बुधवार, 17 अप्रैल 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1 द्वितीयोSध्याय) श्लोक 16 से 20

साश्चर्यस्यासमञ्जस्य कारणं किं भवेदहो।
न सामान्यं धियामेतज्ज्ञातव्यं तु प्रतीयते ॥१६॥
हेतुना सरहस्येन भवितव्यमिह ध्रुवम्।
हेतुमेनं तु विज्ञातुमिच्छास्माकं प्रजायते ॥१७॥
महाप्राज्ञो भवाँस्तत्ववेत्ता कालत्रयस्य च।
द्रष्टाऽमिवज्ञातगुह्यानां ज्ञाता ग्रन्थिं विमोचय ॥१८॥
इदं ज्ञातुं वयं सर्वे त्वातुराश्च समुत्सुका:।
अष्टावक्रस्य जिज्ञासां श्रुत्वा तु ब्रह्मज्ञानिन: ॥१९॥
महाप्राज्ञ: पिप्पलाद: गम्भीरं प्रश्नमन्वभूत्।
प्रशशंस च प्रश्नेऽस्मिन्नवदच्च ततःस्वयम्॥२०॥

टीका- इस आश्चर्य भरे असमंजस का क्या कारण हो सकता है, यह सामान्य बुद्धि की समझ से बाहर की बात है। इसके पीछे कोई रहस्यमय कारण होना चाहिए। इस कारण को जानने की हम सबको बड़ी इच्छा है। आप महाप्राज्ञ है, तत्ववेत्ता है त्रिकालदर्शी हैं अविज्ञात रहस्यों को समझने वाले हैं। कृपया इस गुत्थी को सुलझाइये। हम सब यह जानने के लिए आतुरतापूर्वक इच्छुक हैं। ब्रह्मज्ञानी अष्टावक्र जी की जिज्ञासा सुनकर महाप्राज्ञ पिप्पलाद ने प्रश्न की गम्भीरता अनुभव की। प्रश्न उभारने के लिए उन्हें सराहा और कहा॥१६-२०॥

व्याख्या- यदि यह प्रकरण सामान्य चर्चा से सुलझने जैसा होता तो प्रज्ञासत्र में इस जिज्ञासा को उठाये जाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। यह ऋषि-कालीन परम्परा है कि ऐसे असाधारण-मानवी गरिमा से जुड़े प्रश्नों पर तत्वज्ञान के मर्मज्ञ महाप्राज्ञों से समाधान पूछे जाते रहे हैं एवं तदनुसार अदृश्य, सूक्ष्म जगत में वातावरण बजाया जाता रहा है। जनक एवं याज्ञवस्थ्य तथा काकभुशुण्डि एवं गरुड़ सम्वाद भी इसी प्रयोजन से सम्पन्न हुए हैं। सूत-शौनक सम्वाद के माध्यम से आर्ष ग्रन्थकार ने कथोपकथन से अनेकानेक समस्याएँ उभारी व सुलझाई हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 40

शनिवार, 13 अप्रैल 2019

👉 साधना से सिद्धि

प्रतिदिन प्रातःकाल अथवा सांयकाल एकान्त स्थान में चले जाओ। तुम्हारा चित्त चंचल या आकर्षित करने का कोई साधन न हो। शान्तचित से नेत्र मूँद कर बैठ जाओ। क्रमशः अपने मने की क्रियाओं का निरीक्षण करो। इन सब विचारों को एक-एक करके निकाल डालो, यहाँ तक कि तुम्हारे मन में कुछ भी न रहे। वह बिल्कुल साफ हो जाये। अब दृढ़तापूर्वक निम्न विचारों की पुनरावृति करो-

‘‘मैं आज से एक नवीन र्माग का अनुसरण कर रहा हूँ, पुराने त्रुटियों से भरे हुए जीवन को सदा र्सवदा के लिए छोड़ रहा हूँ। दोषपूर्ण जीवन से मेरा कोई सरोकार नहीं। वह मेरा वास्तविक स्वरूप कदापि नहीं था।’’

‘‘अब तक मैं शृंगार, देह पूजा, टीप-टाप में ही संलग्र रहता था। दूसरों के दोष निकालने, मजाक उड़ाने, त्रुटियों, कमजोरियों के निरीक्षण तथा आलोचना करने में रस लेता था, पर अब मैं इस अन्धकारमय कूप से निकल गया हूँ। अब मैं इन क्षुद्र उलझनों में नही पड़ सकता। ये अभद्र भ्रांतियाँ, रोग, दुःख, शोक आदि मेरी आत्मा में प्रवेश नहीं कर सकतीं। संसार की क्षणभंगुर वासना तरंगे अब मुझे पथ विचलित नहीं कर सकतीं।’’

‘‘मैं मिथ्या अभिमान में दूसरों की कुछ परवाह नहीं करता था, मदहोश था, अपने को ही कुछ समझता था, किन्तु आत्मा के अन्दर प्रवेश करने से मेरा मिथ्या गर्व चूर्ण हो गया है। मुझे अपने पूर्व कृत्यो पर हँसी आती है।’’

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 साधना से सिद्धि वाङमय क्रमांक-5 पृष्ठ-8.32

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

👉 जहाँ प्रेम है, वहाँ लक्ष्मी का वास है।

एक व्यापारी से लक्ष्मी जी रूठ गई। जाते वक्त बोली मैं जा रही हूँ और मेरी जगह टोटा (नुकसान) आ रहा है। तैयार हो जाओ। लेकिन मै तुम्हे अंतिम भेट जरूर देना चाहती हूँ। मांगो जो भी इच्छा हो।

बनिया बहुत समझदार था। उसने 🙏 विनती  की टोटा आए तो आने दो। लेकिन उससे कहना की मेरे परिवार में आपसी  प्रेम बना रहे। बस मेरी यही इच्छा है। लक्ष्मी जी ने तथास्तु कहा।

कुछ दिन के बाद :-

बनिए की सबसे छोटी बहू खिचड़ी बना रही थी। उसने नमक आदि डाला और अन्य  काम करने लगी। तब दूसरे लड़के की बहू आई और उसने भी बिना चखे नमक डाला और चली गई। इसी प्रकार तीसरी, चौथी बहुएं आई और नमक डालकर चली गई। उनकी सास ने भी ऐसा किया।

शाम को सबसे पहले बनिया  आया। पहला निवाला मुह में लिया। देखा बहुत ज्यादा नमक है। लेकिन वह समझ गया टोटा (हानि) आ चुका है। चुपचाप खिचड़ी खाई और चला गया। इसके बाद बङे बेटे का नम्बर आया। पहला निवाला मुह में लिया। पूछा पिता जी ने खाना खा लिया। क्या कहा उन्होंने?

सभी ने उत्तर दिया-" हाँ खा लिया, कुछ नही बोले।"
अब लड़के ने सोचा जब पिता जी ही कुछ नही बोले तो मै भी चुपचाप खा लेता हूँ।
इस प्रकार घर के अन्य सदस्य एक-एक आए। पहले वालो के बारे में पूछते और चुपचाप खाना खा कर चले गए।

रात को टोटा (हानि) हाथ जोड़कर बनिए से कहने लगा-,"मै जा रहा हूँ।"
बनिए ने पूछा- क्यों?

तब टोटा (हानि) कहता है, "आप लोग एक किलो तो नमक खा गए। लेकिन बिलकुल भी झगड़ा नही हुआ। मेरा यहाँ कोई काम नहीं।"

निचौङ

⭐ झगड़ा कमजोरी,  टोटा, नुकसान की पहचान है।

👏 जहाँ प्रेम है, वहाँ लक्ष्मी का वास है।

🔃 सदा प्या -प्रेम  बांटते रहे। छोटे-बङे की कदर करे।

जो बङे हैं, वो बङे ही रहेंगे। चाहे आपकी कमाई उसकी कमाई से बङी हो।

👉 आज का सद्चिंतन 12 April 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 April 2019


👉 शक्ति व स्वास्थ्य प्राप्त करो

इस प्रकार के कितने ही मनुष्य हैं जो दूसरों की भलाई करते हैं पर स्वयं अपना भला नहीं चाहते। वे न तो अपने शरीर और स्वास्थ्य की ही परवाह करते हैं और न अपनी शक्तियों का सदुपयोग। वे दूसरे के मित्र बनना चाहते हैं पर अपने शत्रु बने हुए हैं। दूसरों के साथ भलाई करना अच्छा है पर अपने साथ भलाई करना उससे भी अच्छा है। हर एक व्यक्ति का धर्म है कि मैं ईश्वर की सन्तान हूँ-उसी का प्रतीक हूँ।

ऐसे बहुत से मनुष्य हैं जो चाहें तो बहुत बड़े काम कर सकते हैं परन्तु कर नहीं पाते। उनका जीवन निराशा के झूले में झूलता हुआ उन छोटे कामों में ही व्यतीत हो जाता है। कारण यह है कि उनमें इतनी शक्ति नहीं रही कि वे अपनी कठिनाइयों को दूर कर सकें और विघ्न -बाधाओं को हटा सकें। उन्होंने अपने शरीर की रक्षा नहीं की है और इसी कारण उनका हृदय दुर्बल हो गया है तथा इन्द्रियाँ शिथिल पड़ गई हैं ज़रा ज़रा से कामों के करने पर वे थक जाते हैं।

हमारी शक्ति का बहुत बड़ा भाग क्रोधादि दुर्गुणों से नष्ट हो जाता है। शरीर को भस्म कर देने के लिये क्रोध से बढ़कर कोई चीज़ नहीं। क्रोधी मनुष्य रात-दिन अपने को जलाता रहता है । चिन्ता की उपमा चिता से होती है। ईर्ष्या, द्वेष, निन्दा, घृणा सब शरीर को घुलाने वाली हैं। इनसे मन और शरीर दोनों की अवनति होती है।

तुम्हारे जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य यह होना चाहिए कि अपनी शारीरिक और मानसिक शक्तियों को ऊंची से ऊंची बनाओ।

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1941 पृष्ठ 10

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 6)

HOW DOES CHITRAGUPTA MAINTAIN THE RECORD?

Let us take an example. In a remote, undeveloped tribal area, one may barter a kilogram of food grains for sugar, but in a developed country one has to pay in hard currency. In the material world, people do earn fame and name by making large contributions to charity, helping in popular welfare activities, joining religious or charitable institutions, delivering or listening to sermons, and participating in pilgrimages; but the “Domain of Chitragupta” does not accept this currency. The ledgers of this domain record only debits and credits of motives and emotional involvements in the performance of deeds and convert these into virtues and sins accordingly.

Upon being exhorted by his Divine Teacher Krishna, Arjun got millions killed in the war of Mahabharata. This great confrontation, during which the entire battlefield became littered with corpses, took place because Arjun agreed to take part in the war. In this way, Arjun could have been considered as a great sinner, but Chitragupta gave credit to his motive for waging the Mahabharata war. Arjun’s intentions were pious. He had fought only to re-establish the ‘Moral Order’ (Dharma Sthapana). Chitragupta’s ledger did not take into account the slain bodies of the dead soldiers. Physical objects have no relevance in the invisible realm.

Chitragupta simply ignored the number of toys of flesh and bones destroyed during the war. Does a king bother about the number of toys broken or the number of grains spilled? In this world billionaires are held in high regard but in the realm of Chitragupta they are paupers and nonentities. On the other hand a poor man of this world, if he is kind hearted, could be counted in the realm of Chitragupta amongst the king of kings. Whatever a man does, only his motives-good or bad are recorded in the corresponding account of Chitragupta. A public executioner, who, in course of duty, hangs a person condemned to death without any malice, could be considered a virtuous person by Chitragupta, Whereas a priest, who meticulously follows the rituals, but is secretly engaged in corrupt practices will be labelled as a sinner.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 13

👉 आत्मचिंतन के क्षण 12 April 2019

★ स्पष्ट है कि मनेाबल छोटी-छोटी सफलताएँ प्राप्त करते-करते विकसित होता है। वह आसमान से किसी पर नहीं टपकता। छोटे कदम, छोटे प्रयोग, छोटी सफलता का क्रम चलता रहे तो मनुष्य क्रमशः अधिक आत्म विश्वासी बनता जाता है और इस आधार पर विकसित हुई प्रतिभा के सहारे अपने शरीर तंत्र के मनःसंस्थान के हर कलपुर्जे को क्रिया-कुशल बनाकर सचमुच इस स्थिति में जा पहुँचता है कि उसे अतिरिक्त शक्ति संपन्न, असाधारण महत्त्व एवं सामर्थ्य का व्यक्ति समझा जा सके।

◆ अगर हम चाहते हैं कि बच्चा हमारा आज्ञाकारी बने, जो बात हम कहें वह उसकी उपयोगिता को समझे-स्वीकार करे तथा उसी के अनुसार आचरण करे तो हमें पहले उसका श्रद्धास्पद बनना होगा। बालकों के लिए श्रद्धेय बनने का एकमात्र उपाय है-मधुर स्नेह की अभिव्यक्ति। जोर-जबर्दस्ती से बच्चे आपके आदेश को मान लेंगे, उस समय वैसा आचरण भी कर लेंगे, पर जोर-जबर्दस्ती का जो एहसास उन्हें रहेगा वह उनके मन में आपके प्रति विद्रोह के बीच बोयेगा। यह विद्रोह आगे चलकर बड़ा होने पर फूटेगा।

◇ वाणी से असत्य वचन, चापलूसी, परनिन्दा, कटुभाषण, व्यर्थ वार्तालाप का त्याग करना चाहिए, क्योंकि ये अशुभ और अनैतिक हैं। इनसे जीवन में कलह, पश्चाताप, लड़ाई-झगड़े, अशान्ति पैदा हो सकते हैं। परस्पर संबंध खराब हो जाते हैं। उन सभी दृश्यों तथा प्रसंगों से दूर रहें जिनसे दूषित मनोभावों, वासनाओं को पोषण मिलता हो। मनुष्य जो कुछ भी देखता है उसकी प्रतिक्रिया मन पर होती है। उस दृश्य से संबंधित जो वासना मन में होती है, वह प्रबल हो उठती है और मनुष्य को वैसा ही करने की प्रेरणा देती है।

■ निराश कभी मत होइए। उन्नति के लिए, अच्छी आदतों के लिए, अपने शुभ संकल्पों की सिद्धि के लिए सतत प्रयत्न करते रहिए। बार-बार प्रयत्न करने से ही आपको उत्साह मिलेगा, सफलता मिलेगी। आपके कठिन कार्य सरल होते जायेंगे। प्रत्येक प्रत्यन, आपकी प्रत्येक छोटी-सी सफलता आपका आत्मबल बढ़ाने वाली है। भविष्य में आप कठिनतर कार्य भी हँसते-हँसते कर सकेंगे। अपने शुभ संकल्पों की सिद्धि के लिए सावधान रहकर प्रयत्न करना भी  है। अति आवश्यक है। इस आत्मबल की आवश्यकता हम सबको  है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1 द्वितीयोSध्याय) श्लोक 14 से 15

उच्चादर्शाय संसृष्टौ मानवो यदि जीवति।
तिरश्चां प्राणिनां हेयस्तरेण मनसा तथा ॥१४॥
अनात्माचरणं कुर्यान्सृष्टिसन्तुलनं तथा।
विकुर्याद् महदाश्चर्यं चिन्ताया विषयस्तथा॥१५॥

टीका- उच्च प्रयोजनों के लिए सृजा गया मनुष्य तिर्यक् योनियों में रहने वाले प्राणियों सभी अधिक हेय स्तर की मनःस्थिति रखे, अनात्म आचरण करे और सृष्टि सन्तुलन बिगाड़े तो सचमुच ही यह बड़े आश्चर्य और चिन्ता की बात है ॥१४-१५॥

व्याख्या- सोचा यह था कि मनुष्य अपने को श्रेष्ठता से जोड़े रहेगा, अन्य जीवधारियों के लिए एक आदर्श उदाहरण बनेगा पर स्थिति कुछ विचित्र एवं चिन्ताजनक भी है।

विवेक चूड़ामणि में यह स्पष्ट करते हुए कि मनुष्य भ्रष्ट आचरण की ओर कब प्रवृत्त होता है, संकेत करते हुए कहा गया है-

शब्दादिभि: पञ्चभिरेव पञ्च, पञ्चत्वमापु: स्वगुणेनबद्धा:।
कुरंगमातंगपतंगमीनभृंग नर: पञ्चभिरञ्चित: किम्॥

अर्थात्- 'हिरण, हाथी, पतिंगा, मछली और भौंरा-ये अपने-अपने स्वभाव के कारण शब्दादि पाँच विषयों में से केवल एक-एक से आसक्त होने के कारण मृत्यु को प्राप्त होते हैं, तो फिर इन पाँचों विषयों में जकड़ा हुआ, असंयमी पुरुष कैसे बच सकता है। उसकी तो दुर्गति सुनिश्चित ही है।

अन्य जीवधारियों के समान यदि मनुष्य भी शिश्नोदर परायण रहकर अपना आचरण व चिन्तन बिगाड़ ले तो फिर यह मानना चाहिए कि वह धरती पर इस योनि में अवतरित होकर भी दुर्भाग्यशाली ही बना रहा। आज मानव की उपभोग की ललक व सुख साधना अर्जित करने की एकांगी घुड़दौड़ ने यह भुला दिया कि इस तथाकथित प्रगति और सभ्यता का सृष्टि संतुलन पर क्या असर पडे़गा। उच्छृंखल भौतिकवाद अनियन्त्रित दानव की तरह अपने पालने वाले का ही वह भक्षण कर रहा है। पर्यावरण, असंतुलन और अदृश्य जगत में संव्याप्त हाहाकार मानव की स्वयं की संरचना है जो आस्था संकट के रूप में प्रकट हुआ है और जिसकी प्रतिक्रिया विभिन्न विभीषिकाओं के रूप में मानव जाति को भुगतनी पड़ रही है। इतिहास का अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि ऐसे उदाहरण पहले भी हुए हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 39

गुरुवार, 11 अप्रैल 2019

👉 मैं खुद बदलूँगा। दुनिया तभी बदलेगी।।

एक दिन सारे कर्मचारी जब ऑफिस पहुंचे तो उन्हें गेट पर एक बड़ा-सा नोटिस लगा दिखा:--

'इस कंपनी में अभी तक जो व्यक्ति आपको आगे बढ़ने से रोक रहा था कल उसकी मृत्यु हो गई।
हम आपको उसे आखिरी बार देखने का मौका दे रहे हैं,
कृपया बारी-बारी से मीटिंग हॉल में जाएं और उसे देखने का कष्ट करें।'

जो भी नोटिस पढ़ता उसे पहले तो दुख होता
...लेकिन फिर जिज्ञासा होती कि आखिर वो कौन था, जिसने उसकी ग्रोथ रोक रखी थी... ??

और वो हॉल की तरफ चल देता...।

देखते-देखते हॉल के बाहर काफी भीड़ इकठ्ठा हो गई |
गार्ड ने सभी को रोक रखा था और उन्हें एक-एक करके अंदर जाने दे रहा था।

सबने देखा कि अंदर जाने वाला व्यक्ति काफी गंभीर होकर बाहर निकलता,
मानो उसके किसी करीबी की मृत्यु हुई हो!

इस बार अंदर जाने की बारी एक पुराने कर्मचारी की थी...
उसे सब जानते थे। सबको पता था कि उसे हर एक चीज़ से शिकायत रहती है।
कंपनी से, सहकर्मियों से,
वेतन से, तरक्की से,
हर एक चीज़ से !!

...पर आज वो थोड़ा खुश लग रहा था!!

उसे लगा कि चलो जिसकी वजह से उसकी लाइफ में इतनी समस्या थीं वो गुज़र गया।

अपनी बारी आते ही वो तेज़ी से ताबूत के पास पहुंचा और बड़ी जिज्ञासा से उचक कर अंदर झांकने लगा।

पर यह क्या...!!!

अंदर तो एक बड़ा-सा आईना रखा हुआ था....

यह देख वह कर्मचारी क्रोधित हो उठा और जोर से चिल्लाने को हुआ,

तभी उसे आईने के बगल में एक संदेश लिखा दिखा--!

"इस दुनिया में केवल एक ही व्यक्ति है जो आपकी ग्रोथ... आपकी उन्नति... आपकी तरक्की रोक सकता है...

...और वो आप खुद हैं !!"

इस पूरे संसार में आप वो अकेले व्यक्ति हैं,
जो आपकी जिंदगी में क्रांति ला सकते हैं।

आपकी जिंदगी तब नहीं बदलती...
जब आपका बॉस बदलता है,
जब आपके दोस्त बदलते हैं,
जब आपके पार्टनर बदलते हैं, या
जब आपकी कंपनी बदलती है...।

ज़िंदगी तब बदलती है, जब हम बदलते हैं;
जब हम अपनी सीमित सोच तोड़ते हैं,
जब हम इस बात को रियलाइज करते हैं कि अपनी जिंदगी के लिए सिर्फ़ और सिर्फ हम ज़िम्मेदार हैं।

मैं खुद बदलूँगा। दुनिया तभी बदलेगी।।🙏🙏

मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

👉 दया और सौम्यता

पति ने पत्नी को किसी बात पर तीन थप्पड़ जड़ दिए, पत्नी ने इसके जवाब में अपना सैंडिल पति की तरफ़ फेंका, सैंडिल का एक सिरा पति के सिर को छूता हुआ निकल गया।

मामला रफा-दफा हो भी जाता, लेकिन पति ने इसे अपनी तौहिनी समझी, रिश्तेदारों ने मामला और पेचीदा बना दिया, न सिर्फ़ पेचीदा बल्कि संगीन, सब रिश्तेदारों ने इसे खानदान की नाक कटना कहा, यह भी कहा कि पति को सैडिल मारने वाली औरत न वफादार होती है न पतिव्रता।

इसे घर में रखना, अपने शरीर में मियादी बुखार पालते रहने जैसा है। कुछ रिश्तेदारों ने यह भी पश्चाताप जाहिर किया कि ऐसी औरतों का भ्रूण ही समाप्त कर देना चाहिए।

बुरी बातें चक्रवृत्ति ब्याज की तरह बढ़ती है, सो दोनों तरफ खूब आरोप उछाले गए। ऐसा लगता था जैसे दोनों पक्षों के लोग आरोपों का वॉलीबॉल खेल रहे हैं। लड़के ने लड़की के बारे में और लड़की ने लड़के के बारे में कई असुविधाजनक बातें कही।
मुकदमा दर्ज कराया गया। पति ने पत्नी की चरित्रहीनता का तो पत्नी ने दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया। छह साल तक शादीशुदा जीवन बीताने और एक बच्ची के माता-पिता होने के बाद आज दोनों में तलाक हो गया।

पति-पत्नी के हाथ में तलाक के काग़ज़ों की प्रति थी।
दोनों चुप थे, दोनों शांत, दोनों निर्विकार।
मुकदमा दो साल तक चला था। दो साल से पत्नी अलग रह रही थी और पति अलग, मुकदमे की सुनवाई पर दोनों को आना होता। दोनों एक दूसरे को देखते जैसे चकमक पत्थर आपस में रगड़ खा गए हों।

दोनों गुस्से में होते। दोनों में बदले की भावना का आवेश होता। दोनों के साथ रिश्तेदार होते जिनकी हमदर्दियों में ज़रा-ज़रा विस्फोटक पदार्थ भी छुपा होता।

लेकिन कुछ महीने पहले जब पति-पत्नी कोर्ट में दाखिल होते तो एक-दूसरे को देख कर मुँह फेर लेते। जैसे जानबूझ कर एक-दूसरे की उपेक्षा कर रहे हों, वकील औऱ रिश्तेदार दोनों के साथ होते।

दोनों को अच्छा-खासा सबक सिखाया जाता कि उन्हें क्या कहना है। दोनों वही कहते। कई बार दोनों के वक्तव्य बदलने लगते। वो फिर सँभल जाते।
अंत में वही हुआ जो सब चाहते थे यानी तलाक ................

पहले रिश्तेदारों की फौज साथ होती थी, आज थोड़े से रिश्तेदार साथ थे। दोनों तरफ के रिश्तेदार खुश थे, वकील खुश थे, माता-पिता भी खुश थे।

तलाकशुदा पत्नी चुप थी और पति खामोश था।
यह महज़ इत्तेफाक ही था कि दोनों पक्षों के रिश्तेदार एक ही टी-स्टॉल पर बैठे , कोल्ड ड्रिंक्स लिया।
यह भी महज़ इत्तेफाक ही था कि तलाकशुदा पति-पत्नी एक ही मेज़ के आमने-सामने जा बैठे।

लकड़ी की बेंच और वो दोनों .......
''कांग्रेच्यूलेशन .... आप जो चाहते थे वही हुआ ....'' स्त्री ने कहा।
''तुम्हें भी बधाई ..... तुमने भी तो तलाक दे कर जीत हासिल की ....'' पुरुष बोला।

''तलाक क्या जीत का प्रतीक होता है????'' स्त्री ने पूछा।
''तुम बताओ?''
पुरुष के पूछने पर स्त्री ने जवाब नहीं दिया, वो चुपचाप बैठी रही, फिर बोली, ''तुमने मुझे चरित्रहीन कहा था....
अच्छा हुआ.... अब तुम्हारा चरित्रहीन स्त्री से पीछा छूटा।''
''वो मेरी गलती थी, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था'' पुरुष बोला।
''मैंने बहुत मानसिक तनाव झेली है'', स्त्री की आवाज़ सपाट थी न दुःख, न गुस्सा।

''जानता हूँ पुरुष इसी हथियार से स्त्री पर वार करता है, जो स्त्री के मन और आत्मा को लहू-लुहान कर देता है... तुम बहुत उज्ज्वल हो। मुझे तुम्हारे बारे में ऐसी गंदी बात नहीं करनी चाहिए थी। मुझे बेहद अफ़सोस है, '' पुरुष ने कहा।

स्त्री चुप रही, उसने एक बार पुरुष को देखा।
कुछ पल चुप रहने के बाद पुरुष ने गहरी साँस ली और कहा, ''तुमने भी तो मुझे दहेज का लोभी कहा था।''
''गलत कहा था''.... पुरुष की ओऱ देखती हुई स्त्री बोली।
कुछ देर चुप रही फिर बोली, ''मैं कोई और आरोप लगाती लेकिन मैं नहीं...''

प्लास्टिक के कप में चाय आ गई।
स्त्री ने चाय उठाई, चाय ज़रा-सी छलकी। गर्म चाय स्त्री के हाथ पर गिरी।
स्सी... की आवाज़ निकली।
पुरुष के गले में उसी क्षण 'ओह' की आवाज़ निकली। स्त्री ने पुरुष को देखा। पुरुष स्त्री को देखे जा रहा था।
''तुम्हारा कमर दर्द कैसा है?''
''ऐसा ही है कभी वोवरॉन तो कभी काम्बीफ्लेम,'' स्त्री ने बात खत्म करनी चाही।

''तुम एक्सरसाइज भी तो नहीं करती।'' पुरुष ने कहा तो स्त्री फीकी हँसी हँस दी।
''तुम्हारे अस्थमा की क्या कंडीशन है... फिर अटैक तो नहीं पड़े????'' स्त्री ने पूछा।
''अस्थमा।डॉक्टर सूरी ने स्ट्रेन... मेंटल स्ट्रेस कम करने को कहा है, '' पुरुष ने जानकारी दी।

स्त्री ने पुरुष को देखा, देखती रही एकटक। जैसे पुरुष के चेहरे पर छपे तनाव को पढ़ रही हो।
''इनहेलर तो लेते रहते हो न?'' स्त्री ने पुरुष के चेहरे से नज़रें हटाईं और पूछा।
''हाँ, लेता रहता हूँ। आज लाना याद नहीं रहा, '' पुरुष ने कहा।

''तभी आज तुम्हारी साँस उखड़ी-उखड़ी-सी है, '' स्त्री ने हमदर्द लहजे में कहा।
''हाँ, कुछ इस वजह से और कुछ...'' पुरुष कहते-कहते रुक गया।
''कुछ... कुछ तनाव के कारण,'' स्त्री ने बात पूरी की।

पुरुष कुछ सोचता रहा, फिर बोला, ''तुम्हें चार लाख रुपए देने हैं और छह हज़ार रुपए महीना भी।''
''हाँ... फिर?'' स्त्री ने पूछा।
''वसुंधरा में फ्लैट है... तुम्हें तो पता है। मैं उसे तुम्हारे नाम कर देता हूँ। चार लाख रुपए फिलहाल मेरे पास नहीं है।'' पुरुष ने अपने मन की बात कही।

''वसुंधरा वाले फ्लैट की कीमत तो बीस लाख रुपए होगी??? मुझे सिर्फ चार लाख रुपए चाहिए....'' स्त्री ने स्पष्ट किया।
''बिटिया बड़ी होगी... सौ खर्च होते हैं....'' पुरुष ने कहा।
''वो तो तुम छह हज़ार रुपए महीना मुझे देते रहोगे,'' स्त्री बोली।
''हाँ, ज़रूर दूँगा।''
''चार लाख अगर तुम्हारे पास नहीं है तो मुझे मत देना,'' स्त्री ने कहा।
उसके स्वर में पुराने संबंधों की गर्द थी।

पुरुष उसका चेहरा देखता रहा....
कितनी सह्रदय और कितनी सुंदर लग रही थी सामने बैठी स्त्री जो कभी उसकी पत्नी हुआ करती थी।
स्त्री पुरुष को देख रही थी और सोच रही थी, ''कितना सरल स्वभाव का है यह पुरुष, जो कभी उसका पति हुआ करता था। कितना प्यार करता था उससे...

एक बार हरिद्वार में जब वह गंगा में स्नान कर रही थी तो उसके हाथ से जंजीर छूट गई। फिर पागलों की तरह वह बचाने चला आया था उसे। खुद तैरना नहीं आता था लाट साहब को और मुझे बचाने की कोशिशें करता रहा था... कितना अच्छा है... मैं ही खोट निकालती रही...''

पुरुष एकटक स्त्री को देख रहा था और सोच रहा था, ''कितना ध्यान रखती थी, स्टीम के लिए पानी उबाल कर जग में डाल देती। उसके लिए हमेशा इनहेलर खरीद कर लाती, सेरेटाइड आक्यूहेलर बहुत महँगा था। हर महीने कंजूसी करती, पैसे बचाती, और आक्यूहेलर खरीद लाती। दूसरों की बीमारी की कौन परवाह करता है? ये करती थी परवाह! कभी जाहिर भी नहीं होने देती थी। कितनी संवेदना थी इसमें। मैं अपनी मर्दानगी के नशे में रहा। काश, जो मैं इसके जज़्बे को समझ पाता।''

दोनों चुप थे, बेहद चुप।
दुनिया भर की आवाज़ों से मुक्त हो कर, खामोश।
दोनों भीगी आँखों से एक दूसरे को देखते रहे....

''मुझे एक बात कहनी है, '' उसकी आवाज़ में झिझक थी।
''कहो, '' स्त्री ने सजल आँखों से उसे देखा।
''डरता हूँ,'' पुरुष ने कहा।
''डरो मत। हो सकता है तुम्हारी बात मेरे मन की बात हो,'' स्त्री ने कहा।
''तुम बहुत याद आती रही,'' पुरुष बोला।
''तुम भी,'' स्त्री ने कहा।
''मैं तुम्हें अब भी प्रेम करता हूँ।''
''मैं भी.'' स्त्री ने कहा।

दोनों की आँखें कुछ ज़्यादा ही सजल हो गई थीं।
दोनों की आवाज़ जज़्बाती और चेहरे मासूम।
''क्या हम दोनों जीवन को नया मोड़ नहीं दे सकते?'' पुरुष ने पूछा।
''कौन-सा मोड़?''
''हम फिर से साथ-साथ रहने लगें... एक साथ... पति-पत्नी बन कर... बहुत अच्छे दोस्त बन कर।''

''ये पेपर?'' स्त्री ने पूछा।
''फाड़ देते हैं।'' पुरुष ने कहा औऱ अपने हाथ से तलाक के काग़ज़ात फाड़ दिए। फिर स्त्री ने भी वही किया। दोनों उठ खड़े हुए। एक दूसरे के हाथ में हाथ डाल कर मुस्कराए। दोनों पक्षों के रिश्तेदार हैरान-परेशान थे। दोनों पति-पत्नी हाथ में हाथ डाले घर की तरफ चले गए। घर जो सिर्फ और सिर्फ पति-पत्नी का था।।

पति पत्नी में प्यार और तकरार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जरा सी बात पर कोई ऐसा फैसला न लें कि आपको जिंदगी भर अफसोस हो।।

👉 आज का सद्चिंतन 9 April 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 April 2019


👉 धर्म का आचरण (अन्तिम भाग)

जो मनुष्य कहता है कि मैं कहूँ वह सच है और सब मिथ्या है यह कभी विश्वास योग्य नहीं। एक धर्म सच है तो अन्य धर्म क्योंकर मिथ्या हो सकते हैं? जो परम सहिष्णु और मानव जाति पर प्रेम करे वही सच्चा साधु समझना चाहिए। परमेश्वर हमारा पिता और हम सब भाई हैं, यही भावना मनुष्य को उन्नत बना सकती है। यदि कोई जन्म से अज्ञान है तो क्या उसका कर्त्तव्य ज्ञान सम्पादन करने का नहीं है? वह यों कहे कि हम जन्म से मूर्ख हैं तो अब क्यों ज्ञानी बनें । तो सब उसे महामूर्ख कहेंगे। यदि हमारे संकुचित विचार हों तो उन्हें महान बनाना क्या हमारे लिये कोई अपमान की बात है? धर्मोपासना के विशिष्ट स्थान, निश्चित और खास विधि धर्म-ग्रन्थों में बताये हैं, उनके लिये एक दूसरों का उपहास करना क्या कोई बुद्धिमानी है।

ये तो बालकों के खिलौनों की तरह हैं। ज्ञान होने पर बालक उन खिलौनों की जिस प्रकार परवाह नहीं करते, उसी प्रकार ईश्वर तक पहुँचे हुए लोगों को उक्त साधनों का महत्व नहीं प्रतीत होता किसी खास मत पन्थों को बिना जाने बूझे ज्ञान होने पर भी मानते रहना, बचपन का कुरता युवावस्था में पहनने की इच्छा करने के बराबर उपहास के योग्य है। मैं किसी धर्म पन्थ का विरोधी नहीं हूं और न मुझे उनकी अनावश्यकता ही प्रतीत होती है। पर यह देखकर हँसी रोके से भी नहीं रुकती कि कुछ लोग स्वयं जिस धर्म के रहस्यों को नहीं जानते उसे वे यदि अपना अमूल्य समय इस अध्याषारेघु व्यौपार के बदले उन्हीं तत्वों के जानने में लगावें तो क्या ही अच्छा हो?

अनेक धर्मपन्थ उन्हें क्यों खटकते हैं सो मेरी समझ में नहीं आता ! लोग अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार धर्म का अनुसरण करें तो किसी का क्या बिगड़ेगा? रह एक व्यक्ति के लिये स्वतन्त्र धर्म हो तो भी मेरी समझ में कोई हानि नहीं किन्तु लाभ ही । क्योंकि विविधता से संसार की सुन्दरता बढ़ती है। उदर तृप्ति के लिये अन्न की आवश्यकता है, परन्तु एक ही रस की अपेक्षा अनेक रसों के विविध पदार्थ होने से भोजन में अधिक रुचि आती है। कोई ग्रामीण, जिसे तरह-तरह के पदार्थ मत्सर नहीं और जो केवल रोटी तथा प्याज के टुकड़े से पेट भर लेता है यदि किसी शौकीन के खाने के नाना पदार्थ की निन्दा करे तो वह खुद जिस प्रकार उपहास के पात्र होगा, उसी प्रकार एक ही धर्मविधि के पीछे लगे हुए दूसरे धर्मों की निन्दा करने वाले लोग स्तुति के पात्र नहीं हो सकते।

स्वामी विवेकानन्द जी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1941 पृष्ठ 10

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 5)

HOW DOES CHITRAGUPTA MAINTAIN THE RECORD?

In human society, there are two departments for punishing the violators of law- namely the police and the court of justice. The police arrest the accused, collect the evidence and present these in the court of law. Thereafter the process of justice takes over. The judge delivers the judgement after considering all aspects of the offence and related circumstances. Depending on the circumstantial evidence, individuals are handed down varied sentences for the same type of offence. Let us consider an example. Three persons are accused of killing a person. Because of different circumstances associated with the crime, one is set free, the second person is sentenced to five years of imprisonment and the third is sent to the electric chair.

The person, who was released, was a mason. While working at an elevated label, he had accidentally dropped a brick, which killed a passer by. The presiding judge found that the brick was dropped accidentally and unintentionally, without an ulterior motive. Hence the accused was released without punishment. The second accused was a farmer. Finding a thief stealing his crop, he had given him a fatal blow, killing the offender. Taking the circumstances, which prompted the offence, the judge considered that though it was natural for the farmer to show his anger on finding someone stealing his property, nevertheless, since he had over-reacted to a small offence, a sentence of five years imprisonment was given. The third person was a notorious robber who had robbed a rich man and intentionally killed him in the process. In this way the worldly court of justice pronounces judgement after minutely examining all circumstantial evidences.

In the inner-mind the secret recordings of Chitragupta discharge the dual responsibility of the police and court of justice. In the material world, if the prosecutor presents inadequate or false evidence, the judgement of the court is likely to be unfair, but in the inner occult world there is absolutely no possibility of such miscarriage of justice. The inmost mind, being the direct and transparent witness to all physical as well as mental activities of a person, is wholestically aware of the intentions, motives and circumstances of each and every action. Being wholestically informed, the secret mind does not require the testimony of the external mind to arrive at a conclusion. In Divine Justice the gravity of a sin (vice) or merit of a virtue is decided on the basis of the motive and degree of emotional involvement with the deed. Whereas in the material world objects are measured materially on the basis of their mundane worth, this measure is irrelevant for dispensing Divine Justice. The material world may ignore a poor donor of ten cents and admire a person donating ten thousand dollars, but in Divine Jurisprudence the worth of such acts of altruism will not be assessed on this gross physical basis.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 12

👉 आत्मचिंतन के क्षण 9 April 2019

★ समर्पण की सच्ची साधना है- अंतःकरण में न कोई छल, न छद्म। अपनी बौद्धिक क्षमताएँ, यश, सक्रियता, प्रगति सब ध्येय के प्रति अर्पित हों।  यह सौभाग्य जिन प्रयोजनों को मिल जाते हैं, चाहे वे सांसारिक हों या आध्यात्मिक, उनकी सफलता की आधी मंजिल तत्काल पूर्ण हो जाती है। साथ ही उस समर्पित आत्मा को ईश्वरीय सान्न्ध्यि का एक ऐसा दिव्य लाभ इसी साधना से मिल जाता है, जिसके लिए योगाभ्यास और जन्म-जन्मांतरों के दोष-परिमार्जन की एक कठिन  और लम्बी साधना पूरी करनी पड़ती।

◆ ज्ञानयोग की साधना यह है कि मस्तिष्कीय गतिविधियों पर-विचारधाराओं पर विवेक का आधिपत्य स्थापित किया जाय। चाहे जो कुछ सोचने की छूट न हो। चाहे जिस स्तर की चिंतन प्रक्रिया अपनाने न दी जाय। औचित्य-केवल औचित्य-मात्र औचित्य ही चिंतन का आधार हो सकता है। यह निर्देश मस्तिष्क को लाख बार समझाया जाय और उसे सहमत अथवा बाध्य किया जाय कि इसके अतिरिक्त उसे और किसी अनुपयुक्त प्रवाह में बह चलने की छूट न मिल सकेगी।

◇ नियति क्रम से हर वस्तु का-हर व्यक्ति का अवसान होता है। मनोरथ और प्रयास भी सर्वदा सफल कहाँ होते हैं। यह सब अपने ढंग से चलता रहे, पर मनुष्य भीतर से टूटने न पाये इसी में उसका गौरव है। जैसे समुद्र तट पर जमी हुई चट्टानें चिर अतीत से अपने स्थान पर जमी अड़ी बैठी हैं। हिलोरों ने अपना टकराना बंद नहीं किया सो ठीक है, पर यह भी कहाँ गलत है कि चट्टान ने हार नहीं मानी। न हमें टूटना चाहिए और न हार माननी चाहिए।

■ वर्तमान ही हमारा है। हमें तो पहले आज की परवाह करनी चाहिए। यह सुंदर सुहावना आज, यह उल्लासपूर्ण आज ही हमारी अमूल्य निधि है। यह आज ही हमारे हाथ में है। यह हमारा साथी है। इस आज की ही प्रतिष्ठा कीजिए। आज के साथ खूब खेलिए, कूदिए, मस्त रहिए और इसे अधिकाधिक उत्साहपूर्ण और उल्लासपूर्ण बनाइए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1 द्वितीयोSध्याय) श्लोक 9 से 13

सत्ये युगे नरा: सर्वे सुसंस्कृतसमुन्नतम्।
देवजीवनपद्धत्या जीवन्ति स्म, धरामिमाम्॥९॥
स्वर्ग्येणैव तु दिव्येन वातावरणकेन ते।
भरितां विदधानाश्च विचरन्ति, कथं पुन:?॥१०॥
कारणं किं समुत्पन्नं पातगर्ते यथाऽपतन्।
साम्प्रतीकीं स्थितिं दीनां गता: सर्वे यतो मुने॥११॥
दुर्धर्षायां विपत्तौ तु विग्रहे वाप्युस्थिते।
उत्पद्यते विवशता नैतदस्ति तु साम्प्रतम्॥१२॥
सामान्यं दिनचर्याया: क्रमश्चलति मानवा:।
शक्तिसाधनसम्पन्ना: पातगर्ते पतन्ति किम्?॥१३॥

टीका- सतयुग में सभी मनुष्य समुन्नत सुसंस्कृत स्तर का देव जीवन जीते थे और इस धरती को स्वर्ग जैसे दिव्य वातावरण से भरा-पूरा रखते थे। फिर क्या कारण हुआ जिससे लोग पतन के गर्त में गिरे और आज जैसी दयनीय स्थिति में जा पहुँचे। कोई दुर्धर्ष-विपत्ति-विग्रह आने पर विवशता उत्पन्न हो सकती है किन्तु सामान्य-क्रम चलते रहने पर भी शक्ति-साधनों से सम्पन्न मनुष्य अधःपतन के गर्त में क्यों गिरते जा रहे है

व्याख्या- ऐसी बात नहीं कि जब से मनुष्य को यह जन्म मिला हैं-सृष्टि की उत्पत्ति व विकास हुआ है-यह हेय स्तर का ही जीवन जीता आया है। मानव सतयुग में सभ्य-सुसंस्कृत जीवन भी जी चुका है। श्रेष्ठता की उसे ऊँचाई पर पहुँचकर फिर जीचे गिर पड़ना कहाँ तक उचित माना जायेगा? होना तो यह था कि आज स्थिति सतयुग से भी श्रेष्ठ स्तर की स्वर्गोपम होती। परन्तु ऋषि पाते हैं कि प्रस्तुत परिस्थितियाँ तो नारकीय स्थिति से भी गयी बीती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 39

सोमवार, 8 अप्रैल 2019

👉 धर्म का आचरण (भाग 1)

आप यह अच्छी तरह समझ रक्खें कि किसी धर्म-पुस्तक का पाठ करने अथवा उसमें लिखी हुई धर्म विधियों की कवायद करने से ही कोई धार्मिक नहीं हो सकता। किसी धर्म या धर्म-पुस्तक पर विश्वास करने से ही यह ‘जन्म सार्थक नहीं होगा’ उसमें बताये हुए मार्गों का अनुभव करना चाहिये। ‘जिनका अन्तःकरण पवित्र है, वे धन्य हैं, वे ईश्वर को देख सकेंगे ।’ यह बाइबिल का कथन अक्षरशः सत्य है। परमेश्वर का साक्षात्कार करना ही मुक्ति है। कुछ मन्त्र रट लेने या मन्दिरों में शब्दाडम्बर करने से मुक्ति नहीं मिलती,परमात्मा की प्राप्ति के लिए बाह्य साधन कुछ काम नहीं आते, उसके लिये आन्तरिक सामग्री की जरूरत है। इससे कोई यह न समझलें कि बाहरी साधनों का मैं विरोधी हूँ। आरम्भ में उनकी आवश्यकता होती ही है पर साधक जैसा-जैसा उन्नत होता है, वैसी-वैसी उसकी उस ओर से प्रवृत्ति कम हो चलती है, आप यह निश्चय समझें कि किसी पुस्तक ने ईश्वर को उत्पन्न नहीं किया किन्तु ईश्वर की प्रेरणा से धर्म पुस्तकों की रचना हुई है।

यही बात जीवात्मा और परमात्मा का ऐक्य कर देने का है। यही विश्वधर्म है। कल्पना और मार्ग भिन्न 2 होने पर भी सबका केन्द्र एक ही है। सब धर्मों का मूल्य क्या है? ऐसा यदि कोई मुझ से प्रश्न करे तो मैं उसे यही उत्तर दूँगा कि ‘आत्मा की परमात्मा से एकता कर देना ही सब धर्मों का मूल है। सच्ची दृष्टि से छाया के समान देख पड़ने वाले और इंद्रियों से अनुभव होने वाले इस जगत में जिस दिन परमात्मा का अनुभव कर लेंगे उसी दिन हम कृतकार्य होंगे तब हमको इस बात के विचार करने की आवश्यकता न होगी कि हमें यह दसा किस मार्ग से प्राप्त हुई है। आप चाहे किसी मत को स्वीकार करें, या न करें किसी मत या पन्थ के कहावें या न कहावें परमेश्वर का अस्तित्व अपने आप में अनुभव करने से ही आपका काम बन जायगा।

कोई मनुष्य संसार के सब धर्मों पर विश्वास करता होगा, संसार के सब धर्म ग्रन्थ उसे कंठस्थ होंगे, संसार के सब तीर्थों में उसने स्नान किया होगा । तो भी यह सम्भव नहीं है कि परमात्मा की स्पष्ट कल्पना भी उसके हृदय में हो ! इसके विपरीत सारे जीवन में जिसने एक भी मन्दिर या धर्मग्रन्थ नहीं देखा और न उसमें लिखी कोई विधि ही की होगी, ऐसा पुरुष परमात्मा का अनुभव अन्तःकरण में करता हुआ देख पड़ना सम्भव है।

स्वामी विवेकानन्द जी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1941 पृष्ठ 9

रविवार, 7 अप्रैल 2019

👉 26 साल के इंजिनियर ने नौकरी छोड़ जिंदा किए मरते 10 तालाब

मरते तालाबों को जिंदा करने को मकैनिकल इंजिनियर रामवीर तंवर ने अपनी नौकरी को बाय-बाय कह दिया। रामवीर मकैनिकल इंजिनियरिंग में बीटेक हैं और एक एमएनसी में काम करते थे। ग्रेटर नोएडा में रहने वाले रामवीर ने कहा, 'जल संरक्षण के काम में करियर मेरे लिए एसी ऑफिस में बैठने से ज्यादा अहमियत रखता है।' पिछले 5 सालों में रामवीर 10 तालाबों को जिंदा कर चुके हैं।

ग्रेटर नोएडा गौतम बुद्ध नगर जिले का हिस्सा है और यहां सैकड़ों छोटे-छोटे तालाब हैं, जिनकी देखरेख नहीं हो पा रही थी। अब रामवीर ने यह बीड़ा उठाया है। रामवीर ग्रेटर नोएडा के ही एक किसान के बेटे हैं। 60 एकड़ में फैले सूरजपुर वेटलैंड जैसे बड़े जलाशयों को तो वन संरक्षण नियमों के मुताबिक संरक्षण मिला हुआ है लेकिन डाढा गांव में आए दिन पानी की दिक्कत पेश आती थी। यहीं पले-बढ़े रामवीर देखते थे कि किस तरह छोटे-छोटे जलाशय सूख रहे हैं और उनका इस्तेमाल कूड़ा फेंकने के लिए होना लगा, जबकि इन्हीं जलाशयों पर यहां रहने वाले कई परिवारों की पानी की जरूरत निर्भर करती है। वह बताते हैं, 'मैं जलाशयों के साथ होते इस गलत व्यवहार को देखते-देखते हुए बड़ा हुआ हूं।'

21 साल की उम्र में जब रामवीर कॉलेज स्टूडेंट थे, उन्होंने जलाशयों की सफाई के लिए गांववालों की जल चौपाल लगाई। नौकरी छोड़ने के बाद रामवीर पूरी तरह इसी काम में लग गए।

👉 खर्च चलाने को देते हैं ट्यूशन

धीरे-धीरे इस काम के लिए वॉलंटियरों की टीमें बनाई गईं। रामवीर ने बताया, जल्द जल चौपाल एक ऐसा प्लैटफॉर्म बन गई, जो एक गांव से दूसरे गांव जाकर लोगों को जल संरक्षण के बारे में बताते हैं। वे बताते हैं कि जलाशयों में कूड़ा फेंकना बंद करने की जरूरत है। वॉलंटियरों ने सबसे पहले 2014 में डाबरा गांव में जलाशय की सफाई का काम किया। रामवीर बताते हैं कि उस जलाशय में बहुत कूड़ा था। उस साफ करने में महीनों लग गए। इसके बाद एक फिल्टर सिस्सटम बनाकर हमने पानी की सफाई की, उसे सिंचाई के लिए किसानों के उपयोग लायक बनाया। जलाशय को साफ बनाए रखने के लिए उसने मछलीपालन को प्रोत्साहित किया गया।

जलाशयों को जिंदा करने के लिए और लोगों की जरूरत थी, इसके लिए रामवीर ने सोशल मीडिया का सहारा लिया। वह बताते हैं, हमारे फेसबुक पेज 'बूंद-बूंद पानी' के अब एक लाख से ज्यादा सदस्य हैं। जब भी हमें वॉलंटिअर्स की जरूरत हुई, हम पेज पर अनाउंस कर देते और हर बार करीब 100 लोग संरक्षण के इस काम लिए पहुंच जाते, फिर चाहे इलाका दूरदराज का ही क्यों न हो।

रामवीर ने अपना जॉब छोड़ा और शाम के समय ट्यूशन देकर घर का खर्च चलाते हैं। उनके काम ने लोगों का ध्यान तब खींचा, जब पिछले साल उन्होंने #सेल्फीविदपॉन्ड के के साथ गांववालों को अपने इलाके के जलाशयों की तस्वीरें भेजने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया। इसके बा से स्पॉन्सरशिप के मौके आए। रामवीर ने बताया, 'काफी मेहनत के बाद हमें साल 2018 में 2.5 लाख की सीएसआर फंडिंग मिली।' उन्होंने पूरे पैसे को जलाशयों को जीवंत करने के काम पर लगा दिए।

👉 अपनी कमजोरियों को दूर कीजिये (अंतिम भाग)

(6) अन्य मनुष्यों से किसी वस्तु के मिलने की आशा मत रखिये। आप यदि दूसरों से कुछ मिलने की आशा करेंगे, तो वह वस्तु न मिलने पर अवश्य ही आप दुखी होंगे अतः दिल से भी किसी की वस्तु मत माँगिये! दूसरों के स्वभाव को परिवर्तित करने की व्यर्थ चेष्टा मत करिये। जो जैसा है, उसे वैसा ही रहने दीजिये। जो मनुष्य ऐसा नहीं करते वे पिता-पुत्र, पति-पत्नी, सम्बन्धी एवं कोई भी हों, स्वभाव के कारण एक दूसरे के व्यवहार से अत्यन्त दुखी रहते हैं।

उपर्युक्त ढंग से बुरे विचारों से पूर्ण मानसिक दशा को परिवर्तित करिए, इस प्रकार आप दुखी होने से बच सकेंगे। बातों पर विचार करिए और प्रसन्नता एवं आनन्द का अनुभव करिए

(7) किसी भी परिचित मनुष्य की, जिससे आपको कुछ कार्य भी सिद्ध करना है, इच्छाओं, और कठिनाइयों, जिनके कारण वह दुखी है लिख लीजिए। उसकी सहायता करने और उसे प्रसन्न करने की चेष्टा करिये। दूसरे मनुष्यों को सुखी एवं प्रसन्न करने का सच्चा प्रयत्न स्वर्गीय आनन्द प्राप्त करने का मूल मन्त्र है जो वर्णन नहीं, केवल अनुभव ही किया जा सकता है! उस मनुष्य का, जिसे आपने प्रसन्न करने की चेष्टा की है, सन्तोष, हर्ष, उल्लास एवं आनन्द से प्रसन्न मुख देखकर आप स्वयं हर्ष से फूल उठेंगे।

कल के विषय में न सोचने का दृढ़ संकल्प कर लीजिये। उमर खय्याम की भाँति जीवन के प्रति क्षण में आनन्द और सुख का अनुभव कीजिये। न बीते हुए पर दुखी होइए और न भविष्य से डरिए।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1956/February/v1.27

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 April 2019


👉 आज का सद्चिंतन 7 April 2019


👉 The Absolute Law Of Karma (Part 4)

HOW DOES CHITRAGUPTA MAINTAIN THE RECORD?

Let us now discuss the working of Chitragupta. Why and how this deity evaluates the deeds of a person and what are the yardsticks of this evaluation? We shall also find out how after physical death, the lines of fate drawn by Chitragupta determine a soul’s new incarnation in conditions of hell or heaven. In the foregoing discussion, the reader has been introduced to the concept that our sub-conscious mind, itself operates as the deity Chitragupta. It keeps a continuous micro-record of our good and evil deeds in a condensed form, like the recordings on a small compact disc, the details of our virtuous and sinful deeds registered microscopically and subtly on certain neurons on the inner chambers of mind. In this way the writings of Chitragupta could be regarded as shorthand notes taken by the divine stenographer, Chitragupta, for presentation as testimony for objective evaluation of the total span of our life.

We are aware that human mind works on two levels- one external and the other internal. The outer mind is analytical. It analyses the pros and cons, accepts and discards, takes decisions and changes resolutions. The inner mind, on the other hand, is like an innocent but resolute child. It neither accepts nor discards anything, but as the true faithful representative of the Divine, functions impartially toward divine justice. The external mind may think of escaping punishment by suppressing or overlooking the recordings of the lines of evil deeds and highlight only the virtuous deeds for reward. The inner mind (conscience is one of its constituents), on the other hand, works differently.

It takes decisions like an unbiased judge of highest integrity, who cannot be influenced by allurement, fear or vested interest. It is said that in each human being there co-exist a saint and a devil. You may consider the secret inner mind as a representative of divinity and the external mind, which is ever engaged in reasoning, rationalizing, deliberating, conspiring and hypocrisy, as a tool of the devil. The external mind may deceive the soul by justifying each and every action of a person. The inner-mind, on the contrary, is the flame of the soul and a projection of the Absolute Truth. It is, therefore, incapable of conceit and deceit and is innately calm and detached. That is why God has entrusted it with such crucial responsibility. For the common man, it is the deity Chitragupta. Being absolutely impartial, this deity has been given the high seat of Divine Judge. Like a secret service agent, this deity is all the time vigilantly shadowing a person and recording his action in its secret diary.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 10

👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 April 2019

★ अंतरात्मा में यदि किसी दिव्य वाणी को सुनने की शक्ति हो तो अपने  भीतर बैठा हुआ कोई ‘नैतिक’ यह कहते हुए पाया जायेगा कि जो सुख-साधन समाज के अनुग्रह से मिले हैं, उन्हें लूट का माल न समझा जाय, ऋण माना जाय और उसका प्रतिदान चुकाया जाय। यदि इस आत्मा की पुकार को न सुना जाय तो उसका प्रतिफल यह होगा कि ऋणग्रस्तों की तरह अपना अंतःकरण भारी होता चला जाएगा और उस उल्लास की अनुभूति न हो सकेगी, जो जीवन देवता के अनुग्रह से हर घड़ी होती रहनी चाहिए।

◆ अपने साथ पक्षपात की आदत से प्रायः सभी लोग घिरे रहते हैं। दूसरों की आलोचना करने के लिए काफी तथ्य संग्रह कर लिये जाते हैं, पर अपनी खामियाँ, खराबियाँ ढूँढने के लिए किसी की रुचि नहीं होती। इतना ही नहीं, कोई वैसा सुझाता है तो बुरा लगता है। इस स्वभावगत दुर्बलता से लोहा लेकर जो अपनी कमजोरियों को स्वयं ढूँढते हैं, उन्हें स्वीकार करते हैं और सुधारने के लिए बार-बार असफल होने पर भी धैर्यपूर्वक जुटे रहते हैं उन्हें बहादुर ही कहा जाएगा।

◇ एक बार हमारा एक नौकर काशीनाथ बीमार हुआ। उसे प्लेग की गिल्टी निकल आई। वह चुपचाप अस्पताल को चला गया और रिश्तेदार को एक पत्र लिख दिया कि जज साहब को खबर न होने पावे, वरना वे मेरे लिए बहुत चिन्ता करेंगे। फिर भी मेरी पत्नी को किसी प्रकार पता चल गया और हम लोग उसकी सेवा सुश्रूषा करने अस्पताल नित्य जाने लगे। हमारे एक मित्र ने कहा-छोटे नौकर के लिए हाईकोर्ट के प्रधान जज को इतनी दौड़ धूम करना उचित नहीं। मैंने हँसते हुए कहा- जज होने से पहले मैं मनुष्य हूँ और मनुष्य का धर्म है कि अपने से छोटे व्यक्तियों की शक्ति भर सहायता करे।

■ विचारों का परिष्कार एवं प्रसार करके आप मनुष्य से महामनुष्य, दिव्य मनुष्य और यहाँ तक ईश्वरत्त्व तक प्राप्त कर सकते हैं। इस उपलब्धि में आड़े आने के लिए कोई अवरोध संसार में नहीं। यदि कोई अवरोध हो सकता है, तो वह स्वयं ेका आलस्य, प्रमाद, असंमय अथवा आत्म अवज्ञा का भाव। इस अनंत शक्ति का द्वार सबके लिए समान रूप से खुला है और यह परमार्थ का पुण्य पथ सबके लिए प्रशस्त है। अब कोई उस पर चले या न चले यह उसकी अपनी इच्छा पर निर्भर है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अपंगो ने शक्ति पायी-खोयी

एक बार पाँच ने असमर्थ और अपंग इकट्ठे हुए। अन्धा बोला- मेरी आँखें होती तो जो कुछ अनुपयुक्त दिखाई देता उसे ठीक करता। लँगड़ा बोला- मैं तो दौड़- दौड़कर लोगों की भलाई करता। निर्बल बोला- मेरे पास बल होता तो दीन- दुखियों की सेवा करता। निर्धन ने कहा- मैं धनी होता तो किसी को भूखा न रहने देता। मूर्ख बोला- मैं पण्डित होता तो लोगों को सच्चा ज्ञान देता। वरुणदेव ने उनकी बातें सुनी तो दया आ गई। उनकी इच्छायें उन्होंने पूरी कर दीं। पर अब तो अन्धा सौन्दर्य दर्शन में ही लीन रहने लगा। लंगड़ा सैर- सपाटे के लिए निकल पड़ा। निर्धन धन के नशे में डूब गया। निर्बल दूसरों को सताने लगा और मूर्ख अपनी ही शेखी बघारने लगा। वरुणदेव ने यह देखा तो उन्हें बड़ा दु :ख हुआ। अपनी दी हुई शक्तियां उनसे छीन ली।

इसी तथ्य को रामायणकार ने इस प्रकार लिखा है-
करम प्रधान विश्व करि राखा। जो जस करहिं तो तस फल चाखा।

मनुष्य के लिए तो यही उचित है कि वह अपनी गरिमा के अनुरूप सदैव उत्थान की ओर बढ़े। अन्यों को भी साथ ले।

ऊर्ध्य उठे फिर ना गिरे, यही मनुज को कर्म। औरन ले ऊपर उठे, इससे बडौ न धर्म।
इस तथ्य को मनुष्य समझ नहीं पाता और अपनी ही रची नारकीय सृष्टि से दूर भागने का विफल प्रयास करते देखा जाता है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1 द्वितीयोSध्याय) श्लोक 7 से 8

सामर्थ्यन्यूनतायां तु साधनाभाव एव वा।
प्रतिकूलस्थितौ वापि नरस्त्वसफलो भवेत्॥७॥
यत्रैतन्नास्ति तन्नापि सृष्टिरत्नं नर: कथम् ?
दैन्येन ग्लपितेनाथ जीवतीह घृणास्पद: ॥८॥

टीका-  सामर्थ्य की न्यूनता, साधनों का अभाव, प्रतिकूल परिस्थितियाँ होने पर तो सफल न हो सकने की बात समझ में आती है किन्तु जहाँ ऐसा कुछ भी न हो, वहाँ मनुष्य जैसा सृष्टि का मुकुटमणि हेय स्तर का जीवन क्यों जिये? और क्यों घृणास्पद बने? ॥७-८॥

व्याख्या- यदि वह सब न होता जिससे मानव समृद्ध-सम्पन्न बन सका है तो मानव के उपरोक्त दो प्रयोजनों, सृष्टि उत्पत्ति, सृष्टि संचालन में असफल रहने की बात स्वीकार्य भी होती, पर ऐसा तो कुछ है नहीं। इसके स्थान पर जन्म देने के बाद उसे तो साधन, सामर्थ्य एवं सहयोगकारी परिस्थितियों का अनुदान भी परम पिता ने दिया है। फिर वह सदैव प्रतिकूलताओं का रोना क्यों रोता है? यह ब्रह्मज्ञानी जिज्ञासु के लिए एक ऊहापोह बना हुआ है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 38

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

👉 नवरात्रि अनुष्ठान का विधि- विधान

नवरात्र पर्व वर्ष में दो बार आता है (चैत्र  & आश्विन)।
(१) चैत्र नवरात्र जिस दिन आरम्भ होता है, उसी दिन विक्रमी संवत् का नया वर्ष प्रारम्भ होता है। चैत्र नवरात्र का समापन दिवस भगवान् श्री राम का जन्म दिन रामनवमी होता है।

(२) दूसरा नवरात्र आश्विन शुक्ल मे पड़ता है। इससे लगा हुआ विजयदशमी पर्व आता है।

ऋतुओं के सन्धिकाल इन्हीं पर्वों पर पड़ते हैं। सन्धिकाल को उपासना की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। प्रातः और सायं, ब्राह्ममुहूर्त्त एवं गोधूलि वेला दिन और रात्रि के सन्धिकाल हैं। इन्हें उपासना के लिए उपयुक्त माना गया है। इसी प्रकार ऋतु सन्धिकाल के नौ-नौ दिन दोनों नवरात्रों में विशिष्ट रूप से साधना-अनुष्ठानों के लिए महत्त्वपूर्ण माने गये हैं।

नवरात्रि साधना को दो भागें में बाँटा जा सकता है : एक उन दिनों की जाने वाली जप संख्या एवं विधान प्रक्रिया। दूसरे आहार- विहार सम्बन्धी प्रतिबन्धों की तपश्चर्या ।। दोनों को मिलाकर ही अनुष्ठान पुरश्चरणों की विशेष साधना सम्पन्न होती है।

जप संख्या के बारे में विधान यह है कि ९ दिनों में २४ हजार गायत्री मन्त्रों का जप पूरा होना चाहिए। कारण २४ हजार जप का लघु गायत्री अनुष्ठान होता है। प्रतिदिन २७ माला जप करने से ९ दिन में २४० मालायें अथवा २४०० मंत्र जप पूरा हो जाता है। मोटा अनुपात घण्टे में ११- ११ माला का रहता है। इस प्रकार प्रायः २(१/२) घण्टे इस जप में लग जाते हैं। चूंकि उसमें संख्या विधान मुख्य है इसलिए गणना के लिए माला का उपयोग आवश्यक है। सामान्य उपासना में घड़ी की सहायता से ४५ मिनट का पता चल सकता है, पर जप में गति की न्यूनाधिकता रहने से संख्या की जानकारी बिना माला के नहीं हो सकती। अस्तु नवरात्रि साधना में गणना की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए माला का उपयोग आवश्यक माना गया है।

जिनसे न बन पड़े, वे प्रतिदिन १२ माला करके १०८ माला का अनुष्ठान कर सकते हैं।

उपासना की विधि सामान्य नियमों के अनुरूप ही है। स्नानादि से निवृत्त होकर आसन बिछाकर पूर्व को मुख करके बैठें। जिन्होंने कोई प्रतिमा या चित्र किसी स्थिर स्थान पर प्रतिष्ठित कर रखा हो वे दिशा का भेद छोड़कर उस प्रतिमा के सम्मुख ही बैठें। वरूण देव तथा अग्नि देव को साक्षी करने के लिए पास में जल पात्र रख लें और घृत का दीपक या अगरबत्ती जला लें सन्ध्यावन्दन करके, गायत्री माता का आवाहन करें। आवाहन मन्त्र जिन्हें याद न हो वे गायत्री शक्ति की मानसिक भावना करें। धूप, दीप, अक्षत, नैवेद्य, पुष्प, फल, चन्दन, दूर्वा, सुपारी आदि पूजा की जो मांगलिक वस्तुएँ उपलब्ध हों उनसे चित्र या प्रतिमा का पूजन कर लें। जो लोग निराकार को मानने वाले हों वे धूपबत्ती या दीपक की अग्नि को ही माता का प्रतीक मान कर उसे प्रणाम कर लें।

अपने गायत्री गुरू का भी इस समय पूजन वन्दन कर लेना चाहिए, यही शाप मोचन है।

इस तरह आत्म शुद्धि और देव पूजन के बाद जप आरम्भ हो जाता है। जप के साथ- साथ सविता देवता के प्रकाश का अपने में प्रवेश होते पूर्ववत् अनुभव किया जाता है। सूर्य अर्घ्य आदि अन्य सब बातें उसी प्रकार चलती हैं, जैसी दैनिक साधना में। हर दिन जो आधा घण्टा जप करना पड़ता था वह अलग से नहीं करना होता वरन् इन्हीं २७ मालाओं में सम्मिलित हो जाता है।

गायत्री मन्त्र एवं भावार्थ

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

भावार्थ : उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

अनुष्ठान में पालन करने के लिए दो नियम अनिवार्य हैं।

इन नौ दिनों ब्रह्मचर्य पालन अनिवार्य रूप से आवश्यक है।

दूसरा अनिवार्य नियम है उपवास। जिनके लिए सम्भव हो वे नौ दिन फल, दूध पर रहें। एक समय अन्नाहार, एक समय फलाहार, दो समय दूध और फल, एक समय आहार, एक समय फल दूध का आहार, केवल दूध का आहार इनमें से जो भी उपवास अपनी सामर्थ्यानुकूल हो उसी के अनुसार साधना आरम्भ कर देनी चाहिए। जिनसे इतना भी न बन पड़े वे अन्नाहार पर भी रह सकते हैं, पर नमक और शक्कर छोड़कर अस्वाद व्रत का पालन उन्हें भी करना चाहिए। भोजन में अनेक वस्तुएँ न लेकर दो ही वस्तुएँ ली जायें। जैसे- रोटी, दाल। रोटी- शाक, चावल- दाल, दलिया, दही आदि।

अनुष्ठान में पालन करने के लिए तीन सामान्य नियम हैं


कोमल शैया का त्याग

अपनी शारीरिक सेवाएँ अपने हाथों करना
हिंसा द्रव्यों का त्याग (चमड़े के जूते , रेशम, कस्तूरी, मांस, अण्डा )।

अनुष्ठान के दिनों में मनोविकारों और चरित्र दोनों पर कठोर दृष्टि रखी जाय और अवांछनीय उभारों को निरस्त करने के लिए अधिकाधिक प्रयत्नशील रहा जाय। असत्य भाषण, क्रोध, छल, कटुवचन , अशिष्ट आचरण, चोरी, चालाकी, जैसे अवांछनीय आचरणों से बचा जाना चाहिए, ईर्ष्या, द्वेष, कामुकता, प्रतिशोध जैसे दुर्भावनाओं से मन को जितना बचाया जा सके उतना अच्छा है। जिनसे बन पड़े वे अवकाश लेकर ऐसे वातावरण में रह सकते हैं जहाँ इस प्रकार की अवांछनीयताओं का अवसर ही न आवे। जिनके लिए ऐसा सम्भव नहीं, वे सामान्य जीवन यापन करते हुए अधिक से अधिक सदाचरण अपनाने के लिए सचेष्ट बने रहें ।।

संक्षिप्त गायत्री हवन पद्धति की प्रक्रिया बहुत ही सरल है। जप का शतांश हवन किया जाना चाहिए। पूर्णाहुति के बाद प्रसाद वितरण, कन्या भोजन आदि का प्रबन्ध अपनी सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिए। गायत्री आद्य शक्ति- मातृु शक्ति है। उसका प्रतिनिधित्व कन्या करती है। अस्तु अन्तिम दिन कम से कम एक और अधिक जितनी सुविधा हो कन्याओं को भोजन कराना चाहिए।

अनुष्ठान के साथ दान की परम्परा जुड़ी हुई है। ज्ञानदान सर्वश्रेष्ठ है। इस दृष्टि से प्रत्येक साधक को चाहिए कि यथाशक्ति वितरण योग्य सस्ता युग साहित्य खरीदकर उन्हें उपयुक्त व्यक्तियों को साधना का प्रसाद कहकर दें।

जिन्हें नवरात्रि की साधनायें करनी हों, उन्हें दोनों बार समय से पूर्व उसकी सूचना हरिद्वार भेज देनी चाहिए, ताकि उन दिनों साधक के सुरक्षात्मक, संरक्षण और उस क्रम में रहने वाली भूलों के दोष परिमार्जन का लाभ मिलता रहे। विशेष साधना के लिए विशेष मार्ग- दर्शन एवं विशेष संरक्षण मिल सके तो उससे सफलता की सम्भावना अधिक बढ़ जाती है। वैसे प्रत्येक शुभ कर्म की संरक्षण भगवान स्वयं ही करते हैं।

👉 ज्ञान और आस्था

एक पंडित जी थे। उन्होंने एक नदी के किनारे अपना आश्रम बनाया हुआ था। पंडित जी बहुत विद्वान थे। उनके आश्रम में दूर-दूर से लोग ज्ञान प्राप्त करने आते थे।

नदी के दूसरे किनारे पर लक्ष्मी नाम की एक ग्वालिन अपने बूढ़े पिता के साथ रहती थी। लक्ष्मी सारा दिन अपनी गायों को देखभाल करती थी। सुबह जल्दी उठकर अपनी गायों को नहला कर दूध दुहती, फिर अपने पिताजी के लिए खाना बनाती, तत्पश्चात् तैयार होकर दूध बेचने के लिए निकल जाया करती थी।

पंडित जी के आश्रम में भी दूध लक्ष्मी के यहाँ से ही आता था। एक बार पंडित जी को किसी काम से शहर जाना था। उन्होंने लक्ष्मी से कहा कि उन्हें शहर जाना है, इसलिए अगले दिन दूध उन्हें जल्दी चाहिए। लक्ष्मी अगले दिन जल्दी आने का वादा करके चली गयी।

अगले दिन लक्ष्मी ने सुबह जल्दी उठकर अपना सारा काम समाप्त किया और जल्दी से दूध उठाकर आश्रम की तरफ निकल पड़ी। नदी किनारे उसने आकर देखा कि कोई मल्लाह अभी तक आया नहीं था। लक्ष्मी बगैर नाव के नदी कैसे पार करती ? फिर क्या था, लक्ष्मी को आश्रम तक पहुँचने में देर हो गयी। आश्रम में पंडित जी जाने को तैयार खड़े थे। उन्हें सिर्फ लक्ष्मी का इन्तजार था। लक्ष्मी को देखते ही उन्होंने लक्ष्मी को डाँटा और देरी से आने का कारण पूछा।

लक्ष्मी ने भी बड़ी मासूमियत से पंडित जी से कह दिया कि- “नदी पर कोई मल्लाह नहीं था, मै नदी कैसे पार करती ? इसलिए देर हो गयी।“

पंडित जी गुस्से में तो थे ही, उन्हें लगा कि लक्ष्मी बहाने बना रही है। उन्होंने भी गुस्से में लक्ष्मी से कहा, ‘‘क्यों बहाने बनाती है। लोग तो जीवन सागर को भगवान का नाम लेकर पार कर जाते हैं, तुम एक छोटी सी नदी पार नहीं कर सकती?”

पंडित जी की बातों का लक्ष्मी पर बहुत गहरा असर हुआ। दूसरे दिन भी जब लक्ष्मी दूध लेकर आश्रम जाने निकली तो नदी के किनारे मल्लाह नहीं था। लक्ष्मी ने मल्लाह का इंतजार नहीं किया। उसने भगवान को याद किया और पानी की सतह पर चलकर आसानी से नदी पार कर ली। इतनी जल्दी लक्ष्मी को आश्रम में देख कर पंडित जी हैरान रह गये, उन्हें पता था कि कोई मल्लाह इतनी जल्दी नहीं आता है।

उन्होंने लक्ष्मी से पूछा- “ तुमने आज नदी कैसे पार की ? इतनी सुबह तो कोई मल्लाह नही मिलता।”

लक्ष्मी ने बड़ी सरलता से कहा- ‘‘पंडित जी आपके बताये हुए तरीके से नदी पार कर ली। मैंने भगवान् का नाम लिया और पानी पर चलकर नदी पार कर ली।’’

पंडित जी को लक्ष्मी की बातों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने लक्ष्मी से फिर पानी पर चलने के लिए कहा। लक्ष्मी नदी के किनारे गयी और उसने भगवान का नाम जपते-जपते बड़ी आसानी से नदी पार कर ली।

पंडित जी हैरान रह गये। उन्होंने भी लक्ष्मी की तरह नदी पार करनी चाही। पर नदी में उतरते वक्त उनका ध्यान अपनी धोती को गीली होने से बचाने में लगा था। वह पानी पर नहीं चल पाये और धड़ाम से पानी में गिर गये।

 पंडित जी को गिरते देख लक्ष्मी ने हँसते हुए कहा- ‘‘आपने तो भगवान का नाम लिया ही नहीं, आपका सारा ध्यान अपनी नयी धोती को बचाने में ही लगा हुआ था।’’

पंडित जी को अपनी गलती का अहसास हो गया। उन्हें अपने ज्ञान पर बड़ा अभिमान था। पर अब उन्होंने जान लिया था कि भगवान को पाने के लिए किसी भी ज्ञान की जरूरत नहीं होती। उसे तो पाने के लिए सिर्फ सच्चे मन से याद करने की जरूरत है। 

👉 अपनी कमजोरियों को दूर कीजिये (भाग 3)

(4) चिन्ता दूर करने के उपाय हैं— विश्लेषण द्वारा निर्णय कर लेना, संकल्प, मन की शान्ति, जिस विषय से आप चिन्तित हों, उसका भली-भाँति विश्लेषण कीजिए। चिन्ता, भय का ही दूसरा बढ़ा-चढ़ा रूप है। भयभीत मन की दशाएं ही नारकीय पीड़ायें हैं। चिंतित और भयभीत गरीब अत्यन्त दुख का अनुभव करता है। चिन्तित, दुखित और भयभीत होकर कष्ट सहन करने की अपेक्षा कष्टों का सामना कर लेने का दृढ़ संकल्प कर लीजिये। आप को यदि अपने कार्य के छूट जाने का भय है और चिन्ता है तो उस परिस्थिति का कम से कम चिंतित होकर सामना कीजिए। भयभीत रहने और अप्रयत्न-शील बनने की अपेक्षा अपनी योजनाऐं बदल कर नई योजनाऐं बना लीजिये।

मानसिक शान्ति प्राप्त करने के लिये आराम से बिस्तर पर लेट जाइये और सोचिये कि आपका शरीर पूर्णतया स्वस्थ है। स्फूर्ति लाने के लिए कोई शारीरिक कार्य अथवा कोई खेल खेलिये। आप यदि किसी वस्तु को पाने के लिये अथवा अन्य किसी छोटी सी बात पर चिन्तित हैं, तो निद्रा अथवा स्थान परिवर्तन ही उपयुक्त है। यदि यह असंभव है, तो आप आत्मशक्ति द्वारा बुरे विचारों को मन में मत आने दीजिये।

(5) अधिक आशाऐं मत बाँधिये-
किसी कार्य को करने के लिए भरसक प्रयत्न करिये किन्तु फल ईश्वर पर छोड़ दीजिये। असफल होने पर हतोत्साह मत होइए। याद रखिये असफलता ही सफलता की नींव है। वे पुरुष, जिन्होंने संसार में महान् कार्य किये हैं, उन्हें भी बार-बार असफल होते रहने के बाद ही सफलतायें मिली हैं।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1956/February/v1.27

👉 आज का सद्चिंतन 5 April 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 April 2019


👉 The Absolute Law Of Karma (Part 4)

WHO MAINTAINS RECORD OF SINS AND VIRTUES?

Human mind has an infinite capacity for storage of information. It is quite possible for the subtle sentient mechanism of subconscious mind to maintain a systematic record of activities of a living being. There is also no contradiction in the one Chitragupta of mythology being countless Chitraguptas in innumerable beings. Divine powers of God are omnipresent. The universal life-force- Prana is one, but it is individually present in each living being. Similarly, the subtle celestial elements designated as
deities Indra, Varun, Agni, Shiva and Yama in mythology are also all-pervasive. Air, for instance, in spite of being identified as fresh air of a garden or polluted air of an industrial area, is an integral part of the same atmosphere enveloping the earth. Similarly, though inhabiting and operating in numerous bodies independently, the deity Chitragupta is a single universal celestial entity.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 8

👉 व्याध, संत, वेश्या एवम् सद्गृहस्थ के दृश्य

स्वर्ग और नरक करनी के फल है, एक सन्त ने अपने शिष्य को समझाया पर  शिष्य की समझ में बात आयी नहीं। तब उसका उत्तर देने के लिए अगले दिन सन्त शिष्य के लेकर एक बहेलिए कें पास पहुँचे। वहाँ जाकर देखा कुछ जंगल से व्याध निरीह पक्षी पकड़कर लाया था, वह काट रहा था, घर कलह मची थी। यह सब  देखते ही शिष्य ही शिष्य चिल्लया- ' महाराज! यहाँ तो नरक है, यहाँ से शीघ्र '' चलिए। '' सन्त बोले- ' सचमुच, इस बहेलिये ने इतने जीव मार डाले, पर आज तक फूटी कौड़ी तक न जोड़ पाया। कपड़ों तक के पैसे नहीं, इसके लिए यह संसार भी नरक है और परलोक में तो इतने मारे गये जीवों की तड़पती आत्मायें उसे जितना कष्ट देंगी, उसकी तो कल्पना भी नहीं हो सकती।

सन्त दूसरे दिन एक साधु की कुटी पर पधारे। शिष्य भी साथ थे, वहाँ जाकर देखा, साधु के पास है तो कुछ नहीं, पर उनकी मस्ती का कुछ ठिकाना नहीं, बड़े सन्तुष्ट, बड़े प्रसन्न दिखाई दे रहे थे। सन्त ने कहा- ' वत्स! यह साधु इस जीवन में कष्ट का, तपश्चर्या का जीवन जी रहे हैं तो भी मन में इतना आह्लाद इस बात का प्रतीक है कि इन्हें पारलौकिक सुख तो निश्र्चित ही है। ''

सांयकाल सन्त एक वेश्या के घर में प्रवेश करने लगे तो शिष्य चिल्लाया- ' महाराज! यहाँ कहाँ?' सन्त बोले- ' वत्स! यहाँ का वैभव भी देख लें। मनुष्य इस सांसारिक सुखोपभोग के लिए अपने शरीर, शील और चरित्र को भी किस तरह बेचकर मौज उड़ाता है पर शरीर का सौन्दर्य नष्ट होते ही कोई पास नहीं आता, यह इस बात का प्रतीक है कि इसके लिए यह संसार स्वर्ग की तरह है, पर अन्त इसका वही है, जो उस बहेलिये का था। ''

अन्तिम दिन वे एक सद्गृहस्थ के घर रुके। गृहस्थ बड़ा परिश्रमी, संयमशील, नेक और ईमानदार था सो सुख- समृद्धि की उसे कोई कमी नहीं थी वरन् वह बढ़ रही थी। सन्त ने कहा- यह वह व्यक्ति है, जिसे इस पृथ्वी पर भी स्वर्ग है और परलोक में भी। शिष्य ने इस तत्व- ज्ञान को भली प्रकार समझ लिया कि स्वर्ग और नरक वस्तुत :करनी का फल है।

विधाता ने तो मानव को यही सोच कर भेजा है कि वह पृथ्वी पर अन्य जीवधारियों से अलग अपनी दिशाधारा चयन करेगा और श्रेय पक्ष की ओर बढ़कर सबका कल्याण करेगा पर उसे भी वर्तमान स्थिति देखकर निराशा ही होती होगी।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1 द्वितीयोSध्याय) श्लोक 5 से 6

अष्टावक्र उवाच

ईश्वर: भूपति: साक्षाद् ब्रह्माण्डस्य महाने।
मानवं राजपुत्रं स्वं कर्तुं सर्वगुणान्वितम् ॥५॥
विभूती: स्वा अदाद् बीजरूपे सर्वा मुदान्वित:
सृष्टि संचालकोऽप्येष श्रेयसा रहित: कथम्?॥६॥

टीका- ब्रह्माण्ड के सम्राट् ईश्वर ने मनुष्य को सर्वगुण सम्पन्न उत्तराधिकारी राजकुमार बनाया। अपनी समस्त विभूतियाँ उसे बीजरूप में प्रसन्नतापूर्वक प्रदान कीं। उसे सुष्टि संचालन में सहयोगी बन सकने के योग्य बनाया, फिर भी वह उस श्रेय से, गौरव से वंचित क्यों रहता है? ॥५-६॥

व्याख्या- ब्रह्मज्ञानी अष्टावक्र की जिज्ञासा मानव मात्र से सम्बन्धित है। नित्य देखने में आता है ईश्वर का मुकुटमणि कहलाने वाला, सुर दुर्लभ मानव योनि पाने वाला यह सौभाग्यशाली जीव अपने परम पिता से दो विशेष विभूतियाँ पाने के बावुजूद दिग्भ्रान्त हो दीन-हीन जैसा जीवन जीता है। ये दो विभूतियाँ  हैं-बीज रूप में ईश्वर के समस्त गुण तथा सृष्टि को सुव्यवस्थित बनाने में उसकी ईश्वर के साथ साझेदार जैसी भूमिका। बीज फलता है तब मृदा को स्वरूप लेता है। इसका बहिरंग स्वरूप उसी जाति का होता है जिस जाति का वह स्वयं है। लघु से महान्, अणु से विभु बनने की महत् सामर्थ्य अपने आपमें एक अलभ्य विरासत है। इसे पाने के लिए उसे न जाने कितनी योनियों में कष्ट भोगना पड़ा।

सहयोग-सहकार भी सुसंचालन के लिए न कि संतुलन को बिगाड़ने के लिए। ऐसे में जब मुण कर्म रूपी बीज भी गलने से इन्कार कर दे एवं मानव संतुलन-व्यवस्था के स्थान पर विग्रह-असहयोग करने लगे तो असमंजस होना स्वाभाविक है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 37

बुधवार, 3 अप्रैल 2019

👉 हाथी और छह अंधे व्यक्ति

बहुत समय पहले की बात है, किसी गावं में 6 अंधे आदमी रहते थे. एक दिन गाँव वालों ने उन्हें बताया, अरे, आज गावँ में हाथी आया है. उन्होंने आज तक बस हाथियों के बारे में सुना था पर कभी छू कर महसूस नहीं किया था. उन्होंने ने निश्चय किया, भले ही हम हाथी को देख नहीं सकते, पर आज हम सब चल कर उसे महसूस तो कर सकते हैं ना? और फिर वो सब उस जगह की तरफ बढ़ चले जहाँ हाथी आया हुआ था।

सभी ने हाथी को छूना शुरू किया.

मैं समझ गया, हाथी एक खम्भे की तरह होता है, पहले व्यक्ति ने हाथी का पैर छूते हुए कहा। अरे नहीं, हाथी तो रस्सी की तरह होता है. दूसरे व्यक्ति ने पूँछ पकड़ते हुए कहा। मैं बताता हूँ, ये तो पेड़ के तने की तरह है., तीसरे व्यक्ति ने सूंढ़ पकड़ते हुए कहा।

तुम लोग क्या बात कर रहे हो, हाथी एक बड़े हाथ के पंखे की तरह होता है.”, चौथे व्यक्ति ने कान छूते हुए सभी को समझाया। नहीं-नहीं, ये तो एक दीवार की तरह है.”, पांचवे व्यक्ति ने पेट पर हाथ रखते हुए कहा।

ऐसा नहीं है, हाथी तो एक कठोर नली की तरह होता है.”, छठे व्यक्ति ने अपनी बात रखी। और फिर सभी आपस में बहस करने लगे और खुद को सही साबित करने में लग गए.. ..उनकी बहस तेज होती गयी और ऐसा लगने लगा मानो वो आपस में लड़ ही पड़ेंगे।

तभी वहां से एक बुद्धिमान व्यक्ति गुजर रहा था. वह रुका और उनसे पूछा, क्या बात है तुम सब आपस में झगड़ क्यों रहे हो?” हम यह नहीं तय कर पा रहे हैं कि आखिर हाथी दीखता कैसा है, उन्होंने ने उत्तर दिया.

और फिर बारी बारी से उन्होंने अपनी बात उस व्यक्ति को समझाई। बुद्धिमान व्यक्ति ने सभी की बात शांति से सुनी और बोला, तुम सब अपनी-अपनी जगह सही हो. तुम्हारे वर्णन में अंतर इसलिए है क्योंकि तुम सबने हाथी के अलग-अलग भाग छुए हैं, पर देखा जाए तो तुम लोगो ने जो कुछ भी बताया वो सभी बाते हाथी के वर्णन के लिए सही बैठती हैं।

अच्छा!! ऐसा है.सभी ने एक साथ उत्तर दिया. उसके बाद कोई विवाद नहीं हुआ,और सभी खुश हो गए कि वो सभी सच कह रहे थे।

दोस्तों, कई बार ऐसा होता है कि हम अपनी बात को लेकर अड़ जाते हैं कि हम ही सही हैं और बाकी सब गलत है. लेकिन यह संभव है कि हमें सिक्के का एक ही पहलु दिख रहा हो और उसके आलावा भी कुछ ऐसे तथ्य हों जो सही हों. इसलिए हमें अपनी बात तो रखनी चाहिए पर दूसरों की बात भी सब्र से सुननी चाहिए, और कभी भी बेकार की बहस में नहीं पड़ना चाहिए. वेदों में भी कहा गया है कि एक सत्य को कई तरीके से बताया जा सकता है. तो, जब अगली बार आप ऐसी किसी बहस में पड़ें तो याद कर लीजियेगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि आपके हाथ में सिर्फ पूँछ है और बाकी हिस्से किसी और के पास हैं।

👉 आज का सद्चिंतन 3 April 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 April 2019


👉 अपनी कमजोरियों को दूर कीजिये (भाग 2)

(3) अपनी बुराई-भलाई के विषय में मत सोचा करिए। मनुष्य यदि अपने ही कष्टों और कठिनाइयों पर सोचता रहे तो वह उदासी से किसी प्रकार भी नहीं बच सकता। अन्य मनुष्यों की इच्छाओं एवं आवश्यकताओं पर सोचिए।

परिचित मनुष्यों के स्वभाव के विषय में लिख लीजिए। उनके अद्भुत आचरण और अवगुणों पर ध्यान दीजिए। यह मन बहलाने का बड़ा ही मनोरंजक ढंग है। यदि आप सच्चे मन से ऐसा करेंगे, तो आप अवश्य प्रफुल्लित दिखाई देंगे।

घर पर अथवा आफिस में अकेले मत बैठिए। दूसरे मनुष्यों से मेल बढ़ाइए और अपने विचार बदलिए। बातें अधिक करिए, और सोचिए कम।

आप पर जैसी भी बीते, उसी को सहर्ष स्वीकार कर लीजिये। अपनी असफलता, पराजय, एवं दुर्भाग्य पर अपना ध्यान मत जमाइये।

मनुष्य जैसा कार्य करता है, वैसे ही उसके मन में भाव उठते हैं। अतः कार्य करते समय अत्यन्त प्रसन्न चित्त दिखाई दीजिये, मुस्कुराइये और प्रफुलित रहिये। यदि आप ऐसा करेंगे तो शीघ्र ही प्रसन्नता का अनुभव करेंगे। इसके विपरीत आप यदि झुककर, लड़खड़ाते हुए, नीचे की ओर आँखें किये, त्यौरियाँ चढ़ाए, उदास भाव से चलेंगे तो आप अवश्य उदास हो जाएंगे। इधर-उधर की छोटी-छोटी सी बातों से असन्तुष्ट होने की अपेक्षा अपने भाग्य को सराहिए और अपने आपको धन्य समझिए। इस सिद्धान्त पर सोचिए कि ‘इससे भी बुरा हो सकता था।’ जो कुछ आपके पास नहीं है, उस पर ध्यान देने की अपेक्षा जो कुछ आपके पास है, उस पर ध्यान दीजिए। आपको अधिकतर यही सोचना चाहिए कि ‘जो कुछ मेरे पास है, उसके लिए भगवान को अनेकों बार धन्यवाद है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 26


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1956/February/v1.26

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 3)

WHO MAINTAINS RECORD OF SINS AND VIRTUES?

In Indian spirituality, karma stands for any physical, verbal, mental or social activity. It means that each karma produces an imprint (Rekha), which cannot be erased before creating a reaction (Karmaphal). There is a belief that the Creator (Lord Brahma) inscribes the destiny on the forehead of a human being and this Divine Inscription cannot be erased by anyone (Vidhi ke likhe ko metanhara). Let us examine this concept from a scientific point of view. Microscopic examination shows innumerable furrows in the grey matter all over the brain. Medical science has not so far come to know the biological implications of these indentations. Comparative microscopic research studies have shown that density of these crenulations in the grey matter of highly evolved persons and thinkers is much more, than in the case of common masses.

It shows that these microscopic lines in the grey matter of the brain are nothing but compact subtle impressions created by external activities, which we take as imprints of mental, vocal and physical actions. This record of activities (good and evil deeds) on the neurons of grey matter proves the existence of an intelligent mechanism, which Hindu Mythology refers to as the deity Chitragupta. In Sanskrit language too, the word “Chitragupta” means “a hidden picture”. It shows that there exists in the human mind a hidden chamber, an inner sentient mechanism (Antaha Chetana) or a subtle state of consciousness (Sookshma Man). (We may compare it with a back-up file of executable programmes in computer parlance).

It is well known that the subtle body (Sookshma Sharir) coexisting with the physical human body has four components “Man” (pronounced as Mun)- the source of desires, longings and aspirations; “Buddhi”- the discriminative faculty which deliberates, takes decisions and determines a course of action; “Chitta”- which stores traits, habits inclinations and temperament and “Ahamkar”- the overall personal sense of selfhood (Ego). It is also established that “Chitta” carries forward its record of good and bad impressions after dissolution of the body. It appears the expression “Chittagupta” of scriptures came to be known as “Chitragupta” in course of time. Hence the internal mechanism of mind, which creates the compact subtle recordings of human activities, could be taken as the deity “Chitragupta” of human mythology. No doubt, this intelligent mechanism (Chitragupta) is continuously engaged in  maintaining records of all living beings. Since each being has its own personal Chitragupta and, therefore, for the entire population of animate beings there is an equal number of Chitraguptas. Thus maintenance of records of innumerable beings does not seem to be an impossibility.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 7

👉 आत्मचिंतन के क्षण 3 April 2019

★ मनुष्य सामाजिक प्राणी है। सामाजिक जीवन का अर्थ है- मिल जुलकर स्नेह, सौहार्द्रपूर्वक रहना। स्वार्थ एवं संघर्ष सामाजिक जीवन के प्रतिकूल भाव हैं। सफल सामाजिक जीवन तभी संभव है, जब उसका प्रत्येक सदस्य सौम्य, सहनशील और शान्त स्वभाव वाला हो। इस स्थिति में सब मिल-जुलकर रह सकते हैं और पारस्परिक सद्भावना, सहयोग के बल पर व्यष्टि एवं समष्टिगत उन्नति भी कर सकते हैं। इसके विपरीत जिस समाज के सदस्य स्वार्थी, क्रोधी, असहिष्णु और असहयोगी होते हैं वे समाज में पारस्परिकता के अभाव में यथास्थान पड़े-पड़े कष्ट-क्लेशों के बीच एड़ियाँ रगड़ा करते हैं।

◆ बुरे विचारों से बचने के लिए अवांछनीय साहित्य का पढ़ना बंद कर देना अधूरा उपचार है। उपचार पूरा तब होता है, जब उसके स्थान पर सद्साहित्य का अध्ययन किया जाय। मानव मस्तिष्क कभी खाली नहीं रह सकता। उसमें किसी न किसी प्रकार के विचार आते ही रहते हैं। बार-बार निषेध करते रहने से किन्हीं गंदे विचारों का तारतम्य तो टूट सकता है, किन्तु उनसे सर्वथा मुक्ति नहीं मिल सकती। अवांछनीय विचारों से पूरी तरह बचने का सबसे सफल उपाय यह है कि मस्तिष्क में सद्विचारों को स्थान दिया जाये। असद्विचारों के  रहने से बुरे विचारों को प्रवेश पाने का अवसर ही मिलेगा।

◇ चिन्ता से मुक्ति का एकमात्र उपाय है-हर समय काम में लगे रहना। निठल्ले व्यक्ति को ही चिन्ता जैसी पिशाचिनी घेरती है। जो व्यक्ति कर्मरत है, प्रगतिशील है, चिन्ताएँ उसे किसी प्रकार भी नहीं घेर सकतीं। चिन्ता का जन्मस्थान एवं निवासस्थान दोनों ही में मनुष्य का चित्त होता है। यदि मनुष्य का चित्त किसी कार्य में व्यस्त रहे तो चिन्ता का जन्म ही न हो सके।

■ किसी भी व्यक्ति अथवा समाज की सभ्यता की गहराई का पता उनके उत्सवों, संस्कारों एवं समारोहों के समय ही चलता है। जिनके खुशी मनाने के तरीके सादे, सरल, शिष्ट एवं सुरुचिपूर्ण होते हैं, आज के युग में वे समाज ही सभ्य कहे जा सकते हैं।

★ उपासना का सार है- सर्वगुण संपन्न ईश्वर को अपना घनिष्ठतम जीवन सहचर अनुभव किया जाना और अपने शरीर, मन तथा अंतःकरण को ईश्वर अर्पण करके उस पर दिव्य सत्ता का अधिकार स्वीकार करना। जो इस स्तर की उपासना का अभ्यासी होगा, वह मस्तिष्क पर नियंत्रण रखेगा और ध्यान रखेगा कि जब कभी जो कुछ भी सोचा जाय वह ईश्वर स्तर का हो, जो किया जाय उसमें ईश्वरीय गौरव गरिमा की झाँकी मिलती हो।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...