सोमवार, 8 जनवरी 2018

👉 रोज भूखे सोते हैं 19 करोड़, फिर भी

बर्बाद हो रहा ₹244 Cr का खाना

🔷 देश ने भले ही मंगल ग्रह तक पहुंच बना ली हो लेकिन अब भी भारत की बड़ी आबादी को भूखा सोना पड़ता है। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि भारत में कम अनाज पैदा होता है, बल्कि यह जरूरतमंदों तक पहुंच ही नहीं पाता। युनाइटेड नेशन की फूड एंड एग्रिकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (FAO) ने इससे जुड़ी एक रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट में क्या है जानिए -
 

🔶 FAO ने रिपोर्ट में बताया है कि भारत हर साल 244 करोड़ रुपये का खाना बर्बाद कर देता है जो कि सालाना के हिसाब से 88,800 करोड़ रुपये बैठता है। वहीं दूसरी तरफ भारत में ही रोजाना 19 करोड़ चालिस लाख लोग भूखे रहते हैं।
 
 🔷 बर्बाद सामान में 21 मिलियन टन गेहूं संबंधी उत्पादन होता है। वहीं फसल कटाई के बाद होने वाला नुकसान एक लाख करोड़ रुपये के करीब बैठता है। कुल उत्पादित होने वाली खाद्य सामग्री का चालिस प्रतिशत हर साल बर्बाद हो जाता है।
 
 🔶 रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की जनसंख्या को खिलाने के लिए हर साल 225-230 मिलियन टन खाने की जरूरत है। वहीं 2015-16 में 270 मिलियन टन का उत्पादन हुआ था।

🔷 वैश्विक भूख सूचकांक में भारत की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। 119 देशों में भारत 100वें नंबर पर है। बता दें कि 2016 में भी एक रिपोर्ट आई थी। उसमें कहा गया था कि ब्रिटेन के लोग जितना खाना खाते हैं उतना भारतीय बर्बाद कर देते हैं।

रविवार, 7 जनवरी 2018

👉 कुछ तो लोग कहेंगे

🔷 अमेरिकन राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के विरोधी, अखबारों में जी-खोलकर उनकी बुराई करते थे। लेकिन, लिंकन इन बातों से विचलित नहीं होते थे और अपने काम मे जुटे रहते थे।

🔷 एक दिन उनके मित्र ने उनसे कहा, 'विरोधी लोग आपके खिलाफ चाहे अनेक ऊल-जलूल बातें अखबारों में प्रकाशित करवाते रहें, उनकी बातों का प्रत्युत्तर आपको भी तो देना चाहिए।

🔷 मित्र की बात सुनकर लिंकन मुस्कुराते हुए बोले, 'दोस्त यदि मैं अपनी आलोचनाओं का उत्तर देने लगूं तो दिनभर में केवल इसी काम को कर पाउंगा, मेरे कार्यालय में फिर कोई अन्य कार्य नहीं होगा। मेरा एक ही उद्देश्य है।

🔷 अपनी सारी योग्यता और शक्ति का उपयोग करते हुए ईमानदारी पूर्वक अपना काम करना। वह मैं करता हूं। और इस पद पर रहने की अंतिम घड़ियों तक करता रहूंगा।'

🔷 यदि में अंत में बुरा सिद्ध होता हूं, तो मैं भले ही लाख सफाई देता रहूं कि में सही था, मेरा रास्ता सही था कोई इस बात को नहीं सुनेगा और यदि में अंत में भला सिद्ध होता हूं तो मेरे विषय में जो प्रलाप किया जा रहा है, वह निश्चित रूप से अनर्गल सिद्द होगा। मुझे इस बात को लेकर न तो चिंता है और न ही भय।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 8 Jan 2018


👉 प्रत्येक परिस्थिति में प्रसन्नता का राजमार्ग (भाग 1)

🔷 मनुष्य जिस स्थिति में रहता है उसी स्थिति में उसे दो प्रकार की शक्तियां मिलती हैं। एक जो उसे प्रेरणा, प्रसन्नता प्रदान करती है और उसका कल्याण चाहती है। दूसरी उसे कष्ट देती है, पतन की ओर ले जाती है। एक शक्ति भलाई की है, दूसरी बुराई की। दोनों का संयोग ही मिलकर सृष्टि के रूप में दृष्टिगोचर हो रहा है।

🔶 यह शक्तियां ही चेतना रूप में मनुष्यों में भरी हुई हैं, उनका कोई स्पष्ट पृथक अस्तित्व नहीं है। संसार में जितने भी प्राणी हैं सभी में कुछ गुण और कुछ दोष रहते हैं। सर्वथा निर्दोष तो परमात्मा ही माना जाता है। शेष सभी में कुछ अंश भलाई है कुछ बुराई। किसी में गुणों का आधिक्य है किसी में बुराई का बाहुल्य, जिसे एकदम अवगुणों का अवतार ही माना जाता है कुछ न कुछ अच्छाइयां उसमें भी अवश्य होती हैं। कंस महा क्रूर शासक था, रावण का अत्याचार जगत विख्यात् है किन्तु दोनों ही पराक्रमी, पुरुषार्थी और साहसी थे। सिकन्दर दूरदर्शी था। हिटलर विचारवान था, चंगेज खां में और कुछ नहीं तो संगठन शक्ति थी। बुरे से बुरे व्यक्तियों में भी प्रेरणा और प्रसन्नता देने वाला कोई न कोई गुण अवश्य होता है। जिस प्रकार संसार में कोई भी व्यक्ति पूर्ण रूप से अच्छा नहीं, न पूर्णतः बुरा। संसार में पूर्ण कोई नहीं।

🔷 बुराई करनी हो, निन्दा करनी हो तो अपने ही बहुत से गुण खराब होंगे, कई बुरी आदतें पड़ गई होंगी, उनकी की जानी चाहिए पर गुणवान बनने का, सफलता प्राप्त करने का और प्रसन्नता की मात्रा बढ़ाने की—इच्छा हो तो हमारे विचार गुणों में, कल्याण करने वाले दृश्यों, सन्दर्भों और व्यक्तियों पर केन्द्रित रहने चाहिये। ऐसे व्यक्तियों और परिस्थितियों के प्रति हमारी विचारधारा केन्द्रित रहेगी तो गुण ग्राहकता हमारा स्वभाव बन जायेगा। हृदय शुद्ध और मन बलवान होता चला जायेगा। अच्छे गुणों और कार्यों को चिन्तन करना आत्म विकास के लिये हितकर ही होता है। अच्छे विचार ही मनुष्य को सफलता और जीवन देते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1971 पृष्ठ 32

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/February/v1.32

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.8

👉 Significance of Birthday (Part 1)

🔶 The life of a man is the biggest gift, BHAGWAN can offer. Also no other thing in treasure of BHAGWAN is as precious as a human life that has already been provided to a ZEEV. This precious thing comes out to be useful only when its usefulness is realized and not only this but also to properly put it to some good use. We, because of our ignorance, are unable to see its preciousness. Where does arise a question of putting to good use a thing of which value we have not found out? After all a person, ignorant of a piece of diamond he possesses, cannot be imagined caring about that for he thinks he possesses a piece of stone and not a diamond.
                                             
🔷 We suppose the life to be a useless thing and that it is a burden we have been laden with to bear. Innumerable persons are there who though live, yet in such a way as if some burden would have been put on them, whereas the reality is that they have been bestowed upon such a precious treasure, with which they can live a happy and meaningful life besides fulfilling the specific purpose of BHAGWAN with which he has sent us on this earth.

🔶 BHAGWAN has appointed us as his trustee of this wealth with many expectations to nourish and beautify the world-garden. He expects  us to show the world that we have put his wealth to good use to serve very that purpose. But we can’t do that simply because we remain all our life ignorant about how precious thing we have been offered to use.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 ध्यान का दार्शनिक पक्ष (भाग 2)

🔷 जिंदगी बाहर नहीं हमारे भीतर है और बुद्धि जिसकी वजह से हम रुपया कमाते हैं, सम्मान कमाते हैं, वह बाहर नहीं हमारे भीतर है जिसकी वजह से हम हर चीज कमा सकते हैं। भीतर हमें दिखाई नहीं पड़ता और हम कहते हैं कि हे भगवान! यह आपने क्या मखौल कर दिया मनुष्य के साथ कि बाहर की चीजों की जानकारी दे दी, पर भीतर की चीजों की नहीं दी। भीतर जो चीजें, संपत्तियाँ, विभूतियाँ, देवत्व और महानता दबी हुई पड़ी हैं, वह हमको दिखाई नहीं पड़तीं। हमको अपना बेटा दिखाई पड़ता है, संपत्ति दिखाई पड़ती है, यह और वह दिखाई पड़ता है और न जाने क्या-क्या दिखाई पड़ता है, पर हमको अपना भविष्य नहीं दिखाई पड़ता, आत्मा दिखाई नहीं पड़ती, परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता।

🔶 यहाँ तक कि हमारे भीतर वाले कलपुर्जे तक दिखाई नहीं पड़ते। आँखें तक दिखाई नहीं पड़ती। भीतर की तो बात कौन कहे बाहर की भी दिखाई नहीं पड़ती। अच्छा बताइए आप की नाक कैसी है? भौहें कैसी है? पलकें कैसी हैं? जब आपको बाहर की चीजें ही नहीं दिखती, केवल-इधर की चीजें ही दिखाई देती हैं तो फिर भीतर की कैसे दिखेंगी? इसीलिए गिरेबान में मुँह डाल करके जब हम भीतर तलाश करते हैं तो उसको ध्यान कहते हैं। अपने भीतर झाँकने का नाम ही ध्यान है।
 
🔷 ध्यान किसका किया जाता है? स्वयं का या भगवान का? बेटे स्वयं तो क्या और भगवान तो क्या दोनों एक ही हैं। स्वयं का विकसित रूप ही भगवान है। हमारा विकसित रूप जो है-'शिवोहं' है 'सच्चिदानंदोहं' 'तत्त्वमसि' 'अयमात्माब्रह्म' 'प्रज्ञानंब्रह्म' है। वेदांत के यह सारे के सारे महावाक्य यह बताते हैं कि हमारा परिष्कृत रूप भगवान है। हमारा भगवान हमारा परिष्कृत रूप ही है। डाइमण्ड क्या है? डाइमण्ड और कोयले में कोई खास फर्क नहीं है। एकाध इसके एलीमेंट्स और एकाध इसके भीतर के जो जर्रे हैं, उनमें फर्क पड़ता है, अन्यथा हीरा और कोयला एक ही हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 11)

👉 परमसिद्धि का राजमार्ग

🔷 सद्गुरु के चरणों की महिमा का बोध कराने वाली यह अनुभूति कथा महान् गुरु योगिराजाधिराज श्री श्यामाचरण लाहिड़ी और उनके विभूतिवान् शिष्य स्वामी प्रणवानन्द के बारे है। स्वामी प्रणवानन्द ने स्वयं अपने मुख से अपनी इस अनुभूति को योगानन्द को सुनाया था। उन्होंने उनसे कहा- गुरु की कृपा कितनी अमूल्य होती है, वह सुनो। मैं उन दिनों नित्यरात्रि को आठ घण्टे ध्यान किया करता था। उस समय मेरा समूचा दिन अपने रेलवे कार्यालय में बीत जाता था। वहाँ मुझे अपने क्लर्क होने का दायित्व निभाना पड़ता था। उन दिनों मेरे लिए यह ड्यूटी बड़ी थकाऊ और उबाऊ थी। फिर भी मैं बड़े ही मनोयोग पूर्वक हर रात को ध्यान करता था। प्रत्येक रात्रि को आठ घण्टे की अविराम साधना मेरी जीवनचर्या का अनिवार्य और अविभाज्य अंग बन गयी।
  
🔶 इसके अद्भुत परिणाम भी मेरे जीवन में आए। विराट् आध्यात्मिक अनुभूति से मेरी समूची अन्तर्चेतना उद्भासित हो उठी; परन्तु अभी भी उस अखण्ड सच्चिदानन्द और मेरे बीच एक झीना परदा हमेशा बना रहता था। यहाँ तक कि अतिमानवी निष्ठा के साथ साधना करने के बावजूद भी मैं ब्रह्मतत्त्व से एकाकार नहीं हो सका। इस बारे में किए गए मेरे सारे प्रयास पुरुषार्थ, निष्फल गए। तभी मुझे ध्यान आया कि साधक के लिए सद्गुरु चरणों की कृपा ही परमपूर्णता का परिचय पर्याय बनती है। यही सोचकर एक दिन सायंकाल मैंने लाहिड़ी महाशय के चरणों का आश्रय ग्रहण किया। उनके आशीष की आकांक्षा के साथ मेरी प्रार्थना चलती रही, ‘गुरुदेव, मेरी ईश्वर में समा जाने की आकांक्षा इतनी तीव्र वेदना का रूप धारण कर चुकी है कि उस परम प्रभु का प्रत्यक्ष दर्शन किए बिना मैं अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकता।’
  
🔷 लाहिड़ी महाशय हल्के से मुस्कराए और बोले, भला इसमें मैं क्या कर सकता हूँ। तुम और गहराई से ध्यान करो। मैने उनके चरण पकड़कर बड़े ही करुण भाव से पुकार की, हे मेरे प्रभु, मेरे स्वामी, मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ। आप इस भौतिक कलेवर में मेरे सम्मुख विद्यमान हैं। अब मेरी प्रार्थना को स्वीकारें, और मुझे आशीर्वाद दें कि मैं आपका आपके अनन्त रूप में दर्शन कर सकूँ। प्रसन्न भाव से शिष्य वत्सल परम सद्गुरु लाहिड़ी महाशय ने अपना हाथ आशीर्वाद मुद्रा में उठाते हुए कहा, जाओ वत्स, अब तुम जाओ और ध्यान करो। मैंने तुम्हारी प्रार्थना परमपिता परमेश्वर परब्रह्म तक पहुँचा दी है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 22

शनिवार, 6 जनवरी 2018

👉 भगवान सद्बुद्धि दें

🔷 एक संत थे। वह प्रातः काल अपने शिष्यों के बीच बैठकर प्रभु से प्रार्थना किया करते थे। वह सबसे पहले पूरी मानव जाति के कल्याण की प्रार्थना करते और इसके बाद हाथ जोड़कर कहते कि, हे प्रभु मेरे परमपिता, आप गलत कार्य करने वाले लोगों को सद्बुद्धि दें। उनको सही रास्ता दिखाएं ताकि वो गलत कामों को छोड़कर दया का भाव जाग्रत करें।

🔶 उनकी यह प्रार्थना एक शिष्य रोज सुनता एक दिन उसने पूछा, संत तो अच्छे लोगों के कल्याण के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं। गुरुदेव इस प्रार्थना का क्या अर्थ है?

🔷 संत मुस्कुराए और बोले, 'वत्स अच्छे काम करने वाले लोग तो स्वतः भगवान की दया और स्नेह के अधिकारी बन जाते हैं।' अच्छे लोग अच्छे कर्म करके औरों को भी अच्छा बनाते रहते हैं।

🔶 प्रार्थना तो बुरे लोगों को सद्बुद्धि प्रदान करने के लिए करनी चाहिए, जिससे वे गलत कामों को छोड़कर ईश्वर भक्ति में मन लगाएं और लोगों पर दया करें।

👉 आज का सद्चिंतन 7 Jan 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 Jan 2018


👉 मन का भार हल्का रखिये (अन्तिम भाग)

🔷 काम करते समय आपको जब भी निराशा, बोझ या घबराहट लगा करे, उस समय अपने आत्म-विश्वास को जगाने का प्रयत्न किया कीजिये। आध्यात्मिक चिन्तन किया कीजिये। आप यह सोचा करिये कि आप भी दूसरों की तरह एक बलवान् आत्मा हैं, आपके पास शक्तियों का अभाव नहीं है। अभी तक उनका प्रयोग नहीं किया है इसीलिये भय, संकोच या लज्जा आती है। पर अब आपने जान लिया है कि आपकी भी सामर्थ्य कम नहीं है। आप निर्धन परिवार के सदस्य नहीं, वरन् परमात्मा के वंश में उसकी उत्कृष्ट शक्तियाँ लेकर अवतरित हुए हैं फिर आपको घबराहट किस लिये होनी चाहिये?

🔶 जब भी कभी आपको कोई मानसिक भय, उलझन या निराशा उत्पन्न हो, आप कुछ देर के लिये एकान्त में चले जाया कीजिये। कल्पना में शुभ और पौरुष पूर्ण चित्र बनाया कीजिये। असफलता की बात मन से जितनी दूर भगा देंगे, उतनी ही आपके अन्दर रचनात्मक प्रवृत्तियाँ जागृत होंगी और आपका जीवन सुख-सुविधाओं से पूर्ण होता चलेगा।

🔷 प्रत्येक कार्य शान्ति और स्थिरतापूर्वक किया कीजिये आप महान् आत्मा हैं, आपका जन्म किन्हीं महान् उद्देश्य की पूर्ति के लिये हुआ है। बड़ी सफलता के लिये बड़ा साहस चाहिये। वह साहस आप में सोया है, उसे जागृत करना आपका काम है। आप इस लक्ष्य को समक्ष रखकर शुभ कल्पनाएं किया कीजिये और मन को भय घबराहट तथा निराशा आदि के बोझ से मुक्त रखा कीजिये आपका मन हल्का रहे तो उसमें से रचनात्मक स्रोत फूट पड़ें और आपको सब तरह की सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण कर दें ऋषि की इस प्रार्थना में बड़ा बल हैः—

🔶 अपेहि मनसस्पतेऽप क्राम परश्चर। परो निऋत्या आ चक्ष्व बहुधाजीवनोमनः॥

🔷 अर्थात्- “मन को अपवित्र करने वाले बुरे विचारों वाले बोझ मुझसे दूर रहें। मेरा चित्त कभी मलिन न हो। मेरी अन्तरात्मा निर्भय और मेरा मन शुभ विचारों वाला हो।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.7

👉 Building a Person, his Family and his Society (Last Part)

🔶 The body is not all in all. The requirements of body alone are not all about. Sense-organs are not all about. Yearning & desire of mind alone is not all about. Somewhere a soul is also within and if it is so then believe this ingredient of life too has some demands to be fulfilled, kindly pay your attention to that also. The soul too has a hunger and a thirst but immense & infinite are its compliments. Plants, trees provide us greenery, shadow and air needed for life.

🔷 They also provide us fruits and flowers; but don’t they require fertilizer, water and care? What will you expect of them if you do not bother about care, water and fertilizer needed by them? In the same way ZIWATMA too is like a plant and tree requiring its dose. What kind of dose it demands?

🔶 Didn’t I request you that you must run activities associated with person building, family building and society building in a progressive manner heading onwards. Yes it is what the soul requires. Finished, today’s session

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 ध्यान का दार्शनिक पक्ष ( भाग 1)

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

🔷 साधना स्वर्ण जयंती वर्ष में हम आपको गायत्री उपासना के साथ-साथ विशेष रूप से जो शिक्षण देते हैं, वह ध्यान का शिक्षण है। उपासनाएँ दो हैं- नाम और रूप की उपासनाएँ। नाम और रूप के बिना उपासना हो नहीं सकती। यह दो यूनीवर्सल उपासनाएँ हैं। किसी भी मजहब में चले जाइए व्यक्ति नाम जरूर ले रहा होगा। मुसलमान तसबीह पर नाम ले रहा होगा। ईसाई पादरियों को आप माला जपते हुए देखेंगे। आर्यसमाजी प्रकाश का ध्यान कर रहे होंगे। अन्य अमुक तरह का ध्यान कर रहे होंगे। नादयोग वाले कान में आने वाली आवाज का ध्यान कर रहे होंगे। बहरहाल ध्यान जरूर करना पड़ता है।

🔶 ध्यान के बिना गति किसी की नहीं है। इसीलिए हमने कहा है कि जप के साथ-साथ आप ध्यान किया कीजिए। स्थूल ध्यान मूर्तिपूजा के माध्यम से होता है, तसवीरों के माध्यम से होता है, क्योंकि मनुष्य का मानसिक विकास इतना नहीं हो पाया है कि वह बिना किसी फोटोग्राफ के, बिना किसी मूर्ति के किसी चीज का ध्यान कर सके, लेकिन जब वह विषय पक्का हो जाता है, तब फिर मूर्ति की कोई खास जरूरत नहीं रह जाती। तब हम अपने भीतर बैठे हुए भगवान का साक्षात्कार कर सकते हैं। उसका ध्यान कर सकते हैं।
 
🔷 ध्यान का क्या मतलब है? ध्यान का मतलब है कि हमारे जीवन के दो पक्ष हैं। एक पक्ष वह है जो बाहर फैला हुआ पड़ा है। हमारे कानों के सूराख बाहर को हैं और हमारी आँखों के सूराख बाहर को हैं। हम बाहर को चीजों को देख सकते हैं और बाहर कौन बैठा हुआ है, कौन जा रहा है, यह भी बता सकते हैं। बाहर की चीजें हमको दिखाई पड़ती हैं किंतु भीतर की चीजें हमको बिलकुल दिखाई नहीं पड़ती। तो क्या भीतर कोई चीज नहीं है? बेटे असल में जो कुछ भी चीज है, वह भीतर ही है बाहर नहीं है बाहर केवल दिखाई पड़ती हैं, पर असल में हर चीज भीतर है। जिन्दगी कहाँ है?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 10)

👉 परमसिद्धि का राजमार्ग

🔷 गुरुगीता के महामन्त्र साधना जीवन के महासूत्र हैं। इन्हें अपनाकर, इनकी साधना करके साधक का अध्यात्म राज्य में प्रवेश सुनिश्चित है। पर ध्यान रहे गुरुगीता के इन महामन्त्रों की साधना करने का मतलब कतिपय क्रियाओं अथवा कर्मकाण्डों को कर लेना भर नहीं है। इनकी साधना करने का अर्थ है—उस भावदशा में अपनी सम्पूर्णता एवं समग्रता से जीना, जिसका कि ये महामन्त्र बोध कराते हैं। पिछले मंत्र में गुरुतत्त्व के बारे में बताया गया है कि परम गुरु भगवान् सदाशिव के उन वचनों को किस तरह आत्मसात् किया जाए, जिसमें उन्होंने कहा था कि गुरुतत्त्व ही साधक के जीवन का सार सर्वस्व है। इसके अभाव में यज्ञ, व्रत, तप, दान, जप और तीर्थ अपना अर्थ खो देते हैं। यही नहीं अपनी प्रबुद्ध आत्मा और सद्गुरु भिन्न नहीं हैं। ये दोनों एक ही हैं, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। इस तत्त्व के सत्य को जानने से ही साधक के जीवन में सत्य ज्ञान का उदय होता है।

🔶 गुरुतत्त्व की इस कथा को आगे बढ़ाते हुए देवाधिदेव भगवान् महादेव आदिमाता पार्वती से कहते हैं-

सर्वपापविशुद्धात्मा श्रीगुरोः पादसेवनात्।
देहीब्रह्मभवेद् यस्मात् त्वत् कृपार्थं वदामि ते॥ ११॥
  
🔷 सद्गुरु के चरणों की सेवा से साधक सारे पापों से मुक्त होकर विशुद्धात्मा हो जाता है। (भगवान् शिव, माता पार्वती से कहते हैं, यही नहीं देवि!) मैं तुम्हें कृपापूर्वक बता रहा हूँ, देहधारी जीव ब्रह्मभाव को उपलब्ध हो जाता है।

🔶 गुरुचरणों की महिमा के बारे में कहे गए, भगवान् महादेव के ये वचन साधकों के जीवन का सम्पूर्ण सत्य है। समस्त सृष्टि का आध्यात्मिक इतिहास साक्षी है कि अनेकों बार इस महामन्त्र में निहित सत्य को अपने साधना जीवन में खरा प्रमाणित किया है। महान् साधकों ने दुर्लभतम ब्रह्मतत्त्व का बोध इस महामन्त्र की साधना से पाया है। ऐसी सैकड़ों, हजारों और लाखों घटनाओं में हम यहाँ केवल एक घटना की चर्चा कर रहे हैं। इसकी चर्चा विश्वविख्यात महान् योगी स्वामी योगानन्द ने ‘योगीकथामृत’ में भी की है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 21

शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

👉 वासना की परत

🔷 एक धनी व्यक्ति किसी फकीर के पास गया और कहने लगा कि, 'मैं प्रार्थना करना चाहता हूं, लेकिन तमान कोशिशों के बावजूद प्रार्थना नहीं होती। वासना बनी रहती है। चाहे जितना आंख बंद कर लूं लेकिन परमात्मा के दर्शन नहीं होते।' इसीलिए आप बताइए कि मैं क्या करूं? क्या कारण है इसका?

🔶 फकीर उस धनी को एक खिड़की के पास ले गया जिसमें कांच लगे हुए थे। उसके पार वृक्ष, बादल और सूरज सभी का दर्शन संभव था। फकीर उसे फिर दूसरी खिड़की पर ले गया। जिसमें चांदी की चमकीली परत लगी हुई थी। यहां लाकर फकीर ने धनी व्यक्ति ने पूछा, चांदी की चमकीली परत और कांच में कुछ में तुम क्या अंतर पाते हो ?

🔷 धनी ने बताया चमकीली परत पर सिवाय खुद की शक्ल के कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। बाहर की दुनिया तो एक सिरे से गायब है।

🔶 फकीर ने समझाया, 'जिस चमकीली परत के कारण तुमको सिर्फ अपनी शक्ल दिखाई दे रही है वह तुम्हारे मन के चारों तरफ भी है। इसीलिए तुम ध्यान में जिधर भी देखते हो केवल खुद को ही देखते हो। जब तक तुम्हारे ऊपर वासना की चांदी रूपी परत है कुछ दिखाई नहीं देगा इसीलिए इस परत को हटाना होगा। अगर तुम ऐसा करते हो तो तुम्हें प्रार्थना करने में कभी कोई परेशानी नहीं होगी।

👉 आज का सद्चिंतन 6 Jan 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 Jan 2018


👉 मन का भार हल्का रखिये (भाग 3)

🔷 जीवन में उदासी, खिन्नता एवं अप्रसन्नता के वास्तविक कारण बहुत कम ही होते हैं, अधिकाँश का कारण घबराहट से उत्पन्न भय ही होता है। मनुष्य नहीं जानता कि वह इससे अपनी शारीरिक तथा मानसिक शक्तियों का कितना बड़ा भाग व्यर्थ गँवाता रहता है? जिन्होंने जीवन में बड़ी सफलताएं पाई हैं, उन सबके जीवन बड़े सुचारु, क्रमबद्ध और सुव्यवस्थित रहे हैं। जिनके जीवन में विश्रृंखलता होती है, उनके पास सदैव “समय कम होने” की शिकायत बनी रहती है फिर भी अन्त तक कुल मिलाकर एक-दो काम ही कर पाते हैं, पर जिन लोगों ने विधि-व्यवस्था से, धैर्य से चिन्ता-विमुक्त कार्य सँवारे उन्होंने असंख्य कार्य किये। इतनी सफलतायें अर्जित कीं, जो सामान्य व्यक्ति के लिये चमत्कार जैसी लग सकती हैं।

🔶 यह भी संभव है कि आपकी दुर्बलता पैतृक हो। आप यह अनुभव करते हों कि जिस परिवार में पैदा हुए हैं, वहाँ की परिस्थितियाँ उतनी अच्छी नहीं थीं। उस घर के लोग असफल, निराश, निर्धन, अपढ़ या किसी अन्य बुराई से ग्रसित रहे हैं और उनका प्रभाव आपके संस्कारों पर भी पड़ा है। पारिवारिक जीवन का व्यक्ति के जीवन पर निःसंदेह बहुत प्रभाव होता है किन्तु अपने मनोबल को ऊँचा उठाकर गई-गुजरी स्थिति में भी आशातीत सफलतायें प्राप्त की जा सकती हैं।

🔷 कदाचित आप में ऐसी कमजोरियाँ हों, जिनके कारण आपको घबड़ाहट आती हो। उन कमियों पर गम्भीरतापूर्वक विचार कीजिये। उन्हें अपने माता-पिता, सहपाठियों मित्रों से प्रकट कीजिये और उनसे सहायता लीजिये। जिन लोगों ने छोटी अवस्थाओं से बढ़कर बड़े कार्य किये हों, उनके जीवन चरित्र पढ़िये। अपनी मानसिक कमजोरियों को दूर करने के लिये अपने सहृदय अभिभावकों और मित्रों के प्रति आपका जीवन एक खुली पुस्तक की तरह होना चाहिए, जिसका हर अच्छा-बुरा अध्याय पाठक आसानी से समझ सकता हो। आप अपनी कमजोरियों का हल औरों से पूछिये और उन्हें दूर करने का प्रयत्न किया कीजिये। अब तक आप आत्म-प्रशंसा के लिये अधीर रहते रहे, अब आप आत्मलोचन से प्रसन्न हुआ करिये, तो आपका जीवन प्रतिदिन निखरता हुआ चला जायगा। उसमें शक्ति , साहस और सफलता की कमी न रहेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.7

👉 Building a Person, his Family and his Society (Part 2)

🔶 These three are such jobs that if you could do, must be understood that you have begun taking steps to develop self-life and satiate the hunger of soul. Otherwise obviously you have been living and dying for the body, only pleasure of your organs have so far been your requirements and desires. Only the body has been your ISHT-DEV (a god we target to satiate). Only worldly illusions and attachments have so far been your fantasies. Is not so that all your life so far has been expended in these fantasies, if not then tell me in what else?

🔷 Now please oblige. Pursue simple life-high thinking. Pursue simplicity, simplicity, simplicity and an economical life-style. Much of your concerns will be addressed automatically if you adopt these principles in your life. Much of your time will be saved with you and you will be able to find enough time to address any issue touching your life otherwise your personal ambitions spread over like earth and sky will not let you to satiate your own issues what to talk of issues of family and society. Your own earning may not be sufficient to meet demands unnecessarily grown compelling you to earn through undesirable ways.

🔶 You will then find it essential to under weigh commodities, to seek unsolicited support and to cheat others and to ask loans from others. I mean to say that then you may be doing the meanest of mean jobs giving example of general scenario. Then you will be put to such a state of circumstances that when you cannot reduce your yearning, cannot control undue ambitions of material expenditure and of pomp-show, how you will be able to think about requirements of your soul? Where is the question of rise of soul in such a scenario? Therefore consider your soul also.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 धर्मतंत्र का दुरुपयोग रुके (अन्तिम भाग)

🔷 मंदिरों को अगर ठीक तरीके से काम में लाया जा सके और उनमें लगी पूँजी को ठीक तरीके से इस्तेमाल किया जाता रहे और इन दोनों का उपयोग लोकमंगल के लिए किया जाता रहे। उनमें ऐसे पुजारियों की, कार्यकर्ताओं की नियुक्ति की जा सकती हो, जो अपना एक-दो घंटे का समय पूजा-पाठ में लगाने के बद बचा हुआ सारा समय समाज को ऊँचा उठाने में लगाएँ, तो मैं यह विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि सरकार और दूसरी संस्थाओं के द्वारा जो लंबे-लंबे प्लान, योजनाएँ बनती हैं धन लगाती हैं, कार्यकर्ता नियुक्त करती हैं, फिर भी सारी योजनाएँ असफल हो जाती हैं, उसकी तुलना में यह योजना इतनी बड़ी, इतनी महत्त्वपूर्ण इतनी मार्मिक और सार्थक है कि हम राष्ट्र को पुनः उसके शिखर पर पहुँचा सकते हैं।

🔶 इसके लिए हमें केवल मंदिरों की दिशाएँ मोड़ने की जरूरत है। लोगों को सपने की जरूरत है, प्रचार करने की जरूरत है, धमकाने की जरूरत है। अगर ये काबू में न आते हो, तो घिराव करने से लेकर बहिष्कार करने तक की जरूरत है। यह समझाने की जरूरत है कि इस धन का और इमारतों का हम अपव्यय नहीं होने देंगे। मंदिरों को हम अंधश्रद्धा का केंद्र नहीं बनने देंगे। हम धर्मभीरुता का पोषण करने वाले केंद्र के रूप में नहीं, वरन इन्हें धर्म की स्थापना का केंद्र बनाएँगे। यदि इन मंदिरों को धर्म की स्थापना का केंद्र बनाया जा सका, तो राष्ट्र की महती आवश्यकता पूरी की जा सकती है। तब नया युग लाने में, नया समाज बनाने में, समाज की विकृतियों को दूर करने में और एक समर्थ राष्ट्र-समर्थ समाज बनाने के लिए इतने बड़े साधन हमारे हाथ सहज ही लग सकते है। इन बने-बनाए साधनों को विवेकशील को अपने अधिकार में, कब्जे में लेना ही चाहिए और उनको वह दिशा देनी चाहिए, जिससे कि भगवान वास्तव में प्रसन्न हों।

🔷 भगवान की जो सद्वृत्तियाँ इस विश्व में फैली हुई हैं, जिनसे कि शांति आती है और धार्मिक-भावना की वृद्धि होती है और समाज समृद्ध होता है, उन भावनाओं को आगे बढ़ाने के लिए मंदिरों को केंद्र बनाया ही जाना चाहिए ताकि वास्तविक भगवान अपनी वास्तविक पूजा को देखकर प्रसन्न हो जाए और भक्ति करने, पूजा पाठ करने का उद्देश्य लोगों को समक्ष आ सके और लोग उसका समुचित फायदा उठा सकें। यह करने को बहुत अधिक आवश्यकता है और हमको करना चाहिए। मंदिरों को जनजागरण का केंद्र बनाया जाना चाहिए, उनका कायाकल्प किया जाना चाहिए। इतना करना यदि संभव हो गया, तो समझना चाहिए कि हमने लोक मंगल के क्षेत्र में एक बहुत बड़ी मंजिल पूरी कर ली और बहुत बड़े साधनों को हमने अपने आप इकट्ठा कर लिया।

ॐ शान्तिः!

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 कभी कभी एक अच्छाई भी जीवन को बदल जाती है

🔷 एक नगर का राजा बड़ा ही तामसिक प्रवृत्ति का था और उस राजा का अधिकाँश समय निद्रा और भोग विलास मे ही व्यतीत हो जाता था!

🔶 पर उसके जीवन मे एक बड़ी अच्छाई थी की वो जब तक गौ माता को अपने हाथों से रोटी न दे देता तब तक वो चाहे भूखा मर जाता पर कुछ भी ग्रहण नही करता था!

🔷 एक बार शिकार खेलते खेलते घनघोर जंगल मे जा पहुँचा उसके साथ उसके कुछ साथी भी थे पूरी रात वो जंगल मे इधर उधर भटकते रहे पर रास्ता न मिला!

🔶 फिर वो उसी जंगल मे सो गये जब सुबह हुई तो चलते चलते बहुत दुर निकल गये और सभी भुख से व्याकुल थे उधर से कोई सन्तों का दल आ रहा था सभी उनके पास पहुँचे सन्तों के पास खाने की कुछ सामग्री थी तो सन्तों ने उन्हे खाने को दिया पर राजा ने कहा हॆ महात्माओं मेरे जीवन मे अनेक दुर्गुण है पर मेरा एक नियम है की जब तक मैं अपने हाथों से गौ माता को रोटी न खिलाऊँ तब तक मैं कुछ ग्रहण नही करूँगा और फिर वो सभी जैसे तैसे अपने नगर पहुँचे फिर राजा ने गौ माता को रोटी खिलाई और फिर स्वयं ने भोजन ग्रहण किया!

🔷 और इस दिन के बाद राजा को रोज एक स्वपन आने लगा फिर राजा किसी पहुँचे हुये सन्त के पास गये और राजा ने कहा हॆ महात्मन मैं रोज एक स्वपन देखता हुं की तीन व्यक्ति घोडे के साथ चल रहे है जिसमे पहला व्यक्ति घोड़े पर बैठकर आनन्दमय मुद्रा मे जा रहा है और वो घोड़े को कोडो से पिट रहा है और दूसरा जो है वो घोड़े पर बैठा है पर वो नीचे गिरता है फिर घोड़े पर बैठता है और घोड़े की कौडे से पिटाई करता है और तीसरा जो व्यक्ति है उसे घोड़े खींच रहे है और वो लहूलुहान हो रहा है कभी घोड़ा  इधर भगाये तो कभी उधर भगाये और घोड़ा भी रो रहा है और वो व्यक्ति भी रो रहा है।

🔶 पर सबसे बड़े आश्चर्य की बात ये है की जिन घोडो की पिटाई हो रही है वो बड़े ही आनंदमुद्रा मे चल रहे है और वो घुड़सवार भी आनन्द मे है और जो कभी नीचे गिरता कभी वापिस बैठता वो थोड़ा सा दुःखी होते है पर जैसे ही घोड़े को कौडे लगाता है घोड़ा और घुड़सवार दोनो खुश हो जाते है और तीसरा जो है घोड़े को बहुत ही लाड़प्यार से रख रहा है पर घोडा भी दुःखी और घोड़ेवाला भी दुःखी है ये क्या रहस्य है देव आप मुझ पर दया कीजिये और समझाये नाथ!

🔷 महात्माजी ने कहा हे राजन तीन तरह की प्रवर्तियां और तीन तरह के व्यक्ति है। सात्विक, राजसिक और तामसिक जिनके जीवन मे सात्विकता की प्रधानता है वो संयम रूपी कौडे से इन्द्रिय रूपी घोडो की पिटाई करते है और जो इन्द्रियों पर राज करते है वही आनन्द मे है घोड़ा और घुड़सवार दोनो ही आनन्द मे है!

🔶 दूसरे वो है जो इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने की पूरी पूरी कोशिश कर रहे है और वो भी संयम रूपी कौडे से पिटाई कर रहे है! और तीसरे वो जिनके जीवन मे तामसिकता प्रधान है जो भोग और विलास मे डूबे हुये है इंद्रियों ने उन्हे अपना गुलाम बना रखा है और ऐसे लोग रोते रोते ही चले जाते है!

🔷 राजा - क्षमा हॆ नाथ पर मैं तो एक तामसिक प्रवर्ति का मानव हुं और ऐसा दिव्य स्वपन मुझे कैसे आया?

🔶 महात्मा जी - हॆ राजन आपने जो गाय को रोटी देकर फिर कुछ खाने का जो नियम बना रखा है और परीक्षा काल मे भी जब आप अपने नियम के प्रति अडिग रहे तो श्रीभगवान ने आप पर दया करके आपको बार बार ये स्वपन दिखाया है!

🔷 महात्मा जी ने राजा को एक पाठ पढाया।

देखना इन्द्रियों के न घोड़े भगे
इनपे दिन रात संयम के कौडे पड़े
मन को विषयों से तुम हटाते चलो
हर दिन और हर पल हटाते चलो
कृष्ण गोविन्द गोपाल गाते चलो
साधना- मार्ग पे आगे बढ़ते चलो
कृष्ण गोविन्द गोपाल गाते चलो,
राह मे आयेगी बाधायें बहुत
पर यु हार मान के रुकना कही
बहती नदी की तरह तुम लड़ते चलो
कृष्ण गोविन्द गोपाल गाते चलो
देखना इन्द्रियों के न घोड़े भगे
इन पे दिन रात संयम के कौडे पड़े!!

उस दिन से राजा ने जीवन को सात्विकता की ओर मोड़ दिया!

🔷 मित्रों राजा था तो तामसिक पर उसने अथक प्रयासों से पूरे जीवन को बदलकर रख दिया क्योंकि कोशिश करने वालो की हार नही होती!

🔶 नियम के बिना कुछ नही है जीवन मे एक सारगर्भित नियम जरूर बनाना और उस नियम को कभी भंग मत होने देना फिर देखना एक दिन वो हमारे बन्द भाग्य के दरवाजे कैसे खोलता है!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 Jan 2018

👉 आज का सद्चिंतन 5 Jan 2018


👉 मन का भार हल्का रखिये (भाग 2)

🔷 अपना क्रम अपनी व्यवस्थायें ठीक रखिये तो आप पायेंगे कि घबराहट के सारे कारण निराधार हैं। आप अपना काम ठीक रखिये, आपको कोई नौकरी से नहीं निकालेगा। दुकान पर रोज बैठते हैं, तो खाने की क्या चिन्ता? दूसरों की बच्चियों की शादियाँ होती हैं,फिर आप की बच्ची कुमारी थोड़ी ही बैठी रहेगी। लड़का स्वस्थ और सदाचारी मिल जाय तो निर्धनता की घबराहट क्यों हो? आप अपनी व्यवस्था के साथ अपना दृष्टिकोण ठीक रखिये, आपकी सारी कठिनाइयाँ अपने आप हल होती रहेंगी।

🔶 घबड़ाना तो उन्हें चाहिए, जो हाथ पर हाथ रखे बैठे रहते हैं। कर्मशील व्यक्ति के लिये असफलता की आशंका नहीं होनी चाहिए।

🔷 कार्य करते हुए मानसिक असंतुलन रखना एक बड़ी कमजोरी है। इसी से सारी परेशानियाँ पैदा होती हैं। मन का झुकाव कभी इस ओर , कभी उस ओर होगा तो आप कभी एक काम हाथ में लेंगे और वह पूरा नहीं हो पायेगा, दूसरे काम की ओर दौड़ेंगे। इस गड़बड़ी में आपका न पहला काम पूरा होगा, न दूसरा। सब अधूरा पड़ा रहेगा। आपका मानसिक असंतुलन सब गड़बड़ करता रहेगा और आपकी परेशानियाँ भी बढ़ती जायेंगी।

🔶 विचार लड़खड़ा जाते हैं, तो दिनचर्या और कार्यक्रम भी गड़बड़ हो जाते हैं और उल्टे परिणाम निकलते हैं। सवारी पाने की जल्दी में पीछे सामान छूट जाता है। स्वागत की तैयारी में ध्यान ही नहीं रहता और खाना जल जाता है। स्त्रियाँ इसी झोंक में इतनी बेसुध हो जाती हैं कि चूल्हे या स्टोव की आग से उनके कपड़े जल जाते हैं या मकान में आग लग जाती है। प्रत्येक कार्य को एक व्यवस्था के साथ करने का नियम है। एक काम जब चल रहा है, तो दूसरी तरह के विचार को मस्तिष्क में स्थान मत दीजिये। एक बार में एक ही विचार और एक ही कार्य। हड़बड़ाये नहीं, अन्यथा आपका सारा खेल चौपट हो सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Building a Person, his Family and his Society (Part 1)

🔶 You please include few new jobs in your life. Which job to include?  These are person building, family building and society building. Out of these only one is your job- person building. You go back from here with determination to build your personality. We should change our temperament, our thinking-style. One, let us change our character, the second change that is to be done after going from here is the change in your convictions you have by now about your family for members of family cannot be changed. It is not possible to change or dislodge family members to include new ones as also not possible is to change their education, homes and nature, but what you can surely change is the way you treat your family members. You can easily change the way you think.

🔷 You have some duties, responsibilities towards society. You cannot ignore those duties and responsibilities. The society will give no weight to you and ignore you if you do the same with it. You will not be able to garner respect or support. If Keep ignoring, keep centralising, remain alone to eat and enjoy singly, just forget to get any support or respect from society, simple.

🔶 The very respect and support is the hunger and the thirst of the soul. Fulfilling your obligations for your society is purchasing respect and support to satiate the hunger and thirst of the soul leading you to add to your happiness and progress. There were two jobs- building yourself and your family. The third one is to contribute something or the other for betterment of society.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 धर्मतंत्र का दुरुपयोग रुके (भाग 10)

🔷 इन मंदिरों में पुजारी के रूप में सिर्फ लोकसेवियों की नियुक्ति हो, जिनके मन में समाज के लिए दर्द है और समाज को ऊँचा उठाना चाहते हैं। जो मनुष्य के भीतर धर्मवृत्तियाँ पैदा करना चाहते हैं, उसी तरह के पुजारी वहाँ रहें। वे अपने पूजा-पाठ का एक-दो घंटा पूरा करने के बाद, अपने गुजारे की व्यवस्था करने के बाद जो समय उनके पास बच जाता है, उसका इस्तेमाल इस तरह से करें, जिससे कि हमारी सामाजिक और राष्ट्रीय एवं व्यक्तिगत चरित्र की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके।

🔶 मंदिरों में जहाँ दूसरी तरह के खरच होते हैं-कभी बँगले बनते हैं कभी उत्सव होते हैं, कभी झाँकी बनती है, कभी क्या बनता है और उसी में लाखों रुपये खरच हो जाता हैं। उन सारे-के क्रियाकलापों में आंशिक किफायत की जा सकती है और इससे जो पैसा बचता है, उसको लोकमंगल की अनेक प्रवृत्तियों को आगे बढ़ाने के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है और करना भी चाहिए। इस तरीके से धन की आवश्यकता, इमारतों की आवश्यकता, जनसहयोग की आवश्यकता मंदिरों के आधार पर ठीक तरीके से पूरी की जा सकती है।

🔷 मित्रो! जो व्यक्ति ऐसा ख्याल करते हैं कि भगवान निराकार हैं उसकी मूर्तिपूजा की जरूरत नहीं है, उन लोगों से भी मेरी यह प्रार्थना है कि वे उस शक्तिशाली माध्यम की उपेक्षा नहीं करें। ये मंदिर हिंदू धर्म की श्रद्धा के केंद्र हैं। उनको अब दिशा दी जानी चाहिए, नया मोड़ दिया जाना चाहिए। अब उनके विरोध करने की जरूरत नहीं रहीं। अब उनका खंडन करने की जरूरत नहीं रही। किसी जमाने में ऐसा रहा होगा कि लोगों के मनों में मूर्तिपूजा की बात, जो गहराई तक जम गई थी उसको कमजोर करने के लिए संभव है, किसी ने मंदिर का विरोध किया हो और यह कहा हो कि इसमें मूर्तिपूजा की जरूरत नहीं है। उस आधार पर धन खरच करने की जरूरत नहीं है। हो सकता है, किसी जमाने में धर्म सुधारकों ने अपनी बात समय के अनुरूप कही हो, लेकिन मैं अब यह कहता हूँ कि हिंदुस्तान में गाँव-गाँव में छोटे-बड़े मंदिर बने हुए है। उनको आप उखाड़िएगा क्या? भगवान राम और भगवान श्रीकृष्ण जिनको हमारी असंख्य जनता श्रद्धापूर्वक प्रणाम करती है, क्या उनका आप विरोध करेंगे?

🔶 साथियो! ठीक है, जैसा भी अब तक चला आ रहा है, उसे अब हमें सुधार की दिशा में मोड़ देना चाहिए। यह एक बहुत बड़ा काम है। विरोध करके नई चीज को खड़ा करना कितना मुश्किल है। एक चीज को गिराया जाए और फिर एक नई इमारत बनाई जाए, इसकी अपेक्षा यह क्या बुरा है कि जो बनी-बनाई इमारत है, उसको हम ठीक तरीके से इस्तेमाल करना सीख लें और उसी को काम में लाएँ।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 9)

👉 सद्गुरु की प्राप्ति ही आत्मसाक्षात्कार

🔷 भगवान् महादेव गुरुगीता के अगले मंत्र में स्पष्ट करते हुए कहते हैं- इस तरह के संकल्प के साथ किए गए पवित्र कर्मों के अनुष्ठान गूढ़ विद्या हैं।
गूढविद्या जगन्माया देहेचाज्ञानसम्भवा।
उदयो यत्प्रकाशेन गुरुशब्देन कथ्यते॥ १०॥

🔶 माया से आवृत जगत् और अज्ञान से उत्पन्न शरीर के लिए यह गूढ़विद्या है। जिसके प्रकाशित होने से सत्यज्ञान का उदय होता है। इसी तत्त्व को ‘गुरु’ संज्ञा दी गयी है।
  
🔷 सद्गुरु प्राप्ति की अभीप्सा के संकल्प को भगवान् सदाशिव गूढ़विद्या इसलिए कहते हैं; क्योंकि यह तत्त्व साधारणतया किसी की समझ में नहीं आता। कामनाओं और वासनाओं के अँधेरे से घिरे लोग ‘गुरु’ शब्द का महत्त्व ही नहीं समझ पाते। ‘गुरु’ में पहला अक्षर ‘गु’ अंधकार का वाचक है। और ‘रु’ प्रकाश का वाचक है। इस तरह गुरु वह तत्त्व है, जो अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करके ज्ञानरूपी तेज का प्रकाश करता है। ऐसे सद्गुरु के लिए लगन,उनको पाने के लिए गहरी चाहत, उनके चरणों में अपने सर्वस्व समर्पण के लिए आतुरता में ही इस मनुष्य जीवन की सार्थकता है।

🔶 यद्यपि यह कार्य आसान नहीं है। आसान न होने का पहला कारण है कि यह समस्त जगत् अपने वास्तविक रूप में है, तो ब्रह्ममय, किन्तु इस पर माया का छद्म आवरण है। इस दुनिया में प्रायः सभी लोग इसी कारण मेरा-तेरा करने में लगे हुए हैं। गुरु प्राप्ति की लगन में अगली बाधा है शरीर। यहाँ शरीर का अर्थ केवल देह मात्र से नहीं है। बल्कि इसके अर्थ में दैहिक कष्ट और दैहिक वासना भी शामिल है। जो मनुष्य की आत्म चेतना को अपने से कसे-जकड़े रहती है। इन बाधाओं और अवरोधों को परे हटाकर जो सद्गुरु की प्राप्ति के लिए संकल्पित होते हैं, वे धन्य हैं, वे कृतार्थ और कृतकृत्य होते हैं, जो सद्गुरु के चरणों में भक्तिपूर्वक अपने को न्यौछावर करने के लिए आगे बढ़ते हैं; क्योंकि गुरुचरणों की महिमा अपार है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 19

बुधवार, 3 जनवरी 2018

👉 मन की शांति के लिए सबसे सरल युक्ति

🔷 एक सेठ के पास अपार धन-संपत्ति थी, किंतु फिर भी उसके मन को शांति न थी। एक दिन किसी व्यक्ति ने बताया कि अमुक नगर में एक साधु रहता है। वह लोगों को ऐसी सिद्धि देता है, जिससे मनचाही वस्तु प्राप्त हो जाती है।

🔶 सेठ उस साधु के पास के पास जाकर बोला, 'महाराज मेरे पास बहुत पैसा है, लेकिन मन की शांति नहीं है।' साधु ने कहा कि, 'बेटा जैसा मैं करूं उसे चुपचाप देखते रहना।' इससे तुम्हें मन में शांति करने की युक्ति मिल जाएगी।

🔷 अगले दिन साधु ने सेठ को कड़ी धूप में बिठाए रखा और खुद कुटिया में चले गए। सेठ गर्मी से बेहाल हो गया, मगर चुप रहा। दूसरे दिन साधु ने उसे कुछ भी खाने पीने को नहीं दिया और स्वयं तरह-तरह के पकवान खाता रहा, सेठ इस दिन भी चुप रहा।

🔶 तीसरे दिन सेठ गुस्से में वहां से जाने लगा तो साधु बोला, 'क्यों, क्या हुआ? इस बात पर सेठ बोला, 'महाराज, मैं यहां बड़ी आशा लेकर आया था, किंतु मुझे यहां निराशा ही मिली।'

🔷 इस बात के उत्तर पर साधु ने कहा, 'मैनें तो तुम्हें शांति की युक्ति बता दी, पहले दिन जब मैनें तुम्हें धूप में बैठने के लिए कहा और मैं स्वयं कुटिया में बैठा तो, तुम्हें बताया कि मेरी छाया तुम्हारे काम नहीं आएगी।

🔶 यह तुम्हें समझ नहीं आने पर मैनें तुम्हें भूखा रखा और खुद भरपेट खाया। उससे मैनें तुम्हें समझाया कि मेरी साधना से तुम्हें सिद्धि नहीं मिलेगी। उसी तरह शांति भी तुम्हें अपनी मेहनत और पुरुषार्थ से ही मिलेगी।

🔷 मैं तुम्हारे मन को शांत नहीं कर सकता। उसके लिए तुम्हें खुद ही मन की शांति प्रदान करने वाले काम करने होंगे। यह सुनकर सेठ की आंखे खुल गईं और वह साधु से आशीर्वाद लेकर अपने घर चला गया।

संक्षेप में

🔶 आपकी परेशानी, सिर्फ आपके मन की एक स्थिति है। इससे छुटकारा पाने के लिए मन को शांत रखते हुए सही उपायों पर काम भी आपको ही करना होगा।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 4 Jan 2018


👉 मन का भार हल्का रखिये (भाग 1)

🔷 कल न जाने क्या होगा? नौकरी मिलेगी या नहीं, कक्षा में उत्तीर्ण होंगे या अनुत्तीर्ण, लड़की के लिये योग्य वर कहाँ मिलेगा, मकान कब तक बन कर पूरा होगा, कहीं वर्षा न हो जाय, जो पकी फसल खराब हो जाय आदि बातों की निराशाजनक कल्पना द्वारा आप मन में घबराहट न पैदा किया करें। जो होना है, वह एक निश्चित क्रम से ही होगा, तो फिर घबराने, व्यर्थ विलाप करने अथवा भविष्य की चिन्ता में पड़े रहने से क्या लाभ? अवाँछित कल्पनाएं करेंगे तो आपका जीवन अस्त-व्यस्त होगा और व्यर्थ की कठिनाई से आप अपने को पीड़ित अनुभव करते रहेंगे।

🔶 समय पर कार्य प्रायः सभी के पूरे हो जाते हैं, इसलिये प्रयास तो जारी रखें, पर घबराहट पैदा कर काम को बोझीला न बनायें। आपका मन भार-मुक्त रहेगा, तो काम अधिक रुचि और जागरुकता के साथ कर सकेंगे। यह स्थिति आपको प्रसन्नता भी देगी और सफलता भी ।

🔷 घबराने वाले व्यक्ति फूहड़ माने जाते हैं, उनका कोई काम सही नहीं होता। पुस्तकें लिये बैठे हैं, पर फेल हो जाने की घबराहट सता रही है। फलतः पेज तो खुला है, पर मन कहीं और जगह घूम रहा है। एक गलती आप से हो गई है, उसे छिपाने के चक्कर में आपका दिमाग सही नहीं है, कहीं गड्ढे में गिर जाते हैं, कहीं बर्तनों से टकरा कर पाँव फोड़ लेते हैं। सही काम के लिये मन में घबराहट का बोझ न डाला करिये। फल-कुफल की परवाह किये बिना स्वस्थ और पूरे मन से काम किया कीजिए।

🔶 स्टेशन की ओर तो जा ही रहे हैं, रेलगाड़ी मिलेगी या नहीं? मस्तिष्क को इस फिसाद में फंसाने का क्या फायदा? यही तो होगा कि गाड़ी स्टेशन पहुँचने के पूर्व छूट जाय और आपको जहाँ जाना है, वहाँ कुछ विलंब से पहुँचना हो। आप जहाँ जा रहे हैं या जो कुछ पूरा कर रहे हैं। उसका भी तो यही लक्ष्य होगा कि वह कार्य पूरा हो प्रसन्नता मिले, पर अगली प्रसन्नता के लिये अब की प्रसन्नता क्यों नष्ट करते हैं? पहले से ही मन को अलमस्त क्यों नहीं रखते, यही तो होगा कि कार्य कुछ थोड़ा विलंब से होगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.7

👉 Wealth of Awareness (Last Part)

🔶 The word ‘VIDYA’ can also be termed as spiritual science. You may also call it RITAMBHARA or PRAGYA. There is no problem if you call it VIVEK or discreetness or GAYATRI. Actually very this carries the actual weight. Many persons are there who know much about world. There is much publicity. Are there any less VIDYAWAN men in the world; are there any fewer artists in the world; are there any less intelligent people in the world? Are there any less skilled men in the world? You just tell me. Have you seen jailed persons, each more intelligent than other, each wiser than other? Cheaters include mostly educated persons.

🔷 Ignorant persons can do only small pick-pocketing and small misdeeds but in the world the biggest cheatings have been done by well-educated persons. But I do not talk about education. Let education takes its seat; I have nothing to do with it. But when I am urging something before you, it is about VIDYA (technique). You must realize the significance of VIDYA. Things around you will be better if you could do that.

🔶 What is meant by VIDYA? VIDYA is technique that tells you- how to identify & use your thoughts? How to use your body? How to use your means? How to use your circumstances? Well the very meaning of VIDYA is how you will use means and ways you have or will have at your disposal. For that purpose general knowledge about world and worldly things alone do not work. For this man has to think at a level slightly above general level and see how the dignity and pride of man can be secured? What should be done to ensure it, is called VIDYA, the technique.

🔷 If VIDYA is acquired by someone then that one will be blessed. Much has been said about VIDYA in epic books- ‘VIDYA AMRITMASHNUTE’ VIDYA has been conceived as ambrosia. Any one acquiring technique (VIDYA) is supposed to have gained ambrosia. There is nothing difficult for a man who can distinguish properly between what is justified and what is not. There is nothing difficult for a discreet man. Finished, today’s session.

================OM SHANTI====================

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 धर्मतंत्र का दुरुपयोग रुके (भाग 9)

🔷 मित्रो! अब समय आ गया है, जबकि मंदिरों का स्वरूप बदल दिया जाए। नमूने के लिए अब ऐसे मंदिर बनाए जा सकते हैं, जिनमें प्रयोगशाला के तरीके से लोग देख पाएँ कि मंदिरों का सही इस्तेमाल क्या हो सकता है और क्या होना चाहिए? हमने गायत्री तपोभूमि का मंदिर लोगों के सामने एक नमूना पेश करने की खातिर बनाया है। यों तो अपने देश में इतने सारे मंदिर हैं। भगवान तो एक ही है। उनको ही शंकर कह दीजिए, गणेश कह दीजिए, हनुमान जी कह दीजिए। अनेक भगवान नहीं हो सकते, हाँ उनके नाम अनेक हो सकते है।

🔶 मंदिर में मूर्ति रख देना ही काफी नहीं है, वरन मूर्ति के साथ साथ उन भगवान से संबंधित वृत्तियों को आगे बढ़ाया जाना और फैलाया जाना भी आवश्यक है। अपने यहाँ यही तो होता है। कितने कार्य होते हैं-विद्यालय वहाँ चलता है, प्रकाशन वहाँ होता है, देश भर के लिए कार्यकर्ता वहाँ से भेजे जाते हैं और न जाने क्या क्या किया जाता है, लेकिन उस मंदिर तक ही हम सीमाबद्ध नहीं हैं। यदि सीमाबद्ध हो जाते, तो उसको प्रगतिशील मंदिर नहीं कहा जा सकता था। अब हमको प्रगतिशील मंदिरों की स्थापना की आवश्यकता है। समाज का नया निर्माण करने के लिए नए नए रचनात्मक केंद्र खोले जाने चाहिए।

🔷 साथियो! मंदिरों के नाम पर करोड़ों-अरबों रुपये की संपत्ति के ऐसे ही पड़ा रहने दे, यह कैसे हो सकता है। इस संपत्ति को ठीक तरीके से इस्तेमाल किया जाना चाहिए। उसके लिए समझदार लोगों को, धार्मिक लोगों को आगे आना चाहिए और इस आवश्यकता को महसूस करना चाहिए कि यदि धर्म को जिंदा रहना है, तो वह ढोंग के रूप में नहीं जिएगा। वह केवल कर्मकाण्ड के रूप में जिंदा नहीं रहेगा। बेशक धर्म के साथ में कर्मकाण्डरूपी कलेवर जिंदा रहे, लेकिन कर्मकाण्डों के साथ-साथ उन सत्प्रवृत्तियों को भी जीवित रखा जाना चाहिए, जिनसे लोक-मंगल की और समाज की आवश्यकताएँ पूरी होती है।

🔶 धर्म केवल कर्मकाण्ड नहीं हैं। धर्म केवल आडम्बर नहीं है। धर्म केवल पूजा-पाठ की प्रक्रिया नहीं है, वरन इस पूजा-पाठ की प्रक्रिया और धार्मिक क्रिया-कृत्यों के पीछे और साथ-साथ में एक महती आवश्यकता जुड़ी हुई है कि हम व्यक्ति के अंतरंग को, उसकी भावनाओं के कैसे ऊँचा उठाएँ। समाज के अंदर फैली हुई धार्मिक वृत्तियों को कैसे बढ़ाएँ। यह सारे-के क्रियाकलाप जिस माध्यम से और जिस आधार पर पूरे किए जा सकते हैं, उसके लिए कोई केंद्र या एक स्थान होना ही चाहिए। वह जगह हमारे मंदिर ही को सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 8)

👉 सद्गुरु की प्राप्ति ही आत्मसाक्षात्कार

🔷 गुरुर्बुद्ध्यात्मनो नान्यत् सत्यं सत्यं न संशयः।
तल्लाभार्थं प्रयत्नस्तु कर्तव्यो हि मनीषिभिः॥ ९॥


प्रबुद्ध आत्मा एवं सद्गुरु एक ही है, भिन्न नहीं है। यह सत्य है- सत्य है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। इसलिए मननशील मनीषियों को इसकी प्राप्ति हेतु ही सभी श्रेष्ठ कर्तव्य कर्म करना चाहिए।

🔶 भगवान् महादेव के इन वचन में ऊपर कहे हुए वचन की पूर्णता है। साधकों के मन में इस मंत्र के पहले वाले मंत्र को पढ़कर यह शंका जन्म ले सकती है कि जब गुरुज्ञान के अभाव में यज्ञ, व्रत, तप, दान, जप और तीर्थ आदि कर्म केवल मूढ़ता के द्योतक बने रहते हैं, तो फिर यदि सद्गुरु का सान्निध्य अभी प्राप्त न हो, तो इन्हें किया जाय अथवा नहीं। साधकों की यह शंका मात्र कोरी शंका नहीं है, परन्तु जिज्ञासु अन्तर्मन की जिज्ञासा भी है। महादेव भगवती पार्वती को इस मंत्र में इसी जिज्ञासा का समाधान सुझाते हैं। परम गुरु कहते हैं, हे देवि! जो मननशील मनीषी हैं, वे शीघ्र ही इस गूढ़ रहस्य को समझ जाते हैं कि अपनी जाग्रत् आत्मा ही सद्गुरु है अथवा गुरुदेव भगवान् ही अपनी जाग्रत् आत्मा हैं।
  
🔷 इस कथन में सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करने वाला शब्द ‘मनीषी’ है। मनीषी सब नहीं होते। ये बड़े ही विशेष प्रकार के साधना परायण व्यक्ति होते हैं। इनका विश्वास जीवन की यांत्रिक गतिविधियों में फँसकर सब कुछ गवाँ देने में नहीं होता। इनकी अन्तर्चेतना रोजी-रोटी कमाने तक सिमटी नहीं रहती। ये अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों के साथ जीवन के सार तत्त्व के बारे में सतत मनन करते रहते हैं।

🔶 ऐसे मननशील मनीषियों को शीघ्र ही इस यथार्थता का अहसास हो जाता है कि सद्गुरु की कृपाशक्ति से ही आत्मचेतना में जागृति आती है। और जब आत्म चेतना जाग्रत् होती है, तो यह सत्य अनुभूति का रूप ले लेता है कि सद्गुरुदेव की कृपाचेतना ही अपनी आत्मचेतना है। इन दोनों में कोई भिन्नता नहीं है। इसलिए गहन अर्थ में सद्गुरु के सत्य स्वरूप का साक्षात्कार ही आत्म साक्षात्कार है। सद्गुरु की प्राप्ति ही आत्मप्राप्ति है। मनुष्य जीवन का केन्द्रीय उद्देश्य एवं आधार भी यही है। इसलिए जो भी कर्तव्य कर्म किए जाएँ, वे सभी इसी उद्देश्य एवं अभीप्सा के साथ हों। यज्ञ, व्रत, तप, दान, जप एवं तीर्थ इन सभी श्रेष्ठ कर्मों का अनुष्ठान करना चाहिए; परन्तु इन कर्मों के पवित्र अनुष्ठान के साथ सद्गुरु की प्राप्ति का संकल्प अवश्यमेव जुड़ा हुआ हो। इस संकल्प के जुड़ने मात्र से ये सभी कर्म श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर और श्रेष्ठतम होते चले जाएँगे और इनके अनुष्ठान में तत्पर व्यक्ति की अन्तर्चेतना मूढ़ता से ज्ञानदाता सद्गुरुदेव की ओर यात्रा कर सकेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 18

👉 बुरे विचारों से बचाव


🔷 एक धनवान व्यक्ति था, बडा विलासी था। हर समय उसके मन में भोग विलास सुरा-सुंदरी के विचार ही छाए रहते थे। वह खुद भी इन विचारों से त्रस्त था, पर आदत से लाचार, वे विचार उसे छोड ही नहीं रहे थे।

🔶 एक दिन आचानक किसी संत से उसका सम्पर्क हुआ। वह संत से उक्त अशुभ विचारों से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना करने लगा।

🔷 संत ने कहा अच्छा, अपना हाथ दिखाओं, हाथ देखकर संत भी चिंता में पड गये। संत बोले बुरे विचारों से मैं तुम्हारा पिंड तो छुडा देता, पर तुम्हारे पास समय बहुत ही कम है। आज से ठीक एक माह बाद तुम्हारी मृत्यु निश्चित है, इतने कम समय में तुम्हे कुत्सित विचारों से निजात कैसे दिला सकता हूं। और फ़िर तुम्हें भी तो तुम्हारी तैयारियां करनी होगी।

🔶 वह व्यक्ति चिंता में डूब गया। अब क्या होगा, चलो समय रहते यह मालूम तो हुआ कि मेरे पास समय कम है। वह घर और व्यवसाय को व्यवस्थित व नियोजीत करने में लग गया। परलोक के लिये पुण्य अर्जन की योजनाएं बनाने लगा, कि कदाचित परलोक हो तो पुण्य काम लगेगा। वह सभी से अच्छा व्यवहार करने लगा।

🔷 जब एक दिन शेष रहा तो उसने विचार किया, चलो एक बार संत के दर्शन कर लें।

🔶 संत ने देखते ही कहा- "बडे शान्त नजर आ रहे हो, जबकि मात्र एक दिन शेष है'। अच्छा बताओ क्या इस अवधि में कोई सुरा-सुंदरी की योजना बनी क्या?"

🔷 व्यक्ति का उत्तर था- "महाराज! जब मृत्यु समक्ष हो तो विलास कैसा?"

🔶 संत हंस दिये। और कहा- "वत्स! अशुभ चिंतन से दूर रहने का मात्र एक ही उपाय है “मृत्यु निश्चित है यह चिंतन सदैव सम्मुख रखना चाहिए,और उसी ध्येय से प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करना चाहिए”।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 3 Jan 2018

👉 विक्षुब्ध जीवन, शान्तिमय कैसे बने? (अन्तिम भाग)

🔷 अनास्था, नास्तिकता एवं अविश्वास भी विषैले सर्पों से कम नहीं हैं जो अपने पालने वाले को डसे बिना नहीं रहते। जो नास्तिक है वह निरालंब है, जो आस्थाहीन है, वह नीरस एवं कड़ुआ है और अविश्वासी है वह बहिष्कृत है। संसार में सहज सम्भाव्य निराशाओं और असफलताओं के आने पर जब मनुष्य का विषाद अपनी सीमा पार कर जाता है तब मात्र आस्तिक भाव ही मनुष्य को सहारा देता है। जन-जन के साथ छोड़ देने, सम्बन्धियों के विमुख हो जाने, शत्रुओं से घिर जाने, आपत्ति के आने पर यदि किसी असहाय को कोई सहायता देता है तो वह उसका आस्तिक भाव ही है। रोग, निराशा अथवा विषाद की चरम सीमा जब मनुष्य के चारों ओर मृत्यु का जाल रचने लगती है तब एक आस्तिक भाव ही है जो उसे मृत्यु के भयानक अन्धकार में दीपक दिखाता है।

🔶 मृत्यु के महत्वपूर्ण अवसर पर जहां नास्तिक असहाय अवस्था में छटपटाता, रोता और भयभीत होता है, निरुपाय बांधवों की ओर कातर-दृष्टि से देखता हुआ सहारे की याचना करता वहां आस्तिक व्यक्ति एक अनन्त सहारे से सन्तुष्ट शान्तिपूर्वक प्रयाण करता है। आस्तिकता हर क्षण एक सबल एवं सच्चे मित्र के समान कदम-कदम पर साथ देती है। आस्तिक सदा निर्भय और निश्चिन्त रहता है। आस्तिकता के अभाव में कोई भी मनुष्य कितना ही बलवान अथवा बुद्धिमान क्यों न हो सदैव ही निःसहाय एवं निरुपाय है। ठोकर लगने, चोट खाने पर वह चीत्कार करता उठता है, उसे सहारा देने वाली कोई शक्ति उसके अन्दर नहीं होती।

🔷 इसी प्रकार जो आस्थाहीन और अविश्वासी है उसे न तो किसी से स्नेह होता, न श्रद्धा। स्वयं अविश्वासी होने से किसी का विश्वासपात्र नहीं बन पाता और एक रिक्त एवं बहिष्कृत जीवन बिताता है।

🔶 अस्तु, सुखी और सन्तुष्ट रहने का एक ही मूल-मन्त्र है—स्वल्प इच्छाएं, कम आवश्यकताएं, निःस्वार्थ जीवन और आस्थापूर्ण आस्तिक दृष्टिकोण का विकास मनुष्य को सर्व-सुखी रखने में सदा सफल हो सकते हैं।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Wealth of Awareness (Part 2)

🔶 There are two streams of awareness/knowledge and both should move ahead. One stream is linked with livelihood and is called education. How to behave in public is learned on this basis. Children are sent to school to be educated. What is meant by education? Education means that they must be aware about LOKACHAR. They must know how this world is configured? What is geography? What is history? What have been the characters of men from time to time in history? How the ups and downs have been taking place in history?

🔷 How are the trees grown? What is all about this universe? What is politics? What is society? What are the duties of a citizen? How should livelihood be earned? What is economics? It is to excel in etiquettes-one and to earn livelihood- two. The pieces of information we receive are called education. Is it essential? Yes it is. In absence of it, how a man would take care of his body? How a man would coordinate with society? How a man would use his mind? Education is essential for the purpose of gathering such information.

🔶 For body, for life and for setting things right in material life education is very essential. But then ours’ life is not only a material life alone. At the same time we have one more life called spiritual life. Some consciousness too is within us, some sensations too are within us, some soul is within us, discreetness too is within us. These ingredients of life too need to be redressed. The specification required to do that is called VIDYA. So the VIDYA is one more stream of awareness/knowledge.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 धर्मतंत्र का दुरुपयोग रुके (भाग 8)

🔷 मित्रो! हम अपने ढंग से भगवान के बेकार आदमी जैसा बनाते हैं। अगर भगवान सोया करेंगे तो सूरज, चाँद कैसे उगेगा? हवाएँ कैसे चलेंगी? जीव-जंतु, पेड़-पौधे कैसे पैदा हो जाएँगे? भगवान सो नहीं सकता, हवा सो नहीं सकती, गरमी सो नहीं सकती। जो इस तरह की विश्वव्यापी चेतनाएँ हैं, उनको सोने से क्या मतलब ! इसलिए सोने जागने वाला जो कृत्य है, वह बच्चों का मनबहलाव जैसा है। मनबहलाव का थोड़ा-सा काम रखा जाए, तो क्या हर्ज है, लेकिन उस कार्य के लिए जो धन, पैसा, श्रम लगा हुआ है, जो व्यक्ति लगे हुए हैं, उन सभी को लोकमंगल के लिए खरच किया जाना चाहिए।

🔶 मंदिरों के जो कमेटी वाले हैं, महंत हैं, उनको विवेकशील लोगों की एक कमेटी बनाकर समझाया जाना चाहिए। अगर वे समझते नहीं हैं, तो उन्हें मजबूर किया जाना चाहिए कि मंदिर में धन तो आपने लगाया है, पर अब बह जनता का है। मंदिर का ट्रस्ट बनाने का मतलब है कि उसका स्वामित्व जनता के हाथ में चला जाता है। मंदिरों के न्यासी प्रबंधक होते हैं, स्वामी नहीं होते। वह संपत्ति जनता की मानी जाती है। जो देवालय बन गया, उसकी स्वामी जनता हो जाती है और उसका हक है कि उन लोगों को मजबूर करे और कहे कि आप इस तरीके से इस धन का अपव्यय नहीं कर सकते। जनता की श्रद्धा का गलत उपयोग नहीं किया जा सकता।

🔷 मित्रो! अपने देश में अरबों रुपया मंदिरों के नाम पर लगा हुआ है। मैं इसको अपव्यय ही नहीं दुरुपयोग कहता हूँ और यह कहता हूँ कि उन पुजारियों को, महंतों को यह कहा जाना चाहिए कि आप अगर अपनी श्रद्धा को कायम रखना चाहते हैं, जनता के मन पर अपनी छाप को कायम रखना चाहते हैं, तो आप लोकसेवी के तरीके से जिएँ और इस मदिर को लोकसेवा का केंद्र बनाएँ। न जो आप भगवान के वकील हैं, न एजेंट हैं और ही नुमाइन्दे है। आप हमारे जैसे पुजारी और एक सामान्य व्यक्ति हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 7)

👉 सद्गुरु की प्राप्ति ही आत्मसाक्षात्कार
🔷     गुरुगीता बोधिवृक्ष है। इसकी छाँव तले होने वाली सद्गुरु कृपा की अनुभूति साधक को सम्यक् सम्बुद्ध बनाती है। उपर्युक्त पंक्तियों में गुरुतत्त्व के प्रति जिज्ञासु साधकों ने पढ़ा कि गुरु के अभाव में समस्त शास्त्र एवं सारी विद्याएँ अर्थहीन हो जाती हैं। परमगुरु भगवान् शिव के ये वचन बड़े अनूठे हैं। इनको आत्मसात करने के लिए गहन श्रद्धा एवं प्रखर विवेक की जरूरत है। श्रद्धा एवं विवेक के संयोग से ही यह तत्त्व समझ में आता है कि समस्त शास्त्र सारगर्भित हैं और सारी विद्याएँ अर्थवान् हैं, पर तभी जब सद्गुरु कृपा करके इनका सम्यक् बोध कराएँ। सद्गुरु के न होने पर शास्त्र केवल वाक्जाल और वितण्डावाद का साधन बनकर रह जाते हैं। इन्हें पढ़ने और रटने वाले अहंकार से छुटकारा पाने की जगह ज्ञानी होने के झूठे अहं के ज्वर से पीड़ित होते रहते हैं। यही स्थिति विद्याओं की है। गुरु सान्निध्य के अभाव में कल्याणकारी विद्याएँ भी अकल्याणकारी बन जाती हैं। यह ऐसा अनुभव सिद्ध सत्य है, जिसे अनेकों बार अनेकों ने अनुभव किया है।

🔶 गुरु महिमा की इस कथा को आगे बढ़ाते हुए भगवान् सदाशिव, आदिमाता पार्वती से कहते हैं-

यज्ञो व्रतं तपो दानं जपस्तीर्थं तथैव च।
गुरुतत्त्वमविज्ञाय मूढस्तु चरते जनः॥ ८॥
  
🔷 यज्ञ, व्रत, तप, दान, जप और तीर्थ आदि सारी प्रक्रियाओं को करने वाले लोग भी गुरुतत्त्व के बोध के अभाव में मूढ़ की तरह विचरते रहते हैं।

🔶 गुरुओं के भी गुरु परम गुरु भगवान् सदाशिव के इन वचनों का केन्द्रीय तत्त्व यही है कि गुरुतत्त्व की अनुभूति पाए बिना जिन्दगी की मूढ़ता किसी भी दशा में दूर नहीं होती। और मूढ़ता की इस भावदशा में किए गए उच्चकर्म भी अपना सार्थक सत्परिणाम नहीं दे पाते हैं। यज्ञ, व्रत, तप, दान, जप और तीर्थ ये सभी श्रेष्ठ कर्म हैं; परन्तु सद्गुरु के अभाव में इनकी श्रेष्ठता भी क्षुद्रता एवं संकीर्णता का रूप ले लेती है। इन्हें करने वाले इन उच्च कर्मों की श्रेष्ठता को, अपने स्वार्थ, अहंकार एवं मतवाद की संकीर्णता से ढाँप देते हैं। उदाहरण के लिए जो यज्ञकर्म ‘इदं न मम्’ का भाव प्रवर्तक है- वह गुरुज्ञान के अभाव में प्रायः कामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है। इसी तरह व्रत के पालन का तात्पर्य व्रतशील जीवन से है; परन्तु साधारणतया लोग विभिन्न व्रतों को अपनी मनोकामनाओं की तृप्ति का साधन बना लेते हैं। ठीक यही स्थिति तप, दान, जप और तीर्थ की है।
  
🔷 इस स्थिति से उबरने का उपाय सुझाते हुए भगवान् शिव माता पार्वती से कहते हैं-

गुरुर्बुद्ध्यात्मनो नान्यत् सत्यं सत्यं न संशयः।
तल्लाभार्थं प्रयत्नस्तु कर्तव्यो हि मनीषिभिः॥ ९॥
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 17

👉 आप भला तो जग भला

🔷 जीवन अनेकों समस्याओं के साथ उलझा हुआ है। उन उलझनों को सुलझाने में, प्रगति पथ पर उपस्थित रोड़ों को हटाने में बहुधा हमारी शक्ति का एक बहुत बड़ा भाग व्यतीत होता है, फिर भी कुछ ही समस्याओं का हल हो पाता है, अधिकांश तो उलझी ही रह जाती हैं। उस अपूर्णता का कारण यह है कि हम हर समस्या का हल अपने से बाहर ढूँढ़ते हैं जब कि वस्तुत: वह हमारे शरीर के अंदर ही छिपा रहता है।

🔶 यदि हम कोई आकांक्षाएँ करने से पूर्व अपनी सामथ्र्य और परिस्थितियों का अनुगमन करें तो उनका पूर्ण होना विशेष कठिन नहीं है। एक बार के प्रयत्न में न सही, सोची हुई अवधि में न सही, पूर्ण अंश में न सही, आगे पीछे न्यूनाधिक सफलता इतनी मात्रा में तो मिल ही जाती है कि काम चलाऊ सन्तोष प्राप्त किया जा सके। पर यदि आकांक्षा के साथ-साथ अपनी क्षमता और स्थिति का ठीक अन्दाजा न करके बहुत बढ़ा-चढ़ा लक्ष्य रखा गया है, तो उसकी स्थिति कठिन ही है। ऐसी दशा में असफलता एवं खिन्नता भी स्वाभाविक ही है। पर यदि अपने स्वभाव में आगा पीछा सोचना, परिस्थिति के अनुसार मन चलाने की दूरदर्शिता हो तो उस खिन्नता से बचा जा सकता है और साधारण रीति से जो उपलब्ध हो सकता है उतनी ही आकांक्षा करके शान्तिपूर्वक जीवन यापन किया जा सकता है।
  
🔷 अपने स्वभाव की त्रुटियों का निरीक्षण करके उनमें आवश्यक सुधार करने के लिए यदि हम तैयार हो जाएँ। तो जीवन की तीन चौथाई से अधिक समस्याओं का हल तुरन्त ही हो जाता है। सफलता के बड़े-बड़े स्वप्न देखने की अपेक्षा हम सोच समझ कर कोई सुनिश्चित मार्ग अपनावें और उस पथ पर पूर्ण दृढ़ता एवं मनोयोग के साथ कत्र्तव्य समझकर चलते रहें तो मस्तिष्क शान्त रहेगा, उसकी पूरी शक्तियाँ लक्ष्य को पूरा करने में लगेंगी और मंजिल तेजी से पास आती चली जायेगी।

🔶 समय-समय पर थोड़ी-थोड़ी जो सफलता मिलती चली जायेगी, उसे देखकर हर्ष और सन्तोष भी मिलता जायेगा, इस प्रकार लक्ष्य की ओर अपने कदम एक व्यवस्थित गति के अनुसार बढ़ते चले जायेंगे।

🔷 इसके विपरीत यदि हमारा मन बहुत कल्पनाशील है, बड़े-बड़े मंसूबे गाँठता और बड़ी-बड़ी सफलताओं के सुनहरे महल बनाता रहता है, जल्दी से जल्दी बड़ी से बड़ी सफलता के लिए आतुर रहता है तो मंजिल काफी कठिन हो जायेगी। जो मनोयोग कार्य की गतिविधि को सुसंचालित रखने में लगाना चाहिए था वह शेखचिल्ली के सपने देखने में उलझा रहता है। उन सपनों को इतनी जल्दी साकार देखने की उतावली होती है कि जितना श्रम और समय उसके लिए अपेक्षित है वह उसे भार रूप प्रतीत होता है। ज्यों-ज्यों दिन बीतते जाते हैं त्यों-त्यों बैचेनी बढ़ती जाती है और यह स्पष्टï है कि बैचेन आदमी न तो किसी बात को ठीक तरह सोच सकता है और न ठीक तरह कुछ कर ही सकता है। उसकी गतिविधि अधूरी, अस्त-व्यस्त और अव्यवस्थित हो जाती है। ऐसी दशा में सफलता की मंजिल अधिक कठिन एवं अधिक संदिग्ध होती जाती है। उतावला आदमी सफलता के अवसरों को बहुधा हाथ से गँवा ही देता है।

🔶 एक संत का कथन है कि ‘मुझे नरक में भेज दो, मैं वहाँ भी अपने लिए स्वर्ग बना लूँगा।’  उनका यह दावा इसी आधार पर था कि अपनी निज की अन्त:भूमि परिष्कृत कर लेने पर व्यक्ति में ऐसी सूझ-बूझ की, गुण-कर्म स्वभाव की उत्पत्ति हो जाती है जिससे बुरे व्यक्तियों को भी अपनी सज्जनता से प्रभावित करने एवं उनकी बुराइयों का अपने ऊपर प्रभाव न पडऩे देने की विशेष क्षमता सिद्ध हो सके। यदि ऐसी विशेषता कोई व्यक्ति अपने में पैदा कर ले, तो यही माना जायेगा कि उसने संसार को सुधार लिया।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 2 जनवरी 2018

👉 आज का सद्चिंतन 2 Jan 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 Jan 2018

👉 बड़ा बनना है तो बड़ा सोचो

🔶 एक बार एक बहुत गरीब परिवार का बेरोजगार युवक नौकरी की तलाश में किसी दूसरे शहर जाने के लिए रेलगाड़ी से सफ़र कर रहा था। घर में कभी-कभार ही सब्जी बनती थी, इसलिए उसने रास्ते में खाने के लिए सिर्फ रोटियां ही रखी थी।

🔷 आधा रास्ता गुजर जाने के बाद उसे भूख लगने लगी, और वह टिफिन में से रोटियां निकाल कर खाने लगा। उसके खाने का तरीका कुछ अजीब था, वह रोटी का एक टुकड़ा लेता और उसे टिफिन के अन्दर कुछ ऐसे डालता मानो रोटी के साथ कुछ और भी खा रहा हो, जबकि उसके पास तो सिर्फ रोटियां ही थीं!

🔶 उसकी इस हरकत को आस पास के और दूसरे यात्री देख कर हैरान हो रहे थे। वह युवक हर बार रोटी का एक टुकड़ा लेता और झूठमूठ का टिफिन में डालता और खाता। सभी सोच रहे थे कि आखिर वह युवक ऐसा क्यों कर रहा था। आखिरकार एक व्यक्ति से रहा नहीं गया और उसने उससे पूछ ही लिया कि भैया तुम ऐसा क्यों कर रहे हो, तुम्हारे पास सब्जी तो है ही नहीं, फिर रोटी के टुकड़े को हर बार खाली टिफिन में डालकर ऐसे खा रहे हो मानो उसमे सब्जी हो।

🔷 तब उस युवक ने जवाब दिया, “भैया , इस खाली ढक्कन में सब्जी नहीं है लेकिन मै अपने मन में यह सोच कर खा रहा हूँ कि इसमें बहुत सारा आचार है, मै आचार के साथ रोटी खा रहा हूँ।”

🔶 फिर व्यक्ति ने पूछा, “खाली ढक्कन में आचार सोच कर सूखी रोटी को खा रहे हो तो क्या तुम्हे आचार का स्वाद आ रहा है?”

🔷 “हाँ, बिलकुल आ रहा है, मै रोटी के साथ अचार सोचकर खा रहा हूँ और मुझे बहुत अच्छा भी लग रहा है।”, युवक ने जवाब दिया।

🔶 उसकी इस बात को आसपास के यात्रियों ने भी सुना, और उन्ही में से एक व्यक्ति बोला, “कि भाई! जब तुम्हे सोचना ही था तो तुम आचार की जगह पर कुछ अच्छी सी सब्जी सोचते जैसे, मटर पनीर, शाही पनीर, मलाई कोफ्ता आदि ….तुम्हे इनका स्वाद भी मिल जाता। तुम्हारे कहने के मुताबिक तुमने आचार सोचा तो तुम्हे आचार का स्वाद आया तो अगर तुम और स्वादिष्ट चीजों के बारे में सोचते तो उनका स्वाद भी तुम्हे आता। जब सोचना ही था तो भला छोटा क्यों सोचो बड़ा क्यों नहीं, तुम्हे तो बड़ा सोचना चाहिए था।”

🔷 मित्रों, ये बात हमारी ज़िंदगी के हर पल में लागू होती है। हम जैसा सोचते हैं वैसे ही बन जाते हैं और फिर हमें वैसे ही आनंद आने लगता है। कभी कभी हम बहुत छोटा सोचते हैं और हम उसी के अनुसार कार्य करने लग जाते हैं। बाद में जब वक़्त गुजर जाता है तो हमें एहसास होता है कि अगर हमने थोड़ा और बड़ा और बेहतर सोचा होता तो शायद ज़िंदगी बदल भी सकती थी।

🔶 इसलिए मित्रों, हमेशा बड़े सपने देखो , बड़ा सोचो , बड़े लक्ष्य बनाओ। जब हमारी सोच बड़ी होगी तभी हम कुछ बड़ा कर सकते हैं और तभी हमें कुछ बड़ा मिलेगा।

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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