सोमवार, 5 मार्च 2018

👉 Sage Confucius

🔷 The disciples of sage Confucius often used to request him to show them someone who had attained the ultimate knowledge of God. One day while touring with them the sage took them to a cave where an ascetic was engrossed in singing devotional songs. The disciples curiously asked the ascetic to enlighten them about spiritual knowledge. The saint felt disturbed by their interruption and asked them to leave him alone. They all quickly moved ahead. As per the direction of their master, now they went to meet an oil-trader in a village.  He was a kind person and people used to have high regards for him.

🔶 The disciples humbly asked him – "We have heard that you have attained the true knowledge of God". Could you tell us where do we find him? The dutiful, honest trader smiled and said pointing to his ox; this ox is like God for me. It is only because of him that I can run the oil extracting machine ('kolhu', which is drawn by ox); thus, though indirectly, he sustains the lives of myself and my family. I also love him and take due care of him. We are both very happy with each other and I have no worries in my life.”

🔷 With confusion more confounded, the disciples continued their journey. Now, Confucius took them to a small house where an old woman was weaving on a small handloom in the compound. Her face glowed from inner happiness. Several children of the colony were playing around her. She was sometimes talking to them, laughing with them and also playfully teaching them in between. The disciples repeated their question to her. She replied – "I see and feel the presence of God everywhere around me. Look He is playing there. He is also in you and me. There is no moment when He is away from us.

🔶 Now the master explained to the disciples– "Hope you have now got the gist of the ultimate knowledge of God. Be happy and make others happy under all circumstances – this is the secret of true spiritual awareness and this is true devotion to God."

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 21)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 मित्रो! आप पढ़े-लिखे हुए लोगों से कहना कि यदि आपका गुजारा हो जाता है, तो आपको ‘नाइट स्कूल’ रात्रि पाठशाला खोलनी चाहिए। बाहर विदेशों में लोग नाइट स्कूल चलाते हैं। सारे-के-सारे लोग पढ़ाई उसी में करते हैं। वहाँ दिन भर आठ घंटे मेहनत-मजदूरी हर आदमी को करनी पड़ती है। छोटे बच्चों की बात जाने दीजिए, वे तो स्कूलों में चले जाते हैं। वे साढ़े नौ बजे चले जाते हैं और शाम को चार बजे आ जाते हैं, पर जिसको पेट पालना पड़ेगा, वो किस तरीके से स्कूल जा सकता है। और जो बड़ा आदमी हो गया, जवान आदमी हो गया, वह कैसे जा सकता है? अतः हमको समाज में विद्या का विस्तार करना है।

🔶 विद्या का ऋण-कर्ज हमारे ऊपर है। इसे चुकाने के लिए हमको दूसरों को विद्यावान् बनाना चाहिए। शिक्षित बनाना चाहिए, ज्ञानवान् बनाना चाहिए, इसके लिए हममें से और आप में से हर आदमी को समाज का ऋण चुकाने के लिए वो काम करना चाहिए, जो कल मैंने आपको बताए थे और आपको बताता रहा हूँ। योरोप के तरीके से हमारे यहाँ भी रात्रि के विद्यालय चलने चाहिए, जहाँ मजदूर, धोबी आदि शाम के वक्त अपने काम से छुट्टी पाने के बाद चले जाते हैं और पढ़ाई करते हैं और जिंदगी के आखिरी वक्त तक एम.ए. हो जाते हैं, पी.एच.डी. हो जाते हैं और डी. लिट् हो जाते हैं। जिंदगी के आखिरी-से-आखिरी वक्त तक जो समय उनको पढ़ने को मिल जाता है, वे उसे पढ़ाई में लगा देते हैं।

🔷 मित्रो! हमारे देश में सिनेमाघरों में भीड़ बहुत है। हमारे समाज में गप्पें हाँकने के लिए भीड़ बहुत है, जुआघर में भीड़ बहुत, शराबखानों में भीड़ बहुत होती है, लेकिन आपको उस तरह की भीड़ कहीं भी नहीं दिखाई पड़ेगी कि अपने जातीय संगठन के नाम पर, अपने शिक्षित समुदाय के नाम पर इकट्ठे होकर के हमने सायंकाल के वक्त ‘रात्रि पाठशालाओं’ को चलाया हो। इन रात्रि पाठशालाओं में असंख्य महत्त्वपूर्ण बातें पढ़ाई जा सकती हैं। मैं यह तो नहीं कहता कि हरेक आदमी को बी.ई. पढ़ाना चाहिए, लेकिन जीवन जीने की कितनी समस्याएँ हैं, उनको हल करने के लिए विद्यावानों को आगे आना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 57)

👉 मद्गुरुः श्री जगद्गुरुः
🔷 गुरुगीता के गायन से भावनाओं में गुरुभक्ति का ज्वार उठता है। ऐसा वे कहते हैं, जो शिष्यत्व की, समर्पण की डगर पर चल रहे हैं। इन भावनाशीलों को प्रतिमास गुरुगीता की अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहती है। उनके मन में बड़ी अकुलाहट, बड़ी त्वरा होती है। श्वास-श्वास में गुरुदेव का नाम, मन में उनका चिन्तन, भावनाओं में उनकी ही करुणापूर्ण छवि, यही शिष्य का परिचय है। जो शिष्य होने की लालसा में जी रहे हैं- उन्हें सब कुछ मिलेगा। उनकी राहों में भले ही काँटे बिछे हों, पर जल्दी ही उनकी डगर में फूल खिलेंगे। बस धीरज और साहस का सम्बल नहीं छोड़ना है। सद्गुरु ही जीवन की एकमात्र सच्चाई हैं। उनके चरणों की छाँव में अध्यात्म विद्या के सभी रहस्य अनायास मिल जाते हैं।
  
🔶 बस गुरु चरणों में भक्ति सदा बनी रहे। उनको सदा नमन होता रहे। जिनकी अन्तर्चेतना में सद्गुरु नमन के स्वर मुखरित होते हैं, उन्हें स्मरण होगा कि पिछले मंत्रों  में यह कहा गया है कि अखण्ड वलयाकार चेतना के रूप में जो इस सम्पूर्ण चर-अचर में व्याप्त हैं, ब्रह्मतत्त्व एवं आत्मतत्त्व के रूप में उन्हीं गुरुवर की चेतना दर्शित होती है। वैदिक ऋचाएँ हों या उपनिषदों के महावाक्य रत्न सभी गुरुदेव की कृपा से अपना प्रकाश देते हैं। गुरुदेव के स्मरण मात्र से ही ज्ञान उत्पन्न होता है। वे प्रभु ही परम चैतन्य, शाश्वत, शान्त और आकाश से भी अतीत  एवं माया से परे हैं। वे नादबिन्दु एवं काल से परे हैं, उन परम कृपालु सद्गुरु को नमन है।
  
🔷 गुरु नमन की इस पावन प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए भगवान् भोलेनाथ माँ पार्वती से कहते हैं-
  
स्थावरं  जंगमं  चैव  तथा  चैव चराचरम्। व्याप्तं  येन  जगत्सर्वं  तस्मै  श्रीगुरवे नमः॥ ७१॥
ज्ञानशक्तिसमारूढस्तत्त्वमालाविभूषितः। भुक्तिमुक्तिप्रदाताय  तस्मै  श्रीगुरवे   नमः॥ ७२॥
अनेकजन्मसंप्राप्त-सर्वकर्मविदाहिने। स्वात्मज्ञानप्रभावेण   तस्मै  श्रीगुरवे  नमः॥ ७३॥
न  गुरोरधिकं  तत्त्वं  न  गुरोरधिकं   तपः। तत्त्वम् ज्ञानात्परं नास्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ७४॥
मन्नाथः श्रीजगन्नाथो  मद्गुरुश्रीजगद्गुरुः। ममात्मा  सर्वभूतात्मा  तस्मै  श्रीगुरवे नमः॥ ७५॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 93

👉 गर्वोत्सव संस्कार बनें एक बड़ा अभियान


आओ बहनों आज,
         चलों करें समाज मे कुछ खास........
बदलाव नही सिर्फ़ कहने से होगा!
          जागरूक होगी हर नारी तभी,
भारत का भाग्योदय होगा........
          जन्म दे जो प्राण फूक सकती हैं,
वह ठान ले यदि तो,
          नया संस्कारित समाज गढ़ सकती हैं.........
स्वयं के स्वाभिमान को बचाना उसके हाथ हैं,
          रानी लक्ष्मी बाई से साहस दिखाने की अब बात है...…...
डर नही ...तू डर ....नहीं,
          लड़ना तुझको आज हैं......
गौरी बन अब अपने पुत्रों अंधक और विनायक में,
           चुनाव करना तेरे हाथ हैं.....
हाँ ममतामयी हैं तू, प्रेम की भंडार हैं........
पर देखना आज स्थिति है कैसी,
           क्या उसका भी तुझको भान हैं........
चल उठ खड़ी हो,उठ खड़ी हो....
         सम्हालना कमान हैं......
ले सहारा ज्ञान का,विज्ञान का,आध्यात्म का......
             पर लड़ना तुझको आज है.......
बनाना है....बनाना हैं.......
  बिगडों को बनाना हैं.........
लाना हैं....हां लाना है.......
 दैवीय आत्माओं को फिर धरती पर लाना हैं.......
कर दिखाना है...दिखाना है.....
    युग निर्माण कर दिखाना है....
बनाना है...बनाना हैं आज धरती को स्वर्ग बनाना हैं........
नारियों अब जागृत हो ....
नव निर्माण के लिए तुम्हें,
"गर्भोत्सव संस्कार " को बड़ा अभियान आज बनाना हैं.......
संस्कारित पीढ़ियों को लाना हैं.....
माँ... बहनों....की लाज बचाना हैं....
फिर राम...कृष्ण....से पुत्र तुम्हे जन्माना हैं....
इसे बड़ा अभियान अब बनाना हैं......
नारी को दुर्गा शक्ति बन दिखाना हैं.......
जागृत हो...जागृत हो...
समाज में बदलाव तुम्हे ही लाना है........

👉 आज का सद्चिंतन 05 March 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 05 March 2018

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 20)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 साथियो! ये दावत खाने का निमंत्रण नहीं है। गुरुजी से आशीर्वाद लेने का निमंत्रण नहीं है। मालदार होने का और बीमारियों को अच्छा करने का नहीं है। औलाद प्राप्त करने का नहीं है। आप ये निमंत्रण मत देना किसी को। ये तो बिना आपके निमंत्रण दिए खुद ही चले आते हैं और उन पर मुझको झल्लाना पड़ता है और ये रोज कहना पड़ता है कि बाबा! यहाँ ठहरने की जगह नहीं है, चला जा। ये तो पहले भी आते रहे हैं और आते ही रहेंगे। उनको निमंत्रण देने की आपको जरूरत नहीं है। वे तो अपने आप बिना बुलाए आ जाएँगे और सब तरीके से आ जाएँगे।

🔷 मित्रो! आप उन लोगों के पास जाना जिनके पास क्षमताएँ हैं, जिनके पास प्रतिभाएँ हैं, जिनके पास जीवन है, जिनके पास कसक है, जिनके पास विचार हैं। जिनके पास इस तरह की चीजें दिखाई पड़ें, वहाँ आप जाना और जा करके हमारा संदेश दे करके आना। जहाँ कहीं भी आपको विद्या दिखाई पड़े, जिस किसी के पास भी विद्या दिखाई पड़े कि उसके पास विद्या है, तो आप उन विद्यावानों के पास जाना और यह कहना कि आपकी विद्या की समाज को आवश्यकता है और युग को आवश्यकता है।

🔶 विद्या पेट पालने के लिए नहीं होती है, पेट भरने के लिए नहीं होती है। विद्या का उद्देश्य भिन्न है। विद्या का उद्देश्य है, जो ज्ञान हमको मिला हुआ है, उससे हमको वकालत भी करनी पड़े, तो उस विद्या के द्वारा लोगों के अज्ञान के निवारण के लिए खरच करना चाहिए। आपकी सारी-की-सारी विद्या धन के लिए, पैसे के लिए खरच नहीं होनी चाहिए। अगर आप पढ़े-लिखे आदमी हैं, जीवट वाले आदमी हैं, तो आपकी विद्या का लाभ उन लोगों को मिलना चाहिए, जो पढ़े-लिखे नहीं हैं, जो निरक्षर हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 56)

👉 सद्गुरु की कठोरता में भी प्रेम छिपा है
🔶 यहाँ पर एक सत्य घटना की चर्चा की जा रही है। यह चर्चा अनेक शिष्यों के मनों को सत्प्रेरणाओं से भरेगी-ऐसा विश्वास है। यह घटना महान् संत रामदास काठिया बाबा के शिष्य गरीबदास के बारे में है। गरीबदास पढ़े-लिखे तो नहीं थे,पर उनके हृदय में अपने गुरुदेव के प्रति अगाध भक्ति थी; लेकिन इस भक्ति के बावजूद बाबा रामदास उनसे बड़ी कठोरता व उपेक्षा का बर्ताव करते थे। आगन्तुक शिष्यों को बाबा के इस व्यवहार पर बड़ा अचरज भी होता। वे सोचते कि सभी के साथ प्रेम भरी कोमल-मीठे बोल बोलने वाले बाबा आखिर गरीबदास पर ही क्यों बात-बात पर बरसते हैं? पर किसी की हिम्मत नहीं पड़ती थी कि उनसे कोई कुछ पूछे। लेकिन बाबा के इस बर्ताव से न तो गरीबदास की श्रद्धा कम हुई और न ही उसका विश्वास डिगा।
  
🔷 एक बार तो जैसे बाबा रामदास ने कठोरता की सारी सीमाएँ ही पार कर डाली। हुआ यूँ कि उन दिनों ब्रज परिक्रमा हो रही थी। ८४ कोस की उस परिक्रमा में उसे काफी सामान लाद कर चलना पड़ता था। जहाँ यात्रा रुकती, वहाँ उसे थके-हारे होने पर भी ४०-५० आदमियों का भोजन बनाना पड़ता। इतना कठिन श्रम करने के बाद भी उसका नियम था कि वह सभी को खाना खिलाकर  स्वयं भोजन करता था। श्रद्धासिक्त भक्ति और अद्भुत विनयशीलता इसी को उसने अपनी भक्ति की परिभाषा बना लिया था।
  
🔶 उस दिन गरीबदास ने यात्रा के पड़ाव पर अपने नियम के अनुसार भोजन बनाया। सभी साधुओं व अभ्यागतों के साथ अपने गुरुदेव बाबा रामदास को भी आदर सहित बुलाया और प्रेम सहित उसने उन्हें खाना परोसा। पर यह क्या-आसन पर बैठते ही उन्होंने रोटी हाथ में ली और उसे दूर फेंकते हुए गरज कर कहा- बेशरम मेरे लिए कच्ची रोटियाँ बनाता है, जबकि रोटियाँ अच्छी तरह सिकी हुई थीं। इतना कहकर भी वह चुप नहीं रहे और अपनी लाठी उसके सिर पर दे मारी। लाठी की चोट से गरीबदास के सिर से खून बहने लगा। हारा-थका वह गुरुभक्त दर्द से बुरी तरह चीखा और बेहोश हो गया। बाबा रामदास का यह व्यवहार वहाँ उपस्थित जनों में से किसी को अच्छा न लगा। पर इससे बेखबर बाबा मजे से एक ओर चलते बने।
  
🔷 इधर जब गरीबदास को होश आया, तो उन्होंने बड़ी आतुरता से अपने गुरुदेव बाबा रामदास को ढूँढ़ा और उनके चरणों पर सिर रखते हुए बोला- हे मेरे कृपालु गुरुदेव, हे मेरे आराध्य! मुझसे अपराध हो गया, क्षमा करें भगवन्! शिष्य की गहरी श्रद्धा आज विजयी हुई। परम कठोर बर्ताव करने वाले उसके गुरुदेव आज मातृवत् हो उठे। उसे उन्होंने अपनी छाती से लगाते हुए कहा-बेटा! सद्गुरु की कठोरता में ही उनका प्रेम है। जो इसे जानता है-वही सच्चा शिष्य है। मेरी कठोरता से तेरे जन्म-जमान्तर के कर्म नष्ट हो गये हैं। अब तू मेरे आशीर्वाद से परमहंसत्व प्राप्त कर धन्य हो जायेगा। गुरु की कृपा की यह महिमा अनन्त है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 91

👉 सबसे शक्तिशाली:-

🔷 एक बार गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ किसी पर्वतीय स्थल पर ठहरे थे। शाम के समय वह अपने एक शिष्य के साथ भ्रमण के लिए निकले। दोनों प्रकृति के मोहक दृश्य का आनंद ले रहे थे। विशाल और मजबूत चट्टानों को देख शिष्य के भीतर उत्सुकता जागी।

🔶 उसने पूछा, “इन चट्टानों पर तो किसी का शासन नहीं होगा क्योंकि ये अटल, अविचल और कठोर हैं।”

🔷 शिष्य की बात सुनकर बुद्ध बोले, “नहीं, इन शक्तिशाली चट्टानों पर भी किसी का शासन है।

🔶 लोहे के प्रहार से इन चट्टानों के भी टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं।”

🔷 इस पर शिष्य बोला, “तब तो लोहा सर्वशक्तिशाली हुआ?”

🔶 बुद्ध मुस्कराए और बोले, “नहीं। अग्नि अपने ताप से लोहे का रूप परिवर्तित कर सकती है।”

🔷 उन्हें धैर्यपूर्वक सुन रहे शिष्य ने कहा, “मतलब अग्नि सबसे ज्यादा शक्तिवान है।”

🔶 “ नहीं।” बुद्ध ने फिर उसी भाव से उत्तर दिया, “जल, अग्नि की उष्णता को शीतलता में बदलता देता है तथा अग्नि को शांत कर देता है।”

🔷 शिष्य कुछ सोचने लग गया। बुद्ध समझ गए कि उसकी जिज्ञासा अब भी पूरी तरह शांत नहीं हुई है।

🔶 शिष्य ने फिर सवाल किया, “आखिर जल पर किसका शासन है?”

🔷 बुद्ध ने उत्तर दिया, “वायु का। वायु का वेग जल की दिशा भी बदल देता है।”

🔶 शिष्य कुछ कहता उससे पहले ही बुद्ध ने कहा, “अब तुम कहोगे कि पवन सबसे शक्तिशाली हुआ। नहीं। वायु सबसे शक्तिशाली नहीं है।

🔷 सबसे शक्तिशाली है मनुष्य की संकल्पशक्ति क्योंकि इसी से पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि को नियंत्रित किया जा सकता है। अपनी संकल्पशक्ति से ही अपने भीतर व्याप्त कठोरता, ऊष्णता और शीतलता के आगमन को नियंत्रित किया जा सकता है, इसलिए संकल्पशक्ति ही सर्वशक्तिशाली है। जीवन में कुछ भी महत्वपूर्ण कार्य संकल्पशक्ति के बगैर असंभव है। इसलिए अपने भीतर संकल्पशक्ति का विकास करो।” यह सुनकर शिष्य की जिज्ञासा शांत हो गई।

शनिवार, 3 मार्च 2018

👉 चरित्रहीन कौन?

🔷 संन्यास लेने के बाद गौतम बुद्ध ने अनेक क्षेत्रों की यात्रा की... एक बार वह एक गांव में गए। वहां एक स्त्री उनके पास आई और बोली- आप तो कोई "राजकुमार" लगते हैं। ...क्या मैं जान सकती हूं कि इस युवावस्था में गेरुआ वस्त्र पहनने का क्या कारण है? बुद्ध ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया कि...

🔶 "तीन प्रश्नों" के हल ढूंढने के लिए उन्होंने संन्यास लिया..

🔷 बुद्ध ने कहा.. हमारा यह शरीर जो युवा व आकर्षक है, पर जल्दी ही यह "वृद्ध" होगा, फिर "बीमार" और ....अंत में "मृत्यु" के मुंह में चला जाएगा। मुझे 'वृद्धावस्था', 'बीमारी' व 'मृत्यु' के कारण का ज्ञान प्राप्त करना है .....

🔶 बुद्ध के विचारो से प्रभावित होकर उस स्त्री ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया.... शीघ्र ही यह बात पूरे गांव में फैल गई। गांव वासी बुद्ध के पास आए व आग्रह किया कि वे इस स्त्री के घर भोजन करने न जाएं....!!!

🔷 क्योंकि वह "चरित्रहीन" है.....

🔶 बुद्ध ने गांव के मुखिया से पूछा? .....क्या आप भी मानते हैं कि वह स्त्री चरित्रहीन है...?

🔷 मुखिया ने कहा कि मैं शपथ लेकर कहता हूं कि वह बुरे चरित्र वाली स्त्री है....। आप उसके घर न जाएं। बुद्ध ने मुखिया का दायां हाथ पकड़ा... और उसे ताली बजाने को कहा... मुखिया ने कहा...मैं एक हाथ से ताली नहीं बजा सकता...

🔶 "क्योंकि मेरा दूसरा हाथ आपने पकड़ा हुआ है"... बुद्ध बोले...इसी प्रकार यह स्वयं चरित्रहीन कैसे हो सकती है...????

🔷 ... जब तक इस गांव के "पुरुष चरित्रहीन" न हों...!!!! अगर गांव के सभी पुरुष अच्छे होते तो यह औरत ऐसी न होती इसलिए इसके चरित्र के लिए यहां के पुरुष जिम्मेदार हैं....

🔶 यह सुनकर सभी "लज्जित" हो गए.....

🔷 ....लेकिन आजकल हमारे समाज के पुरूष "लज्जित" नही "गौर्वान्वित" महसूस करते है.....

🔶 ... क्योकि यही हमारे "पुरूष प्रधान" समाज की रीति एवं नीति है..॥

🔷 स्त्री तब तक 'चरित्रहीन' नहीं हो सकती....जब तक पुरुष चरित्रहीन न हो "......
गौतम बुद्ध

🔶 सकारात्मक सोचो
सकारात्मक सोच से ही अपना और अपने घर समाज देश का विकास होगा।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 04 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 04 March 2018


👉 विचार एक मजबूत ताकत

🔷 शुभ सात्विक और आशापूर्ण विचार एक वस्तु है। यह एक ऐसा किला है, जिसमें मनुष्य हर प्रकार के आवेगों और आघातों से सुरक्षित रह सकता है। लेकिन मनुष्य को उत्तम विचार ही रखने और अपनी आदत में डालने अभ्यास निरंतर करना चाहिए। विचार फालतू बात नहीं है। यह एक मजबूत ताकत है। इसका स्पष्ट स्वरूप है। उसमें जीवन है। यह स्वयं ही हमारा मानसिक जीवन है। यह सत्य है। विचार ही मनुष्य का आदिरूप है। पानी में लकड़ी, पत्थर, गोली आदि फेंकने से जैसा आघात होता है, जैसा रूप बनता है, जो प्रभाव होता है, वैसा ही तथा उससे भी अधिक तेज आघात विचारों को फेंकने से होता है।

🔶 मनुष्य के सृजनात्मक विचारों में नव-रचना करने की अदभुद शक्ति है। मनुष्य के जिस रंग, रूप, गुण, कर्म, संस्कार के विचार होते हैं, उसी दिशा में उसकी तीव्र उन्नति होती जाती है। जिसका मन सदा उत्साहपूर्ण रहता है और मन में बड़ा अधिकारी, लेखक, वक्ता, नेता आदि होने की इच्छा होती है, जिसका मन सदैव शून्य में, अपने मानसिक राज्य में बड़ी-बड़ी वस्तुओं की रचना किया करता है, वास्तव में एक दिन वह बड़ा हो जाता है। यही अनुभव की हुई बात है। जितने लोगों ने उन्नति की है या संसार में अमर नाम कमाया है, उन सभी ने विचारों की ही मुख्यता प्रत्येक कार्य में बताई है।
  
🔷 संकल्प में पूरी सच्चाई होनी चाहिए। रचना करने की शक्ति उन्हीं विचारों में होती है, जिनमें सच्चा विश्वास, दृढ़ श्रद्धा होती है। इस विश्व में सब कुछ आपको अपने आत्म विश्वास के अनुसार ही प्राप्त होगा। हमारे मिलने-जुलने से भी हमारे विचारों का बड़ा कार्य होता है, जो लोग प्रसन्नचित्त स्वभाव के होते हैं वे मन में सदा आनन्द के रस में ही डूबे रहते हैं। विपत्ति या कठिनाई आने पर भी वे शुभ विचारों में लीन रहते हैं। उनसे मिलने वाले दुखी और निराश व्यक्ति भी प्रसन्न हो जाता है। प्रसन्न विचारों वाले व्यक्ति जहां जाते हैं, सर्वत्र आनन्द ही आनन्द की वर्षा करते हैं।  इसके विपरीत ऐसे लोग भी हैं, जिनका चेहरे में क्रोध, चिंता, उत्तेजना, जलन से रहता है, उनका चेहरा बदसूरत दीखता है।

🔶 उनके इर्द-गिर्द उदासी का वातावरण छाया रहता है। उनके पास कोई जाना नहीं चाहता और न ही बात करना पसंद करता है। संसार में ऐसे ही मनुष्यों की आवश्यकता है, जिनका हृदय पवित्र प्रेम से पूर्ण हों और आनन्द के स्रोत हों। जिससे संसार में प्रेम, आनन्द और सुख का साम्राज्य हो। परमात्मा का भण्डार मनुष्य अंदर होते हुए भी वह प्रेम, आनन्द और सुख की भीख बाहर दूसरों से मांगता फिरता है। ईश्वर के राज्य में सब वस्तुएं उसी की हैं। फिर सीधे ईश्वर से ही क्यों नहीं मांगते? उस पर विश्वास क्यों नहीं करते? कारण यह है कि बचपन से ही तुम्हें इस बात की शिक्षा नहीं दी गई और संसार की देखा-देखी मनुष्य भी ऐसा ही करने लगे। सुख बाहर नहीं है। आपके मन की शांत और संतुलित स्थिति में है। इसी को शांत करने से, आनन्दमय मन:स्थिति उत्पन्न होती है। केवल ईश्वर पर पूर्ण विश्वास और उच्च भविष्य में विश्वास की आवश्यकता है।
  
🔷 एक धर्म में वर्णन है कि यदि तू मेरे नाम पर मांगे तो मैं अवश्य दूंगा। आगे कहा गया है कि यदि तू मांगता है तो विश्वास कर तू पाएगा। फिर तू अवश्य पा जाएगा। दुख यह है कि हम इन बातों को पढ़ कर भी अपना सुख बाहर ही ढूढ़ते रहते हैं। हमें चाहिए कि हम अपने अंदर छिपे हुए आनन्द के भण्डार पर विश्वास करें।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अचिन्त्य चिन्तन से मनोबल न गँवाएँ (भाग 3)

🔷 दुष्प्रवृत्तियाँ, अवांछनीय आदतें, कुविचारणाएँ बहुत समय तक अभ्यास में सन्निहित रहने पर स्वाभाविक प्रतीत होने लगती हैं, निर्दोष लगती हैं और कभी-कभी तो उचित एवं आवश्यक दीखने लगती हैं। उनके प्रति पक्षपात बनता है और मोह जुड़ता देखा गया है। ऐसी दशा में उन्हें ढूँढ़ निकालना और यह समझ सकना तक कठिन पड़ता है कि उनसे कुछ हानियाँ भी हैं या नहीं। इसका निश्चय श्रेष्ठ, सज्जनों और दुष्ट, दुर्जनों की सद्गति एवं दुर्गति का पर्यवेक्षण करते हुए किया जा सकता है।

🔶 जो दुष्प्रवृत्तियों को अपनाते रहे, हेय जनों जैसी मनःस्थिति में संतुष्ट रहे, अचिन्त्य चिन्तन में निरत रहे, उन्हें ठोकरें खाते और ठोकरें मारते हुए ही दिन काटने पड़े हैं, पर जिनने प्रगति की बात सोची और वरिष्ठता के लिए आकाँक्षा जगाई, उन्हें साथ ही वह निर्णय भी करना पड़ा है कि व्यक्तित्व का स्तर उठाने वाली विचार प्रक्रिया को अपनाने, स्वभाव का अंग बनाने में कोई कोर कसर न रहने दी जायेगी।

🔷 इस सन्दर्भ में सर्वप्रथम उन आदतों से जूझना चाहिए जो एक प्रकार से अपंग स्थिति में डाले रखने के लिए उत्तरदायी हैं। पक्षाघात पीड़ितों, अपंगों, अशक्तों की तरह हीनता के विचार भी ऐसे हैं, जिनके रहते किसी का भी पिछड़ेपन से पिण्ड छूटना असम्भव है। लो ब्लड प्रेशर के मरीज ऐसे पड़े रहते हैं, जैसे लंघन करने वाले ने चारपाई पकड़ ली हो और करवट बदलना तक कठिन हो रहा हो। आलसियों की, अकर्मण्यों की गणना ऐसे ही लोगों में होती है। वे समर्थ होते हुए भी असमर्थ बनते हैं, निरोग होते हुए भी रोगियों की चारपाई में जा लेटते हैं।

🔶 आरामतलबी, काहिली, कामचोरी, हरामखोरी ऐसी ही मानसिक व्यथा हैं, जिसके कारण बहुत कुछ कर सकने में समर्थ व्यक्ति भी अपंग-असमर्थों की तरह दिन गुजारता है। ढेरों समय खाली होने पर भी महिलाओं की तरह उसे जैसे-तैसे काटता है, जबकि उन क्षणों का किन्हीं उपयोगी कामों में नियोजन करने के उपरान्त कुछ ही समय में अतिरिक्त योग्यता का धनी बना जा सकता था, सक्षमों, सुयोग्यों, प्रतिभावानों और सुसम्पन्नों की पंक्ति में खड़ा हुआ जा सकता था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Power of Words


Words have far greater power
Than this world will ever know,
For they can heal the broken-hearted
And cause the small and weak to grow.

They give hope to the tired and discouraged,
When said with a warm, loving smile,
And they can strengthen the step of the weary
As they travel that last rugged mile.

Yes, words can lift up the spirits
Of those who are bowed with despair,
For words can fill them with courage,
Because they show them how much you care.

Gentle words spoken at just the right time
Can soften a cold, hardened heart,
And in the dark times of doubt and of fear,
Strength, joy and peace they impart.

So think carefully about each word that you speak,
And how somebody may be affected,
For words can also kill and destroy,
If by love they have not been perfected.

So speak only words that encourage
And cause others in God's love to grow?
Yes, speak only words of hope and of life
So the power of God's love will show.

- Anonymous

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 19)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 एक बार अमृत की वर्षा हुई। सारे मरे हुए आदमी जिंदा हो गए। केवल एक आदमी जिंदा नहीं हुआ। लोगों ने पूछा, क्या वजह है? वह आदमी क्यों नहीं जिंदा हुआ? जानने पर यह मालूम हुआ कि वह आदमी अपना मुँह जमीन में गाड़े हुए था और पीठ ऊपर किए हुआ था। लोगों ने कहा, अच्छा, तो यह वजह है कि जो मुरदे मुँह खोले हुए थे, नाक ऊपर किए हुए पड़े थे। उनमें से अमृत की बूँदें किसी की नाक में पड़ गईं, किसी के मुँह में पड़ गईं और वे सब जिंदा हो गए। लेकिन जिसने अपना मुँह पलट कर के रखा था, जमीन में गाड़कर रखा था, उसकी नाक में भी अमृत की बूँदें नहीं जा सकीं और मुँह में भी नहीं जा सकीं।

🔶 इसलिए वह जिंदा नहीं हो सका। बेशक वो आदमी जिंदा नहीं हो सकते, चाहे उनका गुरु कोई भी क्यों न हो। गुरुजी! आप अपने गुरुजी के दर्शन करा दीजिए। हम दर्शन क्यों करा दें? हमारे गुरुजी का दर्शन करके तेरा कोई फायदा नहीं हो सकता। कैसे नहीं होगा? बेटे! वो जिंदगी कहाँ है़ वो सीप कहाँ है, जहाँ कि अमृत की बूँदें पड़ा करती हैं और जिंदगी पैदा हो जाती है।

🔷 मित्रो! हमारे पास अपनी विशेषताएँ होनी चाहिए। अपनी विशेषताएँ नहीं होंगी तो बाहर के आदमी, दूसरे आदमी कोई सहायता नहीं कर सकते। आज तक बाहर वाले आदमियों ने किसी की सहायता नहीं की है। केवल अपना हृदय और अपना मन आगे बढ़ा है, तब दूसरों ने सहायता की है। आदिकाल से यही सिद्धांत था और आगे भी यही रहेगा। इसलिए हम आपको विदा करते वक्त उन लोगों के पास भेजना चाहेंगे, जिनके अंदर विशेषता मालूम पड़ती है और चमक मालूम पड़ती है।

🔶 आप उन सब नौजवानों को निमंत्रण देने जाना, आमंत्रण देने जाना, जिनके घर में बंदूकें हैं, भाले हैं। उनसे कहना कि गाँव जल रहे हैं, गाँव में डकैतियाँ हो रही हैं और चूँकि आपके पास बंदूकें हैं, भाला है, इसलिए आप चलिए। चूँकि आपके पास जवानी है, इसलिए आप चलिए। चूँकि आपके पास जवानी है, इसलिए आप चलिए। चूँकि आपके पास अमुक चीजें हैं, इसलिए आप चलिए। जिन लोगों को आप साधन-संपन्न देखें, उन लोगों को आप निमंत्रण देना। जिनके पास बाल्टी है, उनको आप निमंत्रण देना। जिनके पास रस्सी है, उनको आप निमंत्रण देना। उनसे कहना कि बाल्टी खींचिए। गाँव जल रहा है, उसकी आग को बुझाइए। उनको निमंत्रण देने के लिए हम आपको भेजते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 55)

👉 सद्गुरु की कठोरता में भी प्रेम छिपा है

🔷 अखण्ड वलयाकार चेतना के रूप में जो इस सम्पूर्ण चर-अचर जगत् में व्याप्त हैं, ब्रह्म तत्त्व व आत्म तत्त्व के रूप में यही चेतना उनके श्री चरणों की कृपा से दर्शित होती है। उन श्री सद्गुरु को नमन है॥ ६७॥ वैदिक ऋचाओं एवं उपनिषद् की श्रुतियों के सभी महावाक्य रत्न उनके श्री चरणों में विराजित हैं। उन गुरुदेव की चेतना से सूर्य का प्रकाश पाकर ही वेदान्त का कमल खिलता है, ऐसे सद्गुरु को नमन है॥ ६८॥ जिनके स्मरण करने भर से अपने आप ही ज्ञान उत्पन्न होता है, जो अपने में सभी आध्यात्मिक सम्पदा की प्राप्ति है, उन कृपालु सद्गुरु को नमन है॥ ६९॥ जो परम चैतन्य, शाश्वत, शान्त और आकाश से भी अतीत और माया से परे हैं, वे नाद, बिन्दु एवं कला से भी परे हैं, ऐसे सद्गुरु को नमन है॥ ७०॥
  
🔶 गुरु महिमा के महामंत्रमय स्तोत्र होने के साथ तत्त्वचिंतक को भी प्रकाशित करते हैं। निराकार-माया से परे परमेश्वर ही माया को वशवर्ती करके शिष्य के कल्याण के लिए सद्गुरु की काया धारण करते हैं। वे देहधारी होने पर भी देहातीत हैं। उन्हें जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है। जो उनकी शरण में गया, उसे सब कुछ स्वयं ही मिल जाता है। उनमें भक्ति, ज्ञान, कर्म, योग, ध्यान आदि सभी सत्य सम्पूर्ण रूप से प्रकाशित है। जिन्होंने भी यह बात अपने अन्तःकरण में धारण कर ली, वे अध्यात्मवेत्ता हो गये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 90

शुक्रवार, 2 मार्च 2018

👉 बुजुर्गों की दूरदृष्टि

🔶 एक बहुत बड़ा विशाल पेड़ था। उस पर बहुत से हंस रहते थे। उनमें एक बहुत सयाना हंस था। वह बुद्धिमान और बहुत दूरदर्शी था। सब उसका आदर करते 'ताऊ' कहकर बुलाते थे। एक दिन उसने एक नन्ही-सी बेल को पेड़ के तने पर बहुत नीचे लिपटते पाया। ताऊ ने दूसरे हंसों को बुलाकर कहा, "देखो, इस बेल को नष्ट कर दो। एक दिन यह बेल हम सबको मौत के मुँह में ले जाएगी।".

🔷 एक युवा हंस हँसते हुए बोला, "ताऊ, यह छोटी-सी बेल हमें कैसे मौत के मुँह में ले जाएगी?"

🔶 सयाने हंस ने समझाया, "आज यह तुम्हें छोटी-सी लग रही हैं। धीरे-धीरे यह पेड़ के सारे तने को लपेटा मारकर ऊपर तक आएगी। फिर बेल का तना मोटा होने लगेगा और पेड़ से चिपक जाएगा, तब नीचे सेऊपर तक पेड़ पर चढ़ने के लिए सीढ़ी बन जाएगी। कोई भी शिकारी सीढ़ी के सहारे चढ़कर हम तक पहुंच जाएगा और हम मारे जाएँगे।"

🔷 दूसरे हंस को यक़ीन न आया, "एक छोटी सी बेल कैसे सीढ़ी बन जाएगी?"

🔶 तीसरा हंस बोला, "ताऊ, तू तो एक छोटी-सी बेल को खींच कर ज्यादा ही लम्बा कर रहा है।" किसी ने कहा, "यह ताऊ अपनी अक्ल का रोब डालने के लिए अर्थहीन कहानी गढ़ रहा है।"

🔷 इस प्रकार किसी भी हंस ने ताऊ की बात को गंभीरता से नहीं लिया। इतनी दूर तक देख पाने की उनमें अक्ल कहां थी! समय बीतता रहा। बेल लिपटते-लिपटते ऊपर शाखों तक पहुंच गई। बेल कातना मोटा होना शुरु हुआ और सचमुच ही पेड़ के तने पर सीढ़ी बन गई जिस पर आसानी से चढ़ा जा सकता था।

🔶 सबको ताऊ की बात की सच्चाई नजर आने लगी पर अब कुछ नहीं किया जा सकता था क्योंकि बेल इतनी मजबूत हो गई थी कि उसे नष्ट करना हंसों के बस की बात नहीं थी। एक दिन जब सब हंस दाना चुगने बाहर गए हुए थे तब एक बहेलिआ उधर आ निकला।

🔷 पेड़ पर बनी सीढ़ी को देखते ही उसने पेड़ पर चढकर जाल बिछाया और चला गया। साँझ को सारे हंस लौट आए पेड़ पर उतरे तो बहेलिए के जाल में बुरी तरह फंस गए। जब वे जाल में फंस गए और फड़फड़ाने लगे तब उन्हें ताऊ की बुद्धिमानी और दूरदर्शिता का पता लगा। सब ताऊ की बात न मानने के लिए लज्जित थे और अपने आपको कोस रहे थे। ताऊ सबसे रुष्ट था और चुप बैठा था।

🔶 एक हंस ने हिम्मत करके कहा, "ताऊ, हम मूर्ख हैं लेकिन अब हमसे मुँह मत फेरो।'

🔷 दूसरा हंस बोला, "इस संकट से निकालने की तरकीब तू ही हमें बता सकता हैं। आगे हम तेरी कोई बात नहीं टालेंगे।"

🔶 सभी हंसों ने हामी भरी तब ताऊ ने उन्हें बताया, "मेरी बात ध्यान से सुनो। सुबह जब बहेलिया आएगा, तब मुर्दा होने का नाटक करना। बहेलिया तुम्हें मुर्दा समझकर जाल से निकाल कर जमीन पर रखता जाएगा। वहां भी मरे समान पड़े रहना जैसे ही वह अन्तिम हंस को नीचे रखेगा, मैं सीटी बजाऊंगा। मेरी सीटी सुनते ही सब उड़ जाना।"

🔷 सुबह बहेलिया आया। हंसो ने वैसा ही किया, जैसा ताऊ ने समझाया था। सचमुच बहेलिया हंसों को मुर्दा समझकर जमीन पर पटकता गया। सीटी की आवाज के साथ ही सारे हंस उड़ गए। बहेलिया अवाक् होकर देखता रह गया।

🔶 बुजुर्गों की सोच दूरदृष्टि और अनुभव वाली होती है उनके कहे का अनुसरण हमको भविष्य की समस्याओं से सुरक्षित रखता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 03 March 2018

👉 आज का सद्चिंतन 03 March 2018

👉 सद्विचारों द्वारा जीवन लक्ष्य की प्राप्ति (भाग 2)

🔷 अज्ञान, आसक्ति, अहंकार वासना एवं संकीर्णता के बंधनों से छुटकारा पाने को ही मुक्ति कहते हैं। आत्मा-परमात्मा का अंश होने के कारण स्वभावतः युक्त है, उसे यह कुप्रवृत्तियाँ ही अपने बंधन में बाँधकर मायाबद्ध जीव बना लेती है। इन बंधनों से छुटकारा मिलते ही आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है और जीवन मुक्ति का अनिर्वचनीय उपलब्ध करने लगता है।

🔶 अपनी भूल आप समझ में नहीं आती, यदि समझ में आ जाय तो उसे तुरन्त सुधार लें। रोगी यह नहीं समझता कि मैं कुपथ्य कर रहा हूँ यदि उसे ऐसा पता होता तो कुपथ्य करके प्राणों को संकट में क्यों डालता? यों तो कहने सुनने को हर एक भूल करने वाला और कुमवृध करने वाला यह जानता है कि जो कर रहे हैं वह ठीक नहीं पर ऐसा केवल बाहरी रूप से ही सोचा जाता है, यदि अन्तःकरण के गहन अन्तराल को सच्चे हृदय से या कुपंथ की बुराई मालूम हो जाय तो उसे छोड़ते हुए देर न लगे। बात माया बन्धन के बारे में है।

🔷 स्वार्थ, वासना के निकृष्ट सुख में लोग वैसे ही अनुभव करते रहते हैं जैसे कुत्ता सूखी हड्डी चबा कर मसूड़े छिलने से निकलने वाले ही रक्त को ही चाटता है और रक्तपान का अनुभव करता है। यदि मानव मन को अनुभूति अंतःकरण के गहरे अन्तराल में होना कि माया बन्धन के कटघरे में जो सुख है क्रमवश सुख लगता है वस्तुतः वह भारी घाटे विपत्ति का कारण है तो उसे अपने बन्धनों को तोड़ने में निश्चय ही तत्परता हो जाएगी।

🔶 इस अनुभूति के लिए ही आध्यात्मवाद समस्त शिक्षा और साधना है। इस श्रेय मार्ग पर चलने वाला सत् का महत्व समझ जाता वह सद्विचारों को अपनाता है, जिससे सुदूर और सत्कार्यों में उसकी प्रवृत्ति होती है और धीरे-धीरे वह सत्पुरुष बनता हुआ सन्मार्ग चलता हुआ जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 15-16
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/March/v1.15

👉 अचिन्त्य चिन्तन से मनोबल न गँवाएँ (भाग 2)

🔶 मन का, आत्मा का, जो निरूपण किया जाता है, उसे एक शब्द में विचारणा का स्तर ही कहना चाहिए। मान्यताएँ, भावनाएँ, आस्थाएँ इसी क्षेत्र की गहरी परतें हैं। कल्पना, विवेचना, धारणा इसी क्षेत्र में काम करती हैं। सम्मान, आदत, स्वभाव की खिचड़ी इसी चूल्हे पर पकती है। लगने को यह भी लगता है कि विचार बिन बुलाये आते हैं और अनचाहे ही चढ़ दौड़ते हैं, पर वास्तविकता ऐसी नहीं है। हम कोई दिशा-धारा निर्धारित करते हैं और उस सरिता में तदनुरूप लहरें उठने लगती हैं।

🔷 भीतरी हेरफेर का, बाह्य क्रिया कलापों और परिस्थितियों में परिवर्तन होना सुनिश्चित है। मनःस्थिति के अनुरूप परिस्थिति के बदल जाने की बात को सभी विज्ञजन एक स्वर से स्वीकार करते हैं। अस्तु, परिस्थितियों को बदलने के निमित्त मनःस्थिति को बदलना प्राथमिक उपचार की तरह माना गया है। विचारों में मूढ़ता भरी रहने पर, भ्रान्तियों और विकृतियों के अम्बार लगे रहते पर यह सम्भव नहीं कि किसी को गई गुजरी स्थिति में पड़े रहने से छुटकारा मिल सके। जिसका भाग्य बदलता है, उसके विचार बदलते हैं। विचार बदलने का मतलब है अवांछनीयताओं की खोज-कुरेद और जो भी अनुपयुक्त है, उसे बुहार फेंकने का साहस भरा निश्चय।

🔶 यहाँ एक तथ्य और भी स्मरण रखने योग्य है कि मात्र कुविचारों का समापन ही सब कुछ नहीं है। एक कदम उठाने, दूसरा बढ़ाने के उपक्रम के साथ ही यात्रा आरम्भ होती है। छोड़ने पर खाली होने वाले स्थान को रिक्त नहीं रखा जा सकता, उस स्थान पर नई स्थापना भी तो होनी चाहिए। अनौचित्य के अनुकूलन के साथ ही औचित्य का संस्थापन भी आवश्यक है। ऑपरेशन से मवाद निकालने के उपरान्त घाव भरने के लिए तत्काल मरहम पट्टी भी तो करनी पड़ती है। कुविचारों की विकृत आदतों का निराकरण तब हो सकता है, जब उस स्थान पर सत्प्रवृत्तियों को प्रतिष्ठित कर दिया जाय, अन्यथा घोंसला खाली पड़ा रहने पर चमगादड़ न सही अबाबील रहने लगेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Amrit Chintan 3 March

🔷 Enchanting mantra is a vocal ritual, but this is one dimension of spiritual growth, other important dimensions are of self-development and self-rectification. Rituals are good but behind that are actuals, which should be cultivated in life. Rituals only show results when these dimensions are also taken care-of for a blissful life.

🔶 All dimensions of development and progress are the vision of “Yug Nirman Yojna.” (Transformation of the Era) We are inspired by the almighty for that. Who so ever will share this project will be properly gifted by the almighty. They will be blessed and feel so is mentioned in the scripture of “Kalki-Puran”. 

🔷 To develop deep impression on the mind of family members and to develop moral codes life of great men of the history must be discussed in event and story forms. This solves the most of the negative reactions of daily happenings in life. 

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 18)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷साथियो! हमको मालूम पड़ा कि शायद आप खिले हुए फूल हैं, तो हम भी रामकृष्ण परमहंस के तरीके से आपके पास आए हैं, जिस तरीके से वे विवेकानंद के पीछे लगे थे और शिवाजी के पीछे जिस तरीके से रामदास लगे थे। हम भी आपके पीछे उसी तरीके से लगे रहे हैं, जिस तरीके से चाणक्य चंद्रगुप्त के पीछे लगे रहे थे। अगर गलती हो गई हो, तो माफ करना, क्योंकि हमने समझा यही है। आप यह मत सोचना कि गुरुजी जो अपना पुण्य हिमालय पर से लेकर के आए हैं, वह हमको मालदार बनाने के लिए और संपत्ति देने के लिए हमारे पीछे लगे हुए हैं। हमको औलाद वाला बनाने के लिए, बेटा-बेटी देने के लिए पीछे लगे हुए हैं। हम इसके लिए नहीं लगे हुए हैं।

🔶 मित्रो! हमारे गुरु ने और हमारे पिता ने हमको लक्ष्मी नहीं दी है, औलाद नहीं दी है, लेकिन जो चीजें हमको दी हैं, वे लक्ष्मी जी से लाख गुनी और करोड़ गुनी ज्यादा हैं। हमारी निगाह में भी और हमारी उम्मीदों में भी यही चीज जमी हुई है कि आपको कोई चीज हम दें, तो कम-से-कम ऐसी चीज दें, जिससे कि आप भी जन्म-जन्मांतरों तक याद करते रहें कि हमको कोई चीज मिली थी और कोई चीज हमको दी गई थी। अगर आपके पास जिंदादिली हो और आपके पास रखने की चीजें हों, तब। रखने की चीजें न होंगी, तब फिर बड़ा मुश्किल है। फिर स्वाति की बूँदें बरसती चली जाएँगी और वो अभागी सीप है जिसने अपना मुँह नहीं खोला। मुँह बंद करके पड़ी रही। फिर उसके लिए ये संभव नहीं है, मुमकिन नहीं है कि स्वाति की बूँदें बरसती चली जाएँ और उसके अंदर मोती पैदा हो जाए। ऐसी स्थिति में मोती पैदा नहीं हो सकते।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 54)

👉 सद्गुरु की कठोरता में भी प्रेम छिपा है
🔷 गुरुगीता में सद्गुरु महिमा के गीत हैं। इनका गायन करने वाले शिष्यों की चेतना पवित्र-प्रखर एवं प्रकाशित होती है। ये गीत कितने भी गाये जायें, इनका रस समाप्त नहीं होता है और न ही इनका प्रभाव क्षमता पा सकता है। युगों-युगों से इस सत्य को सभी शिष्यों ने अनुभव किया है और कुछ बड़भागी शिष्य इस सच्चाई को अपनी साधना सम्पदा मानकर जी रहे हैं। हाँ, यह सच है कि धन-मान, यश-कीर्ति सब कुछ होने पर भी जिस शिष्य के होठों पर गुरु महिमा के गीत नहीं हैं, वह अभागा है, कंगाल है, समस्त आश्रयों के होने के बावजूद निराश्रित है। जबकि इसके विपरीत जिस शिष्य के पास न तो धन है और न मान है, न यश है, न कीर्ति है, वह यदि गुरु महिमा के गीतों को गाने की कला को जानता है, तो परम सौभाग्यशाली है।
    
🔶 पिछले मंत्रों में यह बताया गया है कि सद्गुरु चेतना सब भाँति अपूर्व है, नित्य है, स्वयं प्रकाशित और निरामय है। इसमें सभी विकारों का अभाव है। यह परमाकाश रूप अचल व अक्षय आनन्द का स्रोत है। वेद आदि शास्त्रों एवं सभी प्रभावों से भी यही सिद्ध होता है। गुरुदेव की आत्मचेतना, तपश्चेतना का सदा-सदा स्मरण करना चाहिए; शिष्य के लिए इससे श्रेष्ठ अन्य कोई साधन नहीं है।
  
🔷 गुरु महिमा के इन गीतों को एक नये स्वर में पिरोते हुए भगवान् भोलेनाथ आदिमाता जगदम्बा से कहते हैं-
  
अखण्डमण्डलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम्। तत्पदं  दर्शितं  येन,  तस्मै  श्री गुरवे नमः॥ ६७॥
सर्वश्रुतिशिरोरत्नविराजितपदाम्बुजः। वेदान्ताम्बुजसूर्यो, यस्तस्मै  श्री  गुरवेनमः॥ ६८॥
यस्य  स्मरणमात्रेण,  ज्ञानमुत्पद्यते स्वयम्। य  एव  सर्वसंप्राप्तिस्तस्मै  श्री  गुरवे नमः॥ ६९॥
चैतन्यं शाश्वतं शान्तं व्योमातीतं निरञ्जनम्।     नादबिन्दुकलातीतं  तस्मै  श्री  गुरवे  नमः॥ ७०॥                                

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 89

👉 उद्देश्य पूर्ति में सहायक बनें

🔷 आपत्तिग्रस्त व्यक्तियों की सहायता करना भी धर्म है। फिर जिसने कोई कुटुंब बनाया हो उस कुलपति का उत्तरदायित्व तो और भी अधिक है। गायत्री परिवार के परिजनों की भौतिक एवं आत्मिक कठिनाइयों के समाधान में हम अपनी तुच्छ सामर्थ्य का पूरा-पूरा उपयोग करते रहे। कहने वालों का कहना है कि इससे लाखों व्यक्तियों को असाधारण लाभ पहुँचा होगा। पहुँचा होगा—पर हमें उससे कुछ अधिक संतोष नहीं हुआ। हम चाहते थे कि वह माला जपने वाले लोग—हमारे शरीर से नहीं विचारों से प्रेम करें, स्वाध्यायशील बनें, मनन चिंतन करें, अपने भावनात्मक स्तर को ऊँचा उठावें और उत्कृष्ट मानव निर्माण करके भारतीय समाज को देव समाज के रूप में परिणत करने के हमारे उद्देश्य को पूरा करें। पर वैसा न हो सका। अधिकांश लोग चमत्कारवादी निकले। वे न तो आत्म निर्माण पर विश्वास कर सके और न लोक निर्माण में।

🔶 आध्यात्मिक व्यक्तियों का जो उत्तरदायित्व होता है उसे अनुभव न कर सके। हम हर परिजन से बार-बार, हर बार अपना प्रयोजन कहते रहे, पर उसे बहुत कम लोगों ने सुना, समझा। मंत्र का जादू देखने के लिए वे लालायित रहे, हम उनमें से काम के आदमी देखते रहे। इस खींचतान को बहुत दिन देख लिया तो हमें निराशा भी उपजी और झल्लाहट भी हुई। मनोकामना पूर्ण करने का जंजाल अपने या गायत्री माता के गले बाँधना हमारा उद्देश्य कदापि न था। उपासना की वैज्ञानिक विधि व्यवस्था अपनाकर आत्मोन्नति के पथ पर क्रमबद्ध रूप से आगे बढ़ते चले जाना यही हमें अपने स्वजन परिजनों से आशा थी, पर वे उस कठिन दीखने वाले काम को झंझट समझकर कतराते रहे। ऐसे लोगों से हमारा क्या प्रयोजन पूरा होता?

🔷 बहुत दिन विचार करने के बाद यह सोचा कि जो अपने मूल मन्तव्य को सुनने-समझने तक के लिए तैयार नहीं हैं, केवल मन्त्र शक्ति का चमत्कार बिना उसका उचित मुख्य चुकाये देखने को आतुर हैं, इन पर शक्ति का अपव्यय न करके इस विशाल संसार में से उन लोगों को ढूँढ़ा जाय जो विचार, भावना, आदर्श और उद्देश्य का मूल्य महत्व समझते हों, अखण्ड ज्योति में व्यक्त हमारे विचारों के प्रति अभिरुचि एवं आस्था रखते हों। इस कसौटी पर 40 हजार व्यक्ति खरे उतरे। उन्होंने शरीर के प्रति आदर अभिवादन व्यक्त करने की अपेक्षा हमारे विचारों की शक्ति, उपयोगिता एवं आवश्यकता को समझा। 24 लाख की तुलना में 40 हजार की संख्या बहुत छोटी है। फिर भी यह सन्तोष किया गया कि जो आज हमारे विचारों के प्रति आस्था रखता है, आगे चलकर वह हमारी बताई हुई कार्य पद्धति को अपना लेगा। बहुत करके ऐसा हुआ भी है। अखण्ड-ज्योति की प्रखर प्रेरणा ने करोड़ों नहीं तो लाखों मनुष्यों की जीवन दिशा में आशाजनक मोड़ दिया है, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1966 पृष्ठ 39
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/October/v1.39

मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

👉 तृप्‍ति के क्षण

🔶 एक छोटा सा फकीर का झोंपड़ा था। रात थी, जोर से वर्षा होती थी। रात के बारह बजे होंगे फकीर और उसकी पत्‍नी दोनों सोते थे। किसी आदमी ने दरवाजे पर दस्‍तक दी। छोटा सा झोंपड़ा कोई शायद शरण चाहता था। उसकी पत्‍नी से उसने कहा कि द्वार खोल दें, कोई द्वार पर खड़ा है, कोई यात्री कोई अपरिचित मित्र। सुनते है उसकी बात, उसने कहां, कोई अपरिचित मित्र, हमारे तो परिचित है, वह भी मित्र नहीं है। उसने कहां की कोई अपरिचित मित्र, प्रेम का भाव है।

🔷 कोई अपरिचित मित्र द्वार पर खड़ा है, द्वार खोल उसकी पत्‍नी ने कहां, लेकिन जगह तो बिलकुल नहीं है। हम दो के लायक ही मुश्‍किल से है। कोई तीसरा आदमी भीतर आयेगा तो हम क्‍या करेंगे।

🔶 उस फकीर ने कहा, पागल यह किसी अमीर का महल नहीं है, जो छोटा पड़ जाये। यह गरीब को झोंपड़ा है। अमीर का महल छोटा पड़ जाता है। हमेशा एक मेहमान आ जाये तो महल छोटा पड़ जाता है। यह गरीब की झोपड़ी है।

🔷 उसकी पत्‍नी ने कहां—इसमे झोपड़ी.. अमीर और गरीब का क्‍या सवाल है? जगह छोटी है। उस फकीर ने कहा कि जहां दिल में जगह बड़ी हो वहां, झोपड़ी महल की तरह मालूम हो जाती है। और जहां दिल में छोटी जगह हो, वहां झोंपड़ा तो क्‍या महल भी छोटा और झोंपड़ा हो जाता है।द्वार खोल दो, द्वार पर खड़े हुए
आदमी को वापस कैसे लौटाया जा सकता है? अभी हम दोनों लेटे थे, अब तीन लेट नहीं सकेंगे,तीन बैठेंगे। बैठने के लिए काफी जगह है।

🔶 मजबूरी थी, पत्‍नी को दरवाजा खोल देना पडा। एक मित्र आ गया, पानी से भीगा हुआ। उसके कपड़े बदले और वे तीनों बैठ कर गपशप करने लग गये। दरवाजा फिर बंद कर दिया।

🔷 फिर किन्‍हीं दो आदमियों ने दस्‍तक दी। अब उस मित्र ने उस फकीर को कहा, वह दरवाजे के पास था, कि दरवाजा खोल दो। मालूम होता है कि कोई आया है। उसी आदमी ने कहा, कैसे खोल दूँ दरवाजा, जगह कहां हे यहां।

🔶 वह आदमी अभी दो घड़ी पहले आया था खुद और भूल गया वह बात की जिस प्रेम ने मुझे जगह दी थी। वह मुझे जगह नहीं दी थी, प्रेम था उसके भीतर इस लिए जगह दी थी। अब कोई दूसरा आ गया जगह बनानी पड़ेगी। लेकिन उस आदमी ने कहा, नहीं दरवाजा खोलने की जरूरत नहीं; मुश्‍किल से हम तीन बैठे हे। वह फकीर हंसने लगा। उसने कहां, बड़े पागल हो। मैंने तुम्‍हारे लिए जगह नहीं की थी। प्रेम था, इसलिए जगह की थी। प्रेम अब भी है, वह तुम पर चुक नहीं गया और समाप्‍त नहीं हो गया। दरवाजा खोलों, अभी हम दूर-दूर बैठे है।

🔷 फिर हम पास-पास बैठ जायेंगे।  पास-पास बैठने के लिए काफी जगह है। और रात ठंडी है, पास-पास बैठने में आनंद ही और होगा।

🔶 दरवाजा खोलना पडा। दो आदमी भीतर आ गये। फिर वह पास-पास बैठकर गपशप करने लगे। और थोड़ी देर बीती है और रात आगे बढ़ गयी है और वर्षा हो रही है ओर एक गधे ने आकर सर लगाया दरवाजे से। पानी में भीग गया था। वह रात शरण चाहता था।

🔷 उस फकीर ने कहा कि मित्रों, वे दो मित्र दरवाजे पर बैठे हुए थे जो पीछे आये थे; दरवाजा खोल दो, कोई अपरिचित मित्र फिर आ गया। उन लोगों ने कहा, वह मित्र वगैरह नहीं है, वह गधा है। इसके लिए द्वार खोलने की जरूरत नहीं है। उस फकीर ने कहा कि तुम्‍हें शायद पता नहीं, अमीर के द्वार पर आदमी के साथ भी गधे जैसा व्‍यवहार किया जाता है। यह गरीब की झोपड़ी है, हम गधे के साथ भी आदमी जैसा व्‍यवहार करेने की आदत भर हो गई है। दरवाजा खोल दो। पर वे दोनों कहने लगे, जगह। उस फकीर ने कहा, जगह बहुत है; अभी हम बैठे है, अब खड़े हो जायेंगे। खड़े होने के लिए काफी जगह है। और फिर तुम घबडाओं मत, अगर जरूरत पड़ेगी तो मैं हमेशा बहार होने के लिए तैयार हूं। प्रेम इतना कर सकता है।

🔶 एक लिविंग एटीट्यूड, एक प्रेमपूर्ण ह्रदय बनाने की जरूरत है। जब प्रेम पूर्ण ह्रदय बनता है।तो व्‍यक्‍तित्‍व में एक तृप्‍ति का भाव एक रसपूर्ण तृप्‍ति.....।

🔷 क्‍या आपको कभी ख्‍याल है कि जब भी आप किसी के प्रति जरा-से प्रेमपूर्ण हुए, पीछे एक तृप्‍ति की लहर छूट गयी है। क्‍या आपको कभी भी खयाल है कि जीवन में तृप्‍ति के क्षण वही रहे है। जो बेशर्त प्रेम के क्षण रहे होंगे। जब कोई शर्त न रही होगी प्रेम की। और जब आपने रास्‍ते चलते एक अजनबी आदमी को देखकर मुस्कुरा दिया होगा - उसके पीछे छूट गयी तृप्‍ति का कोई अनुभव है? उसके पीछे साथ आ गया एक शांति का भाव। एक प्राणों में एक आनंद की लहर का कोई पता है। जब राह चलते किसी आदमी को उठा लिया हो, किसी गिरते को संभाल लिया हो, किसी बीमार को एक फूल दे दिया हो। इसलिए नहीं कि वह आपकी मां है, इसलिए नहीं की वह आपका पिता है। नहीं वह आपका कोई नहीं है। लेकिन एक फूल किसी बीमार को दे देना आनंद पूर्ण है।

🔶 व्‍यक्‍तित्‍व में प्रेम की संभावना बढ़ती जानी चाहिए। वह इतनी बढ़ जानी चाहिए—पौधों के प्रति, पक्षियों के प्रति पशुओं के प्रति, आदमी के प्रति, अपरिचित के प्रति, अंजान लोगों के प्रति, विदेशियों के प्रति, जो बहुत दूर है उसके प्रति, प्रेम हमारा बढ़त चला जाए..........................................

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 28 Feb 2018


👉 सुखद और सरल सत्य ही है

🔶 नि:संदेह सत्य का मार्ग उतना कठिन नहीं है। जितना दीखता है। जो वस्तु व्यवहार में नहीं आती, जिससे हम दूर रहते हैं, वह अजनबी, विचित्र तथा कष्टïसाध्य लगती है, पर जब वह समीप आती है, तो वह स्वाभाविक एवं सरल बन जाती है। चूँकि हमारे जीवन में झूठ बोलने की आदत ने गहराई तक अपनी जड़ जमा ली है। बात-बात में झूठ बोलते हैं। बच्चों की हँसी-जिन्दगी में, शेखी बघारने के लिए, लोगों को आश्चर्य में डालने के लिए अक्सर अतिरंजित बात कही जाती है। इनसे कुछ विशेष लाभ होता हो, या कोई महत्त्वपूर्ण स्वार्थ सधता हो, सो बात भी नहीं है, पर यह सब आदत में सम्मिलित हो गया है, इसलिए अनजाने ही हमारे मुँह से झूठ निकलता रहता है।
  
🔷 वेदों में स्थान-स्थान पर सत्य की महत्ता को समझाया गया है और सत्यवादी तथा सत्यनिष्ठï बनने के लिए प्रेरणा दी गयी है। सत्य का मार्ग चलने में सरल है। यह मार्ग संसार सागर से तरने के लिए बनाया गया है। यही मार्ग द्युलोक तक गया है।
  
🔶 स्वार्थ के लिए, आर्थिक लाभ के लिए, व्यापार में झूठ बोलना तो आज उचित ही नहीं, एक आवश्यक बात भी समझी जाने लगी है। ग्राहक को भाव बताने में अक्सर दुकानदार झूठ बोलते हैं। घटिया को बढिय़ा बताते हैं, चीज के दोषों को छिपाते हैं और गुणों को अतिरंजित करके बताते हैं, जिनसे भोला ग्राहक धोखे में आकर सस्ती और घटिया चीज को बढिय़ा समझ कर अधिक पैसे में खरीद ले। दुकानदार की इस आमप्रवृत्ति को, ग्राहक भी समझने लगे हैं और वे मन ही मन दुकानदार को झूठा, ठग तथा अविश्वस्त मानते हैं। उसकी बात पर जरा भी विश्वास नहीं करते। अपनी निज की समझ का उपयोग करते हैं, दुकानदार की सलाह को ठुकरा देते हैं, दस जगह घूमकर भाव-ताव मालूम करते हैं। चीजों का मुकाबला करते हैं, तब अंत में वस्तु को खरीदते हैं।

🔷 यह व्यापारी के लिए एक बड़ी लज्जा की बात है कि उसे आमतौर से झूठा और बेईमान समझा जाय, उसकी प्रत्येक बात को अविश्वास और संदेह की दृष्टि से देखा जाय। ऐसे लोग भले ही लाभ कमाते हैं, पर वस्तुत: मानव के मूल्यांकन में ये बहुत ही निर्धन, निम्र स्तर के तथा घटिया लोग हैं। जिसे अविश्वस्त समझा जाय, जिनकी नीयत पर संदेह किया जाय, जिसे ठग, धोखेबाज और बहकाने वाला माना जाय, वह नि:संदेह अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा खो चुका। इतनी कीमती वस्तु खोकर यदि किसी ने धन कमा भी लिया, तो इसमें न कोई गौरव की बात है और न प्रसन्नता की। अपना सामाजिक सम्मान खोकर कई लोग धन कमा लेते हैं। लुच्चे, लफंगे, जेबकट और लुटेरे भी अपनी उस्तादी से बहुत पैसे बनाते हैं। और मौज की छानते हैंं। क्या इनकी प्रशंसा की जायेगी? क्या इनका कोई सराहनीय सामाजिक स्तर गिना जायेगा? नहीं, विचारशील क्षेत्रों में इन्हें निम्रकोटि का इन्सानियत से गिरा हुआ व्यक्ति ही गिना जायेगा। ऐसी कमाई, जिससे मनुष्य घृणास्पद बनता हो, अपना आत्म-सम्मान खोता हो, धिक्कार के ही योग्य है। असत्यवादी चाहे वह अपनी चालाकी से किसी क्षेत्र में कितनी ही सफलता क्यों न प्राप्त कर सका हो, धिक्कार योग्य ही माना जायेगा।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों द्वारा जीवन लक्ष्य की प्राप्ति (भाग 1)

🔶 प्रत्येक मनुष्य अपने विचारों द्वारा ही अपना आत्म निर्माण करता है। क्योंकि विचार का बीज ही समयानुसार फलित होकर गुणों का रूप धारण करता है और वे गुण, मनुष्य के दैनिक जीवन में कार्य बनकर प्रकट होते रहते हैं। विचार ही वह तत्व है जो गुण, कर्म, स्वभाव के रूप में, दृष्टिगोचर होता है। मन, कर्म, वचन में विचारों का ही प्रतिबिम्ब सदा परिलक्षित होता रहता है।

🔷 मानव मनोभूमि में सत् और असत् दो प्रकार के संकल्प काम करते रहते हैं। भलाई और बुराई दोनों ही ओर मन चलता रहता है। इस द्विधा में जिधर रुचि अधिक हुई, उधर ही प्रकृतियां बढ़ जाती है। यदि असत मार्ग पर चला गया तो अपयश, द्वेष, चिन्ता, दैवी प्रकोप, शारीरिक और मानसिक अस्वस्थता दरिद्रता एवं अप्रतिष्ठा प्राप्त होती है। और यदि सत मार्ग का अनुगमन किया गया तो प्रशंसा, प्रतिष्ठा, प्रेम, सहयोग, संतोष, दीर्घ जीवन, शारीरिक और आत्मिक बलिष्ठता एवं सदा आनन्द ही आनन्द का रसास्वादन होता है। दो प्रकार के विचार ही मनुष्य समाज को दो भागों में बाँटते हैं। सुखी-दुखी, रोगी-निरोगी, दरिद्र-सम्पन्न, दृष्ट-सज्जन, पापी-पुण्यात्मा, निन्दित-पूज्य, प्रसन्न-चिन्तित आदि द्विविधि श्रेणियाँ केवल मात्र द्विविधि विचारों द्वारा ही विनिर्मित होती हैं।

🔶 अधिक संख्या में जनसमुदाय का मानसिक धरातल परिमार्जित नहीं होता, उसमें पाश्विक वृत्तियों की प्रधानता रहती हैं। अविवेक, अज्ञान, अदूरदर्शिता, संकुचित स्वार्थपरायणता, लोभ विषय विकारों में आसक्ति एवं निकृष्ट कोटि के मनोरंजन की अभिलाषाओं से मनः दोष भरा रहता है। जिससे उसके सोचने, कार्य करने और आनंद लाभ करने की परिधि ऐसी सीमित हो जाती है जिसमें बुराई, तामसिकता एवं अशान्ति ही उत्पन्न हो सकती है। इसी कटघरे में अधिकाँश लोग बंद रहते हैं माया का यह घेरा मनुष्य को बुरी तरह जकड़े रहता है। वह जकड़ा हुआ प्राणी पराधीनता जन्म नाना प्रकार के दुखों को प्राप्त करता रहता है। यही भव बन्धन है।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 15-16
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/March/v1.15

👉 अचिन्त्य चिन्तन से मनोबल न गँवाएँ (भाग 1)

🔷 पिछली भूलों का परिमार्जन, वर्तमान का परिष्कृत निर्धारण एवं उज्ज्वल भविष्य का निर्माण यदि सचमुच ही अभीष्ट हो तो इसके लिए विचार संस्थान पर दृष्टि जमानी चाहिए। इस मान्यता को सुस्थिर करना चाहिए कि समस्त समस्याओं का उद्गम भी यही है और समाधान भी इसी क्षेत्र में सन्निहित है। यह सोचना सही नहीं है कि धन-वैभव के बाहुल्य से मनुष्य सुखी एवं समुन्नत बनता है। इसलिए सब छोड़कर उसी का अधिकाधिक अर्जन जैसे भी संभव हो करना चाहिए। इस भ्रान्ति से जितनी जल्दी छुटकारा पाया जा सके, उतना ही उत्तम है।

🔶 शरीर की बलिष्ठता और चेहरे की सुन्दरता का अपना महत्त्व है। धन की भी उपयोगिता है और उसके सहारे शरीर यात्रा के साधन जुटाने में सुविधा रहती है। इतने पर भी यह तथ्य भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि व्यक्तित्व का स्तर और स्वरूप चिन्तन क्षेत्र के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। व्यक्तित्व का स्तर ही वस्तुतः किसी के उत्थान-पतन का आधारभूत कारण होता है। उसी के अनुरूप भूतकाल बीता है, वर्तमान बना है और भविष्य का निर्धारण होने जा रहा है। उसकी उपेक्षा करने पर भारी घाटे में रहना पड़ता है। स्वास्थ्य का, शिक्षा का, प्रतिभा का, सम्पदा का, पद-अधिकार का कितना ही महत्त्व क्यों न हो, पर उनका लाभ मात्र सुविधा संवर्धन तक सीमित है। यह सम्पदा अपने लिए तथा दूसरों के लिए मात्र निर्वाह सामग्री ही जुटा सकती है, पर इतने भर से बात बनती नहीं। आखिर शरीर ही तो व्यक्तित्व नहीं है? आखिर सुविधाएँ मिल भर जाने से ही तो सब कुछ सध नहीं जाता? कुछ इससे आगे भी है। यदि न होता तो साधन सम्पन्न ही सब कुछ बन गये होते। तब महामानवों की कहीं कोई पूछ न होती, न आदर्शों का स्वरूप कहीं दृष्टिगोचर होता और न मानवी गरिमा का प्रतिनिधित्व करने वाले महामानवों की कहीं आवश्यकता-उपयोगिता समझी जाती।

🔷 समझा जाना चाहिए कि व्यक्ति या व्यक्तित्व का सार तत्व उसके मनःसंस्थान में केन्द्रीभूत है। अन्तःकरण, अन्तरात्मा आदि नामों से इसी क्षेत्र का वर्णन-विवेचन किया जाता है। शास्त्रकारों ने ‘‘मन एव मनुष्याणां कारणं बंध मोक्षये’’ ‘‘आत्मैव आत्मनः बन्धु आत्मैव रिपुरात्मनः’’ ‘‘उद्धरेदात्मनात्मानम् नात्मानमवसादयेत्’’ आदि अभिवचनों में एक ही अंगुलि निर्देश किया है कि मन के महत्त्व को समझा जाय और उसके निग्रह के, परिशोधन-परिष्कार के निमित्त संकल्पपूर्वक साधनारत रहा जाय। मन को जानने की उपमा विश्व विज्ञान से दी गई है। जो अपने ऊपर शासन कर सकता है, वह सबके ऊपर शासन करेगा इस कथन में बहुत कुछ तथ्य है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Amrit Chintan 28 Feb

🔷 Family life is best for most of us. But it is so, subject to condition that one develops and gives a proper decorum to all the members. Parents will have to bear the responsibility of mutual harmony, education, manners. Love and affection and also observe proper development of children. Marriage is not simply a atmosphere of  physical relation but a team for moral and spiritual progress in a blissful way.

🔶 What are needed for a happy blissful life are good health, ability and high moral values. One should develop all this by constant practice. Instead of planning for high ambitions, one should go on earning virtues and distributing side by side to other needy. Self satisfaction in the availing – circumstances is an art in life. Beyond sensual pleasures, there are other higher dimensions for growth in life, which can easily be attained under discipline and ethos.

🔷 Man has control on his destiny. Based on practice of virtues and velour. Nothing is beyond his reach. There is along history that man has earned great height through his hard work and intellect, why you can not. Be sure you have every thing in you in a seed form. But you will have to grow that. That is the royal path which leads historic people to their summits. Thoughts are the power to push you up to great success of life. 

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 17)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 इसलिए मित्रो! इन लोगों से हमारा क्या बनने वाला है? क्या करेंगे हम इन मुरदा आदमियों का? इनसे हमारा कुछ काम नहीं बनेगा। हमको जीवट वाले आदमियों को तलाश करना पड़ेगा। अतः आपको जहाँ कहीं भी जीवट वाले आदमी मिलें, आप वहाँ जाना। हमारा संदेश लेकर के जाना और कहना कि हम आपकी तलाश करते रहे हैं। हम इसलिए तलाश करते रहे हैं कि हमारा ये ख्याल था, भगवान् जाने सही था या गलत था कि आपके अंदर जीवट नाम की कोई चीज है। इस जन्म की नहीं, तो पहले जन्म की है।

🔷 कभी भी हमारी इन आँखों ने चमक में धोखा नहीं खाया है। आपके बारे में हमने अपने मन में यह ख्याल बना करके रखा था कि आप जिंदा इंसानों में से हैं और आपके अंदर दरद नाम की कोई चीज है। आपके अंदर विवेक नाम की कोई चीज है और आपके अंदर तड़प नाम की कोई चीज है। अगर हमको ये चीजें न मालूम पड़ें, तो फिर मुरदे आदमियों को ढोने में क्या आनंद आता है? लाशों को ढो-ढोकर हम कहाँ डालेंगे? सड़े हुए बदबूदार आदमियों को हम कहाँ कंधे पर लिए फिरेंगे? मित्रो! इनको हम बैकुंठ का रास्ता कैसे दिखा देंगे? इनको हम स्वर्ग की कहानी कैसे कह देंगे? भगवान् से मिलने की बात हम कैसे कह देंगे?

🔶 मित्रो! हम सड़े हुए मनुष्यों और मरे हुए मनुष्यों की मनोकामना पूर्ण करने की जिम्मेदारी कैसे उठा लेंगे? हमारे लिए यह बिलकुल असंभव था, नामुमकिन था। हमारा एक ही ख्याल था कि आप लोग जिंदा आदमी हैं। अगर आप वास्तव में जिंदा आदमी हैं, तो यहाँ से जाने के बाद जिंदा आदमियों के तरीके से अपनी जिंदगी जीना। विवेकशील लोगों के तरीके से जीना, विचारशील और भावनाशील लोगों के तरीके से जीना, दिलवाले आदमियों के तरीके से जीना। अगर आप इस तरह से जिएँ, तो फिर तलाश करना और यदि कहीं कोई जिंदा आदमी दिखाई पड़े, तो आप उसके आस-पास चक्कर काटना। आप इस तरीके से चक्कर काटना, जिस तरीके से भौंरा खिले हुए फूल के पास चक्कर काटता है। खिले हुए फूल के आस-पास तितलियाँ और मधुमक्खियाँ चक्कर काटती हैं, जैसे हम बराबर आपके पास चक्कर काटते रहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 53)

👉 भावनाओं का हो सद्गुरु की पराचेतना में विसर्जन

🔶 इस भाव सत्य से जुड़ा एक बहुत ही प्रेरक प्रसंग है। यह प्रसंग श्री श्रीरामकृष्ण परमहंस देव के गृही शिष्य श्री रामचन्द्र दत्त के जीवन का है। श्री दत्त महाशय की भक्ति अपने गुरु के प्रति बढ़ी-चढ़ी थी; परन्तु इसी के साथ उनमें सांसारिक बुद्धि की भी छाया थी। उनमें अपनी विद्या-बुद्धि एवं धन-पैसे का अहंकार भी था। उनके संदर्भ में एक बात और उल्लेखनीय है कि श्री परमहंस देव के संन्यासी शिष्य स्वामी अद्भुतानन्द पहले इन्हीं के यहाँ नौकरी करते थे। इन अद्भुतानन्द को श्री रामकृष्ण के भक्त समुदाय में लाटू महाराज के नाम से जाना जाता है। दत्त महाशय ने ही उन्हें ठाकुर से मिलवाया था। बाद में उनकी भक्ति भावना को देखकर उन्हें ठाकुर की सेवा में अर्पित कर दिया।
  
🔷 यही दत्त महाशय एक दिन श्री श्री ठाकुर के पास दक्षिणेश्वर आये हुए थे। स्वाभाविक रूप से वे अपने साथ अपने गुरुदेव के लिए कुछ फल-मिठाइयाँ एवं कुछ अन्य सामान लाये हुए थे। ठाकुर ने स्वभावतः यह सामान युवा भक्त मण्डली में बाँट दिया। उन्हें इस तरह सामान बाँटते देखकर दत्त महाशय थोड़ा कुण्ठित हो गये। उन्हें लगा कि इतना कीमती सामान और इन्होंने इन लड़कों में बाँट दिया। अच्छा होता कि ये इस सबको अपने लिए रख लेते और बहुत दिनों तक इसका उपयोग करते रहते। उनकी ये सांसारिक भावनाएँ ठाकुर से छिपी नहीं रहीं। जिस समय वे यह सब सोच रहे थे, उस समय शाम का समय था और वे परमहंस देव के पास बैठे उनके पाँव दबा रहे थे।
  
🔶 इन भावनाओं के उनके मन में उठते ही श्री श्रीरामकृष्ण देव ने अपने पाँव से उनके हाथ झटक दिये और बाँटने से बचा हुआ उनका सामान उनके पास फेंकते हुए बोले-तू अब जा यहाँ से। मैं तुझे अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता। रही बात उस सामान की, जो तू अब तक यहाँ लाया करता था, वह भी और उससे ज्यादा तुझे मिल जायेगा। मैं माँ से प्रार्थना करूँगा कि वह सब कुछ बल्कि उससे बहुत ज्यादा तुझे लौटा दे। अचानक ठाकुर में आये इस भाव परिवर्तन से दत्त महाशय तो हतप्रभ रह गये; पर साथ ही वे यह भी समझ गये कि अन्तर्यामी ठाकुर ने उनके मन में उठ रही सभी भावनाओं को जान लिया है।
  
🔷 पर अब किया भी क्या जा सकता था? शाम गहरी हो गयी थी। वापस कलकत्ता भी नहीं लौट सकते थे। वैसे भी ऐसे मनःस्थिति में वह कलकत्ता लौटना भी नहीं चाहते थे। बस भरे हुए मन से सोचा ठाकुर के द्वारा तिरस्कृत जीवन अब किस काम का? और उनके अन्दर उमड़ आयी भक्ति भावना ने यह प्रेरणा दी कि क्यों न माँ के मन्दिर के पास बैठकर ठाकुर के नाम का जप किया जाय। बस ‘ॐ नमो भगवते रामकृष्णाय’ उनके कण्ठ से, प्राणों से और हृदय से बहने लगा। उनकी भावनाएँ अपने दिव्य गुरु में विलीन होने लगी। रात गहरी होती गयी और वह अपने सद्गुरु की पराचेतना में विलीन होते गये। भाव विलीनता इतनी प्रगाढ़ हुई कि शिष्यवत्सल श्री परमहंस देव स्वयं उनके पास आ गये और बोले-चल तेरा परिमार्जन हो गया। श्री ठाकुर के चरणों को अपने आँसुओं से धोते दत्त महाशय अनुभव कर रहे थे कि सद्गुरु की पराचेतना ही चिंतनीय-मननीय है। इस सत्य को हम भी अनुभव कर सकते हैं।                                 

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 87

सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

👉 मंगलसूत्र

🔷 वह आज सुबह से सड़कों पर यहाँ वहाँ भटक रहा है।पर कोई काम नहीं मिला। शायद उसकी ऐसी हालत देखकर कोई उसे किसी कार्य के लायक ही नहीं समझ रहा। तभी तो सभी उसे भिखारी समझ कर दुत्कार रहे हैं। दोपहर होने को आयी। जुबान सूख रही है।होठों पर पपड़ी सी जम गयी है।उसे ना ही खाने की जरूरत है और ना ही पानी की तलब। पिछले हफ्ते से उसने खाया ही कहाँ है भरपेट। जरूरत ही महसूस नहीं हुई। पर वह उस चीज को कहाँ से हासिल करे जिसकी तलब उसके दिमाग पर हावी होती जा रही है। राघव भी जाने कहाँ मर गया आज। सुबह से दो बार चौराहे पर ढाबे के आस पास सब कहीं छान चुका है। कहीं नहीं दिखा।

🔶 रोज तो वहीं खड़ा मिलता है। कहीं वह उससे खेल तो नहीं रहा? राघव अच्छी तरह जानता है कि वह नशे के बगैर नहीं जी सकता। फिर वह क्या करे? जेब में कौड़ी भी नहीं है। हाथ पैर जोड़कर दो चार खुराक उधारी पर ले लेता। कहीं भाग थोड़े ही जायेगा वह? हमेशा तो पैसे तुरंत चुकाता है। आज नहीं तो क्या हुआ?विश्वास भी कोई चीज है आखिर।

🔷 अपनी ही सोच पर हँस पड़ा वह। विश्वास और वह? इकलौता होने के कारण कितनी उम्मीदें थीं उस से माँ बापू को।पर उसने परवाह की कभी क्या? घर के बर्तन,रूपये पैसे जेवर जब गायब होने लगे तब सबको समझ आया कि लड़का हाथ से निकल चुका है। समझाना बुझाना कुछ काम नहीं आया। आखिरकार माँ ने आखिरी पत्ता फेंका। शायद ब्याह के बाद मोहमाया में पड़कर बुरी सोहबत से छूट जाये।

🔶 जब सोना उसकी दुल्हन बनकर आयी तो सचमुच वह उसका रूप देखकर अपनी सुधबुध ही खो बैठा था। कुछ दिन तक तो सब ठीक चला। माँ बाबू जी भी बेहद खुश कि चलो बुढ़ापा खराब होने से बच गया। पर वही कुपथ पर ले जाने वाले कुमित्र फिर आसपास मंडराने लगे। सोना का सोने जैसा रूप भी उसे न रोक सका।

🔷 उसने भले ही माँ बाबू जी को कभी सुख ना दिया पर सोना के प्रेम,सम्मान व सेवाभाव से वो निहाल थे। प्रारम्भ में तो वह संकोच करता रहा फिर धीरे धीरे ब्याह में मिले नेग निछावर व उपहारों पर नजर गड़ाने लगा। सोना भी कूछ ना कह पाती। कमरे में से कीमती सामान गायब होने लगे पर माँ बाबू जी को कुछ न पता चलता।

🔶 खुद तो पीता पिलाता। दोस्तों को भी खुश करता। धीरे धीरे साल गुजर गया। सोना का रूप पीला पड़ने लगा। मायके जाती तो किसी के बहुत पूछने पर भी कुछ ना बताती। पर अंदर ही अंदर चिंता का घुन लग चुका था उसे। जाने क्या होगा उसके भविष्य का? पेट में पल रही नन्ही सी जान भी क्या इसी माहौल में साँस लेगी? क्या क्या सपने देखे थे उसने,पर कच्चे रेत से सब ढह गये। माँ बाबू जी को जब उसके पेट से होने का पता चला तो उनकी खुशी का ठिकाना ना रहा।

🔷 उम्मीदों के नये पुल बनने लगे। पर अभी दुःखों का अंत कहाँ था। दर्द की पराकाष्ठा नहीं देखी थी उन्होंने। उधर ज्यों ज्यों पेट में पल रहा जीव बढ़ रहा था त्यों त्यों सोना के तन से गहनों का बोझ कम होता जा रहा था। अब तो माँ भी सब समझने लगी थी। विरोध करने पर वह घर से चले जाने की धमकी देकर सबकी बोलती बंद कर देता।

🔶 उफ्फ ......यह दिन भी देखना था। आज तो हद ही हो गयी। रात सोना को आपने गले पर स्पर्श का अहसास हुआ तो वह चिंहुक कर ऊठ गयी। मंगल सूत्र की डोरी पर पति का हाथ देखकर काँप गयी। वही मंगलसूत्र जिसे माँ ने पहली रात में कोठरी में जाने से पहले पकड़ाया था मुँह दिखाई के लिये। मोर के बड़े से ठप्पे वाला मंगलसूत्र। सुहाग की आखिरी निशानी बस यही तो बचा था उसके पास। सोना ने हाथ पकड़ लिया था। जाने कहाँ से हिम्मत आ गयी थी उसे। चिरौरी भरे स्वर में बोल गयी थी"अब इसे तो छोड़ दीजिये। कितना गिरेंगे आप?"

🔷 ग्लानि तो नहीं हुई पर शायद मन में भय कर गया कि सोना कहीं यह बात बता न दे माँ बाबू जी को। सो तड़के ही घर से निकल गया। पूरे दिन घर जाने की हिम्मत ना जुटा पाया। उधर सोना दिन भर आँसू बहाती रही। डाॅक्टर दीदी ने इसी महीने की तारीख दी थी। अब वह क्या करे? आज तो उसे सारी दुनिया ही बेगानी लग रही थी। पति के इस रूप की उसने कल्पना भी नहीं की थी। जब नन्हा घर में आ जायेगा तो वह मोहमाया में पड़ जायेगी। तब क्या होगा?नहीं ऐसा नहीं होने देगी वह। इस माहौल में वह अपने बच्चे को नहीं जीने देगी। उसे कुछ करना होगा.....जल्दी ही.....बच्चे के आने से पहले ही।

🔶 और वहाँ चंदन? वह सड़क किनारे ही पड़ गया था।नींद क्या आती? रात भर सोचता रहा सुबह राघव के पाँव पकड़कर खुराक माँगेगा। फिर मेहनत मंजूरी करके चुकता कर देगा। पर घर तो हरगिज नहीं जाना। पत्नी होकर भी पति की मदद नहीं कर सकती। ऐसा घर माँ बाप पत्नी किस काम के? करवटों में कब सुबह हुई पता ही नहीं चला। उठकर पास के नल पर हाथ मुँह धोया और फिर सड़क पर हो लिया,अपने लत की चाह में जो उसे कहाँ से कहाँ ले आयी थी।

🔷 उधर घर में जो घटित होना था वह हो चुका था। पर उसे क्या खबर क्या परवाह? खुद का भी होश नहीं था। दाढ़ी बढ़ चुकी थी। बाल बिखरे हुये और उसकी जिन्दगी की भाँति उलझे हुये। पेट पीठ से लग चुका था। एक भिखारी से कम लग भी नहीं रहा था। उस रात सोना के हाथ की रोटी खायी थी तबसे भरपेट खाना नसीब ही कहाँ हुआ था?

🔶 आज भी काम नहीं मिला था और ना ही राघव। क्या करे?....कहाँ से रूपयों का इन्तजाम हो?...ये कागज के रंगीन टुकड़े भी क्या चीज हैं। खूब रुलाते हैं इन्सान को।

🔷 तभी उसका ध्यान घाट की ओर जाते रेले पर चला गया। शायद कोई पर्व स्नान है। तभी इत्ता आदमी चला जा रहा है पगलाया हुआ। बड़ा दानपुण्य करते हैं लोग नदी किनारे। इस खयाल से ही उसकी निस्तेज बुझ चुकी आँखें चमक उठीं। भिखारी तो लग ही रहा है। कौन पहचानेगा उसे इस हुलिये में। शायद कुछ मिल जाये।यही सोचकर भीड़ के संग हो लिया। घाट पर एक किनारे बैठने भर की जगह ढूंढने में ज्यादा देर नहीं लगी उसे। लोग चले जा रहे थे पर कोई उसपर ध्यान नहीं दे रहा था। हाथ फैलाये हुये बुदबुदाता जा रहा था"लोग कितना बदल गये हैं। धर्म कर्म तो रहा ही नहीं दान पुण्य की भावना भी नहीं रही लोगों में।"......तभी भीड़ में सामने आते जाने पहचाने चेहरे पर नजर गड़ गई। अरे बाप रे.....इतवारी काका..कहीं देख तो नहीं लिया। कोई अमावस पूरनमासी नहीं छोड़ते। गंगा नहाना तो उनके जीवन का जरूरी कारज है। घबराकर मुँह फेरकर बैठ गया। भीड़ आगे बढ़ गयी।

🔶 यह ठीक नहीं है। कोई पहचान लेगा तो....। उठकर मेले में भटकता रहा। सांझ ढल रही थी। भूख प्यास अब शरीर पर असर दिखाने लगी थी। तलब भी बढ़ चली थी। इतना समय वह बिना नशे के कभी नहीं रहा। धीरे धीरे वह मेले की भीड़ को छोड़कर घाट के सुनसान हिस्से की ओर बढ़ चला। उसे मेले की चहल पहल,सजी दुकानें व खुश्बू बिखेरते चाट मिठाई के ठेले कुछ भी भा नहीं रहे थे। आँखें सुस्ती से बेजान हो चली थीं। शरीर निढाल हो गया था। पेड़ के तने से टेक लगाकर बैठ गया वह। सूरज अस्तांचल में समाने लगा था। उसे भी लग रहा था कि आज उसका सूरज भी ढलने को है। तुरंत उसे कुछ करना है, रात होने से पहले ही।

🔷 घाट पर कुछ चितायें जल रही थीं कुछ बस बुझने को ही थीं। जहाँ जीवन के बाद आता है इंसान,आज वह वहीं खड़ा है जिन्दा लाश बनकर। कैसी नियति है? अचानक नजर अभी अभी लायी गयी शवयात्रा पर ठिठक गयी। ट्रैक्टर ट्राॅली से जाने पहचाने लोग उतर रहे थे। लगता है गाँव में टपक गया है कोई।......बाबू जी?...ये भी हैं यहाँ?

🔶 कहीं देख ना लें। पेड़ की ओट हो लिया। चिता सजा दी गयी। यह क्या?....बाबू जी चिता को मुखाग्नि दे रहे हैं?

🔷 क्या माँ...? नहीं ऐसा नहीं हो सकता। पर क्यों नहीं हो सकता? आँसू बह चले थे उसकी निर्लज्ज आँखों से। जी हुआ भागकर चला जाये बाबूजी के पास। गिर जाये उनके कदमों में।माँग ले माफी। पर यह क्या इतना आसान है अब ....। ना ही तन में ताकत बची थी और ना ही मन में हिम्मत। क्या मुँह लेकर जाता। शायद सोना ने सब बता दिया होगा।बर्दाश्त नहीं कर पायी होंगी। वह इतना गिर जायेगा माँ ने कभी नहीं सोचा होगा। पश्चाताप की एक चिंगारी उभरी और तुरंत बुझ भी गयी। चिता जल रही थी पर उसका शरीर कुछ और ही माँग रहा था उससे। उसकी सारी संवेदनायें, भावनायें और रिश्ते चिता के साथ ही भस्म होते जा रहे थे। जीवन भर संजोये गये संस्कार और बंधन लकड़ियों की चटकन के साथ ही दरक गये थे। आँखें मूंदकर बैठा रहा वह।

🔶 धीरे धीरे आहटें कम होती जा रही थीं। उसे लग रहा था कि वह अपना होश खोता जा रहा है। तभी कानों में पड़ी एक आवाज ने उसे चौंका दिया"कितना दुःख झेलकर पाला था मनोहर ने चंदन को। पर इतना बड़ा दुःख दिया उसने। पहले वह घर छोड़ गया। अब बहू ने जहर खा लिया। दुनिया ही उजड़ गयी बेचारे की। सुना है बहू भी पेट से थी।किलकारी गूंजने से पहले ही सब कुछ खत्म हो गया।"

🔷 "सही कह रहे हो। ऊपर वाले की रही मरजी थी। ऐसे लड़के से तो बेऔलाद होना ही भला है। बहू मरने से पहले ही कह गयी थी कि उसकी चिता को पति हाथ भी नहीं लगायेगा। बहुत भली थी........इसके बाद उसे कुछ भी सुनाई न पड़ा। कान में माँ ,बाबू जी,सोना सबकी आवाजें गूँजती रहीं। एक दूसरे में गडमड हुई फिर सन्नाटा छा गया।

🔶 अचानक ना जाने कहाँ से उसमें बला की ताकत आ गयी। वह दौड़ पड़ा चिता की ओर। लकड़ियाँ अभी धधक रही थीं और उनके बीच सोना का रूप और यौवन भी। पर उसे तो और किसी चीज की तलाश थी। जरूर वह आग के ढेर में होगी। पागलों की तरह वह लकड़ी से अंगारों को इधर उधर बिखेरे जा रहा था। चिता के राख बनने तक लगातार........

🔷 पर वह ठप्पा उसे नहीं दिखा, सुन्दर सा, बड़ा सा, मोर वाला......मंगलसूत्र का ठप्पा...... थक कर वह वहीं लुढ़क गया.... ....कानों में सबकी आवाजें खोती जा रही थीं।।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 Feb 2018

👉 आज का सद्चिंतन 27 Feb 2018


👉 ईश्वर के अनुग्रह का सदुपयोग किया जाय

🔷 मनुष्य को सोचने और करने की स्वतन्त्रता प्राप्त है। उसका उपयोग भली या बुरी, सही या गलत किसी भी दिशा में वह स्वेच्छापूर्वक कर सकता है। भव बंधन में बँधना भी उसका स्वतन्त्र कर्तृत्व ही है। इसमें माया, प्रारब्ध, शैतान, ग्रह, नक्षत्र आदि किसी अन्य का कोई दोष या हस्तक्षेप नहीं है। जीवन के स्वरूप और उद्देश्य से अपरिचित व्यक्ति भौतिक लालसाओं और लिप्साओं में स्वतः आबद्ध होता है। वह चाहे तो अपनी मान्यता और दिशा बदल भी सकता है और जिस तरह बंधनों को अपने इर्द गिर्द लपेटा था उसी प्रकार उनसे मुक्त भी हो सकता है।

🔶 रेशम का कीड़ा अपना खोल आप बुनता है और उसी में बँधकर रह जाता है। मकड़ी को बंधन में बाँधने वाला जाल उसका अपना ही तना हुआ होता है। इसे उनकी प्रवृत्ति की प्रतिक्रिया ही कह सकते हैं। जब रेशम का कीड़ा खोल में से निकलने की बात सोचता है तो बुनने की तरह उसे कुतर डालने में भी कुछ कठिनाई नहीं होती। मकड़ी अपने फैलाये जाले को जब चाहे तब समेट भी सकती है। इन्द्रिय लिप्साओं और ममता, अहंता को प्रधानता देकर मनुष्य शोक-सन्ताप की विपन्नता में ग्रस्त होता है। यदि वह अपनी दिशा पलट ले तो जीवन मुक्त स्थिति का आनन्द प्राप्त करने में भी उसे कोई अड़चन प्रतीत न होगी।

🔷 समस्त विभूतियों से सम्पन्न मानव जीवन का अनुदान और सर्व तन्त्र स्वतन्त्रता का उपहार देकर भगवान ने अपने अनुग्रह का अन्त कर दिया। अब मनुष्य की बारी है कि वह सिद्ध कर दिखाये कि उसका सदुपयोग वह कर सकता है जो उसे दिया गया।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1972 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1972/October/v1.1

👉 सत्कर्मों से दुर्भाग्य भी बदल सकता है (अन्तिम भाग)

🔷 पूर्वकृत पापों के नष्ट होने का संबंध उन कर्मों से है जिनका अभी परिपाक नहीं हुआ है, जो अभी संचित रूप में पड़े हैं और समयानुसार फलित होने के लिए जो सुरक्षित रखे हुए हैं। वर्तमान काल में यदि अधिक बलवान शुभकर्म किए जाएं, मन में यदि उच्चकोटि की सतोगुणी भावनाओं का प्रकाश प्रज्वलित रहे तो उसके तेज से, ऊष्मा से वह अशुभ संचय झुलसने लगता है और हत प्रभ हीन वीर्य होने लगता है। जहाँ अग्नि की भट्टी जलती रहती हो उसके आस पास में कई पुस्तकें औषधियाँ आदि रखी रहें तो वे सब उस गर्मी के कारण जीर्ण शीर्ण निस्तेज और क्षतवीर्य हो जायेंगी। कोई बीज उस गर्मी को रखे रहें तो उनकी उपजाने की शक्ति मारी जायेगी।

🔶 इसी प्रकार यदि वर्तमान काल में कोई व्यक्ति अपनी मनोभूमि को तीव्रगति से निर्मल और सतोगुणी बनाता जा रहा है तो उसकी तीव्रता से भूतकाल के अशुभ कर्मों की शक्ति अवश्य नष्ट होगी। इसी प्रकार यदि भूतकाल में अच्छे कर्म किये गये थे और उनका सुखदायक शुभ परिपाक होने जा रहा था तो वह परिपाक भी वर्तमान काल के कुकर्मों, दुर्गुणों, कुविचारों और दुष्ट भावनाओं के कारण हीन-वीर्य, निष्फल और मृतप्रायः हो सकता है। वर्तमान का प्रभाव भूत पर ही पड़ता है और भविष्य पर भी। महापुरुषों के पूर्वज भी प्रशंसा पाते है और संतान भी आदर की दृष्टि से देखी जाती है। दुष्ट कुकर्मियों के पूर्वज भी कोसे जाते हैं और उनकी संतानें भी लज्जा का अनुभव करती है।

🔷 स्मरण रखिए वर्तमान ही प्रधान है। पिछले जीवन में आप भले या बुरे कैसे भी काम करते रहे हों यदि अब अच्छे काम करते हैं तो चंद भोग्य बन गये फलों को छोड़ कर अन्य संचित पाप क्षतवीर्य हो जायेंगे और यदि उनका कुछ परिणाम हुआ भी तो बहुत ही साधारण स्वल्प कष्ट देने वाला एवं कीर्ति बढ़ाने वाला होगा। शिवि, दधीच, हरिश्चन्द्र, प्रहलाद, ध्रुव, पांडव आदि को पूर्व भोगों के अनुसार कष्ट सहने पड़े पर वे कष्ट अन्ततः उनकी कीर्ति को बढ़ाने वाले और आत्मलाभ कराने वाले सिद्ध हुए। सुकर्मी व्यक्तियों के बड़े-बड़े पूर्व घातक स्वल्प दुख देकर सरल रीति से भुगत जाते हैं। पर जो वर्तमान काल में कुमार्गगामी हैं उनके पूर्वकृत सुकर्म तो हीन वीर्य हो जायेंगे जो संचित पाप कर्म हैं वे सिंचित होकर परिपुष्ट और पल्लवित होंगे, जिससे दुखदायी पाप फलों की शृंखला अधिकाधिक भयंकर होती जाएगी।

🔶 हमें चाहिए कि सद्विचारों को आश्रय दें और सुकर्मों को अपनायें, यह प्रणाली हमारे बुरे भूतकाल को भी श्रेष्ठ भविष्य में परिवर्तित कर सकती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 19
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/February/v1.19

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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