शनिवार, 13 मई 2017

👉 चौथे ऑपरेशन में सूक्ष्म सत्ता का संरक्षण

🔵 मैं गुजरात प्रान्त के बलसाड़ जिले के डुंगरी ग्राम में रहता हूँ। सन् १९६२ से १९६५ तक स्थानीय हाई स्कूल में नॉन टीचिंग स्टाफ के रूप में कार्यरत रहा। इसी दौरान मेरा संपर्क पास के गाँव के गायत्री परिजनों से हुआ। उनकी युग निर्माण योजना की बातें मेरे मन- मस्तिष्क को प्रभावित कर गईं।

🔴 मैं मिशन के काम में रुचि लेने लगा। कुछ ही दिनों बाद मुझे पूज्य गुरुदेव से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनसे मुलाकात क्या हुई कि मैं उन्हीं का होकर रह गया। तब से लेकर आज तक मुझे गुरुवर के अनेक अनुदान- वरदान मिले हैं।

🔵 यह संस्मरण मेरे जीवन के ७१वें वर्ष का है। सन् २००६ में मैं हर समय सिर दर्द से परेशान रहा करता था। यह परेशानी जब बहुत अधिक बढ़ गई, तो मैं डॉक्टर से मिला।

🔴 डॉक्टर ने कई तरह की मशीनों से मेरे सिर की जाँच की। जाँच के बाद वह इस नतीजे पर पहुँचे कि हृदय की कुछ नाड़ियों के ब्लाक हो जाने के कारण ही हमेशा सिर दर्द बना रहता है। उन्होंने कहा कि बाईपास सर्जरी से ही इस रोग का निदान हो सकता है।

🔵 बाईपास सर्जरी की तैयारियाँ शुरू हुईं और २ अगस्त २००६ को नाडियाद, महागुजरात हास्पिटल में ऑपरेशन हुआ। पहले पसलियों को बीचो- बीच काटकर दो हिस्से में बॉँट दिया गया, फिर दिल को पसलियों से बाहर निकालकर उसका ऑपरेशन किया गया।

🔴 ऑपरेशन के बाद कटी हुई पसलियों को तार से जोड़कर पहले जैसा बनाया गया- इसे डॉक्टरों की भाषा में ‘कॉटन बाडी’ बोलते हैं। लेकिन मेरे शरीर ने इस कॉटन बाडी को स्वीकार नहीं किया। फलतः शरीर के अन्दर से रिस- रिसकर मवाद बाहर आने लगा।

🔵 डॉक्टर को दिखाने पर उन्होंने कहा कि कॉटन बाडी के कारण प्रायः ऐसा होता है। चिन्ता की कोई बात नहीं है। कुछ दिनों में अपने- आप ठीक हो जाएगा।

🔴 लेकिन छः महीने बीत जाने के बाद भी मवाद निकलना बन्द नहीं हुआ, तो डॉक्टर ने कहा कि पसली की हड्डियों को तार से बाँधने के कारण इन्फेक्शन हो गया है। अब दुबारा ऑपरेशन करके तार बाहर निकालना पड़ेगा।

🔵 २ अप्रैल २००७ को दूसरी बार ऑपरेशन हुआ। फिर से छाती खोलकर तार निकाला गया। लेकिन इतने दिनों में इन्फेक्शन हड्डियों को प्रभावित कर चुका था, इसलिए मवाद का निकलना बंद नहीं हुआ। थक हार कर अहमदाबाद के बड़े अस्पताल में पहुँचा। वहाँ के डॉक्टरों ने २० जून को तीसरा ऑपरेशन किया। वह भी असफल रहा।
      
🔴 सीनियर डॉक्टर ने मेरे बेटे को बताया कि मेरी मौत अब किसी भी क्षण हो सकती है, फिर भी अन्तिम प्रयास के रूप में एक और ऑपरेशन किया जाना चाहिए।
निराश होकर मैंने सीनियर डॉक्टर से कहा कि आप लोग अपना काम कीजिए, मैं अपना काम करूँगा। एक जूनियर डॉक्टर ने जिज्ञासावश पूछा कि आप क्या करेंगे। मैंने कहा- मैं गुरुदेव का स्मरण करूँगा और उन्होंने जो मंत्र दिया है, उसके जप की संख्या बढ़ा दूँगा। अब मैं अध्यात्म की ताकत को आजमाऊँगा।
      
🔵 ......और मैंने वैसा ही किया। सुबह से शाम तक गायत्री मंत्र का जप और रात में सोते समय गुरुदेव का ध्यान। इसी प्रकार तीन सप्ताह और बीत गए। चौथे सप्ताह में चौथे ऑपरेशन की तारीख तय हुई- १८ जुलाई। सारी तैयारियाँ हो चुकी थीं। मुझे ऑपरेशन थियेटर ले जाया गया।
      
🔴 ऑपरेशन शुरू होने से पहले मैंने डॉक्टरों से अनुरोध किया कि वे मुझे पाँच मिनट प्रार्थना करने दें। मैंने गुरुदेव का फोटो अपने साथ रखा था। फोटो सामने रखकर उन्हें प्रणाम किया और आँखें बन्द कर मन ही मन उनसे प्रार्थना करने लगा- परम पूज्य गुरुदेव! ये डॉक्टर पता नहीं क्या- कैसे करेंगे। आप सूक्ष्म रूप से आकर इनका मार्गदर्शन कीजिए, जिससे ये सही तरीके से ऑपरेशन कर सकें और इनके सत्प्रयास से मेरी जीवन- रक्षा हो सके फिर मैं जल्दी से स्वस्थ होकर वापस घर पहुँच सकूँ।
      
🔵 तीन- चार दिन पहले श्रद्धेय डॉक्टर साहब (डॉ. प्रणव पण्ड्या)और आदरणीया जीजी (शैलबाला पण्ड्या) को चार पेज का पत्र लिखा था। उनका जवाब आया- ‘‘आपके उत्तम स्वास्थ्य के लिए हम सब प्रार्थना कर रहे हैं। आप चिन्ता मत करिए। पूज्य गुरुदेव के आशीर्वाद से सब कुछ ठीक हो जाएगा।’’
      
🔴 ऑपरेशन ५ घंटे तक चला। चौथी बार हर्ट का ऑपरेशन हो रहा था, इसलिए डॉक्टर्स ने प्लास्टिक सर्जरी की भी पूरी तैयारी कर रखी थी। टीम में प्लास्टिक सर्जरी के दो विशेषज्ञ डॉक्टर भी तैयार खड़े थे। लेकिन गुरुदेव की कृपा से प्लास्टिक सर्जरी करने की नौबत ही नहीं आई।
      
🔵 अगली सुबह जब बड़े डॉक्टर्स मुझे देखने आए, तो उन्होंने कहा- आपका ऑपरेशन बहुत अच्छा हुआ। सच तो यह है कि केस हिस्ट्री और आपकी हालत देखकर मैं अन्दर से घबराया हुआ था, लेकिन लगता है कि ऑपरेशन से पूर्व आपके द्वारा की गई प्रार्थना आपके इष्टदेव ने सुन ली। ऑपरेशन के दौरान मुझे लगा कि कोई बाहरी शक्ति कदम- कदम पर मेरा मार्ग- दर्शन कर रही है, हिम्मत बढ़ा रही है।
      
🔴 इतने बड़े ऑपरेशन के बाद इतनी तेजी से रिकवरी हुई कि १५ दिनों के बाद ही मुझे हॉस्पिटल से छुट्टी मिल गई और मैं पूरी तरह से स्वस्थ होकर खुशी- खुशी घर लौट आया। तब से लेकर आज तक गुरुकृपा से मेरा स्वास्थ्य पास- पड़ोस के लोगों के लिए एक उदाहरण बना हुआ है।

🌹  दौलत भाई जीवन जी देसाई, बलसाड़ (गुजरात)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/a/appa

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 100)

🌹 तीसरी हिमालय यात्रा-ऋषि परम्परा का बीजारोपण
🔴 जिन साधनों की नव सृजन के लिए आवश्यकता थी, वे कहाँ से मिले, कहाँ से आएँ? इस प्रश्न के उत्तर में मार्गदर्शक ने हमें हमेशा एक ही तरीका बताया था कि बोओ ओर काटो, मक्का और बाजरा का एक बीज जब पौधा बनकर फलता है तो एक के बदले सौ नहीं वरन् उससे भी अधिक मिलता है। द्रौपदी ने किसी संत को अपनी साड़ी फाड़कर दी थी, जिससे उन्होंने लंगोटी बनाकर अपना काम चलाया था। वही आड़े समय में इतनी बनी कि उन साड़ियों के गट्ठे को सिर पर रखकर भगवान् को स्वयं भाग कर आना पड़ा। ‘‘जो तुझे पाना है, उसे बोना आरम्भ कर दे।’’ यही बीज मंत्र हमें बताया और अपनाया गया, प्रतिफल ठीक वैसा ही निकला जैसा कि संकेत किया गया।

🔵 शरीर, बुद्धि और भावनाएँ स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों के साथ भगवान् सबको देते हैं। धन स्व उपार्जित होता है। कोई हाथों-हाथ कमाता है, तो कोई पूर्व संचित सम्पदा को उत्तराधिकार में पाते हैं। हमने कमाया तो नहीं था, पर उत्तराधिकार में अवश्य समुचित मात्रा में पाया। इन सबको बो देने और समय पर काट लेने के लायक गुंजायश थी, सो बिना समय गँवाए उस प्रयोजन में अपने को लगा दिया।

🔴 रात में भगवान् का भजन कर लेना और दिन भर विराट् ब्रह्म के लिए, विश्व मानव के लिए समय और श्रम नियोजित रखना, यह शरीर साधना के रूप में निर्धारित किया गया।

🔵 बुद्धि दिन भर जागने में ही नहीं, रात्रि के सपने में भी लोक मंगल की विधाएँ विनिर्मित करने में लगी रही। अपने निज के लिए सुविधा सम्पदा कमाने का ताना-बाना बुनने की कभी भी इच्छा ही नहीं हुई। अपनी भावनाएँ सदा विराट के लिए लगी रहीं। प्रेम, किसी वस्तु या व्यक्ति से नहीं आदर्शों से किया। गिरों को उठाने और पिछड़ों को बढ़ाने की ही भावनाएँ सतत उमड़ती रहीं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/3.6

👉 आज का सद्चिंतन 14 May 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 May 2017


👉 Intercession & its Significance. (Part 3)

🔴 Friends! Ignorance prevails all around in the country in the name of PUJA-PATH as also in the name of spirituality? Spirituality however was meant exclusively for bringing people, out of trap of ignorance. What has happened now? From where, has come this botheration? Ignorance on the contrary! In sharp contrast to its objective, spirituality has given undue space to ignorance. This should not have happened. Then what should be done now?
                                 
🔵 Friends! Everything becomes soft & wet when rain falls then I ask whether a rock too becomes wet or not? No sir, it does not and whether a rock can grow even a leave? No sir, it does not. It means a rock cannot grow even a leave over it simply because it cannot absorb water. That means the rock has to make it favorable to draw any advantage out of water. Things can proceed only when you understand this theory but you are of the view that you do not need to be changed and you should be the same as you are, rather BHAGWAN should change itself, BHAGWAN should change its rules, BHAGWAN should change its system and BHAGWAN should change his conditions. Why? Because what we do is—to order.

🔴 An order means a wish to be fulfilled.  A wish means an order.  You order? Are you a boss of BHAGWAN? Do you intend to order BHAGWAN? Do you wish BHAGWAN to follow you, simply because you recite hanuman-CHALISA daily and daily show incense-stick to hanuman? That is why you want that BHAGWAN should follow your guidelines. It is not possible at all. What is spirituality? Spirituality literally means that we should mould ourselves as per BHAGWAN’s wishes. We should develop such eligibility within us that we become competent enough to receive the grace & mercy of BHAGWAN which keeps raining unabatedly on us like rain from sky but we cannot take its advantage like that rock simply because of absence of eligibility.

 ====== OM SHANTI======

🌹  Finish
🌹 Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 प्रभु के योग्य स्वयं बनें:-

🔵 एक राजा सायंकाल में महल की छत पर टहल रहा था. अचानक उसकी दृष्टि महल के नीचे बाजार में घूमते हुए एक सन्त पर पड़ी. संत तो संत होते हैं, चाहे हाट बाजार में हों या मंदिर में अपनी धुन में खोए चलते हैं।

🔴 राजा ने महूसस किया वह संत बाजार में इस प्रकार आनंद में भरे चल रहे हैं जैसे वहां उनके अतिरिक्त और कोई है ही नहीं. न किसी के प्रति कोई राग दिखता है न द्वेष।

🔵 संत की यह मस्ती इतनी भा गई कि तत्काल उनसे मिलने को व्याकुल हो गए।

🔴 उन्होंने सेवकों से कहा इन्हें तत्काल लेकर आओ।

🔵 सेवकों को कुछ न सूझा तो उन्होंने महल के ऊपर ऊपर से ही रस्सा लटका दिया और उन सन्त को उस में फंसाकर ऊपर खींच लिया।

🔴 चंद मिनटों में ही संत राजा के सामने थे. राजा ने सेवकों द्वारा इस प्रकार लाए जाने के लिए सन्त से क्षमा मांगी. संत ने सहज भाव से क्षमा कर दिया और पूछा ऐसी क्या शीघ्रता आ पड़ी महाराज जो रस्सी में ही खिंचवा लिया!

🔵 राजा ने कहा- एक प्रश्न का उत्तर पाने के लिए मैं अचानक ऐसा बेचैन हो गया कि आपको यह कष्ट हुआ।

🔴 संत मुस्कुराए और बोले- ऐसी व्याकुलता थी अर्थात कोई गूढ़ प्रश्न है. बताइए क्या प्रश्न है।

🔵 राजा ने कहा- प्रश्न यह है कि भगवान् शीघ्र कैसे मिलें, मुझे लगता है कि आप ही इसका उत्तर देकर मुझे संतुष्ट कर सकते हैं ? कृपया मार्ग दिखाएं।

🔴 सन्त ने कहा‒‘राजन् ! इस प्रश्न का उत्तर तो तुम भली-भांति जानते ही हो, बस समझ नहीं पा रहे. दृष्टि बड़ी करके सोचो तुम्हें पलभर में उत्तर मिल जाएगा।

🔵 राजा ने कहा‒ यदि मैं सचमुच इस प्रश्न का उत्तर जान रहा होता तो मैं इतना व्याकुल क्यों होता और आपको ऐसा कष्ट कैसे देता. मैं व्यग्र हूं. आप संत हैं. सबको उचित राह बताते हैं।

🔴 राजा एक प्रकार से गिड़गिड़ा रहा था और संत चुपचाप सुन रहे थे जैसे उन्हें उस पर दया ही न आ रही हो. फिर बोल पड़े सुनो अपने उलझन का उत्तर।

🔵 सन्त बोले- सुनो, यदि मेरे मन में तुमसे मिलने का विचार आता तो कई अड़चनें आतीं और बहुत देर भी लगती. मैं आता, तुम्हारे दरबारियों को सूचित करता. वे तुम तक संदेश लेकर जाते।

🔴 तुम यदि फुर्सत में होते तो हम मिल पाते और कोई जरूरी नहीं था कि हमारा मिलना सम्भव भी होता या नहीं।

🔵 परंतु जब तुम्हारे मन में मुझसे मिलने का विचार इतना प्रबल रूप से आया तो सोचो कितनी देर लगी मिलने में?

🔴 तुमने मुझे अपने सामने प्रस्तुत कर देने के पूरे प्रयास किए. इसका परिणाम यह रहा कि घड़ी भर से भी कम समय में तुमने मुझे प्राप्त कर लिया।

🔵 राजा ने पूछा- परंतु भगवान् के मन में हमसे मिलने का विचार आए तो कैसे आए और क्यों आए?

🔴 सन्त बोले- तुम्हारे मन में मुझसे मिलने का विचार कैसे आया?

🔵 राजा ने कहा‒ जब मैंने देखा कि आप एक ही धुन में चले जा रहे हैं और सड़क, बाजार, दूकानें, मकान, मनुष्य आदि किसी की भी तरफ आपका ध्यान नहीं है, उसे देखकर मैं इतना प्रभावित हुआ कि मेरे मन में आपसे तत्काल मिलने का विचार आया।

🔴 सन्त बोले- यही तो तरीका है भगवान को प्राप्त करने का. राजन् ! ऐसे ही तुम एक ही धुन में भगवान् की तरफ लग जाओ, अन्य किसी की भी तरफ मत देखो, उनके बिना रह न सको, तो भगवान् के मन में तुमसे मिलने का विचार आ जायगा और वे तुरन्त मिल भी जायेंगे।

👉 आत्मविश्वास की साधना

🔵 जीवन को उन्मुख होकर संसार की लहरों में बहने दीजिए। कभी लहर आप पर होकर गुजरेगी, कभी आप लहरों पर उतराएँगे। लेकिन समुद्र की गोद में उसकी तरंगों से खेलने का साहस-आत्मविश्वास आप में जाग्रत् होगा। जो अकेलेपन अथवा पानी में डूब जाने के भय से पानी में उतरता ही नहीं, जो इसी सोच-विचार में पड़ा रहता है क्या करूँ? कैसे करूँ? मैं मंजिल तक कैसे पहुँचूँगा? वह कुछ नहीं कर पाता, उसका विश्वास मर जाता है। किसी भी कार्य में लगने से पूर्व जिनके संकल्प अधूरे रहते हैं, जो संशय में पड़े रहते हैं, वे कोई बड़े काम नहीं कर पाते और कुछ करते हैं, तो उसमें असफल ही होते हैं, जिसके कारण उनका रहा-सहा विश्वास भी मर जाता है।

🔴 आत्मविश्वास की ज्योति प्रज्वलित करने के लिए उस कार्य में प्राणपण से जुट जाइए, जो आपको हितकर लगता है। जिसे आप अच्छा समझते हैं, उस काम को अपने जीवन का, स्वभाव का अभिन्न अंग बना लीजिए। इससे आपके विश्वास को बल मिलेगा लेकिन इस मार्ग में एक खतरा है- वह है सफलता-असफलता में अपना सन्तुलन खो बैठना। इसके लिए आवश्यक है कि आप सफलता-असफलता को गौण मानकर उस कार्य को प्रधान मानें। कर्म की यह निरन्तर साधना ही आप में विश्वास का अविरल स्रोत खोज निकालेगी। अपने आपको भाग्यशाली-महत्त्वपूर्ण समझने वालों को संसार भी रास्ता देता है। यह भावना अपने हृदय में कूट-कूट कर भर लें कि आपको किसी महान् उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही धरती पर भेजा गया है। आप अवश्य उस काम को करेंगे। इसी महान् श्रद्धा के बल पर आप क्या से क्या बन सकते हैं। इसी तरह के किसी महान् आदर्श को, मिशन को अपनी श्रद्धा का आधार बना लें। इस तरह की बलवती श्रद्धा आपके विश्वास को परिपुष्ट करेगी। विश्वास उनका मर जाता है, जिनके जीवन में कोई आदर्श नहीं, श्रद्धा का कोई आधार नहीं।
  
🔵 समाज की, संसार की, घर-परिवार, पड़ोस की, राष्ट्र की, किसी महान् कार्य की जो कोई भी जिम्मेदारियाँ आप पर आएँ, उन्हें सहर्ष स्वीकार कीजिए। जिम्मेदारियों को अपने कन्धे पर उठाने का संकल्प ही विश्वास की साधना का आधा काम पूरा कर देता है। स्मरण रखिए, संसार में ऐसा कोई भी काम नहीं, जिसे आप न कर सकते हों। फिर जिम्मेदारियों से क्यों डरते हैं, क्यों झिझकते हैं? इसलिए जिम्मेदारियों को निभाना सीखिए। काम करने से ही अपनी कर्मठता, अपनी शक्तियों पर विश्वास होता है।

🔴 लोगों की आलोचना से तनिक भी विचलित हुए बिना कार्य करते रहना, निर्भय होकर अपने आदर्शों को क्रियान्वित करते चलना ही आपको शोभा देता है। जीवन का आशाभरा रंगीन चित्र अपनी कल्पनाओं के पटल पर बनाइए। ध्यान रखिए-आत्मविश्वास की साधना से सृष्टि का वैभव ही नहीं, स्रष्टा के प्रेम को भी पाया जा सकता है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 67

👉 नारी की महानता को समझें (अन्तिम भाग)

🔵 राम के जीवन से सीता को निकाल देने पर रामायण पीछे नहीं रहता। द्रौपदी, कुन्ती, गाँधारी आदि का चरित्र काल देने पर महाभारत की महान गाथा कुछ नहीं रहती, पाण्डवों का जीवन संग्राम अपूर्ण रह जाता है। शिवजी के साथ पार्वती, कृष्ण के साथ राधा, राम के साथ सीता, विष्णु के साथ लक्ष्मी का नाम हटा दिया जाय तो इनके लीला, गाथा चरित्र अधूरे रह जाते हैं।

🔴 प्राचीन काल से नारियाँ घर गृहस्थी को ही देखती नहीं आ रही, समाज, राजनीति, धर्म, कानून, न्याय सभी क्षेत्रों में वे पुरुष की संगिनी ही नहीं रही वरन् सहायक, प्रेरक भी रही हैं। उन्हें समाज में पूजनीय स्थान दिया गया है। महाराज मनु ने तो अपनी प्रजा से कहा था।

🔵 ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवताः।’

जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं। क्योंकि समाज में नारी को समान, पूज्य-स्थान देकर जब उसे पुरुष का सहयोगी, सहायक बना लिया जाता है तो ही समृद्धि, यश, वैभव बढ़ते हैं, जिससे सुख, शाँति, आनन्दपूर्ण जीवन बिताया जा सकता है।

🔴 इसमें कोई संदेह नहीं कि नारी का सहयोग मानव जीवन में उन्नति, प्रगति, विकास के लिए आवश्यक है, अनिवार्य है। वह समाज उन्नति नहीं कर सकता, जहाँ स्त्री जो मानव-जीवन का अर्द्धांग ही नहीं एक बहुत बड़ी शक्ति है, को सामाजिक अधिकारों से वंचित कर उसे लुँज-पुँज एवं पद-दलिता बना कर रखा जाता है।

🔵 आवश्यकता इस बात की है कि हम नारी को समाज से वही प्रतिष्ठा दें, जिसकी आज्ञा हमारे ऋषियों ने, मनीषियों ने दी है। उसे जीवन के सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ावें। हम देखेंगे कि नारी अबला, असहाय न रहकर शक्ति सामर्थ्य की मूर्ति बनेगी। वह जीवन यात्रा में हमारे लिए बोझा न रहकर हमारी सहायक, सहयोगिनी सिद्ध होगी। तब हमें उसके भविष्य के संबंध में चिन्तित न होना पड़ेगा। वह अपनी रक्षा करने में स्वयं समर्थ होगी। अपना निर्वाह करने में समर्थ होगी। हमारे सामाजिक जीवन की यह एक बहुत महत्वपूर्ण माँग है कि सदियों से घर बाहर दीवारी में गंदे पर्दे, बुर्के की ओट में छिपी हुई पराश्रिता, परावलम्बी, अशिक्षित, अन्धविश्वास ग्रस्त, संकीर्ण स्वभाव नारी को वर्तमान दुर्दशा से उभारें। उसे समानता, स्वतंत्रता की मानवोचित सुविधा प्रदान करें। उसे शिक्षित, स्वावलम्बी, सुसंस्कृत एवं योग्य बनावें। तभी वह हमारे विकास में सहायक बन सकेगी। भारतीय संस्कृति को गौरवान्वित करने में योग दे सकेगी।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जून 1964 पृष्ठ 40

👉 इक्कीसवीं सदी का संविधान - हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 1)

👉 युग निर्माण मिशन का घोषणा-पत्र

🔵 युग निर्माण जिसे लेकर गायत्री परिवार अपनी निष्ठा और तत्परतापूर्वक अग्रसर हो रहा है, उसका बीज सत्संकल्प है। उसी आधार पर हमारी सारी विचारणा, योजना, गतिविधियाँ एवं कार्यक्रम संचालित होते हैं, इसे अपना घोषणा-पत्र भी कहा जा सकता है। हम में से प्रत्येक को एक दैनिक धार्मिक कृत्य की तरह इसे नित्य प्रातःकाल पढ़ना चाहिए और सामूहिक शुभ अवसरों पर एक व्यक्ति उच्चारण करें और शेष लोगों को उसे दुहराने की शैली से पढ़ा जाना चाहिए।

🔴 संकल्प की शक्ति अपार है। यह विशाल ब्रह्माण्ड परमात्मा के एक छोटे संकल्प का ही प्रतिफल है। परमात्मा में इच्छा उठी ‘एकोऽहं बहुस्याम’ मैं अकेला हूँ-बहुत हो जाऊँ, उस संकल्प के फलस्वरूप तीन गुण, पंचतत्त्व उपजे और सारा संसार बनकर तैयार हो गया। मनुष्य के संकल्प द्वारा इस ऊबड़-खाबड़ दुनियाँ को ऐसा सुव्यवस्थित रूप मिला है। यदि ऐसी आकांक्षा न जगी होती, आवश्यकता अनुभव न होती तो कदाचित् मानव प्राणी भी अन्य वन्य पशुओं की भाँति अपनी मौत के दिन पूरे कर रहा होता।

🔵 इच्छा जब बुद्धि द्वारा परिष्कृत होकर दृढ़ निश्चय का रूप धारण कर लेती है, तब वह संकल्प कहलाती है। मन का केन्द्रीकरण जब किसी संकल्प पर हो जाता है, तो उसकी पूर्ति में विशेष कठिनाई नहीं रहती। मन की सामर्थ्य अपार है, तो सफलता के उपकरण अनायास ही जुटते चले जाते हैं। बुरे संकल्पों की पूर्ति के लिए भी जब साधन बन जाते हैं, तो सत्संकल्पों के बारे में तो कहना ही क्या है? धर्म और संस्कृति को जो विशाल भवन मानव जाति के सिर पर छत्रछाया की तरह मौजूद है, उसका कारण ऋषियों का सत्संकल्प ही है। संकल्प इस विश्व की सबसे प्रचंड शक्ति है। विज्ञान की शोध द्वारा अगणित प्राकृतिक शक्तियों पर विजय प्राप्त करके वशवर्ती बना लेने का श्रेय मानव की संकल्प शक्ति को ही है। शिक्षा, चिकित्सा, शिल्प, उद्योग, साहित्य, कला, संगीत आदि विविध दिशाओं में जो प्रगति हुई आज दिखाई पड़ती है, उसके मूल में मानव का संकल्प ही सन्निहित है, इसे प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष कह सकते हैं। आकांक्षा को मूर्त रूप देने के लिए जब मनुष्य किसी दिशा विशेष में अग्रसर होने के लिए दृढ़ निश्चय कर लेता है तो उसकी सफलता में संदेह नहीं रह जाता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 नारी की महानता को समझें (भाग 3)

🔵 नारी की प्रकट कोमलता, सहिष्णुता को पुरुष ने कई बार उसकी निर्बलता का चिन्ह मान लिया है और इसलिए उसे अबला कहा है। किन्तु वह यह नहीं जानता कि कोमलता, सहिष्णुता के अंक में ही मानव जीवन की स्थिति संभव है। क्या माँ के सिवा संसार में ऐसी कोई हस्ती है जो शिशु की सेवा, उसका पालन-पोषण कर सके। संसार में जहाँ-जहाँ भी चेतना साकार रूप में मुखरित हुई है उसका एक मात्र श्रेय नारी को ही है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि नारी समाज की निर्मात्री शक्ति है, वह समाज का धारण, पोषण करती है संवर्धन करती है।

🔴 नारी अपने विभिन्न रूपों में सदैव मानव जाति के लिए त्याग, बलिदान, स्नेह, श्रद्धा, धैर्य, सहिष्णुता का जीवन बिताती है। माता-पिता के लिए आत्मीयता, सेवा की भावना जितनी पुत्री में होती है उतनी पुत्र में नहीं होती। पराये घर जाकर भी पुत्री अपने माँ-बाप से जुदा नहीं हो सकती। उसमें परायापन नहीं आता, उसके हृदय में वही सम्मान, सेवा की भावना भरी रहती है जैसी बचपन में थी। भाई-बहिन का नाता कितना आदर्श, कितना पुण्य-पवित्र है। भाई-भाई परस्पर जुदा हो सकते हैं एक दूसरे का अहित कर सकते हैं किन्तु भाई-बहिन जीवन पर्यन्त कभी विलग नहीं हो सकते। बहन जहाँ भी रहेगी अपने भाई के लिए शुभ कामनायें, उसके भले के लिए प्रयत्न करती रहेगी। माँ तो माँ ही है। पुत्र की हित चिन्ता, उसका भला, लाभ हित सोचने वाली माँ के समान संसार में और कोई नहीं है। संसार के सब लोग मुँह मोड़ लें किन्तु एक माँ ही ऐसी है जो अपने पुत्र के लिए सदा सर्वदा सब कुछ करने के लिए तैयार रहती है।

🔵 पत्नी के रूप में नारी मनुष्य की जीवन संगिनी ही नहीं होती वह सब प्रकार से पुरुष का हित-साधन करती है। शास्त्रकार ने भार्या को छः प्रकार से पुरुष के लिए हित-साधक बतलाया है-

कार्य्येषु मन्त्री, करणेषु दासी, भोज्येषु माता, रमणेषु रम्भाः
धर्मानुकूला, क्षमाया धरित्री, भार्या च षड्गुण्यवती च दुर्लभा॥


🔴 ‘कार्य में मंत्री के समान सलाह देने वाली, सेवादि में दासी के समान काम करने वाली, भोजन कराने में माता के समान पथ्य देने वाली, आनन्दोपभोग के लिए रम्भा के समान सरस, धर्म और क्षमा को धारण करने में पृथ्वी के समान-क्षमाशील ऐसे छः गुणों से युक्त स्त्री सचमुच इस विश्व का एक दुर्लभ रत्न है।’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 ~अखण्ड ज्योति जून 1964 पृष्ठ 40
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/June/v1.40

👉 मनुष्य जीवन की सच्ची शोभा

🔵 जमीन फाड़ती है, पत्थरों से टकराती है तब कहीं नदी आगे बढ़ती है और अपने अस्तित्व की रक्षा कर पाती है। मुलायम मिट्टी के बिछौने में पड़ा हुआ बीज यदि ऊपर ढँके ढेलों को ढकेलने की हिम्मत नहीं दिखलाता, तो बीज से वृक्ष बनने का गौरव उसे कैसे मिल पाता? आगे बढ़ने वाली जातियों का इतिहास जिन्होंने भी ध्यानपूर्वक पढ़ा है, तो यही पाया है कि उन्नति के शिखर के लिए उन्हें संघर्ष के बीच बढ़ना और रास्ता बनाना पड़ा और यह सिद्ध करना पड़ा कि बाधाओं के मुकाबले उनका साहस और संघर्ष की शक्ति चुक नहीं सकती। तब कहीं उन्हें सफलता का राजसिंहासन मिल पाया।

🔴 सच्चे अर्थों में जीवित वही है जो अत्याचार से लड़ सकता है। अन्याय और अनीति से टकरा सकता है, रोष प्रदर्शित कर सकता है। सामने अनीति होती रहे और चुपचाप खड़े देखते रहें, यह कायरता का प्रमुख चिह्न है। वीरतापूर्वक जीने की नीति में ही मानवीय प्रगति का आधार छिपा हुआ है। हमें दुनिया की जिन्दादिल कौम की तरह अपना वर्चस्व बनाए रखना है, तो इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं कि हम भीतर और बाहर की बुराइयों से लड़ने के लिए एक तत्पर सिपाही की भाँति अपना प्रत्येक मोर्चा मजबूत बनाएँ और आज से, अभी से अनीति को मिटाने में जुट जाएँ।

🔵 आगे बढ़ने की इच्छा और नए जन्म में कोई अन्तर नहीं है। अन्तरात्मा कहे कि उन्नति करनी चाहिए, तो यह समझना चाहिए कि तुम्हारी जीवनी-शक्ति अदम्य साहस और विश्वास से ओत-प्रोत है। अब एक ही बात शेष रहती है, वह यह कि उठो और बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़ चलो। फिर जब तक मंजिल नहीं मिल जाती, संघर्ष का सम्बल मत छोड़ो। वीर और विजयी की भाँति मुश्किलों से टकराते हुए आगे बढ़ते ही चले जाओ।

🔴 साहसी व्यक्तियों को शक्ति उधार नहीं माँगनी पड़ती, उनका अन्तरात्मा ही उन्हें बल प्रदान करता है। नीति के पथ पर बढ़ने वाले को ईश्वर का विश्वास और उसका अनुग्रह काफी है। ऐसा व्यक्ति जब बुराइयों को, अन्धपरम्पराओं को और सामाजिक कुण्ठाओं को रौंदता हुआ आगे बढ़कर चल पड़ता है, तो उसका अनुसरण करने वाले अपने आप उपज पड़ते हैं। फिर संसार की कोई शक्ति उसे पराजित करने में समर्थ नहीं होती।

🔵 एक बात याद रखने की है, वह यह कि सच्चाई और ईमानदारी से प्रेरित संघर्ष ही स्थायी प्रगति का आधार है। अकेला संघर्ष ही काफी नहीं, उसमें सत्य का समन्वय होगा, तो ही भीतरी शक्ति का आशीर्वाद मिलेगा।

🔴 अन्याय एक चुनौती है, जो इन्सान की इन्सानियत को ललकारती है। उसका उत्तर कोई डरपोक और कायर नहीं दे सकता। उस बेचारे को अपने स्वार्थ, अपने प्रलोभनों से ही मुक्ति कहाँ? पर जिनमें मनुष्यता शेष है, वे अनीति और अन्याय के प्रतिकार के लिए जान की बाजी लगाते हैं। मनुष्य जीवन की सच्ची शोभा भी यही है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 May 2017


👉 आज का सद्चिंतन 13 May 2017


गुरुवार, 11 मई 2017

👉 ऐसा तो भगवान से ही संभव है!

🔵 मंत्र दीक्षा मैंने सन् १९७२ में ही ले ली थी। अपने पैतृक गाँव खीर भोजना, वारसलीगंज, नवादा (बिहार) में ही वह संस्कार सम्पन्न हुआ था। १९७६ में बोकारो में गायत्री यज्ञ हुआ। आदरणीय रमेश चन्द्र शुक्ल जी वहाँ केन्द्रीय प्रतिनिधि के रूप में थे। उनसे पत्र लेकर पू. गुरुदेव के दर्शन हेतु शान्तिकुञ्ज आया। अप्रैल का महीना था। लेकिन वसन्त पूरे वातावरण में अभी तक व्याप्त था। ब्रह्ममुहूर्त में गुलाबी जाड़े की सुखद अनुभूति होती थी। यहाँ पाँच दिनों तक के शिविर में ही मेरे विचार और चिन्तन में आमूलचूल परिवर्तन होता चला गया।

🔴 दर्शन शास्त्र का विद्यार्थी होने के नाते अध्यात्म की थोड़ी बहुत जानकारी तो थी, पर कर्मकाण्डी पंडितों की तिकड़मों के कारण उस पर आस्था नहीं जम पाती। यहाँ आकर अध्यात्म को लेकर अविश्वास का वह भाव बिल्कुल खत्म हो गया। एक दृढ़ आस्था मन में पनपने लगी, कोई सत्ता अवश्य है जिसके अनुसार सब कुछ अपने समय से चलता रहता है।

🔵 मिशन के विषय में मैं अधिक से अधिक जानना चाहता था। सेवा कार्य में सहयोग देने की भी इच्छा होती। मैंने आदरणीय श्री वीरेश्वर उपाध्याय भाई साहब से परामर्श किया और उनके बताए अनुसार अगले वर्ष मई, १९७७ में शान्तिकुञ्ज आकर एक मासीय सत्र किया। उसी समय संकल्प लिया कि वर्ष में छुट्टी के दो माह मैं यहाँ के कार्य में लगाऊँगा। स्थानीय समय दान के अलावा केन्द्र में समयदान १९७८ से देने लगा।

🔴 पहले छुट्टियों में घर जाता था। खेती- बाड़ी के काम में पिताजी की मदद करता था। वह सिलसिला बंद हो गया, तो पिताजी नाराज हुए। घर भेजी जाने वाली मासिक राशि में भी कटौती होती गई। अपने गाँव या आस- पास के गाँव के कोई परिचित मिल जाते, तो कहते- पिताजी तुमसे बहुत नाराज रहते हैं। कहते हैं, पता नहीं किस साधु महात्मा के चक्कर में पड़ गया है। न घर आता है, न ही पैसा दे पाता है। उसका नाम मत लीजिये। यह सब सुनकर मुझे अच्छा नहीं लगता।

🔵 मैं असमंजस में था। पिताजी को मैं इस तरह से नाराज नहीं करना चाहता था। सेवा कार्य के संदर्भ में मैंने पिताजी को विश्वास में लेने की पूरी कोशिश की, लेकिन वे रत्ती भर भी नहीं पिघले। अन्त में थक हार कर मैंने मन ही मन गुरुदेव से प्रार्थना की। मुझे पूर्ण विश्वास था कि इसका वे ही कुछ समाधान निकालेंगे। १९७९ में पिताजी बद्रीनाथ जाने के लिए राजी हुए। पहले शान्तिकुञ्ज आकर सामान रखने की व्यवस्था बनाई गई। फिर पिताजी को साथ लेकर पूज्य गुरुदेव से मिलने गया। गुरुदेव बोले- बेटा, इन्हें बद्रीनाथ घुमा लाओ। पूज्य गुरुदेव की बातें सुनकर पिताजी को आश्चर्य हुआ। नीचे आकर वे हमसे पूछने लगे- इन्हें कैसे मालूम हुआ कि हम बद्रीनाथ जा रहे हैं? मैंने कहा- मुझे क्या मालूम? मैं तो आपके साथ ही हूँ।

🔴 बद्रीनाथ से लौटकर शान्तिकुञ्ज में दो- एक दिन रुकने के लिए पिताजी से पूछा, तो वे राजी हो गए। शान्तिकुञ्ज के स्नेहिल वातावरण ने उनका मन मोह लिया था। बोले मुझे यहाँ बहुत अच्छा लग रहा है। जब तक चाहो, रुको। इसी बीच एक दिन अपने कमरे में ही आश्चर्य से उत्तेजना पूर्ण स्वर में कहने लगे- अरे? गुरुजी तुम लोगों को बुड़बक (मूर्ख) बना कर रखे हुए हैं। ये आदमी नहीं हैं। ये भगवान के सिवा कुछ हो ही नहीं सकते। साश्चर्य मैंने पूछा- क्या हुआ, ऐसा क्यों कह रहे हैं? उन्होंने कहा- आज एक लड़का, जिसको मरे हुए घंटे भर से ज्यादा हो गया था, उसे उन्होंने जिन्दा कर दिया।

🔵 घटना को पूरे विस्तार से बताते हुए उन्होंने कहा- मरे हुए उस लड़के को लेकर कुछ लोग गुरुजी के पास गए। गुरुजी पश्चिम वाले कमरे से निकल रहे थे। शोर सुनकर पूरब वाले कमरे में गए। आकर लोगों से पूछा- क्या बात है? लोगों ने बताया- एक बच्चा मर गया है। बच्चा जमीन पर लेटा था। बच्चे की माँ छाती पीटकर रो रही थी। गुरुजी बोले- कुछ नहीं हुआ है। इतना कहते हुए उन्होंने झटके से बच्चे का हाथ पकड़कर उठा दिया। बोले- जा, इसे माता जी के पास ले जाकर प्रसाद खिला दे। सभी आश्चर्यचकित थे। मरे हुए को जिन्दा कर देना ऐसा तो मात्र भगवान ही कर सकते हैं!

🔴 इस घटना के बाद पिताजी की दृष्टि बदल गई। इसके बाद वे हमेशा मेरे सेवा कार्य को सराहते रहे- मेरा नाम लेते ही भावुक होकर कहते- वह जो कर रहा है, करता रहे, मुझे उसके पैसे और समय की जरूरत नहीं है। वह भगवान का काम कर रहा है, वह स्वयं तो तरेगा ही, हमारे सारे खानदान को भी तार देगा।

🌹  रामनरेश प्रसाद बोकारो (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/a/bha

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 May 2017


👉 आज का सद्चिंतन 12 May 2017


👉 Intercession & its Significance. (Part 2)

🔴 Very this has been quoted at one place in RAMAYANA---
                                  
‘‘KAK HOHI PIK BAKAHU MARALA’’ 

Look, so is the influence of a company that a crow becomes a cuckoo whereas heron, a swan. UPASANA or intercession means to be tuned or harmonized. Harmonization with whom-Harmonization with BHAGWAN; what kind of harmonization with BHAGWAN? Harmonization with BHAGWAN simply means specifications of BHAGWAN landing in our life. but it could not happen and  we never pursued BHAGWAN’s specifications to land in our life, rather we tried things against it, what is against it- as we & you generally do. Let our wickedness, meanness dominate BHAGWAN. We wish our BHAGWAN to be as wicked, as immoral as mean & useless as we all are and he must comply to our wishes only. Do you want that BHAGWAN must fulfill what you desire? Are you worthy enough that BHAGWAN should meet your demands?
                                 
🔵 You offer incense-sticks to him and in exchange you expect him to compensate you. You expect BHAGWAN to follow your dictation just in exchange of bribery of few incense-sticks. This can’t happen for it is a misunderstanding. No one knows how this misunderstanding came in the mind of people that BHAGWAN can be persuaded like a child and that he can be compelled to consent to our dictation as a child does. Is it possible? Son, that’s not possible. Suppose, we all are the devotees of HANUMAN and if we pray to him that our neighbor should die as he tortures us and our neighbor too prays to him that we should die. Both are devotees of HANUMAN, ok. Hanuman has no idea as to whose demand is genuine as both are his devotees. Hanuman is not sure about whose demand is due and whose’ is undue. Now tell whether Hanuman will kill the neighbor to meet our demand or kill us to meet neighbor’s demand?  You tell what will hanuman do now?  Do you harass hanuman? Son, there is no way to happen that. Please, no PUJA for the purpose of wishes. Kindly stop your PUJA-PATH if it is exclusively for the purpose of fulfilling some desire.

🌹  to be continue...
🌹 ~Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 सम्मान पाने के लिए कष्टों से गुजरना पड़ता है।

🔵 बार-बार पैरों तले कुचले जाने के कारण मिट्टी अपने भाग्य पर रो पड़ी। अहो! मैं कैसी बदनसीबी हूँ कि सभी लोग मेरा अपमान करते हैं। कोई भी मुझे सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता जबकि मेरे ही भीतर से प्रस्फुटित होने वाले फूल का कितना सम्मान है। फूलों की माला पिरोकर गले में पहनी जाती है। भक्त लोग अपने उपास्य के चरणों में चढ़ाते हैं। वनिताएं अपने बालों में गूंथ कर गर्व का अनुभव करती हैं। क्या ही अच्छा हो कि मैं भी लोगों के मस्तिष्क पर चढ़ जाऊं!

🔴 मिट्टी के अंदर से निकलती हुई आह को जानकर कुंभकार बोला- मिट्टी! तुम यदि सम्मान पाना चाहती हो तो तुम्हें बड़ा सम्मान दिला सकता हूँ लेकिन एक शर्त है।

🔵 'एक क्या तुम्हारी जितनी भी शर्ते हों, मुझे सभी स्वीकार हैं। बस मुझे लोगों के पैरों तले से हटा दो,' कुंभकार की बात को बीच में ही काटते हुए मिट्टी ने कहा।

🔴 'तो फिर ठीक है, तैयार हो जाओ'- कहते हुए कुंभकार ने जमीन खोदकर मिट्टी बाहर निकाली। उसे घर ले आया। पानी में डालकर उसे बहुत समय तक गीली रखा। इतना ही नहीं फिर पैरों से उसे खूब रौंदा। कष्टों को सहते हुए मिट्टी बोली, 'अरे भाई! मै सम्मान का पात्र कब बनूंगी?'

🔵 'मिट्टी बहिन! धैर्य रखो। अभी सहती जाओ, तुम्हें इसका मधुर फल जरूर मिलेगा।'

🔴 कुंभकार की बात सुनकर मिट्टी कुछ नहीं बोली।

🔵 कुंभकार ने मिट्टी को चाक पर चढ़ाया और उसे तेजी से घुमाते हुए घड़े का रूप दिया। फिर धूप में सुखाया। कष्ट सहते-सहते जब मिट्टी का धैर्य टूटने लगा तो कुंभकार बोला, 'बस बहन! अब केवल एक अग्नि-परीक्षा ही शेष है। और सभी में तुम उत्तीर्ण हो चुकी हो। यदि उसमें भी उत्तीर्ण रही तो लोग सती सीता की तरह तुम्हें भी मस्तक पर चढ़ा लेंगे। सीता को लोग सिर झुकाकर सम्मान देते हैं किन्तु तुम्हें तो वनिताएं सिर पर सजा कर घूमेंगी। '

🔴 आखिर मिट्टी ने सब कुछ सह कर अग्नि-परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली। फिर क्या था! सचमुच सुंदरियां उसे सिर पर उठाए फिरने लगी। मिट्टी अपने सम्मान पर प्रफुल्लित हो उठी। आखिर सम्मान पाने के लिए कष्ट तो सहने ही पड़ते हैं।

👉 सेवा का मर्म

🔵 हममें सेवा करने की चाहत तो है, परन्तु हमारे हृदय में इससे कहीं अधिक ललक अपने नाम और ख्याति की है। सेवा धर्म-प्रेम का मार्ग है। प्रेम में व्यापार नहीं होता, पर हम एक व्यवसायी की भाँति प्रेम का व्यवसाय करते हैं। हम प्रेम के वशीभूत हो सेवा कहाँ करते हैं? हम तो एक प्रकार से अहसान करते हैं। जितना करते हैं, उससे अधिक उसका अहंकार करते हैं। सेवा-साधना तो अपने को समाज का अंग मानकर उसके लिए अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करना भर है। यह कोई अतिरिक्त अनुदान नहीं, जो हम समाज को देते हैं। हमारी भावना तो यह रहती है, मानो हम किसी को ऋण दे रहे हों। हम सेवा के लिए समय-साधनों आदि का विनियोग करते हैं। उन्हें इस दिशा में लगाने की क्षमता का विकास भी करते हैं, किन्तु अपनी निश्छल भावना का उपयुक्त विकास करना चूक जाते हैं।

🔴 हम सेवाकार्य में तप, त्याग के अभिमान को नहीं छोड़ते। अभिमान के कारण भेद एवं विशृंखलताएँ उत्पन्न होती हैं। केवल तप, त्याग और  बलिदान के द्वारा ही उन्हें हटाया जा सकता है।
  
🔵 क्या हमारे हृदय में सात्त्विक भावना मौजूद हैं? समाज, सभाएँ, आश्रम सभी कुछ मौजूद है। ये सब अपना-अपना काम कर रहे हैं। समाजसेवा का कार्य जो भी, जैसा भी और जितना भी होता है, वह अच्छा ही है। परन्तु दुःखी प्राणियों और पीड़ित वर्ग की गुप्त सेवा करने वाले लोग कहाँ हैं? हमारे हृदय में निर्धनों और निर्बलों के प्रति प्रेम एवं आदर का अभाव है। यह ठीक है कि बहुधा सेवा अपने से कम साधन वालों की ही की जाती है। पर इसका यह अर्थ तो नहीं कि उन्हें हीन तथा तिरस्कृत माना जाए। यह भाव रहते सेवा तो कभी हो ही नहीं सकती। जब हम यह मानें कि इनका भी कुछ हक है, जो इन्हें मिलना चाहिए, तभी सेवा की सार्थकता है अन्यथा भ्रान्त दृष्टिकोण से तो अहंकार ही बढ़ेगा।

🔴 कुछ व्यक्ति आध्यात्मिक जीवनयापन करते देखे तो जाते हैं, पर गरीबों-असहायों को शीतल छाया बिलकुल भी नहीं देते। इस सजला-सुफला, शस्यस्यामला भारतभूमि पर लाखों नर-नारी अन्न-वस्त्र, दवा-दारू, सेवा-सहायता के बिना आए दिन तड़प-तड़प कर अपने प्राण गवाँ रहे हैं और हम अपने नाम, प्रतिष्ठा और अधिकार के मद में उस ओर देखते तक नहीं। परहित के लिए हड्डियाँ तक दे डालने वाले दधीचि जैसे ऋषियों की भूमि में गुप्तदान और गुप्त-सेवा आदि की पवित्र, सात्विक भावनाओं के प्रति आदर क्या एकदम उठ गया? लगता है-त्याग, निस्पृहता एवं संवेदना अब इस जगत् में नहीं रही, परन्तु परमात्मप्रेम की ज्योति आज भी बुझी नहीं है। वह परम ज्योति जितने अन्तःकरणों को छू सके, उनमें प्रकाशित हो सके, प्रज्वलित हो सके, उतना ही शुभ होगा। इस शुभ में ही सेवा का मर्म निहित है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 65

👉 नारी की महानता को समझें (भाग 2)

🔵 महादेवी वर्मा ने नारी की महानता के बारे में लिखा है-
‘नारी केवल माँस पिण्ड की संज्ञा नहीं है, आदिम काल से आज तक विकास पथ पर पुरुष का साथ देकर उसकी यात्रा को सफल बनाकर, उसके अभिशापों को स्वयं झेलकर और अपने वरदानों से जीवन में अक्षय शक्ति भर कर मानवी ने जिस व्यक्तित्व, चेतना और हृदय का विकास किया है उसी का पर्याय नारी है।’

🔴 इसमें कोई सन्देह नहीं कि नारी धरा पर स्वर्गीय ज्योति की साकार प्रतिमा है। उसकी वाणी जीवन के लिए अमृत स्रोत है। उसके नेत्रों में करुणा, सरलता और आनन्द के दर्शन होते हैं। उसके हास्य में संसार की समस्त निराशा और कड़ुवाहट मिटाने की अपूर्व क्षमता है। नारी सन्तप्त हृदय के लिए शीतल छाया है। वह स्नेह और सौजन्य की साकार देवी है। आचार्य चतुरसेन शास्त्री के शब्दों में ‘नारी पुरुष की शक्ति के लिए जीवन सुधा है। त्याग उसका स्वभाव है, प्रदान उसका धर्म, सहनशीलता उसका व्रत और प्रेम उसका जीवन है।’

🔵 कवीन्द्र रवीन्द्र ने नारी के हास में जीवन निर्झर का संगीत सुना है। जयशंकर प्रसाद ने कहा है-
नारी केवल तुम श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में।
पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में॥

🔴 संसार के सभी महापुरुषों ने नारी में उसके दिव्य स्वरूप के दर्शन किये हैं जिससे वह पुरुष के लिए पूरक सत्ता के ही नहीं वरन् उर्वरक भूमि के रूप में उसकी उन्नति, प्रगति एवं कल्याण का साधन बनती है। स्वयं प्रकृति ही नारी के रूप में सृष्टि के निर्माण, पालन-पोषण संवर्धन का काम कर रही है। नारी के हाथ बनाने के लिए हैं बिगाड़ने के लिए नहीं। परिस्थिति वश-स्वभाव वश नारी कितनी ही कठोर बन जाय किन्तु उसकी वह सहज-कोमलता कभी ओझल नहीं हो सकती जिसके पावन अंक में संसार को जीवन मिलता है। प्रेमचन्द के शब्दों ‘नारी पृथ्वी की भाँति धैर्यवान् शान्त और सहिष्णु होती है।’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 ~अखण्ड ज्योति जून 1964 पृष्ठ 39
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/June/v1.39

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 99)

🌹 तीसरी हिमालय यात्रा-ऋषि परम्परा का बीजारोपण

🔴 गुजारा अपनी जेब से एवं काम दिन-रात स्वयं की तरह मिशन का, ऐसा उदाहरण अन्य संस्थाओं में चिराग लेकर ढूँढ़ना पड़ेगा। यह सौभाग्य मात्र शान्तिकुञ्ज को मिला है कि उसे एम० ए०, एम०एस०सी०, एम०डी०, एम०एस०, पी०एच०डी०, आयुर्वेदाचार्य, संस्कृत आचार्य स्तर के कार्यकर्ता मिले हैं। उनकी नम्रता, सेवा साधना, श्रमशीलता एवं निष्ठा देखते ही बनती है। जबकि वरीयता योग्यता एवं प्रतिभा को दी जाती है, डिग्री को नहीं, ऐसा परिकर जुड़ना इस मिशन का बहुत बड़ा सौभाग्य है।

🔵 जो काम अब तक हुआ है, उसमें पैसे की याचना नहीं करनी पड़ी। मालवीय जी का मंत्र मुट्ठी भर अन्न और दस पैसा नित्य देने का संदेश मिल जाने से ही इतना बड़ा कार्य सम्पन्न हो गया। आगे इसकी और भी प्रगति होने की सम्भावना है। हम जन्मभूमि छोड़कर आए, वहाँ हाईस्कूल, फिर इंटर कालेज एवं अस्पताल चल पड़ा। मथुरा का कार्य हमारे सामने की अपेक्षा उत्तराधिकारियों द्वारा दूना कर दिया गया है। हमारे हाथ का कार्य क्रमशः अब दूसरे समर्थ व्यक्तियों के कंधों पर जा रहा है, पर मन में विश्वास है कि घटेगा नहीं। ऋषियों का जो कार्य आरम्भ करना और बढ़ाना हमारे जिम्मे था, वह अगले दिनों घटेगा नहीं। प्रज्ञावतार की अवतरण वेला में मत्स्यावतार की तरह बढ़ता-फैलता ही चला जाएगा। चाहे हमारा शरीर रहे या न रहे, किंतु हमारा परोक्ष शरीर सतत उस कार्य को करता रहेगा, जो ऋषि सत्ता ने हमें सौंपा था।

🔴 हिमालय यात्रा से हरिद्वार लौटकर आने के बाद जब आश्रम का प्रारंभिक ढाँचा बनकर तैयार हुआ तो विस्तार हेतु साधनों की आवश्यकता प्रतीत होने लगी। समय की विषमता ऐसी थी कि जिससे जूझने के लिए हमें कितने ही साधनों, व्यक्तियों एवं पराक्रमों की आवश्यकता अपेक्षित थी। दो काम करने थे-एक संघर्ष, दूसरा सृजन। संघर्ष उन अवाञ्छनीयताओं से, जो अब तक की संचित सभ्यता, प्रगति और संस्कृति को निगल जाने के लिए मुँह बाए खड़ी है। सृजन उसका, जो भविष्य को उज्ज्वल एवं सुख-शान्ति से भरा पूरा बना सके। दोनों ही कार्यों का प्रयोग समूचे धरातल पर निवास करने वाले ५०० करोड़ मनुष्यों के लिए करना ठहरा था, इसलिए विस्तार क्रम अनायास ही अधिक हो जाता है।

🔵  निज के लिए हमें कुछ भी न करना था। पेट भरने के लिए जिस स्रष्टा ने कीट-पतंगों तक के लिए व्यवस्था बना रखी है, वह हमें क्यों भूखा रहने देगा। भूखे उठते तो सब हैं, पर खाली पेट सोता कोई नहीं। इस विश्वास ने निजी कामनाओं का आरम्भ में ही समापन कर दिया। न लोभ ने कभी सताया, न मोह ने। वासना, तृष्णा और अहंता में से कोई भी भव बंधन जैसी बँधकर पीछे न लग सकी। जो करना था, भगवान के लिए करना था, गुरुदेव के निर्देशन पर करना था। उन्होंने संघर्ष और सृजन के दो ही काम सौंपे थे, सो उन्हें करने में सदा उत्साह ही रहा। टालमटोल करने की प्रवृत्ति न थी और न कभी इच्छा हुई। जो करना सो तत्परता और तन्मयता से करना, यह आदत जन्मजात दिव्य अनुदान के रूप में मिली और अद्यावधि यथावत बनी रही।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/3.5

👉नारी की महानता को समझें (भाग 1)

🔵  नारी पुरुष की पूरक सत्ता है। वह मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत है। उसके बिना पुरुष का जीवन अपूर्ण है। नारी उसे पूर्ण करती है। मनुष्य का जीवन अन्धकारयुक्त होता है तो स्त्री उसमें रोशनी पैदा करती है। पुरुष का जीवन नीरस होता है तो नारी उसे सरस बनाती है। पुरुष के उजड़े हुए उपवन को नारी पल्लवित बनाती है।

🔴 इसलिए शायद संसार का प्रथम मानव भी जोड़े के रूप में ही धरती पर अवतरित हुआ था। संसार की सभी पुराण कथाओं में इसका उल्लेख है। हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथ मनुस्मृति में उल्लेख है-

द्विधा कृत्वाऽऽत्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽमवत्।
अर्धेन नारी तस्याँ स दिराजम सृजत्प्रभुः॥

🔵  ‘उस हिरण्यगर्भ ने अपने शरीर के दो भाग किए। आधे से पुरुष और आधे से स्त्री का निर्माण हुआ।’

🔴 इस तरह के कई आख्यान हैं जिनसे सिद्ध होता है कि पुरुष और नारी एक ही सत्ता के दो रूप हैं और परस्पर पूरक हैं। फिर भी कर्त्तव्य, उत्तरदायित्व और त्याग के कारण नारी कहीं महान है पुरुष से। वह जीवन यात्रा में पुरुष के साथ नहीं चलती वरन् उसे समय पड़ने पर शक्ति और प्रेरणा भी देती है। उसकी जीवन यात्रा को सरस, सुखद, स्निग्ध और आनन्दपूर्ण बनाती है नारी, पुरुष की शक्तियों के लिए उर्वरक खाद का काम देती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 ~अखण्ड ज्योति जून 1964 पृष्ठ 39 

👉 आत्म-ज्ञान को प्राप्त करो। (भाग 3)

🔵 चारों वेद एक स्वर से कहते हैं कि वास्तव में तू ही अविनाशी आत्मा अथवा अमर ब्रह्म है। शान्ति तथा चतुराई से अपने ऊपर के एक-एक आवरण को तथा मन को इन्द्रिय विषयों से हटा ले। एकान्त वास कर। इन्द्रिय विषयों को विष समझ। दूरदर्शिता एवं अनासक्ति द्वारा अपने मन को वश में कर। विवेक, वैराग्य, शत-सम्पत तथा मुमुक्षत्व को सर्वश्रेष्ठ श्रेणी तक बढ़ा। सर्वदा ध्यानस्थ रह। एक क्षण भी व्यर्थ न जाने दे।

🔴 आकाश सौम्य और सर्वव्यापक है, इसीलिए ब्रह्म की उपमा आकाश से दी जाती है। प्रारम्भ में तू सौम्य ब्रह्म पर विचार कर सकता है। पहले आकाश पर विचार कर और फिर धीरे-धीर ब्रह्म पर। इस प्रकार गूढ़ चिन्तन में लीन हो जा।

🔵 ‘ओऽम्’ ब्रह्म का चिह्न है। अर्थात् परमात्मा का चिह्न है। ओऽम् पर विचार कर। जब तू ओऽम् का चिन्तन करेगा, तब तुझे अवश्य ही ब्रह्म का ध्यान होगा क्योंकि ब्रह्म का चिह्न ओऽम् है।

🔴 यह जान ले कि मन में उठने वाले क्षणिक विचार तथा संकल्प धोखा देने वाले हैं। तू मन तथा विचारों का दर्शक है परन्तु तू अपने उन विचारों में मग्न मत हो। अपने को ब्रह्मज्ञान के बीच में स्थित कर। अपने को सर्वश्रेष्ठ और उच्च स्थिति में रख। अपने आप को संदेह रहित, दुःख-रहित, निर्भय एवं क्लेश-रहित, और भ्रम-रहित बना तथा निर्मल सुख में स्थित होना सीख। काल और मृत्यु तेरे निकट नहीं आ सकते। तेरे लिए कोई बन्धन या रुकावट नहीं है। तू यह अनुभव करेगा कि तू इस ब्रह्माण्ड की समस्त ज्योतियों से सर्वश्रेष्ठ ज्योति है। अपूर्व सुख की यह स्थिति अवर्णनीय है। इसे अनुभव कर और प्रसन्न रह।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 स्वामी शिवानन्द जी
🌹 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1942 पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/September/v1.3

बुधवार, 10 मई 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 May 2017


👉 आज का सद्चिंतन 11 May 2017


👉 बदल दी जीवन की दिशा

🔵  मैं एक नास्तिक प्रकृति का व्यक्ति था। मुझे धर्म में कोई आस्था नहीं थी। मैं शांतिकुंज एवं गुरुदेव के नाम को भी नहीं जानता था। मेरा जीवन बहुत ही विचित्र किस्म का था। मैं शराब छोड़कर सभी चीजों का सेवन करता था। मांसाहार भी करता था। एक दिन अचानक एक व्यक्ति से मुलाकात हुई, जो गाड़ियों के ट्राँसपोर्ट का व्यवसाय करता था। उनका नाम वीरेन्द्र सिंह था। वह चेन स्मोकर था। एक दिन मैं उसके पास बैठा था। स्मोंकिंग की वजह से उनके मुँह में छाले पड़ गए थे। लेकिन मैंने देखा कि उनके दोनों नेत्रों के बीच से प्रकाश निकल रहा है। मैं देखकर आश्चर्य से भर गया। मैंने पूछा तुम्हारी आँखों से क्या निकल रहा है? तो उसने कहा कि मैं तुमको यहाँ नहीं, बाद में बताऊँगा। बाद में उसने बताया कि मेरे गुरुदेव है श्रीराम शर्मा आचार्य जी। मैं उनका शिष्य हूँ। उसकी बातों से मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। धीरे- धीरे मुझे वह गुरुदेव के बारे में बताने लगा। मुझे मिशन की जानकारी हो गई। वह मुझे प्रत्येक कार्यक्रम में बुलाता था। उस समय मेरे क्षेत्र में आचार्य जी के मिशन का कोई प्रचार नहीं था।

🔴 १९९२ की बात है। शान्तिकुञ्ज की टोली मेरे क्षेत्र में आई थी। वीरेन्द्र सिंह जी बहुत परेशान थे। उन्होंने मुझसे कहा- भाई साहब शान्तिकुञ्ज से लोग आए हैं, कार्यक्रम कराना है। आप सहयोग करें। मैं सहर्ष तैयार हो गया। मैंने जगह आदि की व्यवस्था कर दी। कार्यक्रम बहुत अच्छे ढंग से सम्पन्न हुआ। जिस दिन पूर्णाहुति थी, टोली में आए भाई बोले- डॉ० साहब कुछ दक्षिणा दीजिए। उनकी बातों को सुनकर मैंने सोचा कि ये लोग भी शायद ठगने खाने वाले हैं, पता नहीं क्या माँग रहें हैं।

🔵 मैंने कहा- मेरे पास कुछ नहीं है देने के लिए तो वे बोले- आपके पास बहुत कुछ है, कुछ तो दीजिए मैंने सोचा शायद उनको पता है कि मेरे पास रुपया पैसा है। तो मैंने कहा- बोलिए क्या चाहिए? तो वे बोले अपनी कोई बुराई दीजिए उनकी बातों से मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि अजीब लोग हैं, दक्षिणा में बुराई लेते हैं। उन्होंने कहा- आप माँस छोड़ दीजिए, मैंने कहा- यह मेरे बस का नहीं है। उन्होंने कहा कि आप इसकी चिन्ता मत कीजिए। आप केवल संकल्प लीजिए। आपकी बुराई अपने- आप छूट जाएगी। उनने जबर्दस्ती मुझे अक्षत पुष्प दे दिए।

🔴 उसके पश्चात् मैंने गायत्री माता को प्रणाम किया, किन्तु उनके बगल में गुरुजी- माताजी के चित्रों को देखकर मैं बहुत हँसा कि ये कैसे भगवान? ये मेरी क्या बुराई छुड़ाएँगें? मैंने केवल गायत्री माँ को प्रणाम किया। गुरुजी- माताजी को प्रणाम भी नहीं किया। सोचा साधारण वेष- भूषा में ये मेरे ही जैसे सामान्य व्यक्ति हैं। मुझे बिल्कुल श्रद्धा नहीं हुई। इस प्रकार कार्यक्रम समाप्त हुआ। १५ दिन बीत जाने के बाद माँसाहार की ओर से मेरा मन हटने लगा और धीरे- धीरे मेरे सारे दुव्यर्सन दूर हो गए।

🔵 १९९३ के लखनऊ अश्वमेध यज्ञ में मैंने माताजी से दीक्षा ली। तीन महीने का समयदान भी दिया। आज मेरा पूरा परिवार गुरुकार्य में संलग्न है। शताब्दी वर्ष ही मेरा रिटायरमेन्ट हो चुका है। जबकि मेरा पेन्शन, प्रोविडेन्ट फंड आदि का कार्य बाकी है। लेकिन मैं यहाँ चला आया हूँ, चूँकि मेरे लिए गुरुकार्य से बढ़कर कोई कार्य नहीं है। गुरुकृपा से मेरे जीवन के सारे दुर्गुण दूर हो गए। मैं एक अच्छा इन्सान बन सका।

🌹  डॉ० के० के० खरे प्रतापगढ़ (उत्तरप्रदेश)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/dd

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 98)

🌹 तीसरी हिमालय यात्रा-ऋषि परम्परा का बीजारोपण

🔴 यहाँ सभी सत्रों में आने वालों की स्वास्थ्य परीक्षा की जाती है। उसी के अनुरूप उन्हें साधना करने का निर्देश दिया जाता है। अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय पर इस प्रकार शोध करने वाली विश्व की यह पहली एवं स्वयं में अनुपम प्रयोगशाला है।

🔵 इसके अतिरिक्त भी सामयिक प्रगति के लिए जनसाधारण को जो प्रोत्साहन दिए जाने हैं उनकी अनेक शिक्षाएँ यहाँ दी जाती हैं। अगले दिनों और भी बड़े काम हाथ में लिए जाने हैं।

🔴 गायत्री परिवार के लाखों व्यक्ति उत्तराखण्ड की यात्रा करने के लिए जाते समय शान्तिकुञ्ज के दर्शन करते हुए यहाँ की रज मस्तक पर लगाते हुए तीर्थयात्रा आरम्भ करते हैं। बच्चों के अन्नप्राशन, नामकरण, मुंडन, यज्ञोपवीत आदि संस्कार यहाँ आकर कराते हैं क्योंकि परिजन इसे सिद्ध पीठ मानते हैं। पूर्वजों के श्राद्ध तर्पण कराने का भी यहाँ प्रबंध है। जन्म-दिन विवाह-दिन मनाने हर वर्ष प्रमुख परिजन यहाँ आते हैं। बिना दहेज की शादियाँ हर वर्ष यहाँ व तपोभूमि, मथुरा में होती हैं। इससे परिजनों को सुविधा भी बहुत रहती है और, इस खर्चीली कुरीति से भी पीछा छूटता है।

🔵  जब पिछली बार हम हिमालय गए थे और हरिद्वार जाने और शान्तिकुञ्ज  रहकर ऋषियों की कार्य पद्धति को पुनर्जीवन देने का काम हमें सौंपा गया था, तब यह असमंजस था कि इतना बड़ा कार्य हाथ में लेने में न केवल विपुल धन की आवश्यकता है, वरन् इसमें कार्यकर्ता भी उच्च श्रेणी के चाहिए। वे कहाँ मिलेंगे? सभी संस्थाओं के पास वेतन भोगी हैं। वे भी चिह्न पूजा करते हैं। हमें ऐसे जीवनदानी कहाँ से मिलेंगे, पर आश्चर्य है कि शान्तिकुञ्ज में-ब्रह्मवर्चस् में इन दिनों रहने वाले कार्यकर्ता ऐसे हैं, जो अपनी बड़ी-बड़ी पोस्टों से स्वेच्छा से त्याग पत्र देकर आए हैं। सभी ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट स्तर के हैं अथवा प्रखर प्रतिभा सम्पन्न हैं। इनमें से कुछ तो मिशन के चौके में भोजन करते हैं। कुछ उसकी लागत भी अपनी जमा धनराशि के ब्याज से चुकाते रहते हैं। कुछ के पास पेंशन आदि का प्रबंध भी है। भावावेश में आने जाने वालों का क्रम चलता रहता है, पर जो मिशन के सूत्र संचालक के मूलभूत उद्देश्य को समझते हैं, वे स्थायी बनकर टिकते हैं। खुशी की बात है कि ऐसे भावनाशील नैष्ठिक परिजन सतत आते व संस्था से जुड़ते चले जा रहे हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/3.5

👉 नवसृजन का पावन यज्ञ

🔵 नवसृजन की जो चिनगारी हिमालय की ऋषिसत्ताओं ने देवपुरुष परमपूज्य गुरुदेव को सौंपी थी, वह अब महाज्वाला का रूप ले चुकी है। युगपरिवर्तन के हवनकुण्ड में इसकी लपटें प्रबल से प्रबलतर-प्रबलतम हो रही हैं। महाकाल की नित-नवीन प्रेरणाएँ नवसृजन के विविध आयामों को प्रकट कर रही हैं। इसी प्रेरणा से विवश एवं वशीभूत होकर युगतीर्थ-शान्तिकुञ्ज ने एक नए भूखण्ड को क्रय किया और अब इन दिनों नए सिरे से नए निर्माण के नए निर्धारण हो रहे हैं। नवनिर्माण के प्रयासों में ऐसी हलचलें हो रही हैं, जिनमें चिरपुरातन को चिरनवीन के साथ जोड़ा जा सके। भारतीय विद्याओं के पुनर्जीवन के साथ उनका समुचित प्रशिक्षण एवं प्रसार हो।

🔴 युग परिवर्तन की पुण्य प्रक्रिया यही है कि व्यक्ति को सुसंस्कृत और समाज को समुन्नत बनाने की इस पुण्य प्रक्रिया की व्यापक प्रतिष्ठा की जाए, जिसे अपनाकर हमारे महान् पूर्वज जीवनयापन करते हुए इस पुण्यभूमि को चिरकाल तक स्वर्गादपि गरीयसी बनाए रहे। अतीत के उसी महान गौरव को वापस लाने के इस भगीरथ प्रयत्न को एक शब्द में नवसृजन का पावन यज्ञ कह सकते हैं। इस महायज्ञ की संचालक दैवीचेतना की प्रौढ़ता दिनों-दिन तीव्र होती जा रही है। जहाँ कहीं भी चेतना में जाग्रति का अंश है, वहाँ इसमें सक्रिय भागीदारी के लिए आमंत्रण की पुकार स्पष्ट सुनी जा रही है।
  
🔵 आस्थावान् निष्क्रिय रह नहीं सकते। निष्ठा की परिणति अपनी आहुति नवसृजन के पावन यज्ञ में समर्पित करने के रूप में होकर ही रहती है। श्रद्धा का परिचय प्रत्यक्ष करुणा के रूप में मिलता है। करुणा की अन्तःसंवेदनाएँ पीड़ा और पतन की आग बुझाने के लिए अपनी सामर्थ्य को प्रस्तुत किए बिना रह नहीं सकतीं। यही चिह्न है, जिसकी कसौटी पर व्यक्ति की आन्तरिक गरिमा का यथार्थ परिचय प्राप्त होता है। आध्यात्मिक, आस्तिकता और धार्मिकता की विडम्बना करने वाले तो संकीर्ण स्वार्थपरता के दल-दल में फँसे भी बैठे रह सकते हैं, पर जिनकी अन्तरात्मा में दैवी-आलोक का वस्तुतः अवतरण होगा, वे लोककल्याण के लिए समर्पित हुए बिना नहीं रहेंगे।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 65

👉 Intercession & its Significance. (Part 1)

🔴 The progress of a man has nothing to do with its outside development. Actually it is associated with how is the internal scenario of a man. Roots happen to be inside the earth and are not visible and a tree with small roots cannot grow much. The expansion you see of a man is actually not of its body or not due to its body, not of his money, not of his brain rather it is the expansion of his internal scenario/ inner-consciousness.  It is very likely that a man with a low level of inner-consciousness must be a shrewd & wicked one. No man from outside can be of any help even willingly to a man whose inner-consciousness has not been up to mark.
                                 
🔵 Very this secret has been unveiled in four legs of GAYATRI mantra that firstly our inner-consciousness must develop. The meaning of UPASANA (intercession), I have told you- be seated nearby, seated nearby whom? We are influenced by anyone, we sit nearby. We tend to misbehave when we sit nearby misbehaving people. Our children turn worthless and ridiculous. Neighbor’s children, worthless children become successful in misleading our innocent boys to show them cinemas, make them habitual of smoking and after some days make our boy the most useless and confused boy. Effect of company! Yes, a company compulsorily leaves its impressions in the mind. Bad companionship may leave impression so may leave a good one.

🌹  to be continue...
🌹 ~Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 समय का सदुपयोग करें (अंतिम भाग)

🌹  समय-संयम सफलता की कुञ्जी है

🔴 निर्धारित समय में हेर-फेर करते रहने वाले बहुधा लज्जा एवं आत्मग्लानि के भागी बनते हैं। किसी को बुलाकर समय पर न मिलना, समाजों, सभाओं, गोष्ठियों अथवा आयोजनों के अवसर पर समय से पूर्व अथवा पश्चात् पहुंचना, किसी मित्र से मिलने जाने का समय देकर उसका पालन न करना आदि की शिथिलता सभ्यता की परिधि में नहीं मानी जा सकती है। देर-सवेर कक्षा अथवा कार्यालय पहुंचने वाला विद्यार्थी तथा कर्मचारी भर्त्सना का भागी बनता है। ‘लेट लतीफ’ लोगों की ट्रेन छूटती, परीक्षा चूकती, लाभ डूबता डाक रुक जाती, बाजार उठ जाता, संयोग निकल जाते और अवसर चूक जाते हैं। इतना ही नहीं व्यावसायिक क्षेत्र में तो जरा-सी देर दिवाला तक निकाल देती हैं। समय पर बाजार न पहुंचने पर माल दूसरे लोग खरीद ले जाते हैं। देर हो जाने से बैंक बन्द हो जाता है और भुगतान रुक जाता है। समय चुकते ही माल पड़ा रहता है। असामयिक लेन-देन तथा खरीद-फरोख्त किसी भी व्यवसायी को पनपने नहीं देती।

🔵 समय का पालन मानव-जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण संयम है। समय पर काम करने वालों के शरीर चुस्त, मन नीरोग तथा इन्द्रियां तेजस्वी बनी रहती हैं। निर्धारण के विपरीत काम करने से मन, बुद्धि तथा शरीर काम तो करते हैं किन्तु अनुत्साहपूर्वक। इससे कार्य में दक्षता तो नहीं ही आती है, साथ ही शक्तियों का भी क्षय होता है। किसी काम को करने के ठीक समय पर शरीर उसी काम के योग्य यन्त्र जैसा बन जाता है। ऐसे समय में यदि उससे दूसरा काम लिया जाता है, तो वह काम लकड़ी काटने वाली मशीन से कपड़े काटने जैसा ही होगा।

🔴 क्रम एवं समय से न काम करने वालों का शरीर-यन्त्र अस्त-व्यस्त प्रयोग के कारण शीघ्र ही निर्बल हो जाता है और कुछ ही समय में वह किसी कार्य के योग्य नहीं रहता। समय-संयम सफलता की निश्चित कुन्जी है। इसे प्राप्त करना प्रत्येक बुद्धिमान का मानवीय कर्त्तव्य है।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 May 2017


👉 आज का सद्चिंतन 10 May 2017


👉 किसी भ्रान्ति में न रहें, क्रान्ति होकर रहेगी

🔵 आजकल सारी दुनिया असाधारण संक्रमण प्रक्रिया से गुजर रही है। राजनैतिक, आर्थिक और अन्य क्षेत्रों में संकटग्रस्त स्थिति के बारे में रोज ही पढ़ा जाता है। पिछले महायुद्धों और आने वाले सम्भावित युद्धों के बारे सोचकर हर एक का मन सशंकित है। विवेकवान और दिव्यदर्शी जानते हैं कि जिन महान् परिवर्तनों के बीच से हम आजकल गुजर रहे हैं, वैसा मानव जीवन के पूर्व इतिहास में कभी नहीं हुआ। इतिहास के विराट् ज्ञान में इसकी कोई मिसाल नहीं दिखाई देती। हो सकता है कि हर कोई उन विषयों को कुछ भी महत्त्व न दे, जिनके बारे में रोज सुना, देखा और अनुभव किया जाता है, लेकिन इन सबका व्यापक लेखा-जोखा करने पर विचारशीलों के मन में यह अनुभूति सघन हो जाती है कि हम एक महान् क्रान्ति में से गुजर रहे हैं, जिससे सारे मानव समाज का ढाँचा पलटना अवश्यम्भावी है। यह एक बहुत बड़ी बात है कि हम सब इस महापरिवर्तन के समय मौजूद हैं।

🔴 ऐसे में समय का तकाजा यही है कि हम अपनी समस्याओं पर इस दृष्टिकोण से विचार करें। दुनिया भर में राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक परिवर्तन अवश्य होंगे। यह बात सुनिश्चित तौर पर कही जा सकती है कि दुनिया के जिस पुराने ढाँचे के आधार पर चलकर सारा संसार पिछले वर्षों मुसीबत में फँसता रहा है, उसे बदलना ही होगा। यदि हम वर्तमान समस्याओं को सुलझाने, युद्धों को टालने, शान्ति और सुशासन स्थापित करने का प्रयत्न करना चाहते हैं, तो हमें इस दुनिया की नयी रचना करनी होगी। नवयुग का सूत्रपात ही एकमात्र हल है।
  
🔵 यह अनुभूति स्पष्ट है कि आज जो राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य पर संकट उभरा है, उसकी जड़ें गहरी हैं। उसे मनोवैज्ञानिक कहिए या आध्यात्मिक, उसका सम्बन्ध मनुष्य की आत्मा से है। इससे अधिक एवं व्यापक उसकी व्याख्या सम्भव नहीं है। आज दुनिया एक गहरी आत्मिक उथल-पुथल से गुजर रही है। सम्प्रदायों के संकुचित अर्थों में नहीं, न ही पोथियों के पन्नों में कैद शब्दों के सीमित दायरे में इस सत्य को समझा जा सकता है। यह तो समस्त मानवीय चेतना का तीव्र मंथन है, जो व्यक्ति ही नहीं, राष्ट्रों की परिधि से भी व्यापक है। इसकी परिणति मानवता के आमूलचूल परिवर्तन के रूप में होगी।

🔴 यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है, साथ ही एक महान् चुनौती भी। हममें से प्रत्येक के सामने इसे स्वीकार करने के सिवाय और कोई चारा नहीं। यह हम सबको अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि हम बड़ी-बड़ी घटनाओं के अति निकट खड़े हैं। एक के बाद एक तीव्र वेग से आने वाली वे घटनाएँ कष्ट में मुसीबत में फँसा सकती हैं। परन्तु इस सबके बदले हमें एक नवीन और सुन्दर भविष्य आगत के रूप में देखना चाहिए। हिमालय के दिव्यक्षेत्र से आध्यात्मिक धाराएँ पुनः सक्रिय रूप में प्रवाहित हो चली हैं। इनके कल-कल निनाद में सतत यही ध्वनि गूँजती है-‘‘किसी भ्रान्ति में न रहें, क्रान्ति होकर रहेगी। समय रहते चेतें और स्वयं को तैयार करें।’’

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 64

सोमवार, 8 मई 2017

👉 गुरुदेव भी रो पड़े

🔵 मध्य प्रदेश में यज्ञ चल रहा था। गुरुदेव के साथ मैं भी वहाँ गया हुआ था। एक दिन एक हॉल में तीन- चार सौ बहिनें उनके साथ बैठी थीं। बातचीत के साथ- साथ हँसी के फव्वारे छूट रहे थे। गुरुदेव बात- बात में हँसाते जाते थे। सभी बहिनें उनकी बातों पर हँस रही थीं। एक बहिन उन सबमें गुमसुम बैठी थी। उसे हँसी नहीं आ रही थी। उसे दुखी देख गुरुदेव ने पास बुलाया और पूछा- बेटी तुझे क्या दुःख है?

🔴 वहाँ बैठी सभी बहिनें सज- धज कर आई थीं, अच्छे- अच्छे कपड़े- जेवर पहने हुए थीं और वह लड़की सिर्फ सफेद धोती पहनी थी। गुरुदेव की बात का उसने कोई जवाब नहीं दिया, केवल सिर झुका लिया। गुरुदेव ने फिर दुलारते हुए पूछा- बेटी क्या कष्ट है तुझे, तू हँस भी नहीं रही है। उसे निरुत्तर देख गुरुदेव उसे अलग ले गए। मैं भी उनके साथ चला गया। मैं हमेशा उनकी हरेक बातचीत सुनने का प्रयास करता। उनसे काफी कुछ सीखने को मिलता था।

🔵 अलग ले जाकर उन्होंने उससे पूछा- बेटी बता तुझे क्या दु:ख है? तेरे सारे दु:ख दूर कर दूँगा। उसने लम्बी साँस ली। फिर बोली- गुरुदेव, मुझे कोई दु:ख नहीं है। उसकी आँखें आँसुओं से डबडबा आईं। गुरुदेव के बहुत दबाव डालने पर उसने बताया कि उसकी शादी बहुत बचपन में ही हो गई थी। उसके पति का स्वर्गवास हो चुका है। और अब वह स्वनिर्भर जीवन जी रही है। एक विद्यालय में शिक्षिका है और अपना सब काम स्वयं करती है।

🔴 विधवा होने का दु:ख तो वह झेल ही रही थी मगर समाज की बेरुखी से वह बुरी तरह टूट चुकी थी। वह कह रही थी ‘‘मैं 100 अखण्ड ज्योति मँगाती हूँ। उसे लेकर सुबह किसी के घर जाती हूँ तो सभी मुझसे नाराज होते हैं कि तू विधवा है। सुबह- सुबह आकर मुँह दिखला दिया, न जाने आज का दिन कैसा बीतेगा। सब गाली भी देते हैं, मैं चुप होकर सुन लेती हूँ और वापस चली आती हूँ। शाम को अखण्ड ज्योति बाँटने जाती हूँ, तब भी वे यही कहते हैं कि शाम को आकर मुँह दिखला दिया। कल से हमारे घर मत आया कर।’’ वह सिसकते हुए कह रही थी- जहाँ जाती, वहीं सब मुझसे नफरत करते हैं। पत्रिका बाँटने घरों में न जाऊँ तो उनके पैसे अपने वेतन से भरने पड़ते हैं। अपने खर्च में कटौती करनी पड़ती है। समाज की इस नफरत को लेकर जीने की इच्छा नहीं होती। कभी- कभी सोचती हूँ कि आत्महत्या कर लूँ, पर आप कहते हैं आत्महत्या पाप है। मगर मैं जीऊँ तो कैसे?

🔵 बोलते- बोलते वह फूट- फूट कर रोने लगी। उसके साथ- साथ गुरुदेव भी रोने लगे। मेरे भी आँसू नहीं रुक रहे थे। गुरुदेव ने उससे कहा- चल बेटी मेरे साथ चल। फिर हॉल में सबके बीच आकर वे कहने लगे ‘‘बेटी मैं अपनी बात नहीं कहता, वेद की बात कहता हूँ। तू तो पवित्र गंगा जैसा जीवन जीती है। श्रम करती है, लोक मंगल का कार्य करती है, ब्रह्मचर्य से रहती है। तू साक्षात् गंगा है। जो तेरे दर्शन करेगा- सीधे स्वर्ग को जाएगा और जो यह सब बैठी हैं शृंगार करती हैं, फैशन करती हैं, बच्चे पैदा करती हंै, देश के सामने अनेक प्रकार की समस्याएँ पैदा करती हैं- जो भी इनके दर्शन करेगा, सीधे नरक को जाएगा।’’

🔴 गुरुदेव को इतना क्रोधित होते मैंने कभी नहीं देखा था। वे कह रहे थे ‘‘जो दुखी है उसको और दु:ख देना पाप है। जो यह कहता है कि विधवा को देखने से पाप लगता है वह सबसे बड़ा पापी है। बेटी! तू तो शुद्ध और पवित्र है। उनकी इस बात पर वहाँ बैठी सभी बहिनों ने गर्दन नीची कर ली। थोड़ी देर बाद गुस्सा ठण्डा होने पर उन्होंने उनसे कहा- कहो बेटियों, आपको क्या कहना है? इस पर किसी ने कुछ नहीं कहा। सभी शान्त होकर बैठी रहीं। थोड़ी देर बाद जब उठकर जाने लगीं तो मैंने दरवाजे तक जाकर उनसे कहा- बहनों, गुरुदेव की बातों का बुरा नहीं मानना, वे गुस्से में हैं। लेकिन उनकी बातों पर विचार करना। वे लज्जित होकर बोलीं- भाई साहब, गुरुदेव की बातों का बुरा क्यों मानेंगे। उन्होंने तो सही बात कही है। विधवा तो शुद्ध पवित्र जीवन जीती है। आज उन्होंने हमारी आँखें खोल दीं। आज से हम जब भी किसी विधवा का दर्शन करेंगे, उसमें गंगा माता का दर्शन करेंगे और उसे कोई कष्ट हो, तो उसकी मदद करेंगे। हम दूसरों को भी बताएँगे कि विधवा का दर्शन करने से पाप नहीं होता।

🔵 वे कह रही थीं कि गुरुदेव ने हमारी आँखें खोल दीं। हम सौभाग्यशाली हैं कि ऐसे गुरु हमें मिले। ऐसे गुरु हों तो देश में फैला हुआ अज्ञान शीघ्र ही दूर हो जाए। वह दुखी बहिन भी वहीं खड़ी ये सब बातें सुन रही थी। उसके मुख पर सन्तोष के भाव थे। दु:ख के बादल छँट चुके थे। हल्की सी धूप झिलमिला रही थी।
  
🌹  पं. लीलापत शर्मा की यादोंके झरोख, मथुरा (उ.प्र.)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/gw

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 97)

🌹 तीसरी हिमालय यात्रा-ऋषि परम्परा का बीजारोपण

🔴 युग शिल्पी विद्यालय के माध्यम से सुगम संगीत की शिक्षा हजारों व्यक्ति प्राप्त कर चुके हैं और अपने-अपने यहाँ ढपली जैसे छोटे से माध्यम द्वारा संगीत विद्यालय चलाकर युग गायक तैयार कर रहे हैं।

🔵  पृथ्वी अन्तर्ग्रही वातावरण से प्रभावित होती है। उसकी जानकारी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। हर पाँच वर्ष पीछे ज्योतिष गणित को सुधारने की आवश्यकता होती है। आर्यभट्ट की इस विधा को नूतन जीवन प्रदान करने के लिए प्राचीनकाल के उपकरणों वाली समग्र वेधशाला विनिर्मित की गई है और नेपच्यून प्लेटो, यूरेनस ग्रहों के वेध समेत हर वर्ष दृश्य गणित पंचांग प्रकाशित होता है। यह अपने ढंग का एक अनोखा प्रयोग है।

🔴 अब प्रकाश चित्र विज्ञान का नया कार्य हाथ में लिया गया है। अब तक सभी संस्थानों में प्रोजेक्टर पहुँचाए गए थे। उन्हीं से काम चल रहा था। अब वीडियो क्षेत्र में प्रवेश किया गया है। इनके माध्यम से कविताओं के आधार पर प्रेरक फिल्में बनाई जा रही हैं। देश के विद्वानों, मनीषियों, मूर्धन्यों, नेताओं के दृश्य प्रवचन टेप कराकर उनकी छवि समेत संदेश घर-घर पहुँचाए जा रहे हैं। भविष्य में मिशन के कार्यक्रमों का उद्देश्य, स्वरूप और प्रयोग समझाने वाली फिल्में बनाने की बड़ी योजना है, जो जल्दी ही कार्यान्वित होने जा रही है।

🔵 शान्तिकुञ्ज मिशन का सबसे महत्त्वपूर्ण सृजन है ‘‘ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान।’’ इस बहुमूल्य प्रयोगशाला द्वारा अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय करने के लिए बहुमूल्य यंत्र उपकरणों वाली प्रयोगशाला बनाई गई है। कार्यकर्ताओं में आधुनिक आयुर्विज्ञान एवं पुरातन आयुर्वेद विधा के ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट हैं। विज्ञान की अन्य विधाओं में निष्णात उत्साही कार्यकर्ता हैं, जिनकी रुचि अध्यात्म परक है। इसमें विशेष रूप से यज्ञ विज्ञान पर शोध की जा रही है। इस आधार पर यज्ञ विज्ञान की शारीरिक, मानसिक रोगों की निवृत्ति में, पशुओं और वनस्पतियों के लिए लाभदायक सिद्ध करने में, वायुमण्डल और वातावरण के संशोधन में इसकी उपयोगिता जाँची जा रही है, जो अब तक बहुत ही उत्साहवर्धक सिद्ध हुई।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/3.4

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 May 2017


👉 आज का सद्चिंतन 9 May 2017


👉 गुरु नानक की सज्जनोचित उदारता

🔵 सिक्ख संप्रदाय के आदि गुरु- गुरु नानक प्रारंभ से ही बडे उदार और दयावान् थे। किसी को कष्ट देना तो वे जानते ही न थे। संतों की सेवा और उनके सत्संग में उन्हें बडा आनंद आता था। जब कभी भी उन्हें इसका अवसर मिलता था तो उसका लाभ अवश्य उठाते थे। उनके इन्हीं गुणों ने उन्हें एक उच्च कोटि का महात्मा बना दिया। उन्होंने अपना सारा जीवन लोगों को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने मे लगा दिया।

🔴 एक अच्छे ज्ञानी और संत होने पर भी गुरु नानक ने अपने आवश्यक कर्तव्यों से कभी मुँह नहीं मोडा। उन्हें जो भी काम दिया जाता था उसे करने में कभी संकोच नहीं करते थे। एक बार उनके पिता ने उन्हें खेती का काम करने के लिए नियुक्त किया। गुरु नानक ने उसे खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। उन्होंने अपने हाथ से खेती का सारा काम करके बडी अच्छी फसल तैयार की। पकने तक फसल की रखवाली करने का काम भी उन्हें सौंपा गया और वे फसल की रखवाली भी करने लगे।

🔵 एक बार कुछ गाएँ आकर फसल खाने लगीं नानक ने उन्हें डाँटा, फटकारा और ललकारा लेकिन गायों ने एक न सुनी और वे सारा खेत खा गई। पिता को पता चला तो वे नानक से बडे नाराज हुए-बोले "तूनै गायों को भगाया क्यों नहीं" नानक ने कहा-"मैंने तो उन्हें बहुत मना किया, डाँटा-ललकारा भी, लेकिन वे इतनी भूखी थीं कि मानी ही नहीं।" पिता ने और डाँटा और कहा-"बेवकूफ अगर वे ललकारने से नहीं भागी तो चार-चार डंडे क्यों नहीं जड दिए" नानक ने तुरंत उदास होकर उत्तर दिया- भला मैं भूखी गौ माताओं को डंडे से मारने का पाप कैसे करता, वे बेचारी खुद तो खेती करती नहीं। आदमियों के ही सहारे रहती हैं। हमारी खेती में भगवान् ने उनका भी अंश रखा होगा तभी तो आकर खा गई।

🔴 पिता ने नानक की अटपटी बातों में एक सार देखा और फिर उसके बाद कुछ नहीं कहा।

🔵 एक बार गुरु नानक खेत रखाते हुए एक पेड की छाया में लेटे हुए थे। लेटे-लेटे उनकी आँख लग गई। तभी  ऊपर से गाँव का एक परिचित व्यक्ति निकला। वह क्या देखता है कि गुरु नानक सो रहे है और उनके सिर पर एक सर्प फन फैलाए पास ही जड़ पर बैठा है। वह इस कौतुक को देखने के लिये थोडा आगे बढ़ा तो आहट पाकर सर्प चला गया। उस आदमी ने नानक को जगाया और सर्प वाली बात नहीं बतलाई, लेकिन इतना जरूर कहा बेटा! ऐसी वैसी जगह बेखबर मत सो जाया करो।

🔴 उस व्यक्ति ने इस पिषय में सुन रक्खा था कि जिसके सिर पर सर्प फन की छाया कर देता है, वह बडा भाग्यवान् और भविष्य में बडा़ आदमी होता है। उसने यह घटना नानक के पिता को बतलाकर कहा- ''भाई अपने लड़के से ऐसे-वैसे काम न लिया करो। यह बडा नक्षत्री आदमी है। संसार में बडा यश पायेगा। इसे किसी अच्छे काम में लगाओ।''

🔵 नानक के पिता ने उन्हें रुपये दिए और कहा- 'तू बडा़ नक्षत्री बतलाया जाता है। आ कुछ कार-रोजगार करके धन कमा तो जानूँ कि तू नक्षत्री है। भाग्यवान् होगा तो खूब दौलत कमाकर बड़ा आदमी बन जायेगा। गुरुनानक पैसा लेकर रोजगार करने चले तो रास्ते में सबसे पहले उनकी भेंट भूखे-नंगे भिखमगों से हो गई। नानक को उनकी दशा पर बड़ी दया आई और उन्होंने उन गरीबों को भोजन कराया और कपड़े मोल ले दिए। जो कुछ पैसा बचा उसे लेकर आगे बढे तो अनेक साधु-संतों का साक्षात्कार हो गया। उन्होंने उनका सत्संग किया और उनकी बातों तथा शिक्षण में बडा सार पाया। नानक ने बहुत समय तक जी भर उनका सत्संग किया और सारा पैसा उनकी सेवा में खर्च कर दिया। जब नानक सत्संग का लाभ उठाकर घर लौटे तो बिल्कुल खाली हाथ थे।

🔴 पिता ने पूछा- 'बता क्या रोजगार किया! लाभ की आशा है या नहीं ?'' नानक ने बडे विश्वास से और हर्ष के साथ उत्तर दिया-रोजगार तो मैंने किया जिसका अवसर जल्दी-जल्दी किसी को मिलता नहीं और अगर मिलता भी है तो दुर्भाग्य से उसका साहस नहीं पडता। जहाँ तक लाभ की बात है, सो तो लोक से परलोक तक और जन्म से जन्मांतर तक लाभ ही लाभ है।

🔵 पिता की कुछ समझ में नहीं आया बोले- साफ-साफ बतला क्या कमाई की, और ला कमाई कहाँ है ?" नानक ने सारी घटना बतला दी तो पिता ने हताश होकर कहा-राम जाने तू कैसा नक्षत्री है, नानक के इन्हीं गुणों ने उन्हें एक विख्यात संत बनाकर संसार से तार दिया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 159, 160

👉 प्रज्ञावतार की पुण्य-वेला

🔵 अन्धकार जब गहराता चला जाए, तो इसकी सघनतम स्थिति के अतिसमीप ही प्रभातकाल की ब्रह्मवेला भी जुड़ी रहती है। गर्मी की अतिशय तपन बढ़ चलने पर वर्षा की संभावना का अनुमान लगाया जा सकता है और वह सार्थक भी होता है। चारों ओर झुलस गयी धरती हरियाली के कवच से भर जाती है, मानो एक अप्रत्याशित चमत्कार-सा हुआ हो। दीपक जब बुझने को होता है, तो उसकी लौ जोर-जोर से चमकती है, लपलपाने लगती है। मरण की वेला अतिनिकट होने पर भी रोगी में हलकी-सी चेतना अवश्य लौट आती है और वह असामान्य रूप से लम्बी-लम्बी साँसे लेने लगता है। सभी जानते हैं कि मृत्यु की वेला समीप आ गयी। मरण के पूर्व कुछ ही पहले चींटी के पर निकलने लगते हैं।

🔴 उपर्युक्त उदाहरण आज की युग-सन्धि की वेला एवं प्रज्ञावतार के आगमन के पुण्य-प्रयोजन की व्याख्या हेतु दिए गए हैं। इन दिनों असुरता जीवन-मरण का संघर्ष कर रही है। उसे समाप्त होना ही है, मात्र उसका अंतिम चरण ‘‘हताशा की स्थिति में एक उग्र रूप और’’-इस परिप्रेक्ष्य में ही देखा जाना चाहिए। अनीति की थोड़ी मात्रा नीतिवानों के सामने चुनौती बनकर पहुँचती और उन्हें अनौचित्य से लड़ पड़ने की उत्तेजना एवं पौरुष प्रदान करती है। जन-जन को दुष्टता का पराभव देखने का अवसर मिलता है। जागरूकता, आदर्शवादिता और साहसिकता का उभार होता ही तब है जब अन्याय के असुर की दुरभिसंधियाँ देवत्व में आक्रोश का आवेश भरती हैं। इस दृष्टि से अन्याय का अस्तित्व दुखदायी होते हुए भी अन्ततः उत्कृष्टता के प्रखर बने रहने की संभावनाएँ प्रशस्त बनाए रखता है।
  
🔵 किन्तु यदा-कदा परिस्थितियाँ ऐसी भी आती हैं, जब संत, सुधारक और शहीद अपने पराक्रम-पराभव का परिमाण भारी देखते हैं एवं विपन्नता से लड़ते-लड़ते भी सत्परिणाम की संभावना को धूमिल देखते हैं। ऐसे अवसरों पर अवतार का पराक्रम उभरता है और ऐसी परिस्थितियाँ विनिर्मित करता है, जिससे पासा पलटने, परिस्थिति उलटने का वर्तमान में इसके महातथ्य का प्रत्यक्ष स्पष्टीकरण सामने है। युग परिवर्तन की इस पुण्य-वेला में प्रज्ञावतार की प्रखर भूमिका संपादित होते हुए ज्ञानवानों की पैनी दृष्टि सरलतापूर्वक देख सकती है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 62

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 25)

🌹  समय-संयम सफलता की कुञ्जी है

🔴 सुख-शान्ति, सन्तोष, सफलता एवं स्वास्थ्य आदि के पारितोषिक असामयिक जीवन-क्रम वालों से कोसों दूर रहा करते हैं। जिन्दगी जीने के लिए मिली है खो डालने के लिये नहीं। समय-सम्मत व्यवस्था के अभाव में इस परम दुर्लभ मानव-जीवन को न तो ठीक से किया जा सकता है और न इसका कोई लाभ ही उठाया जा सकता है। यह सम्भव तभी हो सकता है जब जीवन का प्रत्येक क्षण किसी निश्चित कर्त्तव्य के लिये निर्धारित एवं जागरुक हों।

🔵 असमय सोने-जागने, खाने-पीने और काम करने वाले आजीवन आरोग्य के दर्शन नहीं कर सकते। वे सदा सर्वदा शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक अथवा आध्यात्मिक किसी न किसी व्याधि से पीड़ित रहेंगे। उनकी शक्ति में से कुछ को तो उनकी अव्यवस्था नष्ट कर देगी और शेष का व्याधियां शोषण कर लेंगी।

🔴 समय-संयम के साथ अपना हर काम करने वाले मनुष्यों का जीवन कभी असफल नहीं हो सकता है। भले ही परिस्थितिवश वे संसार में कोई अनुकरणीय कार्य न भी कर पायें, तब भी उनका जीवन असफल नहीं कहा जा सकता। सुख-शांति पूर्वक एक प्रिय जिन्दगी जी लेना स्वयं ही एक बड़ी सफलता है। सफलता का मान-दंड कोई बड़ा काम ही नहीं है, उनका सच्चा मानदण्ड है—जीने की कला जो सन्तोषपूर्वक जिन्दगी को कथनीयता के साथ जी सका है, वह निःसन्देह अपने जीवन में सफल हुआ है। एक छोर से दूसरे छोर तक जिसका जीवन एक व्यवस्थित कार्यक्रम की तरह स्निग्ध गति से न चल कर ऊबड़-खाबड़ गिरता-पड़ता और उलझता सुलझता चलता है, उसके जीवन को असफल मान लेना ही न्याय-संगत होगा।

🔵 समय पर हर काम करने वालों की सारी शक्तियां उपभोग में आने पर भी अक्षय बनी रहती हैं। समय पर काम करने का अभ्यास एक सजग प्रहरी की तरह ही होता है, जो किसी भी परिस्थिति में मनुष्य को अपने कर्त्तव्य का विस्मरण नहीं होने देता। समय आते ही सिद्ध किया हुआ अभ्यास उसे निश्चित कार्य की याद दिला देता है और प्रेरणापूर्वक उसमें लगा भी देता है? समय आते ही उक्त कार्य योग्य शक्तियों में जागरण एवं सक्रियता आ जाती है, जिससे मनुष्य निरालस्य रूप से अपने काम से लगकर उसे निर्धारित समय में ही पूरा कर लेता है। कार्य एवं कर्त्तव्यों की पूर्णता ही जीवन की पूर्णता है, जो कि बिना समय, संयम, एवं व्यवस्थित और क्रियाशीलता के प्राप्त नहीं हो सकती।

🌹 अगले अंक में समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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