बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

👉 व्यवहार में औचित्य का समावेश करें (भाग 1)

🔷 जिनके साथ इच्छा या अनिच्छा से हमें रहना पड़ता है, उनके साथ निर्वाह की रीति-नीति पहले ही निर्धारित कर लेनी चाहिए। सोचना होगा कि उनमें से स्तर की दृष्टि से कुछ श्रेष्ठ, कुछ मध्यम होंगे, साथ ही कुछ अनगढ़, असंस्कृत और उद्धत भी रहेंगे। इच्छित प्रकृति के लोग ही मिलते रहें, अन्य प्रकार वालों के साथ वास्ता ही न पड़े, ऐसा नहीं हो सकता। सदा सूर्य ही निकला रहे, रात्रि कभी हो नहीं, सदा सर्दी का मौसम रहे, कभी गर्मी फटकने ही न पाये ऐसी अपेक्षा रखना और उस मर्जी के पूरी न होने पर खीजना अनुपयुक्त है। यह संसार हमारे लिए ही नहीं बना है। उसमें अन्यान्य के निर्वाह की भी गुंजायश रखी गई है।

🔶 इस संयुक्त समुदाय के लिए बनाये बड़े रसोईघर में सदा वही सब नहीं पकता जो हम चाहते हैं। इस मुसाफिरखाने में सभी को बैठने की छूट है। अपनी मर्जी तो अपने निजी घर में ही निभ सकती है। समझा जाना चाहिए कि इस सराय में सभी के लिए रैन बसेरे के लिए गुंजायश है। अपनी मर्जी को ही सब कुछ रखने और जैसा चाहा गया है वैसा ही सरंजाम जुटने की बात सोचना, ऐसी गलती है जिसे सुधारे बिना दूसरा रास्ता है नहीं। श्रेष्ठजनों से प्रेरणा लें, उनसे घनिष्ठता साधें और आदान-प्रदान का द्वार खोलें। जो सामान्य हैं, उनके साथ तालमेल बिठाने और बिना टकराये समय गुजारने भर की बात सोचनी चाहिए।

🔷 वे जहाँ तक सहन कर सकें उतना उन्हें सत्परामर्श से लाभान्वित भी करें और वैसी सज्जनता बरतें जैसी कि सामान्य जनों के साथ बरती जानी चाहिए। हर किसी के साथ घनिष्ठता बढ़ाने, अनावश्यक उदारता बरतने और आशा लगाने की भावुकता अन्ततः महँगी ही पड़ती है। इसलिए सम्पर्क क्षेत्र में इस प्रकार का वर्गीकरण और नीति निर्धारण आवश्यक हो जाता है। ऐसा भी होता रहता है कि व्यक्तियों के स्तर बदलें। मध्यम ऊँचे उठें और श्रेष्ठों जैसा स्तर विकसित करें। अपवाद ऐसे भी होते हैं जिनमें ऊँचे लोग भी नीचे की ओर खिसकने लगते हैं। अतएव वर्गीकरण सामयिक होते हैं। जहाँ स्तर में हेर-फेर हो रहा हो, वहाँ अपने निर्धारण में भी तदनुरूप परिवर्तन करना भी उचित है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Essence of Worship-Intercession. (Part 2)

🔷 GAYATRI mantra means refinements of sentiments that I had been taught by my GURU. Friends! My all heart and soul is soaked in GAYATRI mantra which for me is a mantra that only refines & systemizes human brain. I spend all my brain on how to make my style of thinking, wishes and view-point like that of a devotee of GAYATRI. I continued to test & assess if there is any fault me. In olden days rupees were used to be tested on KASAUTI to short out defective ones and genuine ones. I continued to test my every attitude to see which one is defective and which one is pure? I also simultaneously continued to rectify my defectiveness and further improve genuineness.
                             
🔶 My intercession has never been confined to morning PUJA-PATH only.  My UPASANA has been going on 24 hours. I have been on fire all along 24 hours in order to refine and rectify myself. Every moment I have been testing my mind-tendency to be refined simultaneously if it hasn’t been. I have made my mind such that BHAGWAN having once come within it must not go back distressed & disappointed. He must not go back with hate so is very essential to clean/purify the mind.
                             
🔷 BHAGWAN deeply hates longings and cunningness of human beings. BHAGWAN is not likely to concede to buttering by human beings. There is no need to pronounce the words of name of BHAGWAN.  the BHAGWAN is not of so low-standard that he be grabbed or overpowered when you praise him, butter him or repeatedly chant his name. BHAGWAN is not of so weak heart and nature. We the human beings usually assume BHAGWAN to be so weak that any man can get anything from him just by buttering him. Tell, how that can be our BHAGWAN?
                            
.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 16)

🔶 मित्रो! आप जहाँ कहीं भी जायेंगे, वहाँ आपको शिविरों का संचालन करना पड़ेगा। शुरू के तीन दिन तो आपको वहाँ के लोगों की रूपरेखाओं और व्यवस्थाओं को समझने में लगेगा। कार्यकर्ताओं को तो मालूम नहीं है। उन बेचारों पर तो हवन हावी रहता है। बस साहब! हम तो हवन करेंगे और यहाँ बस हवन होगा। हवन के अलावा उन्हें कोई दूसरी चीज दिखाई नहीं पड़ती। दूसरी चीज उनको समझ में नहीं आती। उनको यह बताना पड़ेगा कि हवन आवश्यक नहीं है। हवन हमारा लक्ष्य नहीं है, हवन हमारा उद्देश्य नहीं है। हमारा मुख्य उद्देश्य ज्ञानयज्ञ है। ज्ञान हमारा पूज्य है। हवन के माध्यम से यज्ञ के माध्यम से हम लोगों में सत्प्रवृत्तियाँ पैदा करते हैं। इसलिए हमारे सारे के सारे क्रियाकलापों में उन सब बातों का समन्वय होना चाहिए, जिससे सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन होना संभव हो सके। इसलिए आप लोगों से कहना कि आप अपना श्रम दीजिए, समय दीजिए।

🔷 आप यह कोशिश करना कि यज्ञशालाओं को बनाने के लिए कार्यकर्ता अपना श्रम और समय देना सीखें। परिश्रम करना सीखें, सहयोग देना सीखें। श्रम की कीमत है, समय की कीमत है। पैसों की कीमत नहीं है। पैसे के बिना हमारे कार्य न कभी रुके हैं और न कभी रुकेंगे। इसलिए आप प्रत्येक कार्यकर्ता को श्रमशील और श्रमनिष्ठ होने के लिए कहना, प्रेरित करना। असली कीमत समय की है, श्रम की है। श्रद्धा की है। श्रद्धा जो है, वह समय के साथ जुड़ी हुई है, श्रम के साथ जुड़ी हुई है। इन्हीं के आधार पर हमारे कार्यक्रम चलेंगे। श्रम का जहाँ अभाव दीखेगा, वहाँ हमारा कोई कार्यक्रम नहीं चलेगा, कोई मिशन नहीं चलेगा। कोई भजन नहीं होगा, कोई पूजन नहीं होगा।

🔶 मित्रो! हमें आप के श्रम की और समय की बहुत आवश्यकता है। अगर हमें आप अपना श्रम और समय देना शुरू करेंगे, तो आपकी निष्ठा में बहुत हेर फेर हो जायेगा। तब फिर आपकी निष्ठाएँ परिपक्व होंगी। जो व्यक्ति मिशन की गंभीरता को समझता है और क्रियाशीलता की गंभीरता को समझता है उसके लिए श्रम और समय देना एक कसौटी है। मित्रो मिशन के कार्यों में परिजनों के परिश्रम का जितना बड़ा योगदान रहा होगा, मैं उतनी ही ज्यादा सफलता मानूँगा। आप लोगों को पसीना बहाना सिखाना और श्रेय उन्हीं लोगों को देना जिन्होंने पसीना बहाना शुरू किया है। आप गरीब हैं तो क्या, छोटे हैं तो क्या और अमीर हैं तो क्या? पसीना किसने लगाया-बहाया, हमको श्रेय पसीने को देना है। हम सम्मान पसीने को देना चाहते हैं, श्रम को देना चाहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 35)

👉 गुरु से बड़ा तीनों लोकों में और कोई नहीं

🔷 गुरुगीता में वर्णित यह गुरुतत्त्व बुद्धिगम्य ही नहीं, ध्यानगम्य व भक्तिगम्य भी है। जिनकी अंतर्चेतना ने भक्ति का स्वाद चखा है, जो ध्यान की गहराइयों में अंतर्लीन हुए हैं, उन्हें यह सत्य सहज ही समझ में आ जाता है। इस तथ्य को श्रीरामकृष्ण देव के शिष्य लाटू महाराज स्वामी अद्भुतानन्द के उदाहरण से समझा जा सकता है। श्री ठाकुर एवं उनके शिष्य समुदाय की जीवन कथा को पढ़ने वाले सभी जानते हैं  कि लाटू महाराज अनपढ़ ही थे। गुरुभक्ति ही उनकी साधना थी। भक्त समुदाय में बहुप्रचलित श्रीरामकृष्ण देव की समाधिलीन फोटो जब बन कर आयी, तो श्री ठाकुर ने स्वयं उसे प्रणाम किया। लाटू महाराज बोले - ठाकुर यह क्या, अपनी ही फोटो को प्रणाम। इस पर ठाकुर हँसे और बोले - ‘‘नहीं रे! मेरा यह प्रणाम इस हाड़-मांस की देह वाले चित्र को नहीं है, यह तो उस परम वन्दनीय गुरु चेतना को प्रणाम है, जो इस फोटो की भाव मुद्रा से छलक रही है।’’
  
🔶 श्री ठाकुर के इस कथन ने लाटू महाराज को भक्ति के महाभाव में निमग्न कर दिया। इन क्षणों में उन्हें परमहंस का एक और वाक्य याद आया - ‘जे राम जे कृष्ण सेई रामकृष्ण’ अर्थात् जो राम, जो कृष्ण, वही रामकृष्ण। पर इन सब बातों का अनुभव कैसे किया जाए? इस जिज्ञासा के समाधान में  श्री ठाकुर ने कहा - ‘‘भक्ति से, ज्ञान से। इसी से तेरा सब कुछ हो जाएगा। अपने सद्गुरु के वचनों को हृदय में धारण कर।’’ लाटू महाराज गुरुभक्ति को प्रगाढ़ करते हुए ध्यान- साधना में जुट गए।
  
🔷 उनकी यह साधना निरंतर अविराम तीव्र से तीव्रतर एवं तीव्रतम होती गई। इस साधनावस्था में एक दिन उन्होंने देखा कि ठाकुर किसी दिव्य लोक में हैं। बड़ा ही प्रकाश और प्रभापूर्ण उपस्थिति है उनकी। स्वर्ग के देवगण, विभिन्न ग्रहों के स्वामी रवि, शनि, मंगल आदि उनकी स्तुति कर रहे हैं। ध्यान के इन्हीं क्षणों में लाटू महाराज ने देखा कि श्री ठाकुर की परा चेतना ही विष्णु-ब्रह्मा एवं शिव में समायी है। माँ महाकाली भी उनमें एकाकार हैं। ध्यान में एक के बाद अनेक दृश्य बदले और लीलामय ठाकुर के दिव्य चेतना के अनेक रूपों का साक्षात्कार होता गया। अपनी इस समाधि में लाटू महाराज कब तक खोए रहे, पता नहीं चला।
  
🔶 समाधि का समापन होने पर लाटू महाराज पंचवटी से सीधे श्री ठाकुर के कमरे में आए और उन्हें वह सब कह सुनाया, जो उन्होंने अनुभव किया था। अपने अनुगत शिष्य की यह अनुभूति सुनकर परम कृपालु परमहंस देव हँसते हुए बोले - ‘‘अच्छा रे! तू बड़ा भाग्यवान है, माँ ने तुझे सब  कुछ सच-सच दिखा दिया। जो तूने देखा, वह सब ठीक है।’’ फिर थोड़ा गंभीर होकर उन्होंने कहा - ‘‘शिष्य के लिए गुरु से भिन्न तीनों लोकों में और कुछ नहीं है। जो इसे जान लेता है, उसे सब कुछ अपने-आप मिल जाता है।’’ श्री ठाकुर के यह वचन प्रत्येक शिष्य के लिए महामंत्र है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 59

मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

👉 "एक बेटा ऐसा भी"

🔷 " माँ, मुझे कुछ महीने के लिये विदेश जाना पड़ रहा है। तेरे रहने का इन्तजाम मैंने करा दिया है।" तक़रीबन 32 साल के, अविवाहित डॉक्टर सुदीप ने देर रात घर में घुसते ही कहा।

🔶 " बेटा, तेरा विदेश जाना ज़रूरी है क्या ?" माँ की आवाज़ में चिन्ता और घबराहट झलक रही थी। " माँ, मुझे इंग्लैंड जाकर कुछ रिसर्च करनी है। वैसे भी कुछ ही महीनों की तो बात है।" सुदीप ने कहा।

🔷 " जैसी तेरी इच्छा।" मरी से आवाज़ में माँ बोली। और छोड़ आया सुदीप अपनी माँ 'प्रभा देवी' को पड़ोस वाले शहर में स्थित एक वृद्धा-आश्रम में।

🔶 वृद्धा-आश्रम में आने पर शुरू-शुरू में हर बुजुर्ग के चेहरे पर जिन्दगी के प्रति हताशा और निराशा साफ झलकती थी। पर प्रभा देवी के चेहरे पर वृद्धा-आश्रम में आने के बावजूद कोई शिकन तक न थी।

🔷 एक दिन आश्रम में बैठे कुछ बुजुर्ग आपस में बात कर रहे थे। उनमें दो-तीन महिलायें भी थीं। उनमें से एक ने कहा, " डॉक्टर का कोई सगा-सम्बन्धी नहीं था जो अपनी माँ को यहाँ छोड़ गया।"

🔶 तो वहाँ बैठी एक महिला बोली, " प्रभा देवी के पति की मौत जवानी में ही हो गयी थी। तब सुदीप कुल चार साल का था। पति की मौत के बाद, प्रभा देवी और उसके बेटे को रहने और खाने के लाले पड़ गये। तब किसी भी रिश्तेदार ने उनकी मदद नहीं की। प्रभा देवी ने लोगों के कपड़े सिल-सिल कर अपने बेटे को पढ़ाया। बेटा भी पढ़ने में बहुत तेज था, तभी तो वो डॉक्टर बन सका।"

🔷 वृद्धा-आश्रम में करीब 6 महीने गुज़र जाने के बाद एक दिन प्रभा देवी ने आश्रम के संचालक राम किशन शर्मा जी के ऑफिस के फोन से अपने बेटे के मोबाईल नम्बर पर फोन किया, और कहा, " सुदीप तुम हिंदुस्तान आ गये हो या अभी इंग्लैंड में ही हो ?"

🔶 " माँ, अभी तो मैं इंग्लैंड में ही हूँ।" सुदीप का जवाब था।

🔷 तीन-तीन, चार-चार महीने के अंतराल पर प्रभा देवी सुदीप को फ़ोन करती उसका एक ही जवाब होता, " मैं अभी वहीं हूँ, जैसे ही अपने देश आऊँगा तुझे बता दूँगा।"इस तरह तक़रीबन दो साल गुजर गये। अब तो वृद्धा-आश्रम के लोग भी कहने लगे कि देखो कैसा चालाक बेटा निकला, कितने धोखे से अपनी माँ को यहाँ छोड़ गया। आश्रम के ही किसी बुजुर्ग ने कहा, " मुझे तो लगता नहीं कि डॉक्टर विदेश-पिदेश गया होगा, वो तो बुढ़िया से छुटकारा पाना चाह रहा था।"

🔶 तभी किसी और बुजुर्ग ने कहा, " मगर वो तो शादी-शुदा भी नहीं था।" अरे होगी उसकी कोई 'गर्ल-फ्रेण्ड, जिसने कहा होगा पहले माँ के रहने का अलग इंतजाम करो, तभी मैं तुमसे शादी करुँगी।"

🔷 दो साल आश्रम में रहने के बाद अब प्रभा देवी को भी अपनी नियति का पता चल गया। बेटे का गम उसे अंदर ही अंदर खाने लगा। वो बुरी तरह टूट गयी।

🔶 दो साल आश्रम में और रहने के बाद एक दिन प्रभा देवी की मौत हो गयी। उसकी मौत पर आश्रम के लोगों ने आश्रम के संचालक शर्मा जी से कहा, " इसकी मौत की खबर इसके बेटे को तो दे दो। हमें तो लगता नहीं कि वो विदेश में होगा, वो होगा यहीं कहीं अपने देश में।"

🔷 " इसके बेटे को मैं कैसे खबर करूँ । उसे मरे तो तीन साल हो गये।"* शर्मा जी की यह बात सुन वहाँ पर उपस्थित लोग सनाका खा गये। उनमें से एक बोला, " अगर उसे मरे तीन साल हो गये तो प्रभा देवी से मोबाईल पर कौन बात करता था।"

🔶 "वो मोबाईल तो मेरे पास है, जिसमें उसके बेटे की रिकॉर्डेड आवाज़ है।" शर्मा जी बोले। "पर ऐसा क्यों ?" किसी ने पूछा।

🔷 तब शर्मा जी बोले कि करीब चार साल पहले जब सुदीप अपनी माँ को यहाँ छोड़ने आया तो उसने मुझसे कहा, "शर्मा जी मुझे 'ब्लड कैंसर' हो गया है। और डॉक्टर होने के नाते मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ कि इसकी आखिरी स्टेज में मुझे बहुत तकलीफ होगी। मेरे मुँह से और मसूड़ों आदि से खून भी आयेगा। मेरी यह तकलीफ़ माँ से देखी न जा सकेगी। वो तो जीते जी ही मर जायेगी। मुझे तो मरना ही है पर मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण मेरे से पहले मेरी माँ मरे। मेरे मरने के बाद दो कमरे का हमारा छोटा सा 'फ्लेट' और जो भी घर का सामान आदि है वो मैं आश्रम को दान कर दूँगा।"

🔶 यह दास्ताँ सुन वहाँ पर उपस्थित लोगों की आँखें झलझला आयीं। प्रभा देवी का अन्तिम संस्कार आश्रम के ही एक हिस्से में कर दिया गया। उनके अन्तिम संस्कार में शर्मा जी ने आश्रम में रहने वाले बुजुर्गों के परिवार वालों को भी बुलाया।

🔷 माँ-बेटे की अनमोल और अटूट प्यार की दास्ताँ का ही असर था कि कुछ बेटे अपने बूढ़े माँ/बाप को वापस अपने घर ले गये।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 7 Feb 2018


👉 प्रेम या अपनत्व

🔷 अपनों के लिए स्वभावत: उनके दोषों को छिपाने और गुणों को प्रकट करने की आदत होती है। कोई भी पिता अपने प्यारे पुत्र के दोषों को नहीं प्रकट करता है। वह तो उसकी प्रशंसा के पुल ही बाँधता रहता है। दुर्गुणी बालक को न तो कोई मार डालता है और न जेल ही पहँुचा देता है, वरन्ï यह प्रयत्न करता है कि किसी सरल उपाय से उसके दुर्गुण दूर हो जाए या कम हो जाए। यदि यही बात अपने परिजनों के साथ हम रखें, तो उनके अंदर जो बुरे तत्त्व वर्तमान हैं, वे घट जायेंगे। डाकू, हत्यारे, ठग, व्यभिचारी आदि क्रूर कर्मी लोग भी अपने स्त्री, पुत्र, भाई, बहिन आदि के प्रति मधुर व्यवहार ही करते हैं। सिंह अपने बाल-बच्चों को नहीं फाड़ खाता।
  
🔶 प्रेम एक ऐसा गोंद है, जो टूटे हुए हृदय को जोड़ता है। बिछुड़ों को मिलाता है। यदि किसी के साथ हमारा आत्मभाव सच्चा है और नि:स्वार्थ भाव से हम उसके साथ अपनेपन की भावना रखते हों, तो सच मानिये वह हमारा गुलाम बन जायेगा। दोषों से रहित इस संसार में कोई एक भी व्यक्ति नहीं है। किसी की एक बुराई देखकर उस पर आग बबूला हो जाना, सब बुराई की खान मान लेना उचित नहीं है। यदि हम ध्यान से देखेंगे तो मालूम होगा कि उसमें बुराइयों के साथ कुछ अच्छाइयाँ भी हैं।
  
🔷 आत्मोन्नति यही तो है कि अपनेपन के दायरे को छोटे से बड़ा बनाया जाय। जिनका अपनापन केवल अपने शरीर तक ही है, वे कीट, पतंग जैसे नीच श्रेणी के हैं। जो अपनी संतान तक आत्म भाव को बढ़ाते हैं। वे पशु-पक्षी से कुछ ऊँचे हैं। जिनका अपनापन कुटुम्ब तक सीमित है, वे असुर हैं। जिनका अपनापन अपनी संस्था राष्टï्र तक है, वे मनुष्य हैं। जो समस्त मानव जाति को अपनेपन से ओत-प्रोत देखते हैं, वे देवता हैं। जिनकी आत्मीयता चर-अचर तक फैली है, वे जीवनमुक्त परमसिद्ध हैं। जो आत्मभाव का जितना विस्तार करता है, अधिक लोगों को अपना समझता है, दूसरों की सेवा-सहायता करता है, उनके सुख-दु:ख में अपना सुख-दु:ख मानता है, वह ईश्वर के उतना ही निकट है। आत्म विस्तार और ईश्वर आराधना एक ही क्रिया के दो नाम हैं।
  
🔶 एक उदार व्यक्ति पड़ोसी के बच्चों को खिलाकर बिना खर्च  के उतना ही आनन्द प्राप्त कर लेता है, जितना कि बहुत खर्च और कष्टï के साथ अपने बालकों को खिलाने में किया जाता है। अपने हँसते हुए बालकों को देखकर हमारी छाती गुदगुदाने लगती है, पड़ोसी के उससे भी सुन्दर फूल से हँसते हुए बालक को देखकर हमारे दिल की कली नहीं खिलती है? इसका कारण यह है कि हम खुद अपने हाथों अपनी एक निजी दुनिया बसाना चाहते हैं। उसी से संबंध रखना चाहते हैं, उसकी ही उन्नति देखकर प्रसन्न होना चाहते हैं।
  
🔷 हम सदा यही देखते हैं कि लोग क्या करते हैं? यदि हम क्या करते हैं? यह देखने लगें, तो सदैव सुख ही हमारे सामने होगा, क्योंकि अपने को मनमर्जी बनाना हमारे हाथ में है। इसे कौन रोक सकता है कि हम दूसरों को अपना समझें, उन्हें प्यार करें और उस प्यार और अपनेपन के कारण जो आनन्द उपजे, उसका उपभोग करें। स्वर्ग निर्माण की यही कुंजी है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 खाने तक में नासमझी की भरमार (भाग 6)

🔶 मिर्च-मसालों जैसी स्थिति ही चिकनाई-मिठाई की है। तेल-घी को अलग से निकालकर खाने से वे तत्व अलग हो जाते हैं जो चिकनाई को पचाने में काम आते हैं। तिल, मूँगफली, सोयाबीन आदि को चबा लिया या पीस कर उपयोग किया जाय तो वे उचित मात्रा में होने पर पोषण का प्रयोजन पूरा करेंगे। तेल निकालने पर उसे पचाने वाले तत्व खली में निकल जाते हैं और वह चिकनाई अत्यधिक गरिष्ठ हो जाती है। घी खाने की अपेक्षा दूध दही लेना गनीमत है। वैसे जितनी चिकनाई की शरीर को आवश्यकता है उतनी सन्तुलित आहार में सहज ही मिल जाती है। अन्न, दाल आदि में भी चिकनाई होती है। अलग से उसे लेना आवश्यक नहीं है, पर यदि लेने का मन ही हो तो उसे उन बीजों के रूप में ही लेना चाहिए जिनमें तेल ही नहीं उसको पचाने वाले तत्वों का भी उपयुक्त अनुपात रहता है।

🔷 शक्कर के सम्बन्ध में भी यही बात है। अन्न मुँह में पिसता है तो जीभ से निकलने वाले रस ही उसे ग्लूकोज के रूप में परिवर्तित कर देते हैं। पेट में पहुँचते-पहुँचते वह उपयुक्त मात्रा में शक्कर से भरा-पूरा होता है। फिर सामान्य खाद्य पदार्थों में भी शक्कर का समुचित अनुपात रहता है। उसे अलग से खाने की कोई आवश्यकता नहीं। मीठे फलों में उसका अनुपात पर्याप्त होता है। प्रायः सभी फल मीठे होते हैं। खजूर, अंजीर, दाख आदि में तो उसकी मात्रा बहुत अधिक होती है। शहद की भी प्रशंसा है। यों चीकू से लेकर चुकन्दर तक में उसकी पर्याप्त मात्रा रहती है। मन चले तो गन्ना भी चूसा जा सकता है।

🔶 शक्कर प्राप्त करने की इतनी ही मर्यादा है। चरम सीमा तक पहुँचना हो तो बिना पाउडर के शोधा गया गुड़ या राब तक आगे बढ़ा जा सकता है। सफेद चीनी तो सफेद विष कही गई है। कैल्सियम निकल जाने पर तो वह दाँत, मसूड़े, अस्थि पंजर आदि सभी को गलाती है। मधुमेह, रक्तचाप, यकृत रोग, पेट के कीड़े जैसे रोग उत्पन्न करने में तो उसकी ही करामात काम करती है। यदि सफेद चीनी का उपयोग आहार से हटा दिया जाय तो विष भक्षण, चटोरापन, अपव्यय एवं अधिक खाने जैसे अनेक अभिशापों से सहज छुटकारा मिल सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Essence of Worship-Intercession. (Part 1)

🔶 If man could not develop his eligibility, no RAM-NAM can work. Man generally has a notion in his mind that repeatedly counting of wooden beads with pronunciation of RAM-NAM through tip of his tongue is essence of worship. He keeps repeating RAM-NAM like a parrot uselessly. I do not know if anyone can be benefitted just by counting GAYATRI-mantra over wooden beads. I know millions of people who come complaining to me that their counting of beads is not working. I too, confirm the same that this way no gain was obtained ever nor will be obtained in future.     
                                                 
🔷 But I can assure you that GAYATRI mantra murmured with sincerity, retained in life with right approach and induced in veins, sentiments and thinking process can do miracle and I am the proof & example of that miracle. There are hundreds of secret pages in my life that I have kept sealed so that they could not be opened before I die. So voluminous is the details of helps & services which I have extended to people that no one would believe that a single person can do all that. A man finds it difficult to complete even his own wishes but here another man is competent to help so many people in a diversified way. Yes! I say, it is so and I am that person.
                                     
🔶 Friends! It is a throne and any person cannot sit over it. Only that man is authorized to sit on it who has not confined his GAYATRI to his tongue only, his fingers only rather he went ahead to imbibe GAYATRI to induce his every particle and conscience of heart with GAYATRI’s ambrosia. Only such man is authorized to see the magic of GAYATRI and assure other persons of some share in his PUNYA (GAYATRI) in order to assuage other persons that GAYATRI is a spiritually performed magic for a sure shot gain.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 15)

🔷 मित्रो हमने वह विशेषताएँ खो दीं, जिसके आधार पर हम किसी समय दुनिया के चक्रवर्ती शासक कहलाते थे। वह विशेषताएँ हमने खो दीं, जिसके आधार पर हम किसी जमाने में स्वर्ण-संपदाओं के मालिक कहलाते थे। वह सब विशेषताएँ हमने खो दीं, जिसके आधार पर यहाँ का हर नागरिक देवता कहलाता था और यह देवताओं का देश कहलाता था। यहाँ के निवासियों में जो आध्यात्मिक विशेषताएँ थी वे सब खत्म हो गयीं। नष्ट हो गयीं। भौतिक विशेषताएँ बढ़ीं या नहीं बढ़ीं, मुझे नहीं मालूम। भौतिक विशेषताओं के बारे में जो मैं जानता हूँ, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि भौतिक विशेषताएँ यदि आदमी की बढ़ती हुई चली जायें, तो उससे बर्बादी के अलावा और क्या हासिल हो सकता है? मैं कई बार अमेरिका का उदाहरण दिया करता हूँ।

🔶 बढ़ती हुई भौतिकता के कारण वहाँ के लोगों ने अपनी दिमागी सेहत को गँवा दिया है। वहाँ के अधिकांश आदमी ऐसे हैं, जो कि गोली खा करके सोते हैं; ताकि नींद आ जाये। वहाँ के लोगों ने अपना दाम्पत्य जीवन व पारिवारिक जीवन समाप्त कर दिया। अकेला आदमी कितना डरावना होता है, कितना खौफनाक होता है, आप इसी से अंदाज लगा सकते हैं कि भूत जंगल में अकेला रहता है। उसका कोई खानदान वाला, कोई मित्र, कोई सगा-संबंधी नहीं होता है। सबसे बड़ा कष्ट, सबसे बड़ा त्रास उसकी जिंदगी का यही है कि वह अकेला रहता है। अमेरिका, रूस ब्रिटेन जैसे संपन्न एवं भौतिकवादी देशों का जीवन कुछ ऐसा ही है, जहाँ आदमी अकेला है और वह किसी से जुड़ा हुआ नहीं है। वह किसी का नहीं है और उसका कोई नहीं है। इस तरह का जीवन जी करके आदमी क्लेश में फँसता हुआ चला जा रहा है और दुनिया तबाही की ओर भागती हुई चली जा रही है।

🔷 मित्रो! आप यहाँ से उस स्थान पर चोट करने के लिए जाना जिसने कि हमारे सारे शरीर को, हमारे मन को और हमारी भावनाओं को डगमगा दिया है। जिसने मानव की सारी आस्था को डगमगा दिया है। आपके जिम्मे जो काम सौंपा गया है, वह सामान्य काम नहीं है। वह असामान्य काम है। आप अपने आपको असामान्य व्यक्ति मानकर चलना और यह मानकर चलना कि जो उत्तरदायित्व आपको सौंपा गया है, वह सामान्य उत्तरदायित्व नहीं है। आप असामान्य उत्तरदायित्व ग्रहण करके चले हैं। आप छोटी चीज लेकर के नहीं चले हैं। आप बहुत बड़ी चीज को लेकर के चले हैं। आप उसका ध्यान रखना और उसे पूरा करने के लिए उतनी गहराई, उतनी ईमानदारी और उतनी जिम्मेदारी के साथ कदम बढ़ाना, जिससे कि जो ख्वाब हमने देखे हैं, जो सपने हमने देखे हैं, उसे पूरा किया जा सके। समूची मानव जाति आपसे जो उम्मीद लगाये बैठी है और आशा लगाये बैठी है, उसके बारे में उसे थोड़ा सा भी प्रकाश मिल सके, आपके जिम्मे हम यह बहुत बड़ा काम सौंप रहे हैं। आप से लोग बहुत उम्मीद लगाये बैठे हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 34)

👉 गुरु से बड़ा तीनों लोकों में और कोई नहीं

🔶 गुरु नमन की यह महिमा गुरुतत्त्व के विस्तार की ही भाँति असीम और अनन्त है। इसके अगले क्रम को गुरुगीता के महामंत्रों में प्रकट करते हुए भगवान् सदाशिव -पराम्बा भवानी से कहते हैं-

गुकारं च गुणातीतं रुकारं रूपवर्जितम्। गुणातीत स्वरूपं च यो दद्यात् स गुरुः स्मृतः॥ ४६॥
अ-त्रिनेत्रः सर्वसाक्षी अ-चतुर्बाहुरच्युतः। अ-चतुर्वदनो ब्रह्मा श्री गुरुः कथितः प्रिये॥ ४७॥
अयं मयाञ्जलिर्बद्धो दयासागरवृद्धये। यद् अनुग्रहतो जन्तुŸिवत्र संसार मुक्तिभाक् ॥ ४८॥
श्रीगुरोः परमं रूपं विवेक चक्षुषोऽमृतम्। मन्दभाग्या न पश्यन्ति अन्धाः सूर्योदयं यथा॥ ४९॥
श्रीनाथ चरणद्वन्द्वं यस्यां दिशि विराजते। तस्यै दिशेनमस्कुर्याद् भक्त्या प्रतिदिनं प्रिये॥ ५०॥
  
🔷 गुरुतत्त्व की अनुभूति कराने वाले इन महामंत्रों में आध्यात्मिक जीवन का निष्कर्ष प्रकट है। भगवान् महेश्वर की वाणी शिष्यों के समक्ष इस सत्य को उजागर करती है कि गुरुदेव साकार होते हुए भी निराकार हैं। ‘गुरु ’ शब्द का पहला अक्षर ‘गु’ इस सत्य का बोध कराता है कि त्रिगुणमय कलेवर को धारण करने वाले गुरुदेव सर्वथा गुणातीत हैं। दूसरे अक्षर ‘रु’ में यह सत्य निहित है कि शिष्यों के लिए रूप वाले होते हुए भी गुरुदेव भगवान् रूपातीत हैं। यानि कि गुरुवर की चेतना वास्तव में निर्गुण व निराकार है। शिष्य को आत्मा स्वरूप प्रदान करने वाले गुरुदेव की महिमा अनन्त है॥ ४६॥

🔶 भगवान् सदाशिव के वचन हैं कि तीन आँखों वाले न होने पर भी गुरुदेव साक्षात् शिव हैं। चार भुजाएँ न होने पर भी वे सर्वव्यापी विष्णु हैं। चार मुख न होने पर भी वे सृष्टिकर्त्ता  ब्रह्मा हैं॥ ४७॥

🔷 ऐसे दयासागर गुरुदेव को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ। उनकी कृपा से ही जीवों को भेद बुद्धि वाले संसार से मुक्ति मिलती है॥ ४८॥

🔶 श्री सद्गुरु का यह परम रूप उनसे विवेक चक्षु मिलने पर ही दृश्य होता है; तभी उनके अमृत तुल्य रूप का स्पर्श मिलता है। इसके अभाव में जिस तरह अन्धा व्यक्ति सूर्योदय के दृश्य को नहीं देख पाता ॥ ४९॥ उन परम स्थायी सद्गुरु के चरणद्वय जिस दिशा में भी विराजते हैं, उस दिशा में प्रतिदिन नमस्कार करने से शिष्यों का-भक्तों का परम कल्याण होता है॥ ५०॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 58

सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

👉 किसी से प्यार या नफ़रत

🔷 एक बार एक महात्मा ने अपने शिष्यों से अनुरोध किया कि वे कल से प्रवचन में आते समय अपने साथ एक थैली में बडे़ आलू साथ लेकर आयें, उन आलुओं पर उस व्यक्ति का नाम लिखा होना चाहिये जिनसे वे ईर्ष्या करते हैं। जो व्यक्ति जितने व्यक्तियों से घृणा करता हो, वह उतने आलू लेकर आये।

🔶 अगले दिन सभी लोग आलू लेकर आये, किसी पास चार आलू थे, किसी के पास छः या आठ और प्रत्येक आलू पर उस व्यक्ति का नाम लिखा था जिससे वे नफ़रत करते थे।

🔷 अब महात्मा जी ने कहा कि, अगले सात दिनों तक ये आलू आप सदैव अपने साथ रखें, जहाँ भी जायें, खाते-पीते, सोते-जागते, ये आलू आप सदैव अपने साथ रखें । शिष्यों को कुछ समझ में नहीं आया कि महात्मा जी क्या चाहते हैं, लेकिन महात्मा के आदेश का पालन उन्होंने अक्षरशः किया। दो-तीन दिनों के बाद ही शिष्यों ने आपस में एक दूसरे से शिकायत करना शुरू किया, जिनके आलू ज्यादा थे, वे बडे कष्ट में थे। जैसे-तैसे उन्होंने सात दिन बिताये, और शिष्यों ने महात्मा की शरण ली। महात्मा ने कहा, अब अपने-अपने आलू की थैलियाँ निकालकर रख दें, शिष्यों ने चैन की साँस ली।

🔶 महात्माजी ने पूछा – विगत सात दिनों का अनुभव कैसा रहा ? शिष्यों ने महात्मा से अपनी आपबीती सुनाई, अपने कष्टों का विवरण दिया, आलुओं की बदबू से होने वाली परेशानी के बारे में बताया, सभी ने कहा कि बडा हल्का महसूस हो रहा है… महात्मा ने कहा – यह अनुभव मैने आपको एक शिक्षा देने के लिये किया था…

🔷 जब मात्र सात दिनों में ही आपको ये आलू बोझ लगने लगे, तब सोचिये कि आप जिन व्यक्तियों से ईर्ष्या या नफ़रत करते हैं, उनका कितना बोझ आपके मन पर होता होगा, और वह बोझ आप लोग तमाम जिन्दगी ढोते रहते हैं, सोचिये कि आपके मन और दिमाग की इस ईर्ष्या के बोझ से क्या हालत होती होगी? यह ईर्ष्या तुम्हारे मन पर अनावश्यक बोझ डालती है, उनके कारण तुम्हारे मन में भी बदबू भर जाती है, ठीक उन आलुओं की तरह…. इसलिये अपने मन से इन भावनाओं को निकाल दो।

🔶 यदि किसी से प्यार नहीं कर सकते तो कम से कम नफ़रत मत करो, तभी तुम्हारा मन स्वच्छ, निर्मल और हल्का रहेगा, वरना जीवन भर इनको ढोते-ढोते तुम्हारा मन भी बीमार हो जायेगा।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 6 Feb 2018


👉 खाने तक में नासमझी की भरमार (भाग 5)

🔷 मिर्च मसालों के आवेश में मनुष्य अधिक खा जाता है। जो अभक्ष्य थे उन्हें भी निगल जाता है। अवांछनीय तत्वों को शरीर में प्रवेश देने पर कोई अपनी चतुरता की डींग क्यों न हाँके, पाक विद्या के निष्णात अपने कौशल की शेखी कितनी ही क्यों न बघारें, वास्तविकता यह है कि उस चतुरता के सहारे आरोग्य के सर्वनाश का ही द्वार खुलता है। लाड़-चाव में प्रियजनों को स्वादिष्ट व्यंजन बना-बनाकर खिलाना और अधिक खाने का आकर्षण या दबाव प्रस्तुत करना वस्तुतः ऐसी शत्रुता है, जिसे लोक व्यवहार में मित्रता, शुभेच्छा का प्रदर्शन समझा जाने लगा है।

🔶 न जाने यह समझदारी कहाँ से मनुष्य पर चढ़ दौड़ी कि अधिक खाने से अधिक बल मिलता है, जबकि बात तथ्य के सर्वथा विपरीत है। पेट की बनावट ही ऐसी है कि यदि वह आधा भरा हो तो ही पाचन का ठीक प्रबन्ध कर सकता है। हाँडी खाली रहे तो ही उफनने-उबलने की गुंजायश रहने पर ठीक प्रकार पकेगी। मथानी में दही बिलोने के कारण जो हलचल होती है उसके लिए जगह छोड़नी पड़ती है। यदि हांडी खचाखच भरी हो तो पकने की प्रक्रिया कैसे पूरी हो? मथानी को गरदन तक भर दिया गया हो तो बिलोने पर जो उथल-पुथल होती है उसके लिए स्थान कैसे मिले?

🔷 पेट के खाली रहने पर ही पाचन की गुंजायश रहती है। सीमित रस-स्राव होने पर सीमित मात्रा का आहार ही पचता है। गले तक बोरा भर लेने पर यह आशा छोड़ ही देनी चाहिए कि वह ठीक प्रकार पचेगा और उपयुक्त पोषण प्रदान कर सकेगा। मिर्च-मसाले इस व्यवस्था को बुरी तरह बिगाड़ देते हैं। उनसे दुहरी हानि है। एक यह कि वे अपनी उत्तेजक विषाक्तता के कारण पाचन तंत्र की तोड़-फोड़ करते हैं। दूसरी यह कि उस लालच में अधिक मात्रा में खाते जाने पर भी हाथ रुकता नहीं। फलतः पेट को अकारण अत्यधिक श्रम करने पर भी पोषण के नाम पर खाली हाथ रहना पड़ता है। अपच उत्पन्न होने पर बीमारियों का आक्रमण दौड़ पड़ता हैं सो अलग। इस प्रकार स्वादिष्ट के नाम पर नमक और मसालों का उपयोग होता हैं। उनसे लाभ जैसा तो कुछ मिलता नहीं। शरीर पर विपत्ति लदती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Saving a Life is True Worship

🔶 Saint Gyaneshwar was walking along a river. A monk was deep in meditation while a small child was swimming in the river. All of a sudden, the child was swept away by a strong wave. Now, the poor child was in trouble. He was drowning and frantically crying for help, but the monk sat calmly in his meditation. He opened his eyes momentarily, saw the drowning boy and closed his eyes again.

🔷 Saint Gyaneshwar immediately jumped into the river and saved the kid. He then turned to the meditating monk and asked, "May I ask what you are doing, sir?" "Can't you see? I am meditating!" the monk replied and closed his eyes again. The saint again asked, "Could you succeed in witnessing God?" "No", replied the monk, "I can't concentrate due to disturbances."

🔶 And Saint Gyaneshwar said, "Then get up, and help the poor and needy. Learn to share the misfortunes and sorrows of others, otherwise you will never succeed in your worship" Now the monk realized his folly. He thought, "True worship would have been an attempt to save the drowning kid, rather than ignoring the incident" From that day the monk changed completely. He regularly dedicated some time to help others in addition to his meditation.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 14)

🔶 मित्रो! आप अपनी वाणी का सही प्रयोग करना और ठीक रूप में इस्तेमाल करना। वहाँ इस बात का अहंकार मत होने देना कि हम पहले अमीर आदमी थे, मालदार आदमी थे, जमींदार थे। हम पहले वकील थे, डाक्टर थे, इंजीनियर थे। यह क्या है? अहंकार है। आप अपना अहंकार जितना ज्यादा अपने मुँह से बताने की कोशिश करेंगे, उतना ही समझदार व्यक्तियों की श्रेणी में आपका छोटापन जाहिर होता हुआ चला जायेगा कि यह आदमी बड़ी कच्ची तबियत का आदमी है और बड़ी कमजोर तबियत का आदमी है। पुराने जमाने में आप वकील थे, तो हम क्या कर सकते हैं? आप वकील थे तो आपने रुपये कमाये होंगे, आपने रोटी खायी होगी। इससे हमें क्या लेना-देना? हमें तो आप अभी की बात बताइये कि इस समय आपकी मनःस्थिति क्या मनुष्य सेवा के लिए तत्पर है? सेवा की वृत्ति आपके मन में है क्या? आप पुराने किस्से बताकर हमारे ऊपर रौबदारी क्यों करना चाहते हैं? आप तो हमें इस समय की बात बताइये कि आप इस समय क्या हैं?

🔷 इसलिए मित्रो! आप अपनी कमजोरियों को जाहिर न होने दें। आप श्रेष्ठ, समझदार और बलवान व्यक्ति हो करके वहाँ जाइये, जहाँ हम आपको भेज रहे हैं। आप सशक्त होकर जायँ जिससे लोगों के अंदर आप इतनी प्रेरणा उत्पन्न करने में समर्थ हो जायँ। लोगों को अज्ञान और लोभ-मोह से हटाने में कितने समर्थ हुए, कितनी सफलता प्राप्त की, यही आपकी कसौटी है। इस पर आपको अपने आपको, अपने कार्यों को, हमारे कार्यों को कसना चाहिए।

🔶 मित्रो! यह आपका मिशन, जिसके लिए आपने वक्त देना-समय देना मंजूर कर लिया, जिसके आप सरपरस्त हैं। इसकी महिमा और गरिमा के बारे में जितना ज्यादा आपका विश्वास होगा, जितनी ज्यादा आपकी निष्ठा होगी, उतना ही ज्यादा निष्ठा और विश्वास आप लोगों में पैदा करने में समर्थ होंगे। यह जमाना निष्ठाओं से रहित है। यह जमाना भावनाओं से रहित है। इस जमाने में वे उच्चस्तरीय सिद्धांत और आदर्श न जाने कहाँ से कहाँ गायब हो गये जो कि हमारे ऋषियों की विरासत थी, सम्पदा थी। उसे लोगों ने खो दिया। हम लोगों ने उन विशेषताओं को खो दिया, जिसके आधार पर हम सारे संसार के जगद्गुरु कहलाते थे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 33)

👉 गुरु से बड़ा तीनों लोकों में और कोई नहीं

🔶 गुरुगीता में गुरुतत्त्व की अनुभूति समायी है। सद्गुरु भक्तों के लिए सहज-सुलभ यह अनुभूति बुद्धिप्रवण जनों के लिए परम दुर्लभ है। ऐसे लोग अपनी तर्क-बुद्धि से देहधारी गुरुसत्ता को सामान्य मानव समझने की भूल करते रहते हैं। वे सोचते हैं—हमारी ही तरह दिखने वाला यह व्यक्ति हमसे इतना अलग और असाधारण किस भाँति हो सकता है? जो ठीक हमारी तरह खाता-पीता व सोता है, वह भला किस तरह ईश्वरीय तत्त्व की सघन प्रतिमूर्ति हो सकता है? अनेकों शंकाएँ-कुशंकाएँ उनके मन-अन्तःकरण को घेरे रहती हैं। अनगिनत संदेह-भ्रम उन्हें परेशान करते रहते हैं। मूढ़ताओं का यह कुहासा इतना गहरा होता है कि सूर्य की भाँति प्रकाशित सद्गुरु चेतना उन्हें नजर ही नहीं आती। अपनी तर्कप्रवण बुद्धि में उलझकर वे यह भूल जाते हैं कि गुरुदेव तो तर्क से अतीत हैं। वे महामहेश्वर गुरुदेव बुद्धिगम्य नहीं, भावगम्य हैं।
  
🔷 उन भावगम्य भगवान् को तर्क से नहीं, श्रद्धा से समझा जा सकता है। उन्हें नमन एवं समर्पण से ही इस सत्य का बोध होता है कि वे कौन हैं? गुरु भक्ति कथा की पिछली पंक्तियों में इसी तत्त्व की अनुभूति कराने की चेष्टा की गई है। इसमें यह ज्ञान कराया गया है कि गुरुदेव ब्राह्मी चेतना से सर्वथा अभिन्न होने के कारण इस जगत् के परम स्रोत हैं। यह जगत् भी उन्हीं का विराट् रूप है। वे एक साथ महाबीज भी हैं और महावट भी। ऊपरी तौर पर हर कहीं-सब कहीं कितना भी भेद क्यों न दिखाई दे, पर गुरुदेव की परम पावन चेतना सभी कुछ अभिन्न और अभेद है।

🔶 उनके चरण कमलों में आश्रय पाने से शिष्यों के सभी दुःख, द्वन्द्व और तापों का निवारण हो जाता है। उनका प्रभाव और प्रताप कुछ ऐसा है कि महारुद्र यदि कु्रद्ध हो जायें, तो गुरु कृपा से शिष्य का त्राण हो जाता है; परन्तु सद्गुरु के रुष्ट होने से स्वयं महारुद्र भी रक्षा नहीं कर पाते हैं। सद्गुरु चरण युगल शिव-शक्ति का ही रूप हैं। उनकी बार- बार वन्दना करने से शिष्यों का सब भाँति कल्याण होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 57

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

👉 बदलाव

🔶 मेरी ख़ामोश प्रवृत्ति के कारण मैं मायके से लेकर ससुराल तक कभी प्रशंसा, तो कभी व्यंगबाण झेलती रही. मैं चाहकर भी किसी बात का प्रत्युत्तर नहीं दे पाती थी. बस, हर स्थिति में सामंजस्य बिठाकर चुप्पी ओढ़ लेती. मेरी इसी प्रवृत्ति का फ़ायदा जीवनभर मेरे पति और उनके बाद मेरे पुत्र ने उठाया. इन सब बातों को सोचने के लिए मैं आज क्यों विवश हुई? आज लगता है कि उसकी शादी आशू से कराकर मैंने बड़ी भारी भूल की. उसने अपने पिता का स्वभाव पाया था. वही शक्की मिज़ाज, वही अहंकारपूर्ण व्यवहार, वही हृदय को भेद देनेवाले कटीले व्यंगबाण कहना. आज रह-रहकर पश्‍चाताप हो रहा है. मैं कैसे भूल गयी कि बबूल के पेड़ पर आम नहीं लगते. आशू के पिता शुरू से ही अक्खड़ क़िस्म के व्यक्ति थे. लोक-लाज और मेरी ख़ामोश प्रवृत्ति ने कभी मुझे उनसे विद्रोह नहीं करने दिया. आज वही भूल मेरे हृदय को शूल बनकर चुभ रही हैं. अपनी इस भूल का एहसास शायद जीवनभर मुझे न हो पाता, यदि मैं आशू की शादी रूपा से न कराती।

🔷 आशू आए दिन रूपा को किसी न किसी बात पर डांटता-फटकारता रहता. रूपा गृहकार्य में निपुण पढ़ी-लिखी लड़की थी. आशू उसके हर काम में दोष निकालता रहता. शायद इसके पीछे मुख्य कारण रूपा का सौंन्दर्य था. आशू अपने साधारण व्यक्तित्व की तुलना में रूपा का आकर्षक व्यक्तित्व देखकर अक्सर कुढ़ता रहता था. यही कारण था कि कभी रूपा उसे चरित्रहीन लगती, तो कभी फूहड़. उसे नीचा दिखाकर आशू के अहम् को संतुष्टि मिलती थी।

🔶 यह वही आशू है जिसने अपने दोस्त विनोद की शादी में रूपा को देखकर मुझसे कहा था कि मैं किसी भी तरह उसकी शादी रूपा से करा दूं. तब उसने स्वयं की तुलना उससे क्यों नहीं की थी? तब उसने क्यों अपने साधारण व्यक्तित्व को अनदेखा कर दिया था? आशू की सरकारी नौकरी और ऊंचे ओहदे ने उसकी सारी कमियों को ढंक लिया तथा रूपा के पिता ने रिश्ता स्वीकार कर लिया. इस तरह रूपा इस घर-आंगन में आ गयी. शुरुआती दिन हंसी-ख़ुशी से बीते, लेकिन धीरे-धीरे आशू के भीतर का ज़हर बाहर आने लगा और एक-एक करके उसके पिता की सारी विशेषताएं उसमें प्रकट होने लगीं।

🔷 यदि कोई मित्र या सम्बन्धी रूपा की प्रशंसाभर कर देता, उस समय तो वह हंस देता, लेकिन बाद में बेचारी को न जाने कितनी खरी-खोटी सुनाता था. वह बेचारी मुंह सिए निर्दोष होकर भी सब कुछ सुनती रहती. अचानक किसी पर नज़र पड़ जाती, तो उसके पीछे ही पड़ जाता कि वह जान-बूझकर उस व्यक्ति को देख रही है. मुझे वह जानता था कि मां तो गूंगी है. वो तो कुछ बोलेगी नहीं. मुझे इस बात का बेहद अफ़सोस था कि मैं तो मैं, मेरी बहू भी गूंगी आ गयी थी. आशू उसे जली-कटी सुनाता रहता और वह सुनती रहती. मेरी समझ में ये नहीं आया कि मेरे बेटे में मेरी प्रवृत्ति के बजाय अपने पिता की प्रवृत्ति ही क्यों मुखर हुई थी. न जाने कितनी बार उसने अपने पिता के सन्मुख मुझे नीची गरदन किए अपशब्द सुनते देखा था. लेकिन उसने कभी अपने पिता का विरोध नहीं किया. कभी मुझे नहीं कहा कि ‘मां तुम ये सब क्यों सहन करती हो. तोड़ दो अपना मौनव्रत, मैं तुम्हारे साथ हूं. मैं मां होकर भी पुत्र से वंचित थी।

🔶 आज फिर वह न जाने किस बात पर बहू पर गरज-बरस रहा था. मैंने उनके कमरे का दरवाज़ा थोड़ा-सा खोला. आशू पलंग पर बैठा रूपा को लताड़ रहा था और वह बेचारी चुपचाप खड़ी उसकी जहरीली बातें सुन रही थी. मुझे ऐसा लगा जैसे रूपा के स्थान पर मैं खड़ी हूं और आशू के स्थान पर मुझे उसके पिता नज़र आने लगे. मैंने दरवाज़ा ज़ोर से धकेलकर खोल दिया, ‘‘ख़बरदार आशू, जो अब बहू को एक शब्द भी कहा. तुम यह न समझ लेना कि अगर बहू तुम्हारी बातें सहन कर रही है, तो उसमें कमी है या वह कमज़ोर है. सुन्दरता चरित्रहीनता का कारण नहीं होती. तुम ये बात अच्छी तरह जानते हो. जानते-बूझते भी तुम्हें अपनी पत्नी के चरित्र पर सन्देह करते शर्म नहीं आती. रूपा केवल तुम्हारी पत्नी नहीं है, बल्कि बहू के रूप में मेरी बेटी भी है. इस घर की मान-मर्यादा है. आज के बाद बहू पर किसी भी तरह की तोहमत लगाई, तो मुझसे बुरा कोई न होगा. आज से इसे अकेली न समझना।’’

🔷 आशू आश्‍चर्य से मेरी ओर देख रहा था. एक शब्द में उत्तर देनेवाली मां से इतने बड़े भाषण की उसे उम्मीद नहीं थी. रूपा मुझसे लिपटकर रो रही थी. मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे सिर से बड़ा भारी बोझ उतर गया हो।

🔶 ‘‘चल बहू, अपना सम्मान खोकर अगर किसी रिश्ते को जीवित रखा भी तो क्या रखा.’’ इतना कहकर मैं रूपा को लेकर अपने कमरे में आ गई. आज मैंने अपनी खोई हुई आवाज़ को पा लिया है. मैंने आज महसूस किया कि यदि लड़ाई अपने हक़ की है, तो आवाज़ उठाना ग़लत नहीं है. अगर हम सच्चे हैं, तो उस सच्चाई के आगे एक न एक दिन सबको झुकना ही होगा।

🔷 ‘‘आज के बाद मैं तुम्हारे चेहरे पर ये उदासी न देखूं.’’ मैं धीरे-धीरे रूपा को समझा रही थी. आज मेरी ज़िन्दगी ने करवट ली थी. सब कुछ बदला-बदला-सा लग रहा था और इस बदलाव को महसूस कर आशू ख़ुद क्षमा मांगकर रूपा को ले जाएगा, ऐसा मेरा विश्‍वास है. सोचते-सोचते मेरे होंठों पर गहरी मुस्कुराहट आ गई।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 5 Feb 2018

👉 The Art of Sadhana

🔷 The essence of Sadhana is self-discipline. The deities we worship are in fact the symbolic representatives of our own divine attributes and virtues. So long as these attributes are dormant, we live in a miserable state, but when the divine self is awakened and activated, we realize that we are full of spiritual powers (riddhi and siddhi). The sole aim of Sadhana is to activate these dormant attributes through a dedicated process of self-refinement and self-transcendence.

🔶 A farmer understands the significance of Sadhana. While tending his crops, he remains thoroughly involved in farming day after day throughout the year. In this process, he is least concerned about his health or the severity of weather. He takes care of the fields like he would of his own body. He keeps an eye over each and every plant. According to the needs of the crop, he provides it with manure and performs several operations such as tilling, irrigating, weeding and the harrowing of the field, and finally harvesting. The wisdom for the preservation and maintenance of the fields, the bullocks, ploughs and the ancillary equipment comes to him intuitively from within. He does all this without feeling tired or bored, or showing any haste.

🔷 He does not insist on the immediate reward for his labour because he knows that the crop takes a specific time to ripen and so he has to wait patiently till then. He remains free from the anxiety of filling his cellar with the produce. He also understands the futility of anticipating a plentiful yield. His Sadhana of farming continues single-mindedly. It cannot be said that he does not encounter any obstacles. He overcomes them with his own expertise and with the help of available resources. He refuses to relax without fulfilling the needs of the field. When the crop ripens and is harvested, he takes home the produce with a sense of gratitude to Nature. This is s³dhan³ of a farmer, which he continues to perform from his childhood till death with unwavering faith. There is no rest, no tiredness, no boredom and no indifference. A sadhaka (devotee) should learn the art of Sadhana from the farmer.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 13)

🔶 मित्रो! आप संन्यासी हो जायँ, आप वैरागी हो जायँ। आप गृहस्थ बने रहें, तो भी कोई हर्ज नहीं है। संतों, ऋषियों में से अधिकांश गृहस्थ थे। जितने भी देवी-देवता थे, सबके सब गृहस्थ थे, ऐसे मुझे मालूम पड़ता है। शंकर जी भी गृहस्थ थे। उनके दो बच्चे भी थे। दो बच्चों के अलावा उनके पास बैल था, शेर था, कबूतर था और उनके बेटों के पास चूहा था, मोर था। सारे का सारा सर्कस लेकर वे चलते थे। कौन? शंकर जी। बजाने के लिए डमरू, चलाने के लिए त्रिशूल और ढेर सारा सरंजाम लेकर शंकर जी और उनका खानदान चलता था। वे गृहस्थ थे। ऐसा नहीं है कि आप गृहस्थ रहते हैं, तो आप योग्य नहीं हो सकते और सुयोग्य व्यक्ति नहीं हो सकते, महामानव नहीं बन सकते। गार्हस्थ्य जीवन आपके मार्ग में बाधक नहीं बन सकता। मैं तो स्वयं गृहस्थ बनकर के रहा, ताकि मैं लोगों को यकीन दिला सकूँ, इस बात का विश्वास दिला सकूँ कि गृहस्थ रहने से किसी का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है।

🔷 मित्रो! आदमी का नुकसान गृहस्थ होने से नहीं होता है। नुकसान आदमी का लोभी होने से होता है, मोहग्रस्त होने से होता है। आदमी का विनाश लोभी होने से होता है, गृहस्थ होने से नहीं होता है। संत-बाबा जी भी ऐसे हो सकते हैं, जिन्होंने ढेरों की ढेरों सम्पदा कमाई और मरने के समय तक धन का मोह, स्थान का मोह, आश्रम का मोह उन्हें बना रहा। उनको मैं गृहस्थ कहूँगा। उनको मैं संन्यासी नहीं कह सकता। मैं ऐसे असंख्य गृहस्थों को जानता हूँ जिन्होंने अपने बच्चों का तो पालन किया, जिन्होंने उसी तरीके से किया जिस तरीके से माली अपने बगीचे का पालन किया करता है। पालन करने के बाद वह समझ जाता है कि यह पौधा हमारा नहीं है, वरन् यह मालिक का है। हम मालिक के पौधे की देख−भाल इसलिए करते हैं क्योंकि वह हमें रोटी खिलाता है। इसलिए हमें उसके पौधों को सींचना चाहिए, पौधों को बड़ा बनाना चाहिए। यह संपदा हमारी कैसे हो सकती है?

🔶 मित्रो! आप जहाँ कहीं भी रहें, जहाँ कहीं भी जायँ, मालिक बनकर नहीं, माली बनकर रहें। इससे आपका अहंकार गलता हुआ चला जायेगा और आपका प्रभाव बढ़ता हुआ चला जायेगा। अगर आपने ऐसी मनःस्थिति बना ली और इस बात पर ध्यान देना प्रारंभ कर दिया कि जो लोग आपके संपर्क में आये, उन पर आपने कैसी छाप डालने की कोशिश की और कैसा प्रभाव छोड़कर के आये। मैं इस बात की तलाश करूँगा कि जहाँ भी आप गये थे, वहाँ हिलने-मिलने का, व्यवहार करने का आपका क्रम क्या रहा? अगर आप यह छाप छोड़कर आये कि हम शान्तिकुञ्ज से आये हैं। वहाँ जो विचारधारा दी जाती है, जो प्रेरणाएँ दी जाती हैं, जो दिशायें दी जाती हैं, उन तीनों को लेकर आपने अपनी इज्जत को कैसे बढ़ाया और हमारी इज्जत को कैसे बढ़ाया और हमारे मिशन की इज्जत को कैसे बढ़ाया। हम यही देखना पसंद करेंगे। आपकी वाणी का व्यवहार कैसा रहा। लोगों के साथ में आपने अपनी वाणी की मिठास का किस तरह से इस्तेमाल किया। जहाँ आप गये थे, वहाँ बात-बात पर लड़ाई करके आये होंगे, बात-बात पर झगड़ा करके आये होंगे, तो हमको बुरा लगेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 32)

👉 शिवभाव से करें नित्य सद्गुरु का ध्यान

🔶 कुलदानन्द ब्रह्मचारी ने अपनी डायरी में कई रहस्यमय साधना प्रसंग की चर्चा की है। ऐसी एक चर्चा उनके जीवन के उस कालखण्ड की है, जब वह गहरे साधना संघर्ष से गुजर रहे थे। काम वासना का प्रबल वेग उनके अन्तःकरण में रह-रहकर उद्वेग करता था। समझ में नहीं आता क्या करें? कैसे निबटें इस काम रूपी महाअसुर से। हारकर उन्होंने अपनी विकलता गुरुदेव से निवेदित की। अपनी व्यथा कहते हुए वह बिलख-बिलख कर रो पड़े। उनके आँसुओं से महात्मा विजय कृष्ण गोस्वामी के चरण भीग गए। उनकी इस विह्वलता से द्रवित होकर गोस्वामी जी ने उठाकर ढाँढस बँधाया और कहा- पुत्र! तुम रोते क्यों हो? गुरु के रहते उसके शिष्य को असहाय अनुभव करने की कोई जरूरत नहीं है। अपने सद्गुरु के रहते हुए यदि कोई शिष्य विवशता अनुभव करता है, तो उसके दो ही कारण हो सकते हैं, या तो उसका शिष्यत्व सच्चा नहीं है अथवा उसके गुरु की चेतना अभी भगवान् से एकाकार नहीं हुई है।
  
🔷 अपनी बातों को कहते हुए विजयकृष्ण गोस्वामी उठकर खड़े हुए और दीवार पर लगी अलमारी से अपनी एक छोटी फोटो कुलदानन्द को थमाई। और बोले- बेटा! तुम शिव भाव से इस फोटो की नित्य पूजा करना। तुम्हें अपने जीवन की आन्तरिक व बाह्य आपदाओं से सुरक्षा मिलेगी। फोटो लेकर कुलदानन्द जी अपने निवास स्थान पर आ गए और नित्य प्रति गुरुदेव के चित्र का पूजन करते हुए अपनी साधना में विलीन हो गए। साधना काल में ध्यान के पलों में एक दिन उन्हें अन्तर्दर्शन हुआ कि सुषुम्ना नाड़ी में अपनी चेतना के एक अंश को प्रविष्ट कर गुरुदेव उनकी चेतना को ऊपर उठा रहे हैं। गुरु कृपा से उसी क्षण उनकी अन्तर्चेतना काम विकार से मुक्त हो गई। वह लिखते हैं कि फिर कभी उन्हें काम का प्रकोप नहीं हुआ।
  
🔶 इन्हीं दिनों उन्हें एक अन्य अनुभव भी हुआ। एक दिन साधना करते समय उनके कमरे की छत गिर पड़ी। जिस ढंग से छत गिरी उस तरह उन्हें दबकर मर जाना चाहिए था; परन्तु आश्चर्यजनक ढंग से जिस स्थान पर वे बैठे थे, उस स्थान पर छत का मलबा अधर में ही लटका रह गया। गुरु कृपा को अनुभव करते हुए पहले वह उठे, फिर गुरुदेव के चित्र को उठाया, और बाहर आ गए। इसी के साथ पूरी छत भी गिर गयी। साथ ही ध्यान आया उन्हें गुरुदेव का कथन, जो उन्होंने फोटो देते हुए कहा था- पुत्र! मेरा यह चित्र तुम्हें आन्तरिक व बाह्य विपत्तियों से बचाएगा। और सचमुच ऐसा ही हुआ। गुरु कृपा से शिष्य को सब कुछ अनायास ही सुलभ हो जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 55

👉 खाने तक में नासमझी की भरमार (भाग 4)

🔷 जो नमक शरीर में घुलते और पोषण प्रदान करते हैं वे अन्न, शाक, फल आदि खाद्य पदार्थों में प्रचुर परिमाण में विद्यमान हैं। वे ही पचते और खपते भी हैं। इस प्रकार शरीर की लवण आवश्यकता की पूत के लिए उसका समुचित अनुपात उन खाद्य पदार्थों में सँजोया हैं जो खाने के काम आते हैं। उनका अन्यान्य रासायनिक पदार्थों के साथ ऐसा समन्वय भी रहता है, जिससे उनके पचने में सुविधा रहे। आवश्यक नहीं कि उन उपयोगी लवणों का स्वाद खारा ही रहे। फ्रूट साल्ट खारे कहाँ होते हैं?

🔶 मनुष्य है जिसे खारी नमक के बिना एक ग्रास गले उतारना कठिन पड़ता है। दाल, शाक, चटनी, अचार कुछ क्यों न हो, हरेक में चटकीला नमक रहना चाहिए। इसके बिना जायका ही क्या? यह बुरी आदत जान-बूझकर डाली गई है। संसार के अनेक क्षेत्र इन दिनों भी ऐसे हैं जहाँ खारी नमक का उपयोग प्रायः नहीं ही होता है। देखा-देखी प्रचलन हुआ है तो उसकी मात्रा नगण्य जितनी रखी गई है। इसका प्रतिफल प्रत्यक्ष है। उन-उन क्षेत्रों में सभ्य जगत की प्राणप्रिय बीमारियाँ अभी भी पहुँच नहीं पाई हैं।

🔷 अन्य मसालों के सम्बन्ध में भी यही बात हैं। जीरा, धनिया, हल्दी जैसे मसालों को तो किसी प्रकार सहन भी किया जा सकता है किन्तु मिर्च, लौंग, हींग, तेजपात जैसे गरम मशालें तो ऐसे हैं, जिन्हें एक प्रकार का तेजाब ही कहना चाहिए। वे जलाने-गलाने के अतिरिक्त दूसरा कोई काम कर ही नहीं पाते। हंटर मार-मार कर दौड़ाने जैसी उत्तेजना देकर पेट के साथ अत्याचार ही करते रहते हैं। अधिक खाये को जल्दी पचाने की बात आमतौर से मसालों का लाभ बताते हुए कही जाती हैं। पर वस्तुतः वे निर्दय चाबुकमार की गतिविधियाँ ही अपनाते हैं और नशे की तरह आदत में सम्मिलित हो जाने के बाद यह विवशता उत्पन्न करते हैं कि उनके बिना गाड़ी धकेगी ही नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

👉 परदोष दर्शन भी एक बड़ा पाप है :-

🔷 गाँव के बीच शिव मन्दिर में एक संन्यासी रहा करते थे। मंदिर के ठीक सामने ही एक वैश्या का मकान था।

🔶 वैश्या के यहाँ रात−दिन लोग आते−जाते रहते थे। यह देखकर संन्यासी मन ही मन कुड़−कुड़ाया करता। एक दिन वह अपने को नहीं रोक सका और उस वैश्या को बुला भेजा। उसके आते ही फटकारते हुए कहा—

🔷 ‟तुझे शर्म नहीं आती पापिन, दिन रात पाप करती रहती है। मरने पर तेरी क्या गति होगी?”

🔶 संन्यासी की बात सुनकर वेश्या को बड़ा दुःख हुआ। वह मन ही मन पश्चाताप करती भगवान से प्रार्थना करती अपने पाप कर्मों के लिए क्षमा याचना करती।

🔷 बेचारी कुछ जानती नहीं थी। बेबस उसे पेट के लिए वेश्यावृत्ति करनी पड़ती किन्तु दिन रात पश्चाताप और ईश्वर से क्षमा याचना करती रहती।

🔶 उस संन्यासी ने यह हिसाब लगाने के लिए कि उसके यहाँ कितने लोग आते हैं एक−एक पत्थर गिनकर रखने शुरू कर दिये। जब कोई आता एक पत्थर उठाकर रख देता। इस प्रकार पत्थरों का बड़ा भारी ढेर लग गया तो संन्यासी ने एक दिन फिर उस वेश्या को बुलाया और कहा

🔷 “पापिन? देख तेरे पापों का ढेर? यमराज के यहाँ तेरी क्या गति होगी, अब तो पाप छोड़।”

🔶 पत्थरों का ढेर देखकर अब तो वेश्या काँप गई और भगवान से क्षमा माँगते हुए रोने लगी। अपनी मुक्ति के लिए उसने वह पाप कर्म छोड़ दिया। कुछ जानती नहीं थी न किसी तरह से कमा सकती थी। कुछ दिनों में भूखी रहते हुए कष्ट झेलते हुए वह मर गई।

🔷 उधर वह संन्यासी भी उसी समय मरा। यमदूत उस संन्यासी को लेने आये और वेश्या को विष्णु दूत। तब संन्यासी ने बिगड़कर कहा “तुम कैसे भूलते हो। जानते नहीं हो मुझे विष्णु दूत लेने आये हैं और इस पापिन को यमदूत। मैंने कितनी तपस्या की है भजन किया है, जानते नहीं हो।”

🔴 यमदूत बोले “हम भूलते नहीं, सही है। वह वेश्या पापिन नहीं है पापी तुम हो। उसने तो अपने पाप का बोध होते ही पश्चाताप करके सच्चे हृदय से भगवान से क्षमा याचना करके अपने पाप धो डाले। अब वह मुक्ति की अधिकारिणी है और तुमने सारा जीवन दूसरे के पापों का हिसाब लगाने की पाप वृत्ति में, पाप भावना में जप तप छोड़ छाड़ दिए और पापों का अर्जन किया।

🔷 भगवान के यहाँ मनुष्य की भावना के अनुसार न्याय होता है। बाहरी बाने या दूसरों को उपदेश देने से नहीं। परनिन्दा, छिद्रान्वेषण, दूसरे के पापों को देखना उनका हिसाब करना, दोष दृष्टि रखना अपने मन को मलीन बनाना ही तो है। संसार में पाप बहुत है, पर पुण्य भी क्या कम हैं। हम अपनी भावनाऐं पाप, घृणा और निन्दा में डुबाये रखने की अपेक्षा सद्विचारों में ही क्यों न लगावें?

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 4 Feb 2018


👉 खाने तक में नासमझी की भरमार (भाग 3)

🔷 दूसरी ओर दृष्टि डालने से जो दृश्य सामने आता है, उसे देखते हुए यह मानने को भी जी नहीं करता है कि शरीर को मित्र माना गया है और उसकी सुरक्षा, स्थिरता तथा प्रगति का वैसा ध्यान रखा गया है जैसा कि किसी समझदार को रखना चाहिए था। एक-एक करके पर्यवेक्षण करना हो तो सर्वप्रथम दृष्टि आहार पर जानी चाहिए, क्योंकि इसी ईंधन के सहारे यह भट्टी गरम रहती है और इसी पर पकने वाली खिचड़ी के सहारे जीवन की गाड़ी चलती है। रस-रक्त का तेल-पानी ही है जिसके बलबूते यह मोटर दौड़ती है। इस सन्दर्भ में असावधानी बरती जाय, उलटी नीति अपनाई जाय तो स्पष्ट है कि उस आधार को विषाक्त होना पड़ेगा, जिसे आरोग्य की आधारशिला कह सकते हैं।

🔶 अनुपयुक्त आहार करते रहने पर भी कोई किस प्रकार अपने स्वास्थ्य को अक्षुण्ण रख सकेगा? इस तथ्य को समझने में कोई बड़ी कठिनाई नहीं होनी चाहिए। फिर भी स्पष्ट है कि आहार के सम्बन्ध में वह ढर्रा अपनाया गया है, जिसके रहते निरोग रह सकने की बात सोची भी नहीं जा सकती। आश्चर्य यह है कि दुष्परिणाम भुगतने में इतनी देरी क्यों होती रहती है। प्रकृति को कठोर अनुशासन की अधिष्ठात्री कहा जाता है फिर भी वह मनुष्य के साथ धीमी और थोड़ी प्रताड़ना देने की उदारता क्यों कर दिखा पाती है।

🔷 अभ्यस्त आहार का निरीक्षण पर्यवेक्षण किया जाय तो प्रतीत होता है कि उसे निर्जीव और विषाक्त बनाने में कोई कमी नहीं रहने दी गई है। स्वादिष्ट के ध्रुवकेन्द्र समझे जाने वाले नमक पर दृष्टि डाली जाय तो प्रतीत होता है कि यह मनुष्य के आहार में सम्मिलित होने योग्य स्थिति में किसी भी प्रकार नहीं है। रासायनिक विश्लेषण करने पर वह सोडियम क्लोराइड नामक विष है। जिसकी पोषण में सहायता दे सकने जैसी स्थिति तनिक भी नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Advantages of Worship-Intercession (Part 3)

🔷 I have taken so many big jobs but none of them was ever halted. Have not you seen that? BHAGWAN said to me, ‘‘Change the minds and the hearts of people through spirituality.’’ When I told him about my efficiency in doing that, BHAGWAN just said to me, ‘‘BETA! Efficiency lies within your soul.’’ Well what all I did thereafter is before you. I actually concentrated, researched and exploited the very efficiency of my own soul only to provide this world with so much voluminous literature that stirred the minds & the hearts of millions of people leading them to remember me. I have given DIKSHA to 5 million persons and found a permanent place in hearts and minds of millions of million people all over the world, is it not any surprise?
                                          
🔶 O YES! I was a person, who initially had no means & no man to help & cooperate but my own soul only. I was alone, absolutely alone. Only support I had was of only my own soul. How a lonely person in spiritual field can do miracle cannot be evaluated right now. But pause just a minute. In days to come it will be evaluated that how I have stirred the society through literature, voice and teachings. When I open my voice, it pierces like a gun-bullet in the hearts and minds of listeners.

🔷 My words have been piercing & stirring the people and will continue to do so in future also. Whether I am finishing right now? Yes, right now I am giving my BAIKHARI voice a stop but will continue to stir and pierce through my PARAA, PASHYANT & MADHYAMA voices, the hearts and minds of people just to awaken them.
                                         
🔶 Such kind of efficiency must be visible in people. Yes, how has been that possible? It has been possible only and only through pure spirituality and not because of a little person like me who is without any means. I have told people that a righteous approach of utilizing the resources available can lead them to draw maximum advantages as I had been drawing.
                                                                                   
Finished, today’s session

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 12)

🔷 मित्रो! हमारे गुरुदेव भी इसी प्रकार के हैं। वे बहुत दूर रहते हैं। यहाँ से बहुत दूर, जहाँ मनुष्यों का कभी जाना संभव नहीं होता। उन्होंने अपनी जबान का-अपनी वाणी का कभी इस्तेमाल नहीं किया। शक्ति होते हुए भी अपनी जिंदगी में कभी व्याख्यान नहीं दिया। किसी को कभी गुरुदीक्षा नहीं दी। मुझे भी जब वे बुलाते हैं, तो ज्यादा से ज्यादा चार दिन के लिए बुलाते हैं और मौन बैठे रहते हैं। मुँह से-जबान से एक शब्द भी नहीं निकालते, लेकिन उनके पुण्य के प्रभाव से, शक्ति के प्रभाव से, तेज के प्रभाव से, ब्रह्मवर्चस के प्रभाव से समीप में जो कोई भी आदमी आता है, प्रभावित होता हुआ चला जाता है, बढ़ता हुआ, हिलता हुआ, काँपता हुआ चला जाता है। यह विशेषता उनकी वाणी की विशेषता नहीं है। उनकी क्रियाओं की विशेषता नहीं है। उनके पैसे की विशेषता नहीं है। यह उनके अंतःकरण की विशेषता है।

🔶 मित्रो! आप यहाँ से जाने के पश्चात् योगी बनकर रहना और तपस्वी बनकर रहना। योगी और तपस्वी की परिभाषाएँ आपको मैं कल बता चुका हूँ। आप भूलना मत। आप भूल जायेंगे तो मुश्किल हो जायेगी। आप फिर नाक में से पानी पीने को योग कहना शुरू कर देंगे और गले में से रस्सी डालने को योग कहना शुरू कर देंगे और टट्टी के रास्ते पानी चढ़ाने को योग कहना शुरू कर देंगे। आप नाक में से हवा निकालने को योग कहना शुरू कर देंगे। योग का यह आशय नहीं है, मैं आपको कितनी बार समझा चुका हूँ। योग का इन सबसे कोई ताल्लुक नहीं है। यह अभ्यास है, क्रियाकलाप है, जिससे शरीर को अच्छा रखा जा सके। यह सूत्र है, प्रक्रिया है, योग नहीं है। आप यहाँ से जाने के पश्चात् अपने आपको योगी बनाये रखने के लिए तप करना। आप अपने आपको भावनाओं में मत बहने देना। आप हमेशा यह विचार करना कि हम किसी व्यक्ति विशेष की सम्पत्ति नहीं हैं और हम किसी कुटुम्ब विशेष की सम्पत्ति नहीं हैं और हमारा मन किसी घर विशेष से जुड़ा हुआ नहीं है और किसी खानदान विशेष से जुड़ा हुआ नहीं है।

🔷 मित्रो! वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करने के पश्चात् और पीला कपड़ा पहनने के पश्चात् आपको भले से ही किसी घर में रहना पड़े, इसके लिए मैं आपको मजबूर नहीं करता और यह भी नहीं कहता कि जो बच्चे आपके बाकी रह गये हैं, उनकी सेवा नहीं करना चाहिए। उनका पालन-पोषण नहीं करना चाहिए, मैं यह भी नहीं कहता, पर मैं यह अवश्य कहता हूँ कि आप अपनी मन की स्थिति को बदल देना। आप अपनी मनःस्थिति को इस प्रकार बदल देना कि हम किसी खास आदमियों की संपदा नहीं है और हमारा कोई खास घर नहीं है। हम किसी खास वस्तु से जुड़े हुए नहीं हैं। अब हमारा कायाकल्प हो गया है और हमारे जीवन की नयी दिशायें बन गयी हैं। अब हम समाज की संपत्ति हैं। अब हम धर्म की संपत्ति हैं। अब हम भगवान की संपत्ति हैं। अब हम राष्ट्र की संपत्ति हैं और हम संस्कृति की संपत्ति हैं। अब हम व्यक्ति विशेष की संपत्ति नहीं हैं। अगर आप मन का यह कायाकल्प करने में समर्थ हो गये और मन का स्तर बदलने में समर्थ हो गये, तो मैं आपको सच्चा वैरागी कहूँगा और सच्चा संन्यासी कहूँगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 31)

👉 शिवभाव से करें नित्य सद्गुरु का ध्यान

🔷 गुरु नमन की यह महिमा अनन्त और अपरिमित है। इसका विस्तार असीम है। इसके अगले क्रम को गुरुगीता के महामंत्रों में प्रकट करते हुए भगवान् महेश्वर जगन्माता भवानी से कहते हैं-

यस्य कारणरूपस्य कार्यरूपेण भाति यत्। कार्यकारणरूपाय तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ४१॥
नानारूपम् इदं सर्वं न केनाप्यस्ति भिन्नता। कार्यकारणता चैव तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ४२॥
यदङ् घ्रिकमलद्वंद्वं द्वंद्वतापनिवारकम्। तारकं सर्वदाऽऽपद्भ्यः श्रीगुरुं प्रणमाम्यहम्॥ ४३॥
शिवे क्रुद्धे गुरुस्राता गुरौ कु्रद्धे शिवो न हि। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन श्रीगुरुं शरणं व्रजेत्॥ ४४॥
वन्दे गुरुपदद्वन्द्वं वाङ्मनश्चित्तगोचरम्। श्वेतरक्तप्रभाभिन्नं शिवशक्त्यात्मकं परम्॥ ४५॥

सद्गुरु नमन के इन महामंत्रों में जीवन साधना का सार समाहित है। भगवान् सदाशिव की वाणी शिष्यों को बोध कराती है कि ब्राह्मी चेतना से एकरूप गुरुदेव इस जगत् का परम कारण होने के साथ ही कारण रूप यह  जगत् भी हैं। वे ही महाबीज हैं और वे ही महावट हैं। ऐसे कार्य-कारण रूपी सद्गुरु को नमन है॥ ४१॥ इस संसार में यद्यपि ऊपरी तौर पर सब जगह भेद व भिन्नता दिखाई देती है; परन्तु तात्त्विक दृष्टि से ऐसा नहीं है। इस दृष्टि से तो कार्य-कारण की परमात्म चेतना के रूप में गुरुदेव ही सर्वत्र व्याप्त हैं। ऐसे सर्वव्यापी सद्गुरु को नमन है॥ ४२॥ जिनके दोनों चरण कमल शिष्य के जीवन में आने वाले सभी द्वन्द्वों, सर्वविधि तापों और सब तरह की आपदाओं का निवारण करते हैं उन श्री गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ॥ ४३॥ भगवान् भोलेनाथ स्वयं कहते हैं कि यदि शिव स्वयं क्रुद्ध हो जाएँ, तो भी शिष्य का त्राण करने में सद्गुरु समर्थ हैं; परन्तु यदि गुरुदेव रुष्ट हो गए, तो महारुद्र शिव भी उसकी रक्षा नहीं कर सकते। इसलिए सब तरह की कोशिश करके श्री गुरु की शरण में जाना चाहिए॥ ४४॥ श्री गुरु के चरणों की महिमा मन-वाणी, चित्त व इन्द्रिय ज्ञान से परे है। श्वेत-अरुण प्रभा युक्त गुरु चरण कमल परम शिव व परा शक्ति का सहज वासस्थान हैं, उनकी मैं बार-बार वन्दना करता हूँ॥ ४५॥
  
गुरु नमन के इन महामंत्रों के भाव को सही ढंग से वही समझ सकते हैं, जिन्हें इस सत्य की अनुभूति हो चुकी है कि सद्गुरु चेतना एवं ब्राह्मी चेतना सर्वथा एक हैं; अपने गुरुदेव कोई और नहीं, स्वयं देहधारी ब्रह्म हैं। इन महामंत्रों की व्याख्या को और अधिक सुस्पष्ट ढंग से समझने के लिए एक सत्य घटना का उल्लेख करना सम्भवतः अधिक उपयुक्त होगा। यह घटना बंगाल के महान् सन्त विजयकृष्ण गोस्वामी एवं उनके शिष्य कुलदानन्द ब्रह्मचारी के सम्बन्ध में है। महात्मा विजयकृष्ण गोस्वामी योग विभूतियों से सम्पन्न सिद्ध योगी थे। उनका सन्त जीवन अनेकों सन्तों व महान् देश भक्तों के लिए प्रेरक रहा है। उनके शिष्यों ने न केवल साधना जीवन में आश्चर्यजनक उपलब्धियाँ अर्जित कीं, अपितु कइयों ने राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए बढ़-चढ़कर भागीदारी भी निभायी। इन शिष्यों में कुलदानन्द ब्रह्मचारी उनके ऐसे शिष्य थे, जिन्होंने अपने तप और योग साधना से न केवल स्वयं को बल्कि अनेकों के जीवन को प्रकाशित किया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 54

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

👉 रिश्ते मृत्यु के साथ मिट जाते हैं

🔷 एक बार देवर्षि नारद अपने शिष्य तुम्बरू के साथ कहीं जा रहे थे गर्मियों के दिन थे। एक प्याऊ से उन्होंने पानी पिया और पीपल के पेड़ की छाया में जा बैठे। इतने में एक कसाई वहाँ से 25-30 बकरों को लेकर गुजरा। उसमें से एक बकरा एक दुकान पर चढ़कर मोठ खाने लपक पड़ा।

🔶 उस दुकान पर नाम लिखा था – ‘शगालचंद सेठ।’ दुकानदार का बकरे पर ध्यान जाते ही उसने बकरे के कान पकड़कर दो-चार घूँसे मार दिये बकरा ‘बैंऽऽऽ…. बैंऽऽऽ…’ करने लगा और उसके मुँह में से सारे मोठ गिर पड़े। फिर कसाई को बकरा पकड़ाते हुए कहाः “जब इस बकरे को तू हलाल करेगा तो इसकी मुंडी मेरे को देना क्योंकि यह मेरे मोठ खा गया है।

🔷 ”देवर्षि नारद ने जरा-सा ध्यान लगाकर देखा और जोर-से हँस पड़े। तुम्बरू पूछने लगाः “गुरुजी! आप क्यों हँसे? उस बकरे को जब घूँसे पड़ रहे थे तब तो आप दुःखी हो गये थे, किंतु ध्यान करने के बाद आप हँस पड़े। इसमें क्या रहस्य है?

🔶 ”नारद जी ने कहाः “छोड़ो भी…. यह तो सब कर्मों का फल है, छोड़ो। ”“नहीं गुरुजी! कृपा करके बताइये।”“ इस दुकान पर जो नाम लिखा है ‘शगालचंद सेठ’ – वह शगालचंद सेठ स्वयं यह बकरा होकर आया है। यह दुकानदार शगालचंद सेठ का ही पुत्र है। सेठ मरकर बकरा हुआ है और इस दुकान से अना पुराना सम्बन्ध समझकर इस पर मोठ खाने गया। उसके बेटे ने ही उसको मारकर भगा दिया।

🔷 मैंने देखा कि 30 बकरों में से कोई दुकान पर नहीं गया फिर यह क्यों गया कमबख्त? इसलिए ध्यान करके देखा तो पता चला कि इसका पुराना सम्बंध था। जिस बेटे के लिए शगालचंद सेठ ने इतना कमाया था, वही बेटा मोठ के चार दाने भी नहीं खाने देता और गलती से खा लिये हैं तो मुंडी माँग रहा है बाप की। इसलिए कर्म की गति और मनुष्य के मोह पर मुझे हँसी आ रही हैं कि अपने – अपने कर्मों का फल को प्रत्येक प्राणी को भोगना ही पड़ता है और इस जन्म के रिश्ते – नाते मृत्यु के साथ ही मिट जाते हैं, कोई काम नहीं आता।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 3 Feb 2018


👉 खाने तक में नासमझी की भरमार (भाग 2)

🔷 इतना जानते हुए भी यदि कोई जान बूझकर अपने पैरों कुल्हाड़ी मारे, काँटों पर चले, गड्ढे में गिरे और बर्र के छत्ते में हाथ डाले तो कोई क्या करे? समझदारी का अभाव समझ में आता है। उसके लिए भाग्य-भगवान को दोष देकर भी जी हलका किया जा सकता है। किन्तु तब क्या किया जाय, जब समझदारी उलटे रास्ते चले? पैर ऊपर करके, हाथों के बल, धरती से सिर रगड़ते हुए चलने में विशिष्टता के अहंकार का प्रदर्शन करे।

🔶 मनुष्य की गतिविधियों को देखकर ऐसी ही स्थिति का अवलोकन करना पड़ता है। जब अपने परमप्रिय सेवक-सम्बन्धी के लिए नासमझी भरी अनीति अपनाते हुए देखा जाता है तब आश्चर्य होता है और असमंजस पड़ता है कि मनुष्य की समझदारी को सराहा जाय या उसकी उलटे पैरों चलने लौटने की विडम्बना को मूर्खतापूर्ण कहकर कोसा जाय।

🔷 शरीर के साथ जो व्यवहार किया जाता है उसे उलट-पुलट कर देखा जाय तो एक शब्द में विचित्र ही कहा जा सकता है। शरीर के साथ शत्रुता निबाही जाय, उसे तोड़-फोड़कर बर्बाद किया जाय ऐसा भी किसी का मन नहीं दीखता, यदि ऐसी बात रही होती तो उसे वस्त्र-आभूषणों से, श्रृंगार प्रसाधनों से क्यों सजाया जाता? केश-विन्यास बनाने जैसे अनेकों कामों मेंं कितना समय लगता है? सजधज में कितना धन व्यय होता है? वाहनों, सेवकों द्वारा उसके लिए कितनी सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। विनोद के कितने ही साधन जुटाये जाते हैं? पौष्टिक आहार लेने का भी ध्यान रहता है। इन सब बातों को देखते हुए यह कैसे कहा जाय कि अपनी काया के प्रति किसी का मन शत्रुता निबाहने का है और उसे बर्बाद कर देने का इरादा बन गया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Advantages of Worship-Intercession (Part 2)

🔷 I did PUJA-UPASANA (worship-intercession) but with aforesaid mentality. I never approached BHAGWAN with mentality of a beggar, poor, as happens to be generally the case with public-mentality. By today I have been taking the name of RAM as if I have been using soap or a scrub brush. I used RAM-NAM as stone of a washer man to wash my house; I used RAM-NAM as tool of a cotton-comber to thrash myself. Is not so that cotton is repeatedly thrashed at a single point?

🔶 Is not so that cotton-comber repeatedly strikes his hammer over a floor-mat? I used RAM-NAM as a cotton-comber uses his hammer, but how can a cunning fellow, a selfish fellow, a begging fellow, a cowardice fellow and a beseeching fellow get the love of BHAGWAN? How can such person save his grace before BHAGWAN? I think any person with such approach cannot save his faces.
                                             
🔷 I am a respected person before my BHAGWAN. He has saved my grace for I have saved his grace. I said to my BHAGWAN, ‘‘your grace and dignity depends on the dignified life your child lives. Your dignity is associated with my dignity.’’ I maintained the dignity of BHAGWAN to tell him that he has not committed any mistake by giving me the life of a human being. I got its results. BHAGWAN maintained  own as well as my dignity. BHAGWAN too assured me of no loss to my dignity. I am a magnificent person. No one can mark any blot over my dignity, so none did so. No one could point a censoring finger towards me nor did I allow that.
                                             
🔶 I continued to teach people about mechanics and process of spirituality that honesty, sincerity and dignity are the elements only with which one should approach the BHAGWAN. On doing so no deficiency will be left with that person and no objective in his life will be left uncompleted.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 11)

🔷 मित्रो! यदि उद्देश्य और दिशा सही होती, तो एक-एक संत एक-एक व्यक्ति को व्यक्तित्ववान बनाने में अपनी जिंदगी में समर्थ हो गया होता। हम छप्पन लाख संत-छप्पन लाख अच्छे व्यक्ति तैयार कर देते। फिर यह न कहना पड़ता कि यदि सौ आदमी हमारे पास होते, तो दुनिया को हम कष्टों से, दुखों से त्राण दिला देते। स्वामी विवेकानन्द दुनिया में चिल्ला-चिल्लाकर चले गये कि यदि सौ आदमी हमारे पास होते, जैसे कि मैं चाह रहा हूँ और जैसे की मैं तलाश कर रहा हूँ। मेरे हाथ में यदि सौ आदमी आ गये होते, तो सारी दुनिया में भारतीय संस्कृति की जड़ें जमा देता और भारतवर्ष में संस्कृति के प्रति जो अनास्था उत्पन्न हो गयी है, वह अनास्था उत्पन्न नहीं होने देता। विवेकानन्द की इच्छा पूरी न हो सकी। इसी तरह गाँधी जी की इच्छा पूरी न हो सकी और सौ आदमी उनको न मिल सके।

🔶 मित्रो! विवेकानन्द की इच्छा पूरी न हो सकी, क्योंकि उनको सौ आदमी न मिल सके और वे खाली हाथ चले गये। कैसे चले गये? क्योंकि उस तरह के आदमी तैयार न किये जा सके। अगर आदमी तैयार करने के साँचे हमारे पास होते, तो मित्रो! हम न जाने क्या से क्या करके दिखा देते और न जाने क्या से क्या हो जाता। मशीनें बनाना सरल है, पर मनुष्य को बनाना बहुत मुश्किल है। इन्सान अगर सही रूप में इंसान हो, तो उसके प्रभाव के बराबर किसी का प्रभाव नहीं हो सकता। अगर आप अपने आपमें सही हों तब और अपने आप में गलत हों, तब क्या हो सकता है? मित्रो! यदि आदमी अपने आप में गलत हो, तो उसके व्याख्यानों का किसी पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है। ऐसा व्यक्ति किसी आदमी को पैदा करने में समर्थ हो सकता है? नहीं, किसी आदमी को पैदा नहीं कर सकता। क्यों नहीं पैदा कर सकता? क्योंकि उसके अंदर जो चुम्बकत्व होना चाहिए, मैग्नेट होना चाहिए, वह मैग्नेट उसके अंदर नहीं होता, आप इस बात पर ध्यान देना।

🔷 मित्रो! आप इस बात पर ध्यान देना कि जनता का स्वभाव इस तरह संभव हुआ कि नहीं। आपका चुम्बकत्व उन्हें प्रभावित कर सका कि नहीं कर सका। साथ ही इस बात पर भी ध्यान देना कि आपकी लगन और आपकी निष्ठा इस आस्था में लगी हुई है कि नहीं। अगर आपकी आस्था जमी हुई है, तो कोई चिन्ता की बात नहीं है कि कोई आदमी आपको सुनता है या नहीं और कोई आदमी आपको समझता है या नहीं और कोई आदमी आपकी ओर ध्यान देता है कि नहीं। आप अपने आपमें ही काफी हैं। आप स्वयं के द्वारा, अपने चरित्र के द्वारा, अपने क्रियाकलापों के द्वारा, अपनी भावना के द्वारा, अपने मस्तिष्क के द्वारा, अपने अन्तःकरण के द्वारा इस वायुमंडल में एक ऐसा वातावरण पैदा कर रहे होंगे, एक ऐसी हवा पैदा कर रहे होंगे और एक ऐसी फिजा पैदा कर रहे होंगे, जो आप चुपचाप रहते हुए भी न जाने क्या से क्या पैदा करके दिखा सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 30)

👉 शिवभाव से करें नित्य सद्गुरु का ध्यान

🔷 गुरुगीता सद्गुरु की महिमा का गायन है। सद्गुरु ही वह परम ज्योति है, जो मानव जीवन के अन्धेरे को दूर करती है। इसी के दिव्य प्रकाश से मानव चेतना प्रकाशित होती है। मानव को महामानव, देवमानव बनाते हुए उसे अयमात्मा ब्रह्म की अनुभूति देने वाले कृपालु सद्गुरु ही हैं। उन्हें नमन प्रभु को नमन है। गुरु नमन की भाव भरी साधना से जीवन के सभी तत्त्व, सभी सत्य अनायास ही सहज सुलभ हो जाते हैं।

🔶 नमन-साधना की यह प्रक्रिया सहज-सुलभ होते हुए भी परम-दुर्लभ है। इसमें दुर्लभता उस गुरु तत्त्व के बोध की है, जो गहन-श्रद्धा से ही मिल पाता है। श्रद्धा परिपूर्ण और परिपक्व न हो, तो सद्गुरु को सामान्य मानव समझने की भूल होती रहती है। श्रद्धा और समर्पण की सघनता में ही यह रहस्य समझ में आता है कि गुरुदेव मूर्त महेश्वर हैं। गुरु चेतना को नमन ही ब्राह्मी चेतना को नमन है।
  
🔷 पूर्वोक्त मंत्रों में सद्गुरु के अनुरागी शिष्यों को इसकी अनुभूति कराने की चेष्टा की गई है। इसमें यह बोध कराया गया है कि गुरुतत्त्व, परमात्मतत्त्व एवं सृष्टि तत्त्व अलग-अलग नहीं हैं। जिस परम सत्य के कारण जगत सत्य भासता है, वह गुरुवर के सिवा अन्य कुछ भी नहीं है। जिनके आनन्द से जगत् आनन्द से आपूरित होता है- वे सच्चिदानन्द गुरुदेव ही हैं। जिनके प्रेम के कारण सभी में प्रीति की अनुभूति होती है, वे भावमय भगवान् सद्गुरु ही हैं।

🔶 जिनकी चेतना से विश्व चेतन है। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्थाएँ जिनसे प्रकाशित हैं, सद्गुरु ही वह परम चेतन तत्त्व हैं। जिनके द्वारा ज्ञान मिलने से समस्त भेद दृष्टि समाप्त हो जाती है, वे सदाशिव गुरुदेव ही हैं। उनकी कृपा से ही ब्रह्मतत्त्व की अनुभूति होती है। ऐसे सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, परम करुणामय सद्गुरु को छोड़कर भला और किसे नमन करें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 52

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...