👉 चेतना के रहस्यों का जानकार होता है सद्गुरु
🔶 उन्हीं सर्वव्यापी गुरुदेव की चेतना के अन्य आध्यात्मिक रहस्यों को उजागर करते हुए भगवान् भोलेनाथ जगदम्बा पार्वती से कहते हैं-
ज्ञानं विज्ञानसहितं लभ्यते गुरुभक्तितः। गुरोः परतरं नास्ति ध्येयोऽसौ गुरुमार्गिभिः॥ ८१॥
यस्मात्परतरं नास्ति नेति नेतीति वै श्रुतिः। मनसा वचसा चैव नित्यमाराधयेद् गुरुम्॥ ८२॥
गुरोः कृपाप्रसादेन ब्रह्मविष्णुसदाशिवाः। समर्थाः प्रभवादौ च केवलं गुरुसेवया॥ ८३॥
देवकिन्नरगन्धर्वाःपितरो यक्षचारणाः। मुनयोपि न जानन्ति गुरुशुश्रूषणे विधिम्॥ ८४॥
महाहंकारगर्वेण तपोविद्याबलान्विताः। संसारकुहरावर्ते घटयंत्रे यथा घटाः॥ ८५॥
🔷 गुरुदेव की भक्ति से ज्ञान-विज्ञान सहित सब कुछ अपने आप मिल जाता है। उन सद्गुरु से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है। इसलिए उन्हीं के बताए मार्ग का ध्यान करना चाहिए॥ ८१॥ श्रुतियों में इन्हीं की पराचेतना को नेति-नेति कहकर निरूपित किया गया है। इसलिए मन और वाणी से इन्हीं सद्गुरु की आराधना नित्य करते रहना चाहिए॥ ८२॥ ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव गुरुकृपा के प्रभाव से ही समर्थ हुए हैं। इसलिए गुरुसेवा को ही अपना कर्तव्य मानना चाहिए॥ ८३॥ हालाँकि गुरु सेवा की ठीक-ठीक विधि कोई भी नहीं जानता। फिर भले ही वह देव, किन्नर, गन्धर्व, पितर, यक्ष, चारण अथवा श्रेष्ठ मुनि ही क्यों न हों॥ ८४॥ तप और विद्या को सब कुछ समझने वाले अहंकारी जन इस संसार चक्र में बारम्बार भटकते रहते हैं, जैसे कि घट यंत्र के चक्र में घट घूमता रहता है॥ ८५॥
🔶 गुरुदेव की पराचेतना में सब कुछ है। उन्हीं में सभी लौकिक एवं अलौकिक शक्तियाँ समाहित हैं। इसी सत्य को भगवान् सदाशिव ने आदिमाता पार्वती से कहा है। सद्गुरु अगम एवं अगोचर हैं। वे साकार होते हुए भी निराकार हैं। देहधारी होते हुए भी देहातीत हैं। उन्हीं में अपनी अहंता को विलीन करने से परमज्ञान मिलता है। यह परम सत्य है। भले ही इसे बुद्धि परायण जन समझे अथवा न समझे। हालाँकि इसे समझे बिना तप की कठिन साधनाएँ एवं दुरूह विद्याओं का अभ्यास अज्ञान के अहंकार को ही बढ़ाता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 102
🔶 उन्हीं सर्वव्यापी गुरुदेव की चेतना के अन्य आध्यात्मिक रहस्यों को उजागर करते हुए भगवान् भोलेनाथ जगदम्बा पार्वती से कहते हैं-
ज्ञानं विज्ञानसहितं लभ्यते गुरुभक्तितः। गुरोः परतरं नास्ति ध्येयोऽसौ गुरुमार्गिभिः॥ ८१॥
यस्मात्परतरं नास्ति नेति नेतीति वै श्रुतिः। मनसा वचसा चैव नित्यमाराधयेद् गुरुम्॥ ८२॥
गुरोः कृपाप्रसादेन ब्रह्मविष्णुसदाशिवाः। समर्थाः प्रभवादौ च केवलं गुरुसेवया॥ ८३॥
देवकिन्नरगन्धर्वाःपितरो यक्षचारणाः। मुनयोपि न जानन्ति गुरुशुश्रूषणे विधिम्॥ ८४॥
महाहंकारगर्वेण तपोविद्याबलान्विताः। संसारकुहरावर्ते घटयंत्रे यथा घटाः॥ ८५॥
🔷 गुरुदेव की भक्ति से ज्ञान-विज्ञान सहित सब कुछ अपने आप मिल जाता है। उन सद्गुरु से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है। इसलिए उन्हीं के बताए मार्ग का ध्यान करना चाहिए॥ ८१॥ श्रुतियों में इन्हीं की पराचेतना को नेति-नेति कहकर निरूपित किया गया है। इसलिए मन और वाणी से इन्हीं सद्गुरु की आराधना नित्य करते रहना चाहिए॥ ८२॥ ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव गुरुकृपा के प्रभाव से ही समर्थ हुए हैं। इसलिए गुरुसेवा को ही अपना कर्तव्य मानना चाहिए॥ ८३॥ हालाँकि गुरु सेवा की ठीक-ठीक विधि कोई भी नहीं जानता। फिर भले ही वह देव, किन्नर, गन्धर्व, पितर, यक्ष, चारण अथवा श्रेष्ठ मुनि ही क्यों न हों॥ ८४॥ तप और विद्या को सब कुछ समझने वाले अहंकारी जन इस संसार चक्र में बारम्बार भटकते रहते हैं, जैसे कि घट यंत्र के चक्र में घट घूमता रहता है॥ ८५॥
🔶 गुरुदेव की पराचेतना में सब कुछ है। उन्हीं में सभी लौकिक एवं अलौकिक शक्तियाँ समाहित हैं। इसी सत्य को भगवान् सदाशिव ने आदिमाता पार्वती से कहा है। सद्गुरु अगम एवं अगोचर हैं। वे साकार होते हुए भी निराकार हैं। देहधारी होते हुए भी देहातीत हैं। उन्हीं में अपनी अहंता को विलीन करने से परमज्ञान मिलता है। यह परम सत्य है। भले ही इसे बुद्धि परायण जन समझे अथवा न समझे। हालाँकि इसे समझे बिना तप की कठिन साधनाएँ एवं दुरूह विद्याओं का अभ्यास अज्ञान के अहंकार को ही बढ़ाता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 102












































