बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

👉 महानता से नाता जोड़ने की सूझबूझ

🔴 महानता के साथ सम्पर्क साधकर उस सहयोग का सुयोग पा लेना एक ऐसा अप्रत्याशित सौभाग्य है, जो कभी-कभी मनुष्य को मिलता है। ऐसे अवसर सदा-सर्वदा किसी को नहीं मिलते। पारस पत्थर को स्पर्श कर काले कुरूप और सस्ते मोल वाले लोहे का सोने जैसी गौरवास्पद बहुमूल्य धातु में बदल जाना सम्पर्क का परिणाम है। स्वाति की बूँदों से लाभान्वित होने पर सीप जैसी उपेक्षित इकाई को मूल्यवान मोती प्रसव करने का श्रेय मिलता है। पेड़ से लिपट कर चलने वाली बेल उसी के बराबर ऊँची जा पहुँचती और अपनी उस प्रगति पर गर्व करती है।

🔵 अपने बलबूते वह मात्र जमीन पर थोड़ी दूर रेंग ही सकती थी, किन्तु उसकी दुर्बल काया को देखकर इतने ऊँचे चढ़ जाने की बात साधारण बुद्धि की समझ में नहीं आती। पेड़ का सान्निध्य और लिपट पड़ने का पुरुषार्थ जब सोना में सुहागा जैसे समन्वय बनाता है, तो उससे महान पक्ष की कोई हानि नहीं होती, पर दुर्बल पक्ष को अनायास ही दैवी वरदान जैसा लाभ मिल जाता है। समर्पण के सामीप्य को महानता के साथ जुड़ने के ये कुछ उदाहरण हैं जो बताते हैं कि व्यक्ति के लिए वरेण्य क्या है।

🔴 दैवी प्रयोजनों में यदि क्षुद्र से जीव भी तनिक सा सहयोग करें तो दैवी सहायता अपरिमित परिमाण में पाते हैं। बन्दरों की समुद्र पर पुल बनाने की उदार श्रमशीलता एवं गिलहरी की बालू से समुद्र को पाटने की निष्ठा ने उन्हें ऐतिहासिक बना दिया। सुग्रीव के सहयोगी खोह-कन्दरा में आश्रय हेतु भटकने वाले हनुमान जब श्रीराम के सहयोगी बन गये तो पर्वत उठाने, समुद्र लांघने, लंका जलाने जैसा असम्भव पराक्रम दिखाकर युद्ध में जीत का निमित्त बन राम पंचायतन का एक अंग बन गए। अर्जुन-भीम वे ही थे, जिनने द्रौपदी को निर्वसन होते आँखों से देखा व वनवास के समय पेट भरने और जान बचाने के लिए जिन्हें बहुरूपिए बन कर दिन गुजारने पड़े थे। श्रीकृष्ण रूपी महान् सत्ता को अपनाने वाली उनकी बुद्धिमता ने उन्हें महाभारत के, विराट भारत के निर्माण का श्रेयाधिकारी बना दिया।

🔵 यह सुनिश्चित तथ्य है कि जिस किसी पर भगवत्कृपा बरसती है, वह महानता से अपना नाता जोड़ने की सूझबूझ-सत्प्रेरणा के रूप में ही बरसती है। आज की विषम परिस्थितियों में यदि यह तथ्य हम सब भी सीख-समझ कर महानता को अपना सकें, तो निश्चित उस श्रेय को प्राप्त करेंगे, जो प्रज्ञावतार की सत्ता इस सन्धिकाल की विषमवेला में अनायास ही हमें देना चाहती है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 19

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 18)

🌹 विचारों का व्यक्तित्व एवं चरित्र पर प्रभाव

🔴 बहुत बार देखने में आता है कि डॉक्टर रोगी के घर जाता है, और उसे खूब अच्छी तरह देख-भाल कर चला जाता है। कोई दवा नहीं देता। तब भी रोगी अपने को दिन भर भला-चंगा अनुभव करता रहता है। इसका मनोवैज्ञानिक कारण यही होता है कि वह बुद्धिमान डॉक्टर अपने साथ रोगी के लिए अनुकूल वातावरण लाता है और अपनी गतिविधि से ऐसा विश्वास छोड़ जाता है कि रोगी की दशा ठीक है, दवा देने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। इससे रोगी तथा रोगी के अभिभावकों का यह विचार दृढ़ हो जाता है कि रोग ठीक हो रहा है। विचारों का अनुकूल प्रभाव जीवन तत्व को प्रोत्साहित करता है और बीमार की तकलीफ कम हो जाती है।

🔵 कुछ समय पूर्व कुछ वैज्ञानिकों ने इस सत्य का पता लगाने के लिए कि क्या मनुष्य के शरीर पर आन्तरिक भावनाओं का कोई प्रभाव पड़ता है, एक परीक्षण किया। उन्होंने विभिन्न प्रवृत्ति के आदमियों को एक कोठरी में बन्द कर दिया। उसमें से कोई क्रोधी, कोई विषयी और कोई नशों का व्यसनी था। थोड़ी देर बाद गर्मी के कारण उन सबको पसीना आ गया। उनके पसीने की बूंदें लेकर अलग-अलग विश्लेषण किया गया और वैज्ञानिकों ने उसके पसीने में मिले रासायनिक तत्वों के आधार पर उसके स्वभाव घोषित कर दिये जो बिल्कुल ठीक थे।

🔴 मानसिक दशाओं अथवा विचार-धाराओं का शरीर पर प्रभाव पड़ता है, इसका एक उदाहरण बड़ा ही शिक्षा-प्रद है— एक माता को एक दिन किसी बात पर बहुत क्रोध हो गया। पांच मिनट बाद उसने उसी आवेश की अवस्था मैंने अपने बच्चे को स्तनपान कराया और एक घण्टे के भीतर ही बच्चे की हालात खराब हो गई और उसकी मृत्यु हो गई। शव परीक्षा के परिणाम से विदित हुआ कि मानसिक क्षोभ के कारण माता का रक्त तीक्ष्ण परमाणुओं से विषैला हो गया और उसके प्रभाव से उसका दूध भी विषाक्त हो गया था, जिसे पी लेने से बच्चे की मृत्यु हो गई।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 26)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए  

🔵 सभ्यता, अनुशासन के परिपालन में है। अपने को नीतिमत्ता से अनुबन्धित किये रहें और दूसरों के साथ उदार व्यवहार बरतें, यही है मानवी गरिमा के साथ जुड़ा हुआ शालीन शिष्टाचार। इसके अन्तर्गत यह लोकाचार भी आता है कि घर में बालकों, वृद्धों असमर्थों की व्यवस्था पहले बनाई जाये, इसके उपरान्त अपनी ललक लिप्सा को आगे बढ़ने दिया जाये।      

🔴 जिन्हें अपना ही पेट सब कुछ दीखता है, वे उदारता बरतना तो दूर, बुरे लोगों की तरह निष्ठुरता बरतने में भी नहीं चूकते। ऐसों को दूसरों का अधिकार हरण करते हुये लज्जा, संकोच, भय जैसा भी कुछ अनुभव नहीं होता। ऐसी जड़ता अपनाने पर तो, किसी को मानवी गरिमा के क्षेत्र में भी प्रवेश करने का अवसर कभी नहीं मिलता।      

🔵 इन दिनों दैत्य की तूती हर क्षेत्र में बोलती हैं। हर किसी को खाने की ही नहीं, कुरतने-बर्बाद करने की भी सनक चढ़ी है। साधनों की आपाधापी में, पौराणिक सुन्द-उपसुन्द की तरह पारस्परिक मारकाट मची है। यदि गर्हित दृष्टिकोण बदला जा सका होता और पिछड़ों को प्रमुखता देते हुये उनका हक उन्हें स्वेच्छापूर्वक लौटा दिया गया होता, तो अपनी इसी दुनियाँ में कितनी प्रसन्नता और सुसम्पन्नता बिखरी पड़ी होती?

🔴 आत्मानुशासन रखा गया होता, संयम बरता जाता और अनिवार्य आवश्यकताएँ पूरी करके काम चला लिया जाता, तो इसका प्रभाव सार्वजनीन होता। मनुष्य सत्प्रवृत्ति-सम्वर्धन में अपनी बचत को, विभूतियों को नियोजित करने के निर्णय पर पहुँचता और ऐसे सृजन में, जिसे सतयुगी या स्वर्गीय कहने में किसी को कोई आपत्ति न होती।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 पूजा-उपासना के मर्म (भाग 3)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 मेरी उपासना का क्रम पूजा-उपासना तक सीमित नहीं है। 24 घण्टे मैंने उपासना की है, 24 घण्टे अपने आपको परिशोधन और संशोधन करने के लिये आग में तपाया है। मैंने हर बार अपनी मनोवृत्तियों की परख की है और मैंने हर बार मन की सफाई की है। इस लायक अपने मन को बनाया है कि अगर भगवान् अपने भीतर आये तो नाखुश होकर के नहीं चला जाये, परेशान होकर के नहीं चला जाये। यहाँ से नफरत लेकर के नहीं चला जाये। मन की सफाई करने की जरूरत है।

🔵 भगवान् को आदमी की मक्कारियों और आदमी की लिप्साओं से बहुत नफरत है। भगवान् खुशामद से मानने वाले नहीं हैं। भगवान् को नाम के अक्षर के उच्चारण करने की जरूरत नहीं है। भगवान् की औकात और भगवान् ऐसे नहीं हैं कि आप उसकी तारीफ करें, खुशामद करें, बार-बार नाम लें, बार-बार उसके गुणों को गायें, उसके बाद में उसको अपने काबू में कर लें, कब्जे में कर लें। इतना कमजोर दिल, इतना कमजोर प्रकृति का भगवान् नहीं हो सकता। हम इन्सान उनको इतना कमजोर समझते हैं कि कोई आदमी खुशामद करके जो कुछ चाहे, चाहे जब उनसे वसूल कर ले जाये वह भगवान् कैसे हो सकता है?

🔴 जो व्यक्ति खुशामद करें, तारीफ करें, जो कुछ भी चाहें, वही हमको मिल जाये। ये मुमकिन है? ये नामुमकिन है। भगवान् तुम बड़े अच्छे हो, तुम्हारी नाक बड़ी अच्छी है, तुमने महिषासुर को मार डाला, तुमने फलाने को मार डाला, तुमने कंस को मार डाला, तुमने वृत्रासुर को मार डाला, अब लाओ। उल्लू कहीं का। आज इसी का नाम पूजा, इसी का नाम उपासना, इसी का नाम ध्यान, इसी का नाम जप।

🔵 सारा विश्व अज्ञान के अंधकार में डूबा हुआ; भ्रम के जंजाल में फँसता हुआ और अपना वक्त और अपना समय बरबाद करता हुआ; अध्यात्म को बदनाम करता चला जाता है और शिकायत करता हुआ चला जाता है कि हमने भगवान् का नाम लिया था, पूजा की थी, खुशामद की थी, मिठाई खिलायी थी, चावल खिलाया था, धूपबत्ती खिलायी थी, आरती जलायी थी, और हमें कोई फायदा नहीं हुआ, कैसे हो सकता है फायदा?  फायदा होना चाहिए। उसका लाभ उठाने के लिये आदमी को अपने जीवन में आध्यात्मिकता का समावेश करना होगा। जीवन में आध्यात्मिकता का समावेश है-पूजा-उपासना का शिक्षण।  

🌹 आज की बात समाप्त।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 59)

🌹 अनगढ़ मन हारा, हम जीते

🔴 उपासना, साधना और आराधना में ‘‘साधना’’ ही प्रमुख है। उपासना का कर्मकाण्ड कोई नौकरी की तरह भी कर सकता है। आराधना-पुण्य परमार्थ को कहते हैं। जिसने अपने को साध लिया है, उसके लिए और कोई काम करने के लिए बचता ही नहीं। उत्कृष्टता सम्पन्न मन अपने लिए सबसे लाभदायक व्यवसाय-पुण्य परमार्थ ही देखता है। इसी में उसकी अभिरुचि और प्रवीणता बन जाती है। हिमालय के प्रथम वर्ष में हमें आत्म-संयम की, मनोनिग्रह की साधना करनी पड़ी। जो कुछ चमत्कार हाथ लगे हैं, उसी के प्रतिफल हैं। उपासना तो समय काटने का एक व्यवसाय बन गया है।

🔵 घर चार घण्टे नींद लिया करते थे। यहाँ उसे बढ़ाकर छः घण्टे कर दिया। कारण कि घर पर तो अनेक स्तर के अनेक काम रहते हैं, पर यहाँ तो दिन का प्रकाश हुए बिना मानसिक जप के अतिरिक्त और कुछ कर सकना ही सम्भव न था। पहाड़ों की ऊँचाई में प्रकाश देर से आता है और अन्धेरा जल्दी हो जाता है। इसलिए बारह घण्टे के अँधेरे में छः घण्टे सोने के लिए, छः घण्टे उपासना के लिए पर्याप्त होने चाहिए। स्नान का बंधन वहाँ नहीं रहा। मध्याह्न को ही नहाना और कपड़े सुखाना सम्भव होता था। इसलिए परिस्थिति के अनुरूप दिनचर्या बनानी पड़ी। दिनचर्या के अनुरूप परिस्थितियाँ तो बन नहीं सकती थीं।

🔴 ‘‘प्रथम हिमालय यात्रा कैसी सम्पन्न हुई?’’ इसके उत्तर में कहा जा सकता हे कि परिस्थितियों के अनुरूप मन को ढाल लेने का अभ्यास भली प्रकार कर लिया। इसे यों भी कह सकते हैं कि आधी मञ्जिल पार कर ली। इस प्रकार प्रथम वर्ष में दबाव तो अत्यधिक सहने पड़े, तो भी कच्चा लोहा तेज आग की भट्टी में ऐसा लोहा बन गया, जो आगे चलकर किसी भी काम आ सकने के योग्य बन गया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 60)

🌹 लक्षपूर्ति की प्रतीक्षा

🔵 शिला की आत्मा बिना रुके कहती ही रही। उसने आत्म विश्वास पूर्वक कहा—मुझे देख। मैं भी अपनी हस्ती को उस बड़ी हस्ती में मिला देने के लिए यहां पड़ी हूं। अपने इस स्थूल शरीर को—विशाल शिला खण्ड को—सूक्ष्म, अणु बना कर उस महासागर में मिला देने की साधना कर रही हूं। जल की प्रत्येक लहर से टकरा कर मेरे शरीर के कुछ कण टूटते हैं और वे रज कण बनकर समुद्र की ओर बह जाते हैं। इस तरह मिलन की बूंद-बूंद स्वाद ले रही हूं, तिल-तिल अपने को घिस रही हूं। इस प्रकार प्रेमी के प्रति आत्मदान का आनन्द कितने अधिक दिन तक लेने का रस ले रही हूं। यदि उतावले अन्य पत्थरों की तरह बीच जलधारा में पड़कर लुढ़कने लगती तो सम्भवतः कब की में लक्ष तक पहुंच जाती। फिर यह तिल-तिल अपने को प्रेमी के लिये घिसने का जो आनन्द है उससे तो वंचित ही रह गई होती?’’

🔴 ‘‘उतावली न कर, उतावली में जलन है, खोज है, निराशा है, अस्थिरता है, निष्ठा की कमी है, क्षुद्रता है। इन दुर्गुणों के रहते कौन महान् बना है? और कौन लक्ष तक पहुंचा है? साधक का पहला लक्षण है—धैर्य! धैर्य की परीक्षा ही भक्ति की परीक्षा है। जो अधीर हो गया सो असफल हुआ। लोभ और भय के, निराशा और आवेश के—जो अवसर साधक के सामने आते हैं उनमें और कुछ नहीं, केवल धैर्य परखा जाता है। तू कैसा साधक है जो अभी इस पहले पाठ को भी नहीं पढ़ पाया?’’

🔵 शिला की आत्मा ने बोलना बन्द कर दिया। मेरी तंद्रा टूटी। इस उपालम्भ ने अन्तःकरण को झकझोर डाला ‘‘पहला पाठ भी अभी नहीं पढ़ा, और लगा है बड़ा साधक बनने।’’ लज्जा और संकोच से सिर नीचा हो गया अपने को समझाता और धिक्कारता रहा। शिर ऊपर उठाया तो देखा, ऊषा की लाली उदय हो रही है। उठा और नित्य कर्म की तैयारी करने लगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 Feb 2017


👉 आज का सद्चिंतन 22 Feb 2017


👉 नतमस्तक हो गये वनवासी लुटेरे

🔴 शान्तिकुञ्ज हरिद्वार में सन् १९८९ ई. में विचार क्रान्ति के प्रसार के लिए एक स्कूटर टोली बनाई गई। तय यह हुआ कि टोली बलसाड़ से स्कूटर से चलेगी, प्रचार- प्रसार करते हुए शान्तिकुञ्ज पहुँचेगी और तीन दिनों तक वहाँ रुककर दूसरे रूट से वापस बलसाड़ पहुँचेगी। पूरी यात्रा २५ दिनों की थी। पहले तो टोली में २५ लोगों का जाना तय हुआ था, लेकिन कई कारणों से अन्ततः ९ व्यक्तियों की टोली बनाई गई।

🔵 २२ अप्रैल को यात्रा शुरू हुई। चार स्कूटरों पर दो- दो व्यक्ति और एक स्कूटर पर एक अकेला आदमी। सभी इस भाव से भरे थे कि अकेले आदमी वाले स्कूटर पर पूज्य गुरुदेव सूक्ष्म रूप से बैठे हैं। टोली जहाँ- जहाँ रुकी, वहाँ सभी प्रज्ञा परिजनों का भव्य स्वागत हुआ। सभी अमदा में रात्रि विश्राम के लिए रुके। वहाँ के लोगों द्वारा किये गये स्वागत- सत्कार से सभी गदगद हो गए। एक ने तो इस आशय का पत्र लिखकर घर भेज दिया कि रास्ते भर हमने जो देखा- जाना है, जिस तरह से समाहित हुए हैं, उसके बाद जीवन में कुछ देखने- पाने की इच्छा शेष नहीं रह गई है। अब हम यदि जीवित न भी लौटे तो कोई अफसोस नहीं होगा। आप लोग भी चिन्ता मत करना।

🔴 उत्साह और उमंग से भरे सभी शान्तिकुञ्ज पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि द्वार नं. २ से लेकर जहाँ अभी गुरुदेव की समाधि बनी है, वहाँ तक दोनों तरफ लोग हाथों में फूल लेकर खड़े थे। गेट के अन्दर प्रवेश करते ही इनके ऊपर पुष्प वृष्टि होने लगी। सभी अभिभूत हो गए।
  
🔵 तीन दिनों तक शान्तिकुञ्ज में रुककर यह टोली बलसाड़ के लिए रवाना हुई। ३,६०० कि.मी.की इस सड़क यात्रा का वापसी का रूट दूसरा था। ये लोग रोज ४००- ५०० कि. मी. चलकर रात्रि विश्राम करते थे व रात को १०- ११ बजे के बीच खाना खाकर सोते थे और सुबह ४ बजे अगले पड़ाव के लिए निकल पड़ते थे।

🔴 गर्मियों के दिन थे, लेकिन तेज धूप में भी इन्हें ऐसा लगता था, जैसे एयरकन्डीशन गाड़ी में सफर कर रहे हों। कहीं कोई थकान नहीं, हर पल तरोताजा। विचार क्रान्ति के बीज बोता हुआ यह काफिला इन्दौर पहुँचा। शाम के पाँच बजे जब ये अगले पड़ाव की ओर चलने को तैयार हुए तो वहाँ के लोगों ने इन्हें आगे जाने से रोका। कारण यह था कि इन्दौर से आगे दाऊद और उसके आसपास का इलाका भीलों के उत्पात के लिए प्रसिद्घ था। रात के समय इनके द्वारा राहगीरों को लूट कर उनकी हत्या तक कर दी जाती थी।

🔵  लेकिन युगशिल्पियों को मौत का भय भी रोक नहीं सका। उन्हें निर्धारित समय के अनुसार अगले पड़ाव पर पहुँचना ही था। इसलिए स्थानीय लोगों के लाख रोकने पर भी सभी पूज्य गुरुदेव का स्मरण करते हुए आगे बढ़ चले।

🔴 रात गहरी होती जा रही थी। सड़क पर दूर- दूर तक सन्नाटा पसरा हुआ था। सड़क के दोनों ओर बड़ी- बड़ी झाड़ियाँ थीं, जंगल ही जंगल था। पाँचों स्कूटर आगे पीछे तेज रफ्तार में बढ़े चले जा रहे थे। अचानक अगले स्कूटर सवार ने गाड़ी की रफ्तार बहुत धीमी कर दी। उसने हेडलाइट की रोशनी में यह देख लिया था कि सड़क पर एक छोर से दूसरे छोर तक बड़े- बड़े पत्थर रखे हुए हैं। धीमी गति से बढ़ते हुए उसने दोनों तरफ आँखें गड़ा कर देखा। दायें- बायें तहमद लपेटे हुए कुछ लोग नंगे बदन खड़े थे। सबके हाथों में तीर कमान।

🔵 स्कूटर सवार ने स्कूटर नहीं रोका। आँखें बंद करके पूज्य गुरुदेव से जीवन रक्षा की गुहार करते हुए उसने स्कूटर की रफ्तार बढ़ाई और दाँत भींचकर दो पत्थरों के बीच से स्कूटर निकाल ले गया।

🔴 अगले सवार को सुरक्षित निकलते देखकर पीछे आ रहे स्कूटर सवार का हौसला बढ़ा। उसने स्कूटर का हैंडिल हल्के से दाएँ- बाएँ घुमाकर हेडलाइट की रोशनी सड़क के दोनों ओर डाली। उसने देखा दोनों ओर तीस- चालीस के करीब लुटेरे खड़े हैं। सब के नंगे कंधों पर धनुष हैं। सबने सिर झुकाकर हाथ जोड़ रखा है।

🔵 सभी स्कूटर सवार एक- एक कर सुरक्षित निकल गए। कुछ दूर जाकर सभी एक जगह रुके। एक- दूसरे से कहने लगे- लुटेरे भीलों से बचकर निकल पाना परम पूज्य गुरुदेव की कृपा से संभव हुआ है। एक ने कहा- गुरुदेव की महिमा असीम है। उनकी कृपा से एक साथ एक ही क्षण में इतने सारे अंगुलिमालों का विचार परिवर्तन हो गया।

🌹 ई.एम.डी. शांतिकुंज हरिद्वार  (उत्तराखण्ड)    
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 1)

🌹 भूमिका  

🔴 व्यक्तित्व का परिष्कार ही प्रतिभा परिष्कार है। धातुओं की खदानें जहाँ भी होती हैं, उस क्षेत्र के वही धातु कण मिट्टी में दबे होते हुए भी उसी दिशा में रेंगते और खदान के चुम्बकीय आकर्षणों से आकर्षित होकर पूर्व संचित खदान का भार, कलेवर और गौरव बढ़ाने लगते हैं। व्यक्तित्ववान अनेकों का स्नेह, सहयोग, परामर्श एवं उपयोगी सान्निध्य प्राप्त करते चले जाते हैं। यह निजी पुरुषार्थ है।       

🔵 अन्य सुविधा-साधन तो दूसरों की अनुकम्पा भी उपलब्ध करा सकता है; किन्तु प्रतिभा का परिष्कार करने में अपना संकल्प, अपना समय और अपना पुरुषार्थ ही काम आता है। इस पौरुष में कोताही न करने के लिए गीताकार ने अनेक प्रसंगों पर विचारशीलों को प्रोत्साहित किया है। एक स्थान पर कहा गया है कि मनुष्य स्वयं ही अपना शत्रु और स्वयं ही अपना मित्र है। इसलिए अपने को उठाओ, गिराओ मत।  

🌹 इस पुस्तक में हम पढेंगे       
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1. सर्वोपरि उपलब्धि-प्रतिभा

2. प्रतिभा से बढ़कर और कोई समर्थता है नहीं

3. परिष्कृत प्रतिभा, एक दैवी अनुदान-वरदान

4. प्रचंड मनोबल की प्रतिभा में परिणति

5. आगे बढ़ें और लक्ष्य तक पहुँचें

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 व्यवस्थित जीवन की कुंजी- समय की पाबंदी

🔴 नियमपूर्वक तथा समय पर काम करने से सब काम भली प्रकार हो जाते हैं। जो लोग समय के पाबंद नही होते, उनके आधे काम अधूरे और हमेशा धमा-चौकडी़ मची रहती है। कम अच्छी तरह समाप्त हो जाता है तो उत्साह भी मिलता है और प्रसन्नता भी होती है। काम पूरा न होने से असंतोष और अप्रसत्रता होती है। विचारवान् व्यक्ति सदैव समय का पालन करते है। इस तरह दूसरी व्यवस्थाओं और प्रबंध के लिये भी समय बचाए रखते है।

🔵 अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन के जीवन की एक घटना से समय की पाबंदी की उपयोगिता का प्रकाश मिलता है। एक बार उन्होंने कुछ मेहमानों को तीन बजे भोजन के लिए आमंत्रित किया। साढे़ तीन बजे सैनिक कमांडरो की एक आवश्यक बैठक मे भाग लेना था।

🔴 नौकर जानता था कि जार्ज साहब समय की नियमितता को कितनी दृढता से निबाहते है ? ३ बजे ठीक मेज तैयार हो गई सूचना दी गई तीन बज गये अभी तक मेहमान नहीं आए।

🔵 एकबारगी वाशिंगटन के मस्तिष्क मे एक चित्र उभरा मेहमानों की प्रतीक्षा न की गई तो वे अप्रसन्न हो जायेंगे तो फिर क्या बैठक स्थगित करें। यह समय सारे राष्ट्र के जीवन से संबधित है। क्या अपनी सुविधा के लिये राष्ट्र का अहित करना उचित है, क्या राष्ट्रहित को दो-तीन व्यक्तियों की प्रसन्नता के लिए उत्सर्ग करना बुद्धिमानी होगी।

🔴 हृदय ने दृढतापूर्वक कहा नहीं, नहीं जब परमात्मा अपने नियम से एक सेकण्ड आगे-पीछे नही होता, जिस दिन जितने बजे सूरज को निकलना होता है, बिना किसी की परवाह किये वह उतने ही समय उग आता है तो मुझे ही ईश्वरीय आदेश का पालन करने मे संकोच या भय क्यों होना चाहिये।

🔵 ठीक है नौकर को संबिधित कर उन्होंने कहा- शेष प्लेटें उठा लो, हम अकेले ही भोजन करेंगे। मेहमानो की प्रतीक्षा नहीं की गई।

🔴 आधा भोजन समाप्त हो गया तब मेहमान पहुँचे। उन्हें बहुत दुःख हुआ देर से आने का कुछ अप्रसन्नता भी हुई, वे भोजन में बैठ गये, तब तक बाशिगटन ने अपना भोजन समाप्त किया और निश्चित समय विदा लेकर उस बैठक में भाग लिया।

🔵 मेहमान इसी बात पर रुष्ट थे कि उनकी १५ मिनट प्रतीक्षा नहीं की गई अब और भी कष्ट हुआ क्योकि मेहमान से पहले वे भोजन समाप्त कर वहाँ से चले भी गये। किसी तरह भोजन करके वे लोग भी अपने घर लौट गये।

🔴 सैनिक कमांडरो की बैठक में पहुँचने पर उन्हे पता चला कि यदि वे नियत समय पर नही पहुँचते तो अमेरिका के एक भाग से भयंकर विद्रोह हो जाता। समय पर पहुँच जाने के कारण स्थिति संभाल ली गई और एक बहुत बड़ी जन-धन की हानि को बचा लिया गया।

🔵 इस बात का पता कुछ समय बाद उन मेहमानों को भी चला तो उन्हें समय की नियमित्त्ता का महत्व मालूम पडा। उन्होंने अनुभव किया कि प्रत्येक काम निश्चित समय पर करने, उसमें आलस्य प्रमाद या डील न देने से भयंकर हानियों को रोका जा सकता है और जीवन को सुचारु ढंग से जिया जा सकता है।

🔴 वे फिर से राष्ट्रपति के घर गये और उनसे उस दिन हुई भूल की क्षमा माँगी। राष्ट्रपति ने कहा- 'इसमें क्षमा जैसी तो कोई बात नहीं है पर हाँ, जिन्हें अपने जीवन की व्यवस्था, परिवार, समाज और देश की उन्नति का ध्यान हो, उन्हें समय का कडाई से पालन करना चाहिए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 40, 31

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 17)

🌹 विचारों का व्यक्तित्व एवं चरित्र पर प्रभाव

🔴 इससे वे चिकित्सा के क्षेत्र में आन्तरिक स्थिति का लाभ उठाने के विषय में काफी पिछड़ गये। चिकित्सक अब धीरे धीरे इस बात का महत्व समझने और चिकित्सा में मनोदशाओं का समावेश करने लगे हैं। मानस चिकित्सा का एक शास्त्र ही अलग बनता और विकास करता हुआ जा रहा है। अनुभवी लोगों का विश्वास है कि यदि यह मानस चिकित्सा शास्त्र पूरी तरह विकसित और पूर्ण हो गया तो कितने ही रोगों में औषधियों के प्रयोग की आवश्यकता कम हो जायेगी। लोग अब यह मानने के लिए तैयार हो गये हैं कि मनुष्य के अधिकांश रोगों का कारण उसके विचारों तथा मनोदशाओं में नियत रहता है। यदि उनको बदला जाय तो वे  रोग बिना औषधियों के ही ठीक हो सकते हैं। वैज्ञानिक इसकी खोज, प्रयोग तथा परीक्षण में लगे हुए हैं।

🔵 शरीर रचना के सम्बन्ध में जांच करने वाले एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक ने  अपनी प्रयोगशाला में तरह-तरह के परीक्षण करके यह निष्कर्ष निकला है कि मनुष्य का शरीर अर्थात् हड्डियां, मांस, स्नायु आदि मनुष्य की मनोदशा के अनुसार एक वर्ष में बिल्कुल परिवर्तित हो जाते हैं और कोई-कोई भाग तो एक दो सप्ताह में ही बदल जाते हैं।

🔴 इसमें सन्देह नहीं कि चिकित्सा के क्षेत्र में मानसोपचार का बहुत महत्व है। सच बात तो यह है कि आरोग्य प्राप्ति का प्रभावशाली उपाय आन्तरिक स्थिति का अनुकूल प्रयोग ही है। औषधियों तथा तरह-तरह की जड़ी-बूटियों का उपयोग कोई स्थाई लाभ नहीं करता, उनसे तो रोग के बाह्य लक्षण दब भर जाते हैं। रोग का मूल कारण नष्ट नहीं होता। जीवनी शक्ति जो आरोग्य का यथार्थ आधार है, मनोदशाओं के अनुसार बढ़ती-घटती रहती है। यदि रोगी के लिए ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी जाय कि वह अधिक से अधिक प्रसन्न तथा उल्लसित रहने लगे तो उसकी जीवनी-शक्ति बढ़ जायेगी, जो प्रभाव से रोग को निर्मूल कर सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 25)


🌹 उदारता अपनाई ही जाए  
🔵 यह समझने समझाने के अतिरिक्त और किसी प्रकार बात बनती ही नहीं कि अपनी सोच बदल ली जाये, तो अत्यधिक व्यथित-व्याकुल किए रहने वाली समस्या चुटकी बजाने की तरह मिनटों में हल हो सकती है। रंगीन चश्मा पहन लेने पर सारा संसार रंगीला दीख पड़े, तो उस गड़बड़ी से एक ही प्रकार निपटा जा सकता है कि चश्मा उतार दिया जाये और जो वस्तु जैसी है, उसे उसी रूप में देख कर सन्तोष कर लिया जाये। अपने निजी शरीर से लेकर संसार भर में बिखरे अनेकानेक प्राणियों और पदार्थों तक प्रकृति का सुविस्तृत वैभव बिखरा पड़ा है।   

🔴 इसमें अपना अधिकार मात्र उतने पर है जितने से कि निर्वाह क्रम चलता रहे। इसके अतिरिक्त और जो कुछ बचा रहता है, वह इस सृष्टि के निवासी व अन्यान्य जड़ चेतन घटकों के लिए है। सब अपनी अपनी भागीदारी बरतें और इतने से ही सन्तुष्ट रहें, तो अच्छे बच्चों की तरह सभी अपने अरमान लेकर, हँसते-हँसाते खेलते-खिलाते रह सकते हैं। पर जब वे एक दूसरे का हक छीनने के लिए आक्रामक उद्दण्डता अपनाते हैं तो पारस्परिक सद्भावना तो गँवाते ही हैं, साथ ही उस हुड़दंग के लिए अभिभावकों की चपतें भी खाते हैं।    

🔵 ऐसे बुरे बच्चे कम से कम हमें तो नहीं ही होना चाहिए, जिनके सम्बन्ध में सर्वत्र समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी जैसे व्यवहार की अपेक्षा की जाती है, साथ ही उपलब्धियों के न्यायोचित वितरण, विभाजन एवं सदुपयोग की आशा की जाती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 पूजा-उपासना के मर्म (भाग 2)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 मित्रो! यह सिंहासन है और इस पर हर आदमी को बैठने का हक नहीं। उस सिंहासन पर बैठने का हक उस आदमी को है, जिसने केवल अपनी जबान से, जबान तक सीमित नहीं रखा गायत्री मंत्र को। उँगलियों तक सीमित नहीं रखा गायत्री मंत्र को, बल्कि इस अमृत को पीता हुआ चला गया और अपने हृदय के अन्तरंग से लेकर के रोम-रोम में जिसने परिप्लावित कर लिया। उसको ये चमत्कार देखने का हक है और वो आदमी ये कह सकता है कि हमने गायत्री मंत्र जपा था और हमको फायदा नहीं हुआ, ऐसा आदमी आये मेरे पास और मैं कहूँगा आपको फायदा दिलाने की मेरी जिम्मेदारी है और मैं अपना तप, अपने पुण्य के अंश काटकर के आपको दूँगा और आपको ये यकीन और ये विश्वास करा करके जाऊँगा।

🔵 गायत्री मंत्र के माने है भावनाओं का परिष्कार, भावनाओं का परिष्कार जो मुझे मेरे गुरु ने सिखाया था। मित्रो! मेरे रोम-रोम में समाया हुआ है गायत्री महामंत्र बुद्धि का संशोधन करने का मंत्र। मैंने सारा का सारा दिमाग इस मार्ग पर खर्च किया कि मेरी अकल, मेरी विचारणाएँ, मेरी इच्छाएँ, मेरी आकांक्षाएँ, मेरा दृष्टिकोण और मेरे विचार करने के ढंग, मेरी आकांक्षाएँ और मेरी ख्वाहिशें, क्या उस तरह की हैं, जैसे कि एक गायत्री भक्त की होनी चाहिए। मैं अपने आपको बराबर कसता रहा और अपने आपकी परख बराबर करता रहा। खोटे होने की परख, खरे होने की परख।

🔴 पुराने जमाने के रुपये को कसौटी लगायी जाती थी, पुराने जमाने में जो रुपये चला करते थे, कसौटी लगाई जाती थी। वो खोटा अलग फेंक देते थे, खरा अलग फेंक देते थे। मैंने अपने आपकी कसौटी लगाई और कसौटी बता देती थी कि ये खोटा पैसा है, खरा पैसा है। अपनी हर मनोवृत्ति के ऊपर कसौटी लगाता चला गया और मैं यह देखता हुआ चला गया कि मैं कहाँ खोटा सिक्का हूँ, कहाँ खरा? जहाँ खोटा था, अपने आपको सँभालता रहा; जहाँ खरापन था, वहाँ सुधारता रहा।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 58)

🌹 अनगढ़ मन हारा, हम जीते

🔴 यह बातें पढ़ी और सुनीं तो पहले भी थीं, पर अनुभव में इस वर्ष के अंतर्गत ही आईं, जो प्रथम हिमालय यात्रा में व्यवहार में लानी पड़ीं। यह अभ्यास एक अच्छी-खासी तपश्चर्या थी, जिसने अपने ऊपर नियंत्रण करने का भली प्रकार अभ्यास करा दिया। अब हमें विपरीत परिस्थितियों में भी गुजारा करने से परेशानी का अनुभव नहीं होता था। हर प्रतिकूलता को अनुकूलता की तरह अभ्यास में उतारते देर नहीं लगती।

🔵 एकाकी जीवन में काम, क्रोध, लोभ, मोह का कोई अवसर नहीं था। इसलिए उनसे निपटने का कोई झंझट सामने नहीं आया। परीक्षा के रूप में जो भय प्रलोभन सामने आए उन्हें हँसी में उड़ा दिया गया। यहाँ स्वाभिमान भी काम न कर पाया। सोचा ‘‘हम आत्मा हैं। प्रकाश पुञ्ज और समर्थ। गिराने वाले भय और प्रलोभन हमें न तो गिरा सकते हैं न उल्टा घसीट सकते हैं।’’ मन का निश्चय सुदृढ़ देखकर पतन और पराभव के जो भी अवसर आए, वे परास्त होकर वापस लौट गए। एक वर्ष के उस हिमालय निवास में जो ऐसे अवसर आए, उनका उल्लेख करना यहाँ इसलिए उपयुक्त नहीं समझा कि अभी हम जीवित हैं और अपनी चरित्र निष्ठा की ऊँचाई का वर्णन करने में कोई आत्म-श्लाघा की गंध सूँघ सकता है।

🔴 यहाँ तो हमें मात्र इतना ही कहना है कि अध्यात्म पथ के पथिक को आए दिन भय और प्रलोभनों का दबाव सहना पड़ता है। इनसे जूझने के लिए हर पथिक को कमर कसकर तैयार रहना चाहिए। जो इतनी तैयारी न करेगा उसे उसी तरह पछताना पड़ेगा, जिस प्रकार सरकस के संचालक और रिंग मास्टर का पद बिना तैयारी किए कोई ऐसे सम्भाल ले और पीछे हाथ पैर तोड़ लेने अथवा जान जोखिम में डालने का उपहास कराए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 59)

🌹 लक्षपूर्ति की प्रतीक्षा

🔵 लगा कि नीचे पड़ी शिला की आत्मा बोल रही है उसकी वाणी कम्बल को चीरती हुई, कानों से लेकर हृदय तक प्रवेश करने लगी। मन तंद्रित अवस्था में भी उसे ध्यानपूर्वक सुनने लगा।

🔴 शिला की आत्मा बोली—‘‘साधक! क्या तुझे आत्मा में रस नहीं आता, जो सिद्धि की बात सोचता है? भगवान् के दर्शन से क्या भक्ति भावना में कम रस है? लक्ष प्राप्ति से क्या यात्रा मंजिल कम आनन्द दायक है? फल से क्या कर्म का माधुर्य फीका है? मिलन से क्या विरह में कम गुदगुदा है? तू इस तथ्य को समझ। भगवान तो भक्त से ओत-प्रोत ही हैं। उसे मिलने में देरी ही क्या है? जीवन को साधना का आनन्द लूटने का अवसर देने के लिए ही उसने अपने को पर्दे में छिपा लिया है और झांक-झांक कर देखता रहता है कि मेरा, भक्त, भक्ति के आनन्द में सराबोर हो रहा है या नहीं? जब वह उस रस में निमग्न हो जाता है तो भगवान भी आकर उसके साथ रास नृत्य करने लगता है। सिद्धि वह है जब भक्त कहता है—मुझे सिद्धि नहीं भक्ति चाहिये। मुझे मिलन की नहीं विरह की अभिलाषा है। मुझे सफलता में नहीं कर्म में आनन्द है। मुझे वस्तु नहीं भाव चाहिए।’’

🔵 शिला की आत्मा आगे भी कहती ही गई। उसने और भी कहा—साधक! सामने देख, गंगा अपने प्रियतम से मिलने के लिये कितनी आतुरता पूर्वक दौड़ी जा रही है। उसे इस दौड़ में आनन्द है। समुद्र से मिलन तो उसका कब का हो चुका पर उसमें उसने रस कहां पाया? जो आनन्द प्रयत्न में है, भावना में है, आकुलता में है वह मिलन में कहां है? गंगा उस मिलन से तृप्त नहीं हुई, उसने मिलन प्रयत्न को अनन्त काल तक जारी रखने का व्रत लिया हुआ है फिर अधीर साधक, तू ही क्या उतावली करता है। तेरा लक्ष महान् है, तेरा पथ महान् है, तू महान् है, तेरा कार्य भी महान् है। महान् उद्देश्य के लिए महान् धैर्य चाहिए। बालकों जैसी उतावली का यहां क्या प्रयोजन? सिद्धि कब तक मिलेगी यह सोचने में मन लगाने से क्या लाभ?’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 Feb 2017


👉 और वह तबादला वरदान बन गया!

🔴  सन् १९९६ के आखिर में मेरा तबादला चाइबासा में हो गया। यहाँ आने के लिए मैं मानसिक रूप से बिल्कुल तैयार नहीं था। आरंभ से ही गुरुदेव से और उनके मिशन से इस प्रकार जुड़ा रहा कि विभागीय जिम्मेदारियों को पूरा करने के बाद जो समय बचता था, उसमें मिशन का काम किए बिना मुझे चैन नहीं मिलता था, किन्तु उड़ीसा की सीमा से सटे इस क्षेत्र में मिशन के कार्य कर पाने की संभावना नहीं के बराबर थी। मैं पूज्य गुरुदेव से प्रार्थना करने लगा कि वे मेरा तबादला रुकवा दें, लेकिन उन्होंने मेरी प्रार्थना नहीं सुनी और विभागीय दबाव के कारण अन्ततः मुझे चाइबासा का कार्यभार सँभालना ही पड़ा।

🔵 वहाँ का प्रभार सँभालते हुए कुछ ही दिन बीते थे कि एक दिन सुबह- सुबह दो लड़कियाँ मेरे आवास पर पहुँच गयीं। मैं सोचने लगा कि ये कौन हैं और इन्हें दफ्तर जाने के बजाय यहाँ आवास पर आने की क्या जरूरत पड़ गई। पास आकर जब उन दोनों ने अपना परिचय दिया तो मेरा हृदय एक सुखद आश्चर्य से भर उठा। वे दोनों गायत्री परिवार की ही थीं। उनमें से एक थी वन्दना और दूसरी चंचल गुप्ता। मेरे विभाग के ही किसी व्यक्ति के द्वारा उन्हें यह मालूम हो चुका था कि मिशन से मेरी गहरी संबद्धता है। वे इस उम्मीद से मेरे पास आई थीं कि उनके द्वारा जैसे- तैसे चलाए जा रहे मिशन के कार्यक्रमों को विस्तार दिया जा सके।

🔴 उन्होंने बताया कि मिशन का नाम जानने वाले यहाँ गिने- चुने लोग ही हैं। वे दोनों अपने स्तर से पूरी तरह प्रयासरत हैं, फिर भी मिशन को मजबूती नहीं मिल पा रही है। इन प्रयासों में अधिकाधिक समय देने के कारण गाहे- बगाहे इन्हें घर- परिवार वालों की डाँट भी सुननी पड़ जाती थी। इन विकट परिस्थितियों में उनके द्वारा किए जाने वाले प्रयासों की मैं मन ही मन सराहना किए बिना न रह सका।
  
🔵 मुझे लगा कि इन दोनों बहिनों के साथ मिलकर इस क्षेत्र में मिशन को मजबूत करने के लिए ही पूज्य गुरुदेव ने मुझे यहाँ भेजा है। तभी उन्होंने तबादला रुकवाने की मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं की थी। अब मुझे सबसे पहले नौ कुंडीय यज्ञ के लिए एक स्थान का चयन करना था। इसके लिए शंभुस्थान, शंकर मंदिर मैदान उपलब्ध हो गया। यज्ञ में लोगों को शामिल करने के लिए सघन प्रचार की आवश्यकता थी। इसके लिए जगह- जगह छोटे- छोटे दीप यज्ञों का आयोजन कर लोगों को संदेश दिए जाने लगे। घर- घर सम्पर्क कर विशेष गोष्ठियों का आयोजन किया गया, ताकि स्थानीय लोगों को युग निर्माण योजना के बारे में विस्तार से बताया जा सके।

🔴 इधर लोगों के बीच प्रचार के कार्य चल रहे थे, उधर कुण्ड निर्माण से लेकर साधन- सामग्री जुटाने का प्रयास भी किया जा रहा था। यज्ञ की तैयारियों में शुरू से अन्त तक कहीं कोई अड़चन नहीं आई। चारों ओर से सहयोग की बारिश होने लगी। भोजन प्रसाद की व्यवस्था श्री रूँगटा ने की। दीप यज्ञ और हवन के लिए घर- घर से आमंत्रण आने लगे। विभिन्न व्यावसायिक ग्रुपों ने भी सहयोग का हाथ बढ़ाना शुरू कर दिया। मारवाड़ियों के एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान- कोल ग्रुप द्वारा दीप यज्ञ का आयोजन किया गया। अन्ततः यज्ञ इतने भव्य रूप में सम्पन्न हुआ जिसकी कल्पना भी नहीं की गई थी।

🔵 इस यज्ञ के दौरान ही शक्तिपीठ की स्थापना की बात रखी गई। रायपुर के एक मारवाड़ी सज्जन ने शक्तिपीठ के लिए स्थान की पेशकश की। तीन कट्टे के अहाते में बना हुआ तीन कमरे का मकान, चौड़ा बरामदा, अहाते के अन्दर ही चाँपाकल। स्थान के उपलब्ध हो जाने से शक्तिपीठ के निर्माण का कार्य द्रुतगति से चल पड़ा।

🔴 १८ जनवरी १९९७ को भूमि पूजन हुआ। एस.पी. रामजी साहब ने शक्तिपीठ के निर्माण के लिए विधिपूर्वक भूमि पूजन किया। यह भूमि दरअसल एक बहुत बड़े भू- खंड का हिस्सा थी। उस पर काफी दिनों से कोर्ट में केस चल रहा था, जिसमें पूर्वोक्त मारवाड़ी सज्जन को कुछ इस तरह लपेटा गया था कि भूमि पर उनका अधिकार साबित होने की कम ही गुंजाइश थी। प्रतिपक्ष की जोड़तोड़ के कारण स्थिति कुछ ऐसी बन गई थी कि उनको जेल भी जाना पड़ सकता था। ऊपर से स्थानीय भू- माफियाओं द्वारा उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी जा रही थी, जो उस भूमि पर कब्जा करना चाहते थे।

🔵 शक्तिपीठ के लिए इस भूमि को दान में देने की मौखिक पेशकश करते ही परिस्थिति कुछ इस प्रकार पलटती चली गई कि सारे विरोधियों के सब प्रयास धरे के धरे रह गए। केस की दिशा ही बदल गई और निष्पत्ति मारवाड़ी सेठ के पक्ष में रही। मारवाड़ी सेठ की वर्षों से चली आ रही इस समस्या के बारे में एस.पी. साहब ने मुझे तब बताया जब इस विवाद का निपटारा न्यायालय द्वारा पूरा हो गया। जब स्थानीय लोगों को इस बात की जानकारी मिली तो सभी एक स्वर से कहने लगे कि ऐसे जटिल मुकदमें का फैसला मारवाड़ी सेठ के पक्ष में होना उनके द्वारा शक्तिपीठ के लिए भूमिदान का ही परिणाम है। खुद एस.पी. साहब भी इस निर्णय को लेकर आश्चर्यचकित थे।

🔴 पूरे क्षेत्र में चर्चित इस मुकद्दमें में मारवाड़ी सेठ की जीत से चारों ओर गायत्री माता और गुरुदेव की शक्ति की चर्चाएँ होने लगीं। इन चर्चाओं को तब और बल मिला जब अनायास ही वन्दना के लिए रिश्ता मिल गया और उसकी शादी हो गई। एक पैर से लाचार होने के कारण उसके लिए रिश्ता मिलना मुश्किल हो रहा था। यही कारण था कि 25- 26 वर्ष की हो जाने के बाद भी उसकी शादी तय नहीं हो सकी थी। शादी को लेकर उसके माता- पिता के लिए भी यह एक सुखद आश्चर्य की घड़ी थी।

🔵 इतना सब कुछ घटित होने के बाद यह बात मेरी समझ में आ गई कि चाईबासा के तबादले की व्यवस्था पूज्य गुरुदेव ने मुझे पुरस्कृत करने के लिए ही बनाई थी। तबादले के समय मैं यह सोचकर मरा जा रहा था कि वहाँ मिशन के काम मुझे अधूरे छोड़ने पड़ेंगे ,, लेकिन यहाँ आकर जब शक्तिपीठ की स्थापना जैसा महत्त्वपूर्ण कार्य मुझ अकिंचन के द्वारा पूरा हुआ तो मेरा रोम- रोम गुरुसत्ता की असीम अनुकम्पा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने लगा।

🌹 के.पी. पाण्डेय आई ए एस पटना (बिहार)    
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (अंतिम भाग)

🌹 आराधना और ज्ञानयज्ञ     
🔴 परिवार में रात्रि के समय कथा-कहानियाँ कहने के अपने लाभ हैं। इस प्रयोजन के लिये प्रज्ञा पुराण जैसे ग्रन्थ अभीष्ट आवश्यकता-पूर्ति कर सकते हैं। परस्पर विचार-विनिमय वाद-विवाद प्रतियोगिता, कविता सम्मेलन भी कम उपयोगी नहीं हैं। हर व्यक्ति स्वयं कविता तो नहीं कर या कह सकता है, पर दूसरों की बनाई हुई प्रेरणाप्रद कविताएँ सुनाने की व्यवस्था तो कहीं भी हो सकती है। चित्र प्रदर्शनियाँ भी जहाँ सम्भव हो, इस प्रयोजन की पूर्ति में सहायक हो सकती हैं।     

🔵 खोजने पर ऐसे अनेकों सूत्र हाथ लग सकते हैं जो ज्ञानयज्ञ की, विचारक्रान्ति की, सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन की, दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के लिये कौन, क्या किस प्रकार कुछ कर सकता है? इसकी खोज-बीन करते रहने पर हर जगह हर किसी को कोई न कोई मार्ग मिल सकता है। ढूँढ़ने वाले अदृश्य परमात्मा तक को प्राप्त कर लेते हैं, फिर ज्ञानयज्ञ की प्रक्रिया को अग्रगामी बनाने के लिये मार्ग न मिले, ऐसी कोई बात नहीं है। आवश्यकता है-उसका महत्त्व समझने की, उस पर ध्यान देने की।           
                      
🔴 उपासना से भावना का, जीवन साधना से व्यक्तित्व का और आराधना से क्रियाशीलता का परिष्कार और विकास होता है। आराधना उदार सेवा साधना से ही सधती है। सेवा कार्यों में सामान्यत: वे सेवायें हैं जिनसे लोगों को सुविधाएँ मिलती हैं। श्रेष्ठतर सेवा वह है जिससे किसी की पीड़ा का, अभावों का निवारण होता है। श्रेष्ठतम सेवा वह है जिससे व्यक्ति पतन से हटकर उन्नति की ओर मोड़ा जा सके। सुविधा बढ़ाने और पीड़ा दूर करने की सेवा तो कोई आत्मचेतना सम्पन्न ही कर सकता है। यह सेवा भौतिक सम्पदा से नहीं, दैवी सम्पदा से की जाती है। दैवी सम्पदा देने से घटती नहीं बढ़ती है। इसलिये भी वह सर्वसुलभ और श्रेष्ठ मानी जाती है।

🔵 सन्त और ऋषि स्तर के व्यक्ति पतन निवारण की सेवा को प्रधानता देते रहे हैं। इसीलिये वे संसार में पूज्य बने। जिनकी सेवा की गई वे भी महान बने। सेवा की यह सर्वश्रेष्ठ धारा ज्ञानयज्ञ के माध्यम से कोई भी अपना सकता है। स्वयं लाभ पा सकता है और अगणित व्यक्तियों को लाभ पहुँचाकर पुण्य का भागीदार बन सकता है।  

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 धर्म एक और सनातन है

🔴 गाँधी जी दक्षिण अफ्रीका में थे। अफ्रीकियों के स्वत्वाधिकार के लिए उनका आंदोलन सफलतापूर्वक चल रहा था, ब्रिटिश सरकार के इशारे पर एक दिन मीर नामक एक पठान ने गाँधी जी पर हमला कर दिया, गॉधी जी गंभीर रूप से घायल हुए। मनुष्य का सत्य, सेवा और सच्ची धार्मिकता का मार्ग है ही ऐसा कि इसमें मनुष्य को सुविधाओं की अपेक्षा कष्ट ही अधिक उठाने पडते हैं।

🔵 पर इससे क्या उच्च आत्माएँ कभी अपने पथ से विचलित हो जाती है क्या? बुराई की शक्ति अपना काम बंद नही करती तो फिर भलाई की शक्ति तो सौगुनी अधिक है, वह हार क्यों मानने लगे गाँधी जी को स्वदेश लौटने का आग्रह किया गया पर वे न लौटे। घायल गाँधी जी पादरी जोसेफ डोक के मेहमान बने और कुछ ही दिनों मे यह संबध घनिष्टता में परिवर्तित हो गया।

🔴 पादरी जोसेफ डोक यद्यपि बैपटिस्ट पंथ के अनुयायी और धर्म-गुरु थे, तथापि गांधी जी के संपर्क से वे भारतीय धर्म और सस्कृति से अत्यधिक प्रभावित हुए। वे धीरे-धीरे भारतीय स्वातंत्रता संग्राम का भी समर्थन करने लगे।

🔵 पादरी डोक के एक अंग्रेज मित्र ने उनसे आग्रह किया कि वे भारतीयों के प्रति इतना स्नेह और आदर भाव प्रदर्शित न करें अन्यथा जातीय कोप का भाजन बनना पड़ सकता है, इस पर डोक ने उत्तर दिया- मित्र क्या अपना धर्म-पीडितों और दुखियों की सेवा का समर्थन नहीं करता, क्या गिरे हुओं से ऊपर उठने मे मदद देना धर्म-सम्मत नही ? यदि ऐसा है तो मैं अपने धर्म का ही पालन कर रहा हूँ। भगवान् ईसा भी तो ऐसा ही करते हुए सूली पर चढे थे फिर मुझे घबराने की क्या आवश्यकता?

🔴 मित्र की आशंका सच निकली कुछ ही दिनों में गोरे उनके प्रतिरोधी बन गये और उन्हें तरह-तरह से सताने लगे। ब्रिटिश अखबार उनकी सार्वजनिक निंदा और अपमान करने से नहीं चूके थे, लेकिन इससे पादरी डोक की सिद्धांत-निष्ठा में कोई असर नही पडा़। बहुत सताए जाने पर भी वो भारतीयो का समर्थन भावना पूर्वक करते रहे।

🔵 गाँधी जी जहाँ उनके इस त्याग से प्रभावित थे, वही उन्हें इस बात का दुःख भी बहुत अधिक था वे पादरी डोक को उत्पीडित नहीं देखना चाहते थे, इसलिये जिस तरह एक मित्र अपने मित्र के प्रति वेदना रखता है। गाँधी जी भी उनके पास गए और बोले- आपको इन दिनो अपने जाति भाइयों से जो कष्ट उठाने पड रहे हैं उसके कारण हम भारतीयों की ओर से आपका आभार मानते हैं, पर आपके कष्ट हमसे नही देखे जाते। आप हमारा समर्थन बंद कर दें। परमात्मा हमारे साथ हैं यह लडाई भी हम लोग निपट लेगे।

🔴 इस पर पादरी डोक ने कहा मि० गाँधी आपने ही तो कहा था कि धर्म एक और सनातन है पीडित मानवता की सेवा।'' फिर यदि सांप्रदायिक सिद्धन्तों की अवहेलना करके मैं सच्चे धर्म का पालन करूँ तो इसमे दुख करने की क्या बात और फिर यह तो मैं स्वांतः सुखाय करता हूँ। मनुष्य धर्म की सेवा करते आत्मा को जो पुलक और प्रसन्नता होनी चाहिए, वह प्रसाद मुझे मिल रहा है, इसलिए वाह्य अडचनों, दुःखों और उत्पीडनों की मुझे किंचित भी परवाह नही।

🔵 पादरी डोक अंत तक भारतीयों का समर्थन करते रहे। उन जैसे महात्माओं के आशीर्वाद का फल है कि हम भारतीय आज अपने धर्म, आदर्श और सिद्धन्तों पर निष्कंटक चलने के लिए स्वतंत्र है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 40, 31

👉 अहंकारिता और जल्दबाजी का दुष्परिणाम

🔴 दिल्ली का बादशाह मुहम्मद तुगलक विद्वान भी था और उदार भी। प्रजा के लिए कई उपयोगी काम भी उसने किए; किन्तु दो दुर्गुण उसमें ऐसे थे, जिनके कारण वह बदनाम भी हुआ और दुर्गति का शिकार भी। एक तो वह अहंकारी था; किसी की उपयोगी सलाह भी अपनी बात के आगे स्वीकार न करता था। दूसरा जल्दबाज इतना कि जो मन में आए उसे तुरंत कर गुजरने के लिए आतुर हो उठता था।
 
🔵 उसी सनक में उसने नयी राजधानी दौलताबाद बनायी और बन चुकने पर कठिनाइयों को देखते हुए रद्द कर दिया। एक बार बिना चिह्न के तांबे के सिक्के चलाए। लोगों ने नकली बना लिए और अर्थ व्यवस्था बिगड़ गयी। फिर निर्णय किया कि तांबे के सिक्के खजाने में जमा करके चाँदी के सिक्कों में बदल लें। लोग इस कारण सारा सरकारी कोष खाली कर गए। एक बार चौगुना टैक्स बढ़ा दिया। लोग उसका राज्य छोड़कर अन्यत्र भाग गए। 

🔴 विद्वत्ता और उदारता जितनी सराहनीय है, उतनी ही अहंकारिता और जल्दबाजी हानिकर भी-यह लोगों ने तुगलक के क्रिया-कलापों से प्रत्यक्ष देखा। उसका शासन सर्वथा असफल रहा।
  
🌹 प्रज्ञा पुराण भाग 2 पृष्ठ 11

👉 किसी का जी न दुखाया करो (अंतिम भाग)

🔴 तुम समझते हो कि तुम स्पष्ट वक्ता हो। तुम्हें अभिमान है कि तुम सत्य के नाम पर किसी की भी अप्रसन्नता से नहीं डरते। तुम्हारा विश्वास है कि अपने सिद्धान्त की यत्किंचित् भी अवहेलना देखना तुम नहीं चाहते। पर स्पष्ट वक्ता का अर्थ क्या दूसरे के जीवों दुखाना ही है? क्या सत्य इतनी कठोर वस्तु है कि उसके लिये दूसरे की प्रसन्नता की हत्या करनी पड़े?

🔵 क्या संसार में तुम्हारे ही मात्र सिद्धान्त सत्य हैं? या संसार में दूसरों को अपने स्वतन्त्र विचार रखने का अधिकार ही नहीं है? सत्य को प्रेम से भी समझाया जा सकता है। स्पष्ट वक्ता इस प्रकार से भी कह सकता है कि किसी दूसरे का जी न दुःखे। सिद्धान्त का स्थापन सुन्दर ढंग से भी किया जा सकता है।

🔴 ‘भिन्न रुचिर्हि लोके’ के अनुसार संसार भिन्न रुचि वाला है। जब भाइयों-भाइयों और मित्रों-मित्रों में भी सभी बातें समान नहीं होतीं तो साधारण मनुष्यों में तो सदा विचारों का मेल खाते जाना असम्भव ही है। यदि विवाद में सफल होना चाहते हो तो विवाद निष्कर्ष के लिये करो, केवल बकवास के लिये नहीं। यदि अपनी बात की सच्ची में तुम्हें विश्वास है तो उस पर अड़े मत रहो। दूसरों को उसे समझाने का प्रयत्न करो।

🔵 अपने पक्ष को स्थापित करना चाहते हो तो युक्तियों से काम लो, अपने अभिमान के कारण उसे थोपने का प्रयत्न न करो, और चाहे कुछ भी करो मानवता के नाते किसी का जी को तो न दुखाया करो।

🌹 समाप्त
🌹 अखण्ड ज्योति फरवरी 1948 पृष्ठ 24 

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 16)

🌹 विचारों का व्यक्तित्व एवं चरित्र पर प्रभाव

🔴 विचारों का तेज ही आपको ओजस्वी बनाता है और जीवन संग्राम में एक कुशल योद्धा की भांति विजय भी दिलाता है। इसके विपरीत आपके मुर्दा विचार आपको जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पराजित करके जीवित मृत्यु के अभिशाप के हवाले कर देंगे। जिसके विचार प्रबुद्ध हैं उसकी आत्मा प्रबुद्ध है और जिसकी आत्मा प्रबुद्ध है उससे परमात्मा दूर नहीं है।

🔵 विचारों को जाग्रत कीजिये, उन्हें परिष्कृत कीजिये और जीवन के हर क्षेत्र में पुरस्कृत होकर देवताओं के तुल्य ही जीवन व्यतीत करिये। विचारों की पवित्रता से ही मनुष्य का जीवन उज्ज्वल एवं उन्नत बनता है इसके अतिरिक्त जीवन को सफल बनाने का कोई उपाय मनुष्य के पास नहीं है। सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति से बड़ी शक्ति और क्या होगी?

🔴 भावनाओं और विचारों का प्रभाव स्थूल शरीर पर पड़े बिना नहीं रहता। बहुत समय तक प्रकृति के इस स्वाभाविक नियम पर न तो विश्वास किया गया न उपयोग। लोगों को इस विषय में जरा भी चिन्ता नहीं थी कि मानसिक स्थितियों का प्रभाव बाह्य स्थिति पर पड़ सकता है और आन्तरिक जीवन का कोई सम्बन्ध मनुष्य के बाह्य जीवन से भी हो सकता है। दोनों को एक दूसरे से प्रथक मानकर गतिविधियां चलती रही। आज जो शरीर शास्त्री अथवा चिकित्सक यह मानने लगे हैं कि विचारों का शारीरिक स्थिति से बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध है, वे पहले बहुत समय तक औषधियों जैसी जड़ वस्तुओं का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है— इसके प्रयोग पर ही अपना ध्यान केन्द्रित किये रहे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 24)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए  

🔵 इस द्वन्द्व के चलते देवता तो किसी प्रकार सन्तुष्ट भी हो सके और परस्पर एक सीमा तक तालमेल भी बिठा सके, पर दैत्य सर्वदा विग्रह में ही उलझे रह गये। वे न केवल देव पक्ष से जूझते रहे, वरन् आपा-धापी छीना-झपटी में उन्हें अपने स्तर के लोगों से भी आये दिन निपटना पड़ा। अनीति के आधार पर हस्तगत हुई उपलब्धियाँ अपनी बिरादरी वालों को भी चैन से नहीं बैठने देती। उनके बीच, लूट में अधिक हिस्सा पाने की प्रवृत्ति निरन्तर विग्रह भड़काती रहती है। 

🔴 अच्छा होता-कहीं ऐसी समझ उपज सकी होती कि आवश्यकता के अनुरूप साधन इस सुविस्तृत प्रकृति कलेवर में पर्याप्त मात्रा में विद्यमान हैं, तब उन्हें मिल बाँटकर काम चलाने की समझदारी क्यों न अपनाई जाये? पर दुर्बुद्धि न जाने क्यों तथाकथित समझदारों के सिर ताबड़तोड़ आक्रमण करती है, फलत: अभावग्रस्त समझे जाने वालों की तुलना में समर्थ, सशक्त ही अधिक घाटे में रहते हैं। इतना ही नहीं, जब वे उन्मादी हाथियों की तरह लड़ते हैं, तो अपने क्षेत्र की सुविस्तृत हरियाली को रौंद-दबोच कर तोड़-मरोड़ कर रख देते हैं। स्थिति ऐसी बना देते हैं, जिसमें वे स्वयं अपयश के भागी बनते हैं, आत्म प्रताडऩा की आग में जलते हैं और साथ ही वातावरण को विपन्न बनाकर रख देते हैं। न चैन से बैठते हैं और न दूसरों को बैठने देते हैं।    

🔵 मिल बाँटकर खाने योग्य सुविधा-साधन प्रकृति सदा से उत्पन्न करती रही है और भविष्य में भी उसकी यही रीति नीति बनी रहेगी, पर उस हविश को क्या किया जाये, जो संसार भर का सब कुछ अपने ही छोटे से कटोरे में बटोर लेने के लिए बेहतर आकुल रहती है। यद्यपि यह चन्द्रमा, आकाश से उतर कर उसी के घरौंदे में खेलते रहने के लिए न कभी तैयार हुआ और न कभी भविष्य में ऐसा करने के लिए सहमत होते दीख पड़ता है। ऐसी दशा में अबोध बालक कभी स्वयं हैरान हो, कभी घरवालों पर खीझे और कभी आसमान तक लातें चलाकर चन्द्रमा को धराशायी बनाने के लिए रौद्र रूप धारण करे, तो क्या किया जाये?  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 पूजा-उपासना के मर्म (भाग 1)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 पात्रता का विकास अगर आदमी न कर सका। केवल उसके दिमाग पर ये वहम और ये ख्वाब और ये ख्वाहिश जमा हुआ बैठा रहा कि लकड़ी की माला और जबान की नोंक से उच्चारण किया जाने वाला मंत्र राम-राम, राम-राम चिल्लाता रहा, तोते के तरीके से टें-टें, टें-टें, चिल्लाता रहता है और हम राम-राम जबान में से चिल्लाते रहते हैं। राम नाम जबान के कोने में से चिल्लाया गया हो तो बेकार है ऐसा राम का नाम, कुछ फायदा नहीं हो सकता, राम के नाम का।

🔵 लकड़ी के माला के ऊपर जो गायत्री मंत्र घुमाया गया है, मैं नहीं जानता उसमें से कुछ फायदा ले सकता है कि नहीं। मैं लाखों बच्चों को जानता हूँ, जो शिकायत करते हुए आते हैं और कहते हैं राम का नाम जपा था, हमको कोई फायदा नहीं हुआ और लाखों मनुष्य मेरे पास आते रहते हैं और कहते हैं, हमने गायत्री मंत्र जपा था, पर हमको कोई फायदा नहीं हुआ। और मैं इस बात की तस्दीक करता हूँ, कोई फायदा न हुआ है और न आगे होगा। 

🔴 लेकिन मैं आपको यकीन दिला सकता हूँ कि यह गायत्री मंत्र अगर सही तरीके से जपा गया हो और सही तरीके से जीवन में धारण किया गया हो और जीवन की नसों-नाड़ियों में, भावनाओं में, विचारणा में ओत-प्रोत किया गया हो, तो आदमी को चमत्कार दिखा सकता है और चमत्कार का सबूत और चमत्कार का नमूना हूँ मैं, जो आपके सामने बैठा हुआ हूँ। मैं एक नमूना हूँ और मैं एक सबूत हूँ। मेरी जिन्दगी के सैकड़ों पन्नों के अध्याय हैं और वह सब बन्द हैं, मैंने सील बन्द कर दिया है और मैंने इसलिये सील करके रखे हैं कि मेरे मरने तक के लिये उनको खोल के नहीं रखा जाये।

🔵 इतने लोगों की मैंने सेवाएँ की, इतने लोगों की सहायताएँ की। उनकी सेवा और सहायता का ब्यौरा इतना बड़ा है कि आपको यह मालूम पड़ेगा कि जो एक आदमी अपनी समस्याओं को पूरा नहीं कर सकता? एक आदमी अपनी ख्वाहिशों को पूरा नहीं कर सकता? लेकिन एक आदमी इतने ज्यादा मनुष्यों के, इतने ज्यादा किस्म की सहायता करने में समर्थ है। हाँ! मैं कहता हूँ, समर्थ हूँ।

🌹 आज की बात समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 57)

🌹 अनगढ़ मन हारा, हम जीते

🔴 आत्मा, परमात्मा के घर से एकाकी आता है। खाना, सोना चलना भी अकेले ही होता है। भगवान के घर भी अकेले ही जाना पड़ता है। फिर अन्य अवसरों पर भी आपको परिष्कृत और भावुक मन के सहारे उल्लास अनुभव कराता रहे तो इसमें क्या आश्चर्य की बात है? अध्यात्म के प्रतिफल रूप में मन में इतना परिवर्तन तो दृष्टिगोचर होना ही चाहिए। शरीर को जैसे अभ्यास में ढालने का प्रयास किया जाता है, वह वैसा ही ढल जाता है। उत्तरी ध्रुव के एस्किमो केवल मछलियों के सहारे जिंदगी गुजार देते हैं। दुर्गम हिमालय एवं आल्प्स पर्वत के ऊँचे क्षेत्रों में रहने वाले अभावों के बावजूद स्वस्थ लम्बी जिन्दगी जीते हैं। पशु भी घास के सहारे गुजारा कर  लेते हैं। मनुष्य भी यदि उपयोगी पत्तियाँ चुनकर अपना आहार निर्धारित कर ले, तो अभ्यास न पड़ने पर ही थोड़ी गड़बड़ रहती है।

🔵 बाद में गाड़ी ढर्रे पर चलने लगती है। ऐसे-ऐसे अनेक अनुभव हमें उस प्रथम हिमालय यात्रा में हुए और जो मन सर्वसाधारण को कहीं से कहीं खींचे-खींचे फिरता है, वह काबू में आ गया और कुकल्पनाएँ करने के स्थान पर आनन्द एवं उल्लास भरी अनुभूतियाँ अनायास ही देने लगा। संक्षेप में यही है हमारी ‘‘सुनसान के सहचर’’ पुस्तक का सार-संक्षेप। ऋतुओं की प्रतिकूलता से निपटने के लिए भगवान ने उपयुक्त माध्यम रखे हैं। जब इर्द-गिर्द बर्फ पड़ती है, तब गुफाओं के भीतर समुचित गर्मी रहती है। गोमुख क्षेत्र की कुछ हरी झाड़ियाँ जलाने से जलने लगती हैं।

🔴 रात्रि को प्रकाश दिखाने के लिए ऐसी ही एक वनौषधि झिलमिल जगमगाती रहती है। तपोवन और नन्दन वन में एक शकरकंद जैसा अत्यधिक मधुर स्वाद वाला ‘‘देवकंद’’ जमीन में पकता है। ऊपर तो यह घास जैसा दिखाई देता है, पर भीतर से उसे उखाड़ने पर आकार में इतना बड़ा निकलता है कि कच्चा भूनकर एक सप्ताह तक गुजारा चल सकता है। भोज पत्र के तने की मोटी-गाँठें होती हैं। उन्हें कूटकर चाय की तरह क्वाथ बना लिया जाए तो बिना नमक के भी वह क्वाथ बड़ा स्वादिष्ट लगने लगता है। भोज पत्र का छिलका ऐसा होता है कि उसे बिछाने, ओढ़ने और पहनने के काम में आच्छादन रूप में लिया जा सकता है।

🔵 यह बातें यहाँ इसलिए लिखनी पड़ रही हैं कि भगवान ने हर वस्तु की असह्यता से निपटने के लिए सारी व्यवस्था रखी है। परेशान तो मनुष्य अपने मन की दुर्बलता से अथवा अभ्यस्त वस्तुओं की निर्भरता से होता है। यदि मनुष्य आत्म-निर्भर रहे तो तीन चौथाई समस्याएँ हल हो जाती हैं। एक चौथाई के लिए अन्य विकल्प ढूँढ़े जा सकते हैं और उनके सहारे समय काटने के अभ्यास किए जा सकते हैं। मनुष्य हर स्थिति में अपने को फिट कर सकता है। उसे तब हैरानी होती है, जब वह यह चाहता है कि अन्य सब लोग उसकी मर्जी के अनुरूप बन जाएँ, परिस्थितियाँ अपने अनुकूल ढल जाएँ। यदि अपने को बदल लें, तो हर स्थिति से गुजरा और उल्लासयुक्त बना रहा जा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 58)

🌹 लक्षपूर्ति की प्रतीक्षा

🔵 आहार हलका हो जाने से नींद भी कम हो जाती है। फल तो अब दुर्लभ हैं पर शाकों से भी फलों वाली सात्विकता प्राप्त हो सकती है। यदि शाकाहार पर रहा जाय तो साधन के लिए चार पांच घंटे की नींद पर्याप्त हो जाती है।

🔴 जाड़े की रात लम्बी होती हैं। नींद जल्दी ही पूरी हो गई। आज चित्त कुछ चंचल था। यह साधना कब तक पूरी होगी? लक्ष कब तक प्राप्त होगा? सफलता कब तक मिलेगी? ऐसे-ऐसे विचार उठ रहे थे। विचारों की उलझन भी कैसी विचित्र है, जब उनका जंजाल उमड़ पड़ता है तो शान्ति की नाव डगमगाने लगती है। इस विचार प्रवाह में न भजन बन पड़ रहा था, न ध्यान लग रहा था। चित्त ऊबने लगा। इस ऊब को मिटाने के लिए कुटिया से निकला और बाहर टहलने लगा। आगे बढ़ने की इच्छा हुई। पैर चल पड़े। शीत तो अधिक था, पर गंगा माता की गोद में बैठने का आकर्षण भी कौन कम मधुर है, जिसके सामने शीत की परवा हो? तट से लगी हुई एक विशाल शिला जलधारा में काफी भीतर तक धंसी पड़ी थी। अपने बैठने का वही प्रिय स्थान था। कम्बल ओढ़ कर उसी पर जा बैठा। आकाश की ओर देखा तो तारों ने बताया कि अभी दो बजे हैं।

🔵 देर तक बैठा रहा तो झपकी आने लगी। गंगा का ‘कलकल हरहर’ शब्द भी मन को एकाग्र करने के लिये ऐसा ही है जैसे शरीर के लिए झूला-पालना! बच्चे को झूला पालने में डाल दिया जाय तो शरीर के साथ ही उसे नींद आने लगती है। जिस प्रदेश में इन दिनों यह शरीर है वहां का वातावरण इतना सौम्य है कि यह जलधारा का दिव्य कलरव ऐसा लगता है मानो वात्सल्यमयी माता लोरी सुना रही हो। चित्त एकाग्र होने के लिये, यह ध्वनि लहरी कलरव नादानुसंधान से किसी भी प्रकार कम नहीं है। मन को विश्राम मिला। चित्त शान्त हो गया। झपकी आने लगीं। लेटने को जी चाहा। पेट में घुटने लगाये। कम्बल ने ओढ़ने बिछाने के दोनों काम साध दिये। नींद के हलके झोंके आने आरम्भ हो गये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 16 गोलियां लगने के बाद भी दहाड़ता रहा ‘चीता’

🔴 मौत के मुहाने पर खड़ा होने के बावजूद उसने बंदूक उठाई और एक ही गोली में लश्कर-ए-तैयबा के दुर्दांत आतंकी कमांडर अबू हारिश को ढोर कर दिया। गोलीबारी थमी तो पता चला कि राजस्थान के कोटा का यह जांबाज बेटा मौत से जूझ रहा है। सेना के श्रीनगर बेस हॉस्पीटल ने हाथ खड़े कर दिए तो आनन-फानन में एयर एम्बुलेंस से दिल्ली स्थित एम्स के ट्रोमा सेंटर में लाया गया। जहां उनकी हालत गंभीर बनी हुई है।

🔵 उसका पूरा जिस्म छलनी हो चुका था…ग्रेनेड के धमाके में दोनों हाथ की हड्डियां भी टूट गई…दहशतगर्दों की गोलियों ने दाई आंख भी फोड़ दी…फिर भी ‘चीते’ की दहाड़ कम ना हुई।

🔴 सीआरपीएफ की 92 वीं बटालियन के कमांडेंट चेतन कुमार चीता (45) को मंगलवार की सुबह कश्मीर पुलिस ने जानकारी दी कि बांदीपोर जिले के हाजिन गांव में पाकिस्तान से आए आतंकियों ने डेरा डाल रखा है। चीता मौका गवाए बिना 13 राष्ट्रीय रायफल और जम्मू कश्मीर पुलिस के स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप के साथ गांव में पहुंच गए और पारे मुहल्ले में छिपे आतंकियों को घेर लिया। जिस पर आतकियों ने गोलीबारी शुरू कर दी। चीता आतंकियों को चकमा देते हुए उनके बेहद करीब जा पहुंचे, लेकिन बाकी साथी पीछे छूट गए।

🌹 आतंकवादी को मार कर ही माने

🔵 सीआरपीएफ के महानिदेशक के. दुर्गाप्रसाद ने राजस्थान पत्रिका को बताया कि आतंकियों ने चीता को निशाना बनाकर गोलियां और ग्रेनेड दागे। जिससे उनके हाथ, पैर, कूल्हे और पेट में कई गोलियां जा धसीं। एक गोली से जाबांज जवान की दाई आंख भी छलनी हो गई। इसी बीच आतंकियों के फेंके एक ग्रेनेड में धमाका होने से चीता के दोनों हाथों में भी फैक्चर हो गया और सिर एवं चेहरे में छर्रे जा धंसे। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद इस बहादुर अफसर ने लश्कर-ए-तैयबा के दुर्दांत कमांडर अबू हारिश को मार गिराया। घायल होने के बाद भी उन्होंने 16 राउंड गोलियां चलाई थीं।

🌹 हालत बेहद गंभीर

🔴 गोलीबारी थमने के बाद सेना से जवान चीता को गांव से निकालकर श्रीनगर स्थित सेना के 92 बेस हॉस्पीटल में लेकर आए। जहां इलाज का पर्याप्त इंतजाम न होने के कारण उन्हें तत्काल दिल्ली स्थित एम्स के ट्रॉमा सेंटर लाया गया। कमांडेंट के भाई प्रवीण चीता ने बताया कि हॉस्पीटल से एयरपोर्ट तक लाने के लिए रास्ते बंद कर दिए गए थे।
जहां से एयर एंबुलेंस के जरिए उन्हें रात आठ बजे दिल्ली लाया गया। उन्होंने बताया कि ऑपरेशन के बाद डॉक्टर उनके पेट में लगी छह गोलियां निकाल चुके हैं, लेकिन शरीर के बाकी हिस्सों में लगी गोलियां और छर्रे अभी निकाले जाने बाकी हैं। चिकित्सकों ने 48 घंटे तक हालात बेहद क्रिटिकल बताए हैं।

🌹 20 दिन पहले ही मारा था लखवी का भांजा

🔵 तीन महीने पहले ही चीता की तैनाती कश्मीर में की गई थी, लेकिन इस छोटे से वक्त में ही वह आतंकवादियों के बीच दहशत का पर्याय बन गए थे। 20 जनवरी को भी बांदीपोर इलाके में आतंकियों से उनकी मुठभेड़ हुई थी। जिसमें उन्होंने मुम्बई हमलों के मास्टरमाइंड जाकिर उर रहमान लखवी के भांजे और लश्कर कमांडर अबू मुसैब को मार गिराया था।

🌹 पिता ने बढ़ाया हौसला


🔴 कोटा के खेड़ली फाटक निवासी पूर्व आरएएस अफसर रामगोपाल चीता फालेज होने के कारण चल फिर नहीं सकते, लेकिन बेटे की बहादुरी का किस्सा सुन दो साल बाद बिस्तर से उठ बैठे और बोले कि मुझे अपने बेटे पर नाज है कि उसने आतंकवादियों को मार सैकड़ों मासूमों की जान बचाई है। उसे अभी और भी आतंकियों को मारना है, इसलिए जल्द ही ठीक होना होगा। मेरी दुआ है कि जब तक एक भी आतंकी जिंदा है, मेरे बेटे उनसे इसी तरह लड़ते रहेंगे। फिलहाल चेतन की पत्नी, दोनों बच्चे और बहन-बहनोई दिल्ली में है।

🌹 दुआओं का दौर शुरू

🔵 जांबाज बेटे की बहादुरी और जीवन संघर्ष की जानकारी मिलते ही की कोटा में दुआओं का दौर शुरू हो गया। तमाम सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने उनके जल्द से जल्द स्वस्थ होने की कामना की है। चेतन के मित्र हर्षवर्धन जैन ने बताया कि उनके दोस्त की बहादुरी पर पूरे शहर को नाज है।

रविवार, 19 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 Feb 2017


👉 चुटकियों में हुआ ब्लड कैंसर का इलाज

🔴 वर्ष १९८६ के प्रारंभिक दिनों में शान्तिकुञ्ज से थोड़ी दूर, रायवाला छावनी के सैनिक आवास में मैं अपनी बीमार पत्नी श्रीमती उर्मिला लाल के साथ रहता था। राँची के एक वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. रमण और कैंसर रिसर्च इन्स्टीट्यूट की रिपोर्ट के  अनुसार उन्हें ‘ब्लड कैंसर’ था, जो दुनिया के लिए आज भी लाइलाज बीमारी है।

🔵 चिकित्सकों की एक ही राय थी कि उनकी मृत्यु ६ माह के अन्दर निश्चित है। इसीलिए मैं उन्हें अपने पास रायवाला ले आया था। दिन में दो बार उन्हें १०६.४ डिग्री ताप का बुखार चढ़ता था, जो किसी भी दवा से थमता नहीं था और लगभग २ घंटे रहता ही था। रुड़की मिलिट्री हॉस्पिटल के कर्नल साहब ने भी स्वयं टेस्ट करके ‘ब्लड कैंसर’ की पुष्टि कर दी थी।

🔴 तभी रायवाला छावनी के मेजर सक्सेना ने सलाह दी कि मैं अपनी पत्नी का इलाज शान्तिकुञ्ज में कराऊँ। उर्मिला जी दिनों- दिन दुबली होती जा रही थीं, १८- २० दिनों से खाना बंद था। खाने का प्रयास करते ही उल्टी हो जाती थी। किसी तरह जीप में बिठाकर मैं उन्हें शान्तिकुञ्ज ले आया और डॉ. राम प्रकाश पाण्डेय के समक्ष उपस्थित हो गया। निरीक्षण के उपरान्त उन्होंने सलाह दी कि माता जी के दर्शन का समय है, अतः मैं पहले सपत्नीक उनके दर्शन कर लूँ, उसके बाद ही चिकित्सा प्रारम्भ करवाई जाए।
  
🔵 मैं आधे- अधूरे मन से माता जी के दर्शन के लिए चल पड़ा, क्योंकि मेरे मन में धार्मिक गुरुओं के प्रति अच्छी धारणा नहीं थी। अपने पिछले अनुभवों के कारण मैं उन्हें समाज का नासूर मानता था। किसी प्रकार पत्नी को सहारा दे कर प्रथम तल वाले उस कक्ष में ले गया, जहाँ माता जी बैठती थीं।

🔴 पत्नी ने रो- रो कर अपना दुखड़ा सुनाया। माता जी ने बड़े स्नेह और दुलार से कहा था ‘‘अरे बेटी, तुझे कुछ भी तो नहीं हुआ है, वैसे ही दुःखी हो रही है। तू तो अभी बहुत जियेगी और गुरुदेव का कार्य भी करेगी। छोटी- सी बीमारी है, पाण्डेय जी से जड़ी- बूटी लेकर ठीक हो जायेगी।’’

🔵 माता जी के शब्दों में न जाने कैसा जादू था कि मैं भाव- विह्वल हो उठा। मेरी आँखों से आँसुओं की धार फूट पड़ी। मैंने अपना सिर उनके चरणों में रख दिया। उन्होंने कहा भोजन- प्रसाद लेकर ही जाना। उस समय ऊपर ही भोजन की व्यवस्था थी। पता नहीं कैसे, पत्नी ने भी आधी रोटी खा ली।

🔴 डॉ. पाण्डेय जी के पास आने पर उन्होंने एक दवा खिलायी और कुछ देर और बैठने को कहा। दस मिनट के बाद मेरी पत्नी को ढेर सारी उल्टी हुई। उल्टी इतनी बदबूदार थी कि जैसे कोई जानवर मर कर सड़ गया हो। पास खड़े एक व्यक्ति ने हाथ- मुँह धुलवाया और अपने हाथों से फर्श की सफाई की। मैं सेवा भावना के इस रूप से परिचित नहीं था, सोचा कोई सफाई कर्मचारी होगा। मुझे तो बाद में पता चला कि सफाई करने वाले सज्जन उड़ीसा से आए हुए एक एम.बी.बी.एस. हैं, जो आदरणीय पाण्डेय जी से आयुर्वेद की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

🔵 मैं पत्नी को वापस रायवाला ले गया। वहाँ चिकित्सा प्रारम्भ हुई और पहले ही दिन बुखार १०२ डिग्री से अधिक नहीं बढ़ा। दूसरे दिन केवल १०१ डिग्री तक रहा और रात्रि के २ बजे के आस- पास पत्नी ने मुझे जगा कर कहा कि मुझे खाने को चाहिए, भूख लगी है। डॉक्टर की सलाह के अनुसार मैंने एक सेब के चार टुकड़े किए, आधे ग्लास पानी में उबाल कर जूस को ठंडा करके पीने दे दिया। सेब का जूस पी कर उन्होंने कहा कि वह रोटी खाएँगी।

🔴 मुझे लगा कि अब उनका अंतिम समय आ गया है। यही सोचकर मैंने दो रोटियाँ सेंक दीं। पहली रोटी खाते ही उन्हें नशा- सा हो गया और वह बिना हाथ धोए सो ही गईं। ऐसे, जैसे बेहोश पड़ी हों। सुबह साढ़े चार बजे मैंने बाबूजी (डॉ. रामप्रकाश पाण्डेय) को फोन कर सारी बातें बताईं। पिता की तरह थोड़ी डाँट सुनने को मिली और निर्देश हुआ कि यथाशीघ्र, पत्नी की नींद खुलते ही, शांतिकुंज लेकर आऊँ।

🔵 शांतिकुंज पहुँचने पर उन्होंने पुनः उर्मिला जी का निरीक्षण किया। दवाइयाँ बदल दीं और मुझे विशेष निर्देश दिये, जो खान- पान और चिकित्सा से सम्बन्धित थे।  उन्होंने कहा- ठीक से देख- भाल करोगे, तो १० दिनों में १५ किलो वजन बढ़ जाएगा और शरीर में नई जान आ जाएगी।

🔴 नकारात्मक सोच में डूबा हुआ मेरा मन अपने- आप से कह उठा ‘‘वाह! बड़ा डॉक्टर आ गया, १० दिनों में १५ किलो वजन बढ़ा देगा।’’  मुझे क्या पता था कि महाकाल के इस घोंसले में जड़- चेतन सभी केवल उन्हीं की आज्ञा का पालन करते हैं। उनके शिष्य जो कहें,  वैसा न हो, यह असम्भव है। १० दिनों के बाद मैं जब पुनः जाँच कराने आया, तो पाया गया कि मेरी पत्नी का वजन था ५४ किलो। उस दिन वह स्वयं सीढ़ियाँ चढ़कर वंदनीया माता जी के पास आशीर्वाद लेने गईं।

🔵 ६ महीने की चिकित्सा के बाद जब पुनः मिलिट्री अस्पताल रुड़की में कैंसर का टेस्ट किया गया, तो रिपोर्ट देखकर कर्नल साहब देर तक मेरी पत्नी को अविश्वास की दृष्टि से देखते रहे। रिपोर्ट में कैंसर का नामोंनिशान नहीं था।

🔴 इस घटना को २४ वर्ष बीत चुके हैं। आज भी सब कुछ सामान्य है। वंदनीया माताजी की अनुकम्पा से मेरी पत्नी का उत्तम स्वास्थ्य आज भी आस- पास की महिलाओं के लिए एक उदाहरण है।

🌹 भास्कर प्रसाद लाल साधनगर, पालम कालोनी (नई दिल्ली)   
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/Wonderfula

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 43)

🌹 आराधना और ज्ञानयज्ञ   

🔴 आदर्शवादी लोकशिक्षण के लिये इस प्रकार की आवश्यकता अनिवार्य रूप से रहती है। फिर भी यह आवश्यक नहीं कि पूर्णता प्राप्त करने तक हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहा जाये। छठी कक्षा का विद्यार्थी पाँचवी कक्षा वाले की तो कुछ न कुछ सहायता कर ही सकता है। अपने से कम योग्यता एवं स्थिति वालों को मार्गदर्शन करने में कोई भी समर्थ एवं सफल हो सकता है।   

🔵 इन दिनों उपरोक्त प्रयोजन यंत्रों की सहायता से भी बहुत कुछ हो सकता है। प्राचीन काल में पुस्तकें हाथ से लिखी जाती थीं पर अब तो वे प्रेस से मशीनों से छपती हैं। इसी प्रकार दृश्य और श्रव्य के माध्यम भी अनेकों सुलभ हैं। उसका प्रयोग ज्ञान का विस्तार करने के लिये किया जा सकता है। टेप रिकार्डर में लाउडस्पीकर लगाकर संगीत और प्रवचन के रूप में होने वाली गोष्ठियों की आवश्यकता पूरी की जा सकती है। स्लाइड प्रोजेक्टर (प्रकाश चित्र यंत्र) कम लागत का और लोकरंजन के साथ लोकमंगल का प्रयोजन पूरा करने वाला उपकरण है। वीडियो कैसेट इस निमित्त बनायें और जहाँ टी०वी० है, वहाँ दिखाये जा सकते हैं। टेप प्लेयर पर टेप सुनाये जा सकते हैं।          
                      
🔴 संगीत टोलियाँ जहाँ भी थोड़े व्यक्ति एकत्रित हों, वहीं अपना प्रचार कार्य आरम्भ कर सकती हैं। लाउड स्पीकरों पर रिकार्ड या टेप बजाये जा सकते हैं। इस सन्दर्भ में दीपयज्ञों की आयोजन प्रक्रिया अतीव सस्ती, सुगम और सफल सिद्ध होती है। इस माध्यम से कर्मकाण्ड के माध्यम से आत्मनिर्माण, मध्याह्नकाल के महिला सम्मेलन में परिवार निर्माण और रात्रि के कार्यक्रम में समाज निर्माण की सुधार प्रक्रिया और संस्थापन विद्या का समावेश किया जा सकता है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जीवन-समर्पण की अनोखी पुण्य-प्रक्रिया

🔴 बात बहुत पुरानी है। नालंदा विश्वविद्यालय के विद्यार्थी उमंग भरे हृदयों से चीनी पर्यटक ह्वेनसांग को भाव भीनी विदाई देने जा रहे थे। सिंधु नदी के जल पर हिलती डोलती एक नौका चल रही थी। नौका मे बैठे हुए विद्यार्थी ह्वेनसांग के साथ विद्या-विनोद तथा धर्म-चर्चाऐं कर रहे थे। नाव किनारे की ओर तेजी से बढ़ती जा रही थी।

🔵 इतने में एकाएक एक भारी तूफान का झोंका आया। नौका तेजी से हिलने-डुलने लगी। अब डूबी तब डूबी का भय दिखाई देने लगा। नाविकों ने नौका को स्थिर रखने का जी-तोड़ प्रयत्न किया पर दुर्भाग्य से सब प्रयास विफल हुए।

🔴 और नौका में भार भी क्या कम था ? ह्वेनसांग भारत भर में घूमे थे और जहाँ भी उन्होंने भगवान् तथागत की अदस्य मूर्ति देखी या अप्राप्य ग्रथ देखा उसे तत्काल अपने साथ ले आए थे। जो अप्राप्त ग्रंथ प्राप्त न हो सका, उसकी वहीं कई दिन बैठकर नकल की। ऐसे अप्राप्य ग्रन्थ केवल १०-२० नहीं थे। खासे ६५७ ग्रन्थ और भगवान बुद्ध की लगभग १५० नयन मनोहर ध्यानस्थ मूर्तियाँ नौका में रखी हुईं थी।

🔵 दैवयोग से तूफान का जोर बड़ता गया। नाविकों के सब प्रयत्न बेकार साबित हुए। अंत में उनकी दृष्टि नौका मे भरी पुस्तकों और मूर्तियों पर पडी़। उन्होंने कहा-अब बचने का केवल एक ही मार्ग है। इन सारी पुस्तकों और मूर्तियां को जल में फैंक दो तो भार कुछ कम हो जायेगा और नाव धीरे-धीरे किनारे तक पहुँच जायेगी।

🔴 एक नाविक ने तो ग्रंथों का एक बंडल नदी में फैंकने के लिए उठा ही लिया था। यह दृश्य देखकर ह्वेनसांग तथागत की मन-ही मन प्रार्थना करने लगा- भगवान्। मुझे मृत्यु का तनिक भी भय नही है। मुझे भय केवल इसी बात का है कि अपने देश के लिये मैंने इतना कष्ट उठाकर जो यह अमूल्य सामग्री उपलब्ध की है वह सब एक पल में नष्ट हो जायेगी।''

🔵 फिर ह्वेनसांग ने खडे़ होकर शांति से कहा नौका का भार ही हलका करना है न, तो मैं स्वयं जल मे कूद पडता हूँ।"

🔴 नहीं मानव-जीवन बडी़ कीमती वस्तु है। भार तो इन पुस्तकों और मूर्तियों से कम करो। इसके बिना नौका किनारे तक पहुँचना सभव नहीं है।'' नाविकों ने कहा।

🔵 ह्वेनसांग बोला "मेरे मन में इस देह का कोई मूल्य नहीं। महत्व तो इन संस्कारवान वस्तुओ का है।''

🔴 इस वार्तालाप से नालंदा विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को सहसा प्रकाश मिला। एक वृद्ध चीनी यात्री की वर्षों की मेहनत इस तरह पानी में जायेगी। जो यह चीनी यात्री ही इन संस्कारो, वस्तुओं के लिए आत्मसमर्पण कर देगा तो हमारे भारत की आतिथ्य परंपरा का क्या महत्त्व रहा?

🔵 विद्यार्थियों ने मूक भाषा में संकेत में आपस में बातचीत की। उनमें से एक तेजस्वी बालक खडा हुआ। दोनों हाथ जोडकर सबसे अभिवादन करते हुए उसने कहा- भदंत! भारतवर्ष की भूमि से आपने जो यह संस्कार निधि एकत्र की है वह केवल नौका में भार के कारण डूब जाए यह हमारे लिए असह्य है। इतना कहकर वह युवक सिंधु नदी की अथाह धारा में कूद पडा। उसके बाद सभी विद्यार्थी जल में कूद कर लुप्त हो गए।

🔴 नाविक तो इस समर्पण का अद्भुत दृश्य फटी आँखों से देखते ही रहे। जीवन समर्पण की यह अनोखी पुण्य प्रक्रिया देख कर ह्वेनसांग कीं आँखों से भी अवरिल अश्रुधारा बहने लगी।

🔵 यह वह उज्ज्वल परपरा थी, जिसने न केवल ह्वेनसांग जैसे विदेशी मनीषी को ही प्रभावित किया, अपितु संसार में भारत की सांस्कृतिक गरिमा का उच्च आदर्श प्रस्थापित किया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 38, 39

👉 विदुर का भोजन और श्रीकृष्ण

🔴 विदुर जी ने जब देखा कि धृतराष्ट्र और दुर्योधन अनीति करना नहीं छोड़ते, तो सोचा कि इनका सान्निध्य और इनका अन्न मेरी वृत्तियों को भी प्रभावित करेगा। इसलिए वे नगर के बाहर वन में कुटी बनाकर पली सुलभा सहित रहने लगे। जंगल से भाजी तोड़ लेते, उबालकर खा लेते तथा सत्यकार्यो में, प्रभु स्मरण में समय लगाते।
 
🔵 श्रीकृष्ण जब संधि दूत बनकर गए और वार्ता असफल हो गयी तो वे धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य आदि सबका आमंत्रण अस्वीकार करके विदुर जी के यहाँ जा पहुँचे। वहाँ भोजन करने की इच्छा प्रकट की।

🔴 विदुर जी को यह संकोच हुआ कि शाक प्रभु को परोसने पड़ेंगे? पूछा- '' आप भूखे भी थे, भोजन का समय भी था और उनका आग्रह भी, फिर आपने वहाँ भोजन क्यों नहीं किया?''  

🔵 भगवान बोले-''चाचाजी! जिस भोजन को करना आपने उचित नहीं समझा, जो आपके गले न उतरा, वह मुझे भी कैसे रुचता? जिसमें आपने स्वाद पाया, उसमें मुझे स्वाद न मिलेगा, ऐसा आप कैसे सोचते हैं?''

🔴 विदुर जी भाव विह्वल हो गए, प्रभु के स्मरण मात्र से ही हमें जब पदार्थ नहीं संस्कारप्रिय लगने लगते है, तो स्वयं प्रभु की भूख पदार्थों से कैसे बुझ सकती है। उन्हें तो भावना चाहिए। उसकी विदुर दम्पत्ति के पास कहाँ कमी थी। भाजी के माध्यम से वही दिव्य आदान-प्रदान चला। दोनों धन्य हो गए।

🔵 स्वार्थी व्यक्ति उदारता पूर्वक सुविधाएँ देने का प्रयास करते हैं, कर्तव्य भाव से नहीं, इसलिए कि उसका अहसान जताकर अपनी मनमानी करवा सकें। ऐसी सुविधाएँ न भगवान ही स्वीकार करते है, न उनके भक्त। दोनों उनसे परहेज करते है।

🌹 प्रज्ञा पुराण भाग 2 पृष्ठ 11

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 15)

🌹 दिव्य विचारों से उत्कृष्ट जीवन
🔴 संसार में अधिकांश व्यक्ति बिना किसी उद्देश्य का अविचारपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं किन्तु जो अपने जीवन में उत्तम विचारों के अनुरूप ढालते हैं उन्हें जीवन ध्येय की सिद्धि होती है। मनुष्य का जीवन उसके भले-बुरे विचारों के अनुरूप बनता है। कर्म का प्रारम्भिक स्वरूप विचार है। अतएव चरित्र और आचरण का निर्माण विचार ही करते हैं यही मानना पड़ता है। जिसके विचार श्रेष्ठ होंगे उसके आचरण भी पवित्र होंगे। जीवन की यह पवित्रता ही मनुष्य को श्रेष्ठ बनाती है, ऊंचा उठाती है। अविवेकपूर्ण जीवन जीने में कोई विशेषता नहीं होती सामान्य स्तर का जीवन तो पशु भी जी लेते हैं किन्तु उस जीवन का महत्व ही क्या जो अपना लक्ष्य न प्राप्त कर सके।

🔵 भले और बुरे— दोनों प्रकार के विचार मनुष्य के अन्तःकरण में भरे होते हैं। अपनी इच्छा और रुचि के अनुसार वह जिन्हें चाहता है उन्हें जगा लेता है, जिनसे किसी प्रकार का सरोकार नहीं होता वे सुप्तावस्था में पड़े रहते हैं। जब मनुष्य कुविचारों का आश्रय लेता है तो उसका कलुषित अन्तःकरण विकसित होता है और दीनता, निकृष्टता, आधि-व्याधि, दरिद्रता, दैन्यता के अज्ञानमूलक परिणाम सिनेमा के पर्दे की भांति सामने नाचने लगते हैं। पर जब वह शुभ्र विचारों में रमण करता है तो दिव्य-जीवन और श्रेष्ठता का अवतरण होने लगता है, सुख, समृद्धि और सफलता के मंगलमय परिणाम उपस्थित होने लगते हैं। मनुष्य का जीवन और कुछ नहीं विचारों का प्रतिविम्ब मात्र है। अतः विचारों पर नियन्त्रण रखने और उन्हें लक्ष्य की ओर नियोजित करने का अर्थ है जीवन को इच्छित दिशा में चला सकने की सामर्थ्य अर्जित करना। जबकि अनियन्त्रित, अवियोजित विचार का अर्थ है, दिशाविहीन अनियन्त्रित जीवन प्रवाह।

🔴 समस्त शुभ और अशुभ, सुख और दुःख की परिस्थितियों के हेतु तथा उत्थान पतन के मुख्य कारण-विचारों को वश में रखना मनुष्य का प्रमुख कर्तव्य है। विचारों को उन्नत कीजिये उनको मंगल मूलक बनाइये, उनका परिष्कार एवं परिमार्जन कीजिये और वे आपको स्वर्ग की सुखद परिस्थितियों में पहुंचा देंगे। इसके विपरीत यदि अपने विचारों को स्वतन्त्र छोड़ दिया उन्हें कलुषित एवं कलंकित होने दिया तो आपको हर समय नरक की ज्वाला में जलने के लिए तैयार रहना चाहिए। विचारों की चपेट से आपको संसार की कोई शक्ति नहीं बचा सकती।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 23)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए  
🔵 संसार में चिरकाल से दो प्रचण्ड-धाराओं का संघर्ष होता चला आया है। इसमें से एक की मान्यता है कि अपेक्षित साधनों की बहुलता से ही प्रसन्नता और प्रगति सम्भव है। इसके विपरीत दूसरी विचारधारा यह है कि मन:स्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है। उसके आधार पर ही साधनों का आवश्यक उपार्जन और सत्प्रयोजनों के लिए सदुपयोग बन पड़ता है। वह न हो, तो इच्छित वस्तु पर्याप्त मात्रा में रहने पर भी अभाव और असन्तोष पनपता दीख पड़ता है।

🔴 एक विचारधारा कहती है कि यदि मन को साध सँभाल लिया जाये, तो निर्वाह के आवश्यक साधनों में कमी कभी नहीं पड़ सकती। कदाचित् पड़े भी, तो उस अभाव के साथ संयम, सहानुभूति, सन्तोष जैसे सद्गुणों का समावेश कर लेने पर जो है, उतने में ही भली प्रकार काम चल सकता है। कोई अभाव नहीं अखरता। दूसरी का कहना है कि जितने अधिक साधन, उतना अधिक सुख। समर्थता और सम्पन्नता होने पर दूसरे दुर्बलों के उपार्जन-अधिकार को भी हड़प कर मन चाहा मौज-मजा किया जा सकता है।   

🔵 दोनों के अपने अपने तर्क, आधार और प्रतिपादन हैं। प्रयोग भी दोनों का ही चिरकाल से होता चला आया है, पर अधिकांश लोग अपनी-अपनी पृथक मान्यतायें बनाये हुये चले आ रहे हैं। ऐसा सुयोग नहीं आया कि सभी लोग कोई सर्वसम्मत मान्यता अपना सकें। अपने अपने पक्ष के प्रति हठपूर्ण रवैया अपनाने के कारण, उनके बीच विग्रह भी खड़े होते रहते हैं। इसी को देवासुर संग्राम के नाम से जाना जाता है। पदार्थ ही सब कुछ हैं-यह मान्यता दैत्य पक्ष की है। वह भावनाओं को भ्रान्ति और प्रत्यक्ष को प्रामाणिक मानता है। देव पक्ष, भावनाओं को प्रधान और पदार्थ को गौण मानता है। दर्शन की पृष्ठभूमि पर इसी को भौतिकता और आध्यात्मिकता नाम दिया जाता है। हठवाद ने दोनों ही पक्षों को अपनी ही बात पर अड़े रहने के लिए भड़काया है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 साधक कैसे बनें? (भाग 3)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी
🔴  एक हमारा आमंत्रण अगर आप स्वीकार कर सकें तो बड़ी मजेदार बात होगी। आप हमारी दुकान में शामिल हो जायें। आप दुकान में शामिल हो जायें। हमारी दुकान में बहुत फायदा है। इसमें से हर आदमी को मुनाफेदार शेयर मिल सकता है। माँगने से तो हम थोड़ा सा ही दें पायेंगे। ज्यादा हम कहाँ तक दे पायेंगे? भीख माँगने वाले को कहाँ, किसी ने क्या, कितना दिया है? थोड़ा सा ही दे पाते हैं। लेकिन आप हिस्सेदार क्यों नहीं बन जाते हमारी दुकान में? अन्धे और पंगे का योग क्यों नहीं बना लेते। हमारे गुरु और हमने साझेदारी की है। शंकराचार्य ने और मान्धाता ने साझेदारी की थी। 

🔵 सम्राट अशोक और बुद्ध ने साझेदारी की थी। समर्थ गुरु रामदास और शिवाजी ने साझेदारी की थी। रामकृष्ण परमहंस और विवेकानन्द ने साझेदारी की थी। क्या आप ऐसा नहीं कर सकते? आप हमारे साथ शामिल हो जायें और हम और आप मिलकर के बड़ा काम करें। उसमें से जो मुनाफा आये, वो बाँट लें। अगर आप इतनी हिम्मत कर सकते हों और ये विश्वास कर सकते हों कि हम प्रामाणिक आदमी हैं तो जिस तरीके से हमने अपने गुरु की दुकान में साझा कर लिया है, आप आयें और हमारे साथ साझा करने की कोशिश करें। अपनी पूँजी उसमें लगायें। समय की पूँजी, श्रम की पूँजी, बुद्धि की पूँजी हमारी दुकान में शामिल करें और इतना मुनाफा कमायें जिससे कि आप निहाल हो जायें।

🔴 हमारी जिन्दगी के मुनाफे का यही तरीका है कि हमने अपनी पूँजी को अपने गुरुदेव के साथ में मिला दिया और उनकी कम्पनी में शामिल हो गये। हमारे गुरुदेव हमारे भगवान् की कम्पनी में शामिल हैं। हम अपने गुरुदेव की कम्पनी में शामिल हैं। आप में से हरेक को आवाहन करते हैं कि अगर आपकी हिम्मत है तो आप आयें और हमारे साथ जुड़ जायें और जुड़ करके हम जो लाभ कमायेंगे, भौतिक और आध्यात्मिक ,, उनका इतना हिस्सा आपके हिस्से में मिलेगा कि आप धन्य हो सकते हैं और निहाल हो सकते हैं, उसी तरीके से जैसे कि हम धन्य हो गये, निहाल हो गये। यही है साधकों से हमारा विनम्र अनुरोध।

🌹 आज की बात समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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