गुरुवार, 17 जनवरी 2019
👉 Let Desires Be Judicious and Focused
There is no reason why an illusion prevails in common mass that path of truth and honesty leads to loss and damage only! Probably due to the dishonest people amassing huge wealth in short time by all means of fraud and dishonesty. Seeing fast growing wealth, others also desire to acquire the same status by any means – right or wrong. They are impressed by the influential arrogance and lavish life styles of the rich. But they forget that wealth acquired through fraud and corruption is fragile like a wall of sand, collapsible by the slightest breeze of air. And such pompous glory is only imaginary, people surely praise the rich on face, just to achieve their own selfish gains, but from inside, they do not have any real respect for such rich.
On the contrary, a person working hard with honesty and leading a simple life of high morals and principles may be progressing slowly, but that progress is firm-rooted and sound and his fame is global and immortal, extending beyond the boundaries of space and time.
Pt. Shriram Sharma Aacharya
Badein Aadmi Nahi, Mahamanav Baniyein (Not a Big-Shot, Be Super-Human), Page 3"
On the contrary, a person working hard with honesty and leading a simple life of high morals and principles may be progressing slowly, but that progress is firm-rooted and sound and his fame is global and immortal, extending beyond the boundaries of space and time.
Pt. Shriram Sharma Aacharya
Badein Aadmi Nahi, Mahamanav Baniyein (Not a Big-Shot, Be Super-Human), Page 3"
बुधवार, 16 जनवरी 2019
👉 खुशी की वजह
एक औरत बहुत महँगे कपड़े में अपने मनोचिकित्सक के पास गई और बोली। "डॉ साहब ! मुझे लगता है कि मेरा पूरा जीवन बेकार है, उसका कोई अर्थ नहीं है। क्या आप मेरी खुशियाँ ढूँढने में मदद करेंगें?"
मनोचिकित्सक ने एक बूढ़ी औरत को बुलाया जो वहाँ साफ़-सफाई का काम करती थी और उस अमीर औरत से बोला - "मैं इस बूढी औरत से तुम्हें यह बताने के लिए कहूँगा कि कैसे उसने अपने जीवन में खुशियाँ ढूँढी। मैं चाहता हूँ कि आप उसे ध्यान से सुनें।"
तब उस बूढ़ी औरत ने अपना झाड़ू नीचे रखा, कुर्सी पर बैठ गई और बताने लगी - "मेरे पति की मलेरिया से मृत्यु हो गई और उसके 3 महीने बाद ही मेरे बेटे की भी सड़क हादसे में मौत हो गई। मेरे पास कोई नहीं था। मेरे जीवन में कुछ नहीं बचा था। मैं सो नहीं पाती थी, खा नहीं पाती थी, मैंने मुस्कुराना बंद कर दिया था।"
मैं स्वयं के जीवन को समाप्त करने की तरकीबें सोचने लगी थी। तब एक दिन,एक छोटा बिल्ली का बच्चा मेरे पीछे लग गया जब मैं काम से घर आ रही थी। बाहर बहुत ठंड थी इसलिए मैंने उस बच्चे को अंदर आने दिया। उस बिल्ली के बच्चे के लिए थोड़े से दूध का इंतजाम किया और वह सारी प्लेट सफाचट कर गया। फिर वह मेरे पैरों से लिपट गया और चाटने लगा।"
"उस दिन बहुत महीनों बाद मैं मुस्कुराई। तब मैंने सोचा यदि इस बिल्ली के बच्चे की सहायता करने से मुझे ख़ुशी मिल सकती है, तो हो सकता है कि दूसरों के लिए कुछ करके मुझे और भी ख़ुशी मिले। इसलिए अगले दिन मैं अपने पड़ोसी, जो कि बीमार था, के लिए कुछ बिस्किट्स बना कर ले गई।"
"हर दिन मैं कुछ नया और कुछ ऐसा करती थी जिससे दूसरों को ख़ुशी मिले और उन्हें खुश देख कर मुझे ख़ुशी मिलती थी।" "आज, मैंने खुशियाँ ढूँढी हैं, दूसरों को ख़ुशी देकर।" यह सुन कर वह अमीर औरत रोने लगी। उसके पास वह सब था जो वह पैसे से खरीद सकती थी। लेकिन उसने वह चीज खो दी थी जो पैसे से नहीं खरीदी जा सकती।
मित्रों! हमारा जीवन इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने खुश हैं अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी वजह से कितने लोग खुश हैं।
तो आईये आज शुभारम्भ करें इस संकल्प के साथ कि आज हम भी किसी न किसी की खुशी का कारण बनें।
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मनोचिकित्सक ने एक बूढ़ी औरत को बुलाया जो वहाँ साफ़-सफाई का काम करती थी और उस अमीर औरत से बोला - "मैं इस बूढी औरत से तुम्हें यह बताने के लिए कहूँगा कि कैसे उसने अपने जीवन में खुशियाँ ढूँढी। मैं चाहता हूँ कि आप उसे ध्यान से सुनें।"
तब उस बूढ़ी औरत ने अपना झाड़ू नीचे रखा, कुर्सी पर बैठ गई और बताने लगी - "मेरे पति की मलेरिया से मृत्यु हो गई और उसके 3 महीने बाद ही मेरे बेटे की भी सड़क हादसे में मौत हो गई। मेरे पास कोई नहीं था। मेरे जीवन में कुछ नहीं बचा था। मैं सो नहीं पाती थी, खा नहीं पाती थी, मैंने मुस्कुराना बंद कर दिया था।"
मैं स्वयं के जीवन को समाप्त करने की तरकीबें सोचने लगी थी। तब एक दिन,एक छोटा बिल्ली का बच्चा मेरे पीछे लग गया जब मैं काम से घर आ रही थी। बाहर बहुत ठंड थी इसलिए मैंने उस बच्चे को अंदर आने दिया। उस बिल्ली के बच्चे के लिए थोड़े से दूध का इंतजाम किया और वह सारी प्लेट सफाचट कर गया। फिर वह मेरे पैरों से लिपट गया और चाटने लगा।"
"उस दिन बहुत महीनों बाद मैं मुस्कुराई। तब मैंने सोचा यदि इस बिल्ली के बच्चे की सहायता करने से मुझे ख़ुशी मिल सकती है, तो हो सकता है कि दूसरों के लिए कुछ करके मुझे और भी ख़ुशी मिले। इसलिए अगले दिन मैं अपने पड़ोसी, जो कि बीमार था, के लिए कुछ बिस्किट्स बना कर ले गई।"
"हर दिन मैं कुछ नया और कुछ ऐसा करती थी जिससे दूसरों को ख़ुशी मिले और उन्हें खुश देख कर मुझे ख़ुशी मिलती थी।" "आज, मैंने खुशियाँ ढूँढी हैं, दूसरों को ख़ुशी देकर।" यह सुन कर वह अमीर औरत रोने लगी। उसके पास वह सब था जो वह पैसे से खरीद सकती थी। लेकिन उसने वह चीज खो दी थी जो पैसे से नहीं खरीदी जा सकती।
मित्रों! हमारा जीवन इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने खुश हैं अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी वजह से कितने लोग खुश हैं।
तो आईये आज शुभारम्भ करें इस संकल्प के साथ कि आज हम भी किसी न किसी की खुशी का कारण बनें।
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मंगलवार, 15 जनवरी 2019
👉 समर्पण
एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है। वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया। घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई।
वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था।
उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम हुई थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे। वह गाय उस किचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों भी करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फस गए।
दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था। थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है?
बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं। गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारे उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है?
उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी है। गाय ने मुस्कुराते हुए कहा, बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा।
तुम्हें कौन ले जाएगा? थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया। जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे, क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।
गाय समर्पित ह्रदय का प्रतीक है। बाघ अहंकारी मन है और मालिक सद्गुरु का प्रतीक है। कीचड़ यह संसार है। और यह संघर्ष अस्तित्व की लड़ाई है।
👉 किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है लेकिन उसकी अति नहीं होनी चाहिए। आपको किसी हितैषी की हमेशा ही जरूरत होती है।
और सद्गुरु से बड़ा इस दुनिया में सच्चा हितैषी कोई नहीं है।
कोई न सतगुरु सों परोपकारी जग माहिं।
मैलो मन-बुद्धि संवार, यम ते लेत छुड़ाहिं।।
वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था।
उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम हुई थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे। वह गाय उस किचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों भी करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फस गए।
दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था। थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है?
बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं। गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारे उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है?
उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी है। गाय ने मुस्कुराते हुए कहा, बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा।
तुम्हें कौन ले जाएगा? थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया। जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे, क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।
गाय समर्पित ह्रदय का प्रतीक है। बाघ अहंकारी मन है और मालिक सद्गुरु का प्रतीक है। कीचड़ यह संसार है। और यह संघर्ष अस्तित्व की लड़ाई है।
👉 किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है लेकिन उसकी अति नहीं होनी चाहिए। आपको किसी हितैषी की हमेशा ही जरूरत होती है।
और सद्गुरु से बड़ा इस दुनिया में सच्चा हितैषी कोई नहीं है।
कोई न सतगुरु सों परोपकारी जग माहिं।
मैलो मन-बुद्धि संवार, यम ते लेत छुड़ाहिं।।
अपने अंग अवयवों से
पं श्रीराम शर्मा आचार्य परम पूज्य गुरुदेव द्वारा सूक्ष्मीकरण से पहले मार्च 1984 में लोकसेवी कार्यकर्ता-समयदानी-समर्पित शिष्यों को दिया गया महत्त्वपूर्ण निर्देश। यह पत्रक स्वयं परमपूज्य गुरुदेव ने सभी को वितरित करते हुए इसे प्रतिदिन पढ़ने और जीवन में उतारने का आग्रह किया था।
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https://youtu.be/J2Rovz78uwc
पं श्रीराम शर्मा आचार्य परम पूज्य गुरुदेव द्वारा सूक्ष्मीकरण से पहले मार्च 1984 में लोकसेवी कार्यकर्ता-समयदानी-समर्पित शिष्यों को दिया गया महत्त्वपूर्ण निर्देश। यह पत्रक स्वयं परमपूज्य गुरुदेव ने सभी को वितरित करते हुए इसे प्रतिदिन पढ़ने और जीवन में उतारने का आग्रह किया था।
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सोमवार, 14 जनवरी 2019
🌞⚡ मकरसंक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं
🙏🏻 दान, स्नान और उपासना का पर्व है संक्रांति, ऐसे करें सूर्य की उपासना ⚡🌞
मकर संक्रांति सूर्य उपासना का विशेष पर्व है. इस दिन से सूर्य उत्तरायण होना शुरू होते हैं और इसके बाद बाद से धरती के उत्तरी गोलार्ध में शीत ऋतु की ठंडक में कमी आनी शुरू होती है. प्रायः हर साल 14 जनवरी को सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं, इसलिए तिथि को मकर संक्रांति कहते हैं| पूरे भारतवर्ष में ये मनाया जाता है, लेकिन सब जगह मनाने का तरीका और नाम अलग अलग होता है।
इस दिन सूर्योदय से पहले नहाएं, पानी में तिल या तिल का तेल मिला कर नहाना चाहिए। 11 गायत्री मन्त्र, 11 सूर्य गायत्री मन्त्र और 5 महामृत्युंजय मन्त्र से तिल और गुड़ की आहुति यज्ञ में दें।
यदि यज्ञ की व्यवस्था न हो तो गैस जला कर उस पर तवा रख कर गर्म करें, फ़िर मन्त्र पढ़ते हुए यज्ञ की आहुति तवे पर डाल दें। यज्ञ के बाद गैस बन्द कर दें और उस यज्ञ प्रसाद को तुलसी या किसी पौधे के गमले में डाल दें।
सूर्य गायत्री मन्त्र जपते हुए सूर्य भगवान को जल चढ़ाएं। मकर संक्रांति के दिन पीला या श्वेत वस्त्र पहनें। आहार में पहला नाश्ता दिन में तिल और गुड़ का प्रसाद लें। घर में इस दिन खिचड़ी चावल और उड़द की दाल की बना के खाना शुभ होता है।
इस दिन यदि सम्भव हो तो सुबह गंगा या किसी भी पवित्र नदी में स्नान कर कमर तक जल के बीच में खड़े हो सूर्यदेव को जल में तिल-गुड़ अर्घ्य देना चाहिए। ध्यान रखें कि अर्घ्य तांबे के लोटे में दें। पात्र को दोनों हाथों से पकड़ कर सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए। अर्घ्य के समय सूर्य गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए।
सूर्य गायत्री मन्त्र- ऊं भाष्कराय विद्महे दिवाकराय धीमहि तन्नो सूर्य: प्रचोदयात
गायत्री मन्त्र- ॐ भूर्भूवः स्वः तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्
महामृत्युंजय मन्त्र- ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्
🙏🏻 विचारक्रांति अभियान शांतिकुञ्ज हरिद्वार
मकर संक्रांति सूर्य उपासना का विशेष पर्व है. इस दिन से सूर्य उत्तरायण होना शुरू होते हैं और इसके बाद बाद से धरती के उत्तरी गोलार्ध में शीत ऋतु की ठंडक में कमी आनी शुरू होती है. प्रायः हर साल 14 जनवरी को सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं, इसलिए तिथि को मकर संक्रांति कहते हैं| पूरे भारतवर्ष में ये मनाया जाता है, लेकिन सब जगह मनाने का तरीका और नाम अलग अलग होता है।
इस दिन सूर्योदय से पहले नहाएं, पानी में तिल या तिल का तेल मिला कर नहाना चाहिए। 11 गायत्री मन्त्र, 11 सूर्य गायत्री मन्त्र और 5 महामृत्युंजय मन्त्र से तिल और गुड़ की आहुति यज्ञ में दें।
यदि यज्ञ की व्यवस्था न हो तो गैस जला कर उस पर तवा रख कर गर्म करें, फ़िर मन्त्र पढ़ते हुए यज्ञ की आहुति तवे पर डाल दें। यज्ञ के बाद गैस बन्द कर दें और उस यज्ञ प्रसाद को तुलसी या किसी पौधे के गमले में डाल दें।
सूर्य गायत्री मन्त्र जपते हुए सूर्य भगवान को जल चढ़ाएं। मकर संक्रांति के दिन पीला या श्वेत वस्त्र पहनें। आहार में पहला नाश्ता दिन में तिल और गुड़ का प्रसाद लें। घर में इस दिन खिचड़ी चावल और उड़द की दाल की बना के खाना शुभ होता है।
इस दिन यदि सम्भव हो तो सुबह गंगा या किसी भी पवित्र नदी में स्नान कर कमर तक जल के बीच में खड़े हो सूर्यदेव को जल में तिल-गुड़ अर्घ्य देना चाहिए। ध्यान रखें कि अर्घ्य तांबे के लोटे में दें। पात्र को दोनों हाथों से पकड़ कर सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए। अर्घ्य के समय सूर्य गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए।
सूर्य गायत्री मन्त्र- ऊं भाष्कराय विद्महे दिवाकराय धीमहि तन्नो सूर्य: प्रचोदयात
गायत्री मन्त्र- ॐ भूर्भूवः स्वः तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्
महामृत्युंजय मन्त्र- ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्
🙏🏻 विचारक्रांति अभियान शांतिकुञ्ज हरिद्वार
रविवार, 13 जनवरी 2019
👉 मौन उपदेश
उपदेश किस प्रकार दिया जाता है, शिक्षा पैसे की जाती है? क्या मंच पर से श्रोताओं को व्याख्यान पर व्याख्यान सुनाकर उन्हें ज्ञान दिया जा सकता है? उपदेश का अर्थ है ज्ञान का सामाजिक विवरण। वास्तव में यह तो केवल एकान्त में ही हो सकता है। जो मनुष्य घंटे तक व्याख्यान सुनता है, पर जिसे उसके द्वारा अपने दैनिक जीवन को बदलने की कोई प्रेरणा नहीं मिलती उसके लिए सचमुच व्याख्यान का क्या मूल्य है?
इसकी उस मनुष्य से तुलना करो जो घड़ी भर के लिए ही किसी महात्मा की शरण में बैठता है, किन्तु इतने ही से उसके जीवन का सारा दृष्टिकोण बदल जाता है। कौन सी शिक्षा उत्तम है? प्रभावहीन होकर जोर से व्याख्यान देना या चुपचाप शान्तिपूर्वक आध्यात्म ज्ञान का प्रसार करना।
अच्छा, भाषण का उद्गम क्या है? मूल, सब का मूल है शुद्ध ज्ञान। उससे अहंकार ही उत्पत्ति होती है, फिर अहंकार से विचार प्रकट होते है और अन्त में ये शब्दों का रूप धारण करते हैं। इस प्रकार शब्द उस आदि स्रोत के प्रपोत्र के भी पुत्र हैं। यदि शब्दों का कोई मूल्य हो सकता है तो स्वयं निर्णय करो कि मौन उपदेश का प्रभाव कितना शक्तिशाली न होता होगा।
श्री रमन महर्षि,
अखण्ड ज्योति सितम्बर 1942
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https://bit.ly/2KISkiz
इसकी उस मनुष्य से तुलना करो जो घड़ी भर के लिए ही किसी महात्मा की शरण में बैठता है, किन्तु इतने ही से उसके जीवन का सारा दृष्टिकोण बदल जाता है। कौन सी शिक्षा उत्तम है? प्रभावहीन होकर जोर से व्याख्यान देना या चुपचाप शान्तिपूर्वक आध्यात्म ज्ञान का प्रसार करना।
अच्छा, भाषण का उद्गम क्या है? मूल, सब का मूल है शुद्ध ज्ञान। उससे अहंकार ही उत्पत्ति होती है, फिर अहंकार से विचार प्रकट होते है और अन्त में ये शब्दों का रूप धारण करते हैं। इस प्रकार शब्द उस आदि स्रोत के प्रपोत्र के भी पुत्र हैं। यदि शब्दों का कोई मूल्य हो सकता है तो स्वयं निर्णय करो कि मौन उपदेश का प्रभाव कितना शक्तिशाली न होता होगा।
श्री रमन महर्षि,
अखण्ड ज्योति सितम्बर 1942
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शनिवार, 12 जनवरी 2019
👉 विवेकानंद जयंती विशेष : राष्ट्रीय युवा दिवस
'उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाए' का संदेश देने वाले युवाओं के प्रेरणास्त्रोत, समाज सुधारक युवा युग-पुरुष 'स्वामी विवेकानंद' का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता (वर्तमान में में कोलकाता) में हुआ। इनके जन्मदिन को ही राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।
🌹 स्वामी विवेकानंद का जन्म परिचय
स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी 1863 को गौड़ मोहन मुखर्जी स्ट्रीट,कोलकाता में हुआ था. उस दिन हिन्दू कालदर्शक के अनुसार संवत् १९२० की मकर सक्रांति का दिन था. आज हम स्वामी जी के जन्मदिवस को केरियर डे के रूप में मनाते हैं, स्वामी विवेकानन्द आज की युवा पीढ़ी के सच्चे मार्गदर्शक हैं उनके कार्यो और शिक्षाओ पर चलकर जीवन में हर असंभव सफलता के द्वार खोले जा सकते हैं, स्वामी विवेकानंद जी के बचपन का नाम नरेन्द्र था, जो बचपन से ओजस्वी वाणी और ज्ञानवान थे स्वामी जी १८९३ के विश्व सर्व घर्म सम्मलेन में भारत का प्रतिनिधित्व किया था. और अपने विचारो और सोच से पूरी दुनिया के गुरू कहलाये।
एक कालीन परिवार में जन्मे नरेन्द्र घर्म और आद्यात्मिक की तरफ बचपन से ही उनका झुकाव था. स्वामी जी के गुरू श्री रामकृष्ण परमहंस थे. उनकी शिक्षाए और बातो से नरेन्द्र बहुत प्रभावित हुए, विवेकानंद ने परमहंस से ही सिखा कि हर एक आत्मा में परमात्मा का वास होता हैं इसी सोच ने नरेन्द्र के नजरिये और सोच में बड़ा बदलाव आया।
आज हमारे देश में स्वामी विवेकानंद को एक महान संत, और राष्ट्र सुधारक समझे जाते हैं इसी कारण 12 जनवरी को उनके जन्मदिन को राष्ट्रिय युवा दिवस के रूप में मनाते हैं।
🌹 स्वामी विवेकानन्द का बचपन
स्वामी जी के पिता जी का नाम विश्वनाथ दत्त था जो कलकत्ता हाई कोर्ट के जाने-माने वकील थे.और दादा दुर्गा चरण जी फारसी और संस्कर्त के ज्ञाता थे.माँ भुवनेश्वरी देवी स्वामी जी की माता जी का नाम था. जो कि एक धार्मिक स्वभाव की महिला थी. उनका अधिकतर समय महादेव की पूजा में ही व्यतीत होता था. उनकी सोच और विचारो का बालक नरेन्द्र पर गहरा प्रभाव पड़ा बालपन में ही स्वामी जी तेज बुद्दी और ओजस्वी होने के साथ-साथ बड़े नटकट थे. वो अध्यापको और किसी का मजाक उड़ाने में पीछे नहीं हटते थे. बचपन में ही उन्हें माता से धार्मिक पाठ और रामायण सुनना बहुत पसंद था उनके घर में हमेशा भजन कीर्तन हुआ करते थे. इस प्रकार के वातावरण में उनमे गहरी घार्मिक आस्था का जन्म हुआ और भगवान् को जानने का रहस्य उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना दिया जब भी उन्हें कोई ज्ञानी पंडित मिलते उन्हें ईश्वर के स्वरूप के बारे में जरुर पूछते. स्वामी विवेकानंद ने 25 वर्ष की उम्रः में ही घर छोड़ सन्यासी बन गये थे।
🌹 स्वामी विवेकानंद की शिक्षा
मात्र आठ वर्ष की उम्रः में नरेन्द्र ने कलकता के प्रसिद्ध शिक्षा संस्थान ईश्वर चंद्र विद्यासागर में दाखिला लिया. फिर उनका परिवार रायपुर आ बसा फिर से कलकता लोटे और प्रेसीडेंसी कॉलेज में पढाई की और इस कॉलेज से फस्ट डिविजन से उत्तीर्ण करने वाले नरेन्द्र पहले छात्र थे।
नरेन्द्र बचपन से ही घार्मिक, इतिहास, समाज, कला और साहित्य के किताबो और ग्रंथो को पढने में अधिक रूचि रखते थे. साथ ही रामायण, महाभारत और गीता व् वेदों को गहन अध्ययन किया करते थे. स्वामी जी ने बचपन में भारतीय शास्त्रीय सगीत की भी शिक्षा ली. और नित्य शारीरिक खेलो और व्यायामों में भाग लेते थे. इसके साथ ही नरेन्द्र ने स्कॉटिश चर्च कॉलेज पिश्चमी सभ्यता और संस्कर्ती का गहन अध्ययन किया. नरेन्द्र ने वर्ष 1881 में ललित कला की परीक्षा पार की और वर्ष 1884 में कला वर्ग में स्नातक पास की।।
नरेन्द्र ने सभी वैज्ञानिकों और शिक्षा शास्त्रियों के ग्रंथो का अध्ययन किया जिनमे डेविड ह्यूम, इमैनुएल कांट, जोहान गोटलिब फिच, बारूक स्पिनोज़ा, जोर्ज डब्लू एच हेजेल, आर्थर स्कूपइन्हार, ऑगस्ट कॉम्टे, जॉन स्टुअर्ट मिल और चार्ल्स डार्विन की रचनाये शामिल थी. नरेन्द्र ने कई विदेशी भाषा की पुस्तको का हिन्दी और स्थानीय भाषा बंगाली में अनुवाद भी किया..
नरेन्द्र की कुशाग्र बुद्दी के बारे में हेस्टी नाम के प्रोफ़ेसर ने नरेन्द्र के बारे में कहा की -नरेंद्र वास्तव में एक जीनियस है। मैंने काफी विस्तृत और बड़े इलाकों में यात्रा की है लेकिन उनकी जैसी प्रतिभा वाला का एक भी बालक कहीं नहीं देखा यहाँ तक की जर्मन विश्वविद्यालयों के दार्शनिक छात्रों में भी नहीं।
🌹 स्वामी विवेकानंद का जन्म परिचय
स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी 1863 को गौड़ मोहन मुखर्जी स्ट्रीट,कोलकाता में हुआ था. उस दिन हिन्दू कालदर्शक के अनुसार संवत् १९२० की मकर सक्रांति का दिन था. आज हम स्वामी जी के जन्मदिवस को केरियर डे के रूप में मनाते हैं, स्वामी विवेकानन्द आज की युवा पीढ़ी के सच्चे मार्गदर्शक हैं उनके कार्यो और शिक्षाओ पर चलकर जीवन में हर असंभव सफलता के द्वार खोले जा सकते हैं, स्वामी विवेकानंद जी के बचपन का नाम नरेन्द्र था, जो बचपन से ओजस्वी वाणी और ज्ञानवान थे स्वामी जी १८९३ के विश्व सर्व घर्म सम्मलेन में भारत का प्रतिनिधित्व किया था. और अपने विचारो और सोच से पूरी दुनिया के गुरू कहलाये।
एक कालीन परिवार में जन्मे नरेन्द्र घर्म और आद्यात्मिक की तरफ बचपन से ही उनका झुकाव था. स्वामी जी के गुरू श्री रामकृष्ण परमहंस थे. उनकी शिक्षाए और बातो से नरेन्द्र बहुत प्रभावित हुए, विवेकानंद ने परमहंस से ही सिखा कि हर एक आत्मा में परमात्मा का वास होता हैं इसी सोच ने नरेन्द्र के नजरिये और सोच में बड़ा बदलाव आया।
आज हमारे देश में स्वामी विवेकानंद को एक महान संत, और राष्ट्र सुधारक समझे जाते हैं इसी कारण 12 जनवरी को उनके जन्मदिन को राष्ट्रिय युवा दिवस के रूप में मनाते हैं।
🌹 स्वामी विवेकानन्द का बचपन
स्वामी जी के पिता जी का नाम विश्वनाथ दत्त था जो कलकत्ता हाई कोर्ट के जाने-माने वकील थे.और दादा दुर्गा चरण जी फारसी और संस्कर्त के ज्ञाता थे.माँ भुवनेश्वरी देवी स्वामी जी की माता जी का नाम था. जो कि एक धार्मिक स्वभाव की महिला थी. उनका अधिकतर समय महादेव की पूजा में ही व्यतीत होता था. उनकी सोच और विचारो का बालक नरेन्द्र पर गहरा प्रभाव पड़ा बालपन में ही स्वामी जी तेज बुद्दी और ओजस्वी होने के साथ-साथ बड़े नटकट थे. वो अध्यापको और किसी का मजाक उड़ाने में पीछे नहीं हटते थे. बचपन में ही उन्हें माता से धार्मिक पाठ और रामायण सुनना बहुत पसंद था उनके घर में हमेशा भजन कीर्तन हुआ करते थे. इस प्रकार के वातावरण में उनमे गहरी घार्मिक आस्था का जन्म हुआ और भगवान् को जानने का रहस्य उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना दिया जब भी उन्हें कोई ज्ञानी पंडित मिलते उन्हें ईश्वर के स्वरूप के बारे में जरुर पूछते. स्वामी विवेकानंद ने 25 वर्ष की उम्रः में ही घर छोड़ सन्यासी बन गये थे।
🌹 स्वामी विवेकानंद की शिक्षा
मात्र आठ वर्ष की उम्रः में नरेन्द्र ने कलकता के प्रसिद्ध शिक्षा संस्थान ईश्वर चंद्र विद्यासागर में दाखिला लिया. फिर उनका परिवार रायपुर आ बसा फिर से कलकता लोटे और प्रेसीडेंसी कॉलेज में पढाई की और इस कॉलेज से फस्ट डिविजन से उत्तीर्ण करने वाले नरेन्द्र पहले छात्र थे।
नरेन्द्र बचपन से ही घार्मिक, इतिहास, समाज, कला और साहित्य के किताबो और ग्रंथो को पढने में अधिक रूचि रखते थे. साथ ही रामायण, महाभारत और गीता व् वेदों को गहन अध्ययन किया करते थे. स्वामी जी ने बचपन में भारतीय शास्त्रीय सगीत की भी शिक्षा ली. और नित्य शारीरिक खेलो और व्यायामों में भाग लेते थे. इसके साथ ही नरेन्द्र ने स्कॉटिश चर्च कॉलेज पिश्चमी सभ्यता और संस्कर्ती का गहन अध्ययन किया. नरेन्द्र ने वर्ष 1881 में ललित कला की परीक्षा पार की और वर्ष 1884 में कला वर्ग में स्नातक पास की।।
नरेन्द्र ने सभी वैज्ञानिकों और शिक्षा शास्त्रियों के ग्रंथो का अध्ययन किया जिनमे डेविड ह्यूम, इमैनुएल कांट, जोहान गोटलिब फिच, बारूक स्पिनोज़ा, जोर्ज डब्लू एच हेजेल, आर्थर स्कूपइन्हार, ऑगस्ट कॉम्टे, जॉन स्टुअर्ट मिल और चार्ल्स डार्विन की रचनाये शामिल थी. नरेन्द्र ने कई विदेशी भाषा की पुस्तको का हिन्दी और स्थानीय भाषा बंगाली में अनुवाद भी किया..
नरेन्द्र की कुशाग्र बुद्दी के बारे में हेस्टी नाम के प्रोफ़ेसर ने नरेन्द्र के बारे में कहा की -नरेंद्र वास्तव में एक जीनियस है। मैंने काफी विस्तृत और बड़े इलाकों में यात्रा की है लेकिन उनकी जैसी प्रतिभा वाला का एक भी बालक कहीं नहीं देखा यहाँ तक की जर्मन विश्वविद्यालयों के दार्शनिक छात्रों में भी नहीं।
👉 स्वामी विवेकानन्द के जन्म के सम्बन्ध में
स्वामी विवेकानन्द के जन्म के सम्बन्ध में श्रीरामकृष्ण देव को एक अद्भूत दर्शन हुआ था।
श्रीरामकृष्ण देव के ही शब्दों में "एक दिन देखा, मन समाधि के मार्ग से ज्योतिर्मय पथ में ऊपर उठता जा रहा है। चन्द्र, सूर्य, नक्षत्रयुक्त स्थूल जगत का सहज में ही अतिक्रमण कर वह पहले सूक्ष्म भाव-जगत में प्रविष्ठ हुआ। उस राज्य के ऊँचे स्तरों में वह जितना ही उठने लगा, उतना ही अनेक देवी- देवताओं की मूर्तियाँ पथ के दोनों ओर दिखाई पड़ने लगीं। क्रमश: उस राज्य की अन्तिम सीमा पर वह आ पहुँचा। वहाँ देखा, एक ज्योतिर्मय परदे के द्वारा खण्ड और अखण्ड राज्यों का विभाग किया गया है। उस परदे को लाँघकर वह क्रमश: अखण्ड राज्य में प्रविष्ट हुआ। वहाँ देखा कि मूर्तरूपधारी कुछ भी नहीं है।
...किन्तु दूसरे ही क्षण दिखाई पड़ा कि दिव्य ज्योतिर्घन -तनु सात प्राचीन ऋषि वहाँ समाधिस्थ होकर बैठे है इसी समय देखता हूँ कि अखण्ड भेदरहित समरस, ज्योतिर्मण्डल का एक अंश घनीभूत होकर एक दिव्य शिशु के रुप में परिणत हो गया। वह देवशिशु उनमें से एक के पास जाकर अपने कोमल हाथों से आलिंगन करके अपनी अमृतमयी वाणी से '' उन्हें समाधि से जगाने के लिए चेष्टा करने लगा।
शिशु के कोमल प्रेम- स्पर्श से ऋषि समाधि से जागृत और अधखुले नेत्रों से उस अपूर्व बालक को देखने लगे वह अद्भूत देवशिशु अति आनन्दित होकर उनसे कहने लगा, 'मैं जा रहा तुम्हें भी आना होगा,... उस समय आश्चर्यचकित होकर मैंने देखा कि उन्हीं ऋषि के शरीर- मन का एक अंश उज्ज्वल के रूप में परिणत होकर विलोम मार्ग से पृथ्वी पर अवतीर्ण हो रहा है।
नरेन्द्र (स्वामी विवेकानन्द) को देखते ही मैं जान गया था कि यही वह है।'' बाद में भक्तों द्वारा पूछने पर उन्हें यह ज्ञात हुआ कि श्रीरामकृष्ण देव ने स्वयं ही उस शिशु का रूप धारण किया था।
श्रीरामकृष्ण देव के ही शब्दों में "एक दिन देखा, मन समाधि के मार्ग से ज्योतिर्मय पथ में ऊपर उठता जा रहा है। चन्द्र, सूर्य, नक्षत्रयुक्त स्थूल जगत का सहज में ही अतिक्रमण कर वह पहले सूक्ष्म भाव-जगत में प्रविष्ठ हुआ। उस राज्य के ऊँचे स्तरों में वह जितना ही उठने लगा, उतना ही अनेक देवी- देवताओं की मूर्तियाँ पथ के दोनों ओर दिखाई पड़ने लगीं। क्रमश: उस राज्य की अन्तिम सीमा पर वह आ पहुँचा। वहाँ देखा, एक ज्योतिर्मय परदे के द्वारा खण्ड और अखण्ड राज्यों का विभाग किया गया है। उस परदे को लाँघकर वह क्रमश: अखण्ड राज्य में प्रविष्ट हुआ। वहाँ देखा कि मूर्तरूपधारी कुछ भी नहीं है।
...किन्तु दूसरे ही क्षण दिखाई पड़ा कि दिव्य ज्योतिर्घन -तनु सात प्राचीन ऋषि वहाँ समाधिस्थ होकर बैठे है इसी समय देखता हूँ कि अखण्ड भेदरहित समरस, ज्योतिर्मण्डल का एक अंश घनीभूत होकर एक दिव्य शिशु के रुप में परिणत हो गया। वह देवशिशु उनमें से एक के पास जाकर अपने कोमल हाथों से आलिंगन करके अपनी अमृतमयी वाणी से '' उन्हें समाधि से जगाने के लिए चेष्टा करने लगा।
शिशु के कोमल प्रेम- स्पर्श से ऋषि समाधि से जागृत और अधखुले नेत्रों से उस अपूर्व बालक को देखने लगे वह अद्भूत देवशिशु अति आनन्दित होकर उनसे कहने लगा, 'मैं जा रहा तुम्हें भी आना होगा,... उस समय आश्चर्यचकित होकर मैंने देखा कि उन्हीं ऋषि के शरीर- मन का एक अंश उज्ज्वल के रूप में परिणत होकर विलोम मार्ग से पृथ्वी पर अवतीर्ण हो रहा है।
नरेन्द्र (स्वामी विवेकानन्द) को देखते ही मैं जान गया था कि यही वह है।'' बाद में भक्तों द्वारा पूछने पर उन्हें यह ज्ञात हुआ कि श्रीरामकृष्ण देव ने स्वयं ही उस शिशु का रूप धारण किया था।
👉 भगवान में विश्वास
स्वामी विवेकानंद का सम्पूर्ण जीवन एक दीपक के समान है जो हमेशा अपने प्रकाश से इस संसार को जगमगाता रहेगा और उनका जीवन सदा हम लोगों के लिए एक प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।
एक बार स्वामी विवेकानंद ट्रेन से यात्रा कर रहे थे और हमेशा की तरह भगवा कपडे और पगड़ी पहनी हुई थी। ट्रेन में यात्रा कर रहे एक अन्य यात्री को उनका ये रूप बहुत अजीब लगा और वो स्वामी जी को कुछ अपशब्द कहने लगा बोला – तुम सन्यासी बनकर घूमते रहते हो कुछ कमाते धमाते क्यों नहीं हो, तुम लोग बहुत आलसी हो, लेकिन स्वामी जी दयावान थे उन्होंने उसकी तरफ बिलकुल भी ध्यान नहीं दिया और हमेशा की तरह चेहरे पे तेज लिए मुस्कुराते रहे।
उस समय स्वामी जी को बहुत भूख लगी हुई थी क्यूंकि उन्होंने सुबह से कुछ खाया पिया नहीं था। स्वामी जी हमेशा दूसरों के कल्याण के बारे में सोचते थे अपने खाने का उन्हें ध्यान ही कहाँ रहता था । एक तरफ स्वामी जी भूख से व्याकुल थे वहीँ वो दूसरा यात्री उनको अप्शब्द और बुरा भला कहने में कोई कमी नहीं छोड़ रहा था । इसी बीच स्टेशन आ गया और स्वामी जी और वो यात्री दोनों उतर गए। उस यात्री ने अपने बैग से अपना खाना निकाला और खाने लगा और स्वामी जी से बोला – अगर कुछ कमाते तो तुम भी खा रहे होते।
स्वामी जी बिना कुछ बोले चुपचाप थकेहारे एक पेड़ के नीचे बैठ गए और बोले मैं अपने ईश्वर पे विश्वास करता हूँ जो वो चाहेंगे वही होगा । अचानक ही कहीं से एक आदमी खाना लिए हुए स्वामी जी के पास आया और बोला क्या आप ही स्वामी विवेकानंद हैं और इतना कहकर को स्वामी जी के कदमों में गिर पड़ा और बोला कि मैंने एक सपना देखा था जिसमें खुद भगवान ने मुझसे कहा कि मेरा परम भक्त विवेकानंद भूखा है तुम जल्दी जाओ और उसे भोजन देकर आओ।
बस इतना सुनना था कि वो यात्री जो स्वामी जी की आलोचना कर रहा था भाग कर आया और स्वामी जी के कदमों में गिर पड़ा, बोला – महाराज मुझे क्षमा कर दीजिये मुझसे बहुत बड़ी भूल हुई है मैंने भगवान को देखा नहीं है लेकिन आज जो चमत्कार मैंने देखा उसने मेरे भगवान में विश्वास को बहुत ज्यादा बड़ा दिया है। स्वामी जी ने दया भाव से व्यक्ति को उठाया और गले से लगा लिया।
स्वामी जी के जीवन से जुडी ये सत्य घटना बहुत अधिक प्रभावित करती है और बताती है कि किस तरह भगवान अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और पालन पोषण करते हैं।
एक बार स्वामी विवेकानंद ट्रेन से यात्रा कर रहे थे और हमेशा की तरह भगवा कपडे और पगड़ी पहनी हुई थी। ट्रेन में यात्रा कर रहे एक अन्य यात्री को उनका ये रूप बहुत अजीब लगा और वो स्वामी जी को कुछ अपशब्द कहने लगा बोला – तुम सन्यासी बनकर घूमते रहते हो कुछ कमाते धमाते क्यों नहीं हो, तुम लोग बहुत आलसी हो, लेकिन स्वामी जी दयावान थे उन्होंने उसकी तरफ बिलकुल भी ध्यान नहीं दिया और हमेशा की तरह चेहरे पे तेज लिए मुस्कुराते रहे।
उस समय स्वामी जी को बहुत भूख लगी हुई थी क्यूंकि उन्होंने सुबह से कुछ खाया पिया नहीं था। स्वामी जी हमेशा दूसरों के कल्याण के बारे में सोचते थे अपने खाने का उन्हें ध्यान ही कहाँ रहता था । एक तरफ स्वामी जी भूख से व्याकुल थे वहीँ वो दूसरा यात्री उनको अप्शब्द और बुरा भला कहने में कोई कमी नहीं छोड़ रहा था । इसी बीच स्टेशन आ गया और स्वामी जी और वो यात्री दोनों उतर गए। उस यात्री ने अपने बैग से अपना खाना निकाला और खाने लगा और स्वामी जी से बोला – अगर कुछ कमाते तो तुम भी खा रहे होते।
स्वामी जी बिना कुछ बोले चुपचाप थकेहारे एक पेड़ के नीचे बैठ गए और बोले मैं अपने ईश्वर पे विश्वास करता हूँ जो वो चाहेंगे वही होगा । अचानक ही कहीं से एक आदमी खाना लिए हुए स्वामी जी के पास आया और बोला क्या आप ही स्वामी विवेकानंद हैं और इतना कहकर को स्वामी जी के कदमों में गिर पड़ा और बोला कि मैंने एक सपना देखा था जिसमें खुद भगवान ने मुझसे कहा कि मेरा परम भक्त विवेकानंद भूखा है तुम जल्दी जाओ और उसे भोजन देकर आओ।
बस इतना सुनना था कि वो यात्री जो स्वामी जी की आलोचना कर रहा था भाग कर आया और स्वामी जी के कदमों में गिर पड़ा, बोला – महाराज मुझे क्षमा कर दीजिये मुझसे बहुत बड़ी भूल हुई है मैंने भगवान को देखा नहीं है लेकिन आज जो चमत्कार मैंने देखा उसने मेरे भगवान में विश्वास को बहुत ज्यादा बड़ा दिया है। स्वामी जी ने दया भाव से व्यक्ति को उठाया और गले से लगा लिया।
स्वामी जी के जीवन से जुडी ये सत्य घटना बहुत अधिक प्रभावित करती है और बताती है कि किस तरह भगवान अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और पालन पोषण करते हैं।
👉 देने का आनंद पाने के आनंद से बड़ा होता है
भ्रमण एवं भाषणों से थके हुए स्वामी विवेकानंद अपने निवास स्थान पर लौटे। उन दिनों वे अमेरिका में एक महिला के यहां ठहरे हुए थे। वे अपने हाथों से भोजन बनाते थे। एक दिन वे भोजन की तैयारी कर रहे थे कि कुछ बच्चे पास आकर खड़े हो गए।
उनके पास सामान्यतया बच्चों का आना-जाना लगा ही रहता था। बच्चे भूखे थे। स्वामीजी ने अपनी सारी रोटियां एक-एक कर बच्चों में बांट दी। महिला वहीं बैठी सब देख रही थी। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। आखिर उससे रहा नहीं गया और उसने स्वामीजी से पूछ ही लिया- 'आपने सारी रोटियां उन बच्चों को दे डाली, अब आप क्या खाएंगे?'
स्वामीजी के अधरों पर मुस्कान दौड़ गई। उन्होंने प्रसन्न होकर कहा- 'मां, रोटी तो पेट की ज्वाला शांत करने वाली वस्तु है। इस पेट में न सही, उस पेट में ही सही।' देने का आनंद पाने के आनंद से बड़ा होता है।
उनके पास सामान्यतया बच्चों का आना-जाना लगा ही रहता था। बच्चे भूखे थे। स्वामीजी ने अपनी सारी रोटियां एक-एक कर बच्चों में बांट दी। महिला वहीं बैठी सब देख रही थी। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। आखिर उससे रहा नहीं गया और उसने स्वामीजी से पूछ ही लिया- 'आपने सारी रोटियां उन बच्चों को दे डाली, अब आप क्या खाएंगे?'
स्वामीजी के अधरों पर मुस्कान दौड़ गई। उन्होंने प्रसन्न होकर कहा- 'मां, रोटी तो पेट की ज्वाला शांत करने वाली वस्तु है। इस पेट में न सही, उस पेट में ही सही।' देने का आनंद पाने के आनंद से बड़ा होता है।
👉 स्वामी विवेकानन्द जैसा पुत्र
एक बार जब स्वामी विवेकानंद अमेरिका गए थे, एक महिला ने उनसे शादी करने की इच्छा जताई. जब स्वामी विवेकानंद ने उस महिला से ये पुछा कि आप ने ऐसा प्रश्न क्यूँ किया?
उस महिला का उत्तर था कि वो उनकी बुद्धि से बहुत मोहित है.और उसे एक ऐसे ही बुद्धिमान बच्चे कि कामना है. इसीलिए उसने स्वामी से ये प्रश्न किया कि क्या वो उससे शादी कर सकते है और उसे अपने जैसा एक बच्चा दे सकते हैं?
उन्होंने महिला से कहा कि चूँकि वो सिर्फ उनकी बुद्धि पर मोहित हैं इसलिए कोई समस्या नहीं है. उन्होंने कहा “मैं आपकी इच्छा को समझता हूँ. शादी करना और इस दुनिया में एक बच्चा लाना और फिर जानना कि वो बुद्धिमान है कि नहीं, इसमें बहुत समय लगेगा. इसके अलावा ऐसा हो इसकी गारंटी भी नहीं है. इसके बजाय, आपकी इच्छा को तुरंत पूरा करने हेतु मैं आपको एक सुझाव दे सकता हूँ. मुझे अपने बच्चे के रूप में स्वीकार कर लें .इस प्रकार आप मेरी माँ बन जाएँगी. और इस प्रकार मेरे जैसे बुद्धिमान बच्चा पाने की आपकी इच्छा भी पूर्ण हो जाएगी।“
उस महिला का उत्तर था कि वो उनकी बुद्धि से बहुत मोहित है.और उसे एक ऐसे ही बुद्धिमान बच्चे कि कामना है. इसीलिए उसने स्वामी से ये प्रश्न किया कि क्या वो उससे शादी कर सकते है और उसे अपने जैसा एक बच्चा दे सकते हैं?
उन्होंने महिला से कहा कि चूँकि वो सिर्फ उनकी बुद्धि पर मोहित हैं इसलिए कोई समस्या नहीं है. उन्होंने कहा “मैं आपकी इच्छा को समझता हूँ. शादी करना और इस दुनिया में एक बच्चा लाना और फिर जानना कि वो बुद्धिमान है कि नहीं, इसमें बहुत समय लगेगा. इसके अलावा ऐसा हो इसकी गारंटी भी नहीं है. इसके बजाय, आपकी इच्छा को तुरंत पूरा करने हेतु मैं आपको एक सुझाव दे सकता हूँ. मुझे अपने बच्चे के रूप में स्वीकार कर लें .इस प्रकार आप मेरी माँ बन जाएँगी. और इस प्रकार मेरे जैसे बुद्धिमान बच्चा पाने की आपकी इच्छा भी पूर्ण हो जाएगी।“
👉 माँ की महिमा
स्वामी विवेकानंद जी से एक जिज्ञासु ने प्रश्न किया," माँ की महिमा संसार में किस कारण से गायी जाती है? स्वामी जी मुस्कराए, उस व्यक्ति से बोले, पांच सेर वजन का एक पत्थर ले आओ। जब व्यक्ति पत्थर ले आया तो स्वामी जी ने उससे कहा, " अब इस पत्थर को किसी कपडे में लपेटकर अपने पेट पर बाँध लो और चौबीस घंटे बाद मेरे पास आओ तो मई तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूंगा।"
स्वामी जी के आदेशानुसार उस व्यक्ति ने पत्थर को अपने पेट पर बाँध लिया और चला गया। पत्थर बंधे हुए दिनभर वो अपना कम करता रहा, किन्तु हर छण उसे परेशानी और थकान महसूस हुई। शाम होते-होते पत्थर का बोझ संभाले हुए चलना फिरना उसके लिए असह्य हो उठा। थका मांदा वह स्वामी जी के पास पंहुचा और बोला , " मै इस पत्थर को अब और अधिक देर तक बांधे नहीं रख सकूँगा। एक प्रश्न का उत्तर पाने क लिए मै इतनी कड़ी सजा नहीं भुगत सकता।"
स्वामी जी मुस्कुराते हुए बोले, " पेट पर इस पत्थर का बोझ तुमसे कुछ घंटे भी नहीं उठाया गया और माँ अपने गर्भ में पलने वाले शिशु को पूरे नौ माह तक ढ़ोती है और ग्रहस्थी का सारा काम करती है। संसार में माँ के सिवा कोई इतना धैर्यवान और सहनशील नहीं है इसलिए माँ से बढ़ कर इस संसार में कोई और नहीं।
स्वामी जी के आदेशानुसार उस व्यक्ति ने पत्थर को अपने पेट पर बाँध लिया और चला गया। पत्थर बंधे हुए दिनभर वो अपना कम करता रहा, किन्तु हर छण उसे परेशानी और थकान महसूस हुई। शाम होते-होते पत्थर का बोझ संभाले हुए चलना फिरना उसके लिए असह्य हो उठा। थका मांदा वह स्वामी जी के पास पंहुचा और बोला , " मै इस पत्थर को अब और अधिक देर तक बांधे नहीं रख सकूँगा। एक प्रश्न का उत्तर पाने क लिए मै इतनी कड़ी सजा नहीं भुगत सकता।"
स्वामी जी मुस्कुराते हुए बोले, " पेट पर इस पत्थर का बोझ तुमसे कुछ घंटे भी नहीं उठाया गया और माँ अपने गर्भ में पलने वाले शिशु को पूरे नौ माह तक ढ़ोती है और ग्रहस्थी का सारा काम करती है। संसार में माँ के सिवा कोई इतना धैर्यवान और सहनशील नहीं है इसलिए माँ से बढ़ कर इस संसार में कोई और नहीं।
शुक्रवार, 11 जनवरी 2019
👉 प्रशंसा से बहका मनुष्य.......
एक दिन एक आदमी एक ज्योतिषी से मिला ज्योतिषी ने उसे बताया की तुम्हारी जिन्दगी थोड़ी सी हैं केवल महीने भर की आयु बाकी हैं, वह आदमी बहुत चिंतित हुआ वह चिंता में डूब गया उसने एक संत ये यहाँ दस्तक दी, संत के चरणों में खूब रोया और मृत्यु से बचा लेने की प्रार्थना की।
संत ने पूछा तुम क्या करते हो? उसने जबाब दिया मूर्तिकार हूँ, मुर्तिया बनाता हूँ। संत ने उसे उपाय सुझाया तुम अपनी जैसी शक्ल की आठ मुर्तिया बनाओ।
मुर्तिया हू- ब- हू तुम्हारे जैसी ही होनी चाहिए, सो जिस दिन मृत्यु का बात आये, उस दिन सब को एक से वस्त्र पहना कर लाइन में खड़ा कर देना और इनके बीचो बीच में तुम स्वयं खड़े हो जाना तथा जैसे ही यमदूत तुमको लेने आये तो तुम एक मिनट के लिए अपनी साँस रोक लेना।
यमदूत तुमको पहचान नहीं पायेंगे, और इस तरह वे तुम्हे छोड़ कर चले जायेगे तथा तुम्हरी मृत्यु की घडी टल जायेगी। मूर्तिकार ने ऐसा ही किया मृत्यु के दिन यमदूत उसे लेने आए यमदूतो ने देखा कि एक जैसे नौ आदमी खड़े हैं। मुश्किल में पड़ गए इसमें असली कौन हैं और नकली कौन हैं, मालूम ही नहीं पड़ रहा और बेचारे यमदूत खाली हाथ ही लौट गए।
यमलोक जाकर यमराज से शिकायत की वहां नौ लोग खड़े हैं समझ में नहीं आता किसको लाना हैं। यमराज ने भी सुना तो उसे भी आश्चर्य हुआ क्यों कि पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ यमराज ने सोचा, मृत्युलोक में कोई नया ब्रह्मा पैदा हो गया हैं, जो एक जैसे अनेक व्यक्ति बनाने लगा हैं। यमराज जी ने ब्रह्मा जी को बुलवाया और पूछा ये क्या मामला हैं ? एक जैसी शक्ल के नौ- नौ आदमी ?
यमदूत पेशोपेश में हैं कि कौन असली हैं और कौन नकली, लेकर किसको जाना हैं यह कैसा तमाशा हैं ? ब्रह्मा जी ने देखा तो उनका भी सर चकराया, ब्रह्मा जी बोले मैंने तो पूरी पृथ्वी पर एक जैसे दो आदमी नहीं बनाये, लगता हैं सचमुच में कोई नया ब्रह्मा पैदा हो गया हैं, जिसने एक जैसे दो नहीं बल्कि नौ- नौ आदमीं बना दिए हैं। ब्रह्मा जी बोले मामला जटिल हैं इसका निपटारा विष्णु जी कर सकते हैं।
विष्णु जी को बुलवाया गया विष्णु जी ने सभी मूर्तियों की परिक्रमा की, उन्हें ध्यान से देखा तो असली बात समझ में आ गई। विष्णु जी ने ब्रह्मा जी से कहा - प्रभु क्या कमाल की कला हैं क्या सुन्दर और सजीव मुर्तिया बनायीं हैं जिसने यह मुर्तिया बनायीं हैं अगर मुझे मिल जाए तो में स्वयं उसका अभिनन्दन करूँगा, मैं स्वयं उसकी कला को पुरस्कृत करूँगा।
विष्णु द्वारा इतनी प्रशंसा सुननी थी कि बीच की मूर्ति (जिसमे स्वयं मूर्तिकार था) बोल पड़ी - प्रभु मैंने ही बनायीं हैं, मैं ही मूर्तिकार हूँ । विष्णु जी ने उसका कान पकड़ा और कहा - चल निकल बाहर हम तुझे ही खोज रहे थे और यमदूत पकड़कर उसे अपने साथ ले गए।
इसलिए कहते हे न यहाँ इस धरती पर हर आदमी अपनी जरा सी प्रशंसा भर से बहक जाता हैं। प्रशंसा में फूल जाना और अपनी औकात को भूल जाना ही मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी हैं, कोई आपकी कितनी भी तारीफ करे तो आपको जरा सावधान रहना चाहिए क्योंकि हो सकता है वह ही आपके लिए कोई जाल तैयार कर रहा हो। जीवन में हमेशा संयम बरते और ध्यान रखे ।
संत ने पूछा तुम क्या करते हो? उसने जबाब दिया मूर्तिकार हूँ, मुर्तिया बनाता हूँ। संत ने उसे उपाय सुझाया तुम अपनी जैसी शक्ल की आठ मुर्तिया बनाओ।
मुर्तिया हू- ब- हू तुम्हारे जैसी ही होनी चाहिए, सो जिस दिन मृत्यु का बात आये, उस दिन सब को एक से वस्त्र पहना कर लाइन में खड़ा कर देना और इनके बीचो बीच में तुम स्वयं खड़े हो जाना तथा जैसे ही यमदूत तुमको लेने आये तो तुम एक मिनट के लिए अपनी साँस रोक लेना।
यमदूत तुमको पहचान नहीं पायेंगे, और इस तरह वे तुम्हे छोड़ कर चले जायेगे तथा तुम्हरी मृत्यु की घडी टल जायेगी। मूर्तिकार ने ऐसा ही किया मृत्यु के दिन यमदूत उसे लेने आए यमदूतो ने देखा कि एक जैसे नौ आदमी खड़े हैं। मुश्किल में पड़ गए इसमें असली कौन हैं और नकली कौन हैं, मालूम ही नहीं पड़ रहा और बेचारे यमदूत खाली हाथ ही लौट गए।
यमलोक जाकर यमराज से शिकायत की वहां नौ लोग खड़े हैं समझ में नहीं आता किसको लाना हैं। यमराज ने भी सुना तो उसे भी आश्चर्य हुआ क्यों कि पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ यमराज ने सोचा, मृत्युलोक में कोई नया ब्रह्मा पैदा हो गया हैं, जो एक जैसे अनेक व्यक्ति बनाने लगा हैं। यमराज जी ने ब्रह्मा जी को बुलवाया और पूछा ये क्या मामला हैं ? एक जैसी शक्ल के नौ- नौ आदमी ?
यमदूत पेशोपेश में हैं कि कौन असली हैं और कौन नकली, लेकर किसको जाना हैं यह कैसा तमाशा हैं ? ब्रह्मा जी ने देखा तो उनका भी सर चकराया, ब्रह्मा जी बोले मैंने तो पूरी पृथ्वी पर एक जैसे दो आदमी नहीं बनाये, लगता हैं सचमुच में कोई नया ब्रह्मा पैदा हो गया हैं, जिसने एक जैसे दो नहीं बल्कि नौ- नौ आदमीं बना दिए हैं। ब्रह्मा जी बोले मामला जटिल हैं इसका निपटारा विष्णु जी कर सकते हैं।
विष्णु जी को बुलवाया गया विष्णु जी ने सभी मूर्तियों की परिक्रमा की, उन्हें ध्यान से देखा तो असली बात समझ में आ गई। विष्णु जी ने ब्रह्मा जी से कहा - प्रभु क्या कमाल की कला हैं क्या सुन्दर और सजीव मुर्तिया बनायीं हैं जिसने यह मुर्तिया बनायीं हैं अगर मुझे मिल जाए तो में स्वयं उसका अभिनन्दन करूँगा, मैं स्वयं उसकी कला को पुरस्कृत करूँगा।
विष्णु द्वारा इतनी प्रशंसा सुननी थी कि बीच की मूर्ति (जिसमे स्वयं मूर्तिकार था) बोल पड़ी - प्रभु मैंने ही बनायीं हैं, मैं ही मूर्तिकार हूँ । विष्णु जी ने उसका कान पकड़ा और कहा - चल निकल बाहर हम तुझे ही खोज रहे थे और यमदूत पकड़कर उसे अपने साथ ले गए।
इसलिए कहते हे न यहाँ इस धरती पर हर आदमी अपनी जरा सी प्रशंसा भर से बहक जाता हैं। प्रशंसा में फूल जाना और अपनी औकात को भूल जाना ही मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी हैं, कोई आपकी कितनी भी तारीफ करे तो आपको जरा सावधान रहना चाहिए क्योंकि हो सकता है वह ही आपके लिए कोई जाल तैयार कर रहा हो। जीवन में हमेशा संयम बरते और ध्यान रखे ।
👉 मन मन्दिर को निर्मल बनाओ!
प्यारे प्रभु के दर्शन करने हैं तो मन मन्दिर की सफाई करो। तब देव अपनी सर्व शक्तियों से उसमें पधारेंगे। मन को निर्मल बनाने के लिए अपने में मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा आदि भावनाओं को जगाओ। अर्थात् सुखी पुरुषों में मित्रता, दुखियों पर करुणा-पुण्य आत्माओं पर हर्ष और पापियों पर उपेक्षा की भावना से चित्त निर्मल हो जाता है। मैत्री, करुणा और हर्ष से चित में उत्साह और शान्ति रहती है और पापियों की उपेक्षा करने से मनुष्य क्रोध से बच जाता है। इसके अलावा छल, कपट और स्वार्थादि दोषों को छोड़ दो, दोनों में स्वार्थ मुख्य है।
इसके उदय होने से शेष सब अवगुण अपना बल बढ़ाते हैं। गुणों में मैत्री सबसे अधिक मूल्यवान है। इसके आने पर शेष सब गुण इसकी छाया मैं आ जाते हैं प्रेम प्रकाश है, स्वार्थ अन्धकार है, प्रेम उदार है स्वार्थ धोखे का बाजार है। प्रेम ने संसार को सुधारा स्वार्थ ने संसार को बिगाड़ा- प्रेम परमेश्वर से मिलाता है। स्वार्थ संसार के बंधन में गिराता है।
इसलिए प्रेम सत्संग, स्वाध्याय द्वारा निष्कपट, सरल स्वभाव से अपने अन्तःकरण को पवित्र बनाओ अनेक जन्मों की परम्परा से जो बुरी वासनायें दृढ़ हो गई हैं उनको दूर करो, स्वार्थ को छोड़कर सच्ची प्रभु भक्ति साधारणतया, प्राणी मात्र की सेवा और विशेषतया मनुष्य मात्र की सेवा करो। इस प्रकार जो मल बुरे खोटे कर्मों के करने से बढ़ता है, विक्षेप जो पुरुषार्थ न करके केवल इच्छा करते रहने से मन को चंचल बनाता है और आवरण जो स्वाध्याय सत्संग के बिना बढ़ता है को दूर करके भगवान की कृपा को प्राप्त करो। यही एक सरल मार्ग है।
✍🏻 स्वामी सर्वदानन्द जी महाराज
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1943
इसके उदय होने से शेष सब अवगुण अपना बल बढ़ाते हैं। गुणों में मैत्री सबसे अधिक मूल्यवान है। इसके आने पर शेष सब गुण इसकी छाया मैं आ जाते हैं प्रेम प्रकाश है, स्वार्थ अन्धकार है, प्रेम उदार है स्वार्थ धोखे का बाजार है। प्रेम ने संसार को सुधारा स्वार्थ ने संसार को बिगाड़ा- प्रेम परमेश्वर से मिलाता है। स्वार्थ संसार के बंधन में गिराता है।
इसलिए प्रेम सत्संग, स्वाध्याय द्वारा निष्कपट, सरल स्वभाव से अपने अन्तःकरण को पवित्र बनाओ अनेक जन्मों की परम्परा से जो बुरी वासनायें दृढ़ हो गई हैं उनको दूर करो, स्वार्थ को छोड़कर सच्ची प्रभु भक्ति साधारणतया, प्राणी मात्र की सेवा और विशेषतया मनुष्य मात्र की सेवा करो। इस प्रकार जो मल बुरे खोटे कर्मों के करने से बढ़ता है, विक्षेप जो पुरुषार्थ न करके केवल इच्छा करते रहने से मन को चंचल बनाता है और आवरण जो स्वाध्याय सत्संग के बिना बढ़ता है को दूर करके भगवान की कृपा को प्राप्त करो। यही एक सरल मार्ग है।
✍🏻 स्वामी सर्वदानन्द जी महाराज
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1943
👉 The Second Tenet of Self-refinement: Mastering Our Feelings
Continual self refinement needs us to suppress unwanted urges while simultaneously cultivating divine virtues. Anger, hatred, pride, greed, cruelty, and despair etc are just a few amongst the negative emotional urges. All of them should be uprooted slowly and steadily. One of the ways of getting rid of them is to develop the opposite tendencies in the form of patience, love, affection, encouragement, humility, compassion, and truthfulness etc. As we continue to develop these positive attributes, the unwanted patterns and impressions will disappear on their own.
Love one and all. Your enemies will disappear and your circle of friend will get bigger. Similarly, practicing patience, humility, and compassion will slowly and naturally eradicate all unwanted patterns and feelings.
Pt. Shriram Sharma Aacharya
Aatmagyaan aur Atmakalyaan (Self-realization and Self-benefit) Page 9
Love one and all. Your enemies will disappear and your circle of friend will get bigger. Similarly, practicing patience, humility, and compassion will slowly and naturally eradicate all unwanted patterns and feelings.
Pt. Shriram Sharma Aacharya
Aatmagyaan aur Atmakalyaan (Self-realization and Self-benefit) Page 9
👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 Jan 2019
◾ बद्ध जीव का एक और लक्षण है। यदि उसको संसार से हटाकर किसी अच्छी जगह पर ले जाओ, तो वह तड़प-तड़पकर मर जाएगा। विष्ठा के कीट को विष्ठा ही में आनन्द मिलता है। उसी से वह हृष्टपुष्ट होता है। उस कीट को अगर अन्न की हण्डी में रख दो तो वह मर जाएगा।
◾ यह माया या 'अहं' मेघ की तरह है। मेघ का एक छोटासा ही टुकडा़ क्यों न हो, पर उसके कारण सूर्य नहीं दीख पड़ते। उसके हट जाने से ही सूर्य दीख पड़ते हैं। यदि श्रीगुरू की कृपा से एक बार अहंबुद्धि दूर हो जाय तो फिर ईश्वर के दर्शन होते हैं।
◾ किसी मेढ़क के पास एक रुपया था। वह एक बिल में रखा रहता था। एक हाथी उस बिल को लाँघ गया। तब मेढ़क बिल से निकलकर बडे़ गुस्से में आकर लगा हाथी को लात दिखाने! और बोला, तुझे इतनी हिम्मत कि मुझे लाँघ जाय!' रुपये का इतना अहंकार होता है!
◾ विषयबुद्धि का लेशमात्र रहते उनके दर्शन नहीं हो सकते। दियासलाई अगर भीगी हो तो चाहे जितना रगडो़ वह जलती ही नहीं - बीसों दियासलाई व्यर्थ ही बरबाद हो जाती हैं। विषयासक्त मन भीगी दियासलाई है।
✍🏻 श्रीरामकृष्ण परमहंस
◾ यह माया या 'अहं' मेघ की तरह है। मेघ का एक छोटासा ही टुकडा़ क्यों न हो, पर उसके कारण सूर्य नहीं दीख पड़ते। उसके हट जाने से ही सूर्य दीख पड़ते हैं। यदि श्रीगुरू की कृपा से एक बार अहंबुद्धि दूर हो जाय तो फिर ईश्वर के दर्शन होते हैं।
◾ किसी मेढ़क के पास एक रुपया था। वह एक बिल में रखा रहता था। एक हाथी उस बिल को लाँघ गया। तब मेढ़क बिल से निकलकर बडे़ गुस्से में आकर लगा हाथी को लात दिखाने! और बोला, तुझे इतनी हिम्मत कि मुझे लाँघ जाय!' रुपये का इतना अहंकार होता है!
◾ विषयबुद्धि का लेशमात्र रहते उनके दर्शन नहीं हो सकते। दियासलाई अगर भीगी हो तो चाहे जितना रगडो़ वह जलती ही नहीं - बीसों दियासलाई व्यर्थ ही बरबाद हो जाती हैं। विषयासक्त मन भीगी दियासलाई है।
✍🏻 श्रीरामकृष्ण परमहंस
गुरुवार, 10 जनवरी 2019
👉 पुण्य की जड़ें
एक बड़ा व्यापारी नदी में स्नान करने गया। उस दिन वहां काफी भीड़ थी। व्यापारी की नजर नदी में डूबते हुए एक व्यक्ति पर पड़ी। वह तुरंत नदी में कूद गया। व्यक्ति को बाहर निकालने पर देखा कि वह उनका अकाउंटेंट था। कुछ देर बाद अकाउंटेंट को होश आया। व्यापारी ने उससे इस हालत में पहुंचने का कारण पूछा। अकाउंटेंट ने बात बनाते हुए कहा, ‘मैंने अपना सारा पैसा सट्टा बाजार में खो दिया है। लोगों का काफी उधार है मुझ पर। उन्हीं लोगों के डर से मैंने यह कदम उठाया है।’
व्यापारी ने अकाउंटेंट को सांत्वना दी व कहा, ‘अब चिंता छोड़ो, भविष्य में कभी ऐसा काम मत करना। ईमानदारी से नौकरी करते रहो।’ अकाउंटेंट को नौकरी करते हुए एक साल बीत गया। इस बीच व्यापारी को काफी लाभ हुआ। अकाउंटेंट की नीयत फिर खराब हो गयी।
एक दिन उसके बेटे का जन्मदिन था। उसने सबको खीर खिलाई। व्यापारी के लिए भी एक कटोरा खीर लेकर वह उनके घर पहुंचा। व्यापारी व्यस्त था तो उसे कटोरा मेज पर रखने को कह दिया। काम करते हुए देर हो गयी। थोड़ी देर बाद देखा तो खीर का कटोरा बिल्ली खा रही थी, जिसे खाते ही उसकी तबीयत बिगड़ गयी। व्यापारी को समझ आ गया, पर उसने किसी के सामने जिक्र नहीं किया। सोचा कि जब तक मेरा पुण्य है, मेरा कुछ नहीं हो सकता। अगले दिन अकाउंटेंट ने जब व्यापारी को देखा तो सकपका गया। व्यापारी ने फिर भी कुछ जाहिर नहीं किया। अकाउंटेंट को लगा कि व्यापारी को कुछ पता नहीं चला।
वह फिर व्यापारी का धन हड़पने के बारे में सोचने लगा। एक दिन व्यापारी को कहीं जाना था। उसने अकाउंटेंट को भी मोटी रकम साथ लेकर चलने को कहा। अकाउंटेंट ने व्यापारी को नुकसान पहुंचाने के लिए कुछ गुंडों को साथ रख लिया। एक मंदिर आया। व्यापारी उस ओर जाने लगा। वह जैसे ही झुका, गुंडों ने हमला कर दिया। व्यापारी वहीं बेहोश होकर गिर गया। अकाउंटेंट जैसे ही धन लेकर भागने लगा तो गुंडों की नीयत बिगड़ गयी। उन्होंने धन छीनकर उसे नदी में धकेल दिया।
व्यापारी को होश आया तो सामने अकाउंटेंट को डूबते हुए देखा। अपने दयालु स्वभाव के अनुसार सेठ ने फिर अकाउंटेंट को बचा लिया। होश में आने के बाद अकाउंटेंट ने व्यापारी के पैर पकड़े और माफी मांगने लगा। व्यापारी ने उसे मन ही मन माफी दी और इतना ही कहा- जब तक किसी के पुण्य की जड़ें हरी हैं, तब तक कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
व्यापारी ने अकाउंटेंट को सांत्वना दी व कहा, ‘अब चिंता छोड़ो, भविष्य में कभी ऐसा काम मत करना। ईमानदारी से नौकरी करते रहो।’ अकाउंटेंट को नौकरी करते हुए एक साल बीत गया। इस बीच व्यापारी को काफी लाभ हुआ। अकाउंटेंट की नीयत फिर खराब हो गयी।
एक दिन उसके बेटे का जन्मदिन था। उसने सबको खीर खिलाई। व्यापारी के लिए भी एक कटोरा खीर लेकर वह उनके घर पहुंचा। व्यापारी व्यस्त था तो उसे कटोरा मेज पर रखने को कह दिया। काम करते हुए देर हो गयी। थोड़ी देर बाद देखा तो खीर का कटोरा बिल्ली खा रही थी, जिसे खाते ही उसकी तबीयत बिगड़ गयी। व्यापारी को समझ आ गया, पर उसने किसी के सामने जिक्र नहीं किया। सोचा कि जब तक मेरा पुण्य है, मेरा कुछ नहीं हो सकता। अगले दिन अकाउंटेंट ने जब व्यापारी को देखा तो सकपका गया। व्यापारी ने फिर भी कुछ जाहिर नहीं किया। अकाउंटेंट को लगा कि व्यापारी को कुछ पता नहीं चला।
वह फिर व्यापारी का धन हड़पने के बारे में सोचने लगा। एक दिन व्यापारी को कहीं जाना था। उसने अकाउंटेंट को भी मोटी रकम साथ लेकर चलने को कहा। अकाउंटेंट ने व्यापारी को नुकसान पहुंचाने के लिए कुछ गुंडों को साथ रख लिया। एक मंदिर आया। व्यापारी उस ओर जाने लगा। वह जैसे ही झुका, गुंडों ने हमला कर दिया। व्यापारी वहीं बेहोश होकर गिर गया। अकाउंटेंट जैसे ही धन लेकर भागने लगा तो गुंडों की नीयत बिगड़ गयी। उन्होंने धन छीनकर उसे नदी में धकेल दिया।
व्यापारी को होश आया तो सामने अकाउंटेंट को डूबते हुए देखा। अपने दयालु स्वभाव के अनुसार सेठ ने फिर अकाउंटेंट को बचा लिया। होश में आने के बाद अकाउंटेंट ने व्यापारी के पैर पकड़े और माफी मांगने लगा। व्यापारी ने उसे मन ही मन माफी दी और इतना ही कहा- जब तक किसी के पुण्य की जड़ें हरी हैं, तब तक कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
बुधवार, 9 जनवरी 2019
👉 हमारी फितरत
एक घर में गृह प्रवेश की पूजा हो रही थी। पंडित जी पूजा करा रहे थे। पंडित जी ने सबको हवन में शामिल होने के लिए बुलाया। सबके सामने हवन सामग्री रख दी गई। पंडित जी मंत्र पढ़ते और कहते, “स्वाहा।” लोग चुटकियों से हवन सामग्री लेकर अग्नि में डाल देते। गृह मालिक को स्वाहा कहते ही अग्नि में घी डालने की ज़िम्मेदीरी सौंपी गई।
हर व्यक्ति थोड़ी सामग्री डालता, इस आशंका में कि कहीं हवन खत्म होने से पहले ही सामग्री खत्म न हो जाए। गृह मालिक भी बूंद-बूंद घी डाल रहे थे। उनके मन में भी डर था कि घी खत्म न हो जाए। मंत्रोच्चार चलता रहा, स्वाहा होता रहा और पूजा पूरी हो गई। सबके पास बहुत सी हवन सामग्री बची रह गई। घी तो आधा से भी कम इस्तेमाल हुआ था।
हवन पूरा होने के बाद पंडित जी ने कहा कि आप लोगों के पास जितनी सामग्री बची है, उसे अग्नि में डाल दें। गृह स्वामी से भी उन्होंने कहा कि आप इस घी को भी कुंड में डाल दें। एक साथ बहुत सी हवन सामग्री अग्नि में डाल दी गई। सारा घी भी अग्नि के हवाले कर दिया गया। पूरा घर धुंए से भर गया। वहां बैठना मुश्किल हो गया। एक-एक कर सभी कमरे से बाहर निकल गए।
अब जब तक सब कुछ जल नहीं जाता, कमरे में जाना संभव नहीं था। काफी देर तक इंतज़ार करना पडा, सब कुछ स्वाहा होने के इंतज़ार में।
👉 ये कहानी तो यहीं रुक जाती है। परन्तु.......
उस पूजा में मौजूद हर व्यक्ति जानता था कि जितनी हवन सामग्री उसके पास है, उसे हवन कुंड में ही डालना है। पर सबने उसे बचाए रखा। सबने बचाए रखा कि आख़िर में सामग्री काम आएगी। ऐसा ही हम करते हैं। यही हमारी फितरत है। हम अंत के लिए बहुत कुछ बचाए रखते हैं।
ज़िंदगी की पूजा खत्म हो जाती है और हवन सामग्री बची रह जाती है। हम बचाने में इतने खो जाते हैं कि जब सब कुछ होना हवन कुंड के हवाले है, उसे बचा कर क्या करना। बाद में तो वो सिर्फ धुंआ ही देगा।
संसार हवन कुंड है और जीवन पूजा। एक दिन सब कुछ हवन कुंड में समाहित होना है। अच्छी पूजा वही है, जिसमें हवन सामग्री का सही अनुपात में इस्तेमाल हो l
हर व्यक्ति थोड़ी सामग्री डालता, इस आशंका में कि कहीं हवन खत्म होने से पहले ही सामग्री खत्म न हो जाए। गृह मालिक भी बूंद-बूंद घी डाल रहे थे। उनके मन में भी डर था कि घी खत्म न हो जाए। मंत्रोच्चार चलता रहा, स्वाहा होता रहा और पूजा पूरी हो गई। सबके पास बहुत सी हवन सामग्री बची रह गई। घी तो आधा से भी कम इस्तेमाल हुआ था।
हवन पूरा होने के बाद पंडित जी ने कहा कि आप लोगों के पास जितनी सामग्री बची है, उसे अग्नि में डाल दें। गृह स्वामी से भी उन्होंने कहा कि आप इस घी को भी कुंड में डाल दें। एक साथ बहुत सी हवन सामग्री अग्नि में डाल दी गई। सारा घी भी अग्नि के हवाले कर दिया गया। पूरा घर धुंए से भर गया। वहां बैठना मुश्किल हो गया। एक-एक कर सभी कमरे से बाहर निकल गए।
अब जब तक सब कुछ जल नहीं जाता, कमरे में जाना संभव नहीं था। काफी देर तक इंतज़ार करना पडा, सब कुछ स्वाहा होने के इंतज़ार में।
👉 ये कहानी तो यहीं रुक जाती है। परन्तु.......
उस पूजा में मौजूद हर व्यक्ति जानता था कि जितनी हवन सामग्री उसके पास है, उसे हवन कुंड में ही डालना है। पर सबने उसे बचाए रखा। सबने बचाए रखा कि आख़िर में सामग्री काम आएगी। ऐसा ही हम करते हैं। यही हमारी फितरत है। हम अंत के लिए बहुत कुछ बचाए रखते हैं।
ज़िंदगी की पूजा खत्म हो जाती है और हवन सामग्री बची रह जाती है। हम बचाने में इतने खो जाते हैं कि जब सब कुछ होना हवन कुंड के हवाले है, उसे बचा कर क्या करना। बाद में तो वो सिर्फ धुंआ ही देगा।
संसार हवन कुंड है और जीवन पूजा। एक दिन सब कुछ हवन कुंड में समाहित होना है। अच्छी पूजा वही है, जिसमें हवन सामग्री का सही अनुपात में इस्तेमाल हो l
👉 आज का दिन, सर्वश्रेष्ठ शुभ मुहूर्त (अन्तिम भाग)
आशावादी हर कठिनाई में से उपयोगी अवसर ढूँढ़ निकालता है जबकि निराशावादी हर उपस्थिति अवसर में कोई न कोई कठिनाई देखता है और उसे करने से जी चुराने का कोई बहाना खोजता है। हर दिन, हर सप्ताह, हर मास, हर वर्ष हमारे लिए उज्ज्वल भविष्य के उपहार लिए हुए आता है, हम हैं जो न तो उसे पहचानते हैं और न उसका स्वागत करते हैं फलतः वह वापस चला जाता है और फिर कभी वापस लौटकर नहीं आता।
शेक्सपियर कहते हैं- ‘समय को मैंने बर्बाद किया और वही बर्बादी मेरी परेशानी और बर्बादी का कारण बनी हुई है।’ फ्रेकलिन कहते थे “एक ‘आज’ दो ‘कल’ के बराबर है। इसलिए कल की प्रतीक्षा में न बैठो, जो करना है उसके लिए आज ही कमर कसनी और तैयारी करनी चाहिए। जिसने समय का मूल्य नहीं समझा समझना चाहिए कि वह छोटे काम करने और छोटे स्तर का बने रहने के लिए ही पैदा हुआ है।”
भूतकाल की चर्चा न करें। जो गया वह लौटने वाला नहीं। सोचा इतना ही जाना चाहिए कि जो शेष है वह कम महत्वपूर्ण नहीं। यदि भूत की शिकायत करने की अपेक्षा भविष्य की योजना बनाने में विचारों को केन्द्रित किया जाय और परिवर्तन का क्रम आज के दिन से ही आरम्भ किया जाय तो समझना चाहिए कि महत्वपूर्ण समझदारी का आरम्भ हुआ। ऐसी समझदारी जिसे कुछ समय कार्यान्वित कर लेने पर भी एक समूची जिन्दगी का लाभ मिल सकता है।
.....क्रमशः जारी
✍🏻पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1983 पृष्ठ 2
शेक्सपियर कहते हैं- ‘समय को मैंने बर्बाद किया और वही बर्बादी मेरी परेशानी और बर्बादी का कारण बनी हुई है।’ फ्रेकलिन कहते थे “एक ‘आज’ दो ‘कल’ के बराबर है। इसलिए कल की प्रतीक्षा में न बैठो, जो करना है उसके लिए आज ही कमर कसनी और तैयारी करनी चाहिए। जिसने समय का मूल्य नहीं समझा समझना चाहिए कि वह छोटे काम करने और छोटे स्तर का बने रहने के लिए ही पैदा हुआ है।”
भूतकाल की चर्चा न करें। जो गया वह लौटने वाला नहीं। सोचा इतना ही जाना चाहिए कि जो शेष है वह कम महत्वपूर्ण नहीं। यदि भूत की शिकायत करने की अपेक्षा भविष्य की योजना बनाने में विचारों को केन्द्रित किया जाय और परिवर्तन का क्रम आज के दिन से ही आरम्भ किया जाय तो समझना चाहिए कि महत्वपूर्ण समझदारी का आरम्भ हुआ। ऐसी समझदारी जिसे कुछ समय कार्यान्वित कर लेने पर भी एक समूची जिन्दगी का लाभ मिल सकता है।
.....क्रमशः जारी
✍🏻पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1983 पृष्ठ 2
👉 Though Inconvenient, ‘Change’ is Inevitable
The juncture of the end of night and the beginning of day is called dawn. This period is filled with unique opportunities for self-growth for the early-risers; but for those who are still half – asleep, it appears as an unwelcome guest and as a burden loaded with new responsibilities. Howsoever unpleasant, they have to rise up and attend to their daily chores. Night does not return and the day does not stop. There is no other alternative than to adjust with the change. The cosmos is in perpetual movement. All our resistance is of no avail to hold back the incessant process of change.
The foetus manages happily in the dark cell of mother’s womb, but when it is fully developed, nature pushes it out of its cozy chamber, separates it from the mother’s umbilical cord and forces it to come out in free atmosphere. In the process of progress, this change is essential and unavoidable. The time of birth is painful and inconvenient to everyone. Mother, nurse, members of the family and friends – all have to abandon their normal routine and get ready to help in whatever way they can in the process of birth. Ultimately the result of this exercise is pleasant to all.
During the present momentous transition period of change of an era, the process of elimination of the Evil and establishment of the Good in human hearts is bound to appear painful for the rigidly orthodox. Other sections of the society may also feel it inconvenient to adopt new ways of life befitting a new era. But there is no other alternative than to adopt the discipline of ushering in of the new enlightened world order that has been ordained by Nature. Once we accept this Truth and are not resistant to change, we will find that change is seed of spiritual growth for all humanity. We will discover that the very change we were fleeing from had held the good we had prayed for.
The foetus manages happily in the dark cell of mother’s womb, but when it is fully developed, nature pushes it out of its cozy chamber, separates it from the mother’s umbilical cord and forces it to come out in free atmosphere. In the process of progress, this change is essential and unavoidable. The time of birth is painful and inconvenient to everyone. Mother, nurse, members of the family and friends – all have to abandon their normal routine and get ready to help in whatever way they can in the process of birth. Ultimately the result of this exercise is pleasant to all.
During the present momentous transition period of change of an era, the process of elimination of the Evil and establishment of the Good in human hearts is bound to appear painful for the rigidly orthodox. Other sections of the society may also feel it inconvenient to adopt new ways of life befitting a new era. But there is no other alternative than to adopt the discipline of ushering in of the new enlightened world order that has been ordained by Nature. Once we accept this Truth and are not resistant to change, we will find that change is seed of spiritual growth for all humanity. We will discover that the very change we were fleeing from had held the good we had prayed for.
👉 आत्मचिंतन के क्षण 9 Jan 2019
◾ विपत्ति मनुष्य को शिक्षा देने आती है। इससे हृदय में जो पीड़ा, आकुलता और छटपटाहट होती है उससे चाहें तो अपना सद्ज्ञान जाग्रत् कर सकते हैं। भगवान् को प्राप्त करने के लिए जिस साहस और सहनशीलता की आवश्यकता होती है, दुःख उसकी कसौटी मात्र है। विपत्तियों की तुला पर जो अपनी सहनशक्तियों को तोलते रहते हैं, वही अंत में विजयी होते हैं, उन्हीं को इस संसार में कोई सफलता प्राप्त होती है।
◾ अपने सुख-दुःख, उन्नति-अवनति, कल्याण-अकल्याण, स्वर्ग और नरक का कारण मनुष्य स्वयं है। फिर दुःख या आपत्ति के समय भाग्य के नाम पर संतोष कर लेना और भावी सुधार के प्रति अकर्मण्य बन जाना ठीक नहीं है। ऐसी स्थिति आने पर तो हमें यह अनुभव करना चाहिए कि हमसे जरूर कोई भूल हुई है और उस पर पश्चाताप करना चाहिए।
◾ महानता मनुष्य के अंदर छिपी हुई है और व्यक्त होने का रास्ता ढूँढ़ती है, पर सांसारिक कामनाओं में ग्रस्त मनुष्य उस आत्म प्रेरणा को भुला देना चाहता है, ठुकराये रखना चाहता है। अपमानित आत्मा चुपचाप शरीर के भीतर सुप्त पड़ी रहती है और मनुष्य केवल विडम्बनाओं के प्रपंच में ही पड़ा रह जाता है।
◾ मनुष्य सुखों की, पुण्य फल की इच्छा तो करता है, किन्तु पुण्य अर्जित नहीं करता है। पाप के दुष्परिणामों से डरता है, किन्तु यत्नपूर्वक करता दुष्कर्म ही है-ऐसी स्थिति रहते हुए भला किसी को सुख मिल सकता है? आम का फल आम होता है, बबूल नहीं। इसलिए सुख वही प्राप्त कर सकते हैं, जिनकी प्रवृत्तियाँ भी सन्मार्गगामी होती हैं।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
◾ अपने सुख-दुःख, उन्नति-अवनति, कल्याण-अकल्याण, स्वर्ग और नरक का कारण मनुष्य स्वयं है। फिर दुःख या आपत्ति के समय भाग्य के नाम पर संतोष कर लेना और भावी सुधार के प्रति अकर्मण्य बन जाना ठीक नहीं है। ऐसी स्थिति आने पर तो हमें यह अनुभव करना चाहिए कि हमसे जरूर कोई भूल हुई है और उस पर पश्चाताप करना चाहिए।
◾ महानता मनुष्य के अंदर छिपी हुई है और व्यक्त होने का रास्ता ढूँढ़ती है, पर सांसारिक कामनाओं में ग्रस्त मनुष्य उस आत्म प्रेरणा को भुला देना चाहता है, ठुकराये रखना चाहता है। अपमानित आत्मा चुपचाप शरीर के भीतर सुप्त पड़ी रहती है और मनुष्य केवल विडम्बनाओं के प्रपंच में ही पड़ा रह जाता है।
◾ मनुष्य सुखों की, पुण्य फल की इच्छा तो करता है, किन्तु पुण्य अर्जित नहीं करता है। पाप के दुष्परिणामों से डरता है, किन्तु यत्नपूर्वक करता दुष्कर्म ही है-ऐसी स्थिति रहते हुए भला किसी को सुख मिल सकता है? आम का फल आम होता है, बबूल नहीं। इसलिए सुख वही प्राप्त कर सकते हैं, जिनकी प्रवृत्तियाँ भी सन्मार्गगामी होती हैं।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
मंगलवार, 8 जनवरी 2019
👉 तीव्र वैराग्य
"तीव्र वैराग्य किसे कहते हैं, इसकी एक कहानी सुनो। किसी देश में एक बार वर्षा कम हुई। किसान नालियाँ काट-काटकर दूर से पानी लाते थे। एक किसान बडा़ हठी था। उसने एक दिन शपथ ली कि जब पानी न आने लगे, नहर से नाली का योग न हो जाए, तब तक बराबर नाली खोदूँगा। इधर नहाने का समय हुआ। उसकी स्त्री ने लड़की को उसे बुलाने भेजा।
लड़की बोली, 'पिताजी, दोपहर हो गयी, चलो तुमको माँ बुलाती है। 'उसने कहा, तू चल, हमें अभी काम है।' दोपहर ढल गयी, पर वह काम पर हटा रहा। नहाने का नाम न लिया। तब उसकी स्त्री खेत में जाकर बोली, 'नहाओगे कि नहीं? रोटियाँ ठण्डी हो रही हैं। तुम तो हर काम में हठ करते हो। काम कल करना या भोजन के बाद करना।' गालियाँ देता हुआ कुदाल उठाकर किसना स्त्री को मारने दौडा़ बोला, 'तेरी बुद्धि मारी गयी है क्या? देखती नहीं कि पानी नहीं बरसता; खेती का काम सब पडा़ है; अब की बार लड़के-बच्चे क्या खाएँगे? सब को भूखों मरना होगा। हमने यही ठान लिया है कि खेत में पहले पानी लायेंगे, नहाने-खाने की बात पीछे होगी।'
मामला टेढा़ देखकर उसकी स्त्री वहाँ से लौट पडी़। किसान ने दिनभर जी तोड़ मेहनत करके शाम के समय नहर के साथ नाली का योग कर दिया। फिर एक किनारे बैठकर देखने लगा, किस तरह नहर पानी खेत में 'कलकल' स्वर से बहता हुआ आ रहा है, तब उसका मन शान्ति और आनन्द से भर गया। घर पहुँचकर उसने स्त्री को बुलाकर कहा, 'ले आ अब डोल और रस्सी।' स्नान भोजन करके निश्चिन्त करके निश्चिन्त होकर फिर वह सुख से खुर्राटे लेने लगा। जिद यह है और यही तीव्र वैराग्य की उपमा है।
"खेत में पानी लाने के लिए एक और किसान गया था। उसकी स्त्री जब गयी और बोली, 'धूप बहुत हो गयी, चलो अब, इतना काम नहीं करते', तब वह चुपचाप कुदाल एक ओर रखकर बोला, 'अच्छा, तू कहती है तो चलो।' (सब हँसते हैं।) वह किसान खेत में पानी न ला सका। यह मन्द वैराग्य की उपमा है।
" हठ बिना जैसे किसान खेत में पानी नहीं ला सकता, वैसे ही मनुष्य ईश्वरदर्शन नहीं कर सकता।"
~ रामकृष्ण वचनामृत से
👉 आज का दिन, सर्वश्रेष्ठ शुभ मुहूर्त (भाग 1)
अवसर की तलाश में मत रहो। बुद्धिमानों के लिए हर समय अवसर है। न वे मुहूर्त निकालते हैं, न साथ ढूँढ़ते हैं और न सहारा तकते हैं। सृष्टा ने समय को ऐसी धातु से गढ़ा है कि उसका प्रत्येक क्षण शुभ है। अशुभ तो मनुष्य का संशय है, जो पल में आशा बाँधता और पल में निराश होता है।
बुराई के अवसर दिन में सौ बार आते हैं। पतन और प्रलोभनों की सर्वत्र भरमार है। धरती पर गुरुत्वाकर्षण हर किसी को- हर घड़ी गिरने के लिए बुलाता और घसीटता है। अच्छाई का अवसर तो मनुष्य को स्वयं विनिर्मित करना पड़ता है। वह बिना बुलाये किसी के पास नहीं आता है। आदर्शों के प्रति निष्ठा और अपने भरोसे पर हिम्मत जिस घड़ी उठ पड़े, समझना चाहिए कि ऊँचे उठने आगे बढ़ने की शुभ घड़ी आ पहुँची।
राह मिले तो ठीक, नहीं तो उसे बुलाना चाहिए। अवसर आये तो ठीक, नहीं तो उसे आग्रहपूर्वक बुलाना चाहिए। जो अवसर का उपयोग जानते हैं वे उसे पैदा भी कर सकते हैं। आज का दिन हर भले काम के लिए उपयुक्त है। जो शुभ है उसे शीघ्र ही किया जाना चाहिए। देर तो उनमें करनी चाहिए जो अशुभ है। जिसे करते हुए अन्तःकरण में भय संकोच का संसार होता है।
मनस्वी लोगों ने कभी अवसर की शिकायत नहीं की, हमें अवसर मिलता तो यह कर दिखाने की डींग हाँकने वाले थोथे चने की तरह हैं जो सिर्फ बज सकते हैं, उग नहीं सकते। अवसर आगे बढ़कर हाथ में लिया जाता है और अपनी प्राणाणिकता के आधार पर उसे सार्थक कर दिखाया जाता है। काम चाहे छोटा ही क्यों न हो, यदि सही तरीके से कर दिखाया जायगा तो उससे अच्छा परिणाण अनायास ही दौड़ता आयेगा और कहेगा कि हमें भी कर दिखाया जाय। यही उन्नति की सीढ़ी है। एक-एक कदम आगे बढ़ने और ऊँचे उठने का तरीका यही रहा है कि एक काम सही तरीके से किया नहीं गया कि उससे अच्छा, तत्काल आगे आ उपस्थित हुआ।
.....क्रमशः जारी
✍🏻पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1983 पृष्ठ 26
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1983/June/v1.2
बुराई के अवसर दिन में सौ बार आते हैं। पतन और प्रलोभनों की सर्वत्र भरमार है। धरती पर गुरुत्वाकर्षण हर किसी को- हर घड़ी गिरने के लिए बुलाता और घसीटता है। अच्छाई का अवसर तो मनुष्य को स्वयं विनिर्मित करना पड़ता है। वह बिना बुलाये किसी के पास नहीं आता है। आदर्शों के प्रति निष्ठा और अपने भरोसे पर हिम्मत जिस घड़ी उठ पड़े, समझना चाहिए कि ऊँचे उठने आगे बढ़ने की शुभ घड़ी आ पहुँची।
राह मिले तो ठीक, नहीं तो उसे बुलाना चाहिए। अवसर आये तो ठीक, नहीं तो उसे आग्रहपूर्वक बुलाना चाहिए। जो अवसर का उपयोग जानते हैं वे उसे पैदा भी कर सकते हैं। आज का दिन हर भले काम के लिए उपयुक्त है। जो शुभ है उसे शीघ्र ही किया जाना चाहिए। देर तो उनमें करनी चाहिए जो अशुभ है। जिसे करते हुए अन्तःकरण में भय संकोच का संसार होता है।
मनस्वी लोगों ने कभी अवसर की शिकायत नहीं की, हमें अवसर मिलता तो यह कर दिखाने की डींग हाँकने वाले थोथे चने की तरह हैं जो सिर्फ बज सकते हैं, उग नहीं सकते। अवसर आगे बढ़कर हाथ में लिया जाता है और अपनी प्राणाणिकता के आधार पर उसे सार्थक कर दिखाया जाता है। काम चाहे छोटा ही क्यों न हो, यदि सही तरीके से कर दिखाया जायगा तो उससे अच्छा परिणाण अनायास ही दौड़ता आयेगा और कहेगा कि हमें भी कर दिखाया जाय। यही उन्नति की सीढ़ी है। एक-एक कदम आगे बढ़ने और ऊँचे उठने का तरीका यही रहा है कि एक काम सही तरीके से किया नहीं गया कि उससे अच्छा, तत्काल आगे आ उपस्थित हुआ।
.....क्रमशः जारी
✍🏻पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1983 पृष्ठ 26
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1983/June/v1.2
👉 आत्मचिंतन के क्षण 8 Jan 2019
◾ "है नाथ! तुम्ही हमारे सर्वस्व हो, तुम्ही हमारे प्राणों के आधार हो और सब वस्तुओं में सार पदार्थ भी तुम्ही हो। तुम्हे छोड़ तीनों लोक में अपना और कोई नहीं। सुख, शान्ति, सहाय, सम्बल, सम्पद, ऐश्वर्य, ज्ञान, बुद्धि, बल, वासगृह, आरामस्थल, आत्मीय, मित्र, परिवार सब कुछ तुम्हीं हो। तुम्हीं हमारे इहकाल हो और तुम्हीं परकाल हो, तुम्हीं परित्राण हो और तुम्हीं स्वर्गधाम हो, शास्त्रविधि और कल्पतरू गुरु भी तुम्हीं हो; तुम्हीं हमारे अनन्त सुख के आधार हो। हमारे उपाय, हमारे उद्देश्य तुम्ही हो, तुम्हीं स्त्राष्टा, पालनकर्ता और उपास्य हो, दण्डदाता पिता, स्नेहमयी माता और भवार्णव के कर्णधार भी तुम्हीं हो।"
◾ "एक उपाय से जातिभेद उठ सकता है। वह उपाय है -भक्ति। भक्तों के जाति नहीं है। भक्ति होने से ही देह, मन, आत्मा सब शुद्ध हो जाते हैं। गौर, निताई हरिनाम देने लगे और चाण्डाल तक सभी को गोद में लेने लगे। भक्ति न रहने पर ब्राह्मण नहीं है। भक्ति रहने पर चाण्डाल चाण्डाल नहीं है। अस्पृश्य जाति भक्ति के होने पर शुद्ध पवित्र हो जाती है।"
◾ ऊँट कटीली घास को बहुत चाव से खाता है। परन्तु जितना ही खाता है उतना ही मुँह से धर धर खून गिरता है, फिर भी कटीली घास को खाना नहीं छोड़ता! संसारी मनुष्यों को इतना शोकताप मिलता है, किन्तु कुछ दिन बीते कि सब भूल गए।
~ रामकृष्ण परमहंस
◾ "एक उपाय से जातिभेद उठ सकता है। वह उपाय है -भक्ति। भक्तों के जाति नहीं है। भक्ति होने से ही देह, मन, आत्मा सब शुद्ध हो जाते हैं। गौर, निताई हरिनाम देने लगे और चाण्डाल तक सभी को गोद में लेने लगे। भक्ति न रहने पर ब्राह्मण नहीं है। भक्ति रहने पर चाण्डाल चाण्डाल नहीं है। अस्पृश्य जाति भक्ति के होने पर शुद्ध पवित्र हो जाती है।"
◾ ऊँट कटीली घास को बहुत चाव से खाता है। परन्तु जितना ही खाता है उतना ही मुँह से धर धर खून गिरता है, फिर भी कटीली घास को खाना नहीं छोड़ता! संसारी मनुष्यों को इतना शोकताप मिलता है, किन्तु कुछ दिन बीते कि सब भूल गए।
~ रामकृष्ण परमहंस
👉 A Perfect Deal
Man is a mortal being and all his belongings are also perishable. Only one of his ‘possessions’ that lasts for Ages after he is gone is his glory. One who earns this preeminence is indeed most successful in the ‘business’ of life even if he has sacrificed or lost on the materialistic front. His trade is like, for example, that of getting a new stout building in return of selling off an unused heap of hay. Great ones are those who refine and excel their lives up to glorious heights, worth the dignity of human life. Dormant lives of others mushroom and end like that of any other creature who survives just to till the tummy and quench the sensual thirst.
Those stuck in the peripheries of selfish possession and attachments are shortsighted, and remain careless of the future. Their lives, their activities, despite the physical dynamism and alacrity are no better than ‘movable corpse.’ A dormant life is no life… Fools gather more and more of wealth and resources so that their beloved ones would enjoy it all generations after generations… They spent all their time, talents and efforts in insane and at times unfair possession and its safety. Wouldn’t it be wiser of them if they had employed their resources prudently in the activities of progress and welfare? This would have brightened their own future as well along with supporting more and more people around and contributing in constructive reformation and development.
Draining or throwing away the useful things and collecting the rubbish or hazardous ones – is a clear sign of insanity. Aren’t they mindless who invite enmity all the time, by using absurd, abusive, acrimonious tongue? Anybody, howsoever learned, skillful and smart he might be, is unwise if, instead of augmenting the virtuous qualities, he opts for vices and weaknesses.
📖 Akhand Jyoti, Nov. 1942
Those stuck in the peripheries of selfish possession and attachments are shortsighted, and remain careless of the future. Their lives, their activities, despite the physical dynamism and alacrity are no better than ‘movable corpse.’ A dormant life is no life… Fools gather more and more of wealth and resources so that their beloved ones would enjoy it all generations after generations… They spent all their time, talents and efforts in insane and at times unfair possession and its safety. Wouldn’t it be wiser of them if they had employed their resources prudently in the activities of progress and welfare? This would have brightened their own future as well along with supporting more and more people around and contributing in constructive reformation and development.
Draining or throwing away the useful things and collecting the rubbish or hazardous ones – is a clear sign of insanity. Aren’t they mindless who invite enmity all the time, by using absurd, abusive, acrimonious tongue? Anybody, howsoever learned, skillful and smart he might be, is unwise if, instead of augmenting the virtuous qualities, he opts for vices and weaknesses.
📖 Akhand Jyoti, Nov. 1942
👉 सच्चा और अच्छा व्यापार
आदमी मर जाता है, उसके साज-समान, महल, तिबारे टूट-फूट जाते हैं, परंतु करतूूत ऐसी वस्तु है जो युगों तक जीवित रहती है। जिसने सर्वस्व देकर यश कमाया, उसने बहुत अच्छा व्यापार किया। बरसाती फूस को बेच कर एक पक्का कोठा खरीद लेना बुद्धिमानी है। वे मकान आत्मा हैं, जो अपना जीवन उज्ज्वल कीर्त्ति कमाने में लगाते हैं। उन अभागों के पैदा होने से क्या लाभ, जो जीवन भर पेट भरते रहे और अंत में कुत्तों की मौत मर गए।
जिन्हें अपने भविष्य की चिंता नहीं और स्वार्थ की परिधि से आगे कुछ नहीं देख सकते, वे मुर्दे हैं, भले ही वे साँस लेते, खाते-पीते और चलते-फिरते दिखाई देते हों। मूर्ख लोग धन जमा करके रख जाते हैं ताकि पीछे वाले चंद लोग खाएँ और खुश रहें। कितना अच्छा हो यदि वे अपनी सामने ही सत्कर्मों में उसे लगाते ताकि वह श्रेष्ठ भूमि में उगता और अपनी छाया में असंख्य प्राणियों को शांति देता।
बेवकूफ उसे कहते हैं जो फायदे की चीज को फेंक देता है और हानि करने वाली वस्तुओं को अपनाता है। जो कड़वी और अनर्गल बाते अपनी जिह्वा से बकते हैं, उन्हें बेवकूफ के अलावा और क्या कहा जाए? कोई आदमी कितना ही पढ़ा-लिखा और चतुर क्यों न हो, पर यदि वह भलाई को छोड़कर बुराई अपनाता है, तो उसे पहले सिरे का मूर्ख समझना चाहिए।
📖 अखण्ड ज्योति -नवम्बर 1942
जिन्हें अपने भविष्य की चिंता नहीं और स्वार्थ की परिधि से आगे कुछ नहीं देख सकते, वे मुर्दे हैं, भले ही वे साँस लेते, खाते-पीते और चलते-फिरते दिखाई देते हों। मूर्ख लोग धन जमा करके रख जाते हैं ताकि पीछे वाले चंद लोग खाएँ और खुश रहें। कितना अच्छा हो यदि वे अपनी सामने ही सत्कर्मों में उसे लगाते ताकि वह श्रेष्ठ भूमि में उगता और अपनी छाया में असंख्य प्राणियों को शांति देता।
बेवकूफ उसे कहते हैं जो फायदे की चीज को फेंक देता है और हानि करने वाली वस्तुओं को अपनाता है। जो कड़वी और अनर्गल बाते अपनी जिह्वा से बकते हैं, उन्हें बेवकूफ के अलावा और क्या कहा जाए? कोई आदमी कितना ही पढ़ा-लिखा और चतुर क्यों न हो, पर यदि वह भलाई को छोड़कर बुराई अपनाता है, तो उसे पहले सिरे का मूर्ख समझना चाहिए।
📖 अखण्ड ज्योति -नवम्बर 1942
सोमवार, 7 जनवरी 2019
👉 आत्मबोध का अभाव ही खिन्नता (अन्तिम भाग)
सम्बन्धी कुछ समय पूर्व ही तो मिले थे। इससे पूर्व वे भी किसी के कुटुम्बी सम्बन्धी थे। अब यदि उनमें से कोई बिछुड़ता है और किसी नये परिवार का सदस्य बनता है तो ऐसा क्या हुआ जो इससे पूर्व किसी के साथ घटित नहीं हुआ, या भविष्य में किसी के साथ घटित न होगा। मिलन की प्रसन्नता के साथ विछोह की खिन्नता का अटल नियम चला आ रहा है। उस भवितव्यता से हम बचे रहें, ऐसी आशा करना व्यर्थ है। जो व्यर्थ की चिन्तन करता है उसे अकारण खिन्नता ओढ़नी पड़ती है।
परिवर्तन इस संसार का नियम है। जो वस्तु कल एक की थी वह आज अपने हाथ आ गई। परसों उसे दूसरे के हाथ जाना है। यह भ्रमणशील विश्व व्यवस्था अपने नियम बदल दे और तुम्हारे लिए नियम बदल दे और तुम्हारे लिए स्थिर बन कर रहे। ऐसी आशा करना खिन्नता मोल लेना है जिसका कोई उपचार नहीं।
यदि परिवर्तन से− विछोह और वियोग के दुःख से बचना है तो उसका एक ही उपाय है− आत्मज्ञान। हम सदा से हैं सदा तक रहेंगे। वस्तुएँ न अपनी थीं न अपनी रहेंगी। प्राणियों से सम्बन्ध बनते और बिछुड़ते रहते हैं। यह आत्मज्ञान है। आत्मा के अनुरूप चिन्तन, चरित्र और व्यवहार का गठन−यही है। स्थायी प्रसन्नता का वह आधार जिससे परिवर्तनशील परिस्थितियाँ न खिन्नता उत्पन्न करती हैं और न किसी कारण प्रसन्नता में व्यवधान आता है। आत्मबोध के अभाव में ही हम रोते−कलपते हैं। इसे प्राप्त किया जा सके तो फिर सदा सर्वदा आनन्द ही आनन्द है।
.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1985 पृष्ठ 26
http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1985/March/v1.26
परिवर्तन इस संसार का नियम है। जो वस्तु कल एक की थी वह आज अपने हाथ आ गई। परसों उसे दूसरे के हाथ जाना है। यह भ्रमणशील विश्व व्यवस्था अपने नियम बदल दे और तुम्हारे लिए नियम बदल दे और तुम्हारे लिए स्थिर बन कर रहे। ऐसी आशा करना खिन्नता मोल लेना है जिसका कोई उपचार नहीं।
यदि परिवर्तन से− विछोह और वियोग के दुःख से बचना है तो उसका एक ही उपाय है− आत्मज्ञान। हम सदा से हैं सदा तक रहेंगे। वस्तुएँ न अपनी थीं न अपनी रहेंगी। प्राणियों से सम्बन्ध बनते और बिछुड़ते रहते हैं। यह आत्मज्ञान है। आत्मा के अनुरूप चिन्तन, चरित्र और व्यवहार का गठन−यही है। स्थायी प्रसन्नता का वह आधार जिससे परिवर्तनशील परिस्थितियाँ न खिन्नता उत्पन्न करती हैं और न किसी कारण प्रसन्नता में व्यवधान आता है। आत्मबोध के अभाव में ही हम रोते−कलपते हैं। इसे प्राप्त किया जा सके तो फिर सदा सर्वदा आनन्द ही आनन्द है।
.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1985 पृष्ठ 26
http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1985/March/v1.26
👉 On the way to Enlightenment
Do not argue with others if you find their thoughts conflicting with or going against yours. There are countless number of people living on our planet having diverse views, ideas, beliefs, ways of thinking and outlooks. There is every possibility that any of these viewpoints could be right. Therefore, you should learn not to disregard others’ opinion, be a sympathetic listener and respect their views. Get rid of any egocentric self-opinionated attitude you might have and expand the horizons of your vision. Be open-minded and, be willing to listen to and consider others’ views. Then only your life would become extremely fruitful and really helpful to others.
Talk gently, humbly, amicably, pleasingly and moderately. Give up any unworthy ideas and strong feelings. Get rid of any traces of arrogance or grumpiness. Try not to attach any importance to yourself. The task of serving humanity expects an individual to become totally devoted to the cause, with other people being at the forefront of his/her consideration.
If you do possess all the the aforesaid characteristics, you are indeed a leading light and a boon to the world. You are like a celestial fragrant flower whose fragrance will disperse far and wide (i.e. inspire others). If you do succeed in accomplishing this much, you can safely assume that you are on your way to reach the acme of enlightenment.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Aacharya
📖 Aatmagyaan aur Atmakalyaan (Self-realization and Self-benefit) Page 5
Talk gently, humbly, amicably, pleasingly and moderately. Give up any unworthy ideas and strong feelings. Get rid of any traces of arrogance or grumpiness. Try not to attach any importance to yourself. The task of serving humanity expects an individual to become totally devoted to the cause, with other people being at the forefront of his/her consideration.
If you do possess all the the aforesaid characteristics, you are indeed a leading light and a boon to the world. You are like a celestial fragrant flower whose fragrance will disperse far and wide (i.e. inspire others). If you do succeed in accomplishing this much, you can safely assume that you are on your way to reach the acme of enlightenment.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Aacharya
📖 Aatmagyaan aur Atmakalyaan (Self-realization and Self-benefit) Page 5
👉 उच्चतम अवस्था की प्राप्ति
यदि दूसरों के विचार आपके विचारों से मुक्त हों तो उनसे लड़ाई-झगड़ा न करो। अनेक प्रकार के मन होते हैं। विचारने की शैली अनेक प्रकार की हुआ करती है। विचारने के भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण हुआ करते हैं। अतएव सभी दृष्टिकोण निर्दोष हो सकते हैं। लोगों के मत के अनुकूल बनो। उनके मत को भी ध्यान तथा सहानुभूतिपूर्वक देखो और उनका आदर करो। अपने अहंकार चक्र के क्षुद्र केंद्र से बाहर निकलो और अपनी दृष्टि को विस्तृत करो। अपना मन सर्वग्राही और उदार बनाकर सबके मत के लिए स्थान रखो, तभी आपका जीवन विस्तृत और हृदय उदार होगा।
आपको धीरे-धीरे, मधुर और नम्र होकर बातचीत करनी चाहिए। मितभाषी बनो। अवांछनीय विचारों और संवेदनाओं को निकाल दो। अभिमान या चिड़चिड़ेपन को लेशमात्र भी बाकी नहीं रहने दो। अपने आप को बिलकुल भुला दो। अपने व्यक्तित्व का एक भी अंश या भाव न रहने पावे। सेवा-कार्य के लिए पूर्ण आत्मसमर्पण की आवश्यकता है।
यदि आप में उपर्युक्त सद्गुण मौजूद हैं तो आप संसार के लिए पथप्रदर्शक और अमूल्य प्रसाद रूप हो। आप एक अलौकिक सुगंधित पुष्प हो जिसकी सुगंध देश-भर में व्याप्त हो जाएगी। यदि आपने ऐसा कर लिया तो समझ लो आपने बुद्धत्व की उच्चतम अवस्था को प्राप्त कर लिया।
✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आत्मज्ञान और आत्मकल्याण पृष्ठ 5
आपको धीरे-धीरे, मधुर और नम्र होकर बातचीत करनी चाहिए। मितभाषी बनो। अवांछनीय विचारों और संवेदनाओं को निकाल दो। अभिमान या चिड़चिड़ेपन को लेशमात्र भी बाकी नहीं रहने दो। अपने आप को बिलकुल भुला दो। अपने व्यक्तित्व का एक भी अंश या भाव न रहने पावे। सेवा-कार्य के लिए पूर्ण आत्मसमर्पण की आवश्यकता है।
यदि आप में उपर्युक्त सद्गुण मौजूद हैं तो आप संसार के लिए पथप्रदर्शक और अमूल्य प्रसाद रूप हो। आप एक अलौकिक सुगंधित पुष्प हो जिसकी सुगंध देश-भर में व्याप्त हो जाएगी। यदि आपने ऐसा कर लिया तो समझ लो आपने बुद्धत्व की उच्चतम अवस्था को प्राप्त कर लिया।
✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आत्मज्ञान और आत्मकल्याण पृष्ठ 5
👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 Jan 2019
◾ जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो–उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योति ‘बुद्धिमान’ मनुष्यों के लिए यदि अत्यधिक मात्रा में प्रखर प्रतीत होती है, और उन्हें बहा ले जाती है, तो ले जाने दो–वे जितना शीघ्र बह जाएँ उतना अच्छा ही है।
◾ जो मनुष्य इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करना चाहता है, उसे एक ही जन्म में हजारों वर्ष का काम करना पड़ेगा। वह जिस युग में जन्मा है, उससे उसे बहुत आगे जाना पड़ेगा, किन्तु साधारण लोग किसी तरह रेंगते-रेंगते ही आगे बढ़ सकते हैं।
◾ मन का विकास करो और उसका संयम करो, उसके बाद जहाँ इच्छा हो, वहाँ इसका प्रयोग करो–उससे अति शीघ्र फल प्राप्ति होगी। यह है यथार्थ आत्मोन्नति का उपाय। एकाग्रता सीखो, और जिस ओर इच्छा हो, उसका प्रयोग करो। ऐसा करने पर तुम्हें कुछ खोना नहीं पड़ेगा। जो समस्त को प्राप्त करता है, वह अंश को भी प्राप्त कर सकता है।
◾ सभी मरेंगे- साधु या असाधु, धनी या दरिद्र- सभी मरेंगे। चिर काल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा। अतएव उठो, जागो और संपूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ। भारत में घोर कपट समा गया है। चाहिए चरित्र, चाहिए इस तरह की दृढ़ता और चरित्र का बल, जिससे मनुष्य आजीवन दृढ़व्रत बन सके।
✍🏻 स्वामी विवेकानन्द
◾ जो मनुष्य इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करना चाहता है, उसे एक ही जन्म में हजारों वर्ष का काम करना पड़ेगा। वह जिस युग में जन्मा है, उससे उसे बहुत आगे जाना पड़ेगा, किन्तु साधारण लोग किसी तरह रेंगते-रेंगते ही आगे बढ़ सकते हैं।
◾ मन का विकास करो और उसका संयम करो, उसके बाद जहाँ इच्छा हो, वहाँ इसका प्रयोग करो–उससे अति शीघ्र फल प्राप्ति होगी। यह है यथार्थ आत्मोन्नति का उपाय। एकाग्रता सीखो, और जिस ओर इच्छा हो, उसका प्रयोग करो। ऐसा करने पर तुम्हें कुछ खोना नहीं पड़ेगा। जो समस्त को प्राप्त करता है, वह अंश को भी प्राप्त कर सकता है।
◾ सभी मरेंगे- साधु या असाधु, धनी या दरिद्र- सभी मरेंगे। चिर काल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा। अतएव उठो, जागो और संपूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ। भारत में घोर कपट समा गया है। चाहिए चरित्र, चाहिए इस तरह की दृढ़ता और चरित्र का बल, जिससे मनुष्य आजीवन दृढ़व्रत बन सके।
✍🏻 स्वामी विवेकानन्द
👉 ईश्वर से साक्षात्कार
एक चोर अक्सर एक साधु के पास आता और उससे ईश्वर से साक्षात्कार का उपाय पूछा करता था। लेकिन साधु टाल देता था। वह बार-बार यही कहता कि वह इसके बारे में फिर कभी बताएगा। लेकिन चोर पर इसका असर नहीं पड़ता था। वह रोज पहुंच जाता। एक दिन चोर का आग्रह बहुत बढ़ गया। वह जमकर बैठ गया। उसने कहा कि वह बगैर उपाय जाने वहां से जाएगा ही नहीं। साधु ने चोर को दूसरे दिन सुबह आने को कहा। चोर ठीक समय पर आ गया।
साधु ने कहा, ‘तुम्हें सिर पर कुछ पत्थर रखकर पहाड़ पर चढ़ना होगा। वहां पहुंचने पर ही ईश्वर के दर्शन की व्यवस्था की जाएगी।’ चोर के सिर पर पांच पत्थर लाद दिए गए और साधु ने उसे अपने पीछे-पीछे चले आने को कहा। इतना भार लेकर वह कुछ दूर ही चला तो उस बोझ से उसकी गर्दन दुखने लगी। उसने अपना कष्ट कहा तो साधु ने एक पत्थर फिंकवा दिया।
थोड़ी देर चलने पर शेष भार भी कठिन प्रतीत हुआ तो चोर की प्रार्थना पर साधु ने दूसरा पत्थर भी फिंकवा दिया। यही क्रम आगे भी चला। ज्यों-ज्यों चढ़ाई बढ़ी, थोडे़ पत्थरों को ले चलना भी मुश्किल हो रहा था। चोर बार-बार अपनी थकान व्यक्त कर रहा था। अंत में सब पत्थर फेंक दिए गए और चोर सुगमतापूर्वक पर्वत पर चढ़ता हुआ ऊंचे शिखर पर जा पहुंचा।
साधु ने कहा, ‘जब तक तुम्हारे सिर पर पत्थरों का बोझ रहा, तब तक पर्वत के ऊंचे शिखर पर तुम्हारा चढ़ सकना संभव नहीं हो सका। पर जैसे ही तुमने पत्थर फेंके वैसे ही चढ़ाई सरल हो गई। इसी तरह पापों का बोझ सिर पर लादकर कोई मनुष्य ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता।’ चोर ने साधु का आशय समझ लिया। उसने कहा, ‘आप ठीक कह रहे हैं।
मैं ईश्वर को पाना तो चाहता था पर अपने बुरे कर्मों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं था।’ उस दिन से चोर पूरी तरह बदल गया।
साधु ने कहा, ‘तुम्हें सिर पर कुछ पत्थर रखकर पहाड़ पर चढ़ना होगा। वहां पहुंचने पर ही ईश्वर के दर्शन की व्यवस्था की जाएगी।’ चोर के सिर पर पांच पत्थर लाद दिए गए और साधु ने उसे अपने पीछे-पीछे चले आने को कहा। इतना भार लेकर वह कुछ दूर ही चला तो उस बोझ से उसकी गर्दन दुखने लगी। उसने अपना कष्ट कहा तो साधु ने एक पत्थर फिंकवा दिया।
थोड़ी देर चलने पर शेष भार भी कठिन प्रतीत हुआ तो चोर की प्रार्थना पर साधु ने दूसरा पत्थर भी फिंकवा दिया। यही क्रम आगे भी चला। ज्यों-ज्यों चढ़ाई बढ़ी, थोडे़ पत्थरों को ले चलना भी मुश्किल हो रहा था। चोर बार-बार अपनी थकान व्यक्त कर रहा था। अंत में सब पत्थर फेंक दिए गए और चोर सुगमतापूर्वक पर्वत पर चढ़ता हुआ ऊंचे शिखर पर जा पहुंचा।
साधु ने कहा, ‘जब तक तुम्हारे सिर पर पत्थरों का बोझ रहा, तब तक पर्वत के ऊंचे शिखर पर तुम्हारा चढ़ सकना संभव नहीं हो सका। पर जैसे ही तुमने पत्थर फेंके वैसे ही चढ़ाई सरल हो गई। इसी तरह पापों का बोझ सिर पर लादकर कोई मनुष्य ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता।’ चोर ने साधु का आशय समझ लिया। उसने कहा, ‘आप ठीक कह रहे हैं।
मैं ईश्वर को पाना तो चाहता था पर अपने बुरे कर्मों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं था।’ उस दिन से चोर पूरी तरह बदल गया।
रविवार, 6 जनवरी 2019
👉 पहले स्वयं को जीतो!
आपकी विजय सराहनीय है महाराज! आप सचमुच वीर है, ऐसा न होता तो आप गालव नरेश को तीन दिन में ही कैसे जीत लेते? राजपुरोहित पूर्णिक ने महाराज सिंधुराज की ओर किंचित मुस्कराते हुए कहा-बात का क्रम आगे बढ़ाते हुये वे बोले- किन्तु महाराज! सेना की विजय से भी बढ़कर विजय मन की है, जो काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसी साँसारिक ऐषणाओं को जीत लेता है वही सच्चा शूरवीर है। उस विजय के आगे यह रक्तपात वाली, हिंसा वाली, शक्ति वाली विजय तुच्छ और नगण्य सी लगती है।
महाराज सिंधुराज ने कवच परिचायक को देते हुये कहा-आचार्य प्रदर! हम वैसी विजय भी करके दिखला सकते है। आपने लगता है हमारे पराक्रम का मूल्याँकन नहीं किया- सम्राट के स्वर में अहं मिश्रित रूखापन था।
राज पुरोहित पर्णिक की सूक्ष्म दृष्टि महाराज के उस मनोविकार को ही ताड रही थी, इसलिये वे निःशंक बोले-आपके पराक्रम को कौन नहीं जानता आर्य श्रेष्ठ! आपको सिंहासन पर आसीन हुये अभी दशक ही तो बीता है। इस बीच आपने कलिंग, अरस्ट्रास, मालव, विन्ध्य, पंचनद सभी प्रान्त जीत डाले, क्या यह सब पराक्रमी होने का प्रमाण नहीं? किन्तु यदि आप एक बार महर्षि बेन के दर्शन करके आते तो पता चलता कि वे आपसे भी कीं अधिक पराक्रमी हैं, विजयी है। उन्होंने राग-द्वेष सम्पूर्ण ऐषणाओं पर विजय पाली है।
सिंधुराज को अपने सामने वह भी राज पुरोहित के मुख से किसी और की प्रशंसा अच्छी न लगी। उन दिनों राज पुरोहित राज्य की आचार संहिता के नियंत्रक हुआ करते थे। सिंधुराज उनका कुछ कर नहीं सकते थे, तो भी उन्होंने महर्षि बेने के दर्शन का निश्चय कर लिया।
सूर्योदय होने में अभी थोड़ा विलम्ब था। महाराज सिंधुराज अस्तबल पहुँचें। वहाँ उनका अश्व सजा हुआ तैयार था वे उस पर आरुढ होकर महर्षि बेन के आश्रम की ओर चल पड़े। मार्ग में उन्हें एक वृद्ध जन दिखाई दिये, वह मार्ग में पड़े काँटे साफ कर रहे थे, कंटीली झाड़ियां काट कर उन्हें दूर फेंक रहे थे। उन्हें देखकर महाराज ने घोड़े को रोका और पूछा-महान् तपस्वी बेन का आश्रम किधर है? ओ वृद्ध!
वृद्ध ने एक बार महाराज की ओर देखा फिर अपने काम में जुट गये-महाराज को यह अवहेलना अखरी, उनका अहंकार जाग पड़ा-बोले- शठ! देखता नहीं मैं यहाँ का सम्राट हूँ। बता-बेन का आश्रम किधर है? वृद्ध ने पुनः आंखें उठाई-ओठों पर एक हल्की मुस्कराहट तो आई फिर वे उसी तरह अपने काम में जुट गये। महाराज का क्रोध सीमा पार कर गया। घोड़े को वृद्ध की ओर दौड़ा दिया, उन्हें रौंदता हुआ घोड़ा आगे बढ़ गया। इस बीच महाराज ने उसकी चाबुक से वृद्ध पर प्रहार भी किया और अपशब्द कहते हुये आगे बढ़ गये। वे अभी थोड़ा ही आगे गये थे कि महर्षि की प्रतीक्षा करते खड़े उनके शिष्य दिखाई दिये, महाराज ने पूछा-आपके गुरु बेन कहाँ हैं? शिष्यों ने बताया वे प्रतिदिन हम लोगों से पूर्व ही उठकर मार्ग साफ करने निकल जाते है।
आप जिधर से आये उधर ही तो होंगे वह. और तब महाराज का क्रोध पश्चाताप में बदल गया। वे उन्हीं पैरों लौटे, महर्षि उठकर खड़े हो गये थे, कटी हुई झाड़ियां ठिकाने लगा रहे थे। घोड़े से उतर कर महाराज उनके चरणों पर गिर कर क्षमा माँगने लगे-बोले भगवान्। पहले ही बता देते कि आप ही महर्षि हैं तो यह अपराध क्यों होता?
बेन मुस्कराये-बोले बेटा- तूने मेरी प्रशंसा की उससे मन में अहंकार उठा, उसे-मारने के लिये यह आवश्यक ही था। तेरा उपकार जीवन भर नहीं भूलूँगा। महाराज सिंधुराज पानी-पानी हो गये उन्होंने अनुभव किया-सच्ची वीरता दूसरों को नहीं, अपने को जीतने में है।
महाराज सिंधुराज ने कवच परिचायक को देते हुये कहा-आचार्य प्रदर! हम वैसी विजय भी करके दिखला सकते है। आपने लगता है हमारे पराक्रम का मूल्याँकन नहीं किया- सम्राट के स्वर में अहं मिश्रित रूखापन था।
राज पुरोहित पर्णिक की सूक्ष्म दृष्टि महाराज के उस मनोविकार को ही ताड रही थी, इसलिये वे निःशंक बोले-आपके पराक्रम को कौन नहीं जानता आर्य श्रेष्ठ! आपको सिंहासन पर आसीन हुये अभी दशक ही तो बीता है। इस बीच आपने कलिंग, अरस्ट्रास, मालव, विन्ध्य, पंचनद सभी प्रान्त जीत डाले, क्या यह सब पराक्रमी होने का प्रमाण नहीं? किन्तु यदि आप एक बार महर्षि बेन के दर्शन करके आते तो पता चलता कि वे आपसे भी कीं अधिक पराक्रमी हैं, विजयी है। उन्होंने राग-द्वेष सम्पूर्ण ऐषणाओं पर विजय पाली है।
सिंधुराज को अपने सामने वह भी राज पुरोहित के मुख से किसी और की प्रशंसा अच्छी न लगी। उन दिनों राज पुरोहित राज्य की आचार संहिता के नियंत्रक हुआ करते थे। सिंधुराज उनका कुछ कर नहीं सकते थे, तो भी उन्होंने महर्षि बेने के दर्शन का निश्चय कर लिया।
सूर्योदय होने में अभी थोड़ा विलम्ब था। महाराज सिंधुराज अस्तबल पहुँचें। वहाँ उनका अश्व सजा हुआ तैयार था वे उस पर आरुढ होकर महर्षि बेन के आश्रम की ओर चल पड़े। मार्ग में उन्हें एक वृद्ध जन दिखाई दिये, वह मार्ग में पड़े काँटे साफ कर रहे थे, कंटीली झाड़ियां काट कर उन्हें दूर फेंक रहे थे। उन्हें देखकर महाराज ने घोड़े को रोका और पूछा-महान् तपस्वी बेन का आश्रम किधर है? ओ वृद्ध!
वृद्ध ने एक बार महाराज की ओर देखा फिर अपने काम में जुट गये-महाराज को यह अवहेलना अखरी, उनका अहंकार जाग पड़ा-बोले- शठ! देखता नहीं मैं यहाँ का सम्राट हूँ। बता-बेन का आश्रम किधर है? वृद्ध ने पुनः आंखें उठाई-ओठों पर एक हल्की मुस्कराहट तो आई फिर वे उसी तरह अपने काम में जुट गये। महाराज का क्रोध सीमा पार कर गया। घोड़े को वृद्ध की ओर दौड़ा दिया, उन्हें रौंदता हुआ घोड़ा आगे बढ़ गया। इस बीच महाराज ने उसकी चाबुक से वृद्ध पर प्रहार भी किया और अपशब्द कहते हुये आगे बढ़ गये। वे अभी थोड़ा ही आगे गये थे कि महर्षि की प्रतीक्षा करते खड़े उनके शिष्य दिखाई दिये, महाराज ने पूछा-आपके गुरु बेन कहाँ हैं? शिष्यों ने बताया वे प्रतिदिन हम लोगों से पूर्व ही उठकर मार्ग साफ करने निकल जाते है।
आप जिधर से आये उधर ही तो होंगे वह. और तब महाराज का क्रोध पश्चाताप में बदल गया। वे उन्हीं पैरों लौटे, महर्षि उठकर खड़े हो गये थे, कटी हुई झाड़ियां ठिकाने लगा रहे थे। घोड़े से उतर कर महाराज उनके चरणों पर गिर कर क्षमा माँगने लगे-बोले भगवान्। पहले ही बता देते कि आप ही महर्षि हैं तो यह अपराध क्यों होता?
बेन मुस्कराये-बोले बेटा- तूने मेरी प्रशंसा की उससे मन में अहंकार उठा, उसे-मारने के लिये यह आवश्यक ही था। तेरा उपकार जीवन भर नहीं भूलूँगा। महाराज सिंधुराज पानी-पानी हो गये उन्होंने अनुभव किया-सच्ची वीरता दूसरों को नहीं, अपने को जीतने में है।
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