शुक्रवार, 9 मार्च 2018

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 23)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 सौ फीसदी मरा हुआ आदमी हो, तब तो हम नहीं कह सकते, लेकिन कोई अगर जिंदा आदमी होगा, तो उसको एक बार तड़फड़ाए बिना, उसको एक बार हिलाए बिना नहीं रह सकती। माला वालों को तो यह शायद जगाएगी नहीं। माला वाले तो अखण्ड ज्योति का चंदा इसलिए भेज देते हैं कि गुरुजी नाराज हो जाएँगे और अगली बार मुकदमे में सहायता नहीं करेंगे। वे पत्रिका को पढ़ते थोड़े ही हैं, कोई नहीं पढ़ते, लेकिन जिन लोगों ने इन विचारों को पढ़ा है, वे आदमी काँपते हैं, हिलते हैं। उन आदमियों के अंदर एक स्पंदन पैदा होता है, फुरेरी पैदा होती है।

🔶 आप इन विचारों को लेकर सामान्य जनता तक जरूर जाना। लेकिन सामान्य जनता के अलावा कोई विशेष आदमी दिखाई पड़ते हों, जिनके अंदर आपको जीवट दिखाई पड़ती हो, प्रतिभा दिखाई पड़ती हो, उनके पास आप जरूर जाना विद्यावानों के पास, प्रतिभावानों के पास, कलाकारों के पास जाना। जहाँ कहीं भी कलाकार दिखाई पड़ते हों, उनके पास आप जरूर जाना। उनसे कहना कि भगवान् ने आपको मीठा वाला गला दिया है, आपको गाने की कला आती है। आप इस गाने की कला के द्वारा जिस तरीके से कामुकता के गीत, अंध विश्वासों का समर्थन करने वाले गीत और भक्ति के नाम पर शृंगार रस के गीत गाया करते हैं।

🔷 इनके स्थान पर कहीं आप चंदवरदायी के तरीके से समय को कँपाने वाले, भूषण के तरीके से समय को कँपाने वाले, युगों में जीवन भरने वाले गीत आप इसी गले के द्वारा गाने लगें, चौराहे-चौराहे पर खड़े होकर अलख जगाने लगें-गाँव-गाँव जाकर लोगों को इकट्ठा करके गीत की कला का उपयोग करने लगें, तो आपके यही गीत आपका यही गला और गले की मिठास सैकड़ों-हजारों मनुष्यों के जीवन में हेर-फेर करने में समर्थ हो सकती है। मीरा का गला, मीरा की मिठास और मीरा का संगीत कितने आदमियों के जीवन में हेर-फेर करने में समर्थ हो गया। अतः हमको उस हर मीठे गले वाले व्यक्ति से कहना चाहिए, जिसको ये विशेषताएँ और विभूतियाँ भगवान् ने अमानत के रूप में विशेष रूप से दी हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 59)

👉 मद्गुरुः श्री जगद्गुरुः

🔷 इस सत्य को उजागर करने वाली एक सच्ची घटना यहाँ पर कहने का मन है। इस घटना पर मनन करके श्री गुरुदेव की कृपा का अनुभव किया जा सकता है। यह सत्यकथा रूसी सन्त गुरजिएफ एवं उनके एक शिष्य रूशिल मिनकोव के बारे में है। गुरजिएफ महात्मा कबीर की भाँति बड़े अक्कड़-फक्कड़ सन्त हुए हैं। वे परम ज्ञानी होने के साथ आध्यात्मिक रहस्यों के महान् जानकार थे। इस सब के बावजूद उनका व्यवहार काफी अटपटा-बेबूझ और विचित्र सा होता था। उनके शिष्य समझ ही नहीं पाते थे कि ये क्यों और किसलिए ऐसा कर रहे हैं। पर शायद यही शिष्यों की परीक्षा का उनका ढंग था। इसी कसौटी पर वे शिष्यों की श्रद्धा को जाँचा-परखा करते थे। जो इस जाँच-परख में सही पाया गया, वही आध्यात्मिक ज्ञान के लिए सुयोग्य पात्र समझा जाता था।
  
🔶 रूशिल मिनकोव ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि उनके साथ यह परीक्षा लगातार चौबीस सालों तक चलती रही। रूशिल लिखते हैं कि वह लगभग साढ़े तेईस साल की आयु में गुरजिएफ से मिले थे। बातचीत एवं श्रद्धा की अभिव्यक्ति के क्रम में उन्होंने कहा- गुरुदेव मैं अध्यात्म विद्या पाना चाहता हूँ। शिष्य की इस चाहत पर गुरजिएफ बोले- ठीक है मिलेगी; पर देख, पाँव जमाकर इस कोठरी में रहना। जो भी हो उसे सहना, भागना मत। पीड़ा, परेशानी, अपमान, तिरस्कार सभी कुछ यदि तू सहता रहा, तो समझ तू वह सब पा जाएगा जिसकी तुझे चाहत है। अपने, गुरु के इस कथन पर मिनकोव ने हाँ भर दी। हालाँकि उसे उस समय भविष्य में आने वाली परेशानियों का कोई अन्दाजा नहीं था।
  
🔷 गुरजिएफ के शरीर छोड़ते ही उस पर एक के बाद एक नए-नए वज्रपात होना शुरू हो गए। सालों-साल चलने वाली शारीरिक व्याधियाँ, जैसे-तैसे घिसट-घिसट कर चलता जीवन। हालाँकि मिनकोव अपनी पीड़ाओं के बावजूद किसी अन्य की सहायता करने से चूकता नहीं था। जिनकी वह सहायता करता उसमें पुरुष-स्त्रियाँ, बच्चे सभी शामिल थे। अपनी सारी सहायताओं एवं सभी अच्छे कर्मों के बदले उसे वंचना ही मिली। प्रत्येक सत्कर्म के बदले दुष्परिणाम! जब तब लगने वाले चारित्रिक लांछन उसे प्रायः पीड़ाओं में डुबोए रखते; पर करता भी क्या? श्री गुरुदेव को दिया गया वचन था। ऐसी ही विपत्तियों से जूझते-जूझते अठारह वर्ष बीत गए। हालाँकि संकट यथावत् थे।
  
🔶 उसके मन में शंकाएँ घर करने लगीं; क्योंकि शरीर छोड़ने के बाद गुरजिएफ ने उसे स्वप्न में भी दर्शन नहीं दिए थे। पर इस उन्नीसवें साल में गुरजिएफ की एक अन्य शिष्या ने उसे बताया कि अभी ६ वर्षों की सघन पीड़ाएँ सहनी है। गुरुदेव यही चाहते हैं। ६ सालों के सघन मानसिक यातना एवं कठोर श्रम के बाद ही तुम्हारे  जीवन में प्रकाश का अवतरण होगा। मिनकोव  ने छः वर्ष भी बिताए और अपने निष्कर्ष में कहा कि आज मैं गुरुदेव की कृपा को अनुभव कर रहा हूँ, जो कर्मजाल शायद अनेकों जन्मों में भी न कटता, उन्होंने मात्र चौबीस सालों में ही काट दिया। सद्गुरु जिस पर जितना ज्यादा कठोर हैं, समझो उस पर उतने ही अधिक कृपालु हैं। मिनकोव की ये बातें रहस्यमय होते हुए भी सद्गुरु की करुणा को जताती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 95

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 09 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 09 March 2018


👉 जीवन सम्पदा:-

🔷 एक सुबह, अभी सूरज भी निकला नहीं था और एक मांझी नदी के किनारे पहुंच गया था। उसका पैर किसी चीज से टकरा गया , झुक कर उसने देखा, पत्थरों से भरा हुआ एक झोला पड़ा था।

🔶 उसने अपना जाल किनारे पर रख दिया, वह सुबह सूरज के उगने की प्रतीक्षा करने लगा। सूरज उग आए, वह अपना जाल फेंके और मछलियां पकड़े।

🔷 वह जो झोला उसे पड़ा हुआ मिल गया था, जिसमें पत्थर थे, वह एक-एक पत्थर निकाल कर शांत नदी में फेंकने लगा ।सुबह के सन्नाटे में उन पत्थरों के गिरनेकी छपाक की आवाज सुनता, फिर दूसरा पत्थर फेंकता । धीरे-धीरे सुबह का सूरज निकला, रोशनी हुई। तब तक उसने झोले के सारे पत्थर फेंक दिए थे, सिर्फ एक पत्थर उसके हाथ में रह गया था।

🔶 सूरज की रोशनी में देखते से ही जैसे उसके हृदय की धड़कन बंद हो गई, सांस रुक गई। उसने जिन्हें पत्थर समझ कर फेंक दिया था, वे हीरे-जवाहरात थे! लेकिन अब तो अंतिम हाथ में बचा था टुकड़ा और वह पूरे झोले को फेंक चुका था।

🔷 वह रोने लगा, चिल्लाने लगा। इतनी संपदा उसे मिल गई थी कि अनंत जन्मों के लिए काफी थी, लेकिन अंधेरे में, अनजान, अपरिचित, उसने उस सारी संपदा को पत्थर समझ कर फेंक दिया था ।लेकिन फिर भी वह मछुआ सौभाग्यशाली था क्योंकि अंतिम पत्थर फेंकने के पहले सूरज निकल आया था और उसे दिखाई पड़ गया था कि उसके हाथ में हीरा है।

🔶 साधारणतः सभी लोग इतने सौभाग्यशाली नहीं होते हैं। जिंदगी बीत जाती है, सूरज नहीं निकलता, सुबह नहीं होती, रोशनी नहीं आती और सारे जीवन के हीरे हम पत्थर समझ कर फेंक चुके होते हैं।

🔷 जीवन एक बड़ी संपदा है, लेकिन आदमी सिवाय उसे फेंकने और गंवाने के कुछ भी नहीं करता है! जीवन क्या है, यह भी पता नहीं चल पाता और हम उसे फेंक देते हैं! जीवन में क्या छिपा था--कौन से राज, कौन सा रहस्य, कौन सा स्वर्ग, कौन सा आनंद, कौन सी मुक्ति--उस सबका कोई भी अनुभव नहीं हो पाता और जीवन हमारे हाथ से रिक्त हो जाता है!

🔶 गुरू रूपी प्रकाश किसी को मिल जाता है तो शेष जीवन तो संवर ही जाता है।

गुरुवार, 8 मार्च 2018

👉 "हर दिन ....हर पल.... सम्मान की अधिकारिणी हैं नारियां"


हे ममतामयी नारियां!!
देखी आपकी कई कुर्बानियां.....
न मांगी तुमनें कभी अपने किये की,
उपहार या कोई झाकियां.....
पर करते गयी कुर्बानियां.....

जन्म जब हुआ बेटी बन आयी,
माता पिता के सम्मान के लिए.....
भाइयों के मान के लिए......
जीती रही....तुम जीती रही!!!!

जतन सारी करती रही......
बात- बात पर टोका गया.....
जगह -जगह हर काम पर रोका गया......
ये मत कर!वंहा मत जा.....

क्यो मां?? आखिर तू एक लड़की हैं.........
जब तक हैं... इस घर में मेहमान है....
तेरे पति का घर ही तेरा संसार है ......
न माँ.... न भेज मुझे अनजान जगह......

जो बोलेगी कर दूंगी......
किसी बात पे एक शब्द न कहूंगी,
रहने दे मुझे.... मेरे ही अंगना......
बाबा...न भेज मुझे दुंजे अंगना....

बेटा !!यही तो बेटी का भाग्य होता हैं.......
खुश रहना तू... अपने पति के अंगना......
जा......मेरी लाडली जा......
आगयी वह दूजे घर अंगना.....

मान बैठी उसे भाग्य अपना....
मैं आज तुम्हे वचन देती हूं......
तुम्हारे हर चीज को अपने से भी बढ़ कर समझूँगी.......
अपने घर का हर काम करूँगी.....

हे मेरे देव!!तुम्हारी सेवा कर......
तुम्हे संतति दूंगी.......
आपकी हर इच्छा पूरी करूँगी.....
आपके माता पिता को अपना मानूँगी......

उनकी हमेशा सेवा करूँगी......
पर फिर भी बात बात पर प्रताड़ित हुई......
जिसे ईश्वर समझ सब अर्पण किया.....
उसने ही न मुझे एक पल को समझा......

ये कर दिया.....उस काम को कर लिया .....खाना समय पर बना देना......
माँ को दवा दे देना......सब किया.....
न कोई मांग की......
बस मेरे परमेश्वर!! तुम्हारे प्रेम भरे शब्दों की ही मोहताज़ रही......

पर तब भी आपने न मेरी ओर देखा......
न मेरे भावों को समझा.....
जो जीवन में कभी न काम की.....
वो आपके घर रोसोइ को ही अपना सौभाग्य समझी.......

इतना पढ़ लिख इतनी डिग्री बनाई......
वह नारी समर्पण कर.....
घर के कामों की नौकरी में लग गयी.......
यह दूसरा युग भी बिता.....

अब वह एक माँ बन गयी......
जन्म दे अपने शिशु को वह पागलों सी झूमी......
उसे अपने खून से सींचा......
खुद भूखी रही पर उसे देखा.....हर बात का ध्यान वह रखी......

सारा प्रेम और वात्सल्य उस पर उड़ेल दी.......
पर सौगात क्या मिला.......
तुमने मेरे लिए क्या किया,
हर बार सुनना पड़ा........

अंत में बच्चों ने किए का सौगात दिया.......
वृद्धा आश्रम में रह माँ,
तुझे देखने का मेरे पास वक़्त कँहा........
सभी शक्ति स्वरूपा देवी स्वरूप नारियों को हृदय से नमन वंदन.....

कृपया हर बहन,माँ, बेटी,बहु का सम्मान करें........
ऐसी त्यागनियों को प्रोत्साहित करें🙏🏻🙏🏻

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मंगलवार, 6 मार्च 2018

👉 "तीव्र वैराग्य किसे कहते हैं।

🔶 किसी देश में एक बार वर्षा कम हुई। किसान नालियाँ काट-काटकर दूर से पानी लाते थे। एक किसान बडा़ हठी था। उसने एक दिन शपथ ली कि जब पानी न आने लगे, नहर से नाली का योग न हो जाए, तब तक बराबर नाली खोदूँगा। इधर नहाने का समय हुआ। उसकी स्त्री ने लड़की को उसे बुलाने भेजा। लड़की बोली, 'पिताजी, दोपहर हो गयी, चलो तुमको माँ बुलाती है। 'उसने कहा, तू चल, हमें अभी काम है।' दोपहर ढल गयी, पर वह काम पर हटा रहा। नहाने का नाम न लिया।

🔷 तब उसकी स्त्री खेत में जाकर बोली, 'नहाओगे कि नहीं? रोटियाँ ठण्डी हो रही हैं। तुम तो हर काम में हठ करते हो। काम कल करना या भोजन के बाद करना।' गालियाँ देता हुआ कुदाल उठाकर किसना स्त्री को मारने दौडा़ बोला, 'तेरी बुद्धि मारी गयी है क्या? देखती नहीं कि पानी नहीं बरसता; खेती का काम सब पडा़ है; अब की बार लड़के-बच्चे क्या खाएँगे? सब को भूखों मरना होगा। हमने यही ठान लिया है कि खेत में पहले पानी लायेंगे, नहाने-खाने की बात पीछे होगी।' मामला टेढा़ देखकर उसकी स्त्री वहाँ से लौट पडी़।

🔶 किसान ने दिनभर जी तोड़ मेहनत करके शाम के समय नहर के साथ नाली का योग कर दिया। फिर एक किनारे बैठकर देखने लगा, किस तरह नहर पानी खेत में 'कलकल' स्वर से बहता हुआ आ रहा है, तब उसका मन शान्ति और आनन्द से भर गया। घर पहुँचकर उसने स्त्री को बुलाकर कहा, 'ले आ अब डोल और रस्सी।' स्नान भोजन करके निश्चिन्त करके निश्चिन्त होकर फिर वह सुख से खुर्राटे लेने लगा। जिद यह है और यही तीव्र वैराग्य की उपमा है।
     
🔷 "खेत में पानी लाने के लिए एक और किसान गया था। उसकी स्त्री जब गयी और बोली, 'धूप बहुत हो गयी, चलो अब, इतना काम नहीं करते', तब वह चुपचाप कुदाल एक ओर रखकर बोला, 'अच्छा, तू कहती है तो चलो।' (सब हँसते हैं।) वह किसान खेत में पानी न ला सका। यह मन्द वैराग्य की उपमा है।
       
🔶 " हठ बिना जैसे किसान खेत में पानी नहीं ला सकता, वैसे ही मनुष्य ईश्वरदर्शन नहीं कर सकता।"

रामकृष्ण परमहंस
(रामकृष्ण वचनामृत से)

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 07 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 07 March 2018


👉 अचिन्त्य चिन्तन से मनोबल न गँवाएँ (भाग 5)

🔶 निराशा इससे बुरी है। वह सोचती भी है और चाहती भी, किन्तु साथ ही अपनी असमर्थता, भाग्य की मार, परिस्थितियों की प्रतिकूलता, साथी की बेरुखी जैसी निषेधात्मक संभावनाओं पर ध्यान केन्द्रित करती है और कदम उठाने से पहले ही असफल रहने का दृश्य देखती और हार मान लेती है। ऐसे लोग उदास रहने वालों की अपेक्षा अधिक दीन-हीन स्थिति में होते हैं और सन्तोष भी हाथ से गँवा बैठते हैं।

🔷 अशुभ की आशंका जिन्हें डराती रहती है, वे चिन्तातुर पाये जाते हैं। कुछ चाहते तो हैं, किन्तु सूझ-बूझ और पुरुषार्थ के अभाव को परिस्थितिजन्य गतिरोध मान बैठते हैं। अपने को ऐसे चक्रव्यूह में फँसा पाते हैं जिसमें से बच निकलने का रास्ता अवरुद्ध पाते हैं। इस स्तर के व्यक्ति चिन्तातुर देखे जाते हैं, घबराहट में सिर धुनते हैं, हड़बड़ी में कुछ का कुछ कहते, कुछ करते और सोचते हैं, वह सब बेतुका होता है। अपनी परेशानी साथियों के सामने इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं मानो आकाश टूटकर उन्हीं पर गिरा हो। यों इस कथन में उनका प्रयोजन सहायता न सही, सहानुभूति पाने का तो होता ही है, पर वे यह भूल जाते हैं कि हारते का सभी साथ छोड़ देते हैं।

🔶 मित्र भी कन्नी काटने लगते हैं। इस दुनियाँ में सफल, साहसी और समर्थ को ही साथियों का भी सहारा मिलता है। डूबते को देखकर लोग दूर रहते हैं, ताकि चपेट में आकर कहीं उन्हें भी न डूबना पड़े। उदार, परोपकारी तो जहाँ-तहाँ उँगलियों पर गिनने जितनी संख्या में ही पाये जाते हैं। ऐसी दशा में चिन्तातुर, निराश, भयभीत, संत्रस्त कायर, दुर्बल होने की दुहाई देने के नाम पर यदि सहानुभूति मिलेगी, वह भी उथली एवं व्यंग-तिरस्कार से भरी हुई होगी। सहायता तो कहीं से कदाचित ही मिल सके। यह भी हो सकता है जिनसे सामान्य स्थिति में थोड़ी बहुत सहायता की आशा थी, उससे भी हाथ धोना पड़े।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How long can we go on tolerating vulgarly and extravagant weddings? (Part 1)

A strange contradiction

🔶 We have just entered the third millennium. The literacy rate is on the rise. Plethora of creature comforts is available in ever-improving models and designs. There was a time when owning a scooter or a cycle was a matter of pride, but now car has become a basic necessity, be it a village or a town.  If we just leave aside the extremely poor segment, we will see that mobile, fridge, microwave, TV, home theater, car and several other things have become basic necessities. This list has been increasing for the past fifteen years.

🔷 We certainly cannot take this as a symbol of financial prosperity and should acknowledge this as crass consumerism. Our country represents a glaring contradiction where on one side, vast majority of the population is a victim of poverty, illiteracy, unhygienic living conditions, etc while on the other side an affluent minority owns flats, skyscrapers and modern means of entertainment. On one side lie the dirty slums, while on the other side are palatial mansions; on one side there are extreme crowds at the railway stations / bus stands while on the other side there is equal rush at the airports. The capacity of the creamy layer of society to splurge has increased. We see places full of multiplexes and malls.

📖 From Akhand Jyoti
✍🏻 Pranav Pandya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 22)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 स्वास्थ्य की शिक्षा अभी प्रारंभ नहीं हुई है। हम और आप वकील हों, तो मुबारक, लेकिन आपको नहीं मालूम कि पेट खराब क्यों हो गया? और पेट को खराब होने से बचाने के लिए क्या तरीका होना चाहिए। क्या आपके पास इसके लिए कोई स्कूल है? दवाखाने वाले तो वो चीज हैं कि जहाँ कहीं भी जाइए, हर चीज का इंजेक्शन लगा देंगे। उन्हें ये मालूम नहीं है कि वजह क्या है और किसकी वजह से सेहत खराब कर रहा है। उन सेहत खराब करने वाली खुराक और आदतों को जब तक ये हेर-फेर नहीं करेगा, तब तक उसकी सेहत कभी भी अच्छी नहीं हो सकेगी, चाहे वह रोज एक-एक दिन में बीस इंजेक्शन लगवाता चला जाए। व्यक्ति इंजेक्शन से कदापि अच्छा नहीं हो सकता। सेहत को अच्छा करने के लिए शिक्षण की आवश्यकता है।

🔷 मित्रो! हमको शिक्षण की प्रक्रिया राष्ट्र में पैदा करनी पड़ेगी। विद्या हमारे देश में नहीं है। साक्षरता हमारे देश में नहीं है। उसको बढ़ाने के लिए हमको नाइट स्कूलों की जरूरत पड़ेगी। विद्या के लिए घनघोर आंदोलन खड़ा करना पड़ेगा और इस आंदोलन के लिए हम नौकर नहीं रख सकते, कर्मचारी नहीं रख सकते और वेतन-भोगी नहीं रख सकते। गवर्नमेंट ने इस तरह के वेतन-भोगी रख लिए हैं और आप देखिए क्या हाल हो रहा है? हर डिपार्टमेंट को बढ़ा-बढ़ाकर इतना लंबा चौड़ा कर लिया है कि अगर इतना पैसा इन डिपार्टमेंट में नहीं लगाया गया होता, तो उस बचत से शिक्षण-प्रशिक्षण की समस्या सुलझ गई होती।

🔶 मित्रो! हमको जो काम करना पड़ेगा, उन क्षमता वालों के आधार पर और प्रतिभा वालों के आधार पर करना पड़ेगा। अपना यह मिशन कितना जबरदस्त मिशन है। इसको आगे बढ़ाने के लिए हमको उन आदमियों के पास जाना पड़ेगा, जिनके पास विचारशीलता भी विद्यमान है और क्षमता भी विद्यमान है। विचारशीलता नहीं है और क्षमता है, तो हमको यह कोशिश करनी पड़ेगी कि अपने मिशन की विचारधारा को, मिशन की पुस्तिकाओं को, मिशन के ट्रैक्टों को उनको बार-बार सुनाएँ और किसी प्रकार से इस तरीके से लाएँ कि वे हमारी विचारधारा के संपर्क में आएँ। अगर कोई आदमी हमारी विचारधारा के संपर्क में आ गया, तो यह बड़ी जलती हुई विचारधारा है, यह बड़ी तीखी और प्रखर विचारधारा है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 58)

👉 मद्गुरुः श्री जगद्गुरुः

🔶 परम आराध्य गुरुदेव इस जड़-चेतन, चर-अचर सम्पूर्ण जगत् में संव्याप्त हैं। उन सद्गुरु को नमन है॥ ७१॥ ज्ञान शक्ति पर आरूढ़, सभी तत्त्वों की माला से विभूषित गुरुदेव भोग एवं मोक्ष दोनों ही फल प्रदान करने वाले हैं। उन कृपालु सद्गुरु को नमन है॥ ७२॥ जो अपने आत्मज्ञान के प्रभाव से शिष्य के अनेक जन्मों से संचित सभी कर्मों को भस्मसात कर देते हैं, उन कृपालु सद्गुरु को नमन है॥ ७३॥ श्री गुरुदेव से बढ़कर अन्य कोई तत्त्व नहीं है। श्री गुरु सेवा से बढ़कर कोई दूसरा तप नहीं है, उनसे बढ़कर अन्य कोई ज्ञान नहीं है, ऐसे कृपालु गुरुदेव को नमन है॥ ७४॥ मेरे स्वामी गुरुदेव ही जगत् के स्वामी हैं। मेरे गुरुदेव ही जगत्गुरु हैं। मेरे आत्म स्वरूप गुरुदेव समस्त प्राणियों की अन्तरात्मा हैं। ऐसे श्री गुरुदेव को मेरा नमन है॥ ७५॥
  
🔷 सद्गुरु महिमा का यह मंत्रात्मक स्तोत्र अपने आप में अनेकों दार्शनिक रहस्यों को समाए हैं। इसमें श्रद्धा एवं चिन्तन दोनों का ही मेल है। सद्गुरुदेव की पराचेतना न केवल सर्वव्यापी है; बल्कि शिष्य के सभी पूर्वसंचित कर्मों को नष्ट करने में समर्थ है। सचमुच ही गुरुदेव से श्रेष्ठ अन्य कोई भी तत्त्व या सत्य नहीं है; क्योंकि जो कर्म के गहनतम रहस्य को जानते हैं, उनके लिए यह बड़ा ही स्पष्ट है कि कर्मों के क्रूर, कुटिल कुचक्र से सद्गुरु ही उबारने में समर्थ होते हैं। तभी तो गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस में कहा है- गुरु बिनु भव निधि तरइ न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई॥ यानि कि श्री गुरुदेव के बिना कोई भी संसार सागर को नहीं पार कर सकता, फिर भले ही ब्रह्मा अथवा शिव की भाँति ही समर्थ क्यों न हों।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 94

सोमवार, 5 मार्च 2018

👉 मेरे पापा की औकात

🔷 पाँच दिन की छूट्टियाँ बिता कर जब ससुराल पहुँची तो पति घर के सामने स्वागत में खड़े थे। अंदर प्रवेश किया तो छोटे से गैराज में चमचमाती गाड़ी खड़ी थी स्विफ्ट डिजायर!

🔶 मैंने आँखों ही आँखों से पति से प्रश्न किया तो उन्होंने गाड़ी की चाबियाँ थमाकर कहा:-"कल से तुम इस गाड़ी में कॉलेज जाओगी प्रोफेसर साहिबा!"

🔷 "ओह माय गॉड!!''

🔶 ख़ुशी इतनी थी कि मुँह से और कुछ निकला ही नही। बस जोश और भावावेश में मैंने तहसीलदार साहब को एक जोरदार झप्पी देदी और अमरबेल की तरह उनसे लिपट गई। उनका गिफ्ट देने का तरीका भी अजीब हुआ करता है।

🔷 सब कुछ चुपचाप और अचानक!! खुद के पास पुरानी इंडिगो है और मेरे लिए और भी महंगी खरीद लाए।

🔶 6 साल की शादीशुदा जिंदगी में इस आदमी ने न जाने कितने गिफ्ट दिए। गिनती करती हूँ तो थक जाती हूँ। ईमानदार है रिश्वत नही लेते । मग़र खर्चीले इतने कि उधार के पैसे लाकर गिफ्ट खरीद लाते है।

🔷 लम्बी सी झप्पी के बाद मैं अलग हुई तो गाडी का निरक्षण करने लगी। मेरा फसन्दीदा कलर था। बहुत सुंदर थी। फिर नजर उस जगह गई जहाँ मेरी स्कूटी खड़ी रहती थी।
हठात! वो जगह तो खाली थी।

🔶 "स्कूटी कहाँ है?" मैंने चिल्लाकर पूछा। "बेच दी मैंने, क्या करना अब उस जुगाड़ का? पार्किंग में इतनी जगह भी नही है।" "मुझ से बिना पूछे बेच दी तुमने??"

🔷 "एक स्कूटी ही तो थी; पुरानी सी। गुस्सा क्यूँ होती हो?" उसने भावहीन स्वर में कहा तो मैं चिल्ला पड़ी:-"स्कूटी नही थी वो। मेरी जिंदगी थी। मेरी धड़कनें बसती थी उसमें। मेरे पापा की इकलौती निशानी थी मेरे पास।

मैं तुम्हारे तौफे का सम्मान करती हूँ मगर उस स्कूटी के बिना पे नही। मुझे नही चाहिए तुम्हारी गाड़ी। तुमने मेरी सबसे प्यारी चीज बेच दी। वो भी मुझसे बिना पूछे।'"

🔷 मैं रो पड़ी। शौर सुनकर मेरी सास बाहर निकल आई। उसने मेरे सर पर हाथ फेरा तो मेरी रुलाई और फुट पड़ी। "रो मत बेटा, मैंने तो इससे पहले ही कहा था। एक बार बहु से पूछ ले। मग़र बेटा बड़ा हो गया है। तहसीलदार!! माँ की बात कहाँ सुनेगा?

🔶 मग़र तू रो मत। और तू खड़ा-खड़ा अब क्या देख रहा है वापस ला स्कूटी को।" तहसीलदार साहब गर्दन झुकाकर आए मेरे पास। रोते हुए नही देखा था मुझे पहले कभी। प्यार जो बेइन्तहा करते हैं।

🔷 याचना भरे स्वर में बोले:- सॉरी यार! मुझे क्या पता था वो स्कूटी तेरे दिल के इतनी करीब है। मैंने तो कबाड़ी को बेचा है सिर्फ सात हजार में। वो मामूली पैसे भी मेरे किस काम के थे? यूँ ही बेच दिया कि गाड़ी मिलने के बाद उसका क्या करोगी? तुम्हे ख़ुशी देनी चाही थी आँसू नही। अभी जाकर लाता हूँ। " फिर वो चले गए।

🔶 मैं अपने कमरे में आकर बैठ गई। जड़वत सी। पति का भी क्या दोष था। हाँ एक दो बार उन्होंने कहा था कि ऐसे बेच कर नई ले ले। मैंने भी हँस कर कह दिया था कि नही यही ठीक है। लेकिन अचानक स्कूटी न देखकर मैं बहुत ज्यादा भावुक हो गई थी। होती भी कैसे नही।

🔷 वो स्कूटी नही "औकात" थी मेरे पापा की।

🔶 जब मैं कॉलेज में थी तब मेरे साथ में पढ़ने वाली एक लड़की नई स्कूटी लेकर कॉलेज आई थी। सभी सहेलियाँ उसे बधाई दे रही थी। तब मैंने उससे पूछ लिया:- "कितने की है?
उसने तपाक से जो उत्तर दिया उसने मेरी जान ही निकाल ली थी:-" कितने की भी हो? तेरी और तेरे पापा की औकात से बाहर की है।"

🔷 अचानक पैरों में जान नही रही थी। सब लड़कियाँ वहाँ से चली गई थी। मगर मैं वही बैठी रह गई। किसी ने मेरे हृदय का दर्द नही देखा था। मुझे कभी यह अहसास ही नही हुआ था कि वे सब मुझे अपने से अलग "गरीब"समझती थी। मगर उस दिन लगा कि मैं उनमे से नही हूँ।

🔶 घर आई तब भी अपनी उदासी छूपा नही पाई। माँ से लिपट कर रो पड़ी थी। माँ को बताया तो माँ ने बस इतना ही कहा" छिछोरी लड़कियों पर ज्यादा ध्यान मत दे! पढ़ाई पर ध्यान दे!" रात को पापा घर आए तब उनसे भी मैंने पूछ लिया:-"पापा हम गरीब हैं क्या?"

🔷 तब पापा ने सर पे हाथ फिराते हुए कहा था"-हम गरीब नही हैं बिटिया, बस जरासा हमारा वक़्त गरीब चल रहा है।" फिर अगले दिन भी मैं कॉलेज नही गई। न जाने क्यों दिल नही था। शाम को पापा जल्दी ही घर आ गए थे। और जो लाए थे वो उतनी बड़ी खुशी थी मेरे लिए कि शब्दों में बयाँ नही कर सकती। एक प्यारी सी स्कूटी। तितली सी। सोन चिड़िया सी। नही, एक सफेद परी सी थी वो। मेरे सपनों की उड़ान। मेरी जान थी वो। सच कहूँ तो उस रात मुझे नींद नही आई थी। मैंने पापा को कितनी बार थैंक्यू बोला याद नही है। स्कूटी कहाँ से आई ? पैसे कहाँ से आए ये भी नही सोच सकी ज्यादा ख़ुशी में। फिर दो दिन मेरा प्रशिक्षण चला। साईकिल चलानी तो आती थी। स्कूटी भी चलानी सीख गई।

🔶 पाँच दिन बाद कॉलेज पहुँची। अपने पापा की "औकात" के साथ। एक राजकुमारी की तरह। जैसे अभी स्वर्णजड़ित रथ से उतरी हो। सच पूछो तो मेरी जिंदगी में वो दिन ख़ुशी का सबसे बड़ा दिन था। मेरे पापा मुझे कितना चाहते हैं सबको पता चल गया। मग़र कुछ दिनों बाद एक सहेली ने बताया कि वो पापा के साईकिल रिक्सा पर बैठी थी। तब मैंने कहा नही यार तुम किसी और के साईकिल रिक्शा पर बैठी हो। मेरे पापा का अपना टेम्पो है।

🔷 मग़र अंदर ही अंदर मेरा दिमाग झनझना उठा था। क्या पापा ने मेरी स्कूटी के लिए टेम्पो बेच दिया था। और छः महीने से ऊपर हो गए। मुझे पता भी नही लगने दिया। शाम को पापा घर आए तो मैंने उन्हें गोर से देखा। आज इतने दिनों बाद फुर्सत से देखा तो जान पाई कि दुबले पतले हो गए है। वरना घ्यान से देखने का वक़्त ही नही मिलता था। रात को आते थे और सुबह अँधेरे ही चले जाते थे। टेम्पो भी दूर किसी दोस्त के घर खड़ा करके आते थे। कैसे पता चलता बेच दिया है।

🔶 मैं दौड़ कर उनसे लिपट गई!:-"पापा आपने ऐसा क्यूँ किया?" बस इतना ही मुख से निकला। रोना जो आ गया था। " तू मेरा ग़ुरूर है बिटिया, तेरी आँख में आँसू देखूँ तो मैं कैसा बाप? चिंता ना कर बेचा नही है। गिरवी रखा था। इसी महीने छुड़ा लूँगा।"

🔷 "आप दुनिया के बेस्ट पापा हो। बेस्ट से भी बेस्ट।इसे सिद्ध करना जरूरी कहाँ था? मैंने स्कूटी मांगी कब थी?क्यूँ किया आपने ऐसा? छः महीने से पैरों से सवारियां ढोई आपने। ओह पापा आपने कितनी तक़लीफ़ झेली मेरे लिए ? मैं पागल कुछ समझ ही नही पाई ।" और मैं दहाड़े मार कर रोने लगी। फिर हम सब रोने लगे। मेरे दोनों छोटे भाई। मेरी मम्मी भी।

🔶 पता नही कब तक रोते रहे। वो स्कूटी नही थी मेरे लिए। मेरे पापा के खून से सींचा हुआ उड़नखटोला था मेरा। और उसे किसी कबाड़ी को बेच दिया। दुःख तो होगा ही।

🔷 अचानक मेरी तन्द्रा टूटी। एक जानी-पहचानी सी आवाज कानो में पड़ी। फट-फट-फट,, मेरा उड़नखटोला मेरे पति देव यानी तहसीलदार साहब चलाकर ला रहे थे। और चलाते हुए एकदम बुद्दू लग रहे थे। मगर प्यारे से बुद्दू। मुझे बेइन्तहा चाहने वाले राजकुमार बुद्दू...

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 06 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 06 March 2018


👉 अचिन्त्य चिन्तन से मनोबल न गँवाएँ (भाग 4)

🔷 आलस्य शरीर को स्वेच्छापूर्वक अपंग बनाकर रख देने की प्रक्रिया है। इसी प्रकार प्रमाद मन को जकड़ देने वाली रीति-नीति है। प्रमादी सोचने का कष्ट सहन करना नहीं चाहता है, जो चल रहा है, उसी से समझौता कर लेता है। नया कुछ सोच न सकने पर, नया साहस न जुटा सकने पर, प्रगति की सुखद कल्पनाएँ करते रहना शेखचिल्ली की तरह उपहासास्पद बनना है। आलसी उन कामों को नहीं करते जो बिना कठिनाई के तत्काल किये जा सकते थे। इसी प्रकार प्रमादी उतार-चढ़ावों के सम्बन्ध में कुछ भी सोचने का कष्ट नहीं उठाते, मात्र जिस-तिस पर दोषारोपण करते हुए दुर्भाग्य का रोना रोते हुए मन हल्का करते रहते हैं, जबकि दोष उनका अपना होता है।

🔶 परिस्थितियों को बदलने, सुधारने के लिए जिस सूझबूझ, धैर्य, संतुलन, साहस एवं प्रयास की आवश्यकता पड़ती है, उसे जुटा न पाने का प्रतिफल यह होता है कि अनीति जड़ जमा लेती है। पिछड़ापन ऐसा सहचर बनकर बैठ जाता है जिसे हटाने या बदलने जैसी कोई बात बनती ही नहीं। अस्त-व्यस्त विचारों को यदि वर्तमान को सुधारने वाले उपाय ढूँढ़ने में लगाया जा सके और वर्तमान परिस्थितियों से तालमेल बिठाते हुए अगला कदम क्या हो सकता है, यदि इस पर व्यवहारिक दृष्टि से चिन्तन किया जा सके तो प्रगतिपथ पर बढ़ चलने का कोई मार्ग अवश्य मिलेगा। पर जिसने पत्थर जैसी जड़ता अपना ली है, उसे रचनात्मक प्रयासों में लग पड़ने के लिए न आलस्य छूट देता है, न विचारों की असंगत उड़ानों से निरत करके कुछ व्यवहारिक उपाय सोचने की सुविधा प्रमाद की खुमारी रहते बन पड़ती है। वस्तुतः प्रगतिशीलता के यही दो अवरोध चट्टान की तरह अड़ते हैं। इन्हें हटाये बिना कोई गति नहीं, कोई प्रगति नहीं।

🔷 मनुष्य को हीन बनाने वाले मनोविकारों में उदासी और निराशा प्रमुख हैं। पेट भरने के बाद नदी की बालू में लोटपोट करने वाले मगर और उदरपूर्ति के उपरान्त कीचड़ में मस्त होकर पड़े रहने वाले वाराह को फिर दीन-दुनिया की कोई सुध नहीं रहती। जब बासी पच जाता है और झोले में खालीपन प्रतीत होता है, तभी वे उठने और कुछ करने की बात सोचते हैं। ‘‘पंछी करे ना चाकरी, अजगर करे न काम’’ का उदाहरण बनकर जो समस्त कामनाओं से रहित परमहंसों की तरह दिन गुजारते हैं और ‘‘राम भरोसे जा रहे, पर्वत पै हरियाय’’ के भाग्य भरोसे जो समय काटते हैं, उन्हें ‘‘ना काहू सो दोस्ती, ना काहू सो बैर’’  वाली स्थिति रहती है। वे न कल की सोचते हैं न परसों की। उन उदासीनता सम्प्रदाय का दर्शन अपनाने वालों के लिए प्रगति और अवगति से कुछ लेना-देना नहीं होता, मुट्ठी बाँध कर आते और हाथ पसार कर चले जाते हैं, न शुभ की आकांक्षा, न अशुभ की उपेक्षा, ऐसी उदासीनता पिछड़े और गये गुजरे स्तर का प्रतीक है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Sage Confucius

🔷 The disciples of sage Confucius often used to request him to show them someone who had attained the ultimate knowledge of God. One day while touring with them the sage took them to a cave where an ascetic was engrossed in singing devotional songs. The disciples curiously asked the ascetic to enlighten them about spiritual knowledge. The saint felt disturbed by their interruption and asked them to leave him alone. They all quickly moved ahead. As per the direction of their master, now they went to meet an oil-trader in a village.  He was a kind person and people used to have high regards for him.

🔶 The disciples humbly asked him – "We have heard that you have attained the true knowledge of God". Could you tell us where do we find him? The dutiful, honest trader smiled and said pointing to his ox; this ox is like God for me. It is only because of him that I can run the oil extracting machine ('kolhu', which is drawn by ox); thus, though indirectly, he sustains the lives of myself and my family. I also love him and take due care of him. We are both very happy with each other and I have no worries in my life.”

🔷 With confusion more confounded, the disciples continued their journey. Now, Confucius took them to a small house where an old woman was weaving on a small handloom in the compound. Her face glowed from inner happiness. Several children of the colony were playing around her. She was sometimes talking to them, laughing with them and also playfully teaching them in between. The disciples repeated their question to her. She replied – "I see and feel the presence of God everywhere around me. Look He is playing there. He is also in you and me. There is no moment when He is away from us.

🔶 Now the master explained to the disciples– "Hope you have now got the gist of the ultimate knowledge of God. Be happy and make others happy under all circumstances – this is the secret of true spiritual awareness and this is true devotion to God."

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 21)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 मित्रो! आप पढ़े-लिखे हुए लोगों से कहना कि यदि आपका गुजारा हो जाता है, तो आपको ‘नाइट स्कूल’ रात्रि पाठशाला खोलनी चाहिए। बाहर विदेशों में लोग नाइट स्कूल चलाते हैं। सारे-के-सारे लोग पढ़ाई उसी में करते हैं। वहाँ दिन भर आठ घंटे मेहनत-मजदूरी हर आदमी को करनी पड़ती है। छोटे बच्चों की बात जाने दीजिए, वे तो स्कूलों में चले जाते हैं। वे साढ़े नौ बजे चले जाते हैं और शाम को चार बजे आ जाते हैं, पर जिसको पेट पालना पड़ेगा, वो किस तरीके से स्कूल जा सकता है। और जो बड़ा आदमी हो गया, जवान आदमी हो गया, वह कैसे जा सकता है? अतः हमको समाज में विद्या का विस्तार करना है।

🔶 विद्या का ऋण-कर्ज हमारे ऊपर है। इसे चुकाने के लिए हमको दूसरों को विद्यावान् बनाना चाहिए। शिक्षित बनाना चाहिए, ज्ञानवान् बनाना चाहिए, इसके लिए हममें से और आप में से हर आदमी को समाज का ऋण चुकाने के लिए वो काम करना चाहिए, जो कल मैंने आपको बताए थे और आपको बताता रहा हूँ। योरोप के तरीके से हमारे यहाँ भी रात्रि के विद्यालय चलने चाहिए, जहाँ मजदूर, धोबी आदि शाम के वक्त अपने काम से छुट्टी पाने के बाद चले जाते हैं और पढ़ाई करते हैं और जिंदगी के आखिरी वक्त तक एम.ए. हो जाते हैं, पी.एच.डी. हो जाते हैं और डी. लिट् हो जाते हैं। जिंदगी के आखिरी-से-आखिरी वक्त तक जो समय उनको पढ़ने को मिल जाता है, वे उसे पढ़ाई में लगा देते हैं।

🔷 मित्रो! हमारे देश में सिनेमाघरों में भीड़ बहुत है। हमारे समाज में गप्पें हाँकने के लिए भीड़ बहुत है, जुआघर में भीड़ बहुत, शराबखानों में भीड़ बहुत होती है, लेकिन आपको उस तरह की भीड़ कहीं भी नहीं दिखाई पड़ेगी कि अपने जातीय संगठन के नाम पर, अपने शिक्षित समुदाय के नाम पर इकट्ठे होकर के हमने सायंकाल के वक्त ‘रात्रि पाठशालाओं’ को चलाया हो। इन रात्रि पाठशालाओं में असंख्य महत्त्वपूर्ण बातें पढ़ाई जा सकती हैं। मैं यह तो नहीं कहता कि हरेक आदमी को बी.ई. पढ़ाना चाहिए, लेकिन जीवन जीने की कितनी समस्याएँ हैं, उनको हल करने के लिए विद्यावानों को आगे आना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 57)

👉 मद्गुरुः श्री जगद्गुरुः
🔷 गुरुगीता के गायन से भावनाओं में गुरुभक्ति का ज्वार उठता है। ऐसा वे कहते हैं, जो शिष्यत्व की, समर्पण की डगर पर चल रहे हैं। इन भावनाशीलों को प्रतिमास गुरुगीता की अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहती है। उनके मन में बड़ी अकुलाहट, बड़ी त्वरा होती है। श्वास-श्वास में गुरुदेव का नाम, मन में उनका चिन्तन, भावनाओं में उनकी ही करुणापूर्ण छवि, यही शिष्य का परिचय है। जो शिष्य होने की लालसा में जी रहे हैं- उन्हें सब कुछ मिलेगा। उनकी राहों में भले ही काँटे बिछे हों, पर जल्दी ही उनकी डगर में फूल खिलेंगे। बस धीरज और साहस का सम्बल नहीं छोड़ना है। सद्गुरु ही जीवन की एकमात्र सच्चाई हैं। उनके चरणों की छाँव में अध्यात्म विद्या के सभी रहस्य अनायास मिल जाते हैं।
  
🔶 बस गुरु चरणों में भक्ति सदा बनी रहे। उनको सदा नमन होता रहे। जिनकी अन्तर्चेतना में सद्गुरु नमन के स्वर मुखरित होते हैं, उन्हें स्मरण होगा कि पिछले मंत्रों  में यह कहा गया है कि अखण्ड वलयाकार चेतना के रूप में जो इस सम्पूर्ण चर-अचर में व्याप्त हैं, ब्रह्मतत्त्व एवं आत्मतत्त्व के रूप में उन्हीं गुरुवर की चेतना दर्शित होती है। वैदिक ऋचाएँ हों या उपनिषदों के महावाक्य रत्न सभी गुरुदेव की कृपा से अपना प्रकाश देते हैं। गुरुदेव के स्मरण मात्र से ही ज्ञान उत्पन्न होता है। वे प्रभु ही परम चैतन्य, शाश्वत, शान्त और आकाश से भी अतीत  एवं माया से परे हैं। वे नादबिन्दु एवं काल से परे हैं, उन परम कृपालु सद्गुरु को नमन है।
  
🔷 गुरु नमन की इस पावन प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए भगवान् भोलेनाथ माँ पार्वती से कहते हैं-
  
स्थावरं  जंगमं  चैव  तथा  चैव चराचरम्। व्याप्तं  येन  जगत्सर्वं  तस्मै  श्रीगुरवे नमः॥ ७१॥
ज्ञानशक्तिसमारूढस्तत्त्वमालाविभूषितः। भुक्तिमुक्तिप्रदाताय  तस्मै  श्रीगुरवे   नमः॥ ७२॥
अनेकजन्मसंप्राप्त-सर्वकर्मविदाहिने। स्वात्मज्ञानप्रभावेण   तस्मै  श्रीगुरवे  नमः॥ ७३॥
न  गुरोरधिकं  तत्त्वं  न  गुरोरधिकं   तपः। तत्त्वम् ज्ञानात्परं नास्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ७४॥
मन्नाथः श्रीजगन्नाथो  मद्गुरुश्रीजगद्गुरुः। ममात्मा  सर्वभूतात्मा  तस्मै  श्रीगुरवे नमः॥ ७५॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 93

👉 गर्वोत्सव संस्कार बनें एक बड़ा अभियान


आओ बहनों आज,
         चलों करें समाज मे कुछ खास........
बदलाव नही सिर्फ़ कहने से होगा!
          जागरूक होगी हर नारी तभी,
भारत का भाग्योदय होगा........
          जन्म दे जो प्राण फूक सकती हैं,
वह ठान ले यदि तो,
          नया संस्कारित समाज गढ़ सकती हैं.........
स्वयं के स्वाभिमान को बचाना उसके हाथ हैं,
          रानी लक्ष्मी बाई से साहस दिखाने की अब बात है...…...
डर नही ...तू डर ....नहीं,
          लड़ना तुझको आज हैं......
गौरी बन अब अपने पुत्रों अंधक और विनायक में,
           चुनाव करना तेरे हाथ हैं.....
हाँ ममतामयी हैं तू, प्रेम की भंडार हैं........
पर देखना आज स्थिति है कैसी,
           क्या उसका भी तुझको भान हैं........
चल उठ खड़ी हो,उठ खड़ी हो....
         सम्हालना कमान हैं......
ले सहारा ज्ञान का,विज्ञान का,आध्यात्म का......
             पर लड़ना तुझको आज है.......
बनाना है....बनाना हैं.......
  बिगडों को बनाना हैं.........
लाना हैं....हां लाना है.......
 दैवीय आत्माओं को फिर धरती पर लाना हैं.......
कर दिखाना है...दिखाना है.....
    युग निर्माण कर दिखाना है....
बनाना है...बनाना हैं आज धरती को स्वर्ग बनाना हैं........
नारियों अब जागृत हो ....
नव निर्माण के लिए तुम्हें,
"गर्भोत्सव संस्कार " को बड़ा अभियान आज बनाना हैं.......
संस्कारित पीढ़ियों को लाना हैं.....
माँ... बहनों....की लाज बचाना हैं....
फिर राम...कृष्ण....से पुत्र तुम्हे जन्माना हैं....
इसे बड़ा अभियान अब बनाना हैं......
नारी को दुर्गा शक्ति बन दिखाना हैं.......
जागृत हो...जागृत हो...
समाज में बदलाव तुम्हे ही लाना है........

👉 आज का सद्चिंतन 05 March 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 05 March 2018

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 20)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 साथियो! ये दावत खाने का निमंत्रण नहीं है। गुरुजी से आशीर्वाद लेने का निमंत्रण नहीं है। मालदार होने का और बीमारियों को अच्छा करने का नहीं है। औलाद प्राप्त करने का नहीं है। आप ये निमंत्रण मत देना किसी को। ये तो बिना आपके निमंत्रण दिए खुद ही चले आते हैं और उन पर मुझको झल्लाना पड़ता है और ये रोज कहना पड़ता है कि बाबा! यहाँ ठहरने की जगह नहीं है, चला जा। ये तो पहले भी आते रहे हैं और आते ही रहेंगे। उनको निमंत्रण देने की आपको जरूरत नहीं है। वे तो अपने आप बिना बुलाए आ जाएँगे और सब तरीके से आ जाएँगे।

🔷 मित्रो! आप उन लोगों के पास जाना जिनके पास क्षमताएँ हैं, जिनके पास प्रतिभाएँ हैं, जिनके पास जीवन है, जिनके पास कसक है, जिनके पास विचार हैं। जिनके पास इस तरह की चीजें दिखाई पड़ें, वहाँ आप जाना और जा करके हमारा संदेश दे करके आना। जहाँ कहीं भी आपको विद्या दिखाई पड़े, जिस किसी के पास भी विद्या दिखाई पड़े कि उसके पास विद्या है, तो आप उन विद्यावानों के पास जाना और यह कहना कि आपकी विद्या की समाज को आवश्यकता है और युग को आवश्यकता है।

🔶 विद्या पेट पालने के लिए नहीं होती है, पेट भरने के लिए नहीं होती है। विद्या का उद्देश्य भिन्न है। विद्या का उद्देश्य है, जो ज्ञान हमको मिला हुआ है, उससे हमको वकालत भी करनी पड़े, तो उस विद्या के द्वारा लोगों के अज्ञान के निवारण के लिए खरच करना चाहिए। आपकी सारी-की-सारी विद्या धन के लिए, पैसे के लिए खरच नहीं होनी चाहिए। अगर आप पढ़े-लिखे आदमी हैं, जीवट वाले आदमी हैं, तो आपकी विद्या का लाभ उन लोगों को मिलना चाहिए, जो पढ़े-लिखे नहीं हैं, जो निरक्षर हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 56)

👉 सद्गुरु की कठोरता में भी प्रेम छिपा है
🔶 यहाँ पर एक सत्य घटना की चर्चा की जा रही है। यह चर्चा अनेक शिष्यों के मनों को सत्प्रेरणाओं से भरेगी-ऐसा विश्वास है। यह घटना महान् संत रामदास काठिया बाबा के शिष्य गरीबदास के बारे में है। गरीबदास पढ़े-लिखे तो नहीं थे,पर उनके हृदय में अपने गुरुदेव के प्रति अगाध भक्ति थी; लेकिन इस भक्ति के बावजूद बाबा रामदास उनसे बड़ी कठोरता व उपेक्षा का बर्ताव करते थे। आगन्तुक शिष्यों को बाबा के इस व्यवहार पर बड़ा अचरज भी होता। वे सोचते कि सभी के साथ प्रेम भरी कोमल-मीठे बोल बोलने वाले बाबा आखिर गरीबदास पर ही क्यों बात-बात पर बरसते हैं? पर किसी की हिम्मत नहीं पड़ती थी कि उनसे कोई कुछ पूछे। लेकिन बाबा के इस बर्ताव से न तो गरीबदास की श्रद्धा कम हुई और न ही उसका विश्वास डिगा।
  
🔷 एक बार तो जैसे बाबा रामदास ने कठोरता की सारी सीमाएँ ही पार कर डाली। हुआ यूँ कि उन दिनों ब्रज परिक्रमा हो रही थी। ८४ कोस की उस परिक्रमा में उसे काफी सामान लाद कर चलना पड़ता था। जहाँ यात्रा रुकती, वहाँ उसे थके-हारे होने पर भी ४०-५० आदमियों का भोजन बनाना पड़ता। इतना कठिन श्रम करने के बाद भी उसका नियम था कि वह सभी को खाना खिलाकर  स्वयं भोजन करता था। श्रद्धासिक्त भक्ति और अद्भुत विनयशीलता इसी को उसने अपनी भक्ति की परिभाषा बना लिया था।
  
🔶 उस दिन गरीबदास ने यात्रा के पड़ाव पर अपने नियम के अनुसार भोजन बनाया। सभी साधुओं व अभ्यागतों के साथ अपने गुरुदेव बाबा रामदास को भी आदर सहित बुलाया और प्रेम सहित उसने उन्हें खाना परोसा। पर यह क्या-आसन पर बैठते ही उन्होंने रोटी हाथ में ली और उसे दूर फेंकते हुए गरज कर कहा- बेशरम मेरे लिए कच्ची रोटियाँ बनाता है, जबकि रोटियाँ अच्छी तरह सिकी हुई थीं। इतना कहकर भी वह चुप नहीं रहे और अपनी लाठी उसके सिर पर दे मारी। लाठी की चोट से गरीबदास के सिर से खून बहने लगा। हारा-थका वह गुरुभक्त दर्द से बुरी तरह चीखा और बेहोश हो गया। बाबा रामदास का यह व्यवहार वहाँ उपस्थित जनों में से किसी को अच्छा न लगा। पर इससे बेखबर बाबा मजे से एक ओर चलते बने।
  
🔷 इधर जब गरीबदास को होश आया, तो उन्होंने बड़ी आतुरता से अपने गुरुदेव बाबा रामदास को ढूँढ़ा और उनके चरणों पर सिर रखते हुए बोला- हे मेरे कृपालु गुरुदेव, हे मेरे आराध्य! मुझसे अपराध हो गया, क्षमा करें भगवन्! शिष्य की गहरी श्रद्धा आज विजयी हुई। परम कठोर बर्ताव करने वाले उसके गुरुदेव आज मातृवत् हो उठे। उसे उन्होंने अपनी छाती से लगाते हुए कहा-बेटा! सद्गुरु की कठोरता में ही उनका प्रेम है। जो इसे जानता है-वही सच्चा शिष्य है। मेरी कठोरता से तेरे जन्म-जमान्तर के कर्म नष्ट हो गये हैं। अब तू मेरे आशीर्वाद से परमहंसत्व प्राप्त कर धन्य हो जायेगा। गुरु की कृपा की यह महिमा अनन्त है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 91

👉 सबसे शक्तिशाली:-

🔷 एक बार गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ किसी पर्वतीय स्थल पर ठहरे थे। शाम के समय वह अपने एक शिष्य के साथ भ्रमण के लिए निकले। दोनों प्रकृति के मोहक दृश्य का आनंद ले रहे थे। विशाल और मजबूत चट्टानों को देख शिष्य के भीतर उत्सुकता जागी।

🔶 उसने पूछा, “इन चट्टानों पर तो किसी का शासन नहीं होगा क्योंकि ये अटल, अविचल और कठोर हैं।”

🔷 शिष्य की बात सुनकर बुद्ध बोले, “नहीं, इन शक्तिशाली चट्टानों पर भी किसी का शासन है।

🔶 लोहे के प्रहार से इन चट्टानों के भी टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं।”

🔷 इस पर शिष्य बोला, “तब तो लोहा सर्वशक्तिशाली हुआ?”

🔶 बुद्ध मुस्कराए और बोले, “नहीं। अग्नि अपने ताप से लोहे का रूप परिवर्तित कर सकती है।”

🔷 उन्हें धैर्यपूर्वक सुन रहे शिष्य ने कहा, “मतलब अग्नि सबसे ज्यादा शक्तिवान है।”

🔶 “ नहीं।” बुद्ध ने फिर उसी भाव से उत्तर दिया, “जल, अग्नि की उष्णता को शीतलता में बदलता देता है तथा अग्नि को शांत कर देता है।”

🔷 शिष्य कुछ सोचने लग गया। बुद्ध समझ गए कि उसकी जिज्ञासा अब भी पूरी तरह शांत नहीं हुई है।

🔶 शिष्य ने फिर सवाल किया, “आखिर जल पर किसका शासन है?”

🔷 बुद्ध ने उत्तर दिया, “वायु का। वायु का वेग जल की दिशा भी बदल देता है।”

🔶 शिष्य कुछ कहता उससे पहले ही बुद्ध ने कहा, “अब तुम कहोगे कि पवन सबसे शक्तिशाली हुआ। नहीं। वायु सबसे शक्तिशाली नहीं है।

🔷 सबसे शक्तिशाली है मनुष्य की संकल्पशक्ति क्योंकि इसी से पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि को नियंत्रित किया जा सकता है। अपनी संकल्पशक्ति से ही अपने भीतर व्याप्त कठोरता, ऊष्णता और शीतलता के आगमन को नियंत्रित किया जा सकता है, इसलिए संकल्पशक्ति ही सर्वशक्तिशाली है। जीवन में कुछ भी महत्वपूर्ण कार्य संकल्पशक्ति के बगैर असंभव है। इसलिए अपने भीतर संकल्पशक्ति का विकास करो।” यह सुनकर शिष्य की जिज्ञासा शांत हो गई।

शनिवार, 3 मार्च 2018

👉 चरित्रहीन कौन?

🔷 संन्यास लेने के बाद गौतम बुद्ध ने अनेक क्षेत्रों की यात्रा की... एक बार वह एक गांव में गए। वहां एक स्त्री उनके पास आई और बोली- आप तो कोई "राजकुमार" लगते हैं। ...क्या मैं जान सकती हूं कि इस युवावस्था में गेरुआ वस्त्र पहनने का क्या कारण है? बुद्ध ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया कि...

🔶 "तीन प्रश्नों" के हल ढूंढने के लिए उन्होंने संन्यास लिया..

🔷 बुद्ध ने कहा.. हमारा यह शरीर जो युवा व आकर्षक है, पर जल्दी ही यह "वृद्ध" होगा, फिर "बीमार" और ....अंत में "मृत्यु" के मुंह में चला जाएगा। मुझे 'वृद्धावस्था', 'बीमारी' व 'मृत्यु' के कारण का ज्ञान प्राप्त करना है .....

🔶 बुद्ध के विचारो से प्रभावित होकर उस स्त्री ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया.... शीघ्र ही यह बात पूरे गांव में फैल गई। गांव वासी बुद्ध के पास आए व आग्रह किया कि वे इस स्त्री के घर भोजन करने न जाएं....!!!

🔷 क्योंकि वह "चरित्रहीन" है.....

🔶 बुद्ध ने गांव के मुखिया से पूछा? .....क्या आप भी मानते हैं कि वह स्त्री चरित्रहीन है...?

🔷 मुखिया ने कहा कि मैं शपथ लेकर कहता हूं कि वह बुरे चरित्र वाली स्त्री है....। आप उसके घर न जाएं। बुद्ध ने मुखिया का दायां हाथ पकड़ा... और उसे ताली बजाने को कहा... मुखिया ने कहा...मैं एक हाथ से ताली नहीं बजा सकता...

🔶 "क्योंकि मेरा दूसरा हाथ आपने पकड़ा हुआ है"... बुद्ध बोले...इसी प्रकार यह स्वयं चरित्रहीन कैसे हो सकती है...????

🔷 ... जब तक इस गांव के "पुरुष चरित्रहीन" न हों...!!!! अगर गांव के सभी पुरुष अच्छे होते तो यह औरत ऐसी न होती इसलिए इसके चरित्र के लिए यहां के पुरुष जिम्मेदार हैं....

🔶 यह सुनकर सभी "लज्जित" हो गए.....

🔷 ....लेकिन आजकल हमारे समाज के पुरूष "लज्जित" नही "गौर्वान्वित" महसूस करते है.....

🔶 ... क्योकि यही हमारे "पुरूष प्रधान" समाज की रीति एवं नीति है..॥

🔷 स्त्री तब तक 'चरित्रहीन' नहीं हो सकती....जब तक पुरुष चरित्रहीन न हो "......
गौतम बुद्ध

🔶 सकारात्मक सोचो
सकारात्मक सोच से ही अपना और अपने घर समाज देश का विकास होगा।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 04 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 04 March 2018


👉 विचार एक मजबूत ताकत

🔷 शुभ सात्विक और आशापूर्ण विचार एक वस्तु है। यह एक ऐसा किला है, जिसमें मनुष्य हर प्रकार के आवेगों और आघातों से सुरक्षित रह सकता है। लेकिन मनुष्य को उत्तम विचार ही रखने और अपनी आदत में डालने अभ्यास निरंतर करना चाहिए। विचार फालतू बात नहीं है। यह एक मजबूत ताकत है। इसका स्पष्ट स्वरूप है। उसमें जीवन है। यह स्वयं ही हमारा मानसिक जीवन है। यह सत्य है। विचार ही मनुष्य का आदिरूप है। पानी में लकड़ी, पत्थर, गोली आदि फेंकने से जैसा आघात होता है, जैसा रूप बनता है, जो प्रभाव होता है, वैसा ही तथा उससे भी अधिक तेज आघात विचारों को फेंकने से होता है।

🔶 मनुष्य के सृजनात्मक विचारों में नव-रचना करने की अदभुद शक्ति है। मनुष्य के जिस रंग, रूप, गुण, कर्म, संस्कार के विचार होते हैं, उसी दिशा में उसकी तीव्र उन्नति होती जाती है। जिसका मन सदा उत्साहपूर्ण रहता है और मन में बड़ा अधिकारी, लेखक, वक्ता, नेता आदि होने की इच्छा होती है, जिसका मन सदैव शून्य में, अपने मानसिक राज्य में बड़ी-बड़ी वस्तुओं की रचना किया करता है, वास्तव में एक दिन वह बड़ा हो जाता है। यही अनुभव की हुई बात है। जितने लोगों ने उन्नति की है या संसार में अमर नाम कमाया है, उन सभी ने विचारों की ही मुख्यता प्रत्येक कार्य में बताई है।
  
🔷 संकल्प में पूरी सच्चाई होनी चाहिए। रचना करने की शक्ति उन्हीं विचारों में होती है, जिनमें सच्चा विश्वास, दृढ़ श्रद्धा होती है। इस विश्व में सब कुछ आपको अपने आत्म विश्वास के अनुसार ही प्राप्त होगा। हमारे मिलने-जुलने से भी हमारे विचारों का बड़ा कार्य होता है, जो लोग प्रसन्नचित्त स्वभाव के होते हैं वे मन में सदा आनन्द के रस में ही डूबे रहते हैं। विपत्ति या कठिनाई आने पर भी वे शुभ विचारों में लीन रहते हैं। उनसे मिलने वाले दुखी और निराश व्यक्ति भी प्रसन्न हो जाता है। प्रसन्न विचारों वाले व्यक्ति जहां जाते हैं, सर्वत्र आनन्द ही आनन्द की वर्षा करते हैं।  इसके विपरीत ऐसे लोग भी हैं, जिनका चेहरे में क्रोध, चिंता, उत्तेजना, जलन से रहता है, उनका चेहरा बदसूरत दीखता है।

🔶 उनके इर्द-गिर्द उदासी का वातावरण छाया रहता है। उनके पास कोई जाना नहीं चाहता और न ही बात करना पसंद करता है। संसार में ऐसे ही मनुष्यों की आवश्यकता है, जिनका हृदय पवित्र प्रेम से पूर्ण हों और आनन्द के स्रोत हों। जिससे संसार में प्रेम, आनन्द और सुख का साम्राज्य हो। परमात्मा का भण्डार मनुष्य अंदर होते हुए भी वह प्रेम, आनन्द और सुख की भीख बाहर दूसरों से मांगता फिरता है। ईश्वर के राज्य में सब वस्तुएं उसी की हैं। फिर सीधे ईश्वर से ही क्यों नहीं मांगते? उस पर विश्वास क्यों नहीं करते? कारण यह है कि बचपन से ही तुम्हें इस बात की शिक्षा नहीं दी गई और संसार की देखा-देखी मनुष्य भी ऐसा ही करने लगे। सुख बाहर नहीं है। आपके मन की शांत और संतुलित स्थिति में है। इसी को शांत करने से, आनन्दमय मन:स्थिति उत्पन्न होती है। केवल ईश्वर पर पूर्ण विश्वास और उच्च भविष्य में विश्वास की आवश्यकता है।
  
🔷 एक धर्म में वर्णन है कि यदि तू मेरे नाम पर मांगे तो मैं अवश्य दूंगा। आगे कहा गया है कि यदि तू मांगता है तो विश्वास कर तू पाएगा। फिर तू अवश्य पा जाएगा। दुख यह है कि हम इन बातों को पढ़ कर भी अपना सुख बाहर ही ढूढ़ते रहते हैं। हमें चाहिए कि हम अपने अंदर छिपे हुए आनन्द के भण्डार पर विश्वास करें।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अचिन्त्य चिन्तन से मनोबल न गँवाएँ (भाग 3)

🔷 दुष्प्रवृत्तियाँ, अवांछनीय आदतें, कुविचारणाएँ बहुत समय तक अभ्यास में सन्निहित रहने पर स्वाभाविक प्रतीत होने लगती हैं, निर्दोष लगती हैं और कभी-कभी तो उचित एवं आवश्यक दीखने लगती हैं। उनके प्रति पक्षपात बनता है और मोह जुड़ता देखा गया है। ऐसी दशा में उन्हें ढूँढ़ निकालना और यह समझ सकना तक कठिन पड़ता है कि उनसे कुछ हानियाँ भी हैं या नहीं। इसका निश्चय श्रेष्ठ, सज्जनों और दुष्ट, दुर्जनों की सद्गति एवं दुर्गति का पर्यवेक्षण करते हुए किया जा सकता है।

🔶 जो दुष्प्रवृत्तियों को अपनाते रहे, हेय जनों जैसी मनःस्थिति में संतुष्ट रहे, अचिन्त्य चिन्तन में निरत रहे, उन्हें ठोकरें खाते और ठोकरें मारते हुए ही दिन काटने पड़े हैं, पर जिनने प्रगति की बात सोची और वरिष्ठता के लिए आकाँक्षा जगाई, उन्हें साथ ही वह निर्णय भी करना पड़ा है कि व्यक्तित्व का स्तर उठाने वाली विचार प्रक्रिया को अपनाने, स्वभाव का अंग बनाने में कोई कोर कसर न रहने दी जायेगी।

🔷 इस सन्दर्भ में सर्वप्रथम उन आदतों से जूझना चाहिए जो एक प्रकार से अपंग स्थिति में डाले रखने के लिए उत्तरदायी हैं। पक्षाघात पीड़ितों, अपंगों, अशक्तों की तरह हीनता के विचार भी ऐसे हैं, जिनके रहते किसी का भी पिछड़ेपन से पिण्ड छूटना असम्भव है। लो ब्लड प्रेशर के मरीज ऐसे पड़े रहते हैं, जैसे लंघन करने वाले ने चारपाई पकड़ ली हो और करवट बदलना तक कठिन हो रहा हो। आलसियों की, अकर्मण्यों की गणना ऐसे ही लोगों में होती है। वे समर्थ होते हुए भी असमर्थ बनते हैं, निरोग होते हुए भी रोगियों की चारपाई में जा लेटते हैं।

🔶 आरामतलबी, काहिली, कामचोरी, हरामखोरी ऐसी ही मानसिक व्यथा हैं, जिसके कारण बहुत कुछ कर सकने में समर्थ व्यक्ति भी अपंग-असमर्थों की तरह दिन गुजारता है। ढेरों समय खाली होने पर भी महिलाओं की तरह उसे जैसे-तैसे काटता है, जबकि उन क्षणों का किन्हीं उपयोगी कामों में नियोजन करने के उपरान्त कुछ ही समय में अतिरिक्त योग्यता का धनी बना जा सकता था, सक्षमों, सुयोग्यों, प्रतिभावानों और सुसम्पन्नों की पंक्ति में खड़ा हुआ जा सकता था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Power of Words


Words have far greater power
Than this world will ever know,
For they can heal the broken-hearted
And cause the small and weak to grow.

They give hope to the tired and discouraged,
When said with a warm, loving smile,
And they can strengthen the step of the weary
As they travel that last rugged mile.

Yes, words can lift up the spirits
Of those who are bowed with despair,
For words can fill them with courage,
Because they show them how much you care.

Gentle words spoken at just the right time
Can soften a cold, hardened heart,
And in the dark times of doubt and of fear,
Strength, joy and peace they impart.

So think carefully about each word that you speak,
And how somebody may be affected,
For words can also kill and destroy,
If by love they have not been perfected.

So speak only words that encourage
And cause others in God's love to grow?
Yes, speak only words of hope and of life
So the power of God's love will show.

- Anonymous

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 19)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 एक बार अमृत की वर्षा हुई। सारे मरे हुए आदमी जिंदा हो गए। केवल एक आदमी जिंदा नहीं हुआ। लोगों ने पूछा, क्या वजह है? वह आदमी क्यों नहीं जिंदा हुआ? जानने पर यह मालूम हुआ कि वह आदमी अपना मुँह जमीन में गाड़े हुए था और पीठ ऊपर किए हुआ था। लोगों ने कहा, अच्छा, तो यह वजह है कि जो मुरदे मुँह खोले हुए थे, नाक ऊपर किए हुए पड़े थे। उनमें से अमृत की बूँदें किसी की नाक में पड़ गईं, किसी के मुँह में पड़ गईं और वे सब जिंदा हो गए। लेकिन जिसने अपना मुँह पलट कर के रखा था, जमीन में गाड़कर रखा था, उसकी नाक में भी अमृत की बूँदें नहीं जा सकीं और मुँह में भी नहीं जा सकीं।

🔶 इसलिए वह जिंदा नहीं हो सका। बेशक वो आदमी जिंदा नहीं हो सकते, चाहे उनका गुरु कोई भी क्यों न हो। गुरुजी! आप अपने गुरुजी के दर्शन करा दीजिए। हम दर्शन क्यों करा दें? हमारे गुरुजी का दर्शन करके तेरा कोई फायदा नहीं हो सकता। कैसे नहीं होगा? बेटे! वो जिंदगी कहाँ है़ वो सीप कहाँ है, जहाँ कि अमृत की बूँदें पड़ा करती हैं और जिंदगी पैदा हो जाती है।

🔷 मित्रो! हमारे पास अपनी विशेषताएँ होनी चाहिए। अपनी विशेषताएँ नहीं होंगी तो बाहर के आदमी, दूसरे आदमी कोई सहायता नहीं कर सकते। आज तक बाहर वाले आदमियों ने किसी की सहायता नहीं की है। केवल अपना हृदय और अपना मन आगे बढ़ा है, तब दूसरों ने सहायता की है। आदिकाल से यही सिद्धांत था और आगे भी यही रहेगा। इसलिए हम आपको विदा करते वक्त उन लोगों के पास भेजना चाहेंगे, जिनके अंदर विशेषता मालूम पड़ती है और चमक मालूम पड़ती है।

🔶 आप उन सब नौजवानों को निमंत्रण देने जाना, आमंत्रण देने जाना, जिनके घर में बंदूकें हैं, भाले हैं। उनसे कहना कि गाँव जल रहे हैं, गाँव में डकैतियाँ हो रही हैं और चूँकि आपके पास बंदूकें हैं, भाला है, इसलिए आप चलिए। चूँकि आपके पास जवानी है, इसलिए आप चलिए। चूँकि आपके पास जवानी है, इसलिए आप चलिए। चूँकि आपके पास अमुक चीजें हैं, इसलिए आप चलिए। जिन लोगों को आप साधन-संपन्न देखें, उन लोगों को आप निमंत्रण देना। जिनके पास बाल्टी है, उनको आप निमंत्रण देना। जिनके पास रस्सी है, उनको आप निमंत्रण देना। उनसे कहना कि बाल्टी खींचिए। गाँव जल रहा है, उसकी आग को बुझाइए। उनको निमंत्रण देने के लिए हम आपको भेजते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 55)

👉 सद्गुरु की कठोरता में भी प्रेम छिपा है

🔷 अखण्ड वलयाकार चेतना के रूप में जो इस सम्पूर्ण चर-अचर जगत् में व्याप्त हैं, ब्रह्म तत्त्व व आत्म तत्त्व के रूप में यही चेतना उनके श्री चरणों की कृपा से दर्शित होती है। उन श्री सद्गुरु को नमन है॥ ६७॥ वैदिक ऋचाओं एवं उपनिषद् की श्रुतियों के सभी महावाक्य रत्न उनके श्री चरणों में विराजित हैं। उन गुरुदेव की चेतना से सूर्य का प्रकाश पाकर ही वेदान्त का कमल खिलता है, ऐसे सद्गुरु को नमन है॥ ६८॥ जिनके स्मरण करने भर से अपने आप ही ज्ञान उत्पन्न होता है, जो अपने में सभी आध्यात्मिक सम्पदा की प्राप्ति है, उन कृपालु सद्गुरु को नमन है॥ ६९॥ जो परम चैतन्य, शाश्वत, शान्त और आकाश से भी अतीत और माया से परे हैं, वे नाद, बिन्दु एवं कला से भी परे हैं, ऐसे सद्गुरु को नमन है॥ ७०॥
  
🔶 गुरु महिमा के महामंत्रमय स्तोत्र होने के साथ तत्त्वचिंतक को भी प्रकाशित करते हैं। निराकार-माया से परे परमेश्वर ही माया को वशवर्ती करके शिष्य के कल्याण के लिए सद्गुरु की काया धारण करते हैं। वे देहधारी होने पर भी देहातीत हैं। उन्हें जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है। जो उनकी शरण में गया, उसे सब कुछ स्वयं ही मिल जाता है। उनमें भक्ति, ज्ञान, कर्म, योग, ध्यान आदि सभी सत्य सम्पूर्ण रूप से प्रकाशित है। जिन्होंने भी यह बात अपने अन्तःकरण में धारण कर ली, वे अध्यात्मवेत्ता हो गये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 90

शुक्रवार, 2 मार्च 2018

👉 बुजुर्गों की दूरदृष्टि

🔶 एक बहुत बड़ा विशाल पेड़ था। उस पर बहुत से हंस रहते थे। उनमें एक बहुत सयाना हंस था। वह बुद्धिमान और बहुत दूरदर्शी था। सब उसका आदर करते 'ताऊ' कहकर बुलाते थे। एक दिन उसने एक नन्ही-सी बेल को पेड़ के तने पर बहुत नीचे लिपटते पाया। ताऊ ने दूसरे हंसों को बुलाकर कहा, "देखो, इस बेल को नष्ट कर दो। एक दिन यह बेल हम सबको मौत के मुँह में ले जाएगी।".

🔷 एक युवा हंस हँसते हुए बोला, "ताऊ, यह छोटी-सी बेल हमें कैसे मौत के मुँह में ले जाएगी?"

🔶 सयाने हंस ने समझाया, "आज यह तुम्हें छोटी-सी लग रही हैं। धीरे-धीरे यह पेड़ के सारे तने को लपेटा मारकर ऊपर तक आएगी। फिर बेल का तना मोटा होने लगेगा और पेड़ से चिपक जाएगा, तब नीचे सेऊपर तक पेड़ पर चढ़ने के लिए सीढ़ी बन जाएगी। कोई भी शिकारी सीढ़ी के सहारे चढ़कर हम तक पहुंच जाएगा और हम मारे जाएँगे।"

🔷 दूसरे हंस को यक़ीन न आया, "एक छोटी सी बेल कैसे सीढ़ी बन जाएगी?"

🔶 तीसरा हंस बोला, "ताऊ, तू तो एक छोटी-सी बेल को खींच कर ज्यादा ही लम्बा कर रहा है।" किसी ने कहा, "यह ताऊ अपनी अक्ल का रोब डालने के लिए अर्थहीन कहानी गढ़ रहा है।"

🔷 इस प्रकार किसी भी हंस ने ताऊ की बात को गंभीरता से नहीं लिया। इतनी दूर तक देख पाने की उनमें अक्ल कहां थी! समय बीतता रहा। बेल लिपटते-लिपटते ऊपर शाखों तक पहुंच गई। बेल कातना मोटा होना शुरु हुआ और सचमुच ही पेड़ के तने पर सीढ़ी बन गई जिस पर आसानी से चढ़ा जा सकता था।

🔶 सबको ताऊ की बात की सच्चाई नजर आने लगी पर अब कुछ नहीं किया जा सकता था क्योंकि बेल इतनी मजबूत हो गई थी कि उसे नष्ट करना हंसों के बस की बात नहीं थी। एक दिन जब सब हंस दाना चुगने बाहर गए हुए थे तब एक बहेलिआ उधर आ निकला।

🔷 पेड़ पर बनी सीढ़ी को देखते ही उसने पेड़ पर चढकर जाल बिछाया और चला गया। साँझ को सारे हंस लौट आए पेड़ पर उतरे तो बहेलिए के जाल में बुरी तरह फंस गए। जब वे जाल में फंस गए और फड़फड़ाने लगे तब उन्हें ताऊ की बुद्धिमानी और दूरदर्शिता का पता लगा। सब ताऊ की बात न मानने के लिए लज्जित थे और अपने आपको कोस रहे थे। ताऊ सबसे रुष्ट था और चुप बैठा था।

🔶 एक हंस ने हिम्मत करके कहा, "ताऊ, हम मूर्ख हैं लेकिन अब हमसे मुँह मत फेरो।'

🔷 दूसरा हंस बोला, "इस संकट से निकालने की तरकीब तू ही हमें बता सकता हैं। आगे हम तेरी कोई बात नहीं टालेंगे।"

🔶 सभी हंसों ने हामी भरी तब ताऊ ने उन्हें बताया, "मेरी बात ध्यान से सुनो। सुबह जब बहेलिया आएगा, तब मुर्दा होने का नाटक करना। बहेलिया तुम्हें मुर्दा समझकर जाल से निकाल कर जमीन पर रखता जाएगा। वहां भी मरे समान पड़े रहना जैसे ही वह अन्तिम हंस को नीचे रखेगा, मैं सीटी बजाऊंगा। मेरी सीटी सुनते ही सब उड़ जाना।"

🔷 सुबह बहेलिया आया। हंसो ने वैसा ही किया, जैसा ताऊ ने समझाया था। सचमुच बहेलिया हंसों को मुर्दा समझकर जमीन पर पटकता गया। सीटी की आवाज के साथ ही सारे हंस उड़ गए। बहेलिया अवाक् होकर देखता रह गया।

🔶 बुजुर्गों की सोच दूरदृष्टि और अनुभव वाली होती है उनके कहे का अनुसरण हमको भविष्य की समस्याओं से सुरक्षित रखता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 03 March 2018

👉 आज का सद्चिंतन 03 March 2018

👉 सद्विचारों द्वारा जीवन लक्ष्य की प्राप्ति (भाग 2)

🔷 अज्ञान, आसक्ति, अहंकार वासना एवं संकीर्णता के बंधनों से छुटकारा पाने को ही मुक्ति कहते हैं। आत्मा-परमात्मा का अंश होने के कारण स्वभावतः युक्त है, उसे यह कुप्रवृत्तियाँ ही अपने बंधन में बाँधकर मायाबद्ध जीव बना लेती है। इन बंधनों से छुटकारा मिलते ही आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है और जीवन मुक्ति का अनिर्वचनीय उपलब्ध करने लगता है।

🔶 अपनी भूल आप समझ में नहीं आती, यदि समझ में आ जाय तो उसे तुरन्त सुधार लें। रोगी यह नहीं समझता कि मैं कुपथ्य कर रहा हूँ यदि उसे ऐसा पता होता तो कुपथ्य करके प्राणों को संकट में क्यों डालता? यों तो कहने सुनने को हर एक भूल करने वाला और कुमवृध करने वाला यह जानता है कि जो कर रहे हैं वह ठीक नहीं पर ऐसा केवल बाहरी रूप से ही सोचा जाता है, यदि अन्तःकरण के गहन अन्तराल को सच्चे हृदय से या कुपंथ की बुराई मालूम हो जाय तो उसे छोड़ते हुए देर न लगे। बात माया बन्धन के बारे में है।

🔷 स्वार्थ, वासना के निकृष्ट सुख में लोग वैसे ही अनुभव करते रहते हैं जैसे कुत्ता सूखी हड्डी चबा कर मसूड़े छिलने से निकलने वाले ही रक्त को ही चाटता है और रक्तपान का अनुभव करता है। यदि मानव मन को अनुभूति अंतःकरण के गहरे अन्तराल में होना कि माया बन्धन के कटघरे में जो सुख है क्रमवश सुख लगता है वस्तुतः वह भारी घाटे विपत्ति का कारण है तो उसे अपने बन्धनों को तोड़ने में निश्चय ही तत्परता हो जाएगी।

🔶 इस अनुभूति के लिए ही आध्यात्मवाद समस्त शिक्षा और साधना है। इस श्रेय मार्ग पर चलने वाला सत् का महत्व समझ जाता वह सद्विचारों को अपनाता है, जिससे सुदूर और सत्कार्यों में उसकी प्रवृत्ति होती है और धीरे-धीरे वह सत्पुरुष बनता हुआ सन्मार्ग चलता हुआ जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 15-16
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/March/v1.15

👉 अचिन्त्य चिन्तन से मनोबल न गँवाएँ (भाग 2)

🔶 मन का, आत्मा का, जो निरूपण किया जाता है, उसे एक शब्द में विचारणा का स्तर ही कहना चाहिए। मान्यताएँ, भावनाएँ, आस्थाएँ इसी क्षेत्र की गहरी परतें हैं। कल्पना, विवेचना, धारणा इसी क्षेत्र में काम करती हैं। सम्मान, आदत, स्वभाव की खिचड़ी इसी चूल्हे पर पकती है। लगने को यह भी लगता है कि विचार बिन बुलाये आते हैं और अनचाहे ही चढ़ दौड़ते हैं, पर वास्तविकता ऐसी नहीं है। हम कोई दिशा-धारा निर्धारित करते हैं और उस सरिता में तदनुरूप लहरें उठने लगती हैं।

🔷 भीतरी हेरफेर का, बाह्य क्रिया कलापों और परिस्थितियों में परिवर्तन होना सुनिश्चित है। मनःस्थिति के अनुरूप परिस्थिति के बदल जाने की बात को सभी विज्ञजन एक स्वर से स्वीकार करते हैं। अस्तु, परिस्थितियों को बदलने के निमित्त मनःस्थिति को बदलना प्राथमिक उपचार की तरह माना गया है। विचारों में मूढ़ता भरी रहने पर, भ्रान्तियों और विकृतियों के अम्बार लगे रहते पर यह सम्भव नहीं कि किसी को गई गुजरी स्थिति में पड़े रहने से छुटकारा मिल सके। जिसका भाग्य बदलता है, उसके विचार बदलते हैं। विचार बदलने का मतलब है अवांछनीयताओं की खोज-कुरेद और जो भी अनुपयुक्त है, उसे बुहार फेंकने का साहस भरा निश्चय।

🔶 यहाँ एक तथ्य और भी स्मरण रखने योग्य है कि मात्र कुविचारों का समापन ही सब कुछ नहीं है। एक कदम उठाने, दूसरा बढ़ाने के उपक्रम के साथ ही यात्रा आरम्भ होती है। छोड़ने पर खाली होने वाले स्थान को रिक्त नहीं रखा जा सकता, उस स्थान पर नई स्थापना भी तो होनी चाहिए। अनौचित्य के अनुकूलन के साथ ही औचित्य का संस्थापन भी आवश्यक है। ऑपरेशन से मवाद निकालने के उपरान्त घाव भरने के लिए तत्काल मरहम पट्टी भी तो करनी पड़ती है। कुविचारों की विकृत आदतों का निराकरण तब हो सकता है, जब उस स्थान पर सत्प्रवृत्तियों को प्रतिष्ठित कर दिया जाय, अन्यथा घोंसला खाली पड़ा रहने पर चमगादड़ न सही अबाबील रहने लगेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Amrit Chintan 3 March

🔷 Enchanting mantra is a vocal ritual, but this is one dimension of spiritual growth, other important dimensions are of self-development and self-rectification. Rituals are good but behind that are actuals, which should be cultivated in life. Rituals only show results when these dimensions are also taken care-of for a blissful life.

🔶 All dimensions of development and progress are the vision of “Yug Nirman Yojna.” (Transformation of the Era) We are inspired by the almighty for that. Who so ever will share this project will be properly gifted by the almighty. They will be blessed and feel so is mentioned in the scripture of “Kalki-Puran”. 

🔷 To develop deep impression on the mind of family members and to develop moral codes life of great men of the history must be discussed in event and story forms. This solves the most of the negative reactions of daily happenings in life. 

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 18)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷साथियो! हमको मालूम पड़ा कि शायद आप खिले हुए फूल हैं, तो हम भी रामकृष्ण परमहंस के तरीके से आपके पास आए हैं, जिस तरीके से वे विवेकानंद के पीछे लगे थे और शिवाजी के पीछे जिस तरीके से रामदास लगे थे। हम भी आपके पीछे उसी तरीके से लगे रहे हैं, जिस तरीके से चाणक्य चंद्रगुप्त के पीछे लगे रहे थे। अगर गलती हो गई हो, तो माफ करना, क्योंकि हमने समझा यही है। आप यह मत सोचना कि गुरुजी जो अपना पुण्य हिमालय पर से लेकर के आए हैं, वह हमको मालदार बनाने के लिए और संपत्ति देने के लिए हमारे पीछे लगे हुए हैं। हमको औलाद वाला बनाने के लिए, बेटा-बेटी देने के लिए पीछे लगे हुए हैं। हम इसके लिए नहीं लगे हुए हैं।

🔶 मित्रो! हमारे गुरु ने और हमारे पिता ने हमको लक्ष्मी नहीं दी है, औलाद नहीं दी है, लेकिन जो चीजें हमको दी हैं, वे लक्ष्मी जी से लाख गुनी और करोड़ गुनी ज्यादा हैं। हमारी निगाह में भी और हमारी उम्मीदों में भी यही चीज जमी हुई है कि आपको कोई चीज हम दें, तो कम-से-कम ऐसी चीज दें, जिससे कि आप भी जन्म-जन्मांतरों तक याद करते रहें कि हमको कोई चीज मिली थी और कोई चीज हमको दी गई थी। अगर आपके पास जिंदादिली हो और आपके पास रखने की चीजें हों, तब। रखने की चीजें न होंगी, तब फिर बड़ा मुश्किल है। फिर स्वाति की बूँदें बरसती चली जाएँगी और वो अभागी सीप है जिसने अपना मुँह नहीं खोला। मुँह बंद करके पड़ी रही। फिर उसके लिए ये संभव नहीं है, मुमकिन नहीं है कि स्वाति की बूँदें बरसती चली जाएँ और उसके अंदर मोती पैदा हो जाए। ऐसी स्थिति में मोती पैदा नहीं हो सकते।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 54)

👉 सद्गुरु की कठोरता में भी प्रेम छिपा है
🔷 गुरुगीता में सद्गुरु महिमा के गीत हैं। इनका गायन करने वाले शिष्यों की चेतना पवित्र-प्रखर एवं प्रकाशित होती है। ये गीत कितने भी गाये जायें, इनका रस समाप्त नहीं होता है और न ही इनका प्रभाव क्षमता पा सकता है। युगों-युगों से इस सत्य को सभी शिष्यों ने अनुभव किया है और कुछ बड़भागी शिष्य इस सच्चाई को अपनी साधना सम्पदा मानकर जी रहे हैं। हाँ, यह सच है कि धन-मान, यश-कीर्ति सब कुछ होने पर भी जिस शिष्य के होठों पर गुरु महिमा के गीत नहीं हैं, वह अभागा है, कंगाल है, समस्त आश्रयों के होने के बावजूद निराश्रित है। जबकि इसके विपरीत जिस शिष्य के पास न तो धन है और न मान है, न यश है, न कीर्ति है, वह यदि गुरु महिमा के गीतों को गाने की कला को जानता है, तो परम सौभाग्यशाली है।
    
🔶 पिछले मंत्रों में यह बताया गया है कि सद्गुरु चेतना सब भाँति अपूर्व है, नित्य है, स्वयं प्रकाशित और निरामय है। इसमें सभी विकारों का अभाव है। यह परमाकाश रूप अचल व अक्षय आनन्द का स्रोत है। वेद आदि शास्त्रों एवं सभी प्रभावों से भी यही सिद्ध होता है। गुरुदेव की आत्मचेतना, तपश्चेतना का सदा-सदा स्मरण करना चाहिए; शिष्य के लिए इससे श्रेष्ठ अन्य कोई साधन नहीं है।
  
🔷 गुरु महिमा के इन गीतों को एक नये स्वर में पिरोते हुए भगवान् भोलेनाथ आदिमाता जगदम्बा से कहते हैं-
  
अखण्डमण्डलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम्। तत्पदं  दर्शितं  येन,  तस्मै  श्री गुरवे नमः॥ ६७॥
सर्वश्रुतिशिरोरत्नविराजितपदाम्बुजः। वेदान्ताम्बुजसूर्यो, यस्तस्मै  श्री  गुरवेनमः॥ ६८॥
यस्य  स्मरणमात्रेण,  ज्ञानमुत्पद्यते स्वयम्। य  एव  सर्वसंप्राप्तिस्तस्मै  श्री  गुरवे नमः॥ ६९॥
चैतन्यं शाश्वतं शान्तं व्योमातीतं निरञ्जनम्।     नादबिन्दुकलातीतं  तस्मै  श्री  गुरवे  नमः॥ ७०॥                                

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 89

👉 उद्देश्य पूर्ति में सहायक बनें

🔷 आपत्तिग्रस्त व्यक्तियों की सहायता करना भी धर्म है। फिर जिसने कोई कुटुंब बनाया हो उस कुलपति का उत्तरदायित्व तो और भी अधिक है। गायत्री परिवार के परिजनों की भौतिक एवं आत्मिक कठिनाइयों के समाधान में हम अपनी तुच्छ सामर्थ्य का पूरा-पूरा उपयोग करते रहे। कहने वालों का कहना है कि इससे लाखों व्यक्तियों को असाधारण लाभ पहुँचा होगा। पहुँचा होगा—पर हमें उससे कुछ अधिक संतोष नहीं हुआ। हम चाहते थे कि वह माला जपने वाले लोग—हमारे शरीर से नहीं विचारों से प्रेम करें, स्वाध्यायशील बनें, मनन चिंतन करें, अपने भावनात्मक स्तर को ऊँचा उठावें और उत्कृष्ट मानव निर्माण करके भारतीय समाज को देव समाज के रूप में परिणत करने के हमारे उद्देश्य को पूरा करें। पर वैसा न हो सका। अधिकांश लोग चमत्कारवादी निकले। वे न तो आत्म निर्माण पर विश्वास कर सके और न लोक निर्माण में।

🔶 आध्यात्मिक व्यक्तियों का जो उत्तरदायित्व होता है उसे अनुभव न कर सके। हम हर परिजन से बार-बार, हर बार अपना प्रयोजन कहते रहे, पर उसे बहुत कम लोगों ने सुना, समझा। मंत्र का जादू देखने के लिए वे लालायित रहे, हम उनमें से काम के आदमी देखते रहे। इस खींचतान को बहुत दिन देख लिया तो हमें निराशा भी उपजी और झल्लाहट भी हुई। मनोकामना पूर्ण करने का जंजाल अपने या गायत्री माता के गले बाँधना हमारा उद्देश्य कदापि न था। उपासना की वैज्ञानिक विधि व्यवस्था अपनाकर आत्मोन्नति के पथ पर क्रमबद्ध रूप से आगे बढ़ते चले जाना यही हमें अपने स्वजन परिजनों से आशा थी, पर वे उस कठिन दीखने वाले काम को झंझट समझकर कतराते रहे। ऐसे लोगों से हमारा क्या प्रयोजन पूरा होता?

🔷 बहुत दिन विचार करने के बाद यह सोचा कि जो अपने मूल मन्तव्य को सुनने-समझने तक के लिए तैयार नहीं हैं, केवल मन्त्र शक्ति का चमत्कार बिना उसका उचित मुख्य चुकाये देखने को आतुर हैं, इन पर शक्ति का अपव्यय न करके इस विशाल संसार में से उन लोगों को ढूँढ़ा जाय जो विचार, भावना, आदर्श और उद्देश्य का मूल्य महत्व समझते हों, अखण्ड ज्योति में व्यक्त हमारे विचारों के प्रति अभिरुचि एवं आस्था रखते हों। इस कसौटी पर 40 हजार व्यक्ति खरे उतरे। उन्होंने शरीर के प्रति आदर अभिवादन व्यक्त करने की अपेक्षा हमारे विचारों की शक्ति, उपयोगिता एवं आवश्यकता को समझा। 24 लाख की तुलना में 40 हजार की संख्या बहुत छोटी है। फिर भी यह सन्तोष किया गया कि जो आज हमारे विचारों के प्रति आस्था रखता है, आगे चलकर वह हमारी बताई हुई कार्य पद्धति को अपना लेगा। बहुत करके ऐसा हुआ भी है। अखण्ड-ज्योति की प्रखर प्रेरणा ने करोड़ों नहीं तो लाखों मनुष्यों की जीवन दिशा में आशाजनक मोड़ दिया है, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1966 पृष्ठ 39
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/October/v1.39

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