रविवार, 29 जुलाई 2018
👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 14)
👉 प्रतिभा परिवर्धन के तथ्य और सिद्धांत
🔶 प्रतिभावानों के होठों पर मंद-मुस्कान देखी जाती है। इसी आधार पर यह जाना जाता है कि वे अपने आप में संतुष्ट और प्रसन्न हैं। दूसरे भी ऐसे ही लोगों का सहारा ताकते और साथ देते हैं। खीजते और खिजाते रहने वालों को दूर से ही नमस्कार करने को जी करता है, जिन्हें अपना सही मूल्यांकन करना है, वे इस प्रकार की भूलें नहीं करते। यदि वे आदत में सम्मिलित होने लगें तो उन्हें बुहार फेंकने की मुस्तैदी दिखाते हैं।
🔷 तीसरा चरण है- सुव्यवस्था अस्त-व्यस्त स्थिति में ही, प्रचुर साधन रहते हुए भी लोग असफल रहते और उपहासास्पद बनते हैं। प्रतिभाएँ क्षण-क्षण में अपने कार्यों और नियोजनों की समीक्षा करती रहती हैं तथा उन्हें सही बनाने के लिए जो हेर-फेर करना आवश्यक होता है, उसे बिना हिचक तत्परतापूर्वक करती हैं। जड़ता हठवादिता के शिकंजे में जकड़ने का उन्हें तनिक भी आग्रह नहीं होता। वे जानते हैं कि प्रगतिशीलों को सदा परिस्थितियों के अनुरूप रणनीति बनानी और चलते ढर्रे में आवश्यक सुधार लाने की चेष्टा करनी पड़ती है। व्यवस्था इसी प्रकार बन पड़ती है। जो अपने समय का, श्रम का, साधनों का, विचारों का ,परिवार परिकर का सुनियोजन कर सकता है और उन्हें सही दिशा दे सकने में समर्थ हो सकता है, उसे ही इस योग्य समझा जाता है कि वह कोई बड़ी या अतिरिक्त जिम्मेदारी को वहन कर सके। किन्हीं बढ़ी-चढ़ी महत्त्वाकांक्षाओं को सँजोने से पूर्व यह प्रमाण देना पड़ता है कि व्यक्तित्व, परिकर एवं क्रियाकलापों में किस सीमा तक व्यवस्था बुद्धि का उपयोग किया गया और उन्हें कितना सफल-समुन्नत बनाकर दिखाया गया।
🔶 चौथा व अंतिम सूत्र है- अग्रगमन-नेतृत्व यह उत्साह, साहस और आत्मविश्वास का प्रतीक है। साधारण जन आत्महीनता से ग्रसित, झिझक, संकोच, अनिश्चय एवं साहसहीनता की मन:स्थिति में पड़े पाए जाते हैं। वे उचित कार्यों के लिए भी कदम बढ़ाने का साहस नहीं कर पाते। अधिक-से-अधिक इतना ही सोचते हैं कि कोई बढ़े तो उसके पीछे चलने लगें। ऐसे लोग उचित निष्कर्ष निकाल लेने पर भी उस मार्ग का अवलंबन नहीं कर पाते। अपनी स्थिति को अनुपयुक्त मानते हुए भी उस परिधि से एक कदम भी आगे नहीं रख पाते। ऐसों के बीच उन्हीं को मनस्वी माना जाता है, जो उचित के प्रति अटूट आस्था रखें और जो करना चाहिए उसे अन्यों का समर्थन-सहमति न मिलने पर भी एकाकी कर दिखाएँ। इसे दूध गरम करते ही मलाई के तैरकर ऊपर आ जाने के समकक्ष समझा जा सकता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 18
🔶 प्रतिभावानों के होठों पर मंद-मुस्कान देखी जाती है। इसी आधार पर यह जाना जाता है कि वे अपने आप में संतुष्ट और प्रसन्न हैं। दूसरे भी ऐसे ही लोगों का सहारा ताकते और साथ देते हैं। खीजते और खिजाते रहने वालों को दूर से ही नमस्कार करने को जी करता है, जिन्हें अपना सही मूल्यांकन करना है, वे इस प्रकार की भूलें नहीं करते। यदि वे आदत में सम्मिलित होने लगें तो उन्हें बुहार फेंकने की मुस्तैदी दिखाते हैं।
🔷 तीसरा चरण है- सुव्यवस्था अस्त-व्यस्त स्थिति में ही, प्रचुर साधन रहते हुए भी लोग असफल रहते और उपहासास्पद बनते हैं। प्रतिभाएँ क्षण-क्षण में अपने कार्यों और नियोजनों की समीक्षा करती रहती हैं तथा उन्हें सही बनाने के लिए जो हेर-फेर करना आवश्यक होता है, उसे बिना हिचक तत्परतापूर्वक करती हैं। जड़ता हठवादिता के शिकंजे में जकड़ने का उन्हें तनिक भी आग्रह नहीं होता। वे जानते हैं कि प्रगतिशीलों को सदा परिस्थितियों के अनुरूप रणनीति बनानी और चलते ढर्रे में आवश्यक सुधार लाने की चेष्टा करनी पड़ती है। व्यवस्था इसी प्रकार बन पड़ती है। जो अपने समय का, श्रम का, साधनों का, विचारों का ,परिवार परिकर का सुनियोजन कर सकता है और उन्हें सही दिशा दे सकने में समर्थ हो सकता है, उसे ही इस योग्य समझा जाता है कि वह कोई बड़ी या अतिरिक्त जिम्मेदारी को वहन कर सके। किन्हीं बढ़ी-चढ़ी महत्त्वाकांक्षाओं को सँजोने से पूर्व यह प्रमाण देना पड़ता है कि व्यक्तित्व, परिकर एवं क्रियाकलापों में किस सीमा तक व्यवस्था बुद्धि का उपयोग किया गया और उन्हें कितना सफल-समुन्नत बनाकर दिखाया गया।
🔶 चौथा व अंतिम सूत्र है- अग्रगमन-नेतृत्व यह उत्साह, साहस और आत्मविश्वास का प्रतीक है। साधारण जन आत्महीनता से ग्रसित, झिझक, संकोच, अनिश्चय एवं साहसहीनता की मन:स्थिति में पड़े पाए जाते हैं। वे उचित कार्यों के लिए भी कदम बढ़ाने का साहस नहीं कर पाते। अधिक-से-अधिक इतना ही सोचते हैं कि कोई बढ़े तो उसके पीछे चलने लगें। ऐसे लोग उचित निष्कर्ष निकाल लेने पर भी उस मार्ग का अवलंबन नहीं कर पाते। अपनी स्थिति को अनुपयुक्त मानते हुए भी उस परिधि से एक कदम भी आगे नहीं रख पाते। ऐसों के बीच उन्हीं को मनस्वी माना जाता है, जो उचित के प्रति अटूट आस्था रखें और जो करना चाहिए उसे अन्यों का समर्थन-सहमति न मिलने पर भी एकाकी कर दिखाएँ। इसे दूध गरम करते ही मलाई के तैरकर ऊपर आ जाने के समकक्ष समझा जा सकता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 18
👉 The Significance of Satsang
🔶 Satsanga means being in the company of good people, inspiring discourses and discussions. You should always try to be in the company of such people who protect you from evils and wrongs; who can induce hope even in the moments of despair and offer you encouraging support in adverse circumstances.
🔷 It is easy to get the sycophants or selfish friends around, who would just be ‘friends’ when they need something from you: they need not be your well wishers, and might even pull you in the rut of addictions, ego and avarice; they won’t hesitate in stepping you on your back if it suits their vested interests. You may find it difficult to find wise men who would be your guides; who would be your critiques on your face to correct your flaws and advice you righteously; who would warn you of the dangers or risks well n time. People often prefer the company of elite; we should know that the best company is that of the enlightened personalities, the elevated souls.
🔶 Having true friends, though few in numbers, is a sign of wisdom. Noble friendship is quite significant in the ascent of life in many respects. It is foolish to make enemies, but worse is to leave the friendship of good people.
🔷 Pure intellect and faith in sincere efforts with assiduity are the two key elements essential for transmutation of personality. Adoption of virtues transforms the bad, debased ones into great personalities; on the contrary, vices could decline and debouch the great ones into mean, inferior, scornful levels. So your friends should be those who inspire the virtues and uproot the vices. You may also begin on your own by cultivating food qualities, like constructive use of time, alertness, sincerity and perseverance… Small steps in the prudent direction lead to brighter goals.
📖 Akhand Jyoti, Apr. 1942
🔷 It is easy to get the sycophants or selfish friends around, who would just be ‘friends’ when they need something from you: they need not be your well wishers, and might even pull you in the rut of addictions, ego and avarice; they won’t hesitate in stepping you on your back if it suits their vested interests. You may find it difficult to find wise men who would be your guides; who would be your critiques on your face to correct your flaws and advice you righteously; who would warn you of the dangers or risks well n time. People often prefer the company of elite; we should know that the best company is that of the enlightened personalities, the elevated souls.
🔶 Having true friends, though few in numbers, is a sign of wisdom. Noble friendship is quite significant in the ascent of life in many respects. It is foolish to make enemies, but worse is to leave the friendship of good people.
🔷 Pure intellect and faith in sincere efforts with assiduity are the two key elements essential for transmutation of personality. Adoption of virtues transforms the bad, debased ones into great personalities; on the contrary, vices could decline and debouch the great ones into mean, inferior, scornful levels. So your friends should be those who inspire the virtues and uproot the vices. You may also begin on your own by cultivating food qualities, like constructive use of time, alertness, sincerity and perseverance… Small steps in the prudent direction lead to brighter goals.
📖 Akhand Jyoti, Apr. 1942
👉 पवित्र, श्रद्धालु और धार्मिक बनें
🔷 इस संसार को माया इसलिए कहा गया है कि यहाँ भ्रान्तियों की भरमार है। जो जैसा है, वैसा नहीं दीखता। यहाँ हर प्रसंग में कबीर को उलटबांसियों की भरमार हैं। पहेली बुझाने की तरह हर बात पर सोचना पड़ता है। प्रस्तुत गोरख धन्धा बिना बुद्धि पर असाधारण जोर लगाए समझ में ही नहीं आता। तिलस्म की इस इमारत में भूल-भुलैया ही भरी पड़ी हे। आँख मिचौनी का बेल यहाँ कोई जादूगर खेलता खिलाता रहता है।
🔶 प्रस्तुत परिस्थितियों को विधि की विडम्बना नियति की प्रवंचना भी कहा जा सकता है पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने पर प्रतीत होता हैं कि मनुष्य की बुद्धिमत्ता परखने के लिये उस चतुर चित ने पग-पग पर कसौटियाँ बिछा रखी हैं, जिनके माध्यम से गुजरने वाले के स्तर का पता लगता रहे। लगता है नियन्ता ने अपने युवराज को क्रमशः अधिकाधिक अनुदान देने की व्यवस्था बनाई है और उपयुक्त अधिकारी को उपयुक्त जिम्मेदारियाँ-विभूतियाँ सौंपते चलने की योजना विनिर्मित की है।
🔷 दूरदर्शी और अदूरदर्शी का पता इस गुत्थी को सुलझा सकने, न सुलझा सकने से लग जाता है कि सच्चा स्वार्थ साधन किसमें है, किसमें नहीं। बाधक मात्र एक ही प्रवंचना होती है कि तात्कालिक आकर्षणों में यह चंचल मन इतना मचल जाता है कि बुद्धि को उसकी ललक पूरी करने तक का अवसर नहीं मिलता। तरकस से तीर निकल जाने पर पता चलता है कि निशाना जहाँ लगाना चाहिए था, वहाँ न लगकर कहीं से कहीं चला गया। सफलता और असफलता का निर्धारण यहीं हो जाता है। व्यवहार बुद्धि का आश्रय लेने वाले दूरदर्शी इसी कसौटी पर खरे उतरते एवं माया-प्रपंच से बचकर सफलता के साथ आत्मिक प्रगति के पथ पर प्रशस्त होते देखे जा सकते हैं।
📖 अखण्ड ज्योति फ़रवरी 1973 पृष्ठ 1
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/February/v1
🔶 प्रस्तुत परिस्थितियों को विधि की विडम्बना नियति की प्रवंचना भी कहा जा सकता है पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने पर प्रतीत होता हैं कि मनुष्य की बुद्धिमत्ता परखने के लिये उस चतुर चित ने पग-पग पर कसौटियाँ बिछा रखी हैं, जिनके माध्यम से गुजरने वाले के स्तर का पता लगता रहे। लगता है नियन्ता ने अपने युवराज को क्रमशः अधिकाधिक अनुदान देने की व्यवस्था बनाई है और उपयुक्त अधिकारी को उपयुक्त जिम्मेदारियाँ-विभूतियाँ सौंपते चलने की योजना विनिर्मित की है।
🔷 दूरदर्शी और अदूरदर्शी का पता इस गुत्थी को सुलझा सकने, न सुलझा सकने से लग जाता है कि सच्चा स्वार्थ साधन किसमें है, किसमें नहीं। बाधक मात्र एक ही प्रवंचना होती है कि तात्कालिक आकर्षणों में यह चंचल मन इतना मचल जाता है कि बुद्धि को उसकी ललक पूरी करने तक का अवसर नहीं मिलता। तरकस से तीर निकल जाने पर पता चलता है कि निशाना जहाँ लगाना चाहिए था, वहाँ न लगकर कहीं से कहीं चला गया। सफलता और असफलता का निर्धारण यहीं हो जाता है। व्यवहार बुद्धि का आश्रय लेने वाले दूरदर्शी इसी कसौटी पर खरे उतरते एवं माया-प्रपंच से बचकर सफलता के साथ आत्मिक प्रगति के पथ पर प्रशस्त होते देखे जा सकते हैं।
📖 अखण्ड ज्योति फ़रवरी 1973 पृष्ठ 1
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/February/v1
👉 अपनों के साथ दुर्व्यवहार
🔷 ‘आप लोग मुझे क्षमा करें। आपको आज मैं “महिलाओं”, शब्द से संबोधन कर रहा हूँ। सचमुच हम लोग शताब्दियों से गुलामी करते-करते स्त्री जैसे हो गये हैं। आप लोग इस देश या दूसरे किसी देश में जाइए। आप देखेंगे कि यदि एक स्थान पर तीन स्त्रियाँ 5 मिनट के लिए भी इकट्ठी होंगी तो झगड़ा कर बैठेंगी। पाश्चात्य देशों में बड़ी-बड़ी सभाएं करके स्त्रियों की क्षमता और अधिकारों की घोषणा से आकाश को गूंजा देती हैं पर उसके दो दिन बीतते न बीतते आपस में झगड़ा कर बैठती हैं तब कोई पुरुष आकर प्रभुत्व जमा लेता है।
🔶 सभी जातियों में आप ऐसा ही देखेंगे। स्त्रियों को शासन में रखने के लिये अब भी पुरुषों की आवश्यकता है। हम लोग भी इसी तरह स्त्रियों के समान हो गये हैं। अगर कोई स्त्री आकर उनका नेतृत्व करने लगती है तो सब मिलकर उसकी बड़ी आलोचना करने लगती है। उसे बोलने नहीं देतीं जबरदस्ती बिठा देती हैं। लेकिन यदि कोई पुरुष आकर उन के प्रति कुछ कठोर व्यवहार करें बीच-बीच में बुरा भला भी कहता जाय तो उन्हें अच्छा लगेगा क्योंकि वे लोग इस प्रकार के व्यवहारों की अभ्यस्त हो गई हैं।
🔷 संसार की जादूगरों और वशीकरण मंत्र जानने वालों से भरा हुआ है। शक्तिशाली पुरुष सदा इस प्रकार दूसरों को वश में करते हैं। हम लोगों के संबंध भी यही हुआ है। अगर आपके देश का कोई मनुष्यता बढ़ना चाहता है तो आप सब लोग मिलकर उसे दबाते हैं लेकिन एक विदेशी आकर अगर लाठी भी मारे उसे अनायास ही सहने को प्रस्तुत होते हैं। आप लोग इसी के अभ्यस्त हो गये हैं इसीलिये दासता बन्धनों में पड़े हुए हैं। अपनों के साथ दुर्व्यवहार करना दासता की एक अचूक निशानी है?
✍🏻 स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1943 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/August/v1.6
🔶 सभी जातियों में आप ऐसा ही देखेंगे। स्त्रियों को शासन में रखने के लिये अब भी पुरुषों की आवश्यकता है। हम लोग भी इसी तरह स्त्रियों के समान हो गये हैं। अगर कोई स्त्री आकर उनका नेतृत्व करने लगती है तो सब मिलकर उसकी बड़ी आलोचना करने लगती है। उसे बोलने नहीं देतीं जबरदस्ती बिठा देती हैं। लेकिन यदि कोई पुरुष आकर उन के प्रति कुछ कठोर व्यवहार करें बीच-बीच में बुरा भला भी कहता जाय तो उन्हें अच्छा लगेगा क्योंकि वे लोग इस प्रकार के व्यवहारों की अभ्यस्त हो गई हैं।
🔷 संसार की जादूगरों और वशीकरण मंत्र जानने वालों से भरा हुआ है। शक्तिशाली पुरुष सदा इस प्रकार दूसरों को वश में करते हैं। हम लोगों के संबंध भी यही हुआ है। अगर आपके देश का कोई मनुष्यता बढ़ना चाहता है तो आप सब लोग मिलकर उसे दबाते हैं लेकिन एक विदेशी आकर अगर लाठी भी मारे उसे अनायास ही सहने को प्रस्तुत होते हैं। आप लोग इसी के अभ्यस्त हो गये हैं इसीलिये दासता बन्धनों में पड़े हुए हैं। अपनों के साथ दुर्व्यवहार करना दासता की एक अचूक निशानी है?
✍🏻 स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1943 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/August/v1.6
शनिवार, 28 जुलाई 2018
👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 13)
👉 प्रतिभा परिवर्धन के तथ्य और सिद्धांत
🔷 प्रतिभा परिष्कार के कुछ मूलभूत सिद्धांत हैं। इन्हें उन सभी को हृदयंगम करने का प्रयत्न करना चाहिए, जो समुन्नत, सुसंस्कृत एवं यशस्वी सफल जीवन जीने के लिए उत्सुक हैं।
🔶 प्रथम सिद्धांत अथवा आधार है- क्षमताओं का अभिवर्धन। उनके लिए निरंतर तत्परता का, तन्मयता का सुनियोजन। आलस्य-प्रमाद से बचकर सदा जागरूक और स्फूर्तिवान बने रहना। एक-एक क्षण को बहुमूल्य मानकर उन्हें सदुद्देश्यों में सुनियोजित रखने के लिए योजनाबद्ध आकलन। यही है वह मन:स्थिति जिसे ‘महाजागरण’ कहते हैं। आमतौर से लोग अर्द्ध तंद्रा की स्थिति में जिंदगी को दर्द की तरह जीते हैं। निर्वाह साधन पा लेने भर से उन्हें संतोष हो जाता है। वे भाव-तरंगें उठती ही नहीं, जो आज की तुलना में कल को अधिक परिष्कृत बनाने के लिए लालायित रहती हैं और प्रयत्नरत होती हैं। प्रतिभा के उपासक इस दलदल से उबरते हैं और अपनी निखरती क्षमताओं को बचाकर, मूल्यवान पूँजी की तरह एकत्रित करते हैं। जो हस्तगत है, उसका श्रेष्टतम सदुपयोग करते हैं। यही है कल्पवृक्ष का उत्पादन एवं उसका उद्देश्यपूर्ण सदुपयोग क्रियान्वयन।
🔷 दूसरा चरण है— अपने व्यक्तित्व को चुंबकीय, आकर्षक एवं विश्वस्त स्तर का विकसित करना। यह मनुष्यता के साथ जुड़ने वाला प्राथमिक गुण है। इसके लिए अपना रहन-सहन ऐसा बनाना पड़ता है जैसा जागरूक, जिम्मेदार और सज्जनता संपन्नों का होना चाहिए। शरीर और मन की स्वच्छता, साथ ही शिष्टाचार का निर्वाह और वाणी में मधुरता का गहरा पुट लगाए रहना भी आवश्यक है। इसके लिए अपनी नम्रता का परिचय देना और दूसरों को सम्मान देना आवश्यक है। उसे वे ही कर पाते हैं, जो दूसरों के गुण देखकर उनसे प्रेरणा ग्रहण करते रहते हैं, साथ ही अपनी त्रुटियों को खोजते एवं उनके निष्कासन-परिष्कार में लगे रहते हैं। ओछे अपनी शेखी बघारते और दूसरों के दोष गिनाते रहते हैं। उसी जंजाल में उनका चिंतन एवं वर्चस्व घटता और समाप्त होता रहता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 17
🔷 प्रतिभा परिष्कार के कुछ मूलभूत सिद्धांत हैं। इन्हें उन सभी को हृदयंगम करने का प्रयत्न करना चाहिए, जो समुन्नत, सुसंस्कृत एवं यशस्वी सफल जीवन जीने के लिए उत्सुक हैं।
🔶 प्रथम सिद्धांत अथवा आधार है- क्षमताओं का अभिवर्धन। उनके लिए निरंतर तत्परता का, तन्मयता का सुनियोजन। आलस्य-प्रमाद से बचकर सदा जागरूक और स्फूर्तिवान बने रहना। एक-एक क्षण को बहुमूल्य मानकर उन्हें सदुद्देश्यों में सुनियोजित रखने के लिए योजनाबद्ध आकलन। यही है वह मन:स्थिति जिसे ‘महाजागरण’ कहते हैं। आमतौर से लोग अर्द्ध तंद्रा की स्थिति में जिंदगी को दर्द की तरह जीते हैं। निर्वाह साधन पा लेने भर से उन्हें संतोष हो जाता है। वे भाव-तरंगें उठती ही नहीं, जो आज की तुलना में कल को अधिक परिष्कृत बनाने के लिए लालायित रहती हैं और प्रयत्नरत होती हैं। प्रतिभा के उपासक इस दलदल से उबरते हैं और अपनी निखरती क्षमताओं को बचाकर, मूल्यवान पूँजी की तरह एकत्रित करते हैं। जो हस्तगत है, उसका श्रेष्टतम सदुपयोग करते हैं। यही है कल्पवृक्ष का उत्पादन एवं उसका उद्देश्यपूर्ण सदुपयोग क्रियान्वयन।
🔷 दूसरा चरण है— अपने व्यक्तित्व को चुंबकीय, आकर्षक एवं विश्वस्त स्तर का विकसित करना। यह मनुष्यता के साथ जुड़ने वाला प्राथमिक गुण है। इसके लिए अपना रहन-सहन ऐसा बनाना पड़ता है जैसा जागरूक, जिम्मेदार और सज्जनता संपन्नों का होना चाहिए। शरीर और मन की स्वच्छता, साथ ही शिष्टाचार का निर्वाह और वाणी में मधुरता का गहरा पुट लगाए रहना भी आवश्यक है। इसके लिए अपनी नम्रता का परिचय देना और दूसरों को सम्मान देना आवश्यक है। उसे वे ही कर पाते हैं, जो दूसरों के गुण देखकर उनसे प्रेरणा ग्रहण करते रहते हैं, साथ ही अपनी त्रुटियों को खोजते एवं उनके निष्कासन-परिष्कार में लगे रहते हैं। ओछे अपनी शेखी बघारते और दूसरों के दोष गिनाते रहते हैं। उसी जंजाल में उनका चिंतन एवं वर्चस्व घटता और समाप्त होता रहता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 17
शुक्रवार, 27 जुलाई 2018
👉 गुरु बिन सत्पथ कौन दिखाय।
🔷 गुरु बिन ज्ञान नहीं मिल पाता।
भला बुरा कुछ समझ न आता ।
माटी कंचन की कीमत भी ।
गुरु बिन समझ न आय।
गुरु बिन सत्पथ कौन दिखाय ।
🔶 दोष दुर्गुणों ने जकड़ा है।
पाप ताप ने भी पकड़ा है।
दया धरम सब भुल चुके है।
नेक करम न सुभाय।
गुरु बिन सत्पथ कौन दिखाय ।
🔷 मनुज विकल हो तडप रहा है।
अगणित कष्ट भी सबने सहा है।
दुष्ट दनुज का दंभ मिटाने ,
तुम बिन कौन सहाय ।
गुरु बिन सत्पथ कौन दिखाय ।
🔶 हे प्रभू पथ से भटक चुके है।
मंजिल तक ना पहुच सके है।
पर पीडा मे रमे सभी है।
आचरण हुए दुःखदाय।
गुरु बिन सत्पथ कौन दिखाय ।
🔷 कथनी करनी भिन्न हुआ है।
पाखंड से मन खिन्न हुआ है।
आचरण हमारे ठीक नही है।
सद्बुद्धि सबमे आए।
गुरु बिन सत्पथ कौन दिखाय ।
🔶 दरश दो प्रभू राह दिखाओ।
कष्ट हरो अब मार्ग बताओ ।
तिमिर निशा से त्राण दिलाओ।
सही राह चल पाए।
गुरु बिन सत्पथ कौन दिखाय ।
भला बुरा कुछ समझ न आता ।
माटी कंचन की कीमत भी ।
गुरु बिन समझ न आय।
गुरु बिन सत्पथ कौन दिखाय ।
🔶 दोष दुर्गुणों ने जकड़ा है।
पाप ताप ने भी पकड़ा है।
दया धरम सब भुल चुके है।
नेक करम न सुभाय।
गुरु बिन सत्पथ कौन दिखाय ।
🔷 मनुज विकल हो तडप रहा है।
अगणित कष्ट भी सबने सहा है।
दुष्ट दनुज का दंभ मिटाने ,
तुम बिन कौन सहाय ।
गुरु बिन सत्पथ कौन दिखाय ।
🔶 हे प्रभू पथ से भटक चुके है।
मंजिल तक ना पहुच सके है।
पर पीडा मे रमे सभी है।
आचरण हुए दुःखदाय।
गुरु बिन सत्पथ कौन दिखाय ।
🔷 कथनी करनी भिन्न हुआ है।
पाखंड से मन खिन्न हुआ है।
आचरण हमारे ठीक नही है।
सद्बुद्धि सबमे आए।
गुरु बिन सत्पथ कौन दिखाय ।
🔶 दरश दो प्रभू राह दिखाओ।
कष्ट हरो अब मार्ग बताओ ।
तिमिर निशा से त्राण दिलाओ।
सही राह चल पाए।
गुरु बिन सत्पथ कौन दिखाय ।
👉 इतनी शक्ति हमे दो गुरुवर
🔷 इतनी शक्ति हमे दो गुरुवर, अनुरुप तेरे हो जायें।
समय आज है गुरु पर्व का,आओ यही संकल्प जगाये।
🔶 गहन अन्धेरा छाया जग मे,चहुँ दिशि हाहाकार है।
राह नहीं कहीं भी दिखता,लगे की अपनी हार है।
ज्ञान प्रकाश फैलाओ प्रभू जी ,सत्पथ पर हम चल पायें ।
इतनी शक्ति हमे दो गुरुवर,अनुरुप तेरे हो जायें।
🔷 तुम्ही हो ब्रह्मा विष्णु तुम्ही हो,जग के पालनहार हो।
डूबती जग के नैया के प्रभू,तुम ही खेवन हार हो।
बीच भॅवर से पार निकालो,नहीं कहीं कोई डूब जाए।
इतनी शक्ति हमे दो गुरुवर,अनुरुप तेरे हो जायें।
🔶 शिष्यों को शक्ति देकर ही,जग मे बहाई ज्ञान की धारा।
हर युग मे ही तुने उबारा,नयी दिशा दे जग को सुधारा।
दया दरश तुम करो प्रभू अब,पुनः नया संसार बनाएं।
इतनी शक्ति हमे दो गुरुवर,अनुरुप तेरे हो जायें।
🔷 जब जब धर्म की हानि हुई है,मानवता को कष्ट हुआ है।
तब तब गुरु ने ज्ञान शक्ति से,नयी सृष्टि का सृजन किया है।
अबकी बार उबारो प्रभू जी,सुखी सारा संसार हो जाये।
इतनी शक्ति हमे दो गुरुवर,अनुरुप तेरे हो जायें।
समय आज है गुरु पर्व का,आओ यही संकल्प जगाये।
🔶 गहन अन्धेरा छाया जग मे,चहुँ दिशि हाहाकार है।
राह नहीं कहीं भी दिखता,लगे की अपनी हार है।
ज्ञान प्रकाश फैलाओ प्रभू जी ,सत्पथ पर हम चल पायें ।
इतनी शक्ति हमे दो गुरुवर,अनुरुप तेरे हो जायें।
🔷 तुम्ही हो ब्रह्मा विष्णु तुम्ही हो,जग के पालनहार हो।
डूबती जग के नैया के प्रभू,तुम ही खेवन हार हो।
बीच भॅवर से पार निकालो,नहीं कहीं कोई डूब जाए।
इतनी शक्ति हमे दो गुरुवर,अनुरुप तेरे हो जायें।
🔶 शिष्यों को शक्ति देकर ही,जग मे बहाई ज्ञान की धारा।
हर युग मे ही तुने उबारा,नयी दिशा दे जग को सुधारा।
दया दरश तुम करो प्रभू अब,पुनः नया संसार बनाएं।
इतनी शक्ति हमे दो गुरुवर,अनुरुप तेरे हो जायें।
🔷 जब जब धर्म की हानि हुई है,मानवता को कष्ट हुआ है।
तब तब गुरु ने ज्ञान शक्ति से,नयी सृष्टि का सृजन किया है।
अबकी बार उबारो प्रभू जी,सुखी सारा संसार हो जाये।
इतनी शक्ति हमे दो गुरुवर,अनुरुप तेरे हो जायें।
गुरुवार, 26 जुलाई 2018
👉 बालू के कण
🔷 सीपी के पेट में बालू का एक कण घुस जाता है। उस कण के ऊपर सीपी के शरीर का रस लिपटता जाता है और वह बढ़ते-बढ़ते एक चमकते हुये कीमती मोती के रूप में प्रस्तुत हो जाता है। यो बालू के एक कण की कुछ कीमत नहीं, पर सीपी जब उसे अपने उदर में धारण कर अपने जीवन रस से सींचने लगती हैं तो वह तुच्छ रज कण एक मूल्यवान पदार्थ बनता है। उच्च नैतिक आदर्श भी ऐसे ही बालू के कण हैं जो यदि मनुष्य के हृदय में गहराई तक प्रवेश कर जाये तो एक तुच्छ व्यक्ति को महापुरुष, ऋषि और देवता के रुपये प्रस्तुत कर सकते है।
👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 12)
👉 प्रतिभा परिवर्धन के तथ्य और सिद्धांत
🔶 जनसाधारण के बीच प्रतिभाशाली अलग से चमकते हैं, जैसे पत्तों व काँटों के बीच फूल, तारों के बीच चंद्रमा। यह जन्मजात उपलब्धि नहीं है और न किसी का दिया हुआ वरदान। इसे भाग्यवश मिला हुआ आकस्मिक संयोग-सुयोग भी नहीं कहा जा सकता। वह स्व-उपार्जित संपदा है। इस कार्य में दूसरे कुछ सहायक तो हो सकते हैं, पर प्रधानता तो अपने प्रबल प्रयास की ही रहती है।
🔷 धन आता है और चला जाता है। रूप यौवन भी सामयिक है। उसका संबंध चढ़ते खून से है। किशोर और तरुण ही सुंदर दिखते हैं। इसके बाद ढलान आरंभ होते ही अवयवों में कठोरता और चेहरे पर रुक्षता की हवाइयाँ उड़ने लगती हैं। विद्या उतनी ही स्मरण रहती है, जितनी कि व्यवहार में काम आती है। मित्र, सहयोगी, संबंधी, सहायकों के मन बदलते रहते हैं। आवश्यक नहीं कि उनकी घनिष्टता सदा एक-सी बनी रहे। अधिकार भी चिरस्थायी नहीं है। समर्थन घटते ही वे दूसरों के हाथों चले जाते हैं। वयोवृद्धों के उत्पादन की, परिश्रम की क्षमता घट जाती है। आयुवृद्धि के साथ-साथ स्मरण शक्ति और स्फूर्ति भी जवाब देने लगती है। ऐसी दशा में तब कोई योजना बनाना और उसे चलाना भी, बस से बाहर हो जाता है। यह सब मरण के ही लक्षण हैं। जीवनी शक्ति का भंडार धीरे-धीरे चुकता है और फिर वह अंतत: जवाब दे जाता है।
🔶 विकासोन्मुख शरीर, चढ़ते खून और परिपक्व व्यक्तित्व वाले दिनों में ही रहता है। उसे भले ही कोई आलस्य-प्रमाद में गुजारे, भले ही कोई लिप्सा-लालसा की वेदी पर विसर्जित कर दे। कोई-कोई तो उन दिनों भी अतिवादी उद्दंडता दिखाने से नहीं चूकते। यह सब शक्तियों और संभावनाओं के भंडार मनुष्य जीवन के साथ खिलवाड़ करने जैसा है। दूरदर्शी वे हैं, जो विभूतियों में सर्वश्रेष्ठ ‘प्रतिभा’ को मानते हैं और उसके संपादन हेतु प्राणपण से प्रयत्न करते हैं, क्योंकि वही हर स्थिति में साथ रहती है, अपनी तथा दूसरों की गुत्थियाँ सुलझाती है और जन्म-जन्मान्तरों तक साथ रहकर, क्रमश: अधिकाधिक ऊँचे स्तर वाली परिस्थितियों का निर्माण करती रहती है। इस उपार्जन के लिए किए गए प्रयत्नों को ही, हर दृष्टि से सराहा और स्वर्ण संपदा की तरह किसी भी बाजार में भुनाया जा सकता है। भौतिक प्रगति में भी उसी के चमत्कार दिखते हैं और आदर्शवादी परमार्थ अपनाने वाली महानता को भी उसी के सहारे विकसित परिष्कृत होते हुए देखा जा सकता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 16
🔶 जनसाधारण के बीच प्रतिभाशाली अलग से चमकते हैं, जैसे पत्तों व काँटों के बीच फूल, तारों के बीच चंद्रमा। यह जन्मजात उपलब्धि नहीं है और न किसी का दिया हुआ वरदान। इसे भाग्यवश मिला हुआ आकस्मिक संयोग-सुयोग भी नहीं कहा जा सकता। वह स्व-उपार्जित संपदा है। इस कार्य में दूसरे कुछ सहायक तो हो सकते हैं, पर प्रधानता तो अपने प्रबल प्रयास की ही रहती है।
🔷 धन आता है और चला जाता है। रूप यौवन भी सामयिक है। उसका संबंध चढ़ते खून से है। किशोर और तरुण ही सुंदर दिखते हैं। इसके बाद ढलान आरंभ होते ही अवयवों में कठोरता और चेहरे पर रुक्षता की हवाइयाँ उड़ने लगती हैं। विद्या उतनी ही स्मरण रहती है, जितनी कि व्यवहार में काम आती है। मित्र, सहयोगी, संबंधी, सहायकों के मन बदलते रहते हैं। आवश्यक नहीं कि उनकी घनिष्टता सदा एक-सी बनी रहे। अधिकार भी चिरस्थायी नहीं है। समर्थन घटते ही वे दूसरों के हाथों चले जाते हैं। वयोवृद्धों के उत्पादन की, परिश्रम की क्षमता घट जाती है। आयुवृद्धि के साथ-साथ स्मरण शक्ति और स्फूर्ति भी जवाब देने लगती है। ऐसी दशा में तब कोई योजना बनाना और उसे चलाना भी, बस से बाहर हो जाता है। यह सब मरण के ही लक्षण हैं। जीवनी शक्ति का भंडार धीरे-धीरे चुकता है और फिर वह अंतत: जवाब दे जाता है।
🔶 विकासोन्मुख शरीर, चढ़ते खून और परिपक्व व्यक्तित्व वाले दिनों में ही रहता है। उसे भले ही कोई आलस्य-प्रमाद में गुजारे, भले ही कोई लिप्सा-लालसा की वेदी पर विसर्जित कर दे। कोई-कोई तो उन दिनों भी अतिवादी उद्दंडता दिखाने से नहीं चूकते। यह सब शक्तियों और संभावनाओं के भंडार मनुष्य जीवन के साथ खिलवाड़ करने जैसा है। दूरदर्शी वे हैं, जो विभूतियों में सर्वश्रेष्ठ ‘प्रतिभा’ को मानते हैं और उसके संपादन हेतु प्राणपण से प्रयत्न करते हैं, क्योंकि वही हर स्थिति में साथ रहती है, अपनी तथा दूसरों की गुत्थियाँ सुलझाती है और जन्म-जन्मान्तरों तक साथ रहकर, क्रमश: अधिकाधिक ऊँचे स्तर वाली परिस्थितियों का निर्माण करती रहती है। इस उपार्जन के लिए किए गए प्रयत्नों को ही, हर दृष्टि से सराहा और स्वर्ण संपदा की तरह किसी भी बाजार में भुनाया जा सकता है। भौतिक प्रगति में भी उसी के चमत्कार दिखते हैं और आदर्शवादी परमार्थ अपनाने वाली महानता को भी उसी के सहारे विकसित परिष्कृत होते हुए देखा जा सकता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 16
👉 व्यर्थ का उलाहना
🔶 हे प्रभु ! हे जगत्-पिता, जगन्नियन्ता कैसे आप मौन, मन्दिर में बैठे हैं। क्या आप देख नहीं रहे हैं कि बाहर संसार में अन्याय और अनीति फैली हुई है। अत्याचारियों के आतंक और त्रास से संसार त्राहि-त्राहि कर रहा है। आप उठिये और बाहर आकर अत्याचारियों का विनाश करिये, संसार को त्रास और उत्पीड़न से बचाइये। देखिये, मैं कब से आपको पुकार रहा हूँ, विनय और प्रार्थना कर रहा हूँ। किन्तु आप अनसुनी करते जा रहे हैं। हे प्रभु, हे जगन्नियन्ता न जाने आप जल्दी क्यों नहीं सुनते। पुकारते-पुकारते मेरी वाणी शिथिल हो रही है किन्तु अभी तक आपने मेरी पुकार नहीं, सुनी कहते-कहते, प्रार्थी करुणा से रो पड़ा !
🔷 तभी मूर्ति ने गम्भीरता के साथ कहा- ‘मनुष्य मुझे संसार में आने के लिये न कहे- मैं मनुष्यों से बहुत डरता हूँ। प्रार्थी ने विस्मय पूर्वक पूछा- भगवान् ! आप मनुष्य से डरते हैं- यह क्यों !
🔶 मूर्ति पुनः बोली- इसलिये कि यदि मैं संसार में सशरीर ईश्वर के रूप में आ जाऊँ तो मनुष्य मेरी दुर्गति बना डालें। क्योंकि हर मनुष्य को मुझ से कुछ न कुछ शिकायत है, हर मनुष्य मुझ से कुछ न कुछ सेवा चाहता है। अपनी शिकायतों को ढूँढ़ने और उन्हें दमर करने की अपेक्षा वह दोष मुझे देता है। पुरुष अपनी समस्यायें आप हल करने की अपेक्षा मुझे से सारे काम कराना चाहता है और मूल्य चुकाये बिना वैभव पाने की याचना करता है।
🔷 अब तुम्हीं बताओ ऐसी स्थिति में मैं सशरीर ईश्वर के रूप में कैसे आ सकता हूँ ? मूर्ति मौन हो गई
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखंड ज्योति दिसम्बर 1971 पृष्ठ 1
🔷 तभी मूर्ति ने गम्भीरता के साथ कहा- ‘मनुष्य मुझे संसार में आने के लिये न कहे- मैं मनुष्यों से बहुत डरता हूँ। प्रार्थी ने विस्मय पूर्वक पूछा- भगवान् ! आप मनुष्य से डरते हैं- यह क्यों !
🔶 मूर्ति पुनः बोली- इसलिये कि यदि मैं संसार में सशरीर ईश्वर के रूप में आ जाऊँ तो मनुष्य मेरी दुर्गति बना डालें। क्योंकि हर मनुष्य को मुझ से कुछ न कुछ शिकायत है, हर मनुष्य मुझ से कुछ न कुछ सेवा चाहता है। अपनी शिकायतों को ढूँढ़ने और उन्हें दमर करने की अपेक्षा वह दोष मुझे देता है। पुरुष अपनी समस्यायें आप हल करने की अपेक्षा मुझे से सारे काम कराना चाहता है और मूल्य चुकाये बिना वैभव पाने की याचना करता है।
🔷 अब तुम्हीं बताओ ऐसी स्थिति में मैं सशरीर ईश्वर के रूप में कैसे आ सकता हूँ ? मूर्ति मौन हो गई
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखंड ज्योति दिसम्बर 1971 पृष्ठ 1
बुधवार, 25 जुलाई 2018
👉 जैसी करनी वैसी भरनी
🔷 जो लोग भले होते हैं, वे तो किसी प्रकार उबर आते है पर कुटिल चाल चलने वाले अन्तत : स्वयं गिरते हैं। ऐसे गीदड़ वेशधारी अनेक व्यक्ति समाज में बैठे हैं।
🔶 एक गीदड़ एक दिन गढ्डे में गिर गया। बहुत उछल-कूद की किन्तु बाहर न निकल सका। अन्त में हताश होकर सोचने लगा कि अब इसी गढ्डे में मेरा अन्त हो जाना है। तभी एक बकरी को मिमियाते सुना। तत्काल ही गीदड़ की कुटिलता जाग उठी। वह बकरी से बोला-' बहिन बकरी। यहाँ अन्दर खूब हरी-हरी घास और मीठा-मीठा पानी है। आओ जी भरकर खाओ और पानी पियो। " बकरी उसकी लुभावुनी बातों में आकर, गढ्डे में कूद गयी।
🔷 चालाक गीदड़ बकरी की पीठ पर चढ़कर गढ्डे से बाहर कूद गया और हँसकर बोला-"तुम बड़ी बेवकूफ हो, मेरी जगह खुंद मरने गट्टे में आ गई हो। " बकरी बड़े सरल भाव से बोली-"गीदड़ भाई, मेरी उपयोगितावश कोई न कोई मुझे निकाल ही लेगा किन्तु तुम अपने ही क्षणों के कारण विनाश के बीज वो लोगे।
🔶 थोड़ी देर में मालिक ढूँढ़ता हुआ बकरी को निकाल ले गया। रास्ते में जा रही बकरी ने देखा वही गीदड़ किसी के तीर से घायल हुआ झाड़ी में करहा रहा है।
🔶 एक गीदड़ एक दिन गढ्डे में गिर गया। बहुत उछल-कूद की किन्तु बाहर न निकल सका। अन्त में हताश होकर सोचने लगा कि अब इसी गढ्डे में मेरा अन्त हो जाना है। तभी एक बकरी को मिमियाते सुना। तत्काल ही गीदड़ की कुटिलता जाग उठी। वह बकरी से बोला-' बहिन बकरी। यहाँ अन्दर खूब हरी-हरी घास और मीठा-मीठा पानी है। आओ जी भरकर खाओ और पानी पियो। " बकरी उसकी लुभावुनी बातों में आकर, गढ्डे में कूद गयी।
🔷 चालाक गीदड़ बकरी की पीठ पर चढ़कर गढ्डे से बाहर कूद गया और हँसकर बोला-"तुम बड़ी बेवकूफ हो, मेरी जगह खुंद मरने गट्टे में आ गई हो। " बकरी बड़े सरल भाव से बोली-"गीदड़ भाई, मेरी उपयोगितावश कोई न कोई मुझे निकाल ही लेगा किन्तु तुम अपने ही क्षणों के कारण विनाश के बीज वो लोगे।
🔶 थोड़ी देर में मालिक ढूँढ़ता हुआ बकरी को निकाल ले गया। रास्ते में जा रही बकरी ने देखा वही गीदड़ किसी के तीर से घायल हुआ झाड़ी में करहा रहा है।
👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 12)
👉 विशिष्टता का नए सिरे से उभार
🔷 यहाँ परिजनों के पिछले दिनों के योगदान का मूल्यांकन घटाकर नहीं किया जा रहा है, पर इतने भर से बात तो नहीं बनती? महाकाल की अभिनव चुनौती स्वीकार करने के लिए उतने पर ही संतोष नहीं किया जा सकता, जो पिछले दिनों हो चुका है। यह लंबा संग्राम है- संभवतः प्रस्तुत परिजनों के जीवन भर चलते रहने वाला। इक्कीसवीं सदी आरंभ होने में अभी दस वर्ष से भी अधिक समय शेष है। इस युगसंधि वेला में तो हम सबको, उस स्तर की तप साधना में संलग्न रहना है, जिसे भगीरथ ने अपनाया और धरती पर स्वर्गस्थ गंगा का अवतरण संभव कर दिखाया था।
🔶 महामानवों के जीवन में कहीं कोई विराम नहीं होता। वे निरंतर अनवरत गति से, शरीर छूटने तक चलते ही जाते हैं। इतने पर भी लक्ष्य पूरा न होने पर जन्म-जन्मान्तरों तक उसी प्रयास में निरत रहने का संकल्प संजोए रहते हैं। इसी परंपरा का निर्वाह उन्हें भी करना है, जिन्हें अपनी प्रतिभा निखारनी और निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र में ऐसी उपलब्धियाँ कमानी हों, जिन्हें प्रेरणाप्रद, अनुकरणीय, अभिनंदनीय एवं अविस्मरणीय कहा जा सके। अपने परिवार की प्रतिभाओं को उपेक्षित स्तर की नहीं रहना है। इनकी गणना उन लोगों में नहीं होनी चाहिए, जिन्हें परावलंबी या निर्वाह के लिए जीवित भर रहने वाला कहा जाता है।
🔷 कमल पुष्प, सामान्य तालाब में उगने पर भी अपनी पहचान अलग बनाते और दूर से देखने वाले के मन पर भी अपनी प्रफुल्लता की प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं। अपना स्वरूप एवं स्तर ऐसा ही होना चाहिए।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 15
🔷 यहाँ परिजनों के पिछले दिनों के योगदान का मूल्यांकन घटाकर नहीं किया जा रहा है, पर इतने भर से बात तो नहीं बनती? महाकाल की अभिनव चुनौती स्वीकार करने के लिए उतने पर ही संतोष नहीं किया जा सकता, जो पिछले दिनों हो चुका है। यह लंबा संग्राम है- संभवतः प्रस्तुत परिजनों के जीवन भर चलते रहने वाला। इक्कीसवीं सदी आरंभ होने में अभी दस वर्ष से भी अधिक समय शेष है। इस युगसंधि वेला में तो हम सबको, उस स्तर की तप साधना में संलग्न रहना है, जिसे भगीरथ ने अपनाया और धरती पर स्वर्गस्थ गंगा का अवतरण संभव कर दिखाया था।
🔶 महामानवों के जीवन में कहीं कोई विराम नहीं होता। वे निरंतर अनवरत गति से, शरीर छूटने तक चलते ही जाते हैं। इतने पर भी लक्ष्य पूरा न होने पर जन्म-जन्मान्तरों तक उसी प्रयास में निरत रहने का संकल्प संजोए रहते हैं। इसी परंपरा का निर्वाह उन्हें भी करना है, जिन्हें अपनी प्रतिभा निखारनी और निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र में ऐसी उपलब्धियाँ कमानी हों, जिन्हें प्रेरणाप्रद, अनुकरणीय, अभिनंदनीय एवं अविस्मरणीय कहा जा सके। अपने परिवार की प्रतिभाओं को उपेक्षित स्तर की नहीं रहना है। इनकी गणना उन लोगों में नहीं होनी चाहिए, जिन्हें परावलंबी या निर्वाह के लिए जीवित भर रहने वाला कहा जाता है।
🔷 कमल पुष्प, सामान्य तालाब में उगने पर भी अपनी पहचान अलग बनाते और दूर से देखने वाले के मन पर भी अपनी प्रफुल्लता की प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं। अपना स्वरूप एवं स्तर ऐसा ही होना चाहिए।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 15
👉 आत्म-निरीक्षण
🔷 युग निर्माण परिवार के प्रत्येक परिजन को निरंतर आत्म-निरीक्षण करना चाहिए और देखना चाहिए कि भारत के औसत नागरिक के स्तर से वह अपने ऊपर अधिक खर्च तो नहीं करता? यदि करता है तो आत्मा की, न्याय की, कर्त्तव्य की पुकार सुननी चाहिए और उस अतिरिक्त खर्च को तुरंत घटाना चाहिए। हमें अधिक कमाने की, अधिक बढ़ाने की, अधिक जोड़ने की ललक छोड़नी चाहिए और यह देखना चाहिए कि जो उपलब्ध है उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग क्या हो सकता है?
🔶 जो पास है उसी का ठीक उपयोग कर सकना जब संभव नहीं हो पा रहा है, तो अधिक उपार्जन से भी क्या बनने वाला है? उससे तो साँप के दूध पीने पर बढ़ने वाले विष की तरह अधिक तृष्णा-वासना प्रबल होगी और पतन का क्रम ही तीव्र होगा। हमें उपयोग करने की बात को उपार्जन की ललक से असंख्य गुना महत्त्व देना चाहिए। ऐसा साहस करना कुछ खोना, कुछ गँवाना नहीं है वरन् चक्र-वृद्धि ब्याज समेत अनेक गुना वापस करने वाले किसी प्रामाणिक बैंक में जमा करने की दूरदर्शिता दिखाना भर है।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 वाङमय-६६ पृष्ठ-१.३२
http://awgpskj.blogspot.com/2016/12/blog-post_29.html
🔶 जो पास है उसी का ठीक उपयोग कर सकना जब संभव नहीं हो पा रहा है, तो अधिक उपार्जन से भी क्या बनने वाला है? उससे तो साँप के दूध पीने पर बढ़ने वाले विष की तरह अधिक तृष्णा-वासना प्रबल होगी और पतन का क्रम ही तीव्र होगा। हमें उपयोग करने की बात को उपार्जन की ललक से असंख्य गुना महत्त्व देना चाहिए। ऐसा साहस करना कुछ खोना, कुछ गँवाना नहीं है वरन् चक्र-वृद्धि ब्याज समेत अनेक गुना वापस करने वाले किसी प्रामाणिक बैंक में जमा करने की दूरदर्शिता दिखाना भर है।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 वाङमय-६६ पृष्ठ-१.३२
http://awgpskj.blogspot.com/2016/12/blog-post_29.html
मंगलवार, 24 जुलाई 2018
👉 सबसे खुश कौन ??
🔶 जंगल में एक कौआ रहता था जो अपने जीवन से पूर्णतया संतुष्ट था। लेकिन एक दिन उसने बत्तख देखी और सोचा, “यह बत्तख कितनी सफ़ेद है और मैं कितना काला हूँ. यह बत्तख तो संसार की सबसे ज़्यादा खुश पक्षी होगी।” उसने अपने विचार बत्तख से बतलाए. बत्तख ने उत्तर दिया, “दरसल मुझे भी ऐसा ही लगता था कि मैं सबसे अधिक खुश पक्षी हूँ जब तक मैंने दो रंगों वाले तोते को नहीं देखा था। अब मेरा ऐसा मानना है कि तोता सृष्टि का सबसे अधिक खुश पक्षी है।”
🔷 फिर कौआ तोते के पास गया. तोते ने उसे समझाया, “मोर को मिलने से पहले तक मैं भी एक अत्यधिक खुशहाल ज़िन्दगी जीता था। परन्तु मोर को देखने के बाद मैंने जाना कि मुझमें तो केवल दो रंग हैं जबकि मोर में विविध रंग हैं।” तोते को मिलने के बाद वह कौआ चिड़ियाघर में मोर से मिलने गया. वहाँ उसने देखा कि उस मोर को देखने के लिए हज़ारों लोग एकत्रित थे।
🔶 सब लोगों के चले जाने के बाद कौआ मोर के पास गया और बोला, “प्रिय मोर, तुम तो बहुत ही खूबसूरत हो. तुम्हें देखने प्रतिदिन हज़ारों लोग आते हैं. पर जब लोग मुझे देखते हैं तो तुरंत ही मुझे भगा देते हैं। मेरे अनुमान से तुम भूमण्डल के सबसे अधिक खुश पक्षी हो।”
🔷 मोर ने जवाब दिया, “मैं हमेशा सोचता था कि मैं भूमण्डल का सबसे खूबसूरत और खुश पक्षी हूँ। परन्तु मेरी इस सुंदरता के कारण ही मैं इस चिड़ियाघर में फंसा हुआ हूँ। मैंने चिड़ियाघर का बहुत ध्यान से परीक्षण किया है और तब मुझे यह अहसास हुआ कि इस पिंजरे में केवल कौए को ही नहीं रखा गया है. इसलिए पिछले कुछ दिनों से मैं इस सोच में हूँ कि अगर मैं कौआ होता तो मैं भी खुशी से हर जगह घूम सकता था।”
🔶 यह कहानी इस संसार में हमारी परेशानियों का सार प्रस्तुत करती है: कौआ सोचता है कि बत्तख खुश है, बत्तख को लगता है कि तोता खुश है, तोता सोचता है कि मोर खुश है जबकि मोर को लगता है कि कौआ सबसे खुश है।
सीख :
🔷 दूसरों से तुलना हमें सदा दुखी करती है। हमें दूसरों के लिए खुश होना चाहिए, तभी हमें भी खुशी मिलेगी. हमारे पास जो है उसके लिए हमें सदा आभारी रहना चाहिए। खुशी हमारे मन में होती है।. हमें जो दिया गया है उसका हमें सर्वोत्तम उपयोग करना चाहिए। हम दूसरों की ज़िन्दगी का अनुमान नहीं लगा सकते। हमें सदा कृतज्ञ रहना चाहिए। जब हम जीवन के इस तथ्य को समझ लेंगें तो सदा प्रसन्न रहेंगें।
🔷 फिर कौआ तोते के पास गया. तोते ने उसे समझाया, “मोर को मिलने से पहले तक मैं भी एक अत्यधिक खुशहाल ज़िन्दगी जीता था। परन्तु मोर को देखने के बाद मैंने जाना कि मुझमें तो केवल दो रंग हैं जबकि मोर में विविध रंग हैं।” तोते को मिलने के बाद वह कौआ चिड़ियाघर में मोर से मिलने गया. वहाँ उसने देखा कि उस मोर को देखने के लिए हज़ारों लोग एकत्रित थे।
🔶 सब लोगों के चले जाने के बाद कौआ मोर के पास गया और बोला, “प्रिय मोर, तुम तो बहुत ही खूबसूरत हो. तुम्हें देखने प्रतिदिन हज़ारों लोग आते हैं. पर जब लोग मुझे देखते हैं तो तुरंत ही मुझे भगा देते हैं। मेरे अनुमान से तुम भूमण्डल के सबसे अधिक खुश पक्षी हो।”
🔷 मोर ने जवाब दिया, “मैं हमेशा सोचता था कि मैं भूमण्डल का सबसे खूबसूरत और खुश पक्षी हूँ। परन्तु मेरी इस सुंदरता के कारण ही मैं इस चिड़ियाघर में फंसा हुआ हूँ। मैंने चिड़ियाघर का बहुत ध्यान से परीक्षण किया है और तब मुझे यह अहसास हुआ कि इस पिंजरे में केवल कौए को ही नहीं रखा गया है. इसलिए पिछले कुछ दिनों से मैं इस सोच में हूँ कि अगर मैं कौआ होता तो मैं भी खुशी से हर जगह घूम सकता था।”
🔶 यह कहानी इस संसार में हमारी परेशानियों का सार प्रस्तुत करती है: कौआ सोचता है कि बत्तख खुश है, बत्तख को लगता है कि तोता खुश है, तोता सोचता है कि मोर खुश है जबकि मोर को लगता है कि कौआ सबसे खुश है।
सीख :
🔷 दूसरों से तुलना हमें सदा दुखी करती है। हमें दूसरों के लिए खुश होना चाहिए, तभी हमें भी खुशी मिलेगी. हमारे पास जो है उसके लिए हमें सदा आभारी रहना चाहिए। खुशी हमारे मन में होती है।. हमें जो दिया गया है उसका हमें सर्वोत्तम उपयोग करना चाहिए। हम दूसरों की ज़िन्दगी का अनुमान नहीं लगा सकते। हमें सदा कृतज्ञ रहना चाहिए। जब हम जीवन के इस तथ्य को समझ लेंगें तो सदा प्रसन्न रहेंगें।
👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 11)
👉 विशिष्टता का नए सिरे से उभार
🔶 प्रयत्नपूर्वक खदानों से हीरे खोज तो लिए जाते हैं, पर उन्हें चमकदार, बहुमूल्य और हार में शोभायमान स्थान पाने के लिए खरादना अनिवार्य रूप से आवश्यक होता है। धातुएँ अनेक बार के अग्नि संस्कार से ही संजीवनी जैसे रसायनों के रूप में परिणत होती हैं। पहलवान अखाड़े में लंबा अभ्यास करने के उपरांत ही दंगल में विजयश्री वरण करते हैं। शिल्पी और कलाकार अपने विषय में प्रवीण-पारंगत बनने के लिए लंबे समय तक अभ्यासरत रहते हैं। प्रतिभाओं का प्रशिक्षण और परिवर्धन, आदर्शवादी गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भूमिका निभाने के उपरांत ही संभव हो पाता है।
🔷 उस तथ्य के अनुरूप जहाँ प्रतिभाओं को खोजा जा रहा है, वहीं उनकी प्रखरता निखारने के लिए ऐसे कार्यों में जुटाया भी जा रहा है, जिनके कारण उनका ओजस्, तेजस् और वर्चस् जाज्वल्यमान हो सके। विश्वामित्र ने दशरथ पुत्रों को, युगसृजन प्रयोजन के लिए, उपयुक्त समय पर उनकी तेजस्विता उभारने के लिए यज्ञ की रक्षा करने और असुरों से जूझने का काम सौंपा था। हनुमान्, अर्जुन आदि ने ऐसी ही अग्निपरीक्षाओं से गुजरते हुए असाधारण गौरव पाया था। इनसे बचकर किसी पर भी महानता आकाश से नहीं बरसी है। पराक्रम से जी चुराने वाले तो कृपणों-प्रमादियों की तरह, मात्र हाथ ही मलते रहते हैं।
🔶 इन दिनों जन्मान्तरों से संचित सुसंस्कारों वाली प्रतिभाएँ खोज निकाली गई हैं। उन्हें युगचेतना के साथ जोड़ा गया है। इन्हें नवसृजन साहित्य के माध्यम से पुष्प वाटिका में मधुमक्खियों की तरह, दिव्य सुगंध ने आमंत्रित किया है और उसी परिकर में छत्ता बनाकर रहने के लिए सहमत किया है। प्रज्ञा परिकर को इसी रूप में देखा, समझा और आँका जा सकता है। प्रज्ञा परिजनों को युगसृजन का लक्ष्य लेकर अवतरित हुई दिव्य आत्माओं का समुदाय कहा जा सकता है। वे अंतरात्मा को अमृत पिलाने वाले, युगसाहित्य का रसास्वादन करते रहे हैं, मिशन की पत्रिकाएँ नियमित रूप से पढ़ते रहे हैं। युगचेतना की भावभरी प्रेरणाओं का यथासंभव अनुसरण भी करते रहे हैं। उनके अब तक के योगदान को, परमार्थ पुरुषार्थ को, मुक्त कंठ से सराहा जा सकता है, पर बड़े प्रयोजनों के लिए इतना ही तो पर्याप्त नहीं? समय की बढ़ती माँग को देखते हुए, बड़े कदम भी तो उठाने पड़ेंगे। बच्चे का छोटा-सा पुरुषार्थ भी अभिभावकों द्वारा भली-भाँति सराहा जाता है, पर युवा होने पर बचपन की पुनरावृत्तियाँ करने भर से कौन यशस्वी बनता है?
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 13
🔶 प्रयत्नपूर्वक खदानों से हीरे खोज तो लिए जाते हैं, पर उन्हें चमकदार, बहुमूल्य और हार में शोभायमान स्थान पाने के लिए खरादना अनिवार्य रूप से आवश्यक होता है। धातुएँ अनेक बार के अग्नि संस्कार से ही संजीवनी जैसे रसायनों के रूप में परिणत होती हैं। पहलवान अखाड़े में लंबा अभ्यास करने के उपरांत ही दंगल में विजयश्री वरण करते हैं। शिल्पी और कलाकार अपने विषय में प्रवीण-पारंगत बनने के लिए लंबे समय तक अभ्यासरत रहते हैं। प्रतिभाओं का प्रशिक्षण और परिवर्धन, आदर्शवादी गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भूमिका निभाने के उपरांत ही संभव हो पाता है।
🔷 उस तथ्य के अनुरूप जहाँ प्रतिभाओं को खोजा जा रहा है, वहीं उनकी प्रखरता निखारने के लिए ऐसे कार्यों में जुटाया भी जा रहा है, जिनके कारण उनका ओजस्, तेजस् और वर्चस् जाज्वल्यमान हो सके। विश्वामित्र ने दशरथ पुत्रों को, युगसृजन प्रयोजन के लिए, उपयुक्त समय पर उनकी तेजस्विता उभारने के लिए यज्ञ की रक्षा करने और असुरों से जूझने का काम सौंपा था। हनुमान्, अर्जुन आदि ने ऐसी ही अग्निपरीक्षाओं से गुजरते हुए असाधारण गौरव पाया था। इनसे बचकर किसी पर भी महानता आकाश से नहीं बरसी है। पराक्रम से जी चुराने वाले तो कृपणों-प्रमादियों की तरह, मात्र हाथ ही मलते रहते हैं।
🔶 इन दिनों जन्मान्तरों से संचित सुसंस्कारों वाली प्रतिभाएँ खोज निकाली गई हैं। उन्हें युगचेतना के साथ जोड़ा गया है। इन्हें नवसृजन साहित्य के माध्यम से पुष्प वाटिका में मधुमक्खियों की तरह, दिव्य सुगंध ने आमंत्रित किया है और उसी परिकर में छत्ता बनाकर रहने के लिए सहमत किया है। प्रज्ञा परिकर को इसी रूप में देखा, समझा और आँका जा सकता है। प्रज्ञा परिजनों को युगसृजन का लक्ष्य लेकर अवतरित हुई दिव्य आत्माओं का समुदाय कहा जा सकता है। वे अंतरात्मा को अमृत पिलाने वाले, युगसाहित्य का रसास्वादन करते रहे हैं, मिशन की पत्रिकाएँ नियमित रूप से पढ़ते रहे हैं। युगचेतना की भावभरी प्रेरणाओं का यथासंभव अनुसरण भी करते रहे हैं। उनके अब तक के योगदान को, परमार्थ पुरुषार्थ को, मुक्त कंठ से सराहा जा सकता है, पर बड़े प्रयोजनों के लिए इतना ही तो पर्याप्त नहीं? समय की बढ़ती माँग को देखते हुए, बड़े कदम भी तो उठाने पड़ेंगे। बच्चे का छोटा-सा पुरुषार्थ भी अभिभावकों द्वारा भली-भाँति सराहा जाता है, पर युवा होने पर बचपन की पुनरावृत्तियाँ करने भर से कौन यशस्वी बनता है?
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 13
👉 मनुष्य, अनन्त शक्ति का भाण्डागार है।
🔶 मनुष्य अपने आप में एक परिपूर्ण इकाई है। उसमें वे समस्त शक्तियाँ और सम्भावनायें जन्मजात रूप में विद्यमान् हैं, जिनके आधार पर किसी भी दिशा में पूर्णता एवं सफलता के उच्च-शिखर पर पहुँचना सम्भव हो सकता है।
🔷 समस्त दैवी शक्तियों का प्रतिनिधित्व मनुष्य की अन्तःचेतना करती है। प्रसुप्त पड़ी रहने पर वह भले ही अपना गौरव प्रकट न कर सके पर जब वह जाग जाती है तो यही अन्तःचेतना व्यक्तित्व में अगणित ऐसे सद्गुण प्रस्फुटित करती है, जिनसे किसी दिशा में चमत्कार प्रस्तुत किये जा सकते हैं।
🔶 बाहरी हानि-लाभ, सहयोग और अवरोध मनुष्य की प्राप्ति एवं अवगति के उतने बड़े कारण नहीं, जितने कि अपने आन्तरिक सद्गुण एवं दुर्गुण। व्यक्ति स्वयं ही अपने उत्थान, पतन का उत्तरदायी है। जिसने अपने को समझा, सम्भाला और बढ़ाया वह निश्चित रूप से प्रगति के पथ पर अग्रसर हुआ है। अपने भीतरी शक्ति-कोष को जगाने पर मनुष्य अपरिमित दिव्य-शक्तियों से विभूषित हो सकता है।
🔷 बाहरी सहायता की अपेक्षा करने की तुलना में यह अच्छा है कि मनुष्य अपने भीतर छिपी सत्प्रवृत्तियों को ढूंढ़े एवं उभारे। प्रगति का सार आधार व्यक्ति की अन्तःचेतना और भावनात्मक स्फुरण पर ही तो अवलम्बित है।
✍🏻 ~ जे. कृष्ण मूर्ति
📖 अखण्ड ज्योति 1968 अगस्त पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1968/August/v1
🔷 समस्त दैवी शक्तियों का प्रतिनिधित्व मनुष्य की अन्तःचेतना करती है। प्रसुप्त पड़ी रहने पर वह भले ही अपना गौरव प्रकट न कर सके पर जब वह जाग जाती है तो यही अन्तःचेतना व्यक्तित्व में अगणित ऐसे सद्गुण प्रस्फुटित करती है, जिनसे किसी दिशा में चमत्कार प्रस्तुत किये जा सकते हैं।
🔶 बाहरी हानि-लाभ, सहयोग और अवरोध मनुष्य की प्राप्ति एवं अवगति के उतने बड़े कारण नहीं, जितने कि अपने आन्तरिक सद्गुण एवं दुर्गुण। व्यक्ति स्वयं ही अपने उत्थान, पतन का उत्तरदायी है। जिसने अपने को समझा, सम्भाला और बढ़ाया वह निश्चित रूप से प्रगति के पथ पर अग्रसर हुआ है। अपने भीतरी शक्ति-कोष को जगाने पर मनुष्य अपरिमित दिव्य-शक्तियों से विभूषित हो सकता है।
🔷 बाहरी सहायता की अपेक्षा करने की तुलना में यह अच्छा है कि मनुष्य अपने भीतर छिपी सत्प्रवृत्तियों को ढूंढ़े एवं उभारे। प्रगति का सार आधार व्यक्ति की अन्तःचेतना और भावनात्मक स्फुरण पर ही तो अवलम्बित है।
✍🏻 ~ जे. कृष्ण मूर्ति
📖 अखण्ड ज्योति 1968 अगस्त पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1968/August/v1
👉 सच्चा आत्म-समर्पण करने वाली देवी
🔶 थाईजेन्ड ग्रीनलैण्ड पार्क में स्वामी विवेकानन्द का ओजस्वी भाषण हुआ। उन्होंने संसार के नव-निर्माण की आवश्यकता का प्रतिपादन करते हुए कहा- ‘‘यदि मुझे सच्चा आत्म-समर्पण करने वाले बीस लोक-सेवक मिल जायें, तो दुनिया का नक्शा ही बदल दूँ।”
🔷 भाषण बहुत पसन्द किया गया और उसकी सराहना भी की गई, पर सच्चे आत्म-समर्पण वाली माँग पूरा करने के लिए एक भी तैयार न हुआ।
🔶 दूसरे दिन प्रातःकाल स्वामीजी सोकर उठे तो उन्हें दरवाजे से सटी खड़ी एक महिला दिखाई दी। वह हाथ जोड़े खड़ी थी।
🔷 स्वामीजी ने उससे इतने सवेरे इस प्रकार आने का प्रयोजन पूछा, तो उसने रूंधे कंठ और भरी आँखों से कहा- भगवन्! कल आपने दुनिया का नक्शा बदलने के लिए सच्चे मन से आत्म-समर्पण करने वाले बीस साथियों की माँग की थी। उन्नीस कहाँ से आयेंगे यह मैं नहीं जानती, पर एक मैं आपके सामने हूँ। इस समर्पित मन और मस्तिष्क का आप चाहे जो उपयोग करें।
🔶 स्वामी विवेकानन्द गद्-गद् हो गये। इस भद्र महिला को लेकर वे भारत आये। उसने हिन्दू साध्वी के रूप में नव-निर्माण के लिए जो अनुपम कार्य किया उसे कौन नहीं जानता। वह महिला थी भगिनी निवेदिता- पूर्व नाम था मिस नोबल।
📖 अखण्ड ज्योति 1968 मार्च पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1968/March/v1.3
🔷 भाषण बहुत पसन्द किया गया और उसकी सराहना भी की गई, पर सच्चे आत्म-समर्पण वाली माँग पूरा करने के लिए एक भी तैयार न हुआ।
🔶 दूसरे दिन प्रातःकाल स्वामीजी सोकर उठे तो उन्हें दरवाजे से सटी खड़ी एक महिला दिखाई दी। वह हाथ जोड़े खड़ी थी।
🔷 स्वामीजी ने उससे इतने सवेरे इस प्रकार आने का प्रयोजन पूछा, तो उसने रूंधे कंठ और भरी आँखों से कहा- भगवन्! कल आपने दुनिया का नक्शा बदलने के लिए सच्चे मन से आत्म-समर्पण करने वाले बीस साथियों की माँग की थी। उन्नीस कहाँ से आयेंगे यह मैं नहीं जानती, पर एक मैं आपके सामने हूँ। इस समर्पित मन और मस्तिष्क का आप चाहे जो उपयोग करें।
🔶 स्वामी विवेकानन्द गद्-गद् हो गये। इस भद्र महिला को लेकर वे भारत आये। उसने हिन्दू साध्वी के रूप में नव-निर्माण के लिए जो अनुपम कार्य किया उसे कौन नहीं जानता। वह महिला थी भगिनी निवेदिता- पूर्व नाम था मिस नोबल।
📖 अखण्ड ज्योति 1968 मार्च पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1968/March/v1.3
सोमवार, 23 जुलाई 2018
👉 बलि का तेज चला गया
🔷 राजा बलि असुर कुल में उत्पन्न हुए थे पर वे बड़े सदाचारी थे और अपनी धर्म परायपता के उनने बहुत वैभव और यश कमाया था। उनका पद इन्द्र के समान हो गया। पर धीरे-धीरे जब धन सें उत्पन्न होने वाले अहंकार, आलस्य, दुराचार जैसे दुर्गुण बढ़ने लगे तो उनके भीतर वाली शक्ति खोखली होने लगी।
🔶 एक दिन इन्द्र की बलि से भेंट हुई तो सबने देखा कि बलि के शरीर से एक प्रचण्ड तेज निकलकर इन्द्र के शरीर में चला गया है और बलि श्री विहीन हो गये।
🔷 उस तेज से पूछा गया कि आप कौन हैं? और क्यों बलि के शरीर से निकलकर इन्द्र की देह में गये? तो तेज ने उत्तर दिया कि मैं सदाचरण है। मैं जहां भी रहता हूँ वहीं सब विभूतियाँ रहती हैं। बलि ने तब तक मुझे धारण किया जब तक उसका वैभव बढ़ता रहा था। जब इसने मेरी उपेक्षा कर दी तो मैं सौभाग्य को साथ लेकर, सदाचरण में तत्पर इन्द्र के यहाँ चला आया हूँ।
🔶 बलि का सौभाग्य सूर्य अस्त हो गया और इन्द्र का चमकने लगा, उसमें सदाचरण रूपी तेज की समाप्ति ही प्रधान कारण थी।
🔷 ऐसे भी व्यक्ति होतै हैं जो अपने व्यक्तित्व को ऊँचा उठाकर अपने को महामानव स्तर तक पहुँचा देते है, जन सम्मान पाते हैं। ऐसे निष्ठावानों से भारतीय-संस्कृति सदा से गौरवान्वित होती रही है।
🔶 एक दिन इन्द्र की बलि से भेंट हुई तो सबने देखा कि बलि के शरीर से एक प्रचण्ड तेज निकलकर इन्द्र के शरीर में चला गया है और बलि श्री विहीन हो गये।
🔷 उस तेज से पूछा गया कि आप कौन हैं? और क्यों बलि के शरीर से निकलकर इन्द्र की देह में गये? तो तेज ने उत्तर दिया कि मैं सदाचरण है। मैं जहां भी रहता हूँ वहीं सब विभूतियाँ रहती हैं। बलि ने तब तक मुझे धारण किया जब तक उसका वैभव बढ़ता रहा था। जब इसने मेरी उपेक्षा कर दी तो मैं सौभाग्य को साथ लेकर, सदाचरण में तत्पर इन्द्र के यहाँ चला आया हूँ।
🔶 बलि का सौभाग्य सूर्य अस्त हो गया और इन्द्र का चमकने लगा, उसमें सदाचरण रूपी तेज की समाप्ति ही प्रधान कारण थी।
🔷 ऐसे भी व्यक्ति होतै हैं जो अपने व्यक्तित्व को ऊँचा उठाकर अपने को महामानव स्तर तक पहुँचा देते है, जन सम्मान पाते हैं। ऐसे निष्ठावानों से भारतीय-संस्कृति सदा से गौरवान्वित होती रही है।
👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 10)
👉 विशिष्टता का नए सिरे से उभार
🔷 इन दिनों ऐसा ही कुछ चल रहा है। असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए महाकाल की कोई बड़ी योजना बन रही है। उसे मूर्त रूप देने के लिए दो छोटे किंतु अति महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम सामने आए हैं। एक है आदर्शवादी सहायकों में उमंगों का उभारना और एक परिसर-एक सूत्र में संबद्ध होना। साथ ही कुछ नियमित एवं सृजनात्मक गतिविधियों को प्रारंभ करना, जो सद्विचारों को सद्कार्यों में परिणत कर सकने की भूमिका बना सकें। दूसरा कार्य यह है कि अनीति विरोधी मोरचा खड़ा किया जाए, उसे एक प्रयास से आरंभ करके विशाल-विकराल बनाया जाए। एक चिनगारी दावानल बनती है। छोटे बीज से वृक्ष बनता है।
🔶 ध्वंस एवं सृजन दोनों का यही उपक्रम है। एक कदम शालीनता के सृजन का एवं दूसरा अनीति के दमन का। सत्प्रवृत्ति संवर्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के दो मोरचे पर, दोधारी तलवार से, दो स्तर की रीति-नीति अपनाना। यह है वह अग्रगमन, जिस पर कदम-कदम बढ़ते हुए नवयुग का अवतरण संभव हो सकता है। उज्ज्वल भविष्य की सर्वतोमुखी प्रगति एवं चिरस्थायी शांति के लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है। इसी स्थिति में पहुँचने पर ‘सत्यमेव जयते’ का उद्घोष, प्रचंड प्रयासों का मार्ग पूरा करते हुए अपनी यथार्थता का परिचय दे सकता है।
🔷 इस महाजागरण से ही प्रतिभाओं की मूर्च्छना हटेगी। वे अँगड़ाई लेते हुए लंबी मूर्च्छना से पीछा छुड़ाती और दिनमान की ऊर्जा प्रेरणा से कार्य क्षेत्र में अपने पौरुष का परिचय देती दृष्टिगोचर होंगी। इस भवितव्यता को हम सब इन्हीं आँखों से अपने ही सामने मूर्तिमान होते हुए देखेंगे।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 12
🔷 इन दिनों ऐसा ही कुछ चल रहा है। असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए महाकाल की कोई बड़ी योजना बन रही है। उसे मूर्त रूप देने के लिए दो छोटे किंतु अति महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम सामने आए हैं। एक है आदर्शवादी सहायकों में उमंगों का उभारना और एक परिसर-एक सूत्र में संबद्ध होना। साथ ही कुछ नियमित एवं सृजनात्मक गतिविधियों को प्रारंभ करना, जो सद्विचारों को सद्कार्यों में परिणत कर सकने की भूमिका बना सकें। दूसरा कार्य यह है कि अनीति विरोधी मोरचा खड़ा किया जाए, उसे एक प्रयास से आरंभ करके विशाल-विकराल बनाया जाए। एक चिनगारी दावानल बनती है। छोटे बीज से वृक्ष बनता है।
🔶 ध्वंस एवं सृजन दोनों का यही उपक्रम है। एक कदम शालीनता के सृजन का एवं दूसरा अनीति के दमन का। सत्प्रवृत्ति संवर्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के दो मोरचे पर, दोधारी तलवार से, दो स्तर की रीति-नीति अपनाना। यह है वह अग्रगमन, जिस पर कदम-कदम बढ़ते हुए नवयुग का अवतरण संभव हो सकता है। उज्ज्वल भविष्य की सर्वतोमुखी प्रगति एवं चिरस्थायी शांति के लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है। इसी स्थिति में पहुँचने पर ‘सत्यमेव जयते’ का उद्घोष, प्रचंड प्रयासों का मार्ग पूरा करते हुए अपनी यथार्थता का परिचय दे सकता है।
🔷 इस महाजागरण से ही प्रतिभाओं की मूर्च्छना हटेगी। वे अँगड़ाई लेते हुए लंबी मूर्च्छना से पीछा छुड़ाती और दिनमान की ऊर्जा प्रेरणा से कार्य क्षेत्र में अपने पौरुष का परिचय देती दृष्टिगोचर होंगी। इस भवितव्यता को हम सब इन्हीं आँखों से अपने ही सामने मूर्तिमान होते हुए देखेंगे।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 12
👉 प्रकाश की आवश्यकता हमें ही पूरा करनी होगी
🔷 आज का संसार अन्धविश्वासों और मूढ़ मान्यताओं की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। इन जंजीरों से जकड़े हुए लोगों की दयनीय स्थिति पर मुझे तरस आता है। एक विचार जो मुझे दिन में निकले सूरज की तरह स्पष्ट दिखाई दे रहा है, वह यह है कि- व्यक्ति तथा समाज के समस्त दुःख उनमें समाये हुए अज्ञान के कारण ही हैं। अज्ञान का अन्धकार मिटे बिना सब लोग ऐसे ही भटकते और ठोकरें खाते रहेंगे।
🔶 संसार में प्रकाश कहाँ से उत्पन्न हो? यह प्रक्रिया बलिदानों द्वारा सम्भव होती रही है। बलिदानी वीर अपना उदाहरण प्रस्तुत कर लोगों के सामने एक परम्परा उपस्थित करते हैं, फिर दूसरे उन पदचिन्हों पर चलने लगते हैं। प्रकाश उत्पन्न करने की यही परम्परा अनादि काल से चली आ रही है। इस धरती पर जो सच्चे शूरवीर अथवा उत्तम व्यक्ति उत्पन्न होते रहे हैं उन्होंने त्याग और बलिदान का मार्ग ही अपनाया है क्योंकि अपने सुख को बलिदान करने से ही दूसरे के सुख की सम्भावना उत्पन्न होती है। इस युग में शाश्वत प्रेम और अनन्त करुणा से भरे प्रबुद्ध हृदयों की जितनी अधिक आवश्यकता है, उतनी पहले कभी नहीं रही। साहसपूर्ण कदम उठाने की आज जितनी आवश्यकता है उतनी पहले कभी नहीं रही।
🔷 इसलिये ए, प्रबुद्ध आत्माओ! उठो, संसार दुःख दारिद्रय की ज्वाला में झुलस रहा है। क्या तुम्हें ऐसे समय में भी सोते रहना शोभा दे सकता है? प्रकाश आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है और वह तुम्हारे जागरण एवं बलिदान ये ही उत्पन्न होगा।
✍🏻 ~ स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड ज्योति 1968 जनवरी पृष्ठ 1
🔶 संसार में प्रकाश कहाँ से उत्पन्न हो? यह प्रक्रिया बलिदानों द्वारा सम्भव होती रही है। बलिदानी वीर अपना उदाहरण प्रस्तुत कर लोगों के सामने एक परम्परा उपस्थित करते हैं, फिर दूसरे उन पदचिन्हों पर चलने लगते हैं। प्रकाश उत्पन्न करने की यही परम्परा अनादि काल से चली आ रही है। इस धरती पर जो सच्चे शूरवीर अथवा उत्तम व्यक्ति उत्पन्न होते रहे हैं उन्होंने त्याग और बलिदान का मार्ग ही अपनाया है क्योंकि अपने सुख को बलिदान करने से ही दूसरे के सुख की सम्भावना उत्पन्न होती है। इस युग में शाश्वत प्रेम और अनन्त करुणा से भरे प्रबुद्ध हृदयों की जितनी अधिक आवश्यकता है, उतनी पहले कभी नहीं रही। साहसपूर्ण कदम उठाने की आज जितनी आवश्यकता है उतनी पहले कभी नहीं रही।
🔷 इसलिये ए, प्रबुद्ध आत्माओ! उठो, संसार दुःख दारिद्रय की ज्वाला में झुलस रहा है। क्या तुम्हें ऐसे समय में भी सोते रहना शोभा दे सकता है? प्रकाश आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है और वह तुम्हारे जागरण एवं बलिदान ये ही उत्पन्न होगा।
✍🏻 ~ स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड ज्योति 1968 जनवरी पृष्ठ 1
रविवार, 22 जुलाई 2018
👉 जो चाहोगे सो पाओगे !
🔶 एक साधु था, वह रोज घाट के किनारे बैठ कर चिल्लाया करता था, ”जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे सो पाओगे।” बहुत से लोग वहाँ से गुजरते थे पर कोई भी उसकी बात पर ध्यान नही देता था और सब उसे एक पागल आदमी समझते थे।
🔷 एक दिन एक युवक वहाँ से गुजरा और उसने उस साधु की आवाज सुनी, “जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे सो पाओगे।”, और आवाज सुनते ही उसके पास चला गया। उसने साधु से पूछा -“महाराज आप बोल रहे थे कि ‘जो चाहोगे सो पाओगे’ तो क्या आप मुझको वो दे सकते हो जो मै जो चाहता हूँ?”
🔶 साधु उसकी बात को सुनकर बोला – “हाँ बेटा तुम जो कुछ भी चाहता है मै उसे जरुर दुँगा, बस तुम्हे मेरी बात माननी होगी। लेकिन पहले ये तो बताओ कि तुम्हे आखिर चाहिये क्या?” युवक बोला-” मेरी एक ही ख्वाहिश है मै हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनना चाहता हूँ। “
🔷 साधू बोला,” कोई बात नही मै तुम्हे एक हीरा और एक मोती देता हूँ, उससे तुम जितने भी हीरे मोती बनाना चाहोगे बना पाओगे!” और ऐसा कहते हुए साधु ने अपना हाथ आदमी की हथेली पर रखते हुए कहा, ” पुत्र, मैं तुम्हे दुनिया का सबसे अनमोल हीरा दे रहा हूं, लोग इसे ‘समय’ कहते हैं, इसे तेजी से अपनी मुट्ठी में पकड़ लो और इसे कभी मत गंवाना, तुम इससे जितने चाहो उतने हीरे बना सकते हो।
🔶 युवक अभी कुछ सोच ही रहा था कि साधु उसका दूसरी हथेली, पकड़ते हुए बोला, ” पुत्र , इसे पकड़ो, यह दुनिया का सबसे कीमती मोती है, लोग इसे “धैर्य” कहते हैं, जब कभी समय देने के बावजूद परिणाम ना मिलें तो इस कीमती मोती को धारण कर लेना, याद रखन जिसके पास यह मोती है, वह दुनिया में कुछ भी प्राप्त कर सकता है।
🔷 युवक गम्भीरता से साधु की बातों पर विचार करता है और निश्चय करता है कि आज से वह कभी अपना समय बर्वाद नहीं करेगा और हमेशा धैर्य से काम लेगा। और ऐसा सोचकर वह हीरों के एक बहुत बड़े व्यापारी के यहाँ काम शुरू करता है और अपने मेहनत और ईमानदारी के बल पर एक दिन खुद भी हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनता है।
🔶 मित्रों ‘समय’ और ‘धैर्य’ वह दो हीरे-मोती हैं जिनके बल पर हम बड़े से बड़ा लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। अतः ज़रूरी है कि हम अपने कीमती समय को बर्वाद ना करें और अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए धैर्य से काम लें।
🔷 एक दिन एक युवक वहाँ से गुजरा और उसने उस साधु की आवाज सुनी, “जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे सो पाओगे।”, और आवाज सुनते ही उसके पास चला गया। उसने साधु से पूछा -“महाराज आप बोल रहे थे कि ‘जो चाहोगे सो पाओगे’ तो क्या आप मुझको वो दे सकते हो जो मै जो चाहता हूँ?”
🔶 साधु उसकी बात को सुनकर बोला – “हाँ बेटा तुम जो कुछ भी चाहता है मै उसे जरुर दुँगा, बस तुम्हे मेरी बात माननी होगी। लेकिन पहले ये तो बताओ कि तुम्हे आखिर चाहिये क्या?” युवक बोला-” मेरी एक ही ख्वाहिश है मै हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनना चाहता हूँ। “
🔷 साधू बोला,” कोई बात नही मै तुम्हे एक हीरा और एक मोती देता हूँ, उससे तुम जितने भी हीरे मोती बनाना चाहोगे बना पाओगे!” और ऐसा कहते हुए साधु ने अपना हाथ आदमी की हथेली पर रखते हुए कहा, ” पुत्र, मैं तुम्हे दुनिया का सबसे अनमोल हीरा दे रहा हूं, लोग इसे ‘समय’ कहते हैं, इसे तेजी से अपनी मुट्ठी में पकड़ लो और इसे कभी मत गंवाना, तुम इससे जितने चाहो उतने हीरे बना सकते हो।
🔶 युवक अभी कुछ सोच ही रहा था कि साधु उसका दूसरी हथेली, पकड़ते हुए बोला, ” पुत्र , इसे पकड़ो, यह दुनिया का सबसे कीमती मोती है, लोग इसे “धैर्य” कहते हैं, जब कभी समय देने के बावजूद परिणाम ना मिलें तो इस कीमती मोती को धारण कर लेना, याद रखन जिसके पास यह मोती है, वह दुनिया में कुछ भी प्राप्त कर सकता है।
🔷 युवक गम्भीरता से साधु की बातों पर विचार करता है और निश्चय करता है कि आज से वह कभी अपना समय बर्वाद नहीं करेगा और हमेशा धैर्य से काम लेगा। और ऐसा सोचकर वह हीरों के एक बहुत बड़े व्यापारी के यहाँ काम शुरू करता है और अपने मेहनत और ईमानदारी के बल पर एक दिन खुद भी हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनता है।
🔶 मित्रों ‘समय’ और ‘धैर्य’ वह दो हीरे-मोती हैं जिनके बल पर हम बड़े से बड़ा लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। अतः ज़रूरी है कि हम अपने कीमती समय को बर्वाद ना करें और अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए धैर्य से काम लें।
👉 Motivational Story 22 July 2018
🔶 We have to create strength where it does not exist; we have to change our natures, and become new men with new hearts, to be born again… We need a nucleus of men in whom the Shakti is developed to its uttermost extent, in whom it fills every corner of the personality and overflows to fertilize the earth. These, having the fire of Bhawani in their hearts and brains, will go forth and carry the flame to every nook and cranny of our land.
✍🏻 ~ Sri Aurobindo
📖 From Akhand Jyoti
✍🏻 ~ Sri Aurobindo
📖 From Akhand Jyoti
👉 सार्वभौम सर्वजनीन-माँ की उपासना
🔶 दुनिया में जितने धर्म, सम्प्रदाय, देवता और भगवानों के प्रकार हैं उन्हें कुछ दिन मौन हो जाना चाहिए और एक नई उपासना पद्धति का प्रचलन करना चाहिए जिसमें केवल “माँ” की ही पूजा हो, माँ को ही भेंट चढ़ाई जाये?
🔷 माँ बच्चे को दूध ही नहीं पिलाती, पहले वह उसका रस, रक्त और हाड़-माँस से निर्माण भी करती है, पीछे उसके विकास, उसकी सुख-समृद्धि और समुन्नति के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देती है। उसकी एक ही कामना रहती है, मेरे सब बच्चे परस्पर प्रेमपूर्वक रहें, मित्रता का आचरण करें, न्यायपूर्वक सम्पत्तियों का उपभोग करें, परस्पर ईर्ष्या-द्वेष का कारण न बनें। चिरशान्ति, विश्व-मैत्री और ‘‘सर्वे भवंतु सुखिनः” वह आदर्श है, जिनके कारण माँ सब देवताओं से बड़ी है।
🔶 हमारी धरती ही हमारी माता है यह मानकर उसकी उपासना करें। संसार भर के प्राणी उसकी सन्तान-हमारे भाई हैं। यदि हमने माँ की उपासना न की होती तो छल-कपट, ईर्ष्या-द्वेष, दम्भ, हिंसा, पाशविकता, युद्ध को प्रश्रय न देते। स्वर्ग और है भी क्या, जहाँ यह बुराइयाँ न हों वहीं तो स्वर्ग है। माँ की उपासना से स्वर्गीय आनन्द की अनुभूति इसीलिए यहीं प्रत्यक्ष रूप से अभी मिलती है। इसलिए मैं कहता हूँ कि कुछ दिन और सब उपासना पद्धति बन्द कर केवल “माँ” की “मातृ-भावना” की उपासना करनी चाहिए।
✍🏻 ~ स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड ज्योति-मार्च 1981 पृष्ठ 3
🔷 माँ बच्चे को दूध ही नहीं पिलाती, पहले वह उसका रस, रक्त और हाड़-माँस से निर्माण भी करती है, पीछे उसके विकास, उसकी सुख-समृद्धि और समुन्नति के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देती है। उसकी एक ही कामना रहती है, मेरे सब बच्चे परस्पर प्रेमपूर्वक रहें, मित्रता का आचरण करें, न्यायपूर्वक सम्पत्तियों का उपभोग करें, परस्पर ईर्ष्या-द्वेष का कारण न बनें। चिरशान्ति, विश्व-मैत्री और ‘‘सर्वे भवंतु सुखिनः” वह आदर्श है, जिनके कारण माँ सब देवताओं से बड़ी है।
🔶 हमारी धरती ही हमारी माता है यह मानकर उसकी उपासना करें। संसार भर के प्राणी उसकी सन्तान-हमारे भाई हैं। यदि हमने माँ की उपासना न की होती तो छल-कपट, ईर्ष्या-द्वेष, दम्भ, हिंसा, पाशविकता, युद्ध को प्रश्रय न देते। स्वर्ग और है भी क्या, जहाँ यह बुराइयाँ न हों वहीं तो स्वर्ग है। माँ की उपासना से स्वर्गीय आनन्द की अनुभूति इसीलिए यहीं प्रत्यक्ष रूप से अभी मिलती है। इसलिए मैं कहता हूँ कि कुछ दिन और सब उपासना पद्धति बन्द कर केवल “माँ” की “मातृ-भावना” की उपासना करनी चाहिए।
✍🏻 ~ स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड ज्योति-मार्च 1981 पृष्ठ 3
👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 9)
👉 विशिष्टता का नए सिरे से उभार
🔶 इन सबसे जूझने के लिए एक सुविस्तृत मोर्चेबंदी करनी होगी। सामान्यजन तो अपनी निजी आवश्यकताओं, उलझनों तक का समाधान नहीं कर पाते, फिर व्यापक बनी-हर क्षेत्र में समाई विपन्नताओं से जूझने के लिए उनसे क्या कुछ बन पड़ेगा? इस कठिन कार्य को संपन्न करने के लिए विशिष्टतायुक्त प्रतिभाएँ चाहिए। बड़े युद्धों को जीतना वरिष्ठ सेनानायकों द्वारा अपनाई गई रणनीति और सूझ-बूझ के सहारे ही संभव हो पाता है। यही बात बड़े सृजनों के संबंध में भी है। ताजमहल जैसी इमारत बनाने, चीन की दीवार खड़ी करने, हाबड़ा जैसे पुल खड़े करने जैसे महापुरुषार्थों के लिए वरिष्ठ लोगों की, वस्तुस्थिति के साथ तालमेल बिठाकर चलने वाली नीति ही सफल होती है। उनके लिए आवश्यक साधन एवं सहयोग जुटाना भी हँसी-खेल नहीं होता। बड़ी प्रतिभाएँ ही बड़ी योजनाएँ बनाती हैं, वे ही उतने भारी-भरकम दायित्व उठाती हैं। छोटे तो समर्थन भर देते हैं। सफलता पर हर्ष और असफलता पर विषाद प्रकट करने भर की उनमें क्षमता होती है।
🔷 इन दिनों दो कार्य प्रमुख हैं- विपन्नता से जूझना और निरस्त करना, साथ ही नवसृजन की ऐसी आधारशिला रखना, जिससे अगले ही दिनों संपन्नता, बुद्धिमत्ता, कुशलता और समर्थता का सुहावना माहौल बन पड़े। इक्कीसवीं सदी को दूरदर्शी लोग सर्वतोमुखी प्रगति की संभावनाओं से भरी-पूरी मानते हैं। उस अवधि में सतयुग की वापसी पर विश्वास करते हैं। इस मान्यता के अनेकों कारण भी हैं। उनमें से एक यह है कि इन्हीं दिनों समर्थ प्रतिभाओं का सृजन, उन्नयन और प्रखरीकरण तेजी से हो रहा है। संभवतः अदृश्य शक्ति का ही इसमें हाथ हो?
🔶 ऐसी शक्ति का जो समय-समय पर आड़े समय में बिगड़ता संतुलन संभालने के लिए अपने वर्चस्व का प्रकटीकरण करती रही है। कहना न होगा कि तेजस्वी प्रतिभाएँ ही भौतिक समृद्धि बढ़ाने, प्रगति का वातावरण उत्पन्न करने और अंधकार भरे वर्तमान को उज्ज्वल भविष्य में परिणत करने का श्रेय संपादित करती रही हैं। उन्हें ही किसी देश, समाज एवं युग की वास्तविक शक्ति एवं संपदा माना जाता है। स्पष्ट है कि वे उदीयमान वातावरण में ही उगती और फलित होती हैं। वर्षा में हरीतिमा और वसंत में सुषमा का प्राकट्य होता है। प्रतिभाएँ अनायास ही नहीं बरस पड़ती, न वे उद्भिजों की तरह उग पड़ती हैं। उन्हें प्रयत्नपूर्वक खोजा, उभारा और खरादा जाता है। इसके लिए आवश्यक एवं उपयुक्त वातावरण का सृजन किया जाता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 11
🔶 इन सबसे जूझने के लिए एक सुविस्तृत मोर्चेबंदी करनी होगी। सामान्यजन तो अपनी निजी आवश्यकताओं, उलझनों तक का समाधान नहीं कर पाते, फिर व्यापक बनी-हर क्षेत्र में समाई विपन्नताओं से जूझने के लिए उनसे क्या कुछ बन पड़ेगा? इस कठिन कार्य को संपन्न करने के लिए विशिष्टतायुक्त प्रतिभाएँ चाहिए। बड़े युद्धों को जीतना वरिष्ठ सेनानायकों द्वारा अपनाई गई रणनीति और सूझ-बूझ के सहारे ही संभव हो पाता है। यही बात बड़े सृजनों के संबंध में भी है। ताजमहल जैसी इमारत बनाने, चीन की दीवार खड़ी करने, हाबड़ा जैसे पुल खड़े करने जैसे महापुरुषार्थों के लिए वरिष्ठ लोगों की, वस्तुस्थिति के साथ तालमेल बिठाकर चलने वाली नीति ही सफल होती है। उनके लिए आवश्यक साधन एवं सहयोग जुटाना भी हँसी-खेल नहीं होता। बड़ी प्रतिभाएँ ही बड़ी योजनाएँ बनाती हैं, वे ही उतने भारी-भरकम दायित्व उठाती हैं। छोटे तो समर्थन भर देते हैं। सफलता पर हर्ष और असफलता पर विषाद प्रकट करने भर की उनमें क्षमता होती है।
🔷 इन दिनों दो कार्य प्रमुख हैं- विपन्नता से जूझना और निरस्त करना, साथ ही नवसृजन की ऐसी आधारशिला रखना, जिससे अगले ही दिनों संपन्नता, बुद्धिमत्ता, कुशलता और समर्थता का सुहावना माहौल बन पड़े। इक्कीसवीं सदी को दूरदर्शी लोग सर्वतोमुखी प्रगति की संभावनाओं से भरी-पूरी मानते हैं। उस अवधि में सतयुग की वापसी पर विश्वास करते हैं। इस मान्यता के अनेकों कारण भी हैं। उनमें से एक यह है कि इन्हीं दिनों समर्थ प्रतिभाओं का सृजन, उन्नयन और प्रखरीकरण तेजी से हो रहा है। संभवतः अदृश्य शक्ति का ही इसमें हाथ हो?
🔶 ऐसी शक्ति का जो समय-समय पर आड़े समय में बिगड़ता संतुलन संभालने के लिए अपने वर्चस्व का प्रकटीकरण करती रही है। कहना न होगा कि तेजस्वी प्रतिभाएँ ही भौतिक समृद्धि बढ़ाने, प्रगति का वातावरण उत्पन्न करने और अंधकार भरे वर्तमान को उज्ज्वल भविष्य में परिणत करने का श्रेय संपादित करती रही हैं। उन्हें ही किसी देश, समाज एवं युग की वास्तविक शक्ति एवं संपदा माना जाता है। स्पष्ट है कि वे उदीयमान वातावरण में ही उगती और फलित होती हैं। वर्षा में हरीतिमा और वसंत में सुषमा का प्राकट्य होता है। प्रतिभाएँ अनायास ही नहीं बरस पड़ती, न वे उद्भिजों की तरह उग पड़ती हैं। उन्हें प्रयत्नपूर्वक खोजा, उभारा और खरादा जाता है। इसके लिए आवश्यक एवं उपयुक्त वातावरण का सृजन किया जाता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 11
शनिवार, 21 जुलाई 2018
👉 महात्मा बुद्ध और अनुयायी -
🔷 भगवान् बुद्ध के एक अनुयायी ने कहा, प्रभु ! मुझे आपसे एक निवेदन करना है।बुद्ध: बताओ क्या कहना है?
🔶 अनुयायी: मेरे वस्त्र पुराने हो चुके हैं. अब ये पहनने के लायक नहीं रहे. कृपया मुझे नए वस्त्र देने का कष्ट करें!
🔷 बुद्ध ने अनुयायी के वस्त्र देखे, वे सचमुच बिलकुल जीर्ण हो चुके थे और जगह जगह से घिस चुके थे… इसलिए उन्होंने एक अन्य अनुयायी को नए वस्त्र देने का आदेश दे दिए. कुछ दिनों बाद बुद्ध अनुयायी के घर पहुंचे.
🔶 बुद्ध: क्या तुम अपने नए वस्त्रों में आराम से हो? तुम्हे और कुछ तो नहीं चाहिए?
🔷 अनुयायी: धन्यवाद प्रभु मैं इन वस्त्रों में बिलकुल आराम से हूँ और मुझे और कुछ नहीं चाहिए।
🔶 बुद्ध: अब जबकि तुम्हारे पास नए वस्त्र हैं तो तुमने पुराने वस्त्रों का क्या किया?
🔷 अनुयायी: मैं अब उसे ओढने के लिए प्रयोग कर रहा हूँ?
🔶 बुद्ध: तो तुमने अपनी पुरानी ओढ़नी का क्या किया?
🔷 अनुयायी: जी मैंने उसे खिड़की पर परदे की जगह लगा दिया है।
🔶 बुद्ध: तो क्या तुमने पुराने परदे फ़ेंक दिए?
🔷 अनुयायी: जी नहीं, मैंने उसके चार टुकड़े किये और उनका प्रयोग रसोई में गरम पतीलों को आग से उतारने के लिए कर रहा हूँ।
🔶 बुद्ध: तो फिर रसॊइ के पुराने कपड़ों का क्या किया?
🔷 अनुयायी: अब मैं उन्हें पोछा लगाने के लिए प्रयोग करूँगा।
🔶 बुद्ध: तो तुम्हारा पुराना पोछा क्या हुआ?
🔷 अनुयायी: प्रभु वो अब इतना तार -तार हो चुका था कि उसका कुछ नहीं किया जा सकता था, इसलिए मैंने उसका एक -एक धागा अलग कर दिए की बातियाँ तैयार कर लीं…. उन्ही में से एक कल रात आपके कक्ष में प्रकाशित था।
🔶 बुद्ध अनुयायी से संतुष्ट हो गए वो प्रसन्न थे कि उनका शिष्य वस्तुओं को बर्वाद नहीं करता और उसमे समझ है कि उनका उपयोग किस तरह से किया जा सकता है।
🔷 दोस्तों, आज जब प्राकृतिक संसाधन दिन – प्रतिदिन कम होते जा रहे हैं ऐसे में हमें भी कोशिश करनी चाहिए कि चीजों को बर्वाद ना करें और अपने छोटे छोटे प्रयत्नों से इस धरा को सुरक्षित बना कर रखें।
🔶 अनुयायी: मेरे वस्त्र पुराने हो चुके हैं. अब ये पहनने के लायक नहीं रहे. कृपया मुझे नए वस्त्र देने का कष्ट करें!
🔷 बुद्ध ने अनुयायी के वस्त्र देखे, वे सचमुच बिलकुल जीर्ण हो चुके थे और जगह जगह से घिस चुके थे… इसलिए उन्होंने एक अन्य अनुयायी को नए वस्त्र देने का आदेश दे दिए. कुछ दिनों बाद बुद्ध अनुयायी के घर पहुंचे.
🔶 बुद्ध: क्या तुम अपने नए वस्त्रों में आराम से हो? तुम्हे और कुछ तो नहीं चाहिए?
🔷 अनुयायी: धन्यवाद प्रभु मैं इन वस्त्रों में बिलकुल आराम से हूँ और मुझे और कुछ नहीं चाहिए।
🔶 बुद्ध: अब जबकि तुम्हारे पास नए वस्त्र हैं तो तुमने पुराने वस्त्रों का क्या किया?
🔷 अनुयायी: मैं अब उसे ओढने के लिए प्रयोग कर रहा हूँ?
🔶 बुद्ध: तो तुमने अपनी पुरानी ओढ़नी का क्या किया?
🔷 अनुयायी: जी मैंने उसे खिड़की पर परदे की जगह लगा दिया है।
🔶 बुद्ध: तो क्या तुमने पुराने परदे फ़ेंक दिए?
🔷 अनुयायी: जी नहीं, मैंने उसके चार टुकड़े किये और उनका प्रयोग रसोई में गरम पतीलों को आग से उतारने के लिए कर रहा हूँ।
🔶 बुद्ध: तो फिर रसॊइ के पुराने कपड़ों का क्या किया?
🔷 अनुयायी: अब मैं उन्हें पोछा लगाने के लिए प्रयोग करूँगा।
🔶 बुद्ध: तो तुम्हारा पुराना पोछा क्या हुआ?
🔷 अनुयायी: प्रभु वो अब इतना तार -तार हो चुका था कि उसका कुछ नहीं किया जा सकता था, इसलिए मैंने उसका एक -एक धागा अलग कर दिए की बातियाँ तैयार कर लीं…. उन्ही में से एक कल रात आपके कक्ष में प्रकाशित था।
🔶 बुद्ध अनुयायी से संतुष्ट हो गए वो प्रसन्न थे कि उनका शिष्य वस्तुओं को बर्वाद नहीं करता और उसमे समझ है कि उनका उपयोग किस तरह से किया जा सकता है।
🔷 दोस्तों, आज जब प्राकृतिक संसाधन दिन – प्रतिदिन कम होते जा रहे हैं ऐसे में हमें भी कोशिश करनी चाहिए कि चीजों को बर्वाद ना करें और अपने छोटे छोटे प्रयत्नों से इस धरा को सुरक्षित बना कर रखें।
👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 8)
👉 विशिष्टता का नए सिरे से उभार
🔷 दूध में मक्खन घुला होता है, पर उसे अलग निकालने के लिए उबालने, मथने जैसे कई कार्य संपन्न करने पड़ते हैं। प्राणवान प्रतिभाओं की इन दिनों अतिशय आवश्यकता पड़ रही है, ताकि इस समुद्र मंथन जैसे युगसंधि पर्व में अपनी महती भूमिका निभा सकें। अनिष्ट के अनर्थ से मानवीय गरिमा को विनष्ट होने से बचा सके। उज्ज्वल भविष्य की संरचना में ऐसा प्रचंड पुरुषार्थ प्रदर्शित कर सकें, जैसे-गंगा अवतरण के संदर्भ में मनस्वी भगीरथ द्वारा संपन्न किया गया था।
🔶 इन दिनों यह ढूँढ़-खोज ही बड़ा काम है। सीता को वापस लाने के लिए वानर समुदाय विशेष खोज में निकला था। समुद्र-मंथन भी ऐसी खोज का एक इतिहास है। गहरे समुद्र में उतरकर मणि-मुक्तक खोजे जाते हैं। कोयले की खदानों में से खोजने वाले हीरे ढूँढ़ निकालते हैं, धातुओं की खदान इसी प्रकार धरती को खोद-खोदकर ढूँढी जाती है। दिव्य औषधियों को सघन वन प्रदेशों में खोजना पड़ता है। वैज्ञानिक प्रकृति के रहस्यों को खोज लेने का काम करते हैं। हाड़-माँस की काया में से देवत्व का उदय, साधना द्वारा गहरी खोज करते हुए ही संभव किया जाता है।
🔷 महाप्राणों की इन दिनों इसी कारण भारी खोज हो रही है कि उनके बिना, युगसंधि का महाप्रयोजन पूरा भी तो नहीं हो सकेगा। आज तो व्यक्ति की सामयिक एवं क्षेत्रीय समस्याओं का निराकरण भी वातावरण बदले बिना संभव नहीं हो सकता। संसार में निकटता बढ़ जाने से, गुत्थियाँ भी वैयक्तिक न रहकर सामूहिक हो गई हैं। उनका निराकरण व्यक्ति को कुछ ले-देकर नहीं हो सकता। चेचक की फुंसियों पर पट्टी कहाँ बाँधते हैं? स्थायी उपचार तो रक्त-शोधन की प्रक्रिया से ही बन पड़ता है।
🔶 प्रस्तुत चिंतन और प्रचलन में इतनी अधिक विकृतियों का समावेश हो गया है कि उन्हें औचित्य एवं विवेक से सर्वथा प्रतिकूल माना जा सकता है। अस्वस्थता, उद्विग्नता, आक्रामकता, निष्ठुरता, स्वार्थांधता, संकीर्णता, उद्दण्डता का बड़ों और छोटों में अपने-अपने ढंग का बाहुल्य है। लगता है मानवीय मर्यादाओं और वर्जनाओं की प्रतिबद्धता से इनकार कर दिया गया है। फलतः व्यक्ति को अनेकानेक संकटों और समाज को चित्र-विचित्र समस्याओं का सामना करना पड़ता है। न कोई सुखी दिखता है, न संतुष्ट। अभाव और जन बाहुल्य नयी-नयी विपत्तियाँ खड़ी कर रहे हैं। हर कोई आतंक और आशंका से विक्षुब्ध जैसा दिखता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 10
🔷 दूध में मक्खन घुला होता है, पर उसे अलग निकालने के लिए उबालने, मथने जैसे कई कार्य संपन्न करने पड़ते हैं। प्राणवान प्रतिभाओं की इन दिनों अतिशय आवश्यकता पड़ रही है, ताकि इस समुद्र मंथन जैसे युगसंधि पर्व में अपनी महती भूमिका निभा सकें। अनिष्ट के अनर्थ से मानवीय गरिमा को विनष्ट होने से बचा सके। उज्ज्वल भविष्य की संरचना में ऐसा प्रचंड पुरुषार्थ प्रदर्शित कर सकें, जैसे-गंगा अवतरण के संदर्भ में मनस्वी भगीरथ द्वारा संपन्न किया गया था।
🔶 इन दिनों यह ढूँढ़-खोज ही बड़ा काम है। सीता को वापस लाने के लिए वानर समुदाय विशेष खोज में निकला था। समुद्र-मंथन भी ऐसी खोज का एक इतिहास है। गहरे समुद्र में उतरकर मणि-मुक्तक खोजे जाते हैं। कोयले की खदानों में से खोजने वाले हीरे ढूँढ़ निकालते हैं, धातुओं की खदान इसी प्रकार धरती को खोद-खोदकर ढूँढी जाती है। दिव्य औषधियों को सघन वन प्रदेशों में खोजना पड़ता है। वैज्ञानिक प्रकृति के रहस्यों को खोज लेने का काम करते हैं। हाड़-माँस की काया में से देवत्व का उदय, साधना द्वारा गहरी खोज करते हुए ही संभव किया जाता है।
🔷 महाप्राणों की इन दिनों इसी कारण भारी खोज हो रही है कि उनके बिना, युगसंधि का महाप्रयोजन पूरा भी तो नहीं हो सकेगा। आज तो व्यक्ति की सामयिक एवं क्षेत्रीय समस्याओं का निराकरण भी वातावरण बदले बिना संभव नहीं हो सकता। संसार में निकटता बढ़ जाने से, गुत्थियाँ भी वैयक्तिक न रहकर सामूहिक हो गई हैं। उनका निराकरण व्यक्ति को कुछ ले-देकर नहीं हो सकता। चेचक की फुंसियों पर पट्टी कहाँ बाँधते हैं? स्थायी उपचार तो रक्त-शोधन की प्रक्रिया से ही बन पड़ता है।
🔶 प्रस्तुत चिंतन और प्रचलन में इतनी अधिक विकृतियों का समावेश हो गया है कि उन्हें औचित्य एवं विवेक से सर्वथा प्रतिकूल माना जा सकता है। अस्वस्थता, उद्विग्नता, आक्रामकता, निष्ठुरता, स्वार्थांधता, संकीर्णता, उद्दण्डता का बड़ों और छोटों में अपने-अपने ढंग का बाहुल्य है। लगता है मानवीय मर्यादाओं और वर्जनाओं की प्रतिबद्धता से इनकार कर दिया गया है। फलतः व्यक्ति को अनेकानेक संकटों और समाज को चित्र-विचित्र समस्याओं का सामना करना पड़ता है। न कोई सुखी दिखता है, न संतुष्ट। अभाव और जन बाहुल्य नयी-नयी विपत्तियाँ खड़ी कर रहे हैं। हर कोई आतंक और आशंका से विक्षुब्ध जैसा दिखता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 10
👉 मनुष्य को मनुष्य बनाने वाला धर्म
🔷 “मेरे देशवासियों! विषम परिस्थितियों का अन्त आ गया। काफी रो चुके, अब रोने की आवश्यकता नहीं रही। अब हमें अपनी आत्म शक्ति को जगाने का अवसर आया है। उठो, अपने पैरों पर खड़े हो और मनुष्य बनो। हम मनुष्य बनाने वाला ही धर्म चाहते हैं। सुख, सफलता ही क्या सत्य भी यदि शरीर, बुद्धि और आत्मा को कमजोर बनाये तो उसे विष की भाँति त्याग देने की दृढ़ता आप में होनी चाहिए।”
🔶 “जीवन-शक्ति विहीन धर्म कभी धर्म नहीं हो सकता। उसका तो स्वरूप ही बड़ा पवित्र, बलप्रद, ज्ञानयुक्त है। जो शक्ति दे, ज्ञान दे हृदय के अन्धकार को दूर कर नव स्फूर्ति भर दे। आओ, हम उस सत्य की, धर्म की वन्दना करें। कामना करें और जन जीवन में प्रवाहित होने दें। तोता बोल बहुत सकता है। पर वह आबद्ध कुछ कर नहीं सकता। हम रागद्वेष, काम, क्रोध, मद, मत्सर, अज्ञान, कुत्सा, कुविचार, दुष्कर्म के पिंजरे में आबद्ध न हों। अच्छी बात मुँह से कहें और उसे जीवन में उतारें भी। हमारे मस्तिष्कों में जो दुर्बलता भर गई है उसे निकाल कर शक्तिशाली बनने के लिए कटिबद्ध हो जाना चाहिये।
✍🏻 ~स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड ज्योति 1967 सितम्बर पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/September/v1.2
🔶 “जीवन-शक्ति विहीन धर्म कभी धर्म नहीं हो सकता। उसका तो स्वरूप ही बड़ा पवित्र, बलप्रद, ज्ञानयुक्त है। जो शक्ति दे, ज्ञान दे हृदय के अन्धकार को दूर कर नव स्फूर्ति भर दे। आओ, हम उस सत्य की, धर्म की वन्दना करें। कामना करें और जन जीवन में प्रवाहित होने दें। तोता बोल बहुत सकता है। पर वह आबद्ध कुछ कर नहीं सकता। हम रागद्वेष, काम, क्रोध, मद, मत्सर, अज्ञान, कुत्सा, कुविचार, दुष्कर्म के पिंजरे में आबद्ध न हों। अच्छी बात मुँह से कहें और उसे जीवन में उतारें भी। हमारे मस्तिष्कों में जो दुर्बलता भर गई है उसे निकाल कर शक्तिशाली बनने के लिए कटिबद्ध हो जाना चाहिये।
✍🏻 ~स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड ज्योति 1967 सितम्बर पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/September/v1.2
👉 भगवान भगवान की कृपा या अकृपा
🔷 एक व्यक्ति नित्य हनुमान जी की मूर्ति के आगे दिया जलाने जाया करता था। एक दिन मैंने उससे इसका कारण पूछा तो उसने कहा-”मैंने हनुमान जी की मनौती मानी थी कि यदि मुकदमा जीत जाऊँ तो रोज उनके आगे दिया जलाया करूंगा। मैं जीत गया और तभी से यह दिया जलाने का कम चल रहा है।
🔶 मेरे पूछने पर मुकदमे का विवरण बताते हुए उसने कहा- एक गरीब आदमी की जमीन मैंने दबा रखी थी, उसने अपनी जमीन वापिस छुड़ाने के लिए अदालत में अर्जी दी, पर वह कानून जानता न था और मुकदमें का खर्च भी न जुटा पाया। मैंने अच्छे वकील किए खर्च किया और हनुमान जी मनौती मनाई। जीत मेरी हुई। हनुमान जी की इस कृपा के लिए मुझे दीपक जलाना ही चाहिए था, सो जलाता भी हूँ।
🔷 मैंने उससे कहा-भोले आदमी, यह तो हनुमान जी की कृपा नहीं अकृपा हुई। अनुचित कार्यों में सफलता मिलने से तो मनुष्य पाप और पतन के मार्ग पर अधिक तेजी से बढ़ता है, क्या तुझे इतना भी मालूम नहीं। मैंने उस व्यक्ति को एक घटना सुनाई-’एक व्यक्ति वेश्यागमन के लिए गया। सीढ़ी पर चढ़ते समय उसका पैर फिसला और हाथ की हड्डी टूट गई। अस्पताल में से उसने सन्देश भेजा कि मेरी हड्डी टूटी यह भगवान की बड़ी कृपा है। वेश्यागमन के पाप से बच गया।
🔶 मनुष्य सोचता है कि जो कुछ वह चाहे उसकी पूर्ति हो जाना ही भगवान ही कृपा है। यह भूल है। यदि उचित और न्याययुक्त सफलता मिले तो ही उसे भगवान की कृपा कहना चाहिए। पाप की सफलता तो प्रत्यक्ष अकृपा है। जिससे अपना पतन और नाश समीप आता है उसे अकृपा नहीं तो और क्या कहें?
✍🏻 बिनोवा
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1964 पृष्ठ 3
🔶 मेरे पूछने पर मुकदमे का विवरण बताते हुए उसने कहा- एक गरीब आदमी की जमीन मैंने दबा रखी थी, उसने अपनी जमीन वापिस छुड़ाने के लिए अदालत में अर्जी दी, पर वह कानून जानता न था और मुकदमें का खर्च भी न जुटा पाया। मैंने अच्छे वकील किए खर्च किया और हनुमान जी मनौती मनाई। जीत मेरी हुई। हनुमान जी की इस कृपा के लिए मुझे दीपक जलाना ही चाहिए था, सो जलाता भी हूँ।
🔷 मैंने उससे कहा-भोले आदमी, यह तो हनुमान जी की कृपा नहीं अकृपा हुई। अनुचित कार्यों में सफलता मिलने से तो मनुष्य पाप और पतन के मार्ग पर अधिक तेजी से बढ़ता है, क्या तुझे इतना भी मालूम नहीं। मैंने उस व्यक्ति को एक घटना सुनाई-’एक व्यक्ति वेश्यागमन के लिए गया। सीढ़ी पर चढ़ते समय उसका पैर फिसला और हाथ की हड्डी टूट गई। अस्पताल में से उसने सन्देश भेजा कि मेरी हड्डी टूटी यह भगवान की बड़ी कृपा है। वेश्यागमन के पाप से बच गया।
🔶 मनुष्य सोचता है कि जो कुछ वह चाहे उसकी पूर्ति हो जाना ही भगवान ही कृपा है। यह भूल है। यदि उचित और न्याययुक्त सफलता मिले तो ही उसे भगवान की कृपा कहना चाहिए। पाप की सफलता तो प्रत्यक्ष अकृपा है। जिससे अपना पतन और नाश समीप आता है उसे अकृपा नहीं तो और क्या कहें?
✍🏻 बिनोवा
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1964 पृष्ठ 3
शुक्रवार, 20 जुलाई 2018
👉 नियत मार्ग की मर्यादा
🔶 आकाश में ग्रह और नक्षत्र तूफानी चाल से अपनपी राह चलते हैं। एक सेकेण्ड में हजारों मील की यात्रा पार करते हैं पर चलते अपने नियत मार्ग पर ही हैं। यदि कोई तारा जरा सा भी भटक जाय तो वह दूसरे तारों से टकराकर सृष्टि में भारी उथल पुथल पैदा कर सकता है। हर एक तारा अपने निर्धारित मार्ग पर पूर्ण नियम बद्ध होकर चलता है तभी यह दुनियाँ अपनी जगह पर ठहरी हुई है। यदि मर्यादाओं का पालन छोड़ दिया जाय तो समाज की सारी शृंखला बिखर जाएगी और साथ ही मनुष्य जाति सुख शान्ति से भी वंचित हो जाएगी।
🔷 यदि मनुष्य अपनी बुद्धि की थोड़ी अधिक खींच तान करे तो वह बुरी और गलत से गलत बातों को उचित ठहराने के लिए तर्क और प्रमाण ढूँढ़ सकता है। विश्वासों और भावनाओं को पुष्टि करना बुद्धि का काम है। मस्तिष्क को हृदय का वकील कहा जा सकता है। भीतर से जो आकांक्षा और अभिरुचि उठती है उसी को पुष्ट करने और मार्ग ढूँढ़ने में मस्तिष्क लगे जाता है। चोर के लिए वह चोरी की कला में प्रवीणता प्राप्त करने और उसके लिए अवसर ढूँढ़ देने का काम करता है और साधु के लिए पुण्य परमार्थ के अवसर तथा साधन जुटाने में सफल प्रयत्न करता है।
🔶 इसलिए बुद्धि के चमत्कार से प्रभावित होने की जरूरत नहीं है और न बुद्धि को बहुत मान देने की आवश्यकता है। वह तो एक वेश्या के समान है जो प्रलोभन की ओर फिसलती रहती है। प्रभावित होने योग्य तो केवल एक ही वस्तु हैं, उदारता मिश्रित सचाई। भले ही कोई मूर्ख गिना जाय पर जिसमें उदारता और सच्चाई है वह हजार बुद्धिमानों से अच्छा है।
📖 अखण्ड ज्योति से
🔷 यदि मनुष्य अपनी बुद्धि की थोड़ी अधिक खींच तान करे तो वह बुरी और गलत से गलत बातों को उचित ठहराने के लिए तर्क और प्रमाण ढूँढ़ सकता है। विश्वासों और भावनाओं को पुष्टि करना बुद्धि का काम है। मस्तिष्क को हृदय का वकील कहा जा सकता है। भीतर से जो आकांक्षा और अभिरुचि उठती है उसी को पुष्ट करने और मार्ग ढूँढ़ने में मस्तिष्क लगे जाता है। चोर के लिए वह चोरी की कला में प्रवीणता प्राप्त करने और उसके लिए अवसर ढूँढ़ देने का काम करता है और साधु के लिए पुण्य परमार्थ के अवसर तथा साधन जुटाने में सफल प्रयत्न करता है।
🔶 इसलिए बुद्धि के चमत्कार से प्रभावित होने की जरूरत नहीं है और न बुद्धि को बहुत मान देने की आवश्यकता है। वह तो एक वेश्या के समान है जो प्रलोभन की ओर फिसलती रहती है। प्रभावित होने योग्य तो केवल एक ही वस्तु हैं, उदारता मिश्रित सचाई। भले ही कोई मूर्ख गिना जाय पर जिसमें उदारता और सच्चाई है वह हजार बुद्धिमानों से अच्छा है।
📖 अखण्ड ज्योति से
👉 भिखारी का आत्मसम्मान
🔶 एक भिखारी किसी स्टेशन पर पेसिलो से भरा कटोरा लेकर बैठा हुआ था। एक युवा व्यवसायी उधर से गुजरा और उसने कटोरे मे 50 रूपये डाल दिया, लेकिन उसने कोई पेँसिल नही ली। उसके बाद वह ट्रेन मे बैठ गया। डिब्बे का दरवाजा बंद होने ही वाला था कि अधिकारी एकाएक ट्रेन से उतर कर भिखारी के पास लौटा और कुछ पेसिल उठा कर बोला, “मै कुछ पेसिल लूँगा। इन पेँसिलो की कीमत है, आखिरकार तुम एक व्यापारी हो और मै भी।” उसके बाद वह युवा तेजी से ट्रेन मे चढ़ गया।
🔷 कुछ वर्षों बाद, वह व्यवसायी एक पार्टी मे गया। वह भिखारी भी वहाँ मौजूद था। भिखारी ने उस व्यवसायी को देखते ही पहचान लिया, वह उसके पास जाकर बोला-” आप शायद मुझे नही पहचान रहे है, लेकिन मै आपको पहचानता हूँ।”
🔶 उसके बाद उसने उसके साथ घटी उस घटना का जिक्र किया। व्यवसायी ने कहा-” तुम्हारे याद दिलाने पर मुझे याद आ रहा है कि तुम भीख मांग रहे थे। लेकिन तुम यहाँ सूट और टाई मे क्या कर रहे हो?”
🔷 भिखारी ने जवाब दिया, ” आपको शायद मालूम नही है कि आपने मेरे लिए उस दिन क्या किया। मुझे पर दया करने की बजाय मेरे साथ सम्मान के साथ पेश आये। आपने कटोरे से पेसिल उठाकर कहा, ‘इनकी कीमत है, आखिरकार तुम भी एक व्यापारी हो और मै भी।’
🔶 आपके जाने के बाद मैँने बहूत सोचा, मै यहाँ क्या कर रहा हूँ? मै भीख क्योँ माँग रहा हूँ? मैने अपनी जिदगी को सँवारने के लिये कुछ अच्छा काम करने का फैसला लिया। मैने अपना थैला उठाया और घूम-घूम कर पेंसिल बेचने लगा । फिर धीरे -धीरे मेरा व्यापार बढ़ता गया, मैं कॉपी – किताब एवं अन्य चीजें भी बेचने लगा और आज पूरे शहर में मैं इन चीजों का सबसे बड़ा थोक विक्रेता हूँ।
🔷 मुझे मेरा सम्मान लौटाने के लिये मै आपका तहेदिल से धन्यवाद देता हूँ क्योकि उस घटना ने आज मेरा जीवन ही बदल दिया ।”
🔶 मित्रो, आप अपने बारे मे क्या सोचते है? खुद के लिये आप क्या राय स्वयँ पर जाहिर करते है? क्या आप अपने आपको ठीक तरह से समझ पाते है? इन सारी चीजो को ही हम अप्रत्यक्ष रूप से आत्मसम्मान कहते है। दुसरे लोग हमारे बारे मे क्या सोचते है ये बाते उतनी मायने नहीँ रखती या कहे तो कुछ भी मायने नही रखती लेकिन आप अपने बारे मे क्या राय जाहिर करते है, क्या सोचते है ये बात बहूत ही ज्यादा मायने रखती है। लेकिन एक बात तय है कि हम अपने बारे मे जो भी सोचते हैँ, उसका एहसास जाने अनजाने मे दुसरो को भी करा ही देते है और इसमे कोई भी शक नही कि इसी कारण की वजह से दूसरे लोग भी हमारे साथ उसी ढंग से पेश आते है।
🔷 याद रखे कि आत्म-सम्मान की वजह से ही हमारे अंदर प्रेरणा पैदा होती है या कहे तो हम आत्मप्रेरित होते है। इसलिए आवश्यक है कि हम अपने बारे मे एक श्रेष्ठ राय बनाएं और आत्मसम्मान से पूर्ण जीवन जीएं।
🔷 कुछ वर्षों बाद, वह व्यवसायी एक पार्टी मे गया। वह भिखारी भी वहाँ मौजूद था। भिखारी ने उस व्यवसायी को देखते ही पहचान लिया, वह उसके पास जाकर बोला-” आप शायद मुझे नही पहचान रहे है, लेकिन मै आपको पहचानता हूँ।”
🔶 उसके बाद उसने उसके साथ घटी उस घटना का जिक्र किया। व्यवसायी ने कहा-” तुम्हारे याद दिलाने पर मुझे याद आ रहा है कि तुम भीख मांग रहे थे। लेकिन तुम यहाँ सूट और टाई मे क्या कर रहे हो?”
🔷 भिखारी ने जवाब दिया, ” आपको शायद मालूम नही है कि आपने मेरे लिए उस दिन क्या किया। मुझे पर दया करने की बजाय मेरे साथ सम्मान के साथ पेश आये। आपने कटोरे से पेसिल उठाकर कहा, ‘इनकी कीमत है, आखिरकार तुम भी एक व्यापारी हो और मै भी।’
🔶 आपके जाने के बाद मैँने बहूत सोचा, मै यहाँ क्या कर रहा हूँ? मै भीख क्योँ माँग रहा हूँ? मैने अपनी जिदगी को सँवारने के लिये कुछ अच्छा काम करने का फैसला लिया। मैने अपना थैला उठाया और घूम-घूम कर पेंसिल बेचने लगा । फिर धीरे -धीरे मेरा व्यापार बढ़ता गया, मैं कॉपी – किताब एवं अन्य चीजें भी बेचने लगा और आज पूरे शहर में मैं इन चीजों का सबसे बड़ा थोक विक्रेता हूँ।
🔷 मुझे मेरा सम्मान लौटाने के लिये मै आपका तहेदिल से धन्यवाद देता हूँ क्योकि उस घटना ने आज मेरा जीवन ही बदल दिया ।”
🔶 मित्रो, आप अपने बारे मे क्या सोचते है? खुद के लिये आप क्या राय स्वयँ पर जाहिर करते है? क्या आप अपने आपको ठीक तरह से समझ पाते है? इन सारी चीजो को ही हम अप्रत्यक्ष रूप से आत्मसम्मान कहते है। दुसरे लोग हमारे बारे मे क्या सोचते है ये बाते उतनी मायने नहीँ रखती या कहे तो कुछ भी मायने नही रखती लेकिन आप अपने बारे मे क्या राय जाहिर करते है, क्या सोचते है ये बात बहूत ही ज्यादा मायने रखती है। लेकिन एक बात तय है कि हम अपने बारे मे जो भी सोचते हैँ, उसका एहसास जाने अनजाने मे दुसरो को भी करा ही देते है और इसमे कोई भी शक नही कि इसी कारण की वजह से दूसरे लोग भी हमारे साथ उसी ढंग से पेश आते है।
🔷 याद रखे कि आत्म-सम्मान की वजह से ही हमारे अंदर प्रेरणा पैदा होती है या कहे तो हम आत्मप्रेरित होते है। इसलिए आवश्यक है कि हम अपने बारे मे एक श्रेष्ठ राय बनाएं और आत्मसम्मान से पूर्ण जीवन जीएं।
👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 7)
👉 प्राणवान् प्रतिभाओं की खोज
🔶 चाणक्य ने चंद्रगुप्त की प्रतिभा को पहचान, उसे अपनी सामर्थ्य का बोध कराया व कुछ पुरुषार्थ कर दिखाने को आगे धकेला तो असमंजस में उलझा नगण्य-सा वह व्यक्ति असामान्य कार्य कर दिखा पाने में समर्थ हुआ। प्राणनाथ महाप्रभु ने वीर छत्रसाल जैसी प्रतिभा को पहचाना व उसे वह शक्ति दी जिसने उसे उत्तर भारत में आक्रांताओं से भारतीय संस्कृति की रक्षा करने का साहस प्रदान किया। विवेकानंद जैसी प्रतिभा नरेंद्र नाम के युवक में छिपी है, यह रामकृष्ण ही जान पाए एवं अपनी शक्ति का अंश देकर वे विश्व को एक महामानव दे गए। समय-समय पर परोक्ष चेतना, समस्याओं के निवारण हेतु प्रतिभाओं को ही खोजती रही है।
🔷 इन दिनों व्यक्तिगत समस्याओं का शिकंजा भी कम कसा हुआ नहीं है। आर्थिक, सामाजिक, मानसिक क्षेत्रों में छाई हुई विभीषिकाएँ, सर्वसाधारण को चैन से जी सकने का अवसर नहीं दे रही हैं। इससे भी बढ़कर सार्वजनिक समस्यायें है। संसार के सामने कितनी ही चुनौतियाँ है, बढ़ती हुई गरीबी, बेकारी, बीमारी, प्रदूषण, जनसंख्या वृद्धि, परमाणु विकिरण, युद्धोन्माद का बढ़ता दबाव, अंतरिक्ष क्षेत्र में धूमकेतु की तरह अपनी विकरालता का परिचय दे रहा है। हिमप्रलय, जलप्रलय, दुर्भिक्ष भूकंपों आदि के माध्यम से प्रकृति अपने प्रकोप का परिचय दे रही है। मनुष्य की बौद्धिक भ्रष्टता और व्यवहारिक दुष्टता से, वह भी तो कम अप्रसन्न नहीं है। भविष्यवक्ता इन दिनों की विनाश विभीषिका की संभावना की जानकारी, अनेक स्तरों पर देते रहे हैं। दीखता है कि वह महाविनाश कहीं अगले दिनों घटित ही तो होने नहीं जा रहा है?
🔶 पक्ष दूसरा भी है-इक्कीसवीं सदी की ऐसी सुखद संभावना, जिसे सतयुग की वापसी कहा जा सके। इन दोनों ही प्रयोजनों में आवश्यक मानवीय भूमिका का समावेश होना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। इस कार्य को मूर्द्धन्य प्रतिभाएँ ही संपन्न कर सकेंगी। ईश्वर, धर्म का संरक्षण और अधर्म के विनाश का काम तो करता है, पर अदृश्य प्रेरणा का परिवहन तो शरीरधारी महामानव ही करते हैं। आज उन्हीं की खोज है। उन्हीं को आकुल-व्याकुल होकर ढूँढ़ा जा रहा है। दीन-हीन और पेट-प्रजनन में निरत तो असंख्य प्रजाजन सर्वत्र बिखरे पड़े हैं। पर वे तो अपने भार से ही दबे हैं, अपनी ही लाश ढो रहे हैं। युग परिवर्तन जैसे सृजन और ध्वंस के महान प्रयोजन की पूर्ति के लिए प्राणवानों की आवश्यकता है। गोताखोर उन्हीं को इस खारे समुद्र में से मणिमुक्तकों की तरह ढूँढ़ निकालने में लगे हुए हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 8
🔶 चाणक्य ने चंद्रगुप्त की प्रतिभा को पहचान, उसे अपनी सामर्थ्य का बोध कराया व कुछ पुरुषार्थ कर दिखाने को आगे धकेला तो असमंजस में उलझा नगण्य-सा वह व्यक्ति असामान्य कार्य कर दिखा पाने में समर्थ हुआ। प्राणनाथ महाप्रभु ने वीर छत्रसाल जैसी प्रतिभा को पहचाना व उसे वह शक्ति दी जिसने उसे उत्तर भारत में आक्रांताओं से भारतीय संस्कृति की रक्षा करने का साहस प्रदान किया। विवेकानंद जैसी प्रतिभा नरेंद्र नाम के युवक में छिपी है, यह रामकृष्ण ही जान पाए एवं अपनी शक्ति का अंश देकर वे विश्व को एक महामानव दे गए। समय-समय पर परोक्ष चेतना, समस्याओं के निवारण हेतु प्रतिभाओं को ही खोजती रही है।
🔷 इन दिनों व्यक्तिगत समस्याओं का शिकंजा भी कम कसा हुआ नहीं है। आर्थिक, सामाजिक, मानसिक क्षेत्रों में छाई हुई विभीषिकाएँ, सर्वसाधारण को चैन से जी सकने का अवसर नहीं दे रही हैं। इससे भी बढ़कर सार्वजनिक समस्यायें है। संसार के सामने कितनी ही चुनौतियाँ है, बढ़ती हुई गरीबी, बेकारी, बीमारी, प्रदूषण, जनसंख्या वृद्धि, परमाणु विकिरण, युद्धोन्माद का बढ़ता दबाव, अंतरिक्ष क्षेत्र में धूमकेतु की तरह अपनी विकरालता का परिचय दे रहा है। हिमप्रलय, जलप्रलय, दुर्भिक्ष भूकंपों आदि के माध्यम से प्रकृति अपने प्रकोप का परिचय दे रही है। मनुष्य की बौद्धिक भ्रष्टता और व्यवहारिक दुष्टता से, वह भी तो कम अप्रसन्न नहीं है। भविष्यवक्ता इन दिनों की विनाश विभीषिका की संभावना की जानकारी, अनेक स्तरों पर देते रहे हैं। दीखता है कि वह महाविनाश कहीं अगले दिनों घटित ही तो होने नहीं जा रहा है?
🔶 पक्ष दूसरा भी है-इक्कीसवीं सदी की ऐसी सुखद संभावना, जिसे सतयुग की वापसी कहा जा सके। इन दोनों ही प्रयोजनों में आवश्यक मानवीय भूमिका का समावेश होना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। इस कार्य को मूर्द्धन्य प्रतिभाएँ ही संपन्न कर सकेंगी। ईश्वर, धर्म का संरक्षण और अधर्म के विनाश का काम तो करता है, पर अदृश्य प्रेरणा का परिवहन तो शरीरधारी महामानव ही करते हैं। आज उन्हीं की खोज है। उन्हीं को आकुल-व्याकुल होकर ढूँढ़ा जा रहा है। दीन-हीन और पेट-प्रजनन में निरत तो असंख्य प्रजाजन सर्वत्र बिखरे पड़े हैं। पर वे तो अपने भार से ही दबे हैं, अपनी ही लाश ढो रहे हैं। युग परिवर्तन जैसे सृजन और ध्वंस के महान प्रयोजन की पूर्ति के लिए प्राणवानों की आवश्यकता है। गोताखोर उन्हीं को इस खारे समुद्र में से मणिमुक्तकों की तरह ढूँढ़ निकालने में लगे हुए हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 8
👉 दूषित अहंभाव
🔶 जो अहंभाव जीवात्मा को संसार में फँसाता है, कंचन और कामिनी में लुब्ध कर देता है, वह अहंभाव वास्तव में दूषित है। यही अहंभाव जीव और आत्मा के बीच बहुत बड़ा भेदभाव उत्पन्न कर देता है। यही अहंभाव हमारे भीतर रह कर बोलता रहता है। पानी के ऊपर लाठी से चोट मारने पर उसके दो भाग होते दिखाई पड़ते हैं पर वास्तव में विचार करने पर जल एक ही होता है, केवल लाठी के कारण पृथक दिखाई देने लगता है हमारा अहंभाव लाठी के समान है।
🔷 उस लाठी को त्याग दो तो जल एक ही है। यह दोषयुक्त अहंभाव का स्वरूप क्या है? ‘मैं’ करके बोलता है पर ‘मैं’ का आशय वह नहीं समझता। मेरे पास इतना धन है, मेरे पास इतने बड़े बड़े आदमी आते हैं अगर किसी ने मेरा अपमान कर दिया या कुछ ले लिया तो उसे मारा पीटा जाता है, उसे हर तरह से तंग किया जाता है, मुकदमा चलाया जाता है, उस समय अहंभाव यही कहता है कि इसने मेरा अपमान क्यों किया?
🔶 कुछ लोग साधन, ज्ञान द्वारा अहंभाव को त्यागने का प्रयत्न करते है, पर अधिकाँश लोगों में वह कुछ न कुछ बचा ही रहता है। चाहे जितना ब्रह्म-विचार करो पर अन्त में यह अहंभाव कभी न कभी सर ऊँचा किए बिना नहीं रहता। पीपल के पेड़ को आज काट डालो, पर दूसरे दिन सबेरे देखोगे तो उसमें दो-चार नये अंकुर उगे दिखाई ही पड़ेंगे। इसलिए सच्चे हृदय से ईश्वर का स्मरण करके उनका आश्रय लेने से ही दूषित अहंभाव से छुटकारा मिल सकता है।
✍🏻 रामकृष्ण परमहंस
📖 अखण्ड ज्योति मई 1963 पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1963/May/v1.3
🔷 उस लाठी को त्याग दो तो जल एक ही है। यह दोषयुक्त अहंभाव का स्वरूप क्या है? ‘मैं’ करके बोलता है पर ‘मैं’ का आशय वह नहीं समझता। मेरे पास इतना धन है, मेरे पास इतने बड़े बड़े आदमी आते हैं अगर किसी ने मेरा अपमान कर दिया या कुछ ले लिया तो उसे मारा पीटा जाता है, उसे हर तरह से तंग किया जाता है, मुकदमा चलाया जाता है, उस समय अहंभाव यही कहता है कि इसने मेरा अपमान क्यों किया?
🔶 कुछ लोग साधन, ज्ञान द्वारा अहंभाव को त्यागने का प्रयत्न करते है, पर अधिकाँश लोगों में वह कुछ न कुछ बचा ही रहता है। चाहे जितना ब्रह्म-विचार करो पर अन्त में यह अहंभाव कभी न कभी सर ऊँचा किए बिना नहीं रहता। पीपल के पेड़ को आज काट डालो, पर दूसरे दिन सबेरे देखोगे तो उसमें दो-चार नये अंकुर उगे दिखाई ही पड़ेंगे। इसलिए सच्चे हृदय से ईश्वर का स्मरण करके उनका आश्रय लेने से ही दूषित अहंभाव से छुटकारा मिल सकता है।
✍🏻 रामकृष्ण परमहंस
📖 अखण्ड ज्योति मई 1963 पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1963/May/v1.3
👉 विचारों का अवतार
🔶
इस वक्त लोगों की इच्छा हो रही है कि भगवान अवतार लें जिसे मैं पुरानी
भाषा में अवतार प्रेरणा कहता हूँ। तुलसीदास ने वर्णन किया है कि पृथ्वी
संत्रस्त होकर गोरूप धारण कर भगवान से प्रार्थना करती है कि हे भगवन् आइये,
हमें बचाइये। भारत को आज मैं उस मनःस्थिति में देख रहा हूँ। जिस मनःस्थिति
में अवतार की आकाँक्षा होती है। यह जरूरी नहीं है कि मनुष्य का अवतार होगा
। विचार का भी अवतार होता है, बल्कि विचार का ही अवतार होता है। लोग समझते
हैं कि रामचन्द्र एक अवतार थे, कृष्ण,बुद्ध, अवतार थे। लेकिन उन्हें हमने
अवतार बनाया है। वे आपके और मेरे जैसे मनुष्य थे ।
🔷 लेकिन उन्होंने एक विचार संचार सृष्टि में किया और वे उस विचार के मूर्ति रूप बन गए, इसलिए लोगों ने उन्हें अवतार माना। हम अपनी प्रार्थना के समय लोगों से सत्य प्रेम, करुणा का चिन्तन करने के लिए कहते हैं। भारत की तरफ ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो जहाँ सत्य शब्द का उच्चारण होता है वहाँ असंख्य लोगों को प्रभु राम का स्मरण होता है। जहाँ प्रेम शब्द का उच्चारण होता है वहाँ करोड़ों को कृष्ण भगवान की याद आती है और जहाँ करुणा शब्द का उच्चारण होता है वहाँ गौतम बुद्ध का स्मरण होता है। राम, कृष्ण और बुद्ध ये ही तीन अवतार हिन्दुस्तान में माने गए हैं लेकिन वे तो निमित्तमात्र हैं। दरअसल भगवान ने सत्य, प्रेम, करुणा के रूप में अवतार लिया था।
🔶 भगवान किसी न किसी गुण या विचार के रूप में अवतार लेता है और उन गुणों या विचार को मूर्त रूप देने में, जिनका अधिक से अधिक परिश्रम लगता है उन्हें जनता अवतार मान लेती है। यह अवतार मीमाँसा है। अवतार व्यक्ति का नहीं विचार का होता है और विचार के वाहन के तोर पर मनुष्य काम करते हैं। किसी युग में सत्य की महिमा प्रकट हुई, किसी में प्रेम की, किसी में करुणा की तो किसी में व्यवस्था की। इस तरह भिन्न भिन्न गुणों की महिमा प्रकट हुई है।
✍🏻 सन्त बिनोवा
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1963 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1963/October/v1
🔷 लेकिन उन्होंने एक विचार संचार सृष्टि में किया और वे उस विचार के मूर्ति रूप बन गए, इसलिए लोगों ने उन्हें अवतार माना। हम अपनी प्रार्थना के समय लोगों से सत्य प्रेम, करुणा का चिन्तन करने के लिए कहते हैं। भारत की तरफ ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो जहाँ सत्य शब्द का उच्चारण होता है वहाँ असंख्य लोगों को प्रभु राम का स्मरण होता है। जहाँ प्रेम शब्द का उच्चारण होता है वहाँ करोड़ों को कृष्ण भगवान की याद आती है और जहाँ करुणा शब्द का उच्चारण होता है वहाँ गौतम बुद्ध का स्मरण होता है। राम, कृष्ण और बुद्ध ये ही तीन अवतार हिन्दुस्तान में माने गए हैं लेकिन वे तो निमित्तमात्र हैं। दरअसल भगवान ने सत्य, प्रेम, करुणा के रूप में अवतार लिया था।
🔶 भगवान किसी न किसी गुण या विचार के रूप में अवतार लेता है और उन गुणों या विचार को मूर्त रूप देने में, जिनका अधिक से अधिक परिश्रम लगता है उन्हें जनता अवतार मान लेती है। यह अवतार मीमाँसा है। अवतार व्यक्ति का नहीं विचार का होता है और विचार के वाहन के तोर पर मनुष्य काम करते हैं। किसी युग में सत्य की महिमा प्रकट हुई, किसी में प्रेम की, किसी में करुणा की तो किसी में व्यवस्था की। इस तरह भिन्न भिन्न गुणों की महिमा प्रकट हुई है।
✍🏻 सन्त बिनोवा
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1963 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1963/October/v1
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026
शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...

















































