गुरुवार, 3 मई 2018
👉 इन तीन का ध्यान रखिए (अन्तिम भाग)
🔷 इन तीनों को स्मरण रखो- आरोग्य, सुमित्र और संतोष वृत्ति। ये तीनों ही आड़े समय काम में आने और रक्षा करने वाले है।
🔶 चाहे अन्य बातों में आप पीछे रहें, किन्तु इन स्वास्थ्य और आरोग्य सम्पादकों को प्राप्त करते रहिये। सच्चा मित्र जीवन का सब से बड़ा हितैषी और सहायता है। संतोषवृत्ति मनः शक्ति को परिपुष्ट करने, आन्तरिक समस्वरता को प्रदान करने वाली परमौषधि है।
🔷 इन तीनों का प्राप्त करो-(1) अच्छी पुस्तक (2) अच्छी सोबत और (3) अच्छी आदतें। अच्छे, उपयोगी, चरित्र का परिष्कार एवं आत्म सुधार करने वाले सद्ग्रन्थ जिस व्यक्ति के पास है, उसे अकेलापन, नीरसता, शुष्कता कभी न प्रतीत होगी। पुस्तकें सदा सर्वदा चौबीसों घंटे का आत्मसुधार करने को प्रस्तुत हैं, आपकी सद्शिक्षाएँ देने को मौजूद रहती हैं। इनके सत्संग से अनेक साधारण व्यक्ति महत्ता प्राप्त कर सकते हैं। सत्साहित्य से समाज के ज्ञान का संवर्द्धन चरित्र का संशोधन होता है। उच्च कोटि के साहित्य से ही घर की शोभा है।
🔶 महात्मा गाँधी जी ने कहा है, “अच्छी पुस्तकों के पास रहने से हमें अपने भले मित्रों के साथ न रहने की कमी नहीं खटकती। जितना ही मैं उत्तम पुस्तकों का अध्ययन करता गया, उतना ही मुझे उनकी विशेषताएं मालूम होती गईं। जिसे पुस्तकें पढ़ने का शौक है, वह सब जगह सुखी रह सकता है।” लोकमान्य तिलक के अनुसार, “मैं नर्क में भी उत्तम पुस्तकों का स्वागत करूंगा, क्योंकि इनमें वह शक्ति है कि वे जहाँ होंगी, वहाँ आप ही स्वर्ग बन जायेगा।” अच्छी पुस्तकें ही अच्छी सोहबत और अच्छी आदतें प्रदान कर सकती हैं।
.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 14
🔶 चाहे अन्य बातों में आप पीछे रहें, किन्तु इन स्वास्थ्य और आरोग्य सम्पादकों को प्राप्त करते रहिये। सच्चा मित्र जीवन का सब से बड़ा हितैषी और सहायता है। संतोषवृत्ति मनः शक्ति को परिपुष्ट करने, आन्तरिक समस्वरता को प्रदान करने वाली परमौषधि है।
🔷 इन तीनों का प्राप्त करो-(1) अच्छी पुस्तक (2) अच्छी सोबत और (3) अच्छी आदतें। अच्छे, उपयोगी, चरित्र का परिष्कार एवं आत्म सुधार करने वाले सद्ग्रन्थ जिस व्यक्ति के पास है, उसे अकेलापन, नीरसता, शुष्कता कभी न प्रतीत होगी। पुस्तकें सदा सर्वदा चौबीसों घंटे का आत्मसुधार करने को प्रस्तुत हैं, आपकी सद्शिक्षाएँ देने को मौजूद रहती हैं। इनके सत्संग से अनेक साधारण व्यक्ति महत्ता प्राप्त कर सकते हैं। सत्साहित्य से समाज के ज्ञान का संवर्द्धन चरित्र का संशोधन होता है। उच्च कोटि के साहित्य से ही घर की शोभा है।
🔶 महात्मा गाँधी जी ने कहा है, “अच्छी पुस्तकों के पास रहने से हमें अपने भले मित्रों के साथ न रहने की कमी नहीं खटकती। जितना ही मैं उत्तम पुस्तकों का अध्ययन करता गया, उतना ही मुझे उनकी विशेषताएं मालूम होती गईं। जिसे पुस्तकें पढ़ने का शौक है, वह सब जगह सुखी रह सकता है।” लोकमान्य तिलक के अनुसार, “मैं नर्क में भी उत्तम पुस्तकों का स्वागत करूंगा, क्योंकि इनमें वह शक्ति है कि वे जहाँ होंगी, वहाँ आप ही स्वर्ग बन जायेगा।” अच्छी पुस्तकें ही अच्छी सोहबत और अच्छी आदतें प्रदान कर सकती हैं।
.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 14
👉 Yajna – The Root of Vedic Culture (Last Part)
🔶 Yajóa is also supposed to be performed during the programme of katha-kirtan (the recital of a story along with devotional songs), religious celebrations and the occasions of special festivals. For example, Holi, which is celebrated these days as a colour festival was originally a festival of yajóa to celebrate the harvesting of new crop every year. A handful of new grains is supposed to be sacrificed in the “holi- yajóa” as a mark of expressing gratitude to God’s grace. The spirit of purifying the grain before using it in food preparation is also associated with this yajóa.
🔷 Yajóa is also performed along with religious functions like Satya Narayan Katha, Bhagvat Katha, Ramayan Parayan, etc. Specific yajóas are also invariably linked with the Vedic as well as the tantrika sadhana anusthanas. Gayatri Sadhana is regarded incomplete without yajóa. The number of ahutis offered in the havans or yajóas organized to mark the end of Gayatri anusthana or mahapurashcharanas should at least equal the tenth or hundredth fraction of the number of japas completed everyday in these sadhanas. Worshiping different manifestations of God is also supposed to be carried out with specific kinds of yajóa, as described in the holy scriptures.
🔶 The prominence of tirthas, the places of pilgrimage, is also associated with yajóa since the Vedic Age. The places where grand yajóas were organized and conducted by the rishis became tirthas and are still revered as holy destinations of pilgrimage in India.
📖 From Akhand Jyoti Jan 2001
🔷 Yajóa is also performed along with religious functions like Satya Narayan Katha, Bhagvat Katha, Ramayan Parayan, etc. Specific yajóas are also invariably linked with the Vedic as well as the tantrika sadhana anusthanas. Gayatri Sadhana is regarded incomplete without yajóa. The number of ahutis offered in the havans or yajóas organized to mark the end of Gayatri anusthana or mahapurashcharanas should at least equal the tenth or hundredth fraction of the number of japas completed everyday in these sadhanas. Worshiping different manifestations of God is also supposed to be carried out with specific kinds of yajóa, as described in the holy scriptures.
🔶 The prominence of tirthas, the places of pilgrimage, is also associated with yajóa since the Vedic Age. The places where grand yajóas were organized and conducted by the rishis became tirthas and are still revered as holy destinations of pilgrimage in India.
📖 From Akhand Jyoti Jan 2001
👉 गुरुगीता (भाग 100)
👉 गुरूकृपा गृहस्थ को भी विदेह बना देती है
🔶 गुरूगीता के इन मंत्रों में मुक्त पुरूष का व्यवहार बताया गया है। यह अतिदुर्लभ अवस्था जिसे जहाँ प्राप्त है, वह व्यक्ति तो कृतार्थ है ही। वह भूमि भी धन्य हो जाती है, जहाँ ऐसे लोग रहा करते हैं। ऐसे व्यक्ति संन्यासी हों या गृहस्थ, श्वेताम्बर हो या काषायाम्बर अथवा फिर दिगम्बर सर्वत्र पूजनीय हैं। इन्हें वेष से नहीं, अवस्था से पहचाना जाता है। ये जनक की भाँति राजा भी हो सकते हैं और महामुनि शुकदेव की भाँति सर्वत्यागी भी। परन्तु इनकी अन्तर्चेतना सदा विराट् में विलीन रहती है। हाँ, उन्हें समझ पाना अति कठिन हो पाता है, केवल ज्ञानी जन ही इन्हें जान पाते हैं।
🔷 पुराण कथा के अनुसार राजा जनक को अपने गुरूदेव अष्टावक्र की कृपा से ज्ञान हुआ था। महर्षि अष्टावक्र की कृपा से ही उन्हें सिद्धि मिली थी। साधना से सिद्धि की यात्रा कर लेने के बावजूद वे गुरू आदेश से अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करते रहे। उनके लिए सभी कुछ समान था। परन्तु मूढ़ जन इस रहस्य को समझ न पाये और उन्हें साधारण गृहस्थ समझने की भूल करते रहे। इन्हीं दिनों ब्रहर्षि विश्वामित्र ने वेदान्त विदों का एक शिविर मिथिला नगरी में लगाया। इस शिविर में देशभर के ऋषि- मुनि, त्यागी वेश एवं कमण्डलुधारी, संन्यासी सभी पधारे। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र, योगी याज्ञवल्क्य, महर्षि अष्टावक्र सरीखें पारदर्शी ज्ञानी वहाँ रोज प्रवचन देते।
🔶 इस प्रवचन कक्षा में राजर्षि जनक भी शामिल होते। परन्तु आडम्बर में घिरे कई वेशधारी संन्यासी उन्हें उपेक्षा की नजर से देखते। यहाँ तक कि उन्हें समझ में ही नहीं आता था कि वे महर्षि जन इस राजा को इतना सम्मान क्यों देते हैं? ब्रह्मर्षि विश्वामित्र से यह सच्चाई छुपी न रही। उन्होनें इन आडम्बर धारियों की समस्या का निराकरण करने के लिए शिविर स्थल में अपने तपोबल से आग लगा दी। आग लगते ही सबकी झोपड़ियाँ जलने लगी। जिस समय आग लगी, उस समय वेदान्त का प्रवचन चल रहा था। आत्मज्ञान की चर्चा के समय आग लगने से सभी संन्यासी घबरा गये। उन्हें अपनी लंगोटी व कमण्डलु की चिन्ता होने लगी। ये सभी प्रवचन को छोड़कर अपना सामान बचाने के लिए भागे। इस सारे खेल में ब्रहर्षि विश्वामित्र हंस रहे थे।
🔷 यह आग बढ़ती गयी। राजा जनक भी वहीं बैठे थे। परन्तु उनके चित्त में स्थिरता थी। वह बिना किसी परेशानी के वेदान्त चर्चा में भाग ले रहे थे। ब्रहर्षि विश्वामित्र ने उन्हें चेताया- महाराज महाराज! आग लगी है। आप तो राजा हैं। आपका राज्य एवं महल जल रहा है। क्या आपको चिंता नहीं हों रही है? महर्षि के प्रश्न पर राजा जनक स्थिर चित्त से बोले- ऋषियों! आप चिंता न करें। सद्गुरू की कृपा से मैंने सत्य जान लिया है- मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दहति किंचन केवल मिथिला नगरी जल रही है, मेरा कुछ नहीं जल रहा है। जनक के इस कथन के साथ ही आग बुझ गयी। महर्षि ने अपना खेल समेट लिया। ज्ञान और आसक्ति का भेद स्पष्ट हो गया। सचमुच सद्गुरू की कृपा से क्या नहीं हो सकता।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 152
🔶 गुरूगीता के इन मंत्रों में मुक्त पुरूष का व्यवहार बताया गया है। यह अतिदुर्लभ अवस्था जिसे जहाँ प्राप्त है, वह व्यक्ति तो कृतार्थ है ही। वह भूमि भी धन्य हो जाती है, जहाँ ऐसे लोग रहा करते हैं। ऐसे व्यक्ति संन्यासी हों या गृहस्थ, श्वेताम्बर हो या काषायाम्बर अथवा फिर दिगम्बर सर्वत्र पूजनीय हैं। इन्हें वेष से नहीं, अवस्था से पहचाना जाता है। ये जनक की भाँति राजा भी हो सकते हैं और महामुनि शुकदेव की भाँति सर्वत्यागी भी। परन्तु इनकी अन्तर्चेतना सदा विराट् में विलीन रहती है। हाँ, उन्हें समझ पाना अति कठिन हो पाता है, केवल ज्ञानी जन ही इन्हें जान पाते हैं।
🔷 पुराण कथा के अनुसार राजा जनक को अपने गुरूदेव अष्टावक्र की कृपा से ज्ञान हुआ था। महर्षि अष्टावक्र की कृपा से ही उन्हें सिद्धि मिली थी। साधना से सिद्धि की यात्रा कर लेने के बावजूद वे गुरू आदेश से अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करते रहे। उनके लिए सभी कुछ समान था। परन्तु मूढ़ जन इस रहस्य को समझ न पाये और उन्हें साधारण गृहस्थ समझने की भूल करते रहे। इन्हीं दिनों ब्रहर्षि विश्वामित्र ने वेदान्त विदों का एक शिविर मिथिला नगरी में लगाया। इस शिविर में देशभर के ऋषि- मुनि, त्यागी वेश एवं कमण्डलुधारी, संन्यासी सभी पधारे। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र, योगी याज्ञवल्क्य, महर्षि अष्टावक्र सरीखें पारदर्शी ज्ञानी वहाँ रोज प्रवचन देते।
🔶 इस प्रवचन कक्षा में राजर्षि जनक भी शामिल होते। परन्तु आडम्बर में घिरे कई वेशधारी संन्यासी उन्हें उपेक्षा की नजर से देखते। यहाँ तक कि उन्हें समझ में ही नहीं आता था कि वे महर्षि जन इस राजा को इतना सम्मान क्यों देते हैं? ब्रह्मर्षि विश्वामित्र से यह सच्चाई छुपी न रही। उन्होनें इन आडम्बर धारियों की समस्या का निराकरण करने के लिए शिविर स्थल में अपने तपोबल से आग लगा दी। आग लगते ही सबकी झोपड़ियाँ जलने लगी। जिस समय आग लगी, उस समय वेदान्त का प्रवचन चल रहा था। आत्मज्ञान की चर्चा के समय आग लगने से सभी संन्यासी घबरा गये। उन्हें अपनी लंगोटी व कमण्डलु की चिन्ता होने लगी। ये सभी प्रवचन को छोड़कर अपना सामान बचाने के लिए भागे। इस सारे खेल में ब्रहर्षि विश्वामित्र हंस रहे थे।
🔷 यह आग बढ़ती गयी। राजा जनक भी वहीं बैठे थे। परन्तु उनके चित्त में स्थिरता थी। वह बिना किसी परेशानी के वेदान्त चर्चा में भाग ले रहे थे। ब्रहर्षि विश्वामित्र ने उन्हें चेताया- महाराज महाराज! आग लगी है। आप तो राजा हैं। आपका राज्य एवं महल जल रहा है। क्या आपको चिंता नहीं हों रही है? महर्षि के प्रश्न पर राजा जनक स्थिर चित्त से बोले- ऋषियों! आप चिंता न करें। सद्गुरू की कृपा से मैंने सत्य जान लिया है- मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दहति किंचन केवल मिथिला नगरी जल रही है, मेरा कुछ नहीं जल रहा है। जनक के इस कथन के साथ ही आग बुझ गयी। महर्षि ने अपना खेल समेट लिया। ज्ञान और आसक्ति का भेद स्पष्ट हो गया। सचमुच सद्गुरू की कृपा से क्या नहीं हो सकता।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 152
बुधवार, 2 मई 2018
👉 कमजोर लड़की
🔶 ऋतु का व्हाट्स एप्प पे कई लड़को से दोस्ती और चैटिंग पढ़कर राज का चेहरा लाल हो गया। गुस्से से आँखों से अंगारे निकलने लगे, मुट्ठियां भींच गई। क्रोध से पूरा शरीर काँपने लगा। दिमाग मे ऐसा लगा जैसे कोई हथौड़ा चला रहा हो। यद्यपि सारी चैटिंग नार्मल थी। अच्छे और मजाकिया चुटकुले और बातें थी जो फ्रेंड्स में होती है। कुछ दोस्तों ने ऋतु की खूबसूरती और उसके डीपी की तारीफ की थी इस बात पे राज और भी जल भुन गया था।
🔷 दोनों की शादी के अभी सात दिन ही हुए थे। "ऋतु!! ऋतु !! "पूरी ताकत और गुस्से से राज चिल्लाया।"क्या हुआ?" ऋतु घबराई सी कमरे में पहुँची तब तक उसके सास ससुर और ननद भी कमरे में आ गए थे।
🔶 राज ने सबके सामने चिल्लाना और अपमान करना शुरू किया। "माँ ये देखो इस लडक़ी के व्हाट्स एप्प पे कई लड़कों से दोस्ती हैं ये सही लड़की नही है?"
🔷 सासु माँ ससुर और ननद भी जलती नेत्रों से ऋतु को देखने लगे। ऋतु को अपनी गलती नही समझ आयी वो हतप्रभ खड़ी थी जो राज रात दिन उसके प्यार का दम्भ भरता था, उसकी खूबसूरती के कसीदे पढ़ता था, उसके लिए आसमान से तारे तोड़ लाने की बातें करता था उसके इस रूप की ऋतु ने कल्पना भी न की थी।
🔶 "राज मैंने भी तुम्हारा व्हाट्स एप्प देखा तुम्हारी भी कई लड़कियों से दोस्ती है। तुम्हारी बहन रानी के भी कई लड़के अच्छे दोस्त होंगें इसमें गलत क्या है?" ऋतु के बोलते ही "चुप! जबान लडाती है" सास की जोरदार आवाज़ गूँजी।
🔷 चटाक!!!! राज का जोरदार तेज थप्पड़ ऋतु के गाल पर पड़ा। गाल पे लाल लाल उँगलियो के निशान पड़ गए। आँखे पनिया गई।
🔶 चटाक!!!!!!! पहले से भी अधिक जोरदार और तेज थप्पड़ की कमरे में आवाज़ हुई। इस बार सबके सामने ऋतु का जोरदार थप्पड़ राज को पड़ा। ऐसा थप्पड़ कि राज को दिन में ही चाँद तारे ग्रह उपग्रह सब दिख गए।
🔷 "मुझे कमजोर लड़की न समझना मैं पढ़ी लिखी और अपने हक़ और अधिकार जानने वाली भारतीय आर्मी के मेजर की बेटी हूँ। किसी भी हाल में चरित्र उज्ज्वल रखना और गलत सहन नहीं करना दो बातें पापा ने सिखाई हैं। इसके बाद किसी ने मुझे किसी भी तरह से परेशान करने की कोशिश की तो फिजिकल, मेन्टल टॉर्चर और डोमेस्टिक वॉइलेन्स का केस डाल दूँगी। सासु माँ आपने बेटे को खूब पढ़ा लिखा कर बड़ा ऑफिसर तो बना दिया काश थोड़ा लड़कियों से बात करने की तमीज और उनकी इज़्ज़त करना भी सिखा देतीं।"
🔶 इसके बाद कुछ दिनों तक घर का माहौल काफी तनावपूर्ण रहने लगा। दीवारों में कान होने के कारण पड़ोसियों में भी इस नई बहू के बिगड़े तेवर की चर्चा होने लगी और पड़ोसियों की खुसर फुसर ने हवन में घी का काम किया। एक दिन पहले की आदर्श बहु अब बहुत बुरी बहु बन गयी थी।
🔷 इस घटना के कुछ दिन बाद राज अपने काम के सिलसिले में दो दिन के लिए दूसरे शहर गया हुआ था। उसके पिता जी भी गाँव के किसी रिश्तेदार की बीमारी की खबर सुनकर गाँव गए हुए थे। घर पर सिर्फ राज की माँ बहन रानी और ऋतु थीं।
🔶 माँ छत पर कपड़ा सूखने डालकर आ रही थीं कि अचानक पैर फिसलने से वह ऊपर की सीढ़ियों से लुढकते लुढकते नीचे आ गिरी। जोर से चिल्लाकर बेहोश हो गयी। सर फट गया और तेजी से खून बहने लगा। पैर फ्रैक्चर होकर थोड़ा मुड़ सा गया। रानी और ऋतु चीख सुनते हो दौड़ पड़े। रानी माँ को ऐसे हाल में देखकर नरवस हो गयी वो जोर जोर से रोने लगी।
🔷 ऋतु ने संयम रखते हुए एकपल भी देर न करते हुए सबसे पहले एक साफ कपड़े से सर पे पट्टी बंधी इससे थोड़ा खून बहना कम हो गया फिर माँ को गोद में उठाकर कार की पिछली सीट पर लिटाया और रानी को बिठाकर सीधे हॉस्पिटल ले गयी।
🔶 हॉस्पिटल में तुरंत इमरजेंसी के सारे कागजात तैयार कर माँ को ICU में भर्ती कराया और तुरंत माँ के लिए अपना ब्लड डोनेट भी की चोटें काफी गंभीर लगीं थी और ऋतु अकेले ही बहु की तरह नहीं बल्कि बेटे की तरह खाना पीना सोना जागना भूलकर सब काम कर रही थी।
🔷 रानी को माँ के पास बिठाकर कभी डॉक्टर से बात करती कभी दवाइया लाती कभी रिपोर्ट पढ़ती। राज और उसके पापा को खबर कर दी गयी थी फिर भी उनलोगों के आने में नौ दस घंटे का समय लग गया था। इन नौ घंटो में ऐसा लग रहा था जैसे ऋतु खुद यमराज से टक्कर लेने को तैयार थी।
🔶 सुबह हॉस्पिटल में जब माँ की आँख खुली तो देखा पैरों में प्लास्टर है सर पे पट्टी बंधी है सामने राज ऋतु को गले लगाए है रानी और उसके पापा की आँखों में आँसू हैं और डॉक्टर बोल रहा है थैंक्स मेरा नहीं इनका कीजिये जिन्होंने टाइम रहते हॉस्पिटल ले आये वरना हमारे हाथ भी कुछ संभव न था।
🔷 कल तक जिन आँखों मे ऋतु के लिए नफरत था आज उन्ही आँखों में कृतज्ञता के भाव थे और सवकी आँखों से आँसू निकल रहे थे।
🔷 दोनों की शादी के अभी सात दिन ही हुए थे। "ऋतु!! ऋतु !! "पूरी ताकत और गुस्से से राज चिल्लाया।"क्या हुआ?" ऋतु घबराई सी कमरे में पहुँची तब तक उसके सास ससुर और ननद भी कमरे में आ गए थे।
🔶 राज ने सबके सामने चिल्लाना और अपमान करना शुरू किया। "माँ ये देखो इस लडक़ी के व्हाट्स एप्प पे कई लड़कों से दोस्ती हैं ये सही लड़की नही है?"
🔷 सासु माँ ससुर और ननद भी जलती नेत्रों से ऋतु को देखने लगे। ऋतु को अपनी गलती नही समझ आयी वो हतप्रभ खड़ी थी जो राज रात दिन उसके प्यार का दम्भ भरता था, उसकी खूबसूरती के कसीदे पढ़ता था, उसके लिए आसमान से तारे तोड़ लाने की बातें करता था उसके इस रूप की ऋतु ने कल्पना भी न की थी।
🔶 "राज मैंने भी तुम्हारा व्हाट्स एप्प देखा तुम्हारी भी कई लड़कियों से दोस्ती है। तुम्हारी बहन रानी के भी कई लड़के अच्छे दोस्त होंगें इसमें गलत क्या है?" ऋतु के बोलते ही "चुप! जबान लडाती है" सास की जोरदार आवाज़ गूँजी।
🔷 चटाक!!!! राज का जोरदार तेज थप्पड़ ऋतु के गाल पर पड़ा। गाल पे लाल लाल उँगलियो के निशान पड़ गए। आँखे पनिया गई।
🔶 चटाक!!!!!!! पहले से भी अधिक जोरदार और तेज थप्पड़ की कमरे में आवाज़ हुई। इस बार सबके सामने ऋतु का जोरदार थप्पड़ राज को पड़ा। ऐसा थप्पड़ कि राज को दिन में ही चाँद तारे ग्रह उपग्रह सब दिख गए।
🔷 "मुझे कमजोर लड़की न समझना मैं पढ़ी लिखी और अपने हक़ और अधिकार जानने वाली भारतीय आर्मी के मेजर की बेटी हूँ। किसी भी हाल में चरित्र उज्ज्वल रखना और गलत सहन नहीं करना दो बातें पापा ने सिखाई हैं। इसके बाद किसी ने मुझे किसी भी तरह से परेशान करने की कोशिश की तो फिजिकल, मेन्टल टॉर्चर और डोमेस्टिक वॉइलेन्स का केस डाल दूँगी। सासु माँ आपने बेटे को खूब पढ़ा लिखा कर बड़ा ऑफिसर तो बना दिया काश थोड़ा लड़कियों से बात करने की तमीज और उनकी इज़्ज़त करना भी सिखा देतीं।"
🔶 इसके बाद कुछ दिनों तक घर का माहौल काफी तनावपूर्ण रहने लगा। दीवारों में कान होने के कारण पड़ोसियों में भी इस नई बहू के बिगड़े तेवर की चर्चा होने लगी और पड़ोसियों की खुसर फुसर ने हवन में घी का काम किया। एक दिन पहले की आदर्श बहु अब बहुत बुरी बहु बन गयी थी।
🔷 इस घटना के कुछ दिन बाद राज अपने काम के सिलसिले में दो दिन के लिए दूसरे शहर गया हुआ था। उसके पिता जी भी गाँव के किसी रिश्तेदार की बीमारी की खबर सुनकर गाँव गए हुए थे। घर पर सिर्फ राज की माँ बहन रानी और ऋतु थीं।
🔶 माँ छत पर कपड़ा सूखने डालकर आ रही थीं कि अचानक पैर फिसलने से वह ऊपर की सीढ़ियों से लुढकते लुढकते नीचे आ गिरी। जोर से चिल्लाकर बेहोश हो गयी। सर फट गया और तेजी से खून बहने लगा। पैर फ्रैक्चर होकर थोड़ा मुड़ सा गया। रानी और ऋतु चीख सुनते हो दौड़ पड़े। रानी माँ को ऐसे हाल में देखकर नरवस हो गयी वो जोर जोर से रोने लगी।
🔷 ऋतु ने संयम रखते हुए एकपल भी देर न करते हुए सबसे पहले एक साफ कपड़े से सर पे पट्टी बंधी इससे थोड़ा खून बहना कम हो गया फिर माँ को गोद में उठाकर कार की पिछली सीट पर लिटाया और रानी को बिठाकर सीधे हॉस्पिटल ले गयी।
🔶 हॉस्पिटल में तुरंत इमरजेंसी के सारे कागजात तैयार कर माँ को ICU में भर्ती कराया और तुरंत माँ के लिए अपना ब्लड डोनेट भी की चोटें काफी गंभीर लगीं थी और ऋतु अकेले ही बहु की तरह नहीं बल्कि बेटे की तरह खाना पीना सोना जागना भूलकर सब काम कर रही थी।
🔷 रानी को माँ के पास बिठाकर कभी डॉक्टर से बात करती कभी दवाइया लाती कभी रिपोर्ट पढ़ती। राज और उसके पापा को खबर कर दी गयी थी फिर भी उनलोगों के आने में नौ दस घंटे का समय लग गया था। इन नौ घंटो में ऐसा लग रहा था जैसे ऋतु खुद यमराज से टक्कर लेने को तैयार थी।
🔶 सुबह हॉस्पिटल में जब माँ की आँख खुली तो देखा पैरों में प्लास्टर है सर पे पट्टी बंधी है सामने राज ऋतु को गले लगाए है रानी और उसके पापा की आँखों में आँसू हैं और डॉक्टर बोल रहा है थैंक्स मेरा नहीं इनका कीजिये जिन्होंने टाइम रहते हॉस्पिटल ले आये वरना हमारे हाथ भी कुछ संभव न था।
🔷 कल तक जिन आँखों मे ऋतु के लिए नफरत था आज उन्ही आँखों में कृतज्ञता के भाव थे और सवकी आँखों से आँसू निकल रहे थे।
👉 इन तीन का ध्यान रखिए (भाग 6)
🔶 इन तीनों का आनन्द प्राप्त करो- (1) खुला दिल (2) स्वतन्त्रता (3) सौंदर्य- ये तीनों आपके आनन्द की अभिवृद्धि करने वाले तत्व हैं।
🔷 खुला दिल सबसे उत्तम वस्तुएँ ग्रहण करने को प्रस्तुत रहता है, संकुचित हृदय वाला व्यक्तिगत वैमनस्य के कारण दूसरे के सद्गुणों को कभी प्राप्त करने की चेष्टा नहीं करता। स्वतन्त्रता का आनन्द वही साधक जानता है जो रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, एवं क्षणिक आवेशों से मुक्त है।
🔶 स्वतंत्रता का अर्थ अत्यन्त विस्तृत है। सोचने, बोलने, लिखने, प्रकट करने की स्वतन्त्रता प्राप्त करनी चाहिए। जो व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र है, वह अनेक झगड़ों से मुक्त है। सौंदर्य-आत्मिक और चारित्रिक-दोनों ही उन्नति और प्रगति की ओर ले जाने वाले हैं। यदि सौंदर्य के साथ कुरुचि और वासना मिश्रित हो जायेंगी, तो वह अपना वास्तविक अभिप्राय नष्ट कर देगा।
🔷 सौंदर्य के साथ सुरुचि का समावेश होना चाहिए। आप सौंदर्य की जिस रूप में पूजा करें, यह स्मरण रखिये वह आप में शुभ भावनाएं प्रेरित करने वाला, सद्प्रेरणाओं को उत्पन्न करने वाला हो।
🔶 इन तीन के लिये लड़ो-इज्जत, देश, और मित्र। इनकी प्रतिष्ठा आपकी अपनी इज्जत है। यदि आप में स्वाभिमान है, तो आपको इन तीनों की रक्षा अपनी सम्पूर्ण शक्ति से करनी चाहिए। इन तीन की चाह करो-निर्मलपन, भलापन, आनन्दी स्वभाव। आन्तरिक शान्ति के लिये तीनों आवश्यक है।
.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 14
🔷 खुला दिल सबसे उत्तम वस्तुएँ ग्रहण करने को प्रस्तुत रहता है, संकुचित हृदय वाला व्यक्तिगत वैमनस्य के कारण दूसरे के सद्गुणों को कभी प्राप्त करने की चेष्टा नहीं करता। स्वतन्त्रता का आनन्द वही साधक जानता है जो रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, एवं क्षणिक आवेशों से मुक्त है।
🔶 स्वतंत्रता का अर्थ अत्यन्त विस्तृत है। सोचने, बोलने, लिखने, प्रकट करने की स्वतन्त्रता प्राप्त करनी चाहिए। जो व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र है, वह अनेक झगड़ों से मुक्त है। सौंदर्य-आत्मिक और चारित्रिक-दोनों ही उन्नति और प्रगति की ओर ले जाने वाले हैं। यदि सौंदर्य के साथ कुरुचि और वासना मिश्रित हो जायेंगी, तो वह अपना वास्तविक अभिप्राय नष्ट कर देगा।
🔷 सौंदर्य के साथ सुरुचि का समावेश होना चाहिए। आप सौंदर्य की जिस रूप में पूजा करें, यह स्मरण रखिये वह आप में शुभ भावनाएं प्रेरित करने वाला, सद्प्रेरणाओं को उत्पन्न करने वाला हो।
🔶 इन तीन के लिये लड़ो-इज्जत, देश, और मित्र। इनकी प्रतिष्ठा आपकी अपनी इज्जत है। यदि आप में स्वाभिमान है, तो आपको इन तीनों की रक्षा अपनी सम्पूर्ण शक्ति से करनी चाहिए। इन तीन की चाह करो-निर्मलपन, भलापन, आनन्दी स्वभाव। आन्तरिक शान्ति के लिये तीनों आवश्यक है।
.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 14
👉 Gold coins
🔶 A saint used to administer a small gurukul. One day he brought a person walking by and asked him before his scholars, “What will you do if you get a packet of three gold coins on the way?”
🔷 “I will locate its owner and return to him at once or submit them in the king’s treasure,” replied the man. The saint laughed, sent back the passer by and told his scholars that the man was unwise. The scholars wondered about what the saint said. All of them were taught not to keep the others’ belongings.
🔶 After sometimes another man passed by, and the saint repeated the same question to him. He replied, “Do you think I am a stupid that I will go to search for the owner of the gold coins if hapen to find them on the way?” The saint told that man was a devil.
🔷 Now the saint brought inside a third man and put before him the same question. The man modestly replied, “It is difficult to say anything right now. Who can say of mind that deceives in a second? If there be God’s grace and intellect reigns, I will return the coins.” The saint inferred this man as rightful as he had entrusted his everything to God. Such people are never a failure.
🔷 “I will locate its owner and return to him at once or submit them in the king’s treasure,” replied the man. The saint laughed, sent back the passer by and told his scholars that the man was unwise. The scholars wondered about what the saint said. All of them were taught not to keep the others’ belongings.
🔶 After sometimes another man passed by, and the saint repeated the same question to him. He replied, “Do you think I am a stupid that I will go to search for the owner of the gold coins if hapen to find them on the way?” The saint told that man was a devil.
🔷 Now the saint brought inside a third man and put before him the same question. The man modestly replied, “It is difficult to say anything right now. Who can say of mind that deceives in a second? If there be God’s grace and intellect reigns, I will return the coins.” The saint inferred this man as rightful as he had entrusted his everything to God. Such people are never a failure.
👉 चिन्ता पीडित व्यक्ति
🔶 मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु रोग- क्षय से पीडित रोगियों में सबसे अधिक संख्या उनकी है जिन्होंने रात दिन दुश्चिन्ताएँ करके अपने शत्रु को बुलाया है। चिन्ता पीडित व्यक्ति के लक्षण:-
🔷 (1) चिन्तित व्यक्ति हमेशा दुःखी बना रहता है। उसके पेट में और सिर में प्राय: दर्द बना रहता है। स्वास्थ्य के मुख्य आधारभूत अंग पेट और सिर ही है और यह दोनों ही दुश्चिन्ता करने से भारी बने रहते हैं।
🔶 (2) दुश्चिन्ता करने वाला व्यक्ति कायर हो जाता है और कायरता की यह प्रवृत्ति विशेष रूप से उन मौकों पर परिलक्षित होती है जब उसे बाह्य संसार की वास्तविकता का सामना करना पड़ता है। उसे सदैव भयंकर हानि का खतरा अनुभव हुआ करता है। कभी कभी तो वह अकारण ही भयभीत हो जाया करता है।
🔷 (3) चिन्ताशील व्यक्ति में आत्मविश्वास की कमी होती है। दूसरों के प्रति उस के मन में संदेह बना ही रहता है। चाहे जितना उसका उत्साहवर्धन किया जाय, उसे असफलता ही नजर आती है।
🔶 (4) उसमें आवश्यकता से अधिक झुझलाने की आदत पैदा हो जाती है। कभी कभी उसके साथ अन्य लोगों का उठना- बैठना भी कठिन हो जाता है। वह अपनी अस्थिरता को छिपाने की चेष्टा करता है पर उसकी चेष्टा बेकार सिद्ध होती है। जरा- जरा सी बात पर उसका खून खौल उठता है।
🔷 (5) वह अत्यन्त अनुभूतिशील और आवश्यकता से अधिक सम्मान प्रिय होता है। इसलिये समाज के प्रति उसका दृष्टिकोण गलत और अतिरंजित होता है। वह अपने ही मित्रों, प्रियजनों, परिजनों और परिवारजनों के कार्यों और कथन का उल्टा अर्थ लगाता है, कभी हर बात में वह अपना ही दोष समझता है। इस प्रकार वह अपना जीवन बहुत दु:खी बना लेता है।
🔶 (6) वह प्राय: नैराश्यपूर्ण भावों से ओत- प्रोत रहता है। कुछ मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि उसे निराशा में ही आनन्द आता है, अन्यथा वह उन तामसिक भावों से इतना लीन क्यों रहता? पर चिन्ता पीडि़त व्यक्ति उन भावों से छुटकारा पाना चाहता है, वह उनसे पीछा छुड़ाने में बिल्कुल असमर्थ हो जाता है।
🔷 (7) चिन्ता करने से बड़ी जल्दी थकावट आ जाती है। ऐसा जान पड़ता है कि शरीर और मन दोनों थक गये हों। ऐसी थकावट हर समय बनी रहती है। जहाँ चिन्ता है वहाँ थकावट अवश्य होगी।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति से
🔷 (1) चिन्तित व्यक्ति हमेशा दुःखी बना रहता है। उसके पेट में और सिर में प्राय: दर्द बना रहता है। स्वास्थ्य के मुख्य आधारभूत अंग पेट और सिर ही है और यह दोनों ही दुश्चिन्ता करने से भारी बने रहते हैं।
🔶 (2) दुश्चिन्ता करने वाला व्यक्ति कायर हो जाता है और कायरता की यह प्रवृत्ति विशेष रूप से उन मौकों पर परिलक्षित होती है जब उसे बाह्य संसार की वास्तविकता का सामना करना पड़ता है। उसे सदैव भयंकर हानि का खतरा अनुभव हुआ करता है। कभी कभी तो वह अकारण ही भयभीत हो जाया करता है।
🔷 (3) चिन्ताशील व्यक्ति में आत्मविश्वास की कमी होती है। दूसरों के प्रति उस के मन में संदेह बना ही रहता है। चाहे जितना उसका उत्साहवर्धन किया जाय, उसे असफलता ही नजर आती है।
🔶 (4) उसमें आवश्यकता से अधिक झुझलाने की आदत पैदा हो जाती है। कभी कभी उसके साथ अन्य लोगों का उठना- बैठना भी कठिन हो जाता है। वह अपनी अस्थिरता को छिपाने की चेष्टा करता है पर उसकी चेष्टा बेकार सिद्ध होती है। जरा- जरा सी बात पर उसका खून खौल उठता है।
🔷 (5) वह अत्यन्त अनुभूतिशील और आवश्यकता से अधिक सम्मान प्रिय होता है। इसलिये समाज के प्रति उसका दृष्टिकोण गलत और अतिरंजित होता है। वह अपने ही मित्रों, प्रियजनों, परिजनों और परिवारजनों के कार्यों और कथन का उल्टा अर्थ लगाता है, कभी हर बात में वह अपना ही दोष समझता है। इस प्रकार वह अपना जीवन बहुत दु:खी बना लेता है।
🔶 (6) वह प्राय: नैराश्यपूर्ण भावों से ओत- प्रोत रहता है। कुछ मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि उसे निराशा में ही आनन्द आता है, अन्यथा वह उन तामसिक भावों से इतना लीन क्यों रहता? पर चिन्ता पीडि़त व्यक्ति उन भावों से छुटकारा पाना चाहता है, वह उनसे पीछा छुड़ाने में बिल्कुल असमर्थ हो जाता है।
🔷 (7) चिन्ता करने से बड़ी जल्दी थकावट आ जाती है। ऐसा जान पड़ता है कि शरीर और मन दोनों थक गये हों। ऐसी थकावट हर समय बनी रहती है। जहाँ चिन्ता है वहाँ थकावट अवश्य होगी।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति से
👉 गुरुगीता (भाग 99)
👉 गुरूकृपा गृहस्थ को भी विदेह बना देती है
🔶 इसके स्वरूप को और भी अधिक स्पष्ट करते हुए भगवान् सदाशिव माँ भगवती से कहते हैं-
स्वयं सर्वमयो भूत्वा परं तत्त्वं विलोकयेत्। परात्परतरं नान्यत् सर्वमेतन्निरालयम्॥ १२३॥
तस्यावलोकनं प्राप्य सर्वसंगविवर्जितः। एकाकी निःस्पृहः शान्तः तिष्ठासेत् तत्प्रसादतः॥१२४॥
लब्धं वाऽथ न लब्धं वा स्वल्पं वा बहुलं तथा। निष्कामेनैव भोक्तव्यं सदा संतुष्टचेतसा ॥ १२५॥
सर्वज्ञपदमित्याहुर्देही सर्वमयो बुधाः। सदानन्दः सदाशान्तो रमते यत्र- कुत्रचित्॥ १२६॥
यत्रैव तिष्ठते सोऽपि स देशः पुण्यभाजनम्। मुक्तस्य लक्षणं देवि तवाग्रे कथितं मया॥ १२७॥
🔷 ऐसा मुक्त पुरूष स्वयं सर्वमय होकर परम तत्व को देखता है। वह इस सत्य को अनुभव करता है कि न तो कोई दूसरा है और न ही इस आत्मतत्त्व से बढ़कर कोई श्रेष्ठता है। ऐसा अनुभव करते हुए वह सम्पूर्ण निराश्रय होकर जीता है॥ १२३॥ श्री गुरूकृपा से इस परम तत्त्व का अवलोकन करने के बाद शिष्य -साधक सभी आसक्तियों से रहित , एकाकी, निस्पृह, शान्त और स्थिर हो जाता है॥ १२४॥ उसे अभीष्ट मिले या न मिले, उसे ज्यादा मिले अथवा थोड़ा मिले, इस चिंता को छोड़कर वह सभी कामनाओं से रहित संतुष्ट चित्त होकर जीवन यापन करता है॥ १२५॥
🔶 ज्ञानी जन इस अवस्था को ही सर्वज्ञ पद कहते हैं। इसे प्राप्त करके देहधारी सर्वात्म हो जाता है। इस अवस्था को पाने वाला साधक सदा शान्त, हमेशा ही आनन्दित एवं यत्र- तत्र रमने वाला होता है॥१२६॥ भगवान् सदाशिव कहते हैं, हे देवि! इस तरह से मैंने आपको मुक्त पुरूष के लक्षण सुनाएँ। ऐसा मुक्त पुरूष जहाँ कहीं भी निवास करता है, वह देश पुण्यभूमि हो जाता है॥ १२७॥ ऐसे व्यक्ति का दर्शन, सान्निध्य सभी कुछ दुर्लभ है। परन्तु इसे अनुभव वही कर पाता है, जो सच्चे साधक हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 151
🔶 इसके स्वरूप को और भी अधिक स्पष्ट करते हुए भगवान् सदाशिव माँ भगवती से कहते हैं-
स्वयं सर्वमयो भूत्वा परं तत्त्वं विलोकयेत्। परात्परतरं नान्यत् सर्वमेतन्निरालयम्॥ १२३॥
तस्यावलोकनं प्राप्य सर्वसंगविवर्जितः। एकाकी निःस्पृहः शान्तः तिष्ठासेत् तत्प्रसादतः॥१२४॥
लब्धं वाऽथ न लब्धं वा स्वल्पं वा बहुलं तथा। निष्कामेनैव भोक्तव्यं सदा संतुष्टचेतसा ॥ १२५॥
सर्वज्ञपदमित्याहुर्देही सर्वमयो बुधाः। सदानन्दः सदाशान्तो रमते यत्र- कुत्रचित्॥ १२६॥
यत्रैव तिष्ठते सोऽपि स देशः पुण्यभाजनम्। मुक्तस्य लक्षणं देवि तवाग्रे कथितं मया॥ १२७॥
🔷 ऐसा मुक्त पुरूष स्वयं सर्वमय होकर परम तत्व को देखता है। वह इस सत्य को अनुभव करता है कि न तो कोई दूसरा है और न ही इस आत्मतत्त्व से बढ़कर कोई श्रेष्ठता है। ऐसा अनुभव करते हुए वह सम्पूर्ण निराश्रय होकर जीता है॥ १२३॥ श्री गुरूकृपा से इस परम तत्त्व का अवलोकन करने के बाद शिष्य -साधक सभी आसक्तियों से रहित , एकाकी, निस्पृह, शान्त और स्थिर हो जाता है॥ १२४॥ उसे अभीष्ट मिले या न मिले, उसे ज्यादा मिले अथवा थोड़ा मिले, इस चिंता को छोड़कर वह सभी कामनाओं से रहित संतुष्ट चित्त होकर जीवन यापन करता है॥ १२५॥
🔶 ज्ञानी जन इस अवस्था को ही सर्वज्ञ पद कहते हैं। इसे प्राप्त करके देहधारी सर्वात्म हो जाता है। इस अवस्था को पाने वाला साधक सदा शान्त, हमेशा ही आनन्दित एवं यत्र- तत्र रमने वाला होता है॥१२६॥ भगवान् सदाशिव कहते हैं, हे देवि! इस तरह से मैंने आपको मुक्त पुरूष के लक्षण सुनाएँ। ऐसा मुक्त पुरूष जहाँ कहीं भी निवास करता है, वह देश पुण्यभूमि हो जाता है॥ १२७॥ ऐसे व्यक्ति का दर्शन, सान्निध्य सभी कुछ दुर्लभ है। परन्तु इसे अनुभव वही कर पाता है, जो सच्चे साधक हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 151
👉 Yajna – The Root of Vedic Culture (Part 5)
🔷 Types of Yajnas
A variety of Yajnas are described in scriptures. The seva Yajna, meaning service to the society, is a noble example of Yajna. The jnana Yajna corresponds to the service of people by enlightening their lives with the glow of knowledge and education. The prana Yajna implies the selfless service of saving the lives of people from sufferings and agonies and inspiring liveliness and respect for life in them.
🔶 Modern times and ignorance towards a great tradition
In the tides of time we lost and forgot the original purpose, relevance and importance of Yajna in our life. It won’t be an exaggeration to conclude that this negligence and aberration has been a major cause of our fallen and miserable state today. Nevertheless, there is a hope of reviving the Yajna in its original form, as we have somehow continued the tradition of Yajna as a holy custom and occasionally perform it, in some form at least, as a symbolic ritual.
🔷 Although lifeless and deformed, the feeble and hazy image of this ancient tradition is still with us. All important ceremonies, including the sodas sanskaras (sixteen rituals that are performed at various stages of life from birth till death), are conducted with Yajna. For instance, the Vedic mode of the wedding ceremony (vivaha sanskara) takes place in the presence of the sacred flames of Yajna.
🔶 As the melting heat of the fire welds and binds two metal pieces, the pious glow and the spiritual warmth of the yagyagni (the fire of Yajna) conjugate the soul of the bride and the groom through the sacred knot of marriage. The funeral process ( daha or anityesti sanskara) is also a Yajna. The significance of Yajna in the thread ceremony (upanayana sanskara) is self-evident, as the sacred thread donned to symbolize the initiation of an enlightened life is called “yajóopavita”. This thread is always worn in the auspicious vicinity of yajnagni.
📖 From Akhand Jyoti Jan 2001
A variety of Yajnas are described in scriptures. The seva Yajna, meaning service to the society, is a noble example of Yajna. The jnana Yajna corresponds to the service of people by enlightening their lives with the glow of knowledge and education. The prana Yajna implies the selfless service of saving the lives of people from sufferings and agonies and inspiring liveliness and respect for life in them.
🔶 Modern times and ignorance towards a great tradition
In the tides of time we lost and forgot the original purpose, relevance and importance of Yajna in our life. It won’t be an exaggeration to conclude that this negligence and aberration has been a major cause of our fallen and miserable state today. Nevertheless, there is a hope of reviving the Yajna in its original form, as we have somehow continued the tradition of Yajna as a holy custom and occasionally perform it, in some form at least, as a symbolic ritual.
🔷 Although lifeless and deformed, the feeble and hazy image of this ancient tradition is still with us. All important ceremonies, including the sodas sanskaras (sixteen rituals that are performed at various stages of life from birth till death), are conducted with Yajna. For instance, the Vedic mode of the wedding ceremony (vivaha sanskara) takes place in the presence of the sacred flames of Yajna.
🔶 As the melting heat of the fire welds and binds two metal pieces, the pious glow and the spiritual warmth of the yagyagni (the fire of Yajna) conjugate the soul of the bride and the groom through the sacred knot of marriage. The funeral process ( daha or anityesti sanskara) is also a Yajna. The significance of Yajna in the thread ceremony (upanayana sanskara) is self-evident, as the sacred thread donned to symbolize the initiation of an enlightened life is called “yajóopavita”. This thread is always worn in the auspicious vicinity of yajnagni.
📖 From Akhand Jyoti Jan 2001
👉 इन तीन का ध्यान रखिए (भाग 5)
🔷 इन तीन को हासिल कीजिए- सत्यनिष्ठा, परिश्रम और अनवरतता
🔶 (1) सत्यनिष्ठ व्यक्ति की आत्मा विशालतर बनती है। रागद्वेष हीन श्रद्धा एवं निष्पक्ष बुद्धि उसमें सदैव जागृत रहती है। वह व्यक्ति वाणी, कर्म, एवं धारणा प्रत्येक स्थान पर परमेश्वर को दृष्टि में रख कर कार्य करता है। जो वाणी, कर्तव्य रूप होने पर हमारे ज्ञान या जानकारी को सही सही प्रकट करती है और उसमें ऐसी कमीवेशी करने का यत्न नहीं करती है कि जिससे अन्यथा अभिप्राय भासित हो, वह सत्यवाणी है। विचार में जो सत्य प्रतीत हो, उसके विवेकपूर्ण आचरण का नाम ही सत्य कर्म है।
🔷 (2) परिश्रम एक ऐसी पूजा है, जिसके द्वारा कर्म पथ के सब पथिक अपने पथ को, जीवन और प्राण को ऊँचा उठा सकते हैं। कार्लाइल का कथन है कि परिश्रम द्वारा कोई भी बड़े से बड़ा कार्य, उद्देश्य या योजना सफल हो सकती है।
🔶 (3) अनवरतता अर्थात् लगातार अपने उद्योग में लगे रहना मनुष्य को सफलता के द्वारा पर लाकर खड़ा कर देता है। पुनःपुनः अपने कर्तव्य एवं योजनाओं को परिवर्तित करने वाला कभी सफलता लाभ नहीं कर सकता।
.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 14
🔶 (1) सत्यनिष्ठ व्यक्ति की आत्मा विशालतर बनती है। रागद्वेष हीन श्रद्धा एवं निष्पक्ष बुद्धि उसमें सदैव जागृत रहती है। वह व्यक्ति वाणी, कर्म, एवं धारणा प्रत्येक स्थान पर परमेश्वर को दृष्टि में रख कर कार्य करता है। जो वाणी, कर्तव्य रूप होने पर हमारे ज्ञान या जानकारी को सही सही प्रकट करती है और उसमें ऐसी कमीवेशी करने का यत्न नहीं करती है कि जिससे अन्यथा अभिप्राय भासित हो, वह सत्यवाणी है। विचार में जो सत्य प्रतीत हो, उसके विवेकपूर्ण आचरण का नाम ही सत्य कर्म है।
🔷 (2) परिश्रम एक ऐसी पूजा है, जिसके द्वारा कर्म पथ के सब पथिक अपने पथ को, जीवन और प्राण को ऊँचा उठा सकते हैं। कार्लाइल का कथन है कि परिश्रम द्वारा कोई भी बड़े से बड़ा कार्य, उद्देश्य या योजना सफल हो सकती है।
🔶 (3) अनवरतता अर्थात् लगातार अपने उद्योग में लगे रहना मनुष्य को सफलता के द्वारा पर लाकर खड़ा कर देता है। पुनःपुनः अपने कर्तव्य एवं योजनाओं को परिवर्तित करने वाला कभी सफलता लाभ नहीं कर सकता।
.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 14
👉 बेपरवाह
🔷 यदि आप पुरी तरह से बेपरवाह बन जाओगे तो वो दिन दुर नही की एक दिन संसार मे आपकी परवाह करने वाला कोई न होगा!
🔶 एक नगर मे दो भाई थे जो सहपाठी भी थे दोनो के नाम थे जगजीत और ओमनारायण! जगजीत बड़े परिवार से था तो ओमनारायण साधारण परिवार से था और जगजीत पढ़ने मे बड़ा होशियार था तो ओमनारायण साधारण बुद्धी का प्राणी था!
🔷 दोनो वर्षों तक साथ पढ़े और एक दिन जगजीत बहुत ऊँचे ओहदे पर पहुँच गया और ओमनारायण बड़ी मुश्किल से चपरासी की नौकरी तक पहुँच पाया! पर जहाँ ओमनारायण को हर कोई चाहता था पुरा गाँव उसकी परवाह करता था तो जगजीत की कोई परवाह नही करते थे!
🔶 जगजीत के जीवन की सबसे बड़ी कमी यही थी की वो किसी की भी परवाह नही करता था और ओमनारायण हर एक की परवाह करता था जहाँ जगजीत बहुत ऊँचे ओहदे पर और पूर्ण समर्थ होने के बावजुद वो जगह न बना पाया जो ओमनारायण ने अपनी संवेदना से बना ली!
🔷 मित्रों एक बात हमेशा याद रखना की यदि हम किसी की परवाह नहीं करेंगे तो एक दिन वो आयेगा की संसार मे कोई हमारी परवाह नही करेगा! जो परवाह के योग्य है उनकी परवाह करना समाज, साथी, परिवार, माँ-बाप, सद्गुरु, संत, सत्य और अन्तरात्मा इन सबकी परवाह करनी चाहिये क्योंकि यदि हम किसी के प्रति सम्वेदनशील रहेंगे तो प्रकृति भी हमारे प्रति सम्वेदनशील रहेगी और जीवन का चहुमुखि विकास तभी सम्भव है जब हम अधिकतम की परवाह करेंगे!
🔶 वैसे नीति तो यही कहती है की मानव को चींटी तक की परवाह करनी चाहिये क्योंकि यदि हम उसकी रक्षा करेंगे तो भगवान हमारी परवाह करेंगे और यदि हम उसकी रक्षा न करके राक्षसी प्रवर्ति दर्शायेँगे तो फिर भगवान भी हमारी परवाह नही करेंगे!
👉 जैसे यदि तुम समय की परवाह नही करोगे तो एक दिन समय भी तुम्हारी परवाह नही करेगा इसलिये परवाह करना!
🔶 एक नगर मे दो भाई थे जो सहपाठी भी थे दोनो के नाम थे जगजीत और ओमनारायण! जगजीत बड़े परिवार से था तो ओमनारायण साधारण परिवार से था और जगजीत पढ़ने मे बड़ा होशियार था तो ओमनारायण साधारण बुद्धी का प्राणी था!
🔷 दोनो वर्षों तक साथ पढ़े और एक दिन जगजीत बहुत ऊँचे ओहदे पर पहुँच गया और ओमनारायण बड़ी मुश्किल से चपरासी की नौकरी तक पहुँच पाया! पर जहाँ ओमनारायण को हर कोई चाहता था पुरा गाँव उसकी परवाह करता था तो जगजीत की कोई परवाह नही करते थे!
🔶 जगजीत के जीवन की सबसे बड़ी कमी यही थी की वो किसी की भी परवाह नही करता था और ओमनारायण हर एक की परवाह करता था जहाँ जगजीत बहुत ऊँचे ओहदे पर और पूर्ण समर्थ होने के बावजुद वो जगह न बना पाया जो ओमनारायण ने अपनी संवेदना से बना ली!
🔷 मित्रों एक बात हमेशा याद रखना की यदि हम किसी की परवाह नहीं करेंगे तो एक दिन वो आयेगा की संसार मे कोई हमारी परवाह नही करेगा! जो परवाह के योग्य है उनकी परवाह करना समाज, साथी, परिवार, माँ-बाप, सद्गुरु, संत, सत्य और अन्तरात्मा इन सबकी परवाह करनी चाहिये क्योंकि यदि हम किसी के प्रति सम्वेदनशील रहेंगे तो प्रकृति भी हमारे प्रति सम्वेदनशील रहेगी और जीवन का चहुमुखि विकास तभी सम्भव है जब हम अधिकतम की परवाह करेंगे!
🔶 वैसे नीति तो यही कहती है की मानव को चींटी तक की परवाह करनी चाहिये क्योंकि यदि हम उसकी रक्षा करेंगे तो भगवान हमारी परवाह करेंगे और यदि हम उसकी रक्षा न करके राक्षसी प्रवर्ति दर्शायेँगे तो फिर भगवान भी हमारी परवाह नही करेंगे!
👉 जैसे यदि तुम समय की परवाह नही करोगे तो एक दिन समय भी तुम्हारी परवाह नही करेगा इसलिये परवाह करना!
मंगलवार, 1 मई 2018
👉 यौवन की जिम्मेदारी
🔶 युवावस्था जीवन का वह अंश है, जिसमें उत्साह, स्फूर्ति, उमंग, उन्माद और क्रिया शीलता का तरंगें प्रचण्ड वेग के साथ बहती रहती है। अब तक जितने भी महत्वपूर्ण कार्य हुए हैं, उसकी नींव यौवन की सुदृढ़ भूमि पर ही रखी गई हैं। बालकों और वृद्धों की शक्ति सीमित होने के कारण उनसे किसी महान् कार्य की आशा बहुत ही स्वल्प मात्रा में की जा सकती है।
🔷 वृक्ष बसन्त ऋतु में पल्लव, पुष्प और फलों से सुशोभित होते हैं। मनुष्य अपने यौवन काल में पूर्ण आया के साथ विकसित होता है। वृक्षों को कई बसन्त बार-बार प्राप्त होते हैं, पर मनुष्य का यौवन बसन्त केवल एक बार ही आता है, इसके बाद असमर्थता और निराशा से भरी वृद्धावस्था तत्पश्चात् मृत्यु! जिसने यौवन का सदुपयोग नहीं कर पाया, उसको हाथ मल-मल कर पक्ष ताना ही शेष रह जाता है।
🔶 यौवन सब से बड़ी जिम्मेदारी है। यह ईश्वर की दी हुई सब से बड़ी अमानत है, जिसका समय रहते उसमें से उत्तम उपयोग करना चाहिए। किसी भी देश और जाति का भाग्य उसके नव-युवकों के हाथ रहता है। जिस समाज के युवक जागरुक परायण और देश भक्त हैं, वहीं सामूहिक उन्न्ति हो सकती है। जहाँ के युवकों आलस्य, अकर्मण्यता, स्वार्थ परता और दुर्गुणों की भरमार होगी, वह देश जाति कदापि उन्नति के पथ पर अवसर नहीं हो सकती।
🔷 एक समय जो संसार का मुकुट मणि था, वह भारत आज सब प्रकार दीन-हीन, पतित-पराधीन बना हुआ है। पद-दलित भारत माता अपने सपूतों की ओर सजल नेत्रों से देख रही है और चाहती है, कि उसके ननिहाल अपने तुच्छ स्वार्थों को छोड़कर आगे बढ़ें और अज्ञान, दरिद्र, दुष्ट दुराचार रूपी असुरों को इस पुण्य भूमि से मार भगावें। भारतीय नवयुवक यौवन की जिम्मेदारी को अनुभव करते हुए तुच्छ स्वार्थों को छोड़कर देश सेवा के पथ पर अग्रसर हो इसकी आज ही सबसे बड़ी आवश्यकता है।
📖 अखण्ड ज्योति जून 1943 पृष्ठ 30
🔷 वृक्ष बसन्त ऋतु में पल्लव, पुष्प और फलों से सुशोभित होते हैं। मनुष्य अपने यौवन काल में पूर्ण आया के साथ विकसित होता है। वृक्षों को कई बसन्त बार-बार प्राप्त होते हैं, पर मनुष्य का यौवन बसन्त केवल एक बार ही आता है, इसके बाद असमर्थता और निराशा से भरी वृद्धावस्था तत्पश्चात् मृत्यु! जिसने यौवन का सदुपयोग नहीं कर पाया, उसको हाथ मल-मल कर पक्ष ताना ही शेष रह जाता है।
🔶 यौवन सब से बड़ी जिम्मेदारी है। यह ईश्वर की दी हुई सब से बड़ी अमानत है, जिसका समय रहते उसमें से उत्तम उपयोग करना चाहिए। किसी भी देश और जाति का भाग्य उसके नव-युवकों के हाथ रहता है। जिस समाज के युवक जागरुक परायण और देश भक्त हैं, वहीं सामूहिक उन्न्ति हो सकती है। जहाँ के युवकों आलस्य, अकर्मण्यता, स्वार्थ परता और दुर्गुणों की भरमार होगी, वह देश जाति कदापि उन्नति के पथ पर अवसर नहीं हो सकती।
🔷 एक समय जो संसार का मुकुट मणि था, वह भारत आज सब प्रकार दीन-हीन, पतित-पराधीन बना हुआ है। पद-दलित भारत माता अपने सपूतों की ओर सजल नेत्रों से देख रही है और चाहती है, कि उसके ननिहाल अपने तुच्छ स्वार्थों को छोड़कर आगे बढ़ें और अज्ञान, दरिद्र, दुष्ट दुराचार रूपी असुरों को इस पुण्य भूमि से मार भगावें। भारतीय नवयुवक यौवन की जिम्मेदारी को अनुभव करते हुए तुच्छ स्वार्थों को छोड़कर देश सेवा के पथ पर अग्रसर हो इसकी आज ही सबसे बड़ी आवश्यकता है।
📖 अखण्ड ज्योति जून 1943 पृष्ठ 30
👉 मायावी ज्ञान
🔶 एक गांव में सप्ताह के एक दिन प्रवचन का आयोजन होता था। इसकी व्यवस्था गांव के कुछ प्रबुद्ध लोगों ने करवाई थी ताकि भोले-भाले ग्रामीणों को धर्म का कुछ ज्ञान हो सके। इसके लिए एक दिन एक ज्ञानी पुरुष को बुलाया गया। गांव वाले समय से पहुंच गए। ज्ञानी पुरुष ने पूछा – क्या आपको मालूम है कि मैं क्या कहने जा रहा हूं? गांव वालों ने कहा – नहीं तो…। ज्ञानी पुरुष गुस्से में भरकर बोले – जब आपको पता ही नहीं कि मैं क्या कहने जा रहा हूं तो फिर क्या कहूं। वह नाराज होकर चले गए।
🔷 गांव के सरपंच उनके पास दौड़े हुए पहुंचे और क्षमायाचना करके कहा कि गांव के लोग तो अनपढ़ हैं, वे क्या जानें कि क्या बोलना है। किसी तरह उन्होंने ज्ञानी पुरुष को फिर आने के लिए मना लिया। अगले दिन आकर उन्होंने फिर वही सवाल किया - क्या आपको पता है कि मैं क्या कहने जा रहा हूं? इस बार गांव वाले सतर्क थे। उन्होंने छूटते ही कहा – हां, हमें पता है कि आप क्या कहेंगे। ज्ञानी पुरुष भड़क गए। उन्होंने कहा -जब आपको पता ही है कि मैं क्या कहने वाला हूं तो इसका अर्थ हुआ कि आप सब मुझसे ज्यादा ज्ञानी हैं। फिर मेरी क्या आवश्यकता है? यह कहकर वह चल पड़े।
🔶 गांव वाले दुविधा में पड़ गए कि आखिर उस सज्जन से किस तरह पेश आएं, क्या कहें। उन्हें फिर समझा-बुझाकर लाया गया। इस बार जब उन्होंने वही सवाल किया तो गांव वाले उठकर जाने लगे। ज्ञानी पुरुष ने क्रोध में कहा – अरे, मैं कुछ कहने आया हूं तो आप लोग जा रहे हैं। इस पर कुछ गांव वालों ने हाथ जोड़कर कहा – देखिए, आप परम ज्ञानी हैं। हम गांव वाले मूढ़ और अज्ञानी हैं। हमें आपकी बातें समझ में नहीं आतीं। कृपया अपने अनमोल वचन हम पर व्यर्थ न करें। ज्ञानी पुरुष अकेले खड़े रह गए। उनका घमंड चूर-चूर हो गया।
🔷 गांव के सरपंच उनके पास दौड़े हुए पहुंचे और क्षमायाचना करके कहा कि गांव के लोग तो अनपढ़ हैं, वे क्या जानें कि क्या बोलना है। किसी तरह उन्होंने ज्ञानी पुरुष को फिर आने के लिए मना लिया। अगले दिन आकर उन्होंने फिर वही सवाल किया - क्या आपको पता है कि मैं क्या कहने जा रहा हूं? इस बार गांव वाले सतर्क थे। उन्होंने छूटते ही कहा – हां, हमें पता है कि आप क्या कहेंगे। ज्ञानी पुरुष भड़क गए। उन्होंने कहा -जब आपको पता ही है कि मैं क्या कहने वाला हूं तो इसका अर्थ हुआ कि आप सब मुझसे ज्यादा ज्ञानी हैं। फिर मेरी क्या आवश्यकता है? यह कहकर वह चल पड़े।
🔶 गांव वाले दुविधा में पड़ गए कि आखिर उस सज्जन से किस तरह पेश आएं, क्या कहें। उन्हें फिर समझा-बुझाकर लाया गया। इस बार जब उन्होंने वही सवाल किया तो गांव वाले उठकर जाने लगे। ज्ञानी पुरुष ने क्रोध में कहा – अरे, मैं कुछ कहने आया हूं तो आप लोग जा रहे हैं। इस पर कुछ गांव वालों ने हाथ जोड़कर कहा – देखिए, आप परम ज्ञानी हैं। हम गांव वाले मूढ़ और अज्ञानी हैं। हमें आपकी बातें समझ में नहीं आतीं। कृपया अपने अनमोल वचन हम पर व्यर्थ न करें। ज्ञानी पुरुष अकेले खड़े रह गए। उनका घमंड चूर-चूर हो गया।
सोमवार, 30 अप्रैल 2018
👉 गुरु-कृपा
🔶 सन्तों की अपनी ही मौज होती है! एक संत अपने शिष्य के साथ किसी अजनबी नगर में पहुंचे। रात हो चुकी थी और वे दोनों सिर छुपाने के लिए किसी आसरे की तलाश में थे। उन्होंने एक घर का दरवाजा खटखटाया, वह एक धनिक का घर था और अंदर से परिवार का मुखिया निकलकर आया। वह संकीर्ण वृत्ति का था, उसने कहा - "मैं आपको अपने घर के अंदर तो नहीं ठहरा सकता लेकिन तलघर में हमारा स्टोर बना है।
🔷 आप चाहें तो वहां रात को रुक सकते हैं, लेकिन सुबह होते ही आपको जाना होगा। " वह संत अपने शिष्य के साथ तलघर में ठहर गए। वहां के कठोर फर्श पर वे सोने की तैयारी कर रहे थे कि तभी संत को दीवार में एक दरार नजर आई।
🔶 संत उस दरार के पास पहुंचे और कुछ सोचकर उसे भरने में जुट गए। शिष्य के कारण पूछने पर संत ने कहा-"चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं। " अगली रात वे दोनों एक गरीब किसान के घर आसरा मांगने पहुंचे।
🔷 किसान और उसकी पत्नी ने प्रेमपूर्वक उनका स्वागत किया। उनके पास जो कुछ रूखा-सूखा था, वह उन्होंने उन दोनों के साथ बांटकर खाया और फिर उन्हें सोने के लिए अपना बिस्तर दे दिया। किसान और उसकी पत्नी नीचे फर्श पर सो गए।
🔶 सवेरा होने पर संत व उनके शिष्य ने देखा कि किसान और उसकी पत्नी रो रहे थे क्योंकि उनका बैल खेत में मरा पड़ा था। यह देखकर शिष्य ने संत से कहा- 'गुरुदेव, आपके पास तो कई सिद्धियां हैं, फिर आपने यह क्यों होने दिया?
🔷 उस धनिक के पास सब कुछ था, फिर भी आपने उसके तलघर की मरम्मत करके उसकी मदद की, जबकि इस गरीब ने कुछ ना होने के बाद भी हमें इतना सम्मान दिया फिर भी आपने उसके बैल को मरने दिया।
🔶 " संत फिर बोले-'चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं। " उन्होंने आगे कहा- 'उस धनिक के तलघर में दरार से मैंने यह देखा कि उस दीवार के पीछे स्वर्ण का भंडार था।
🔷 चूंकि उस घर का मालिक बेहद लोभी और कृपण था, इसलिए मैंने उस दरार को बंद कर दिया, ताकि स्वर्ण भंडार उसके हाथ ना लगे। इस किसान के घर में हम इसके बिस्तर पर सोए थे। रात्रि में इस किसान की पत्नी की मौत लिखी थी और जब यमदूत उसके प्राण हरने आए तो मैंने रोक दिया।
🔶 चूंकि वे खाली हाथ नहीं जा सकते थे, इसलिए मैंने उनसे किसान के बैल के प्राण ले जाने के लिए कहा। यह सुनकर शिष्य संत के समक्ष नतमस्तक हो गया।
🔷 ठीक इसी तरह गुरु की कृपा वह नहीं है जो हम चाहते बल्कि गुरु-कृपा तो वह है जो गुरुदेव चाहते हैं।
🔷 आप चाहें तो वहां रात को रुक सकते हैं, लेकिन सुबह होते ही आपको जाना होगा। " वह संत अपने शिष्य के साथ तलघर में ठहर गए। वहां के कठोर फर्श पर वे सोने की तैयारी कर रहे थे कि तभी संत को दीवार में एक दरार नजर आई।
🔶 संत उस दरार के पास पहुंचे और कुछ सोचकर उसे भरने में जुट गए। शिष्य के कारण पूछने पर संत ने कहा-"चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं। " अगली रात वे दोनों एक गरीब किसान के घर आसरा मांगने पहुंचे।
🔷 किसान और उसकी पत्नी ने प्रेमपूर्वक उनका स्वागत किया। उनके पास जो कुछ रूखा-सूखा था, वह उन्होंने उन दोनों के साथ बांटकर खाया और फिर उन्हें सोने के लिए अपना बिस्तर दे दिया। किसान और उसकी पत्नी नीचे फर्श पर सो गए।
🔶 सवेरा होने पर संत व उनके शिष्य ने देखा कि किसान और उसकी पत्नी रो रहे थे क्योंकि उनका बैल खेत में मरा पड़ा था। यह देखकर शिष्य ने संत से कहा- 'गुरुदेव, आपके पास तो कई सिद्धियां हैं, फिर आपने यह क्यों होने दिया?
🔷 उस धनिक के पास सब कुछ था, फिर भी आपने उसके तलघर की मरम्मत करके उसकी मदद की, जबकि इस गरीब ने कुछ ना होने के बाद भी हमें इतना सम्मान दिया फिर भी आपने उसके बैल को मरने दिया।
🔶 " संत फिर बोले-'चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं। " उन्होंने आगे कहा- 'उस धनिक के तलघर में दरार से मैंने यह देखा कि उस दीवार के पीछे स्वर्ण का भंडार था।
🔷 चूंकि उस घर का मालिक बेहद लोभी और कृपण था, इसलिए मैंने उस दरार को बंद कर दिया, ताकि स्वर्ण भंडार उसके हाथ ना लगे। इस किसान के घर में हम इसके बिस्तर पर सोए थे। रात्रि में इस किसान की पत्नी की मौत लिखी थी और जब यमदूत उसके प्राण हरने आए तो मैंने रोक दिया।
🔶 चूंकि वे खाली हाथ नहीं जा सकते थे, इसलिए मैंने उनसे किसान के बैल के प्राण ले जाने के लिए कहा। यह सुनकर शिष्य संत के समक्ष नतमस्तक हो गया।
🔷 ठीक इसी तरह गुरु की कृपा वह नहीं है जो हम चाहते बल्कि गुरु-कृपा तो वह है जो गुरुदेव चाहते हैं।
👉 Atma Sadhana
🔶 Musicians do not become expert in either vocal or instrumental music in a day. They have to make a persistent effort. In the absence of practice, the voice of a vocalist sounds erratic and jarring and the fingers of an instrumentalist lack coordination. A true artist remains indifferent both to the reaction of the audience and to the remuneration paid to him. He feels contented with the joy derived from his daily sadhana of music.
🔷 A true devotee of art would maintain his inner peace even if he does not get any immediate and tangible reward or recognition for his art. He would continue to do his sadhana of music without any lessening of interest, even though he may have to dwell in a hut in a remote forest. The mental make up of a person practicing Atma sadhana should have at least this much dedication and commitment. Dancers, actors, sculptors, etc. know the importance of daily practice to maintain their art. Soldiers participate compulsorily in routine parades to maintain their skills of marksmanship and fighting.
📖 From Akhand Jyoti Jan 2001
🔷 A true devotee of art would maintain his inner peace even if he does not get any immediate and tangible reward or recognition for his art. He would continue to do his sadhana of music without any lessening of interest, even though he may have to dwell in a hut in a remote forest. The mental make up of a person practicing Atma sadhana should have at least this much dedication and commitment. Dancers, actors, sculptors, etc. know the importance of daily practice to maintain their art. Soldiers participate compulsorily in routine parades to maintain their skills of marksmanship and fighting.
📖 From Akhand Jyoti Jan 2001
👉 जीवन में विकास कीजिए:-
🔶 आपका शरीर प्रतिदिन विकसित हो रहा है। प्रत्येक दिन शरीर में नए रक्त, मज्जा, तन्तुओं का विकास हो रहा है पर खेद है कि शारीरिक अनुपात में मानसिक और आध्यात्मिक विकास नहीं हो रहा। आपका शरीर बड़ा होता जा रहा है किन्तु मन बच्चों जैसा अविकसित ही पड़ा है। उसमें उन तत्वों का विकास नहीं हुआ, जिनसे मनुष्य पूर्णता प्राप्त करता है।
🔷 मन विकसित हुआ या नहीं, यह जानने के लिए निम्न प्रश्नों का उत्तर दीजिए:-
🔶 1. क्या आप आत्मनिर्भर हैं, या हीनता के भाव को, लोगों से बात करते या व्यवहार करते हुए अनुभव करते हैं?
🔷 2. मन की शान्ति या उत्साह के लिए आप दूसरों के विचारों और मन्तव्यों पर कहाँ तक निर्भर रहते हैं? दूसरों के कुत्सित संकेत क्या आपको पस्त हिम्मत कर देते हैं या आप बिना उनकी परवाह किए अविचल भाव से अपने कर्तव्य-पथ या निर्दिष्ट मार्ग पर आरुढ़ हैं?
🔶 3. क्या आप मिथ्या घमंड, अहंकार या दूसरों की तारीफ के आदी बन गये हैं? बच्चे प्रायः जरा सी तारीफ से प्रसन्न हो उठते हैं, तनिक सी कठोर बात से विक्षुब्ध हो उठते हैं। क्या आप भी अपने को इसी श्रेणी में रक्खे हुए है? क्या दूसरों की झूठी तारीफ का जादू आप पर चलता है? यदि चलता है तो आप अभी अविकसित ही हैं।
🔷 4. क्या आप अपनी पोशाक की बहुत देखभाल रखते हैं? बाहर से शृंगार बनाकर अंदर का खोखलापन छिपाना चाहते हैं? क्या आपको आभूषणों, फेस पाउडर, रोज हजामत, टीप-टाप का शौक अभी तक बना हुआ है? क्या आप बच्चों की तरह अब भी चटकीले, रंग बिरंगे वस्त्र पहनने के आदी हैं?
🔶 5. जिह्वा के स्वाद में, स्वादिष्ट मिष्ठान्न और मेवे पकवान चाट पकौड़ी बीड़ी पान क्या इनमें आपको रुचि है? यदि हाँ, तो आप अभी रुचि में परिष्कार नहीं हुआ है। परिपक्वता और विकास इस दिशा में नहीं हुए हैं।
🔷 ऊपर लिखे हुए प्रश्नों पर विचार कीजिए। इनसे आपको अपने रुचि परिष्कार एवं विकास का कुछ ज्ञान होगा।
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 13
🔷 मन विकसित हुआ या नहीं, यह जानने के लिए निम्न प्रश्नों का उत्तर दीजिए:-
🔶 1. क्या आप आत्मनिर्भर हैं, या हीनता के भाव को, लोगों से बात करते या व्यवहार करते हुए अनुभव करते हैं?
🔷 2. मन की शान्ति या उत्साह के लिए आप दूसरों के विचारों और मन्तव्यों पर कहाँ तक निर्भर रहते हैं? दूसरों के कुत्सित संकेत क्या आपको पस्त हिम्मत कर देते हैं या आप बिना उनकी परवाह किए अविचल भाव से अपने कर्तव्य-पथ या निर्दिष्ट मार्ग पर आरुढ़ हैं?
🔶 3. क्या आप मिथ्या घमंड, अहंकार या दूसरों की तारीफ के आदी बन गये हैं? बच्चे प्रायः जरा सी तारीफ से प्रसन्न हो उठते हैं, तनिक सी कठोर बात से विक्षुब्ध हो उठते हैं। क्या आप भी अपने को इसी श्रेणी में रक्खे हुए है? क्या दूसरों की झूठी तारीफ का जादू आप पर चलता है? यदि चलता है तो आप अभी अविकसित ही हैं।
🔷 4. क्या आप अपनी पोशाक की बहुत देखभाल रखते हैं? बाहर से शृंगार बनाकर अंदर का खोखलापन छिपाना चाहते हैं? क्या आपको आभूषणों, फेस पाउडर, रोज हजामत, टीप-टाप का शौक अभी तक बना हुआ है? क्या आप बच्चों की तरह अब भी चटकीले, रंग बिरंगे वस्त्र पहनने के आदी हैं?
🔶 5. जिह्वा के स्वाद में, स्वादिष्ट मिष्ठान्न और मेवे पकवान चाट पकौड़ी बीड़ी पान क्या इनमें आपको रुचि है? यदि हाँ, तो आप अभी रुचि में परिष्कार नहीं हुआ है। परिपक्वता और विकास इस दिशा में नहीं हुए हैं।
🔷 ऊपर लिखे हुए प्रश्नों पर विचार कीजिए। इनसे आपको अपने रुचि परिष्कार एवं विकास का कुछ ज्ञान होगा।
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 13
👉 Yajna – The Root of Vedic Culture (Part 4)
🔶 The parjanya generated by Yajna augments the level of prana in the air. This effect is dense around the Yajnasala (the area where is Yajna performed) but is also prevalent in the wider space and continues to expand with the flow of air with the process of Yajna. If we pour some oil drops in a pot containing water, the oil separates itself from water and spreads on the surface of water. In a similar way, the energy of Yajna expands all around in the open space. Its prana, its essence, its energy, is also present in the water contained in the clouds.
🔷 This is showered in the form of rain and thus gets absorbed in the soil, crops and vegetation. The soil irrigated by it is found to be more fertile and the grains, fruits and vegetables grown there are tastier and have higher nutrition. The milk of the cows, which graze the grass grown on such lands, is also of excellent quality. Drinking the milk and eating the fruits and vegetables energized by Yajna increases our stamina, resistance against infections and diseases, and mental astuteness.
🔶 In fact the cosmic flow of prana is omnipresent in the subliminal realms of Nature. It enables all activities, movements and evolution of living beings. All creatures possess prana and therefore they are called prani. Prana is the source of our vital strength. If it were present in substantial amount in the body, a visibly lean and skinny person would be very strong and healthy (e.g. Mahatma Gandhi).
🔷 Its elevated levels are expressed in mental radiance, intellectual sharpness and talents. Its reduction on the contrary would turn a physically robust person rather weak, lethargic and dull. Reduction of this subtle energy in plants and trees would diminish the shining beauty of flowers, and nutrient quality of fruits, vegetables and grains. Decreased levels of prana in the air, despite the presence of substantial amounts of oxygen, would lessen its vitality. Even deep breathing of this otherwise ‘fresh’ air would not have the desired healthy effects. People living at such places are found to lack vital strength, immunity and mental sharpness. The parjanya extracted by Yajna compensates for these deficiencies.
🔷 This is showered in the form of rain and thus gets absorbed in the soil, crops and vegetation. The soil irrigated by it is found to be more fertile and the grains, fruits and vegetables grown there are tastier and have higher nutrition. The milk of the cows, which graze the grass grown on such lands, is also of excellent quality. Drinking the milk and eating the fruits and vegetables energized by Yajna increases our stamina, resistance against infections and diseases, and mental astuteness.
🔶 In fact the cosmic flow of prana is omnipresent in the subliminal realms of Nature. It enables all activities, movements and evolution of living beings. All creatures possess prana and therefore they are called prani. Prana is the source of our vital strength. If it were present in substantial amount in the body, a visibly lean and skinny person would be very strong and healthy (e.g. Mahatma Gandhi).
🔷 Its elevated levels are expressed in mental radiance, intellectual sharpness and talents. Its reduction on the contrary would turn a physically robust person rather weak, lethargic and dull. Reduction of this subtle energy in plants and trees would diminish the shining beauty of flowers, and nutrient quality of fruits, vegetables and grains. Decreased levels of prana in the air, despite the presence of substantial amounts of oxygen, would lessen its vitality. Even deep breathing of this otherwise ‘fresh’ air would not have the desired healthy effects. People living at such places are found to lack vital strength, immunity and mental sharpness. The parjanya extracted by Yajna compensates for these deficiencies.
📖 From Akhand Jyoti Jan 2001
👉 गुरुगीता (भाग 98)
👉 गुरूकृपा गृहस्थ को भी विदेह बना देती है
🔶 गुरूगीता के महामंत्रों में साधक, साधना एवं सिद्धि तीनों का तत्त्वबोध पिरोया है। इन मंत्रों में बार- बार चेताया गया है कि शिष्य- साधक क्या करें? किसी मंत्र को दुहराने वाले अथवा ध्यान के लिए गुम- सुुम बैठे रहने वाले को न तो शिष्य कहते हैं और साधक। शिष्य और साधक तो किसी की समूची जीवनचर्या, जीवनशैली और जीवन दृष्टि का नाम है। यह सत्य जहाँ है, वहीं शिष्यत्व है। अपने कान में मंत्र सुनने वाले को शिष्य नहीं कहते। दीक्षा के कर्मकाण्ड भर से किसी को शिष्यत्व उपलब्ध नहीं होता। यह उपलब्धि तो बलिदानी भावना एवं समर्पण की सतत साधना से हुआ करती है, जिसके अन्तःकरण में यह घटना घट चुकी है अथवा घटित हो रही है- समझो वही शिष्यत्व का उदय हो रहा है। वहीं पर एक साधक का व्यक्तित्व अपना आकार पा रहा है।
🔷 यही स्थिति साधना की है। साधना मन अन्तःकरण एवं जीवन के परिष्कार का नाम है, फिर वह चाहे कैसे भी हो। चाहे इसके लिये कोई मंत्र जपना पड़े या फिर किसी सेवाकर्म में लगना पड़े। किस मंत्र का जप करना साधना है? अथवा ध्यान की किस प्रक्रिया को करना साधना है? ये सभी सवाल अर्थहीन हैं। सब सही है कि अपने सद्गुरू उपदेश के अनुसार, उनके आदेश के अनुसार जीवन जीने की साधना कहते हैं। फिर वह चाहे कितना ही अटपटा क्यों न हो। देवर्षि नारद के उपदेश से मरा- मरा जपने वाले क्रूरकर्मा रत्नाकर महर्षि वाल्मिकी ही गये। गुरू के आदेश के अनुसार जीवन जीने की परिणति उनके जीवन में साधना की चरम सफलता के रूप में साकार हुई।
🔶 इसी तरह से सिद्धि व्यक्तित्व की विराट् में विलीनता है। अहंता का, वैभव का अपने सद्गुरू में विसर्जन है। व्यक्तित्व की सर्वमयता ही साधक और उसकी साधना की चरम उपलब्धि है। जिसे यह स्थिति हासिल हो सकी- समझो उसी की साधना सफल हुई। उसी को सिद्धि ने दर्शन दिये। उसी को तत्त्वबोध प्राप्त हुआ, उसी को मुक्ति मिल सकी। गुरूगीता के पिछले क्रम में इसी रहस्य को भगवान् भोले नाथ ने माँ जगदम्बा को समझाया है। इसमें उन्होंने कहा था- हे महादेवि! कुण्डलिनी शक्ति पिण्ड है। हंस पद है, बिन्दु ही रूप है तथा निरञ्जन, निराकार रूपातीत है ऐसा कहते हैं। जो पिण्ड से मुक्त हुआ और जो रूपातीत से मुक्त हुआ, उसी को मुक्त कहते हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 150
🔶 गुरूगीता के महामंत्रों में साधक, साधना एवं सिद्धि तीनों का तत्त्वबोध पिरोया है। इन मंत्रों में बार- बार चेताया गया है कि शिष्य- साधक क्या करें? किसी मंत्र को दुहराने वाले अथवा ध्यान के लिए गुम- सुुम बैठे रहने वाले को न तो शिष्य कहते हैं और साधक। शिष्य और साधक तो किसी की समूची जीवनचर्या, जीवनशैली और जीवन दृष्टि का नाम है। यह सत्य जहाँ है, वहीं शिष्यत्व है। अपने कान में मंत्र सुनने वाले को शिष्य नहीं कहते। दीक्षा के कर्मकाण्ड भर से किसी को शिष्यत्व उपलब्ध नहीं होता। यह उपलब्धि तो बलिदानी भावना एवं समर्पण की सतत साधना से हुआ करती है, जिसके अन्तःकरण में यह घटना घट चुकी है अथवा घटित हो रही है- समझो वही शिष्यत्व का उदय हो रहा है। वहीं पर एक साधक का व्यक्तित्व अपना आकार पा रहा है।
🔷 यही स्थिति साधना की है। साधना मन अन्तःकरण एवं जीवन के परिष्कार का नाम है, फिर वह चाहे कैसे भी हो। चाहे इसके लिये कोई मंत्र जपना पड़े या फिर किसी सेवाकर्म में लगना पड़े। किस मंत्र का जप करना साधना है? अथवा ध्यान की किस प्रक्रिया को करना साधना है? ये सभी सवाल अर्थहीन हैं। सब सही है कि अपने सद्गुरू उपदेश के अनुसार, उनके आदेश के अनुसार जीवन जीने की साधना कहते हैं। फिर वह चाहे कितना ही अटपटा क्यों न हो। देवर्षि नारद के उपदेश से मरा- मरा जपने वाले क्रूरकर्मा रत्नाकर महर्षि वाल्मिकी ही गये। गुरू के आदेश के अनुसार जीवन जीने की परिणति उनके जीवन में साधना की चरम सफलता के रूप में साकार हुई।
🔶 इसी तरह से सिद्धि व्यक्तित्व की विराट् में विलीनता है। अहंता का, वैभव का अपने सद्गुरू में विसर्जन है। व्यक्तित्व की सर्वमयता ही साधक और उसकी साधना की चरम उपलब्धि है। जिसे यह स्थिति हासिल हो सकी- समझो उसी की साधना सफल हुई। उसी को सिद्धि ने दर्शन दिये। उसी को तत्त्वबोध प्राप्त हुआ, उसी को मुक्ति मिल सकी। गुरूगीता के पिछले क्रम में इसी रहस्य को भगवान् भोले नाथ ने माँ जगदम्बा को समझाया है। इसमें उन्होंने कहा था- हे महादेवि! कुण्डलिनी शक्ति पिण्ड है। हंस पद है, बिन्दु ही रूप है तथा निरञ्जन, निराकार रूपातीत है ऐसा कहते हैं। जो पिण्ड से मुक्त हुआ और जो रूपातीत से मुक्त हुआ, उसी को मुक्त कहते हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 150
शनिवार, 28 अप्रैल 2018
👉 मान बड़ाई का परित्याग
🔷 स्वामी रामतीर्थ की विद्वत्ता तथा ओजस्वी वाणी से प्रभावित होकर अमेरिका की 18 युनिवर्सिटियों ने मिलकर उन्हें एल. एल. डी. की उपाधि देने का प्रस्ताव रखा। जिस उन्होंने सधन्यवाद अस्वीकार करते हुए कहा स्वामी और ‘एम. ए.’ ये दो कलंक पहले ही नाम के आगे पीछे लगे हुए है अब तीसरे कलंक को कहाँ रखूँगा?
🔶 यश कीर्ति, लोकेषणा, प्रतिष्ठा, प्रशंसा, पूजा, मान बड़ाई के फेर में पड़कर सत्ता और लोक सेवियों का अहंकार उभरता है। इसलिए सच्चे सत मान बड़ाई से सदा बचते रहते है।
🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961
🔶 यश कीर्ति, लोकेषणा, प्रतिष्ठा, प्रशंसा, पूजा, मान बड़ाई के फेर में पड़कर सत्ता और लोक सेवियों का अहंकार उभरता है। इसलिए सच्चे सत मान बड़ाई से सदा बचते रहते है।
🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961
👉 पक्का बनना कच्चा मत रहना
🔷 एक बार एक साधक ने अपने गुरुदेव से पुछा की गुरुदेव हम पक्के साधक कैसे बने! गुरुदेव ने शिष्य को एक कहानी सुनाई
🔶 एक नगर मे एक सेठ जी की हलवाई की दुकान थी वहाँ कई लोग काम करते थे! उस नगर मे हलवाई तो बहुत थे पर प्रतिस्पर्धा बहुत थी इसलिये जो भी सेठ के यहाँ नौकरी करता वो बड़ी सावधानी से चलता था की कही गलती हुई तो सेठ जी तत्काल नौकरी से बाहर कर देते!
🔷 एक बार हलवाई के साथ एक छोटा बालक दुकान पर आ गया हलवाई हलवा बना रहा था बालक आकर हलवाई से पूछे की हलवा बन गया हलवाई ने कहा ठहरो अभी, थोड़ी देर बाद बनेगा फिर थोड़ी देर बाद वो वापिस आया और पूछे की हलवा बन गया तो हलवाई ने कहा ठहरो अभी!
🔶 थोड़ी देर बाद फिर आकर पूछे हलवाई जी खुशबू तो आ रही है हलवा बन गया क्या? हलवाई को जब बार बार परेशान किया तो हलवाई ने कहा की खुशबू आ रही है तो ले खा! और उसे हलवा रखा पर उसने कहा की ये तो अच्छा नही लग रहा है हलवाई जी ने कहा अच्छा नही लग रहा है तो चुपचाप बैठ जाओ और थोड़ा इंतजार करो!
🔷 थोड़ी देर बाद हलवाई ने पुनः उसे हलवा रखा तो इस बार वो खुशी से उछल पड़ा अब बहुत अच्छा लगा! बालक ने हलवाई से पुछा की हलवाई जी अब ये अच्छा कैसे लगा? और पहले क्यों नही लगा?
🔶 तो हलवाई जी ने उसे बड़े प्यार से समझाया बेटा पहले ये कच्चा था इसलिये अच्छा नही लगा अब ये पक गया इसलिये अब ये अच्छा लग रहा है! फिर बालक ने पूछा की इसे आग से नीचे क्यों उतारा है? तो हलवाई ने उसे प्यार से समझाया बेटा अब ये पक गया इसलिये इसे नीचे उतार दिया गया!
🔷 इतने मे एक मजदूर ने आकर हलवाई जी से कहा की हलवाई जी आपने दुध को गरम नही किया इसलिये वो सारा दुध फट गया! और इतने मे सेठ जी आ गये और वो बड़ा नाराज हुये और चिल्लाने लगे उसे नौकरी से बाहर निकालने लगे पर हलवाई गिड़गिड़ाया सेठ जी आप जो चाहो वो सजा दे दो पर नौकरी से मत निकालो कल मेरी सगाई है यदि आपने नौकरी से बाहर निकाल दिया तो सगाई टूट जायेगी!
🔶 फिर सेठ जी ने दया तो की पर दंड के तौर पे एक महीने की पगार काट ली!
🔷 गुरुदेव ने अपने शिष्य को आगे समझाते हुये कहा की कच्चे दूध को गर्म नही करोगे तो फट जायेगा! हलवा कितना भी मीठा क्यों न हो उसमे कितना भी घी क्यों न हो पर यदि कच्चा है तो कोई मतलब नही! कच्ची सगाई कभी भी टूट सकती है, कच्ची नौकरी मे हमेशा एक तनाव रहता है की कभी भी बाहर हो सकते है!
🔶 अरे साधक बनो तो पक्का बनना कच्चा मत रहना और पक्का साधक बनने के लिये रोज साधना और सत्संग करना! हॆ वत्स साधक वही जो हर पल सावधान रहे! हे वत्स माया बड़ी ठगनी है जिस तरह से रोटी पकने के बाद आग से उतारी जाती है और जब वो पक जाती है तभी वो मूल्यवान है कच्ची रोटी नही खाई जा सकती है!
🔷 उसी तरह जब तक साधक आग पर न जल जायें अर्थात मृत्यु को प्राप्त न कर ले तब तक उसे हर क़दम पर सावधानी बरतनी पड़ती है! इसलिये सावधान वत्स सावधान साधक का पहला कर्तव्य की वो हर कदम पर सावधान होकर चले!
🔶 एक नगर मे एक सेठ जी की हलवाई की दुकान थी वहाँ कई लोग काम करते थे! उस नगर मे हलवाई तो बहुत थे पर प्रतिस्पर्धा बहुत थी इसलिये जो भी सेठ के यहाँ नौकरी करता वो बड़ी सावधानी से चलता था की कही गलती हुई तो सेठ जी तत्काल नौकरी से बाहर कर देते!
🔷 एक बार हलवाई के साथ एक छोटा बालक दुकान पर आ गया हलवाई हलवा बना रहा था बालक आकर हलवाई से पूछे की हलवा बन गया हलवाई ने कहा ठहरो अभी, थोड़ी देर बाद बनेगा फिर थोड़ी देर बाद वो वापिस आया और पूछे की हलवा बन गया तो हलवाई ने कहा ठहरो अभी!
🔶 थोड़ी देर बाद फिर आकर पूछे हलवाई जी खुशबू तो आ रही है हलवा बन गया क्या? हलवाई को जब बार बार परेशान किया तो हलवाई ने कहा की खुशबू आ रही है तो ले खा! और उसे हलवा रखा पर उसने कहा की ये तो अच्छा नही लग रहा है हलवाई जी ने कहा अच्छा नही लग रहा है तो चुपचाप बैठ जाओ और थोड़ा इंतजार करो!
🔷 थोड़ी देर बाद हलवाई ने पुनः उसे हलवा रखा तो इस बार वो खुशी से उछल पड़ा अब बहुत अच्छा लगा! बालक ने हलवाई से पुछा की हलवाई जी अब ये अच्छा कैसे लगा? और पहले क्यों नही लगा?
🔶 तो हलवाई जी ने उसे बड़े प्यार से समझाया बेटा पहले ये कच्चा था इसलिये अच्छा नही लगा अब ये पक गया इसलिये अब ये अच्छा लग रहा है! फिर बालक ने पूछा की इसे आग से नीचे क्यों उतारा है? तो हलवाई ने उसे प्यार से समझाया बेटा अब ये पक गया इसलिये इसे नीचे उतार दिया गया!
🔷 इतने मे एक मजदूर ने आकर हलवाई जी से कहा की हलवाई जी आपने दुध को गरम नही किया इसलिये वो सारा दुध फट गया! और इतने मे सेठ जी आ गये और वो बड़ा नाराज हुये और चिल्लाने लगे उसे नौकरी से बाहर निकालने लगे पर हलवाई गिड़गिड़ाया सेठ जी आप जो चाहो वो सजा दे दो पर नौकरी से मत निकालो कल मेरी सगाई है यदि आपने नौकरी से बाहर निकाल दिया तो सगाई टूट जायेगी!
🔶 फिर सेठ जी ने दया तो की पर दंड के तौर पे एक महीने की पगार काट ली!
🔷 गुरुदेव ने अपने शिष्य को आगे समझाते हुये कहा की कच्चे दूध को गर्म नही करोगे तो फट जायेगा! हलवा कितना भी मीठा क्यों न हो उसमे कितना भी घी क्यों न हो पर यदि कच्चा है तो कोई मतलब नही! कच्ची सगाई कभी भी टूट सकती है, कच्ची नौकरी मे हमेशा एक तनाव रहता है की कभी भी बाहर हो सकते है!
🔶 अरे साधक बनो तो पक्का बनना कच्चा मत रहना और पक्का साधक बनने के लिये रोज साधना और सत्संग करना! हॆ वत्स साधक वही जो हर पल सावधान रहे! हे वत्स माया बड़ी ठगनी है जिस तरह से रोटी पकने के बाद आग से उतारी जाती है और जब वो पक जाती है तभी वो मूल्यवान है कच्ची रोटी नही खाई जा सकती है!
🔷 उसी तरह जब तक साधक आग पर न जल जायें अर्थात मृत्यु को प्राप्त न कर ले तब तक उसे हर क़दम पर सावधानी बरतनी पड़ती है! इसलिये सावधान वत्स सावधान साधक का पहला कर्तव्य की वो हर कदम पर सावधान होकर चले!
👉 आपका जीवन किधर जा रहा है?
🔷 मानवी जगत् में आकर आपने क्या किया है? क्या कोई ऐसा कार्य किया है जिससे आपको मनः शान्ति का चरम सुख प्राप्त हो? क्या आपकी मनोवृत्ति सात्विक वस्तुओं पर एकाग्र होती है, या वह अब भी निंद्य एवं वासनामय पदार्थों की ओर मारी-मारी फिरती है? संसार में जिन दो स्थानों पर रह कर आपको आत्म विकास करना पड़ा, उन स्थानों पर रह कर क्या आपने कुशलता और चातुर्य का परिचय दिया है? क्या आप उस परिपक्वता में आ गये हैं कि आपकी राय दूसरे लेते हैं? निर्णय करते समय क्या भावावेश, या जल्दबाजी में आ जाते हैं, या ‘करूं या न करूं’ की स्थिति में पड़े रहते हैं? जीवन में क्या आपके कोई निश्चित या अनिश्चित उद्देश्य हैं? उस तक पहुँचने के लिए क्या आपने कुछ प्रयत्न किया है?
🔶 एक संतुलित और विवेकशील व्यक्ति के मन में इस प्रकार के अनेक प्रश्न आते हैं। वासना या क्षणिक आवेश से मुक्त होकर जब वह जीवन की जटिलताओं पर विचार करता है, तो उसे ज्ञान होता है कि वास्तव में अभी उसमें कुछ नहीं किया है। यों ही निरुद्देश्य जीवन-यात्रा चली जा रही है।
🔷 यह अनिश्चित प्रवृत्ति मानव की सबसे बड़ी निर्बलता है। मनुष्य अपने आपको बड़ा बुद्धिमान समझता है किन्तु वास्तव में उसके जीवन का 50 प्रतिशत जीवन यों ही आलस्य और बेकारी में नष्ट होता है।
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 13
🔶 एक संतुलित और विवेकशील व्यक्ति के मन में इस प्रकार के अनेक प्रश्न आते हैं। वासना या क्षणिक आवेश से मुक्त होकर जब वह जीवन की जटिलताओं पर विचार करता है, तो उसे ज्ञान होता है कि वास्तव में अभी उसमें कुछ नहीं किया है। यों ही निरुद्देश्य जीवन-यात्रा चली जा रही है।
🔷 यह अनिश्चित प्रवृत्ति मानव की सबसे बड़ी निर्बलता है। मनुष्य अपने आपको बड़ा बुद्धिमान समझता है किन्तु वास्तव में उसके जीवन का 50 प्रतिशत जीवन यों ही आलस्य और बेकारी में नष्ट होता है।
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 13
👉 Yajna – The Root of Vedic Culture (Part 3)
🔷 Scientific aspects of Yajna
The four Vedas signify the philosophy of the eternity and absolute compatibility of Gayatri and Yajna in the divine creations. Further, the Atharvaveda also deals with the sound therapy aspects of the mantras. They can be used for the treatment of the ailing human system at the physical, psychological and spiritual levels. The Samaveda focuses on the musical chanting patterns of the mantras and the subtle form of Yajna by defining the latter as the process of mental oblation on the surface of internal emotions through the cosmic radiations of the omnipresent subtle energy of sound. The Yajurveda contains the knowledge of the principles and the methods of performing Yajnas as a part of the spiritual and scientific experiments for global welfare.
🔶 The effects of Yajna include treatment of various diseases and the removal of atmospheric pollution (discussed in detail in the coming issues). Another prominent effect is parjanya.
🔷 Parjanya implies sublime showers of vital energy and spiritual strength from the cosmic layers (higher space). As the natural fertilizers add to the fertility of soil, the unique confluence of the power of mantra, thermal force and sublimated herbal energy in Yajna increases the vital energy (prana) in the atmosphere while purifying the air. This prana is inherent in the air. The sadhaka, having prepared himself through pranayama is able to inhale this parjanya along with oxygen through inner determination (sankalpa). The flow of fresh air in the morning is found be rich in pr³ña. The larger the scale of Yajnas and the longer their duration, the greater would be these effects.
📖 From Akhand Jyoti Jan 2001
The four Vedas signify the philosophy of the eternity and absolute compatibility of Gayatri and Yajna in the divine creations. Further, the Atharvaveda also deals with the sound therapy aspects of the mantras. They can be used for the treatment of the ailing human system at the physical, psychological and spiritual levels. The Samaveda focuses on the musical chanting patterns of the mantras and the subtle form of Yajna by defining the latter as the process of mental oblation on the surface of internal emotions through the cosmic radiations of the omnipresent subtle energy of sound. The Yajurveda contains the knowledge of the principles and the methods of performing Yajnas as a part of the spiritual and scientific experiments for global welfare.
🔶 The effects of Yajna include treatment of various diseases and the removal of atmospheric pollution (discussed in detail in the coming issues). Another prominent effect is parjanya.
🔷 Parjanya implies sublime showers of vital energy and spiritual strength from the cosmic layers (higher space). As the natural fertilizers add to the fertility of soil, the unique confluence of the power of mantra, thermal force and sublimated herbal energy in Yajna increases the vital energy (prana) in the atmosphere while purifying the air. This prana is inherent in the air. The sadhaka, having prepared himself through pranayama is able to inhale this parjanya along with oxygen through inner determination (sankalpa). The flow of fresh air in the morning is found be rich in pr³ña. The larger the scale of Yajnas and the longer their duration, the greater would be these effects.
📖 From Akhand Jyoti Jan 2001
👉 गुरुगीता (भाग 98)
👉 सद्गुरू की कृपा से ही मिलती है मुक्ति
🔷 कुण्डलिनी के जागृत होते ही कीचड़ धुलने लगती है, कुसंस्कारों की काई छटने लगती है और तब उसे अनुभव होता है कि देह से परे भी उसकी सत्ता है। इस तरह ऐसा साधक कुण्डलिनी के जागरण एवं ऊर्घ्वगमन के साथ ही पिण्ड से मुक्त हो जाता है; परन्तु यह मुक्ति का पहला चरण है। इसके आगे की यात्रा तब सम्भव होती है, जब वह पद को पहचानता है। प्राण रूप हंस की सूक्ष्मताओं एवं विचित्रताओं से परिचित होता है। देह में जितने बन्धन है, वे सब के सब स्थूल हैं, परन्तु प्राण की प्रकृति देह की तुलना में सूक्ष्म है। इस प्राण को भलीभाँति जान लेने पर, इसे अपनी साधना से स्थिर कर लेने पर उसे पद मुक्ति के रूप में मुक्ति के दूसरे चरण का अनुभव होता है।
🔶 इस अवस्था में पहुँचे हुए योगी को वासनाएँ नहीं सताती, कुसंस्कारों की कीचड़ उसे कलुषित नहीं करती। वह भय से सर्वथा मुक्त हो जाता है। परन्तु यहीं से उसके जीवन में ऋद्धियों का, सिद्धियों का सिलसिला प्रारम्भ होता है। परिष्कृत प्राण एवं पारदर्शी मन उसमें अनेक अलौकिक विभूतियों को जन्म देते हैं। हालाँकि इसमें स्थूल जैसा कुछ भी नहीं होता। परन्तु इनके प्रयोग एवं परिणाम से सूक्ष्म अभिमान तो जगता ही है। इनसे छुटकारा इतना आसान नहीं है। यह तो योग साधक को परिष्कृत प्राण एवं पारदर्शी मन उसमें अनेक अलौकिक विभूतियों को जन्म देते हैं। हालाँकि इसमें स्थूल जैसा कुछ भी नहीं होता। परन्तु इनके प्रयोग एवं परिणाम से सूक्ष्म अभिमान तो जगता ही है। इनसे छुटकारा इतना आसान नहीं है। यह तो योग साधक को के वल आत्म साक्षात्कार के बाद ही उपलब्ध होता है।
🔷 किन्तु यह तभी होता है, जब इसे बिन्दु रूप आत्मज्योति का दर्शन हो। यह दर्शन ही आत्म साक्षात्कार है। जो योग साधक इस आत्मरूप का साक्षात्कार करता है, वही मुक्ति के अगले चरण यानि कि रूप मुक्ति का आनन्द उठा सकता है। योग साधक की यह अवस्था पूर्णतः द्वन्द्वातीत होती है। न यहाँ सुख होता है और न दुःख। किसी तरह के सांसारिक- लौकिक कष्ट उसे कोई पीड़ा नहीं देते। गुण गुणों में बसते हैं, इस सत्य का अनुभव उसे इसी अवस्था में होता है। उपनिषदों में इसी को अंगुष्ठ मात्र आत्मज्योति का साक्षात्कार कहा गया है। इस ज्योति के दर्शन मात्र से योग साधक को स्वयं का ज्ञान एवं आत्मरूप में स्थिति की प्राप्ति हो जाती है। इस अवस्था का सच एक ऐसा सच है, जिसे अवुभवी ही जानते हैं। वही इसका सुख एवं आनन्द भोगते हैं।
🔶 मुक्ति की यह अवस्था पाने के बाद भी भेद बना रहता है। जीव सत्ता एवं परमात्म सत्ता के बीच पारदर्शी दीवार बनी रहती है। कुछ वैसा ही, जैसा कि लैम्प की ज्योति एवं देखने वाले के बीच शीशा आ खड़ा होता है। देखने वाला ज्योति को देखता है, परन्तु इसे छू नहीं सकता, इसमें समा नहीं सकता। कुछ इसी तरह आत्मज्योति में स्थिर हो जाने के बाद जीव सत्ता को परमात्मा की अनुभूति तो होने लगती है, परन्तु भेद करने वाली पारदर्शी दीवार नहीं ढहती। यह अवस्था आनन्ददायक होते हुए भी बड़ी पीड़ादायक एवं तड़पाने वाली है।
🔷 अनुभवी जनों को ही इसका अनुभव होता है। इस पारदर्शी दीवार को भेदना किसी साधनात्मक पुरूषार्थ से सम्भव नहीं है। कोई भी योग साधना, किसी तरह की तकनीक से यह कार्य नहीं हो सकता। इसके लिए तो बस भक्त की पुकार और भगवान् की कृपा का मेल चाहिए। शिष्य की तड़पन एवं सद्गुरु की कृपा से ही यह दीवार ढहती है- गिरती है। बड़ी कठिन एवं मार्मिक बात है यह ।। जो यहाँ लिखा और कहा जा रहा है, उसे पता नहीं कौन किस तरह से समझ सकेगा। पर यही सच है, यही सच है। जिसे अपने गुरू की यह कृपा मिल जाती है, उसी को रूपातीत निरूपित हो जाता है। यही सम्पूर्ण मुक्ति है। सद्गुरू की अपने शिष्य पर अनूठी कृपा है। इस कृपा को पाने वाला कौन होता है? इसे भगवान् सदाशिव अगले क्रम में बताते हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 148
🔷 कुण्डलिनी के जागृत होते ही कीचड़ धुलने लगती है, कुसंस्कारों की काई छटने लगती है और तब उसे अनुभव होता है कि देह से परे भी उसकी सत्ता है। इस तरह ऐसा साधक कुण्डलिनी के जागरण एवं ऊर्घ्वगमन के साथ ही पिण्ड से मुक्त हो जाता है; परन्तु यह मुक्ति का पहला चरण है। इसके आगे की यात्रा तब सम्भव होती है, जब वह पद को पहचानता है। प्राण रूप हंस की सूक्ष्मताओं एवं विचित्रताओं से परिचित होता है। देह में जितने बन्धन है, वे सब के सब स्थूल हैं, परन्तु प्राण की प्रकृति देह की तुलना में सूक्ष्म है। इस प्राण को भलीभाँति जान लेने पर, इसे अपनी साधना से स्थिर कर लेने पर उसे पद मुक्ति के रूप में मुक्ति के दूसरे चरण का अनुभव होता है।
🔶 इस अवस्था में पहुँचे हुए योगी को वासनाएँ नहीं सताती, कुसंस्कारों की कीचड़ उसे कलुषित नहीं करती। वह भय से सर्वथा मुक्त हो जाता है। परन्तु यहीं से उसके जीवन में ऋद्धियों का, सिद्धियों का सिलसिला प्रारम्भ होता है। परिष्कृत प्राण एवं पारदर्शी मन उसमें अनेक अलौकिक विभूतियों को जन्म देते हैं। हालाँकि इसमें स्थूल जैसा कुछ भी नहीं होता। परन्तु इनके प्रयोग एवं परिणाम से सूक्ष्म अभिमान तो जगता ही है। इनसे छुटकारा इतना आसान नहीं है। यह तो योग साधक को परिष्कृत प्राण एवं पारदर्शी मन उसमें अनेक अलौकिक विभूतियों को जन्म देते हैं। हालाँकि इसमें स्थूल जैसा कुछ भी नहीं होता। परन्तु इनके प्रयोग एवं परिणाम से सूक्ष्म अभिमान तो जगता ही है। इनसे छुटकारा इतना आसान नहीं है। यह तो योग साधक को के वल आत्म साक्षात्कार के बाद ही उपलब्ध होता है।
🔷 किन्तु यह तभी होता है, जब इसे बिन्दु रूप आत्मज्योति का दर्शन हो। यह दर्शन ही आत्म साक्षात्कार है। जो योग साधक इस आत्मरूप का साक्षात्कार करता है, वही मुक्ति के अगले चरण यानि कि रूप मुक्ति का आनन्द उठा सकता है। योग साधक की यह अवस्था पूर्णतः द्वन्द्वातीत होती है। न यहाँ सुख होता है और न दुःख। किसी तरह के सांसारिक- लौकिक कष्ट उसे कोई पीड़ा नहीं देते। गुण गुणों में बसते हैं, इस सत्य का अनुभव उसे इसी अवस्था में होता है। उपनिषदों में इसी को अंगुष्ठ मात्र आत्मज्योति का साक्षात्कार कहा गया है। इस ज्योति के दर्शन मात्र से योग साधक को स्वयं का ज्ञान एवं आत्मरूप में स्थिति की प्राप्ति हो जाती है। इस अवस्था का सच एक ऐसा सच है, जिसे अवुभवी ही जानते हैं। वही इसका सुख एवं आनन्द भोगते हैं।
🔶 मुक्ति की यह अवस्था पाने के बाद भी भेद बना रहता है। जीव सत्ता एवं परमात्म सत्ता के बीच पारदर्शी दीवार बनी रहती है। कुछ वैसा ही, जैसा कि लैम्प की ज्योति एवं देखने वाले के बीच शीशा आ खड़ा होता है। देखने वाला ज्योति को देखता है, परन्तु इसे छू नहीं सकता, इसमें समा नहीं सकता। कुछ इसी तरह आत्मज्योति में स्थिर हो जाने के बाद जीव सत्ता को परमात्मा की अनुभूति तो होने लगती है, परन्तु भेद करने वाली पारदर्शी दीवार नहीं ढहती। यह अवस्था आनन्ददायक होते हुए भी बड़ी पीड़ादायक एवं तड़पाने वाली है।
🔷 अनुभवी जनों को ही इसका अनुभव होता है। इस पारदर्शी दीवार को भेदना किसी साधनात्मक पुरूषार्थ से सम्भव नहीं है। कोई भी योग साधना, किसी तरह की तकनीक से यह कार्य नहीं हो सकता। इसके लिए तो बस भक्त की पुकार और भगवान् की कृपा का मेल चाहिए। शिष्य की तड़पन एवं सद्गुरु की कृपा से ही यह दीवार ढहती है- गिरती है। बड़ी कठिन एवं मार्मिक बात है यह ।। जो यहाँ लिखा और कहा जा रहा है, उसे पता नहीं कौन किस तरह से समझ सकेगा। पर यही सच है, यही सच है। जिसे अपने गुरू की यह कृपा मिल जाती है, उसी को रूपातीत निरूपित हो जाता है। यही सम्पूर्ण मुक्ति है। सद्गुरू की अपने शिष्य पर अनूठी कृपा है। इस कृपा को पाने वाला कौन होता है? इसे भगवान् सदाशिव अगले क्रम में बताते हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 148
👉 जीवन का एक रहस्य.....
🔶 एक औरत बहुत महँगे कपड़ो में अपने मनोचिकित्सक के पास जाती है और उसे कहती है कि उसे लगता है कि उसका पूरा जीवन बेकार है, उसका कोई अर्थ नहीं है। वे उसकी खुशियाँ ढूँढने में मदद करें।
🔷 मनोचिकित्सक ने एक बूढ़ी औरत को बुलाया जो वहाँ साफ़-सफाई का काम करती थी और उस अमीर औरत से बोला - "मैं मैरी से तुम्हें यह बताने के लिए कहूँगा कि कैसे उसने अपने जीवन में खुशियाँ ढूँढी। मैं चाहता हूँ कि आप उसे ध्यान से सुनें।"
🔶 तब उस बूढ़ी औरत ने अपना झाड़ू नीचे रखा, कुर्सी पर बैठ गई और बताने लगी - "मेरे पति की मलेरिया से मृत्यु हो गई और उसके 3 महीने बाद ही मेरे बेटे की भी सड़क हादसेमें मौत हो गई। मेरे पास कोई नहीं था। मेरे जीवन में कुछ नहीं बचा था। मैं सो नहीं पाती थी, खा नहीं पाती थी, मैंने मुस्कुराना बंद कर दिया था।
🔷 मैं खुद का जीवन लेने की तरकीबें सोचने लगी थी। तब एक दिन, एक छोटा बिल्ली का बच्चा मेरे पीछे लग गया जब मैं काम से घर आ रही थी। बाहर बहुत ठंड थी इसलिए मैंने उस बच्चे को अंदर आने दिया। उस बिल्ली के बच्चे के लिए थोड़े से दूध का इंतजाम किया और वह सारी प्लेट सफाचट कर गया। फिर वह मेरे पैरों से लिपट गया और चाटने लगा।
🔶 उस दिन बहुत महीनों बाद मैं मुस्कुराई । तब मैंने सोचा अगर इस बिल्ली के बच्चे की सहायता करना मुझे ख़ुशी दे सकता है, तो हो सकता है दूसरों के लिए कुछ करके मुझे और भी ख़ुशी मिले। इसलिए अगले दिन मैं अपने पड़ोसी, जो कि बीमार था, उसके लिए कुछ बिस्किट्स बना कर ले गई।
🔷 हर दिन मैं कुछ नया और कुछ ऐसा करती थी जिससे दूसरों को ख़ुशी मिले और उन्हें खुश देख कर मुझे ख़ुशी मिलती थी। आज, मैं किसी को नहीं जानती जो मुझसे बेहतर खाता-पीता हो और चैन से सोता हो। मैंने खुशियाँ ढूँढी हैं, दूसरों को ख़ुशी देकर।
🔶 यह सब सुन कर वह अमीर औरत रोने लगी। उसके पास वह सब था जो वह पैसे से खरीद सकती थी पर उसने वह चीज खो दी थी जो पैसे से नहीं खरीदी जा सकती। हमारा जीवन इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने खुश हैं अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी वजह से कितने लोग खुश हैं।
ख़ुशी मंजिल नहीं, यात्रा है..,वह कल नहीं, आज है..
निर्भरता नहीं, निर्णय है..,यह नहीं कि हम कौन है,
अपितु हमारे पास क्या है
🔷 मनोचिकित्सक ने एक बूढ़ी औरत को बुलाया जो वहाँ साफ़-सफाई का काम करती थी और उस अमीर औरत से बोला - "मैं मैरी से तुम्हें यह बताने के लिए कहूँगा कि कैसे उसने अपने जीवन में खुशियाँ ढूँढी। मैं चाहता हूँ कि आप उसे ध्यान से सुनें।"
🔶 तब उस बूढ़ी औरत ने अपना झाड़ू नीचे रखा, कुर्सी पर बैठ गई और बताने लगी - "मेरे पति की मलेरिया से मृत्यु हो गई और उसके 3 महीने बाद ही मेरे बेटे की भी सड़क हादसेमें मौत हो गई। मेरे पास कोई नहीं था। मेरे जीवन में कुछ नहीं बचा था। मैं सो नहीं पाती थी, खा नहीं पाती थी, मैंने मुस्कुराना बंद कर दिया था।
🔷 मैं खुद का जीवन लेने की तरकीबें सोचने लगी थी। तब एक दिन, एक छोटा बिल्ली का बच्चा मेरे पीछे लग गया जब मैं काम से घर आ रही थी। बाहर बहुत ठंड थी इसलिए मैंने उस बच्चे को अंदर आने दिया। उस बिल्ली के बच्चे के लिए थोड़े से दूध का इंतजाम किया और वह सारी प्लेट सफाचट कर गया। फिर वह मेरे पैरों से लिपट गया और चाटने लगा।
🔶 उस दिन बहुत महीनों बाद मैं मुस्कुराई । तब मैंने सोचा अगर इस बिल्ली के बच्चे की सहायता करना मुझे ख़ुशी दे सकता है, तो हो सकता है दूसरों के लिए कुछ करके मुझे और भी ख़ुशी मिले। इसलिए अगले दिन मैं अपने पड़ोसी, जो कि बीमार था, उसके लिए कुछ बिस्किट्स बना कर ले गई।
🔷 हर दिन मैं कुछ नया और कुछ ऐसा करती थी जिससे दूसरों को ख़ुशी मिले और उन्हें खुश देख कर मुझे ख़ुशी मिलती थी। आज, मैं किसी को नहीं जानती जो मुझसे बेहतर खाता-पीता हो और चैन से सोता हो। मैंने खुशियाँ ढूँढी हैं, दूसरों को ख़ुशी देकर।
🔶 यह सब सुन कर वह अमीर औरत रोने लगी। उसके पास वह सब था जो वह पैसे से खरीद सकती थी पर उसने वह चीज खो दी थी जो पैसे से नहीं खरीदी जा सकती। हमारा जीवन इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने खुश हैं अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी वजह से कितने लोग खुश हैं।
ख़ुशी मंजिल नहीं, यात्रा है..,वह कल नहीं, आज है..
निर्भरता नहीं, निर्णय है..,यह नहीं कि हम कौन है,
अपितु हमारे पास क्या है
👉 Yajna – The Root of Vedic Culture (Part 2)
🔶 The brilliance and purity of agni (fire) appears to be a universal symbol for worship. The rituals of different religions affirm this fact. The first mantra of Rigaveda – the most ancient scripture of knowledge on Earth, quotes “agnimide purohitam”, signifying agni as a sacred idol of God. This is what is referred to in different religious and spiritual scriptures as Brahmateja, Divine Flame, Sacred Glow, Divine Light, Latent Light, etc. The Vedic hymn “agne supatha raye” prays to this omnipotent, supreme power to enlighten and ennoble us towards the righteous path. The same is inspired in the phrase “dhiyo yonah pracodayat” of the great Gayatri Mantra.
Meaning of Yajna
🔷 In its gross form, Yajna is a spiritual experiment of sacrificing and sublimating the havana samagri (herbal preparations) in the fire accompanied by the chanting of Vedic mantras. This is only the physical process or ritual of Yajna, which has scientific importance and beneficial effects. This agni-Yajna when performed on a small scale is also known as havan, homam or agnihotra.
🔶 The meaning of Yajna is not confined to this sacrificial fire process. It has a much wider and deeper meaning. The word Yajna is derived from the Sanskrit verb yaj, which has a three-fold meaning: worship of deities (devapujana), unity (sangatikarana) and charity (dana). The philosophy of Yajna teaches a way of living in the society in harmony and a lifestyle which promotes and protects higher human values in the society, which is indeed the basis of an ideal human culture.
📖 From Akhand Jyoti Jan 2001
Meaning of Yajna
🔷 In its gross form, Yajna is a spiritual experiment of sacrificing and sublimating the havana samagri (herbal preparations) in the fire accompanied by the chanting of Vedic mantras. This is only the physical process or ritual of Yajna, which has scientific importance and beneficial effects. This agni-Yajna when performed on a small scale is also known as havan, homam or agnihotra.
🔶 The meaning of Yajna is not confined to this sacrificial fire process. It has a much wider and deeper meaning. The word Yajna is derived from the Sanskrit verb yaj, which has a three-fold meaning: worship of deities (devapujana), unity (sangatikarana) and charity (dana). The philosophy of Yajna teaches a way of living in the society in harmony and a lifestyle which promotes and protects higher human values in the society, which is indeed the basis of an ideal human culture.
📖 From Akhand Jyoti Jan 2001
👉 गुरुगीता (भाग 97)
👉 सद्गुरू की कृपा से ही मिलती है मुक्ति
🔶 इस साधना रहस्यों को अपने श्रीमुख से उद्घाटित करते हुए भगवान् महादेव कहते हैं-
श्री महादेव उवाच-
पिण्डं कुण्डलिनीशक्तिः, पदं हंसमुदाहतम्। रूपं बिन्दुरितिज्ञेयं रूपातीतं निरञ्जनम् ॥ १२१॥
पिण्डे मुक्ता पदे मुक्ता, रूपे मुक्ता वरानने। रूपातीते तु ये मुक्तास्ते मुक्तानामसंशयः॥ १२२॥
🔷 हे देवि! कुण्डलिनी शक्ति पिण्ड है। हंस पद है, बिन्दु ही रूप है तथा निरञ्जन, निराकार रूपातीत है, ऐसा कहते हैं॥ १२१॥ जो पिण्ड से मुक्त हुआ, पद से मुक्त हुआ, रूप से मुक्त हुआ और जो रूपातीत से मुक्त हो सका, हे श्रेष्ठ मुखवाली! उसी को मुक्त कहते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है॥१२२॥
🔶 गुरूगीता के उपरोक्त दो महामंत्रों में योगीजनों की समस्त योगसाधना का सार है। विरले ही इसकी अनुभूति कर पाते हैं। भगवान् शिव बड़े क्रम से माता भवानी को इन रहस्यों की जानकारी देते हैं। वे कहते हैं कि कुण्डलिनी शक्ति ही पिण्ड है। इसका तात्पर्य यह है कि जब तक योग साधक में कुण्डलिनी शक्ति सुप्त रहती है, तब तक वह देह बोध और देहाभिमान से बँधा रहता है। ऐसा व्यक्ति कितनी ही पुस्तकें पढ़ डाले, भले कितनी ही शास्त्रों का अध्ययन कर ले, पर उसे देह बोध से मुक्ति नहीं मिलती। इनके पास तर्क तो होते हैं, पर बोध नहीं होता है। ये बातें कितनी ही ऊँची क्यों न करें, पर वह वासनाओं की कीचड़ और कलुष से मुक्त नहीं हो पाता। उसे यह मुक्ति मिलती है- कुण्डलिनी शक्ति के जागरण से।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 146
🔶 इस साधना रहस्यों को अपने श्रीमुख से उद्घाटित करते हुए भगवान् महादेव कहते हैं-
श्री महादेव उवाच-
पिण्डं कुण्डलिनीशक्तिः, पदं हंसमुदाहतम्। रूपं बिन्दुरितिज्ञेयं रूपातीतं निरञ्जनम् ॥ १२१॥
पिण्डे मुक्ता पदे मुक्ता, रूपे मुक्ता वरानने। रूपातीते तु ये मुक्तास्ते मुक्तानामसंशयः॥ १२२॥
🔷 हे देवि! कुण्डलिनी शक्ति पिण्ड है। हंस पद है, बिन्दु ही रूप है तथा निरञ्जन, निराकार रूपातीत है, ऐसा कहते हैं॥ १२१॥ जो पिण्ड से मुक्त हुआ, पद से मुक्त हुआ, रूप से मुक्त हुआ और जो रूपातीत से मुक्त हो सका, हे श्रेष्ठ मुखवाली! उसी को मुक्त कहते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है॥१२२॥
🔶 गुरूगीता के उपरोक्त दो महामंत्रों में योगीजनों की समस्त योगसाधना का सार है। विरले ही इसकी अनुभूति कर पाते हैं। भगवान् शिव बड़े क्रम से माता भवानी को इन रहस्यों की जानकारी देते हैं। वे कहते हैं कि कुण्डलिनी शक्ति ही पिण्ड है। इसका तात्पर्य यह है कि जब तक योग साधक में कुण्डलिनी शक्ति सुप्त रहती है, तब तक वह देह बोध और देहाभिमान से बँधा रहता है। ऐसा व्यक्ति कितनी ही पुस्तकें पढ़ डाले, भले कितनी ही शास्त्रों का अध्ययन कर ले, पर उसे देह बोध से मुक्ति नहीं मिलती। इनके पास तर्क तो होते हैं, पर बोध नहीं होता है। ये बातें कितनी ही ऊँची क्यों न करें, पर वह वासनाओं की कीचड़ और कलुष से मुक्त नहीं हो पाता। उसे यह मुक्ति मिलती है- कुण्डलिनी शक्ति के जागरण से।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 146
गुरुवार, 26 अप्रैल 2018
👉 संयम का महत्व
🔷 एक देवरानी और जेठानी में किसी बात पर जोरदार बहस हुई और दोनो में बात इतनी बढ़ गई कि दोनों ने एक दूसरे का मुँह तक न देखने की कसम खा ली और अपने-अपने कमरे में जा कर दरवाजा बंद कर लिया।
🔶 परंतु थोड़ी देर बाद जेठानी के कमरे के दरवाजे पर खट-खट हुई। जेठानी तनिक ऊँची आवाज में बोली कौन है, बाहर से आवाज आई दीदी मैं ! जेठानी ने जोर से दरवाजा खोला और बोली अभी तो बड़ी कसमें खा कर गई थी। अब यहाँ क्यों आई हो ?
🔷 देवरानी ने कहा दीदी सोच कर तो वही गई थी, परंतु माँ की कही एक बात याद आ गई कि जब कभी किसी से कुछ कहा सुनी हो जाए तो उसकी अच्छाइयों को याद करो और मैंने भी वही किया और मुझे आपका दिया हुआ प्यार ही प्यार याद आया और मैं आपके लिए चाय ले कर आ गई।
🔶 बस फिर क्या था दोनों रोते रोते, एक दूसरे के गले लग गईं और साथ बैठ कर चाय पीने लगीं। जीवन मे क्रोध को क्रोध से नहीं जीता जा सकता, बोध से जीता जा सकता है। अग्नि अग्नि से नहीं बुझती जल से बुझती है।
🔷 समझदार व्यक्ति बड़ी से बड़ी बिगड़ती स्थितियों को दो शब्द प्रेम के बोलकर संभाल लेते हैं। हर स्थिति में संयम और बड़ा दिल रखना ही श्रेष्ठ है।
🔶 परंतु थोड़ी देर बाद जेठानी के कमरे के दरवाजे पर खट-खट हुई। जेठानी तनिक ऊँची आवाज में बोली कौन है, बाहर से आवाज आई दीदी मैं ! जेठानी ने जोर से दरवाजा खोला और बोली अभी तो बड़ी कसमें खा कर गई थी। अब यहाँ क्यों आई हो ?
🔷 देवरानी ने कहा दीदी सोच कर तो वही गई थी, परंतु माँ की कही एक बात याद आ गई कि जब कभी किसी से कुछ कहा सुनी हो जाए तो उसकी अच्छाइयों को याद करो और मैंने भी वही किया और मुझे आपका दिया हुआ प्यार ही प्यार याद आया और मैं आपके लिए चाय ले कर आ गई।
🔶 बस फिर क्या था दोनों रोते रोते, एक दूसरे के गले लग गईं और साथ बैठ कर चाय पीने लगीं। जीवन मे क्रोध को क्रोध से नहीं जीता जा सकता, बोध से जीता जा सकता है। अग्नि अग्नि से नहीं बुझती जल से बुझती है।
🔷 समझदार व्यक्ति बड़ी से बड़ी बिगड़ती स्थितियों को दो शब्द प्रेम के बोलकर संभाल लेते हैं। हर स्थिति में संयम और बड़ा दिल रखना ही श्रेष्ठ है।
👉 आत्मचिंतन के क्षण 27 April 2018
🔷 कहते हैं कि शनिश्चर और राहू की दशा सबसे खराब होती है और जब वे आती हैं तो बर्बाद कर देती हैं। इस कथन में कितनी सचाई है यह कहना कठिन है, पर यह नितान्त सत्य है कि आलस्य को शनिश्चर और प्रमाद को-समय की बर्बादी को-राहू माना जाय तो इनकी छाया पड़ने मात्र से मनुष्य की बर्बादी का पूरा-पूरा सरंजाम बन जाता है।
🔶 दुःख और कठिनाइयेां में ही सच्चे हृदय से परमात्मा की याद आती है। सुख-सुविधाओं में तो भोग और तृप्ति की ही भावना बनी रहती है। इसलिए उचित यही है कि विपत्तियों का सच्चे हृदय से स्वागत करें। परमात्मा से माँगने लायक एक ही वरदान है कि वह कष्ट दे, मुसीबतें दें, ताकि मनुष्य अपने लक्ष्य के प्रति सावधान व सजग बना रहे।
🔷 निराशा वह मानवीय दुर्गुण है, जो बुद्धि को भ्रमित कर देती है। मानसिक शक्तियों को लुंज-पुंज कर देती है। ऐसा व्यक्ति आधे मन से डरा-डरा सा कार्य करेगा। ऐसी अवस्था में सफलता प्राप्त कर सकना संभव ही कहाँ होगा? जहाँ आशा नहीं वहाँ प्रयत्न नहीं। बिना प्रयत्न के ध्येय की प्राप्ति न आज तक कोई कर सका है, न आगे संभव है।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔶 दुःख और कठिनाइयेां में ही सच्चे हृदय से परमात्मा की याद आती है। सुख-सुविधाओं में तो भोग और तृप्ति की ही भावना बनी रहती है। इसलिए उचित यही है कि विपत्तियों का सच्चे हृदय से स्वागत करें। परमात्मा से माँगने लायक एक ही वरदान है कि वह कष्ट दे, मुसीबतें दें, ताकि मनुष्य अपने लक्ष्य के प्रति सावधान व सजग बना रहे।
🔷 निराशा वह मानवीय दुर्गुण है, जो बुद्धि को भ्रमित कर देती है। मानसिक शक्तियों को लुंज-पुंज कर देती है। ऐसा व्यक्ति आधे मन से डरा-डरा सा कार्य करेगा। ऐसी अवस्था में सफलता प्राप्त कर सकना संभव ही कहाँ होगा? जहाँ आशा नहीं वहाँ प्रयत्न नहीं। बिना प्रयत्न के ध्येय की प्राप्ति न आज तक कोई कर सका है, न आगे संभव है।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 Yajna – The Root of Vedic Culture (Part 1)
🔷 Gayatri and Yajna constitute the foundation of the Vedic Indian Culture. While Gayatri imparts wisdom and pure intelligence, Yajna inspires corresponding creativity and actions.
🔶 In talking of the Vedic age the images of the great saints performing agnihotra-Yajnas instantly flashes in our memory. In those days, apart from the saints, the rich and the poor, the kings and citizens also had an equally deep faith and respect for Yajna and they used to sincerely participate in and lend wholehearted support for different kinds of Yajnas. The saints used to spend at least one-third of their lives in conducting Yajnas.
🔷 It was a common belief and an observed fact in the Vedic Indian society that Yajna was essential for the refinement of human life from a sudra (i.e. a person living a life driven by animal instincts) to a Brahmin (i.e. a wise, knowledgeable, charitable person), and ultimately to a divine, great personality. Yajnas played an essential role in the all-round progress, prosperity and happiness in the Vedic age. This was indeed natural, as the philosophy and science of Yajna and the different modes of performing agni-Yajna were discovered and developed by the rishis based on their deep understanding and in-depth research of the human self, the intricacies of the social system and the mysteries of Nature.
📖 From Akhand Jyoti Jan 2001
🔶 In talking of the Vedic age the images of the great saints performing agnihotra-Yajnas instantly flashes in our memory. In those days, apart from the saints, the rich and the poor, the kings and citizens also had an equally deep faith and respect for Yajna and they used to sincerely participate in and lend wholehearted support for different kinds of Yajnas. The saints used to spend at least one-third of their lives in conducting Yajnas.
🔷 It was a common belief and an observed fact in the Vedic Indian society that Yajna was essential for the refinement of human life from a sudra (i.e. a person living a life driven by animal instincts) to a Brahmin (i.e. a wise, knowledgeable, charitable person), and ultimately to a divine, great personality. Yajnas played an essential role in the all-round progress, prosperity and happiness in the Vedic age. This was indeed natural, as the philosophy and science of Yajna and the different modes of performing agni-Yajna were discovered and developed by the rishis based on their deep understanding and in-depth research of the human self, the intricacies of the social system and the mysteries of Nature.
📖 From Akhand Jyoti Jan 2001
👉 गुरुगीता (भाग 96)
👉 सद्गुरू की कृपा से ही मिलती है मुक्ति
🔷 गुरूगीता में योगसाधना के गहन रहस्य उजागर होते हैं। इसमें जो कुछ भी है, वह सभी तरह के बुद्धि कौशल से परे है। गुरूगीता के महामंत्रों में निहित रहस्य बुद्धि से नहीं, बोध से अनुभव होता है। इसके मंत्रोंक्षरों की सच्चाई के तर्क से नहीं, साधना से ही जाना जा सकता है। जो लोग गुरूगीता को बुद्धि और तर्क से जानने की कोशिश करते हैं, वे अपने ही जाल में उलझ कर रह जाते हैं। गुरूगीता के सम्बन्ध में उनकी बौद्धिक तत्परता उन्हें भ्रमों के सिवा और कुछ नहीं दे पाती। तर्कों से उन्हें केवल बहस का खोखलापन मिलता है। इसके विपरीत जो साधना करते हैं, वे अपनी साधना से प्राप्त अन्तर्दृष्टि के सहारे सब कुछ जान लेते हैं।
🔶 गुरूगीता की रहस्य कथा में अन्तर्दृष्टि के रहस्यों की श्रृंखला स्पष्ट होती रही है। इसकी प्रत्येक कड़ी ने साधकों एवं शिष्यों की अन्तर्दृष्टि में हर बार नये आयाम जोड़े हैं। पिछले क्रम में माँ पार्वती ने भगवान् सदाशिव से अनूठी जिज्ञासा जतायी है। उन्होंने पूछा है कि हे महादेव! पिण्ड क्या है? पद किसे कहते हैं? हे भोलेनाथ रूप क्या है और रूपातीत क्या है? माँ की यह सभी जिज्ञासाएँ जीवात्मा के अस्तित्व के अतिगूढ़ प्रश्न हैं और इनका उत्तर केवल साधना की समाधि से शिवमुख से सुनकर ही जाना जा सकता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 144
🔷 गुरूगीता में योगसाधना के गहन रहस्य उजागर होते हैं। इसमें जो कुछ भी है, वह सभी तरह के बुद्धि कौशल से परे है। गुरूगीता के महामंत्रों में निहित रहस्य बुद्धि से नहीं, बोध से अनुभव होता है। इसके मंत्रोंक्षरों की सच्चाई के तर्क से नहीं, साधना से ही जाना जा सकता है। जो लोग गुरूगीता को बुद्धि और तर्क से जानने की कोशिश करते हैं, वे अपने ही जाल में उलझ कर रह जाते हैं। गुरूगीता के सम्बन्ध में उनकी बौद्धिक तत्परता उन्हें भ्रमों के सिवा और कुछ नहीं दे पाती। तर्कों से उन्हें केवल बहस का खोखलापन मिलता है। इसके विपरीत जो साधना करते हैं, वे अपनी साधना से प्राप्त अन्तर्दृष्टि के सहारे सब कुछ जान लेते हैं।
🔶 गुरूगीता की रहस्य कथा में अन्तर्दृष्टि के रहस्यों की श्रृंखला स्पष्ट होती रही है। इसकी प्रत्येक कड़ी ने साधकों एवं शिष्यों की अन्तर्दृष्टि में हर बार नये आयाम जोड़े हैं। पिछले क्रम में माँ पार्वती ने भगवान् सदाशिव से अनूठी जिज्ञासा जतायी है। उन्होंने पूछा है कि हे महादेव! पिण्ड क्या है? पद किसे कहते हैं? हे भोलेनाथ रूप क्या है और रूपातीत क्या है? माँ की यह सभी जिज्ञासाएँ जीवात्मा के अस्तित्व के अतिगूढ़ प्रश्न हैं और इनका उत्तर केवल साधना की समाधि से शिवमुख से सुनकर ही जाना जा सकता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 144
👉 संकल्पवान
🔶 गुरजिएफ ने कहा कि सामान्य व्यक्ति वादा नहीं कर सकता, संकल्प नहीं कर सकता, क्योंकि यह सब तो साधकों के गुण हैं, शिष्यत्व के लक्षण हैं।
🔷 गुरजिएफ के पास लोग आते और कहते— अब मैं व्रत लूँगा। उसके शिष्य औस्पेन्सकी ने लिखा है कि वह जोर से हँसता और कहता 'इससे पहले कि तुम कोई प्रतिज्ञा लो, दो बार फिर सोच लो। क्या तुम्हें पूरा आश्वासन है कि जिसने वादा किया है, वह अगले क्षण भी बना रहेगा? तुम कल से सुबह तीन बजे उठने का निर्णय कर लेते हो और तीन बजे तुम्हारे भीतर कोई कहता है, झंझट मत लो। बाहर इतनी सर्दी पड़ रही है। और ऐसी जल्दी भी क्या है? मैं यह कल भी कर सकता हूँ और तुम फिर सो जाते हो। दूसरे दिन सारे पछतावे के बावजूद यही स्थिति फिर से दुहराई जाती है। क्योंकि जिसने प्रतिज्ञा की, वह सुबह तीन बजे वहाँ होता ही नहीं, उसकी जगह कोई दूसरा ही आ बैठता है। अनुशासन का मतलब है, भीड़ की इस अराजक अव्यवस्था को समाप्त कर केन्द्रीयकरण की लयबद्धता उत्पन्न करना और तभी जानने की क्षमता आती है।
🔶 संकल्पवान ही आत्मतत्त्व को जान पाते हैं। गुरुदेव का समूचा जीवन इसी संकल्प का पर्याय था। उनके समूचे जीवन में, अन्तर्चेतना में अविराम लयबद्धता थी; तभी उनके गुरु ने उन्हें जो अनुशासन दिया, वह बड़ी प्रसन्नतापूर्वक पालन करते रहे। अनुशासन से मिलता-जुलता अंग्रेजी का शब्द है- डिसिप्लिन। यह डिसिप्लिन शब्द बड़ा सुन्दर है। यह उसी जड़, उसी उद्ïगम से आया है, जहाँ से डिसाइपल शब्द आया है। इससे यही प्रकट होता है कि अनुशासन शिष्य का सहज धर्म है। केन्द्रस्थ, लयबद्ध, संकल्पवान व्यक्ति ही गुरु के दिए गए अनुशासन को स्वीकार, शिरोधार्य कर सकता है। ऐसे ही व्यक्ति के अन्दर विकसित होती है, जानने की क्षमता।
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान से
🔷 गुरजिएफ के पास लोग आते और कहते— अब मैं व्रत लूँगा। उसके शिष्य औस्पेन्सकी ने लिखा है कि वह जोर से हँसता और कहता 'इससे पहले कि तुम कोई प्रतिज्ञा लो, दो बार फिर सोच लो। क्या तुम्हें पूरा आश्वासन है कि जिसने वादा किया है, वह अगले क्षण भी बना रहेगा? तुम कल से सुबह तीन बजे उठने का निर्णय कर लेते हो और तीन बजे तुम्हारे भीतर कोई कहता है, झंझट मत लो। बाहर इतनी सर्दी पड़ रही है। और ऐसी जल्दी भी क्या है? मैं यह कल भी कर सकता हूँ और तुम फिर सो जाते हो। दूसरे दिन सारे पछतावे के बावजूद यही स्थिति फिर से दुहराई जाती है। क्योंकि जिसने प्रतिज्ञा की, वह सुबह तीन बजे वहाँ होता ही नहीं, उसकी जगह कोई दूसरा ही आ बैठता है। अनुशासन का मतलब है, भीड़ की इस अराजक अव्यवस्था को समाप्त कर केन्द्रीयकरण की लयबद्धता उत्पन्न करना और तभी जानने की क्षमता आती है।
🔶 संकल्पवान ही आत्मतत्त्व को जान पाते हैं। गुरुदेव का समूचा जीवन इसी संकल्प का पर्याय था। उनके समूचे जीवन में, अन्तर्चेतना में अविराम लयबद्धता थी; तभी उनके गुरु ने उन्हें जो अनुशासन दिया, वह बड़ी प्रसन्नतापूर्वक पालन करते रहे। अनुशासन से मिलता-जुलता अंग्रेजी का शब्द है- डिसिप्लिन। यह डिसिप्लिन शब्द बड़ा सुन्दर है। यह उसी जड़, उसी उद्ïगम से आया है, जहाँ से डिसाइपल शब्द आया है। इससे यही प्रकट होता है कि अनुशासन शिष्य का सहज धर्म है। केन्द्रस्थ, लयबद्ध, संकल्पवान व्यक्ति ही गुरु के दिए गए अनुशासन को स्वीकार, शिरोधार्य कर सकता है। ऐसे ही व्यक्ति के अन्दर विकसित होती है, जानने की क्षमता।
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान से
👉 गुरुगीता (भाग 95)
👉 सद्गुरु को तत्त्व से जान लेने का मर्म
🔶 जीव को पिण्ड मिलने और इसमें आबद्ध होने का कारण उसकी वासनाएँ, चाहतें और इच्छाएँ हैं। वासनाएँ जब तक हैं, जीव का पिण्ड से छुटकारा नहीं है। इतना ही नहीं, वह इन वासनाओं से लिपटे रहने के कारण स्वयं को ही पिण्ड समझने लगता है। ग्रामीण अंचल में एक बड़ा प्रचलित मुहावरा है- पिण्ड छुड़ाना। किसी जंजाल या विपत्ति से पीछा छूटने पर कहते हैं कि चलो पिण्ड छूटा। भले ही इस कहावत पर किसी ने गहराई से विचार न किया हो, परन्तु सच यही है कि पिण्ड छूटना बड़े महत्त्व की बात है; परन्तु योगीजन जानते हैं कि पिण्ड से मुक्त होना वासनाओं से मुक्त होने के बाद ही सम्भव है और वासनाएँ कुण्डलिनी शक्ति के जागरण व ऊर्ध्वगमन के बाद ही छूट पाती हैं। सो वासनाओं और इससे पैदा होने वाले कर्म बीजों व इसके परिणामों को जिसने जान लिया, समझो उसने पिण्ड के तत्त्व को जान लिया।
🔷 माता जगदम्बा प्रभु से अगला सवाल करती हैं-प्रभु पद किसे कहते हैं? यह पद शब्द भी यौगिक शब्दावली की एक गहरी विशेषता है। योग में जीवात्मा को पद कहा गया है। इसका एक नाम हंस भी है। इस हंस का ज्ञान सामान्य जनों को नहीं होता; क्योंकि वासनाओं से चंचल प्राणों में यह अनुभूति नहीं हो पाती। जब वासनाओं का वेग थमता है, तब प्राण स्थिर होते हैं। और प्राणों की इस स्थिरता में हंस का अनुभव होता है। यह अनुभव जीवात्मा का है। जीवात्मा का मतलब है आत्मचेतना का वह स्वरूप जिसने प्रकृति बन्धनों के कारण जीव भाव को स्वीकार कर लिया है। जीव भाव से मुक्त होने पर ही योग साधना में आत्मतत्त्व की अनुभूति होती है।
🔶 इसी क्रम में माँ की अगली जिज्ञासा है कि प्रभु रूप क्या है? रूप का मतलब है—आत्मरूप का। यह आत्मरूप है—आत्मज्योति रूप नीलबिन्दु। इसका अनुभव साधक को आत्मज्योति का अनुभव देता है। इस अनुभूति के साथ ही साधक को अपने आत्मरूप का ज्ञान व भान हो जाता है। सभी जप, योग एवं तप का सुफल यही है। जिसकी यह स्थिति नहीं है समझो उसे अभी अध्यात्म की कक्षा में प्रवेश नहीं मिला। योग साधना में रूप दर्शन एवं रूप मुक्ति यही दो क्रम हैं। इन्हें पूरा कर लेने पर रूपातीत अनुभूति का क्रम होता है। यह अध्यात्म विद्या की उच्च कक्षा है। इसमें प्रवेश साधक को जन्मों की साधना के बाद मिलता है।
🔷 इस उच्च कक्षा के बारे में जगन्माता भवानी अगली जिज्ञासा करती हैं—प्रभु रूपातीत क्या है? रूपातीत है ब्राह्मीचेतना। सभी रूप इसी से उदय होते हैं और इसी में विलीन हो जाते हैं। यह अनुभूति विरल है। जन्म-जन्मान्तर की साधना के बाद ही साधक इसकी प्राप्ति का अधिकारी हो पाता है। इसे पाने पर न शोक रह जाता है और न मोह। माया से परे अगम-अगोचर प्रभु की अनुभूति अति असाधारण अनुभव है। इस अनुभव में साधना की सार्थकता है। यहीं जीव शिव बनता है। इस शिवत्व की प्राप्ति में उसकी गुरुसेवा की सफलता है। उसके सद्गुरु के वरदान का सुफल है। जिसको यह मिल गया समझो उसे सब मिल गया।
🔶 हालाँकि यह तत्त्व बोध होता है क्रमवार ही। सबसे पहले पिण्ड बोध करना होता है। किन वासनाओं के प्रतिफल से यह देह मिली है। किन कर्मबीजों के कारण वर्तमान परिस्थितियाँ हैं। इसे अपनी साधना की गहराई में अनुभव करना होता है। इसके बाद आता है प्राणों की गति का क्रम। प्राणों की गति का ऊर्ध्व व स्थिर होना जीवात्मा के साक्षात्कार का कारण बनता है। इसके बाद ही हो पाता है आत्मज्योति के दर्शन का क्रम और बाद में ब्र्राह्मी चेतना से सायुज्य की स्थिति बनती है। यह सायुज्यता मिलने पर साधक को अपने सद्गुरु के निराकार निरञ्जन तत्त्व का साक्षात्कार होता है। माँ की इन जिज्ञासाओं में भगवान् सदाशिव के उत्तर अत्यन्त मर्मस्पर्शी हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 143
🔶 जीव को पिण्ड मिलने और इसमें आबद्ध होने का कारण उसकी वासनाएँ, चाहतें और इच्छाएँ हैं। वासनाएँ जब तक हैं, जीव का पिण्ड से छुटकारा नहीं है। इतना ही नहीं, वह इन वासनाओं से लिपटे रहने के कारण स्वयं को ही पिण्ड समझने लगता है। ग्रामीण अंचल में एक बड़ा प्रचलित मुहावरा है- पिण्ड छुड़ाना। किसी जंजाल या विपत्ति से पीछा छूटने पर कहते हैं कि चलो पिण्ड छूटा। भले ही इस कहावत पर किसी ने गहराई से विचार न किया हो, परन्तु सच यही है कि पिण्ड छूटना बड़े महत्त्व की बात है; परन्तु योगीजन जानते हैं कि पिण्ड से मुक्त होना वासनाओं से मुक्त होने के बाद ही सम्भव है और वासनाएँ कुण्डलिनी शक्ति के जागरण व ऊर्ध्वगमन के बाद ही छूट पाती हैं। सो वासनाओं और इससे पैदा होने वाले कर्म बीजों व इसके परिणामों को जिसने जान लिया, समझो उसने पिण्ड के तत्त्व को जान लिया।
🔷 माता जगदम्बा प्रभु से अगला सवाल करती हैं-प्रभु पद किसे कहते हैं? यह पद शब्द भी यौगिक शब्दावली की एक गहरी विशेषता है। योग में जीवात्मा को पद कहा गया है। इसका एक नाम हंस भी है। इस हंस का ज्ञान सामान्य जनों को नहीं होता; क्योंकि वासनाओं से चंचल प्राणों में यह अनुभूति नहीं हो पाती। जब वासनाओं का वेग थमता है, तब प्राण स्थिर होते हैं। और प्राणों की इस स्थिरता में हंस का अनुभव होता है। यह अनुभव जीवात्मा का है। जीवात्मा का मतलब है आत्मचेतना का वह स्वरूप जिसने प्रकृति बन्धनों के कारण जीव भाव को स्वीकार कर लिया है। जीव भाव से मुक्त होने पर ही योग साधना में आत्मतत्त्व की अनुभूति होती है।
🔶 इसी क्रम में माँ की अगली जिज्ञासा है कि प्रभु रूप क्या है? रूप का मतलब है—आत्मरूप का। यह आत्मरूप है—आत्मज्योति रूप नीलबिन्दु। इसका अनुभव साधक को आत्मज्योति का अनुभव देता है। इस अनुभूति के साथ ही साधक को अपने आत्मरूप का ज्ञान व भान हो जाता है। सभी जप, योग एवं तप का सुफल यही है। जिसकी यह स्थिति नहीं है समझो उसे अभी अध्यात्म की कक्षा में प्रवेश नहीं मिला। योग साधना में रूप दर्शन एवं रूप मुक्ति यही दो क्रम हैं। इन्हें पूरा कर लेने पर रूपातीत अनुभूति का क्रम होता है। यह अध्यात्म विद्या की उच्च कक्षा है। इसमें प्रवेश साधक को जन्मों की साधना के बाद मिलता है।
🔷 इस उच्च कक्षा के बारे में जगन्माता भवानी अगली जिज्ञासा करती हैं—प्रभु रूपातीत क्या है? रूपातीत है ब्राह्मीचेतना। सभी रूप इसी से उदय होते हैं और इसी में विलीन हो जाते हैं। यह अनुभूति विरल है। जन्म-जन्मान्तर की साधना के बाद ही साधक इसकी प्राप्ति का अधिकारी हो पाता है। इसे पाने पर न शोक रह जाता है और न मोह। माया से परे अगम-अगोचर प्रभु की अनुभूति अति असाधारण अनुभव है। इस अनुभव में साधना की सार्थकता है। यहीं जीव शिव बनता है। इस शिवत्व की प्राप्ति में उसकी गुरुसेवा की सफलता है। उसके सद्गुरु के वरदान का सुफल है। जिसको यह मिल गया समझो उसे सब मिल गया।
🔶 हालाँकि यह तत्त्व बोध होता है क्रमवार ही। सबसे पहले पिण्ड बोध करना होता है। किन वासनाओं के प्रतिफल से यह देह मिली है। किन कर्मबीजों के कारण वर्तमान परिस्थितियाँ हैं। इसे अपनी साधना की गहराई में अनुभव करना होता है। इसके बाद आता है प्राणों की गति का क्रम। प्राणों की गति का ऊर्ध्व व स्थिर होना जीवात्मा के साक्षात्कार का कारण बनता है। इसके बाद ही हो पाता है आत्मज्योति के दर्शन का क्रम और बाद में ब्र्राह्मी चेतना से सायुज्य की स्थिति बनती है। यह सायुज्यता मिलने पर साधक को अपने सद्गुरु के निराकार निरञ्जन तत्त्व का साक्षात्कार होता है। माँ की इन जिज्ञासाओं में भगवान् सदाशिव के उत्तर अत्यन्त मर्मस्पर्शी हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 143
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026
शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...

















































