शनिवार, 7 अक्टूबर 2017

👉 कर्म फल:-

🔴  इन्सान जैसा कर्म करता है कुदरत या परमात्मा उसे वैसा ही उसे लौटा देता है।

🔵  एक बार द्रोपदी सुबह तडके स्नान करने यमुना घाट पर गयी भोर का समय था तभी उसका ध्यान सहज ही एक साधु की ओर गया जिसके शरीर पर मात्र एक लँगोटी थी। साधु स्नान के पश्चात अपनी दुसरी लँगोटी लेने गया तो वो लँगोटी अचानक हवा के झोके से उड पानी मे चली गयी ओर बह गयी।

🔴  सँयोगवस साधु ने जो लँगोटी पहनी वो भी फटी हुई थी। साधु सोच मे पड़ गया कि अब वह अपनी लाज कैसे बचाए थोडी देर मे सुर्योदय हो जाएगा और घाट पर भीड बढ जाएगी।

🔵  साधु तेजी से पानी के बाहर आया और झाडी मे छिप गया। द्रोपदी यह सारा दृश्य देख अपनी साडी जो पहन रखी थी, उसमे आधी फाड कर उस साधु के पास गयी ओर उसे आधी साडी देते हुए बोली-तात मै आपकी परेशानी समझ गयी। इस वस्त्र से अपनी लाज ढँक लीजिए।

🔴  साधु ने सकुचाते हुए साडी का टुकडा ले लिया और आशीष दिया। जिस तरह आज तुमने मेरी लाज बचायी उसी तरह एक दिन भगवान तुम्हारी लाज बचाएगे। और जब भरी सभा मे चीरहरण के समय द्रोपदी की करुण पुकार नारद ने भगवान तक पहुचायी तो भगवान ने कहा-कर्मो के बदले मेरी कृपा बरसती है क्या कोई पुण्य है द्रोपदी के खाते मे।

🔵  जाँचा परखा गया तो उस दिन साधु को दिया वस्त्र दान हिसाब मे मिला जिसका ब्याज भी कई गुणा बढ गया था।

🔴  जिसको चुकता करने भगवान पहुच गये द्रोपदी की मदद करने, दुस्सासन चीर खीचता गया और हजारो गज कपडा बढता गया।

🔵  इंसान यदि सुकर्म करे तो उसका फल सूद सहित मिलता है और दुस्कर्म करे तो सूद सहित भोगना पडता है।

शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

👉 मनुज देवता बने, बने यह धरती स्वर्ग समान (अमृतवाणी भाग 2)

🔴 देवता क्या देते हैं? देवता हजम करने की ताकत देते हैं। जो दुनियाबी दौलत या जिन चीजों को आप माँगते हैं जो आपको खुशी का बायस मालूम पड़ती हैं, उन सारी चीजों को हजम करने के लिए विशेषता होनी चाहिए। इसी का नाम है—देवत्व। देवत्व अगर प्राप्त हो जाता है, तो फिर आप दुनिया की हर चीज से, थोड़ी-से थोड़ी चीजों से लेकर फायदा उठा सकते हैं। अगर वे न भी हो तो काम चल सकता है। ज्यादा चीजें हो जाएँ तो भी अच्छा है, यदि न हो जाएँ तो भी कोई हर्ज नहीं है। लेकिन अगर आप इस बात के लिए उतावले हैं कि जैसे भी पिछड़े हैं वैसे ही बने रहें, तो फिर कुछ कहना सम्भव नहीं है।
  
🔵 मनुष्य के शरीर में ताकत होनी चाहिए लेकिन समझदारी का नियन्त्रण न होने से आग में घी डालने, ईंधन डालने के तरीके से वह सिर्फ दुनिया में मुसीबतें पैदा करेगी। देवता किसी को दौलत देने की गलती नहीं कर सकते। अगर देते हैं तो इसका मतलब है कि तबाही कर रहे हैं। इनसानियत उस चीज का नाम है, जिसमें आदमी का चिन्तन, दृष्टिकोण, महत्त्वाकांक्षाएँ और गतिविधियाँ ऊँचे स्तर की हो जाती है। इनसानियत एक बड़ी चीज है।

🔴 मनोकामनाएँ पूरी करना खराब बात नहीं है, पर शर्त एक ही है कि यह किस काम के लिए, किस चीज के लिए माँगी गई हैं? अगर सांसारिकता के लिए माँगी गई हैं तो उससे पहले यह जानना जरूरी है कि उस दौलत को हजम कैसे कर सकते हैं? उसे खर्च कैसे कर सकते हैं? मनुष्य भूल कर सकता है, पर देवता भूल नहीं कर सकते। देवता आपको चीजें नहीं दे सकते जैसा कि मेरा अपना ख्याल है। देवताओं के सम्पर्क में आने वाले को भौतिक वस्तुएँ नहीं मिलीं। क्या मिला है? आदमी को गुण मिले हैं, देवत्व मिला है।

🔵 सद्गुणों के आधार पर आदमी को विकास करने का मौका मिला है। गुणों के विकसित होने के पश्चात् उन्होंने वह काम किए हैं, जिन्हें सामान्य मनुष्य सामान्य बुद्धि से काम करते हुए नहीं कर सकता। देवत्व के विकसित होने पर कोई भी उन्नति के शिखर पर जा पहुँचा सकता है, चाहे वह सांसारिक हो अथवा आध्यात्मिक। संसार और अध्यात्म में कोई फर्क नहीं पड़ता। गुणों के इस्तेमाल करने का तरीका भर है। गुण अपने आप में शक्ति के पुंज हैं, कर्म अपने आप में शक्ति के पुंज हैं और स्वभाव अपने आप में शक्ति के पुंज हैं। इन्हें कहाँ इस्तेमाल करना चाहते हैं, यह आपकी इच्छा की बात है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मचिंतन के क्षण 6 Oct 2017

🔵 आत्मदर्शन का अर्थ है अन्तःकरण में पवित्रता और प्रखरता का समुचित सम्वर्धन। दर्पण पर धूलि जमी हो या उसके भीतर का रंग उतर गया हो तो फिर उसमें मुख दीख पड़ने का सुयोग न बनेगा। जिसने अपने अन्तःक्षेत्र को टटोला नहीं है, उसे धोया संजोया नहीं है, उसके लिये यह कठिन है कि उस गॅदले क्षेत्र में ईश्वर का आगमन अवतरण या दिव्य-दर्शन की आशा करे। वस्तुतः आत्मशोधन ही प्रभुदर्शन का एक मात्र उपाय है।

🔴 सिंह जब शिकार पर आक्रमण करता है, तो एक क्षण ठहरकर हमला करता है। धनुष पर बाण को चढ़ाकर जब छोड़ा जाता है तो यत्किंचित् रुककर तब बाण छोड़ा जाता है। बन्दूक का घोड़ा दबाने से पहले जरा-सी देर शरीर को साध कर स्थिर कर लिया जाता है, ताकि निशाना ठीक बैठे। इसी प्रकार अभीष्ट उद्देश्य की प्राप्ति के लिये पर्याप्त मात्रा में आत्मिक बल एकत्रित करने के लिये कुछ समय आन्तरिक शक्तियों को फुलाया और विकसित किया जाता है, इसी प्रक्रिया का नाम ‘पुरश्चरण ’ है।

🔵 चोर, उचक्के, व्यसनी, जुआरी भी अपनी बिरादरी निरंतर बढ़ाते रहते हैं । इसका एक ही कारण है कि उनका चरित्र और चिंतन एक होता है। दोनों के मिलन पर ही प्रभावोत्पादक शक्ति का उद्भव होता है। किंतु आदर्शों के क्षेत्र में यही सबसे बड़ी कमी है।

🔴 जिस प्रकार कर्त्तव्यशील पुलिस, न्यायाधीश अथवा राजा को सामने खड़ा देखकर कोई पक्का चोर भी चेारी करने या कानून तोड़ने का साहस नहीं कर सकता। इसी प्रकार जिस व्यक्ति के मन में यह भावना दृढ़तापूर्वक समाई हुई है कि परमात्मा सर्वत्र व्याप्त है और हजार आँखों से उसके हर विचार और कार्य को देख रहा है तो उसकी यह हिम्मत नहीं हो सकती कि कोई पाप गुप्त या प्रकट रूप से करे।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जीवन की सफलता का रहस्य (भाग 4)

🔴 अतः, हमें ऐसा नियम बना लेना चाहिये कि हम जो कुछ भी दें उसको पुनः प्राप्त करने की आशा से न दें और न उसे माँगे ही। नदी जब तक बहती रहती है एवं अपना जल समुद्र में उड़ेलती रहती है तभी तक उसमें बाहर से जल आता रहता है किन्तु जिस क्षण वह समुद्र को जल देना बन्द कर देती है। उसी क्षण उसमें बाहर से जल का आगमन रुक जाता है। जब तक आप देते रहोगे, जब तक बाहर निकालते रहोगे तब तक आपके पास संचय होता रहेगा।

🔵 अतः भिक्षुक न बनो, देने में कृपणता न करो। इसी का लोग ख्याल नहीं करते। कठिनाइयों का पहिले से ही ध्यान रखना चाहिये। और हम रख भी सकते हैं। यह तो बहुत ही सरल कार्य है फिर भी अपनी ही भूल से हम गड्ढे में गिरते हैं। प्रकृति हमें घूँसे का जवाब घूँसे से, लात का लात से और थप्पड़ का थप्पड़ से देने के लिये प्रेरित करती है किन्तु बुद्धिमानी यही है कि हम मौन रहें, अनासक्त रहें, निर्विकार रहें। अपने पर नियन्त्रण रखें।

🔴 कठिनाइयाँ तो बहुत पड़ती हैं इसमें सन्देह नहीं। और इन्हीं के द्वारा हमारा साहस, उत्साह, भंग हो जाता है। किसी के कटु शब्द कह देने पर हमसे निर्विकार शान्त, मौन नहीं रहा जाता। असाधारण स्थिति में मनुष्य और भी भूल करता है, उद्विग्न हो जाता है, किन्तु उस असाधारण स्थिति के पार जाना ही वीरता है। इनसे पार जाने पर, इनसे छुटकारा पाने पर ही वास्तविक सुधार सम्भव है। इसके लिये अपेक्षा है आध्यात्मिक बल की, आध्यात्मिक शक्ति की। इन सब बन्धनों से, दुर्बलताओं से, मायाजाल से छुटकारा प्राप्त करने के लिये हमें, चाहे कितने ही कष्टों का सामना करना पड़े, अपने मार्ग से विचलित नहीं होना चाहिये। वरन् विघ्न-बाधाओं के, कठिनाईयों के आने पर अविचल भाव से उनका सामना करना चाहिये और उसी समय अपनी तत्परता का, शान्ति का, अनासक्ति का परिचय देना चाहिये।

🔵 यह कार्य कठिन है तो अवश्य किन्तु अभ्यास से क्या नहीं हो सकता। हमें अपनी भावना ही ऐसी बना लेनी चाहिये कि चाहे कुछ भी हो हमारे ऊपर उसका प्रभाव नहीं पड़ सकता। यदि हम अपनी अहंमन्यता को मिटा सकें तो हमारे लिये सब कुछ सम्भव है। यदि हम अपने अन्दर यह विचार बैठा रखें कि दुःख और मुसीबतें अकस्मात् और असम्भावित रूप से नहीं आतीं वरन् वे अनिवार्य हैं, हमारे पूर्व कर्मों के फल अच्छे या बुरे हमें अवश्य मिलेंगे, तो फिर हम निश्चिन्त रहेंगे। हमें कोई परेशानी न होगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 स्वामी विवेकानन्द
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1950 पृष्ठ 8

👉 आज का सद्चिंतन 6 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 Oct 2017

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

👉 जीवन की सफलता का रहस्य (भाग 3)

🔴 भिक्षुक क्या कभी सुखी रह सकता है? यदि उसको कोई कुछ देता है तो वह घृणा के भाव से। और इसीलिये भिक्षुक को जो कुछ मिलता है उसका आनन्द वह नहीं उठा सकता। उसी प्रकार हम सभी भिक्षुक हैं। हम जो कुछ भी करते हैं उसका बदला पाने की आशा करते हैं। हम लोगों की बुद्धि व्यापारिक हो गयी है। जीवन में, सुकृति में प्रेम में सब में हम लोग व्यापारी बन गये, तो जब हमारे अन्दर व्यापारिक बुद्धि का प्रवेश होगा तो फिर व्यापार की सभी अवस्थाओं का सामना भी करना पड़ेगा। व्यापार में आदान-प्रदान, क्रय-विक्रय, मन्दी-तेजी, हानि-लाभ सभी होते हैं और हमें उन सबको भोगना पड़ेगा। बस यहीं मनुष्य फंसता है, इसी जगह उसकी कठिनाई आरम्भ होती है। स्पृहा, अभिलाषा और आशा जहाँ शुरू हुई कि दुःख स्रोत उमड़ पड़ा।

🔵 अतः जो निस्वार्थ कर्म करेगा, जो पुनः वापस पाने कि इच्छा रखकर कार्य नहीं करेगा वही सफल होगा, वही दुःखों से मुक्त रहेगा। कितने ही लोग कहेंगे, “यह तो विचित्र बात है, असम्भव है, गलत है। रोज ही हम देखते हैं कि सीधा सादा, सरल निस्वार्थ कर्मी ठगा जाता है, हानि उठाता रहता है। भगवान ईसा ने सेवा की भावना रख कर कर्म किया, उनका कर्म केवल कर्म के लिये था। फल के लिये उनके अन्दर तनिक भी आसक्ति न थी फिर भी उनको प्राण गंवाना पड़ा। किन्तु साथ ही साथ यह भी हम जानते हैं कि ईसा के आत्मबलिदान ने जगत को वह अमूल्य निधि दी जिसका ठिकाना नहीं। ईसा का उद्देश्य सफल हुआ, अपने लक्ष्य को उन्होंने प्राप्त कर लिया।

🔴 आप जो कुछ भी करो, जो कुछ भी दो उसका बदला न चाहो। जो कुछ भी दे सको दो, जहाँ तक हो सके करो, इसका फल आपको हजार गुना मिलेगा किन्तु आप आशा न करो, अभिलाषा न करो, माँगो नहीं। जीवन देना ही तो है और क्या है? यदि आप देना बन्द कर दोगे या नहीं देना चाहोगे तो प्रकृति आपका गला दबा कर आपसे ले लेगी। आप सोचते हो कि जीवन संग्रह करने के लिये है, हाथ बन्द करने के लिये हैं किन्तु जब प्रकृति आपका गला दबा कर आपका हाथ खोल देती, तब आपको इस बात का ज्ञान होता कि वास्तव में जीवन देने के लिये बना था। मरने के बाद सिकन्दर के दोनों हाथ खुले हुए बाहर निकल कर लटक रहे थे। उसने इस ध्रुव सत्य को समझ लिया था कि जीवन में कुछ संचय नहीं किया जा सकता, यह तो देने के ही लिये बना था। इसी को प्रारम्भ में लोग नहीं समझते किन्तु एक समय ऐसा आता है जब विवश होकर उन्हें समझना पड़ता है। लेकिन यदि हममें इतनी बुद्धि होती कि हम प्रकृति के इस रहस्य को समझते, भगवान के उपदेशों के अनुसार चलते तो दुःख किस बात का था।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 स्वामी विवेकानन्द
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1950 पृष्ठ 7

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/July/v1.7

👉 आज का सद्चिंतन 5 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 Oct 2017


बुधवार, 4 अक्टूबर 2017

👉 मनुज देवता बने, बने यह धरती स्वर्ग समान (अमृतवाणी भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियो! भाइयो!!

🔴 देवताओं के अनुग्रह की बात आप सबने सुनी होगी। देवता नाम ही इसलिए रखा गया है कि, वे दिया करते हैं। प्राप्त करने की इच्छा से कितने ही लोग उनकी पूजा करते हैं, उपासना करते हैं, भजन करते हैं, आइए—इस पर विचार करें।
  
🔵 देवता देते तो हैं, इसमें कोई शक नहीं है। अगर वे देते न होते तो उनका नाम देवता न रखा गया होता। देवता का अर्थ ही होता है—देने वाला। देने वाले से अगर माँगने वाला कुछ माँगता है तो कोई बेजा बात नहीं है। पर विचार करना पड़ेगा कि, आखिर देवता देते क्या चीज हैं? देवता वही चीज देते हैं जो उनके पास है। जिसके पास जो चीज होगी, वही तो दे पाएगा। देवता के पास सिर्फ एक चीज है और उसका नाम है—देवत्व। देवत्व कहते हैं—गुण, कर्म और स्वभाव-तीनों की अच्छाई को, श्रेष्ठता को। इतना देने के बाद में देवता निश्चिन्त हो जाते हैं, निवृत्त हो जाते हैं और कहते हैं कि, जो हम आपको दे सकते थे हमने वह दे दिया। अब आपका काम है कि, जो चीज हमने दी है, उसको जहाँ भी आप मुनासिब समझें, वहाँ इस्तेमाल करें और उसी किस्म की सफलता पाएँ।

🔴 दुनिया में सफलता एक चीज के बदले में मिलती है और वह है—आदमी का उत्कृष्ट व्यक्तित्व। इससे कम में कोई चीज नहीं मिल सकती। अगर कहीं से किसी ने घटिया व्यक्तित्व की कीमत पर किसी तरीके से अपने सिक्के को भुनाए बिना, अपनी योग्यता का सबूत दिए बिना, परिश्रम के बिना, गुणों के अभाव में, कोई चीज प्राप्त कर ली है तो वह उसके पास ठहरेगी नहीं। शरीर में हजम करने की ताकत न हो तो जो खुराक आपने खाई है, वह आपको हैरान करेगी, परेशान करेगी। इसी तरह सम्पत्तियों को, सुविधाओं को हजम करने के लिए गुणों का माद्दा नहीं होगा तो वे आपको तंग करेंगी, परेशान करेंगी। अगर गुण नहीं है तो जैसे-जैसे दौलत बढ़ती जाएगी वैसे-वैसे आपके अन्दर दोष-दुर्गुण बढ़ते जाएँगे, व्यसन बढ़ते जाएँगे, अहंकार बढ़ता जाएगा और आपकी जिन्दगी को तबाह कर देगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्वास्थ्य का रहस्य

🔴 तब बीमारियाँ एक पहाड़ पर रहा करती थीं। उन दिनों की बात है, एक किसान को जमीन की कमी महसूस हुई। अतः उसने पहाड़ काटना शुरु कर दिया। पहाड़ बड़ा घबराया, उसने बीमारियों को आज्ञा दी-बेटियो! टूट पड़ो इस किसान पर और इसे नष्ट-भ्रष्ट कर डालो। बीमारियाँ डंड-बैठक लगाकर आगे बढ़ी और किसान पर चढ़ बैठी। किसान ने किसी की परवाह नहीं की और डटा रहा अपने काम में। शरीर से पसीने की धार निकली और उसी में लिपटी हुई बीमारियाँ भी बह गई। पहाड़ ने क्रुद्ध होकर शाप दे दिया-मेरी बेटी होकर तुमने मेरा इतना काम भी नहीं किया, अब जहाँ हो वहीं पड़ी रहो। तब से बीमारियाँ परिश्रमी लोगों पर असर नहीं कर पातीं। गंदे और आलसी लोग ही उनके शिकार होते हैं।

👉 महाकाल से प्रार्थना

🔴 हे महाकाल!  उज्ज्वल भविष्य की रचना के लिए-अपने संकल्पों को पूरा करने के लिए हमें उपयुक्त शक्ति, मनोवृत्ति तथा प्रेरणा दें। हे प्रभो ! हमारे संकल्प पूरे हों। हम सुख-सौभाग्य, श्रेय-पुण्य तथा आपकी कृपा के अधिकारी बनें। आपसे दिव्य अनुदान पाने और उन्हें जन-जन तक पहुँचाने की हमारी पात्रता बढ़ती रहे।

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 142)

🌹  इन दिनों हम यह करने में जुट रहे है

🔵 हमारी जिज्ञासाओं एवं उत्सुकताओं का समाधान गुरुदेव प्रायः हमारे अंतराल में बैठकर ही किया करते हैं। उनकी आत्मा हमें अपने समीप ही दृष्टिगोचर होती रहती है। आर्षग्रंथों के अनुवाद से लेकर प्रज्ञा पुराण की संरचना तक जिस प्रकार लेखन प्रयोजन में उनका मार्गदर्शन अध्यापक और विद्यार्थी जैसा रहा है, हमारी वाणी भी उन्हीं की सिखावन को दुहराती रही है। घोड़ा जिस प्रकार सवार के संकेतों पर दिशा और चाल बदलता रहता है, वही प्रक्रिया हमारे साथ भी कार्यान्वित होती रही है।

🔴 बैटरी चार्ज करने के लिए जब हिमालय बुलाते हैं, तब भी वे कुछ विशेष कहते नहीं। सेनीटोरियम में जिस प्रकार किसी दुर्बल का स्वास्थ्य सुधर जाता है, वही उपलब्धियाँ हमें हिमालय जाने पर हस्तगत होती हैं। वार्तालाप का प्रयोग अनेक प्रसंगों में होता रहता है।

🔵 इस बार सूक्ष्मीकरण की प्रक्रिया और साधना विधि तो ठीक तरह समझ में आ गई और जिस प्रकार कुन्ती ने अपने शरीर में से देव संतानें जन्मीं थीं, ठीक उसी प्रकार अपनी काया में विद्यमान पाँच कोशों, अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोषों को पाँच वीरभद्रों के रूप में विकसित करना पड़ेगा, इसकी साधना विधि भी समझ में आ गई। जब तक वे पाँचों पूर्ण समर्थ न हो जाएँ तब तक वर्तमान स्थूल शरीर को उनके घोंसले की तरह बनाए रहने का भी आदेश है और अपनी दृश्य स्थूल जिम्मेदारियाँ दूसरों को हस्तांतरित करने की दृष्टि से अभी शान्तिकुञ्ज ही रहने का निर्देश है।

🔴 यह सब स्पष्ट हो गया। सावित्री साधना का विधान भी उनका निर्देश मिलते ही इस निमित्त आरम्भ कर दिया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 King in Dreams

🔴 A young man dreamt that he was the king of a big empire. His joy knew no bounds after getting such a prized position instantaneously in the dream. In the morning father told him to go to work, mother asked him to go and bring the wood after cutting. Wife asked to bring something from the market but the man didn’t do any work and told that,” I am the king, how can I do any work?”.

🔵 Everyone at home was bewildered at his behavior. Then her little sister took charge of situation. She fed everyone in the house except her brother. When he couldn’t bear the hunger, he asked his sister, “Wont she serve him the food? “, to which she replied, “O king, let the night come, angels will descend here and server you food according to your status. You won’t get satisfaction from our simple food.”

🔴 He finally accepted the truth and stopped wandering in useless thoughts and got food only after he promised that he would work towards attaining the real and eternal truth and will from now on work industriously.

🌹 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 2 Oct 2017

🔵 दूसरों की अच्छाइयों को ढूंढ़ने, उन्हें देख-देखकर प्रसन्न होने एवं उनकी प्रशंसा करते रहने का स्वभाव यदि हम अपना बना लें तो यह सारी दुनिया हमें एक सुरम्य सुगंधित बगीचे की तरह मनोरम दिखाई देगी। हर व्यक्ति और हर वस्तु में कुछ न कुछ अच्छाई मौजूद है। हमारे लिये इतना ही पर्याप्त है। शहद की मक्खी के लिए, इतना ही पर्याप्त है कि फूल में मिठास के तनिक से कण मौजूद हों, जब एक नन्हीं-सी विद्या और बुद्धि से हीन मक्खी इतना कर सकती है कि फूल में से अपने काम की जरा सी चीज को निकालने मात्र का ध्यान रखे और अपना छत्ता मीठे शहद से भर ले तो क्या हम ऐसा नहीं कर सकते कि लोगों के अंदर उपस्थित अच्छाइयों को ही तलाश करें भले ही वे थोड़ी-सी ही मात्रा में क्यों न हों। यदि हमारी दृष्टि ऐसी रहे तो हमें अपने चारों और सज्जन एवं स्नेही ही दिखाई देंगे। हमारा मन घड़ी प्रसन्नता और संतोष से ही भरा रहेगा।

🔴 ताली एक हाथ से नहीं बजती। अन्य व्यक्ति दुर्जन भी हो तो हमारी सज्जनता उनके हथियारों को व्यर्थ बना देगी। सड़क टूट हुई हो, जगह-जगह गड्ढे हों तो मोटर में बैठने वाले को दचके लगने स्वाभाविक हैं, पर बहुत बढ़िया किस्म की मोटर जिसमें लचकदार कामनी या स्प्रिंगदार सीटें हों-उस टूटी सड़क पर भी किसी यात्री को सुविधा पूर्वक यात्रा करा सकती है। दुनिया में बुरे लोग हैं- ठीक है- पर यदि हम अपनी मनोभूमि को सहनशील, धैर्यवान, उदार और गुदगुदी बना लें तो बढ़िया मोटर में बैठने वाले यात्री की तरह इस टूटी सड़क वाली दुनिया में भी आनंद पूर्वक यात्रा कर सकते हैं।

🔵 जो उपलब्ध है उसे कम या घटिया मानकर अनेक लोग दुःखी रहते हैं और अपने भाग्य को कोसते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि अधिक ऊंची किस्म के सुख-साधन, सामग्री प्राप्त करने के लिए उतावले होकर लोग अनुचित रीति से भी उन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं और अन्याय और अत्याचार करने में भी नहीं चूकते। यह मार्ग समाज में अशान्ति और अपने लिये दुष्परिणाम उत्पन्न करने वाला ही है। ऐसे अनुचित कदम उठने में वह असन्तोष ही मुख्य कारण है जिससे, और अधिक मात्रा में, और अधिक बढ़िया किस्म की वस्तुएं प्राप्त करने की लालसा लगी रहती है। यदि हम इन लालसाओं पर नियंत्रण कर लें, अपना स्वभाव सन्तोषी बना लें, तो मामूली वस्तुओं से भी काम चलाते हुए प्रसन्न रह सकते हैं। अपने से भी कहीं अधिक गिरी स्थिति में, गरीबी में दिन गुजारने वाले लाखों करोड़ों व्यक्ति मौजूद है। उनकी तुलना में हम कहीं अधिक अच्छी स्थिति में माने जा सकते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जीवन की सफलता का रहस्य (भाग 2)

🔴 अतः हमारे दुःखों का, कष्टों का सबसे बड़ा कारण आसक्ति है। इसीलिये, भगवान कृष्ण ने कहा है कि अनासक्त होकर कर्म करो। कर्म करो। कर्म करो। किन्तु उसके फल के प्रलोभन में न पड़ो जब चाहे उस कर्म-चक्र से अलग हो जाने की क्षमता अपने अन्दर रखो। चाहे कोई हो उससे अपने को अलग कर लेना होगा। जीवन का नाम ही संघर्ष है अशक्तों, अपाहिजों और दुर्बलों के लिये यह जीवन या कर्म-क्षेत्र संसार नहीं बना है। दुर्बलता से ही सब प्रकार की तकलीफें, चाहे वे शारीरिक हों या मानसिक, उत्पन्न होती हैं। दुर्बलता मृत्यु है, शक्ति समृद्धि है, जीवन है, अमरत्व है।

🔵 साँसारिक आनन्द आसक्ति से ही हमको प्राप्त होते हैं हम अपने सम्बन्धियों के प्रति, अपने सत्कार्यों के प्रति एवं संसार के प्रति आसक्त हो जाते हैं और फिर अन्त में यही सुख, यही आनन्द दुःख में करुणा में परिणत हो जाता है। सुख भोगने के लिये आसक्ति हीन होना अत्यावश्यक है। यदि कोई अनासक्त हो तो वह कभी दुःखी हो ही नहीं सकता। संसार में वही व्यक्ति अत्यधिक सुखी और सम्पन्न है जिसके अन्दर साँसारिक पदार्थों से अपने को आसक्त रखते हुए भी अनासक्त कर लेने की सामर्थ्य हो। जो संसार में रहते हुए भी, संसार के पदार्थों का उपयोग करते हुए भी, जब चाहे अपने को उनसे विरक्त करले और उसके मनमें उनके प्रति तनिक भी अनुराग न रखे उसी का जीवन सफल है।

🔴 कितने ऐसे मनुष्य होते हैं जो संसार के किसी पदार्थ से प्रेम नहीं करते, उनके भीतर किसी भी लौकिक वस्तु के प्रति सद्भाव नहीं होता। वे निर्दय, निर्मम, निष्ठुर होते हैं। निस्सन्देह वे अनेक प्रकार की कठिनाइयों, मुसीबतों से बच जाते हैं। किन्तु वैसे तो निर्जीव पत्थर की चट्टान को भी कोई शोक नहीं होता, कोई वेदना नहीं होती। लेकिन क्या हम सजीव मनुष्य की तुलना पत्थर की चट्टान से कर सकते हैं? ऐसा कभी नहीं हो सकता। मनुष्य मनुष्य ही है पत्थर पत्थर ही है। जो कुलिषवत् कठोर होते हैं, नितान्त एकाकी होते हैं, वे चाहे कष्ट न भोगें पर जीवन के बहुत से आनन्दों का भी उपभोग करने से वे वंचित रह जाते हैं। ऐसा भी जीवन क्या कोई जीवन है? कुशल चतुर व्यक्ति तो वही है जो सब प्रकार से संसार में रह कर, सब तरह के कार्यक्रम पूरा कर, सब की सेवा कर, सब से प्रेम कर फिर भी सब से अलग रहता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 स्वामी विवेकानन्द
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1950 पृष्ठ 7
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/July/v1.7

👉 आज का सद्चिंतन 4 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 Oct 2017


मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

👉 सहज़ जीवन साधना के सूत्र :-

🔴 एक निःसन्तान सेठ अपने लिए उत्तराधिकारी की तलाश में था उसने नगर के इक्छुक युवकों को बुलाया और प्रत्येक को एक बिल्ली और एक गाय दी कहा एक माह में बिल्ली को इतना दूध पिला के तृप्त कर दो क़ि जब मैं एक माह बाद उसके समक्ष दूध रखूँ वो न पिए। जिसकी बिल्ली तृप्त होगी उसे मैं अपना उत्तराधिकारी बनाऊंगा।
               
🔵 सबने बिल्ली की खूब खातिरदारी की और उसे खिला पिला के मोटा तन्दरूस्त कर दिया और गाय की उपेक्षा कर दी।

🔴 लेकिन एक युवक ने सोचा सेठ कितना मूर्ख है गाय की सेवा न बोल के बिल्ली की सेवा करवाता है। उसने उल्टा काम किया गाय की खूब सेवा कर उसे खिला पिला के मोटा तन्द्तुस्त किया गाय ने खूब दूध दिया सारे परिवार ने आनंद से खाया और सारा परिवार तन्दरूस्त हुआ। बिल्ली को उसने सिर्फ आवश्यक भोजन करवाया और उसके सामने गर्म दूध रख देता। जैसे ही बिल्ली पीती उसके मुँह में बहुत मारता। मार खाने की वज़ह से बिल्ली दूध से डर गयी।

🔵 प्रतियोगिता के दिन सबकी तन्दरूस्त बिल्लियाँ दूध पर टूट पड़ी, गाय की उपेक्षा हुई। लेकिन उस युवक की पतली दुबली बिल्ली ने दूध को मुँह भी न लगाया और वह युवक विजयी हुआ और सेठ का उत्तराधिकारी बना। उसकी गाय भी सबसे ज़्यादा स्वस्थ थी।

🔴 सेठ ने युवक से पूंछा तुमने बिल्ली के बजाय गाय की सेवा की और तुम्हारी बिल्ली तुम्हारे नियंत्रण में कैसे?

🔵 युवक ने कहा इस संसार में बिल्ली को अनावशयक खिला के सन्तुष्ट नहीँ किया जा सकता उसे सिर्फ दण्ड से नियंत्रित किया जा सकता है। गाय की सेवा से उसने ज्यादा दूध दिया जिसे खा के और दूध बेच के मेरी आर्थिक स्थिति ठीक हुई।

🔴 मित्रों यही बात हमारे जीवन पर लागू होती है कामना-वासना रुपी बिल्ली अनावश्यक-अत्यधिक पूर्ती से कभी तृप्त न होगी। उस पर कठोरता से संयम करना होगा।

👉 परोपकारी विसाोबा

🔴 महाराष्ट्र के ओढिया नागनाथ नामक ग्राम में विसोवा नामक एक सज्जन रहते थे। वे सोने चाँदी का काम करते थे। धनी भी थे और भगवान के भक्त भी। उस क्षेत्र में दुर्भिक्ष पड़ता है। विसोबा के पास जो कुछ था उसे वे अकाल पीड़ितों को खिला देते हैं। फिर भी लोग भूख से प्राण त्यागते ही जाते है। विसोबा सोचते है मेरी साख है, क्यों न ऋण लेकर भूखों का पेट भरूँ? जब दुर्भिक्ष समाप्त हो जाएगा तब मैं ऋण चुका दूँगा। अपनी पत्नी से सलाह करते है उसे भी यह बात पसंद आ जाती है। और सब तो निर्धन हो चुके थे, एक निर्दय पठान ही धनी था उसी के यहाँ अन्न भी था। विसोबा उसे ऋण लेकर भूखे भरती को अन्न बाँटने लगे। चुगलखोरों ने पठान से विसोबा के दिवालिया होने की बात कह दी। पठान ने अपना ऋण तुरन्त लौटाने का तकाजा किया, मुसलमानी राज्य में पठानों की तूती बोलती थी। कुछ न्याय भाव था नहीं, वे चाहे जिसका जो कर डाल सकते थे, उसने मुश्किल से सात दिन की मोहलत दी। विसोबा ऋण कहाँ से चुकाते उनके पास कुछ भी न था।

🔵 जब ऋण चुकाने का कोई प्रबन्ध न हो सका तो पठान बिसोवा को अत्यन्त क्रूरता पूर्वक यातनाऐं देने लगे और अपमानित करने लगे फिर भी बिसोवा क्षुब्ध न हुए बराबर यही कहते रहे मैंने आपका ऋण अवश्य लिया है और जिस दिन भी मेरे पास व्यवस्था हो जाएगी आपको अवश्य चुका दूँगा। आप चाहे तो मुझे और मेरे परिवार को ऋण के बदले में पशु की तरह खरीद कर अपने यहाँ जन्म भर के लिए गुलाम भी रख सकते है।

🔴 बिसोबा का मुनीम अपने स्वामी को इस दुर्दशा को न देख सका उसने अपनी सारी संचित पूँजी पठान को देकर अपने परोपकारी स्वामी का उद्धष्ट कराया। इसके बद वह मुनीम भी विसोबा के साथ पूर्ण श्रद्धा के साथ ईश्वर भक्ति एवं परोपकार में लग गया।

🔵 ईश्वर भक्ति जिसके हृदय में आती है उसके साथ ही करुणा दिया और परोपकार की भावना भी अवश्य उपजती है। जो भक्त तो बने, पर निष्ठुर और कंजूस हो उसकी भक्ति ढोंग मात्र है।

🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 जीवन की सफलता का रहस्य (भाग 1)

🔴 अपने जीवन में सबसे बड़ी और मूल्यवान बात जो मैंने सीखी है वह है-साध्य से अधिक साधना की ओर ध्यान देना। यही सफलता का रहस्य है। हम लोगों में सबसे बड़ा दोष यही है कि हम लोग लक्ष्य की ही ओर ध्यान देते हैं और साधन की, कार्यप्रणाली की, ब्यौरे की बातों को भूल जाते हैं। और इसीलिये इसका परिणाम यह होता है कि यदि हम अपने लक्ष्य पर एक बार पहुँच भी गये, यदि हमको एक बार सफलता मिल भी गयी तो भी हमारी वह सफलता स्थायी नहीं होती और हम शीघ्र ही फिसल जाते हैं। हमें सबसे पहले यह बात ध्यान में बैठा लेनी चाहिये कि हमारी कार्यप्रणाली की शुद्धता और अशुद्धता पर ही कार्य का फलाफल निर्भर करता है। यदि हमारी प्रणाली ठीक न रही तो फल कभी ठीक नहीं हो सकता। पद्धति पर ध्यान देने से परिणाम आशा और अभिलाषा के अनुरूप ही होगा इसमें तनिक भी संशय नहीं। प्रणाली की विशुद्धता ही फल है।

🔵 अतः हमें चाहिये कि अपना सारा ध्यान कर्म और उसकी प्रणाली पर ही रखें, उसकी पूर्ति के प्रलोभन में तनिक भी न फंसें। गीता का भी यही उपदेश है कि हमें निरन्तर अपने कर्म में लगे रहना चाहिये, फल की स्पृहा करना उसके पीछे अन्धा होना पतन की जड़ है। इसीलिये गीता का कथन है कि सब कर्मों को करते हुए भी उनसे अनासक्त रहें। आसक्ति होना ही बुरा है। संसार में हम कर्म करने के लिये आते हैं। किन्तु कर्मफल के लिये हमारे अन्दर जो स्पृहा, जो लोभ होता है वह हमारा सत्यानाश कर देता है।

🔴 हम नित्य देखते हैं कि मधुमक्षिका फूलों का रस चूसने के लिये आती है किन्तु चलते समय उन फूलों के रस में उसके पर फंस जाते हैं और वह विवश हो जाती है इसका कारण उसके अन्दर मधु के प्रति आसक्ति है। उसी प्रकार हम भी इस विश्व में केवल कर्म करने के लिये आते हैं किन्तु अपनी मूर्खता से उसके फल के प्रति आसक्ति रखने के कारण संसार में ही फंस जाते हैं। फल इसका बड़ा घातक होता है। हमारी स्वतंत्रता छिन जाती है, हम गुलाम हो जाते हैं। प्रकृति से हम सब चीजें प्राप्त करना चाहते हैं, किन्तु अन्त में प्रकृति हमसे सभी चीजें छीन लेती है और हमको ठुकरा देती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 स्वामी विवेकानन्द
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1950 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/July/v1.6

👉 आज का सद्चिंतन 3 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 Oct 2017


सोमवार, 2 अक्टूबर 2017

👉 कर्मकाण्ड ही सब कुछ नहीं है

🔴 एक धनी व्यक्ति ने सुन रखा था कि भागवत पुराण सुनने से मुक्ति हो जाती है। राजा परीक्षित को इसी से मुक्ति हुई थी। उसने एक पंडित जी को भगवान की कथा सुनाने को कहा। कथा पूरी हो गई पर उस व्यक्ति के मुक्ति के कोई लक्षण नजर न आये। उसने पंडित जी से इसका कारण पूछा- पंडित जी ने लालच वश उत्तर दिया। यह कलियुग है इसमें चौथाई पुण्य होता है। चार बार कथा सुनो तो एक कथा की बराबर पुण्य होगा। धनी ने तीन कथा की दक्षिणा पेशगी दे दी और कथाऐं आरम्भ करने को कहा। वे तीनों भी पूरी हो गई पर मुक्ति का कोई लक्षण तो भी प्रतीत न हुआ। इस पर कथा कहने और सुनने वाले में कहासुनी होने लगी।

🔵 विवाद एक उच्च कोटि के महात्मा के पास पहुँचा। उसने दोनों को समझाया कि केवल बाह्य क्रिया से नहीं आन्तरिक स्थिति के आधार पर पुण्य फल मिलता है। राजा परीक्षित मृत्यु को निश्चित जान संसार से वैराग्य लेकर आत्म कल्याण में मन लगाकर कथा सुन रहा था। वीतराग शुकदेव जी भी पूर्ण निर्लोभ होकर परमार्थ की दृष्टि से कथा सुना रहे थे। दोनों की अन्तःस्थिति ऊँची थी इसलिए उन्हें वैसा ही फल मिला। तुम दोनों लोभ मोह में डूबे हो। जैसे कथा कहने वाले वैसे सुनने वाले, इसलिए तुम लोगों को पुण्य तो मिलेगा पर वह थोड़ा ही होगा। परीक्षित जैसी स्थिति न होने के कारण वैसे फल की भी तुम्हें आशा नहीं करनी चाहिए।

🔴 आत्म कल्याण के लिए बाह्य कर्मकाण्ड से ही काम नहीं चलता। उसके लिए उच्च भावनायें होना भी आवश्यक है।

🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 आत्मचिंतन के क्षण 2 Oct 2017

🔵 यदि हम अपने आपसे सच्चे और सज्जन हों तो हमें सदा दूसरों की भलाइयाँ और अच्छाइयाँ दृष्टिगोचर होंगी। जिस प्रकार हम किसी के सुन्दर चेहरे को ही बार-बार देखते हैं उसी से प्रभावित होते हैं और प्रशंसा करते हैं। यद्यपि उसी मनुष्य के शरीर से मलमूत्र के दुर्गन्धपूर्ण कुरूप और कुरुचिपूर्ण स्थान भी हैं पर उनकी ओर न तो ध्यान देते हैं और न चर्चा करते हैं। इसी प्रकार सुरुचिपूर्ण मनो-भावना के व्यक्ति आमतौर से दूसरों के सद्गुणों को ही निरखते-परखते रहते हैं। उसके द्वारा जो अच्छे काम बन पड़े हैं उन्हीं की चर्चा करते हैं। उसके प्रशंसक और मित्र बनकर रहते हैं। आलोचकों और निन्दकों की अपेक्षा आत्मीयता, सद्भाव रखने वाला व्यक्ति किसी की बुराई को अधिक जल्दी और अधिक सरलता पूर्वक दूर कर सकता है।

🔴 कोई व्यक्ति जो अपने को सज्जन और समझदार मानता है उस पर यह जिम्मेदारी अधिक मात्रा में आती है कि वह सामान्य लोगों की अपेक्षा अपने में कुछ असामान्य गुण सिद्ध करे। सामने वाले से मतभेद होने पर उसे बुरा भला कहना निन्दा या अपमान भरे शब्द कहना, लड़-झगड़ पड़ना इतना तो निम्नकोटि के लोग भी करते रहते हैं। कुँजड़े और कंजड़ भी इस नीति से परिचित हैं? यदि इसी नीति को वे लोग भी अपनावें जो अपने को समझदार कहते हैं तो वे उनका यह दवा करना निस्सार है कि हम उस मानसिक स्तर के हैं। कुँजड़े-कंजड़ जैसे फूहड़ शब्द इस्तेमाल करते हैं इसे भले ही उनने न किए हों, शिक्षित होने के कारण वे साहित्यिक शब्दों का प्रयोग कर सकते हैं पर नीति तो वही रही, भावना तो वही रही, क्रिया तो वही रही। वे अपने आपको शिक्षित कुँजड़ा या कंजड़ कह सकते हैं, इतनी ही उनकी विशेषता मानी जा सकती है।

🔵 हर समझदार आदमी पर यह जिम्मेदारी आती है कि वह जिनकी निन्दा करना चाहता है उनकी अपेक्षा अपने आपको अधिक ऊंचा, अधिक सभ्य और अधिक सुसंस्कृत सिद्ध करे। यह भी तभी हो सकता है जब वह अपने में अधिक सहिष्णुता, अधिक प्यार, अधिक आत्मीयता, अधिक सज्जनता, अधिक उदारता और अधिक क्षमाशीलता धारण किये होना प्रमाणित करे। इन्हीं गुणों के आधार उसके बड़प्पन की तौल की जायेगी। यदि कभी भी दो व्यक्तियों में से एक को चुनना पड़े, एक को महत्व देना पड़े तो बाहर के विवेकशील आदमी इसी आधार पर महत्व देंगे कि किसने अधिक उदारता और सज्जनता का परिचय दिया। जिसमें यह अधिकता पाई जायेगी उसी की ओर लोगों की सहज सहानुभूति आकर्षित होगी। पर यदि ऐसा नहीं है तो दोनों एक ही स्तर पर रखे जायेंगे। दोनों की निन्दा की जायेगी और लोग उनके बीच में पड़ने की अपेक्षा उनसे दूर रहना ही पसंद करेंगे।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

👉 ●●● परिचय ○○○

🔴 एक संन्यासी सारी दुनिया की यात्रा करके भारत वापस लौटा था। एक छोटी सी रियासत में मेहमान हुआ।
                 
🔵 उस रियासत के राजा ने जाकर संन्यासी को कहा :- स्वामी! एक प्रश्न बीस वर्षो से निरंतर पूछ रहा हूं। कोई उत्तर नहीं मिलता। क्या आप मुझे उत्तर देंगे ?

🔴 स्वामी ने कहा :- निश्चित दूंगा। उस संन्यासी ने उस राजा से कहा :- आज तुम खाली नहीं लौटोगे। पूछो।

🔵 उस राजा ने कहा :- मैं ईश्वर से मिलना चाहता हूं। ईश्वर को समझाने की कोशिश मत करना। मैं सीधा मिलना चाहता हूं।

🔴 उस संन्यासी ने कहा :- अभी मिलना चाहते हैं कि थोड़ी देर ठहर कर?

🔵 राजा ने कहा : - माफ़ करिए, शायद आप समझे नहीं। मैं परम पिता परमात्मा की बात कर रहा हूं। आप यह तो नहीं समझे कि किसी ईश्वर नाम वाले आदमी की बात कर रहा हूं। जो आप कहते हैं कि अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हो ?

🔴 उस संन्यासी ने कहा: महानुभाव!  भूलने की कोई गुंजाइश नहीं है। मैं तो चौबीस घंटे परमात्मा से मिलाने का धंधा ही करता हूं। अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हैं। सीधा जवाब दें।बीस साल से मिलने को उत्सुक हो और आज वक्त आ गया तो मिल लो।

🔵 राजा ने हिम्मत की, उसने कहा :- अच्छा मैं अभी मिलना चाहता हूं मिला दीजिए।

🔴 संन्यासी ने कहा: - कृपा करो! इस छोटे से कागज पर अपना नाम पता लिख दो ताकि मैं भगवान के पास पहुंचा दूं कि आप कौन हैं।

🔵 राजा ने लिखा - अपना नाम, अपना महल, अपना परिचय, अपनी उपाधियां और उसे दीं।

🔴 वह संन्यासी बोला कि महाशय, ये सब बाते मुझे झूठ और असत्य मालूम होती हैं जो आपने कागज पर लिखीं।

🔵 उस संन्यासी ने कहा :- मित्र! अगर तुम्हारा नाम बदल दें तो क्या तुम बदल जाओगे? तुम्हारी चेतना, तुम्हारी सत्ता, तुम्हारा व्यक्तित्व दूसरा हो जाएगा?

🔴 उस राजा ने कहा :- नहीं, नाम के बदलने से मैं क्यों बदलूंगा? नाम नाम है, मैं मैं हूं।

🔵 तो संन्यासी ने कहा:- एक बात तय हो गई कि नाम तुम्हारा परिचय नहीं है। क्योंकि तुम उसके बदलने से बदलते नहीं। आज तुम राजा हो, कल गांव के भिखारी हो जाओ तो बदल जाओगे?

🔴 उस राजा ने कहा:- नहीं।राज्य चला जाएगा।भिखारी हो जाऊंगा। लेकिन मैं क्यों बदल जाऊंगा?

🔵 मैं तो जो हूं हूं। राजा होकर जो हूं। भिखारी होकर भी वही होऊंगा।

🔴 न होगा मकान, न होगा राज्य, न होगी धन- संपति, लेकिन मैं? मैं तो वही रहूंगा जो मैं हूं।

🔵 तो संन्यासी ने कहा:- तय हो गई दूसरी बात कि राज्य तुम्हारा परिचय नहीं है।क्योंकि राज्य छिन जाए तो भी तुम बदलते नहीं।

🔴 तुम्हारी उम्र कितनी है? उसने कहा: - चालीस वर्ष।

🔵 संन्यासी ने कहा:- तो पचास वर्ष के होकर तुम दुसरे हो जाओगे? बीस वर्ष या जब बच्चे थे तब दुसरे थे?

🔴 उस राजा ने कहा:- नही। उम्र बदलती है, शरीर बदलता है लेकिन मैं? मैं तो जो बचपन में था, जो मेरे भीतर था, वह आज भी है।

🔵 उस संन्यासी ने कहा:- फिर उम्र भी तुम्हारा परिचय न रहा, शरीर भी तुम्हारा परिचय न रहा।

🔴 फिर तुम कौन हो? उसे लिख दो तो पहुंचा दूं भगवान के पास। नहीं तो मैं भी झूठा बनूंगा तुम्हारे साथ। यह कोई भी परिचय तुम्हारा नहीं है।

🔵 राजा बोला:- तब तो बड़ी कठिनाई हो गई। उसे तो मैं भी नहीं जानता फिर। जो मैं हूं, उसे तो मैं नहीं जानता। इन्हीं को मैं जानता हूं मेरा होना।

🔴 उस संन्यासी ने कहा फिर बड़ी कठिनाई हो गई क्योंकि जिसका मैं परिचय भी न दे सकूं बता भी न सकू कि कौन मिलना चाहता है तो भगवान भी क्या कहेंगे कि किसको मिलना चाहता है ?

🔵 तो जाओ पहले इसको खोज लो कि तुम कौन हो और मैं तुमसे कहे देता हू कि जिस दिन तुम यह जान लोगे कि तुम कौन हो उस दिन तुम आओगे नही भगवान को खोजने क्योंकि खुद को जानने मे वह भी जान लिया जाता है जो परमात्मा है।
○○○○○○○○○ ॐ ●●●●●●●●●●●

👉 शास्त्री जी से सम्बंधित कुछ तथ्य

🔵 1. भारत की स्वंतन्त्रता के बाद शास्त्री जी को उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव के रूप में नियुक्त किया गया था जहां उन्हें पुलिस एवं परिवहन मंन्त्रालय सौंपा गया. परिवहन मंत्री के कार्यकाल में उन्होंने प्रथम बार महिला कण्डक्टर्स की नियुक्ती की थी. इतना ही नही उन्हों भीड़ को नियंत्रण में रखने के लिए लाठी की जगह पानी की बौछार का प्रयोग प्रांरम्भ कराया.

🔴 2. काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि मिलते ही लाल बहादुर शास्त्री जी ने जन्म से चला आ रहा जातिसूचक शब्द श्रीवास्तव हमेशा-हमेशा के लिए हटा दिया और अपने नाम के आगे ‘शास्त्री’ लगा लिया.
🔵 3. 1965 में पाकिस्तान ने भारत पर सायं ७:30 बजे हवाई हमला कर दिया. राष्ट्रपति ने आपात बैठक बुलाई जिसमें शास्त्री जी से पूछा गया कि, “अब हमें क्या करना चाहिए ? शाश्त्री जी ने एक वाक्य में तत्तकाल उत्तर दिया, “आप देश की रक्षा कीजिये और मझे बताइयों कि हमें क्या करना है.” बस फिर क्या था. शास्त्री जी के नेतृत्व में भारत ने पाकिस्तान को शिकश्त दी.

👉 महात्मा गाँधी से सम्बंधित कुछ तथ्य

🔴 1. गाँधी जी अपनी आत्मकथा में लिखते है कि, “मैं बचपन में बहुत शर्मीला था और स्कूल से छुट्टी होते ही सबसे पहले दौड़ कर घर जाता था ताकि रास्ते में मुझसे कोई बात करके मेरा मजाक न उड़ाए.”

🔵 2. गाँधी जी बहुत जोश और उत्साह से चलते थे. वह चलने के बारे में कहते हैं कि ,”चलना व्यायाम का सर्वोत्तम तरीका है.” उन्होंने हाई स्कूल के दौरान आयोजित हुए दौड़ -भाग वाले खेलों बहुत बार भाग लिया. लंडन में एक छात्र के तौर पर वह रोज 12 से 15 किलोमीटर पैदल चल कर पैसे बचाते थे. इससे उन को इंग्लैंड में अच्छी सेहत बनाए रखने और फिट रहने में बहुत सहायता मिलती थी. इसके इलावा उन्होंने अपना हर आंदोलन भी चलकर ही किया . 1930 में वह अपने आश्रम से 387 किलोमीटर चले थे , जिसे दांडी मार्च के रूप में याद किया जाता है.

🔴 3. एक बार साउथ अफ्रीका में रेलयात्रा के दौरान एक अंग्रेज ने गाँधी जी को ट्रेन से बाहर निकल जाने के लिए कहा तो गाँधी जी ने कहा कि उनके पास भी वैसा ही टिकट है जैसा कि उनके पास है. मगर उस अंग्रेज और रेलवे अधिकारी ने उन्हें गाड़ी से बाहर धक्का दे दिया. किसी अंग्रेज के साथ गाँधी जी का यह सबसे कड़वा अनुभव था.

🔵 4. जब गाँधी जी 1931 मे इंग्लैंड में थे तो उन्होंने रेडीयो प्रसारण द्वारा अमरीकी वासियों को संदेश दिया था. अमरीकी वासीयों ने सबसे पहले जो उनके शब्द सुने थे वह यह थे, “Do i have to speak into this thing?” ( क्या मुझे इस चीज में बोलना है)

🔴 5. गाँधी जी दूसरों की सहायता करने में बहुत आनंद लेते थे. एक बार वह ट्रेन में थे. अचानक ट्रेन चली और उनका एक जूता नीचे ट्रैक पर गिर गया. उन्होंने तुरंत ही अपना दूसरा जूता उसके पास फेक दिया ताकि वह जोड़ा जिसे मिले उस के काम आ सके.

🔵 6. गाँधी जी समय के बहुत पाबंद थे. वह अपनी डॉलर घड़ी हमेशा पास रखते थे. पर 30 जनवरी 1948 को जिस दिन उनकी हत्या हुई थी , वह प्रार्थना के लिए मीटिंग की वजह से 10 मिनट लेट हो गए थे.

🔴 7. टाइम मैगजीन ने उनको 1930 के लिए “Man of the year” चुना था. इसके आलावा टाइम मैगजीन ने आइंस्टाइन को “सदी का पुरूष” चुना था और गाँधी जी को दूसरे नंबर पर रखा था. मगर आइंस्टाइन गाँधी जी को बहुत मानते थे. 1930 में दोनो के मध्य पत्रो द्वारा संवाद भी हुआ था और गाँधीजी ने आइंस्टाइन को भारत आने का न्योता भी दिया था. मगर काम की व्यस्तता और नाजी गतिविधियों के कारण वह भारत न आ सके.

🔵 8. भारत की स्वंत्रता प्राप्ती के पश्चात कुछ पत्रकार गाँधी जी के पास आए और उनसे अंग्रेजी में बात करने लगे. मगर गाँधी जी ने सभी को रोका और कहा कि, “मेरा देश अब आजाद हो गया है, अब मैं हमारी हिन्दी भाषा ही बोलूँगा।गुजराती होने के बावजूद भी गाँधी जी हिन्दी ही बोलते थे , राष्ट्र भाषा के विषय में उनका एक विचार है- “कोई भी देश तब तक उन्नति नही कर सकता जब तक कि वह अपनी भाषा में नही बोलता.”

🔴 9. उन्होने भारत और दक्षिणी अफरीका में एक संपादक के तौर पर हरीजन, Indian Opinion(दक्षिणी अफरीका) और युवा भारत सहित कई समाचार पत्रो का हिन्दी, अंग्रेजी और गुजराती भाषा में संपादन किया है.

🔵 10. गाँधी जी की आत्मकथा का नाम है “सत्य के प्रयोग”. इसमें 1920 तक उनके जीवन का हर पहलु दिया है. यह 1927 में प्रकाशित हुई थी. 1999 में इस आत्मकथा को 20वी सदी की 100 सबसे आध्यात्मिक किताबों में स्थान दिया गया था ,यह किताब लगभग हर भाषा में छप चुकी है और विश्व की सबसे ज्यादा बिकने वाली पुस्कतो में से एक है.

🔴 11. 1948 में गाँधी जी को शाँति के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया था, पर उनकी हत्या हो जाने पर नोबोल पुरस्कार कमेटी ने उस साल शाँति का पुरस्कार किसी को भी नही देने का निर्णय लिया।

🔵 12. गाँधी जी के दांत खराब होने के कारण उनके पास दांतो का एक बनावटी जोड़ा था जिसे वह अपनी कमर के कपड़े में रखते थे. वह उन्हें तभी अपने मुँह में लगाते जब वह खाना खाते. खाना खाने के बाद वह उसे वापस बाहर निकालते, धोते और फिर कमर के कपड़े में बाँध कर रख लेते.

🔴 13. जब वह दक्षिणी अफरीका मे थे तब उनकी पगार 1500 डॉलर प्रति वर्ष तक पहुँच गई थी जो उस समय ज्यादातर भारतीयों का सपना होता था. मगर वह इसका भी ज्यादातर हिस्सा दान कर दिया करते थे.

🔵 14. शाँति में नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले पाँच नेताओं मार्टिन लुथर किंग, दलाई लामा, आंग सान सुई, नेलसन मंडेला और अर्जनटीना के अडोल्फो यह सभी मानते थे कि वे गाँधी जी के विचारो से प्रभावित थे.

🔴 15. गाँधी जी फोटो खीचे जाने से बहुत चिढ़ते थे. मगर उस समय वही ऐसे थे जिनके सबसे ज्यादा फोटे खींचे जाते थे.

🔵 16. 1915 में एक बार गाँधी जी शाँति निकेतन जा रहे थे तो उन्हें रबीन्द्र नाथ टैगोर मिले. गाँधी जी ने उन्हें “नमस्ते गुरूदेव” कह कर संबोधन किया. इस पर टैगोर जी ने कहा, “कि अगर मैं गुरूदेव हूँ तो आप महात्मा है. तब से ही टैगोर जी का प्यारा नाम ‘गुरूदेव’ पड़ा और गाँधी जी के नाम के आगे ‘महात्मा’ लगने लगा.

🔴 17. गाँधी जी ने कभी भी हवाई जहाज में सफर नही किया.

🔵 18. हमारी आजादी के लिए गाँधी जी बहुत बार जेल गए जिसकी कुल अवधि 6 साल 5 महीने बनती है.

🔴 19. भारत के केवल तीन राष्ट्रीय पर्व हैं. 15 अगस्त, 26 जनवरी और गाँधी जी की जयंती 2 अक्टूबर को. इसके इलावा संयुक्त राष्ट्र ने 2 अक्टूबर को ‘अंर्तराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ ऐलान किया हुआ है.

🔵 20. गाँधी जी ने लन्दन से वकालत की डिग्री प्राप्त की थी और लंम्बे समय तक वकालत का पेशा भी किया था मगर वह इसमें बिलकुल भी सफल नही हुए क्योंकि वह झूठ नही बोलते थे.

👉 दृण संकल्पवान लाल बहादुर शास्त्री

🔴 साधनो का अभाव प्रगति में बाधक नही होता, ये प्रेरणा बचपन से लिये परिस्थिती से जूझते हुए एक बालक अपनी विधवा माँ का हर संभव सहारा बनने का प्रयास कर रहा था। उसी दौरान भारत माता को गुलामी से आजाद कराने के लिये असहयोग आन्दोलन का शंखनाद हुआ। ये वाक्या 1921 का है, जब अनेक लोग भारत माता को स्वतंत्र कराने के लिये अपना सर्वस्व बलिदान करने को आतुर थे।

🔵 देशभक्ति की इस लहर में 16 वर्षिय लाल बहादुर शास्त्री जी का मन भी आन्दोलन में जाने को अधीर हो गया। वे अपने अध्यापक से इस आन्दोलन का हिस्सा बनने की अनुमति लेने गये परंतु गुरू जी ने समझाया कि, बेटा हाई स्कूल की परिक्षा में कुछ दिन बचे हैं परिश्रम करके अच्छे नम्बरों से पास हो जाओगे तो माँ को सहारा हो जायेगा। विद्यालय छोडकर आन्दोलन में जाने की इजाजत रिश्तेदारों ने भी नही दी। फिर भी युवा लाल बहादुर शास्त्री जी अपने अंतःकरण की आवाज को रोक नही पाये और अपने तथा अपनी माँ के हित को देश हित पर बलिदान करने के लिये निकल पडे।

🔴 शाश्त्री जी एक बार 12 वर्ष की उम्र में साथियों के साथ गंगा पार मेला देखने गये थे, परंतु लौटते समय पैसा न होने के कारण गंगा नदी को तैर कर पार किया । नाना एवं मौसा के घर रहकर उनकी शिक्षा पूरी हुई। ईमानदारी तथा परिश्रम में विश्वास रखने वाले शास्त्री जी पढाई में बहुत तेज नही थे फिर भी ढृण संक्लप और मेहनत से हिन्दी विद्यापीठ से शास्त्री की परिक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। उनका प्रमुख विषय दर्शन शास्त्र था। पारिवारिक स्थिति साधारण होने के बावजूद उनका लक्ष्य साधारण नही था। मन में देश भक्ति का जज़बा पूरे जोर-शोर से धङक रहा था। घर की आर्थिक स्थिति का भी उन्हे एहसास था। उन्होने लोकसेवा संघ में अपने मित्र अलगुराय चौधरी के साथ अछूतोद्धार का काम आरंभ किया। उनकी लगन, श्रम तथा तत्परता से लाला लाजपत राय बहुत प्रभावित हुए। शास्त्री जी संघ के आजीवन सदस्य मनोनित हुए। उन्हे सात रुपया भत्ता मिलता था जो बाद में 100 रुपये हो गया था, इसे वे घर वालों को दे देते थे। सादा जीवन उच्च विचार का अनुसरण करने वाले शास्त्री जी मित्व्यता का जिवंत उदाहरण थे। 1927 में उनका विवाह ललिता देवी से हुआ। ललिता देवी ने भी लाल बहादुर शास्त्री जी के उद्देश्य को अपना उद्देश्य बना लिया और भारत की आजादी के लिये सदैव शास्त्री जी को सहयोग देती रहीं।

🔵 नेहरू जी के देहांत के बाद 9 जून 1964 को कांग्रेस पार्टी ने शाश्त्री जी को अपने नए नेता के रूप में चुना और वो देश के दुसरे प्रधानमंत्री बने । जब 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ तब शाश्त्री जी के नारे “जय जवान जय किसान” ने पूरे देश में एक नयी ऊर्जा का संचार कर दिया था। इसी युद्ध की समाप्ति के लिए शाश्त्री जी रूस के ताशकंद शहर गए और समझौते पर हस्ताक्षर करने के ठीक एक दिन बाद 11 जनवरी 1966 को कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटने के कारण शास्त्री जी का देहांत हो गया। इस खबर को सुनकर विश्व के अनेक नेताओं की आँखें नम हो गईं। उनका जीवन परिवार तक सिमित नही था, वे पूरे देश के लिये जिये और अंतिम यात्रा भी देश हित के विचार में ही निकली। 2 अक्टुबर को जन्मे शास्त्री जी सच्चे गाँधीवादी थे। सादा एवं सच्चा जीवन ही उनकी अमुल्य धरोहर है।

👉 गाँधी जी के जीवन के प्रेरक प्रसंग 1

🔵 गाँधी जी देश भर में भ्रमण कर चरखा संघ के लिए धन इकठ्ठा कर रहे थे. अपने दौरे के दौरान वे ओड़िसा में किसी सभा को संबोधित करने पहुंचे . उनके भाषण के बाद एक बूढी गरीब महिला खड़ी हुई, उसके बाल सफ़ेद हो चुके थे , कपडे फटे हुए थे और वह कमर से झुक कर चल  रही थी , किसी तरह वह भीड़ से होते हुए गाँधी जी के पास तक पहुची.

🔴 ” मुझे गाँधी जी को देखना है.” उसने आग्रह किया और उन तक पहुच कर उनके पैर छुए.

🔵 फिर उसने अपने साड़ी के पल्लू में बंधा एक  ताम्बे का सिक्का निकाला और गाँधी जी के चरणों में रख दिया. गाँधी जी ने सावधानी से सिक्का उठाया और अपने पास रख लिया. उस समय चरखा संघ का कोष जमनालाल बजाज संभाल रहे थे. उन्होंने गाँधी जे से वो सिक्का माँगा, लेकिन गाँधी जी ने उसे देने से माना कर दिया.

🔴 ” मैं चरखा संघ के लिए हज़ारो रूपये के चेक संभालता हूँ”, जमनालाल जी हँसते हुए कहा ” फिर भी आप मुझपर इस सिक्के को लेके यकीन नहीं कर रहे हैं.”

🔵 ” यह ताम्बे का सिक्का उन हज़ारों से कहीं कीमती है,” गाँधी जी बोले.

🔴 ” यदि किसी के पास लाखों हैं और वो हज़ार-दो हज़ार दे देता है तो उसे कोई फरक नहीं पड़ता. लेकिन ये सिक्का शायद उस औरत की कुल जमा-पूँजी थी. उसने अपना ससार धन दान दे दिया. कितनी उदारता दिखाई उसने…. कितना बड़ा बलिदान दिया उसने!!! इसीलिए इस ताम्बे के सिक्के का मूल्य मेरे लिए एक करोड़ से भी अधिक है.”

👉 गाँधी जी के जीवन के प्रेरक प्रसंग 2

🔴 रात बहुत काली थी और मोहन डरा हुआ था. हमेशा से ही उसे भूतों से डर लगता था. वह जब भी अँधेरे में अकेला होता उसे लगता की कोई भूत आसा-पास है और कभी भी उसपे झपट पड़ेगा. और आज तो इतना अँधेरा था कि कुछ भी स्पष्ठ नहीं दिख रहा था , ऐसे में मोहन को एक कमरे से दूसरे कमरे में जाना था.

🔵 वह हिम्मत कर के कमरे से निकला ,पर उसका दिल जोर-जोर से धडकने लगा और चेहरे पर डर के भाव आ गए. घर में काम करने वाली रम्भा वहीँ दरवाजे पर खड़ी यह सब देख रही थी.

🔴 ” क्या हुआ बेटा?” , उसने हँसते हुए पूछा.

🔵 ” मुझे डर लग रहा है दाई,”  मोहन ने उत्तर दिया.

🔴 ” डर, बेटा किस चीज का डर ?”

🔵 ” देखिये कितना अँधेरा है ! मुझे भूतों से डर लग रहा है!” मोहन सहमते हुए बोला.

🔴 रम्भा ने प्यार से मोहन का सर सहलाते हुए कहा, ” जो कोई भी अँधेरे से डरता है वो मेरी बात सुने: राम जी  के बारे में सोचो और कोई भूत तुम्हारे निकट आने की हिम्मत नहीं करेगा. कोई तुम्हारे सर का बाल तक नहीं छू पायेगा. राम जी तुम्हारी  रक्षा करेंगे.”

🔵 रम्भा के शब्दों ने मोहन को हिम्मत दी. राम नाम लेते हुए वो कमरे से निकला, और उस दिन से मोहन ने कभी खुद को अकेला नहीं समझा और भयभीत नहीं हुआ. उसका विश्वास था कि जब तक राम उसके साथ हैं उसे डरने की कोई ज़रुरत नहीं.

🔴 इस विश्वास ने गाँधी जी को जीवन भर शक्ति दी, और मरते वक़्त भी उनके मुख से राम नाम ही निकला.

👉 गाँधी जी के जीवन के प्रेरक प्रसंग 3

🔵 कलकत्ता में हिन्दू- मुस्लिम दंगे भड़के हुए थे. तमाम प्रयासों के बावजूद लोग शांत नहीं हो रहे थे. ऐसी स्थिति में गाँधी जी वहां पहुंचे और एक मुस्लिम मित्र के यहाँ ठहरे. उनके पहुचने से दंगा कुछ शांत हुआ लेकिन कुछ ही दोनों में फिर से आग भड़क उठी. तब गाँधी जी ने आमरण अनशन करने का निर्णय लिया और 31-Aug-1947 को अनशन पर बैठ गए. इसी दौरान एक दिन एक अधेड़ उम्र का आदमी उनके पास पहुंचा और बोला , ” मैं तुम्हारी मृत्यु का पाप अपने सर पर नहीं लेना चाहता, लो रोटी खा लो .”

🔴 और फिर अचानक ही वह रोने लगा, ” मैं मरूँगा तो नर्क जाऊँगा!!”

🔵 “क्यों ?”, गाँधी जी ने विनम्रता से पूछा.

🔴 ” क्योंकि मैंने एक आठ साल के मुस्लिम लड़के की जान ले ली.”

🔵 ” तुमने उसे क्यों मारा ?”, गाँधी जी ने पूछा.

🔴 ” क्योंकि उन्होंने मेरे मासूम बच्चे को जान से मार दिया .”, आदमी रोते हुए बोला.

🔵 गाँधी जी ने कुछ देर सोचा और फिर बोले,” मेरे पास एक उपाय है.”

🔴 आदमी आश्चर्य से उनकी तरफ देखने लगा .

🔵 ” उसी उम्र का एक लड़का खोजो जिसने दंगो में अपने मात-पिता खो दिए हों, और उसे अपने बच्चे की तरह पालो. लेकिन एक चीज सुनिश्चित कर लो की वह एक मुस्लिम होना चाहिए और उसी तरह बड़ा किया जाना चाहिए.”, गाँधी जी ने अपनी बात ख़तम की.

👉 ज्ञानी की पहचान

🔴 एक धार्मिक व्यक्ति को गुरु दीक्षा लेने की आवश्यकता पड़ी उसने सुन रखा था कि ज्ञानी गुरु से ही दीक्षा लेनी चाहिए। गुरु बनने के लिए तो अनेकों साधु पंडित तैयार थे पर उस व्यक्ति को यह निश्चय न होता था कि यह ज्ञानी है या नहीं? इसी संदेह में वह चिन्तित रहने लगा।

🔵 एक दिन उसकी पत्नी ने चिन्ता का कारण पूछा तो उसने सब बात बता दी। पत्नी हँसी उसने कहा इसकी परीक्षा बहुत सरल है। तुम गुरु बनने को जो तैयार हो उसे घर ले आया करो मैं बता दूँगी कि यह ज्ञानी है या नहीं। पति बहुत प्रसन्न हुआ और प्रतिदिन एक एक गुरू बनने वाले को लाने लगा।

🔴 स्त्री ने पिंजड़े में एक कौआ बन्द कर रखा था। जो महात्मा आता उसी से पूछती महात्माजी यह कबूतर ही है न? उत्तर में कई महात्मा हंस पड़ते, कई उसे मूर्ख बताते, कई झिड़कते कि यह तो कौआ है। इस पर वह स्त्री नाराज होती और अपनी बात पर अड़ जाती, नहीं महाराज यह तो कबूतर है। उसके इस दुराग्रह को सुन कर आने वाले महात्मा क्रुद्ध होकर उसकी मूर्खता को निन्दा करते हुए चले जाते।

🔵 एक दिन एक महात्मा ऐसे आये जो कौए को कबूतर कहने पर नाराज नहीं हुये वरन् शान्तिपूर्वक बड़े स्नेह के साथ समझाने लगे देखो बेटी कौए में यह लक्षण और कबूतर में यह लक्षण होते है, अब तुम स्वयं ही विचार लो कि यह कौन है? यदि समझ में न आवे तो मैं तुम्हें कौए और कबूतर का अन्तर उन पक्षियों के झुण्ड में ले जाकर या अन्य बुद्धिमान मनुष्यों की साक्षी से समझाने का प्रयत्न करूँगा स्त्री न मानी तो भी उनने क्रोध न किया अपनी बातें बड़े सौम्य भाव से करते रहे।

🔴 अपने पति से स्त्री ने कहा- यही महात्मा ज्ञानी है। इन्हें ही गुरू बना लो। ज्ञानी की पहचान यही है कि उन्हें क्रोध नहीं आता।

🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 आज का सद्चिंतन 1 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 Oct 2017


शनिवार, 30 सितंबर 2017

👉 व्यवहारिक ज्ञान भी चाहिए।

🔴 एक पण्डित जी को नाव से नदी पार करनी थी। कोई और यात्री था नहीं। अकेले पण्डित जी को लेकर चलने में मल्लाह तैयार नहीं हो रहा था। पंडित जी का जाना आवश्यक था। मल्लाह ने कहा- कुछ अतिरिक्त मजदूरी मिले तो चलूँ। पंडित जी ने कहा- उतराई के पैसों के अतिरिक्त तुम्हें बड़े सुन्दर ज्ञान भरे उपदेश भी दूँगा। मल्लाह ने बैठे से बेगार भली वाली बात सोचकर नाव खोली और पंडित जी को उस पर ले चला।

🔵 रास्ते में पंडित जी उपदेश करने लगे। उन्होंने मल्लाह से पूछा- तुम कुछ पूजा पाठ जानते हो? उसने उत्तर दिया, "नहीं महाराज"। पंडित जी बोले- तब तो तुम्हारे जीवन का एक तिहाई भाग व्यर्थ चला गया। पंडित ने फिर पूछा- कुछ पढ़ना लिखना जानते हो? मल्लाह ने कहा- नहीं महाराज। पंडित जी ने कहा- तो तुम्हारे जीवन का एक तिहाई भाग और व्यर्थ चला गया। अब दो तिहाई जीवन व्यर्थ गँवा देने के बाद एक तिहाई ही शेष है, उसका सदुपयोग करो।

🔴 पंडित जी का उपदेश चल ही रहा था कि नाव एक चट्टान से टकराकर टूट गई और पंडित जी पानी में डूबने लगे। उन्हें पकड़ते हुए मल्लाह ने पूछा- महाराज तैरना जानते हो? उनने कहा- नहीं मल्लाह उन्हें पीठ पर रखकर पार लगाने लगा और बोला- महाराज! तैरना न जानने के कारण आपका तो पूरा ही जीवन व्यर्थ चला गया होता। उपदेश करना सीखने के साथ-साथ कुछ हाथ पैर चलाना भी सीखना चाहिए था।

🔵 केवल दार्शनिक ज्ञान ही पर्याप्त नहीं, मनुष्य को जीवन समस्याओं को सुलझाने की व्यवहारिक योग्यता भी प्राप्त करनी चाहिए।

🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 आज का सद्चिंतन 30 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 Sep 2017


👉 जीवन के दुःख

🔴 एक बार एक नवयुवक किसी संत के पास पहुंचा और बोला.......
                 
🔵 “महात्मा जी, मैं अपनी ज़िन्दगी से बहुत परेशान हूँ, कृपया इस परेशानी से निकलने का उपाय बताएं...

🔴 संत बोले, “पानी के ग्लास में एक मुट्ठी नमक डालो और उसे पीयो ” युवक ने ऐसा ही किया...

🔵 “इसका स्वाद कैसा लगा?”, संत ने पुछा...?

🔴 “बहुत ही खराब … एकदम खारा .” – युवक थूकते हुए बोला .

🔵 संत मुस्कुराते हुए बोले , “एक बार फिर अपने हाथ में एक मुट्ठी नमक लेलो और मेरे पीछे -पीछे आओ.. “दोनों धीरे -धीरे आगे बढ़ने लगे और थोड़ी दूर जाकर स्वच्छ पानी से बनी एक झील के सामने रुक गए ...

🔴 चलो, अब इस नमक को पानी में दाल दो .”, संत ने निर्देश दिया।

🔵 युवक ने ऐसा ही किया...

🔴 “अब इस झील का पानी पियो .” , संत बोले...

🔵 युवक पानी पीने लगा …,

🔴 एक बार फिर संत ने पूछा ,: “ बताओ इसका स्वाद कैसा है , क्या अभी भी तुम्हे ये खरा लग रहा है...?”

🔵 “नहीं, ये तो मीठा है, बहुत अच्छा है ”, युवक बोला....

🔴 संत युवक के बगल में बैठ गए और उसका हाथ थामते हुए बोले, “जीवन के दुःख बिलकुल नमक की तरह हैं; न इससे कम ना ज्यादा . जीवन में दुःख की मात्र वही रहती है, बिलकुल वही. लेकिन हम कितने दुःख का स्वाद लेते हैं ये इस पर निर्भर करता है कि हम उसे किस पात्र में डाल रहे हैं. इसलिए जब तुम दुखी हो तो सिर्फ इतना कर सकते हो कि खुद को बड़ा कर लो… ग़्लास मत बने रहो झील बन जाओ !!!

शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

👉 Cat sees a dream

🔴 A cat dreams that she has become a tiger and is hunting a fat goat. Barely had she tasted it when a fat dog came pouncing on her. She left the goat and ran and hid near her owner.

🔵 In the second dream she saw that she was a dog and has entered into her owner’s kitchen to taste the dishes kept there. Just then the owner came and started beating it black and blue. The owner came and woke up the crying cat. The cat woke up and realized that it was a dream. She said to her owner, “I’ll be what I am. Changing identity is full of dangers.”

🔴 We should always remember our original identity.

🌹 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 29 Sep 2017

🔵 लोगों की बुराई-भलाई इतना महत्व नहीं रखती जितनी हमारी दृष्टि, दृष्टि में दोष उत्पन्न हो जाए तो हर चीज अटपटी दिखाई देगी। रंगीन काँच का चश्मा पहन लिया जाए तो हर चीज उसी रंग की दिखाई देगी। पीलिया रोग वाले का चेहरा खून एवं मल-मूत्र ही पीला नहीं होता वरन् सभी चीजें उसे पीली दिखाई देने लगती हैं। कई व्यक्ति हर घड़ी किसी न किसी की निन्दा करते सुने जाते हैं, दूसरों के दोषों का वर्णन करने में उन्हें बड़ा मजा आता है, ऐसे लोग बहुधा अपने आपको आलोचक या सुधारक कहते हैं पर वस्तुतः बात दूसरी ही होती है। उनके मन में दूसरों के प्रति घृणा और द्वेष के भाव भरे होते हैं, वे ही दूसरों की निन्दा के रूप से बाहर निकलते रहते हैं।

🔴 जो आदमी लहसुन खाकर या शराब पीकर आया है, उसके मुँह में से इन पदार्थों की दुर्गन्ध स्पष्ट रूप से आती है। इसी प्रकार दुर्भावना युक्त ओछे आदमियों के मुख में से निन्दा, बुराई, दोष दर्शन, छिद्रान्वेषण की धारा ही प्रवाहित होती रहेगी। ऐसे लोग किसी की भलाई या सद्भावना पर विश्वास नहीं कर सकते, उन्हें सभी धूर्त या दुष्ट दिखाई देते हैं। ऐसे लोगों को दोष दृष्टा ही कहा जायेगा। उनकी अपनी दुर्बलता उनके चारों ओर धूर्तता दुष्टता के रूप में बिखरी दिखाई पड़ती है।

🔵 दोषदर्शी दृष्टिकोण मनुष्य के लिए एक भारी विपत्ति के समान है। प्रेम और द्वेष छिपाये नहीं छिपते। दुर्भावों में वह शक्ति है कि जिसके प्रति उस तरह के भाव रखे जायें तो उस तक किसी न किसी प्रकार जा ही पहुँचते हैं और वह किसी दिन जान ही लेता है कि अमुक व्यक्ति मेरा निन्दक या द्वेषी है। यह जान लेने पर उसके मन में भी प्रतिक्रिया होती ही, वह भी शत्रुता करेगा। इस प्रकार उस दोष दर्शी के शत्रु ही चारों ओर बढ़ते जायेंगे। शत्रुता के साथ विपत्ति जुड़ी हुई है, जिसके जितने ज्यादा शत्रु होंगे वह उतना ही चिंतित, परेशान एवं आपत्तिग्रस्त रहेगा। उसके मार्ग में समय-समय पर अनेकों बाधाएं आती ही रहेंगी। उन्नति के मार्ग में सहयोग देने वालों की अपेक्षा रोड़े अटकाने वाले ही अधिक होंगे। ऐसी स्थिति अपने लिए उत्पन्न कर लेना कोई बुद्धिमता की बात नहीं है। निन्दात्मक दृष्टिकोण अपनाये रखना एक अबुद्धिमत्ता पूर्ण कार्य ही कहा जा सकता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 29 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 Sep 2017


👉 सबसे बड़ा पुण्य:-

🔴 एक गांव मे एक बहुत गरीब सेठ रहता था जो कि किसी जमाने बहुत बड़ा धनवान था जब सेठ धनी था उस समय सेठ ने बहुत पुण्य किए। गउशाला बनवाई गरीबों को खाना खिलाया अनाथ आश्रम बनवाए और भी बहुत से पुण्य किए थे लेकिन जैसे जैसे समय गुजरा सेठ निर्धन हो गया।
                 
🔵 एक समय ऐसा आया कि राजा ने ऐलान किया कि यदि किसी व्यक्ति ने कोई पुण्य किए हैं तो वह अपने पुण्य बताए और अपने पुण्य का जो भी उचित फल है ले जाए।

🔴 यह बात जब सेठानी ने सुनी तो सेठानी सेठ को क़हा कि हमने तो बहुत पुण्य किए हैं तुम राजा के पास जाओ और अपने पुण्य बताकर उनका जो भी फल मिले ले आओ।

🔵 सेठ इस बात के लिए सहमत हो गया और दुसरे दिन राजा के महल जाने के लिए तैयार हो गया।

🔴 जब सेठ महल जाने लगा तो सेठानी ने सेठ के लिए चार रोटी बनाकर बांध दी कि रास्ते मे जब भुख लगी तो रोटी खा लेना.सेठ राजा के महल को रवाना हो गया गर्मी का समय दोपहर हो गई सेठ ने सोचा सामने पानी की कुंड भी है वृक्ष की छाया भी है क्यों ना बैठकर थोड़ा आराम किया जाए व रोटी भी खा लूंगा।

🔵 सेठ वृक्ष के नीचे रोटी रखकर पानी से हाथ मुंह धोने लगा।

🔴 तभी वहां पर एक कुतिया अपने चार पांच छोटे छोटे बच्चों के साथ पहुंच गई और सेठ के सामने प्रेम से दुम हिलाने लगी क्यों कि कुतिया को सेठ के पास के अनाज की खुशबु आ रही थी।

🔵 कुतिया को देखकर सेठ को दया आई सेठ ने दो रोटी निकाल कुतिया को डाल दी अब कुतिया भुखी थी और बिना समय लगाए कुतिया दोनो रोटी खा गई और फिर से सेठ की तरफ देखने लगी।

🔴 सेठ ने सोचा कि कुतिया के चार पांच बच्चे इसका दुध भी पीते है दो रोटी से इसकी भुख नही मिट सकती और फिर सेठ ने बची हुई दोनो रोटी भी कुतिया को डाल कर पानी
पीकर अपने रास्ते चल दिया।

🔵 सेठ राजा के दरबार मे हाजिर हो गया और अपने किए गए पुण्य के कामों की गिनती करने लगा और सेठ ने अपने द्वारा किए गए सभी पुण्य कर्म विस्तार पुर्वक राजा को बता दिए और अपने द्वारा किए गए पुण्य का फल देने बात कही।

🔴 तब राजा ने कहा कि आपके इन पुण्य का कोई फल नही है यदि आपने कोई और पुण्य किया है तो वह भी बताएं शायद उसका कोई फल मै आपको दे पाऊं।

🔵 सेठ कुछ नही बोला और यह कहकर बापिस चल दिया कि यदि मेरे इतने पुण्य का कोई फल नही है तो और पुण्य गिनती करना बेकार है अब मुझे यहां से चलना चाहिए।

🔴 जब सेठ वापिस जाने लगा तो राजा ने सेठ को आवाज लगाई कि सेठ जी आपने एक पुण्य कल भी किया था वह तो आपने बताया ही नही, सेठ ने सोचा कि कल तो मैनें कोई पुण्य किया ही नही राजा किस पुण्य की बात कर रहा है क्यों कि सेठ भुल चुका था कि कल उसने कोई पुण्य किया था।

🔵 सेठ ने कहा कि राजा जी कल मैनें को ई पुण्य नहीं किया, तो राजा ने सेठ को कहा कि कल तुमने एक कुतिया को चार रोटी खिलाई और तुम उस पुण्य कर्म को भुल गए?

🔴 कल किए गए तेरे पुण्य के बदले तुम जो भी मांगना चाहते हो मांग लो वह तुझे मिल जाएगा।

🔵 सेठ ने पूछा कि राजा जी ऐसा क्यों मेरे किए पिछले सभी कर्म का कोई मूल्य नही है और एक कुतिया को डाली गई चार रोटी का इतना मोल क्यों?

🔴 राजा ने कहा हे सेठ! जो पुण्य करके तुमने याद रखे और गिनकर लोंगों को बता दिए वह सब बेकार है क्यों कि तेरे अन्दर मै बोल रही है कि यह मैनें किया।

🔵 तेरा सब कर्म व्यर्थ है जो तू करता है और लोगों को सुना रहा है, जो सेवा कल तुमने रास्ते मे कुतिया को चार रोटी पुण्य करके की वह तेरी सबसे बड़ी सेवा है, उसके बदले तुम मेरा सारा राज्य भी ले लो वह भी बहुत कम है।

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (अन्तिम भाग)

🌹  तो फिर हमें क्या करना चाहिए?

🔴 भोग प्रधान आकांक्षाएँ रखने से मनुष्यों की अतृप्ति बढ़ जाती है और वे अधिक सुख सामग्री की माँग करते हैं। स्वार्थ के कारण ही छीना झपटी और चालाकी बेईमानी बढ़ती है। श्रम से बचने और मौज करने की इच्छाएँ जब तीव्र हो जाती है, तो उचित-अनुचित का विचार छोड़कर लोग कुमार्ग पर चलने लगते हैं, जिसका परिणाम उनके स्वयं के लिए ही नहीं सारे समाज के लिए भी घातक होता है। इस अदूरदर्शितापूर्ण प्रक्रिया को अपनाने से ही संसार में सर्वत्र दुःख-दैन्य का विस्तार हुआ है।
     
🔵 पतन का निवारण करने के लिए मानवीय दृष्टिकोण में परिवर्तन करना आवश्यक है और उस परिवर्तन के लिए मनुष्य का जीवन-दर्शन भी ऊँचा बनाया जाना चाहिए। पतित भावनाओं वाले व्यक्ति के लिए लाँछना एवं आत्म-ग्लानि की व्यथा कष्टदायक नहीं होती, वह निर्लज्ज बना कुकर्म करता रहता है। जब लोक मानस का स्तर भावनात्मक दृष्टि से ऊँचा उठेगा तब ही जीवन में श्रेष्ठता आएगी और उसी के आधार पर विश्व शांति की मंगलमय परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी।

🔴 आज का मनुष्य सभ्यता के क्षेत्र में विकास करने के साथ-साथ इतना विचारशील भी बना है कि यदि उसे तथ्य समझाए जाएँ, तो वह उन्हें समझने और मानने के लिए तैयार हो जाता है। लोकसेवियों को इस प्रयोजन के लिए घर-घर जाना चाहिए और लोगों की आस्थाएँ, मान्यताएँ तथा विचारणाएँ परिष्कृत करने के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

🔵 प्रत्येक व्यक्ति इतना बुद्धिमान और प्रतिभाशाली नहीं होता कि वह तथ्यों को सही-सही समझा सके और किस परिस्थितियों में क्या किया जाना चाहिए, इसका मार्गदर्शन कर सके। इसके लिए सुलझी विचारधारा का साहित्य लेकर निकलना चाहिए तथा लोगों को उसे पढ़ने तथा विचार करने की प्रेरणा देनी चाहिए, उसके साथ अशिक्षित व्यक्तियों के लिए पढ़कर सुनाने या परामर्श द्वारा प्रेरणा देने की प्रक्रिया चलाई जानी चाहिए। आरंभ में सभी लोगों की रुचि इस ओर नहीं हो सकती। अतः जो लोग ज्ञानयज्ञ की आवश्यकता समझते हैं, उन्हें चाहिए कि वे ऐसा विचार-साहित्य लोगों तक स्वयं लेकर पहुँचें।

🔵 यह ठीक है कि कुआँ प्यासे के पास नहीं जाता, प्यासे को ही कुआँ के पास जाकर पानी पीना पड़ता है। गर्मियों में जब व्यापक जल संकट उत्पन्न हो जाता है, तो बादलों को ही जगह-जगह जाकर बरसना पड़ता है। लोक-सेवियों को भी सद्विचारों और सद्प्रेरणाओं की शीतल सुखद जलवृष्टि के लिए जन-जन तक पहुँचना चाहिए। उसके लिए उन व्यक्तियों में पहल सद्विचारों के प्रति भूख जगाना आवश्यक है। भूख उत्पन्न करने का यह कार्य सम्पर्क द्वारा ही संभव होता है। उसके बाद सद्विचारों और सत्प्रेरणाओं को उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। यह आवश्यकता साहित्य और निम्न सेवा कार्यों द्वारा पूरी की जा सकती है।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 नारी का निर्मल अन्तःकरण (अंतिम भाग)

🔴 स्त्री को जीतने और सुधारने का एकमात्र अस्त्र उनके प्रति गहरी ममता, आत्मीयता, उदारता, करुणा, एवं हित कामना ही है। जिसके मन में यह भावना होंगी वह नारी की बुरी से बुरी आदतों को स्वल्प प्रयास से दूर करके उसके पूर्ण अनुकूल एवं उपयोगी बना सकेगा। इसके विपरीत जो उससे विरानेपन का, बदले का, अनुदारता का, स्वामित्व का एवं उसकी कमजोरों से नाजायज लाभ उठाने का प्रयत्न करते हैं वे उसे कदापि नहीं सुधार सकते हैं और वरन् ऐसे प्रयत्नों से उलटा विद्वेष बढ़ाते हैं और अपने भविष्य को अन्धकारमय बना लेते हैं।

🔵 गृहस्थ जीवन की 90 प्रतिशत सफलता नारी की अनुकूलता पर निर्भर रहती है। और नारी की अनुकूलता पुरुष की उदारता एवं सच्ची आत्मीयता पर निर्भर है। यदि नारी में कोई कमी भी है तो उसके निर्मल हृदय को प्रेम से जीता जा सकता है। हीरे के अंगूठी से यदि कोई अशुद्ध वस्तु लग जाय तो उसे कोई तोड़ नहीं डालता वरन् उस अशुद्धि को हटाकर उस मूल्यवान वस्तु को पूर्ववत् प्रेमपूर्वक रखा जाता है, इसी प्रकार नारी की छोटी-मोटी त्रुटियों, बुराइयों से निराश या विक्षुब्ध होने की आवश्यकता नहीं है, वरन् रोगी के प्रति डॉक्टर या परिचर्या करने वाले की जो भावना होती है उसी भावना के साथ उसे सुधारने की आवश्यकता है।

🔴 गायत्री के ‘रे’ अक्षर में नारी के प्रति उदारता और सहृदयता का व्यवहार करने के लिए आदेश दिया गया है। इस आदेश को पालन करने से हमारे गृहस्थ जीवन में स्वर्गीय शान्ति, समृद्धि एवं उन्नति के अनेकों अवसर उत्पन्न हो सकते हैं। आज लड़की के पिता से दहेज माँगा जाता है, ठहराव कम दहेज मिलने पर वधू का अपमान किया जाता है, कन्याओं की शिक्षा पर, उनके स्वास्थ पर माँ बाप पूरा ध्यान नहीं देते, ससुराल में लड़की को छोटी-छोटी बातों पर अपमानित होना पड़ता है, उसकी इच्छा को कोई महत्व नहीं दिया जाता, उसे स्वावलम्बी तथा उन्नतिशील बनाने के लिए भी किसी का ध्यान नहीं होता, केवल उससे अधिकाधिक सेवा लेने की ही सबकी दृष्टि रहती है। इस प्रकार की अनुदारता बन्द करके ओर उदार एवं सहृदय व्यवहार करने का आदेश गायत्री मन्त्र में दिया गया है। यदि हम इस आदेश को मानें तो निस्सन्देह नारी अन्तःकरण निर्मल नर्मदा नदी के समान स्वच्छ, शीतल एवं शान्तिमय बन सकता है और वह साक्षात् लक्ष्मी बन कर हमारे जीवन को स्वर्गीय आनन्द से परिपूर्ण कर सकती है।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 1952 पृष्ठ 

👉 आज का सद्चिंतन 28 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 Sep 2017


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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