रविवार, 6 अगस्त 2017
शनिवार, 5 अगस्त 2017
👉मानव की मौलिक स्वतंत्रता
🔴मानव मौलिक रूप से स्वतंत्र है। प्रकृति ने तो उसे मात्र संभावनाएँ दी है। उसका स्वरूप निर्णीत नहीं है। वह स्वयं का स्वयं ही सृजन करता है। उसकी श्रेष्ठता अथवा निकृष्टता स्वयं उसी के हाथों में है। मानव की यह मौलिक स्वतंत्रता गरिमामय एवं महिमापूर्ण है, किन्तु वह चाहे तो इसे दुर्भाग्य भी बना सकता है और दुःख की बात यही है कि ज्यादातर लोगों के लिए यह मौलिक स्वतंत्रता दुर्भाग्य ही सिद्ध होती है, क्योंकि सृजन की क्षमता में विनाश की क्षमता और स्वतंत्रता भी तो छिपी है। ज्यादातर लोग इसी दूसरे विकल्प का ही उपयोग कर बैठते हैं।
🔵निर्माण से विनाश हमेशा ही आसान होता है। भला स्वयं को मिटाने से आसान और क्या हो सकता है? स्व-विनाश के लिए आत्मसृजन में न लगना ही काफी है। उसके लिए अलग से और कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं होती। जो जीवन में ऊपर की ओर नहीं उठ रहा है, वह अनजाने और अनचाहे ही पीछे और नीचे गिरता चला जाता है।
🔴एक बार ऐसी ही चर्चा महर्षि रमण की सत्संग सभा में चली थी। इस सत्संग सभा में कुछ लोग कह रहे थे कि मनुष्य सब प्राणियों में श्रेष्ठ है, किंतु कुछ का विचार था कि मनुष्य तो पशुओं से भी गया-गुजरा है, क्योंकि पशुओं का भी संयम एवं बर्ताव कई बार मनुष्य से अनेकों गुना श्रेष्ठ होता है। सत्संग सभा में महर्षि स्वयं भी उपस्थित थे। दोनों पक्ष वालों ने उनसे अपना निर्णायक मत देने को कहा। महर्षि कहने लगे, ‘‘देखो, सच यही है कि मनुष्य मृण्मय और चिन्मय का जोड़ है। जो देह का और उसकी वासनाओं का अनुकरण करता है, एवं नीचे-से-नीचे अँधेरे में उतरता जाता है और जो चिन्मय के अनुसंधान में रत होता है, वह अंततः सच्चिदानंद को पाता और स्वयं भी वही हो जाता है।’’
🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 94
🔵निर्माण से विनाश हमेशा ही आसान होता है। भला स्वयं को मिटाने से आसान और क्या हो सकता है? स्व-विनाश के लिए आत्मसृजन में न लगना ही काफी है। उसके लिए अलग से और कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं होती। जो जीवन में ऊपर की ओर नहीं उठ रहा है, वह अनजाने और अनचाहे ही पीछे और नीचे गिरता चला जाता है।
🔴एक बार ऐसी ही चर्चा महर्षि रमण की सत्संग सभा में चली थी। इस सत्संग सभा में कुछ लोग कह रहे थे कि मनुष्य सब प्राणियों में श्रेष्ठ है, किंतु कुछ का विचार था कि मनुष्य तो पशुओं से भी गया-गुजरा है, क्योंकि पशुओं का भी संयम एवं बर्ताव कई बार मनुष्य से अनेकों गुना श्रेष्ठ होता है। सत्संग सभा में महर्षि स्वयं भी उपस्थित थे। दोनों पक्ष वालों ने उनसे अपना निर्णायक मत देने को कहा। महर्षि कहने लगे, ‘‘देखो, सच यही है कि मनुष्य मृण्मय और चिन्मय का जोड़ है। जो देह का और उसकी वासनाओं का अनुकरण करता है, एवं नीचे-से-नीचे अँधेरे में उतरता जाता है और जो चिन्मय के अनुसंधान में रत होता है, वह अंततः सच्चिदानंद को पाता और स्वयं भी वही हो जाता है।’’
🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 94
शुक्रवार, 4 अगस्त 2017
👉क्षण में शाश्वत की पहचान
🔴क्षण में शाश्वत छुपा है और अणु में विराट्। अणु को जो अणु मानकर छोड़ दे, वह विराट् को ही खो देता है। इसी तरह जिसने क्षण का तिरस्कार किया, वह शाश्वत से अपना नाता तुड़ा लेता है। क्षुद्र को तुच्छ समझने की भूल नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यही द्वार है परम का। इसी में गहरे-गहन अवगाहन करने से परम की उपलब्धि होती है।
🔵जीवन का प्रत्येक क्षण महत्त्वपूर्ण है। किसी भी क्षण का मूल्य, किसी दूसरे क्षण से न तो ज्यादा है और न ही कम है। आनंद को पाने के लिए किसी विशेष समय की प्रतीक्षा करना व्यर्थ है। जो जानते हैं, वे प्रत्येक क्षण को ही आनंद बना लेते हैं और जो विशेष समय की, किसी खास अवसर की प्रतीक्षा करते रहते हैं, वे समूचे जीवन के समय और अवसर को ही गँवा देते हैं।
🔴जीवन की कृतार्थता इकट्ठी और राशिभूत नहीं मिलती। उसे तो बिंदु-बिंदु और क्षण-क्षण में ही पाना होता है। प्रत्येक बिंदु सच्चिदानंद सागर का ही अमृत अंश है और प्रत्येक क्षण अपरिमेय शाश्वत का सनातन अंश। इन्हें जो गहराइयों से अपना सका, वही अमरत्व का स्वाद चख पाता है।
🔵एक फकीर के महानिर्वाण पर जब उनके शिष्यों से पूछा गया कि आपके सद्गुरु अपने जीवन में सबसे श्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण बात कौन-सी मानते थे? इसके उत्तर में उन्होंने कहा था, ‘‘वही जिसमें किसी भी क्षण वे संलग्न होते थे।’’
🔴बूँद-बूँद से सागर बनता है और क्षण-क्षण से जीवन। बूँद को जो पहचान ले, वह सागर को जान लेता है और क्षण को जो पा ले, वह जीवन को पा लेता है। क्षण में शाश्वत की पहचान ही जीवन का आध्यात्मिक रहस्य है।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 93
🔵जीवन का प्रत्येक क्षण महत्त्वपूर्ण है। किसी भी क्षण का मूल्य, किसी दूसरे क्षण से न तो ज्यादा है और न ही कम है। आनंद को पाने के लिए किसी विशेष समय की प्रतीक्षा करना व्यर्थ है। जो जानते हैं, वे प्रत्येक क्षण को ही आनंद बना लेते हैं और जो विशेष समय की, किसी खास अवसर की प्रतीक्षा करते रहते हैं, वे समूचे जीवन के समय और अवसर को ही गँवा देते हैं।
🔴जीवन की कृतार्थता इकट्ठी और राशिभूत नहीं मिलती। उसे तो बिंदु-बिंदु और क्षण-क्षण में ही पाना होता है। प्रत्येक बिंदु सच्चिदानंद सागर का ही अमृत अंश है और प्रत्येक क्षण अपरिमेय शाश्वत का सनातन अंश। इन्हें जो गहराइयों से अपना सका, वही अमरत्व का स्वाद चख पाता है।
🔵एक फकीर के महानिर्वाण पर जब उनके शिष्यों से पूछा गया कि आपके सद्गुरु अपने जीवन में सबसे श्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण बात कौन-सी मानते थे? इसके उत्तर में उन्होंने कहा था, ‘‘वही जिसमें किसी भी क्षण वे संलग्न होते थे।’’
🔴बूँद-बूँद से सागर बनता है और क्षण-क्षण से जीवन। बूँद को जो पहचान ले, वह सागर को जान लेता है और क्षण को जो पा ले, वह जीवन को पा लेता है। क्षण में शाश्वत की पहचान ही जीवन का आध्यात्मिक रहस्य है।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 93
गुरुवार, 3 अगस्त 2017
👉सत्य केवल एक है
🔴सत्य केवल एक है, अनेक नहीं। हाँ, उस तक पहुँचने के द्वार जरूर अनेक हो सकते हैं। लेकिन जो द्वार के आकर्षण में उलझकर उसी के मोह में पड़ जाता है, वह द्वार पर ही ठहर जाता है। ऐसे में सत्य की समीपता उसके लिए कभी भी सुलभ नहीं होती है।🔵हालाँकि सत्य हर कहीं है। जो कुछ भी है सभी कुछ सत्य है। उसकी अभिव्यक्तियाँ अनंत हैं। वह तो सौंदर्य की ही भाँति है। सौंदर्य अगणित रूपों में प्रकट होता है, पर इससे क्या वह भिन्न-भिन्न हो जाता है। जो रात्रि में तारों में झलकता है, जो सूर्य में प्रकाश बन चमकता है, जो फूलों में सुगंध बनकर महकता है, जो हरे-भरे पहाड़ों से झरनों के रूप में झरता है, जो हृदय में भाव बन उमगता है और जो आँखों में प्रेम बनकर प्रकट होता है, वह भला क्या अलग-अलग है? हाँ, इनके रूप अलग-अलग हो सकते हैं। पर इन सभी में जो एकता स्थापित है, जो सबका सार है, वह तो एक ही है।
🔴किंतु जो रूप पर मोहित हो जाता है, जो गंध और दृश्य की मादकता में स्वयं को भुला देता है वह तो बस रूप पर ही ठहर जाता है। वह उसके सारतत्त्व, उसकी आत्मा को नहीं जान पाता। ठीक भी है, भला जो सुंदर पर रुक गया हो, वह सौंदर्य तक पहुँचेगा भी कैसे?
🔵ऐसे ही, जो शब्दों से बँध जाते हैं, उन्हें तो सत्य से वंचित रहना ही पड़ेगा। अब ये शब्द संस्कृत के हों या फिर अरबी के, हिब्रू के हों या फिर लैटिन के, शब्द तो शब्द ही हैं। सत्य उनकी लिखावट में नहीं, उनमें निहित भावों में है। जो भावों में पैठते हैं और गहराई से पैठते हैं, वे सत्य पा ही लेते हैं। वे जान लेते हैं कि अपने साररूप में हर कहीं एक ही सत्य विद्यमान है। जो इस सचाई को जानते हैं, वे राह के अवरोधों को भी सीढ़ियाँ बना लेते हैं और जो नहीं जानते, उनके लिए सीढ़ियाँ भी अवरोध बन जाती हैं।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 92
बुधवार, 2 अगस्त 2017
👉महत्त्वाकांक्षा के ज्वर से मुक्ति
🔴 महत्त्वाकांक्षा की धुरी पर घूमने वाला जीवनवृत्त ही नरक है। महत्त्वाकांक्षाओं का ज्वर जीवन को विषाक्त कर देता है, जो इस ज्वर की हवाओं से उद्वेलित हैं, शांति का संगीत और आत्मा का आनंद भला उनके भाग्य में कहाँ? वे तो स्वयं में ही नहीं होते हैं और शांति का संगीत एवं आत्मा का आनंद तो स्वयं में होने के ही फल हैं।🔵बड़ी सहज जिज्ञासा है, इस महत्त्वकांक्षा का मूल क्या है? इसका उत्तर भी उतना ही सहज है, ‘‘हीनता का भाव। अभाव का बोध।’’ हालाँकि ऊपर से दिखने में हीनता का भाव और महत्त्वाकांक्षी चेतना परस्पर विरोधी दिखाई देते हैं, लेकिन वस्तुतः वे एक ही भावदशा के दो छोर हैं। एक छोर से जो हीनता है, वही दूसरे छोर से महत्त्वाकांक्षा। हीनता ही स्वयं को ढकने-छिपाने के प्रयास में महत्त्वाकांक्षा बन जाती है। अपनी इस कोशिश में वह स्वयं को ढक तो लेती है, पर मिटती नहीं और ध्यान रखने की बात तो यह है कि किसी भी रोग को ढकने भर से कभी भी कोई छुटकारा नहीं है। इस भाँति रोग मिटते नहीं, वरन् पुष्ट ही होते हैं।
🔴 व्यक्ति जब स्वयं की वास्तविकता से दूर भागता है, तब तक वह किसी-न-किसी रूप में महत्त्वाकांक्षा के ज्वर में ग्रसित होता रहता है। स्वयं से दूर भागने की आकांक्षा में वह स्वयं जैसा है, उसे ढकता है और भूलता है, लेकिन क्या हीनता की विस्मृति और उसका विजर्सन एक ही बात है? नहीं। हीनता की विस्मृति हीनता से मुक्ति नहीं है। इससे मुक्ति तो स्वयं को जानकर ही है, क्योंकि स्वयं से भागना ही वह मूल और केन्द्रीय भाव है, जिससे सारी हीनताओं का निर्माण होता है।
🔵आत्मज्ञान के अतिरिक्त इस आंतरिक अभाव से और महत्त्वाकांक्षा के ज्वर से मुक्ति का कोई उपाय नहीं है। जो अपने आप को जानने, उसमें जीने और जागने का साहस करते हैं, उनके लिए शून्य ही पूर्ण बन जाता है। फिर न हीन भाव रहता है और न उससे उपजने वाला महत्त्वाकांक्षा का ज्वर।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 91
मंगलवार, 1 अगस्त 2017
👉स्वतंत्रता का अर्जन
🔴 परतंत्रता जन्मजात है। वह तो प्रकृतिप्रदत्त है। हममें से किसी को उसे अर्जित नहीं करना होता। होश सँभालते ही मनुष्य पाता है कि वह परतंत्र है। वासना की जंजीरों के साथ ही उसका इस जगत् में आना हुआ है। अगणित सूक्ष्म बंधन उसे बाँधे हुए हैं, इन बंधनों की पीड़ा हर पल उसे सताती है। परतंत्रता में भला कोई सुखी भी कैसे हो सकता है।🔵 सुखी होने के लिए तो स्वतंत्रता चाहिए। यह स्वतंत्रता किसी को भी जन्म के साथ नहीं मिलती। इसे तो अर्जित करना होता है और यह उसे ही उपलब्ध होती है,जो उसके लिए श्रम एवं संघर्ष करता है। स्वतंत्रता के लिए मूल्य देना होता है। हो भी क्यों नहीं? जीवन में जो भी श्रेष्ठ है, वह निर्मूल्य नहीं मिल सकता।
🔴 ध्यान रहे, प्रकृति से मिली स्वतंत्रता दुर्भाग्य नहीं है। दुर्भाग्य तो है स्वतंत्रता को अर्जित न कर पाना। दासता में जन्म लेना बुरा नहीं है, पर दासता ढोते हुए, दास स्थिति में ही मर जाना अवश्य बुरा है। अंतस् की स्वतंत्रता को पाए बिना जीवन में कुछ भी सार्थकता और कृतार्थता तक नहीं पहुँचता है।
🔵 वासनाओं की अँधेरी काल-कोठरियों की कैद में जो बंद हैं, जिन्होंने विवेक का निरभ्र व मुक्त आकाश नहीं जाना है, समझना यही चाहिए कि उन्होंने जीवन तो पाया, पर वे जीवन को जानने से वंचित रह गए। उन्होंने न तो खुली हवा में साँस लेने का सुख पाया, न ही अनंत आकाश में चाँद-सितारों की जगमगाहट देखी। सुबह के सूरज की उजास का भी वे अनुभव नहीं कर पाए, क्योंकि ये सारे अनुभव स्वतंत्रता के हैं।
🔴 पिंजड़ों में कैद पक्षियों और वासनाओं की कैद में पड़ी आत्माओं के जीवन में कोई भेद नहीं, क्योंकि दोनों ही स्वतंत्रता एवं स्वामित्व का आनंद नहीं पा सकते।
प्रभु को जानना है, तो हर मनुष्य को चाहिए कि वह स्वतंत्रता का अर्जन करे। जो परतंत्र, पराजित और दास हैं, प्रभु का राज्य उनके लिए नहीं है।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 90
सोमवार, 31 जुलाई 2017
👉मैं कौन हूँ?
🔴 ‘‘मैं कौन हूँ?’’ जो स्वयं से इस सवाल को नहीं पूछता है, ज्ञान के द्वार उसके लिए बंद ही रह जाते हैं। उस द्वार को खोलने की चाबी यही है कि स्वयं से पूछो, ‘‘मैं कौन हूँ?’’ और जो तीव्रता से, समग्रता से अपने से यह सवाल पूछता है, वह स्वयं ही उत्तर पा जाता है।
🔵 महान् दार्शनिक सर्वपल्ली राधाकृष्णन् बूढ़े हो चले थे। उनकी देह जो कभी अति सुंदर और स्वस्थ थी, अब जर्जर और ढीली हो गई थी। जीवन संध्या के लक्षण प्रकट होने लगे थे। ऐसे बुढ़ापे की सुबह की घटना है। वह स्नानगृह में थे। स्नान के बाद वह जैसे ही अपने शरीर को पोंछने लगे, तभी अचानक उन्होंने गहरी नजर से देखा कि वह देह तो कब की जा चुकी है, जिसे अपनी माने बैठे थे। शरीर तो बिलकुल ही बदल गया है। वह काया अब कहाँ है? जिसे उन्होंने प्रेम किया था, जिस पर उन्होंने गौरव किया था, उसकी जगह यह खंडहर ही तो बाकी बचा रह गया है।
🔴 इस सोच के साथ उनके दार्शनिक मन में एक अत्यंत अभिनव बोध भी अंकुरित होने लगा, ‘शरीर तो वह नहीं है, लेकिन वह तो वही हैं। वह तो बिलकुल भी नहीं बदले हैं। अपने सारे कर्तृत्वों, उपलब्धियों के ढेर के बीच वह अपनी गहराई में जस-के-तस हैं।’ तब उन्होंने स्वयं से ही पूछा, ‘आह! तब फिर मैं कौन हूँ?’ अपनी गहराइयों में उन्हें उत्तर भी मिला और तत्त्ववेत्ता के रूप में वह संपूर्ण हुए।
🔵 यही सवाल प्रत्येक को अपने से पूछना होता है। यही असली सवाल है। जो इसे नहीं पूछते, वे एक प्रकार से व्यर्थ जीवन जीते हैं। जो पूछते ही नहीं, वे भला उत्तर भी कैसे पा सकेंगे? इसलिए स्वयं से अभी और तत्काल यह सवाल पूछो कि ‘‘मैं कौन हूँ?’’ अपने अंतरतम की गहराइयों में इस प्रश्न को गूँजने दो, ‘‘मैं कौन हूँ?’’ जब प्राणों की पूरी शक्ति से कोई पूछता है, तो उसे अवश्य ही उत्तर उपलब्ध होता है और वह उत्तर जीवन की सारी दिशा और अर्थ को परिवर्तित कर देता है।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 89
रविवार, 30 जुलाई 2017
👉जीवन पथ के प्रदीप 30_July_2017
🌹पथ प्रभु प्रेम का🔴आखिर भयभीत क्यों हो? न तो इहलोक में, न परलोक में ही भय का कोई कारण है। सभी जीवों को आलोकित करता हुआ प्रेम का महाभाव विद्यमान है और उस प्रेम के लिए ईश्वर के अतिरिक्त और कोई दूसरा नाम नहीं है। ईश्वर तुमसे दूर नहीं है। वह देश की सीमा में बद्ध नहीं है, क्योंकि वह निराकार एवं अंतर्यामी है। स्वयं को पूर्णतः उसके प्रति समर्पित कर दो। शुभ तथा अशुभ तुम जो भी हो सर्वस्व उसको समर्पित कर दो। कुछ भी बचा न रखो। इस प्रकार के सर्वस्व समर्पण के द्वारा तुम्हारा संपूर्ण चरित्र बन जाएगा। विचार करो प्रेम कितना महान है। यह जीवन से भी बड़ा तथा मृत्यु से भी अधिक सशक्त है। ईश्वरप्राप्ति के सभी मार्गों में यह सर्वाधिक शीघ्रगामी है।
🔵 ज्ञान का पथ कठिन है। प्रेम का पथ सहज है। शिशु के समान सरल-निश्छल बनो। विश्वास और प्रेम रखो, तब तुम्हें कोई हानि नहीं होगी। धीर आशावान बनो, तभी तुम सहज रूप से जीवन की सभी परिस्थतियों का सामना करने में समर्थ हो सकोगे। उदार हृदय बनो। क्षुद्र अहं तथा अनुदारता के सभी विचारों को निर्मूल कर दो। पूर्ण विश्वास के साथ स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित कर दो। वे तुम्हारी सभी बातों को जानते हैं। उनके ज्ञान पर विश्वास करो। वे कितने पितृतुल्य हैं, सर्वोपरि वे कितने मातृतुल्य हैं। अनंत प्रभु अपनी अनंतता में तुम्हारे दुख के सहभागी हैं। उनकी कृपा असीम है। यदि तुम हजार भूलें करो तो भी प्रभु तुम्हें हजार बार क्षमा करेंगे। यदि दोष तुम पर आ पड़े, तो वह दोष नहीं रह जाएगा। यदि तुम प्रभु से प्रेम करते हो तो अत्यंत भयावह अनुभव भी तुम्हें तुम्हारे प्रेमास्पद प्रभु के सन्देशवाहक ही प्रतीत होंगे।
🔴 निश्चित ही प्रेम के द्वारा तुम ईश्वर को प्राप्त करोगे। क्या माँ सर्वदा प्रेममयी नहीं होती? वह, अपना ईश्वर, आत्मा का प्रेमी भी कुछ उसी प्रकार है, विश्वास करो! केवल प्रेमपूर्ण विश्वास करो!! फिर तुम्हारे लिए सब कुछ ठीक हो जाएगा। तुमसे जो भूलें हो गयी हैं, उनसे तनिक भी भयभीत न होओ। मनुष्य बनो-सच्चे अर्थों में मनुष्य-वह मनुष्य जिसके पास प्रेम से लबालब भरा हुआ हृदय है। जीवन का साहसपूर्वक सामना करो। जो भी हो, उसे होने दो। प्रभु प्रेम की शक्ति से ही तुम शक्तिशाली बन सकते हो। स्मरण रखो कि तुम्हारे पास अनंत शक्ति है। तुम्हारे परम प्रेमास्पद प्रभु स्वयं तुम्हारे साथ हैं। फिर तुम्हें क्या भय हो सकता है? प्रभु प्रेम के इस पथ पर निर्भीक हो बढ़े चलो, सब कुछ वह स्वतः होता चला जाएगा, जो तुम्हारे लिए परम कल्याणकारी एवं प्रीतिकर है।
🌹जीवन पथ के प्रदीप
शुक्रवार, 28 जुलाई 2017
👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 37)
🌹 चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी और सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे।
🔴 घर के बर्तन इस तरह नहीं रहने चाहिए जिन पर चूहे और छिपकली पेशाब करें और उस जहर से अप्रत्यक्ष बीमारियाँ शरीरों में घुस पड़ें। खुले हुए वाद्य पदार्थों में कीड़े-मकोड़े घुसते हैं। इसलिए हर खाने में काम आने वाली वस्तु दबी-ढकी रहनी चाहिए। कपड़े, बर्तन, फर्नीचर, किताबें, जूते तथा अन्य सामान यथास्थान रखा हो तो ही सुंदर लगेगा अन्यथा बिखरी हुई अस्त-व्यस्त चीजें कूड़े और गंदगी की ही शक्ल धारण कर लेती हैं, भले ही वे कितनी ही मूल्यवान क्यों न हों। जिस वस्तु को झाड़ते-पोंछते न रहा जाएगा, वह धूल की पर्त जमा होने तथा लगातार ऋतु प्रभाव सहते रहने से मैली, पुरानी हो जाएगी।
🔵 हर चीज सफाई, मरम्मत और व्यवस्था चाहती है। घर का हर पदार्थ हम से यही आशा करता है कि उसे स्वच्छ और सुव्यवस्थित रखा जाए। जिन्हें स्वच्छता से सच्चा प्रेम है, वे शरीर का शृंगार करके ही न बैठ जाएँगे वरन् जहाँ रहेंगे वहाँ हर पदार्थ की शोभा, स्वच्छता एवं सुसज्जा का ध्यान रखेंगे। मकान की टूट-फूट और लिपाई-पुताई का, किवाड़ों की रंगाई का ध्यान रखा जाएगा तो उसमें बहुत पैसा खर्च नहीं होता। थोड़ा-थोड़ा समय बचाकर घर के लोग मिल-जुलकर यह सब सहज ही एक मनोरंजन की तरह करते रह सकते हैं और घर परिवार में शरीर और बच्चों में मानवोचित स्वच्छता का दर्शन हो सकता है। कलाकारिता, स्वच्छता से आरंभ होती है। अवांछनीयता को अस्वीकार करने की प्रवृत्ति का अभिवर्धन शरीर से आरंभ होकर वस्त्रों तक और मन से लेकर व्यवहार तक की स्वच्छता तक विकसित होता चला जाता है और इस अच्छी आदत के सहारे परम सौंदर्य से भरे हुए इस विश्व में भगवान की प्रकाशवान कलाकारिता को देखकर आनंद विभोर रहता हुआ पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है।
🔴 अपने यहाँ मल-मूत्र संबंधी गंदगी के लोग बुरी तरह अभ्यस्त हो गए हैं। पुराने ढंग के पाखानों में फिनायल, चूना आदि न पड़ने से उनमें भारी दुर्गंध आती है। बच्चों को नालियों पर, गलियों में टट्टी कराके रास्ते दुर्गंध पूर्ण एवं जी मिचलाने वाले बना दिए जाते हैं। घरों के आगे लोग कूड़े का ढेर लगा देते हैं। पेशाब ऐसे स्थानों पर करते रहते हैं, जहाँ सार्वजनिक आवागमन रहता है। सफाई कर्मी के भरोसे सब कुछ निर्भर रहता है। यह नहीं सोचते कि मल-मूत्र आखिर है तो हमारे ही शरीर का, उसकी स्वच्छता के लिए कुछ काम स्वयं भी करें और सफाई कर्मी के काम में सहयोग देकर स्वच्छता बनाए रखने का अपना कर्तव्य निबाहें।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.51
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.8
🔴 घर के बर्तन इस तरह नहीं रहने चाहिए जिन पर चूहे और छिपकली पेशाब करें और उस जहर से अप्रत्यक्ष बीमारियाँ शरीरों में घुस पड़ें। खुले हुए वाद्य पदार्थों में कीड़े-मकोड़े घुसते हैं। इसलिए हर खाने में काम आने वाली वस्तु दबी-ढकी रहनी चाहिए। कपड़े, बर्तन, फर्नीचर, किताबें, जूते तथा अन्य सामान यथास्थान रखा हो तो ही सुंदर लगेगा अन्यथा बिखरी हुई अस्त-व्यस्त चीजें कूड़े और गंदगी की ही शक्ल धारण कर लेती हैं, भले ही वे कितनी ही मूल्यवान क्यों न हों। जिस वस्तु को झाड़ते-पोंछते न रहा जाएगा, वह धूल की पर्त जमा होने तथा लगातार ऋतु प्रभाव सहते रहने से मैली, पुरानी हो जाएगी।
🔵 हर चीज सफाई, मरम्मत और व्यवस्था चाहती है। घर का हर पदार्थ हम से यही आशा करता है कि उसे स्वच्छ और सुव्यवस्थित रखा जाए। जिन्हें स्वच्छता से सच्चा प्रेम है, वे शरीर का शृंगार करके ही न बैठ जाएँगे वरन् जहाँ रहेंगे वहाँ हर पदार्थ की शोभा, स्वच्छता एवं सुसज्जा का ध्यान रखेंगे। मकान की टूट-फूट और लिपाई-पुताई का, किवाड़ों की रंगाई का ध्यान रखा जाएगा तो उसमें बहुत पैसा खर्च नहीं होता। थोड़ा-थोड़ा समय बचाकर घर के लोग मिल-जुलकर यह सब सहज ही एक मनोरंजन की तरह करते रह सकते हैं और घर परिवार में शरीर और बच्चों में मानवोचित स्वच्छता का दर्शन हो सकता है। कलाकारिता, स्वच्छता से आरंभ होती है। अवांछनीयता को अस्वीकार करने की प्रवृत्ति का अभिवर्धन शरीर से आरंभ होकर वस्त्रों तक और मन से लेकर व्यवहार तक की स्वच्छता तक विकसित होता चला जाता है और इस अच्छी आदत के सहारे परम सौंदर्य से भरे हुए इस विश्व में भगवान की प्रकाशवान कलाकारिता को देखकर आनंद विभोर रहता हुआ पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है।
🔴 अपने यहाँ मल-मूत्र संबंधी गंदगी के लोग बुरी तरह अभ्यस्त हो गए हैं। पुराने ढंग के पाखानों में फिनायल, चूना आदि न पड़ने से उनमें भारी दुर्गंध आती है। बच्चों को नालियों पर, गलियों में टट्टी कराके रास्ते दुर्गंध पूर्ण एवं जी मिचलाने वाले बना दिए जाते हैं। घरों के आगे लोग कूड़े का ढेर लगा देते हैं। पेशाब ऐसे स्थानों पर करते रहते हैं, जहाँ सार्वजनिक आवागमन रहता है। सफाई कर्मी के भरोसे सब कुछ निर्भर रहता है। यह नहीं सोचते कि मल-मूत्र आखिर है तो हमारे ही शरीर का, उसकी स्वच्छता के लिए कुछ काम स्वयं भी करें और सफाई कर्मी के काम में सहयोग देकर स्वच्छता बनाए रखने का अपना कर्तव्य निबाहें।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.51
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.8
👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: २८
🌹 विचार और कार्य संतुलित करो
🔵 एक साथ बहुत सारे काम निबटाने के चक्कर में मनोयोग से कोई कार्य पूरा नहीं हो पाता। आधा- अधूरा कार्य छोडक़र मन दूसरे कार्यों की ओर दौडऩे लगता है। यहीं से श्रम, समय की बर्बादी प्रारंभ होती है तथा मन में खीझ उत्पन्न होती है। विचार और कार्य सीमित एवं संतुलित कर लेने से श्रम और शक्ति का अपव्यय रूक जाता है और व्यक्ति सफलता के सोपानों पर चढ़ता चला जाता है।
🔴 कोई भी काम करते समय अपने मन को उच्च भावों से और संस्कारों से ओत- प्रोत रखना हीसाँसारिक जीवन में सफलता का मूल मंत्र है। हम जहाँ रह रहे हैं उसे नहीं बदल सकते पर अपने आपको बदल कर हर स्थिति में आनंद ले सकते हैं।
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔵 एक साथ बहुत सारे काम निबटाने के चक्कर में मनोयोग से कोई कार्य पूरा नहीं हो पाता। आधा- अधूरा कार्य छोडक़र मन दूसरे कार्यों की ओर दौडऩे लगता है। यहीं से श्रम, समय की बर्बादी प्रारंभ होती है तथा मन में खीझ उत्पन्न होती है। विचार और कार्य सीमित एवं संतुलित कर लेने से श्रम और शक्ति का अपव्यय रूक जाता है और व्यक्ति सफलता के सोपानों पर चढ़ता चला जाता है।
🔴 कोई भी काम करते समय अपने मन को उच्च भावों से और संस्कारों से ओत- प्रोत रखना हीसाँसारिक जीवन में सफलता का मूल मंत्र है। हम जहाँ रह रहे हैं उसे नहीं बदल सकते पर अपने आपको बदल कर हर स्थिति में आनंद ले सकते हैं।
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 Lose Not Your Heart Day 28
🌹 Balance Your Thoughts and Actions
🔵 When the mind is pulled in too many directions, it cannot accomplish anything. It becomes disturbed by half- completed tasks and runs out of control. When it is burdened with too many tasks, it cannot complete a single one. You quickly lose time, energy, and most importantly, temper. By limiting your tasks and organizing your thoughts, you will not be as likely to waste your energies, and you will be able to achieve greater success in the tasks you undertake.
🔴 Before starting a task, saturate your mind with noble thoughts. This is the formula for worldly success. While we cannot change
ituations, we can change ourselves to accommodate a situation and remain cheerful.
🔵 When the mind is pulled in too many directions, it cannot accomplish anything. It becomes disturbed by half- completed tasks and runs out of control. When it is burdened with too many tasks, it cannot complete a single one. You quickly lose time, energy, and most importantly, temper. By limiting your tasks and organizing your thoughts, you will not be as likely to waste your energies, and you will be able to achieve greater success in the tasks you undertake.
🔴 Before starting a task, saturate your mind with noble thoughts. This is the formula for worldly success. While we cannot change
ituations, we can change ourselves to accommodate a situation and remain cheerful.
🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya
👉 दो अक्षर की गम्भीर समस्या और दो अक्षर से ही समाधान
🔵 एक बार एक नगर मे कई व्यक्ति बड़े दुःखी थे बस अपने दुखों की दवा पाने के लिये इधरउधर मारे मारे फिरते थे!
🔴 एक बार उस नगर मे कोई संत आये और वो रोज प्रवचन दिया करते थे एक दिन जब वो प्रवचन देकर उठे तो बाहर से एक आदमी आया और वो लोगो को मिठाई बाँट रहा था और खुशी मे झूम रहा था लोगो ने पूछा अरे भाई क्या मिल गया तुम्हे ऐसा की इतने खुश हो रहे हो और ये मिठाई किस बात की बाँट रहे हो?
🔵 तो उसने कहाँ मेरे जीवन की एक बहुत ही गम्भीर समस्या थी मै उस समस्या से बड़ा दुःखी रहता था भगवान श्री राम की इस कथा मे आने से मेरी उस समस्या का समाधान हो गया उस करुणानिधान ने मेरी सारी समस्या को समाप्त कर दिया! तो लोगो ने पूछा की आखिर ऐसा क्या मिला तो उसने कहा मिला नही मेरा घोड़ा खो गया तो लोगो ने पूछा की घोड़ा मूल्यहीन होगा इसलिये लड्डू बाँट रहा है तो उसने कहा अरे नही वो तो बहुत ही चंचल और मूल्यवान है पर वो खो गया इसलिये मै बड़ा खुश हुं उसने सन्त श्री के चरणों मे खुब प्रणाम किया और नाचते गाते चला गया!
🔴 सभी लोग सन्त श्री के पास गये और उन्होंने कहा की हॆ देव ये कैसा पागल इंसान है जो लोगो से कह रहा है और मिठाई बाँट रहा है की इस कथा मे मेरा घोड़ा खो गया है ये कैसा पागल है?
🔵 तो सन्त श्री ने कहा की यहाँ मेरी कथा सार्थक हो गई तो लोगो ने कहा की हॆ देव हम आपका मतलब नही समझ पा रहे है तो सन्त श्री ने कहा की मै तो यही चाहता हुं जो भी कथा मे आये उन सब के घोड़े खो जाये तो लोगो ने कहा की हमारे पास तो घोड़े है ही नही तो फिर घोड़े खोयेँगे कैसे तो सन्त श्री ने जो उत्तर दिया तो सब अवाक रह गये!
🔴 सन्त श्री ने कहा की "मन" वो घोड़ा है जो बड़ा चंचल है और यदि ये "राम" मे खो जायें अर्थात ईष्ट मे खो जायें सार मे खो जाये तो आनन्द ही आनन्द है और संसार मे खो जाये तो दुःख दुःख और बस दुःख ही दुःख है !मन बड़ा चंचल है पता नही कहाँ कहाँ खो जाता है अरे जिसमे इसे खोना है ये उसमे तो नही खोता है और जिसमे इसे नही खोना है बस उसी मे खो जाता है!
🔵 सद्गुरु देव से एक अति विनम्र प्रार्थना है मेरी की हॆ नाथ इस मन को संसार मे मत खोने देना हॆ नाथ इस मन को सार मे लगा देना! मेरा मन खो जाये मेरे ईष्ट मे और पुरी तरह से खो जायें ईष्ट मे और सद्गुरु के चरणों मे, बस इतनी सी कृपा करना हॆ माँ की ये चंचल मन तुझमे खो जायें हॆ माँ!
🔴 बस हमको भी यही माँगना की मन रूपी घोड़ा खो जाये " संसार " मे ताकि फिर दुखी न हो संसार मे!
गुरुवार, 27 जुलाई 2017
👉 भगवान शिव और उनका तत्त्वदर्शन (अंतिम भाग)
🔵 हिन्दू समाज के पूज्य जिनकी हम दोनों वक्त आरती उतारते हैं, जप करते हैं, शिवरात्रि के दिन पूजा और उपवास करते हैं और न जाने क्या-क्या प्रार्थनाएँ करते-कराते हैं। क्या वे भगवान शंकर हमारी कठिनाइयों का समाधान नहीं कर सकते? क्या हमारी उन्नति में कोई सहयोग नहीं दे सकते? भगवान को देना चाहिए, हम उनके प्यारे हैं, उपासक हैं। हम उनकी पूजा करते हैं, वे बादल के तरीके से हैं। अगर पात्रता हमारी विकसित होती चली जाएगी तो वह लाभ मिलते चले जाएँगे जो शंकर भक्तों को मिलने चाहिए।
🔴 शंकर भगवान के स्वरूप का जैसा कि मैंने आपको निवेदन किया, इसी प्रकार के सारे पौराणिक कथानकों, सारे देवी-देवताओं में संदेश और शिक्षाएँ भरी पड़ी हैं। काश! हमने उनको समझने की कोशिश की होती, तो हम प्राचीनकाल के उसी तरीके से नर-रत्नों में एक रहे होते जिनको कि दुनिया वाले तैंतीस करोड़ देवता कहते थे। 33 करोड़ आदमी हिन्दुस्तान में रहते थे और उन्हीं को लोग कहते थे कि वे इनसान नहीं देवता हैं, क्योंकि उनके ऊँचे विचार और ऊँचे कर्म होते थे। वह भारत भूमि जहाँ से आप लोग पधारे हैं।
🔵 वह देवताओं की भूमि थी और रहनी चाहिए। देवता जहाँ कहीं भी जाते हैं, वहाँ शांति, सौंदर्य, प्रेम और सम्पत्ति पैदा करते हैं। आप लोग जहाँ कहीं भी जाएँ वहाँ आपको ऐसा ही करना चाहिए। आप लोगों ने जो अब तक मेरी बात सुनी, बहुत-बहुत आभार आप सब लोगों का।
🌹 ॥ॐ शान्ति:॥
🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 शंकर भगवान के स्वरूप का जैसा कि मैंने आपको निवेदन किया, इसी प्रकार के सारे पौराणिक कथानकों, सारे देवी-देवताओं में संदेश और शिक्षाएँ भरी पड़ी हैं। काश! हमने उनको समझने की कोशिश की होती, तो हम प्राचीनकाल के उसी तरीके से नर-रत्नों में एक रहे होते जिनको कि दुनिया वाले तैंतीस करोड़ देवता कहते थे। 33 करोड़ आदमी हिन्दुस्तान में रहते थे और उन्हीं को लोग कहते थे कि वे इनसान नहीं देवता हैं, क्योंकि उनके ऊँचे विचार और ऊँचे कर्म होते थे। वह भारत भूमि जहाँ से आप लोग पधारे हैं।
🔵 वह देवताओं की भूमि थी और रहनी चाहिए। देवता जहाँ कहीं भी जाते हैं, वहाँ शांति, सौंदर्य, प्रेम और सम्पत्ति पैदा करते हैं। आप लोग जहाँ कहीं भी जाएँ वहाँ आपको ऐसा ही करना चाहिए। आप लोगों ने जो अब तक मेरी बात सुनी, बहुत-बहुत आभार आप सब लोगों का।
🌹 ॥ॐ शान्ति:॥
🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: २७
🌹 संतोष भरा जीवन जीयेंगे
🔵 समझदारी और विचारशीलता का तकाजा है कि संसार चक्र के बदलते क्रम के अनुरूप अपनीमन:स्थिति को तैयार रखा जाए। लाभ, सुख, सफलता, प्रगति, वैभव आदि मिलने पर अहंकार से ऐंठने की जरूरत नहीं है। कहा नहीं जा सकता कि वह स्थिति कब तक रहेगी। ऐसी दशा में रोने-झींकने ,खीजने, निराश होने में शक्ति नष्ट करना व्यर्थ है। परिवर्तन के अनुरूप अपने को ढालने में,, विपन्नता को सुधारने में सोचने, हल निकालने और तालमेल बिठाने में मस्तिष्क को लगाया जाए तो यह प्रयत्न रोने और सिर धुनने की अपेक्षा अधिक श्रेयस्कर होगा।
🔴 बुद्धिमानी इसी में है कि जो उपलब्ध है उसका आनंद लिया जाय और संतोष भरा संतुलन बनाए रखा जाए।
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔵 समझदारी और विचारशीलता का तकाजा है कि संसार चक्र के बदलते क्रम के अनुरूप अपनीमन:स्थिति को तैयार रखा जाए। लाभ, सुख, सफलता, प्रगति, वैभव आदि मिलने पर अहंकार से ऐंठने की जरूरत नहीं है। कहा नहीं जा सकता कि वह स्थिति कब तक रहेगी। ऐसी दशा में रोने-झींकने ,खीजने, निराश होने में शक्ति नष्ट करना व्यर्थ है। परिवर्तन के अनुरूप अपने को ढालने में,, विपन्नता को सुधारने में सोचने, हल निकालने और तालमेल बिठाने में मस्तिष्क को लगाया जाए तो यह प्रयत्न रोने और सिर धुनने की अपेक्षा अधिक श्रेयस्कर होगा।
🔴 बुद्धिमानी इसी में है कि जो उपलब्ध है उसका आनंद लिया जाय और संतोष भरा संतुलन बनाए रखा जाए।
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 Lose Not Your Heart Day 27
🌹 Live in Contentment
🔵 It is only wise to be prepared for changing times. You should never feel conceited about your successes, happiness, luxuries, or progress, because you do not know how long these will last. If they do not, there is no point in spending your energy complaining, despairing, or becoming angry. Use your time to think through the situation and devise a solution, or otherwise reconcile yourself to it. In the end, this will be more beneficial for you.
🔴 Real intelligence comes from finding happiness in whatever is available, and in this way, keeping your mental balance.
🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya
🔵 It is only wise to be prepared for changing times. You should never feel conceited about your successes, happiness, luxuries, or progress, because you do not know how long these will last. If they do not, there is no point in spending your energy complaining, despairing, or becoming angry. Use your time to think through the situation and devise a solution, or otherwise reconcile yourself to it. In the end, this will be more beneficial for you.
🔴 Real intelligence comes from finding happiness in whatever is available, and in this way, keeping your mental balance.
🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya
बुधवार, 26 जुलाई 2017
👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 36)
🌹 चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी और सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे।
🔴 गंदगी स्वास्थ्य की दृष्टि से अतीव हानिकारक है। उसे बीमारी का संदेशवाहक कह सकते हैं। जहाँ गंदगी रहेगी वहाँ बीमारी जरूर पहुँचेगी। गंदगी से बीमारी को बहुत प्यार है। फूलों को तलाश करती हुई तितली जिस प्रकार फूल पर जा पहुँचती है, उसी तरह जहाँ गंदगी फल-फूल रही होगी वहाँ बीमारी भी खोज, तलाश करती हुई जरूर पहुँच जाएगी। बीमारी भी गंदगी पैदा करती है यह ठीक है, पर यह निश्चित है कि जो गंदे हैं वे स्वस्थ न रह सकेंगे। मनुष्य की मूल प्रकृति गंदगी के विरुद्ध है, इसलिए किसी व्यक्ति या पदार्थ को गंदा देखते हैं तो अनायास ही घृणा उत्पन्न होती है, वहाँ से दूर हटने का जी करता है। अस्तु जिन्हें मनुष्यता का ज्ञान है, उन्हें गंदगी हटाने का स्वभाव अपनी प्रकृति में अनिवार्यतः जोड़ देना चाहिए।
🔵 हर हालत में हर व्यक्ति को स्वच्छता के लिए स्नान आवश्यक मानना चाहिए। चेचक जैसे रोगों में मजबूरी उत्पन्न हो जाए तो बात दूसरी है, नहीं तो बीमारों को भी चिकित्सक के परामर्श से स्वच्छता का कोई न कोई रास्ता जरूर निकालते रहना चाहिए।
🔴 मुँह की सफाई बहुत ध्यान देने योग्य है। जीभ पर मैल की एक पर्त जमने लगती है और दाँतों की झिरी में अन्न के कण छिपे रहकर सड़न पैदा करते हैं। सबेरे कुल्ला करते समय दाँतों को भली प्रकार साफ करना चाहिए। जितने बार कुछ खाया जाए उतने ही बार कुल्ला करना चाहिए और रात को सोते समय तो जरूर ही मुँह की सफाई कर लेनी चाहिए। इससे दाँत अधिक दिन टिकेंगे, मुँह में बदबू न आएगी और लोगों को पास बैठने पर दूर हटने की आवश्यकता न पड़ेगी।
🔵 कपड़े जो शरीर को छूते हैं, उन्हें विशेष ध्यान देकर साबुन से रोज धोना चाहिए। बनियान, अंडरवियर, धोती, पायजामा आदि पसीना सोखते रहते हैं और रोज साबुन तथा धूप की अपेक्षा करते हैं। कोट जैसे कपड़े जिनका पसीने से सम्पर्क नहीं होता, नित्य धोने से छूट पा सकते हैं। भारी बिस्तरों को धोना तो कठिन पड़ेगा, पर शरीर छूने वाली चादरें जल्दी-जल्दी बदलते रहना चाहिए और बिस्तर को कड़ी धूप में हर रोज सुखाना चाहिए।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.49
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.8
🔴 गंदगी स्वास्थ्य की दृष्टि से अतीव हानिकारक है। उसे बीमारी का संदेशवाहक कह सकते हैं। जहाँ गंदगी रहेगी वहाँ बीमारी जरूर पहुँचेगी। गंदगी से बीमारी को बहुत प्यार है। फूलों को तलाश करती हुई तितली जिस प्रकार फूल पर जा पहुँचती है, उसी तरह जहाँ गंदगी फल-फूल रही होगी वहाँ बीमारी भी खोज, तलाश करती हुई जरूर पहुँच जाएगी। बीमारी भी गंदगी पैदा करती है यह ठीक है, पर यह निश्चित है कि जो गंदे हैं वे स्वस्थ न रह सकेंगे। मनुष्य की मूल प्रकृति गंदगी के विरुद्ध है, इसलिए किसी व्यक्ति या पदार्थ को गंदा देखते हैं तो अनायास ही घृणा उत्पन्न होती है, वहाँ से दूर हटने का जी करता है। अस्तु जिन्हें मनुष्यता का ज्ञान है, उन्हें गंदगी हटाने का स्वभाव अपनी प्रकृति में अनिवार्यतः जोड़ देना चाहिए।
🔵 हर हालत में हर व्यक्ति को स्वच्छता के लिए स्नान आवश्यक मानना चाहिए। चेचक जैसे रोगों में मजबूरी उत्पन्न हो जाए तो बात दूसरी है, नहीं तो बीमारों को भी चिकित्सक के परामर्श से स्वच्छता का कोई न कोई रास्ता जरूर निकालते रहना चाहिए।
🔴 मुँह की सफाई बहुत ध्यान देने योग्य है। जीभ पर मैल की एक पर्त जमने लगती है और दाँतों की झिरी में अन्न के कण छिपे रहकर सड़न पैदा करते हैं। सबेरे कुल्ला करते समय दाँतों को भली प्रकार साफ करना चाहिए। जितने बार कुछ खाया जाए उतने ही बार कुल्ला करना चाहिए और रात को सोते समय तो जरूर ही मुँह की सफाई कर लेनी चाहिए। इससे दाँत अधिक दिन टिकेंगे, मुँह में बदबू न आएगी और लोगों को पास बैठने पर दूर हटने की आवश्यकता न पड़ेगी।
🔵 कपड़े जो शरीर को छूते हैं, उन्हें विशेष ध्यान देकर साबुन से रोज धोना चाहिए। बनियान, अंडरवियर, धोती, पायजामा आदि पसीना सोखते रहते हैं और रोज साबुन तथा धूप की अपेक्षा करते हैं। कोट जैसे कपड़े जिनका पसीने से सम्पर्क नहीं होता, नित्य धोने से छूट पा सकते हैं। भारी बिस्तरों को धोना तो कठिन पड़ेगा, पर शरीर छूने वाली चादरें जल्दी-जल्दी बदलते रहना चाहिए और बिस्तर को कड़ी धूप में हर रोज सुखाना चाहिए।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.49
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.8
👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: २६
🌹 खिलाड़ी भावना अपनाओ
🔵 आपके विषय में, आपकी योजनाओं के विषय में,, आपके उद्देश्यों के विषय में अन्य लोग जो कुछ विचार करते हैं, उस पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। अगर वे आपको कल्पनाओं के पीछे दौडऩे वाला उन्मुक्त अथवा स्वप्न देखने वाला कहें तो उसकी परवाह मत करो। तुम अपने व्यक्तित्व पर श्रद्धा को बनाए रहेा। किसी मनुष्य के कहने से,, किसी आपत्ति के आने से अपने आत्मविश्वास को डगमगाने मत दो। आत्मश्रद्धा को कायम रखोगे और आगे बढ़ते रहोगे तो जल्दी या देर में संसार आपको रास्ता देगा ही।
🔴 आगे भी प्रगति के प्रयास तो जारी रखें ही जाएँ पर वह सब खिलाड़ी भावना से ही किया जाए।
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔵 आपके विषय में, आपकी योजनाओं के विषय में,, आपके उद्देश्यों के विषय में अन्य लोग जो कुछ विचार करते हैं, उस पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। अगर वे आपको कल्पनाओं के पीछे दौडऩे वाला उन्मुक्त अथवा स्वप्न देखने वाला कहें तो उसकी परवाह मत करो। तुम अपने व्यक्तित्व पर श्रद्धा को बनाए रहेा। किसी मनुष्य के कहने से,, किसी आपत्ति के आने से अपने आत्मविश्वास को डगमगाने मत दो। आत्मश्रद्धा को कायम रखोगे और आगे बढ़ते रहोगे तो जल्दी या देर में संसार आपको रास्ता देगा ही।
🔴 आगे भी प्रगति के प्रयास तो जारी रखें ही जाएँ पर वह सब खिलाड़ी भावना से ही किया जाए।
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 Lose Not Your Heart Day 26
🌹 The Spirit of Sportsmanship
🔵 If you wish to do something extraordinary, do not pay attention to what others think of your goals and plans. If they see you as an unrealistic dreamer, ignore it. Have faith in yourself. Do not let your faith waver because of someone's words or an adverse condition. If you keep going, you will ultimately find a way to proceed.
🔴 Keep applying your efforts, but do it with a spirit of sportsmanship: do not give up, even upon losing.
🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya
🔵 If you wish to do something extraordinary, do not pay attention to what others think of your goals and plans. If they see you as an unrealistic dreamer, ignore it. Have faith in yourself. Do not let your faith waver because of someone's words or an adverse condition. If you keep going, you will ultimately find a way to proceed.
🔴 Keep applying your efforts, but do it with a spirit of sportsmanship: do not give up, even upon losing.
🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya
मंगलवार, 25 जुलाई 2017
👉 आत्मचिंतन के क्षण 25 July
🔴 शक्तिशाली आत्म संकेत में अद्भुत शक्ति है। जिन विचारों के संपर्क में हम रहते हैं, जिनमें पुनः पुनः रमण करते हैं वैसे ही बन जाते हैं। ये संकेत हमारे मानसिक संस्थान के एक अंग बन जाते हैं। प्रकाशमय विचार धारा से कंटकाकीर्ण और अन्धकारमय पथ भी आलोकित हो उठता है। जब आप दृढ़ता से कहते हैं, ‘मैं बलवान हूँ, दृढ़ संकल्प हूँ, गौरवशाली हूँ।” तो इन विचारों से हमारा आत्म विश्वास जागृत हो उठता है। हम साहस और पौरुष से भर जाते हैं और आत्म गौरव को समझने लगते हैं। हमारी शक्तियाँ वैसा ही काम करती हैं जैसी हम उन्हें आज्ञा देते हैं।
🔵 आत्म विश्वास पाने के लिए सफलता जादू जैसा प्रभाव डालती है। एक सफलता से मनुष्य दूसरी सफलता के लिए प्रेरणा पाता है। आप पहले एक साधारण कार्य चुन लीजिए और दृढ़ता से उसे पूर्ण कीजिए। जब यह पूर्ण हो जाय, तो अधिक बड़ा काम हाथ में लीजिए। इसे पूरा करके ही छोड़िए। तत्पश्चात् अधिक बड़े और दीर्घकालीन अपेक्षाकृत कष्ट साध्य कार्य हाथ में लीजिए और अपनी समस्त शक्ति से उसे पूर्ण कीजिए।
🔴 आपका मन कर्त्तव्य से, कठोर मेहनत से दूर भागेगा, उस कार्य को बीच में ही छोड़ने की ओर प्रवृत्त होगा। इस पलायन प्रवृत्ति से आपको सावधान रहना होगा। मन से लगातार लड़ना चाहिए और जब यह निश्चित मार्ग से च्युत होना चाहे, तुरन्त सावधानी से कार्य लेना चाहिए। कभी आपको आलस्य आयेगा, अपना कार्य मध्य ही में छोड़ देने को जी करेगा, लालच मार्ग में दिखलाई देंगे लेकिन आप छोटे लाभ के लिए बड़े फायदे को मत छोड़िए। भूल कर भी चञ्चल मन के कहने में मत आइए, प्रत्युत विवेक को जागृत कर उसके संरक्षण में अपने आपको रखिए। जाग्रत समय में मन को निरन्तर कार्य में लगाये रखिए। जब तक जागते हैं किसी उत्तम कार्य में अपने आपको संलग्न रखें, तत्पश्चात् सोयें। सुप्तावस्था में भी आप मन की चञ्चलता से दूर रह सकेंगे। धीरे धीरे धैर्य पूर्वक अभ्यास से मन चंचलता दूर होती है।
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔵 आत्म विश्वास पाने के लिए सफलता जादू जैसा प्रभाव डालती है। एक सफलता से मनुष्य दूसरी सफलता के लिए प्रेरणा पाता है। आप पहले एक साधारण कार्य चुन लीजिए और दृढ़ता से उसे पूर्ण कीजिए। जब यह पूर्ण हो जाय, तो अधिक बड़ा काम हाथ में लीजिए। इसे पूरा करके ही छोड़िए। तत्पश्चात् अधिक बड़े और दीर्घकालीन अपेक्षाकृत कष्ट साध्य कार्य हाथ में लीजिए और अपनी समस्त शक्ति से उसे पूर्ण कीजिए।
🔴 आपका मन कर्त्तव्य से, कठोर मेहनत से दूर भागेगा, उस कार्य को बीच में ही छोड़ने की ओर प्रवृत्त होगा। इस पलायन प्रवृत्ति से आपको सावधान रहना होगा। मन से लगातार लड़ना चाहिए और जब यह निश्चित मार्ग से च्युत होना चाहे, तुरन्त सावधानी से कार्य लेना चाहिए। कभी आपको आलस्य आयेगा, अपना कार्य मध्य ही में छोड़ देने को जी करेगा, लालच मार्ग में दिखलाई देंगे लेकिन आप छोटे लाभ के लिए बड़े फायदे को मत छोड़िए। भूल कर भी चञ्चल मन के कहने में मत आइए, प्रत्युत विवेक को जागृत कर उसके संरक्षण में अपने आपको रखिए। जाग्रत समय में मन को निरन्तर कार्य में लगाये रखिए। जब तक जागते हैं किसी उत्तम कार्य में अपने आपको संलग्न रखें, तत्पश्चात् सोयें। सुप्तावस्था में भी आप मन की चञ्चलता से दूर रह सकेंगे। धीरे धीरे धैर्य पूर्वक अभ्यास से मन चंचलता दूर होती है।
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: २५
🌹 आप अपने मित्र भी हो और शत्रु भी
🔵 इस बात का शोक मत करो कि मुझे बार- बार असफल होना पड़ता है। परवाह मत करो क्योंकि समय अनन्त है। बार- बार प्रयत्न करो और आगे की ओर कदम बढ़ाओ। निरन्तर कर्तव्य करते रहो, आज नहीं तो कल तुम सफल होकर रहोगे।
🔴 सहायता के लिए दूसरों के सामने मत गिड़गिड़ाओ क्योंकि यथार्थ में भी इतनी शक्ति नहीं है जो तुम्हारी सहायता कर सके। किसी कष्ट के लिए दूसरों पर दोषरोपण मत करो, क्योंकि यथार्थ में कोई भी तुम्हें द़:ख नहीं पहुँचा सकता। तुम स्वयं ही अपने मित्र हो और स्वयं ही अपने शत्रु हो। जो कुछ भली बुरी स्थितियाँ सामने हैं वह तुम्हारी ही पैदा की हुई हैं। अपना दृष्टिकोण बदल दोगे तो दूसरे ही क्षण यह भय के भूत अंतरिक्ष में तिरोहित हो जावेंगे।
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔵 इस बात का शोक मत करो कि मुझे बार- बार असफल होना पड़ता है। परवाह मत करो क्योंकि समय अनन्त है। बार- बार प्रयत्न करो और आगे की ओर कदम बढ़ाओ। निरन्तर कर्तव्य करते रहो, आज नहीं तो कल तुम सफल होकर रहोगे।
🔴 सहायता के लिए दूसरों के सामने मत गिड़गिड़ाओ क्योंकि यथार्थ में भी इतनी शक्ति नहीं है जो तुम्हारी सहायता कर सके। किसी कष्ट के लिए दूसरों पर दोषरोपण मत करो, क्योंकि यथार्थ में कोई भी तुम्हें द़:ख नहीं पहुँचा सकता। तुम स्वयं ही अपने मित्र हो और स्वयं ही अपने शत्रु हो। जो कुछ भली बुरी स्थितियाँ सामने हैं वह तुम्हारी ही पैदा की हुई हैं। अपना दृष्टिकोण बदल दोगे तो दूसरे ही क्षण यह भय के भूत अंतरिक्ष में तिरोहित हो जावेंगे।
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 Lose Not Your Heart Day 25
🌹 You are Your Own Friend and Enemy
🔵 Do not dwell on repeated failures. You have plenty of time before you. Start afresh and keep performing your duties properly;
success will be yours in due time.
🔴 Do not beg others for help, because in reality, no one has the capacity to truly help you. Likewise, do not blame others when you are depressed as no one has the capacity to cause you pain. You are your own friend and enemy. Every situation you find yourself in, whether good or bad, is of your own creation. Change your outlook towards a situation, and right away the fear surrounding it will vanish.
🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya
🔵 Do not dwell on repeated failures. You have plenty of time before you. Start afresh and keep performing your duties properly;
success will be yours in due time.
🔴 Do not beg others for help, because in reality, no one has the capacity to truly help you. Likewise, do not blame others when you are depressed as no one has the capacity to cause you pain. You are your own friend and enemy. Every situation you find yourself in, whether good or bad, is of your own creation. Change your outlook towards a situation, and right away the fear surrounding it will vanish.
🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya
सोमवार, 24 जुलाई 2017
👉 मदद और दया सबसे बड़ा धर्म
🔵 कहा जाता है दूसरों की मदद करना ही सबसे बड़ा धर्म है। मदद एक ऐसी चीज़ है जिसकी जरुरत हर इंसान को पड़ती है, चाहे आप बूढ़े हों, बच्चे हों या जवान; सभी के जीवन में एक समय ऐसा जरूर आता है जब हमें दूसरों की मदद की जरुरत पड़ती है।
🔴 आज हर इंसान ये बोलता है कि कोई किसी की मदद नहीं करता, पर आप खुद से पूछिये- क्या आपने कभी किसी की मदद की है? अगर नहीं तो आप दूसरों से मदद की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
🔵 किशोर नाम का एक लड़का था जो बहुत गरीब था। दिन भर कड़ी मेहनत के बाद जंगल से लकड़ियाँ काट के लाता और उन्हें जंगल में बेचा करता। एक दिन किशोर सर पे लकड़ियों का गट्ठर लिए जंगल से गुजर रहा था।
🔴 अचानक उसने रास्ते में एक बूढ़े इंसान को देखा जो बहुत दुर्बल था उसको देखकर लगा कि जैसे उसने काफी दिनों खाना नहीं खाया है। किशोर का दिल पिघल गया, लेकिन वो क्या करता उसके पास खुद खाने को नहीं था वो उस बूढ़े व्यक्ति का पेट कैसे भरता? यही सोचकर दुःखी मन से किशोर आगे बढ़ गया।
🔵 आगे कुछ दूर चलने के बाद किशोर को एक औरत दिखाई दी जिसका बच्चा प्यास से रो रहा था क्यूंकि जंगल में कहीं पानी नहीं था। बच्चे की हालत देखकर किशोर से रहा नहीं गया लेकिन क्या करता बेचारा उसके खुद के पास जंगल में पानी नहीं था। दुःखी मन से वो फिर आगे चल दिया। कुछ दूर जाकर किशोर को एक व्यक्ति दिखाई दिया जो तम्बू लगाने के लिए लकड़ियों की तलाश में था।
🔴 किशोर ने उसे लकड़ियाँ बेच दीं और बदले में उसने किशोर को कुछ खाना और पानी दिया। किशोर के मन में कुछ ख्याल आया और वो खाना, पानी लेकर वापस जंगल की ओर दौड़ा। और जाकर बूढ़े व्यक्ति को खाना खिलाया और उस औरत के बच्चे को भी पानी पीने को दिया। ऐसा करके किशोर बहुत अच्छा महसूस कर रहा था।
🔵 इसके कुछ दिन बाद किशोर एक दिन एक पहाड़ी पर चढ़कर लकड़ियाँ काट रहा था अचानक उसका पैर फिसला और वो नीचे आ गिरा। उसके पैर में बुरी तरह चोट लग गयी और वो दर्द से चिल्लाने लगा। तभी वही बूढ़ा व्यक्ति भागा हुआ आया और उसने किशोर को उठाया। जब उस औरत को पता चला तो वो भी आई और उसने अपनी साड़ी का चीर फाड़ कर उसके पैर पे पट्टी कर दी। किशोर अब बहुत अच्छा महसूस कर रहा था।
🔴 मित्रों दूसरों की मदद करके भी हम असल में खुद की ही मदद कर रहे होते हैं। जब हम दूसरों की मदद करेंगे तभी जरुरत पढ़ने पर कोई दूसरा हमारी भी मदद करेगा। तो आज इस कहानी को पढ़ते हुए एक वादा करिये की रोज किसी की मदद जरूर करेंगे, रोज नहीं तो कम से कम सप्ताह एक बार , नहीं तो महीने में एक बार।
🔵 जरुरी नहीं कि मदद पैसे से ही की जाये, आप किसी वृद्ध व्यक्ति को सड़क पार करा सकते हैं या किसी प्यासे को पानी पिला सकते हैं या किसी हताश इंसान को सलाह दे सकते हैं या किसी को खाना खिला सकते हैं। यकीन मानिये ऐसा करते हुए आपको बहुत ख़ुशी मिलेगी और लोग भी आपकी मदद जरूर करेंगे।
🔴 आज हर इंसान ये बोलता है कि कोई किसी की मदद नहीं करता, पर आप खुद से पूछिये- क्या आपने कभी किसी की मदद की है? अगर नहीं तो आप दूसरों से मदद की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
🔵 किशोर नाम का एक लड़का था जो बहुत गरीब था। दिन भर कड़ी मेहनत के बाद जंगल से लकड़ियाँ काट के लाता और उन्हें जंगल में बेचा करता। एक दिन किशोर सर पे लकड़ियों का गट्ठर लिए जंगल से गुजर रहा था।
🔴 अचानक उसने रास्ते में एक बूढ़े इंसान को देखा जो बहुत दुर्बल था उसको देखकर लगा कि जैसे उसने काफी दिनों खाना नहीं खाया है। किशोर का दिल पिघल गया, लेकिन वो क्या करता उसके पास खुद खाने को नहीं था वो उस बूढ़े व्यक्ति का पेट कैसे भरता? यही सोचकर दुःखी मन से किशोर आगे बढ़ गया।
🔵 आगे कुछ दूर चलने के बाद किशोर को एक औरत दिखाई दी जिसका बच्चा प्यास से रो रहा था क्यूंकि जंगल में कहीं पानी नहीं था। बच्चे की हालत देखकर किशोर से रहा नहीं गया लेकिन क्या करता बेचारा उसके खुद के पास जंगल में पानी नहीं था। दुःखी मन से वो फिर आगे चल दिया। कुछ दूर जाकर किशोर को एक व्यक्ति दिखाई दिया जो तम्बू लगाने के लिए लकड़ियों की तलाश में था।
🔴 किशोर ने उसे लकड़ियाँ बेच दीं और बदले में उसने किशोर को कुछ खाना और पानी दिया। किशोर के मन में कुछ ख्याल आया और वो खाना, पानी लेकर वापस जंगल की ओर दौड़ा। और जाकर बूढ़े व्यक्ति को खाना खिलाया और उस औरत के बच्चे को भी पानी पीने को दिया। ऐसा करके किशोर बहुत अच्छा महसूस कर रहा था।
🔵 इसके कुछ दिन बाद किशोर एक दिन एक पहाड़ी पर चढ़कर लकड़ियाँ काट रहा था अचानक उसका पैर फिसला और वो नीचे आ गिरा। उसके पैर में बुरी तरह चोट लग गयी और वो दर्द से चिल्लाने लगा। तभी वही बूढ़ा व्यक्ति भागा हुआ आया और उसने किशोर को उठाया। जब उस औरत को पता चला तो वो भी आई और उसने अपनी साड़ी का चीर फाड़ कर उसके पैर पे पट्टी कर दी। किशोर अब बहुत अच्छा महसूस कर रहा था।
🔴 मित्रों दूसरों की मदद करके भी हम असल में खुद की ही मदद कर रहे होते हैं। जब हम दूसरों की मदद करेंगे तभी जरुरत पढ़ने पर कोई दूसरा हमारी भी मदद करेगा। तो आज इस कहानी को पढ़ते हुए एक वादा करिये की रोज किसी की मदद जरूर करेंगे, रोज नहीं तो कम से कम सप्ताह एक बार , नहीं तो महीने में एक बार।
🔵 जरुरी नहीं कि मदद पैसे से ही की जाये, आप किसी वृद्ध व्यक्ति को सड़क पार करा सकते हैं या किसी प्यासे को पानी पिला सकते हैं या किसी हताश इंसान को सलाह दे सकते हैं या किसी को खाना खिला सकते हैं। यकीन मानिये ऐसा करते हुए आपको बहुत ख़ुशी मिलेगी और लोग भी आपकी मदद जरूर करेंगे।
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