रविवार, 11 मार्च 2018

👉 How long can we go on tolerating vulgarly and extravagant weddings? (Part 5)

Some statistics that will touch your hearts

🔶 I feel like presenting some more statistics to you. According to an estimate, the annual average income of an individual is around Rs 25000. But the same society buys around 800 tonnes of gold per year (note that the cost of gold has become more than 18000/- for 10gms). 600 tonnes of gold is exclusively used for making jewellery. In this country, a mere 3% of the people pay income tax every year. Then where does this huge amount come from? So, definitely the money being spent in profligate weddings must be the savings of the family. These savings can be brought into circulation through various mediums. This amount is beyond any kind of taxation. In the name of celebration and public merry-making, is this not a display of our sick mindset? Each and every intelligent person in the society should think about this.

🔷 More than 70 crores of our country’s population eke out a living with less than Rs. 30 income per day. More than 39 crores of the people are below the poverty line. Clean drinking water is not available for more than 60 crore people. 35 crore do not have access to primary education. 62 crores do not have their own houses. 20 crore sleep on the city footpaths.  15 crore are living out of compensation. On the contrary, political leaders have an average annual income of 9 lakh rupees. The annual income of about 30 crore of the population is more than Rs. 2 crores.  In India, 15 crore people are millionaires and 24 are billionaires. 25 crore people spend about 50 crore rupees on bottled water. 1.5 crore like to live in hotels while 7 crore own more than one house.

🔶 Aren’t these statistics an eye opener? But they depict a little less than the entire truth. Where do these expensive weddings take birth? This can be understood. Will group conflicts not rise in such situations? Why are divorces becoming more rampant? Why is domestic and social violence continuing on women? Why are social thinkers mum on this issue?

✍🏻 Pranav Pandya
📖 From Akhand Jyoti

👉 प्रायश्चित क्यों? कैसे? (भाग 2)

🔶 आपने गलतियाँ की हैं और अपने शरीर को कमजोर बना डाला है। आप पापकर्म से कैसे बचेंगे? पढ़ेंगे के समय में और पढ़ने के दिनों में लापरवाही बरती आपने और पढ़ने से इनकार कर दिया। अब आप बिना पड़े हैं, दम्भ से बचिए न जरा। नहीं साहब, हम तो प्रार्थना करेंगे, भगवान की पूजा करेंगे और विद्वान हो जाएँगे। आपने विद्वान बनने के लिए जो करना चाहिए था, वह किया था क्या? नहीं किया था। फिर क्या मतलब है? नहीं, हम तो पूजा करने मात्र से बन जाएँगे। नहीं भाईसाहब, ऐसा नहीं हो सकता। आप वास्तविकता को समझिए तो सही। यहाँ आ करके भी वास्तविकता को नहीं समझेंगे, आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश करने के बाद भी वास्तविकता और सच्चाई अगर आपकी समझ में न आ सकी, तो इसमें प्रवेश करने का क्या फायदा हुआ? आप अज्ञान में ही फँसे रहे, भ्रम में ही फँसे रहे और आप अज्ञान और भ्रमों को ही छाती से लगाए रहे, तो क्या बात बनी? आप यहाँ अध्यात्म को सच्चाई का प्रतीक मानिये और यह मानकर चलिए कि कर्मफल एक वास्तविकता है और उसमें जो भूतकाल के कर्म हैं, वह भी ज्यों के त्यों हैं।

🔷 पिताजी ने आपके लिए कर्ज लिया था और उससे आपने डिग्री हासिल की थी, लेकिन पिताजी के मरने के बाद में वह डिग्री आपको भुगतानी पड़ेगी, चाहे आपका मकान बिके या आपकी जमीन बिके। साहब हम तो क्षमा माँगेंगे, पुरानी बात तो पुरानी हो गई। पुरानी बात कैसे हो गई? बैंक से आप कर्जा लाए थे और बैंक का कर्जा बढ़ते-बढ़ते दुगुना हो गया है, अब आप चुकायेंगे कि नहीं, चुकायेंगे। नहीं साहब, बैंक मैनेजर से प्रार्थना करेंगे, हाथ जोड़ेंगे, पैर छुएँगे, पंचामृत पिलाएँगे और माफ करा लेंगे। आप यह बेकार की बात मत कीजिए। बेकार की बात करने से आपको भ्रमित, घृणित और अज्ञानियों की श्रेणी में गिना जाएगा।

🔶 आप भ्रमग्रस्त मत रहिए और अज्ञानियों की श्रेणी में अपने आपको शामिल मत कराइए। भूतकाल के पापों से या भूतकाल की घटनाओं से आप प्रभावित हैं, तो भूतकाल को मजाक में नहीं उड़ा सकते। भूतकाल में जो आपने किया था, लड़ाई-झगड़े किए थे, किसी आदमी का कत्ल कर दिया था, तो आप पर मुकदमा चलेगा और आप फाँसी के लिए तैयार रहिए। नहीं साहब, भूतकाल को छोड़िए, जो मार डाला, सो मार डाला और मर गया, सो मर गया। आप यों कहेंगे कैसे? भूतकाल ऐसे मजाक की चीज है? मजा की चीज नहीं है। आप ऐसा मत कीजिए। आप वास्तविकता से इतनी दूर रहेंगे, तो फिर वहाँ नहीं पहुँच सकेंगे, जहाँ आपको वास्तविकता के सहारे पहुँचना है। पापों का प्रायश्चित एक बहुत बड़ी बात है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 62)

👉 मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यम्

🔶 इस सत्य को बताने वाली एक बहुत ही प्यारी घटना है, जिसे जानकर शिष्यगणों को सहज ही गुरुदेव की महिमा का बोध होगा। यह सत्य घटना बंगाल के महान साधक सुरेन्द्र नाथ बनर्जी के बारे में है। बनर्जी महाशय उन दिनों सर्वेयर के पद पर कार्यरत थे। इस पद पर उनकी आमदनी तो ठीक थी। पर पारिवारिक जीवन समस्याओं से घिरा था। पहले बेटी का मरना, फिर पत्नी का लम्बी बीमारी के बाद देहत्याग! इन विषमताओं ने उन्हें विचलित कर दिया था। ऐसे में उनकी मुलाकात महान् सन्त सूर्यानन्द गिरी से हुई। सुरेन्द्र नाथ के विकल मन ने सन्त की शरण में छाँव पाना चाहा। इसी उद्देश्य से वह उन संन्यासी महाराज की कुटिया में गए और दीक्षा देने की प्रार्थना की।

🔷 इस प्रार्थना को सुनकर संन्यासी महाराज नाराज हो गए और उन्हें डपटते हुए बोले-  ‘आज तक तुमने सत्कर्म किया है, जो मेरा शिष्य बनना चाहते हो। जाओ पहले सत्कर्म करो।’ उनकी इस झिड़की को सुनकर सुरेन्द्रनाथ विचलित नहीं हुए और बोले- आज्ञा दीजिए महाराज! संन्यासी सूर्यानन्द गिरी ने कहा- इस संसार में पीड़ित मनुष्यों की संख्या कम नहीं है। उन पीड़ितों  की सेवा करो। जो आज्ञा प्रभो! सुरेन्द्र नाथ ने कहा- मैंने सम्पूर्ण अन्तस् से आपको अपना गुरु माना है, आपके द्वारा कहा गया प्रत्येक वाक्य मेरे लिए मूलमंत्र है। आपके द्वारा उच्चारित प्रत्येक अक्षर मेरे लिए परा बीज है।

🔶 ऐसा कहकर सुरेन्द्रनाथ कलकत्ता चले आए और अभावग्रस्त, लाचार, दुःखी मनुष्यों की सेवा करने लगे। उन्हें अस्पताल ले जाकर भर्ती करने लगे। निराश्रितों के सिरहाने बैठकर सेवा करते हुए वे गरीबों के मसीहा बन गए। धीरे-धीरे पास की सारी रकम समाप्त हो जाने पर वे कुली का काम करने लगे। उससे जो आमदानी होती, उससे अपाहिजों की सहायता करने लगे। ऐसी दशा में उनके कई वर्ष गुजर गए। इस बीच संन्यासी सूर्यानन्द गिरी से उनकी कोई मुलाकात नहीं हुई।

🔷 एक दिन जब वे कुली का काम करके जूट मिल से बाहर निकले, तो देखा कि सामने गुरुदेव खड़े हैं। सुरेन्द्र के प्रणाम करते ही उनसे गुरुदेव ने कहा-सुरेन्द्र, तुम्हारी परीक्षा समाप्त हो गयी है, अब मेरे साथ चलो।  इस आदेश को शिरोधार्य करके वे चुपचाप गुरु  के पीछे-पीछे चल पड़े। गुरुदेव उन्हें बंगाल, आसाम पार कराते हुए बर्मा के जंगलों में ले गए। यहीं से उनकी साधना का क्रम शुरू हुआ। गुरु- कृपा से वह महान् सिद्ध सन्त महानन्द गिरी के नाम से प्रसिद्ध हुए। परवर्ती काल में जब कोई उनसे साधना का रहस्य जानना चाहता, तो वे एक ही बात कहते, ‘मंत्र मूलं गुरोर्वाक्यं’ गुरु वाक्य मूल मंत्र है। इसकी साधना से सब कुछ स्वयं ही हो जाता है। सचमुच ही गुरुदेव की महिमा अनन्त व अपार है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 99

शनिवार, 10 मार्च 2018

👉 शेख सादी की सूक्तियाँ

🔶 “ऐ कनाअत तदन्गरम गरदाँ। क वराये तो हेच नेमत नेस्त॥”
“ऐ सन्तोष! मुझे दौलतमंद बना दें, क्योंकि संसार की कोई दौलत तुझसे बढ़कर नहीं है।”

🔷 एक अफ्रीकी सानिया कपड़ा बेचने वालों के कूचे में इस तरह कह रहा था, “ऐ धनी लोगों ! अगर तुम लोगों में न्याय होता और हम लोगों में संतोष होता, तो संसार से भीख माँगने की प्रथा ही उठ जाती।” हे संतोष ! मुझे धनी बना दे क्योंकि तेरे बिना कोई धनी नहीं है। लुकमान ने एकाँतवास में संतोष धारण किया था। जिसके दिल में संतोष नहीं है, उसमें तत्वज्ञान की हिकमत नहीं है।

🔶 तात्पर्य यह है कि जगत में ‘संतोष’ ही सबसे बड़ा धन है। जिसमें संतोष नहीं है, वह भारी से भारी धनी होने पर भी निर्धन है। जिसके हृदय में असंतोष नहीं है वही सदा सुखी है। लाख, करोड़ और अरब-खरब की सम्पदा होने पर भी जो संतोषहीन है वह परम दुखी है। सन्तोषी मनुष्य ही सब सुख भोग सकता है।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 आत्म-भाव का विस्तार

🔶 इस संसार का अणु-अणु एक दूसरे से संबंधित है। एक दूसरे को पकड़े हुए है। यह कण यदि आपस में बँधे न रहें सहयोग न करें। परस्पर बँधे रहने की प्रक्रिया से मुँह मोड़ ले तो सृष्टि क्रम ही बिखर जायेगा, प्रत्येक पदार्थ के भीतर विघटन आरम्भ हो जायेगा और वह अपने अस्तित्व को ही खो बैठेगा। एकता के बंधनों का ऐसा ही महत्व है। जड़ जगत में ही नहीं सब चैतन्य प्राणियों विशेषतया मानव-समाज में यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि एकता, प्रेम और आत्मीयता के आधार पर उनका बल तथा विस्तार सुदृढ़ होता है। जो जितना ही आत्मीयता की भावनाओं से ओतप्रोत है वह उतना ही विकसित कहा जा सकता है। उदारमना महापुरुष-वसुधैव कुटुम्बकम् के आदर्श को अपनाते हैं, उन्हें सभी अपने ही दिखाई पड़ते हैं। जिसका स्वार्थ-आत्मभाव जितना छोटा है, जितना संकीर्ण है उस व्यक्ति को उतना ही तुच्छ माना जायेगा।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 11 March 2018


👉 Be Good and Do Good

🔶 The truth behind performing good deeds to gain entry into heaven may be debatable. There are some references about such idea in the scriptures but its fundamental aim is to motivate people to follow the path in life which is moral and good for the self and the society at large.Getting a sick child take medicine is a great challenge. A mother has to resort to cajoling the child into taking medicine by saying that she would reward him with a toy. The child does not know the worth of the medicine, but he does know the worth of a toy. In the hope of getting rewarded with a toy, he takes the medicine which works in his best interest.

🔷 Similarly, an average individual does not appreciate the worth of living a high ideal life. Sensual pleasures are what interests him more. He can visualize his interest of securing the heavens which is the happiness he is seeking for. The prospects of heaven makes him take up a worthy course in life. This can’t be thought of as a deceit or a lie as it would indeed usher him in the direction which has much more to offer than the said reward.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Saṁsṛti saṅjivani Srimad-Bhagwata evam Gita Vangmay 31 Page 5.18

👉 क्षमताओं का सदुपयोग-प्रगति का राजमार्ग (भाग 2)

🔶 बहुमूल्य मानव जीवन का एक-एक क्षण अनमोल है। हर साँस को हीरे मोतियों से तोला जा सकता है। जिसने इस तथ्य को जाना, समझना चाहिए उसने जो सबसे अधिक महत्त्व का था उसे जान लिया। बुद्धिमत्ता की प्रशंसा तब है जब समय के सदुपयोग का उच्चस्तरीय निर्धारण बन सके। जिसकी भी प्रज्ञा ने इस प्रकार का अनुग्रह अनुदान प्रदान किया है, उसे सच्चे अर्थों में भाग्यवान कहना चाहिए। अन्यथा लोग ऐसे ही नर वानरों की तरह जीते और ज्यों-त्यों करके दिन गुजारते हैं।

🔷 ईश्वर प्रदत्त समय सम्पदा को कौड़ी मोल गँवा देने वाले तीन भूल करते हैं-एक यह कि आलस्य-प्रमाद, विलास-विनोद में समय काटते हैं। दूसरे ललक लिप्सा की पूर्ति के लिए धन बटोरने में लगे रहते हैं। आम आदमी का अधिकांश समय नियोजन प्रायः इन्हीं दो कामों के लिए होता है। तीसरे स्तर के कुछ उद्धत प्रकृति के ऐसे भी होते हैं जो विनाश विध्वंस में लगे रहते हैं अथवा दर्प दिखाने, ठाठ बनाने के लिए, प्रशंसा सुनने के लिए ऐसे कृत्य करते हैं जिसमें प्रवंचना और विडम्बना के अतिरिक्त और कोई सार तत्व नहीं होता।

🔶 इन प्रयोजनों की परिणति पर ध्यान दिया जाय और महामानवों द्वारा अपनाई गई गतिविधियों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाय तो प्रतीत होगा कि दोनों के मध्य जमीन-आसमान जितना अन्तर है। दोनों की उपलब्धियों में इतना अन्तर है जिन्हें काँच और हीरे जैसा कहा जा सके। आलसी, प्रमादी, अनगढ़, पिछड़ी परिस्थितियों में पड़े रहते हैं। तृष्णातुर उद्यमी तो होते हैं, पर उनकी योग्यता उस अनावश्यक संचय और अवांछनीय उपभोग में लग जाती है जिसकी निरर्थकता को सहज समझा जा सकता था और देखा जा सकता था कि ललक में जिस सुखोपभोग की आशा की गई थी, उसकी छाया ही दिवास्वप्न की तरह लुभाती रही। पल्ले खीज़ और थकान के अतिरिक्त और कुछ लगा नहीं। बड़प्पन और दर्प की विडम्बना और भी अधिक उपहासास्पद है।

🔷 इस नक्कारखाने में तूती की क्या बिसात? एक से एक प्रतापी, कठपुतली जैसा नाच दिखाकर बाजीगर के झोली में घुस गये। यहाँ कौन किसका बड़प्पन मानता है? अपनी चिन्ता, समस्याओं से फुरसत नहीं फिर कौन किसका दर्प देखे और किसलिए, किस-किस समय किसी को सराहें? अपनी ओर ध्यान खींचने और चकाचौंध उत्पन्न करने की लिप्सा को बचकानी बालक्रीड़ा के अतिरिक्त और कुछ कहते नहीं बनता। यही हैं वे ललक लिप्साएँ जिसमें जिन्दगी का बहुमूल्य अवसर ऐसे ही गुम जाता है। विदाई के दिनों जब ईश्वर प्रदत्त अनुदान को किस निमित्त उपयोग किया गया, यह सोचने का अवसर मिलता तो प्रतीत होता कि भूल ही भूल में उस वैभव को गँवा दिया गया, जिसके सही सदुपयोग की बात यदि सूझ पड़ी होती तो सार्थकता का स्वरूप ही दूसरा होता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How long can we go on tolerating vulgarly and extravagant weddings? (Part 4)

Expensive arrangements should become a laughing stock

🔶 Cost of living has increased, so has the list of items on the dinner menu. Today, we see people spending as much as Rs. 800-2400 per plate during the wedding dinners. This is partly because of the demand in the hotels due to limited muhurats available. This has undoubtedly led to boom in the hotel business; banquet halls are minting money; pundits who perform the weddings are in great demand, but the pockets of the people are getting lighter.

🔷 Can anyone say – this is my money and I will spend it the way I want; I can blow it off in smoke just like the crackers. No, it does make a difference. This money belongs to the entire society. This is not the money of an individual. They have extracted this money from the society, but are spending it according to their whims and fancies and setting up a very bad example indeed. This is a tradition that is working against our culture and the progress of the nation. This is an insult to the values of the society.

📖 From Akhand Jyoti
✍🏻 Pranav Pandya

👉 प्रायश्चित क्यों? कैसे? (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियो! भाइयो!!

🔶 उन्नति के मार्ग पर सबसे बड़ी रुकावट वह है, जिसके कारण से हमारे पैर रुक जाते हैं। प्रायश्चित की प्रक्रिया इसीलिए है कि हमने भूतकाल में जो गलतियाँ की हैं, उनकी रोकथाम कर सकें। इस संसार का यह नियम है कि जो गलतियाँ होती हैं, भूलें होती हैं, उसका दण्ड तो मिलता-ही है। हमारे लिए सबसे बड़ा व्यवधान यही है कि पिछली गलतियाँ, वह रास्ता रोककर खड़ी हो जाती है और हमको उन्नति नहीं करने देतीं। अगर हम अपने ध्यान, जप और साधना में समर्थ हो जाएँ तब? तब फिर उन गलतियों का दण्ड कैसे मिलेगा? पापों का प्रायश्चित कैसे होगा? उज्ज्वल भविष्य तो सुख और शान्ति का हो जाएगा, फिर पापों का क्या होगा?

🔷 पाप इतनी छोटी बात नहीं हैं कि आप गंगा नहा करके या उसका प्रायश्चित करके, प्रार्थना करके खत्म कर सकें। वह आपके जीवन की कोई महत्त्वहीन घटना नहीं है। बुरे कामों का। अच्छे फलों की ही क्यों आशा करते हैं? जब आप अच्छे फलों की आशा करते हैं कि हमने यह अच्छा किया है, विद्या पढ़ी है, तो हमको उत्तीर्ण होना चाहिए, हमने मेहनत की है, तो हमको इनाम मिलना चाहिए, हमने ब्याह-शादी की है, तो हमारी घर-गृहस्थी चलनी चाहिए। जब आप श्रेष्ठ कामों के बारे में यह विश्वास करते हैं, कि हमको अपने कर्मों का अच्छा फल मिलना ही चाहिए, फिर आप एक और बात क्यों भूल जाते हैं कि हमने जो बुरे कर्म किये हैं या भूलें की हैं, उनका दण्ड मिलना चाहिए।

🔶 उसके बारे में फिर क्यों उपेक्षा करते हैं? इसकी उपेक्षा कीजिए न कि हम खेती करेंगे नहीं, पैदा हुआ तो क्या हुआ, हम विद्या पढ़ेंगे नहीं, पढ़ना आया तो क्या हुआ? आप यह क्यों सोचते हैं कि हमारे अच्छे कर्मों का फल तो हमको मिलना चाहिए और बुरे कर्मों के बारे में इतने ज्यादा लापरवाह हैं कि आप यह ख्याल कर लें कि हम राम नाम लेंगे, पंचामृत पी लेंगे, गंगाजी में डुबकी मार लेंगे, फलाना कर लेंगे, तो ऐसे दिल्लगी, मजाक जैसे छोटे-छोटे कारणों से आप छुटकारा पा जाएँगे?

🔷 ऐसा कैसे हो सकता है? यह मुमकिन नहीं है। जहर खाया है, तो आपको मरना पड़ेगा अथवा जहर को सारी नसों में से निकालना पड़ेगा। नहीं साहब, जहर खा लिया है, तो क्या हुआ, प्रार्थना कर लेंगे, फाँसी लगा ली है, तो क्या हुआ, प्रार्थना कर लेंगे, रेल की पटरी पर बैठ करके सिर कटा लिया है, तो क्या हुआ, प्रार्थना कर लेंगे। नहीं भाईसाहब, ऐसी कल्पना मत कीजिए बच्चों जैसी। आप जरा समझदारों की तरह बात कीजिए। पाप भी आपके जीवन की एक इकाई है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 61)

👉 मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यम्

🔶 परम पूज्य गुरुदेव की भावमयी मूर्ति ध्यान का मूल है। उनके चरण कमल पूजा का मूल हैं। उनके द्वारा कहे गए वाक्य मूल मंत्र हैं। उनकी कृपा ही मोक्ष का मूल है॥ ७६॥ गुरुदेव ही आदि और अनादि हैं, वही परम देव हैं। उनसे बढ़कर और कुछ भी नहीं। उन श्रीगुरु को नमन है॥ ७७॥ सप्त सागर पर्यन्त जितने भी तीर्थ उन सभी के स्नान का फल गुरुदेव के पादप्रक्षालन के जल बिन्दुओं का हजारवाँ हिस्सा भी नहीं है॥ ७८॥ यदि भगवान् शिव स्वयं रूठ जायें, तो श्री गुरु की कृपा से रक्षा हो जाती है; लेकिन यदि गुरु रूठ जाएँ, तो कोई भी रक्षा करने में समर्थ नहीं होता। इसलिए सभी प्रकार से कृपालु सद्गुरु की शरण में जाना चाहिए॥ ७९॥ ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव रूप यह जो जगत् है-वह गुरुदेव का ही स्वरूप है।  गुरुदेव से अधिक और कुछ भी नहीं है। इसलिए सब तरह से गुरुवर की अर्चना करनी चाहिए॥ ८०॥

🔷 सद्गुरु चेतना की महिमा का गायन करने वाले इन मंत्रों में आध्यात्मिक जीवन के कई रहस्यों की दुर्लभ झलकियाँ हैं। गुरुदेव का ध्यान, उन्हीें की पूजा, उनके ही वाक्यों के अनुुसार जीवन एवं उनकी ही कृपा से परम पद की प्राप्ति-यह साधना का सहज पथ है। वही सब कुछ है। इस सृष्टि में जो भी विस्तार है, वह ब्राह्मी चेतना के साकार रूप गुरुदेव का ही है। गुरुदेव प्रसन्न हों तो काल को भी अपने पाँव पीछे लौटाने पड़ते हैं। जो शिष्य अपने सद्गुरु की कृपा छाँव में रहता है, उसका भला कौन क्या बिगाड़ सकता है? अपने शिष्य के जीवन के लिए ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर गुरुदेव के सिवा और कोई भी नहीं। परम समर्थ एवं परम कृपालु गुरुदेव से अधिक शिष्य के लिए और कुछ भी नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 98

शुक्रवार, 9 मार्च 2018

👉 सत्य को न समझ पाने की आत्मघाती विडम्बना

🔷 किसी गाँव में कन्फ्यूशियस शिष्यों सहित पधारे। गाँव के पाँच युवक एक अन्धे को पकड़कर उनके पास लाये। उनमें से एक बोला- “भगवन्! एक समस्या हम सबके लिए उत्पन्न हो गई है। यह व्यक्ति आंख का तो अन्धा है पर है बहुत मूर्ख एवं हद दर्जे का तार्किक। हम इसको सतत् समझा रहे हैं कि प्रकाश का अस्तित्व है। प्रकृति के दृश्यों में सौंदर्य की अद्भुत छटा है। दुनिया में कुरूपता एवं सुन्दरता का युग्म सर्वत्र विद्यमान है। सूर्य, चाँद, सितारे प्रकाशवान हैं। समस्त संसार उनसे प्रकाशित-आलोकित होता है। रंग-बिरंगे पुष्पों में एक प्राकृतिक आकर्षण है जो सब का मन मोह लेता है। बसन्त के साथ प्रकृति श्रृंगार करके अवतरित होती- सबको मनमोहित करती है।”

🔶 “हमारी हर बात को यह अन्धा अपने तर्कों के सहारे काट कर रख देता है। कहता है कि प्रकाश की सत्ता कल्पित है। तुम लोगों ने मुझे अन्धा सिद्ध करने के लिए प्रकाश के सिद्धान्त गढ़ लिए हैं। वस्तुतः प्रकाश का अस्तित्व ही नहीं है। यदि है तो सिद्ध करके बताओ। मुझे स्पर्श कराके दिखाओ कि प्रकाश है। यदि स्पर्श के माध्यम से सम्भव नहीं है तो मैं चखकर देखना चाहता हूँ। यदि तुम कहते हो वह स्वाद रहित है तो मैं सुन सकता हूँ। प्रकाश की आवाज सम्प्रेषित करो। यदि उसे सुना भी नहीं जा सकता तो तुम मुझे प्रकाश की गन्ध का पान करा दो। मेरी घ्राणेंद्रियां सक्षम हैं- गन्ध को ग्रहण करने में। मेरी चारों इन्द्रियाँ समर्थ हैं। इनमें से किसी एक से प्रकाश का संपर्क करा दो। अनुभूति होने पर ही तो मैं मान सकता हूँ कि प्रकाश की सत्ता है।

🔷 उन पांचों ने कन्फ्यूशियस से कहा- “आप ही बतायें, इस अंधे को कैसे समझायें? प्रकाश को चखाया तो जा नहीं सकता। न ही स्पर्श कराया जा सकता। उसमें से गन्ध तो निकलती नहीं कि इसे सुँघाया जा सके न ही ध्वनि निकलती है जिसे सुना जा सके। आप समर्थ हैं, सम्भव है आपके समझाने से उसे सत्य का ज्ञान हो।

🔶 कन्फ्यूशियस बोले- प्रकाश को यह नासमझ जिन इन्द्रियों के माध्यम से समझना अनुभव करना चाहता है, उनसे कभी सम्भव नहीं है कि वह प्रकाश का अस्तित्व स्वीकार ले। उसको बोध कराने में तो मैं भी असमर्थ हूँ। तुम्हें मेरे पास नहीं किसी चिकित्सक के पास जाना चाहिए जब तक नेत्र नहीं मिल जाते, कोई भी उसे समझाने में सफल नहीं हो सकता। इसलिए कि आँखों के अतिरिक्त दृश्य प्रकाश का कोई प्रमाण नहीं है।

🔷 महान दार्शनिक का निर्देश पाकर पाँचों उस जन्मजात अंधे को एक कुशल वैद्य के पास लेकर पहुँचे। विशेषज्ञ वैद्य बोला- ‘‘इस रोगी को तो और पहले लाना चाहिए था। इसका रोग इतना गम्भीर नहीं है। बेकार में यह अपनी आयु की इतनी लम्बी अवधि अन्धेपन का भार लादे व्यतीत करता रहा।”

🔶 वैद्य ने शल्य क्रिया द्वारा आँखों की ऊपरी झिल्ली हटादी जिससे प्रकाश को आने का मार्ग मिल गया। अल्पावधि के उपचार से ही वह अन्धा ठीक हो गया। उसके आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा। उसके सारे तर्क अपने आप तिरोहित हो गये। अपनी भूल तिरोहित हो गयी। अपनी भूल  उसे समझ में आ गयी कन्फ्यूशियस ने शिष्य मण्डली से कहा- “तुम्हें उस अंधे की मूर्खता तथा तर्क शीलता पर हँसी आ सकती है पर उन तथाकथित बुद्धिमानों को किस श्रेणी में रखा जाय जो ईश्वर जैसी अगोचर, निराकार, इन्द्रियातीत सत्ता को प्रत्यक्ष इन्द्रियों के सहारे समझने का प्रयास करते हैं। उसमें असफल होने पर ऐसे असंख्यों अन्धे उद्घोष करते दिखाई देते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है वह तो आस्तिकों की मात्र कल्पना है।”

🔷 सचमुच ही अन्तःकरण पर छाये कषाय-कल्मषों को धोकर परिमार्जित किया जा सके, उसे निर्मल बनाया जा सके तो उसमें ईश्वरीय प्रकाश को झिलमिलाते देखा- अनुभव किया जा सकता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 10 March 2018


👉 Non-vegetarian food can be eaten only after leaving humanity

🔷 Compassion cannot be separated between human beings and animals. Cruel actions towards animals will directly affect behavior towards human beings. One who understands having affection & love for a human being, will never be cruel & merciless to animals. The famous travelers, Fahiyan and Marco Polo, have written that, “Aside from a wretch, nobody eats non-vegetarian food in India,” As per our religious books, non vegetarian food is always reprehensible. Non vegetarianism is frowned upon by various cultures throughout the world.

🔶 Buddist and Jain philosophies are based on non-violence and Vaishnavs also treat non-vegetarianism as a sin. The same concept is mentioned in Hindu holy books such as the Vedas and Purans.

🔷 The Bible says “Oh, what are you seeing, do open your mouth in favor of animals which are being cut.” Christ also praises vegetarianism in saying, “Do not hurt anyone neither kill animals nor eat meat.”

🔶 Similarly, the Quran says, “God never forgives those who cut green trees, sell human beings, cut animals, and have relationships with another’s wife. One who has mercy on others will get mercy from the God.” We must analyze the disadvantages of non-vegetarianism and act according to our basic nature and tendencies to keep ourselves physically and mentally healthy. Practicing non vegetarianism can be seen as mercilessness and cruelty towards animals. It will be beneficial if we, ourselves, get out from such cruel habits otherwise we will demonstrate the same cruelty towards human beings, and then the world will become hell.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 YUG NIRMAN YOJANA – DARSHAN, SWAROOP AND KARYAKRAM – Vangmay 66 Page 6.86

👉 मांस मनुष्यता को त्याग कर ही खाया जा सकता है

🔷 करुणा की प्रवृत्ति अविछिन्न है। उसे मनुष्य और पशुओं के बीच विभाजित नहीं किया जा सकता। पशु-पक्षियों के प्रति बरती जाने वाली निर्दयता मनुष्यों के साथ किये जाने वाले व्यवहार को भी प्रभावित करेगी। जो मनुष्यों से प्रेम और सद्व्यवहार का मर्म समझता है वह पशु-पक्षियों के प्रति निर्दय नहीं हो सकता। भारत यात्रा करने वाले सुप्रसिद्ध फाह्यान, मार्कोपोलो सरीखे विदेशी यात्रियों ने अपनी भारत यात्राओं के विशद् वर्णनों में यही लिखा है - भारत में चाण्डालों के अतिरिक्त और कोई सभ्य व्यक्ति माँस नहीं खाता था। धार्मिक दृष्टि से तो इसे सदा निन्दनीय पाप कर्म बताया जाता रहा है।

🔶 बौद्ध और जैन धर्म तो प्रधानतया अहिंसा पर ही आधारित है। वैष्णव धर्म भी इस सम्बन्ध में इतना ही सतर्क है । वेद, पुराण, स्मृति, सूत्र आदि हिन्दू धर्म-ग्रंथों में पग-पग पर मॉंसाहार की निन्दा और निषेध भरा पड़ा है।

🔷 बाइबिल में कहा गया है - ऐ देखने वाले देखता क्यों है, इन काटे जाने वाले जानवरों के विरोध में अपनी जुबान खोल। ईसा कहते थे -किसी को मत मार। प्राणियों की हत्या न कर और मांस न खा।

🔶 कुरान में लिखा है - हरा पेड़ काटने वाले, मनुष्य बेचने वाले, जानवरों को मारने वाले और पर स्त्रीगामी को खुदा माफ नहीं करता। जो दूसरों पर रहम करेगा, वही खुदा की रहमत पायेगा। हमें बढ़ते हुए माँसाहार की प्रवृति में होने वाली हानियों पर विचार करना चाहिए और अपनी मूल प्रकृति एवं प्रवृत्ति के अनुकूल आचरण करना चाहिए ताकि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य नष्ट होने से बच सके। निष्ठुरता और क्रूरता का दूसरा नाम ही माँसाहार है। अच्छा हो हम अपनी प्रकृति में से इन तत्त्वों को निकाले अन्यथा हमारा व्यवहार मनुष्यों के प्रति भी इन्हीं दुर्गुणों से भरा होगा और संसार में नरक के दृश्य दीखेंगे ।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम- वांग्मय 66 पृष्ठ 6.86

👉 क्षमताओं का सदुपयोग-प्रगति का राजमार्ग (भाग 1)

🔷 कौशल, मनोयोग और श्रम का अमुक गति से अमुक समय तक उपयोग करने की विद्या ही समयानुसार सम्पदा बनकर सामने आती है। इस तथ्य को समझ लेने पर इस तथ्य का रहस्योद्घाटन होता है कि समय का सुनियोजन ही धन है। भ्रष्ट प्रचलनों ने जो अपवाद खड़े किये हैं वे मान्यता प्राप्त नहीं कर सकते। उन्हें तो बुहार फेंकने में ही गति है। यह प्रक्रिया आज नहीं तो कल सम्पन्न करनी ही है। अर्थ क्षेत्र की विकृतियाँ तो मानवी गरिमा, सम्भावना और सौजन्य की सभ्यता को ही जड़-मूल से उखाड़ देंगी। इसलिए जहाँ उस परिमार्जन की तैयारी करनी चाहिए, वहाँ उसके सम्बन्ध में कम से कम अपने चिन्तन और निर्धारण में समय रहते सुधार परिवर्तन कर ही लेना चाहिए।

🔶 धन की आवश्यक ललक पर अंकुश लग सके और उसके उपार्जन में अपना तथा कुटुम्बियों का अधिक श्रम, मनोयोग लग सके तो समझना चाहिए कि अर्थ समस्या का समाधान हुआ और एक ऐसा बड़ा व्यवधान हटा जो किसी उच्चस्तरीय प्रयोजन के लिए समय, श्रम और मनोयोग लग सकने जैसी स्थिति ही नहीं बनने देता। समझा जाना चाहिए कि समय ईश्वर प्रदत्त ऐसा अनुदान है जिसे श्रम के साथ संयुक्त कर देने के उपरान्त अपनी क्षमता प्रकट करना है। वह क्षमता ही मनुष्य की वास्तविक शक्ति सामर्थ्य है। उसके बदले किसी भी दिशा में चला जा सकता है और किसी भी लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है। मनुष्य को सर्व समर्थ कहा गया है। वह सच्चे अर्थों में अपना भाग्य विधाता और भविष्य निर्धारक है, पर यह तथ्य साकार तभी होता है, जब समय के साथ श्रम और मनोयोग का समन्वय करके अभीष्ट प्रयोजन में संकल्पपूर्वक नियोजित किया जाय।

🔷 कौन कितना जिया? इसका लेखा-जोखा वर्ष, महीने या दिनों को गिनकर नहीं करना चाहिए वरन् देखा यह जाना चाहिए कि जीने वाले ने उस अवधि को किन प्रयोजनों में कितनी तत्परतापूर्वक नियोजित किया। हो सकता है कि कम समय जीने वाला भी शंकराचार्य और विवेकानन्द की तरह अपने अविस्मरणीय पदचिह्न छोड़े और सराहनीय कृतियों के पर्वत खड़े करे। साथ ही यह भी हो सकता है कि कोई शतायु होकर मरे किन्तु निरर्थक दिन बिताये और असंतोष उगाये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)


👉 How long can we go on tolerating vulgarly and extravagant weddings? (Part 3)

Breaking marriages, unethical traditions

🔷 I don’t understand in which era we are living? Will the married life be happy because so much money has been spent? Just because it is a status symbol, or is it ethical and wise to spend so much of the nation’s money for a wedding? Will the noble sanskaras required for a lasting and loving relationship be present in these couples? According to a recent survey, during 2007-2008 10,000 extravagant weddings were performed. Almost in all these wedlocks, there have been problems in the very first year of married life. The issues varied from dowry to several other conflicts. 30% of those marriages broke up.

🔶 When the marriages lead to such a dismal end so soon, what is the meaning of muhurat and all the money that has gone down the drain? Have wealth, jewellery, expensive baraats, vehicles and multi-cuisine dinners become simply the occasions for showing off one’s prosperity? What right do we have to play with the lives of these couples? Why don’t we resolve to perform simple and sober marriage ceremonies that inspire them to live simple, noble and austere lives dedicated to high ideals of loving kindness, compassion and service? Probably, we all have something to gain from these big and fat weddings. Otherwise why don’t the elites of society lead a campaign against this accursed custom?

📖 From Akhand Jyoti
✍🏻 Pranav Pandya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (अन्तिम भाग)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 मित्रो! हमको उनके पास विशेष रूप से जाना चाहिए, जिन लोगों के पास कला है। जिन लोगों के पास लेखन की शक्ति है, जिन लोगों के पास विद्या की शक्ति है, जिन लोगों के पास बुद्धि की शक्ति है, उन लोगों के पास आप जरूर जाना। बीमारी के समय डॉक्टर के पास हमको जरूर जाना चाहिए, क्योंकि वह जानता है और उस काम को आसानी से पूरा कर सकता है। एक डॉक्टर हैजे का मुकाबला आसानी से कर सकता है, जबकि सौ गँवार मिलकर भी हैजे का मुकाबला नहीं कर सकते। इसलिए आप उनके पास चक्कर जरूर लगाना। उनकी खुशामद करने में अपमान महसूस मत करना।

🔶 आप उनकी खुशामद करना, उनकी मिन्नतें करना, जिनके अंदर आपको जीवन मालूम पड़ता है और जीवट मालूम पड़ता है। अगर आपने खुशामद की है, मिन्नतें की हैं, तो आपने भीख माँगने के लिए नहीं की है, अपना पेट भरने के लिए नहीं की है। अपना उल्लू सीधा करने के लिए नहीं की है, वरन् समाज के लिए की है, देश के लिए की है, मानवता के लिए की है और मिशन के लिए की है।

🔷 मित्रो! आपको उन लोगों की खुशामद करनी चाहिए, जिनके पास बुद्धि है, क्षमता है, जिनके पास प्रभाव है, जिनके पास अक्ल है, जिनके पास कला है, जिनके पास जान है। जो आदमी कलम को पकड़ सकते हैं, जो आदमी अपनी विद्या से दूसरों को प्रभावित कर सकते हैं। जिनके पास भगवान् ने वाणी दी है, जो बोल सकते हैं, जो व्याख्यान दे सकते हैं, उनको आप यह कहना कि आपको जो विशेषताएँ मिली हुई हैं, वह भगवान् की अमानत हैं। आपको इसको इस विशेष समय पर इस्तेमाल करना चाहिए।

🔶 गवर्नमेंट के पास रिजर्व फोर्स, रिजर्व पुलिस होती है और वह विशेष समय के लिए रखी जाती है, ताकि जिस समय इसकी बेहद आवश्यकता हो, उस समय विशेष रूप से काम आए। आप उनसे यही कहना कि आप भगवान् के रिजर्व फोर्स के तरीके से हैं, तभी तो दूसरे सामान्य लोगों की अपेक्षा ज्यादा बुद्धि दी गई है, ज्यादा प्रभाव दिया गया है, ज्यादा प्रतिभा दी गई है और ज्यादा समझदारी दी गई है। यदि आप प्रतिभाओं को, विभूतियों को जगाकर राष्ट्र-निर्माण के लिए लगा सकें, तो इससे बड़ा पुण्य कोई नहीं।

आज की बात समाप्त।
॥ ॐ शांति

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 60)

👉 मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यम्

🔷 गुरुगीता के महामंत्रों में साधना की दुर्लभ अनुभूतियाँ सँजोयी हैं। लेकिन यह मिलती केवल उन्हें है, जो निष्कपट भाव से इन मंत्रों की साधना करते हैं। यहाँ साधना का अर्थ गुरुगीता के मंत्रों का बारबार उच्चारण नहीं; बल्कि बार-बार आचरण है। जो कहा जा रहा है, उसे रटो नहीं; बल्कि उसे जीवन में उतारो, आचरण में ढालो, उसे कर्तव्य मानकर करो। जो इस साधना सूत्र को स्वीकारते हैं, फलश्रुतियाँ भी उन्हीं की अन्तश्चेतना में उतरती हैं। सिर्फ बातें बनाने से काम नहीं चलता। श्रीरामकृष्ण परमहंस देव  कहा करते थे कि यदि घर से चिट्ठी आयी है, दो जोड़ी धोती, एक कुर्ते का कपड़ा और एक किलो सन्देश (मिठाई) भिजवाना है, तो फिर वैसा करना पड़ेगा कि बाजार जाकर यह सामान खरीद कर भिजवाना होगा; केवल चिट्ठी रटने से काम चलने वाला नहीं है।
  
🔶 गुरु गीता के महामंत्रों में महेश्वर महादेव जो कुछ भी माता पार्वती से कह रहे हैं, उसके अनुसार जीवन को गढ़ना-ढालना होगा। जो ऐसा करने में जुटे हैं, उन्हें स्मरण होगा कि पिछले मंत्रों  में यह कहा गया है कि गुरुदेव की चेतना ही इस जड़-चेतन, चर-अचर में संव्याप्त है। ज्ञान शक्ति पर आरूढ़ गुरुदेव प्रसन्न होने पर शिष्यों को भोग एवं मोक्ष दोनों का ही वरदान देते हैं। वे अपने ज्ञान व तप के प्रभाव से सहज ही शिष्यों  के संचित कर्मों को भस्म कर देते हैं। श्री गुरुदेव से बढ़कर अन्य कोई तत्त्व नहीं है। उनकी सेवा से अधिक कोई दूसरा तप नहीं है। गुरुदेव ही जगत् के स्वामी हैं, वे ही जगत्गुरु हैं। शिष्य के आत्मरूप गुरुदेव ही अन्तश्चेतना की सृष्टि के समस्त प्राणियों की आत्मा हैं।
  
🔷 ऐसे सर्वव्यापी सद्गुरु की महिमा बताने के बाद भगवान् भोलेनाथ गुरुदेव की चेतना में समाए अन्य आध्यात्मिक रहस्यों को उजागर करते हैं। वे भगवती पार्वती से कहते हैं-
ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिंः पूजामूलं गुरोःपदम्। मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोःकृपा॥ ७६॥
गुरुरादिरनादिश्च गुरुः परम दैवतम्। गुरोः परतरं नास्ति तस्मै श्री गुरवे नमः॥ ७७॥
सप्तसागरपर्यन्तं तीर्थस्नानादिकं फलम्। गुरोरङ्घ्रिपयोबिन्दुसहस्रांशेन दुर्लभम्॥ ७८॥
हरौ रुष्टे गुरस्राता गुरौ रुष्टे न कश्चन। तस्मात् सर्व प्रयत्नेन श्रीगुरुं शरणं व्रजेत्॥ ७९॥
गुरुरेव जगत्सर्वं ब्रह्म विष्णुशिवात्मकम्। गुरोः परतरं नास्ति तस्मात्संपूजयेद्गुरुम्॥ ८०॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 97

👉 वर्दी मैंने धोयी नहीं

🔶 "2009 में उसने मुझे प्रपोज़ किया था. 2011 में हमारी शादी हुई, मैं पुणे आ गयी. दो साल बाद नैना का जन्म हुआ. उसे लम्बे समय तक काम के सिलसिले में बाहर रहना पड़ता था. हमारी बच्ची छोटी थी, इसलिए हमारे परिवारों ने कहा कि मैं बेंगलुरु आ जाऊं. मैंने फिर भी वहीं रहना चुना जहां अक्षय था. मैं हमारी उस छोटी सी दुनिया से दूर नहीं जाना चाहती थी, जो हमने मिल कर बनायी थी.

🔷 उसके साथ ज़िंदगी हंसती-खेलती थी. उससे मिलने नैना को लेकर 2011 फ़ीट पर जाना, स्काईडाइविंग करना, हमने सबकुछ किया. 2016 में उसे नगरोटा भेजा गया. हमें अभी वहां घर नहीं मिला था, इसलिए हम ऑफ़िसर्स मेस में रह रहे थे. 29 नवम्बर की सुबह 5:30 बजे अचानक गोलियों की आवाज़ से हमारी आंख खुली. हमें लगा कि ट्रेनिंग चल रही है, तभी ग्रेनेड की आवाज़ भी आने लगी. 5:45 पर अक्षय के एक जूनियर ने आकर बताया कि आतंकियों ने तोपखाने की रेजिमेंट को बंधक बना लिया है. उसके मुझसे आखरी शब्द थे "तुम्हें इसके बारे में लिखना चाहिए".

🔶 सभी बच्चों और महिलाओं को एक कमरे में रखा गया था. संतरियों को कमरे के बाहर तैनात किया गया था, हमें लगातार फ़ायरिंग की आवाज़ आ रही थी. मैंने अपनी सास और ननद से इस बीच बात की. 8:09 पर उसने ग्रुप चैट में मेसेज किया कि वो लड़ाई में है.

🔷 8:30 बजे सबको सुरक्षित जगह ले जाया गया. अभी भी हम सब पजामों और चप्पलों में ही थे. दिन चढ़ता रहा, लेकिन कोई ख़बर नहीं आ रही थी. मेरा दिल बैठा जा रहा था. मुझसे रहा नहीं गया, मैंने 11:30 बजे उसे फ़ोन किया. किसी और ने फ़ोन उठा कर कहा कि मेजर अक्षय को दूसरी लोकेशन पर भेजा गया है.

🔶 लगभग शाम 6:15 बजे कुछ अफ़सर मुझसे मिलने आये और कहा, "मैम हमने अक्षय को खो दिया है, सुबह 8:30 बजे वो शहीद हो गए." मेरी दुनिया वहीं थम गयी. जाने क्या-क्या ख़याल मेरे मन में आते रहे. कभी लगता कि काश मैंने उसे कोई मेसेज कर दिया होता, काश जाने से पहले एक बार उसे गले लगा लिया होता, काश एक आखिरी बार उससे कहा होता कि मैं उससे प्यार करती हूं.

🔷 चीज़ें वैसी नहीं होतीं, जैसा हमने सोचा होता है. मैं बच्चों की तरह बिलखती रही, जैसे मेरी आत्मा के किसी ने टुकड़े कर दिए हों. दो और सिपाही भी उस दिन शहीद हो गए थे. मुझे उसकी वर्दी और कपड़े मिले. एक ट्रक में वो सब था जो इन सालों में हमने जोड़ा था. लाख नाकाम कोशिशें कीं अपने आंसुओं को रोकने की.

🔶 आज तक उसकी वर्दी मैंने धोयी नहीं है. जब उसकी बहुत याद आती है, तो उनकी जैकेट पहन लेती हूं. उसमें उसे महसूस कर पाती हूं.
शुरू में नैना को समझाना मुश्किल था कि उसके पापा को क्या हो गया, लेकिन फिर उससे कह दिया कि अब उसके पापा आसमान में एक तारा बन गए हैं. आज हमारी जमायी चीज़ों से ही मैंने एक दुनिया बना ली है, जहां वो जीता है, मेरी यादों में, हमारी तस्वीरों में. आंखों में आंसू हों, फिर भी मुस्कुराती हूं. जानती हूं कि वो होता तो मुझे मुस्कुराते हुए ही देखना चाहता.

🔷 कहते हैं न, अगर आपने अपनी आत्मा को चीर देने का दर्द नहीं सहा, तो क्या प्यार किया. दर्द तो बहुत होता है पर हां, मैं उससे हमेशा इसी तरह प्यार करूंगी."

🔶 शहीदों के परिवारों को वो सब सहना पड़ता है, जिसके बारे में सोच कर भी शायद आप कांप उठेंगे. उनके अपने क़ुर्बान हो जाते हैं हमारी रक्षा करते-करते. हम सलाम करते हैं इन लोगों को जो ये सब सहते हैं, ताकि हम सुरक्षित रह सकें.🙇🌹

👉 अपने ऊपर भरोसा करो!

🔷 यदि आप चाहते हैं कि दूसरे लोग आपके ऊपर भरोसा करें तो इसका सबसे सुलभ और सुनिश्चित उपाय यह है कि आप अपने ऊपर भरोसा करें। दुनिया में ऐसे अनेक मनुष्य हैं जिन पर कोई भरोसा नहीं करता, उन्हें गैर जिम्मेदार और बेपैंदी का समझा जाता है तथा जगह जगह दुत्कारा जाता है। ऐसे मनुष्य अपने आपे के प्रति अविश्वासी होते हैं। उनके चेहरे से, भावभंगिमा से, वाणी से, यह स्पष्ट रूप से प्रकट होता रहता है कि वह अपने आपके ऊपर भरोसा नहीं करता।

🔶 बाहर के मनुष्य हमें उसी नाम से पुकारते हैं कि जो हम अपना नाम उनके सामने प्रकट करते हैं। जब हमारी भावभंगिमा और वाणी से दीनता तुच्छता, असमर्थता, निराशा, निर्बलता, असमर्थता प्रकट होती है तो तुरन्त ही दूसरे लोग भी हमें वैसे ही मान लेते हैं और तदनुसार ही हमारे साथ व्यवहार करते हैं। जो लोग साहस पूर्वक किसी काम के करने के लिए खड़े होते हैं और यह घोषित करते हैं कि हम इस काम को पूरा करेंगे, देखा गया है कि वे लोग सफल हो भी जाते हैं। ईश्वर मर्दों का मददगार है। वह उन लोगों की सहायता करता है जो अपनी सहायता आप करने को तत्पर होते हैं।

🔷 आपके सामने आज जो कार्यक्रम है उसे पूरी दिलचस्पी के साथ पूरा करने का प्रयत्न कीजिए अपनी योग्यता, बुद्धिमत्ता और कर्मशीलता पर पूरा भरोसा रखिए। सारी शक्ति को एकत्रित करके अपने उद्देश्य को पूरा करने में इस प्रकार प्रवृत्त हूजिए मानो सफलता प्राप्त करने के लिए आपने प्राण प्रण से निश्चय कर लिया है। छिछोरपन और हीनता की वाणी बोलना छोड़िए और गंभीरता उत्साहपूर्ण आशा तथा दृढ़ता के साथ कार्य करना सीखिए। याद रखिए-इस दुनिया में सफलता उसे मिलेगी जो आत्म विश्वासी होगा।

📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1944 पृष्ठ 11
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1944/September/v1.11

👉 अचिन्त्य चिन्तन से मनोबल न गँवाएँ (अन्तिम भाग)

🔷 अपने आपको कमजोर करने और गिराने का यह अवसाद उपक्रम जिसने भी अपनाया है, वे घाटे में रहे हैं। मनोबल को गिराना भी धीमी आत्महत्या है, जो रोग निवारण, अर्थ उपार्जन, सौभाग्य संवर्धन, संकट निवारण जैसे अगणित महत्त्वपूर्ण कार्यों में अजस्र सहयोग प्रदान करता है। गिराने, थकाने और खोखला बनाने वाले उपरोक्त मनोविकारों में चिन्तन का निषेधात्मक प्रवाह ही आधारभूत कारण होता है। जैसे सोचा होता है, उसमें वास्तविकता का नगण्य सा ही अंश रहता है। कुकल्पनाओं का घटाटोप ही ‘शंका डायन मनसामते’ की उक्ति चरितार्थ करता है। कुकल्पनाओं के अँधेरे में झाड़ी की आकृति भूत जैसी बन जाती है। साहस और विवेक की मात्रा घट जाने पर ऐसे अनगढ़ विचार उठने लगते हैं, जिनसे विपत्ति का आक्रमण और उसके कारण विनाश का भयावह दिवास्वप्न आँखों के सामने तैरने लगता है।

🔶 जब कल्पना जगत में बेपर की उड़ाने ही उड़नी हैं तो फिर उन्हें विधेयात्मक स्तर की क्यों न गढ़ा जाय? असफलता के स्थान पर सफलता का स्वप्न देखने में क्या हर्ज है? संकट के न आने और उसके स्थान पर सुखद सम्भावनाओं के आगमन की बात सोचने में भी कोई अड़चन नहीं होनी चाहिए। यथार्थता तो समय पर ही सामने आती है। आशंका तो कल्पना पर आधारित हो सकती है, सो भी मनगढ़न्त। जब गढ़ना ही रहा तो भूत क्यों गढ़ा जाय? देवता की संरचना करने में भी तो उतनी ही शक्ति लगेगी। डर वास्तविक नहीं होते। जितने संकट अनगढ़ मस्तिष्क द्वारा सोचे जाते हैं, देखा गया है, उनमें से आधे चौथाई भी सामने नहीं आते। काली घटाएँ सदा बरसने वाली ही नहीं होतीं।

🔷 अनुकूलताएँ और प्रतिकूलताएँ धूप-छाँव की तरह आती-जाती रहती हैं। उनमें से एक भी चिरस्थायी नहीं होती। सामने आने वाली परिस्थितियों का समाधान ढूँढ़ने के लिए और भी अधिक सूझ-बूझ की, साहस एवं पुरुषार्थ की आवश्यकता पड़ती है। उन्हें जुटाने के लिए मनोबल तगड़ा रहना चाहिए, अन्यथा निराशा, चिन्ता, भय जैसी कुकल्पनाएँ घिर जाने पर तो हाथ-पैर फूल जाते हैं, कुछ करते धरते नहीं बन पड़ता है, फलतः अपने ही बुने जाल में मकड़ी की तरह फँसकर अकारण कष्ट सहना पड़ता है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How long can we go on tolerating vulgarly and extravagant weddings? (Part 2)

A tradition that has been making this country poor and dishonest
🔷 One tradition that shows us apart from other countries even during this increased cost of living is the tradition of expensive weddings coupled with dowry and show of extravagance in spite of the modern and scientific outlook. Param Pujya Gurudev has written that ‘Expensive weddings make our country poor and dishonest’.  But what is it that is encouraging this tradition to survive and gather speed so much so that even poor families indulge in it and are getting submerged in increased debts and quarrels? Marriage is a sacred bond; it marks the union of two souls. Then why do we need to resort to so much extravagance and showoff during this sacred ceremony? There has been so much progress in science but how come it has not given us little discrimination and intelligence that we could break away from the herd and set an example? Nobody is ready. The poor blindly imitates the rich in this vulgar waste of money while celebrating weddings of their children.

‘Muhurtavaad’ has made the weddings more expensive


🔶 Whatever has been missing, those gaps have been filled by the muhurtavaad. Marriage has to be solemnized during specific muhurats. This has created a crazy situation where more and more money gets spent; there is scarcity of marriage halls and banquet halls. In addition to all this, attending several weddings on the same day becomes a matter of dilemma for a person. Astrologers also manage to have their say and fix a special day for the wedding.

🔷 Though living in a scientific age, we tend to blindly follow these trends. During the recent past, 22 and 28th November 2009 were announced to be auspicious muhurats and the so-called astrologers declared that such an auspicious time was not going to come for a long time. It is estimated that in Delhi alone, 10,000 weddings were performed and more than Rs 1200 crores was spent on these two days. This amount is equivalent to what was spent for the Lok Sabha elections in 2009. Between November 2009 and February 2010, astrologers have identified 24 auspicious days for weddings. Rs 30 to 50 lakhs are spent in a standard middle class wedding.

📖 From Akhand Jyoti
✍🏻 Pranav Pandya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 23)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 सौ फीसदी मरा हुआ आदमी हो, तब तो हम नहीं कह सकते, लेकिन कोई अगर जिंदा आदमी होगा, तो उसको एक बार तड़फड़ाए बिना, उसको एक बार हिलाए बिना नहीं रह सकती। माला वालों को तो यह शायद जगाएगी नहीं। माला वाले तो अखण्ड ज्योति का चंदा इसलिए भेज देते हैं कि गुरुजी नाराज हो जाएँगे और अगली बार मुकदमे में सहायता नहीं करेंगे। वे पत्रिका को पढ़ते थोड़े ही हैं, कोई नहीं पढ़ते, लेकिन जिन लोगों ने इन विचारों को पढ़ा है, वे आदमी काँपते हैं, हिलते हैं। उन आदमियों के अंदर एक स्पंदन पैदा होता है, फुरेरी पैदा होती है।

🔶 आप इन विचारों को लेकर सामान्य जनता तक जरूर जाना। लेकिन सामान्य जनता के अलावा कोई विशेष आदमी दिखाई पड़ते हों, जिनके अंदर आपको जीवट दिखाई पड़ती हो, प्रतिभा दिखाई पड़ती हो, उनके पास आप जरूर जाना विद्यावानों के पास, प्रतिभावानों के पास, कलाकारों के पास जाना। जहाँ कहीं भी कलाकार दिखाई पड़ते हों, उनके पास आप जरूर जाना। उनसे कहना कि भगवान् ने आपको मीठा वाला गला दिया है, आपको गाने की कला आती है। आप इस गाने की कला के द्वारा जिस तरीके से कामुकता के गीत, अंध विश्वासों का समर्थन करने वाले गीत और भक्ति के नाम पर शृंगार रस के गीत गाया करते हैं।

🔷 इनके स्थान पर कहीं आप चंदवरदायी के तरीके से समय को कँपाने वाले, भूषण के तरीके से समय को कँपाने वाले, युगों में जीवन भरने वाले गीत आप इसी गले के द्वारा गाने लगें, चौराहे-चौराहे पर खड़े होकर अलख जगाने लगें-गाँव-गाँव जाकर लोगों को इकट्ठा करके गीत की कला का उपयोग करने लगें, तो आपके यही गीत आपका यही गला और गले की मिठास सैकड़ों-हजारों मनुष्यों के जीवन में हेर-फेर करने में समर्थ हो सकती है। मीरा का गला, मीरा की मिठास और मीरा का संगीत कितने आदमियों के जीवन में हेर-फेर करने में समर्थ हो गया। अतः हमको उस हर मीठे गले वाले व्यक्ति से कहना चाहिए, जिसको ये विशेषताएँ और विभूतियाँ भगवान् ने अमानत के रूप में विशेष रूप से दी हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 59)

👉 मद्गुरुः श्री जगद्गुरुः

🔷 इस सत्य को उजागर करने वाली एक सच्ची घटना यहाँ पर कहने का मन है। इस घटना पर मनन करके श्री गुरुदेव की कृपा का अनुभव किया जा सकता है। यह सत्यकथा रूसी सन्त गुरजिएफ एवं उनके एक शिष्य रूशिल मिनकोव के बारे में है। गुरजिएफ महात्मा कबीर की भाँति बड़े अक्कड़-फक्कड़ सन्त हुए हैं। वे परम ज्ञानी होने के साथ आध्यात्मिक रहस्यों के महान् जानकार थे। इस सब के बावजूद उनका व्यवहार काफी अटपटा-बेबूझ और विचित्र सा होता था। उनके शिष्य समझ ही नहीं पाते थे कि ये क्यों और किसलिए ऐसा कर रहे हैं। पर शायद यही शिष्यों की परीक्षा का उनका ढंग था। इसी कसौटी पर वे शिष्यों की श्रद्धा को जाँचा-परखा करते थे। जो इस जाँच-परख में सही पाया गया, वही आध्यात्मिक ज्ञान के लिए सुयोग्य पात्र समझा जाता था।
  
🔶 रूशिल मिनकोव ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि उनके साथ यह परीक्षा लगातार चौबीस सालों तक चलती रही। रूशिल लिखते हैं कि वह लगभग साढ़े तेईस साल की आयु में गुरजिएफ से मिले थे। बातचीत एवं श्रद्धा की अभिव्यक्ति के क्रम में उन्होंने कहा- गुरुदेव मैं अध्यात्म विद्या पाना चाहता हूँ। शिष्य की इस चाहत पर गुरजिएफ बोले- ठीक है मिलेगी; पर देख, पाँव जमाकर इस कोठरी में रहना। जो भी हो उसे सहना, भागना मत। पीड़ा, परेशानी, अपमान, तिरस्कार सभी कुछ यदि तू सहता रहा, तो समझ तू वह सब पा जाएगा जिसकी तुझे चाहत है। अपने, गुरु के इस कथन पर मिनकोव ने हाँ भर दी। हालाँकि उसे उस समय भविष्य में आने वाली परेशानियों का कोई अन्दाजा नहीं था।
  
🔷 गुरजिएफ के शरीर छोड़ते ही उस पर एक के बाद एक नए-नए वज्रपात होना शुरू हो गए। सालों-साल चलने वाली शारीरिक व्याधियाँ, जैसे-तैसे घिसट-घिसट कर चलता जीवन। हालाँकि मिनकोव अपनी पीड़ाओं के बावजूद किसी अन्य की सहायता करने से चूकता नहीं था। जिनकी वह सहायता करता उसमें पुरुष-स्त्रियाँ, बच्चे सभी शामिल थे। अपनी सारी सहायताओं एवं सभी अच्छे कर्मों के बदले उसे वंचना ही मिली। प्रत्येक सत्कर्म के बदले दुष्परिणाम! जब तब लगने वाले चारित्रिक लांछन उसे प्रायः पीड़ाओं में डुबोए रखते; पर करता भी क्या? श्री गुरुदेव को दिया गया वचन था। ऐसी ही विपत्तियों से जूझते-जूझते अठारह वर्ष बीत गए। हालाँकि संकट यथावत् थे।
  
🔶 उसके मन में शंकाएँ घर करने लगीं; क्योंकि शरीर छोड़ने के बाद गुरजिएफ ने उसे स्वप्न में भी दर्शन नहीं दिए थे। पर इस उन्नीसवें साल में गुरजिएफ की एक अन्य शिष्या ने उसे बताया कि अभी ६ वर्षों की सघन पीड़ाएँ सहनी है। गुरुदेव यही चाहते हैं। ६ सालों के सघन मानसिक यातना एवं कठोर श्रम के बाद ही तुम्हारे  जीवन में प्रकाश का अवतरण होगा। मिनकोव  ने छः वर्ष भी बिताए और अपने निष्कर्ष में कहा कि आज मैं गुरुदेव की कृपा को अनुभव कर रहा हूँ, जो कर्मजाल शायद अनेकों जन्मों में भी न कटता, उन्होंने मात्र चौबीस सालों में ही काट दिया। सद्गुरु जिस पर जितना ज्यादा कठोर हैं, समझो उस पर उतने ही अधिक कृपालु हैं। मिनकोव की ये बातें रहस्यमय होते हुए भी सद्गुरु की करुणा को जताती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 95

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 09 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 09 March 2018


👉 जीवन सम्पदा:-

🔷 एक सुबह, अभी सूरज भी निकला नहीं था और एक मांझी नदी के किनारे पहुंच गया था। उसका पैर किसी चीज से टकरा गया , झुक कर उसने देखा, पत्थरों से भरा हुआ एक झोला पड़ा था।

🔶 उसने अपना जाल किनारे पर रख दिया, वह सुबह सूरज के उगने की प्रतीक्षा करने लगा। सूरज उग आए, वह अपना जाल फेंके और मछलियां पकड़े।

🔷 वह जो झोला उसे पड़ा हुआ मिल गया था, जिसमें पत्थर थे, वह एक-एक पत्थर निकाल कर शांत नदी में फेंकने लगा ।सुबह के सन्नाटे में उन पत्थरों के गिरनेकी छपाक की आवाज सुनता, फिर दूसरा पत्थर फेंकता । धीरे-धीरे सुबह का सूरज निकला, रोशनी हुई। तब तक उसने झोले के सारे पत्थर फेंक दिए थे, सिर्फ एक पत्थर उसके हाथ में रह गया था।

🔶 सूरज की रोशनी में देखते से ही जैसे उसके हृदय की धड़कन बंद हो गई, सांस रुक गई। उसने जिन्हें पत्थर समझ कर फेंक दिया था, वे हीरे-जवाहरात थे! लेकिन अब तो अंतिम हाथ में बचा था टुकड़ा और वह पूरे झोले को फेंक चुका था।

🔷 वह रोने लगा, चिल्लाने लगा। इतनी संपदा उसे मिल गई थी कि अनंत जन्मों के लिए काफी थी, लेकिन अंधेरे में, अनजान, अपरिचित, उसने उस सारी संपदा को पत्थर समझ कर फेंक दिया था ।लेकिन फिर भी वह मछुआ सौभाग्यशाली था क्योंकि अंतिम पत्थर फेंकने के पहले सूरज निकल आया था और उसे दिखाई पड़ गया था कि उसके हाथ में हीरा है।

🔶 साधारणतः सभी लोग इतने सौभाग्यशाली नहीं होते हैं। जिंदगी बीत जाती है, सूरज नहीं निकलता, सुबह नहीं होती, रोशनी नहीं आती और सारे जीवन के हीरे हम पत्थर समझ कर फेंक चुके होते हैं।

🔷 जीवन एक बड़ी संपदा है, लेकिन आदमी सिवाय उसे फेंकने और गंवाने के कुछ भी नहीं करता है! जीवन क्या है, यह भी पता नहीं चल पाता और हम उसे फेंक देते हैं! जीवन में क्या छिपा था--कौन से राज, कौन सा रहस्य, कौन सा स्वर्ग, कौन सा आनंद, कौन सी मुक्ति--उस सबका कोई भी अनुभव नहीं हो पाता और जीवन हमारे हाथ से रिक्त हो जाता है!

🔶 गुरू रूपी प्रकाश किसी को मिल जाता है तो शेष जीवन तो संवर ही जाता है।

गुरुवार, 8 मार्च 2018

👉 "हर दिन ....हर पल.... सम्मान की अधिकारिणी हैं नारियां"


हे ममतामयी नारियां!!
देखी आपकी कई कुर्बानियां.....
न मांगी तुमनें कभी अपने किये की,
उपहार या कोई झाकियां.....
पर करते गयी कुर्बानियां.....

जन्म जब हुआ बेटी बन आयी,
माता पिता के सम्मान के लिए.....
भाइयों के मान के लिए......
जीती रही....तुम जीती रही!!!!

जतन सारी करती रही......
बात- बात पर टोका गया.....
जगह -जगह हर काम पर रोका गया......
ये मत कर!वंहा मत जा.....

क्यो मां?? आखिर तू एक लड़की हैं.........
जब तक हैं... इस घर में मेहमान है....
तेरे पति का घर ही तेरा संसार है ......
न माँ.... न भेज मुझे अनजान जगह......

जो बोलेगी कर दूंगी......
किसी बात पे एक शब्द न कहूंगी,
रहने दे मुझे.... मेरे ही अंगना......
बाबा...न भेज मुझे दुंजे अंगना....

बेटा !!यही तो बेटी का भाग्य होता हैं.......
खुश रहना तू... अपने पति के अंगना......
जा......मेरी लाडली जा......
आगयी वह दूजे घर अंगना.....

मान बैठी उसे भाग्य अपना....
मैं आज तुम्हे वचन देती हूं......
तुम्हारे हर चीज को अपने से भी बढ़ कर समझूँगी.......
अपने घर का हर काम करूँगी.....

हे मेरे देव!!तुम्हारी सेवा कर......
तुम्हे संतति दूंगी.......
आपकी हर इच्छा पूरी करूँगी.....
आपके माता पिता को अपना मानूँगी......

उनकी हमेशा सेवा करूँगी......
पर फिर भी बात बात पर प्रताड़ित हुई......
जिसे ईश्वर समझ सब अर्पण किया.....
उसने ही न मुझे एक पल को समझा......

ये कर दिया.....उस काम को कर लिया .....खाना समय पर बना देना......
माँ को दवा दे देना......सब किया.....
न कोई मांग की......
बस मेरे परमेश्वर!! तुम्हारे प्रेम भरे शब्दों की ही मोहताज़ रही......

पर तब भी आपने न मेरी ओर देखा......
न मेरे भावों को समझा.....
जो जीवन में कभी न काम की.....
वो आपके घर रोसोइ को ही अपना सौभाग्य समझी.......

इतना पढ़ लिख इतनी डिग्री बनाई......
वह नारी समर्पण कर.....
घर के कामों की नौकरी में लग गयी.......
यह दूसरा युग भी बिता.....

अब वह एक माँ बन गयी......
जन्म दे अपने शिशु को वह पागलों सी झूमी......
उसे अपने खून से सींचा......
खुद भूखी रही पर उसे देखा.....हर बात का ध्यान वह रखी......

सारा प्रेम और वात्सल्य उस पर उड़ेल दी.......
पर सौगात क्या मिला.......
तुमने मेरे लिए क्या किया,
हर बार सुनना पड़ा........

अंत में बच्चों ने किए का सौगात दिया.......
वृद्धा आश्रम में रह माँ,
तुझे देखने का मेरे पास वक़्त कँहा........
सभी शक्ति स्वरूपा देवी स्वरूप नारियों को हृदय से नमन वंदन.....

कृपया हर बहन,माँ, बेटी,बहु का सम्मान करें........
ऐसी त्यागनियों को प्रोत्साहित करें🙏🏻🙏🏻

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मंगलवार, 6 मार्च 2018

👉 "तीव्र वैराग्य किसे कहते हैं।

🔶 किसी देश में एक बार वर्षा कम हुई। किसान नालियाँ काट-काटकर दूर से पानी लाते थे। एक किसान बडा़ हठी था। उसने एक दिन शपथ ली कि जब पानी न आने लगे, नहर से नाली का योग न हो जाए, तब तक बराबर नाली खोदूँगा। इधर नहाने का समय हुआ। उसकी स्त्री ने लड़की को उसे बुलाने भेजा। लड़की बोली, 'पिताजी, दोपहर हो गयी, चलो तुमको माँ बुलाती है। 'उसने कहा, तू चल, हमें अभी काम है।' दोपहर ढल गयी, पर वह काम पर हटा रहा। नहाने का नाम न लिया।

🔷 तब उसकी स्त्री खेत में जाकर बोली, 'नहाओगे कि नहीं? रोटियाँ ठण्डी हो रही हैं। तुम तो हर काम में हठ करते हो। काम कल करना या भोजन के बाद करना।' गालियाँ देता हुआ कुदाल उठाकर किसना स्त्री को मारने दौडा़ बोला, 'तेरी बुद्धि मारी गयी है क्या? देखती नहीं कि पानी नहीं बरसता; खेती का काम सब पडा़ है; अब की बार लड़के-बच्चे क्या खाएँगे? सब को भूखों मरना होगा। हमने यही ठान लिया है कि खेत में पहले पानी लायेंगे, नहाने-खाने की बात पीछे होगी।' मामला टेढा़ देखकर उसकी स्त्री वहाँ से लौट पडी़।

🔶 किसान ने दिनभर जी तोड़ मेहनत करके शाम के समय नहर के साथ नाली का योग कर दिया। फिर एक किनारे बैठकर देखने लगा, किस तरह नहर पानी खेत में 'कलकल' स्वर से बहता हुआ आ रहा है, तब उसका मन शान्ति और आनन्द से भर गया। घर पहुँचकर उसने स्त्री को बुलाकर कहा, 'ले आ अब डोल और रस्सी।' स्नान भोजन करके निश्चिन्त करके निश्चिन्त होकर फिर वह सुख से खुर्राटे लेने लगा। जिद यह है और यही तीव्र वैराग्य की उपमा है।
     
🔷 "खेत में पानी लाने के लिए एक और किसान गया था। उसकी स्त्री जब गयी और बोली, 'धूप बहुत हो गयी, चलो अब, इतना काम नहीं करते', तब वह चुपचाप कुदाल एक ओर रखकर बोला, 'अच्छा, तू कहती है तो चलो।' (सब हँसते हैं।) वह किसान खेत में पानी न ला सका। यह मन्द वैराग्य की उपमा है।
       
🔶 " हठ बिना जैसे किसान खेत में पानी नहीं ला सकता, वैसे ही मनुष्य ईश्वरदर्शन नहीं कर सकता।"

रामकृष्ण परमहंस
(रामकृष्ण वचनामृत से)

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 07 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 07 March 2018


👉 अचिन्त्य चिन्तन से मनोबल न गँवाएँ (भाग 5)

🔶 निराशा इससे बुरी है। वह सोचती भी है और चाहती भी, किन्तु साथ ही अपनी असमर्थता, भाग्य की मार, परिस्थितियों की प्रतिकूलता, साथी की बेरुखी जैसी निषेधात्मक संभावनाओं पर ध्यान केन्द्रित करती है और कदम उठाने से पहले ही असफल रहने का दृश्य देखती और हार मान लेती है। ऐसे लोग उदास रहने वालों की अपेक्षा अधिक दीन-हीन स्थिति में होते हैं और सन्तोष भी हाथ से गँवा बैठते हैं।

🔷 अशुभ की आशंका जिन्हें डराती रहती है, वे चिन्तातुर पाये जाते हैं। कुछ चाहते तो हैं, किन्तु सूझ-बूझ और पुरुषार्थ के अभाव को परिस्थितिजन्य गतिरोध मान बैठते हैं। अपने को ऐसे चक्रव्यूह में फँसा पाते हैं जिसमें से बच निकलने का रास्ता अवरुद्ध पाते हैं। इस स्तर के व्यक्ति चिन्तातुर देखे जाते हैं, घबराहट में सिर धुनते हैं, हड़बड़ी में कुछ का कुछ कहते, कुछ करते और सोचते हैं, वह सब बेतुका होता है। अपनी परेशानी साथियों के सामने इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं मानो आकाश टूटकर उन्हीं पर गिरा हो। यों इस कथन में उनका प्रयोजन सहायता न सही, सहानुभूति पाने का तो होता ही है, पर वे यह भूल जाते हैं कि हारते का सभी साथ छोड़ देते हैं।

🔶 मित्र भी कन्नी काटने लगते हैं। इस दुनियाँ में सफल, साहसी और समर्थ को ही साथियों का भी सहारा मिलता है। डूबते को देखकर लोग दूर रहते हैं, ताकि चपेट में आकर कहीं उन्हें भी न डूबना पड़े। उदार, परोपकारी तो जहाँ-तहाँ उँगलियों पर गिनने जितनी संख्या में ही पाये जाते हैं। ऐसी दशा में चिन्तातुर, निराश, भयभीत, संत्रस्त कायर, दुर्बल होने की दुहाई देने के नाम पर यदि सहानुभूति मिलेगी, वह भी उथली एवं व्यंग-तिरस्कार से भरी हुई होगी। सहायता तो कहीं से कदाचित ही मिल सके। यह भी हो सकता है जिनसे सामान्य स्थिति में थोड़ी बहुत सहायता की आशा थी, उससे भी हाथ धोना पड़े।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How long can we go on tolerating vulgarly and extravagant weddings? (Part 1)

A strange contradiction

🔶 We have just entered the third millennium. The literacy rate is on the rise. Plethora of creature comforts is available in ever-improving models and designs. There was a time when owning a scooter or a cycle was a matter of pride, but now car has become a basic necessity, be it a village or a town.  If we just leave aside the extremely poor segment, we will see that mobile, fridge, microwave, TV, home theater, car and several other things have become basic necessities. This list has been increasing for the past fifteen years.

🔷 We certainly cannot take this as a symbol of financial prosperity and should acknowledge this as crass consumerism. Our country represents a glaring contradiction where on one side, vast majority of the population is a victim of poverty, illiteracy, unhygienic living conditions, etc while on the other side an affluent minority owns flats, skyscrapers and modern means of entertainment. On one side lie the dirty slums, while on the other side are palatial mansions; on one side there are extreme crowds at the railway stations / bus stands while on the other side there is equal rush at the airports. The capacity of the creamy layer of society to splurge has increased. We see places full of multiplexes and malls.

📖 From Akhand Jyoti
✍🏻 Pranav Pandya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 22)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 स्वास्थ्य की शिक्षा अभी प्रारंभ नहीं हुई है। हम और आप वकील हों, तो मुबारक, लेकिन आपको नहीं मालूम कि पेट खराब क्यों हो गया? और पेट को खराब होने से बचाने के लिए क्या तरीका होना चाहिए। क्या आपके पास इसके लिए कोई स्कूल है? दवाखाने वाले तो वो चीज हैं कि जहाँ कहीं भी जाइए, हर चीज का इंजेक्शन लगा देंगे। उन्हें ये मालूम नहीं है कि वजह क्या है और किसकी वजह से सेहत खराब कर रहा है। उन सेहत खराब करने वाली खुराक और आदतों को जब तक ये हेर-फेर नहीं करेगा, तब तक उसकी सेहत कभी भी अच्छी नहीं हो सकेगी, चाहे वह रोज एक-एक दिन में बीस इंजेक्शन लगवाता चला जाए। व्यक्ति इंजेक्शन से कदापि अच्छा नहीं हो सकता। सेहत को अच्छा करने के लिए शिक्षण की आवश्यकता है।

🔷 मित्रो! हमको शिक्षण की प्रक्रिया राष्ट्र में पैदा करनी पड़ेगी। विद्या हमारे देश में नहीं है। साक्षरता हमारे देश में नहीं है। उसको बढ़ाने के लिए हमको नाइट स्कूलों की जरूरत पड़ेगी। विद्या के लिए घनघोर आंदोलन खड़ा करना पड़ेगा और इस आंदोलन के लिए हम नौकर नहीं रख सकते, कर्मचारी नहीं रख सकते और वेतन-भोगी नहीं रख सकते। गवर्नमेंट ने इस तरह के वेतन-भोगी रख लिए हैं और आप देखिए क्या हाल हो रहा है? हर डिपार्टमेंट को बढ़ा-बढ़ाकर इतना लंबा चौड़ा कर लिया है कि अगर इतना पैसा इन डिपार्टमेंट में नहीं लगाया गया होता, तो उस बचत से शिक्षण-प्रशिक्षण की समस्या सुलझ गई होती।

🔶 मित्रो! हमको जो काम करना पड़ेगा, उन क्षमता वालों के आधार पर और प्रतिभा वालों के आधार पर करना पड़ेगा। अपना यह मिशन कितना जबरदस्त मिशन है। इसको आगे बढ़ाने के लिए हमको उन आदमियों के पास जाना पड़ेगा, जिनके पास विचारशीलता भी विद्यमान है और क्षमता भी विद्यमान है। विचारशीलता नहीं है और क्षमता है, तो हमको यह कोशिश करनी पड़ेगी कि अपने मिशन की विचारधारा को, मिशन की पुस्तिकाओं को, मिशन के ट्रैक्टों को उनको बार-बार सुनाएँ और किसी प्रकार से इस तरीके से लाएँ कि वे हमारी विचारधारा के संपर्क में आएँ। अगर कोई आदमी हमारी विचारधारा के संपर्क में आ गया, तो यह बड़ी जलती हुई विचारधारा है, यह बड़ी तीखी और प्रखर विचारधारा है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 58)

👉 मद्गुरुः श्री जगद्गुरुः

🔶 परम आराध्य गुरुदेव इस जड़-चेतन, चर-अचर सम्पूर्ण जगत् में संव्याप्त हैं। उन सद्गुरु को नमन है॥ ७१॥ ज्ञान शक्ति पर आरूढ़, सभी तत्त्वों की माला से विभूषित गुरुदेव भोग एवं मोक्ष दोनों ही फल प्रदान करने वाले हैं। उन कृपालु सद्गुरु को नमन है॥ ७२॥ जो अपने आत्मज्ञान के प्रभाव से शिष्य के अनेक जन्मों से संचित सभी कर्मों को भस्मसात कर देते हैं, उन कृपालु सद्गुरु को नमन है॥ ७३॥ श्री गुरुदेव से बढ़कर अन्य कोई तत्त्व नहीं है। श्री गुरु सेवा से बढ़कर कोई दूसरा तप नहीं है, उनसे बढ़कर अन्य कोई ज्ञान नहीं है, ऐसे कृपालु गुरुदेव को नमन है॥ ७४॥ मेरे स्वामी गुरुदेव ही जगत् के स्वामी हैं। मेरे गुरुदेव ही जगत्गुरु हैं। मेरे आत्म स्वरूप गुरुदेव समस्त प्राणियों की अन्तरात्मा हैं। ऐसे श्री गुरुदेव को मेरा नमन है॥ ७५॥
  
🔷 सद्गुरु महिमा का यह मंत्रात्मक स्तोत्र अपने आप में अनेकों दार्शनिक रहस्यों को समाए हैं। इसमें श्रद्धा एवं चिन्तन दोनों का ही मेल है। सद्गुरुदेव की पराचेतना न केवल सर्वव्यापी है; बल्कि शिष्य के सभी पूर्वसंचित कर्मों को नष्ट करने में समर्थ है। सचमुच ही गुरुदेव से श्रेष्ठ अन्य कोई भी तत्त्व या सत्य नहीं है; क्योंकि जो कर्म के गहनतम रहस्य को जानते हैं, उनके लिए यह बड़ा ही स्पष्ट है कि कर्मों के क्रूर, कुटिल कुचक्र से सद्गुरु ही उबारने में समर्थ होते हैं। तभी तो गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस में कहा है- गुरु बिनु भव निधि तरइ न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई॥ यानि कि श्री गुरुदेव के बिना कोई भी संसार सागर को नहीं पार कर सकता, फिर भले ही ब्रह्मा अथवा शिव की भाँति ही समर्थ क्यों न हों।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 94

सोमवार, 5 मार्च 2018

👉 मेरे पापा की औकात

🔷 पाँच दिन की छूट्टियाँ बिता कर जब ससुराल पहुँची तो पति घर के सामने स्वागत में खड़े थे। अंदर प्रवेश किया तो छोटे से गैराज में चमचमाती गाड़ी खड़ी थी स्विफ्ट डिजायर!

🔶 मैंने आँखों ही आँखों से पति से प्रश्न किया तो उन्होंने गाड़ी की चाबियाँ थमाकर कहा:-"कल से तुम इस गाड़ी में कॉलेज जाओगी प्रोफेसर साहिबा!"

🔷 "ओह माय गॉड!!''

🔶 ख़ुशी इतनी थी कि मुँह से और कुछ निकला ही नही। बस जोश और भावावेश में मैंने तहसीलदार साहब को एक जोरदार झप्पी देदी और अमरबेल की तरह उनसे लिपट गई। उनका गिफ्ट देने का तरीका भी अजीब हुआ करता है।

🔷 सब कुछ चुपचाप और अचानक!! खुद के पास पुरानी इंडिगो है और मेरे लिए और भी महंगी खरीद लाए।

🔶 6 साल की शादीशुदा जिंदगी में इस आदमी ने न जाने कितने गिफ्ट दिए। गिनती करती हूँ तो थक जाती हूँ। ईमानदार है रिश्वत नही लेते । मग़र खर्चीले इतने कि उधार के पैसे लाकर गिफ्ट खरीद लाते है।

🔷 लम्बी सी झप्पी के बाद मैं अलग हुई तो गाडी का निरक्षण करने लगी। मेरा फसन्दीदा कलर था। बहुत सुंदर थी। फिर नजर उस जगह गई जहाँ मेरी स्कूटी खड़ी रहती थी।
हठात! वो जगह तो खाली थी।

🔶 "स्कूटी कहाँ है?" मैंने चिल्लाकर पूछा। "बेच दी मैंने, क्या करना अब उस जुगाड़ का? पार्किंग में इतनी जगह भी नही है।" "मुझ से बिना पूछे बेच दी तुमने??"

🔷 "एक स्कूटी ही तो थी; पुरानी सी। गुस्सा क्यूँ होती हो?" उसने भावहीन स्वर में कहा तो मैं चिल्ला पड़ी:-"स्कूटी नही थी वो। मेरी जिंदगी थी। मेरी धड़कनें बसती थी उसमें। मेरे पापा की इकलौती निशानी थी मेरे पास।

मैं तुम्हारे तौफे का सम्मान करती हूँ मगर उस स्कूटी के बिना पे नही। मुझे नही चाहिए तुम्हारी गाड़ी। तुमने मेरी सबसे प्यारी चीज बेच दी। वो भी मुझसे बिना पूछे।'"

🔷 मैं रो पड़ी। शौर सुनकर मेरी सास बाहर निकल आई। उसने मेरे सर पर हाथ फेरा तो मेरी रुलाई और फुट पड़ी। "रो मत बेटा, मैंने तो इससे पहले ही कहा था। एक बार बहु से पूछ ले। मग़र बेटा बड़ा हो गया है। तहसीलदार!! माँ की बात कहाँ सुनेगा?

🔶 मग़र तू रो मत। और तू खड़ा-खड़ा अब क्या देख रहा है वापस ला स्कूटी को।" तहसीलदार साहब गर्दन झुकाकर आए मेरे पास। रोते हुए नही देखा था मुझे पहले कभी। प्यार जो बेइन्तहा करते हैं।

🔷 याचना भरे स्वर में बोले:- सॉरी यार! मुझे क्या पता था वो स्कूटी तेरे दिल के इतनी करीब है। मैंने तो कबाड़ी को बेचा है सिर्फ सात हजार में। वो मामूली पैसे भी मेरे किस काम के थे? यूँ ही बेच दिया कि गाड़ी मिलने के बाद उसका क्या करोगी? तुम्हे ख़ुशी देनी चाही थी आँसू नही। अभी जाकर लाता हूँ। " फिर वो चले गए।

🔶 मैं अपने कमरे में आकर बैठ गई। जड़वत सी। पति का भी क्या दोष था। हाँ एक दो बार उन्होंने कहा था कि ऐसे बेच कर नई ले ले। मैंने भी हँस कर कह दिया था कि नही यही ठीक है। लेकिन अचानक स्कूटी न देखकर मैं बहुत ज्यादा भावुक हो गई थी। होती भी कैसे नही।

🔷 वो स्कूटी नही "औकात" थी मेरे पापा की।

🔶 जब मैं कॉलेज में थी तब मेरे साथ में पढ़ने वाली एक लड़की नई स्कूटी लेकर कॉलेज आई थी। सभी सहेलियाँ उसे बधाई दे रही थी। तब मैंने उससे पूछ लिया:- "कितने की है?
उसने तपाक से जो उत्तर दिया उसने मेरी जान ही निकाल ली थी:-" कितने की भी हो? तेरी और तेरे पापा की औकात से बाहर की है।"

🔷 अचानक पैरों में जान नही रही थी। सब लड़कियाँ वहाँ से चली गई थी। मगर मैं वही बैठी रह गई। किसी ने मेरे हृदय का दर्द नही देखा था। मुझे कभी यह अहसास ही नही हुआ था कि वे सब मुझे अपने से अलग "गरीब"समझती थी। मगर उस दिन लगा कि मैं उनमे से नही हूँ।

🔶 घर आई तब भी अपनी उदासी छूपा नही पाई। माँ से लिपट कर रो पड़ी थी। माँ को बताया तो माँ ने बस इतना ही कहा" छिछोरी लड़कियों पर ज्यादा ध्यान मत दे! पढ़ाई पर ध्यान दे!" रात को पापा घर आए तब उनसे भी मैंने पूछ लिया:-"पापा हम गरीब हैं क्या?"

🔷 तब पापा ने सर पे हाथ फिराते हुए कहा था"-हम गरीब नही हैं बिटिया, बस जरासा हमारा वक़्त गरीब चल रहा है।" फिर अगले दिन भी मैं कॉलेज नही गई। न जाने क्यों दिल नही था। शाम को पापा जल्दी ही घर आ गए थे। और जो लाए थे वो उतनी बड़ी खुशी थी मेरे लिए कि शब्दों में बयाँ नही कर सकती। एक प्यारी सी स्कूटी। तितली सी। सोन चिड़िया सी। नही, एक सफेद परी सी थी वो। मेरे सपनों की उड़ान। मेरी जान थी वो। सच कहूँ तो उस रात मुझे नींद नही आई थी। मैंने पापा को कितनी बार थैंक्यू बोला याद नही है। स्कूटी कहाँ से आई ? पैसे कहाँ से आए ये भी नही सोच सकी ज्यादा ख़ुशी में। फिर दो दिन मेरा प्रशिक्षण चला। साईकिल चलानी तो आती थी। स्कूटी भी चलानी सीख गई।

🔶 पाँच दिन बाद कॉलेज पहुँची। अपने पापा की "औकात" के साथ। एक राजकुमारी की तरह। जैसे अभी स्वर्णजड़ित रथ से उतरी हो। सच पूछो तो मेरी जिंदगी में वो दिन ख़ुशी का सबसे बड़ा दिन था। मेरे पापा मुझे कितना चाहते हैं सबको पता चल गया। मग़र कुछ दिनों बाद एक सहेली ने बताया कि वो पापा के साईकिल रिक्सा पर बैठी थी। तब मैंने कहा नही यार तुम किसी और के साईकिल रिक्शा पर बैठी हो। मेरे पापा का अपना टेम्पो है।

🔷 मग़र अंदर ही अंदर मेरा दिमाग झनझना उठा था। क्या पापा ने मेरी स्कूटी के लिए टेम्पो बेच दिया था। और छः महीने से ऊपर हो गए। मुझे पता भी नही लगने दिया। शाम को पापा घर आए तो मैंने उन्हें गोर से देखा। आज इतने दिनों बाद फुर्सत से देखा तो जान पाई कि दुबले पतले हो गए है। वरना घ्यान से देखने का वक़्त ही नही मिलता था। रात को आते थे और सुबह अँधेरे ही चले जाते थे। टेम्पो भी दूर किसी दोस्त के घर खड़ा करके आते थे। कैसे पता चलता बेच दिया है।

🔶 मैं दौड़ कर उनसे लिपट गई!:-"पापा आपने ऐसा क्यूँ किया?" बस इतना ही मुख से निकला। रोना जो आ गया था। " तू मेरा ग़ुरूर है बिटिया, तेरी आँख में आँसू देखूँ तो मैं कैसा बाप? चिंता ना कर बेचा नही है। गिरवी रखा था। इसी महीने छुड़ा लूँगा।"

🔷 "आप दुनिया के बेस्ट पापा हो। बेस्ट से भी बेस्ट।इसे सिद्ध करना जरूरी कहाँ था? मैंने स्कूटी मांगी कब थी?क्यूँ किया आपने ऐसा? छः महीने से पैरों से सवारियां ढोई आपने। ओह पापा आपने कितनी तक़लीफ़ झेली मेरे लिए ? मैं पागल कुछ समझ ही नही पाई ।" और मैं दहाड़े मार कर रोने लगी। फिर हम सब रोने लगे। मेरे दोनों छोटे भाई। मेरी मम्मी भी।

🔶 पता नही कब तक रोते रहे। वो स्कूटी नही थी मेरे लिए। मेरे पापा के खून से सींचा हुआ उड़नखटोला था मेरा। और उसे किसी कबाड़ी को बेच दिया। दुःख तो होगा ही।

🔷 अचानक मेरी तन्द्रा टूटी। एक जानी-पहचानी सी आवाज कानो में पड़ी। फट-फट-फट,, मेरा उड़नखटोला मेरे पति देव यानी तहसीलदार साहब चलाकर ला रहे थे। और चलाते हुए एकदम बुद्दू लग रहे थे। मगर प्यारे से बुद्दू। मुझे बेइन्तहा चाहने वाले राजकुमार बुद्दू...

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 06 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 06 March 2018


👉 अचिन्त्य चिन्तन से मनोबल न गँवाएँ (भाग 4)

🔷 आलस्य शरीर को स्वेच्छापूर्वक अपंग बनाकर रख देने की प्रक्रिया है। इसी प्रकार प्रमाद मन को जकड़ देने वाली रीति-नीति है। प्रमादी सोचने का कष्ट सहन करना नहीं चाहता है, जो चल रहा है, उसी से समझौता कर लेता है। नया कुछ सोच न सकने पर, नया साहस न जुटा सकने पर, प्रगति की सुखद कल्पनाएँ करते रहना शेखचिल्ली की तरह उपहासास्पद बनना है। आलसी उन कामों को नहीं करते जो बिना कठिनाई के तत्काल किये जा सकते थे। इसी प्रकार प्रमादी उतार-चढ़ावों के सम्बन्ध में कुछ भी सोचने का कष्ट नहीं उठाते, मात्र जिस-तिस पर दोषारोपण करते हुए दुर्भाग्य का रोना रोते हुए मन हल्का करते रहते हैं, जबकि दोष उनका अपना होता है।

🔶 परिस्थितियों को बदलने, सुधारने के लिए जिस सूझबूझ, धैर्य, संतुलन, साहस एवं प्रयास की आवश्यकता पड़ती है, उसे जुटा न पाने का प्रतिफल यह होता है कि अनीति जड़ जमा लेती है। पिछड़ापन ऐसा सहचर बनकर बैठ जाता है जिसे हटाने या बदलने जैसी कोई बात बनती ही नहीं। अस्त-व्यस्त विचारों को यदि वर्तमान को सुधारने वाले उपाय ढूँढ़ने में लगाया जा सके और वर्तमान परिस्थितियों से तालमेल बिठाते हुए अगला कदम क्या हो सकता है, यदि इस पर व्यवहारिक दृष्टि से चिन्तन किया जा सके तो प्रगतिपथ पर बढ़ चलने का कोई मार्ग अवश्य मिलेगा। पर जिसने पत्थर जैसी जड़ता अपना ली है, उसे रचनात्मक प्रयासों में लग पड़ने के लिए न आलस्य छूट देता है, न विचारों की असंगत उड़ानों से निरत करके कुछ व्यवहारिक उपाय सोचने की सुविधा प्रमाद की खुमारी रहते बन पड़ती है। वस्तुतः प्रगतिशीलता के यही दो अवरोध चट्टान की तरह अड़ते हैं। इन्हें हटाये बिना कोई गति नहीं, कोई प्रगति नहीं।

🔷 मनुष्य को हीन बनाने वाले मनोविकारों में उदासी और निराशा प्रमुख हैं। पेट भरने के बाद नदी की बालू में लोटपोट करने वाले मगर और उदरपूर्ति के उपरान्त कीचड़ में मस्त होकर पड़े रहने वाले वाराह को फिर दीन-दुनिया की कोई सुध नहीं रहती। जब बासी पच जाता है और झोले में खालीपन प्रतीत होता है, तभी वे उठने और कुछ करने की बात सोचते हैं। ‘‘पंछी करे ना चाकरी, अजगर करे न काम’’ का उदाहरण बनकर जो समस्त कामनाओं से रहित परमहंसों की तरह दिन गुजारते हैं और ‘‘राम भरोसे जा रहे, पर्वत पै हरियाय’’ के भाग्य भरोसे जो समय काटते हैं, उन्हें ‘‘ना काहू सो दोस्ती, ना काहू सो बैर’’  वाली स्थिति रहती है। वे न कल की सोचते हैं न परसों की। उन उदासीनता सम्प्रदाय का दर्शन अपनाने वालों के लिए प्रगति और अवगति से कुछ लेना-देना नहीं होता, मुट्ठी बाँध कर आते और हाथ पसार कर चले जाते हैं, न शुभ की आकांक्षा, न अशुभ की उपेक्षा, ऐसी उदासीनता पिछड़े और गये गुजरे स्तर का प्रतीक है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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