शनिवार, 11 मार्च 2017

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 19)

🌹 परिष्कृत प्रतिभा, एक दैवी अनुदान-वरदान  
🔴 साधारण लोगों की प्रतिभा उभारकर साहस के धनी लोगों ने बड़े-बड़े काम करा लिए थे। चन्द्रगुप्त बड़े साम्राज्य का दायित्व सँभालने के योग्य अपने को पा नहीं रहा था, पर चाणक्य ने उसमें प्राण फूँके और अपने आदेशानुसार चलने के लिए विवश कर दिया। अर्जुन भी महाभारत की बागडोर सँभालने में सकपका रहा था, पर कृष्ण ने उसे वैसा ही करने के लिए बाधित कर दिया जैसा कि वे चाहते थे।                  

🔵 समर्थ गुरु रामदास की मनस्विता यदि उच्चस्तर की नहीं रही होती, तो शिवाजी की परिस्थितियाँ गजब का पराक्रम करा सकने के लिए उद्यत न होने देतीं। रामकृष्ण परमहंस ही थे, जिन्होंने विवेकानन्द को एक साधारण विद्यार्थी से ऊँचा उठाकर विश्वभर में भारतीय संस्कृति का सन्देशवाहक बना दिया। दयानन्द की प्रगतिशीलता के पीछे विरजानन्द के प्रोत्साहन ने कम योगदान नहीं दिया था। साथियों और मार्गदर्शकों की प्रतिभा, जिस किसी पर अपना आवेश हस्तान्तरित कर दे, वही कुछ से कुछ बन जाता है।       

🔴 औजारों-हथियारों को ठीक तरह काम करने के लिए उनकी धार तेज रखने की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए उन्हें पत्थर पर रगड़कर शान पर चढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है। पहलवान भी चाहे जब दंगल में जाकर कुश्ती नहीं पछाड़ लेते, इसके लिए उन्हेें मुद्दतों अखाड़े में अभ्यास करना पड़ता है। प्रतिभा भी यकायक परिष्कृत स्तर की नहीं बन जाती, इसके लिए आए दिन अवाञ्छनीयताओं से जूझना और सुसंस्कारी आदर्शवादिता के अभिवर्धन का प्रयास निरन्तर जारी रखना पड़ता है। समाज सेवा के रूप में अन्यान्यों के साथ यह प्रयत्न जारी रखा जा सकता है।

🔵 समाज में ऐसे अवसर निरन्तर नहीं मिलते। निजी जीवन और परिवार-परिकर का क्षेत्र ऐसा है, जिसमें सुधार-परिष्कार के लिए कोई-न कोई कारण निरन्तर विद्यमान रहते हैं। रोज घर में बुहारी लगाने की, नहाने, कपड़े धोने की आवश्यकता पड़ती है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव में कहीं न कहीं से मलीनता घुस पड़ती है, उनका निराकरण करना नित्य ही आवश्यक होता है। मन में, स्वभाव में पूर्वसञ्चित कुसंस्कारों, परिचितों के सम्पर्कों से मात्र अनौचित्य ही पल्ले बँधता है। उसका निराकरण अपने आप से जूझे बिना, समझाने से लेकर धमकाने तक का प्रयोग करने के अतिरिक्त स्वच्छता, शालीनता बनाए बिना नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त आदर्शों का परिपालन भी स्वभाव का अङ्ग बनाना पड़ता है। इसके लिए दूसरों से तो यत्किञ्चित् सहायता ही मिल पाती है।
   
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बदली हुई दृष्टि ने जीवन बदल दिया

🔵 मथुरा में १९५८ में यज्ञ का कार्यक्रम था। मेरी माँ अलीगढ़ जिले के नदरोई गाँव के आसपास की बहुत सारी महिलाओं को साथ ले जाकर प्रचार-प्रसार में जुटी थीं। मैं भोपाल में शिक्षा विभाग में मिडिल स्कूल के हेडमास्टर के पद पर कार्यरत था। यद्यपि मेरे कानों में यह बात जरूर थी कि मथुरा में एक विशाल यज्ञ का आयोजन हो रहा है, पर मैं वहाँ जाने का मन नहीं बना सका। मैंने यही सोचा था कि मथुरा में बहुत से पण्डे हैं और वे खाने कमाने के लिए कुछ न कुछ करते ही रहते हैं। यह भी कुछ ऐसा ही उपक्रम होगा, इसलिए ध्यान नहीं दिया।

🔴 जब मैं गर्मियों की छुट्टी में गाँव आया, तो मेरी माता जी ने फटकार भरे शब्दों में मुझसे कहा-यज्ञ में इतने सारे लोग दूर-दूर से आए, तुम क्यों नहीं आ सके। जब उन्होंने यज्ञ का विवरण देना शुरू किया तो सुनकर मैं पश्चात्ताप में डूबता चला गया। उसी समय मंैने यह निर्णय कर लिया कि आचार्य जी से मिलने जरूर जाऊँगा। पहले मैं अपने गाँव से भोपाल, आगरा होकर ही जाता था। इस बार बजाय आगरा के मथुरा होकर जाने का निश्चय किया। जब मैंने प्रथम बार गायत्री तपोभूमि मथुरा में आचार्यश्री के दर्शन किये, तो मैं उनके साधारण से बाह्य व्यक्तित्व के कारण प्रभावित नहीं हुआ और उनसे मिलकर भोपाल चला गया।

🔵 लेकिन उस मुलाकात के बाद से ही मन में उथल-पुथल मची रहती थी। इसी दौरान भोपाल में कुछ ऐसे व्यक्ति टकराए, जिन्होंने मुझसे पूज्य गुरुदेव के साहित्य की चर्चाएँ कीं। उसमें से एक व्यक्ति ने दो-तीन किताबें भी भेंट कीं। बस किताबों का पढ़ना था कि ठीक वैसी स्थिति बन गई, जैसी ड्रिल के समय एबाउट टर्न का आदेश होते ही किसी जवान की होती है। मेरे जीवन की पूरी दिशा ही बदल गई। फिर क्या था? तड़पन बढ़ती गई और मथुरा के चक्कर लगते गए।

🔴 मैं गुरुदेव के पास बैठा-बैठा उन वार्त्ताओं को सुनता जो वे और लोगों के साथ करते थे। इच्छा तो होती थी कि मैं भी कुछ कहूँ पर मैं  कुछ कह नहीं पाता था। उनके पास जो आता, उससे पहला प्रश्न यही करते-बता तेरी कोई समस्या तो नहीं है? और वह जैसे ही अपनी समस्या सुनाता बड़ी सरलता से कह देते-हाँ बेटा, सब ठीक हो जाएगा। तब मेरा शंकालु मन सिर उठाने लगता। ये सभी फालतू की बातें हैं। ऐसा कह देने भर से कहीं समस्याएँ हल हो जाती हैं? समय बीतने के साथ ही लोगों से ये सुनने को मिलता रहा कि उनके जीवन का भारी संकट गुरुदेव की कृपा से टल गया। एक व्यक्ति ने तो यहाँ तक बताया कि जब बड़े-बड़े डॉक्टरों के कई सालों से किए जा रहे उपचार फेल हो गए तब गुरुदेव के कहने मात्र से मेरा असाध्य रोग एक ही दिन में समाप्त हो गया। मुझे पूज्य गुरुदेव ने ही यह नया जीवन दिया है। यह सब सुनकर मेरे विश्वास ने पलटा खाया, और मंै शंकाओं की धूल झाड़कर खड़ा हो गया।

🔵 बदली हुई दृष्टि के साथ १९६२ ई. में गायत्री तपोभूमि मथुरा पहुँचा। गर्मियों के दिन थे। सुबह के आठ बजने को थे। पूज्यवर का व्याख्यान शुरू होने वाला था। श्रोताओं की संख्या बहुत नहीं थी। व्याख्यान का विषय था-अपव्यय। गुरुदेव ने कहा-अपव्यय अनेक समस्याओं की जड़ है। जब आदमी फिजूलखर्ची करता है, तो खर्च को पूरा करने के लिए रिश्वत लेता है, बेइमानी करता है, चोरी-ठगी करता है और इन सब के पीछे अनेक कुसंस्कार उसके जीवन में प्रवेश कर जाते हैं। उन्होंने कहा कि अपव्यय एक ओछापन है। इससे मनुष्य का व्यक्तित्व धूमिल हो जाता है। जिन्हें अपने व्यक्तित्व की जरा भी चिंता हो वे ढोंग, दिखावा और अपव्यय से बचें।

🔴 प्रवचन क्रम में उनका एक वाक्य था-लोग कमाना तो जानते हैं, पर खर्च करना नहीं जानते। परिणाम यह होता है कि वे जीवन में सुख-शांति के बजाय दुःख और दरिद्रता मोल ले लेते हैं। व्याख्यान समाप्त हो जाने के बाद भी पूज्य गुरुदेव का यह वाक्य मेरे दिमाग पर हथौड़े की तरह चोट करता रहा।

🔵 दोपहर को गुरुदेव से व्यक्तिगत भेंट करने चला। रास्ते में फिजूलखर्ची की अपनी हद से ज्यादा बिगड़ी हुई आदत पर ग्लानि से गड़ा जा रहा था। मालदार बाप का बेटा होने के कारण मैं बचपन से ही खर्चीले स्वभाव का था, ऊपर से फैशन-परस्ती का नशा। सुबह एक ड्रेस पहनता था, तो शाम को दूसरी। चार-छह टाइयों से कम में काम नहीं चलता था। शाही जीवन शैली थी। लेकिन अब मुझे लग रहा था कि पिताजी के पैसे पानी की तरह बहाकर मैंने बहुत बड़ा अपराध किया है। झुका हुआ सिर लेकर मैं गुरुदेव के पास पहुँचा। उन्हें प्रणाम किया और बिना कुछ बोले मन ही मन यह संकल्प कर लिया-‘‘अब तक खाई सो खाई। अब की राम दुहाई’’ अब जीवन में कभी अपव्यय नहीं करूँगा।

🔴 नीचे उतरते ही एक किताब पढ़ने को मिल गई ‘अपव्यय का ओछापन’। गुरुदेव के प्रवचन ने तो पहले से ही दिमाग में हलचल मचा रखी थी, पुस्तक पढ़ने के बाद मैंने अपव्यय पर अंकुश लगाने के लिए योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ने का निश्चय किया। इस संदर्भ में पत्नी से बात की। मेरी पत्नी भी मेरे विचार से सहमत हुईं और हम मुट्ठी भर साधन में बड़ी प्रसन्नता और संतोष के साथ जीवनयापन करने लगे।

🔵 अगर आत्मश्लाघा न कहें तो मैं यह बताता हूँ कि न कोई सिनेमा न कोई होटलबाजी और न कहीं दिखावा। सब छोड़ दिया। धीरे-धीरे हमने अपने जीवन की आवश्यकताएँ इतनी सीमित कर ली थीं, उसे सामान्य दृष्टि से अविश्वसनीय ठहराया जा सकता है। लेकिन इससे हमें जो लाभ हुआ, उसका लेखा-जोखा करना कठिन है। बच्चों के शादी-ब्याह, व्यापार, धन्धा, भोपाल में आलीशान घर ये सब बिना किसी से कोई कर्ज लिए ही बन गया। यह सब अपव्यय न करने का ही परिणाम है। यदि गुरुदेव की वह धारदार प्रेरणा न रही होती, तो सांसारिक दृष्टि से इस सफलता की कल्पना भी नहीं कर सकता था।

🌹 डॉ. आर.पी. कर्मयोगी देवसंस्कृति विश्वशिद्यालय, हरिद्वार (उत्तराखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Wonderful/badali.2

शुक्रवार, 10 मार्च 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 March 2017


👉 आज का सद्चिंतन 11 March 2017


👉 महाकाल ने सुनी माता की उलाहना

🔴 मुझे शादी के सात वर्षों के बाद चार वर्ष के अंतराल पर दो बेटियाँ बड़े ऑपरेशन से हुई थीं और सामाजिक संरचना को देखते हुए मेरी पत्नी एक पुत्र की चाहत में काफी चिंतित रहती थी; क्योंकि उस समय मान्यता थी कि ऑपरेशन के द्वारा तीन बच्चे ही हो सकते हैं। इसलिये मेरी पत्नी सोच में डूबी रहती थी कि अब तो अंतिम चांस है। पता नहीं मुझे पुत्ररत्न की प्राप्ति होगी भी या नहीं। उन्हीं दिनों वह गर्भवती हुई; और इसी दौरान उन्होंने नवंबर १९८९ में षष्ठी व्रत रखा था। षष्ठी व्रत के दूसरे दिन रात्रि में स्वप्न देखती हैं कि बिल्कुल सादे लिबास में एक बूढ़ी औरत कह रही हैं कि तुम चिंतित मत होओ, तुम्हें पुत्र की प्राप्ति होगी।

🔵 एक दो महीने के बाद ही उसे मलेरिया बुखार हो गया। स्थानीय डॉक्टर और हाजीपुर की डॉ० सुचिता चौधरी (स्त्री रोग एवं प्रसूति विशेषज्ञ) ने कहा कि मलेरिया की दवा देने पर गर्भपात होने की प्रबल संभावना है; और अगर ऐसा नहीं होगा तो भी बच्चा विकलांग पैदा होगा। ऐसा सुनते ही मैं पत्नी को लेकर डॉ० सुभद्रा (स्त्री रोग विशेषज्ञ) के यहाँ पटना गया। वहाँ भी वही बात कही गई; परन्तु उन्होंने कहा कि पहले मरीज की जान बचाइए, बाद में बच्चे के लिए प्रयास किया जाएगा। उन्होंने जो दवा दी, उसे हम लोगों ने एक दिन तक उसे नहीं दिया, क्योंकि दवा से होने वाले बच्चे को खतरा है, यह जानने के बाद हमें हिम्मत नहीं हो रही थी कि दवा पिला दूँ। एक दिन तक हमने दवा रोके रखी। मगर रोगी को ठीक होने के लिए दवा तो लेनी ही होगी। दूसरे दिन रात्रि में गुरुजी- माताजी पर ध्यान लगाकर मैंने उसे दवा खिला दी। वह धीरे- धीरे स्वस्थ हो गई।

🔴 समय पूरा होने पर ८ अप्रैल १९९० को पटना की सुप्रसिद्ध चिकित्सक मंजू गीता मिश्रा के यहाँ ऑपरेशन से पुत्र का जन्म हुआ। बच्चा विकलांग तो नहीं हुआ लेकिन बहुत कमजोर था, जिसका वजन मात्र १.६ किलोग्राम ही था। बच्चे को पटना चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल (पी एम० सी एच०) के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ० अरुण ठाकुर की देख- रेख में प्रेमतारा नर्सिंग होम में इलाज हेतु भर्ती कराया। उसके नाक के एक छिद्र में ऑक्सीजन का पाइप तथा दूसरे छिद्र में ग्लुकोन- डी देने के लिये पाइप लगा दिया गया। दिन रात देखने वालों का ताँता लगा रहता था। लोग आश्चर्यचकित थे कि इतना छोटा और कमजोर बच्चा जीवित कैसे है।

🔵 चार- पाँच दिन बीतने के बाद बच्चे को कै (उल्टी) हुई और बच्चे का पूरा शरीर नीला पड़ गया। डॉक्टर ने नर्स को सलाह दी कि उल्टी से पूरी गंदगी निकल नहीं पाई है, उसे मशीन से बाहर निकाल दीजिए। वैसे भी अब मेरे वश में नहीं रह गया इस बच्चे को बचाना। इस बच्चे को अब भगवान ही बचा सकते हैं। इतना सुनते ही मेरी बहन बहुत घबरा गई और दौड़ी- दौड़ी अपनी भाभी के पास गई और उन्हें सब कुछ बता दिया। वह अभी नर्सिंग होम में स्वयं ही नाजुक स्थिति में थी। डॉक्टरों ने सख्त हिदायत दे रखी थी कि उसे किसी प्रकार का सदमा न पहुँचे। बच्चे की स्थिति के बारे में सुनते ही उसने उसी अवस्था में अपने कलेजे में मुक्का मारकर बेड से छलांग लगा दी और गुरु देव को कोसने लगी। वह बोली- हे गुरु देव, जब मुझसे मेरा बच्चा छीन ही लेना था तो बेटा दिया ही क्यों?

🔴 इसके तुरंत बाद बच्चे का शरीर नीला से सामान्य होने लगा और बच्चे में एक विशेष स्फूर्ति पैदा हो गई। इसके बाद वह बच्चा अपने नाक का पाइप बार- बार पकड़कर बाहर निकाल देता था। डॉक्टर का कहना था- बच्चे को कम से कम तीन महीने उस शीशे के बॉक्स में रखना पड़ेगा। बच्चे की स्थिति को देखकर मुझे पूर्ण विश्वास हो गया कि गुरु जी की कृपा से बच्चा अब पूर्ण स्वस्थ हो चुका है। जो बच्चा कुछ ही देर पहले बिल्कुल निस्तेज- निर्जीव पड़ा था वह अपने हाथ से पाइप पकड़कर बाहर निकाल दे- यह अनहोनी गुरु कृपा से ही संभव थी। मैं पूरे आत्मविश्वास के साथ जिम्मेवारी लेते हुए बच्चे को घर ले आया। डॉक्टर ने कहा था- ऐसा करना खतरे से खाली नहीं होगा। पर मुझे ऐसा लगा कि जबरन नाक में पाइप लगाए रखना ही खतरनाक होगा; इसलिए डॉक्टर के नाराज होने पर भी मैं उसे घर ले आया। आज वह बिल्कुल स्वस्थ है।

🌹 वीरेन्द्र कुमार सिंह वैशाली (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Wonderful/mahakal

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 18)

🌹 परिष्कृत प्रतिभा, एक दैवी अनुदान-वरदान  

🔴 वह पौराणिक गाथा स्मरण रखने योग्य है कि सीता हरण के उपरान्त जब रावण को परास्त करने का प्रश्न सामने आया, तो राम के द्वारा भेजा गया निमन्त्रण उन दिनों के राजाओं और सम्बन्धियों तक ने अस्वीकृत कर दिया था, पर सुदृढ़ संकल्पों के अधूरे रहने से तो दिव्य व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगने की स्थिति आती है। वह भी तो अंगीकृत नहीं हो सकती।                 

🔵 ‘जिन खोजा, तिन पाइयाँ’ वाली उक्ति के अनुरूप खोज की गई, तो रीछ-वानरों में से भी ऐसे मनस्वी निकल पड़े, जो आदर्शों के निर्वाह में बड़े-से-बड़ा जोखिम उठाने के लिए तत्परता दिखाने लगे। उनकी एक अच्छी-खासी मण्डली कार्य क्षेत्र में उतरने के लिए कटिबद्ध होकर आगे आ गई। बन्दरों ने लकड़ी-पत्थर एकत्रित किये, रीछों ने इन्जीनियर की भूमिका निभाई और समुद्र पर सेतु बनकर खड़ा हो गया।       

🔴 ईश्वर उन्हीं की सहायता करता है, जो अपनी सहायता आप करते हैं। प्रतिकूलताएँ हटतीं और अनुकूलताएँ जुटती चली गईं। लङ्का विजय और श्रीराम की अवध-वापसी वाली कथा सर्वविदित है। सीता भी अनेक बन्धनों से छुटकारा पाकर वापस आ गईं। यहाँ दो निष्कर्ष निकलते हैं-एक यह कि राम की प्रतिभा पर विश्वास करके वरिष्ठ वानर भी उत्साह और साहस से भर गए थे। अथवा राम दल के मूर्धन्यों ने सामान्य स्तर के वानरों को भी प्राण-चेतना से ओत-प्रोत कर दिया हो और समर्थ व्यक्तियों की एक अच्छी-खासी मण्डली बन गई हो? दूसरी ओर समर्थ शासनाध्यक्ष भी रावण की असमर्थता और अपनी दुर्बलता को देखते हुए डर गए हों और झंझट में पड़ने से डरकर कन्नी काट गए हों?

🔵 निष्कर्ष यही निकलता है कि परिष्कृत प्रतिभा, दुर्बल सहयोगियों की सहायता से भी बड़े-से-भी बड़े काम सम्पन्न कर लेती है जबकि डरकर समर्थ व्यक्ति भी हाथ-पैर फुला बैठते हैं। राणाप्रताप के सैनिकों में अधिकांश आदिवासियों का ही पिछड़ा समझा जाने वाला समुदाय प्रमुख था। लक्ष्मीबाई रानी ने घर के पिञ्जरे में बन्द रहने वाली महिलाओं को भी प्रोत्साहन देकर युद्ध क्षेत्र में वीर सैनिकों की तरह ला खड़ा किया था। रानी लक्ष्मीबाई ने तो अपने समय के दुर्दान्त दस्यु सागर सिंह को लूट-मार करके भागते समय, केवल अपनी सहेली सुन्दर के सहयोग से बन्दी बनाकर दरबार में खड़ा कर दिया था। उनकी मनस्विता के समक्ष उसका सारा दुस्साहस ढह गया। रानी ने अन्तत: उसे अपना सहयोगी बनाकर उसकी प्रतिभा का उपयोग अपनी सेना की शक्ति बढ़ाने में किया।    

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 यह खटकने वाला त्याग का अभाव

🔴 मेरे कुछ मित्र ढाका से लौट रहे थे। मार्ग में वह स्टीमर जिस पर यात्रा हो रही थी, किसी समुद्री चट्टान से टकरा गया और चूर-चूर होकर डूब गया। यात्रा कर रहे तीनों यात्री संकट में पड गए।

🔵 संयोग से एक नाव पास से गुजरी। डूबने वालों ने नाविक को पुकारा पर उसने कतई ध्यान नहीं दिया। डूबने वाले डूबते जाते थे और सहायता की प्रार्थना भी करते जाते थे। जीवन के प्रति प्यार छटपटाता रहा, पर मछुआरों में से कोई भी उनकी सहायता को तत्पर न हुआ, जबकि वे तीनों को बचा सकते थे। आत्म-त्याग का यह अभाव ही तो आज विश्व भर में अशांति, कलह और विद्वेष का कारण है। कदाचित् मनुष्य-मनुष्य के प्रति उत्सर्ग करना जानता तो कितना अच्छा होता ?

🔴 एक दिन और आया, हम एक खाड़ी में नौका-बिहार कर रहे थे। मछुओं ने मछली पकडने के लिये खूँटे गाड रखे थे। हमारी नाव उनसे टकरा गई और डूबने लगी। मछुओं को पुकार लगाई गई पर उनका ध्यान मछली पकडने में लगा था. हमारी कौन सुनता ?

🔵 हमारे मित्र ने कहा-जो हमें बचायेगा हम उसे सौ रुपया देंगे। फिर क्या था सब दौड़े। हाथों-हाथ बचा लिए गए। मछुओं को हमारे प्रति कोई करुणा न थी, कोई दया न थी। सहानुभूति और सेवा का भाव न था। वे सौ के नोट देखकर प्रसन्न हो रहे थे। उनके जीवन में धन ही सब कुछ था।

🔴 एक दिन हम सागर के तट पर खडे सिंधुराज की लहरों का खेल देख रहे थे। प्रकृति में कितनी संवेदना है कि उसका हर कण इतना प्यारा है कि उसे भुलाओ तो भूलता नहीं। पर उससे भी प्यारा है आहत हृदयों की सेवा का भाव, जिसकी शांति के आगे प्रकृति की शांति, सौंदर्य सब कुछ फीका है।

🔵 ऐसा दिखाई दिया कोई स्त्री सागर में डूब रही है। प्रयत्न करने पर उसे बचाया जा सकता था। हृदय ने कहा उछलो और समुद्र में कूद पडो़ तुम्हारे जीवन से किसी जीवन की रक्षा का सुख क्यों न उठाओ ? पर विवशता थी शरीर अशक्त था, हम तैर
नहीं सकते थे।

🔴 कुछ मछुए खड़े थे। हमने कहा भाई जो उस स्त्री को बचायेगा उसे बीस रुपये देंगे। मछुओं ने बिल्कुल ध्यान न दिया। जो मछलियों को मारते हैं उनकी तड़प देखकर भी दया नहीं करते। जीवों से जिन्हें प्रेम नहीं वह मनुष्य से ही कहाँ प्रेम करने लगे ?

🔵 हमने कहा-सौ रुपये देंगे। तब तो उन्हें सौदे में और भी आकर्षण दिखाई दिया। तब वे दौड़े और स्त्री को पानी से निकाल कर लाए। पैसे से मोह हो तो मनुष्य की आत्मा कितना गिर जाती है इसका अनुमान उस दिन हुआ तब से संसार का यह साधन भी तुच्छ लगता है।

🔴 इसी बीच टाइटेनिक जहाज के डूबने की घटना अखबारों मे पढी़। दो हजार यात्रियों को लेकर यह जहाज अटलांटिक महासागर में जा रहा था। एक रात वह ग्लेशियर से टकरा गया और डूबने लगा। उसमें अधिकांश योरोप और अमेरिका के धनी व्यक्ति थे सबने अपने धन और जीवन की चिंता छोड़ दी और सर्व प्रथम स्त्री और बच्चों को बचाने का प्रयत्न किया। इस प्रयत्न में कई लोग डूब भी गये पर अपनी आत्मा के अंदर उन्होंने कोई कमजोरी नहीं आने दी। अपनी आत्मा के आगे उन्होंने अपने आपको कायर नही होने दिया।

🔵 यह समाचार पढ़ता हूँ, याद करता हूँ तो आँखें छलक उठती हैं। सोचता हूँ वह कौन सा दिन होगा, जब इस तरह का प्यार और आत्म-त्याग का भाव मानवीय अंत करणों को छुयेगा।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 75, 76

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 34)

🌹 विचार ही चरित्र निर्माण करते हैं
🔴 चरित्र की रचना संस्कारों के अनुसार होती है और संस्कारों की रचना विचारों के अनुसार। अस्तु आदर्श चरित्र के लिए, आदर्श विचारों को ही ग्रहण करना होगा। पवित्र कल्याणकारी और उत्पादक विचारों को चुन-चुनकर अपने मस्तिष्क में स्थान दीजिये। अकल्याणकर दूषित विचारों को एक क्षण के लिए भी पास मत आने दीजिये। अच्छे विचारों का ही चिन्तन और मनन करिये। अच्छे विचार वालों के संसर्ग करिये। अच्छे विचारों का साहित्य पढ़िये और इस प्रकार हर ओर से अच्छे विचारों से ओत-प्रोत हो जाइये।

🔵  कुछ ही समय में आपके उन शुभ विचारों से आपकी एकात्मक अनुभूति जुड़ जायेगी, उनके चिन्तन-मनन में निरन्तरता आ जायेगी, जिसके फलस्वरूप वे मांगलिक विचार चेतन मस्तिष्क से अवचेतन मस्तिष्क में संस्कार बन-बनकर संचित होने लगेंगे और तब उन्हीं के अनुसार आपका चरित्र निर्मित और आपकी क्रियायें स्वाभाविक रूप से आपसे आप संचालित होने लगेंगी। आप एक आदर्श चरित्र वाले व्यक्ति बनकर सारे श्रेयों के अधिकारी बन जायेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 12)

🌹 अनास्था की जननी-दुर्बुद्धि
🔵 उसे उपहार-मनुहार की टंट-घंट पूरी करके उन लाभों को पाने की प्रतीक्षा की जाने लगती है, जिनके लिये प्रबल पुरुषार्थ और व्यक्ति के उठे हुए स्तर की अपेक्षा की जाती है। समुचित मूल्य न चुकाने पर कोई कीमती वस्तु ऐसे ही तिकड़मबाज़ी के सहारे हाथ कैसे लगे? देखा जाता है कि मनोकामनाओं का पुलिंदा बाँधे फिरने वाले जिस-तिस देवी देवता के पीछे गिड़गिड़ाते फिरने के उपरांत भी खाली हाथ लौटते हैं और विधि-विधान में कोई गलती रहने या पूजा-पाठ को व्यर्थ बताने की नास्तिकों जैसी प्रतिक्रिया व्यक्त करते रहते हैं। आए दिन लाभ मिलते रहने की बात न बनते देखकर उस प्रक्रिया को छोड़ बैठते हैं या जब-तब अनमने मन से लकीर पीट लेते हैं।     

🔴 अच्छा होता अध्यात्म का दर्शन, स्वल्प, उद्देश्य और प्रयोग के संबंध में गहराई में उतरकर जानने का प्रयत्न किया गया होता और पूरा मूल्य देकर असली चीज पाने की मान्यता को बनाया गया होता। तब इस संदर्भ में किसी को कोई शिकायत करने की आवश्यकता न पड़ती। अच्छा होता अध्यात्म का दर्शन, स्वल्प, उद्देश्य और प्रयोग के संबंध में गहराई में उतरकर जानने का प्रयत्न किया गया होता और पूरा मूल्य देकर असली चीज पाने की मान्यता को बनाया गया होता। तब इस संदर्भ में किसी को कोई शिकायत करने की आवश्यकता न पड़ती।  

🔵 कहा जा चुका है कि विश्व के शक्ति-भण्डार में सर्वोपरि आत्मबल है। उसकी तुलना धनबल, शस्त्रबल, सत्ताबल आदि से नहीं हो सकती। वे सभी छोटे और बौने पड़ते हैं। जो कार्य आत्मबल संपन्न कर सके , वे दूसरों से नहीं बन पड़े। पुरुषार्थ का अपना प्रयोजन तो है, पर यदि उसके पीछे आत्मबल का समावेश न हो तो फिर समझना चाहिये कि वह फुलझड़ी की तरह तमाशा मात्र बनकर रह जाएगा। असुरों में से अनेकों ने साधनाबल के सहारे कई प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त कीं, पर वे न तो अधिक समय टिकीं और न अंतत: सुखद परिणाम ही प्रस्तुत कर सकीं।
   
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 16)

🌹 दीक्षा के अंग-उपअंग

🔴 गुरु- दीक्षा के साथ गायत्री मंत्र हमको दिया जाता है और इस ख्याल से दिया जाता है कि इसका जप भी किया जायेगा, ध्यान भी किया जायेगा। जप और ध्यान करने के साथ- साथ में इसके अंदर जो शिक्षण भरा हुआ पड़ा है, जो दिशाएँ भरी हुई पड़ी हैं, उन दिशाओं को भी ध्यान में रखा जायेगा। बस यही गुरुदीक्षा का मतलब है।

🔵 मंत्र दीक्षा- दोनों हाथों के अँगूठे आपस में मिला लिये जाने चाहिए। कंधे और कमर को सीधे रखा जाना चाहिए। अपने अँगूठों के ऊपर निगाह रखी जानी चाहिए और ध्यान किया जाना चाहिए। भगवान् की प्रेरणा और भगवान् का प्रकाश अब हमारे अन्तरंग में आता है। जो आदमी गुरु दीक्षा करायें। मंत्र को स्वयं धीरे- धीरे बोलना चाहिए और जो आदमी बैठे हुए हैं, उनसे दोहराने के लिए कहना चाहिए और यह कहना चाहिए कि आप लोगों को ध्यान सिर्फ अँगूठे पर रखना है और जिस तरीके से कहा जा रहा है, उस तरीके से गायत्री मंत्र कहना चाहिए।

🔴 गुरू- दीक्षा का संस्कार कराने वाले टुकड़े- टुकड़े में गायत्री मंत्र कहें और बाकी लोग जो बैठे हुए हैं, उसको दोहराएँ। ॐ भूर्भुवः  स्वः तत् तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। इतने शब्दों को गुरु- प्रतिनिधि इस तरीके से कहें। उसके बीच में जब रुकने का समय आता है, दूसरे दीक्षा लेने वाले लोग उसको उसी तरीके से दोहराएँ अर्थात् एक टुकड़ा गायत्री मंत्र का दीक्षा संस्कार कराने वाला व्यक्ति कहे और बाकी उसी टुकड़े को उसके बाद के लोग कहें। बस इस तरह से कहने के बाद में जल के छीटे उनके ऊपर लगा दिये जाएँ और यह कहा जाए कि आपके अंदर पाप की जो आग जल रही थी, तृष्णा की जो आग जल रही थी, वासना की जो आग जल रही थी, इन मंत्रों के द्वारा उसको शांत किया जा रहा है।

🔵 पानी के पात्र लेकर के लोग खड़े हो जाएँ और जो व्यक्ति अँगूठे को मिलाए हुए, निगाह लगाये हुए बैठे थे, उन सबके ऊपर जल के छीटे लगाये जाएँ और दीक्षा देने वाला व्यक्ति शांति पाठ करता जाए- ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष œ शान्तिः, पृथिवी शान्तिरापः, शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः, शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः, सर्वœशान्तिः, शान्तिरेव शान्तिः, सा मा शान्तिरेधि ॥ इन मंत्रों के साथ पानी के पात्र लिये हुए लोग पानी के छींटे सब पर लगाते जाएँ और दीक्षा लेने वालों को कहें कि आप हाथ खोल लीजिए, आपकी दीक्षा का कृत्य समाप्त हो गया। ये दीक्षा का कृत्य हुआ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Diksha/d

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 73)

🌹 विचार क्रांति का बीजारोपण पुनः हिमालय आमंत्रण

🔴 ऐसे आयोजन जहाँ-जहाँ भी हुए, बहुत ही सफल रहे, इनके माध्यम से प्रायः एक करोड़ व्यक्तियों ने मिशन की विचारधारा को सुना एवं लाखों व्यक्ति ऐसे थे जिन्होंने अनैतिकताओं, अंध-विश्वासों एवं कुरीतियों के परित्याग की प्रतिज्ञाएँ लीं। इन आयोजनों में से अधिकाँश के बिना दहेज और धूमधाम के साथ विवाह हुए। मथुरा में एक बार और सौ कुण्डीय यज्ञ में 100 आदर्श विवाह कराए गए। तब से ये प्रचलन बराबर चलते आ रहे हैं और हर वर्ष इस प्रकार के आन्दोलन से अनेक व्यक्ति लाभ उठाते रहे हैं।

🔵  सहस्र कुण्डीय यज्ञ से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण प्रसंगों से जुड़े अनेकानेक रहस्यमय घटनाक्रमों का विवरण बताना अभी जनहित में उपयुक्त न होगा। इस काया को छोड़ने के बाद ही वह रहस्योद्घाटन हो, ऐसा प्रतिबन्ध हमारे मार्गदर्शक का है, सो हमने उसे दबी कलम से ही लिखा है। इस महान यज्ञ से हमें प्रत्यक्ष रूप से काफी कुछ मिला। एक बहुत बड़ा संगठन रातों रात गायत्री परिवार के रूप में खड़ा हो गया। युग निर्माण योजना के विचार क्रान्ति अभियान एवं धर्मतंत्र से लोकशिक्षण के रूप में उनकी भावी भूमिका भी बन गई।

🔴 जिन-जिन स्थानों से आए व्यक्तियों ने अपने यहाँ शाखा स्थापित करने के संकल्प लिए, लगभग वहीं दो दशक बाद हमारे प्रज्ञा संस्थान एवं स्वाध्याय मण्डल विनिर्मित हुए। जिन स्थाई कार्यकर्ताओं ने हमारे मथुरा से आने के बाद प्रेस-प्रकाशन, संगठन-प्रचार का दायित्व अपने कंधों पर लिया, वे इसी महायज्ञ से उभरकर आए थे। सम्प्रति शान्तिकुञ्ज में स्थाई रूप से कार्यरत बहुसंख्य स्वयं सेवकों की पृष्ठभूमि में इस महायज्ञ अथवा इसके बाद देश भर में हुए आयोजनों की प्रमुख भूमिका रही है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 74)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू

🔴 पूजा के ६ घंटे, शेष और १८ घण्टों की भरपूर प्रेरणा देते। काम का जो समय रहा उसमें यह लगता रहा कि इष्ट देवता का तेजस् ही अपना मार्गदर्शक है। उनके संकेतों पर ही प्रत्येक क्रिया- कलाप बना और चल रहा है। लालसा और लिप्सा से, तृष्णा और वासना से प्रेरित अपना कोई कार्य हो रहा हो ऐसा कभी लगा ही नहीं। छोटे बालक को माँ जिस तरह उँगली पकड़कर चलाती है, उसी प्रकार दिव्य सत्ता ने मस्तिष्क को पकड़कर ऊँचा सोचने और शरीर को पकड़कर ऊँचा करने के लिए विवश कर दिया।  

🔵 उपासना के अतिरिक्त जाग्रत अवस्था के जितने घण्टे रहे उनमें शारीरिक नित्य कर्मों से लेकर आजीविका, उपार्जन, स्वाध्याय- चिन्तन परिवार व्यवस्था आदि की समस्त क्रियाएँ इस अनुभूति के साथ चलती रहीं मानो परमेश्वर इन सबका नियोजन और संचालन कर रहा हो। रात को सोने के ६ घण्टे ऐसी गहरी नींद में बीतते रहे मानों समाधि लग गई हो और माता के आँचल में अपने को सौंप कर परम शान्ति और सन्तुष्टि की भूमिका आत्मसत्ता से तादात्म्य प्राप्त कर रही हो। सोकर जब उठे तो लगा- नया जीवन, नया उल्लास, नया प्रकाश अग्रिम मार्गदर्शन के लिए पहले से ही पथ प्रदर्शन के लिए पहले से ही पथ प्रदर्शन के लिए सामने खड़ा है। 

🔴 उपासना के अतिरिक्त जाग्रत अवस्था के जितने घण्टे रहे उनमें शारीरिक नित्य कर्मों से लेकर आजीविका, उपार्जन, स्वाध्याय- चिन्तन परिवार व्यवस्था आदि की समस्त क्रियाएँ इस अनुभूति के साथ चलती रहीं मानो परमेश्वर इन सबका नियोजन और संचालन कर रहा हो। रात को सोने के ६ घण्टे ऐसी गहरी नींद में बीतते रहे मानों समाधि लग गई हो और माता के आँचल में अपने को सौंप कर परम शान्ति और सन्तुष्टि की भूमिका आत्मसत्ता से तादात्म्य प्राप्त कर रही हो। सोकर जब उठे तो लगा- नया जीवन, नया उल्लास, नया प्रकाश अग्रिम मार्गदर्शन के लिए पहले से ही पथ प्रदर्शन के लिए पहले से ही पथ प्रदर्शन के लिए सामने खड़ा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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गुरुवार, 9 मार्च 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 March 2017


👉 आज का सद्चिंतन 10 March 2017


👉 तबादला स्थगित हुआ

🔴 सन् १९६५ से मैं अखण्ड ज्योति का सदस्य बना। इसके पश्चात् अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा से पहली बार परम पूज्य गुरु देव के हाथ का लिखा पत्र मिला, जिसमें गुरुदेव ने ‘‘मेरे आत्मस्वरूप’’ करके सम्बोधन किया था। इस पत्र में इतना अपनापन का भाव था कि मन भीग गया और १८ जून १९७१ को मथुरा में गुरुदेव से दीक्षा ले ली। घटना १९७५ की है। मैं रेलवे में सर्विस कर रहा था। मेरी पोस्टिंग लुधियाना में थी। मैं मेकेनिक सिग्नल इंस्पेक्टर के पद पर कार्य कर रहा था। इस सर्विस में तबादला हमेशा ही होता रहता है। इसी क्रम में मेरा तबादला कानपुर में हुआ, जहाँ आधुनिक पावर सिग्नल का काम शुरू करना था। 

🔵 इसके लिए मैं सक्षम नहीं था। इस कार्य का मुझे कोई अनुभव नहीं था। मन बहुत डर रहा था। कहीं कोई गड़बड़ी हो तो नौकरी ही चली जाएगी। मैंने तबादला रुकवाने के लिए काफी प्रयास किया, लेकिन सारे प्रयास बेकार सिद्ध हुए। इसी बीच शान्तिकुञ्ज से जीवन साधना शिविर में सम्मिलित होने के लिए स्वीकृति पत्र मिला, जिसके लिए मैंने पहले ही आवेदन दे रखा था। पत्र मिलते ही निश्चित समय पर शिविर में शामिल होने के लिए मैं शान्तिकुञ्ज पहुँचा।

🔴 शिविर शुरू हो गया था। मैं नियमित दिनचर्या में सम्मिलित होता था। उन दिनों गुरुदेव दोपहर में स्वयं सभी परिजनों से मिलते थे। मैं भी गुरुदेव के पास पहुँचा। कमरे में प्रवेश करते ही गुरुदेव ने बुलाकर पास बिठाया और हाल समाचार पूछे। तबादले को लेकर मेरी दुश्चिन्ता उनसे छिपी नहीं रही। शायद उस समय भी मेरे मुख पर चिन्ता के भाव थे। मैंने स्वयं अपनी समस्या के बारे में नहीं बताया। गुरुदेव ने कहा- बेटा ‘‘तुम कुछ चिन्तित दिखते हो, क्या बात है?’’ मैंने बात टालने की कोशिश की। लेकिन गुरुदेव के बार- बार पूछने पर मैंने बताया कि गुरुदेव! मेरा तबादला कानपुर में हो रहा है। नई सिग्नलिंग पूरी तरह इलेक्ट्रिकल है और सुरक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण भी। इस कार्य को करने का कोई अनुभव भी मेरे पास नहीं है।   मेरी बातों को सुनकर गुरुदेव मुस्कुराए और बड़े ही सहज भाव से बोले कि ‘‘यदि तुम वहाँ नहीं जाना चाहते हो, तो नहीं जाओगे। चिन्ता न करो। तुम शिविर करने आए हो, उसे मन लगाकर करो।’’

🔵 शिविर समाप्त कर जब लुधियाना पहुँचा तो देखा, वहाँ तबादले को लेकर काफी चर्चा छिड़ी हुई थी। मेरे ऑफिस पहुँचते ही साथियों ने सूचना दी कि आपका तबादला स्थगित हो गया है। मुझे विश्वास नहीं हुआ। फिर साथियों ने कहा कि स्वयं चीफ सिग्नल इंजीनियर ने तबादले की लिस्ट मँगाकर आपका नाम काट दिया है। ये शब्द सुनते ही मुझे गुरु देव का सहज भाव से दिया गया आश्वासन याद आया तभी मैंने जाना कि सरकारी मशीनरी भी उनकी इच्छा के ही अधीन है।

🌹 अनिरुद्ध प्र. श्रीवास्तव लखनऊ (उ.प्र.) 
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से


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👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 17)

🌹 प्रतिभा से बढ़कर और कोई समर्थता है नहीं    

🔴 एक सम्भावना यह है कि सञ्चित अनाचारों का विस्फोट इन्हीं दिनों हो सकता है। उसे रोका न गया, तो कोई महायुद्ध भड़क सकता है। बढ़ता हुआ प्रदूषण, भयावह बहुप्रजनन, बढ़ता हुआ अनाचार मिल-जुलकर महाप्रलय या खण्डप्रलय जैसी स्थिति-उत्पन्न कर सकते हैं। उसे रोकने के लिए सशक्त अवरोध चाहिए। ऐसा अवरोध, जो उफनती हुई नदियों पर बाँध बनाकर उस जल-सञ्चय को नहरों द्वारा खेत-खेत तक पहुँचा सके। वह साधारणों का नहीं असाधारणों का काम है।                

🔵 ताजमहल, मिस्र के पिरामिड, चीन की दीवार, पीसा की मीनार, स्वेज और पनामा नहर, हालैण्ड द्वारा समुद्र को पीछे धकेलकर उस स्थान पर सुरम्य औद्योगिक नगर बसा लेने जैसे अद्भुत सृजन-कार्य जहाँ-तहाँ विनिर्मित हुए दीख पड़ते हैं, वे आरम्भ में किन्हीं एकाध संकल्पवानों के ही मन-मानस में उभरे थे। बाद में सहयोगियों की मण्डली जुड़ती गई और असीम साधनों की व्यवस्था बनती चली गई। नवयुग का अवतरण भी इन सबमें बढ़ा-चढ़ा कार्य है, क्योंकि उसके साथ संसार के समूचे धरातल का, जन समुदाय का, सम्बन्ध किसी न किसी प्रकार जुड़ता है। इतने बड़े परिवर्तन एवं प्रयास के लिए अग्रदूत कौन बने? अग्रिम पंक्ति में खड़ा कौन हो? आवश्यक क्षमता और सम्पदा कौन जुटाए? निश्चय ही यह नियोजन असाधारण एवं अभूतपूर्व है। इसे, बिना मनस्वी साथी-सहयोगियों के सम्पन्न नहीं किया जा सकता। विचारणीय है कि उतनी बड़ी व्यवस्था कैसे बने?      

🔴 आरम्भिक दृष्टि से यह कार्य लगभग असम्भव जैसा लगता है, पर संसार में ऐसे लोग भी हुए हैं, जिसने असम्भव को सम्भव बनाया है। आल्पस पहाड़ को लाँघने की योजना बनाने वाले नेपोलियन से हर किसी ने यह कहा था कि जो कार्य सृष्टि में आदि से लेकर अब तक कोई नहीं कर सका, उसे आप कैसे कर लेंगे? उत्तर बड़ा शानदार था। असम्भव शब्द मूर्खों के कोश में लिखा मिलता है। यदि आल्पस ने राह न दी, तो उसे इन्हीं पैरों के नीचे रौंदकर रख दिया जाएगा। अमेरिका की खोज पर निकले कोलम्बस को भी लगभग ऐसा ही उदाहरण प्रस्तुत करना पड़ा।

🔵 समुद्र से अण्डे वापस लेने में असफल होने पर जब टिटहरी ने अपनी चोंच में बालू भरकर समुद्र में डालने और उसे पाटकर समतल बनाने का सङ्कल्प घोषित किया और उसके लिए प्राणों की बाजी लगाने के लिए उद्यत हो गई, तो नियति ने संकल्पवानों का साथ दिया। अगस्त्य मुनि आए, उन्होंने समुद्र पी डाला और टिटहरी को अण्डे वापस मिल गए। फरहाद द्वारा पहाड़ काटकर ३२ मील लम्बी नहर निकालने का असम्भव समझे जाने वाला कार्य सम्भव करके दिखाया गया। इसे ही कहते हैं ‘‘प्रतिभा’’।   

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अपनी तृप्ति को धर्म मत बनाओ

🔵 धर्म का एक निश्चित विश्वास है, पारलौकिक जीवन की सुख-शांति और बंधन, मुक्ति। पर उस विश्वास की पुष्टि कैसे हो, इसके लिए धर्म की एक कसौटी है और वह यह है कि व्यक्ति का प्रस्तुत जीवन भी शांत-बंधनमुक्त, कलह, अज्ञान और अभाव मुक्त होना चाहिए।

🔴 धर्म का पालक बनें किंतु वह विशेषताएँ परिलक्षित न हों तो यह मानना चाहिये, वहाँ धर्म नहीं, अपनी तृप्ति का कोई खिलवाड या षड्यंत्र चल रहा है। आज सर्वत्र ऐसे ही भोंडे धर्म के दर्शन होते हैं। विचारशील व्यक्ति ऐसे धर्म को कभी भी स्वीकार नहीं करते, चाहे उसके लिए कितना ही दबाव पडे़, दुराग्रह हो या भयभीत किया जाए।

🔵 प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक प्लेटो के जीवन की एक महत्त्वपूर्ण घटना है, जब उन्होंने जीवन का संकट मोल लेकर भी इस तरह के अंध-विश्वास का प्रतिवाद किया।

🔴 एक बार नगर के एक देव मंदिर में कोई उत्सव था। नगरवासी प्लेटो को उसमें सम्मिलित होने के लिए सम्मानपूर्वक ले आए। नगरवासियों के प्रेम और आग्रह को प्लेटो ठुकरा न सके उत्सव मे सम्मिलित हुए। वैसे उनका विचार यह था कि इस तरह के उत्सव आयोजनों में किया जाने वाला व्यय मनुष्य के कल्याण में लगना चाहिए। बाहरी टीमराम, दिखावे या प्रदर्शनबाजी में नहीं।

🔵 मंदिर में जाकर एक नया ही दृश्य देखने को मिला। नगरवासी देव प्रतिमा के सामने अनेक पशुओं की बलि चढ़ाने लगे। जो भी आता, एक पशु अपने साथ लाता। देव प्रतिमा के सामने खडा़ कर उस पर तेज अस्त्र से प्रहार किया जाता है। दूसरे क्षण वह पशु तड़पता हुआ अपने प्राण त्याग देता और दर्शक यह सब देखते, हँसते-इठलाते और नृत्य करते।

🔴 जीव मात्र की अंतर्व्यथा की अनुभूति रखने वाले प्लेटो से यह दृश्य देखा न गया। उन्होंने पहली बार धर्म के नाम पर नृशंस आचरण के दर्शन किए। वहाँ दया, करुणा, संवेदना और आत्म-परायणता का कोई स्थान न था।

🔵 वे उठकर चलने लगे। उनका हृदय अंतर्नाद कर रहा था। तभी एक सज्जन ने उनका हाथ पकड़कर कहा- 'मान्य अतिथि आज तो आपको भी बलि चढा़नी होगी, तभी देव प्रतिमा प्रसन्न होगी। लीजिये यह रही तलवार और यह रहा बलि का पशु। वार कीजिए और देव प्रतिमा को अर्ध्यदान दीजिए।''

🔴 प्लेटो ने शांतिपूर्वक थोड़ा पानी लिया। मिट्टी गीली की उसी का छोटा सा जानवर बनाया। देव प्रतिमा के सामने तलवार चलाई और उसे काट दिया और फिर चल पडे घर ओर।

🔵 अंध-श्रद्धालु इस पर प्लेटो से बहस करने लगे- 'क्या यही आपका बलिदान है।'

🔴 हाँ प्लेटो ने शांति से कहा- ''आपका देवता निर्जीव है, निर्जीव भेंट उपयुक्त थी-सो चढा़ दी, वह खा-पी सकता इसलिए उसे मिट्टी चढ़ाना बुरा नहीं।

🔵 उन धर्मधारियों ने प्रतिवाद किया और कहा कि जिन लोगों यह प्रथा चलाई "क्या वे मूर्ख थे, क्या आपका अभिप्राय यह कि हमारा यह कृत्य मूर्खतापूर्ण है ?"

🔴 प्लेटो मुस्कराए, पर उनका अंतर कराह रहा था। जीवन मात्र के प्रति दर्द का भाव अब स्पष्ट ही हो गया। उन्होंने निर्भीक भाव से कहा- ''आप हों या पूर्वज, जिन्होंने भी यह प्रथा चलाई-पशुओं का नहीं, मानवीय करुणा की हत्या का प्रचलन किया है। कृपया देवता को कलंकित करो, न धर्म को। धर्म, दया और विवेक पर्याय है, हिंसा और अंध विश्वास का पोषक नहीं हो सकता।''

🔵 इस प्रश्न का जबाव किसी के पास न था। नगरवासी सिर सुकाए खडे रहे। प्लेटो उनके बीच से चले आए। ऐसे ही धर्म को स्वार्थ-साधन बनाने वालों के पास से परमात्मा भाग जाते हैं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 73, 74

👉 आत्मचिंतन के क्षण 10 March

🔴 महाकवि शेक्सपीयर ने लिखा है- ”दृश्य और अदृश्य का ज्ञान विचारों से होता है, संसार में अच्छा या बुरा जो कुछ भी है, वह विचारों की ही देन है।” इससे दो बातें समझ में आती हैं। एक तो यह कि संसार का यथार्थ ज्ञान पैदा करने के लिए विचार शक्ति चाहिये। दूसरे, अच्छी परिस्थितियाँ, सुखी जीवन और सुसंस्कृत समाज की रचना के लिये स्वस्थ और नवोदित विचार चाहिये। यह जो रचना हम करते रहते हैं, उसकी एक काल्पनिक छाया हमारे मस्तिष्क में आती रहती है, उसी को क्रियात्मक रूप दे देने से अच्छे-बुरे परिणाम सामने आते हैं।

🔵 मनुष्य जब तक साँसारिक अभिमान में भूला रहता है तब तक उसकी शक्ति और सामर्थ्य बिल्कुल तुच्छ और नगण्य होती है। जीवन के सारे अधिकार जब ईश्वर के हाथ सौंप देते हैं तो पूर्ण निश्चिन्तता आ जाती है। कोई भय नहीं, कोई आकाँक्षा नहीं। न कुछ दुःख और न ही किसी प्रकार का सुख शेष रहता है। पूर्ण तृप्ति और अलौकिक आनन्द की अनुभूति तब होती है जब जीवन की बागडोर परमात्मा को सौंप देते हैं। तब उसे बुलाना भी नहीं पड़ता। वह स्वयं ही आकर पहरेदारी करते हैं। भक्त के प्रत्येक अवयव में स्थित होकर अपना कार्य करने लगते हैं। इस स्थिति को ही पूर्ण समर्पण कहते हैं।

🔴 सत्कर्म दिखावे के लिये ही न करें। उनके प्रति हमारी गहन निष्ठा भी होनी चाहिये। ईश्वर के प्रति जितना अधिक विश्वास होगा उतना ही अधिक सत्कर्मों में प्रीति बनी रहेगी। जब भी कभी उसे भूल जाते हैं तभी दुष्कर्म बन पड़ते हैं। ईश्वर के प्रति प्रगाढ़ आस्था रखेंगे तभी कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सत्कर्म और कर्त्तव्य-पालन से विचलित न होंगे। प्रलोभनों में वही फँसते हैं जिनका ईश्वर-विश्वास डगमगाता रहता है, पर जिसने चिन्तन-मनन और विचार द्वारा हृदय-आत्मा से ईश्वरीय स्थिति को स्वीकार कर लिया है उससे भूलकर भी कोई ऐसा कार्य न होगा जिससे किसी को कष्ट पहुँचता हो।
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 33)

🌹 विचार ही चरित्र निर्माण करते हैं

🔴 धर्म-कर्म और विरक्ति भाव में रुचि होने पर भी भोग वासनायें उनका साथ नहीं छोड़ पातीं। विचार जब तक संस्कार नहीं बन जाते मानव-वृत्तियों में परिवर्तन नहीं ला सकते। संस्कार रूप भोग वासनाओं से छूट सकना तभी सम्भव होता है जब अखण्ड प्रयत्न द्वारा पूर्व संस्कारों को धूमिल बनाया जाये और वांछनीय विचारों का भावनात्मक अनुभूति के साथ, चिन्तन-मनन और विश्वास के द्वारा संस्कार रूप में प्रौढ़ और परिपुष्ट किया जाय। पुराने संस्कारों की रचना परमावश्यक है।

🔵 चरित्र मानव-जीवन की सर्वश्रेष्ठ सम्पदा है। यही वह धुरी है, जिस पर मनुष्य का जीवन सुख-शान्ति और मान-सम्मान की अनुकूल दिशा अथवा दुःख-दारिद्रय तथा अशान्ति, असन्तोष की प्रतिकूल दिशा में गतिमान होता है। जिसने अपने चरित्र का निर्माण आदर्श रूप में कर लिया उसने मानो लौकिक सफलताओं के साथ पारलौकिक सुख-शान्ति की सम्भावनायें स्थिर कर लीं और जिसने अन्य नश्वर सम्पदाओं के माया-मोह में पकड़कर अपनी चारित्रिक सम्पदा की उपेक्षा कर दी उसने मानो लोक से लेकर परलोक तक के जीवन पथ में अपने लिए नारकीय प्रभाव प्रबन्ध कर लिया।

🔴 यदि सुख की इच्छा है तो चरित्र का निर्माण करिये। धन की कामना है तो आचरण ऊंचा करिये, स्वर्ग की वांछा है तो भी चरित्र को देवोपम बनाइये और यदि आत्मा, परमात्मा अथवा मोक्ष मुक्ति की जिज्ञासा है तो भी चरित्र को आदर्श एवं उदात्त बनाना होगा। जहां चरित्र है वहां सब कुछ है, जहां चरित्र नहीं वहां कुछ भी नहीं। भले ही देखने-सुनने के लिए भण्डार के भण्डार क्यों न भरे पड़े हों।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 11)

🌹 अनास्था की जननी-दुर्बुद्धि

🔵 भ्रांतियों का स्वरूप समझ लेने के उपरांत यह भी आवश्यक है कि उसका समाधान भी समझा जाए और यह जानने का प्रयत्न किया जाए कि वह वास्तविकता क्या है, जिसकी आड़ लेकर धुएँ का बादल बनाकर खड़ा कर दिया गया।    

🔴 समझा जाना चाहिये कि संसार के दृश्यमान जड़-पदार्थों के साथ-साथ ऐसी एक सर्वव्यापी नियामक सत्ता भी है, जो इस आश्चर्य भरे ब्रह्माण्ड को बनाने से लेकर और भी न जाने क्या-क्या बनाती रहती है।  

🔵 असल की नकल इन दिनों खूब चल पड़ी है। नकली चीजें सस्ती भी होती हैं। चलती भी अधिक हैं और बिक्री भी उन्हीं की अधिक होती देखी जाती है। नकली सोने के, नकली चाँदी के जेवरों की दुकानों में भरमार देखी जाती है। नकली हीरे-मोती भी खूब बिकते हैं। नकली रेशम, नकली दाँत अधिक चमकते हैं। नकली घी से दुकानें पटी पड़ी हैं। नकली शहद सस्ते भाव में कहीं भी मिल सकता है, पर वह वस्तुएँ ऐसे चमकीली होते हुए भी असली जैसा सम्मान नहीं पातीं। बेचने पर कीमत भी नहीं उठती। अध्यात्म का नकलीपन भी बहुत प्रचलित हुआ है। 
   
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 15)

🌹 द्विज का अर्थ - मर्म समझें

🔴 कोई सामान्य मनुष्य ब्रह्मा कैसे हो सकता है? कोई सामान्य मनुष्य विष्णु कैसे हो सकता है? कोई सामान्य मनुष्य महेश कैसे हो सकता है? इतनी जो महत्ता और महिमा बताई गई है, वह अंतरंग में बैठे हुए उस भगवान् के लिए है। सद्गुरु शब्द केवल भगवान् के लिए काम आता है, मनुष्यों के लिए नहीं आता। गुरु तो जरूर मनुष्यों के लिए आता है, लेकिन सद्गुरु सम्बोधन कभी मनुष्य के लिए काम में नहीं आ सकता, वह सिर्फ भगवान् के लिए काम आयेगा। उस भगवान् के लिए जो हमारे अन्तरंग में बैठा हुआ प्रेरणा दिया करता है।

🔵  सद्गुरु के साथ अपनी जीवात्मा का सम्बन्ध जोड़ लेना- यही गुरु दीक्षा है। गुरु दीक्षा जब होती है, तो हमको  गायत्री मंत्र दिया जाता है। ये सिम्बल है, ये सहारा है। पहाड़ पर चढ़ने के लिए हाथ में लाठी जिस तरीके से दी जाती है, उस तरीके से ये लाठी है- महानता के मार्ग पर चलने के लिए। गायत्री मंत्र की शिक्षाओं में कितना मूल्य भरा हुआ है। मनुष्य को सविता के समान तेजस्वी होना चाहिए और वरेण्य- श्रेष्ठ होना चाहिए, ऐसी कितनी विशेषता उसमें भरी पड़ी है। अंत में ये कहा गया है- धियो यो नः प्रचोदयात्। इनसान की इस दुनिया में अक्ल को बहकाने वाले बहुत साधन भरे पड़े हैं।

🔴 हमारे कुटुम्बी हमारी अक्ल को बहकाते हैं और हमारे खानदान वाले हमारी अक्ल को बहकाते हैं और हमारे लोग ही हमारी अक्ल को बहकाते हैं और समाज के लोग अक्ल को बहकाते हैं। जितनी भी दुनिया में चालाकियाँ और जाल भरे पड़े हैं, आदमी की अक्ल को बहकाते हैं। अक्ल को बहकाया नहीं जाना चाहिए। इस तरह का शिक्षण, इस तरह का इशारा, इस तरह का सिगनल और इस तरह का जिस मंत्र के द्वारा, जिस प्रेरणा के द्वारा, जिस प्रकाश के द्वारा, हमको मार्गदर्शन दिया गया है, उसका नाम गायत्री मंत्र है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 72)

🌹 विचार क्रांति का बीजारोपण पुनः हिमालय आमंत्रण

🔴 मथुरा से ही उस विचार क्रान्ति अभियान ने जन्म लिया, जिसके माध्यम से आज करोड़ों व्यक्तियों के मन-मस्तिष्कों को उलटने का संकल्प पूरा कर दिखाने का हमारा दावा आज सत्य होता दिखाई देता है। सहस्र कुण्डीय यज्ञ तो पूर्वजन्म से जुड़े उन परिजनों के समागम का माध्यम था, जिन्हें भावी जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी थी। इस यज्ञ में एक लाख से भी अधिक लोगों ने समाज से, परिवार से एवं अपने अंदर से बुराइयों को निकाल फेंकने की प्रतिज्ञाएँ लीं। यह यज्ञ नरमेध यज्ञ था। इनमें हमने समाज के लिए समर्पित लोकसेवियों की माँग की एवं समयानुसार हमें वे सभी सहायक उपलब्ध होते चले गए। यह सारा खेल उस अदृश्य बाजीगर द्वारा सम्पन्न होता ही हम मानते आए हैं, जिसने हमें माध्यम बनाकर समग्र परिवर्तन का ढाँचा खड़ा कर दिखाया।

🔵 मथुरा में ही नैतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक क्रान्ति के लिए गाँव-गाँव आलोक वितरण करने एवं घर-घर अलख जगाने के लिए सर्वत्र गायत्री यज्ञ समेत युग निर्माण सम्मेलन के आयोजनों की एक व्यापक योजना बनाई गई। मथुरा के सहस्र कुण्डीय यज्ञ के अवसर पर जो प्राणवान व्यक्ति आए थे, उन्होंने अपने यहाँ एक शाखा संगठन खड़ा करने और एक ऐसा ही यज्ञ आयोजन का दायित्व अपने कंधों में लिया या कहें कि उस दिव्य वातावरण में अन्तःप्रेरणा ने उन्हें दायित्व सौंपा ताकि हर व्यक्ति न्यूनतम एक हजार विचारशील व्यक्तियों को अपने समीपवर्ती क्षेत्र में से ढूँढ़कर अपना सहयोगी बनाए।

🔴 आयोजन चार-चार दिन के रखे गए। इनमें तीन दिन तीन क्रान्तियों की विस्तृत रूपरेखा और कार्य पद्धति समझाने वाले संगीत और प्रवचन रखे गए। अंतिम चौथे दिन यज्ञाग्नि के सम्मुख उन लोगों से व्रत धारण करने को कहा गया, जो अवांछनीयता को छोड़ने और उचित परम्पराओं को अपनाने के लिए तैयार थे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 73)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू

🔴 गायत्री माता का परम तेजस्वी प्रकाश सूक्ष्म शरीर में- अंत:करण में- मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार में प्रवेश करते और प्रकाशवान होते देखा तथा अनुभव किया कि ब्रह्मवर्चस अपने मन को उस भूमिका में घसीटे लिए जा रहा है जिसमें पाशविक इच्छा आकाँक्षाएँ विरत हो जाती हैं और दिव्यता परिप्लावित करने वाली आकांक्षाएँ सजग हो उठती हैं। बुद्धि निर्णय करती है कि क्षणिक आवेशों के लिए, तुच्छ प्रलोभनों के लिए मानव जीवन जैसी उपलब्धि विनष्ट नहीं की जा सकती। इसका एक- एक पल आदर्शों की प्रतिष्ठापना के लिए खर्च किया जाना चाहिए। चित्त में उच्च निष्ठाएँ जमानी और सत्यम्- शिवम् कि ओर बढ़ चलने की उमंगें उत्पन्न करनी हैं। सविता देवता का तेजस अपनी अन्त:भूमिका में प्रवेश करके "अहं'' को परिष्कृत करता है। मरणधर्मा जीवधारियों की स्थिति से योजनों ऊपर उड़ा ले जाकर ईश्वर के सर्व समर्थ, परम पवित्र और सच्चिदानन्द स्वरूप में अवस्थित कर देता है।

🔵 गायत्री पुरश्चरणों के समय केवल जप ही नहीं किया जाता रहा, साथ ही भाव तरंगों से मन भी हिलोरें लेता रहा। कारण शरीर भावभूमि का अन्त:स्थल के आत्मबोध, आत्म दर्शन, आत्मानुभूति और आत्म विस्तार की अनुभूति अन्तर्ज्योति के रूप में अनुभव किया जाता रहा। लगा अपनी आत्मा परम तेजस्वी सविता देवता के प्रकाश में पतंगों के दीपक पर समर्पित होने की तरह विलीन हो गयी। अपना अस्तित्व समाप्त, उसकी स्थान पूर्ति परम तेजस् व्दारा। मैं समाप्त- सत् का आधिपत्य्। आत्मा और परमात्मा के अव्दैत मिलने की अनुभूति में ऐसे ब्रह्मानन्द की सरसता की क्षण- क्षण अनुभूति होती रही जिस पर संसार भर का समवेत विषयानन्द निछावर किया जा सकता है। 

🔴 जप के साथ स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीरों में दिव्य प्रकाश की प्रतिष्ठापना का आरम्भ प्रयत्न पूर्वक धारण के रूप में की गई थी। पीछे वह स्वाभाविक प्रकृति बनी और अन्तत: प्रत्यक्ष अनुभूति बन गई। जितनी देर उपासना में बैठा गया- अपनी सत्ता के भीतर और बाहर परम तेजस्वी सविता की दिव्य ज्योति का सागर लहलहाता रहा और यही प्रतीत होता रहा कि हमारा अस्तित्व इस दिव्य ज्योति से ओतप्रोत हो रहा है। प्रकाश के अतिरिक्त अंतरंग और बहिरंग में और कुछ है ही नहीं। प्राण के हर स्फुरण में ज्योति स्फुल्लिंगों के अतिरिक्त कुछ बचा ही नहीं। इस अनुभूति ने कम से कम पूजा के समय की अनुभूति को दिव्य दर्शन अनुभव से ओतप्रोत बनाए ही रखा। साधना का प्राय: सारा समय इसी अनुभूति के साथ बीता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamari_jivan_saadhna.3

बुधवार, 8 मार्च 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 09 March 2017


👉 आज का सद्चिंतन 09 March 2017


👉 कलियुग के सूर को मिले भगवान

🔴 तब मेरी उम्र करीब ७ वर्ष की रही होगी। मेरी आँखों में बहुत दर्द शुरू हुआ, इसी दौरान मेरी आँखों की रोशनी बिल्कुल जाती रही और कुछ ही दिनों में मेरे लिए यह दुनिया पूरी तरह अँधेरी हो गई। बचपन से ही शिक्षा के प्रति मेरा रुझान था। माँ सरस्वती की कृपा से मेरे विद्याध्ययन में रोशनी का अभाव कभी बाधक नहीं बना।  शिक्षा प्राप्ति के बाद मैं शासकीय माधव संगीत महाविद्यालय ग्वालियर में लेक्चरर नियुक्त हो गया। वहाँ मैं संगीत की क्लास लेता था। क्लास शाम ५ बजे से ८ बजे तक लगती थी।

🔵 अगस्त सन् ७८ की बात है। गर्मी का समय था, पर बारिश के कारण मौसम ठण्डा हो चला था। शाम की ठण्डी- ठण्डी हवा और गुनगुनी धूप से तीसरी मंजिल का वह कमरा काफी आरामदायक लग रहा था। थोड़ी देर में बच्चे आ गए। कक्षा आरंभ हुई। अभी ५ मिनट ही हुए होंगे कि सभी लड़कियाँ एकदम से चुप हो गईं। पूरे क्लास में अचानक सन्नाटा छा जाने पर मैंने पूछा क्या हुआ? चुप क्यों हो गईं? पर किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। मेरे दुबारा पूछने पर उनमें से एक लड़की ने कहा- सर ‘‘उत्तर दिशा की ओर से दो फूल उड़ते हुए चले आ रहे हैं।’’ मैंने सोचा इसमें देखने की क्या बात है? कोई बड़ा सा पेड़ होगा, उसी पेड़ के फूल टूट कर गिर रहे होंगे। मैंने उनसे कहा भी कि हवा चल ही रही है, जिससे फूल गिर कर उड़ रहे होंगे।

🔴 मेरी इन बातों का लड़कियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उनमें से एक लड़की ने कहा कि नहीं सर वे फूल भागते हुए बम के गोले की तरह से इधर ही चले आ रहे हैं। मैंने सोचा कि मुझे दिखाई नहीं पड़ रहा है इसलिए ये लड़कियाँ मुझे बेवकूफ बना रही हैं। उनमें से एक गंभीर लड़की ‘कल्पना’ ने कहा- हाँ सर सचमुच फूल आ रहे हैं। इतने में फूल अन्दर आकर मेरी गोद में गिर पड़े। मैंने उन फूलों को उठाकर अपनी जेब में रख लिया। कक्षा समाप्त होने के पश्चात् भोजन किया और बिस्तर पर चला गया। तब तक मैं उन फूलों की बात बिल्कुल भूल चुका था। मैं सोने की कोशिश कर रहा था। अचानक मेरी ऐसी इच्छा हुई कि मैं हरिद्वार जाऊँ और गंगा स्नान कर आऊँ। ये बातें उस समय की है जब मैं गुरु देव एवं मिशन के बारे में कुछ नहीं जानता था। गायत्री मन्त्र का नाम तक नहीं सुना था।

🔵 मैंने तीन- चार दिन की छुट्टी ली और हरिद्वार के लिए रवाना हुआ। रात के तीन बज रहे थे। हरिद्वार स्टेशन पहुँच गया। मेरे एक हाथ में अटैची और एक हाथ में डंडा था। मैं डंडे के सहारे स्टेशन के बाहर आया तो एक ऑटो वाला मिला और बोला- भाई साहब शान्तिकुञ्ज चलिए, वहाँ रहने और खाने पीने की व्यवस्था हो जाएगी। मैंने सोचा यह मुझे बेवकूफ बना रहा है। मैंने कहा- मुझे शान्तिकुञ्ज नहीं जाना है। मुझे गंगा स्नान करके ग्वालियर वापस जाना है। मैं जैसे- जैसे मना करता, ऑटो वाला उतना ही पीछे पड़ता गया। अन्ततः मैंने ढाई रुपये किराया तय कर लिया और शान्तिकुञ्ज पहुँच गये। वहाँ पहुँचकर स्नान- भोजन वगैरह करके विश्राम करने लगा। पहले दिन सफर की थकावट थी इसलिए शाम को जल्दी ही सो गया।

🔴 रात को ११ बजे मेरी नींद खुल गई, तो उठकर नहा- धोकर रात १२ बजे ही मैं माला लेकर बैठ गया। उस समय मैं शिव भक्त था। शिव जी के मंत्र के अतिरिक्त मुझे दूसरा कोई मंत्र नहीं आता था। लेकिन मैं जब मंत्र जप करने बैठा तो यह क्या! शिव मंत्र की जगह पर मेरे मुँह से ‘ॐ भूः, ॐ भूः, ॐ भूः’ निकलने लगा। सवेरे ६ बजे तक माला जपता रहा पर ग्यारह माला ही कर सका! मैंने सोचा- हे भगवान, यह क्या? छः घण्टे में मैं ११ माला ही कैसे कर पाया; जबकि सैकड़ों माला हो जाना चाहिए। दोपहर को भोजन विश्राम के बाद लोगों ने मुझसे कहा कि चलो गुरुजी के प्रवचन में। उस समय गुरु जी के महत्त्व के बारे में जानता भी नहीं था। सभी लोग जा रहे थे अतः मैं भी चला गया। प्रवचन के दौरान गुरु जी ने टेबल पर अपने हाथ को पटक कर जोर से कहा, ११ माला से क्या होता है, नाश्ता भी नहीं होता। यह बात उन्होंने तीन बार कहीं। मुझे आश्चर्य हो रहा था। कहीं ये शब्द मेरे लिए तो नहीं! लेकिन इन्हें कैसे पता चला! प्रवचन समाप्त होने के बाद भी मैं सोचता रहा। याद आया कोई एक भाई कह रहे थे- गुरु जी महाकाल के अवतार हैं। यहाँ कोई अपनी मर्जी से नहीं आता। जिसे वे बुलाते हैं, वही आता है। मेरे रोम- रोम ने इसकी सच्चाई को स्वीकारा। याद आई वो फूलों वाली घटना, फिर अचानक हरिद्वार आना, स्टेशन पर ऑटो वाले की जिद। मैं अन्तर तक रोमांचित हो उठा।

🔵 तीन दिन किस तरह बीत गए, कुछ पता ही नहीं चला। अनमने भाव से मैं वापस भी आ गया। फिर पहले की तरह संगीत की कक्षा लेने लगा। लेकिन सब कुछ पहले जैसा नहीं हुआ। ऐसा लगता जैसे कुछ महत्वपूर्ण चीज छूट गई हो। इसके बाद कई बार शान्तिकुञ्ज आया। गुरु देव और माताजी का स्नेह पाकर मुझे लगता था जैसे जन्म- जन्म के माता पिता मिल गए हों। पर एक प्रश्र हमेशा साथ लगा रहा- गुरु देव ने मुझे प्रयत्नपूर्वक बुलाया तो आखिर क्यों? इसका जवाब सन् १९८४ में मिला।

🔴 मैं नौ दिवसीय संजीवनी साधना सत्र करने शान्तिकुञ्ज आया था। इसी दौरान एक दिन मुझे साँप ने काट लिया, मेरा पैर खूब फूल गया, चलना- फिरना मुश्किल हो गया। ऐसा लग रहा था जैसे चारों ओर अँधेरा छाता जा रहा हो। धीरे- धीरे चेतना लुप्त होती चली गई। साथियों से पता- चला कि मेरे बेहोश होने के बाद डॉक्टर ने होश में लाने के लिए इंजेक्शन दिया था। जब पर्याप्त समय बीत जाने के बाद भी होश नहीं आया तो घबराकर लोगों ने गुरु देव को जाकर बताया। साथ में डॉक्टर भी थे। गुरु देव ने डॉक्टरों से कहा- अभी उठ जाएगा। उसे एक इंजेक्शन और लगाओ। और वास्तव में दूसरे इंजेक्शन से मुझे होश आ गया। अब मैं समझा मुझे अपने पास बुलाने का उनका यही उद्देश्य था कि मुझे असमय मृत्यु के हाथ से बचाया जाये और आगे का मेरा जीवन युग निर्माण के कार्य में लग सके। उनकी असीम कृपा को नमस्कार करता हूँ।

🌹 देवीदयाल वैश्य ग्वालियर (मध्यप्रदेश) 
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 16)

🌹 प्रतिभा से बढ़कर और कोई समर्थता है नहीं    

🔴 विशिष्ट पुरुषार्थ का परिचय देने के उपरान्त ही पुरस्कार मिलते हैं। परिष्कृत प्रतिभा ऐसी सम्पदा है, जिसकी तुलना में मनुष्य को गौरवान्वित करने वाला और कोई साधन है नहीं। उसे प्राप्त करने के लिए यह सिद्ध करने की आवश्यकता है कि मानवी गरिमा को गौरवान्वित करने वाली धर्म-धारणा के क्षेत्र में कितनी उदारता और कितनी सेवा-साधना का परिचय देने का साहस जुटा पाया।                 

🔵 दूसरों के हाथ रचाने के लिए, मेंहदी के पत्ते पीसने पर अपने हाथ स्वयमेव लाल हो जाते हैं। समय की माँग के अनुरूप पुण्य-परमार्थ का परिचय देने वालों को भी सदा नफे में ही रहने का सुयोग मिलता है। बाजरा, मक्का आदि का बोया हुआ एक दाना हजार दाने से लदी बाल बनकर इस तथ्य को प्रमाणित और परिपुष्ट करता है। भगवान के बैंक में जमा की हुई पूँजी इतने अधिक ब्याज समेत वापस लौटती है, जितना लाभ अन्य किसी व्यवसाय या पूँजी-निवेश में कदाचित् ही हस्तगत होती हो।       

🔴 किसी की वरिष्ठता उसके पारमार्थिक पौरुष के आधार पर ही आँकी जाती है। श्रेष्ठों-वरिष्ठों का आँकलन इसी एक आधार पर होता रहा है। साथ ही यह भी विश्वास किया जाता है कि बड़े कामों को सम्पन्न करने में उन्हीं की मनस्विता काम आती है। पटरी पर से उतरे इंजन को उठाकर फिर उसी स्थान पर रखने के लिए मजबूत और बड़ी क्रेन चाहिए। उफनती नदी में जब भँवर पड़ते रहते हैं, तब बलिष्ठ नाविकों के लिए ही यह सम्भव होता है कि वे डगमगाती नाव को खेकर पार पहुँचाएँ। समाज की सुविस्तृत, संसार की उलझन भरी बड़ी समस्याओं को सही तरह सुलझा सकना, उन साहसी और मेधावीजनों से ही बन पड़ता है, जिन्हें दूसरे शब्दों में प्रतिभावान भी कहा जा सकता है। युग परिवर्तन जैसे महान प्रयोजनों को हाथ में लेने के लिए अपनी साहसिकता का गौरवभरी गरिमा का परिचय दे सकने वाले व्यक्ति चाहिए। आड़े समय में ऐसे ही प्रखर प्रतिभावानों को खोजा, उभारा और खरादा जाना है।    

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 निर्धनता से प्यार

🔵 संत फ्रांसिस एक धनवान् पिता के पुत्र थे। उनके यहाँ कपडे का बड़ा व्यापार होता था। अपने प्रारंभिक जीवन मे फ्रांसिस बडी शान से रहते थे। अच्छा-अच्छा खाते और कीमती कपडे पहनते थे। पर बाद में उनका हृदय ऐसा बदला कि उन्हें गरीबी से प्रेम हो गया। उन्होंने सब कुछ त्याग दिया और गरीबों की सेवा में लग गए।

🔴 एक बार एक भिखारी उनकी दुकान पर आया और बोला-भाई, मुझे कुछ खाने- पहनने को दो, मैं बहुत भूखा हूँ और जाड़े से मर रहा हूँ। फ़ांसिस को उसकी दशा पर बडी़ दया आई और उन्होंने उस गरीब को खाना खिलवाया और तन ढकने के लिये कपडा दिया। जब उनके पिता को इस बात का पता चला तो वे फ्रांसिस से बहुत बिगडे और बोले-धन इसलिए नहीं है कि वह इस तरह भिखमंगों को लुटा दिया जाए। संत फ्रांसिस को पिता की इस बात से बड़ा दुःख हुआ। वे सोचने लगे-वह धन यो बेकार की ही चीज है, जो गरीबों और असहायों की मदद करने में नहीं लगाया जा सकता। जब हजारों लोग हमारे सामने ही भूखों मर रहे हैं और नंगे रघूम हे हैं, तो हमें इस प्रकार धन जमा रखकर धनवान बने रहने का क्या अधिकार ? उन्हें धन से घृणा हो गई और वे शान-शौकत छोडकर सादे ढंग से रहने लगे।

🔵 एक बार फ्रांसिस घोड़े पर चढे़ हुए कहीं जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक कोढ़ी दिखाई दिया। वह नंगा पडा पीड़ा से कराह रहा था। पहले तो उसकी दशा देखकर, उन्हें बडी घृणा हुई। पर तत्काल ही उनकी आत्मा ने कहा- 'धिक्कार है फ्रांसिस! जिसकी तुम्हें मदद करनी चाहिए, उसे देखकर तुम घृणा करते हो।'' उनकी मनुष्यता जाग उठी। वे तत्काल घोड़े से उतरे। कोढी को गले लगाया और सेवा से उसका कष्ट दूर किया। अपने पास के कपडे और पैसे उसे दे दिए।

🔴 इस उपकार से फ्रांसिस की आत्मा बडी़ करुण हो गई और निर्धनता के प्रति उनका प्रेम जाग उठा। वे दिन रात गरीबों की चिंता में रहने लगे। एक दिन उन्हें चिंतित देखकर, उनके एक मित्र ने कहा-''भाई आजकल बडे विचारशील बने रहते हो, क्या विवाह करने का विचार कर रहे हो ?'' फ्रांसिस ने उत्तर दिया- विचार तो कुछ ऐसा ही है। एक बडी़ सुंदर स्त्री से विवाह का विचार है। बताओ वह स्त्री कौन है "मित्र ने कहा-" "कोई भी हो, होगी बड़ी भाग्यवान्। बताओ वह कौन है ?'' फ्रांसिस ने कहा- "उस सुंदर देवी का नाम है निर्धनता।" मैं उसी से विवाह करने का विचार कर रहा हूँ। फ्रांसिस ने अपने विचार को चरितार्थ किया और न केवल निर्धनता ही स्वीकार कर ली बल्कि निर्धनों महान् सेवक बन गए।

🔵 फ्रांसिस एक बार गिरजाघर में प्रार्थना करने गए। गिरजाघर बड़ा टूटा-फूटा था। भगवान् के घर की यह दशा देखकर उन्हें बडा दुःख हुआ। वे घर आए और कपडे की कई गाठे और अपना घोड़ा बेच डाला। उसका सारा पैसा ले पाकर पुजारी  को गिरजाघर की मरम्मत के लिये दे दिया।

🔴 पिता को पता चला तो उन्होने फ्रांसिस को बहुत मारा और विशप के पास ले जाकर कहा कि यह लड़का मेरा धन बरबाद किये जा रहा है, मैं इसे अपनी संपत्ति से वंचित कर चाहता हूँ।

🔵 पिता की बात सुनकर फ्रांसिस खुशी से उछल पडे़, बोले-आपने मुझे एक बहुत बडे मोह-बंधन से मुक्त कर दिया है। मैं स्वयं ही उस संपत्ति को दूर से प्रणाम करता हूँ, जो 'परमार्थ और परोपकार में काम नहीं आ सकती।' इतना कहकर उन्होंने कपडे तक उतारकर रख दिए और एक चोगा पहन चले गए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 71, 72

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 32)

🌹 विचारशील लोग दीर्घायु होते हैं

🔴 विचारों के विपरीत कार्य हो जाने का रहस्य यही होता है कि मनुष्य की क्रिया प्रवृत्ति पर संस्कारों का प्रभाव रहता है और गुप्त मन में छिपे रहने से उनका पता नहीं चल पता। संस्कार विचारों को व्यर्थ कर अपने अनुसार मनुष्य की क्रियायें प्रेरित कर दिया करते हैं। जिस प्रकार पानी के ऊपर दीखने वाले छोटे से कमल पुष्प का मूल पानी के तल में कीचड़ में छिपा रहने से नहीं दीखता, उसी प्रकार परिणाम रूप क्रिया का मूल संस्कार अवचेतन मन में छिपा होने से नहीं दीखता।

🔵 कोई-कोई विचार ही तात्कालिक क्रिया के रूप में परिणित हो पाता है अन्यथा मनुष्य के वे ही विचार क्रिया के रूप में परिणत होते हैं, जो प्रौढ़ होकर संस्कार बन जाते हैं। ये विचार जो जन्म के साथ ही क्रियान्वित हो जाते हैं, प्रायः संस्कारों के जाति की ही होते हैं। संस्कारों से भिन्न तात्कालिक विचार कदाचित् ही क्रिया के रूप में परिणत हो पाते हैं बशर्ते कि वे संस्कार के रूप में परिपक्व न हो गये हों। वे संतुलित तथा प्रौढ़ मस्तिष्क वाले व्यक्ति अपने अवचेतन मस्तिष्क को पहले से ही उपयुक्त बनाये रहते हैं, जो अपने तात्कालिक विचारों को क्रिया रूप में बदल देते हैं। इसका कारण इसके सिवाय और कुछ नहीं होता कि उनके संस्कारों और प्रौढ़ विचारों में भिन्नता नहीं होती—एक साम्य तथा अनुरूपता होती है।

🔴 संस्कारों के अनुरूप मनुष्य का चरित्र बनता है और विचारों के अनुरूप संस्कार। विचारों की एक विशेषता यह होती है कि यदि उनके साथ भावनात्मक अनुभूति का समन्वय कर दिया जाता है तो वे न केवल तीव्र और प्रभावशाली हो जाते हैं, बल्कि शीघ्र ही पक कर संस्कारों का रूप धारण कर लेते हैं। किन्हीं विषयों के चिन्तन के साथ यदि मनुष्य की भावनात्मक अनुभूति जुड़ जाती है तो वह विषय मनुष्य का बड़ा प्रिय बन जाता है। यही प्रियता उस विषय को मानव-मस्तिष्क पर हर समय प्रतिविम्बित बनाये रहती है। फलतः उसी विषय में चिन्तन, मनन की प्रक्रिया भी अबाधगति से चलती है और वह विषय अवचेतन में जा-जाकर संस्कार रूप में परिणत होता रहता है। 

🔵 इसी नियम के साथ बहुधा देखा जाता है कि अनेक लोग, लोक प्रियता के कारण भोगवासनाओं को निरन्तर चिन्तन से संस्कारों में सम्मिलित कर लेते हैं, बहुत कुछ पूजा-पाठ, सत्संग और धार्मिक साहित्य का अध्ययन करते रहने पर भी उनसे मुक्त नहीं हो पाते। वे  चाहते हैं कि संसार के नश्वर भोगों और अकल्याणकर वासनाओं से विरषित हो जाये, लेकिन उनकी यह चाह पूरी नहीं हो पाती। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 10)

🌹 अनास्था की जननी-दुर्बुद्धि 

🔵 विचारणीय यह है कि क्या सिद्धांत-रहित उपहार, मनुहार का लालची और किसी भी चाटुकार की सही-गलत मनोकामनाएँ पूरी करने वाला कोई परमेश्वर हो भी सकता है क्या? इस संदर्भ में किसी भी दृष्टिकोण से विचार करने पर उत्तर नहीं में ही देना पड़ता है; क्योंकि यह सिलसिला यदि चल पड़े तो रही-बची विवेकशीलता और न्यायनिष्ठा के परखचे ही उड़ जाएँगे।     

🔴 ऐसे कबायली परमेश्वर को पूजने वाले ही मनोकामनाएँ पूरी न होने पर उसे सौ गुनी गाली भी देते देखे गये हैं, जो कि आशाएँ लगाये रहने से पूर्व मिन्नतें करने और चमचागिरी दिखाने में अतिवाद की सीमा तक पहुँच जाते हैं। इस भ्रांत मान्यताओं वाले जंजाल को ही यदि परमेश्वर माना जाए तो फिर इसी के साथ एक बात और भी जान लेनी चाहिये कि इसके पीछे वास्तविकता कुछ भी न होने से लाभ कुछ भी नहीं होने वाला है। अंधे के हाथों कभी बटेर लग जाए तो बात दूसरी है, पर उससे भ्रांति पर आधारित मान्यता की पुष्टि नहीं होती।   

🔵 उपर्युक्त पंक्तियों को पढ़ने के उपरांत तथाकथित पूजा-पाठ करने वालों की मान्यताएँ डाँवाडोल हो सकती हैं। जो थोड़ी-बहुत आधे-अधूरे मन से टंट-घंट करते थे, उसमें भी कमी आ सकती है। भक्तिवाद की आड़ में यह मिथ्या भ्रम-जंजाल चलाते रहने वाले को तो अपने व्यवसाय में घाटा दीख पड़ते ही अनख होने में ऐसी स्थिति भी आ सकती है जो प्रतिपक्ष पर किसी भी स्तर का आक्रोश लेकर पिल पड़े, पर सही अध्यात्म की स्थापना करने के लिये यह भी सहना पड़े तो उद्यत रहना चाहिये।  
     
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 14)

🌹 द्विज का अर्थ - मर्म समझें

🔴 जन्म भी अपने यहाँ हँसी- खुशी का त्यौहार माना जाता है और विवाह भी। ये दोनों ही कार्य जिस दिन एक साथ होते हैं, वह आदमी का बड़ी खुशी का दिन है, बड़े उत्सव का दिन है, बड़ी शान का दिन है, बड़ा गौरव का दिन है और वह दिन दीक्षा का दिन है। दीक्षा एक तरह की कसम लेने की प्रक्रिया है। जिस तरीके से कोई मिनिस्टर बनता है जब, तब उसको न्यायाधीश अथवा राष्ट्रपति आते हैं, उसको प्रतिज्ञाएँ दिलाते हैं, उसको गोपनीयता की शपथ दिलाते हैं, देश भक्ति की शपथ दिलाते हैं। 

🔵 मैं देश भक्त होकर के जिऊँगा और जो गोपनीय बातें हैं उनको बाहर प्रकट नहीं होने दूँगा। ये दो बातें राजनीतिक मनुष्यों को शपथ के रूप में लेनी पड़ती हैं, जो ये शपथ नहीं ले, उसको मिनिस्टर नहीं बनाया जा सकता। ठीक इसी प्रकार से दीक्षा यह शपथ लेने का समारोह है कि मैं मनुष्य का जीवन जीऊँगा महत्त्व उस शपथ के भावनात्मक सम्बन्ध का है। संस्कार कराने की विधि तो कोई सामान्य आदमी भी पूरा कर सकता है,  ये कोई बड़ी बात है क्या?   

🔴 विवाह स्त्री- पुरुषों का होता है। पण्डित जी पगड़ी बाँध के आ बैठते हैं, उनको दक्षिणा दे देते हैं, वे श्लोक बोल देते हैं, परिक्रमा करा देते हैं और पण्डित जी मिठाई खा करके, पूड़ी खा करके घर से चले जाते हैं। पण्डित जी का ब्याह में कोई खास भाग नहीं है। बस थोड़ी देर के लिए भाग है। इस तरीके से गुरु- दीक्षा का कृत्य- कर्मकाण्ड कोई भी आदमी करा सकता है, उस आदमी का कोई मूल्य नहीं है। वास्तविक बात यह है कि आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ने भर की बात है। 

🔵 सद्गुरु जिसको कहते हैं। वह अन्तरंग में बैठा हुआ चेतना- प्रेरणा का नाम है, जो मनुष्य को दिशाएँ बताती है, हर वक्त मार्गदर्शन करती है। बाहर का गुरु तो केवल ढाँचे के तरीके से, खाके के तरीके से और सिगनल के तरीके से सिर्फ आरम्भिक रास्ता बता सकता है। चौबीस घंटे रास्ता कैसे बता सकता है कोई गुरु? ॐ गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णुः, गुरुरेव महेश्वरः .. में जो बात बताई है, वह मनुष्यों के ऊपर कैसे लागू हो जायेगी?        
   
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 71)

🌹 प्रवास का दूसरा चरण एवं कार्य क्षेत्र का निर्धारण

🔴 एक दिन हम रात को 1 बजे करीब ऊपर गए। लालटेन हाथ में थी। भागने वालों से रुकने के लिए कहा। रुक गए। हमने कहा-‘‘आप बहुत दिन से इस घर में रहते आए हैं। ऐसा करें कि ऊपर की मंजिल के सात कमरों में आप लोग गुजारा करें। नीचे के आठ कमरों में हमारा काम चल जाएगा। इस प्रकार हम सब राजी नामा करके रहें। न आप लोग परेशान हों और न हमें हैरान होना पड़े।’’ किसी ने उत्तर नहीं दिया। खड़े जरूर रहे। दूसरे दिन से पूरा घटनाक्रम बदल गया। हमने अपनी ओर से समझौते का पालन किया और वे सभी उस बात पर सहमत हो गए।  

🔵 छत पर कभी चलने-फिरने जैसी आवाजें तो सुनी गईं, पर ऐसा उपद्रव न हुआ जिससे हमारी नींद हराम होती, बच्चे डरते या काम में विघ्न पड़ता। घर में जो टूट-फूट थी, अपने पैसों से सँभलवा ली। ‘‘अखण्ड ज्योति’’ पत्रिका पुनः इसी घर से प्रकाशित होने लगी। परिजनों से पत्र-व्यवहार यही आरम्भ किया। पहले वर्ष में ही दो हजार के करीब ग्राहक बन गए। ग्राहकों से पत्र व्यवहार करते और वार्तालाप करने के लिए बुलाते रहे। अध्ययन का क्रम तो रास्ता चलने के समय चलता रहा। रोज टहलने जाते, उसी समय में दो घण्टा नित्य पढ़ लेते। अनुष्ठान भी अपनी छोटी सी पूजा की कोठरी में चलता रहता।  

🔴 काँग्रेस के काम के स्थान पर लेखन कार्य को अब गति दे दी। अखण्ड ज्योति पत्रिका, आर्ष साहित्य का अनुवाद, धर्म तंत्र से लोकशिक्षण की रूपरेखा इन्हीं विषयों पर लेखनी चल पड़ी। पत्रिका अपनी ही हैंडप्रेस से छापते, शेष साहित्य दूसरी प्रेसों से छपा लेते। इस प्रकार ढर्रा चला तो, पर वह चिंता बराबर बनी रही कि अगले दिनों मथुरा में रहकर जो प्रकाशन का बड़ा काम करना है, प्रेस लगाना है, गायत्री तपोभूमि का भव्य भवन बनाना है, यज्ञ इतने विशाल रूप में करना है, जितना महाभारत के उपरांत दूसरा नहीं हुआ इन सबके लिए धन शक्ति और जन शक्ति कैसे जुटे? बोओ और काटो, उसे अब समाज रूपी खेत में कार्यान्वित करना था। सच्चे अर्थों में अपरिग्रही ब्राह्मण बनना था, इसी कार्यक्रम की रूपरेखा मस्तिष्क में घूमने लगीं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 72)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू

🔴 पूजा उपासना के बिना आत्मिक प्रगति कैसे हो सकती है। यह जानने के साथ- साथ हमें यह भी जानना चाहिए कि स्वास्थ्य, अध्ययन, चिन्तन, मनन की, बौद्धिक विकास की प्रक्रिया सम्पन्न किये बिना केवल कलम कागज के आधार पर लेख नहीं लिखा जा सकता। न कविताएँ बनाई जा सकती हैं। आन्तरिक उत्कृष्टता बौद्धिक विकास की तरह है और पूजा अच्छी कलम की तरह। दोनों का समन्वय होने से ही बात बनती है। एक को हटा दिया जाय तो बात अधूरी रह जाती है। हमने यह ध्यान रखा कि साधना की गाड़ी एक पहिए पर न चल सकेगी, इसलिए दोनों पहियों की व्यवस्था ठीक तरह  जुटाई जाय।   

🔵 हमने उपासना कैसे कि इसमें कोई रहस्य नहीं है। गायत्री महाविज्ञान में जैसा लिखा है उसी क्रम से हमारा गायत्री मन्त्र का सामान्य उपासन क्रम चलता रहा है। हाँ! जितनी देर तक भजन करने बैठे हैं, उतनी देर तक यह भावना अवश्य करते रहे हैं ब्रह्म की परम तेजोमयी सत्ता माता गायत्री का दिव्य प्रकाश हमारे रोम- रोम में ओत- प्रोत हो रहा है और प्रचण्ड अग्नि में पड़कर लाल हुए लोहे की तरह हमारा भौंड़ा अस्तित्व उसी स्तर का उत्कृष्ट बन गया है जिस स्तर का कि हमारा इष्टदेव है। शरीर के अणु- परमाणुओं में गायत्री माता का वर्चस्व समा जाने से काया का हर अवयव ज्योर्तिमय हो उठा अग्नि से इन्द्रियों की लिप्सा जल कर भस्म हो गयी, आलस्य आदि दुर्गुण नष्ट हो गये। रोग- विकारों को उस अग्नि ने अपने में जला दिया। 

🔴 शरीर तो अपना है, पर उसके भीतर प्रचंड ब्रह्मवर्चस लहरा रहा है, व वाणी में केवल सरस्वती ही शेष है। असत्य, छल और स्वाद के वह असुर उस दिव्य मंदिर को छोड़कर पलायन कर गये। नेत्रों में गुण ग्राहकता और भगवान् का सौन्दर्य हर जड़- चेतन में देखने की क्षमता भर शेष है। छिद्रान्वेषण, कामुकता जैसे दोष आँखों में नहीं रहे। कान केवल जो मंगलमय हैं उसे सुनते हैं। बाकी कोलाहल मात्र है जो श्रवणेन्द्रिय के पर्दे से टकरा कर वापस लौट जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...