बुधवार, 10 जनवरी 2018

👉 MY LIFE: An indivisible Lamp (Akhand-Deepak) (Part 1)

🔷 I kindled an incessant lamp, continued to sit before it to count beads of GAYATRI mantra and also continued to emotionally undulate as if I were any snake. I kept asking myself, ‘‘can you light like a lamp to enlighten others?’’ a lamp of the cost of one fourth of a paisa, a little of oil and cotton, if all these taken together can show path to others in the form of a DEEPAK and can sacrifice itself to show others the path then, ‘‘O man! Why can’t you make your life like a Deepak?’’ my incessant Deepak continued to enlighten. I am not one of those who just burn the oil, ghee. I am not among those who misuse the things/ assets. Rather I am among those who believe to refine sentiments through rituals (tools). Thus I continued to refine my sentiments. My life is like a Deepak, enlightening others’ life, guiding the lives of millions of men, opening doors to millions of people. My life is like a Deepak. Enlightening, I have been. From beginning to the end, I have simply been burning.

🔶 I was kindled at the age of 15 years. I know only one thing that I have been burning like a Deepak for the last 60 years. I know nothing else. I have to spend my coming days in HIMAALAYA. What is there in HIMAALAYA? Is there any cinema in HIMAALAYA? Is there any sweet shop in HIMAALAYA? Is there any KACHAORI-SHOP in HIMAALAYA? No there is nothing like that and then what is there? There in HIMAALAYA are wild animals roaring all the night, wild pythons coming out of their holes in night. When in night there comes cold and air makes a different noise, the blood is freezed in veins of body and man finds it difficult to move. I am going to live in such a difficult place that is millions times more dangerous than jail. I am going, for what? For being engulfed in fire so that such a heat is generated within me that could awaken the sleeping fire within millions of people.
                                        
🔷 Has slept the honesty of man, the soul of man, the thinking-style of man and have slept the ideals of man. So now the man is alive like a beast-only to eat, sleep and marry. The soul within it has slept. I am going to be engulfed in fire. A dead body has to be either revitalized or reduced to ashes. I am going to generate fire. I am going to toil in order to generate fire, light and sense & knowledge of soul about which I have told you earlier that I had seen at the time of very first visit of my GUERDEV in my house. He gave me a different thinking style and light. I am going for that, so here I go. But wherever I go, I assure you to keep looking at you however you will not be able to see me. You cannot keep a distance from me.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 प्रत्येक परिस्थिति में प्रसन्नता का राजमार्ग (भाग 4)

🔶 बुराई की शक्ति अपनी सम्पूर्ण प्रबलता के साथ टक्कर लेती है। इसमें सन्देह नहीं है। ऐसे भी व्यक्ति संसार में हैं जिनसे ‘‘कुशल क्षेम तो है’’ पूछने पर ‘‘आपको क्या गरज पड़ी’’ जैसे उत्तर मिल जाते हैं। ऐसे प्रसंगों से आये दिन भेंट होती है। इनसे टकराया जाये तो मनुष्य का सारा जीवन टकराने में ही चला जाता है। उनसे निबटा न जाय यह तो नहीं कहा जाता, पर किसी भी काम में हमारी विचार और ग्रहण शक्ति सात्विक और ऊर्ध्ववती रहनी चाहिये। शत्रु से युद्ध करते हुये भी उसके गुण, साहस और सूझ-बूझ की प्रशंसा करनी चाहिये।

🔷 यही बात भगवान कृष्ण ने अर्जुन को सिखाई। जब उसे पता चला कि इस संसार में सब विरोधी ही विरोधी हैं तो भगवान कृष्ण ने समझाया—अर्जुन! भद्रं मनः कृणुष्व वृत्रतूर्ये इस संसार संग्राम में तू भद्र मनस्कता के साथ युद्ध कर। कोई भी काम करते समय अपने मन को उच्च भावों और संस्कारों से ओत-प्रोत रखना ही सांसारिक जीवन में सफलता का मूल मन्त्र है। यहां निरन्तर टकराने वाले से जो ‘‘अच्छा है सो सब मेरा’’ ‘‘बुरे से प्रयोजन नहीं’’ की धारणा रखने वाला व्यक्ति निश्चय ही अपने जीवन को ऊंचा उठाता और मनुष्य जीवन का वीरोचित लाभ प्राप्त करता है।

🔶 हम जहां रह रहे हैं, उसे नहीं बदल सकते पर अपने आपको बदल कर हर स्थिति से आनन्द ले सकते हैं। सामान्य सतह पर खड़े होकर दीखने वाला दृश्य कम अच्छा लगता है। अट्टालिका पर चढ़ जाने से वही वातावरण और भी व्यापक और अच्छा लगने लगता है। स्वतः की उच्च या निम्न स्थिति के कारण ही संसार अच्छा या बुरा लगता है। जब यह अपने ही हाथ की बात है तो संसार को क्यों बुरा देखें, क्यों बुराइयों का चिन्तन करें। हम भलाई की शक्ति में निमग्न रहकर उच्च स्थिति प्राप्त कर सकते हैं तो ऐसी सुन्दर जीवन व्यवस्था को छोड़ कर अपने आपको दुःखी और दलित क्यों बनावें?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1971 पृष्ठ 33
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/February/v1.33

👉 ध्यान का दार्शनिक पक्ष (भाग 5)

🔶 दूसरा वाला प्रकाश का ध्यान करने के लिए जो मैंने बताया था और यह कहा था कि आप अपने मस्तिष्क में प्रकाश का ध्यान किया कीजिए। आपके मस्तिष्क में-मन में जब प्रकाश आए, तब आपको ज्ञानयोगी होना चाहिए। कर्मयोगी शरीर से, ज्ञानयोगी मस्तिष्क से। आपके मस्तिष्क के भीतर जो भी विचार आएँ निषेधात्मक नहीं, विधेयात्मक विचार आने चाहिए। अभी तो आप लोगों के मस्तिष्क में विचारों को कितनी भीड़, कितने मक्खी मच्छर, कितनी वे चीजें जो आपके किसी काम की नहीं हैं, कितने विचार, कितनी कल्पनाएँ आती रहती हैं। उनका यदि आप विश्लेषण करें तो देखेंगे कि मस्तिष्क में जाने कितने मक्खी-मच्छरों जैसे विचार भरे पड़े हैं। अभी उनमें से एक तो गुस्से का भरा था, एक कामवासना का विचार करता रहा, एक सिनेमा का विचार करता रहा।

🔷 एक यह विचार करता रहा कि मैंने लॉटरी के तीन टिकट खरीदे हैं, उसमें से तीन-तीन लाख रुपए तो मिल ही जाएँगे। उन रुपयों से क्या-क्या करूँगा? अमुक काम करूँगा, अमुक बच्चे को, अमुक को दूँगा। आदि बेसिर-पैर की सारी को सारी बातें सारे के सारे ताने-बाने बुन रहा है। इससे आपकी सारी शक्तियाँ निरर्थक होती जा रही हैं। यह सब बेकार की कल्पनाएँ हैं जिनके पीछे न कोई तारतम्य है, न वास्तविकता है और न इनसे आपको कुछ लेना-देना है। इस प्रकार की कल्पनाएँ निरर्थक और अनर्थमूलक ही होती हैं। सार्थक कल्पनाएँ अगर आपके मस्तिष्क में आई होती, क्रमबद्ध रूप से आपने विचार किया होता तो आपमें से अधिकांश व्यक्ति वाल्टेयर हो गए होते, रवीन्द्रनाथ टैगोर हो गए होते अगर आपने अपनी कल्पनाओं को क्रमबद्ध बनाया होता, दिशाबद्ध बनाया होता, उत्कृष्ट और सक्षम बनाया होता।

🔶 हमारी एक ही विशेषता है कि हम विद्वान हैं। इसलिए विद्वान हैं कि हमने अपने चिंतन की धाराओं को सीमाबद्ध-दिशाबद्ध करके रखा है। हमारा चिंतन अनावश्यक बातों में कभी भी नहीं जाता। जब कभी जाएगा, क्रमबद्ध बातों में जाएगा, दिशाबद्ध बातों में जाएगा, आदर्श बातों में जाएगा और जो संभव है उनमें जाएगा। हमारा मस्तिष्क इतना ताना-बाना बुनता है कि वह एक वास्तविकता और व्यावहारिकता पर टिका रहता है। जो अवास्तविक है, अव्यावहारिक है और जो अनावश्यक है, ऐसे सारे के सारे विचारों को हम बाहर से ही मना कर देते हैं कि-'नो एडमीशन' यहाँ नहीं आ सकते, बाहर जाइए। आपको दाखिला हमारे मस्तिष्क में नहीं मिल सकता।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 13)

👉 गुरु-चरण व रज का माहात्म्य

🔶 गुरुगीता के महामंत्र साधकों का पग-पग पर मार्गदर्शन करते हैं। साधना की सुगम, सरल, सहज विधियाँ सुझाते हैं। साधकों को इस गुह्यतत्त्व का बोध कराते हैं कि तुम क्यों इधर-उधर भटक रहे हो, क्यों व्यर्थ में परेशान हो? परम कृपालु सद्गुरु के होते हुए तुम्हें किसी भी तरह से भटकने या परेशान होने की जरूरत नहीं है। सद्गुरु के प्रति भाव भरा समर्पण सभी भव रोगों की अचूक दवा है। समस्याएँ भौतिक हों या आध्यात्मिक, लौकिक हों या अलौकिक गुरुचरणों में सभी के सारे समाधान समाए हैं। पिछले मंत्रों में गुरुचरणों की इसी महिमा की चर्चा की गई है। गुरु चरणों की कृपा से गुरुभक्त साधक को साधना का परम प्राप्य अनायास ही सुलभ हो जाता है। गुरु चरण सेवा से जीव ‘अयमात्माब्रह्म’ के दुर्लभ बोध को सुगमता से पा लेता है।
  
🔷 गुरुभक्ति की इसी भावकथा को आगे बढ़ाते हुए देवों के भी परम देव भगवान् सदाशिव आदिमाता पार्वती से कहते हैं-

गुरुपादाम्बुजं स्मृत्वा जलं शिरसि धारयेत्।
सर्वतीर्थावगाहस्य सम्प्राप्नोति फलं नरः॥ १२॥
  
शोषकं पापपङ्कस्य दीपनं ज्ञानतेजसाम्।
गुरुपादोदकं सम्यक् संसारार्णवतारकम्॥ १३॥
  
अज्ञानमूलहरणं जन्मकर्मनिवारणम्।
ज्ञानवैराग्यसिद्धर्य्थं गुरुपादोदकं पिबेत्॥ १४॥
  
🔶 सद्गुरु के चरणों का स्मरण करते हुए जल को सिर पर डालने से मनुष्य को सभी तीर्थों के स्नान का फल प्राप्त होता है॥ १२॥ श्री गुरु चरणों का जल पाप पंक को सुखाने वाला और ज्ञान तेज के दीपक को प्रकाशित करने वाला है। गुरुचरण जल की महिमा से मनुष्य ठीक तरह से संसार सागर को पार कर जाता है॥ १॥ गुरु चरणों का जल पीने से अन्तर्भूमि में  गहराई से जमा हुआ अज्ञान का महावृक्ष जड़ से उखड़ जाता है। जन्म-कर्म के बन्धन का निवारण होता है। गुरु पादोदक के पान से साधक को ज्ञान-वैराग्य की सहज सिद्धि होती है॥ १४॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 25

👉 समस्याओं का समाधान करें और आगे बढ़ें

🔶 एक गाँव में एक किसान रहता था। वह खेती बाड़ी करके अपने परिवार का पालन पोषण किया करता था। उसके खेत के बीचो-बीच पत्थर का एक छोटा सा हिस्सा ज़मीन से ऊपर निकला हुआ था जिससे ठोकर खाकर वह कई बार खुद भी गिर चुका था और ना जाने कितनी ही बार उससे पत्थर से टकराकर उसका हल भी टूट चुका था।

🔷 रोजाना की तरह एक दिन वह किसान सुबह-सुबह खेती करने पहुँचा लेकिन जो सालों से होता आ रहा था फिर वही हुआ, यानि एक बार फिर से उस किसान का हल उसी पत्थर के हिस्से से टकराकर टूट गया। किसान बिल्कुल क्रोधित हो उठा, और उसने मन ही मन सोचा कि आज जो भी हो जाए वह इस चट्टान को ज़मीन से निकाल कर अपने खेत के बाहर फ़ेंक ही देगा।

🔶 वह तुरंत गांव की ओर भागा और गाँव से चार पाँच लोगों को बुला लाया और सभी को लेकर वह उस पत्त्थर के पास पहुंचा ओर बोला – “मित्रो! ये देखो ज़मीन से निकले चट्टान के इस हिस्से ने मेरा बहुत नुक्सान किया है, और आज हम सभी को मिलकर इसे जड़ से निकालना है और खेत के बाहर फ़ेंक देना है।”

🔷 और ऐसा कहते ही वह फावड़े से पत्थर के आसपास पास खुदाई करने लगा, पर ये क्या! उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि अभी उसने एक-दो बार ही फावड़ा मारा था कि पूरा का पूरा पत्थर ज़मीन से बाहर निकल आया। साथ खड़े सभी लोग भी अचरज में पड़ गए और उन्ही में से एक ने हँसते हुए उस किसान से पूछा,” क्यों भाई, तुम तो कहते थे कि तुम्हारे खेत के बीच में एक बड़ी सी चट्टान दबी हुई है, पर ये तो एक मामूली सा पत्थर निकला?” खुद किसान भी आश्चर्य में पड़ गया क्योंकि सालों से जिसे वह एक भारी-भरकम चट्टान समझ रहा था दरअसल वह बस एक छोटा सा पत्थर था!

🔶 उसे बहुत पछतावा हुआ कि काश उसने पहले ही इसे निकालने का प्रयास किया होता तो ना उसे इतना नुकसान उठाना पड़ता और ना ही दोस्तों के सामने उसका मज़ाक बनता!

🔷 दोस्तों, कुछ इस किसान की तरह ही अक्सर हमारे साथ भी होता है। हम भी कई बार अपनी ज़िंदगी में आने वाली छोटी छोटी मुश्किलो, बाधाओं को बहुत बड़ा समझ लेते हैं और उनका सामना करने बजाय दुःख उठाते रहते हैं, नुकसान उठाते रहते हैं।

🔶 अगर हम उन मुश्किलों का सामना करे और उनसे निकलने की कोशिश करें तो हम देखेंगे कि चट्टान की तरह दिखने वाली समस्याएं एक छोटे से पत्थर के सामान दिखने लगेंगी जिन्हे हम बडी ही आसानी से ठोकर मारकर अपनी ज़िंदगी से निकाल सकते हैं। और अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ सकते हैं।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 Jan 2018

👉 आज का सद्चिंतन 10 Jan 2018


👉 प्रत्येक परिस्थिति में प्रसन्नता का राजमार्ग (भाग 3)

🔶 किसी व्यक्ति में मित्रता का गुण होता है। मित्रता आनन्द देने वाली वस्तु है उससे मित्रता का गुण सीख लें। दूसरा व्यक्ति संयमी है उससे शरीर को सुदृढ़ बनाने और सौन्दर्य तथा यौवन बचाये रखने की धारणा पुष्ट करलें। एक व्यक्ति में और सब दुर्गुण हैं किन्तु वह स्वच्छ, सुथरा रहता है। यह गुण प्रसन्नता और प्रेरणा ग्रहण करने के लिये कम महत्वपूर्ण नहीं। मौन से मनःशक्तियों के संरक्षण का पाठ पढ़ लें तो वाणी विलास प्रिय व्यक्ति से विनोद और हास्य युक्त जीवन की सीख ले सकते हैं।

🔷 वेश-भूषा, रहन-सहन, रीति-रिवाज, संस्कार-संस्कृति, समाज-व्यवस्था, वर्णाश्रम-व्यवस्था, शासन पद्धति, नगर-ग्राम, शिक्षा-दीक्षा, इतिहास, भूगोल, स्मृति-कर्मकांड, उपासना, पर्व उत्सव, नदी, नाले, जंगल, पर्वत, खेत, खलिहान, परिपाटी प्रक्रिया, आशा विश्वास, मन्तव्य—मान्यताओं आदि में से ढेर से सद्गुणों का संचय कर हम अपनी मनोवृत्ति को सतोगुणी बना सकते हैं और आत्म-पुलक का शाश्वत सुख उपलब्ध कर सकते हैं।

🔶 जीवन की सफलता किस बात पर निर्भर है? इसका एक ही उत्तर है—अपनी भावनाओं पर। मनुष्य अपनी कल्पना से ही अपने आपको सफल अथवा विफल बनाता है। जैसी कल्पना की जाती है, अपने आस-पास उसी प्रकार की दृष्टि रच जाती है। कसाई की कल्पना जानवरों का वध करना होता है, उस तरह की अन्य क्रियायें और सहयोगी उसे अपने आप मिल जाते हैं। भेड़-बकरियां बेचने वाले, खाल और मांस खरीदने वाले, वध करने का स्थान और औजार सब कुछ उसकी इच्छा शक्ति जुटा देती है। यदि एक कसाई के लिये मनोवांछित सृष्टि जुटा लेना कुछ असम्भव नहीं होता तो उत्कृष्ट मनोभूमि द्वारा उत्कृष्ट वातावरण और उच्च सफलतायें प्राप्त कर लेना भी कोई असंभव बात नहीं है। केवल मनुष्य की मानसिक शक्ति का भलाई की दिशा में विकेन्द्रीकरण होना चाहिये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1971 पृष्ठ 33
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/February/v1.33

👉 Significance of Birthday (Last Part)

🔷 There are some occasions in human life, when given suggestions leave long-lasting impressions on human mind and not only this, they also inspire and compel the man to revisit his past life in order to overhaul the same with a bright future taking shape in mind. The birthday is one such day that facilitates the mind of that man to execute & implement the rules that he firmly takes that day for his life ahead. He is compelled to accept the presence and majesty of ‘SVA’ (the self) so that he gets a chance to live his life in such a way that leaves the dignity and pride of his own life intact.

🔶 Some occasions are there in a human life that proves to be important and jesting. The happiness on the face of a winner of wrestling, an award or gift or toys can easily be read. How much happy he looks and such happiness develops his physical and mental powers. We can help man develops his internal & outer life both by giving him pleasure and sensation. This way man enters into an enlightened life leaving behind ordinary dull life & this change proves to be important for him.
                                        
🔷 Let such occasion is available to everyone on the basis of birthday for the purpose of realizing the dignity, attaining happiness and preparing ground of self-realization. Self-realization is the biggest awareness of the life. To know about the self, to see the self is the biggest knowledge. BHAGWAN has repeatedly said in GEETA, ‘‘know who you are, see who you are, analyze who you are. Set yourself free and don’t degrade/underestimate it.’’  The doors to spiritual progress are opened with attainment of this awareness about the self. The birthday can be supposed to be the most important day for the purpose of thoroughly analyzing about the self. Finished, today’s session.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 ध्यान का दार्शनिक पक्ष (भाग 4)

🔶 तीन योग हैं- कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। प्रकाश के माध्यम से इन तीनों योगों को हृदयंगम करने के लिए मैंने आपको कहा है। भगवान का प्रकाश जब कभी शरीर में आएगा तो कर्मयोग के रूप में आएगा और आदमी कर्तव्यनिष्ठ होता हुआ दिखाई पड़ेगा। उसके लिए 'वर्क इज वरशिप' होगा। पूजा कर्म, श्रेष्ठ कर्म, आदर्श कर्म, लोकोपयोगी कर्म, मर्यादाओं से बँधे हुए कर्म सभी कर्मयोग के अंतर्गत आते हैं। जो हमें सिखाते हैं कि जब प्रकाश हमारे शरीर में आता है तो हमारे शरीर की प्रत्येक क्रिया को कर्मनिष्ठ होना चाहिए। परिश्रमी होना चाहिए। यह बताता है कि आदमी को जो प्रकाश का ध्यान करता है, उसे हरामखोर और आलसी नहीं होना चाहिए। चोर और हरामखोर मेरी दृष्टि से दोनों बराबर हैं।

🔷 महाराज जी हमारा बेटा बड़ा हो गया है और खूब कमाता-खाता है और हम तो अपनी मौज करते हैं। नहीं बेटे, कामचोर और चोर में तो कामचोर ही बड़ा होता है। मनुष्य के लिए यह सबसे बड़ी गाली है। कामचोर सबसे खराब आदमी है। नहीं गुरुजी हमको तो पेंशन मिलती है और हम मौज करते हैं। नहीं बेटे, हम तुझे मौज नहीं करने देंगे। जब तक जिंदा है, तब तक शरीर से तुझे कर्म करना पड़ेगा। अपने लिए रोटी खाने, पेट भरने को है, दूसरों के लिए तो नहीं है। उसके लिए कर। गुरुजी ! हमारे बेटे तो पढ़ गए और हम अब निश्चिंत हो गए। तेरे ही तो पढ़ गए समाज के बेटे तो नहीं पढ़े। चल रात को नाइट स्कूल चलाया कर और दूसरों के बच्चों को पढ़ाया कर।
 
🔶 इसलिए मित्रो, क्या करना पड़ेगा कि जब वह प्रकाश, जो मैंने जप के साथ-साथ करने के लिए बताया है, अगर वह आपके भीतर नसों में स्फूर्ति के रूप में आए तो जब तक आप जिंदा हैं, तब तक हम काम करेंगे, कर्मयोगी बनेंगे, मेहनत करेंगे, मशक्कत करेंगे, श्रेष्ठ काम करेंगे, कर्तव्यों का पालन करेंगे। जो हमारे लिए, हमारे समाज के लिए, देश के लिए, धर्म के लिए सबके लिए कर्तव्यों का बंधन बँधा हुआ है, इसका हम पालन करेंगे। अगर इस तरह की स्फूर्ति और नाड़ी अभ्यास बन जाए तो मैं समझूँगा कि आप कर्मयोगी हैं और आपने उस प्रकाश के ध्यान को जो मैंने बताया था उसे सीख लिया और उसका मकसद समझ गए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

सोमवार, 8 जनवरी 2018

👉 शासक और फल

🔶 वाराणसी के राजा ब्रह्मदत को अपने अवगुणों और दोषों के बारे में जानने की बहुत इच्छा थी। उसने राजभवन के अंदर रहने वाले लोगो से लेकर प्रजा के आम लोगो तक हर किसी से प्रश्न किये। किन्तु किसी को भी उस राजा में कोई त्रुटी नहीं दिखी।

🔷 राजा निराश हो गया। वो हिमालय की छोटी में पहुंचा। किसी घने जंगल के शांत और रमणीय इलाके में एक साधू का आश्रम था। राजा जब वंहा गया तो साधू ने उसका स्वागत किया और भोजन में उसे कंदमूल और फल भेंट किये। राजा मुग्ध होकर बोला महाराज इन फलों का स्वाद तो दिव्य है। ये फल इतने मीठे किस वजह से है। साधू ने सहज स्वर में जवाब दिए ये फल इसलिए इतने मीठे है क्योंकि शासक धर्मिनिष्ठ है इस पर राजा को भरोसा नहीं हुआ। राजा ने पूछा शासक अधर्मी हो तो क्या फल मीठे नहीं होते।

🔶 साधू ने कहा ‘नहीं वत्स फल ही क्या शर्करा घी तेल सब अपना स्वाद खो देते है अगर शासक अधर्मी हो जाये तो उनका रस सूख जाता है। इस पर राजा संतुष्ट तो नहीं हुआ लेकिन फिर भी साधू से विदा लेकर वापिस अपने महल पंहुचा उसके मन में वही बात घूम रही थी। उसने निर्णय करने की ठानी और प्रजा पर भयंकर अत्याचार शुरू कर दिया और अपना स्वाभाव भी क्रूर कर लिया।

🔷 कुछ दिनों बाद फिर से वह उसी साधू के पास पहुंचा और फिर उसी सत्कार के साथ साधू ने उसे फल भेंट किये तो राजा ने पाया कि फल अब उस भांति मीठे नहीं है जितने पिछली बार थे तो राजा ने ये बात साधू से कही तो साधू गंभीर हो गया।

🔶 साधू बोला तब तो अवश्य ही शासक पानी और अधर्मी हो गया है जो फलों ने अपना स्वाद खो दिया है क्योंकि ये उसी के अधर्म का परिणाम है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 9 Jan 2018


👉 प्रत्येक परिस्थिति में प्रसन्नता का राजमार्ग (भाग 2)

🔶 मधुमक्खी गुलाब के फूल पर बैठती है और आक के फूलों पर भी। जंगली करील से लेकर सेमर, कचनार, गुलबास, बेला, चमेली और कमल सबमें मधुमक्खी बैठती है। किसी में कांटे हैं या चुभन, कोई जंगली है या शहरी, किसी को लोग खाते हैं किसी को नहीं, यह न देखने वाली मधुमक्खी केवल पराग चूसने के ही मतलब से मतलब रखती है। अपनी इसी लगन के कारण मधुमक्खी थोड़े ही दिनों में मधु का छत्ता भर लेती है, कुछ आप पीती है कुछ संसार को बांट देती है।

🔷 मनुष्य को चाहिये कि वह सदा ही किसी न किसी भले काम, भले व्यक्ति और भलाई के गुण का चिन्तन किया करे, इससे उसके अन्तःकरण से अपने आप भलाई की शक्ति जन्मती है। उसे प्रेरणा और पुलक प्रदान करती है। इस तरह निरन्तर पुलकित रहने का जिसका स्वभाव बन जाता है, संसार में उसके लिये न तो कुछ अमंगल रह जाता है न अहितकर। उसके संसार में सर्वत्र अच्छाइयां ही अच्छाइयां, आनन्द ही आनन्द, प्रेम ही प्रेम, पुलक ही पुलक शेष रह जाती है। केवल अपने मन को गुण—ग्रहण की दिशा में लगा देने का चमत्कार मात्र है।

🔶 ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार चक्षु और मन क्रमशः मित्र और वरुण कहे गये हैं। चक्षु उपलक्षण से पंच ज्ञानेन्द्रियों का वाचक है। इनको संयत करके मन को शुद्ध भावों से उपेत करना वशिष्ठ का लक्षण है। वशिष्ठ का अर्थ श्रेष्ठ होना बताया गया है और लिखा गया है कि इस प्रकार व्यावहारिक दृष्टि से शुद्ध भावोपेत होना और केवल गुणों का संग्रह करते रहना वशिष्ठ होने का प्रथम लक्षण है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1971 पृष्ठ 32
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/February/v1.32

👉 Significance of Birthday (Part 2)

🔷 So much are the possibilities in this human life that if a good and proper use of this human life could be made, the man can excel both in material and in spiritual quarters of life. All doors of success are just open to him with only condition for a man being realization of the significance of his existence and that how precious thing he has in his possession. How much costly is our corporeal body, our brain and of course the immense specifications of temperament, action and merit induced within it, If these could be used properly and effectively. If we could not do that then even a diamond may be proved to be worthless lying idle in our hands.
                                       
🔶 The most important job in this world is to identify the dignity and the majesty of a man, as is the importance of identifying and finding out the preciousness of a diamond in hand because only then a exultation can emerge from within us to be benefitted by putting the same to a proper and good use.

🔷 The birthday provides us a day, an opportunity as well as a platform to exclusively think in this direction to evaluate the cost, the usefulness and the dignity of our life besides taking some purposeful decision in that direction. To achieve all these objects, the celebration of birthday of at least one member in the family, has been mandatory. Some shrewd ones may question this mandate. Only answer to such people is that it provides an enthusiastic and sentimental atmosphere facilitating conveyance of some important things.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 ध्यान का दार्शनिक पक्ष (भाग 3)

🔶 आत्मा और परमात्मा एक है। यह थोड़ा सा सीमाबद्ध है तो वह असीम है। यह अणु है और वह विभु है। यह मायाग्रस्त है तो वह मुक्त है। बस इतना ही फर्क है। अगर हम अपने आप को साफ कर लें तो हम उसको प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए हम प्रकाश का ध्यान करते हैं, भीतर वाले का ध्यान करते हैं। अपने लक्ष्य का ध्यान करते हैं, जीवन का ध्यान करते हैं तो गुरुजी आपने इसीलिए सूरज का ध्यान बता दिया है? हाँ बेटे, वह तो हमने प्रतीक बता दिया है। उसकी चमक देखकर अगर आप यह अंदाजा लगाते हों कि हमारे ध्यान में चमक आ जाती हैं या नहीं आती हैं अथवा आपके ध्यान में गायत्री माता आ जाती हैं, या नहीं आती हैं, तो उससे बनता-बिगड़ता नहीं है। उससे केवल यह बात साबित होती है कि आपके दिमाग की परिपक्व अवस्था आई कि नहीं।

🔷 प्रकाश से मेरा मतलब वह नहीं है जो आप समझते है। प्रकाश को अध्यात्म में जिस अर्थ में लिया गया है, उस अर्थ से मेरा मतलब है। प्रकाश 'डिवाइन लाइट' लेटेंट लाइट या जान के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। यह चमक के अर्थ में प्रयुक्त नहीं हुआ है। चमक का अर्थ ज्ञान है। जिस प्रकाश के लिए हमने कहा है, वह है जिसके लिए भगवान से हमने प्रार्थना की है 'तमसो मा ज्योतिर्गमय'। हे भगवान! हमको अंधकार की ओर नहीं प्रकाश की ओर ले चलिए। अध्यात्म में प्रकाश शब्द कहीं भी प्रयुक्त हुआ है, वहाँ ज्ञान के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
 
🔶 ध्यान के लिए जो हमने यह बताया कि आप प्रकाश का ध्यान किया कीजिए, तो कहाँ-कहाँ प्रकाश का ध्यान किया करें? अभी स्वर्ण जयंती साधना वर्ष में हमने आपको तीन जगह ध्यान करने के लिए कहा है। एक आप मस्तिष्क में ध्यान किया कीजिए। दूसरा अंतरात्मा में हृदय स्थान पर और तीसरा नाभि स्थान पर ध्यान किया कीजिए। हमारे तीन शरीर हैं और तीनों शरीरों के ये तीन केंद्र हैं। इन तीनों के भीतर प्रकाश चमकना चाहिए। प्रकाश हमारे तीनों शरीरों के भीतर प्रविष्ट होना चाहिए। इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ यह है कि प्रकाश जब हमारी नसों में आए, नाड़ियों में आए, शरीर में आए तो नाभि में होकर आए। नाभि में से होकर इसलिए कि माता और बच्चे का जो संबंध-सूत्र है, वह नाभि से जुड़ा होता है। इसलिए स्थूलशरीर का केन्द्र नाभि को माना गया है।

🔷 जिस प्रकार माता के शरीर में से उसका रक्त नाभि से होकर हमारे शरीर में आता था और दोनों का संबंध जुड़ा हुआ था, उसी प्रकार भगवान का प्रकाश नाभि में से होकर हमारे शरीर के भीतर आता है। जब वह प्रकाश आएगा, तब आपकी हड्डियाँ चमकेगी, रक्त चमकेगा, माँस चमकेगा। चमकने से मेरा मकसद यह है कि तब आपके भीतर कर्मनिष्ठा, स्फूर्ति, साहसिकता, श्रम के प्रति प्यार, कर्मों के प्रति प्यार, कर्मयोग के प्रति प्यार, कर्तव्य-परायणता के प्रति प्यार उभरेगा। यह कर्मयोग है। कर्मयोग शरीर का रोग है। प्रकाश का ध्यान करने वाला कभी खाली बैठ नहीं सकता। वह सतत सत्कर्मरत ही रहेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 12)

👉 परमसिद्धि का राजमार्ग

🔶 अपरिमित आनन्द और उल्लास से भरकर मैं घर लौटा। नित्य की ही भांति उस रात्रि भी मैं ध्यान के लिए बैठा। बस फर्क थोड़ा था, आज सद्गुरु के चरण मेरी ध्यानस्थ चेतना का केन्द्र थे। वे चरण कब अनन्त विराट् परब्रह्म बन गए पता ही नहीं चला। बस उसी रात मैंने जीवन की चिरप्रतीक्षित परमसिद्धि प्राप्त कर ली। उस दिन से माया का कोई भी परदा उस परमानन्दमय जगत् स्रष्टा की छवि को मेरे नेत्रों से ओझल नहीं कर सका है। यह कहते हुए स्वामी प्रणवानन्द का मुखमण्डल प्रसन्नता से दमक उठा। स्वामी योगानन्द लिखते हैं कि गुरु महिमा की यह कथा सुनकर मेरा भय भी नष्ट हो गया।
  
🔷 योगानन्द द्वारा कही गयी यह योगकथा गुरुचरणों की महिमा को प्रकट करती है। गुरुचरण ही अपने तात्त्विक रूप में परब्रह्म का स्वरूप है। लेकिन इसे जाना और समझा तभी जा सकता है- जब साधक अपनी गुरुभक्ति की साधना के शिखर पर आरूढ़ हो गया है। एक सन्त कवि ने इस तथ्य को एक पंक्ति में कहने की कोशिश की है- ‘श्री गुरुचरणों में नेह। साधन और सिद्धि है येह।’ अर्थात् गुरुचरणों में अनुराग साधना भी है और सिद्धि भी। साधना के रूप में इसका प्रारम्भ होता है, तो इसके तात्त्विक स्वरूप के दर्शन में इसकी सिद्धि की चरम परिणति होते हैं। हममें से अनेक गुरुपद अनुरागी यह जानना चाहेंगे की इस साधना की शुरुआत कैसे करें? तो इसका सरल उत्तर है कि गुरुचरणों के भाव भरे ध्यान से। भाव भरे ध्यान का मतलब इस अटल विश्वास से है कि सद्गुरु का स्थूल रूप ही और कुछ नहीं परब्रह्म का ही घनीभूत प्राकट्य है।
  
🔶 वही भक्तवत्सल भगवान् हमारे कल्याण के लिए शिष्यवत्सल गुरुदेव के रूप में प्रकट हुए हैं। बिना किसी शर्त के, बिना किसी मांग के, बिना किसी अधिकार के, स्वयं को उनके श्री चरणों में न्यौछावर कर देना ही गुरुचरणों की सच्ची सेवा है। इससे हमारे जन्म-जन्मान्तर के सारे पाप धुल जाते हैं और आत्मा का विशुद्ध स्वरूप निखरने लगता है। साथ ही अन्तर्चेतना में अयमात्मा ब्रह्म की अनुभूति प्रकट और प्रत्यक्ष हो जाती है। इस कथन में तर्कपूर्ण कल्पना का जाल नहीं, बल्कि असंख्य साधकों की साधनात्मक अनुभूति सँजोयी है। सद्गुरु के चरणों का प्रभाव एवं प्रताप ही ऐसा है। इसकी महिमा कथा का और अधिक विस्तार अगले मंत्रों में है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 23

👉 रोज भूखे सोते हैं 19 करोड़, फिर भी

बर्बाद हो रहा ₹244 Cr का खाना

🔷 देश ने भले ही मंगल ग्रह तक पहुंच बना ली हो लेकिन अब भी भारत की बड़ी आबादी को भूखा सोना पड़ता है। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि भारत में कम अनाज पैदा होता है, बल्कि यह जरूरतमंदों तक पहुंच ही नहीं पाता। युनाइटेड नेशन की फूड एंड एग्रिकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (FAO) ने इससे जुड़ी एक रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट में क्या है जानिए -
 

🔶 FAO ने रिपोर्ट में बताया है कि भारत हर साल 244 करोड़ रुपये का खाना बर्बाद कर देता है जो कि सालाना के हिसाब से 88,800 करोड़ रुपये बैठता है। वहीं दूसरी तरफ भारत में ही रोजाना 19 करोड़ चालिस लाख लोग भूखे रहते हैं।
 
 🔷 बर्बाद सामान में 21 मिलियन टन गेहूं संबंधी उत्पादन होता है। वहीं फसल कटाई के बाद होने वाला नुकसान एक लाख करोड़ रुपये के करीब बैठता है। कुल उत्पादित होने वाली खाद्य सामग्री का चालिस प्रतिशत हर साल बर्बाद हो जाता है।
 
 🔶 रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की जनसंख्या को खिलाने के लिए हर साल 225-230 मिलियन टन खाने की जरूरत है। वहीं 2015-16 में 270 मिलियन टन का उत्पादन हुआ था।

🔷 वैश्विक भूख सूचकांक में भारत की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। 119 देशों में भारत 100वें नंबर पर है। बता दें कि 2016 में भी एक रिपोर्ट आई थी। उसमें कहा गया था कि ब्रिटेन के लोग जितना खाना खाते हैं उतना भारतीय बर्बाद कर देते हैं।

रविवार, 7 जनवरी 2018

👉 कुछ तो लोग कहेंगे

🔷 अमेरिकन राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के विरोधी, अखबारों में जी-खोलकर उनकी बुराई करते थे। लेकिन, लिंकन इन बातों से विचलित नहीं होते थे और अपने काम मे जुटे रहते थे।

🔷 एक दिन उनके मित्र ने उनसे कहा, 'विरोधी लोग आपके खिलाफ चाहे अनेक ऊल-जलूल बातें अखबारों में प्रकाशित करवाते रहें, उनकी बातों का प्रत्युत्तर आपको भी तो देना चाहिए।

🔷 मित्र की बात सुनकर लिंकन मुस्कुराते हुए बोले, 'दोस्त यदि मैं अपनी आलोचनाओं का उत्तर देने लगूं तो दिनभर में केवल इसी काम को कर पाउंगा, मेरे कार्यालय में फिर कोई अन्य कार्य नहीं होगा। मेरा एक ही उद्देश्य है।

🔷 अपनी सारी योग्यता और शक्ति का उपयोग करते हुए ईमानदारी पूर्वक अपना काम करना। वह मैं करता हूं। और इस पद पर रहने की अंतिम घड़ियों तक करता रहूंगा।'

🔷 यदि में अंत में बुरा सिद्ध होता हूं, तो मैं भले ही लाख सफाई देता रहूं कि में सही था, मेरा रास्ता सही था कोई इस बात को नहीं सुनेगा और यदि में अंत में भला सिद्ध होता हूं तो मेरे विषय में जो प्रलाप किया जा रहा है, वह निश्चित रूप से अनर्गल सिद्द होगा। मुझे इस बात को लेकर न तो चिंता है और न ही भय।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 8 Jan 2018


👉 प्रत्येक परिस्थिति में प्रसन्नता का राजमार्ग (भाग 1)

🔷 मनुष्य जिस स्थिति में रहता है उसी स्थिति में उसे दो प्रकार की शक्तियां मिलती हैं। एक जो उसे प्रेरणा, प्रसन्नता प्रदान करती है और उसका कल्याण चाहती है। दूसरी उसे कष्ट देती है, पतन की ओर ले जाती है। एक शक्ति भलाई की है, दूसरी बुराई की। दोनों का संयोग ही मिलकर सृष्टि के रूप में दृष्टिगोचर हो रहा है।

🔶 यह शक्तियां ही चेतना रूप में मनुष्यों में भरी हुई हैं, उनका कोई स्पष्ट पृथक अस्तित्व नहीं है। संसार में जितने भी प्राणी हैं सभी में कुछ गुण और कुछ दोष रहते हैं। सर्वथा निर्दोष तो परमात्मा ही माना जाता है। शेष सभी में कुछ अंश भलाई है कुछ बुराई। किसी में गुणों का आधिक्य है किसी में बुराई का बाहुल्य, जिसे एकदम अवगुणों का अवतार ही माना जाता है कुछ न कुछ अच्छाइयां उसमें भी अवश्य होती हैं। कंस महा क्रूर शासक था, रावण का अत्याचार जगत विख्यात् है किन्तु दोनों ही पराक्रमी, पुरुषार्थी और साहसी थे। सिकन्दर दूरदर्शी था। हिटलर विचारवान था, चंगेज खां में और कुछ नहीं तो संगठन शक्ति थी। बुरे से बुरे व्यक्तियों में भी प्रेरणा और प्रसन्नता देने वाला कोई न कोई गुण अवश्य होता है। जिस प्रकार संसार में कोई भी व्यक्ति पूर्ण रूप से अच्छा नहीं, न पूर्णतः बुरा। संसार में पूर्ण कोई नहीं।

🔷 बुराई करनी हो, निन्दा करनी हो तो अपने ही बहुत से गुण खराब होंगे, कई बुरी आदतें पड़ गई होंगी, उनकी की जानी चाहिए पर गुणवान बनने का, सफलता प्राप्त करने का और प्रसन्नता की मात्रा बढ़ाने की—इच्छा हो तो हमारे विचार गुणों में, कल्याण करने वाले दृश्यों, सन्दर्भों और व्यक्तियों पर केन्द्रित रहने चाहिये। ऐसे व्यक्तियों और परिस्थितियों के प्रति हमारी विचारधारा केन्द्रित रहेगी तो गुण ग्राहकता हमारा स्वभाव बन जायेगा। हृदय शुद्ध और मन बलवान होता चला जायेगा। अच्छे गुणों और कार्यों को चिन्तन करना आत्म विकास के लिये हितकर ही होता है। अच्छे विचार ही मनुष्य को सफलता और जीवन देते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1971 पृष्ठ 32

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/February/v1.32

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.8

👉 Significance of Birthday (Part 1)

🔶 The life of a man is the biggest gift, BHAGWAN can offer. Also no other thing in treasure of BHAGWAN is as precious as a human life that has already been provided to a ZEEV. This precious thing comes out to be useful only when its usefulness is realized and not only this but also to properly put it to some good use. We, because of our ignorance, are unable to see its preciousness. Where does arise a question of putting to good use a thing of which value we have not found out? After all a person, ignorant of a piece of diamond he possesses, cannot be imagined caring about that for he thinks he possesses a piece of stone and not a diamond.
                                             
🔷 We suppose the life to be a useless thing and that it is a burden we have been laden with to bear. Innumerable persons are there who though live, yet in such a way as if some burden would have been put on them, whereas the reality is that they have been bestowed upon such a precious treasure, with which they can live a happy and meaningful life besides fulfilling the specific purpose of BHAGWAN with which he has sent us on this earth.

🔶 BHAGWAN has appointed us as his trustee of this wealth with many expectations to nourish and beautify the world-garden. He expects  us to show the world that we have put his wealth to good use to serve very that purpose. But we can’t do that simply because we remain all our life ignorant about how precious thing we have been offered to use.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 ध्यान का दार्शनिक पक्ष (भाग 2)

🔷 जिंदगी बाहर नहीं हमारे भीतर है और बुद्धि जिसकी वजह से हम रुपया कमाते हैं, सम्मान कमाते हैं, वह बाहर नहीं हमारे भीतर है जिसकी वजह से हम हर चीज कमा सकते हैं। भीतर हमें दिखाई नहीं पड़ता और हम कहते हैं कि हे भगवान! यह आपने क्या मखौल कर दिया मनुष्य के साथ कि बाहर की चीजों की जानकारी दे दी, पर भीतर की चीजों की नहीं दी। भीतर जो चीजें, संपत्तियाँ, विभूतियाँ, देवत्व और महानता दबी हुई पड़ी हैं, वह हमको दिखाई नहीं पड़तीं। हमको अपना बेटा दिखाई पड़ता है, संपत्ति दिखाई पड़ती है, यह और वह दिखाई पड़ता है और न जाने क्या-क्या दिखाई पड़ता है, पर हमको अपना भविष्य नहीं दिखाई पड़ता, आत्मा दिखाई नहीं पड़ती, परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता।

🔶 यहाँ तक कि हमारे भीतर वाले कलपुर्जे तक दिखाई नहीं पड़ते। आँखें तक दिखाई नहीं पड़ती। भीतर की तो बात कौन कहे बाहर की भी दिखाई नहीं पड़ती। अच्छा बताइए आप की नाक कैसी है? भौहें कैसी है? पलकें कैसी हैं? जब आपको बाहर की चीजें ही नहीं दिखती, केवल-इधर की चीजें ही दिखाई देती हैं तो फिर भीतर की कैसे दिखेंगी? इसीलिए गिरेबान में मुँह डाल करके जब हम भीतर तलाश करते हैं तो उसको ध्यान कहते हैं। अपने भीतर झाँकने का नाम ही ध्यान है।
 
🔷 ध्यान किसका किया जाता है? स्वयं का या भगवान का? बेटे स्वयं तो क्या और भगवान तो क्या दोनों एक ही हैं। स्वयं का विकसित रूप ही भगवान है। हमारा विकसित रूप जो है-'शिवोहं' है 'सच्चिदानंदोहं' 'तत्त्वमसि' 'अयमात्माब्रह्म' 'प्रज्ञानंब्रह्म' है। वेदांत के यह सारे के सारे महावाक्य यह बताते हैं कि हमारा परिष्कृत रूप भगवान है। हमारा भगवान हमारा परिष्कृत रूप ही है। डाइमण्ड क्या है? डाइमण्ड और कोयले में कोई खास फर्क नहीं है। एकाध इसके एलीमेंट्स और एकाध इसके भीतर के जो जर्रे हैं, उनमें फर्क पड़ता है, अन्यथा हीरा और कोयला एक ही हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 11)

👉 परमसिद्धि का राजमार्ग

🔷 सद्गुरु के चरणों की महिमा का बोध कराने वाली यह अनुभूति कथा महान् गुरु योगिराजाधिराज श्री श्यामाचरण लाहिड़ी और उनके विभूतिवान् शिष्य स्वामी प्रणवानन्द के बारे है। स्वामी प्रणवानन्द ने स्वयं अपने मुख से अपनी इस अनुभूति को योगानन्द को सुनाया था। उन्होंने उनसे कहा- गुरु की कृपा कितनी अमूल्य होती है, वह सुनो। मैं उन दिनों नित्यरात्रि को आठ घण्टे ध्यान किया करता था। उस समय मेरा समूचा दिन अपने रेलवे कार्यालय में बीत जाता था। वहाँ मुझे अपने क्लर्क होने का दायित्व निभाना पड़ता था। उन दिनों मेरे लिए यह ड्यूटी बड़ी थकाऊ और उबाऊ थी। फिर भी मैं बड़े ही मनोयोग पूर्वक हर रात को ध्यान करता था। प्रत्येक रात्रि को आठ घण्टे की अविराम साधना मेरी जीवनचर्या का अनिवार्य और अविभाज्य अंग बन गयी।
  
🔶 इसके अद्भुत परिणाम भी मेरे जीवन में आए। विराट् आध्यात्मिक अनुभूति से मेरी समूची अन्तर्चेतना उद्भासित हो उठी; परन्तु अभी भी उस अखण्ड सच्चिदानन्द और मेरे बीच एक झीना परदा हमेशा बना रहता था। यहाँ तक कि अतिमानवी निष्ठा के साथ साधना करने के बावजूद भी मैं ब्रह्मतत्त्व से एकाकार नहीं हो सका। इस बारे में किए गए मेरे सारे प्रयास पुरुषार्थ, निष्फल गए। तभी मुझे ध्यान आया कि साधक के लिए सद्गुरु चरणों की कृपा ही परमपूर्णता का परिचय पर्याय बनती है। यही सोचकर एक दिन सायंकाल मैंने लाहिड़ी महाशय के चरणों का आश्रय ग्रहण किया। उनके आशीष की आकांक्षा के साथ मेरी प्रार्थना चलती रही, ‘गुरुदेव, मेरी ईश्वर में समा जाने की आकांक्षा इतनी तीव्र वेदना का रूप धारण कर चुकी है कि उस परम प्रभु का प्रत्यक्ष दर्शन किए बिना मैं अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकता।’
  
🔷 लाहिड़ी महाशय हल्के से मुस्कराए और बोले, भला इसमें मैं क्या कर सकता हूँ। तुम और गहराई से ध्यान करो। मैने उनके चरण पकड़कर बड़े ही करुण भाव से पुकार की, हे मेरे प्रभु, मेरे स्वामी, मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ। आप इस भौतिक कलेवर में मेरे सम्मुख विद्यमान हैं। अब मेरी प्रार्थना को स्वीकारें, और मुझे आशीर्वाद दें कि मैं आपका आपके अनन्त रूप में दर्शन कर सकूँ। प्रसन्न भाव से शिष्य वत्सल परम सद्गुरु लाहिड़ी महाशय ने अपना हाथ आशीर्वाद मुद्रा में उठाते हुए कहा, जाओ वत्स, अब तुम जाओ और ध्यान करो। मैंने तुम्हारी प्रार्थना परमपिता परमेश्वर परब्रह्म तक पहुँचा दी है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 22

शनिवार, 6 जनवरी 2018

👉 भगवान सद्बुद्धि दें

🔷 एक संत थे। वह प्रातः काल अपने शिष्यों के बीच बैठकर प्रभु से प्रार्थना किया करते थे। वह सबसे पहले पूरी मानव जाति के कल्याण की प्रार्थना करते और इसके बाद हाथ जोड़कर कहते कि, हे प्रभु मेरे परमपिता, आप गलत कार्य करने वाले लोगों को सद्बुद्धि दें। उनको सही रास्ता दिखाएं ताकि वो गलत कामों को छोड़कर दया का भाव जाग्रत करें।

🔶 उनकी यह प्रार्थना एक शिष्य रोज सुनता एक दिन उसने पूछा, संत तो अच्छे लोगों के कल्याण के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं। गुरुदेव इस प्रार्थना का क्या अर्थ है?

🔷 संत मुस्कुराए और बोले, 'वत्स अच्छे काम करने वाले लोग तो स्वतः भगवान की दया और स्नेह के अधिकारी बन जाते हैं।' अच्छे लोग अच्छे कर्म करके औरों को भी अच्छा बनाते रहते हैं।

🔶 प्रार्थना तो बुरे लोगों को सद्बुद्धि प्रदान करने के लिए करनी चाहिए, जिससे वे गलत कामों को छोड़कर ईश्वर भक्ति में मन लगाएं और लोगों पर दया करें।

👉 आज का सद्चिंतन 7 Jan 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 Jan 2018


👉 मन का भार हल्का रखिये (अन्तिम भाग)

🔷 काम करते समय आपको जब भी निराशा, बोझ या घबराहट लगा करे, उस समय अपने आत्म-विश्वास को जगाने का प्रयत्न किया कीजिये। आध्यात्मिक चिन्तन किया कीजिये। आप यह सोचा करिये कि आप भी दूसरों की तरह एक बलवान् आत्मा हैं, आपके पास शक्तियों का अभाव नहीं है। अभी तक उनका प्रयोग नहीं किया है इसीलिये भय, संकोच या लज्जा आती है। पर अब आपने जान लिया है कि आपकी भी सामर्थ्य कम नहीं है। आप निर्धन परिवार के सदस्य नहीं, वरन् परमात्मा के वंश में उसकी उत्कृष्ट शक्तियाँ लेकर अवतरित हुए हैं फिर आपको घबराहट किस लिये होनी चाहिये?

🔶 जब भी कभी आपको कोई मानसिक भय, उलझन या निराशा उत्पन्न हो, आप कुछ देर के लिये एकान्त में चले जाया कीजिये। कल्पना में शुभ और पौरुष पूर्ण चित्र बनाया कीजिये। असफलता की बात मन से जितनी दूर भगा देंगे, उतनी ही आपके अन्दर रचनात्मक प्रवृत्तियाँ जागृत होंगी और आपका जीवन सुख-सुविधाओं से पूर्ण होता चलेगा।

🔷 प्रत्येक कार्य शान्ति और स्थिरतापूर्वक किया कीजिये आप महान् आत्मा हैं, आपका जन्म किन्हीं महान् उद्देश्य की पूर्ति के लिये हुआ है। बड़ी सफलता के लिये बड़ा साहस चाहिये। वह साहस आप में सोया है, उसे जागृत करना आपका काम है। आप इस लक्ष्य को समक्ष रखकर शुभ कल्पनाएं किया कीजिये और मन को भय घबराहट तथा निराशा आदि के बोझ से मुक्त रखा कीजिये आपका मन हल्का रहे तो उसमें से रचनात्मक स्रोत फूट पड़ें और आपको सब तरह की सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण कर दें ऋषि की इस प्रार्थना में बड़ा बल हैः—

🔶 अपेहि मनसस्पतेऽप क्राम परश्चर। परो निऋत्या आ चक्ष्व बहुधाजीवनोमनः॥

🔷 अर्थात्- “मन को अपवित्र करने वाले बुरे विचारों वाले बोझ मुझसे दूर रहें। मेरा चित्त कभी मलिन न हो। मेरी अन्तरात्मा निर्भय और मेरा मन शुभ विचारों वाला हो।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.7

👉 Building a Person, his Family and his Society (Last Part)

🔶 The body is not all in all. The requirements of body alone are not all about. Sense-organs are not all about. Yearning & desire of mind alone is not all about. Somewhere a soul is also within and if it is so then believe this ingredient of life too has some demands to be fulfilled, kindly pay your attention to that also. The soul too has a hunger and a thirst but immense & infinite are its compliments. Plants, trees provide us greenery, shadow and air needed for life.

🔷 They also provide us fruits and flowers; but don’t they require fertilizer, water and care? What will you expect of them if you do not bother about care, water and fertilizer needed by them? In the same way ZIWATMA too is like a plant and tree requiring its dose. What kind of dose it demands?

🔶 Didn’t I request you that you must run activities associated with person building, family building and society building in a progressive manner heading onwards. Yes it is what the soul requires. Finished, today’s session

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 ध्यान का दार्शनिक पक्ष ( भाग 1)

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

🔷 साधना स्वर्ण जयंती वर्ष में हम आपको गायत्री उपासना के साथ-साथ विशेष रूप से जो शिक्षण देते हैं, वह ध्यान का शिक्षण है। उपासनाएँ दो हैं- नाम और रूप की उपासनाएँ। नाम और रूप के बिना उपासना हो नहीं सकती। यह दो यूनीवर्सल उपासनाएँ हैं। किसी भी मजहब में चले जाइए व्यक्ति नाम जरूर ले रहा होगा। मुसलमान तसबीह पर नाम ले रहा होगा। ईसाई पादरियों को आप माला जपते हुए देखेंगे। आर्यसमाजी प्रकाश का ध्यान कर रहे होंगे। अन्य अमुक तरह का ध्यान कर रहे होंगे। नादयोग वाले कान में आने वाली आवाज का ध्यान कर रहे होंगे। बहरहाल ध्यान जरूर करना पड़ता है।

🔶 ध्यान के बिना गति किसी की नहीं है। इसीलिए हमने कहा है कि जप के साथ-साथ आप ध्यान किया कीजिए। स्थूल ध्यान मूर्तिपूजा के माध्यम से होता है, तसवीरों के माध्यम से होता है, क्योंकि मनुष्य का मानसिक विकास इतना नहीं हो पाया है कि वह बिना किसी फोटोग्राफ के, बिना किसी मूर्ति के किसी चीज का ध्यान कर सके, लेकिन जब वह विषय पक्का हो जाता है, तब फिर मूर्ति की कोई खास जरूरत नहीं रह जाती। तब हम अपने भीतर बैठे हुए भगवान का साक्षात्कार कर सकते हैं। उसका ध्यान कर सकते हैं।
 
🔷 ध्यान का क्या मतलब है? ध्यान का मतलब है कि हमारे जीवन के दो पक्ष हैं। एक पक्ष वह है जो बाहर फैला हुआ पड़ा है। हमारे कानों के सूराख बाहर को हैं और हमारी आँखों के सूराख बाहर को हैं। हम बाहर को चीजों को देख सकते हैं और बाहर कौन बैठा हुआ है, कौन जा रहा है, यह भी बता सकते हैं। बाहर की चीजें हमको दिखाई पड़ती हैं किंतु भीतर की चीजें हमको बिलकुल दिखाई नहीं पड़ती। तो क्या भीतर कोई चीज नहीं है? बेटे असल में जो कुछ भी चीज है, वह भीतर ही है बाहर नहीं है बाहर केवल दिखाई पड़ती हैं, पर असल में हर चीज भीतर है। जिन्दगी कहाँ है?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 10)

👉 परमसिद्धि का राजमार्ग

🔷 गुरुगीता के महामन्त्र साधना जीवन के महासूत्र हैं। इन्हें अपनाकर, इनकी साधना करके साधक का अध्यात्म राज्य में प्रवेश सुनिश्चित है। पर ध्यान रहे गुरुगीता के इन महामन्त्रों की साधना करने का मतलब कतिपय क्रियाओं अथवा कर्मकाण्डों को कर लेना भर नहीं है। इनकी साधना करने का अर्थ है—उस भावदशा में अपनी सम्पूर्णता एवं समग्रता से जीना, जिसका कि ये महामन्त्र बोध कराते हैं। पिछले मंत्र में गुरुतत्त्व के बारे में बताया गया है कि परम गुरु भगवान् सदाशिव के उन वचनों को किस तरह आत्मसात् किया जाए, जिसमें उन्होंने कहा था कि गुरुतत्त्व ही साधक के जीवन का सार सर्वस्व है। इसके अभाव में यज्ञ, व्रत, तप, दान, जप और तीर्थ अपना अर्थ खो देते हैं। यही नहीं अपनी प्रबुद्ध आत्मा और सद्गुरु भिन्न नहीं हैं। ये दोनों एक ही हैं, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। इस तत्त्व के सत्य को जानने से ही साधक के जीवन में सत्य ज्ञान का उदय होता है।

🔶 गुरुतत्त्व की इस कथा को आगे बढ़ाते हुए देवाधिदेव भगवान् महादेव आदिमाता पार्वती से कहते हैं-

सर्वपापविशुद्धात्मा श्रीगुरोः पादसेवनात्।
देहीब्रह्मभवेद् यस्मात् त्वत् कृपार्थं वदामि ते॥ ११॥
  
🔷 सद्गुरु के चरणों की सेवा से साधक सारे पापों से मुक्त होकर विशुद्धात्मा हो जाता है। (भगवान् शिव, माता पार्वती से कहते हैं, यही नहीं देवि!) मैं तुम्हें कृपापूर्वक बता रहा हूँ, देहधारी जीव ब्रह्मभाव को उपलब्ध हो जाता है।

🔶 गुरुचरणों की महिमा के बारे में कहे गए, भगवान् महादेव के ये वचन साधकों के जीवन का सम्पूर्ण सत्य है। समस्त सृष्टि का आध्यात्मिक इतिहास साक्षी है कि अनेकों बार इस महामन्त्र में निहित सत्य को अपने साधना जीवन में खरा प्रमाणित किया है। महान् साधकों ने दुर्लभतम ब्रह्मतत्त्व का बोध इस महामन्त्र की साधना से पाया है। ऐसी सैकड़ों, हजारों और लाखों घटनाओं में हम यहाँ केवल एक घटना की चर्चा कर रहे हैं। इसकी चर्चा विश्वविख्यात महान् योगी स्वामी योगानन्द ने ‘योगीकथामृत’ में भी की है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 21

शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

👉 वासना की परत

🔷 एक धनी व्यक्ति किसी फकीर के पास गया और कहने लगा कि, 'मैं प्रार्थना करना चाहता हूं, लेकिन तमान कोशिशों के बावजूद प्रार्थना नहीं होती। वासना बनी रहती है। चाहे जितना आंख बंद कर लूं लेकिन परमात्मा के दर्शन नहीं होते।' इसीलिए आप बताइए कि मैं क्या करूं? क्या कारण है इसका?

🔶 फकीर उस धनी को एक खिड़की के पास ले गया जिसमें कांच लगे हुए थे। उसके पार वृक्ष, बादल और सूरज सभी का दर्शन संभव था। फकीर उसे फिर दूसरी खिड़की पर ले गया। जिसमें चांदी की चमकीली परत लगी हुई थी। यहां लाकर फकीर ने धनी व्यक्ति ने पूछा, चांदी की चमकीली परत और कांच में कुछ में तुम क्या अंतर पाते हो ?

🔷 धनी ने बताया चमकीली परत पर सिवाय खुद की शक्ल के कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। बाहर की दुनिया तो एक सिरे से गायब है।

🔶 फकीर ने समझाया, 'जिस चमकीली परत के कारण तुमको सिर्फ अपनी शक्ल दिखाई दे रही है वह तुम्हारे मन के चारों तरफ भी है। इसीलिए तुम ध्यान में जिधर भी देखते हो केवल खुद को ही देखते हो। जब तक तुम्हारे ऊपर वासना की चांदी रूपी परत है कुछ दिखाई नहीं देगा इसीलिए इस परत को हटाना होगा। अगर तुम ऐसा करते हो तो तुम्हें प्रार्थना करने में कभी कोई परेशानी नहीं होगी।

👉 आज का सद्चिंतन 6 Jan 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 Jan 2018


👉 मन का भार हल्का रखिये (भाग 3)

🔷 जीवन में उदासी, खिन्नता एवं अप्रसन्नता के वास्तविक कारण बहुत कम ही होते हैं, अधिकाँश का कारण घबराहट से उत्पन्न भय ही होता है। मनुष्य नहीं जानता कि वह इससे अपनी शारीरिक तथा मानसिक शक्तियों का कितना बड़ा भाग व्यर्थ गँवाता रहता है? जिन्होंने जीवन में बड़ी सफलताएं पाई हैं, उन सबके जीवन बड़े सुचारु, क्रमबद्ध और सुव्यवस्थित रहे हैं। जिनके जीवन में विश्रृंखलता होती है, उनके पास सदैव “समय कम होने” की शिकायत बनी रहती है फिर भी अन्त तक कुल मिलाकर एक-दो काम ही कर पाते हैं, पर जिन लोगों ने विधि-व्यवस्था से, धैर्य से चिन्ता-विमुक्त कार्य सँवारे उन्होंने असंख्य कार्य किये। इतनी सफलतायें अर्जित कीं, जो सामान्य व्यक्ति के लिये चमत्कार जैसी लग सकती हैं।

🔶 यह भी संभव है कि आपकी दुर्बलता पैतृक हो। आप यह अनुभव करते हों कि जिस परिवार में पैदा हुए हैं, वहाँ की परिस्थितियाँ उतनी अच्छी नहीं थीं। उस घर के लोग असफल, निराश, निर्धन, अपढ़ या किसी अन्य बुराई से ग्रसित रहे हैं और उनका प्रभाव आपके संस्कारों पर भी पड़ा है। पारिवारिक जीवन का व्यक्ति के जीवन पर निःसंदेह बहुत प्रभाव होता है किन्तु अपने मनोबल को ऊँचा उठाकर गई-गुजरी स्थिति में भी आशातीत सफलतायें प्राप्त की जा सकती हैं।

🔷 कदाचित आप में ऐसी कमजोरियाँ हों, जिनके कारण आपको घबड़ाहट आती हो। उन कमियों पर गम्भीरतापूर्वक विचार कीजिये। उन्हें अपने माता-पिता, सहपाठियों मित्रों से प्रकट कीजिये और उनसे सहायता लीजिये। जिन लोगों ने छोटी अवस्थाओं से बढ़कर बड़े कार्य किये हों, उनके जीवन चरित्र पढ़िये। अपनी मानसिक कमजोरियों को दूर करने के लिये अपने सहृदय अभिभावकों और मित्रों के प्रति आपका जीवन एक खुली पुस्तक की तरह होना चाहिए, जिसका हर अच्छा-बुरा अध्याय पाठक आसानी से समझ सकता हो। आप अपनी कमजोरियों का हल औरों से पूछिये और उन्हें दूर करने का प्रयत्न किया कीजिये। अब तक आप आत्म-प्रशंसा के लिये अधीर रहते रहे, अब आप आत्मलोचन से प्रसन्न हुआ करिये, तो आपका जीवन प्रतिदिन निखरता हुआ चला जायगा। उसमें शक्ति , साहस और सफलता की कमी न रहेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.7

👉 Building a Person, his Family and his Society (Part 2)

🔶 These three are such jobs that if you could do, must be understood that you have begun taking steps to develop self-life and satiate the hunger of soul. Otherwise obviously you have been living and dying for the body, only pleasure of your organs have so far been your requirements and desires. Only the body has been your ISHT-DEV (a god we target to satiate). Only worldly illusions and attachments have so far been your fantasies. Is not so that all your life so far has been expended in these fantasies, if not then tell me in what else?

🔷 Now please oblige. Pursue simple life-high thinking. Pursue simplicity, simplicity, simplicity and an economical life-style. Much of your concerns will be addressed automatically if you adopt these principles in your life. Much of your time will be saved with you and you will be able to find enough time to address any issue touching your life otherwise your personal ambitions spread over like earth and sky will not let you to satiate your own issues what to talk of issues of family and society. Your own earning may not be sufficient to meet demands unnecessarily grown compelling you to earn through undesirable ways.

🔶 You will then find it essential to under weigh commodities, to seek unsolicited support and to cheat others and to ask loans from others. I mean to say that then you may be doing the meanest of mean jobs giving example of general scenario. Then you will be put to such a state of circumstances that when you cannot reduce your yearning, cannot control undue ambitions of material expenditure and of pomp-show, how you will be able to think about requirements of your soul? Where is the question of rise of soul in such a scenario? Therefore consider your soul also.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 धर्मतंत्र का दुरुपयोग रुके (अन्तिम भाग)

🔷 मंदिरों को अगर ठीक तरीके से काम में लाया जा सके और उनमें लगी पूँजी को ठीक तरीके से इस्तेमाल किया जाता रहे और इन दोनों का उपयोग लोकमंगल के लिए किया जाता रहे। उनमें ऐसे पुजारियों की, कार्यकर्ताओं की नियुक्ति की जा सकती हो, जो अपना एक-दो घंटे का समय पूजा-पाठ में लगाने के बद बचा हुआ सारा समय समाज को ऊँचा उठाने में लगाएँ, तो मैं यह विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि सरकार और दूसरी संस्थाओं के द्वारा जो लंबे-लंबे प्लान, योजनाएँ बनती हैं धन लगाती हैं, कार्यकर्ता नियुक्त करती हैं, फिर भी सारी योजनाएँ असफल हो जाती हैं, उसकी तुलना में यह योजना इतनी बड़ी, इतनी महत्त्वपूर्ण इतनी मार्मिक और सार्थक है कि हम राष्ट्र को पुनः उसके शिखर पर पहुँचा सकते हैं।

🔶 इसके लिए हमें केवल मंदिरों की दिशाएँ मोड़ने की जरूरत है। लोगों को सपने की जरूरत है, प्रचार करने की जरूरत है, धमकाने की जरूरत है। अगर ये काबू में न आते हो, तो घिराव करने से लेकर बहिष्कार करने तक की जरूरत है। यह समझाने की जरूरत है कि इस धन का और इमारतों का हम अपव्यय नहीं होने देंगे। मंदिरों को हम अंधश्रद्धा का केंद्र नहीं बनने देंगे। हम धर्मभीरुता का पोषण करने वाले केंद्र के रूप में नहीं, वरन इन्हें धर्म की स्थापना का केंद्र बनाएँगे। यदि इन मंदिरों को धर्म की स्थापना का केंद्र बनाया जा सका, तो राष्ट्र की महती आवश्यकता पूरी की जा सकती है। तब नया युग लाने में, नया समाज बनाने में, समाज की विकृतियों को दूर करने में और एक समर्थ राष्ट्र-समर्थ समाज बनाने के लिए इतने बड़े साधन हमारे हाथ सहज ही लग सकते है। इन बने-बनाए साधनों को विवेकशील को अपने अधिकार में, कब्जे में लेना ही चाहिए और उनको वह दिशा देनी चाहिए, जिससे कि भगवान वास्तव में प्रसन्न हों।

🔷 भगवान की जो सद्वृत्तियाँ इस विश्व में फैली हुई हैं, जिनसे कि शांति आती है और धार्मिक-भावना की वृद्धि होती है और समाज समृद्ध होता है, उन भावनाओं को आगे बढ़ाने के लिए मंदिरों को केंद्र बनाया ही जाना चाहिए ताकि वास्तविक भगवान अपनी वास्तविक पूजा को देखकर प्रसन्न हो जाए और भक्ति करने, पूजा पाठ करने का उद्देश्य लोगों को समक्ष आ सके और लोग उसका समुचित फायदा उठा सकें। यह करने को बहुत अधिक आवश्यकता है और हमको करना चाहिए। मंदिरों को जनजागरण का केंद्र बनाया जाना चाहिए, उनका कायाकल्प किया जाना चाहिए। इतना करना यदि संभव हो गया, तो समझना चाहिए कि हमने लोक मंगल के क्षेत्र में एक बहुत बड़ी मंजिल पूरी कर ली और बहुत बड़े साधनों को हमने अपने आप इकट्ठा कर लिया।

ॐ शान्तिः!

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 कभी कभी एक अच्छाई भी जीवन को बदल जाती है

🔷 एक नगर का राजा बड़ा ही तामसिक प्रवृत्ति का था और उस राजा का अधिकाँश समय निद्रा और भोग विलास मे ही व्यतीत हो जाता था!

🔶 पर उसके जीवन मे एक बड़ी अच्छाई थी की वो जब तक गौ माता को अपने हाथों से रोटी न दे देता तब तक वो चाहे भूखा मर जाता पर कुछ भी ग्रहण नही करता था!

🔷 एक बार शिकार खेलते खेलते घनघोर जंगल मे जा पहुँचा उसके साथ उसके कुछ साथी भी थे पूरी रात वो जंगल मे इधर उधर भटकते रहे पर रास्ता न मिला!

🔶 फिर वो उसी जंगल मे सो गये जब सुबह हुई तो चलते चलते बहुत दुर निकल गये और सभी भुख से व्याकुल थे उधर से कोई सन्तों का दल आ रहा था सभी उनके पास पहुँचे सन्तों के पास खाने की कुछ सामग्री थी तो सन्तों ने उन्हे खाने को दिया पर राजा ने कहा हॆ महात्माओं मेरे जीवन मे अनेक दुर्गुण है पर मेरा एक नियम है की जब तक मैं अपने हाथों से गौ माता को रोटी न खिलाऊँ तब तक मैं कुछ ग्रहण नही करूँगा और फिर वो सभी जैसे तैसे अपने नगर पहुँचे फिर राजा ने गौ माता को रोटी खिलाई और फिर स्वयं ने भोजन ग्रहण किया!

🔷 और इस दिन के बाद राजा को रोज एक स्वपन आने लगा फिर राजा किसी पहुँचे हुये सन्त के पास गये और राजा ने कहा हॆ महात्मन मैं रोज एक स्वपन देखता हुं की तीन व्यक्ति घोडे के साथ चल रहे है जिसमे पहला व्यक्ति घोड़े पर बैठकर आनन्दमय मुद्रा मे जा रहा है और वो घोड़े को कोडो से पिट रहा है और दूसरा जो है वो घोड़े पर बैठा है पर वो नीचे गिरता है फिर घोड़े पर बैठता है और घोड़े की कौडे से पिटाई करता है और तीसरा जो व्यक्ति है उसे घोड़े खींच रहे है और वो लहूलुहान हो रहा है कभी घोड़ा  इधर भगाये तो कभी उधर भगाये और घोड़ा भी रो रहा है और वो व्यक्ति भी रो रहा है।

🔶 पर सबसे बड़े आश्चर्य की बात ये है की जिन घोडो की पिटाई हो रही है वो बड़े ही आनंदमुद्रा मे चल रहे है और वो घुड़सवार भी आनन्द मे है और जो कभी नीचे गिरता कभी वापिस बैठता वो थोड़ा सा दुःखी होते है पर जैसे ही घोड़े को कौडे लगाता है घोड़ा और घुड़सवार दोनो खुश हो जाते है और तीसरा जो है घोड़े को बहुत ही लाड़प्यार से रख रहा है पर घोडा भी दुःखी और घोड़ेवाला भी दुःखी है ये क्या रहस्य है देव आप मुझ पर दया कीजिये और समझाये नाथ!

🔷 महात्माजी ने कहा हे राजन तीन तरह की प्रवर्तियां और तीन तरह के व्यक्ति है। सात्विक, राजसिक और तामसिक जिनके जीवन मे सात्विकता की प्रधानता है वो संयम रूपी कौडे से इन्द्रिय रूपी घोडो की पिटाई करते है और जो इन्द्रियों पर राज करते है वही आनन्द मे है घोड़ा और घुड़सवार दोनो ही आनन्द मे है!

🔶 दूसरे वो है जो इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने की पूरी पूरी कोशिश कर रहे है और वो भी संयम रूपी कौडे से पिटाई कर रहे है! और तीसरे वो जिनके जीवन मे तामसिकता प्रधान है जो भोग और विलास मे डूबे हुये है इंद्रियों ने उन्हे अपना गुलाम बना रखा है और ऐसे लोग रोते रोते ही चले जाते है!

🔷 राजा - क्षमा हॆ नाथ पर मैं तो एक तामसिक प्रवर्ति का मानव हुं और ऐसा दिव्य स्वपन मुझे कैसे आया?

🔶 महात्मा जी - हॆ राजन आपने जो गाय को रोटी देकर फिर कुछ खाने का जो नियम बना रखा है और परीक्षा काल मे भी जब आप अपने नियम के प्रति अडिग रहे तो श्रीभगवान ने आप पर दया करके आपको बार बार ये स्वपन दिखाया है!

🔷 महात्मा जी ने राजा को एक पाठ पढाया।

देखना इन्द्रियों के न घोड़े भगे
इनपे दिन रात संयम के कौडे पड़े
मन को विषयों से तुम हटाते चलो
हर दिन और हर पल हटाते चलो
कृष्ण गोविन्द गोपाल गाते चलो
साधना- मार्ग पे आगे बढ़ते चलो
कृष्ण गोविन्द गोपाल गाते चलो,
राह मे आयेगी बाधायें बहुत
पर यु हार मान के रुकना कही
बहती नदी की तरह तुम लड़ते चलो
कृष्ण गोविन्द गोपाल गाते चलो
देखना इन्द्रियों के न घोड़े भगे
इन पे दिन रात संयम के कौडे पड़े!!

उस दिन से राजा ने जीवन को सात्विकता की ओर मोड़ दिया!

🔷 मित्रों राजा था तो तामसिक पर उसने अथक प्रयासों से पूरे जीवन को बदलकर रख दिया क्योंकि कोशिश करने वालो की हार नही होती!

🔶 नियम के बिना कुछ नही है जीवन मे एक सारगर्भित नियम जरूर बनाना और उस नियम को कभी भंग मत होने देना फिर देखना एक दिन वो हमारे बन्द भाग्य के दरवाजे कैसे खोलता है!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 Jan 2018

👉 आज का सद्चिंतन 5 Jan 2018


👉 मन का भार हल्का रखिये (भाग 2)

🔷 अपना क्रम अपनी व्यवस्थायें ठीक रखिये तो आप पायेंगे कि घबराहट के सारे कारण निराधार हैं। आप अपना काम ठीक रखिये, आपको कोई नौकरी से नहीं निकालेगा। दुकान पर रोज बैठते हैं, तो खाने की क्या चिन्ता? दूसरों की बच्चियों की शादियाँ होती हैं,फिर आप की बच्ची कुमारी थोड़ी ही बैठी रहेगी। लड़का स्वस्थ और सदाचारी मिल जाय तो निर्धनता की घबराहट क्यों हो? आप अपनी व्यवस्था के साथ अपना दृष्टिकोण ठीक रखिये, आपकी सारी कठिनाइयाँ अपने आप हल होती रहेंगी।

🔶 घबड़ाना तो उन्हें चाहिए, जो हाथ पर हाथ रखे बैठे रहते हैं। कर्मशील व्यक्ति के लिये असफलता की आशंका नहीं होनी चाहिए।

🔷 कार्य करते हुए मानसिक असंतुलन रखना एक बड़ी कमजोरी है। इसी से सारी परेशानियाँ पैदा होती हैं। मन का झुकाव कभी इस ओर , कभी उस ओर होगा तो आप कभी एक काम हाथ में लेंगे और वह पूरा नहीं हो पायेगा, दूसरे काम की ओर दौड़ेंगे। इस गड़बड़ी में आपका न पहला काम पूरा होगा, न दूसरा। सब अधूरा पड़ा रहेगा। आपका मानसिक असंतुलन सब गड़बड़ करता रहेगा और आपकी परेशानियाँ भी बढ़ती जायेंगी।

🔶 विचार लड़खड़ा जाते हैं, तो दिनचर्या और कार्यक्रम भी गड़बड़ हो जाते हैं और उल्टे परिणाम निकलते हैं। सवारी पाने की जल्दी में पीछे सामान छूट जाता है। स्वागत की तैयारी में ध्यान ही नहीं रहता और खाना जल जाता है। स्त्रियाँ इसी झोंक में इतनी बेसुध हो जाती हैं कि चूल्हे या स्टोव की आग से उनके कपड़े जल जाते हैं या मकान में आग लग जाती है। प्रत्येक कार्य को एक व्यवस्था के साथ करने का नियम है। एक काम जब चल रहा है, तो दूसरी तरह के विचार को मस्तिष्क में स्थान मत दीजिये। एक बार में एक ही विचार और एक ही कार्य। हड़बड़ाये नहीं, अन्यथा आपका सारा खेल चौपट हो सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Building a Person, his Family and his Society (Part 1)

🔶 You please include few new jobs in your life. Which job to include?  These are person building, family building and society building. Out of these only one is your job- person building. You go back from here with determination to build your personality. We should change our temperament, our thinking-style. One, let us change our character, the second change that is to be done after going from here is the change in your convictions you have by now about your family for members of family cannot be changed. It is not possible to change or dislodge family members to include new ones as also not possible is to change their education, homes and nature, but what you can surely change is the way you treat your family members. You can easily change the way you think.

🔷 You have some duties, responsibilities towards society. You cannot ignore those duties and responsibilities. The society will give no weight to you and ignore you if you do the same with it. You will not be able to garner respect or support. If Keep ignoring, keep centralising, remain alone to eat and enjoy singly, just forget to get any support or respect from society, simple.

🔶 The very respect and support is the hunger and the thirst of the soul. Fulfilling your obligations for your society is purchasing respect and support to satiate the hunger and thirst of the soul leading you to add to your happiness and progress. There were two jobs- building yourself and your family. The third one is to contribute something or the other for betterment of society.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 धर्मतंत्र का दुरुपयोग रुके (भाग 10)

🔷 इन मंदिरों में पुजारी के रूप में सिर्फ लोकसेवियों की नियुक्ति हो, जिनके मन में समाज के लिए दर्द है और समाज को ऊँचा उठाना चाहते हैं। जो मनुष्य के भीतर धर्मवृत्तियाँ पैदा करना चाहते हैं, उसी तरह के पुजारी वहाँ रहें। वे अपने पूजा-पाठ का एक-दो घंटा पूरा करने के बाद, अपने गुजारे की व्यवस्था करने के बाद जो समय उनके पास बच जाता है, उसका इस्तेमाल इस तरह से करें, जिससे कि हमारी सामाजिक और राष्ट्रीय एवं व्यक्तिगत चरित्र की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके।

🔶 मंदिरों में जहाँ दूसरी तरह के खरच होते हैं-कभी बँगले बनते हैं कभी उत्सव होते हैं, कभी झाँकी बनती है, कभी क्या बनता है और उसी में लाखों रुपये खरच हो जाता हैं। उन सारे-के क्रियाकलापों में आंशिक किफायत की जा सकती है और इससे जो पैसा बचता है, उसको लोकमंगल की अनेक प्रवृत्तियों को आगे बढ़ाने के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है और करना भी चाहिए। इस तरीके से धन की आवश्यकता, इमारतों की आवश्यकता, जनसहयोग की आवश्यकता मंदिरों के आधार पर ठीक तरीके से पूरी की जा सकती है।

🔷 मित्रो! जो व्यक्ति ऐसा ख्याल करते हैं कि भगवान निराकार हैं उसकी मूर्तिपूजा की जरूरत नहीं है, उन लोगों से भी मेरी यह प्रार्थना है कि वे उस शक्तिशाली माध्यम की उपेक्षा नहीं करें। ये मंदिर हिंदू धर्म की श्रद्धा के केंद्र हैं। उनको अब दिशा दी जानी चाहिए, नया मोड़ दिया जाना चाहिए। अब उनके विरोध करने की जरूरत नहीं रहीं। अब उनका खंडन करने की जरूरत नहीं रही। किसी जमाने में ऐसा रहा होगा कि लोगों के मनों में मूर्तिपूजा की बात, जो गहराई तक जम गई थी उसको कमजोर करने के लिए संभव है, किसी ने मंदिर का विरोध किया हो और यह कहा हो कि इसमें मूर्तिपूजा की जरूरत नहीं है। उस आधार पर धन खरच करने की जरूरत नहीं है। हो सकता है, किसी जमाने में धर्म सुधारकों ने अपनी बात समय के अनुरूप कही हो, लेकिन मैं अब यह कहता हूँ कि हिंदुस्तान में गाँव-गाँव में छोटे-बड़े मंदिर बने हुए है। उनको आप उखाड़िएगा क्या? भगवान राम और भगवान श्रीकृष्ण जिनको हमारी असंख्य जनता श्रद्धापूर्वक प्रणाम करती है, क्या उनका आप विरोध करेंगे?

🔶 साथियो! ठीक है, जैसा भी अब तक चला आ रहा है, उसे अब हमें सुधार की दिशा में मोड़ देना चाहिए। यह एक बहुत बड़ा काम है। विरोध करके नई चीज को खड़ा करना कितना मुश्किल है। एक चीज को गिराया जाए और फिर एक नई इमारत बनाई जाए, इसकी अपेक्षा यह क्या बुरा है कि जो बनी-बनाई इमारत है, उसको हम ठीक तरीके से इस्तेमाल करना सीख लें और उसी को काम में लाएँ।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 9)

👉 सद्गुरु की प्राप्ति ही आत्मसाक्षात्कार

🔷 भगवान् महादेव गुरुगीता के अगले मंत्र में स्पष्ट करते हुए कहते हैं- इस तरह के संकल्प के साथ किए गए पवित्र कर्मों के अनुष्ठान गूढ़ विद्या हैं।
गूढविद्या जगन्माया देहेचाज्ञानसम्भवा।
उदयो यत्प्रकाशेन गुरुशब्देन कथ्यते॥ १०॥

🔶 माया से आवृत जगत् और अज्ञान से उत्पन्न शरीर के लिए यह गूढ़विद्या है। जिसके प्रकाशित होने से सत्यज्ञान का उदय होता है। इसी तत्त्व को ‘गुरु’ संज्ञा दी गयी है।
  
🔷 सद्गुरु प्राप्ति की अभीप्सा के संकल्प को भगवान् सदाशिव गूढ़विद्या इसलिए कहते हैं; क्योंकि यह तत्त्व साधारणतया किसी की समझ में नहीं आता। कामनाओं और वासनाओं के अँधेरे से घिरे लोग ‘गुरु’ शब्द का महत्त्व ही नहीं समझ पाते। ‘गुरु’ में पहला अक्षर ‘गु’ अंधकार का वाचक है। और ‘रु’ प्रकाश का वाचक है। इस तरह गुरु वह तत्त्व है, जो अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करके ज्ञानरूपी तेज का प्रकाश करता है। ऐसे सद्गुरु के लिए लगन,उनको पाने के लिए गहरी चाहत, उनके चरणों में अपने सर्वस्व समर्पण के लिए आतुरता में ही इस मनुष्य जीवन की सार्थकता है।

🔶 यद्यपि यह कार्य आसान नहीं है। आसान न होने का पहला कारण है कि यह समस्त जगत् अपने वास्तविक रूप में है, तो ब्रह्ममय, किन्तु इस पर माया का छद्म आवरण है। इस दुनिया में प्रायः सभी लोग इसी कारण मेरा-तेरा करने में लगे हुए हैं। गुरु प्राप्ति की लगन में अगली बाधा है शरीर। यहाँ शरीर का अर्थ केवल देह मात्र से नहीं है। बल्कि इसके अर्थ में दैहिक कष्ट और दैहिक वासना भी शामिल है। जो मनुष्य की आत्म चेतना को अपने से कसे-जकड़े रहती है। इन बाधाओं और अवरोधों को परे हटाकर जो सद्गुरु की प्राप्ति के लिए संकल्पित होते हैं, वे धन्य हैं, वे कृतार्थ और कृतकृत्य होते हैं, जो सद्गुरु के चरणों में भक्तिपूर्वक अपने को न्यौछावर करने के लिए आगे बढ़ते हैं; क्योंकि गुरुचरणों की महिमा अपार है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 19

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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