रविवार, 19 फ़रवरी 2017

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 23)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए  
🔵 संसार में चिरकाल से दो प्रचण्ड-धाराओं का संघर्ष होता चला आया है। इसमें से एक की मान्यता है कि अपेक्षित साधनों की बहुलता से ही प्रसन्नता और प्रगति सम्भव है। इसके विपरीत दूसरी विचारधारा यह है कि मन:स्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है। उसके आधार पर ही साधनों का आवश्यक उपार्जन और सत्प्रयोजनों के लिए सदुपयोग बन पड़ता है। वह न हो, तो इच्छित वस्तु पर्याप्त मात्रा में रहने पर भी अभाव और असन्तोष पनपता दीख पड़ता है।

🔴 एक विचारधारा कहती है कि यदि मन को साध सँभाल लिया जाये, तो निर्वाह के आवश्यक साधनों में कमी कभी नहीं पड़ सकती। कदाचित् पड़े भी, तो उस अभाव के साथ संयम, सहानुभूति, सन्तोष जैसे सद्गुणों का समावेश कर लेने पर जो है, उतने में ही भली प्रकार काम चल सकता है। कोई अभाव नहीं अखरता। दूसरी का कहना है कि जितने अधिक साधन, उतना अधिक सुख। समर्थता और सम्पन्नता होने पर दूसरे दुर्बलों के उपार्जन-अधिकार को भी हड़प कर मन चाहा मौज-मजा किया जा सकता है।   

🔵 दोनों के अपने अपने तर्क, आधार और प्रतिपादन हैं। प्रयोग भी दोनों का ही चिरकाल से होता चला आया है, पर अधिकांश लोग अपनी-अपनी पृथक मान्यतायें बनाये हुये चले आ रहे हैं। ऐसा सुयोग नहीं आया कि सभी लोग कोई सर्वसम्मत मान्यता अपना सकें। अपने अपने पक्ष के प्रति हठपूर्ण रवैया अपनाने के कारण, उनके बीच विग्रह भी खड़े होते रहते हैं। इसी को देवासुर संग्राम के नाम से जाना जाता है। पदार्थ ही सब कुछ हैं-यह मान्यता दैत्य पक्ष की है। वह भावनाओं को भ्रान्ति और प्रत्यक्ष को प्रामाणिक मानता है। देव पक्ष, भावनाओं को प्रधान और पदार्थ को गौण मानता है। दर्शन की पृष्ठभूमि पर इसी को भौतिकता और आध्यात्मिकता नाम दिया जाता है। हठवाद ने दोनों ही पक्षों को अपनी ही बात पर अड़े रहने के लिए भड़काया है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 साधक कैसे बनें? (भाग 3)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी
🔴  एक हमारा आमंत्रण अगर आप स्वीकार कर सकें तो बड़ी मजेदार बात होगी। आप हमारी दुकान में शामिल हो जायें। आप दुकान में शामिल हो जायें। हमारी दुकान में बहुत फायदा है। इसमें से हर आदमी को मुनाफेदार शेयर मिल सकता है। माँगने से तो हम थोड़ा सा ही दें पायेंगे। ज्यादा हम कहाँ तक दे पायेंगे? भीख माँगने वाले को कहाँ, किसी ने क्या, कितना दिया है? थोड़ा सा ही दे पाते हैं। लेकिन आप हिस्सेदार क्यों नहीं बन जाते हमारी दुकान में? अन्धे और पंगे का योग क्यों नहीं बना लेते। हमारे गुरु और हमने साझेदारी की है। शंकराचार्य ने और मान्धाता ने साझेदारी की थी। 

🔵 सम्राट अशोक और बुद्ध ने साझेदारी की थी। समर्थ गुरु रामदास और शिवाजी ने साझेदारी की थी। रामकृष्ण परमहंस और विवेकानन्द ने साझेदारी की थी। क्या आप ऐसा नहीं कर सकते? आप हमारे साथ शामिल हो जायें और हम और आप मिलकर के बड़ा काम करें। उसमें से जो मुनाफा आये, वो बाँट लें। अगर आप इतनी हिम्मत कर सकते हों और ये विश्वास कर सकते हों कि हम प्रामाणिक आदमी हैं तो जिस तरीके से हमने अपने गुरु की दुकान में साझा कर लिया है, आप आयें और हमारे साथ साझा करने की कोशिश करें। अपनी पूँजी उसमें लगायें। समय की पूँजी, श्रम की पूँजी, बुद्धि की पूँजी हमारी दुकान में शामिल करें और इतना मुनाफा कमायें जिससे कि आप निहाल हो जायें।

🔴 हमारी जिन्दगी के मुनाफे का यही तरीका है कि हमने अपनी पूँजी को अपने गुरुदेव के साथ में मिला दिया और उनकी कम्पनी में शामिल हो गये। हमारे गुरुदेव हमारे भगवान् की कम्पनी में शामिल हैं। हम अपने गुरुदेव की कम्पनी में शामिल हैं। आप में से हरेक को आवाहन करते हैं कि अगर आपकी हिम्मत है तो आप आयें और हमारे साथ जुड़ जायें और जुड़ करके हम जो लाभ कमायेंगे, भौतिक और आध्यात्मिक ,, उनका इतना हिस्सा आपके हिस्से में मिलेगा कि आप धन्य हो सकते हैं और निहाल हो सकते हैं, उसी तरीके से जैसे कि हम धन्य हो गये, निहाल हो गये। यही है साधकों से हमारा विनम्र अनुरोध।

🌹 आज की बात समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 56)

🌹 भावी रूपरेखा का स्पष्टीकरण

🔴 अपनी पहली यात्रा में ही सिद्ध पुरुषों, संतों के विषय में वस्तु स्थिति का पता चल गया। हम स्वयं जिस भ्रम में थे, वह दूर हो गया और दूसरे जो लोग हमारी ही तरह सोचते रहे होंगे उनके भ्रम का निराकरण करते रहे, अपने साक्षात्कार प्रसंग को याद रखते हुए दुहराया कि अपनी पात्रता पहले ही अर्जित न कर ली हो तो उनसे भेंट हो जाना अशक्य है, क्योंकि वे सूक्ष्म शरीर में होते हैं और उचित अधिकारी के सामने ही प्रकट होते हैं। यह जानकारियाँ हमें पहले न थीं।

🔵 हमारी हिमालय यात्रा का विवरण पूर्व में ‘‘सुनसान के सहचर’’ पुस्तक में प्रकाशित किया गया है। यह विवरण तो लम्बा है, पर सारांश थोड़ा ही है। अभावों और आशंकाओं के बीच प्रतिकूलताओं को किस तरह मनोबल के सहारे पार किया जा सकता है, इसका आभास उनमें मिल सकेगा। मन साथ दे तो सर्वसाधारण को संकट दीखने वाले प्रसंग किस प्रकार हँसी-मजाक जैसे बन जाते हैं, कुछ इसी प्रकार के विवरण उन छपे प्रसंगों में पाठकों को मिल सकते हैं। अध्यात्म मार्ग पर चलने वाले को मन इतना मजबूत तो बनाना ही पड़ता है।

🔴 पुस्तक बड़ी है, विवरण भी सुविस्तृत है, पर उसमें बातें थोड़ी सी हैं, साहित्यिक विवेचना ज्यादा है। हिमालय और गंगा तट क्यों साधना के लिए अधिक उपयुक्त हैं, इसका कारण हमने उसमें दिया है। एकांत में सूनेपन का जो भय लगता है, उसमें चिंतन की दुर्बलता ही कारण है। मन मजबूत हो तो साथियों की तलाश क्यों करनी पड़े? उनके न मिलने पर एकाकीपन का डर क्यों लगे? जंगली पशु अकेले रहते हैं। उनके लिए तो हिंस्र पशु-पक्षी भी आक्रमण करने को बैठे रहते हैं फिर मनुष्य से तो सभी डरते हैं। साथ ही उसमें इतनी सूझ-बूझ भी होती है कि आत्मरक्षा कर सके।

🔵 चिंतन भय की ओर मुड़े तो इस संसार में सब कुछ डरावना है। यदि साहस साथ दे तो हाथ, पैर, मुख और मन, बुद्धि इतनों का निरन्तर साथ रहने पर डरने का क्या कारण हो सकता है? वन्य पशुओं में कुछ ही हिंसक होते हैं। फिर मनुष्य निर्भय रहे, उनके प्रति अंतः से प्रेम भावना रखे तो खतरे का अवसर आने की कम ही सम्भावना रहती है। राजा हरिश्चन्द्र श्मशान की जलती चिताओं के बीच रहने की मेहतर की नौकरी करते थे। केन्या के मसाई शेरों के बीच झोपड़े बनाकर रहते हैं। वनवासी, आदिवासी सर्पों और व्याघ्रों के बीच रहते हैं। फिर कोई कारण नहीं कि सूझ-बूझ वाला आदमी वहाँ न रह सके, जहाँ खतरा समझा जा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 57)

🔵 देर बहुत हो गई थी। कुटी पर लौटते-लौटते अंधेरा हो गया। उस अंधेरे में बहुत रात गये तक सोचता रहा कि—मनुष्य की ही भलाई की, उसी की सेवा की, उसी के सान्निध्य की, उसी की उन्नति की, बात जो हम सोचते रहते हैं क्या इसमें जातिगत पक्षपात भरा नहीं है, क्या यह संकुचित दृष्टिकोण नहीं है? सद्गुणों की अपेक्षा से ही मनुष्य को श्रेष्ठ माना जा सकता है, अन्यथा वह अन्य जीवधारियों की तुलना में अधिक दुष्ट ही है। हमारा दृष्टिकोण मनुष्य की समस्याओं तक ही क्यों सीमित रहे? हमारा विवेक मनुष्येत्तर प्राणियों के साथ आत्मीयता बढ़ाने, उनके सुख-दुख में सम्मिलित होने के लिए अग्रसर क्यों न हो? हम अपने को मानव समाज की अपेक्षा विश्व समाज का एक सदस्य क्यों न मानें?

🔴 इन्हीं विचारों में रात बहुत बीत गई। विचारों के तीव्र दबाव में नींद बार-बार लगती-खुलती रही। सपने बहुत दीखे। हर स्वप्न में विभिन्न जीव-जन्तुओं के साथ क्रीड़ा, विनोद, स्नेह संलाप करने के दृश्य दिखाई देते रहे। उन सबके निष्कर्ष यही थे कि अपनी चेतना विभिन्न प्राणियों के साथ स्वजन सम्बन्धियों जैसी घनिष्ठता अनुभव कर रही है। आज के सपने बड़े ही आनन्ददायक थे। लगता रहा जैसे एक छोटे क्षेत्र से आगे बढ़कर आत्मा विशाल विस्तृत क्षेत्र को अपना क्रीड़ांगन बनाने के लिये अग्रसर हो रही है।

🔵 कुछ दिन पहले इस प्रदेश का सुनसान अखरता था पर अब तो सुनसान जैसी कोई जगह दिखाई ही नहीं पड़ती। सभी जगह तो विनोद करने वाले सहचर मौजूद हैं। वे मनुष्य की तरह भले ही न बोलते हों, उनकी परम्पराएं मानव समाज जैसी भले ही न हों पर इन सहचरों की भावनाएं मनुष्य की अपेक्षा हर दृष्टि से उत्कृष्ट ही है। ऐसे क्षेत्र में रहते हुए जी ऊबने का अब कोई कारण प्रतीत नहीं होता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 Feb 2017


👉 आस्था से मिली संकट से मुक्ति

🔴 मेरे बेटे को अक्सर पेट में दर्द रहता था। थोड़ी बहुत इधर- उधर की दवाइयों से वह ठीक भी हो जाता। किसी ने सुझाया- डॉक्टर को दिखा दो, ताकि अच्छे से इलाज हो जाए। कई बार ऐसी लापरवाही से अन्दर ही अन्दर गम्भीर बीमारी पकड़ लेती है। मैंने भी सोचा दिखा ही दूँ, पर बात टलती गई। एक दिन इतना असहनीय दर्द शुरू हुआ कि वह छटपटाने और रोने चिल्लाने लगा। रविवार का दिन था। अधिकतर क्लीनिक और दवा की दुकानें बंद थीं। मजबूरन मुझे दोपहर की उस कड़ी धूप में उसे साइकिल पर बैठाकर डॉक्टर की खोज में निकलना पड़ा।

🔵 डॉ० जी० एल० कुशवाहा जो अभी नये डॉक्टर थे, मेडिकल कॉलेज से हाल ही में पढ़ाई करके आए थे, उन्होंने उसे सामान्य तौर पर देखकर दवा दे दी। जब बच्चा दवा खाता तो थोड़ी देर के लिए दर्द कम हो जाता। एक हफ्ते तक ऐसा ही चलता रहा। अगले हफ्ते जब डॉक्टर को जाकर यह बात बताई तो उन्होंने दवा बदल दी; पर इससे भी कोई लाभ नहीं हुआ। इसी तरह दवा बदलते हुए लगभग एक महीना बीत गया लेकिन कोई राहत नहीं मिली। डॉ० साहब ने चिन्ता जताते हुए उसे किसी नर्सिंग होम में ले जाने की बात कही और इसके लिए एक सीनियर डॉक्टर के पास भेजा। बच्चे का इलाज यहाँ एक महीने तक चला, लेकिन बच्चे के स्वास्थ्य में किसी प्रकार का कोई सुधार नहीं हुआ। वाराणसी के डॉ० रोहित गुप्ता ने बच्चे के विषय में रिपोर्ट दी कि बच्चे की आँत में कोई गड़बड़ी आ गई है। बच्चे का इन्डोस्कोपी कराया गया, जिसकी रिपोर्ट करीब १५ दिन के बाद मिलनी थी। बीच- बीच में बच्चे की हालत काफी नाजुक हो जाती, कभी पेट में दर्द होता, कभी सिर में दर्द होता। शरीर सूखकर कंकाल की तरह हो गया था। हम सभी बच्चे का दर्द देखकर बहुत परेशान थे। बच्चे के इलाज में काफी पैसे लग चुके थे। ढाई महीने बीत जाने के बाद भी स्वास्थ्य में कोई परिवर्तन नहीं आया। बार- बार ऑफिस से छुट्टी लेने के कारण परेशानी और बढ़ गई। आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर हो गई थी। मन- मस्तिष्क भी थकने लगे थे।

🔴 संयोग से इन्हीं दिनों किसी सज्जन से मुझे ‘‘गायत्री साधना के प्रत्यक्ष चमत्कार’’ पुस्तक मिली। परिस्थितियों से मैं बहुत परेशान था। ध्यान हटाने के लिए एवं मन को श्रेष्ठ चिन्तन में लगाने के लिए मैं पुस्तक का अध्ययन करने लगा। उसमें मैंने बहुत से लोगों के बारे में पढ़ा, जिन्हें गायत्री साधना से प्रत्यक्ष लाभ मिला था। मैंने भी अनुष्ठान करने के बारे में सोचा। यदि सभी को कुछ न कुछ लाभ मिला है, तो हमें भी अवश्य मिलेगा। मैंने अनुष्ठान आरंभ कर दिया। बच्चे के स्वास्थ्य में थोड़ा बहुत सुधार भी हो रहा था। रिपोर्ट में आया कि बच्चे की आँत में घाव हो गया है।
  
🔵 इस नाजुक परिस्थिति में हमें कुछ सूझ नहीं रहा था। इसी बीच हमारा शांतिकुंज जाना हुआ। वहाँ जाकर हमने डॉक्टर को दिखाया। डॉक्टर साहब ने ऑपरेशन की सलाह दी और कहा कि कल आप ९.३० बजे ऑपरेशन के लिए आ जाइये। मैं बुरी तरह से डर गया था। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ! मन ही मन गुरु देव से प्रार्थना कर रहा था। हमें गुरु देव का संरक्षण मिल रहा था, किन्तु उस समय इसका आभास नहीं हो रहा था। हुआ यह कि जब बच्चे को ऑपरेशन थियेटर में ले जाया जा रहा था तब वह इतना कमजोर था कि ऑपरेशन नहीं हो सकता। उसी वक्त खून चढ़ाया जाना था। मैंने अपना खून दे दिया। खून चढ़ते ही बच्चे को बुखार आ गया और बच्चे का ऑपरेशन नहीं हो सका।

🔴 लेकिन अगले दिन देखा गया कि बच्चा धीरे- धीरे स्वस्थ हो रहा है, तो डॉक्टर साहब ने कहा कि अब बच्चे को कोई दवा नहीं दी जायेगी। ऐसा क्यों कहा उस समय पता नहीं था। वास्तव में गुरु देव की चेतना सूक्ष्म रूप से बच्चे का इलाज कर रही थी। धीरे- धीरे बच्चा स्वस्थ हो गया। घर की परिस्थिति भी सामान्य हो गई। हमारी जिन्दगी दुबारा फिर अच्छे तरीके से चलने लगी।

🔵 यह कोई कहानी नहीं बल्कि हमारी जिन्दगी की प्रत्यक्ष घटना है। इस घटना ने गायत्री और गुरु देव के प्रति मेरे मन में गहरी आस्था और विश्वास का भाव जगा दिया।

🌹 श्यामबाबू पटेल, बादलपुर (उत्तरप्रदेश)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 42)

🌹 आराधना और ज्ञानयज्ञ     
🔴 कहा जाता है कि विचारक्रान्ति की, ज्ञान की साधना में सभी दूरदर्शी विवेकवानों को लगना चाहिये। इसी निमित्त, लेखनी, वाणी तथा दृश्य, श्रव्य आधारों का ऐसा प्रयोग करना चाहिये जिससे सर्वसाधारण को युगधर्म पहचानने और कार्यान्वित करने की प्रेरणा मिल सके। सर्वजनीन और सार्वभौम ज्ञानयज्ञ ही आज का सर्वश्रेष्ठ परमार्थ है। इसकी उपेक्षा करके, सस्ती वाहवाही पाने के लिये कुछ भी देते, बखेरते और कहते, लिखते रहने से कुछ वास्तविक प्रयोजन सिद्ध होने वाला नहीं है।  

🔵 इस चेतना को प्रखर प्रज्वलित करने के लिये युग साहित्य की प्राथमिक आवश्यकता है। उसी के आधार पर पढ़ने-पढ़ाने सुनने-सुनाने की बात बनती है। शिक्षितों को पढ़ाया और अशिक्षितों को सुनाया जाये, तो लोक प्रवाह को सही दिशा दी जा सकती है। इसके लिये प्रज्ञायुग के साधकों को झोला पुस्तकालय चलाने के लिये अपना समय और पैसा लगाना चाहिये। सत्साहित्य खरीदना सभी के लिये कठिन है, विशेषतया ऐसे समय में जबकि लोगों को भौतिक स्वार्थ साधनों के अतिरिक्त और कुछ सूझता नहीं। आदर्शों की बात सुनने-पढ़ने की अभिरुचि है ही नहीं। ऐसे समय में युग साहित्य पढ़ाने, वापस लेने के लिये शिक्षितों के घर जाया जाये, उन्हें पढ़ने योग्य सामग्री दी जाती और वापसी ली जाती रहे, तो इतने से सामान्य कार्य से ज्ञानयज्ञ का महत्त्वपूर्ण प्रयोजन हर क्षेत्र में पूरा होने लगेगा। अशिक्षितों को सुनाने की बात भी इसी के साथ जोड़कर रखनी चाहिये।         
                      
🔴 विचारगोष्ठियों, सभा सम्मेलनों, कथा प्रवचनों का अपना महत्त्व है। इसे सत्संग कहा जा सकता है। लेखनी और वाणी के माध्यम से यह दोनों कार्य किसी न किसी रूप में हर कहीं चलते रह सकते हैं। अपना उदाहरण प्रस्तुत करना सबसे अधिक प्रभावोत्पादक होता है। लोग समझने लगे हैं कि आदर्शों की बात सिर्फ कहने-सुनने के लिये होती है। उन्हें व्यावहारिक जीवन में नहीं उतारा जा सकता। इस भ्रान्ति का निराकरण इसी प्रकार हो सकता है कि ज्ञानयज्ञ के अध्वर्यु विचारक्रान्ति के प्रस्तोता जो कहते हैं-दूसरों से जो कराने की अपेक्षा है, उसे स्वयं अपने व्यवहार में उतारकर दिखायें। अपने को समझाना, ढालना दूसरों को सुधारने की अपेक्षा अधिक सरल है। उपदेष्टाओं को आत्मिक प्रगति के आराधनारत होने वालों की, अपनी कथनी और करनी एक करके दिखानी चाहिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 नियमबद्धता और कर्तव्य-परायणता-बड़प्पन का आधार

🔴 मैसूर के दीवान की हैसियत से ये राज्य का दौरा कर रहे थे। एक गाँव में वे अकस्मात् बीमार पड गये। ऐसा तेज ज्वर चडा कि दो दिन तक चारपाई से न उठ सके। गांव के डॉक्टर को बीमारी का पता चला तो भागा-भागा आया और उनकी देखभाल की। उसके अथक परिश्रम से वे अच्छे हो गये।

🔵 डॉक्टर चलने लगे तो उन्होंने २५ रुपये का एक चेक उनकी फीस के बतौर हाथ में दिया। डॉ० हाथ जोडकर खडा हो गया और कहने लगा साहब! यह क्तो मेरा सौभाग्य था कि आपकी सेवा करने का अवसर मिला। मुझे फीस नही चाहिए।

🔴 चेक हाथ में थमाते हुए उन्होंने कहा बडे आदमी की कृपा छोटों के लिये दंड होती है। आप ऐसे अवसरों पर फीस इसलिये ले लिया कीजिये, ताकि गरीबों की बिना फीस सेवा भी कर सके। ऐसा न किया कीजिए कि दवाएँ किसी और पर खर्च कर पैसे किसी और से वसूल करे।

🔵 यह थी उनकी महानता। जहाँ बडे लोग अपनी सेवा मुफ्त कराने, अनुचित और अधिक सम्मान पाने में बडप्पन मानते हैं, वहाँ उन्होंने परिश्रम, नियमितता और कर्तव्यपालन में ही गौरव अनुभव किया, यदि यह कहा जाए कि अपने इन्ही गुणों से उन्होंने एक साधारण व्यक्ति से उठकर देश के सर्वाधिक ख्याति लब्ध इंजीनियर का पद पाया तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। वे नियम पालन में डॉक्टर के सामने क्या बडे-से-बडे व्यक्ति के सामने भी उतने ही तटस्थ रहे। कभी लचीलापन व्यक्त नहीं किया।

🔴 उन्हें भारत रत्न की उपाधि दी गई। अलंकरण समारोह में उपाधि ग्रहण करने के लिये वे दिल्ली आए। नियम है कि जिन्हें भारतरत्न की उपाधि से विभूषित किया जाता है वे राष्ट्रपति के अतिथि होते है और राष्ट्रपति भवन में ही निवास करते है। उन्हें भी यहीं ठहराया गया। राष्ट्रपति डॉ० राजेंद्र प्रसाद प्रतिदिन उनसे मिलते थे और उनकी सान्निध्यता में हर्ष अनुभव करते।

🔵 एक दिन जब राष्ट्रपति उनसे मिलने गए तो उन्होंने देखा कि वे अपना सामान बांध रहे हैं और जाने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होने आते ही पूछा आप यह क्या कर रहे है, अभी तो आपका ठहरने का कार्यक्रम है।

🔴 उन्होंने उत्तर दिया हाँ तो पर अब कहीं दूसरी जगह ठहरना पडेगा। यहाँ का यह तो नियम है कि कोई व्यक्ति तीन दिन से अधिक नहीं ठहर सकता। राष्ट्रपति बोले आप तो अभी यही रुकिए।'' तो उन्होंने कहा नियम के सामने छोटे-बड़े सब एक है। मैं आपका स्नेह पात्र हूँ इस कारण नियम का उल्लंघन करूँ तो सामान्य लोग दुःखी न होंगे क्या और यह कहकर उन्होंने अपना सामान उठाया बाबू जी को प्रणाम किया और वहाँ से चले आए। शेष दिन दूसरी जगह ठहरे पर राष्ट्रपति के बहुत कहने पर भी वहाँ न रुके।

🔵 नियम पालन से मनुष्य बडा़ बने, केवल पद और प्रतिष्ठा पा लेना ही बडप्पन का चिन्ह नहीं। सूर्य चद्रमा तक जब सनातन नियमों की अवहेलना नहीं करते हुए पूज्य और प्रतिष्ठित हैं तो समुचित कर्तव्य और नियमो के पालन से मनुष्य का मूल्य कैसे घट सकता है? 'भले ही काम कितना ही छोटा क्यों न हो?

🔴 वह थे देश के महान इंजीनियर मोक्षगुंडम् विश्वैश्वरैया जिनकी प्रतिष्ठा और प्रशंसा भारतवर्ष ही नही इंगलैंड और अमेरिका तक में होती थी। पद के लिये नहीं वरन् कार्यकुशलता, नियम पालन अनुशासन और योग्यता जैसे गुणों के लिये।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 36, 37

👉 अहंकार का प्रदर्शन

🔴 राबिया बसरी कई संतों के संग बैठी बातें कर रही थी। तभी हसन बसरी वहाँ आ पहुँचे और बोले-''चलिए, झील के पानी पर बैठकर हम दोनों अध्यात्म चर्चा करें।'' हसन के बारे में प्रसिद्ध था कि उन्हें पानी पर चलने की सिद्धि प्राप्त है।    

🔵 राबिया ताड़ गई कि हसन उसी का प्रदर्शन करना चाहते है। बोली-'' भैया, यदि दोनों आसमान में उड़ते- उड़ते बातें करें तो कैसा रहे?'' (राबिया के बारे में भी प्रसिद्ध था कि वे हवा में उड़ सकती हैं।) फिर गंभीर होकर बोलीं-''भैया, जो तुम कर सकते हो, वह हर एक मछली करती है; और जो मैं कर सकती हूँ वह हर मक्खी करती है।

🔴 सत्य करिश्मेबाजी से बहुत ऊपर है। उसे विनम्र होकर खोजना पड़ता है। अध्यात्मवादी को दर्प करके अपनी गुणवत्ता गँवानी नहीं चाहिए।'' हसन ने अध्यात्म का मर्म समझा और राबिया को अपना गुरु मानकर आत्म-परिशोधन में जुट गए ।  

🌹 प्रज्ञा पुराण भाग 2 पृष्ठ 11

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 14)

🌹 अद्भुत उपलब्धियों का आधार
🔴 मनुष्य आज जिस उन्नत व्यवस्था में पहुंचा है वह एक साथ एक दिन की घटना नहीं है। वह धीरे-धीरे क्रमानुसार विचारों के परिष्कार के साथ आज इस स्थिति में पहुंच सका है। ज्यों-ज्यों उसके विचार परिष्कृत, पवित्र तथा उन्नत होते गये उसी प्रकार अपने साधनों के साथ उसका जीवन परिष्कृत तथा पुरस्कृत होता गया। व्यक्ति-व्यक्ति के रूप में भी हम देख सकते हैं कि एक मनुष्य जितना सभ्य, सुशील और सुसंस्कृत है अपेक्षाकृत दूसरा उतना नहीं।

🔵 समाज में जहां आज भी सन्तों और सज्जनों की कमी नहीं है वहां चोर, उचक्के भी पाये जाते हैं। जहां बड़े-बड़े शिल्पकार और साहित्यकार मौजूद हैं वहां गोबर गणेशों की भी कमी नहीं है। मनुष्यों की यह वैयक्तिक विषमता भी विचारों, संस्कारों के अनुपात पर ही निर्भर करती है। जिसके विचार जिस अनुपात से परिमार्जित हो रहे हैं वह उसी अनुपात से पशु से मनुष्य और मनुष्य से देवता बनता जा रहा है।

🔴 विचार शक्ति के समान कोई भी शक्ति संसार में नहीं है। अरबों का उत्पादन करने वाले दैत्याकार कारखानों का संचालन, उद्वेलित जन-समुदाय का नियंत्रण, दुर्धर्ष सेनाओं का अनुशासन और बड़े-बड़े साम्राज्यों का शासन और असंख्यों जनता का नेतृत्व एक विचार बल पर ही किया जाता है, अन्यथा एक मनुष्य में एक मनुष्य के योग्य ही सीमित शक्ति रहती है, वह असंख्यों का अनुशासन किस प्रकार कर सकता है? बड़े-बड़े आततायी हुकुमरानों और सुदृढ़ साम्राज्यों को विचार बल से ही उलट दिया गया। बड़े-बड़े हिंस्र पशुओं और अत्याचारियों को विचार बल से ही प्रभावित कर सुशील बना लिया जाता है। विचार-शक्ति से बढ़कर कोई भी शक्ति संसार में नहीं है। विचार की शक्ति अपरिमित तथा अपराजेय है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 22)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए

🔵 घर के समर्थ कमाते हैं और उसी कमाई से परिवार के सभी सदस्य गुजारा करते हैं। यह जिम्मेदारी भी है, परम्परा भी और उदारता भी। सही वितरण यही है। पुण्य परमार्थ भी इसी को कहते हैं। मानवी गरिमा की सराहना इससे कम में करते बन ही नहीं पड़ती। सम्पत्ति की सार्थकता भी इसी में है कि उसे मिलजुल कर सभी लोग काम में लायें। गिरों को उठाने और उठों को आगे बढ़ाने में इसी प्रक्रिया को अपनाने से काम चलता है।

🔴 भारतीय धर्म परम्परा में गोग्रास, दैनिक पञ्च यज्ञ, मुसलमान धर्म में जकात, सिख धर्म में कड़ा-प्रसाद जैसे माध्यमों से दैनिक अनुदान निकालने की परम्परा है। समय भी सम्पदा है और साधनों को भी सम्पत्ति कहते हैं। दोनों ही वैभव ऐसे हैं, जो हर किसी के पास न्यूनाधिक मात्रा में होते ही हैं। यदि खुशहाली हो, तब तो कहना ही क्या, पर यदि तंगी और व्यस्तता के बीच भी रहना पड़ता हो, तो भी आवश्यक सुविधा साधनों में कटौती करके भी परमार्थ प्रयोजनों के लिए, उनका एक अंश नियमित रूप से निकालते ही रहना चाहिए। इसमें कंजूसी-कृपणता बरतना एक प्रकार से मानवी श्रेष्ठता को ही झुठलाना है।  

🔵 दान धर्म भी है और अधर्म भी। हथियार से पुण्य भी बन पड़ता है और पाप भी। दानशीलता को यदि भाव संवेदनाओं और विचार परिष्कार में लगाया जाये तो ही समझना चाहिए कि युगधर्म के निर्वाह और उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में उस सदाशयता का सही नियोजन हो सका। अन्यथा धूर्तों द्वारा, मूर्ख आये दिन जिस तिस बहाने ठगे ही जाते रहते हैं और यह बहकाया जाता रहता है कि यह नियोजन पुण्य के लिए किया गया है। स्मरण रहे, उज्ज्वल भविष्य निर्माण की महती योजना, मन मस्तिष्क में आदर्शवादी भाव संवेदनाओं का उभार उपजाये बिना और किसी प्रकार सफल-सम्भव नहीं हो सकेगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 साधक कैसे बनें? (भाग 2)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 अर्जुनदेव ने न कुछ किया था, न कराया था, केवल अपने आपको बना लिया था। इसीलिये उनके गुरु ने ये माना कि ये सबसे अच्छा आदमी है। सप्तऋषियों ने अपने आपको बनाया। उनके अन्दर तप की सम्पदा थी, ज्ञान की सम्पदा थी। हरिद्वार या जहाँ कहीं भी रहते चले, जो कुछ भी काम उन्होंने कर लिया, वो एक महानतम श्रेणी का उच्चस्तरीय काम कहलाया। अगर उनका व्यक्तित्व घटिया होता तो फिर बात कैसे बनती?

🔵 गाँधीजी ने अपने आपको बनाया, हजारों आदमी उनके पीछे चले। बुद्ध ने अपने आपको बनाया, हजारों आदमी उनके पीछे चले। हम अपने भीतर चुम्बकत्व पैदा करें। खदानों के अन्दर जो लोहे के कण, धातु के कण जमा हो जाते हैं, उसका कारण ये है कि जहाँ कहीं भी खदान होती है, वहाँ चुम्बकत्व रहता है। चुम्बकत्व से खदान छोटी-छोटी चीजों को खींचता रहता है। हम अपनी क्वॉलिटी बढ़ायें। हम अपना चुम्बकत्व बढ़ायें। हम अपना व्यक्तित्व बढ़ायें; चूँकि ये सबसे बड़ा करने के लिये काम है।

🔴 समाज की सेवा करें। हाँ! ठीक है। वो भी आपको करनी चाहिए, पर मैं ये कहता हूँ समाज सेवा से भी पहले ज्यादा महत्त्वपूर्ण इस बात को समझें कि हमको अपनी क्वॉलिटी बढ़ानी चाहिये। खनिज में से जो धातु निकलती हैं, वो कच्ची होती हैं, लेकिन जब पकाकर के ठीक कर ली जाती हैं, साफ-सुथरी बना दी जाती हैं, तो उन्हीं धातुओं का नाम-स्वर्ण, शुद्ध स्वर्ण हो जाता है। उसी का नाम फौलाद हो जाता है। हम अपने आपको फौलाद बनायें। अपने आपकी सफाई करें, अपने आपको धोयें, अपने आपको परिष्कृत करें।

🔵 इतना कर सकना, अगर हमारे लिये सम्भव हो जाये तो समझना चाहिए आपका ये सवाल पूरा हो गया, अब हम क्या करें? नहीं ये करें कि हम अच्छे बनें। समाज सेवा भी करना, पर समाज सेवा करने से पहले आवश्यक है कि समाज सेवा के लायक हथियार अपने आपको बना लें। ये ज्यादा अच्छा है। हम अपने आपकी सफाई करें। समाज सेवा भी करें, पर अपने आपकी सफाई को भूल नहीं जायें। मित्रो! एक और बात कह करके हम अपनी बात समाप्त करना चाहते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/amart_vachan_jivan_ke_sidha_sutra/sadhak_kese_bane

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 55)

🌹 भावी रूपरेखा का स्पष्टीकरण
🔴 गुरुदेव अदृश्य हो गए। हमें उनका दूत गोमुख तक पहुँचा गया। इसके बाद उनके बताए हुए स्थान पर एक वर्ष के शेष दिन पूरे किए।

🔵 समय पूरा होने पर वापस लौट पड़े। अब की बार इधर से लौटते हुए उन कठिनाइयों में से एक भी सामने नहीं आईं, जो जाते समय पग-पग पर हैरान कर रही थी। वे परीक्षाएँ थी, जो पूरी हो जाने पर लौटते समय कठिनाइयों का सामना करना भी क्यों पड़ता?

🔴 हम एक वर्ष बाद घर वापस लौट आए। वजन 18 पौंड बढ़ गया। चेहरा लाल और गोल हो गया था। शरीरगत शक्ति काफी बढ़ी हुई थी। हर समय प्रसन्नता छाई रहती थी। लौटने पर लोगों ने गंगाजी का प्रसाद माँगा। सभी को गंगोत्री की रेती में से एक चुटकी दे दी व गोमुख के जल का प्रसाद दे दिया। यही वहाँ से साथ लेकर भी लौटे थे। दीख सकने वाला प्रत्यक्ष प्रसाद यही एक ही था, जो दिया जा सकता था। वस्तुतः यह हमारे जीवन का एक महत्त्वपूर्ण मोड़ था। यद्यपि इसके बाद भी हिमालय जाने का क्रम बराबर बना रहा एवं गंतव्य भी वही है, फिर भी गुरुदेव के साथ विश्व व्यवस्था का संचालन करने वाली परोक्ष ऋषि सत्ता का प्रथम दर्शन अंतःस्थल पर अमिट छाप छोड़ गया। हमें अपने लक्ष्य, भावी जीवन क्रम, जीवन यात्रा में सहयोगी बनने वाली जागृत प्राणवान आत्माओं का आभास भी इसी यात्रा में हुआ। हिमालय की हमारी पहली यात्रा अनेक अनुभवों की कथा गाथा है, जो अन्य अनेकों के लिए प्रेरणाप्रद सिद्ध हो सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 56) 19 Feb

🔵 जिस प्रदेश में अपनी निर्जन कुटिया है, उसमें पेड़ पौधों के अतिरिक्त, जलचर, थलचर, नभचर जीव जन्तुओं की भी बहुतायत हैं। जब भ्रमण को निकलते हैं तो अनायास ही उनसे भेंट करने का अवसर मिलता है। आरम्भ के दिनों में वे डरते थे पर अब तो पहचान गये हैं। मुझे अपने कुटुम्ब का ही एक सदस्य मान लिया है। अब न वे मुझ से डरते हैं और न अपने को ही उनसे डर लगता है। दिन-दिन यह समीपता और घनिष्ठता बढ़ती जाती है। लगता है इस पृथ्वी पर ही एक महान् विश्व मौजूद है।

🔴 इस विश्व में प्रेम, करुणा, मैत्री, सहयोग, सौजन्य, सौन्दर्य, शान्ति, सन्तोष, आदि स्वर्ग के सभी चिह्न मौजूद हैं। उससे मनुष्य दूर है। उसने अपनी एक छोटी सी दुनिया अलग बना रखी है—मनुष्यों की दुनिया। इस अहंकारी और दुष्ट प्राणी ने ज्ञान-विज्ञान की लम्बी-चौड़ी बातें बहुत की हैं। महानता और श्रेष्ठता के, धर्म और नैतिकता के लम्बे-चौड़े विवेचन किये हैं। पर सृष्टि के अन्य प्राणियों के साथ उसने जो दुर्व्यवहार किया है उससे उस सारे पाखण्ड का पर्दाफाश हो जाता है जो वह अपनी श्रेष्ठता, अपने समाज और सदाचार की श्रेष्ठता बखानते हुए प्रतिपादित किया करता है।

🔵 आज विचार बहुत गहरे उतर गये, रास्ता भूल गया, कितने ही पशु-पक्षियों को आंखें भर-भर कर देर तक देखता रहा। वे भी खड़े होकर मेरी विचारधारा का समर्थन करते रहे। मनुष्य ही इस कारण सृष्टि का श्रेष्ठ प्राणी नहीं माना जा सकता कि उसके पास दूसरों की अपेक्षा बुद्धि बल अधिक है। यदि बल ही बड़प्पन का चिह्न हो तो दस्यु, सामन्त, असुर, दानव, पिशाच, बेताल ब्रह्म राक्षस आदि की श्रेष्ठता को मस्तक नवाना पड़ेगा।

🔴 श्रेष्ठता के चिन्ह हैं सत्य, प्रेम, न्याय, शील, संयम, उदारता, त्याग, सौजन्य, विवेक, सौहार्द्र। यदि इनका अभाव रहा तो बुद्धि का शस्त्र धारण किये हुए नर-पशु—उन विकराल नख और दांतों वाले हिंस्र पशुओं से कहीं अधिक भयंकर है। हिंस्र पशु भूखे होने पर ही आक्रमण करते हैं। पर यह बुद्धिधारी नर पशु तो तृष्णा और अहंकार के लिए ही भारी दुष्टता और क्रूरता का निरन्तर अभियान करता रहता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Feb 2017


👉 आज का सद्चिंतन 18 Feb 2017


👉 पल भर में सुनी गई अबला की पुकार

  🔴 उन दिनों मैं सिविल कोर्ट, बलरामपुर में सर्विस कर रही थी। जून में कोर्ट की छुट्टियाँ होने को थीं। सन् २००२ ई. की बात है। इस बार हमने शान्तिकुञ्ज में छुट्टियाँ बिताने की सोची। पहले तो कई लोग आने को तैयार थे, पर बाद में उन सभी ने अलग- अलग कारणों से अपना प्रोग्राम बदल दिया और मैं अकेली रह गई। छुट्टियों के दिन होने के कारण ट्रेन में रिजर्वेशन नहीं मिल पाया था। किन्तु मुझे तो किसी भी हाल में शान्तिकुञ्ज पहुँचना ही था। मन में ठान चुकी थी। सो, अकेली ही रवाना हो गई। गोण्डा से ट्रेन से चारबाग स्टेशन, लखनऊ पहुँची, तो शाम के चार बज चुके थे। दून एक्सप्रेस से जाना था। लेकिन, स्टेशन पर यात्रियों की भारी भीड़ देखकर मैं अन्दर से काँप उठी।

🔵 प्लेटफार्म पर पैर रखने की जगह नहीं थी। नतीजा यह हुआ कि ट्रेन छूट गई। इसके बाद वाली ट्रेन जनता एक्सप्रेस में भी नहीं चढ़ सकी। पता चला कि इसके बाद रात में कोई और ट्रेन नहीं है। मैं स्टेशन पर चिन्तित बैठी थी। सोच रही थी कि काश, यह समाचार झूठा होता, संयोगवश कोई ट्रेन आ जाती।

🔴 रात गहरी होती गयी। स्टेशन पर से भीड़ घटती जा रही थी। मेरा भय लगातार बढ़ता जा रहा था। पूरी रात मैं प्लेटफार्म पर अकेली कैसे रहूँगी? यहाँ किसी को जानती भी नहीं कि उसके घर जाकर रात बिता सकूँ। चोर- उचक्के ही आ जाएँ या अकेली औरत देख किसी पर बदनीयती ही सवार हो जाए, तो क्या करूँगी। मन बार- बार यह कहने लगा कि मुझे अकेले नहीं आना चाहिए था। आए दिन कितनी ही उल्टी सीधी घटनाएँ घटती रहती हैं। अखबारों में रोज ही ऐसी खबरें छपती हैं। दस की भीड़ में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करना अलग बात है, पर यहाँ सुनसान रात में अनजान स्टेशन के प्लेटफार्म पर रहना....! यही सब सोचकर मैं अन्दर ही अन्दर काँप रही थी।
  
🔵 इतने में एक आदमी पास आकर खड़ा हो गया। मुझे उसके रंग- ढंग ठीक नहीं लग रहे थे। वह मुझसे पूछने लगा- कहाँ जाना है? मैंने उपेक्षापूर्ण स्वर में कहा- हरिद्वार। उसने बात आगे बढ़ाने की चेष्टा की- मैं रेलवे का इम्प्लाई हूँ। हरिद्वार की आखिरी ट्रेन भी जा चुकी है। अब वहाँ के लिए कोई ट्रेन आपको कल ही मिलेगी। मेरा रहा- सहा होश भी गुम होने लगा। वहाँ से उठकर मैं टी स्टाल के पास वाली बैंच पर बैठ गई। थोड़ी देर बाद वह आदमी मेरे पास आकर बैठ गया और बेमतलब की बातें करने लगा। मैं बुरी तरह डर गई थी। जब और कोई उपाय नहीं दिखा, तो आँखें मूँदकर गुरुदेव का ध्यान करने लगी। मन ही मन उनसे प्रार्थना करती हुई बोली -‘‘हे गुरुदेव, अकेले ही घर से निकलकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है, अब तो आप ही मेरी लाज बचा सकते हैं।’’ मैं परेशान होकर इधर- उधर टहल रही थी। मेरी आँखों में आँसू भरे हुये थे। मैं रोना चाहती थी, किंतु रो नहीं रही थी। मैं टलहते हुए स्टेशन के दूसरे छोर के पास पहुँच गई। मैं एक खंभे के पास खड़ी हो गई। मैं डरी हुई थी। चूँकि वह व्यक्ति आस- पास ही रह रहा था।

🔴 मैंने देखा खम्भे के पास जहाँ थोड़ी जगह होती है वहीं पर एक बूढ़े दम्पत्ति को बैठे हुए देखा। उनके पास दो छोटी- छोटी गठरियाँ थीं उन्हें देखकर मैं उन्हीं के पास खड़ी हो गई। मुझे उनके पास खड़े होने पर लग रहा था जैसे गुरुदेव मेरी करुण पुकार सुनकर स्वयं आ गये हों। मैं भी थोड़ी जगह पर बैठ गई, थोड़ी देर में बात- चीत के क्रम में उन्होंने कहा -‘बेटी क्या बात है? कुछ परेशानी है क्या? ’ मैंने कहा कि बाबा मुझे हरिद्वार जाना है। किंतु हरिद्वार की दोनों रेले जा चुकी हैं मैंने पता किया, तो मालूम हुआ कि हरिद्वार के लिये कोई ट्रेन नहीं है मैं बहुत परेशान हूँ। पूरी रात स्टेशन पर क्या करूँगी? बाबा बोले- इसमें चिंता की क्या बात है? तुम्हें हरिद्वार ही जाना है। अभी एक ट्रेन आयेगी इसी प्लेटफार्म  पर, जो सहारनपुर जायेगी। तुम लक्सर स्टेशन पर उतर जाना, वहाँ से हरिद्वार के लिए कोई न कोई ट्रेन मिल जायेगी। पूरी रात स्टेशन पर बैठने से अच्छा है ट्रेन में रहोगी और सुरक्षित भी रहोगी। उनकी बात मुझे अच्छी लगी किंतु विश्वास नहीं हो रहा था कि ये जो कह रहें हैं वह सही है। चूंकि उनकी वेशभूषा से नहीं लग रहा था कि ज्यादा पढ़े लिखे होंगे। इनको कैसे पता चला कि कौन सी ट्रेन आ रही है? किंतु न जाने क्यों मुझे उनकी बातों में सच्चाई लग रही थी। उनकी वाणी में अजीब सी मिठास एवं अपनापन झलक रहा था। मैंने कहा- बाबा आप सच कह रहे हैं। वो तो मैं सही बोल रहा हूँ, मुझे भी हरिद्वार जाना है। अभी १०.३० बजे ट्रेन आयेगी।

🔵 मैंने सोचा इंतजार करने में क्या हर्ज है अभी सच्चाई तो पता चल ही जायेगी। ३०- ३५ मिनट की बात है लेकिन उस स्थिति में एक- एक मिनट पहाड़ जैसी बीत रही थी। आखिर १०.३० बजे वह ट्रेन आई। मैं अपना बैग लेकर बाबा के साथ चल दी ट्रेन में चढ़ने के लिए। मैंने सोचा कि बाबा बूढ़े हैं इनकी सहायता करनी चाहिए इसलिए मैंने कहा- बाबा, पहले आप चढ़ जाइए तब मैं चढूँगी। तो बाबा बोले- पहले तुम चढ़ो तुम मेरी चिंता मत करो। मैं ट्रेन में चढ़ गई। ट्रेन में काफ भीड़ थी मैंने सोचा बाबा इसी ट्रेन में होंगे लेकिन आस- पास मुझे वह बाबा दिखाई नहीं पड़े। मैं रात भर ट्रेन में बैठी रही। मुझे हल्की झपकी लग जाय, तो मैं जाग जाती थी। चूँकि मुझे लक्सर स्टेशन पर उतरना था। पहली बार स्टेशन का नाम सुना था कि कहीं भूल न जाऊँ। मैंने ट्रेन में बैठे व्यक्तियों से भी स्टेशन के बारे में पूछा। दूसरे दिन मैं लक्सर स्टेशन पर उतर गई। मैंने इन्क्वाइरी में जाकर हरिद्वार के लिये ट्रेन पूछी तो पता लगा अभी एक घंटे बाद ट्रेन आएगी। इस प्रकार गुरुकृपा से हरिद्वार आ गई। जब भी मैं इस घटना के बारे में सोचती हूँ मेरा हृदय गुरुवर के प्रति श्रद्धा से भर जाता है। गुरुदेव की कृपा का कर्ज मैं इस जन्म में नहीं चुका सकती।

🌹  अर्चना सिंह, बलरामपुर (उ.प्र.)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से

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👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 41)

🌹 आराधना और ज्ञानयज्ञ     
🔴 अन्य कुटीर उद्योग भी इसी श्रेणी में आते हैं। बेरोजगारी दूर करने के साधन खड़े करें प्रकारान्तर से अभावग्रस्तों की सहायता की है। मुफ्तखोरी का बढ़ावा देना दान नहीं है। इससे निठल्लेपन की आदत पड़ती है। प्रमाद और व्यसन पनपते हैं। लेने वाले को हीनता की अनुभूति होती है और देने वाले का अहंकार बढ़ता है। यह दोनों ही प्रवृत्तियाँ दोनों ही पक्षों के लिये अहितकर हैं इसलिये औचित्य और सही परिणाम को दृष्टि में रखते हुए दान किया जाना चाहिये। अन्यथा दान के नाम पर धन का दुरुपयोग ही होता है और उससे स्वावलम्बन का उत्साह घटता है। 

🔵 दोनों में सर्वोपरि ज्ञान दान को माना जाता है। इसे ब्रह्मयज्ञ भी कहते हैं। सद्भावनायें और सत्प्रवृत्तियाँ जिन प्रयत्नों से बढ़ सकें उसी को सच्चा परमार्थ कहना चाहिये। सत् चिन्तन के अभाव में ही लोग अनेकों दुर्गुण अपनाते और पतन-पराभव के गर्त में गिरते हैं। यदि सही चिन्तन कर सकने का पथ प्रशस्त हो सके तो समझना चाहिये कि सर्व-समर्थ मनुष्य को अपनी समस्यायें आप हल करने का मार्ग मिल गया। अपंगों, असमर्थों या दुर्घटनाग्रस्तों को छोड़कर कोई ऐसा नहीं है जो सही चिन्तन करने का मार्ग मिल जाने पर ऊँचा उठ न सकें, आगे न बढ़ सकें, अपनी समस्याओं को आप हल न कर सकें। इसलिये आत्मिक प्रगति के लिये प्रधानता यही नीति अपनानी चाहिये कि लोकमानस के परिष्कार के लिये, सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन के लिये अपनी योग्यता और परिस्थिति के अनुसार भरसक प्रयत्न किया जाये।        
                      
🔴 समय की अपनी समस्यायें हुआ करती हैं और परिस्थितियों के अनुरूप उनके समाधान भी खोजने पड़ते हैं। प्राचीन कथा, पुराणों और धर्मशास्त्रों से युगधर्म का निरूपण नहीं हो सकता उसके लिये आज के प्रवाह प्रचलन और वातावरण को ध्यान में रखना होगा। इस हेतु युग मनीषियों को ही सदा से मान्यता मिलती रही है। इन दिनों भी इसी प्रक्रिया को अपनाना होगा। इसके लिये युग चेतना का आश्रय लेना होगा। युग मनीषियों के प्रतिपादनों पर ध्यान देना होगा। सद्ज्ञान संवर्द्धन का सही तरीका यही हो सकता है। साक्षरता की तरह ऐसे सद्ज्ञान संवर्द्धन की भी आवश्यकता है जो व्यक्ति और समाज के सम्मुख उपस्थित समस्याओं के सन्दर्भ में समाधान-कारक सिद्ध हो सकें। आत्मोत्कर्ष के लिये आराधना का सेवा साधना का उपाय इसी आधार पर खोजना होगा। लोकमानस का परिष्कार और सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन को सर्वोच्च स्तर का आधार मानते हुए बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक क्षेत्रों में युगधर्म की प्रतिष्ठापना की जानी चाहिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जाओ करो नहीं आओ करो

🔴 कीचड में फँसे लकडी के लट्ठे उठाकर इमारत तक पहुँचाने थे। एक लकडी़ का लट्ठा काफी वजनदार था। आठ-दस सिपाही अपनी सपूर्ण शक्ति से उठाने का प्रयत्न कर रहे थे। लट्ठा जमीन तो छोडता रहा था पर पूरी तरह उठ नहीं पाता था। सिपाहियों की सम्मिलित शक्ति भी कुछ कर नहीं पा रही थी।

🔵 पास ही खडे़ अफसर ने सिपाहियो को डाँटा- "मूर्खों! इतने लोग लगे हो फिर भी लकडी नहीं उठा पा रहे हो।" सिपाहियों ने पुन पूरा जोर लगाया। लट्ठा पेट तक उठाए रख सकना कठिन हो गया और वह उनक हाथ से बरबस एटकर फिर कीचड में जा गिरा।

🔴 अफसर के रोष का ठिकाना न रहा वह चाहता था कि लट्ठा तुरंत उठ ही जाना चाहिए। यह तो नहीं कि कोई युक्ति सोचता, नई शक्ति जुटाता सिपाहियों के हौसले बढा़ता, उन्हे शाबासी देता? उल्टे आफिसरी का रोब दिखाता रहा। धैर्य और साहस दिखाने की एक शक्ति होती है वह अपने को छोटे सहयोगियों और कर्मचारियों का साहस बढा़ती है और उससे कर्तव्य भावना उद्दीप्त होती है। प्रेम और स्नेह से जो काम कराए जा सकते हैं वह बलपूर्वक नहीं। उससे तो शक्ति टूटती ही है, यह बात उन सब लोगों को याद रखनी चाहिए. जो बडी जिम्मेदारियाँ कंधों पर संभाले हैं। अफसर या प्रशासक हैं।

🔵 सिपाही प्रसन्नता से काम कर रहे होते तो लट्ठा कब का उठ गया होता, पर हुक्म चलाने की दांभिकता ने उनका सारा उत्साह शिथिल कर रखा था। इसलिये खींचातानी करने पर भी वह नही ही उठ पाया। अफसर उन्हें और भी बुरी तरह डाँटने-फटकारने लगा! तभी उधर से घोडे पर चढा़ नवयुवक आता दिखाई दिया। अफसर के पास आकर वह सादे वेष का घुडसवार शांति और धैर्य के साथ नीचे उतरा और गभीर स्वर में बोला भाई! जिस तरह आप इन्हें डॉट रहे है, उस तरह काम नहीं होता थोडा आप भी हाथ लगा देते तो लट्ठा कब का उठ गया होता ? काम से आदमी की शान नही घटती, न आपकी पदवी छोटी हो जाती। इससे सिपाहियों मे आपका सम्मान और स्वामिभक्ति ही बढ़ती।

🔴 देखो "जाओ करो" कहने की अपेक्षा "आओ करें" की शक्ति बडी होती है। उससे अधिक और सुव्यवस्थित काम संपन्न होते है। यह कहकर नवागंतुक ने घोडे की रास वहीं छोड दी और काम करते सिपाहियों में जा मिला फिर हँसकर कहा-देखो भाईयों अब हमारी शक्ति बढ़ गई यह अकेला लट्ठा अपने को बलवान् न कहने पाए। सब सिपाही इस मसखरेपन पर मुस्कराए बिना न रह सके और इसके बाद सबने एक जयकारा लगाकर जो लट्ठे को उठाया तो वह पलक मारते सीधे हाथों आकाश की ओर उठ गया। प्रसन्नता और सफलता से सबके चेहरे खिल उठे। जो काम ३ घंटे से रुका पडा़ था वही काम चंद मिनटो में पूरा हो गया।

🔵 आगुंतक ने पानी में हाथ-पाँव धोए और फिर घोडे़ पर सवार होकर-उस अफसर को संकेत करके बोला देखो भाई काम कराने का असली गुरु मंत्र यह है कि आप को भी सहयोग देकर काम का मूल्य बढा़ना चाहिए और उसके बोझीलेपन को कम करना चाहिए।

🔴 शाम को उस अफसर को पता चला कि नवागुंतक कोई और नहीं था, वरन उन्हीं का सेनापति जार्ज वाशिगटन था। वह अफसर अपनी दांभिकता पर बडा लज्जित हुआ। उसने अनुभव किया कि बडे आदमी पद से नहीं कर्तव्य भावना से बडे होते है, यदि किसी को केवल अमिमान है, तो किसी भी बडे पद में होकर वह बडा नहीं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 35, 36

👉 दो मुँह वाला जुलाहा

🔴 एक जुलाहा का कर्धा टूट गया और उसके लिए लकड़ी काटने वह पास के जंगल में गया। जंगल में सूखा पेड़ एक ही दीखा और वह उसे काटने लगा। उस पेड़ पर एक यक्ष रहता था । उसने कहा- '' इस पर मेरा निवास है, इसे मत काटो। अपना काम चलाने के लिए कोई वरदान माँग लो।  

🔵 जुलाहा कोई लाभदायक वरदान माँगने की बात सोचने लगा । सोचते- सोचते एक बात समझ में आयी, कि दो हाथों की जगह चार हाथ और एक सिर की जगह दो सिर माँग लिए जाँय। चार हाथों से दुगुना कपड़ा बुना जा सकेगा। दो सिरों पर लाद कर हाट तक दूने वजन की पोटली ले जाई जा सकेगी ।

🔴 यक्ष ने मनोरथ पूरा कर दिया । इस विचित्र आकृति को लेकर वह घर लौटा, तो कौतूहल देखने सारा गाँव इकट्ठा हो गया । पत्नी भयभीत होकर छिप गई । मुहल्ले वालों ने उसे भूत- प्रेत समझा और ईंट-पत्थरों से मार डाला ।साधारण स्तर बनाये रहने में ही भलाई है ।

🌹 प्रज्ञा पुराण भाग 2 पृष्ठ 9

👉 आत्मविजेता ही विश्वविजेता

🔵 मानवी व्यक्तित्व का निर्माण मनुष्य की अपनी कलाकारिता, सूझबूझ, एकाग्रता और ऐसे पराक्रम का प्रतिफल है, जो संसार के अन्यान्य उपार्जनों की तुलना में कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण एवं कहीं अधिक प्रयत्नसाध्य है। उसमें संकल्पशक्ति, साहसिकता और दूरदर्शिता का परिचय देना पड़ता है। जनसाधारण द्वारा अपनायी गयी रीति-नीति से ठीक उलटी दिशा में चलना उस मछली के पराक्रम जैसा है जो प्रचण्ड प्रवाह को चीरकर प्रवाह के विपरीत चलती है। आत्म निर्माताओं को जहाँ ‘‘सादा जीवन उच्च विचार’’ की नीति अपनाकर स्वल्प सन्तोषी, अपरिग्रही बनना पड़ता है, वहाँ साथियों के उपहास, असहयोग ही नहीं, विरोध का भी सामना करना पड़ता है।

🔴 जिस किसी ने भी इस आत्मनिर्माण के मोर्चे को फतह कर लिया, वह सस्ती तारीफ से तो वंचित हो सकता है, पर लोकश्रद्धा उसके चरणों पर अपनी पुष्पाञ्जलियाँ अनन्त काल तक चढ़ाती रहती हैं। सघन आत्म-सन्तोष, अनुकरणीय आदर्श परिपालन तथा अनुगामियों के लिए पद चिह्न छोड़े जाने वाली गौरव-गरिमा मात्र इसी क्षेत्र के विजेताओं को हस्तगत होने वाली विभूतियाँ हैं। महानता चिन्तन, चरित्र और प्रयास में आदर्शवादिता घुली रहने पर ही उपलब्ध होती है। आत्म विजेता को विश्व विजेता की उपमा अकारण ही नहीं दी गयी है। दूसरों को उबारने-उछालने, दिशा देने और कुछ से कुछ ढाल देने की क्षमता मात्र इन्हीं लोगों में होती है।

🔵 आत्मनिर्माण-व्यक्तित्व परिष्कार कर लेने वाले व्यक्ति एक दूसरा कदम और उठाते हैं-वह है परिष्कृत व्यक्तित्व का सत्प्रवृत्ति संवर्धन में नियोजन, परमार्थ सँजोना और पुण्य कमाना। महामानवों में से प्रत्येक को लोक मंगल में लगना पड़ा है। शाश्वत सुख-सन्तोष रूपी सौभाग्य मात्र उन्हीं के भाग्य में बदा है, जिनने स्रष्टा के विश्व उद्यान को सुरम्य समुन्नत बनाने के लिए अपनी क्षमता को भावविभोर मनःस्थिति के साथ नियोजित किया है। ऐसे लोगों पर ही सतत दैवी अनुग्रह सहज ही बरसता है। हम सब भी अपना इष्ट कुछ ऐसा ही चुनें।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 18

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 13)

🌹 अद्भुत उपलब्धियों का आधार
🔴 मनुष्य की विचार पुटी में संसार के सारे श्रेय एवं प्रेय सन्निहित रहते हैं। यही कारण है कि मनुष्य ने न केवल एक अपितु असंख्यों क्षेत्रों में चमत्कार कर दिखाये हैं। जिन विचारों के बल पर मनुष्य साहित्य का सृजन करता है उन्हीं विचारों के बल पर कल-कारखाने चलाता है। जिन विचारों के बल पर आत्मा और परमात्मा की खोज कर लेता है उन्हीं विचारों के बल पर खेती करता और विविध प्रकार के धन-धान्य उत्पन्न करता है, व्यापार और व्यवसाय करता है। यही नहीं जिन विचारों की प्रेरणा से वह निर्दय अपराधी भी बन जाता है। इस प्रकार सहज ही समझा जा सकता है कि मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व तथा कर्तृत्व में उसकी विचार शक्ति ही काम कर रही है।

🔵 एक दिन पशुओं की भांति सारी क्रियाओं में पूर्ण पशु मनुष्य आज इस सभ्यता के उन्नति शिखर पर किस प्रकार पहुंच गया? अपनी विचार-शक्ति की सहायता से विचार शक्ति  की अद्भुत उपलब्धि इस सृष्टि में केवल मानव प्राणी को ही प्राप्त हुई है। यही कारण हैं कि किसी दिन का पशुओं के समकक्ष मनुष्य आज महान उन्नत दशा में पहुंच गया है और अन्य सारे पशु-पक्षी आज भी अपनी आदि स्थिति में उसी प्रकार रह रहे हैं। पशु-पक्षी नीड़ों और निविड़ों में पूर्ववत ही निवास कर रहे हैं किन्तु मनुष्य बड़े-बड़े नगर बनाकर अनन्त सुविधाओं के साथ रह रहा है। यह सब विचार-कला का ही विस्मय है।

🔴 विचारों के बल पर मनुष्य न केवल पशु से मनुष्य बना है वह मनुष्य से देवता भी बन सकता है। और विचार प्रधान ऋषि, मुनि महात्मा और सन्त मनुष्य से देवकोटि में पहुंचे हैं पहुंचते रहेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 21)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए  
🔵 भौतिक क्षेत्र की त्रिविध सम्पदाओं को प्रगति का माध्यम कहा गया है। समृद्धि, समर्थता और कुशलता के आधार पर व्यक्ति या समाज के सौभाग्य को सहारा जाता है। इसमें कोई हर्ज भी नहीं है, बशर्ते कि उन पर नैतिकता, सामाजिकता और सद्भावना का अंकुश ढीला न होने पाए। व्यक्ति कमाये कुछ भी, पर ध्यान इतना अवश्य रखें कि उसमें अनीति का, मुफ्तखोरी का समावेश तो नहीं, हो रहा है? उस उपार्जन को भी निजी स्वामित्व के अन्तर्गत ही समझ लिया जाये। ध्यान इस बात का भी रखा जाये कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है, उसकी आद्योपान्त प्रगति जन सहयोग के आधार पर ही सम्भव हुई है।

🔴 जिससे पाया है, उसे चुकाया भी जाना चाहिए अन्यथा लुटेरेपन की ही तूती बोलने लगेगी। तब ऋण चुकाने, प्रत्युपकार करने या कृतज्ञता जताने का द्वार ही बन्द हो जायेगा। ऐसी दशा में संसार में दो ही वर्ग शेष रहेंगे-एक शोषक, दूसरा शोषित। तब उन स्थापनाओं और विधाओं के लिए कोई स्थान ही नहीं रह जायेगा, जिनमें सहकारिता, सहभागिता और समानता का संस्थापना पर जोर दिया गया है। 

🔵 यदि जीवन में भाव संवेदना एवं वैचारिक उदारता के लिए स्थान न रह गया, तो वह अराजकता ही दीख पड़ने लगेगी, जिसमें समर्थों के लिए पीसना और असमर्थों के लिए पिसना ही नियति है। ऐसा मत्स्य न्याय ही यदि मनुष्यों के लिए भी परम्परा बन जाये फिर उस श्रेष्ठता के लिए कोई गुञ्जाइश ही न रहेगी, जिसके कारण मनुष्य को देवत्व का उत्तराधिकारी माना गया है। ‘‘कमाने वाला ही खाये’’ की नीति को यदि मान्यता मिल गई तो संसार में अबोधों अविकसितों, अपंगो, असमर्थों को जीवित रहने का कोई अधिकार ही न रह जायेगा।

🔴 उस स्थिति में अर्थ शास्त्र के अनुसार मनुष्यों में से प्राय: आधों को अपने जीवन का अन्त करना होगा। तब बूढ़ों को जीवित रहने देने की हिमायत किस तर्क के आधार पर की जा सकेगी? तब फिर इस संसार में भेड़ियों को भेड़ियों द्वारा ही फाड़ चीर कर खा जाने जैसे दृश्य सर्वत्र उपस्थित होंगे। तब कैसा वीभत्स होगा संसार?     

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 साधक कैसे बनें? (भाग 1)


👉 युग ऋषि की अमृतवाणी
 
🔴 साधकों में से कई व्यक्ति हमसे ये पूछते रहते हैं-क्या करें? क्या करें? मैं उनमें से हरेक से ये कहता हूँ, ये मत पूछो, बल्कि ये पूछो कि क्या बनें? क्या बनें? अगर आप कुछ बन जाते हैं तो करने से भी ज्यादा कीमती है, पर जो कुछ भी आप कर रहे होंगे, वो सब सही हो रहा होगा। आप साँचा बनने की कोशिश करें। अगर आप साँचा बनेंगे, तो जो भी गीली मिट्टी आपके सम्पर्क में आयेगी, आपके तरीके से आपके ढंग की शकल के खिलौने बनते हुए चले जायेंगे। आप सूरज बनें। आप चमकेंगे और चलेंगे। उसका परिणाम क्या होगा? जिन लोगों के लिये आप करना चाहते हैं वो आपके साथ-साथ चलेंगे और चमकेंगे। सूरज के साथ में नवग्रह और बत्तीस उपग्रह हैं, ये सबके सब लोग चमकते हैं और साथ-साथ चलते हैं, क्योंकि सूरज चलता है। हम चलें।

🔵  हम प्रकाशवान् हों। हम देखेंगे, जिस जनता के लिये हम चाहते थे कि ये हमारा अनुगामी बने और हमारी ये नकल करे, आप देखेंगे कि आप चलते हैं तो दूसरे लोग भी चलते हैं। आप स्वयं भी नहीं चलेंगे और ये अपेक्षा करेंगे कि दूसरे आदमी हमारा कहना मानें, ये मुश्किल बात है। आप गलें और वृक्ष बनें और वृक्ष बनकर के अपने जैसे असंख्य बीज आप पायें, अपने भीतर से आप पैदा कर डालें। हमको बीज की जरूरत है, बीज लाइये, बीज बनिए, कहाँ से बीज लायेंगे? आप गलिए, वृक्ष बनिए और अपने भीतर से ही फल पैदा कीजिए और प्रत्येक फल में से ढेरों के ढेरों बीज पैदा कीजिए, लीजिए बन गये तैयार। अपने भीतर से ही क्यों न बीज बनायें?

🔴 मित्रो! जिन लोगों ने अपने आपको बनाया है, उनको ये पूछने की जरूरत न पड़ी ‘क्या करेंगे?’, उनकी प्रत्येक क्रिया इस लायक बन गई, कि वो सब कुछ कर सकने में समर्थ हो गई। उनका व्यक्तित्व ही इतना आकर्षक रहा कि प्रत्येक सफलता को और प्रत्येक महानता को सम्पन्न करने के लिये काफी था। अर्जुनदेव जी थाली, बरतन साफ करते थे। उन्होंने अपने आपको गुरु के अनुशासन में ढालने का प्रयत्न किया था और जब उनके गुरु तलाश करने लगे कि कौन-से शिष्य को उत्तराधिकारी बनाया जाय? सारे विद्वानों की अपेक्षा, सारे नेता और दूसरे गुण वालों की अपेक्षा उन्होंने अर्जुनदेव को चुना। उनके गुरु रामदास जी ने ये कहा, कि अर्जुनदेव ने अपने आपको बनाया है और बाकी आदमी इस कोशिश में लगे रहे कि हम दूसरों से क्या करायें और स्वयं क्या करें, बल्कि होना ये चाहिए था कि अपने आपको बनाना चाहिए था।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 54)

🌹 भावी रूपरेखा का स्पष्टीकरण
🔴 यह कार्यक्रम देवात्मा गुरुदेव ने ही बनाया था, पर था मेरा इच्छित। इसे मनोकामना की पूर्ति कहना चाहिए। स्वास्थ्य, सत्संग और मनन-चिंतन से यह तथ्य भली प्रकार हृदयंगम हो गया था कि दसों इन्द्रियाँ प्रत्यक्ष और ग्यारहवीं अदृश्य मन इन सबका निग्रह कर लेने पर बिखराव से छुटकारा मिल जाता है और आत्मसंयम का पराक्रम बन पड़ने पर मनुष्य की दुर्बलताएँ समाप्त हो जाती हैं और विभूतियाँ जग पड़ती हैं। सशरीर सिद्ध पुरुष होने का यही राजमार्ग है। इन्द्रिय निग्रह, अर्थ निग्रह, समय निग्रह और विचार निग्रह यह चार संयम हैं। इन्हें सुधारने वाले महामानव बन जाते हैं और काम, क्रोध, लोभ, मोह इन चारों से मन को उबार लेने पर लौकिक सिद्धियाँ हस्तगत हो जाती हैं।

🔵 मैं तपश्चर्या करना चाहता था, पर करता कैसे? समर्पित को स्वेच्छा आचरण की सुविधा कहाँ? जो मैं चाहता था, वह गुरुदेव के मुख से आदेश रूप में कहे जाने पर मैं फूला न समाया और उस क्रिया कृत्य के लिए समय निर्धारित होने की प्रतीक्षा करने लगा।

🔴  गुरुदेव बोले-‘‘अब वार्ता समाप्त हुई। तुम गंगोत्री चले जाओ। वहाँ तुम्हारे निवास, आहार आदि की व्यवस्था हमने कर दी है। भागीरथ शिला, गौरी कुण्ड पर बैठकर अपना साधना क्रम आरम्भ कर दो। एक साल पूरा हो जाए, तब अपने घर लौट जाना। हम तुम्हारी देख−भाल नियमित रूप से करते रहेंगे।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 55) 18 Feb

🔵 सर्दी से बचने के लिए लोग कितनी तरह के वस्त्रों का उपयोग करते हैं पर रोज ही आंखों के सामने गुजरने वाले बरड (जंगली भेड़) और रीछ के शरीर पर जमे हुए बालों जैसे गरम ऊनी कोट शायद अब तक किसी मनुष्य को उपलब्ध नहीं हुए। हर छिद्र से हर घड़ी दुर्गन्ध निकालने वाले मनुष्य की हर घड़ी अपने पुष्पों से सुगन्धि बखेरने वाले, लता—गुल्मों से क्या तुलना हो सकती है? साठ-सत्तर वर्ष में जीर्ण-शीर्ण होकर मरखप जाने वाले मनुष्य की इन अजगरों से क्या तुलना की जाय जो चार सौ वर्ष की आयु को हंसी खुशी पूरा कर लेते हैं। वट और पीपल के वृक्ष तो एक हजार वर्ष तक जीवित रहते हैं।

🔴 कस्तूरी मृग जो सामने वाले पठार पर छलांग मारते रहते हैं, किसी भी मनुष्य को दौड़ में परास्त कर सकते हैं। भूरे बाघों से मल्ल युद्ध में क्या कोई मनुष्य जीत सकता है? चींटी की तरह अधिक परिश्रम करने की सामर्थ्य भला किस आदमी में होगी? शहद की मक्खी की तरह फूलों में से कौन मधु संचय कर सकता है? बिल्ली की तरह रात के घोर अन्धकार में देख सकने वाली दृष्टि किसे प्राप्त है? कुत्तों की तरह घ्राण शक्ति के आधार पर बहुत कुछ पहचान लेने की क्षमता भला किस को होगी? मछली की तरह निरन्तर जल में कौन रह सकता है? हंस के समान नीर-क्षीर विवेक किसे होगा? हाथी के समान बल किसी व्यक्ति में है? इन विशेषताओं युक्त प्राणियों के देखते हुए मनुष्य का यह गर्व करना मिथ्या मालूम पड़ता है कि वही संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है।

🔵 आज के भ्रमण में यही विचार मन में घूमते रहे कि मनुष्य ही सब कुछ नहीं है, सर्वश्रेष्ठ भी नहीं है, सब का नेता भी नहीं है। उसे बुद्धि बल मिला, सही। उसके आधार पर उसने अपने सुख साधन बढ़ाये यह भी सही है। पर साथ ही यह भी सही है कि इसे पाकर उसने अनर्थ ही किया। सृष्टि के अन्य प्राणी जो उसके भाई थे, यह धरती, उनकी भी माता ही थी, उस पर जीवित रहने, फलने फूलने और स्वाधीन रहने का उन्हें भी अधिकार था; पर मनुष्य ने सब को पराधीन बना डाला, सब की सुविधा और स्वतन्त्रता को बुरी तरह पददलित कर डाला।

🔴 पशुओं को जंजीरों से कसकर उससे अत्यधिक श्रम लेने के लिए पैशाचिक उत्पीड़न किया, उनके बच्चों के हक का दूध छीनकर स्वयं पीने लगा, निर्दयता पूर्वक वध करके उनका मांस खाने लगा। पक्षियों और जलचरों के जीवन को भी उसने अपनी स्वाद प्रियता और विलासिता के लिए बुरी तरह नष्ट किया। मांस के लिए, दवाओं के लिए, फैशन के लिए, विनोद के लिए उनके साथ कैसा नृशंस व्यवहार किया है, उस पर विचार करने से दम्भी मनुष्य की सारी नैतिकता मिथ्या ही प्रतीत होती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 Feb 2017


👉 आज का सद्चिंतन 17 Feb 2017


👉 ईसाई चिकित्सक को दिव्य दिशा निर्देश

🔴 १० अक्टूबर, १९८३ के ब्रह्ममुहूर्त के वे पल मुझसे भुलाये नहीं भूलते। पूज्य गुरुदेव ने आत्मीयतापूर्वक कहा था- ‘‘बेटा, तू मेरा काम कर और मैं तेरा काम करूँगा।’’

🔵 प्यार में रंगे पूज्य गुरुदेव के ये शब्द आज भी उन क्षणों में गूँज उठते हैं, जिन क्षणों में मेरे जीवन की कोई जटिल समस्या मुझे पंगु बना देती है। पूज्य गुरुदेव के संरक्षण में जब मैंने अपनी आध्यात्मिक यात्रा शुरू की तो मेरे जीवन में कई तरह के उतार- चढ़ाव आए। पिताजी, माताजी के देहावसान के बाद परिवार की सारी जिम्मेदारी मेरे ही कंधे पर आ गई।

🔴 पूज्य गुरुदेव के सान्निध्य में आने के २३ साल बाद की बात है। पिछले कुछ समय से बीमार चल रही मेरी पत्नी श्रीमती कलावती देवी की डाक्टरी जाँच से पता चला कि उन्हें कैंसर हो गया है। तब तक यह असाध्य बीमारी आखिरी स्टेज में पहुँच चुकी थी, इसलिए सभी प्रयासों के बावजूद उनका देहान्त हो गया। यह ६ अक्टूबर २००६ का दिन था।
  
🔵 अब पूरे परिवार की देख- रेख की जिम्मेदारी मुझ अकेले के कन्धों पर आ गई थी। एक ओर मेरी बेटी सुषमा विवाह के योग्य हो चुकी थी और दूसरी ओर दो छोटे- छोटे बच्चों के पालन- पोषण का उत्तरदायित्व भी मुझे ही वहन करना था। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि नौकरी की आठ घण्टे की ड्यूटी पूरी करने के बाद घर के इतने सारे काम अकेले कैसे कर पाऊँगा। खैर, जैसे- तैसे सुबह से देर रात तक अपने शरीर का दोहन करता हुआ मैं इन बच्चों के लालन- पालन में लगा रहा, लेकिन इतने पर ही बस नहीं हुआ। दुर्भाग्य मेरे पीछे हाथ धोकर पड़ा था। इन दायित्वों के निर्वाह के दौर में प्रारब्ध ने मेरी एक और कठिन परीक्षा ली।

🔴 घटना सन् २००९ की है। अक्टूबर का महीना था। हजारीबाग की वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. निधि सरन ने बताया कि मुझे प्रोस्टेट के साथ किडनी में इंफेक्शन की शिकायत है।

🔵 घर में छोटा बेटा नरेन्द्र और बेटी सुषमा ही थी। मेरी बीमारी की बात सुनकर दोनों सकते में आ गए। उन्होंने मेरे जीवन की रक्षा के लिए भीगी आँखों से पूज्यवर को याद किया और मुझे राँची के एक अस्पताल में भर्ती कराया। यहीं पर शुरू हुई नियति के साथ पूज्य गुरुदेव की जंग।

🔴 यहाँ आकर उपचार के दौरान मेरी तबियत ठीक होने के बजाय और भी बिगड़ती चली गई। अंत में मुझे वहाँ के डॉक्टरों की सलाह पर १० नवंबर २००९ को  राँची के अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया। मेरा अंत निकट आया जानकर मेरे परिवार के लोग मुझे देखने के लिए हॉस्पिटल आने लगे। नेफ्रोलॉजिस्ट मुझे नित्य ४ घंटे डायलिसिस पर रख रहे थे। एक दिन अस्पताल के डॉ. घनश्याम सिंह ने बताया कि किडनी की स्थिति बहुत ही खराब हो चुकी है। इन्हें बदलवाकर ही मरीज को जिन्दा रखा जा सकता है, वह भी कुछ ही समय के लिए। यह सुनकर मेरे बच्चों की स्थिति ऐसी हो गई, मानो उनके ऊपर पहाड़ टूट पड़ा हो।

🔵 अपोलो के इलाज से निराश होकर श्रद्धेया शैल जीजी व श्रद्धेय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी को इस विपत्ति के बारे में फोन पर बताया गया। उन्होंने कहा कि प्राण रक्षा के लिए वे हम सबके आराध्य देव आचार्यश्री एवं वन्दनीया माताजी से प्रार्थना करेंगे। इधर गायत्री शक्तिपीठ, हजारीबाग के समस्त परिजन भी मेरे स्वास्थ्य लाभ के लिए गायत्री उपासना करने लगे

🔴 सामूहिक रूप से की जा रही उपासना- प्रार्थना १६ नवंबर को फलीभूत हुई। दोपहर का समय था। मुझे आभास हुआ कि पूज्य गुरुदेव व माताजी मेरे सिरहाने के पास आकर मेरा सिर सहला रहे हैं। पूज्य गुरुदेव का स्नेहिल स्पर्श पाकर मेरी आँखों से आँसुओं की धार फूट पड़ी। मुझे सान्त्वना देते हुए उन्होंने कहा- ‘‘बेटे! हॉस्पिटल बदलो। कहाँ जाना है, कब जाना है, किससे मिलना है, इन सबकी व्यवस्था हमने कर दी है।’’     

🔵 परिवार के लोगों ने किडनी ट्रांसप्लांटेशन के लिए देश के नामचीन अस्पतालों से संपर्क करना शुरू कर दिया था। अंततः मुझे- क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, सी.एम.सी., वैल्लूर ले जाने का निर्णय लिया गया। जैसे- तैसे हम वैल्लूर पहुँचे।

🔴 वैल्लूर हॉस्पिटल जाकर पता चला कि किडनी ट्रान्सप्लांटेशन के विशेषज्ञ डॉक्टर से एक सप्ताह बाद मुलाकात हो पाएगी। यहीं प्रारंभ हुई गुरुवर की लीला। मैं व्हील चेयर पर बैठा युगऋषि का ध्यान करने लगा। इसी बीच मेरे छोटे बेटे नरेन्द्र को ऐसी अन्तःप्रेरणा हुई कि वह बिना किसी की अनुमति लिए मेरे ह्वील चेयर को दौड़ाते हुए नेफ्रोलॉजी विभाग पहुँचा और विभाग के प्रभारी डॉ. राजेश जोसेफ के आगे हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

🔵 डॉ. जोसेफ ने हमें देखकर असहज भाव से पूछा- क्या बात है? नरेन्द्र ने राँची के अपोलो में चले इलाज से लेकर अब तक की स्थिति की जानकारी देते हुए उनसे किडनी ट्रान्सप्लाण्ट करने की प्रार्थना की और अपोलो हॉस्पिटल की रिपोर्ट की फाईल उनके आगे रख दी।

🔴 डॉ. जोसेफ ने रिपोर्ट देखकर कहा- ‘‘चिन्ता की कोई बात नहीं है। सब ठीक हो जायेगा।’’ दरअसल कल से ही मुझे आप जैसे किसी मरीज के आने का स्पष्ट पूर्वाभास हो रहा था। मुझे लग रहा था कि अगले दिन अकस्मात् आने वाले किसी मरीज की अविलम्ब चिकित्सा के लिए मेरे प्रभु मुझे प्रेरित कर रहे हैं। सच पूछिए तो आज सुबह से मैं आप लोगों की ही प्रतीक्षा कर रहा था।’’ इतना कहते हुए वे स्वयं अपने हाथों से मेरा ह्वील चेयर सँभालकर डायलिसिस कक्ष की ओर चल पड़े।

🔵 लगभग 4 घंटे तक डायलिसिस चलने के बाद मुझे बाहर लाया गया। डॉ. जोसेफ ने नरेन्द्र से मुस्कराते हुए कहा कि अब किडनी ट्रान्सप्लाण्ट करने या भविष्य में कभी डायलिसिस पर रखने की नौबत नहीं आयेगी। कुछ ही दिनों में ये पूरी तरह से स्वस्थ हो जायेंगे।              

🔴 सवेरे- सवेरे डॉ. जोसेफ ने फोन पर निर्देश देकर ब्लड के विभिन्न टेस्ट करवाये। रिपोर्ट बता रही थी कि सुधार की प्रक्रिया तेजी से शुरू हो चुकी है। तीन दिन बाद पुनः ब्लड टेस्ट हुआ, रिपोर्ट आश्चर्यचकित करने वाली थी। अब तक मैं ह्वील चेयर से उठकर कुछ कदम टहलने लायक हो चुका था। इस बीच कभी डायलिसिस पर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ी। 25 दिसंबर को डॉ. जोसेफ  ने अपने जन्मदिन पर एक समारोह का आयोजन किया। इसमें मेरा बेटा नरेन्द्र भी आमंत्रित था।

🔵 उन्होंने नरेन्द्र के समक्ष इस तथ्य का उद्घाटन किया कि ४ घण्टे तक चली मेरी गहन चिकित्सा के दौरान कोई दैवी शक्ति उन्हें लगातार प्रोत्साहन तथा दिशा निर्देश दे रही थी। डॉ. जोसेफ की बातें सुनकर भाव विह्वलता में नरेन्द्र की आँखें मुंद गईं। उसे लगा कि सामने गुरुदेव खड़े होकर मुस्करा रहे हैं और उनका दाहिना हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में ऊपर उठा हुआ है।

🌹  ई. एम. डी. शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार (उत्तराखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 40)

🌹 आराधना और ज्ञानयज्ञ     
🔴 शारीरिक स्वस्थता के तीन चिन्ह हैं - (१) खुलकर भूख, (२) गहरी नींद, (३) काम करने के लिये स्फूर्ति। आत्मिक समर्थता के भी तीन चिह्न हैं -(१) चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश, (२) चरित्र में निष्ठा और, (३) व्यवहार में पुण्य परमार्थ के पुरुषार्थ की प्रचुरता। इन्हीं को उपासना, साधना और आराधना कहते हैं। आत्मिक प्रगति का लक्षण है, मनुष्य में देवत्व का अभिवर्द्धन। देवता देने वाले को कहते हैं। दूसरे शब्दों में इसे धर्मधारणा या सेवा साधना भी कह सकते हैं। व्यक्तित्व में शालीनता उभरेगी तो निश्चित रूप से सेवा की ललक उठेगी। सेवा साधना से गुण, कर्म, स्वभाव में सदाशयता भरती है। इसे यों भी कह सकते हैं कि जब शालीनता उभरेगी तो परमार्थरत हुए बिना रहा नहीं जा सकेगा।

🔵 पृथ्वी पर मनुष्य शरीर में निवास करने वाले देवताओं को ‘भूसुर’ कहते हैं। यह साधु और ब्राह्मण वर्ग के लिये प्रयुक्त होता है। ब्राह्मण एक सीमित क्षेत्र में परमार्थरत रहते हैं और साधु परिव्राजक के रूप मेें सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन का उद्देश्य लेकर जहाँ आवश्यकता है, वहाँ पहुँचते रहते हैं। उनकी गतिविधियाँ पवन की तरह प्राण प्रवाह बिखेरती हैं। बादलों की तरह बरसकर हरीतिमा उत्पन्न करती हैं। आत्मिक प्रगति से कोई लाभान्वित हुआ या नहीं, इसकी पहचान इन्हीं दो कसौटियों पर होती है कि चिन्तन और चरित्र में मानवी गरिमा के अनुरूप उत्कृष्टता दृष्टिगोचर होती है या नहीं। साथ ही परमार्थपरायणता की ललक कार्यान्वित होती है या नहीं।        
                      
🔴 मोटेतौर पर दान पुण्य को परमार्थ कहते हैं। पर इनमें विचारशीलता का गहरा पुट आवश्यक है। दुर्घटनाग्रस्त, आकस्मिक संकटों में फँसे हुओं को तात्कालिक सहायता आवश्यक होती है। इसी प्रकार अपंग, असमर्थों को भी निर्वाह मिलना चाहिए। इसके अतिरिक्त अभावग्रस्तों, पिछड़े हुओं को ऐसी परोक्ष सहायता की जानी चाहिये जिसके सहारे वे स्वावलम्बी बन सकें। उन्हें श्रम दिया जाये, साथ ही श्रम का इतना मूल्य भी, जिससे मानवोचित निर्वाह सम्भव हो सके। गाँधीजी ने खादी को इसी दृष्टि से महत्त्व दिया था कि उसे अपनाने पर बेकारों को काम मिलता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सादगी और कमखर्ची का अनुकरणीय आदर्श

🔴 वे राज्यों के दौरे पर थे। बिहार राज्य के शहर रांची पहुँचने तक जूता दाँत दिखाने लगा। काफी घिस जाने के कारण कैइ कीलें निकल आइ थी, जो बैठे रहने में तो नहीं पैदल चलने में पैरों में चुभती थी, इसलिए रांची में दूसरा जूता-जोडा बदलने की व्यवस्था की गई।

🔵 यह तो वह फिजूलखर्ची लोग होते है, जो आय और औकत की परवाह किए बिना आमदनी से भी अधिक खर्च विलासितापूर्ण सामग्रियों में करते है। इस तरह वे व्यवस्था संबंधी कठिनाइयों और कर्ज के भार से तो दबते ही है, शिक्षा, पौष्टिक आहार, औद्योगिक एवं आर्थिक विकास से भी वंचित रह जाते हैं। मितव्ययी लोग थोडी-सी आमदनी से ही जैसी शान की जिंदगी बिता लेते है। फिजूलखर्च लंबी आमदनी वाली को वह सौभाग्य कहां नसीब होता है?

🔴 इनके लिए तो यह बात भी नही थी। आय और औकात दोनों ही बडे आदमियों जैसे थे, पर वे कहा करते थे कि दिखावट और फिजूलखर्ची अच्छे मनुष्यों का लक्षण नही वह चाहे कितना ही बडा़ आदमी क्यों न हो। फिजूल खर्च करने वाला समाज का अपराधी है क्योंकि बढे़ हुए खर्चों की पूर्ति अनैतिक तरीके से नही तो और कहाँ से करेगा ? मितव्ययी आदमी व्यवस्था और उल्लास की बेफिक्री और स्वाभिमान की जिदंगी बिताता है, क्या हुआ यदि साफ कपडा़ चार दिन पहन लिया जाए इसके बजाय कि केवल शौक फैशन और दिखावट के लिए दिन में चार कपडे बदले जाऐं रोजाना धोबी का धुला कपडा पहना जाए।

🔵 हर वस्तु का उपभोग तब तक करना चाहिए, जब तक उस की उपयोगिता पूरी तरह नष्ट न हो जाए। कपडा सीकर के दो माह और काम दे जाए तो सिला कपडा पहनना अच्छा बजाय इसके कि नये कपडे के लिए १० रुपया बेकार खर्च किये जाऐँ।

🔴 इस आदर्श का उन्होंने अपने जीवन में अक्षरश पालन भी किया था। उनका प्रमाण राँची वाले जूते थे। बस यहाँ तक का उनका जीवन था, अब उन जूतों को हर हालत मे बदल डालने की उन्होंने भी आवश्यकता अनुभव की।

🔵 उनके निजी सचिव गये और अच्छा-सा मुलायम १९ रुपये का जूता खरीद लाए। उन्होंने सोचा था यह जूते उनके व्यक्तित्व के अनुरूप फवेंगे, पर यहाँ तो उल्टी पडी, उन्होने कहा- जब ग्यारह रुपये वाले जूते से काम चल सकता है तो फिर १९ रुपये खर्च करने की क्या आवश्यकता है ? मेरा पैर कड़ा जूता पहनने का अभ्यस्त है, आप इसे लौटा दीजिये।

🔴 निजी सचिव अपनी मोटर की ओर बढे़ कि यह जूता बाजार जाकर वापस लौटा आऐं। पर वह ऐसे नेता नही थे। आजकल के नेताओं की तरह १ की जगह ४ खर्च करने, प्रजा का धन होली की तरह फूँकने की मनमानी नही थी। उनमें प्रजा के धन की रक्षा की भावना थी। राजा ही सदाचरण का पलन नहीं करेगा तो प्रजा उसका परिपालन कैसे करेगी ? इसलिए जान बूझकर उन्होंने अपने जीवन मे आडंबर को स्थान नही दिया था और हर समय इस बात का ध्यान रखते थे कि मेरी प्रजा का एक पैसा भी व्यर्थ बरबाद न हो।

🔵 उन्होंने सचिव को वापस बुलाकर कहा ‘दो मील जाकर और दो मील वापस लौटकर जितना पेट्रोल खर्च करेगे, बचत उससे आधी होगी तो ऐसी बचत से क्या फायदा ? सब लोग उनकी विलक्षण सादगी और कमखर्ची के आगे नतमस्तक हुए।

🔴 आप जानना चाहेंगे कि वह कौन था ? सादगी और कमखची की प्रतिमूर्ति- डा० राजेंद्र प्रसाद, भारतवर्ष के राष्ट्रपति रहकर भी जिन्होंने धन के सदुपयोग का अनुकरणीय आदर्श अपने जीवन में प्रस्तुत किया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 33, 34

👉 आत्मिक प्रगति का अवलम्बन :- सेवा-साधना

🔵 दो वस्तुओं के परस्पर घुल-मिल जाने पर तीसरी नयी वस्तु बन जाती है। नीला और पीला रंग यदि मिला दिया जाय तो हरा बन जाता है। रात्रि और दिवस के मिलन को सन्ध्या तथा दो ऋतुओं की मिलन-वेला को सन्धिकाल के नाम से पुकारा जाता है। अध्यात्म क्षेत्र में आत्मतत्त्व की उपलब्धि के लिए दो प्रमुख आधार हैं योग एवं तप। इन दोनों को सम्मिलित कर देने पर जो तीसरी आकृति सामने आती है, उसे सेवा कहते हैं। जहाँ आदर्शों के साथ तादात्म्य स्थापित करने की प्रक्रिया योग कहलाती है, वहीं लोभ, मोह, अहंकार विलास आदि बन्धनों -कुसंस्कारों को निरस्त करने के लिए किया गया संघर्ष तप कहलाता है। यह संघर्ष सत्प्रयोजनों के, सत्प्रवृत्ति संवर्धन के निमित्त ही किया जाता है।

🔴 योग व तप के दोनों सरञ्जाम जुट जाने पर सेवा भावनाओं का उदय होता है। योग से उदार आत्मीयता के रूप में परमार्थ परायणता की, सदाशयता की अन्तःप्रेरणा उठने लगती है। उसकी पूर्ति के निमित्त अपव्यय से शक्ति स्रोतों को बचाना और उस बचत को सदुद्देश्यों के निमित्त लगाना पड़ता है। यह नियोजन ही तप है। सेवा साधना में निरत व्यक्ति योगी व तपस्वी का सम्मिलित स्वरूप होता है, यदि यह कहा जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति नहीं है।

🔵 अध्यात्म क्षेत्र में ‘भज-सेवायाम्’ से ‘भजन’ शब्द बना है। भजन का सीधा-सादा एक ही अर्थ है सेवा। भजन-याने दिखावा, कर्मकाण्ड, भक्ति का प्रदर्शन, जोरों से नामोच्चारण इत्यादि नहीं अपितु ‘सेवा’। सेवा भी किसकी? इसका एक ही उत्तर है-आदर्शों की। आदर्शों का समुच्चय ही भगवान् है। स्थायी सेवा वही है, जिसमें व्यक्ति को पीड़ा से मुक्ति दिलाने-साधन दिलाने के साथ अपने पैरों पर खड़ा करने के साथ, इन सबके एक मात्र आधार आदर्शों के प्रति उसे निष्ठावान् बना दिया जाय। यही सेवा सच्ची सेवा है। उसे पतन-निवारण व आदर्शों के साथ संयुक्तीकरण भी कह सकते हैं। दुखी को सुखी व सुखी को सुसंस्कृत बनाने का आत्यांतिक आधार एक ही है- आदर्शों को आत्मसात् करना। किसने कितना भजन किया, कितना आध्यात्मिक परिष्कार उनका हुआ, इसका एक ही पैमाना है। वह यह कि सेवा धर्म अपनाने के लिए उसके मन में कितनी ललक उठी, लगन लगी, अन्दर से मन हुलस उठा। यही व्यक्तित्व का सही मायने में परिष्कार भी है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 17

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 12)

🌹 अद्भुत उपलब्धियों का आधार

🔴 किसी भी कार्य में प्रेरक होने से कार्य की सफलता असफलता, अच्छाई-बुराई और उच्चता-निम्नता के हेतु भी मनुष्य के अपने विचार ही हैं। जिस प्रकार के विचार होंगे सृजन भी उसी प्रकार का होगा।

🔵 नित्य प्रति देखने में आता है कि एक ही प्रकार का काम दो आदमी करते हैं। उनमें से एक का कार्य सुन्दर सफल और सुघड़ होता है और  दूसरे का नहीं। एक से हाथ पैर, उपादान और साधनों के होते हुए भी दो मनुष्यों के एक ही कार्य में विषमता क्यों होती है। इसका एक मात्र कारण उनकी अपनी-अपनी विचार प्रेरणा है। जिसके कार्य सम्बन्धी विचार जितने सुन्दर, सुघड़ और सुलझे हुये होंगे उसका कार्य भी उसी के अनुसार उद्दात्त होगा।

🔴 जितने भी शिल्पों, शास्त्रों तथा साहित्य का सृजन हुआ है। वह सब विचारों की ही विभूति हैं। चित्रकार नित्य नये-नये चित्र बनाता है, कवि नित्य नये काव्य रचता है, शिल्पकार नित्य नये मॉडल और नमूने तैयार करता है। यह सब विचारों का ही परिणाम है। कोई भी रचनाकार जो नया निर्माण करता है, वह कहीं से उतार कर नहीं लाता और न कोई अदृश्य देव ही उसकी सहायता करता है। वह यह सब नवीन रचनायें अपने विचारों के ही बल पर करता है। विचार ही वह अद्भुत शक्ति है जो मनुष्य को नित्य नवीन प्रेरणा दिया करती है।

🔵 भूत, भविष्य और वर्तमान में जो कुछ दिखाई दिया, दिखलाई देगा और दिखलाई दे रहा है वह सब विचारों में वर्तमान रहा है, वर्तमान रहेगा और वर्तमान है। तात्पर्य यह है कि समग्र त्रयकालिक कर्तृत्व मनुष्य के विचार पटल पर अंकित रहता है। विचारों के प्रतिविम्ब को ही मनुष्य बाहर के संसार में उतारा करता है। जिसकी विचार स्फुरणा जितनी शक्तिमती होगी उसकी रचना भी उतनी ही सबल एवं सफल होगी। विचारशक्ति जितनी उज्ज्वल होगी, बाह्य प्रतिविम्ब भी उतने ही स्पष्ट और सुबोध होंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 20)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए  

🔵 हाथी पर अंकुश न लगे, तो वह खेत-खलिहानों को रौंदता, पेड़ पौधों को उखाड़ता और झोंपड़ों को धराशायी करता चला जायेगा। उसकी चपेट में जो प्राणी आ जाएँगे, उनकी भी खैर नहीं। सम्पदा भी उन्मत्त हाथी की तरह है, जिस पर उदारता का अंकुश आवश्यक है। यदि झरने पानी का सीधे रास्ते से निकलना रोक दिया गया, तो उसका परिणाम बाढ़ के रूप में भयंकरता दिखाने ही लगेगा। 

🔴 प्रस्तुत वातावरण में एक ही सबसे बड़ा अनर्थ दीख पड़ता है कि हर कोई अपने उपार्जन, वैभव को मात्र अपने लिए ही खर्च करना चाहता है। वह अपनापन भी विलासिता और अहंकारी ठाट-बाट प्रदर्शन तक ही सीमित है। यह प्रचलन इसी प्रकार बना रहा, तो इसका दुष्परिणाम अब से भी अधिक भयंकर रूप में अगले दिनों दृष्टिगोचर होगा । एक से बढ़कर एक अनर्थ सँजोए जाते रहेंगे। पेट की एक सीमा है, उसे पूर कर लेने पर भी अनावश्यक आहार खोजते चले जाने पर वह विग्रह उत्पन्न किये बिना नहीं रहेगा। उल्टी, दस्त, उदरशूल जैसी अवाञ्छनीय परिस्थितियाँ ही उत्पन्न होंगी। यह मोटी बात समझी जा सके, तो फिर एक ही नीति निर्धारण शेष बच जाता है कि नीतिपूर्वक कमाया कितना ही क्यों न जाये, पर उसका उपयोग सत्प्रवृत्ति के मार्ग में आगे बढ़ने में ही किया जाये।    

🔵 मात्र पैसा नहीं, शक्ति सूत्रों में समर्थता, योग्यता, शिक्षा, कुशलता आदि अन्य विभूतियाँ भी आती हैं। उन्हें भी अपरिग्रही नीतिवानों की तरह पतन को बँटाने और उत्कर्ष को बढ़ाने में उसी प्रकार नियोजित किया जा सकता है।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 जीवन कैसे जीयें? (भाग 4)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 मेरा आपसे अनुरोध ये है कि आप हँसती-हँसाती जिन्दगी जीयें, खिलती-खिलाती जिन्दगी जीयें, हलकी-फुलकी जिन्दगी जीयें। हलकी-फुलकी जिन्दगी जीयेंगे तो आप जीवन का सारे का सारा आनन्द पायेंगे। अगर आप घुसेंगे (सेंध मारेंगे) तो आप नुकसान पायेंगे। आप अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिये जिन्दगी को जीयें। हँसी-खुशी से जीयें। हमें माली की जिन्दगी जीनी चाहिये, मालिक की नहीं। मालिक की जिन्दगी में बहुत भारीपन है और बहुत कष्ट है। माली की जिन्दगी केवल रखवाली के तरीके से, चौकीदार के तरीके से अगर आप जीयें तो हम पायेंगे जो कुछ भी कर लिया, हमारा कर्तव्य काफी था। मालिक को चिंता रहती है। सफलता मिली, नहीं मिली। माली को इतनी चिंता रहती है कि अपने कर्तव्यों और अपने फर्ज पूरे किये कि नहीं किये?

🔵 दुनिया में रहें, काम दुनिया में करें, पर अपना मन भगवान् में रखें अर्थात् उच्च उद्देश्यों और उच्च आदर्शों के साथ जोड़कर रखें। हम दुनिया में डूबें नहीं। हम खिलाड़ी के तरीके से जीयें। हार-जीत के बारे में बहुत ज्यादा चिंता न करें। हम अभिनेता के तरीके से जीयें। हमने अपना पाठ-प्ले ठीक तरीके से किया कि नहीं किया; हमारे लिये इतना ही संतोष बहुत है। ठीक है, परिणाम नहीं मिला तो हम क्या कर सकते हैं? बहुत सी बातें परिस्थितियों पर निर्भर रहती है। परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल नहीं रहीं तो हम क्या कर सकते थे? कर्तव्य हमने हमारा पूरा किया, बहुत है, हमारे लिये बहुत है; इस दृष्टि से आप जीयेंगे तो आपकी खुशी को कोई छीन नहीं सकता और आपको इस बात की परवाह नहीं होगी कि जब कभी सफलता मिले, तब आपको प्रसन्नता हो। 24 घण्टे आप खुशी से जीवन जी सकते हैं। जीवन की सार्थकता और सफलता का यही तरीका है।

🌹 आज की बात समाप्त।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/amart_vachan_jivan_ke_sidha_sutra/jivan_kese_jiye

👉 हमारी युग निर्माण योजना (अंतिम भाग)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 युग-निर्माण योजना का उद्देश्य व्यक्ति, परिवार और समाज की ऐसी अभिनव रचना करना है जिसमें मानवीय आदर्शों का अनुसरण करते हुए सब लोग प्रगति, समृद्धि और शान्ति की ओर अग्रसर हो सकें। मानव-जीवन को वैयक्तिक एवं सामूहिक रूप में दुर्भावना एवं दुष्प्रवृत्तियों ने ही नरकमय बना रखा है। इस स्थिति को बदलना होगा और ऐसा प्रयत्न करना होगा कि इस अन्धकार के स्थान पर नया प्रकाश प्रतिष्ठित हो सके। सद्-भावनाएं और सत्प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि ही उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएं प्रशस्त कर सकती है। इसलिए हमें इन दोनों को बढ़ाने के लिए सभी सम्भव उपायों का अवलम्बन करना चाहिये। हम गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से उत्कृष्ट एवं आदर्श मानव बन सकें तो ही वे परिस्थितियां उत्पन्न होंगी जिन में अपनी और दूसरों की सुख शान्ति की सुरक्षा सम्भव हो सके।

🔵 दूसरे क्षेत्रों में आर्थिक राजनैतिक, औद्योगिक, वैज्ञानिक एवं अन्यान्य प्रगतियों के लिये विविध प्रयत्न किये जाते हैं, वे स्वागत योग्य हैं। पर व्यक्तियों के दृष्टिकोण को आदर्शवादिता की ओर उन्मुख करने के लिये नहीं के बराबर ध्यान दिया जा रहा है। जो हो रहा है उसमें दिखावा अधिक और तथ्य कम है। आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य को आदर्शवादिता को अपनाने के लिये—सदाचार, संयम, उदारता, सज्जनता जैसे सद्गुणों का विकास करने के लिये—लोक मंगल के लिए, त्याग बलिदान का आदर्श प्रस्तुत करने के लिए ऐसी प्रेरणा दी जाय जिससे उसकी वर्तमान हेय मनोदशा में आमूलचूल परिवर्तन हो सके।

इसी प्रयास का आरम्भ ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के सदस्यों ने अपने छोटे क्षेत्र से कर दिया है। बड़े लोगों की बड़ी योजनायें इस दिशा में बनें और वे व्यापक रूप से कार्यान्वित की जायें, आवश्यकता तो इसी बात की है। पर जब तक समाज के कर्णधारों एवं शक्तिशाली पुरुषों की अभिरुचि इस ओर उत्पन्न नहीं होती तब तक भावनाशील लोगों के लिए निष्क्रिय बैठे रहना उचित न होता। इससे हम लोगों ने अपने छोटे से परिवार से यह कार्यक्रम आरम्भ कर दिया है। यह पंक्तियां लिखे जाते समय इस परिवार के प्रमुख और सहायक सदस्यों को मिला कर तीन लाख के लगभग संख्या हो जाती है। इतनी जन-संख्या अपने वैयक्तिक एवं सामूहिक जीवन में नव-निर्माण की रचनात्मक योजना अपना ले तो उसका कुछ न कुछ प्रभाव शेष समाज पर भी पड़ेगा। इसी आशा से शत-सूत्री युग-निर्माण योजना प्रस्तुत की गई है। प्रसन्नता की बात है कि यह आशा-जनक गति से उत्साहवर्धक प्रगति करती चली जा रही है। मानव-समाज के पुनरुत्थान में यह छोटा-सा प्रयत्न कुछ उपयोगी सिद्ध हो सके ऐसी परमात्मा से प्रार्थना है।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 53)

🌹 भावी रूपरेखा का स्पष्टीकरण

🔴 परमब्रह्म के अंशधर देवात्मा सूक्ष्म शरीर में किस प्रकार रहते हैं। इसका प्रथम परिचय हमने अपने मार्गदर्शक के रूप में घर पर ही प्राप्त कर लिया था। उनके हाथों में विधिवत् मेरी नाव सुपुर्द हो गई थी। फिर भी बालबुद्धि अपना काम कर रही थी। हिमालय में अनेक सिद्ध पुरुषों के निवास की जो बात सुन रखी थी, उस कौतूहल को देखने का जो मन था वह ऋषियों के दर्शन एवं मार्गदर्शक की सांत्वना से पूरा हो गया था। इस लालसा को पहले अपने अंदर ही मन के किसी कोने में छिपाए फिरते थे। आज उसके पूरे होने व आगे भी दर्शन होते रहने का आश्वासन मिल गया था। संतोष तो पहले भी कम न था, पर अब वह प्रसन्नता और प्रफुल्लता के रूप में और भी अधिक बढ़ गया।

🔵 गुरुदेव ने आगे कहा-‘‘हम जब भी बुलाएँ तब समझना कि हमने 6 माह या एक वर्ष के लिए बुलाया है। तुम्हारा शरीर इस लायक बन गया है कि इधर की परिस्थितियों में निर्वाह कर सको। इस नए अभ्यास को परिपक्व करने के लिए इस निर्धारित अवधि में एक-एक करके तीन बार इधर हिमालय में ही रहना चाहिए। तुम्हारे स्थूल शरीर के लिए जिन वस्तुओं की आवश्यकता समझेंगे, हम प्रबंध कर दिया करेंगे। फिर इसकी आवश्यकता इसलिए भी है कि स्थूल से सूक्ष्म में और सूक्ष्म से कारण शरीर में प्रवेश करने के लिए जो तितीक्षा करनी पड़ती है, सो होती चलेगी। शरीर को क्षुधा, पिपासा, शीत, ग्रीष्म, निद्रा, थकान व्यथित करती हैं। इन छः को घर पर रहकर जीतना कठिन है, क्योंकि सारी सुविधाएँ वहाँ उपलब्ध रहने से यह प्रयोजन आसानी से पूरे होते हैं और तप तितीक्षाओं के लिए अवसर ही नहीं मिलता।

🔴  इसी प्रकार मन पर छाए रहने वाले छः कषाय-कल्मष भी किसी न किसी घटनाक्रम के साथ घटित होते रहते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर इन छः रिपुओं से जूझने के लिए आरण्यकों में रहकर इनसे निपटने का अभ्यास करना पड़ता है। तुम्हें घर रहकर यह अवसर भी न मिल सकेगा। इसलिए अभ्यास के लिए जन संकुल संस्थान से अलग रहने से उस आंतरिक मल्ल युद्ध में भी सरलता होती है। हिमालय में रहकर तुम शारीरिक तितीक्षा और मानसिक तपस्या करना। इस प्रकार तीन बार, तीन वर्ष यहाँ आते रहने और शेष वर्षों में जन सम्पर्क में रहने से परीक्षा भी होती चलेगी कि जो अभ्यास हिमालय में रहकर किया था, वह परिपक्व हुआ या नहीं?’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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