गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

👉 ईसाई चिकित्सक को दिव्य दिशा निर्देश

🔴 १० अक्टूबर, १९८३ के ब्रह्ममुहूर्त के वे पल मुझसे भुलाये नहीं भूलते। पूज्य गुरुदेव ने आत्मीयतापूर्वक कहा था- ‘‘बेटा, तू मेरा काम कर और मैं तेरा काम करूँगा।’’

🔵 प्यार में रंगे पूज्य गुरुदेव के ये शब्द आज भी उन क्षणों में गूँज उठते हैं, जिन क्षणों में मेरे जीवन की कोई जटिल समस्या मुझे पंगु बना देती है। पूज्य गुरुदेव के संरक्षण में जब मैंने अपनी आध्यात्मिक यात्रा शुरू की तो मेरे जीवन में कई तरह के उतार- चढ़ाव आए। पिताजी, माताजी के देहावसान के बाद परिवार की सारी जिम्मेदारी मेरे ही कंधे पर आ गई।

🔴 पूज्य गुरुदेव के सान्निध्य में आने के २३ साल बाद की बात है। पिछले कुछ समय से बीमार चल रही मेरी पत्नी श्रीमती कलावती देवी की डाक्टरी जाँच से पता चला कि उन्हें कैंसर हो गया है। तब तक यह असाध्य बीमारी आखिरी स्टेज में पहुँच चुकी थी, इसलिए सभी प्रयासों के बावजूद उनका देहान्त हो गया। यह ६ अक्टूबर २००६ का दिन था।
  
🔵 अब पूरे परिवार की देख- रेख की जिम्मेदारी मुझ अकेले के कन्धों पर आ गई थी। एक ओर मेरी बेटी सुषमा विवाह के योग्य हो चुकी थी और दूसरी ओर दो छोटे- छोटे बच्चों के पालन- पोषण का उत्तरदायित्व भी मुझे ही वहन करना था। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि नौकरी की आठ घण्टे की ड्यूटी पूरी करने के बाद घर के इतने सारे काम अकेले कैसे कर पाऊँगा। खैर, जैसे- तैसे सुबह से देर रात तक अपने शरीर का दोहन करता हुआ मैं इन बच्चों के लालन- पालन में लगा रहा, लेकिन इतने पर ही बस नहीं हुआ। दुर्भाग्य मेरे पीछे हाथ धोकर पड़ा था। इन दायित्वों के निर्वाह के दौर में प्रारब्ध ने मेरी एक और कठिन परीक्षा ली।

🔴 घटना सन् २००९ की है। अक्टूबर का महीना था। हजारीबाग की वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. निधि सरन ने बताया कि मुझे प्रोस्टेट के साथ किडनी में इंफेक्शन की शिकायत है।

🔵 घर में छोटा बेटा नरेन्द्र और बेटी सुषमा ही थी। मेरी बीमारी की बात सुनकर दोनों सकते में आ गए। उन्होंने मेरे जीवन की रक्षा के लिए भीगी आँखों से पूज्यवर को याद किया और मुझे राँची के एक अस्पताल में भर्ती कराया। यहीं पर शुरू हुई नियति के साथ पूज्य गुरुदेव की जंग।

🔴 यहाँ आकर उपचार के दौरान मेरी तबियत ठीक होने के बजाय और भी बिगड़ती चली गई। अंत में मुझे वहाँ के डॉक्टरों की सलाह पर १० नवंबर २००९ को  राँची के अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया। मेरा अंत निकट आया जानकर मेरे परिवार के लोग मुझे देखने के लिए हॉस्पिटल आने लगे। नेफ्रोलॉजिस्ट मुझे नित्य ४ घंटे डायलिसिस पर रख रहे थे। एक दिन अस्पताल के डॉ. घनश्याम सिंह ने बताया कि किडनी की स्थिति बहुत ही खराब हो चुकी है। इन्हें बदलवाकर ही मरीज को जिन्दा रखा जा सकता है, वह भी कुछ ही समय के लिए। यह सुनकर मेरे बच्चों की स्थिति ऐसी हो गई, मानो उनके ऊपर पहाड़ टूट पड़ा हो।

🔵 अपोलो के इलाज से निराश होकर श्रद्धेया शैल जीजी व श्रद्धेय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी को इस विपत्ति के बारे में फोन पर बताया गया। उन्होंने कहा कि प्राण रक्षा के लिए वे हम सबके आराध्य देव आचार्यश्री एवं वन्दनीया माताजी से प्रार्थना करेंगे। इधर गायत्री शक्तिपीठ, हजारीबाग के समस्त परिजन भी मेरे स्वास्थ्य लाभ के लिए गायत्री उपासना करने लगे

🔴 सामूहिक रूप से की जा रही उपासना- प्रार्थना १६ नवंबर को फलीभूत हुई। दोपहर का समय था। मुझे आभास हुआ कि पूज्य गुरुदेव व माताजी मेरे सिरहाने के पास आकर मेरा सिर सहला रहे हैं। पूज्य गुरुदेव का स्नेहिल स्पर्श पाकर मेरी आँखों से आँसुओं की धार फूट पड़ी। मुझे सान्त्वना देते हुए उन्होंने कहा- ‘‘बेटे! हॉस्पिटल बदलो। कहाँ जाना है, कब जाना है, किससे मिलना है, इन सबकी व्यवस्था हमने कर दी है।’’     

🔵 परिवार के लोगों ने किडनी ट्रांसप्लांटेशन के लिए देश के नामचीन अस्पतालों से संपर्क करना शुरू कर दिया था। अंततः मुझे- क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, सी.एम.सी., वैल्लूर ले जाने का निर्णय लिया गया। जैसे- तैसे हम वैल्लूर पहुँचे।

🔴 वैल्लूर हॉस्पिटल जाकर पता चला कि किडनी ट्रान्सप्लांटेशन के विशेषज्ञ डॉक्टर से एक सप्ताह बाद मुलाकात हो पाएगी। यहीं प्रारंभ हुई गुरुवर की लीला। मैं व्हील चेयर पर बैठा युगऋषि का ध्यान करने लगा। इसी बीच मेरे छोटे बेटे नरेन्द्र को ऐसी अन्तःप्रेरणा हुई कि वह बिना किसी की अनुमति लिए मेरे ह्वील चेयर को दौड़ाते हुए नेफ्रोलॉजी विभाग पहुँचा और विभाग के प्रभारी डॉ. राजेश जोसेफ के आगे हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

🔵 डॉ. जोसेफ ने हमें देखकर असहज भाव से पूछा- क्या बात है? नरेन्द्र ने राँची के अपोलो में चले इलाज से लेकर अब तक की स्थिति की जानकारी देते हुए उनसे किडनी ट्रान्सप्लाण्ट करने की प्रार्थना की और अपोलो हॉस्पिटल की रिपोर्ट की फाईल उनके आगे रख दी।

🔴 डॉ. जोसेफ ने रिपोर्ट देखकर कहा- ‘‘चिन्ता की कोई बात नहीं है। सब ठीक हो जायेगा।’’ दरअसल कल से ही मुझे आप जैसे किसी मरीज के आने का स्पष्ट पूर्वाभास हो रहा था। मुझे लग रहा था कि अगले दिन अकस्मात् आने वाले किसी मरीज की अविलम्ब चिकित्सा के लिए मेरे प्रभु मुझे प्रेरित कर रहे हैं। सच पूछिए तो आज सुबह से मैं आप लोगों की ही प्रतीक्षा कर रहा था।’’ इतना कहते हुए वे स्वयं अपने हाथों से मेरा ह्वील चेयर सँभालकर डायलिसिस कक्ष की ओर चल पड़े।

🔵 लगभग 4 घंटे तक डायलिसिस चलने के बाद मुझे बाहर लाया गया। डॉ. जोसेफ ने नरेन्द्र से मुस्कराते हुए कहा कि अब किडनी ट्रान्सप्लाण्ट करने या भविष्य में कभी डायलिसिस पर रखने की नौबत नहीं आयेगी। कुछ ही दिनों में ये पूरी तरह से स्वस्थ हो जायेंगे।              

🔴 सवेरे- सवेरे डॉ. जोसेफ ने फोन पर निर्देश देकर ब्लड के विभिन्न टेस्ट करवाये। रिपोर्ट बता रही थी कि सुधार की प्रक्रिया तेजी से शुरू हो चुकी है। तीन दिन बाद पुनः ब्लड टेस्ट हुआ, रिपोर्ट आश्चर्यचकित करने वाली थी। अब तक मैं ह्वील चेयर से उठकर कुछ कदम टहलने लायक हो चुका था। इस बीच कभी डायलिसिस पर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ी। 25 दिसंबर को डॉ. जोसेफ  ने अपने जन्मदिन पर एक समारोह का आयोजन किया। इसमें मेरा बेटा नरेन्द्र भी आमंत्रित था।

🔵 उन्होंने नरेन्द्र के समक्ष इस तथ्य का उद्घाटन किया कि ४ घण्टे तक चली मेरी गहन चिकित्सा के दौरान कोई दैवी शक्ति उन्हें लगातार प्रोत्साहन तथा दिशा निर्देश दे रही थी। डॉ. जोसेफ की बातें सुनकर भाव विह्वलता में नरेन्द्र की आँखें मुंद गईं। उसे लगा कि सामने गुरुदेव खड़े होकर मुस्करा रहे हैं और उनका दाहिना हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में ऊपर उठा हुआ है।

🌹  ई. एम. डी. शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार (उत्तराखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/Wonderfula

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 40)

🌹 आराधना और ज्ञानयज्ञ     
🔴 शारीरिक स्वस्थता के तीन चिन्ह हैं - (१) खुलकर भूख, (२) गहरी नींद, (३) काम करने के लिये स्फूर्ति। आत्मिक समर्थता के भी तीन चिह्न हैं -(१) चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश, (२) चरित्र में निष्ठा और, (३) व्यवहार में पुण्य परमार्थ के पुरुषार्थ की प्रचुरता। इन्हीं को उपासना, साधना और आराधना कहते हैं। आत्मिक प्रगति का लक्षण है, मनुष्य में देवत्व का अभिवर्द्धन। देवता देने वाले को कहते हैं। दूसरे शब्दों में इसे धर्मधारणा या सेवा साधना भी कह सकते हैं। व्यक्तित्व में शालीनता उभरेगी तो निश्चित रूप से सेवा की ललक उठेगी। सेवा साधना से गुण, कर्म, स्वभाव में सदाशयता भरती है। इसे यों भी कह सकते हैं कि जब शालीनता उभरेगी तो परमार्थरत हुए बिना रहा नहीं जा सकेगा।

🔵 पृथ्वी पर मनुष्य शरीर में निवास करने वाले देवताओं को ‘भूसुर’ कहते हैं। यह साधु और ब्राह्मण वर्ग के लिये प्रयुक्त होता है। ब्राह्मण एक सीमित क्षेत्र में परमार्थरत रहते हैं और साधु परिव्राजक के रूप मेें सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन का उद्देश्य लेकर जहाँ आवश्यकता है, वहाँ पहुँचते रहते हैं। उनकी गतिविधियाँ पवन की तरह प्राण प्रवाह बिखेरती हैं। बादलों की तरह बरसकर हरीतिमा उत्पन्न करती हैं। आत्मिक प्रगति से कोई लाभान्वित हुआ या नहीं, इसकी पहचान इन्हीं दो कसौटियों पर होती है कि चिन्तन और चरित्र में मानवी गरिमा के अनुरूप उत्कृष्टता दृष्टिगोचर होती है या नहीं। साथ ही परमार्थपरायणता की ललक कार्यान्वित होती है या नहीं।        
                      
🔴 मोटेतौर पर दान पुण्य को परमार्थ कहते हैं। पर इनमें विचारशीलता का गहरा पुट आवश्यक है। दुर्घटनाग्रस्त, आकस्मिक संकटों में फँसे हुओं को तात्कालिक सहायता आवश्यक होती है। इसी प्रकार अपंग, असमर्थों को भी निर्वाह मिलना चाहिए। इसके अतिरिक्त अभावग्रस्तों, पिछड़े हुओं को ऐसी परोक्ष सहायता की जानी चाहिये जिसके सहारे वे स्वावलम्बी बन सकें। उन्हें श्रम दिया जाये, साथ ही श्रम का इतना मूल्य भी, जिससे मानवोचित निर्वाह सम्भव हो सके। गाँधीजी ने खादी को इसी दृष्टि से महत्त्व दिया था कि उसे अपनाने पर बेकारों को काम मिलता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सादगी और कमखर्ची का अनुकरणीय आदर्श

🔴 वे राज्यों के दौरे पर थे। बिहार राज्य के शहर रांची पहुँचने तक जूता दाँत दिखाने लगा। काफी घिस जाने के कारण कैइ कीलें निकल आइ थी, जो बैठे रहने में तो नहीं पैदल चलने में पैरों में चुभती थी, इसलिए रांची में दूसरा जूता-जोडा बदलने की व्यवस्था की गई।

🔵 यह तो वह फिजूलखर्ची लोग होते है, जो आय और औकत की परवाह किए बिना आमदनी से भी अधिक खर्च विलासितापूर्ण सामग्रियों में करते है। इस तरह वे व्यवस्था संबंधी कठिनाइयों और कर्ज के भार से तो दबते ही है, शिक्षा, पौष्टिक आहार, औद्योगिक एवं आर्थिक विकास से भी वंचित रह जाते हैं। मितव्ययी लोग थोडी-सी आमदनी से ही जैसी शान की जिंदगी बिता लेते है। फिजूलखर्च लंबी आमदनी वाली को वह सौभाग्य कहां नसीब होता है?

🔴 इनके लिए तो यह बात भी नही थी। आय और औकात दोनों ही बडे आदमियों जैसे थे, पर वे कहा करते थे कि दिखावट और फिजूलखर्ची अच्छे मनुष्यों का लक्षण नही वह चाहे कितना ही बडा़ आदमी क्यों न हो। फिजूल खर्च करने वाला समाज का अपराधी है क्योंकि बढे़ हुए खर्चों की पूर्ति अनैतिक तरीके से नही तो और कहाँ से करेगा ? मितव्ययी आदमी व्यवस्था और उल्लास की बेफिक्री और स्वाभिमान की जिदंगी बिताता है, क्या हुआ यदि साफ कपडा़ चार दिन पहन लिया जाए इसके बजाय कि केवल शौक फैशन और दिखावट के लिए दिन में चार कपडे बदले जाऐं रोजाना धोबी का धुला कपडा पहना जाए।

🔵 हर वस्तु का उपभोग तब तक करना चाहिए, जब तक उस की उपयोगिता पूरी तरह नष्ट न हो जाए। कपडा सीकर के दो माह और काम दे जाए तो सिला कपडा पहनना अच्छा बजाय इसके कि नये कपडे के लिए १० रुपया बेकार खर्च किये जाऐँ।

🔴 इस आदर्श का उन्होंने अपने जीवन में अक्षरश पालन भी किया था। उनका प्रमाण राँची वाले जूते थे। बस यहाँ तक का उनका जीवन था, अब उन जूतों को हर हालत मे बदल डालने की उन्होंने भी आवश्यकता अनुभव की।

🔵 उनके निजी सचिव गये और अच्छा-सा मुलायम १९ रुपये का जूता खरीद लाए। उन्होंने सोचा था यह जूते उनके व्यक्तित्व के अनुरूप फवेंगे, पर यहाँ तो उल्टी पडी, उन्होने कहा- जब ग्यारह रुपये वाले जूते से काम चल सकता है तो फिर १९ रुपये खर्च करने की क्या आवश्यकता है ? मेरा पैर कड़ा जूता पहनने का अभ्यस्त है, आप इसे लौटा दीजिये।

🔴 निजी सचिव अपनी मोटर की ओर बढे़ कि यह जूता बाजार जाकर वापस लौटा आऐं। पर वह ऐसे नेता नही थे। आजकल के नेताओं की तरह १ की जगह ४ खर्च करने, प्रजा का धन होली की तरह फूँकने की मनमानी नही थी। उनमें प्रजा के धन की रक्षा की भावना थी। राजा ही सदाचरण का पलन नहीं करेगा तो प्रजा उसका परिपालन कैसे करेगी ? इसलिए जान बूझकर उन्होंने अपने जीवन मे आडंबर को स्थान नही दिया था और हर समय इस बात का ध्यान रखते थे कि मेरी प्रजा का एक पैसा भी व्यर्थ बरबाद न हो।

🔵 उन्होंने सचिव को वापस बुलाकर कहा ‘दो मील जाकर और दो मील वापस लौटकर जितना पेट्रोल खर्च करेगे, बचत उससे आधी होगी तो ऐसी बचत से क्या फायदा ? सब लोग उनकी विलक्षण सादगी और कमखर्ची के आगे नतमस्तक हुए।

🔴 आप जानना चाहेंगे कि वह कौन था ? सादगी और कमखची की प्रतिमूर्ति- डा० राजेंद्र प्रसाद, भारतवर्ष के राष्ट्रपति रहकर भी जिन्होंने धन के सदुपयोग का अनुकरणीय आदर्श अपने जीवन में प्रस्तुत किया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 33, 34

👉 आत्मिक प्रगति का अवलम्बन :- सेवा-साधना

🔵 दो वस्तुओं के परस्पर घुल-मिल जाने पर तीसरी नयी वस्तु बन जाती है। नीला और पीला रंग यदि मिला दिया जाय तो हरा बन जाता है। रात्रि और दिवस के मिलन को सन्ध्या तथा दो ऋतुओं की मिलन-वेला को सन्धिकाल के नाम से पुकारा जाता है। अध्यात्म क्षेत्र में आत्मतत्त्व की उपलब्धि के लिए दो प्रमुख आधार हैं योग एवं तप। इन दोनों को सम्मिलित कर देने पर जो तीसरी आकृति सामने आती है, उसे सेवा कहते हैं। जहाँ आदर्शों के साथ तादात्म्य स्थापित करने की प्रक्रिया योग कहलाती है, वहीं लोभ, मोह, अहंकार विलास आदि बन्धनों -कुसंस्कारों को निरस्त करने के लिए किया गया संघर्ष तप कहलाता है। यह संघर्ष सत्प्रयोजनों के, सत्प्रवृत्ति संवर्धन के निमित्त ही किया जाता है।

🔴 योग व तप के दोनों सरञ्जाम जुट जाने पर सेवा भावनाओं का उदय होता है। योग से उदार आत्मीयता के रूप में परमार्थ परायणता की, सदाशयता की अन्तःप्रेरणा उठने लगती है। उसकी पूर्ति के निमित्त अपव्यय से शक्ति स्रोतों को बचाना और उस बचत को सदुद्देश्यों के निमित्त लगाना पड़ता है। यह नियोजन ही तप है। सेवा साधना में निरत व्यक्ति योगी व तपस्वी का सम्मिलित स्वरूप होता है, यदि यह कहा जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति नहीं है।

🔵 अध्यात्म क्षेत्र में ‘भज-सेवायाम्’ से ‘भजन’ शब्द बना है। भजन का सीधा-सादा एक ही अर्थ है सेवा। भजन-याने दिखावा, कर्मकाण्ड, भक्ति का प्रदर्शन, जोरों से नामोच्चारण इत्यादि नहीं अपितु ‘सेवा’। सेवा भी किसकी? इसका एक ही उत्तर है-आदर्शों की। आदर्शों का समुच्चय ही भगवान् है। स्थायी सेवा वही है, जिसमें व्यक्ति को पीड़ा से मुक्ति दिलाने-साधन दिलाने के साथ अपने पैरों पर खड़ा करने के साथ, इन सबके एक मात्र आधार आदर्शों के प्रति उसे निष्ठावान् बना दिया जाय। यही सेवा सच्ची सेवा है। उसे पतन-निवारण व आदर्शों के साथ संयुक्तीकरण भी कह सकते हैं। दुखी को सुखी व सुखी को सुसंस्कृत बनाने का आत्यांतिक आधार एक ही है- आदर्शों को आत्मसात् करना। किसने कितना भजन किया, कितना आध्यात्मिक परिष्कार उनका हुआ, इसका एक ही पैमाना है। वह यह कि सेवा धर्म अपनाने के लिए उसके मन में कितनी ललक उठी, लगन लगी, अन्दर से मन हुलस उठा। यही व्यक्तित्व का सही मायने में परिष्कार भी है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 17

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 12)

🌹 अद्भुत उपलब्धियों का आधार

🔴 किसी भी कार्य में प्रेरक होने से कार्य की सफलता असफलता, अच्छाई-बुराई और उच्चता-निम्नता के हेतु भी मनुष्य के अपने विचार ही हैं। जिस प्रकार के विचार होंगे सृजन भी उसी प्रकार का होगा।

🔵 नित्य प्रति देखने में आता है कि एक ही प्रकार का काम दो आदमी करते हैं। उनमें से एक का कार्य सुन्दर सफल और सुघड़ होता है और  दूसरे का नहीं। एक से हाथ पैर, उपादान और साधनों के होते हुए भी दो मनुष्यों के एक ही कार्य में विषमता क्यों होती है। इसका एक मात्र कारण उनकी अपनी-अपनी विचार प्रेरणा है। जिसके कार्य सम्बन्धी विचार जितने सुन्दर, सुघड़ और सुलझे हुये होंगे उसका कार्य भी उसी के अनुसार उद्दात्त होगा।

🔴 जितने भी शिल्पों, शास्त्रों तथा साहित्य का सृजन हुआ है। वह सब विचारों की ही विभूति हैं। चित्रकार नित्य नये-नये चित्र बनाता है, कवि नित्य नये काव्य रचता है, शिल्पकार नित्य नये मॉडल और नमूने तैयार करता है। यह सब विचारों का ही परिणाम है। कोई भी रचनाकार जो नया निर्माण करता है, वह कहीं से उतार कर नहीं लाता और न कोई अदृश्य देव ही उसकी सहायता करता है। वह यह सब नवीन रचनायें अपने विचारों के ही बल पर करता है। विचार ही वह अद्भुत शक्ति है जो मनुष्य को नित्य नवीन प्रेरणा दिया करती है।

🔵 भूत, भविष्य और वर्तमान में जो कुछ दिखाई दिया, दिखलाई देगा और दिखलाई दे रहा है वह सब विचारों में वर्तमान रहा है, वर्तमान रहेगा और वर्तमान है। तात्पर्य यह है कि समग्र त्रयकालिक कर्तृत्व मनुष्य के विचार पटल पर अंकित रहता है। विचारों के प्रतिविम्ब को ही मनुष्य बाहर के संसार में उतारा करता है। जिसकी विचार स्फुरणा जितनी शक्तिमती होगी उसकी रचना भी उतनी ही सबल एवं सफल होगी। विचारशक्ति जितनी उज्ज्वल होगी, बाह्य प्रतिविम्ब भी उतने ही स्पष्ट और सुबोध होंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 20)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए  

🔵 हाथी पर अंकुश न लगे, तो वह खेत-खलिहानों को रौंदता, पेड़ पौधों को उखाड़ता और झोंपड़ों को धराशायी करता चला जायेगा। उसकी चपेट में जो प्राणी आ जाएँगे, उनकी भी खैर नहीं। सम्पदा भी उन्मत्त हाथी की तरह है, जिस पर उदारता का अंकुश आवश्यक है। यदि झरने पानी का सीधे रास्ते से निकलना रोक दिया गया, तो उसका परिणाम बाढ़ के रूप में भयंकरता दिखाने ही लगेगा। 

🔴 प्रस्तुत वातावरण में एक ही सबसे बड़ा अनर्थ दीख पड़ता है कि हर कोई अपने उपार्जन, वैभव को मात्र अपने लिए ही खर्च करना चाहता है। वह अपनापन भी विलासिता और अहंकारी ठाट-बाट प्रदर्शन तक ही सीमित है। यह प्रचलन इसी प्रकार बना रहा, तो इसका दुष्परिणाम अब से भी अधिक भयंकर रूप में अगले दिनों दृष्टिगोचर होगा । एक से बढ़कर एक अनर्थ सँजोए जाते रहेंगे। पेट की एक सीमा है, उसे पूर कर लेने पर भी अनावश्यक आहार खोजते चले जाने पर वह विग्रह उत्पन्न किये बिना नहीं रहेगा। उल्टी, दस्त, उदरशूल जैसी अवाञ्छनीय परिस्थितियाँ ही उत्पन्न होंगी। यह मोटी बात समझी जा सके, तो फिर एक ही नीति निर्धारण शेष बच जाता है कि नीतिपूर्वक कमाया कितना ही क्यों न जाये, पर उसका उपयोग सत्प्रवृत्ति के मार्ग में आगे बढ़ने में ही किया जाये।    

🔵 मात्र पैसा नहीं, शक्ति सूत्रों में समर्थता, योग्यता, शिक्षा, कुशलता आदि अन्य विभूतियाँ भी आती हैं। उन्हें भी अपरिग्रही नीतिवानों की तरह पतन को बँटाने और उत्कर्ष को बढ़ाने में उसी प्रकार नियोजित किया जा सकता है।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 जीवन कैसे जीयें? (भाग 4)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 मेरा आपसे अनुरोध ये है कि आप हँसती-हँसाती जिन्दगी जीयें, खिलती-खिलाती जिन्दगी जीयें, हलकी-फुलकी जिन्दगी जीयें। हलकी-फुलकी जिन्दगी जीयेंगे तो आप जीवन का सारे का सारा आनन्द पायेंगे। अगर आप घुसेंगे (सेंध मारेंगे) तो आप नुकसान पायेंगे। आप अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिये जिन्दगी को जीयें। हँसी-खुशी से जीयें। हमें माली की जिन्दगी जीनी चाहिये, मालिक की नहीं। मालिक की जिन्दगी में बहुत भारीपन है और बहुत कष्ट है। माली की जिन्दगी केवल रखवाली के तरीके से, चौकीदार के तरीके से अगर आप जीयें तो हम पायेंगे जो कुछ भी कर लिया, हमारा कर्तव्य काफी था। मालिक को चिंता रहती है। सफलता मिली, नहीं मिली। माली को इतनी चिंता रहती है कि अपने कर्तव्यों और अपने फर्ज पूरे किये कि नहीं किये?

🔵 दुनिया में रहें, काम दुनिया में करें, पर अपना मन भगवान् में रखें अर्थात् उच्च उद्देश्यों और उच्च आदर्शों के साथ जोड़कर रखें। हम दुनिया में डूबें नहीं। हम खिलाड़ी के तरीके से जीयें। हार-जीत के बारे में बहुत ज्यादा चिंता न करें। हम अभिनेता के तरीके से जीयें। हमने अपना पाठ-प्ले ठीक तरीके से किया कि नहीं किया; हमारे लिये इतना ही संतोष बहुत है। ठीक है, परिणाम नहीं मिला तो हम क्या कर सकते हैं? बहुत सी बातें परिस्थितियों पर निर्भर रहती है। परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल नहीं रहीं तो हम क्या कर सकते थे? कर्तव्य हमने हमारा पूरा किया, बहुत है, हमारे लिये बहुत है; इस दृष्टि से आप जीयेंगे तो आपकी खुशी को कोई छीन नहीं सकता और आपको इस बात की परवाह नहीं होगी कि जब कभी सफलता मिले, तब आपको प्रसन्नता हो। 24 घण्टे आप खुशी से जीवन जी सकते हैं। जीवन की सार्थकता और सफलता का यही तरीका है।

🌹 आज की बात समाप्त।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/amart_vachan_jivan_ke_sidha_sutra/jivan_kese_jiye

👉 हमारी युग निर्माण योजना (अंतिम भाग)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 युग-निर्माण योजना का उद्देश्य व्यक्ति, परिवार और समाज की ऐसी अभिनव रचना करना है जिसमें मानवीय आदर्शों का अनुसरण करते हुए सब लोग प्रगति, समृद्धि और शान्ति की ओर अग्रसर हो सकें। मानव-जीवन को वैयक्तिक एवं सामूहिक रूप में दुर्भावना एवं दुष्प्रवृत्तियों ने ही नरकमय बना रखा है। इस स्थिति को बदलना होगा और ऐसा प्रयत्न करना होगा कि इस अन्धकार के स्थान पर नया प्रकाश प्रतिष्ठित हो सके। सद्-भावनाएं और सत्प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि ही उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएं प्रशस्त कर सकती है। इसलिए हमें इन दोनों को बढ़ाने के लिए सभी सम्भव उपायों का अवलम्बन करना चाहिये। हम गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से उत्कृष्ट एवं आदर्श मानव बन सकें तो ही वे परिस्थितियां उत्पन्न होंगी जिन में अपनी और दूसरों की सुख शान्ति की सुरक्षा सम्भव हो सके।

🔵 दूसरे क्षेत्रों में आर्थिक राजनैतिक, औद्योगिक, वैज्ञानिक एवं अन्यान्य प्रगतियों के लिये विविध प्रयत्न किये जाते हैं, वे स्वागत योग्य हैं। पर व्यक्तियों के दृष्टिकोण को आदर्शवादिता की ओर उन्मुख करने के लिये नहीं के बराबर ध्यान दिया जा रहा है। जो हो रहा है उसमें दिखावा अधिक और तथ्य कम है। आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य को आदर्शवादिता को अपनाने के लिये—सदाचार, संयम, उदारता, सज्जनता जैसे सद्गुणों का विकास करने के लिये—लोक मंगल के लिए, त्याग बलिदान का आदर्श प्रस्तुत करने के लिए ऐसी प्रेरणा दी जाय जिससे उसकी वर्तमान हेय मनोदशा में आमूलचूल परिवर्तन हो सके।

इसी प्रयास का आरम्भ ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के सदस्यों ने अपने छोटे क्षेत्र से कर दिया है। बड़े लोगों की बड़ी योजनायें इस दिशा में बनें और वे व्यापक रूप से कार्यान्वित की जायें, आवश्यकता तो इसी बात की है। पर जब तक समाज के कर्णधारों एवं शक्तिशाली पुरुषों की अभिरुचि इस ओर उत्पन्न नहीं होती तब तक भावनाशील लोगों के लिए निष्क्रिय बैठे रहना उचित न होता। इससे हम लोगों ने अपने छोटे से परिवार से यह कार्यक्रम आरम्भ कर दिया है। यह पंक्तियां लिखे जाते समय इस परिवार के प्रमुख और सहायक सदस्यों को मिला कर तीन लाख के लगभग संख्या हो जाती है। इतनी जन-संख्या अपने वैयक्तिक एवं सामूहिक जीवन में नव-निर्माण की रचनात्मक योजना अपना ले तो उसका कुछ न कुछ प्रभाव शेष समाज पर भी पड़ेगा। इसी आशा से शत-सूत्री युग-निर्माण योजना प्रस्तुत की गई है। प्रसन्नता की बात है कि यह आशा-जनक गति से उत्साहवर्धक प्रगति करती चली जा रही है। मानव-समाज के पुनरुत्थान में यह छोटा-सा प्रयत्न कुछ उपयोगी सिद्ध हो सके ऐसी परमात्मा से प्रार्थना है।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 53)

🌹 भावी रूपरेखा का स्पष्टीकरण

🔴 परमब्रह्म के अंशधर देवात्मा सूक्ष्म शरीर में किस प्रकार रहते हैं। इसका प्रथम परिचय हमने अपने मार्गदर्शक के रूप में घर पर ही प्राप्त कर लिया था। उनके हाथों में विधिवत् मेरी नाव सुपुर्द हो गई थी। फिर भी बालबुद्धि अपना काम कर रही थी। हिमालय में अनेक सिद्ध पुरुषों के निवास की जो बात सुन रखी थी, उस कौतूहल को देखने का जो मन था वह ऋषियों के दर्शन एवं मार्गदर्शक की सांत्वना से पूरा हो गया था। इस लालसा को पहले अपने अंदर ही मन के किसी कोने में छिपाए फिरते थे। आज उसके पूरे होने व आगे भी दर्शन होते रहने का आश्वासन मिल गया था। संतोष तो पहले भी कम न था, पर अब वह प्रसन्नता और प्रफुल्लता के रूप में और भी अधिक बढ़ गया।

🔵 गुरुदेव ने आगे कहा-‘‘हम जब भी बुलाएँ तब समझना कि हमने 6 माह या एक वर्ष के लिए बुलाया है। तुम्हारा शरीर इस लायक बन गया है कि इधर की परिस्थितियों में निर्वाह कर सको। इस नए अभ्यास को परिपक्व करने के लिए इस निर्धारित अवधि में एक-एक करके तीन बार इधर हिमालय में ही रहना चाहिए। तुम्हारे स्थूल शरीर के लिए जिन वस्तुओं की आवश्यकता समझेंगे, हम प्रबंध कर दिया करेंगे। फिर इसकी आवश्यकता इसलिए भी है कि स्थूल से सूक्ष्म में और सूक्ष्म से कारण शरीर में प्रवेश करने के लिए जो तितीक्षा करनी पड़ती है, सो होती चलेगी। शरीर को क्षुधा, पिपासा, शीत, ग्रीष्म, निद्रा, थकान व्यथित करती हैं। इन छः को घर पर रहकर जीतना कठिन है, क्योंकि सारी सुविधाएँ वहाँ उपलब्ध रहने से यह प्रयोजन आसानी से पूरे होते हैं और तप तितीक्षाओं के लिए अवसर ही नहीं मिलता।

🔴  इसी प्रकार मन पर छाए रहने वाले छः कषाय-कल्मष भी किसी न किसी घटनाक्रम के साथ घटित होते रहते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर इन छः रिपुओं से जूझने के लिए आरण्यकों में रहकर इनसे निपटने का अभ्यास करना पड़ता है। तुम्हें घर रहकर यह अवसर भी न मिल सकेगा। इसलिए अभ्यास के लिए जन संकुल संस्थान से अलग रहने से उस आंतरिक मल्ल युद्ध में भी सरलता होती है। हिमालय में रहकर तुम शारीरिक तितीक्षा और मानसिक तपस्या करना। इस प्रकार तीन बार, तीन वर्ष यहाँ आते रहने और शेष वर्षों में जन सम्पर्क में रहने से परीक्षा भी होती चलेगी कि जो अभ्यास हिमालय में रहकर किया था, वह परिपक्व हुआ या नहीं?’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/bhavi

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 54)

🔵 नित्य की तरह आज भी तीसरे पहर उस सुरम्य वनश्री के अवलोकन के लिए निकला। भ्रमण में जहां स्वास्थ्य संतुलन की, व्यायाम की दृष्टि रहती है वहां सूनेपन के सहचर से, इस निर्जन में निवास करने वाले परिजनों से कुशल क्षेम पूछने और उनसे मिलकर आनन्द लाभ करने की भावना भी रहती है। अपने आपको मात्र मनुष्य जाति का सदस्य मानने को संकुचित दृष्टि जब विस्तीर्ण होने लगी, तो वृक्ष-वनस्पति, पशु-पक्षी, कीट-पतंगों के प्रति भी ममता और आत्मीयता उमड़ी। ये परिजन मनुष्य की बोली नहीं बोलते और न उनकी सामाजिक प्रक्रिया ही मनुष्य जैसी है, फिर भी अपनी विचित्रताओं और विशेषताओं के कारण इन मनुष्येत्तर प्राणियों की दुनिया भी अपने स्थान पर बहुत ही महत्वपूर्ण है।

🔴 जिस प्रकार धर्म, जति, रंग, प्रान्त, देश भाषा, भेष आदि के आधार पर मनुष्यों—मनुष्यों के बीच संकुचित साम्प्रदायिकता फैली हुई हैं, वैसी ही एक संकीर्णता यह भी है कि आत्मा अपने आपको केवल मनुष्य जाति का सदस्य माने। अन्य प्राणियों को अपने से भिन्न जाति का समझे या उन्हें अपने उपयोग की, शोषण को वस्तु समझे। प्रकृति के अगणित पुत्रों में से मनुष्य भी एक है। माना कि उसमें कुछ अपने ढंग से विशेषताएं हैं पर अन्य प्रकार की अगणित विशेषताएं सृष्टि के अन्य जीव-जन्तुओं में भी मौजूद हैं और वे भी इतनी बड़ी हैं कि मनुष्य उन्हें देखते हुए अपने आपको पिछड़ा हुआ ही मानेगा।

🔵 आज भ्रमण करते समय यही विचार मन में उठ रहे थे। आरम्भ में इन निर्जन के जो सदस्य जीव-जन्तु और वृक्ष-वनस्पति तुच्छ लगते थे, महत्वहीन प्रतीत होते थे, अब ध्यान पूर्वक देखने से वे भी महान् लगने लगे और ऐसा प्रतीत होने लगा कि भले ही मनुष्य को प्रकृति ने बुद्धि अधिक दे दी हो पर अन्य अनेकों उपहार उसने अपने इन निर्बुद्धि माने जाने वाले पुत्रों को भी दिये हैं। उन उपहारों को पाकर वे चाहें तो मनुष्य की अपेक्षा अपने आप पर कहीं अधिक गर्व कर सकते हैं।

🔴 इस प्रदेश में कितनी ही प्रकार की चिड़ियां हैं, जो प्रसन्नता पूर्वक दूर-दूर देशों तक उड़कर जाती हैं। पर्वतों को लांघती हैं। ऋतुओं के अनुसार अपने प्रदेश पंखों से उड़कर ही बदल लेती हैं। क्या मनुष्य को यह उड़ने की विभूति प्राप्त हो सकी है? हवाई जहाज बनाकर उसने एक भोंड़ा प्रयत्न किया तो है पर चिड़ियों के पंखों से उसकी क्या तुलना हो सकती है? अपने आपको सुन्दर बनाने के लिए सजावट की रंग−बिरंगी वस्तुएं उनसे आविष्कृत की हैं पर चित्र-विचित्र पंखों वाली , स्वर्ग की अप्सराओं जैसी चिड़ियों और तितलियों जैसी रूप सज्जा उसे कहां प्राप्त हुई है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 Feb 2017


👉 इसी बुड्ढे ने बचाई थी मेरी जान

🔴 सन् १९८८ ई. की बात है। गायत्री शक्तिपीठ, बलसाड़ की एक विशेष गोष्ठी में गायत्री महामंत्र की असीम शक्तियों पर परिचर्चा हो रही थी। धीरे- धीरे परिचर्चा का विषय इस युग के अन्यतम गायत्री साधक पं. श्रीराम शर्मा ‘आचार्य’ की अलौकिक क्षमताओं की ओर मुड़ने लगा। कई परिजनों ने सूक्ष्म रूप से पूज्य गुरुदेव द्वारा जीवन- रक्षा किए जाने के विस्मयकारी प्रसंगों की झड़ी लगा दी। इन चर्चाओं से सभी इस नतीजे पर पहुँचे कि ऐसे अद्भुत कार्यों का सम्पादन या तो ईश्वर कर सकते हैं या ईश्वर के अवतार।

🔵 इन चर्चाओं से अभिभूत होकर कई वृद्ध परिजनों ने एक स्वर में कहा- काश! हम अभागे लोग भी अवतार पुरुष के दर्शन कर पाते। वृद्ध परिजनों की मार्मिक पीड़ा देखकर कुछ युवकों ने इन्हें हरिद्वार ले जाने का बीड़ा उठाया।

🔴 अगले दिन उन युवकों ने हरिद्वार की यात्रा की योजना पर विचार- विमर्श शुरू किया। गुरु दर्शन के लिए जाने की ललक से भरे ग्रामीणों की संख्या बढ़ती ही जा रही थी। ६०० से अधिक लोगों की सूची तैयार हो चुकी थी। इतनी बड़ी संख्या को देखकर आयोजक युवकों ने एक पूरी ट्रेन बुक कराने का निर्णय लिया।
  
🔵 बलसाड़ स्टेशन से स्पेशल ट्रेन से यात्रा शुरू हुई। रेलगाड़ी के सभी डिब्बों का वातावरण गायत्रीमय हो गया था। किसी डिब्बे में गायत्री महामंत्र का सामूहिक जप, किसी में वरिष्ठ परिजनों का उद्बोधन, किसी में पूज्य गुरुदेव तथा वन्दनीया माता जी के  प्रेम- निर्झर की चर्चाएँ, तो किसी में युग संगीत का गायन- वादन। सभी हर्षोल्लास में डूबे यात्रा करते रहे।

🔴 दूसरे दिन, रात के १०:०० बजे ट्रेन दिल्ली पहुँची। आधे घंटे बाद हरिद्वार के लिए रवाना हुई। ट्रेन अभी आउटर सिग्नल को क्रास कर ही रही थी कि बीच के एक डिब्बे से अति वृद्ध महिला, जो खुले दरवाजे के पास बैठी थीं, ट्रेन के तेज झटके से संतुलन खोकर, नीचे गिर पड़ीं। महिला के नीचे गिरते ही पूरे ट्रेन में कोहराम मच गया- बाई गिर पड़ी...... बाई गिर पड़ी। शोर- शराबे और अफरा- तफरी के बीच एक युवक ने चेन पुलिंग की। ट्रेन रुक गई।

🔵 बहुत सारे परिजन टार्च लेकर उतरे और बाई क को खोजते हुए विपरीत दिशा में बढ़ने लगे। ये लोग कुछ ही दूर बढ़े थे कि दिल्ली की तरफ से दूसरी ट्रेन आती हुई दिखी। दिल्ली से तो वैसे भी बहुत सारी रेल गाड़ियाँ अलग- अलग जगहों के लिए चलती ही रहती हैं। सबको यह देखकर आश्चर्य हुआ कि ग्रीन सिग्नल होने के बावजूद ट्रेन की रफ्तार कम होती जा रही है। धीरे- धीरे वह दूसरी ट्रेन उस ट्रेन के सामने आकर रुक गई जो इन लोगों को लेकर हरिद्वार जा रही थी।

🔴 जिस डिब्बे से बूढ़ी औरत गिरी थी, ठीक उसी डिब्बे के सामने वाले डिब्बे से कुछ लोगों ने ऊँची आवाज में कहा- इस ट्रेन से अभी थोड़ी देर पहले एक बाई गिर पड़ी थी। उसे हम सुरक्षित साथ ले आये हैं। इसके साथ के लोग यदि इस डिब्बे में हों, तो आकर इसे ले जाएँ। सामने के डिब्बे से बहुत सारी औरतें नीचे उतर आईं। उधर बाई को खोजने के लिए निकल पड़े लोग भी वापस लौटकर डिब्बे के पास आ चुके थे। सभी ने जोर से कहा- हाँ..हाँ। हम लोगों ने इसी बाई की खोज करने के लिए ट्रेन रुकवाई थी और दिल्ली की ओर जाने लगे थे। बाई को दूसरी ट्रेन से नीचे उतारकर वापस आरक्षित ट्रेन में बिठाया गया। बाई एकदम ठीक- ठाक दिख रही थी। फिर भी कई लोगों ने जिज्ञासावश पूछा- क्या हुआ था, कैसे गिरी, कहीं चोट तो नहीं लगी? बाई ने कहा- मैं बिल्कुल ठीक हूँ, कुछ नहीं हुआ है, अचानक गिर पड़ी थी। एक बूढ़े ने मुझे गिरने से पहले ही अपने हाथों में उठा लिया और ले जाकर आराम से उस ट्रेन में बिठा दिया।

🔵 ट्रेन का वातावरण एक बार फिर गायत्रीमय हो चुका था। लोग पहले की तरह गायन- वादन में तल्लीन हो गए। सुबह होते- होते ट्रेन हरिद्वार पहुँची। हरिद्वार से शांतिकुंज पहुँचने पर सभी नहा- धोकर गुरुदेव के दर्शन के लिए गए। साथ में वह बूढ़ी महिला भी थी। उसकी नजर जैसे ही गुरुदेव पर पड़ी, वह जोर से चिल्ला उठी- यही है.....यही वह बुड्ढा है, जिसने मेरी जान बचायी है। जब मैं ट्रेन से नीचे गिरी थी, तो इसी ने मुझे अपने हाथों में सम्हाल कर दूसरी ट्रेन में बिठाया और फिर तुरंत गायब हो गया। पूज्य गुरुदेव के दर्शन को आये हुए सभी लोग महिला की कहानी सुनकर विस्मय- विमुग्ध हो गए। गुरुसत्ता की उस असीम अनुकम्पा से सभी की आँखें भर आईं।

🌹  ई. एम. डी. शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार (उत्तराखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 39)

🌹 साप्ताहिक और अर्द्ध वार्षिक साधनाएँ  

🔴 ब्रह्मभोज का दूसरा प्रचलित रूप वितरण भी है। यों प्रसाद में कोई मीठी वस्तुएँ थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बाँटने का भी नियम है। इसमें अधिक लोगों तक अपने अनुदान का लाभ पहुँचाना उद्देश्य है, भले ही वह थोड़ी-थोड़ी मात्रा में ही क्यों न हो! एक का पेट भर देने की अपेक्षा सौ का मुँह मीठा कर देना इसलिए अच्छा माना जाता है कि इसमें देने वाले तथा लेने वालों को उस धर्म प्रयोजन के विस्तार की महिमा समझने और व्यापक बनाने की आवश्यकता का अनुभव होता है।   

🔵 यह कार्य मिष्ठान्न वितरण की अपेक्षा सस्ता युग साहित्य वितरण करने के रूप में अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति कर सकता है। ‘‘युग निर्माण का सत्संकल्प’’ नामक अति सस्ती पुस्तिका इस प्रयोजन के लिये अधिक उपयुक्त बैठती है। ऐसी ही अन्य छोटी पुस्तिकाएँ भी युग निर्माण योजना द्वारा प्रकाशित हुई हैं जिन्हें बाँटा या लागत से कम मूल्य में बेचने का प्रयोग किया जा सकता है। नवरात्र अनुष्ठानों में यह ब्रह्मभोज की सत्साहित्य के रूप में प्रसाद वितरण की प्रक्रिया भी जुड़ी रहनी चाहिये।    
                      
🔴 स्थानीय साधक मिल-जुलकर एक स्थान पर नौ दिन की साधना करें। अन्त में सामूहिक यज्ञ करें। सहभोज का प्रबन्ध रखें, साथ ही कथा-प्रवचन कीर्तन उद्बोधन का क्रम बनाये रह सके तो उस सामूहिक आयोजन से सोने में सुगन्ध जैसा उपक्रम बन पड़ता है।     

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अपव्ययता किसी की भी न चली

🔴 हिंदी के अनन्य सेवक भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र विचारवान् थे, उसके कारण उन्हें सार्वजनिक प्रतिष्ठा और सम्मान भी मिला, धन भी बहुत कमाया, किंतु अपव्यय के एक दुर्गुण ने ही उनके जीवन को दुर्दशाग्रस्त बना दिया। घर आए धन की होली फूँकने, अंधाधुंध खर्च करने से तो महाराजे भी कंगाल हो जाते हैं। भारतेंदु बाबू उक्त कथन के प्रत्यक्ष उदाहरण है।

🔵 पैतृण संपत्ति के रूप में उन्हें धन की कमी पहले ही न थी। अपने साहित्यिक उपार्जन से भी उन्होंने अपना कोष बढा़या। वह सब धन किसी बैंक या पोस्ट आफिस में जमा कर देते तो उसके ब्याज में सारा जीवन हँसी-खुशी और मस्ती में बिता लेते, पर अपव्यय की बुरी लत ने उन्हें ऐसा पछाडा कि मरते समय उनके पास कानी कौडी़ शेष न थी।

🔴 भारतवर्ष एक निर्धन देश है यहाँ के नागरिकों को साधारण मोटा-नोटा खाना और कपडा प्रयोग करना चाहिए पर भारतेंदु बाबू बहुत कीमती कपडे पहनते, खाना इतना मसालेदार और स्वादिष्ट बनता कि कोई राजा-महाराजा भी वैसा क्या खाता होगा ? प्रतिदिन दिन में कई बार अंगराग और कीमती सुंगधित तेलो की मालिश कराते। भोजन, वस्त्र, फुलेल की इतनी मात्रा खरीदी जाती कि स्वयं के पास प्रतिदिन कई चाटुकार और झूठे प्रशंसक भी उनका उतना ही आनंद लूटते।

🔵 दीपक में फुलेल जलता, रोशनदानों के कपडे रोज बदले जाते। जूते तो धनी आदमी भी पांच-छह महीने पहन लेते है, पर भारतेंदु बाबू के लिये इतने दिनों के लिये ४-५ जोडी जूते-चप्पल भी कम रहते। आखिर धन की आय की भी मर्यादा है। उस सीमा के भीतर पांव न रखने से तो आर्थिक दुर्गति होती ही है।

🔴 जाडे की रात्रि थी। कुछ लोग बाहर से मिलने आए थे। झूठे दंभ के लिए अपने में बहुत बडा़- चडा़कर व्यक्त करने वालों के पीछे उचक्कों की कमी नहीं रहती। वे प्रायः झूंठी प्रशंसा करके अपना उल्लू सीधा करते है। वह सज्जन उसी में अपना गौरव मानते है। ऐसे समय थोडा भविष्य पर भी विचार कर लिया करें तो संभवत लोग परेशानियों से पहले ही बच लें।

🔵 भारतेंदु पढे-लिखे थे, पर दूरदर्शी नहीं। उन लोगो ने आते ही उनकी उदारता की झूठी प्रशंसा प्रारंभ कर दी। इधर हाथ सेंकने के लिये अँगीठी की आवश्यकता पडी़। अँगीठी इधर-उधर दिखाई न दी तो उसे और बढकर ढूँढना अपना अपमान जान पडा। शेखी में आकर जेब से नोट निकालकर उन्हीं में आग लगा दी और अपने हाथ सेंके। हम नही समझते दर्शकों पर इसका क्या प्रभाव पडा़ होगा ? भीतर-ही-भीतर ऐसी मूर्खता पर वे हँसे ही होंगे।

🔴 इस तरह की संगति और जीवन-क्रम के कारण उनमे चरित्र-दोष भी आ गए। हितैषियों ने समझाया-भैया हाथ रोककर खर्च किया करो, जुटाया नही जाता, न जाने आगे कैसी स्थिति आ जाए पर भारतेंदु जी की बुद्धि ने सही काम न किया।

🔵 अपव्यय के दुर्गुणों ने उन्हें शारीरिक और मानसिक दोनों दृष्टि से विक्षिप्त कर दिया। वे तीस बष की आयु में ही मर गये। जीवन के अंतिम दिनों मे उन्हें पैसे-पैसे के लिए दूसरे साथियों के आगे हाथ फैलाना पडा। ऐसे पत्र सुरक्षित हैं, जिनमे उन्होंने आर्थिक सहायता की याचना की है, पर यहाँ इस संसार में अपनी-अपनी आवश्यकताओं से ही सभी तंग है, दूसरों की कौन देखे ? कौन सहायता करे

🔴 मृत्यु के क्षणो में भारतेंदु बाबू ने कहा-'किसी के पास धन और साधन कितने ही बडे़ क्यो न हो, उनका खर्च और उपयोग बहुत हाथ साधकर सावधानी के साथ भविष्य की चिंता रखकर ही करना चाहिए।"  यह तब पहले समझ में आई होती तो यह दुर्दशा न होती।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 31, 32

👉 नर से नारायण बनने का परम पुरुषार्थ

🔵  ईश्वर प्राप्ति को जीवन का परम पुरुषार्थ कहा गया है। महान् के साथ तुच्छ की घनिष्ठता स्थापित होने पर लाभ ही लाभ है। इस प्रक्रिया के आधार पर नगण्य को भी महान् बनने का अवसर मिलता है। नाला, गंगा में मिलकर उसी का नाम धारण कर लेता है। बूँद का विसर्जन उसे विराट् सागर बना देता है। उपेक्षणीय ईंधन देखते-देखते प्रचण्ड अग्नि का रूप धारण कर लेता है। पाणिग्रहण करने के उपरान्त पत्नी तत्काल अपने पति की समस्त सम्पदा पर सहज अधिकार प्राप्त कर लेती है। वृक्ष से लिपट कर दुबली कमर वाली बेल भी उतनी ही ऊँची उठ जाती है। वादक होठों से सटने पर पोले बाँस की नली को मनमोहक वंशी के रूप में श्रेय सम्मान मिलता है। कठपुतली का नाच वस्तुतः उन लकड़ी के टुकड़ों का कलाकार की अँगुलियों के साथ समर्पित भाव से बँध जाने के अतिरिक्त और कुछ है नहीं।

🔴  ऊँचे तालाब और नीचे तालाब के बीच एक सम्बन्ध स्थापित करने वाली नाली बना दी जाय, तो दोनों की सतह एक होने तक ऊँचे का प्रवाह नीचे की ओर बहता रहेगा। जेनरेटर के साथ सम्बन्ध सूत्र स्थापित होते ही बल्ब, पंखे आदि उपकरण तत्काल गतिशील होते हैं। ये उदाहरण बताते हैं कि परमात्मसत्ता के साथ घनिष्टता स्थापित करने वाले भगवद् भक्त क्यों कर देवात्मा माने गये? किस कारण अपना और समस्त संसार का कल्याण कर सकने में समर्थ हुए? प्रगति का उच्चतम सोपान यही है कि आत्मा-परमात्मा के स्तर तक जा पहुँचे और सर्वोत्कृष्ट शिखर पर अवस्थित होकर दूसरों के व अपने बीच का आकाश-पाताल जैसा अन्तर देखे।

🔵  प्रगति यदि किसी को सचमुच ही अभीष्ट है तो उसे बहिरंग के वैभव में नहीं, अन्तरंग के वर्चस् में तलाशा जाना चाहिए। एक ही उपाय का अवलम्बन लिया जाना चाहिए-महानता के साथ अपनी क्षुद्रता को जोड़ देना। कामना का भावना में, संकीर्णता का व्यापकता में, नर का नारायण में विलय-विसर्जन उसी परम पुरुषार्थ का सुनिश्चित स्वरूप है, जिसे ईश्वर प्राप्ति कहते हैं जिसे पा लेने के बाद फिर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 16

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 11)

🌹 विकास और शोध का श्रेय विचार को

🔴 पिछले दिनों में अपनी आकांक्षा को सुव्यवस्थित रूप में केन्द्रीभूत करके रूस और अमेरिका बहुत कुछ कर चुके हैं। हमारी आकांक्षा एवं विचार-धारा अपने लक्ष्य पर जहां भी तन्मयता से संलग्न रहेंगी, वहां सफलता की उपलब्धि असंदिग्ध है। विचार शक्ति को एक जीवित जादू कहा जा सकता है। उसके स्पष्ट होने से निर्जीव मिट्टी, नयनाभिराम खिलौने के रूप में और प्राणघातक विष जीवनदायी रसायन के रूप में बदल जाता है।

🔵 हम दिन भर सोचते हैं नाना प्रकार की समस्याओं को समझने और हल करने में अपनी विचार शक्ति को लगाते हैं। ईश्वर ने मस्तिष्क रूपी ऐसा देवता इस शरीर में टिका दिया है जो हमारी आकांक्षा की पूर्ति में निरन्तर सहायता करता रहता है। इस देवता से जो हम मांगते हैं वह उसे करने की व्यवस्था कर देता है। विचार शक्ति इस जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है। इसे कामधेनु और कल्पवता कह सकते हैं। प्रगति के पथ पर हम महान सम्बल के आधार पर ही मनुष्य आगे बढ़ सकता है। यह शक्ति यदि जीवन में उपस्थित उलझनों का स्वरूप समझने और उनका निराकरण करने में लगे तो निःसन्देह उसका भी हल निकल सकता है। विक्षोभ की परिस्थिति को बदलने का मार्ग रचनात्मक विचारों से ही मिलता है।

🔴 विचारों की रचना प्रचण्ड शक्ति है। जो कुछ मन सोचता है, बुद्धि उसे प्राप्त करने में, उसके साधन जुटाने में लग जाती है। धीरे-धीरे वैसी ही परिस्थिति सामने आने लगती है, दूसरे लोगों का वैसा ही सहयोग भी मिलने लगता है और धीरे-धीरे वैसा ही वातावरण बन जाता है, जैसा कि मन में विचार प्रवाह उठा करता है। भय, चिन्ता, और निराशा में डूबे रहने वाले मनुष्य के सामने ठीक वैसी ही परिस्थितियां आ जाती हैं जैसी कि वे सोचते रहते हैं। चिन्ता एक प्रकार का मानसिक रोग है जिससे लाभ कुछ नहीं, हानि की सम्भावना रहती है।

🔵 चिन्तित और विक्षुब्ध मनुष्य अपनी मानसिक क्षमता खो बैठता है। जो वह सोचता है, जो करना चाहता है, वह प्रयत्न गलत हो जाता है। उसके निर्णय अदूरदर्शिता पूर्ण और अव्यवहारिक सिद्ध होते हैं। उलझनों को सुलझाने के लिए सही मार्ग तभी निकलता है जबकि सोचने वाले का मानसिक स्तर सही और शान्त हो। उत्तेजना अथवा शिथिल मस्तिष्क तो ऐसे ही उपाय सोच सकता है जो उल्टे मुसीबत बढ़ाने वाले परिणाम उत्पन्न करें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 19)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए  
🔵 शरीर कितना ही सुन्दर-सुसज्जित क्यों न हो, उसकी प्रतिष्ठा-उपयोगिता तभी है, जब उसमें जीवन चेतना विद्यमान हो। निष्प्राण हो जाने की स्थिति में तो, तथाकथित प्रेम प्रकट करने वाले भी उसे हटा देने का जुगाड़ बनाने में लग जाते हैं। सज्जनता की शोभा, उपयोगिता, आवश्यकता कितनी ही क्यों न हो, पर वह श्रेष्ठ स्तर की तभी मानी जायेगी, जब उसके साथ शालीनता की प्राणचेतना का सुनिश्चित समावेश हो।

🔴 सम्पत्ति से सुविधा साधन भर बढ़ या मिल सकते हैं किन्तु यदि उनका सदुपयोग न बन पड़े, तो वह दुधारी तलवार बन जाती है। वह रक्षा भी कर सकती है और अपनी तथा दूसरों की हत्या करने के काम भी आ सकती है। पिछले दिनों भूल यही होती रही है कि एक मात्र सम्पत्ति के ही गुण गाए जाते रहे। यहाँ तक समझा जाता रहा है कि उसके सहारे व्यक्ति की प्रतिभा-प्रतिष्ठा भी बढ़ सकती है। यह मान्यता ही आदि से अन्त तक भ्रान्तियों से भरी हुई है। यदि ऐसा ही रहा होता, तो धन सम्पन्नों के द्वारा लोकमंगल के श्रेष्ठ प्रयास बन पड़े होते और पिछड़ेपन का नाम निशान भी शेष कहीं न रहा होता। यदि सर्वसाधारण को पिछड़ेपन से अभावग्रस्तता से उबारने में सञ्चित सम्पदाओं को खर्च किया जा सका होता, तो संसार का नक्शा ही बदल गया होता।   

🔵 संसार में इतनी धन सम्पदा है कि उसे मिल-बाँटकर खाने पर सभी लोग सुख शान्ति से रह सकें और सन्तोषपूर्वक सर्वतोमुखी प्रगति का पथ प्रशस्त करते रहें। विलास, सञ्चय और अहंकार के प्रदर्शन में उसका उपयोग होने लगे, तो समझना चाहिए कि वह निरर्थक ही नहीं गई, वरन् उसने अनर्थ विनिर्मित करने के लिए अवाञ्छनीय वातावरण भी बनाकर रख दिया। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 जीवन कैसे जीयें? (भाग 3)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 हम हिमालय के साथ जुड़ें, हम भगवान् के साथ जुड़ें तो हमारा भी सूखने का कभी मौका न आयेगा। फिर हम इतनी हिम्मत कर पायें तब। आप-हम भगवान् को समर्पित कर सकें अपने आपको तो भगवान् को हम पायें। हम भगवान् की कला का सारा लाभ उठा सकते हैं। शर्त ये है कि हम अपने आपको, अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को, अपनी कामनाओं को और अपनी विष-वृत्तियों को भगवान् के सुपुर्द कर दें। हम भगवान् के साथ में अपने आपको उसी तरीके से जोड़ें जैसे कठपुतली, जैसे पतंग और जैसे बाँसुरी। न कि हम इस तरीके से करें कि पग-पग पर हुकूमत चलायें। भगवान् के पास हम अपनी मनोकामना पेश करें। ये भक्ति की निशानी नहीं है।

🔵 भगवान् की आज्ञा पर चलना हमारा काम है। भगवान् पर हुकूमत करना और भगवान् के सामने तरह-तरह के फरमाइश पेश करना, ये सब वेश्यावृत्ति का काम है। हम में से किसी की उपासना लौकिक कामनाओं के लिये नहीं; बल्कि भगवान् की साझेदारी के लिये, भगवान् को स्मरण रखने के लिये, भगवान् का आज्ञानुवर्ती होने के लिये और भगवान् को अपना समर्पण करने के उद्देश्य से उपासना होनी चाहिए।

🔴 अगर आप ऐसी उपासना करेंगे तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि उपासना सफल होगी। आपको आंतरिक संतोष मिलेगा। न केवल आंतरिक संतोष मिलेगा;  पर आपके व्यक्तित्व का विकास होगा और व्यक्तित्व के विकास करने का निश्चित परिणाम ये है कि आदमी भौतिक और आत्मिक, दोनों तरीके की सफलताएँ भरपूर मात्रा में प्राप्त करता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/amart_vachan_jivan_ke_sidha_sutra/jivan_kese_jiye

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 105)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 11. वार्षिकोत्सव:--
संगठनों में चेतना और सक्रियता बने रहने के लिये यह आवश्यक है कि उस तरह के विचारों के लोगों का परस्पर सम्मिलन होता रहे। उत्सवों के द्वारा प्रत्येक चेतना को नवजीवन तथा प्रोत्साहन प्राप्त होता है। बड़े उत्सव खर्चीले होते हैं, किन्तु छोटे-छोटे आयोजन तो आसानी से हो सकते हैं। जातीय संगठनों के मेले आयोजित करने की बात बहुत ही महत्वपूर्ण है। आदर्श विवाहों की पृष्ठभूमि रूपी उन सम्मेलनों में सामूहिक विवाह होने की प्रथा चल पड़े तो और भी उत्तम रहे।

🔵 इन उत्सवों को गायत्री यज्ञ का रूप दिया जाना चाहिये। यज्ञ से उत्सव की शोभा सज्जा ही नहीं, भावनात्मक, धार्मिक वातावरण भी बनता है और शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक कई प्रकार के लाभ भी होते हैं। सामूहिक यज्ञोपवीत संस्कार, मुण्डन आदि भी उस अवसर पर हो सकते हैं। प्रचार के लिए तो यह एक प्रभावशाली माध्यम है ही। इन यज्ञो में कुछ लोग विधिवत् वानप्रस्थ लेकर समाज-सेवा के लिये अपना जीवन उत्सर्ग किया करें, ऐसी चेष्टा भी करते रहना चाहिये।

जिस जाति का सम्मेलन हो उसके लोगों को तो आना ही चाहिए, पर साथ ही अन्य जातियों के लोगों को भी बुलाया जाना आवश्यक है, ताकि वे भी उसके अनुकरण की प्रेरणा ले सकें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 52)

🌹 भावी रूपरेखा का स्पष्टीकरण

🔴 इस बार की हमारी हिमालय यात्रा में वह असमंजस बना हुआ था कि हिमालय की गुफाओं में सिद्ध पुरुष रहने और उनके दर्शन मात्र से विभूतियाँ मिलने की जनश्रुतियाँ प्रचलित हैं। हमें इनका कोई आधार नहीं मिला। वह बात ऐसे ही किंवदंती मालूम पड़ती है। था तो मन का भीतरी असमंजस, पर गुरुदेव ने उसे बिना कहे ही समझ लिया और कंधे पर हाथ रखकर पूछा-‘‘तुझे क्या जरूरत पड़ गई सिद्ध पुरुषों की? ऋषियों के सूक्ष्म शरीरों के दर्शन एवं हमसे मन नहीं भरा?’’

🔵 अपने मन में अविश्वास जैसी बात, कोई दूसरा खोजने जैसी बात स्वप्न में भी नहीं उठी थी। मात्र बाल कौतूहल मन में था। गुरुदेव ने इसे अविश्वास मान लिया होगा तो श्रद्धा क्षेत्र में हमारी कुपात्रता मानेंगे। यह विचार मन में आते ही स्तब्ध रह गया।

🔴 मन को पढ़ लेने वाले देवात्मा ने हँसते हुए कहा। वे हैं तो सही, पर दो बातें नई हो गई हैं। एक तो सड़कों की, वाहनों की सुविधा होने से यात्री अधिक आने लगे हैं। इससे उनकी साधना में विघ्न पड़ता है। दूसरे यह कि अन्यत्र जाने पर शरीर निर्वाह में असुविधा होती है। इसलिए उन्होंने स्थूल शरीरों का परित्याग कर दिया है और सूक्ष्म शरीर धारण करके रहते हैं। जो किसी को दृष्टिगोचर भी न हो और उनके लिए निर्वाह साधनों की आवश्यकता भी न पड़े।

🔵 इस कारण उन सभी ने शरीर ही नहीं स्थान भी बदल लिए हैं। स्थान ही नहीं साधना के साथ जुड़े कार्यक्रम भी बदल लिए हैं। जब सब कुछ परिवर्तन हो गया तो दृष्टिगोचर कैसे हो? फिर सत्पात्र साधकों का अभाव हो जाने के कारण वे कुपात्रों को दर्शन देने या उन पर की हुई अनुकम्पा में अपनी शक्ति गँवाना भी नहीं चाहते, ऐसी दशा में अन्य लोग जो तलाश करते हैं, वह मिलना सम्भव नहीं। किसी के लिए भी सम्भव नहीं। तुम्हें अगली बार पुनः हिमालय के सिद्ध पुरुषों की दर्शन झाँकी करा देंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 53)

🔵 जिसके पास मैं बैठा था वह बड़े से पीले फूल वाला पौधा बड़ा हंसोड़ तथा वाचाल था। अपनी भाषा में उसने कहा—दोस्त, तुम मनुष्यों में व्यर्थ जा जन्मे। उनकी भी कोई जिन्दगी है, हर समय चिन्ता, हर समय उधेड़बुन, हर समय तनाव, हर समय कुढ़न। अब की बार तुम पौधे बनना, हमारे साथ रहना। देखते नहीं हम सब कितने प्रसन्न हैं, कितने खिलते हैं, जीवन को खेल मान कर जीने में कितनी शान्ति है, यह हम लोग जानते हैं। देखते नहीं हमारे भीतर आन्तरिक उल्लास सुगन्ध के रूप में बाहर निकल रहा है। हमारी हंसी फूलों के रूप में बिखरी पड़ रही है। सभी हमें प्यार करते हैं, सभी को हम प्रसन्नता प्रदान करते हैं। आनन्द से जीते हैं और जो पास आता है उसी को आनन्दित कर देते हैं। जीवन जीने की यही कला है। मनुष्य बुद्धिमानी का गर्व करता है पर किस काम की वह बुद्धिमानी जिससे जीवन की साधारण कला, हंस खेल कर जीने की प्रक्रिया भी हाथ आये।’’

🔴 फूल ने कहा—‘‘मित्र, तुम्हें ताना मारने के लिए नहीं, अपनी बड़ाई करने के लिए भी नहीं, यह मैंने एक तथ्य ही कहा है? अच्छा बताओ जब हम धनी, विद्वान्, गुणी, सम्पन्न, वीर और बलवान न होते हुए भी अपने जीवन को हंसते हुए तथा सुगन्ध फैलाते हुए जी सकते हैं तो मनुष्य वैसा क्यों नहीं कर सकता? हमारी अपेक्षा असंख्य गुने साधन उपलब्ध होने पर भी यदि वह चिन्तित और असंतुष्ट रहता है तो क्या इसका कारण उसकी बुद्धिहीनता मानी जायगी?

🔵 ‘‘प्रिय, तुम बुद्धिमान हो जो उस बुद्धिहीनों को छोड़कर कुछ समय हमारे साथ हंसने खेलने चले आये। चाहो तो हम अकिंचनों से भी जीवन विद्या का एक महत्वपूर्ण तथ्य सीख सकते हो।’’

🔴 मेरा मस्तक श्रद्धा से नत हो गया—‘‘पुष्प मित्र, तुम धन्य हो। स्वल्प साधन होते हुए भी तुमको जीवन कैसे जीना चाहिये यह जानते हो। एक हम हैं—जो उपलब्ध सौभाग्य को कुढ़न में ही व्यतीत करते रहते हैं। मित्र, सच्चे उपदेशक हो, वाणी से नहीं जीवन से सिखाते हो, बाल सहचर, यहां सीखने आया हूं तो तुमसे बहुत सीख सकूंगा। सच्चे साथी की तरह सिखाने में संकोच न करना।’’

🔵 हंसोड़ पीला पौधा खिलखिला कर हंस पड़ा। सिर हिला-हिलाकर वह स्वीकृति दे रहा था। और कहने लगे—सीखने की इच्छा रखने वाले के लिए पग-पग पर शिक्षक मौजूद हैं। पर आज सीखना कौन चाहता है। सभी तो अपनी अपूर्णता के अहंकार के मद में ऐंठे-ऐंठे से फिरते हैं। सीखने के लिए हृदय का द्वार खोल दिया जाय तो बहती हुई वायु की तरह शिक्षा, सच्ची शिक्षा स्वयमेव हमारे हृदय में प्रवेश करने लगे।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 दुनिया में बने नंबर वन, इसरो ने सफलतापूर्वक लॉन्च किए रेकॉर्ड 104 सैटलाइट्स

🔵 104 सैटलाइट्स को एकसाथ छोड़कर इसरो ने बुधवार एक और रेकॉर्ड बनाते हुए इतिहास रच दिया। आंध्र प्रदेश स्थित श्रीहरिकोटा स्पेस सेंटर से एक ही रॉकेट से अंतरिक्ष में 104 सैटलाइट्स और एक रॉकेट छोड़कर इसरो ने रूस को पछाड़ दिया। अभी तक एक साथ सबसे ज्यादा(37) सैटलाइट्स छोड़ने का रेकॉर्ड रूस के नाम था। अमेरिका एक साथ 29 सैटलाइट्स लॉन्च कर चुका है।

🔴 पीएसएलवी-सी37 कार्टोसैट-2 सीरीज सैटलाइट मिशन को श्रीहरिकोटा से भारतीय समयानुसार सुबह 9:28 बजे प्रक्षेपित किया गया। ये सैटलाइट्स 28 मिनट बाद 9:56 पर ऑर्बिट में सफलतापूर्वक प्रक्षेपित हो गए। इन सभी सैटलाइट्स को पीएसएलवी-सी37 की मदद से छोड़ा गया, यह इस रॉकेट का 39वां मिशन रहा। इस मिशन के तहत जिस प्रमुख भारतीय सैटलाइट्स को लॉन्च किया गया, वह कॉर्टोसैट-2 सीरीज का है।

🔵 मंगलयान की कामयाबी के बाद इसरो की कमर्शल इकाई 'अंतरिक्ष' को लगातार विदेशी सैटलाइट्स लॉन्च करने के ऑर्डर मिल रहे हैं। इसरो पिछले साल जून में एक साथ 20 सैटलाइट्स लॉन्च कर चुका है। इससे पहले तक इसरो 50 विदेशी सैटलाइट्स लॉन्च कर चुका था। पीएसएलवी-सी37 से पहले 714 किलोग्राम वजन के कॉर्टोसैट-2 सीरीज के सैटलाइट को पृथ्वी पर निगरानी के लिए प्रक्षेपित किया गया। इसके बाद बाकी 103 सैटलाइट्स को पृथ्वी से करीब 520 किलोमीटर दूर पोलर सन सिंक्रोनस ऑर्बिट में एक-एक कर प्रविष्ट कराया गया।

🌹 एेसा हुआ प्रक्षेपण:
🔴 सबसे पहले पीएसएलवी-सी37 रॉकेट ने भारत के कार्टोसेट-2 सीरीज के सैटलाइट को अंतरिक्ष में स्थापित किया, जिससे भारतीय भूभाग की हाई रेजोल्यूशन इमेज हासिल करने में मदद मिलेगी। इसके बाद 103 सहयोगी उपग्रहों को पृथ्वी से करीब 520 किलोमीटर दूर ध्रुवीय सन सिंक्रोनस ऑर्बिट में प्रविष्ट कराया गया, जिनका अंतरिक्ष में कुल वजन 664 किलोग्राम है। हालांकि इतने वजनी हालात में इतनी सटीकता से लॉन्च आसान नहीं था, लेकिन सैटेलाइट एक दूसरे से टकराए नहीं, इसकी महारथ इसरो अपने पिछले प्रक्षेपणों के दौरान हासिल कर चुका है। 27 हजार किमी प्रति घंटे की रफ्तार महज 600 सेकंड के भीतर सभी 101 सैटेलाइट लॉन्च किए गए।
रॉकेट की खासियत: पीएसएलवी रॉकेट की यह 39वीं उड़ान है। इसका वजन 320 टन और ऊंचाई 44.2 मीटर है। इसमें इसरो के 2 नैनो सैटलाइट भी भेजे गए। यह रॉकेट 15 मंजिल इमारत जितना ऊंचा है। प्रक्षेपित किए जाने वाले सभी उपग्रहों का कुल वजन करीब 1378 किलोग्राम है।

🔵 इन देशों के रॉकेट जाएंगे स्पेस में : अमेरिका के 96 सैटलाइट्स, जिसमें सैन फ्रांसिस्को की एक कंपनी प्लेनेट के 88 छोटे सैटलाइट्स हैं। इसके अलावा इस्राइल, कजाकिस्तान, नीदरलैंड्स, स्विट्जरलैंड और यूएई के छोटे सैटलाइट्स स्पेस में भेजे गए।

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 Feb 2017


👉 माँ के लहूलुहान हाथ

🔴 मेरी धर्मपत्नी ने गुरुदेव के पास रहकर देव कन्याओं का शिविर किया था। विवाह के बाद उनके माध्यम से मैं भी गुरुदेव से जुड़ गया। पत्नी की पहली डिलीवरी के समय हम बहुत परेशान थे, वहाँ हमारे गाँव में न कोई साधन, न सहयोगी थे। उस परिस्थिति में हमारे पास प्रार्थना के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था। डिलीवरी के दिन पत्नी बहुत तकलीफ में थीं। उनकी हालत देख मैं गुरु देव से प्रार्थना करने लगा। संयोग से समय पर एक नर्स मिल गई। उन्होंने बड़ी सहजता के साथ डिलीवरी करा दी। तब से गुरु देव के प्रति श्रद्धान्वित मैं कोई काम शुरू करने से पहले उनसे अवश्य पूछता हूँ।

🔵 सन् १९९१ में मैं राइस मिल चलाने जा रहा था। माताजी से आशीर्वाद लेने गया। राइस मिल की बात सुनकर माताजी गम्भीर हो गईं। बोलीं- दुकान पर तो बैठ रहा है, क्या दिक्कत है? मैंने कहा- भाई लोगों के पास काम नहीं है इसलिए मिल लगाना चाहता हूँ। माताजी ने अनुमति देते हुए कहा- ठीक है, जा मशीन लगा। मैंने राइस मिल ले ली। ठेका में काम शुरू किया। लेकिन साल भर में लगभग छः महीने मिल बंद रही। उसके बाद बहुत काम भी नहीं हुआ। फिर भी उस साल नुकसान नहीं हुआ।

🔴 दूसरे साल अच्छी तरह मिल चला सकें इसके लिए फिर आशीर्वाद लेने गया तो माताजी ने कहा इस साल चला ले, लेकिन अगले साल मिल मत चलाना। इस साल भी ज्यादा काम तो नहीं हुआ, लेकिन नुकसान भी नहीं हुआ। तीसरे साल यानि १९९३ में मैंने खुद अपने दम पर मिल चलाया। इस बार चार- पाँच गुना अधिक काम होने के बावजूद मेरा बहुत नुकसान हुआ। करीब बीस लाख रुपये का नुकसान हो गया। इसी साल मिल में एक दुर्घटना हुई। राइस मिल बॉयलर फट गया। लगभग २०- २५ मजदूर काम कर रहे थे किसी को कुछ नहीं हुआ। बॉयलर के टुकड़े बिखर कर आस- पास के घरों के ऊपर गिरे; रोड पर गिरे। किन्तु आश्चर्य की बात कि किसी को चोट नहीं आई।
  
🔵 उसी रात माताजी सपने में दिखाई दीं। उन्होंने कहा- मानता नहीं, देख मेरे हाथ लहूलुहान हो गए हैं। मैं देखकर सन्न रह गया। उनकी दोनों हथेलियाँ खून से लथपथ थीं। अब समझ में आया कि इतनी बड़ी दुर्घटना में किसी के हताहत न होने के पीछे माताजी का सक्रिय प्रयास था। मुझे अपनी मनमानी पर अफसोस होने लगा। माताजी ने पहले ही मना किया था। माँ के उस वत्सल रूप को देख मेरा हृदय गदगद हो गया। आज भी उस क्षण को याद करता हूँ तो आँखों में आँसू भर आते हैं।

🌹  पुरुषोत्तम सुल्तानिया  जानकी ज्यापा (छत्तीसगढ़)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से

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👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 38)

🌹 साप्ताहिक और अर्द्ध वार्षिक साधनाएँ    

🔴 अर्द्ध वार्षिक साधनायें आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में नौ-नौ दिन के लिये की जाती हैं। इन दिनों गायत्री मंत्र के २४ हजार जप की परम्परा पुरातन काल से चली आती है। उसका निर्वाह सभी आस्थावान साधकों को करना चाहिये। बिना जाति या लिंगभेद के इसे कोई भी अध्यात्म प्रेमी नि:संकोच कर सकता है। कुछ कमी रह जाने पर भी इस सात्विक साधना में किसी प्रकार के अनिष्ट की आशंका नहीं करना चाहिए। नौ दिनों में प्रतिदिन २७ माला गायत्री मंत्र के जप कर लेने से २४ हजार निर्धारित जप संख्या पूरी हो जाती है। अंतिम दिन कम से कम २४ आहुतियों का अग्निहोत्र करना चाहिए। अंतिम दिन अवकाश न हो तो हवन किसी अगले दिन किया जा सकता है।     

🔵 अनुष्ठानों में कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है- (१) उपवास अधिक न बन पड़े तो एक समय का भोजन या अस्वाद व्रत का निर्वाह तो करना ही चाहिए। (२) ब्रह्मचर्य पालन - यौनाचार एवं अश्लील चिंतन का नियमन। (३) अपनी शारीरिक सेवाएँ यथासंभव स्वयं ही करना। (४) हिंसायुक्त चमड़े के उपकरणों का प्रयोग न करना। पलंग की अपेक्षा तखत या जमीन पर सोना। इन सब नियमों का उद्देश्य यह है कि नौ दिन तक विलासी या अस्त-व्यस्त निरंकुश जीवन न जिया जाए। उसमें तप संयम की विधि व्यवस्था का अधिकाधिक समावेश किया जाए। नौ दिन का अभ्यास अगले छह महीने तक अपने आप पर छाया रहे और यह ध्यान बने रहे कि संयमशील जीवन ही आत्मकल्याण तथा लोकमंगल की दुहरी भूमिका संपन्न करता है। इसलिए जीवनचर्या को इसी दिशाधारा के साथ जोड़ना चाहिए।     
                        
🔴 अनुष्ठान के अंत में पूर्णाहुति के रूप में प्राचीन परंपरा ब्रह्मभोज की है। उपयुक्त ब्राह्मण न मिल सकने के कारण इन दिनों वह कृत्य नौ कन्याओं को भोजन करा देने के रूप में भी पूरा किया जाता है। कन्यायें किसी भी वर्ण की हो सकती हैं। इस प्रावधान में नारी को देवी स्वरूप में मान्यता देने की भावना सन्निहित है। कन्यायें तो ब्रह्मचारिणी होने के कारण और भी अधिक पवित्र मानी जाती हैं।       

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 परमार्थ की प्राथमिकता

🔴 जुटफेन का युद्ध-स्थल। सनसनाती हुई गोलियों की आवाज। सेना के प्रधान अधिकारी सर फिलिप सिडनी बडी़ बहादुरी से युद्धरत थे। अनेक सैनिकों को युद्ध-स्थल में उनके द्वारा मार्गदर्शन मिल रहा था। शत्रु की ओर से आई हुई एक गोली उनकी जाँघ में लगी और हड्डी के दो टुकडे़ करके पार निकल गई।

🔵 रक्त की धार फूट पडी, युद्ध करने का उनमें साहस न रहा, बचने की भी कोई आशा न रही। युद्ध में गिरकर प्राण देने की अपेक्षा उन्होंने कैंप में लौटना ज्यादा अच्छा समझा। उनका समझदार घोड़ा उन्हें लेकर पीछे लौट पडा। वह शिविर तक अभी न आ पाए थे कि वह बेहोश होकर जमीन पर गिर पडे जब मूर्छा टूटी तो उन्होंने संकेत से पानी पीने की इच्छा व्यक्त की। दौडा दौडा़ एक सैनिक गया और कहीं दूर की जलाशय से पानी लाया पानी का पात्र होठों से लगाया ही था, तब तक उनके कानों में पास पडे़ दूसरे सैनिक की आवाज आई जो 'पानी पानी' चिल्ला रहा था पर घायल होने के कारण उठकर पानी पीने की स्थिति में न था।

🔴 सिडनी ने सोचा मेरा तो जीवन वैसे ही समाप्त हो रहा है। शरीर से सारा रक्त निकल चुका है यह पानी मुझमें पुन जीवन न डाल सकेगा, मरते दम तक मेरी प्यास भले ही बुझा दे, मगर यह पानी पास का घायल सैनिक पी लेगा तो शायद उसका जीवन बच सके और मातृभूमि की रक्षा में पुनः योगदान दे सके। सिडनी ने पानी का गिलास अपने होठ से हटा दिया और धीरे से कहा-' यह पानी उस सिपाही को पिला दो।' अनेक सैनिकों ने इस बात का आग्रह किया कि आपका महत्त्व एक साधारण सैनिक से कहीं अधिक है आप पहले पानी पी लीजिये उस सैनिक के लिये भी पानी की व्यवस्था की जायेगी।

🔵 सिडनी ने कहा- आप मुझे इसीलिये तो अधिक महत्त्व देते हैं कि मै आप सबकी तकलीफों को अपनी तकलीफ समझता हूँ, और सबको सच्चे हृदय से प्यार करता हूँ। यदि ऐसा कोई गुण आप मुझ में न देखें तो भला मुझे कौन बडा मानेगा और मेरा क्या मूल्य रहेगा, यदि आप सब एक सैनिक से बडा़ मानते हैं तो मेरा बडप्पन भी इसी में है कि यह पानी उस सैनिक को पीने दूँ।

🔴 सिडनी की आज्ञा से यह पानी उस प्यासे सैनिक को पिला दिया गया और दूसरी बार एक अन्य सैनिक उसी जलाशय से पानी लेकर लौटा तब तक सिडनी अपने प्राण त्याग चुके थे। सिडनी इस ससार में आज भले ही न हों पर अपने अधीनस्थ सैनिकों के प्रति उदार व्यवहार के कारण वे आज भी स्मरण किए जाते हैं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 29, 30

👉 जीवन में त्याग की प्रतिष्ठा ही ‘मोक्ष’



🔵 मोक्ष क्या है? मुक्ति क्या है? यह प्रश्न हर भारतीय संस्कृति के पक्षधर मानव के मन में सहज ही उठता रहा है, सदा से ही, उसके पृथ्वी आविर्भाव के काल से। कई व्यक्ति यह समझते हैं मोक्ष मरने के बाद, शरीर रूपी बंधन के छूटने के बाद ही मिलता है। इसके लिए वे दान-पुण्य आदि अनेकानेक कृत्य करते भी देखे जाते हैं। किन्तु क्या वास्तविक मोक्ष इससे मिल जाता है? ऋषियों की दृष्टि से देखें तो यह एक ऐसी विधा है जिसका अन्तर्चक्षुओं से साक्षात्कार कर समझना होगा।

🔴 ऋषि- मनीषा कहती है कि जो मोह का क्षय करे, वही मोक्ष है। यह सदेह जीवन मुक्त स्थिति किसी को भी प्रयास करने पर मिल सकता है। मोक्ष वस्तुतः जीवन में त्याग की प्रतिष्ठा का नाम है। वासना-तृष्णा-अहंता रूपी त्रिविध बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर आत्मतत्त्व की ओर उन्मुख होने का पुरुषार्थ ही मोक्ष है। इस मोक्ष देने वाले ज्ञान का स्वरूप भारतीय दर्शन की विभिन्न विचार धाराओं के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकता है, किन्तु लक्ष्य सभी का एक है-जीव को बंधनों से मुक्त करना। वस्तुतः मानव जीवन मिला ही इसलिए है कि हर व्यक्ति इस परम पुरुषार्थ, जिसे निर्वाण मुक्ति या अपवर्ग कुछ भी नाम दे दें, के लिए कर्म कर व परमतत्त्व की प्राप्ति हेतु इस प्रयोग को सार्थक बनाए। मोक्ष प्राप्ति हेतु किये जाने वाले इस कर्म को यदि जीवन जीने की कला कहा जाय तो अत्युक्ति नहीं होगी।

🔵 गीता में योगेश्वर कृष्ण, इस कला का जिसमें बंधनमुक्ति या मोक्ष प्राप्ति का सन्देश दिया गया है, बड़ा ही सुन्दर शिक्षण धनञ्जय को देते हैं। मोक्ष को गीताकार जीवन के एक सकारात्मक पक्ष के रूप में लेता है। कर्म करते हुए व उन कर्मों को मन से परम सत्ता को अर्पण करते हुए यदि कोई पुरुषार्थ करता है (मयि सन्यस्य मत्परः) तो वह मोक्ष इस जीवन में ही पा लेता है। कर्म करते हुए व्यक्ति को अनेकानेक बन्धनों को काटना पड़ता है, जिनमें लोभ प्रधान, मोह प्रधान व अहं प्रधान ये तीन प्रमुख है। बन्धन सदा दुष्प्रवृत्तियों के ही होते हैं। इनसे छुटकारा पा लेना, ज्ञान द्वारा भवबन्धनों से मुक्ति पा लेना ही मोक्ष है। यदि यह दूरदर्शिता हमारे अन्दर आ जाए तो मोक्ष का तत्त्वज्ञान समझते हुए हम जीवन को सफलता की चरमसीमा तक पहुँचा सकते हैं। यह मार्ग ऋतम्भरा प्रज्ञा के आश्रय के रूप में प्रत्येक के लिए खुला है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 15

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 10)

🌹 विकास और शोध का श्रेय विचार को

🔴 मनुष्य विचार शक्ति को जिस दिशा में प्रयुक्त करता है उधर ही आशाजनक सफलता उपलब्ध होने लगती। चिन्तन की शोध द्वारा अनेकों प्रकार की रहस्यमय प्राकृतिक शक्तियों को जानने और उनको यशवर्ती बनाने में सफलता प्राप्त की गई है, इस शोध-कार्य में सारा श्रेय मानव विचार शक्ति का ही है। ये प्राकृतिक शक्तियां तो अनादि काल से इस सृष्टि में मौजूद थीं पर उनको उपलब्ध कर सकना तभी सम्भव हुआ जब विचार-शक्ति की दौड़ उनके शोध तक पहुंची।

🔵 विचार-शक्ति के विशाल क्षेत्र के द्वारा ही वाणी, भाषा, लिपि, संगीत, अग्नि का उपयोग, कृषि, पशुपालन, जलतरण, वस्त्र निर्माण, धातु प्रयोग, मकान बनाने, संगठित रहने, सामूहिक सुविधा की धर्म-संहिता पर चलने, रोगों की चिकित्सा करने जैसे अनेकों महत्वपूर्ण आविष्कार मनुष्य ने जब तब किये और उनके द्वारा अपनी स्थिति को देवोपम बनाया। मनुष्य अन्य प्राणियों की तुलना में अत्यधिक विभूतिवान है। हम देवताओं के सुखों के बारे में सोचते हैं कि मनुष्य की अपेक्षा उन्हें असंख्य गुने सुख-साधन प्राप्त हैं। धरती के प्राणी भी यदि यह सोच सकें कि उनमें और मनुष्य की सुविधाओं में कितना अन्तर है तो हम उनसे कहीं अधिक सुख-सुविधा से सम्पन्न होंगे जितना कि हम अपनी तुलना में देवताओं को मानते हैं। यह देवोपम स्थिति हमने विचारशक्ति की विशेषता के कारण उसके विकास और प्रयोग के कारण ही उपलब्ध की है।

🔴 पुष्ट विचार-शक्ति को जीवन की जिस दिशा में जितनी मात्रा में लगाना प्रारम्भ कर दिया है, हमें उस दिशा में उतनी ही सफलता मिलने लगती है। विज्ञान की शोध अस्त्र-शस्त्र की सुसज्जा, उत्पादन, राजनीति, शिक्षा चिकित्सा आदि जिन कार्यों में भी हमारा ध्यान लगा हुआ है उनमें तीव्रगति से प्रगति दृष्टिगोचर हो रही है और यदि ध्यान इन कार्यों में केन्द्रीभूत हो इसी प्रकार लगा रहा हो तो भविष्य में उस ओर उन्नति भी आशाजनक होंगी निश्चित है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 18)

🌹 साधनों से भी अधिक सद्गुणों की आवश्यकता

🔵 उदारता, प्रामाणिकता और परमार्थ-परायणता यह तीन ही ऐसे गुण हैं, जिनका उपार्जन-अभिवर्धन करने पर व्यक्ति न केवल अपने को सुखी समुन्नत बना सकता है, वरन् उसके क्रियाकलापों से सम्बद्ध समूचा परिकर ऊँचा उठता, आगे बढ़ता चला जाता है।

🔴 अगली शताब्दी में उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएँ विनिर्मित करने के लिए क्या सम्पदा जुटानी पड़ेगी? किस प्रकार की योजना और विधि व्यवस्था बनानी जुटानी पड़ेगी? किस स्तर की समृद्धि जुटानी पड़ेगी? इसका ऊहापोह करना समय रहते उचित भी है और आवश्यक भी, किन्तु इतना तो ध्यान रखना ही पड़ेगा कि लोगों की मानसिकता यदि घटिया रही, तो जो इच्छित एवं उपयुक्त है, उसे उपलब्ध कर सकना शताब्दियों सहस्राब्दियों में भी सम्भव न हो सकेगा।  

🔵 साधनों का महत्त्व तो आवश्यक है, पर इतना नहीं कि उन्हें व्यक्तित्व के स्तर से भी ऊँचा माना जा सके। गरीब देशों के लोग सर्वथा निठल्ले-निकम्मे ही रहते हों, ऐसी बात भी नहीं है। शरीर संरचना भी उनकी एक जैसी ही होती है। कई तो उनमें से शिक्षित और समर्थ भी रहते हैं, इतने पर भी गई गुजरी परिस्थितियाँ उनका पीछा नहीं छोड़ती। अभावों, कष्टों, विद्रोहों और संकटों का माहौल कहीं न कहीं से आ ही धमकता है । व्यक्ति को गरिमा सम्पन्न बना सकने में अड़ा रहने वाला अवरोध ही प्रधान इसका कारण होता है, जिसके कारण या तो वे अभीष्ट अर्जन-उत्पादन कर ही नहीं पाते, या फिर से उसे स्वभावगत अस्त-व्यस्तता के कारण ऐसे ही गँवा-उड़ा देते हैं।

🔴 इसके ठीक विपरीत यह भी पाया गया है कि साधु, सज्जन, सद्गुणी, सेवाभावी लोग, नगण्य साधनों से सदाशयता की रीति नीति अपनाए हुए हँसता-हँसाता और खिलता-खिलाता जीवन जी लेते हैं। उन्हीं परिस्थितियों में न केवल स्वयं को वरन् अन्य पिछड़े हुओं को भी ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने में समर्थ होते हैं। ऐसे ही आदर्शवादी, शालीनता सम्पन्नों का अपना पुरातन इतिहास जीवन्त स्थिति में रहा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 जीवन कैसे जीयें? (भाग 2)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 कार्लमार्क्स मजदूरों से ये कहते थे कि ‘‘मजदूरो! एक हो जाओ, तुम्हें गरीबी के अलावा कुछ खोना नहीं है’’ और मैं ये कहता हूँ कि ‘‘अध्यात्म मार्ग पर चलने वाले विद्यार्थियो! तुम्हें अपनी क्षुद्रता के अलावा और कुछ नहीं खोना है। पाना ही पाना है। आध्यात्मिकता के मार्ग पर पाने के अलावा कुछ नहीं है। इसमें एक ही चीज हाथ से गुम जाती है, उसका नाम है, आदमी की क्षुद्रता और संकीर्णता।’’ क्षुद्रता और संकीर्णता को त्यागने में अगर आपको कोई बहुत कष्ट न होता हो तो मेरी प्रार्थना है कि आप इसको छोड़ दें और आप महानता के रास्ते पर चलें। जीवन में भगवान् को अपना हिस्सेदार बना लें। भगवान् के साथ आप नाता जोड़ लें। जोड़ लेंगे तो ये मुलाकात की हिस्सेदारी आपके बहुत काम आयेगी।

🔵 गंगा ने अपने आपको हिमालय के साथ में जोड़े रखा। गंगा का और हिमालय का तालमेल और उसका रिश्ता-नाता ठीक बना रहा और हमेशा गंगा अपना पानी खर्च करती रही, लेकिन पानी की कमी कभी नहीं पड़ने पाई। हिमालय के साथ रिश्ता हम जोड़ें, भगवान् के साथ रिश्ता हम जोड़ें तो हमारे लिये जीवन में कभी अभावों का, कभी उस तरह के संकटों का अनुभव न करना पड़ेगा, जैसे कि सामान्य लोग पग-पग पर जीया करते हैं।

🔴 गंगा का पानी सूखा नहीं, लेकिन नाली का सूख गया। उसने किसी महान् सत्ता के साथ सम्बन्ध मिलाया नहीं। बाढ़ का पानी आया और उछलने लगा। बाढ़ का पानी सूखा और नाला सूख गया। नौ महीने सूखा पड़ा रहा। बरसाती नाला तीन महीने सूखा पड़ा। लेकिन गंगा युगों से बहती चली आ रही है, कभी भी सूखने का नाम नहीं लिया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 104)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 10. आन्दोलन का खर्च:-- हर आन्दोलन कुछ खर्च चाहता है। पैसे के बिना कोई भी काम, संस्थाएं भी अपना काम ठीक नहीं कर पातीं। जातीय-संगठनों का कार्य और आदर्श विवाहों की योजना भी व्ययसाध्य हैं। संगठनकर्त्ता, दफ्तर, पत्र-व्यवहार, मार्गव्यय, प्रचार आदि सभी कार्यों के लिए तो पैसा चाहिये। इसकी पूर्ति हमें निष्ठावान् सदस्यों से मासिक चन्दे के रूप में करना चाहिये। युग-निर्माण योजना के सदस्यों को अपनी आय का एक अंश सामाजिक पुनरुत्थान के लिए अनिवार्य रूप से निकालना होगा। भावनाशील लोगों से यह आशा की जाती है कि वे अपने हृदय की विशालता और उच्च आदर्शवादिता के अनुरूप समय ही नहीं, धन भी उदारतापूर्वक देंगे।

🔵 मासिक चन्दा हर सक्रिय कार्यकर्त्ता को देना चाहिये। इसका आरम्भ अपने लोगों से ही होगा। बाहर के नये लोगों से प्रारम्भ में ही चन्दा मांगने लगने से वे बिचक जाते हैं। जो जितना आस्थावान बनता जाय, उससे उसी अनुपात से आर्थिक सहयोग की भी आशा की जा सकेगी। सम्पन्न एवं दानी लोगों से जो सक्रिय कार्य नहीं कर सकते, पर पैसा दे सकते हैं, उनसे लेना चाहिए। किन्हीं दानी उदार सज्जनों से इन कार्यों के लिए कोई स्थायी जमीन-जायदाद मिल सके तो उसके लिये भी प्रयत्न करना चाहिये। मन्दिरों, धर्मशालाओं की खाली इमारतें संगठन के कार्यालय का काम देने योग्य मिल सकें तो उन्हें लेने का भी प्रयास करना चाहिये, ताकि मकान सम्बन्धी आवश्यकता की पूर्ति बिना खर्च के भी हो सके। धर्म घट रखकर प्रतिदिन एक मुट्ठी अन्न या धर्म पेटी रखकर कुछ पैसे लेने वाला क्रम भी जहां जम सके वहां अवश्य जमाना चाहिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 51)

🌹 भावी रूपरेखा का स्पष्टीकरण

🔴 यह तुम्हारे कार्यक्रम का प्रथम चरण है, अपना कर्तव्य पालन करते रहना। यह मत सोचना कि हमारी शक्ति नगण्य है। तुम्हारी कम सही, पर जब हम दो मिल जाते हैं, तब एक और एक मिलकर ग्यारह होते हैं और फिर यह तो दैवी सत्ता द्वारा संचालित कार्यक्रम है। इसमें संदेह कैसा? समय आने पर सारी विधि व्यवस्था सामने आती जाएगी। अभी योजना बनाने और चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। अध्ययन जारी रखो। पुरश्चरण भी करते रहो। स्वतंत्रता सैनिक का काम करो। अधिक आगे की बात सोचने में व्यर्थ ही मन में उद्विग्नता बढ़ेगी। अभी अपनी मातृभूमि में रहो और वहीं से प्रथम चरण के यह तीनों काम करो।

🔵 आगे की बात संकेत रूप में कहे देते हैं। साहित्य प्रकाशन द्वारा स्वाध्याय का और विशाल धर्म संगठन द्वारा सत्संग का, यह दो कार्य मथुरा रहकर करने पड़ेंगे। पुरश्चरण की पूर्णाहुति भी वहीं होगी। प्रेस प्रकाशन भी वहीं से चलेगा। मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की प्रक्रिया सुनियोजित ढंग से वहीं से चलेगी। वह प्रयास एक ऐतिहासिक आंदोलन होगा जैसा कि अब तक कहीं भी नहीं हुआ।

🔴 तीसरा चरण इन सूक्ष्म शरीरधारी ऋषियों की इच्छा पूरी करने का है। ऋषि परम्परा का बीजारोपण तुम्हें करना है। इसका विश्वव्यापी विस्तार अपने ढंग से होता रहेगा। यह कार्य सप्त ऋषियों की तपोभूमि सप्त सरोवर हरिद्वार में रहते हुए करना पड़ेगा। तीनों कार्य तीनों जगह उपयुक्त ढंग से चलते रहेंगे अभी संकेत किया है। आगे चलकर समयानुसार इन कार्यों की विस्तृत रूपरेखा हम यहाँ बुलाकर बताते रहेंगे। तीन बार बुलाने के तीन प्रयोजन होंगे।

🔵 चौथी बार तुम्हें भी चौथी भूमिका में जाना है और हमारे प्रयोजन का बोझ इस सदी के अंतिम दशकों में अपने कंधों पर लेना है। तब सारे विश्व में उलझी हुई विषम परिस्थितियों के अत्यंत कठिन और अत्यंत व्यापक कार्य अपने कंधे पर लेने होंगे। पूर्व घोषणा करने से कुछ लाभ नहीं, समयानुसार जो आवश्यक होगा, सो विदित भी होता चलेगा और सम्पन्न भी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/bhavi

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 52)

🔵 सुनहरी धूप ऊंचे पर्वत शिखरों से उतर कर पृथ्वी पर कुछ देर के लिए आ गई थी। मानो अविद्याग्रस्त हृदय में सत्संगवश स्वल्पस्थायी ज्ञान उदय हो गया। ऊंचे पहाड़ों की आड़ में सूरज इधर उधर ही छिपा रहता है केवल मध्यान्ह को ही कुछ घण्टों के लिये उनके दर्शन होते हैं उनकी किरणें सभी सुकुड़ते हुए जीवों में चेतना की एक लहर दौड़ा देती हैं। सभी में गतिशीलता और प्रसन्नता उमड़ने लगती है। आत्म ज्ञान का सूर्य भी प्रायः वासना और तृष्णा की चोटियां के पीछे छिपा रहता है पर जब कभी जहां कहीं वह उदय होगा वहीं उसकी सुनहरी रश्मियां एक दिव्य हलचल उत्पन्न करती हुई अवश्य दिखाई देंगी।

🔴 अपना शरीर भी स्वर्णिम रश्मियों का आनन्द लेने के लिए कुटिया से बाहर निकला और मखमल के कालीन सी बिछी हरी घास पर टहलने की दृष्टि से एक ओर चल पड़ा। कुछ ही दूर रंग-बिरंगे फूलों का एक बड़ा पठार था। आंखें उधर ही आकर्षित हुईं और पैर उसी दिशा में उठ चले।

🔵 छोटे बच्चे अपने सिर पर रंगीन टोपे पहने हुए पास-पास बैठकर किसी खेल की योजना बनाने में व्यस्त हों ऐसे लगते थे वे पुष्प सज्जित पौधे। मैं उन्हीं के बीच जाकर बैठ गया। लगा जैसे मैं भी एक फूल हूं। यदि ये पौधे मुझे भी अपना साथी बनालें तो मुझे भी अपने खोये बचपन पाने का पुण्य अवसर मिल जाय।

🔴 भावना आगे बढ़ी। जब अन्तराल हुलसता है तो तर्कवादी कुतर्की विचार भी ठण्डे पड़ जाते हैं। मनुष्य के भावों में प्रबल रचना शक्ति है वे अपनी दुनिया आप बसा लेते हैं। काल्पनिक ही नहीं शक्तिशाली भी सजीव भी। ईश्वर और देवताओं तक ही रचना उसने अपनी भावना के बल पर की है और उनमें अपनी श्रद्धा को पिरोकर उन्हें इतना महान बनाया है जितना कि वह स्वयं है। अपने भाव फूल बनने को मचले तो वैसा ही बनने में देर न थी। लगा कि इन पंक्ति बनाकर बैठे हुए पुष्प बालकों ने मुझे भी सहचर मान कर मुझे भी अपने खेल में भाग लेने के लिए सम्मिलित कर लिया है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 शहीद भगत सिंह से जुड़ी एक ग़लत जानकारी फैलाने की कोशिश

🔴 शहीद भगत सिंह से जुड़ी एक ग़लत जानकारी फैलाने की कोशिश की गई कि उन्हें 23 मार्च को नहीं, 14 फरवरी को फांसी दी गई थी. पर हकीकत ये है कि 1929 में असेंबली में बम फेंकने के बाद भगत सिंह को अंग्रेजों ने गिरफ्तार किया था. भगत सिंह से जुड़े इस मामले की तेज गति से सुनवाई के लिए तब के वायसराय लॉर्ड इरविन ने एक प्रीवी काउंसिल का गठन किया था. तब एक भारतीय डिफेंस कमेटी ने प्रीवी काउंसिल के खिलाफ पंजाब में अपील की थी, जिसे जज विस्काउंट डुनेडिन ने ठुकरा दिया था।

🔵 इसके बाद 14 फरवरी 1931 को कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष मदन मोहन मालवीय लॉर्ड इरविन के सामने एक यदा याचिका डाली, मगर ये याचिका भी स्वीकार नहीं की गई और भगत सिंह को 23 मार्च 1931 को शाम 7 बजकर 30 मिनट पर लाहौर जेल में फांसी दे दी गई. भगत सिंह के साथ उनके दो साथी राजगुरु और सुखदेव भी थे.


🔴  Freedom fighters Bhagat Singh, Sukhdev Thapar and Shivaram Rajguru were three great sons of India, who breathed their last as 'martyrs'. All three of them were influential revolutionaries, who sacrificed their young lives to make their motherland, free from the shackles of the British rule.

🔵 Bhagat Singh, a Sandhu Jat, became so popular that he had become the symbol of the new awakening among the youths.

🔴  According to facts, Bhagat Singh, Rajguru and Sukhdev were sentenced to death in 'Lahore conspiracy case' and were ordered to be hanged on 24 March, 1931. But, the schedule was moved forward by 11 hours and they were actually executed on 23 March, 1931 at 7:30 pm.

🔵 However, there has been a controversial 'malicious campaign' doing the rounds on social media, about the date of deaths of the three martyrs.

🔴  Whether it is a hoax or a rumuor, some claim that Bhagat Singh and his comrades were hanged on February 14, 1931, a day that is celebrated as Valentine's day.

🔵 When rumours are spread on such sensitive issues, then, it shows that we are not giving sufficient acknowledgement for the sacrifices made by our great freedom fighters. Spreading misinformation about the date of their deaths is not only a mockery on their struggle, but also a conspiracy to spread feelings of hatred, on a day that is meant to spread love. On the social networking site Facebook, many people have mentioned that, "Most of us know 14th Feb as Valentine Day.. but in the morning of 14.02.1931 at Lahore, the legendaries were hanged to their deaths. We only celebrate valentine day.. Let us pass this message to every 1 we know,to salute and pay respect to their sacrifice also.. Let Us Be An Indian First..!!"

🔴  So, it's an appeal to all rumourmongers, please do not spread venomous propoganda by twisting the facts about the freedom fighters' martyrdom.

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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