★ ये शिला देख रहे हैं आप ये वही शिला है जो आप मंदिरों में पाते हैं, जिसके समक्ष आप शीश झुकाते हैं, हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं, विनती करते हैं। अब सोचिये ये शिला बनती किससे है, पाषाण के एक खण्ड से, बिल्कुल साधारण सा पाषाण का खण्ड। यदि यही पाषाण का खण्ड आपको कहीं और मिल जाए तो आप क्या करोगे? ठोकर मार दोगे?? वो पाषाण आपके लिए अधिक महत्व नहीं रखता। अब यही मनुष्य के साथ भी होता है। अब या तो आप सम्मान पा सकते हैं या ठोकर खा सकते हैं, प्रयत्न आपका होगा। यदि आप अपने भीतर अच्छे विचार जगाएँ, शुभ कर्म करें, कठिनाइयों का, संकटों का सामना करें, सदाचार के मार्ग पर चलें तो आपको सम्मान अवश्य प्राप्त होगा अन्यथा विफलता का मार्ग तो आपके पास है ही।
◆ कहते हैं यदि भाग्य साथ न हो, यदि भाग्य ही खराब हो, नदी का पानी भी खारा बन जाता है। ये बात अनुचित है। हर बात के लिए, हर समस्या के लिए, भाग्य दोषी नहीं हो सकता। कई बार हमारी असावधानी भी होती है। सावधान रहना अत्यंत आवश्यक है। हम आने वाले समय के लिए सावधान नहीं रहते और जब अचानक संकट हमारे समक्ष आ जाता है, तो स्वयं को संभाल नहीं पाते, क्योंकि हम सज्ज नहीं रहते? उस परिस्थिति में हम हार जाते हैं? सावधानी अत्यंत आवश्यक है, जब आप किसी अंजान राह पर निकलते हैं, तो सर्वप्रथम अपना एक पैर अपनी धरा पर जमाए रखना और दूसरे पैर से आने वाली भूमि का आकलन करना जरूरी है। ये समस्या है ऐसा मानना सावधानी का अंत है। आने वाले भविष्य का आकलन करना क्योंकि कुछ भी कर लो आप आने वाली परिस्थिति को तो देख नहीं सकते। यदि भविष्य में आपके संकट ही लिखा है तो आने वाले संकट का सामना करने के लिए आप सावधानी की ढाल का तो उपयोग कर सकते हैं।
◇ विषपान करने के बाद भी महादेव देवों के देव महादेव कहलाते हैं? वहीं दूसरी ओर अमृतपान करने के पश्चात भी राहू और केतू असुर ही कहलाते हैं? क्यों?? इसका कारण है भाव। आपके कर्मों के पीछे जो आपका भाव है, अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये संसार किसी व्यक्ति को वहीं से तो जानता है, कर्मों के पीछे उसके भाव से। यदि कोई परोपकार करे और उसके पीछे भाव स्वार्थ का हो, तो वो परोपकारी मनुष्य अपने आप अपना महत्व खो देता है। यदि आपके कर्म के पीछे भाव उचित हो तो श्राप भी वरदान में परिवर्तित हो सकता है। यदि आपके कर्म का भाव अनुचित हो तो वरदान को श्राप का रूप लेने में अधिक समय नहीं लगता। ये सारा खेल है कर्मों का और भावों का।
◆ कहते हैं यदि भाग्य साथ न हो, यदि भाग्य ही खराब हो, नदी का पानी भी खारा बन जाता है। ये बात अनुचित है। हर बात के लिए, हर समस्या के लिए, भाग्य दोषी नहीं हो सकता। कई बार हमारी असावधानी भी होती है। सावधान रहना अत्यंत आवश्यक है। हम आने वाले समय के लिए सावधान नहीं रहते और जब अचानक संकट हमारे समक्ष आ जाता है, तो स्वयं को संभाल नहीं पाते, क्योंकि हम सज्ज नहीं रहते? उस परिस्थिति में हम हार जाते हैं? सावधानी अत्यंत आवश्यक है, जब आप किसी अंजान राह पर निकलते हैं, तो सर्वप्रथम अपना एक पैर अपनी धरा पर जमाए रखना और दूसरे पैर से आने वाली भूमि का आकलन करना जरूरी है। ये समस्या है ऐसा मानना सावधानी का अंत है। आने वाले भविष्य का आकलन करना क्योंकि कुछ भी कर लो आप आने वाली परिस्थिति को तो देख नहीं सकते। यदि भविष्य में आपके संकट ही लिखा है तो आने वाले संकट का सामना करने के लिए आप सावधानी की ढाल का तो उपयोग कर सकते हैं।
◇ विषपान करने के बाद भी महादेव देवों के देव महादेव कहलाते हैं? वहीं दूसरी ओर अमृतपान करने के पश्चात भी राहू और केतू असुर ही कहलाते हैं? क्यों?? इसका कारण है भाव। आपके कर्मों के पीछे जो आपका भाव है, अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये संसार किसी व्यक्ति को वहीं से तो जानता है, कर्मों के पीछे उसके भाव से। यदि कोई परोपकार करे और उसके पीछे भाव स्वार्थ का हो, तो वो परोपकारी मनुष्य अपने आप अपना महत्व खो देता है। यदि आपके कर्म के पीछे भाव उचित हो तो श्राप भी वरदान में परिवर्तित हो सकता है। यदि आपके कर्म का भाव अनुचित हो तो वरदान को श्राप का रूप लेने में अधिक समय नहीं लगता। ये सारा खेल है कर्मों का और भावों का।

















































