था जानवर.. आदमी ज़मीन पर गिरा, कुत्ता उसके ऊपर चढ़ा कुत्ता गुर्रा रहा था और अब आदमी कुत्ता है या कुत्ता आदमी है कुछ भी नहीं समझ आ रहा था...

नीचे पड़े आदमी का हाथ लहराया, हाथ में एक पत्थर आया कुत्ता कांय-कांय करता भागा.. आदमी अब जैसे नींद से जागा हुआ खड़ा और लड़खड़ाते कदमों से चल पड़ा.... वह कराह रहा था रह-रह कर हाथों से खून टपक रहा था बहते खून के साथ ही आदमी एक झोंपड़ी पर पहुंचा..

झोंपड़ी से एक बच्चा बाहर आया और ख़ुशी से चिल्लाया.. आ जाओ, सब आ जाओ बापू रोटी लाया, देखो बापू रोटी लाया, देखो बापू रोटी लाया..

👉 आज का सद्चिंतन10 June 2019


👉 प्रेरणादायक गायत्री मंत्र की महिमा


👉 अध्यात्म से मानव-जीवन का चरमोत्कर्ष (भाग 3)

वरदायी अथवा अलौकिक ऐश्वर्य का आधार अध्यात्म सामान्य उपासना मात्र नहीं है। उसका क्षेत्र आत्मा के सूक्ष्म संस्थानों की साधना है। उन शक्तियों के प्रबोधन की प्रक्रिया है, जो मनुष्य के अन्तःकरण में बीज रूप में सन्निहित रहती है। आत्मिक अध्यात्म के उस क्षेत्र में एक से एक बढ़कर सिद्धियाँ एवं समृद्धियाँ भरी पड़ी है। किन्तु उनकी प्राप्ति तभी सम्भव है, जब मन, बुद्धि, चित, अहंकार से निर्मित अन्तःकरण पंचकोशों, छहों चक्रों, मस्तिष्कीय ब्रह्म-रन्ध्र में अवस्थित कमल, हृदय स्थित सूर्यचक्र, नाभि की ब्रह्म-ग्रन्थि और मूलाधार वासिनी कुण्डलिनी आदि के शक्ति संस्थानों और कोश-केन्द्रों को प्रबुद्ध, प्रयुक्त और अनुकूलता पूर्वक निर्धारित दिशा में सक्रिय बनाया जा सके। यह बड़ी गहन, सूक्ष्म और योग साध्य तपस्या है। जन्म-जन्म से तैयारी किए हुये कोई बिरले ही यह साधना कर पाते है और अलौकिक सिद्धियों को प्राप्त करते है। यह साधना न सामान्य है और न सर्वसाधारण के वश की।

तथापि असम्भव भी नहीं है। एक समय था, जब भारतवर्ष में अध्यात्म की इस साधना पद्धति का पर्याप्त प्रचलन रहा। देश का ऋषि वर्ग उसी समय की देन है। जो-जो पुरुषार्थी इस सूक्ष्म साधना को पूरा करते गये, वे ऋषियों की श्रेणी में आते गये। यद्यपि आज इस साधना के सर्वथा उपयुक्त न तो साधन है और न समय, तथापि वह परम्परा पूरी तरह से उठ नहीं गई है। अब भी यदाकदा, यत्र-तत्र इस साधना के सिद्ध पुरुष देखे सुने जाते है। किन्तु इनकी संख्या बहुत विरल है। वैसे योग का स्वांग दिखा कर और सिद्धों का वेश बनाकर पैसा कमाने वाले रगें सियार तो बहुत देखे जाते है। किन्तु उच्च स्तरीय अध्यात्म विद्या की पूर्वोक्त वैज्ञानिक पद्धति से सिद्धि की दिशा में अग्रसर होने वाले सच्चे योगी नहीं के बराबर ही है। जिन्होंने साहसिक तपस्या के बल पर आत्मा की सूक्ष्म शक्तियों को जागृत कर प्रयोग योग्य बना लिया होता है, वे संसार के मोह जाल से दूर प्रायः अप्रत्यक्ष ही रहा करते है। शीघ्र किसी को प्राप्त नहीं होते और पुण्य अथवा सौभाग्य से जिसको मिल जाते है, उसका जीवन उनके दर्शनमात्र से ही धन्य हो जाता है।

इतनी बड़ी तपस्या को छोटी-मोटी साधना अथवा थोड़े से कर्मकाण्ड द्वारा पूरी कर लेने की आशा करने वाले बाल-बुद्धि के व्यक्ति ही माने जायेंगे। यह उच्च स्तरीय आध्यात्मिक साधना शीघ्र पूरी नहीं की जा सकती। स्तर के अनुरूप ही पर्याप्त समय, धैर्य, पुरुषार्थ एवं शक्ति की आवश्यकता होती है। इस आवश्यकता की पूर्ति धीरे धीरे अपने बाह्य जीवन के परिष्कार से प्रारम्भ होती है। बाह्य की उपेक्षा कर सहसा है, जिसमें सफलता की आशा नहीं की जा सकती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1969 पृष्ठ 9

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/January/v1.9

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 11)

👉 मानवी जीवन आध्यात्मिक रहस्यों से भरा

अपनी इस अनुभूति के बाद उन्होंने कहा- आइन्स्टीन का सूत्र E=mc2 वैज्ञानिक ही नहीं आध्यात्मिक सूत्र भी है। आध्यात्मिक अनुभव भी यही कहता है कि पदार्थ और ऊर्जा आपस में रूपान्तरित होते हैं। मानव जीवन भी इसी रूपान्तरण का परिणाम है। जिसे हम देह, प्राण एवं मन, अन्तःकरण एवं अन्तरात्मा के संयोग से बना व्यक्तित्व कहते हैं वह दरअसल कुछ विशिष्ट ऊर्जा तरंगों का सुखद संयोग है। कर्म, इच्छा एवं भावना के अनुसार इन ऊर्जा तरंगों में न्यूनता व अधिकता होती रहती है। स्थिति में होने वाले इस परिवर्तन के लिए वर्तमान जीवन के साथ अतीत में किए गए कर्म, इच्छाएँ व भावनाएँ जिम्मेदार होती हैं।

इन्हीं की उपयुक्त एवं अनुपयुक्त स्थिति के अनुसार जीवन में सुखद एवं दुःखद परिवर्तन आते हैं। किसी विशिष्ट ऊर्जा तरंग की न्यूनता जब जीवन में होती है, तो स्वास्थ्य, मानसिक स्थिति, पारिवारिक एवं सामाजिक परिस्थिति में तदानुरूप परिवर्तन आ जाते हैं। इस स्थिति को तप, योग, मंत्रविद्या आदि प्रयासों से ठीक भी किया जा सकता है। सत्प्रेम ने ये सभी प्रयोग एक वैज्ञानिक की भाँति किए। साथ ही उन्होंने अपने निष्कर्षों को लिपिबद्ध भी किया। जो भी मानव जीवन के आध्यात्मिक रहस्यों को विस्तार से जानना चाहते हैं उनके लिए सत्प्रेम की रचनाएँ मार्गदर्शक प्रदीप की भाँति हैं।

प्रयोगिक निष्कर्ष के क्रम में उन्होंने सबसे पहले ‘श्री अरविन्द ऑर द एडवेन्चर ऑफ कॉन्शसनेस’ लिखा। इसके कुछ ही बाद उन्होंने ‘ऑन द वे ऑफ सुपरमैनहुड’ प्रकाशित किया। श्री मां के संग साथ की अनुभूतियों को उन्होंने ‘मदर्स एजेण्डा’ के १३ खण्डों में लिखा। इसके बाद ‘द डिवाइन मैटीरियलिज़्म,’ ‘द न्यू स्पेसीज़, द म्यूटेशन ऑफ डेथ’ की एक ग्रन्थ त्रयी लिखी। इसके बाद ‘द माइण्ड ऑफ सेल्स’ प्रकाश में आया। सन् १९८९ में अपनी साधना कथा को ‘द रिवोल्ट ऑफ अर्थ’ नाम से प्रकाशित किया।
सत्प्रेम ने अपना सम्पूर्ण जीवन मानव जीवन के आध्यात्मिक रहस्यों की खोज में बिताया। एक गम्भीर वैज्ञानिक की भाँति उन्होंने अपने शोध निष्कर्ष प्रस्तुत किए। सार रूप में उनके निष्कर्षों के बारे में दो बातें कही जा सकती हैं-

१. हम सभी, सृष्टि एवं स्रष्टा के साथ एक दूसरे से गहराई में गुँथे हैं।
२. कर्म चक्र ही हम सबके जीवन को प्रवर्तित, परिवर्तित कर रहा है।

इन दो बातों के साथ दो बातें और भी हैं- १. इच्छा, संकल्प, साहस एवं श्रद्धा के द्वारा हम सभी अपनी अनन्त शक्तियों को जाग्रत् कर सकते हैं। २. आध्यात्मिक चिकित्सा ही मानव व्यक्तित्व का एक मात्र समाधान है। इसे आस्तिकता के अस्तित्त्व में अनुभव किया जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 16

👉 Motivational Story

A wandering monk once visited the city of Mithila, ruled by the Sage King Janaka. “Who is the best teacher around here?” He asked around. To his surprise every spiritual person around referred to him the name of King Janaka. The monk was both puzzled and furious. “How can a King be spiritually that high? These people don’t know what true spirituality is.” he thought.

He went to the King and asked him “O King, learned people around here, speak highly of you, how can you a worldly man of pleasures be more spiritual than those who have given up their everything for the sake of knowing the highest truth?” “Dear one, you have come from a far place, you must have been tired. Let’s eat and rest for the day, we can discuss further tomorrow.”
The King took him to the royal dinner table, fed him variety of foods, and pleased his palates. He took him to a spacious room and told him to rest there.

There was a huge sword hung from the ceiling, hanging just above the bed. “What is this?” asked the monk. “Oh don’t mind it, it has been there for ages, it is an old custom, just have a good sleep. See you in the morning.” said the King and rushed out hurriedly.

The monk was worried that the sword might fall on him and kill him during the night; he couldn’t close his eyes even if he tried.
The king met him the next day, “Sir, how was the night. I hope you slept well” asked the King.

“How could I sleep? there was a huge sword hanging on my neck.” monk explained his trouble.

“When one knows death is certain, how the pleasures of world can sway him away, how can the worldly duties ever limit his eyes from the supreme goal?” said the King answering the Monk’s earlier question.

रविवार, 9 जून 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 10)

👉 मानवी जीवन आध्यात्मिक रहस्यों से भरा

प्राण की ही भाँति मन के आध्यात्मिक रहस्यों से मनोवैज्ञानिकों का समुदाय अपरिचित है। मन सोच- विचार के संस्थान से कुछ ज्यादा है। इसी तरह से इसके अवचेतन- अचेतन की परतों की गहराई वर्तमान जीवन से कहीं अधिक है। इसमें असंख्य ऐसे गहरे भेद समाए हैं, जिन्हें केवल आध्यात्मिक साधनाओं से ही उभारा उकेरा और जगाया जा सकता है। ऐसा होने पर यही मन हमें अतीन्द्रिय झलकें दिखाने लगता है। किसी अनजाने झरोखे से भविष्य की झाँकी मिलने लगती है। जीवन की परतें बहुतेरी हैं, इनके रहस्य भी असंख्य हैं, पर इन्हें जान वही सकता है, जो सचमुच में जिज्ञासु है। जिसमें स्वस्थ जीवन का सही अर्थ खोजने की लालसा है। जो इस सत्य को समझता है कि आध्यात्मिक चिकित्सा से ही स्वस्थ एवं सफल जीवन के वरदान पाए जा सकते हैं।

ऐसे ही एक सच्चे जिज्ञासु सन् १९५३ में श्री अरविन्द आश्रम में साधना के लिए आए। हालाँकि उनका पाण्डिचेरी से पुराना रिश्ता था। वह यहाँ पर फ्रांसीसी औपनिवेशिक सरकार में पहले सेवारत रहे थे। और तभी उनका श्री अरविन्द एवं श्री मां से भाव भरा सम्बन्ध बना था। ‘मानव जीवन में अनन्त आध्यात्मिक रहस्य समाए हैं’- इस एक बात ने उनकी गहरी हृततन्त्री को छू लिया। उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। और गियाना के लिए रवाना हो गए। वहाँ उन्होंने अमेजान के जंगलों में अपनी साहसिक साधना में एक वर्ष बिताया। इसके बाद ब्राजील होते हुए अफ्रीका पहुँचे। इस साहस भरी खोज में उन्हें सद्गुरु के मार्गदर्शन की गहरी आवश्यकता महसूस हुई।

यही अहसास उन्हें श्री मां की शरण में ले आया। अपनी ३० वर्ष की आयु में वे श्री मां के समर्पित शिष्य हो गए। मां ने उन्हें सत्प्रेम कहकर सम्बोधित किया। साधना के लिए साहसिक संकल्प एवं सद्गुरु के प्रति सघन श्रद्धा के सुयोग ने उन्हें नयी शुरूआत दी। वे अपनी डगर पर चल पड़े। इस डगर पर चलते हुए उनके सामने एक के बाद एक नए- नए आध्यात्मिक रहस्य उजागर होने लगे। सबसे पहले उन्होंने अनुभव किया कि सृष्टि और मानव जीवन का मूल ऊर्जा है। इस ऊर्जा ने अपने निश्चित क्रम में विभिन्न आकार लिए हैं। लोकों की सृष्टि भी इसी तरह से हुई है और मानव जीवन भी इसी भांति अस्तित्व में आया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 15

गुरु तेरे कौन-कौन गुण गाऊँ। Guru Tere Kaun Kaun Gun Gau



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👉 आज का सद्चिंतन 9 June 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 June 2019


शुक्रवार, 7 जून 2019

👉 आज का सद्चिंतन 7 June 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 June 2019


👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 9)

👉 मानवी जीवन आध्यात्मिक रहस्यों से भरा

मानव जीवन के आध्यात्मिक रहस्य अद्भुत हैं। अनुभव कहता है कि ये इतने आश्चर्यों से भरे हैं कि सामान्य बुद्धि इन पर भरोसा करने में स्वयं को असहाय पाती है। जिस देह से हमें जीवन का परिचय मिलता है, उसके बारे में हमारी जानकारी बड़ी आधी- अधूरी है। ऊपर से देखने पर भले ही यह मांस और चमड़े से मढ़ा हुआ हड्डियों का ऐसा ढाँचा नजर आता हो, जिसके भीतर रक्त और प्राण चक्कर लगा रहे हैं। लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि कहती है कि इसके भीतर अनेकों ऐसी सूक्ष्मताएँ हैं, जिसके बारे में आधुनिकतम शोध भी कुछ कह पाने में असमर्थ है। अंतःस्रावी ग्रन्थियों की संरचनाएँ, मांस पेशियों में लिपटे तन्त्रिकाओं के गुच्छक, मस्तिष्क की आधे से अधिक कोशिकाओं की निष्क्रिय स्थिति ने तीसरी सहस्राब्दी के महावैज्ञानिकों को हैरान कर रखा है।

इनमें से कइयों का तो यह मानना है कि विज्ञान और वैज्ञानिकता देह की जिस सूक्ष्म संरचनाओं को भेद पाने में अक्षम है, सम्भव है वही आध्यात्मिक रहस्यों के प्रवेश द्वार हो। अभी कुछ सालों पहले तीसरी सहस्राब्दी के प्रवेश की शुभ घड़ी में एक ग्रन्थ प्रकाशित हुआ है ‘प्रेडिक्शन फॉर द नेक्स्ट मिलेनियम’। इस ग्रन्थ का सम्पादन डेविड क्रिस्टॉफ एवं टॉड डब्ल्यू निकरसन नाम के विशेषज्ञ वैज्ञानिकों ने किया है। इस ग्रन्थ में दो सौ सत्तर विशिष्ट वैज्ञानिकों के विचार प्रकाशित किए गए हैं। जिनके माध्यम से भविष्य के मानव विकास पर दृष्टि डाली गयी है। संक्षेप में इस पुस्तक का सार कहें तो इसमें यह उम्मीद जतायी गयी है कि भविष्य का मानव अपने जीवन के आध्यात्मिक रहस्यों को वैज्ञानिक रीति से जानने योग्य बन सकेगा।

जहाँ तक अभी वर्तमान की बात है तो न केवल देह के रहस्य अनजाने, बल्कि प्राण के प्रवाह भी अबूझ हैं। नाड़ी संस्थान में बहने वाला प्राण विश्व प्राण से कैसे सम्बन्धित है? इस प्रश्र का कोई सटीक वैज्ञानिक उत्तर नहीं है। जबकि आध्यात्मिकता के भव्य भवन की समूची नींव प्राण विद्या पर ही टिकी हुई है। प्राण के भेद, उपभेद, इसके भावनाओं एवं विचारों पर प्रभाव इतने अनोखे हैं, जिसकी अनुभूति पर कोई भी जीवन की डेार अपने हाथें में ले सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 14

My Family Is My Strength Part 2



Title

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 7 Oct 2019


बुधवार, 5 जून 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 8)

👉 सद्गुरु की कृपा से तरते हैं  भवरोग

अगले दिन प्रातः अरूणोदय के साथ ही वेदमंत्रों के स्वर गूंजने लगे। स्वाहा के घोष के साथ सविधि यज्ञीय आहुतियाँ यज्ञकुण्डों में पड़ने लगीं। भगवान् जातवेदस् अपने प्रखर तेज के साथ भुवन भास्कर को चुनौती सी दे रहे थे। इतने में सभी ने देखा कि कल आया हुआ वह किशोर बालक अपने पाँवों से चलकर अपने माता- पिता के साथ आ रहा है। एक रात्रि में यह अपूर्व चमत्कार। सभी अचरज में थे। उनके इस अचरज को और अधिक करते हुए उस किशोर वय के बालक ने कहा, आप मुझे शिष्य के रूप में अपना लीजिए गुरुदेव।

गुरुदेव ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- बेटा, तुम मेरे अपने हो। तुम हमेशा से मेरी आत्मा के अभिन्न अंश हो। परेशान न हो सब ठीक हो जाएगा। पर किस तरह आचार्य जी, एक विद्वान ने पूछ ही लिया। उत्तर में गुरुदेव उनसे बोले- मिश्र जी, बीमारियाँ दो तरह की होती हैं,
१. असंयम से उपजी,
२. प्रारब्ध से प्रेरित।

यह बालक रामनारायण प्रारब्ध से प्रेरित बीमारियों की जकड़ में है। जब तक यह अपने प्रारब्ध से ग्रसित रहेगा, इसे कोई औषधि फायदा नहीं करेगी। सा इसकी एक मात्र चिकित्सा अध्यात्म है। हाँ औषधियाँ, शरीर के तल पर इसमें सहयोगी साबित हो सकती हैं।

यह कहते हुए गुरुदेव उस बालक के माँ- पिता की ओर मुड़े और उनसे बोले, आप चिन्ता न करें। आपका बेटा रामनारायण आज से मेरा बेटा है। आपने इसके शरीर को जन्म दिया है। मैं इसकी जीवात्मा को नया जन्म दूँगा। उसे पूर्वकृत दुष्कर्मों के प्रभाव से मुक्त करूँगा। गुरुदेव की बातों ने माता- पिता को आश्वस्ति दी। वैसे भी वे एक रात्रि में काफी कुछ परिवर्तन देख चुके थे। गुरुदेव के तप के अंश को पाकर कुछ ही महीनों में न केवल उस किशोर रामनारायण के न केवल शारीरिक रोग दूर हुए, बल्कि उसकी मानसिक चेतना भी निखरी। उसकी बौद्धिक शक्तियों का भारी विकास हुआ। यही नहीं रुचियाँ- प्रवृत्तियाँ भी परिष्कृत हुईं। उसमें गायत्री साधना के प्रति भारी अनुराग जाग पड़ा। उसमें ये सारे परिवर्तन सद्गुरु की कृपा से आए। वही सद्गुरु जो मानवीय जीवन के आध्यात्मिक रहस्यों के मर्मज्ञ थे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 13

My Family Is My Strength Part 1



Title

मंगलवार, 4 जून 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 7)

👉 सद्गुरु की कृपा से तरते हैं  भवरोग

कर्मकाण्ड के महान् विद्वानों का विशिष्ट सम्मेलन था यह। मंत्रविद्या के अनेकों महारथी पधारे थे। कर्मकाण्ड के स्थूल प्रयोग सूक्ष्म को किस तरह प्रभावित करते हैं? किस विधि जीवन चेतना रूपान्तरित होती है? मनुष्य की अन्तर्निहित शक्तियों के जागरण के प्रयोग सफल कैसे हों? आदि अनेक गम्भीर प्रश्रों पर चर्चा चल रही थी। परम पूज्य गुरुदेव इस चर्चा को मौन भाव से सुन रहे थे। सुनते- सुनते जहाँ कहीं आवश्यक होता, वहाँ वह अपनी अनुभूति का स्वर जोड़ देते। उनकी मौलिकता से इस विशद् चर्चा में नवप्राणों का संचार हो जाता।

चर्चा के इस क्रम में बड़ा विचित्र व्याघात हुआ। सभी की दृष्टि उन रोते- कलपते प्रौढ़ दम्पति की ओर गयी, जो अपने किशोर पुत्र को लेकर आए थे। उनका यह किशोर बालक कई जीर्ण बीमारियों से पीड़ित था। लगभग असहाय एवं अपाहिज स्थिति थी उसकी। निस्तेज मुख, बुझी हुई आँखें, कृशकाय, लड़खड़ाते कदम। बस जैसे उसके मां- पिता ने उसे लाकर गुरुदेव के पाँवों में डाल दिया। आप ही बचा सकते हैं- मेरे बेटे को। यही एक रट थी उन दोनों की। गुरुदेव ने बड़ी आत्मीयता से उनकी बातें सुनी। फिर उन्हें थोड़ा समझाया- बुझाया और उनके ठहरने की उचित व्यवस्था कर दी।

क्या होगा इस असाध्य रोग से घिरे किशोर का? उपस्थित सभी महान् विद्वानों को जिज्ञासा थी। किस विधि से आचार्य श्री चिकित्सा करेंगे इसकी? ऐसे अनेक प्रश्र उन सभी के मन में उभर रहे थे। उधर परम पूज्य गुरुदेव पूर्णतया आश्वस्त थे। जैसे उन्होंने उसकी चिकित्सा पद्धति खोज ली हो। वह सहज ही उपस्थित जनों को उनकी अनुत्तरित जिज्ञासाओं के साथ छोड़कर अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गए। दिन के यज्ञीय कार्यक्रम, विद्वानों की चर्चाएँ एवं आने वाले परिजन- आगन्तुकों से भेंट, सब कुछ चलता रहा। पर कहीं अपने मन के किसी कोने में सभी को अगले दिन की प्रतीक्षा थी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 12

सोमवार, 3 जून 2019

👉 आज का सद्चिंतन स्वाध्याय करो Swadhyay Kro


👉 प्रेरणादायक प्रसंग परिश्रम करो


Prernadayak Prasang Prishram Kro


👉 अध्यात्म से मानव-जीवन का चरमोत्कर्ष (भाग 2)

सामान्य लोगों के बीच प्रायः यह भ्रम फैला हुआ है कि अध्यात्मवाद का लौकिक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं है। वह तो योगी तपस्वियों का क्षेत्र है, जो जीवन में दैवी वरदान प्राप्त करना चाहते है। जो साँसारिक जीवनयापन करना चाहते है। घर-बार बसाकर रहना चाहते है, उनसे अध्यात्म का सम्बन्ध नहीं। इसी भ्रम के कारण बहुत से गृहस्थ भी, जो दैवी वरदान की लालसा के फेर में पड़ जाते है, अध्यात्म मार्ग पर चलने का प्रयत्न करते है। किन्तु अध्यात्म का सही अर्थ न जानने के कारण थोड़ा -सा पूजा-पाठ कर लेने को ही अध्यात्म मान लेते है।

यह बात सही है कि अध्यात्म मार्ग पर चलने ये उसकी साधना करने से दैवी वरदान भी मिलते है और ऋद्धि-सिद्धि की भी प्राप्ति होती है। किन्तु वह उच्च स्तरीय सूक्ष्म-साधना का फल है। कुछ दिनों पूजा-पाठ करने अथवा जीवन भर यों ही कार्यक्रम के अंतर्गत पूजा करते रहने पर भी ऋषियों वाला ऐश्वर्य प्राप्त नहीं हो सकता। उस स्तर की साधना कुछ भिन्न प्रकार की होती है। वह सर्व सामान्य लोगों के लिये सम्भव नहीं। उन्हें इस तपसाध्य अध्यात्म में न पड़कर अपने आवश्यक कर्तव्यों में ही आध्यात्मिक निष्ठा रखकर जीवन को आगे बढ़ाते रहना चाहिये। उनके साधारण पूजा-पाठ का जो कि जीवन का एक अनिवार्य अंग होना चाहिये, अपनी तरह से लाभ मिलता रहेगा।

थोड़ी सी साधारण पूजा, उपासना करके जो जीवन में अलौकिक ऋद्धि-सिद्धि पाने की लालसा रखते है, वे किसी जुआरी की तरह नगण्य सा धन लगाकर बहुत अधिक लाभ उठाना चाहते है। बिना श्रम के मालामाल होना चाहते हैं। लोभी उपासकों की यह अनुचित आशा कभी भी पूरी नहीं हो सकती और हो वह भी सकता है कि इस लोभ के कारण उनकी अपनी उस सामान्य उपासना का भी कोई फल न मिले। देवताओं का वरदान वस्तुतः इतना सस्ता नहीं होता, जितना कि लोगों ने समझ रखा हे। वे मन्दिर में जाकर हाथ जोड़ जाने या अक्षत-पुण्य जैसी तुच्छ वस्तुएँ चढ़ा देने से प्रसन्न हो जायेंगे और अपने वरदान लुटाने लगेंगे-ऐसा सोचना अज्ञान के सिवाय और कुछ नहीं है। सामान्य पूजा-पाठ का अपना जो पुरस्कार है, मिलेगा वही, उससे अधिक कुछ नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1969 पृष्ठ 8

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 6)

👉 सद्गुरु की कृपा से तरते हैं  भवरोग

यामि गुरुं शरणं भववैद्यम्- जीवन के सभी सांसारिक रोगों के आध्यात्मिक चिकित्सक वही सद्गुरु मेरे आश्रय हैं। जीवन की प्रकृति, समय और परिस्थितियों के विपरीत होने से कई बार प्रदूषित होती है। उसमें विकृति एवं विकार पनपते हैं। कई तरह के शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक रोग उसे घेर लेते हैं। सामान्य चिकित्सक न तो इनकी तह तक पहुँच पाते हैं और न इनका समाधान कर पाते हैं। वजह एक ही है कि इनका समाधान सामान्य औषधियाँ नहीं बल्कि उपयुक्त जीवन साधना है। जिसे केवल समर्थ आध्यात्मिक चिकित्सक ही बता सकता है। संक्षेप में कहें तो सद्गुरु के स्वरों में ही समाधान के सूत्र होते हैं।

सवाल पूछा जा सकता है कि सद्गुरु कौन? तो इस महाप्रश्र का सरल उत्तर यह है कि सद्गुरु वे हैं जो मनुष्य जीवन के दृश्य एवं अदृश्य सभी आयामों के मर्मज्ञ होते हैं। मानवीय चेतना की सम्पूर्णता का उन्हें विशेषज्ञ अनुभव होता है। वे हमारे वर्तमान को जानने की जितनी गहन क्षमता रखते हैं, अतीत के बारे में भी वे उतनी ही जानकारी रखते हैं। साथ ही उन्हें हमारे भविष्य का पारदर्शी ज्ञान होता है। शरीर की कार्यक्षमता, मन की विचार शैली, चित्त में समाये जन्म- जन्मान्तर के कर्म संस्कार, अहंकार की उलझी गाँठें, सद्गुरु इन सभी के बारे में बखूबी जानते हैं। उनमें इनके परिमार्जन, परिष्कार की अपूर्व क्षमता होती है। यही कारण है कि सद्गुरु का मिलन हमारे महासौभाग्य का सूचक है। यह इस सत्य का उद्घोष है कि हमारे जीवन की सम्पूर्ण आध्यात्मिक चिकित्सा की शुभ घड़ी आ गयी।

जिन्हें यह अवसर मिला है, उनकी अनुभूति में हम इस सच्चाई का अहसास पा सकते हैं। जिन पलों में इस अनुभूति को घटित होने का क्रम प्रारम्भ हुआ, उन दिनों हमारे अपने सद्गुरु गायत्री तपोभूमि- मथुरा को केन्द्र बनाकर अपनी योजना को आकार दे रहे थे। यह १९५५ का वर्ष था। तपोभूमि में विशिष्ट यज्ञों की शृंखला चल रही थी। इसमें १. चारों वेदों का पारायण यज्ञ, २. महामृत्युञ्जय यज्ञ, ३. रुद्र यज्ञ, ४. विष्णु यज्ञ, ५. शतचण्डी यज्ञ, ६. नवग्रह यज्ञ ,, ७. गणपति यज्ञ, ८. सरस्वती यज्ञ, ९. ज्योतिष्टोम, १०. अग्रिष्टोम आदि अनेक यज्ञों की प्रक्रियाएँ शामिल थीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 11

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 23)

CREATE YOUR OWN WORLD

The physical cosmos, according to a philosopher, is made up of inert components, which can be moulded into any desired configuration. The doer, man, is animate, whereas elements of the cosmos are inert. The animate doer has the capacity to utilize an inert substance as needed. A potter has free choice to make any object of pottery out of raw mud. A goldsmith can make any ornament from gold. With the needle and thread, a tailor may make a shirt or a trouser. The material world consists of elements creating three types of ‘qualitative reactions’ in life. In spiritual parlance these ‘natural attributes’ of the world are known as Sat, Raj and Tam. Broadly speaking, Sat stands for the most refined cohesive and super conductive medium of the spirit; Tam for the most opaque, sluggish and perverted and Raj most perturbed and unstable in which both Sat and Tam coexist in continued disequilibrium. Man is free to choose any combination of attributes amongst these with the one predominant over the other two.

In a garden there is slush, filth as well as fragrance of flowers. Worms creep into the mud, flies find out the filth and the bees go straight to the flowers. Everyone receives things of one’s choice. Bats and owls can see even during the darkest of night. Honeybees are able to detect fructose in the tiny flowers hidden in a thick bush and the poisonous snakes manufacture venom out of harmless organic substances. In this world, good and bad things, virtues and vices, morality and immorality exist everywhere. It is like that super cafeteria, where the customer has free choice to procure sweet, sour or bitter food. The shelves of the super market of the world are stocked with stuffs of unlimited varieties. Customers enter the shop and purchase items of their taste. Our Supreme Mother has kept prepared dishes for everyone’s taste.

The Ideosphere (Personal Ideological Environment) of a thief is overwhelmed with thievery. This ideosphere will easily interact with the compatible ideosphere of other thieves. Be it a prison, society or house, everywhere a thief will find thievery being discussed. His family members will generally talk about thievery. Some will support his avocation others oppose it. When the thief moves in the society, persons known to him will pass good or bad comments about his profession. When he meets fellow thieves, they will talk only about the tricks of the trade. In a prison, thieves will flock together and immediately discuss their favourite subject. In this way a thief will find the entire world revolving around thievery. He will regard thievery as the most important trade and think very little of anything else. He will be indifferent to other things in life. Similarly an adulterer or adulteress will see an adulterant in each man and woman. He/she will collect and display erotic photographs, paintings and literature in the house. Friends and acquaintances having similar inclinations will be easily found. In his/her mind sex will become the most important issue in life. In the same manner drunkards and drug addicts create their own worlds. It is up to you to create the world of your choice.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 38-39

शुक्रवार, 31 मई 2019

मंत्र की महिमा Power of Mantra | डॉ चिन्मय पंड्या



Title

👉 आज का सद्चिंतन विद्या का उद्देश्य Vidya Ka Uddesya


👉 प्रेरणादायक प्रसंग अहंकार छोडो

Prernadayak Prasang Ahnkaar Chhodo


👉 सर्वस्व दान Sarvsy Daan

एक पुराना मंदिर था। दरारें पड़ी थीं। खूब जोर से वर्षा हुई और हवा चली। मंदिर का बहुत-सा भाग लडख़ड़ा कर गिर पड़ा। उस दिन एक साधु वर्षा में उस मंदिर में आकर ठहरे थे। भाग्य से वह जहां बैठे थे उधर का कोना बच गया। साधु को चोट नहीं लगी। साधु ने सवेरे पास के बाजार में चंदा जमा करना प्रारंभ किया। उन्होंने सोचा- ‘‘मेरे रहते भगवान का मंदिर गिरा है तो इसे बनवा कर ही तब मुझे कहीं जाना चाहिए।’’

बाजार वालों में श्रद्धा थी। साधु विद्वान थे। उन्होंने घर-घर जाकर चंदा एकत्र किया। मंदिर बन गया। भगवान की मूर्त की बड़े भारी उत्सव के साथ पूजा हुई। भंडारा हुआ। सबने आनंद से भगवान का प्रसाद लिया। भंडारे के दिन शाम को सभा हुई। साधु बाबा दाताओं को धन्यवाद देने के लिए खड़े हुए। उनके हाथ में एक कागज था। उसमें लम्बी सूची थी।

उन्होंने कहा- ‘‘सबसे बड़ा दान एक बुढिय़ा माता ने दिया है। वह स्वयं आकर दे गई थीं।’’ लोगों ने सोचा कि अवश्य किसी बुढिय़ा ने एक-दो लाख रुपए दिए होंगे लेकिन सबको बड़ा आश्चर्य हुआ जब बाबा ने कहा- ‘‘उन्होंने मुझे एक रुपए का सिक्का और थोड़ा-सा आटा दिया है।’’

लोगों ने समझा कि साधु मजाक कर रहे हैं। साधु ने आगे कहा- ‘‘वह लोगों के घर आटा पीस कर अपना काम चलाती हैं। यह एक रुपया वह कई महीने में एकत्र कर पाई थीं। यही उनकी सारी पूंजी थी। मैं सर्वस्व दान करने वाली उन श्रद्धालु माता को प्रणाम करता हूं।’’

लोगों ने मस्तक झुका लिए। सचमुच बुढिय़ा का मन से दिया हुआ यह सर्वस्व दान ही सबसे बड़ा था।

👉 अध्यात्म से मानव-जीवन का चरमोत्कर्ष (भाग 1)

इस संसार में मानव-जीवन से अधिक श्रेष्ठ अन्य कोई उपलब्धि नहीं मानी गई है। एकमात्र मानव-जीवन ही वह अवसर है, जिसमें मनुष्य जो भी चाहे प्राप्त कर सकता है। इसका सदुपयोग मनुष्य को कल्पवृक्ष की भाँति फलीभूत होता है।

जो मनुष्य इस सुरदुर्लभ मानव-जीवन को पाकर उसे सुचारु रूप से संचालित करने की कला नहीं जानता है अथवा उसे जानने में प्रमाद करता है, तो यह उसका एक बड़ा दुर्भाग्य ही कहा जायेगा। मानव-जीवन वह पवित्र क्षेत्र है, जिसमें परमात्मा ने सारी विभूतियाँ बीज रूप में रख दी है, जिनका विकास नर को नारायण बना देता है। किन्तु इन विभूतियों का विकास होता तभी है, जब जीवन का व्यवस्थित रूप से संचालन किया जाय। अन्यथा अव्यवस्थित जीवन, जीवन का ऐसा दुरुपयोग है, जो विभूतियों के स्थान पर दरिद्रता की वृद्धि कर देता है।

जीवन को व्यवस्थित रूप से चलाने की एक वैज्ञानिक पद्धति है। उसे अपनाकर चलने पर ही इसमें वाँछित फलों की उपलब्धि की जा सकती है। अन्यथा इसकी भी वही गति होती है, जो अन्य पशु-प्राणियों की होती है। जीवन को सुचारु रूप से चलाने की वह वैज्ञानिक पद्धति एकमात्र अध्यात्म ही है। जिसे जीवन जीने की कला भी कहा जा सकता है। इस सर्वश्रेष्ठ कला को जाने बिना जो मनुष्य जीवन को अस्त-व्यस्त ढंग से बिताता रहता है। उसे, उनमें से कोई भी ऐश्वर्य उपलब्ध नहीं हो सकता, जो लोक से लेकर परलोक तक फैले पड़े है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष जिनके अंतर्गत आदि से लेकर अन्त तक की सारी सफलतायें सन्निहित है, इसी जीवन कला के आधार पर ही तो मिलते है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1969 पृष्ठ 8


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/January/v1.8

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 5)

अथर्वण विद्या की चमत्कारी क्षमता

ऐसी अनेकों सत्य घटनाएँ हैं, जो ऋषि भूमि भारत की आध्यात्मिक चिकित्सा के पुण्य प्रवाह की साक्षी रही हैं। आधुनिक बुद्धि भले ही इन्हें कल्पित गल्प माने, लेकिन जिन्हें भारतीय इतिहास के सच का ज्ञान है,जो ऋत् के प्रति आस्थावान हैं, वे इन्हें स्वीकारने में संकोच न करेंगे। जिस सत्य घटना का जिक्र यहाँ किया जा रहा है, वह उत्तर वैदिक काल की है। उन दिनों वेदत्रयी की ही मान्यता थी। अथर्वण विद्याएँ अपनी प्रतिष्ठा पाने के लिए प्रयत्नशील थीं। इन्हीं दिनों हस्तिनापुर नरेश महाराज शान्तनु बीमार पड़े। उनका दूसरा विवाह सत्यवती से हो चुका था। और कुरुवंश के गौरव देवव्रत युवराज पद को त्याग कर भीष्म बन चुके थे।

उनकी पितृभक्ति, महात्याग, कर्त्तव्यनिष्ठा एवं निरन्तर सेवा मिलकर भी महाराज शान्तनु को राहत नहीं दे पा रहे थे। उनका स्वास्थ्य निरन्तर गिरता जा रहा था। मन की क्लान्ति एवं अशान्ति बढ़ती जा रही थी। महारानी सत्यवती भी घबराई हुई थीं। क्योंकि प्राणवान औषधियाँ निष्प्राण साबित हो रही थीं। और गुणवान वैद्य गुणहीन प्रमाणित हो रहे थे। किसी को उम्मीद नहीं थी कि महाराज शान्तनु का जीवन बच पाएगा। सत्यवती ने अन्तिम प्रयास के रूप में महर्षि व्यास का स्मरण किया। पितृभक्त भीष्म उन्हें आदरपूर्वक ले आए।
व्यास ने स्थिति की सम्पूर्ण जानकारी ली और माता सत्यवती से कहा- माँ! यह कार्य कम से कम मेरे लिए तो असाध्य है। हाँ परम तपस्वी महर्षि दध्यङ्ग अथर्वण चाहे तो वे कुछ कर सकते हैं। व्यास की बातें सुनकर भीष्म उन्हें लेने के लिए उनके पास पहुँचे। पहले तो उन्होंने चलने से मना किया, पर बाद में महर्षि व्यास के अनुरोध पर तैयार हो गए। राजमहलों, राजपुरुषों एवं राजनीति से पर्याप्त दूरी बनाकर रखने वाले महर्षि अथर्वण का हस्तिनापुर आना किसी चमत्कार से कम न था। आते ही उन्होंने महाराज शान्तनु को देखा और जोर से ठहाका मार कर हँसे। उनकी हँसी देर तक बिना रूके चलती रही। सभी उपस्थित जन चकित थे।

तभी उन्होंने थोड़े से आक्रोशित लहजे में कहा- महाराज, दिखने में तो आप की देह रोगी है, पर दरअसल आप प्रारब्ध के कुयोग एवं अपनी मनोग्रन्थियों से पीड़ित हैं। समग्र उपचार के लिए आपको चिन्तन शैली एवं जीवन क्रम बदलना होगा। शान्तनु के आश्वासन देने पर उन्होंने अपनी चिकित्सा प्रारम्भ की। इसमें औषधियों के कल्प थे तो मंत्रों के प्रयोग भी। कई तरह के ऐसे अनुष्ठान थे जिनके प्रभाव से शान्तनु की देह एवं मन की स्थिति बदलने लगी। अथर्वण विद्या के प्रभाव को सभी देख रहे थे। इस घटना के साक्षी बने महर्षि व्यास ने उनसे कहा ऋषिवर! आध्यात्मिक चिकित्सा की आपकी विधियाँ चमत्कारी हैं। यह पुण्य प्रक्रिया चलती रहे, इसके लिए अथर्ववेद का प्रणयन आवश्यक है। अथर्वण के आशीर्वाद से अथर्ववेद रचा गया। और सभी ने आध्यात्मिक चिकित्सक के रूप में वेदज्ञानी गुरु का महत्त्व पहचाना।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 9

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 22)

WELCOME THE SUFFERINGS
Distress is an unwelcome phenomenon. Its immediate experience is bitterness. Nevertheless, ultimately it is meant for the well-being and happiness of man. Distress is an extraordinarily effective mechanism provided by God for rectification of evil traits and augmentation of positive values. Life is a blissful and self-enlightened spark of the Supreme-Being. He/She has self-created this world which is intrinsically blissful. The brief interludes of unhappiness in life are provided to give the needed momentum to the progressive evolution of the soul, by reminding the being about the true purpose of life, which is awakening to its original nature as a Spark of the Divine. Events producing unhappiness in life are few and their impact is self-evident. Nevertheless, we must remember that whatever little suffering we come across, is the result of our own forgetfulness of our Divine Source. Being a spark of the Blissful Supreme Being, the soul is intrinsically blissful. Nor is there any natural unhappiness in the basic structure of the cosmos, which is orderly and harmonious.

Do not be afraid of the misfortunes, which create unhappiness. Do not loose your mental equilibrium. Face misfortunes boldly. Instead of getting worried or uneasy, be prepared to sail through them. Embrace misfortune as though it were an ill-mannered but warm-hearted friend, who uses foul language, makes unpleasant criticism. Nevertheless, when it (misfortune) goes, it leaves behind the gift of a large treasure of wisdom and insight. Like a brave soldier, face misfortune defiantly and say, “O oncoming misfortunes! you are like my children. I am your creator. Therefore, I welcome you with open arms. You are my legitimate offspring. Therefore, I won’t disown you. You are free to play in the courtyard of my life. I am not a coward. I won’t shed tears in desperation on meeting you. I am not morally so bankrupt as to avoid paying for my own misdeeds. Being a creation of That Supreme Being, I am a Spark of That Absolute Truth, Absolute Benefaction and Absolute Virtue. Come ugly products of my ignorant karmas. Come! I have courage to accommodate you in my life. I don’t need help from anyone. You have arrived to test how courageous I am? I am
prepared to face you.”

Friends! Don’t commit blasphemy. Don’t ever say this world is bad, wicked, unvirtuous and full of unhappiness. In this world, created by God, each elements masterpiece. Nothing is bad in the wholistic view of creation. If you blame the creation, you are also casting aspersions on its Creator. Saying that the pot is badlymade means commenting on the proficiency of the potter. How dare you underrate the qualification of your Omnipotent Father/Mother? When you say that this world is full of misery you are casting aspersions on the integrity of God. In this celestial creation, there is not an iota of unhappiness. Our ignorance itself is the cause of our bad karmas and consequent miseries. Come! Let us cleanse and purify our inner selves of our evil thoughts and wickedness so that we are totally and finally released from our miseries and acquire ultimate deliverance.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 37

👉 ऋषि जैमिनि सात दिन कक्ष में बन्द रहे:-

प्रख्यात आर्ष दार्शनिक जैमिनि जिन्होंने ''मीमांसा"  की रचना की, के साथ एक घटना ऐसी जुडी़ है जो विचारों की शक्ति भी बताती है व इस ग्रन्थ रचना की पृष्ठभूमि थी। जब वे मीमांसा दर्शन के सूत्रों को क्रमबद्ध कर रहे थे, अपनी धर्मपत्नी को उन्होंने कह दिया ''जब तक वे न कहें  कक्ष का द्वार न खोला जाय। चाहे रात्रि का आगमन हो जाय एवं अगले दिन का अरुणोदय, कोई उनके कार्य में व्यवधान न डाले।'' बिना आहार लिए वे उसी कक्ष में ७ दिन तक बन्द रहे। बाहर निकले तो चेहरे पर अभूतपूर्व तेज था एवं सफलता कीं मुस्कान थी। वे महत्त्वपूर्ण सूत्रों को क्रमबद्ध करके ग्रन्थ की रचना पूरी कर चुके थे। ''मीमांसा दर्शन'' नामक यह ग्रन्थ अध्यात्म के मूल सिद्धांतों का आधार बना।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1

गुरुवार, 30 मई 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 4)

अथर्वण विद्या की चमत्कारी क्षमता

हालांकि वर्ष १९८८ में यह दिव्य ग्रन्थ एक परिजन के हाथों ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के शोधकर्मियों को प्राप्त हुआ था। तब इसको आधार बनाकर ‘वेदों में मानव जीवन का स्वरूप एवं उसकी आध्यात्मिक चिकित्सा के रहस्य’ के शीर्षक से एक शोध कार्य भी कराया गया था। पर इन दिनों शोध कार्य भी संस्थान में नहीं है। परन्तु जो कार्य कराया गया था, उसके आधार पर बड़ी ही प्रामाणित रीति से कहा जा सकता है कि वेद मानव जीवन की आध्यात्मिक चिकित्सा के आदि स्रोत हैं। इनमें केवल देह की पीड़ा को दूर करने की विधियाँ भर नहीं है। बल्कि मानसिक रोगों की निवृत्ति, दरिद्रता निवारण, ब्रह्मवर्चस व स्मरण शक्ति के वर्धन, घर- परिवार की सुख- शान्ति एवं सामाजिक यश, सम्मान में अभिवृद्धि के अनेकों प्रयोग शामिल हैं।

एक लघु आलेख में इन सभी के प्रयोग के विस्तार की व्याख्या तो सम्भव नहीं है। परन्तु एक सामान्य प्रयोग की चर्चा तो की ही जा सकती है। यह चर्चा ऋग्वेद के दशम् मण्डल के १५५ वें सूक्त के बारे में है। यदि कोई व्यक्ति धनलक्ष्मी से विहीन होकर जीवन यापन कर रहा हो, तो वह इस सूक्त के समस्त पाँचों मंत्रों का नित्य प्रातःकाल स्नान करने के पश्चात् १०१ बार जप करे। इस जप से पहले एवं बाद में गायत्री महामंत्र की एक- एक माला का जप आवश्यक है। वेद में प्रयोग अनेकों एवं विधियाँ असंख्य हैं। महाकाव्य एवं पुराणकाल में इन विधियों एवं प्रयोगों का उल्लेख महाकाव्यों एवं पुराणों में हुआ। वाल्मीकि रामायण एवं महाभारत में जीवन की अनगिनत समस्याओं के समाधान हेतु विभिन्न प्रयोगों की सांकेतिक या विस्तार से चर्चा की गयी है।

आध्यात्मिक चिकित्सा के ये प्रसंग ऐतरेय ब्राह्मण, तैत्तिरीयब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण, ताण्ड्य ब्राह्मण तथा षडङ्क्षवश ब्राह्मण में भी पर्याप्त मिलते हैं। देवीभागवत पुराण, अग्रिपुराण, नारदादिपुराणों में तो इनकी भरमार है। इस सन्दर्भ में सूत्र ग्रन्थ भी पीछे नहीं हैं। यहाँ भी आध्यात्मिक चिकित्सा से सम्बन्धित अनेकों प्रयोग विधियाँ मिलती हैं। कल्प सूत्र, श्रोतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र एवं शुल्बसूत्र में इस विषय पर इतनी प्रचुर सामग्री है, जिसके आधार पर एक शोधग्रन्थ तैयार किया जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 8

👉 उपासना को समग्र रूप में अपनायें- समुचित लाभ उठायें (अन्तिम भाग)

सामान्यतया हर प्रज्ञा परिजन को युग सन्धि की बेला में अपनी उपासना को नैष्ठिक, नियमित एवं समग्र बना लेना चाहिए। तीन माला का जप, गुरुवार को जिस स्तर का बन पड़े उपवास, ब्रह्मचर्य, महीने में एक बार अग्निहोत्र का न्यूनतम साधना क्रम तो चलाना ही चाहिए। इसके अतिरिक्त अपने भावना क्षेत्र को उत्कृष्टताओं के समुच्चय परमात्मा के साथ तादात्म्य स्थापित करने का निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए। भावना, विचारणा और क्रिया- प्रक्रिया में जितनी अधिक उत्कृष्टता आदर्शवादिता का समावेश सम्भव हो सके, उसके लिए उपाय खोजने और प्रयत्न करने में सतत संलग्न रहना चाहिए। भजन कृत्य और तादात्म्य की उभय पक्षीय प्रक्रिया उपासना को समग्र बनाती है और अपना प्रत्यक्ष प्रतिफल हाथों हाथ प्रस्तुत करती है।

युग सन्धि के अगले दिन सृजन और विनाश की सम्भावनाओं से भरे पड़े हैं। ऐसी परिस्थितियों में उपासना विधान की अपनी महत्ता है। नैष्ठिक साधना एवं प्रज्ञा पुरश्चरण इसी निमित्त आरम्भ किए गए प्रारम्भिक उपचार हैं। लेकिन यहीं तक सीमित होकर किसी को नहीं रहना है। जो भी उपासना के माध्यम से आत्मशक्ति अभिवर्द्धन की बात सोचते हैं, उन्हें अपने निजी जीवन का कायाकल्प तो करना ही है। अपने परिकर क्षेत्र को भी उसी रंग में रंगना है। इससे व्यक्तित्व में और निखार आएगा, वह पुण्य लाभ तो मिलेगा ही, जो महाकाल की योजना में भागीदार बनने से किसी को भी मिल सकता है।

इस कार्य के लिए यदि कल्प साधना में सम्मिलित होकर प्रारम्भिक स्थिति जान ली जाय एवं उसमें जो परिशोधन संभावित हो उसे मार्गदर्शकों द्वारा जानकर प्रायश्चित विधान द्वारा अपने अन्तः को परिष्कृत कर लिया जाय तो यह और भी अच्छा है। साधना से ही वह स्थिति बनती है कि मनुष्य परमात्म सत्ता के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेता है। बिना साधना के, तप- तितिक्षा के उपासना सम्भव नहीं। साधना कड़ा संयम, आहार की तितिक्षा अपनाकर ही सम्भव है। जो इस प्रारम्भिक सोपान को पूरा कर लेता है। उसके लिए साधना मार्ग में आगे और फिर कोई अवरोध आड़े नहीं आता। साधना उपासना के बाद आराधना पुण्य परमार्थ की बात आती है। ईश्वरीय गुणों से सम्पन्न साधक बिना परमार्थ के रह नहीं सकता। लोक कल्याण, आराधना, परमार्थ परायणता ये सभी उपासना के उत्तरार्द्ध माने जा सकते हैं। जिसने स्वयं को अनुशासन के शिकंजे में कस लिया, दैवी प्रयोजन में सहभागी बनने योग्य स्वयं को बना लिया वह ईश्वर की कृपा का पात्र बन जाता है। ऐसे व्यक्ति ही व्यक्तित्व सम्पन्न बनते, लोक सम्मान व दैवी अनुग्रह पाते हैं।

उपासना अपने समग्र रूप में ही सही कही जा सकती है। साधना, तप, आराधना उसके आवश्यक अंग माने जा सकते हैं। आत्मिक प्रगति का यह अवलम्बन मनुष्य को परमात्म सत्ता के साथ जोड़ देता है, समकक्ष बना देता है। यह कथन सत्य है। परन्तु शर्त मात्र यही है कि उसे सही रूप में अपनाया गया हो, चिन्ह पूजा की लकीर भर न पीटी गयी हो।

..... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 28 मई 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 3)

अथर्वण विद्या की चमत्कारी क्षमता

आध्यात्मिक चिकित्सा की पुण्य परम्परा वैदिक ऋचाओं की गूंज के साथ ही प्रारम्भ हो गयी। अपने जीवन के ऊषाकाल से ही मनुष्य को विकृति एवं विरोधों से अनेकों संघर्ष करने पड़े। इन संघर्षों में कभी तो उसकी देह क्षत- विक्षत हुई तो कभी अन्तर्मन विदीर्ण हुआ। भावनाओं के तार- तार होने के भी अनगिनत अवसर आए। विपन्नता और धनहीनता के दुःख भी उसने झेले, शत्रुओं द्वारा दी जाने वाली विषम पीड़ाएँ भी उसने सहीं। छटपटाहट भरी इन पीड़ाओं के बीच उसने समाधान की खोज में कठिन साधनाएँ की। महातप की ज्वालाओं में उसने अपने जीवन को झोंका। प्रश्र एक ही था- जीवन की विकृतियों के निदान एवं उसके चिकित्सकीय समाधान।

आत्मचेतना के केन्द्र में- परमात्म चेतना के सान्निध्य में उसे समाधान के स्वर सुनाई दिए। महातप की इस निरन्तरता ने उसके सामान्य व्यक्तित्व का ऋषिकल्प कर दिया। और उसने कहा-
तं प्रत्नास ऋषयो दीध्यानाः पुरो विप्राः दधिरे मन्द्रजिह्वम्।
-- ऋग्वेद ४/५०/१

इस ऋषि अनुभूति से यह स्पष्ट ध्वनि निकलती है कि प्राचीन ऋषिगण परब्रह्म का ध्यान कर उन्हें अपने सामने प्रकट कर लेते थे। और मन्द्रजिह्व परमात्मा द्वारा उन्हें वेदमंत्रों का उपदेश प्राप्त होता था। इन वेदमन्त्रों के शब्दार्थ कीथ एवं ब्लूमफील्ड जैसे पश्चिमी विद्वान कुछ भी खोजते रहे; पर अपने रहस्यार्थ में ये जीवन की आध्यात्मिक चिकित्सा के मंत्र हैं। आध्यात्मिक चिकित्सा के इस दिव्य काव्य के विषय में अथर्ववेद के ऋषि ने कहा-
पश्य देवस्य काव्यं न ममार न जीर्यति।
परमात्मा के काव्य (वेद) को देखो, वह न नष्ट होता है और न मरता है।

सचमुच ही इस अमृत काव्य में जीवन की सम्पूर्ण एवं सर्वविधि आध्यात्मिक चिकित्सा के अनेकों सूक्त, सूत्र एवं आयाम समाहित हैं। अपने महातप से असंख्य पीड़ित जनों की आध्यात्मिक चिकित्सा करने वाले ब्रह्मऋषि गुरुदेव ने वर्षों पूर्व इस सत्य को अपनी लेखनी से प्रकट किया था। उन्होंने ऋग्, यजुष, साम व अथर्व वेद के कतिपय विशिष्ट मंत्रों की आध्यात्मिक चिकित्सा के सन्दर्भ में महत्ता तथा इनकी प्रयोग विधि को उद्घाटित किया था। ‘वैदिक मंत्र विद्या के रूप में यह आश्चर्यजनक एवं चमत्कारी रूप से उपादेय थी, पर आज अनुपलब्ध है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 7

रविवार, 26 मई 2019

👉 Do Mitra दो मित्र

दो मित्र एक आम के बगीचे में पहुँचे। पेड़ पके हुए मीठे फलों से लदे हुए थे। दोनों का मन फलों को देखकर खाने के लिए ललचाने लगा। बाग का माली उधर से निकला। उसने आगन्तुकों की इच्छा को जाना और कहा-मालिक की आज्ञा है कि कोई यात्री एक दिन यहाँ ठहर सकता है, जितना खा सके आम खा सकता है पर साथ नहीं ले जा सकता। सो आप लोग चाहे तो दिन भर इच्छानुसार आम खायें पर संध्या होते-होते चले जावें। साथ में एक भी आम न ले जा सकेंगे।

मित्रों को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे अपनी रुचि के आम खाने को चल दिये। पेड़ सभी अच्छे थे आम सभी मीठे थे सो एक मित्र जिस पेड़ पर चढ़ा उसी पर बैठा-बैठा खाने लगा। शाम तक खूब पेट भरा और तृप्त होकर नीचे आ गया।

दूसरे ने सोचा, इस सुन्दर बगीचे की जाँच पड़ताल कर ले। खट्टे, मीठे और जाति किस्म का पता लगाते अन्त में खाना आरम्भ करेंगे। वह इसी खोज बीन में लगा रहा और शाम हो गई। माली ने दोनों आगन्तुकों को बाहर किया और बाग का फाटक बन्द कर दिया। एक का पेट भर चुका था दूसरे का खाली। एक प्रसन्न था दूसरा असन्तुष्ट।

फाटक के बाहर बैठे हुए एक दरवेश ने कहा-दोस्तों यह संसार आम के बगीचे की तरह है। थोड़ी देर यहाँ रहने का मौका मिलता है और समय बीतते ही विदाई की घड़ी आ पहुँचती है। बुद्धिमान वह है जो सत्कर्मों द्वारा तृप्ति दायक सत्परिणामों का लाभ से सका, मूर्ख वह है जो मोह ममता प्रपंच में इधर-उधर मारा फिरे। लगता है कि तुम में से भी एक ने मूर्खता और एक ने बुद्धिमत्ता बरती है।

📖 अखण्ड ज्योति मई 1964

👉 उपासना को समग्र रूप में अपनायें- समुचित लाभ उठायें (भाग 4)

प्रज्ञा परिजनों को मूर्धन्य भूमिका निभाने के लिए आत्मशक्ति की प्राण ऊर्जा का बड़ी मात्रा में संचय करना होगा। यह परमात्मा से ही उसे मिलेगी। अस्तु उसे उपासना के लिए सच्चे मन से साहस जुटाना और प्रयास करना चाहिए। जीवन चर्या में उसे निष्ठापूर्वक सुनिश्चित एवं मूर्धन्य स्थान देना चाहिए। कर्मकाण्ड के लिए जितना भी समय निकाला जाय, उसे नियमित और निश्चित होना चाहिए। व्यायाम, औषधि सेवन, अध्ययन आदि के लिए समय भी निर्धारित किए जाते हैं और उसकी मात्रा का सीमा बन्धन भी रखा जाता है। यदि इन प्रसंगों में मन की मौज बरती जाय, समय और मात्रा ही उपेक्षा करके जैसा मन वैसा करने की स्वेच्छाचारिता अपनाई जाय तो पहलवान, विद्वान बनने और निरोग होने की इच्छा पूरी हो ही नहीं सकेगी। हर महत्त्वपूर्ण कार्य में नियमितता को प्रमुखता दी जाती है। जो किया जाता है उसमें समूचे मनोयोग का नियोजन किया जाता है, उपासना के सन्दर्भ में भी वही किया जाना चाहिए। अस्त- व्यस्तता बनी रहेगी तो अभीष्ट उद्देश्य की प्राप्ति अति कठिन हो जाएगी।

युग सन्धि की अवधि में सभी प्रज्ञा परिजनों को न्यूनतम तीन माला गायत्री जप प्रातःकाल नित्य कर्म से निवृत्त होकर करने के लिए कहा गया है। जप के साथ प्रभात कालीन सूर्य का दर्शन और उस सविता देवता की स्वर्णिम किरणों का स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों में प्रवेश कराने का ध्यान भी करते चलना चाहिए। शरीर, स्थान और उपकरणों की स्वच्छता के अतिरिक्त, मन, बुद्धि, चित्त की स्वच्छता के लिए आचमन, प्राणायाम और न्यास कृत्य करने का विधान है। सामान्य प्राणायाम तो रेचक, कुम्भक, पूरक द्वारा ही सम्पन्न हो जाता है, पर उसमें विशेषता लानी हो तो उसे प्राणाकर्षण स्तर का विकसित कर लेना चाहिए।

इन पंक्तियों में उसे संक्षिप्त ही लिखा जा रहा है क्योंकि अधिकांश परिजन उसे पहले से ही जानते हैं। जो नहीं जानते उनके लिए थोड़ी सी पंक्तियों के निर्देशन से काम नहीं चलेगा। उन्हें किसी समीपवर्ती निष्णात से, गायत्री महाविज्ञान से जानना होगा या शान्तिकुञ्ज पत्र व्यवहार करके अपनी वर्तमान स्थिति के अनुरूप साधना क्रम का निर्धारण करना होगा। स्पष्ट है कि साधक के स्तर और प्रवाह को ध्यान में रखते हुए साधना क्रम भी चिकित्सा उपचार की तरह आवश्यकतानुसार समय- समय पर बदलने होते हैं। शान्तिकुञ्ज को गायत्री तीर्थ के रूप में इन्हीं दिनों इसी प्रयोजन के लिए विकसित किया गया है। ताकि हर साधक की स्थिति एवं आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए उसके लिए विशेष निर्धारण किए जा सकें और जो बताया गया है उसका प्रारम्भिक अभ्यास प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में ही सही कर लेना सम्भव हो सके।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा (भाग 2)

बोध, निदान एवं विज्ञान का पूर्ण तंत्र है। इसमें जीवन की दृश्य- अदृश्य संरचना का सम्पूर्ण बोध है। इसी के साथ यहाँ जीवन के दैहिक- दैविक एवं आध्यात्मिक रोगों के निदान की सूक्ष्म विधियों का समग्र ज्ञान है। इतना ही नहीं इसमें इन सभी रोगों के सार्थक समाधान का प्रायोगिक विज्ञान भी समाविष्ट है, जो मानव जीवन की सम्पूर्ण चिकित्सा के ऋषि संकल्प को दुहराता है।

यह वही महासंकल्प है, जो ऋग्वेद के दशम मण्डल के रोग निवारण सूक्त के पंचम मंत्र के ऋषि विश्वामित्र की अन्तर्चेतना में गूँजा था। नवयुग की नवीन सृष्टि करने वाले ब्रह्मऋषि विश्वामित्र उन क्षणों में चिन्तन में निमग्र थे। तभी उन्हें एक करूण, आर्त स्वर सुनाई दिया। यह विकल स्वर एक दुःखी नारी का था, जिसे उनका शिष्य जाबालि लिए आ रहा था। इस युवती नारी को रोगों ने असमय वृद्ध बना दिया था।

पास आते ही ब्रह्मज्ञानी महर्षि ने उसकी व्यथा के सारे सूत्र जान लिए। और जाबालि को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा- वत्स! चिकित्सा की सारी प्रचलित विधियाँ एवं औषधियाँ इस पर नाकाम हो गयी हैं, यही कहना चाहते हो न। हां आचार्यवर...। वह अभी आगे कुछ कह पाता तभी ऋषि बोले- वत्स! अभी एक चिकित्सा विधि बाकी है- और वह है आध्यात्मिक चिकित्सा। तुम्हारे सम्मुख मैं आज इसका प्रयोग करूँगा।

शिष्य जाबालि अपने आचार्य की अनन्त आध्यात्मिक शक्तियों से परिचित थे, सो वे शान्त रहे। फिर भी उनमें जिज्ञासा तो थी ही। जिसका समाधान करते हुए अन्तर्यामी ब्रह्मऋषि बोले- पुत्र जाबालि, सफल चिकित्सा के लिए जीवन का समग्र बोध आवश्यक है। और जीवन मात्र देह नहीं है। इसमें इन्द्रिय, प्राण, मन, चित्त, बुद्धि, अहं एवं अन्तरात्मा की अन्य अदृश्य कड़ियाँ भी हैं। रोग के सही निदान के लिए इनका पारदर्शी ज्ञान होना चाहिए। तभी समाधान का विज्ञान कारगर होता है। यह कहते हुए महर्षि ने उस पीड़ित नारी को सामने बिठाकर उसे अपने महातप के एक अंश का अनुदान देने का संकल्प करते हुए कहा-
आ त्वागमं शंतातिभिरथो अरिष्टातातिभिः।
दक्षं त उग्रमाभारिषं परा यक्ष्मं सुवामि ते॥

अर्थात्- ‘आपके पास शान्ति फैलाने वाले तथा अविनाशी साधनों के साथ आया हूँ। तेरे लिए प्रचण्ड बल भर देता हूँ। तेरे रोग को दूर भगा देता हूँ।’ महर्षि  के इस संकल्प ने उस पीड़ित नारी को स्वास्थ्य का वरदान देने के साथ आध्यात्मिक चिकित्सा की पुण्य परम्परा का प्रारम्भ भी किया

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 5

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 21)

KRIYAMAN KARMAS (Physical Karmas):

Physical actions fall in the category of Kriyaman Karmas. These produce co current results. Consumption of drugs is followed by intoxication. Death follows consumption of poison. Human body is made up of five natural basic elements. Interaction between these natural elements produces immediate reaction. As soon as we touch fire, fingers are burnt. Laws of nature govern interactions between natural elements. Defiance of these laws invites almost constant punishment by nature.

When the physical body is compelled to live on foods and habits incompatible with its physiology, there is an immediate disturbance in the natural balance of the body, which results in disease, and weakening of the harmonious working of the biological system. This is nature’s mechanism for rectification. (Vegetarianism is meant for human species, since contrary to the physiology of the carnivora, man has been provided with smaller canine teeth and larger intestine as compared to carnivora.

The smaller intestines of the carnivora do not let accumulation of residual toxins of animal fat in the body. Besides, the flesh-eating animals are provided with long tongues. The vegetarians use their lips for consuming liquids). Physical Karmas are mechanically carried out by the body without any emotional involvement unlike Sanchit and Prarabdha Karmas, they produce fruits in a short time.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 35

👉 आज का सद्चिंतन Apna Nirmaan Aap


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Pavitr Aur Apavitra



शुक्रवार, 24 मई 2019

👉 उपासना को समग्र रूप में अपनायें- समुचित लाभ उठायें (भाग 3)

तादात्म्य अर्थात् भक्त और इष्ट की अंतःस्थिति का समन्वय एकीकरण। दूसरे शब्दों में ईश्वरीय अनुशासन के अनुरूप जीवनचर्या का निर्धारण। परब्रह्म तो अचिन्त्य है पर उपासना जिस परमात्मा की की जाती है वह आत्मा का ही परिष्कृत रूप है। वेदान्त दर्शन से सोऽहम्, शिवोऽहम्, तत्त्वमसि, अयमात्मा, ब्रह्म आदि शब्दों में अन्तःचेतना के उच्चस्तरीय विशिष्टताओं से भरे- पूरे उत्कृष्टताओं के समुच्चय को ही परमात्मा कहा गया है, उसके साथ ही मिलन का, तादात्म्य का स्वरूप तभी बनता है जब दोनों के मध्य एकता एकात्मता स्थापित हो। इसके लिए साधक अपने आपको कठपुतली की स्थिति में रखता है और अपने अवयवों में बंधे धागों को बाजीगर के हाथों सौंप देता है। दर्शकों को मन्त्र मुग्ध कर देने वाला खेल इस स्थापना के बिना बनता ही नहीं। आत्मा को परमात्मा की उच्चस्तरीय प्रेरणाएँ अपनाने और तदनुरूप जीवनचर्या बनाने पर ही उपासना का समग्र लाभ मिलता है।

लकड़ी और अग्नि की समीपता का प्रतिफल प्रत्यक्ष है। गीली लकड़ी आग के समीप पहुँचते- पहुँचते अपनी नमी गँवाती और उस ऊर्जा से अनुप्राणित होती चली जाती है। जब वह अति निकट पहुँचती है तो फिर आग और लकड़ी एक स्वरूप जैसे हो जाते हैं। साधक को भी ऐसा ही भाव समर्पण करके ईश्वरीय अनुशासन के साथ अपने आपको एक रूप बनाना पड़ता है। चन्दन के समीप वाली झाड़ियों का सुगन्धित हो जाना, स्वाति बूँद के संयोग से सीप में मोती पैदा होना, पारस छूकर लोहे का स्वर्ण बनना, नाले का गंगा में मिलकर गंगाजल बनना, पानी का दूध में मिलकर उसी भाव बिकना, बूँद का समुद्र में मिलकर सुविस्तृत हो जाना जैसे अगणित उदाहरण हैं, जिनके आधार पर यह जाना जा सकता है कि भक्त और भगवान की एकता उपासना का स्तर क्या होना चाहिए। सृष्टि के आदि से अद्यावधि सच्चे भक्तों में से प्रत्येक को ईश्वर के शरणागत होना पड़ा है। आत्म समर्पण का साहस जुटाना पड़ा है।

इसका व्यावहारिक स्वरूप है ईश्वरीय अनुशासन को, उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व को अपनी विचारणा एवं कार्यपद्धति से अनुप्राणित करना। जो इस तत्व दर्शन को जानते, मानते और व्यवहार में उतारते रहे हैं उन सच्चे ईश्वर भक्तों को सुनिश्चित रूप से वे लाभ मिले हैं, जिन्हें उपासना की फल श्रुतियों के रूप में कहा जाता रहा है। पत्नी- पति को आत्म समर्पण करती है। अर्थात उसकी मर्जी पर चलने के लिए अपनी मनोभूमि एवं क्रिया पद्धति को मोड़ती चली जाती है। इस आत्म समर्पण के बदले वह पति के वंश, गोत्र, यश, वैभव की उत्तराधिकारिणी ही नहीं अर्धांगिनी भी बन जाती है। समर्पण विहीन कर्मकाण्ड तो एक प्रकार का वेश्या व्यवसाय या चिन्ह पूजा जैसा निर्जीव ढकोसला ही माना जाएगा। भक्त भगवान के अनुरूप चलता चला जाता है और अन्ततः नर नारायण, पुरुष- पुरुषोत्तम, भक्त भगवान की एक रूपता का स्वयं प्रमाण बनता है। देवात्माओं में परमात्मा स्तर की क्षमतायें ही उत्पन्न हो जाती हैं। इन्हें ही ऋद्धि- सिद्धियाँ कहते हैं।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन Jeevan Kaise Jiye


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Bhagwaan Kaise MIlte Hai



👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 1)

लेखक की ओर से

जीवन रोगों के भार और मार से बुरी तरह टूट गया है। जब तन के साथ मन भी रोगी हो गया हो, तो इन दोनों के योगफल के रूप में जीवन का यह बुरा हाल भला क्यों न होगा? ऐसा नहीं है कि चिकित्सा की कोशिशें नहीं हो रही। चिकित्सा तंत्र का विस्तार भी बहुत है और चिकित्सकों की भीड़ भी भारी है। पर समझ सही नहीं है। जो तन को समझते हैं, वे मन के दर्द को दरकिनार करते हैं। और जो मन की बात सुनते हैं, उन्हें तन की पीड़ा समझ नहीं आती। चिकित्सकों के इसी द्वन्द्व के कारण तन और मन को जोड़ने वाली प्राणों की डोर कमजोर पड़ गयी है।

पीड़ा बढ़ती जा रही है, पर कारगर दवा नहीं जुट रही। जो दवा ढूँढी जाती है, वही नया दर्द बढ़ा देती है। प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों में से प्रायः हर एक का यही हाल है। यही वजह है कि चिकित्सा की वैकल्पिक विधियों की ओर सभी का ध्यान गया है। लेकिन एक बात जिसे चिकित्सा विशेषज्ञों को समझना चाहिए, उसे नहीं समझा गया। समझदारों की यही नासमझी सारी आफतों- मुसीबतों की जड़ है। यह नासमझी की बात सिर्फ इतनी है कि जब तक जिन्दगी को सही तरह से नहीं समझा जाता, तब तक उसकी सम्पूर्ण चिकित्सा भी नहीं की जा सकती।

जीवन- तन और मन के जोड़ से कुछ अधिक है। इसमें अन्तर्भावना, अन्तर्चेतना एवं अन्तरात्मा जैसे अदृश्य आयाम भी हैं। शारीरिक अंगों की गठजोड़ को बायलॉजी पर आधारित मेडिकल साइन्स से समझा जा सकता है। मन की चेतना- अचेतन परतें साइकोलॉजी द्वारा पढ़ ली जाती है। पर अतिचेतन की इबारत कौन पढ़े? प्रारब्ध और संस्कारों का लेखा- जोखा कौर सम्हाले? ये गहरी बातें तो अध्यात्म विद्या से ही जानी- समझी जाती है। आध्यात्मिक दृष्टि से ही जीवन की यथार्थता और सम्पूर्णता पता चलती है। इस सम्पूर्णता के बलबूते की सम्पूर्ण चिकित्सा का विधान सम्भव है।

यही वजह है कि अध्यात्म विद्या, आध्यात्मिक दृष्टि एवं आध्यात्मिक चिकित्सा की जरूरत को आज सभी अनुभव कर रहे हैं। इस पुस्तक के लेखक के रूप में मैंने इन आध्यात्मिक सत्यों को जिया है, अनुभव किया है। युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव के सान्निध्य, साहचर्य एवं सेवा में जीवन के जो पल बीते है, वे अनिवर्चनीय अनुभूतियों एवं  उपलब्धियों से भरे रहे हैं। गुरुदेव अध्यात्म विद्या एवं अध्यात्म चिकित्सा के परम विशेषज्ञ थे। उनकी इस विशेषता के क्षितिज में आध्यात्मिक चिकित्सा की नित नयी आभा को बिखेरते- विकीर्ण होते हुए मैंने अपनी इन्हीं आँखों से देखा है।

कई अवसरों पर उन्होंने स्वयं मुझे अपने पास बैठाकर आध्यात्मिक चिकित्सा की सच्चाई को बताया और समझाया। उनके श्रीमुख से जो सूत्र उनके श्री चरणों में बैठकर जैसे सीखा, उसी को बताने की चेष्टा इस पुस्तक की पंक्तियों में की गयी है। इस पुस्तक में जो कहा गया है, वह न तो कई ग्रन्थों के अध्ययन का सार है और न शब्दों का ऐन्द्रजालिक गठजोड़। इसमें तो बस अपनी अनुभूतियों एवं उपलब्धियों को उदारता पूर्वक अपनों में बाँटने की चेष्टा की गई है। इस सच्चाई को पढ़ने वाले पुस्तक की प्रत्येक पंक्ति, शब्द में अनुभव करेंगे। पढ़ने वालों की इन अनुभूतियों में उनके स्वस्थ जीवन की उपलब्धि भी जुड़े, यही गुरुसत्ता से प्रार्थना है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 1,2

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 20)

GOD IS NOT VINDICTIVE
Misfortune occurs in life in a particular order and according to a well-defined process of divine justice, but people reconcile to their inevitability by believing in socalled “Wrath of God”, “God’s Will” or “Natural woeful state of this world”. As a matter of fact, God neither creates any good fortune nor misfortune for anybody, nor He/She (God is not gender-specific as a biological being) desires
to put anyone in distress. Nor is this world wholly full of woes. A spider gets confined and entangled in its own self-woven web. Similarly, man himself makes his mind vicious, undisciplined, corrupt and sinful and when the evil mind works to create a distressing situation, he weeps, wails and blames others- including God. Here it should be clearly understood that the fruits of Prarabdha are always received as abrupt unprecedented events. (e.g., unexpected death due to disease or accident, collapsing of a house, winning a jackpot, injury due to accident, accidental loss of limbs or cessation of vital functions of body.)

God does not involve other beings directly in enforcing divine justice for a couple of reasons. One: The person enforcing divine punishment on behalf of God would create resentment against his own self- thus beginning a chain of counter reaction between himself and the person being punished. It would increase turbulence of mind. Two: The enforcer would have to be unnecessarily involved in the complex process of cause-effect by committing undesired karmas and reaping their fruits.

Here, we may once again recapitulate the characteristics of Sanchit Karmas and Prarabdha Karmas. Whereas Sanchit Karmas bear fruits only on coming across a suitable environment or otherwise get destroyed in a counter environment, the Prarabdha Karmas invariably bear fruit, though it may take a period of several life cycles. The current activities being knowingly carried out are Prarabdha Karmas, whereas the unexpected, sudden happenings are the fruits of past Prarabdha Karmas. Any failure in life due to indolence is definitely not due to Prarabdha Karmas of the past. Unlike the Prarabdha Karmas, the physical Kriyaman Karmas (discussed hereafter) bear definite fruits within a short time.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 34

👉 अर्जुन को मात्र आँख दिखी:-

लक्ष्य के प्रति तन्मयता सच्चे साधक की विशेषता है। यह विचार एकीकरण का ही परिणाम है। द्रोणाचार्य ने प्रश्न किया- ''दुर्योधन ! सामने क्या दिखाई दे रहा है ?'' ''आकाश, वृक्ष, पत्तियाँ और चिडि़या जिस पर निशाना लगाना है। ''द्रोणाचार्य ने कहा-  ''तुम्हारा निशाना सही न लगेगा, बैठ जाओ। '' एक-एक करके सारे शिष्य असफल होते गये। अब अर्जुन का नम्बर आया। आचार्य ने वही प्रश्न दुहराया। अर्जुन ने कहा- '' गुरुदेव। मुझे पक्षी की आँख के अतिरिक्त और कुछ दिखाई नहीं देता।'' '' बाण चलाओ, आचार्य ने आदेश दिया। तीर सही ठिकाने पर जा लगा। द्रोणाचार्य ने शिष्यों को बताया, जिसे लक्ष्य के अतिरिक्त कुछ दिखाई न दे उसी की साधना सफल होती है।

प्रतिभाएँ परमात्मा की देन होती है- ऐसा माना जाता है। इसी कारण हजारों में एक वैज्ञानिक, दार्शनिक अथवा विषय विशेष का निष्णात प्रकाण्ड पण्डित बन जाता है। वस्तुत: परमपिता की यह कृपा बरसती सब पर एक साथ है, लाभ वे ही उठाते हैं जो अपने विचारों को रचनात्मक चिंतन एवं कर्तृत्व में नियोजित कर लेते हैं। महर्षि पतंजलि ने विचारों की एकाग्रता का महत्व समझा, उसे जीवन में उतारा एवं योगदर्शन के रूप में एक महान ग्रंथ मानवता को दे सके।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...