साश्चर्यस्यासमञ्जस्य कारणं किं भवेदहो।
न सामान्यं धियामेतज्ज्ञातव्यं तु प्रतीयते ॥१६॥
हेतुना सरहस्येन भवितव्यमिह ध्रुवम्।
हेतुमेनं तु विज्ञातुमिच्छास्माकं प्रजायते ॥१७॥
महाप्राज्ञो भवाँस्तत्ववेत्ता कालत्रयस्य च।
द्रष्टाऽमिवज्ञातगुह्यानां ज्ञाता ग्रन्थिं विमोचय ॥१८॥
इदं ज्ञातुं वयं सर्वे त्वातुराश्च समुत्सुका:।
अष्टावक्रस्य जिज्ञासां श्रुत्वा तु ब्रह्मज्ञानिन: ॥१९॥
महाप्राज्ञ: पिप्पलाद: गम्भीरं प्रश्नमन्वभूत्।
प्रशशंस च प्रश्नेऽस्मिन्नवदच्च ततःस्वयम्॥२०॥
टीका- इस आश्चर्य भरे असमंजस का क्या कारण हो सकता है, यह सामान्य बुद्धि की समझ से बाहर की बात है। इसके पीछे कोई रहस्यमय कारण होना चाहिए। इस कारण को जानने की हम सबको बड़ी इच्छा है। आप महाप्राज्ञ है, तत्ववेत्ता है त्रिकालदर्शी हैं अविज्ञात रहस्यों को समझने वाले हैं। कृपया इस गुत्थी को सुलझाइये। हम सब यह जानने के लिए आतुरतापूर्वक इच्छुक हैं। ब्रह्मज्ञानी अष्टावक्र जी की जिज्ञासा सुनकर महाप्राज्ञ पिप्पलाद ने प्रश्न की गम्भीरता अनुभव की। प्रश्न उभारने के लिए उन्हें सराहा और कहा॥१६-२०॥
व्याख्या- यदि यह प्रकरण सामान्य चर्चा से सुलझने जैसा होता तो प्रज्ञासत्र में इस जिज्ञासा को उठाये जाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। यह ऋषि-कालीन परम्परा है कि ऐसे असाधारण-मानवी गरिमा से जुड़े प्रश्नों पर तत्वज्ञान के मर्मज्ञ महाप्राज्ञों से समाधान पूछे जाते रहे हैं एवं तदनुसार अदृश्य, सूक्ष्म जगत में वातावरण बजाया जाता रहा है। जनक एवं याज्ञवस्थ्य तथा काकभुशुण्डि एवं गरुड़ सम्वाद भी इसी प्रयोजन से सम्पन्न हुए हैं। सूत-शौनक सम्वाद के माध्यम से आर्ष ग्रन्थकार ने कथोपकथन से अनेकानेक समस्याएँ उभारी व सुलझाई हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 40
न सामान्यं धियामेतज्ज्ञातव्यं तु प्रतीयते ॥१६॥
हेतुना सरहस्येन भवितव्यमिह ध्रुवम्।
हेतुमेनं तु विज्ञातुमिच्छास्माकं प्रजायते ॥१७॥
महाप्राज्ञो भवाँस्तत्ववेत्ता कालत्रयस्य च।
द्रष्टाऽमिवज्ञातगुह्यानां ज्ञाता ग्रन्थिं विमोचय ॥१८॥
इदं ज्ञातुं वयं सर्वे त्वातुराश्च समुत्सुका:।
अष्टावक्रस्य जिज्ञासां श्रुत्वा तु ब्रह्मज्ञानिन: ॥१९॥
महाप्राज्ञ: पिप्पलाद: गम्भीरं प्रश्नमन्वभूत्।
प्रशशंस च प्रश्नेऽस्मिन्नवदच्च ततःस्वयम्॥२०॥
टीका- इस आश्चर्य भरे असमंजस का क्या कारण हो सकता है, यह सामान्य बुद्धि की समझ से बाहर की बात है। इसके पीछे कोई रहस्यमय कारण होना चाहिए। इस कारण को जानने की हम सबको बड़ी इच्छा है। आप महाप्राज्ञ है, तत्ववेत्ता है त्रिकालदर्शी हैं अविज्ञात रहस्यों को समझने वाले हैं। कृपया इस गुत्थी को सुलझाइये। हम सब यह जानने के लिए आतुरतापूर्वक इच्छुक हैं। ब्रह्मज्ञानी अष्टावक्र जी की जिज्ञासा सुनकर महाप्राज्ञ पिप्पलाद ने प्रश्न की गम्भीरता अनुभव की। प्रश्न उभारने के लिए उन्हें सराहा और कहा॥१६-२०॥
व्याख्या- यदि यह प्रकरण सामान्य चर्चा से सुलझने जैसा होता तो प्रज्ञासत्र में इस जिज्ञासा को उठाये जाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। यह ऋषि-कालीन परम्परा है कि ऐसे असाधारण-मानवी गरिमा से जुड़े प्रश्नों पर तत्वज्ञान के मर्मज्ञ महाप्राज्ञों से समाधान पूछे जाते रहे हैं एवं तदनुसार अदृश्य, सूक्ष्म जगत में वातावरण बजाया जाता रहा है। जनक एवं याज्ञवस्थ्य तथा काकभुशुण्डि एवं गरुड़ सम्वाद भी इसी प्रयोजन से सम्पन्न हुए हैं। सूत-शौनक सम्वाद के माध्यम से आर्ष ग्रन्थकार ने कथोपकथन से अनेकानेक समस्याएँ उभारी व सुलझाई हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 40







































