सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 50)

🌹 भावी रूपरेखा का स्पष्टीकरण

🔴  तुम्हारा समर्पण यदि सच्चा है, तो शेष जीवन की कार्य पद्धति बनाए देते हैं। इसे परिपूर्ण निष्ठा के साथ पूरी करना। प्रथम कार्यक्रम तो यही है कि 24 लक्ष्य गायत्री महामंत्र के 24 महापुरश्चरण चौबीस वर्ष में पूरे करो। इससे मजबूती में जो कमी रही होगी, सो पूरी जो जाएगी। बड़े और भारी काम करने के लिए बड़ी समर्थता चाहिए। इसी के निमित्त यह प्रथम कार्यक्रम सौंपा गया है। इसी के साथ-साथ दो कार्य और भी चलते रहेंगे। एक यह कि अपना अध्ययन जारी रखो। तुम्हें कलम उठानी है। आर्ष ग्रन्थों के अनुवाद प्रकाशन की व्यवस्था करके उसे सर्व-साधारण तक पहुँचाना है। इससे देव संस्कृति की लुप्तप्राय कड़ियाँ जुड़ेंगी और भविष्य में विश्व संस्कृति का ढाँचा खड़ा करने में सहायता मिलेगी। इसके साथ ही जब तक स्थूल शरीर विद्यमान है, तब तक मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण करने वाला सर्वसुलभ साहित्य विश्व वसुधा की सभी सम्भव भाषाओं में लिखा जाना है। यह कार्य तुम्हारी प्रथम साधना शक्ति से सम्बद्ध है। इसमें समय आने पर तुम्हारी सहायता के लिए सुपात्र मनीषी आ जुटेंगे, जो तुम्हारा छोड़ा काम पूरा करेंगे।

🔵 तीसरा कार्य स्वतंत्रता संग्राम में एक सिपाही की तरह प्रत्यक्ष एवं पृष्ठभूमि में रहकर लड़ते रहने का है। यह सन् 1947 तक चलेगा। तब तक तुम्हारा पुरश्चरण भी बहुत कुछ पूरा हो लेगा। यह प्रथम चरण है। इसकी सिद्धियाँ जन साधारण के सम्मुख प्रकट होंगी। इस समय के लक्षण ऐसे नहीं है, जिनसे यह प्रतीत हो कि अंग्रेज भारत को स्वतंत्रता देकर सहज ही चले जाएँगे किन्तु यह सफलता तुम्हारा अनुष्ठान पूरा होने के पूर्व ही मिलकर रहेगी। तब तक तुम्हारा ज्ञान इतना हो जाएगा जितना कि युग परिवर्तन और नव-निर्माण के लिए किसी तत्त्ववेत्ता के पास होना चाहिए। 

🔴 पुरश्चरणों की समग्र सम्पन्नता तब होती है, जब उसका पूर्णाहुति यज्ञ भी किया जाए। चौबीस लाख पुरश्चरण का गायत्री महायज्ञ इतना बड़ा होना चाहिए कि जिससे 24 लाख मंत्रों की आहुतियाँ हो सकें एवं तुम्हारा संगठन इस माध्यम से खड़ा हो जाए। यह भी तुम्हें ही करना है। इसमें लाखों रुपए की राशि और लाखों की सहायक जनसंख्या चाहिए। तुम यह मत सोचना कि हम अकेले हैं, पास में धन नहीं है। हम तुम्हारे साथ हैं। साथ ही तुम्हारी उपासना का प्रतिफल भी, इसलिए संदेह करने की गुंजायश नहीं है। समय आने पर सब हो जाएगा। साथ ही सर्वसाधारण को यह भी विदित हो जाएगा कि सच्चे साधक की सच्ची साधना का कितना चमत्कारी प्रतिफल होता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य


👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 51)

🔵 छोटे-छोटे लता-गुल्म नन्हे मुन्ने बच्चे-बच्चियों की तरह पंक्ति बना कर बैठे थे। पुष्पों में उनके अपने सिर सुशोभित थे। वायु के झोंकों के साथ हिलते हुए ऐसे लगते थे मानों प्रारम्भिक पाठशाला के छोटे छात्र सिर हिला हिला कर पहाड़े याद कर रहे हों। पल्लवों पर बैठे हुए पक्षी मधुर स्वर में ऐसे चहक रहे थे, मानों यक्ष गन्धर्वों की आत्माएं खिलौने जैसे सुन्दर आकार धारण करके इस वन श्री का गुणगान और अभिनन्दन करने के लिए ही स्वर्ग से उतरी हों। किशोर बालकों की तरह हिरन उछल कूद मचा रहे थे। जंगली भेड़ें (बरड़) ऐसी निश्चिन्त होकर घूम रही थी मानों इस प्रदेश की गृह लक्ष्मी यही हो। मन बहलाने के लिए चाबीदार कीमती खिलौनों की तरह छोटे-छोटे कीड़े पृथ्वी पर चल रहे थे। उनका रंग, रूप, चाल, ढाल सभी कुछ देखने योग्य था। उड़ते हुए पतंग, फूलों से अपने सौन्दर्य को प्रतिस्पर्धा कर रहे थे। हममें से कौन अधिक सुन्दर और कौन अधिक असुन्दर है इसकी होड़ उनमें लगी हुई थी।

🔴 नव यौवन का भार जिससे सम्भलने में न आ रहा हो ऐसी इतराती हुई पर्वतीय नदी बगल में ही बह रही थी। उसकी चंचलता और उच्छृंखलता, दर्प देखते ही बनता था। गंगा में और भी नदी आकर मिलती हैं। मिलन के संगम पर ऐसा लगता था मानों दो सहोदर बहिनें ससुराल जाते समय गले मिल रही हों, लिपट रही हों। पर्वत राज हिमालय ने अपनी सहस्र पुत्रियों (नदियों) का विवाह समुद्र के साथ किया है। ससुराल जाते समय में बहिनें कैसी आत्मीयता से मिलती हैं, संगम पर खड़े-खड़े इस दृश्य को देखते-देखते जी नहीं अघाता। लगता है हर घड़ी इसे देखते ही रहें।

🔵 वयोवृद्ध राज पुरुषों और लोक नायकों की तरह पर्वत शिखर दूर-दूर तक ऐसे बैठे थे मानो किसी गम्भीर समस्याओं को सुलझाने में दत्त-चित्त होकर संलग्न हों। हिमाच्छादित चोटियां उनके श्वेत केशों की झांकी करा रही थीं। उन पर उड़ते हुए छोटे बादल ऐसे लगते थे मानो ठण्ड से बचाने के लिए नई रुई का बढ़िया टोपा उन्हें पहनाया जा रहा है। कीमती शाल-दुशालों में उनके नग्न शरीर को लपेटा जा रहा हो।

🔴 जिधर भी दृष्टि उठती उधर एक विशाल कुटुम्ब अपने चारों ओर बैठा हुआ नजर आता था। उनके जवान न थी, वे बोलते न थे पर उनकी आत्मा में रहने वाला चेतन बिना शब्दों के ही बहुत कुछ कहता था। जो कहता था हृदय से कहता था और करके दिखाता था। ऐसी बिना शब्दों की किन्तु अत्यन्त मार्मिक वाणी इससे पहले सुनने को नहीं मिली थी। उनके शब्द सीधे आत्मा तक प्रवेश करते और रोम-रोम को झंकृत किये देते थे। अब सूनापन कहां? अब भय किसका? सब ओर सहचर ही सहचर जो बैठे थे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 12 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 Feb 2017


👉 एक ही दिन में मिले तीन जीवनदान

🔴 बचपन से ही साधना में मेरी गहरी रुचि थी। ध्यान मुझे स्वतः सिद्ध था। तरह- तरह के अनुभव होते थे, जिन्हें किसी से कहने में भी मुझे डर लगता था। पर धीरे- धीरे उनका अर्थ समझ में आने लगा। एक दिन न जाने कहाँ से एक महात्मा मस्तीचक आए और धूनी जलाकर बैठ गए। उनका नाम था- बाबा हरिहर दास। उनसे प्रभावित होकर मैंने दीक्षा लेने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा- मैं तुम्हारा गुरु नहीं हो सकता हूँ। तुम्हारे गुरु इस धरती पर अवतरित हो चुके हैं। मेरा उद्धार भी तुम्हारे गुरु के द्वारा ही होना है। एक दिन वे मथुरा से यहाँ आएँगे और इसी मिट्टी की कुटिया में आकर मेरा उद्धार करेंगे।

🔵 बाबा हरिहर दास ने जिस दिन मुझे यह बात बताई, उस दिन के पहले से ही मेरे सपने में एक महापुरुष का आना शुरू हो चुका था। वे खादी के धोती- कुर्ते में नंगे पाँव आया करते थे। उनके चेहरे से अलौकिक आभा टपकती रहती थी। जब भी वे मेरे सपने में आते, मैं यंत्रचालित- सा उनके चरणों में अपना माथा टेक देता। फिर वे मेरा सिर सहलाकर मुझे आशीर्वाद देते और बिना कुछ कहे वापस चले जाते।

🔴 वर्षों तक यही क्रम चलता रहा। लेकिन एक रात ऐसी भी आयी, जब उन्होंने अपना मौन तोड़ दिया। अंतरंगता से आप्लावित शब्दों में उन्होंने मुझसे कहा- अभी कितने दिन यहाँ रहना है। मैं वहाँ तुम्हारी राह देख रहा हूँ।
  
🔵 तभी से एक अनजानी- सी बेचैनी मेरे भीतर घर कर गई। अब तक मुझे इसका आभास हो चुका था कि यही मेरे पूर्व जन्म के गुरु हैं। लेकिन प्रश्र यह था कि इस अवतारी चेतना को मैं कहाँ खोजूँ? कुछ ही दिनों बाद दैवयोग से मैं मथुरा पहुँचा। वहीं पर मुझे मिले बार- बार मेरे सपने में आने वाले मेरे परम पूज्य गुरुदेव- युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य!

🔴 पहली ही मुलाकात में उनसे मुझे ऐसा प्यार मिला कि मैं उन्हीं का होकर रह गया। उनके पास रहते- रहते करीब चार वर्ष बीत गए थे। आचार्यश्री के मार्गदर्शन में साधना और उपासना के बल पर मैं अपने जीवन में होने वाली अनेक घटनाओं के बारे में जानने लग गया था।

🔵 इसी क्रम में एक दिन मुझे अपनी मृत्यु के समय का ज्ञान हो गया। तब मैंने पूज्य गुरुदेव से कहा- इस शरीर से आपकी सेवा अगले तीन- चार महीने तक ही हो सकेगी। गुरुदेव ने पूछा- ऐसा क्यों? मैंने मुस्कुराते हुए कहा- मेरी मृत्यु होने वाली है। मरने के बाद भूत बनकर शायद आपकी सेवा कर सकूँ, पर इस शरीर से तो सेवा नहीं हो पाएगी। जवाब में पूज्य गुरुदेव भी मुस्कराने लगे। उन्होंने कहा- तुम्हें इसी शरीर से मेरा काम करना है।

🔴 कुछ दिन और बीत गए। मृत्यु को कुछ और करीब आया जानकर मैंने पूज्य गुरुदेव के सामने फिर से यही बात दुहराई। गुरुदेव झल्ला उठे। उन्होंने डपटते हुए पूछा- अच्छा बता, तेरी मृत्यु कैसे होगी? मैंने कहा- आज से ठीक दो महीने बाद मुझे एक साँप काट लेगा और उसी से मेरी मृत्यु हो जाएगी।  मेरी बात सुनकर उनकी झल्लाहट कुछ और बढ़ गई। उन्होंने कहा- तू अपना काम करता चल। मरने की बकवास छोड़ दे। मुझे लगा कि गुरुदेव का इशारा शरीर की नश्वरता की ओर है। मैं भी करीब आती हुई मौत को भूलकर अपने काम में मगन हो गया।

🔵 महीने- डेढ़ महीने बाद तो मैं इस बात को पूरी तरह से भूल गया था कि मौत मेरी तरफ तेजी से बढ़ती आ रही है। आखिरकार वह दिन भी आ ही गया जिसे नियति ने मेरी मृत्यु के लिए निर्धारित कर रखा था। सुबह के समय मैं, शरण जी तथा दो- तीन अन्य परिजनों के साथ नीम के पेड़ के नीचे बैठा था। गुरुदेव सामने के कमरे में थे। हम सब उनके बाहर निकलने का ही इन्तजार कर रहे थे। समय बीतता जा रहा था, पर वे बाहर निकलने का नाम नहीं ले रहे थे। विलम्ब होता देख मैं उधर जाने की सोच ही रहा था कि अचानक पेड़ से एक भयंकर विषधर सर्प मेरे सिर पर गिरा। उसी क्षण मुझे अपनी ध्यानावस्था में देखा हुआ दृश्य याद आ गया कि आज मुझे मृत्यु से कोई बचा नहीं सकता है। पर आश्चर्य! उस काले साँप का फन मेरी आँखों के आगे नाच रहा था। उस काले साँप ने दो- तीन बार अपने फन से मेरे सिर पर और छाती पर प्रहार किया, पर काट नहीं सका। ऐसा लगा कि किसी ने उसके फन को नाथ कर रख दिया है।

🔴 अपने जीवन में समय को पूरी तरह से साध लेने वाले मेरे गुरुदेव समय के बीत जाने पर भी आज कमरे से बाहर क्यों नहीं निकले, यह बात अब मेरी समझ में आ चुकी थी। डसने की कोशिश में असफल हुआ वह साँप धीरे- धीरे मेरे शरीर पर सरकता हुआ नीचे आ गया। अब तक वहाँ कुछ और लोग भी जमा हो गए थे। सबने मिलकर उस साँप को मार दिया। तब तक वहाँ इस बात को लेकर कोहराम मच गया कि शुक्ला जी को साँप ने काट खाया है। गुरुदेव अपने कमरे से निकले। इन सारी बातों से अनजान बनते हुए उन्होंने पूछा -क्या हुआ शुक्ला? मैंने मरे हुए साँप को दिखाते हुए कहा- यह सर्प मेरा काल बनकर आया था। लगता है मैं बच गया। गुरुदेव ने गंभीर स्वर में कहा- इस सर्प को मारना नहीं चाहिए था। किसने मारा? किसी ने मुँह नहीं खोला। सभी सिर झुकाए खड़े रहे। वातावरण को सहज बनाने के लिए गुरुदेव बोले- खैर, जाने दो। स्नान कर लो। पूज्यवर की शक्ति सामर्थ्य से अभिभूत होकर मैं स्नान करने के लिए चल पड़ा।

🔵 उस दिन भी रोज की भाँति ही दोपहर के बाद वाले कार्यक्रम में परम वन्दनीया माताजी के गायन में मुझे तबले पर संगत करनी थी। मंच पर सारी व्यवस्था हो चुकी थी। तबला, हारमोनियम रखे जा चुके थे। माताजी के लिए माइक सेट करना था। जैसे ही मैंने माइक को पकड़कर उठाना चाहा, मेरा हाथ माइक से चिपक गया। माइक में २४० बोल्ट का करंट दौड़ रहा था। अपनी पूरी ताकत लगाकर मैंने हाथ झटकना चाहा, पर झटक नहीं सका। फिर मैं चीखकर बोला- लाइन काटो। मुझे लगा कि अब मेरी मृत्यु निश्चित है। सुबह साँप से तो मैं बच गया था, पर बिजली के इस करंट से बचना असंभव है। लेकिन मेरे और मेरी मौत के बीच तो पूज्य गुरुदेव की तपश्चर्या की ताकत दीवार बनकर खड़ी थी। उन्होंने भेदक दृष्टि से बिजली के तार की ओर देखा और तार का कनेक्शन कट गया। माइक ने मेरा हाथ छोड़ दिया और मैं झटके से नीचे गिर पड़ा। सब लोग दौड़कर मेरे पास आ गए। पूज्य गुरुदेव भी स्थिर चाल से चले आ रहे थे। लोगों ने उन्हें रास्ता दिया। उन्होंने पास आकर पूछा- कैसे हो बेटे? बोलना चाहकर भी मैं कुछ बोल नहीं सका। ऐसा लग रहा था, जैसे पूरे शरीर को लकवा मार गया हो।

🔴 डॉक्टर बुलाये गए। उन्होंने कहा- बिजली का झटका बहुत जोर का लगा है। इसका असर मस्तिष्क पर भी पड़ सकता है। ठीक होने में कम से कम तीन महीने तो लग ही जाएँगे। डॉक्टर के चले जाने के बाद पूज्य गुरुदेव ने कहा -इसके सारे शरीर में सरसों के तेल से मालिश करो।

🔵 संगीत का कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया। मैं अकेले में बिस्तर पर लेटा हुआ गुरुसत्ता की सर्वसमर्थता पर मुग्ध हो रहा था। कुछ ही घण्टों के दौरान दो बार काल मुझे निगलने के लिए आया और दोनों बार उन्होंने मुझे मौत के मुँह से बाहर निकाल लिया। मैं उनके प्रति कृतज्ञता के भाव में डूबता जा रहा था कि न जाने कब आँखों में गहरी नींद समाती चली गई। आधी रात के बाद अचानक मेरी नींद टूटी। ऐसा लगा कि कोई मेरी छाती पर बैठकर मुझे जान से मारने की कोशिश कर रहा है और मैं अब कुछ ही क्षणों का मेहमान हूँ। एक ही दिन में तीसरी बार मैं अपनी मृत्यु को करीब से देख रहा था। दोपहर बाद के बिजली के झटके ने मेरी सारी ताकत पहले ही निचोड़ ली थी। इसीलिए चाहकर भी मैं कोई प्रतिकार नहीं कर सका। जब मुझे लगा कि अगली कोई भी साँस मेरी अन्तिम साँस साबित हो सकती है, तो मेरे मुँह से सिर्फ दो ही शब्द निकले- हे गुरुदेव! उनका नाम लेना भर था कि मेरी छाती पर सवार मेरा काल शून्य में विलीन हो गया। इस प्रकार परम पूज्य गुरुदेव ने विधि के विधान को चुनौती देकर एक ही दिन में तीन- तीन बार मुझे नया जीवन दिया।                  

🔴 सुबह होते ही पत्नी ने पूज्य गुरुदेव के कल के आदेश का पालन करने की तत्परता दिखाई। सरसों के तेल की मालिश शुरू हुई। बीस मिनट की मालिश में ही एक चौथाई आराम मिल गया। मालिश का यह क्रम करीब एक हफ्ते तक चलता रहा। डॉक्टर साहब ने तो जोर देकर कहा था कि मुझे ठीक होने में कम से कम तीन महीने लग जायेंगे, लेकिन आठवें दिन ही मैं अपने आपको पहले से भी अधिक ताकतवर महसूस करने लगा था। उनकी दवा धरी की धरी ही रह गई थी।
  
🌹 रमेशचन्द्र शुक्ल मस्तीचक, (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/Wonderfula

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 36) 13 Feb

🌹 साप्ताहिक और अर्द्ध वार्षिक साधनाएँ    
🔴 उपवास पेट का साप्ताहिक विश्राम है। इससे छह दिन की विसंगतियों का सन्तुलन बन जाता है और आगे के लिये सही मार्ग अपनाने का अवसर मिलता है। जल लेकर उपवास न बन पड़े तो शाकों का रस या फलों का रस लिया जा सकता। दूध, छाछ पर भी रहा जा सकता है। इतना भी न बन पड़े तो एक समय का निराहार तो करना ही चाहिये। मौन पूरे दिन का न सही किसी उचित समय दो घंटे का तो कर ही लेना चाहिये। इस चिह्न पूजा से भी दोनों प्रयोजनों का उद्देश्य स्मरण बना रहता है और भविष्य में जिन मर्यादाओं का पालन किया जाता है, उस पर ध्यान केन्द्रित बना रहता है। साप्ताहिक विशेष साधना में जिह्वा पर नियन्त्रण स्थापित करना प्रथम चरण है।  

🔵 द्वितीय आधार है-ब्रह्मचर्य नियत दिन शारीरिक ब्रह्मचर्य तो पालन करना ही चाहिये। यौनाचार से तो दूर ही रहना चाहिये, साथ ही मानसिक ब्रह्मचर्य अपनाने के लिये यह आवश्यक है कि कुदृष्टि का, अश्लील कल्पनाओं का निराकरण किया जाये। नर नारी को देवी के रूप में और नारी नर को देवता के रूप में देखे तथा श्रद्धा भरे भाव मन पर जमायें। भाई-बहन पिता-पुत्री माता-सन्तान की दृष्टि से ही दोनों पक्ष एक दूसरे के लिये पवित्र भावनायें उगायें। यहाँ तक कि पति-पत्नी भी एक दूसरे के प्रति अर्द्धांग की उच्चस्तरीय आत्मीयता संजोयें। 
                      
🔴 अश्लीलता को अनाचार का एक अंग माने और उस प्रकार के दुश्चिन्तन को पास न फटकने दें। सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य तभी सधता है, जब शरीरसंयम के साथ-साथ मानसिक श्रद्धा का भी समन्वय रखा जाय। इससे मनोबल बढ़ता है और कामुकता के साथ जुड़ने वाली अनेकानेक दुर्भावनाओं से सहज छुटकारा मिलता है। सप्ताह में हर दिन इस लक्ष्य पर भावनायें केन्द्रित रखी जाय तो उसका प्रभाव भी अगले छह दिनों तक बना रहेगा।    

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्लास्टिक का दिल बनाने वाले महान् डॉक्टर

🔴 टेमगाज के एक डॉक्टर श्री माईकेल डेवा ने चिकित्सा शास्त्र में एक अद्भुत चमत्कार कर दिखाया। उन्होंने एक हृदय रोगी का खराब दिल निकालकर उसके स्थान पर प्लास्टिक का एक नकली दिल लगा दिया।

🔵 डॉ० डेवा के इस अद्भुत कार्य का प्रभाव रोगी पर किसी प्रभार भी अन्यथा नही पडा। उसका नकली दिल यथावत् काम कर रहा है। शरीर का रक्त संचालन तथा रक्तचाप सामान्य रहा। साथ ही शरीर के अन्य अवयवों की कार्य प्रणाली में किसी प्रकार का व्यवधान अथवा विरोध नहीं आया। डॉ० डेवा की इस सफलता ने चिकित्सा विज्ञान में एक नई क्रांति का शुभारंभ कर दिया है।

🔴 डॉ० डेवा ने प्रारंभ से ही, जब वे कालेज मे पढते थे यह विचार बना लिया था कि वे अपना सारा जीवन संसार की सेवा में ही लगायेंगे। अपनी सेवाओं के लिये उन्होंने चिकित्सा का क्षेत्र चुना। डॉ० डेवा जब किशोर थे तभी से यह अनुभव कर रहे थे कि रोग मानव जाति के सबसे भयंकर शत्रु हैं। यह मनुष्यों के लिए न केवल अकाल के कारण बनते हैं बल्कि जिसको लग जाते है उसका जीवन ही बेकार तथा विकृत बना देते हैं। न जाने कितनी महान् आत्माऐं और ऊदीयमान प्रतिभाएँ जो संसार का बडे़ से बडा़ उपकार कर सकती है, विचार निर्माण तथा साहित्य के क्षेत्र में अद्भुत दान कर सकती है, इनका शिकार बनकर नष्ट हो जाती है।

🔵 इसके साथ ही उन्हें यह बात भी कम कष्ट नहीं देती थी कि रोग से ग्रस्त हो जाने पर जहाँ मनुष्य की कार्यक्षमता भी नष्ट हो जाती है, वहाँ उसके उपचार में बहुत सा धन भी बरबाद होता रहता है। रोगों के कारण संसार के न जाने कितने परिवार अभावग्रस्त बने रहते है। जो पैसा वे बच्चों की पढाई और परिवार की उन्नति में लगा सकते हैं, वह सब रोग की भेंट चढ़ जाता है और बहुत से होनहार बच्चे अशिक्षित रह जाते है।

🔴 इस बात को सोचकर तो वे और भी व्यग्र हो उठते थे कि रोगों से दूसरे नये रोगो का जन्म होता है। संसार की आबादी बुरी तरह बढती जा रही है। लोग अभी इतने समझदार नहीं हो पाए है कि यह समझ सकें कि जनवृद्धि के कारण संसार में उपस्थित अभाव भी अनेक रोगों को जन्म देता है। भर पेट भोजन न मिलने से मनुष्य की शक्ति क्षीण हो जाती है, जिससे उसे अनेक रोग दबा लेते हैं, उनका सक्रमण तथा प्रसार होता है और संसार की बहुत-सी बस्तियाँ बरबाद हो जाती है। रोग युद्ध से भी अधिक मानव समाज के शत्रु होते हैं।

🔵 वे चिकित्साशास्त्र के अध्ययन में लग गए और यह भी देखते रहे कि उन्हें इस क्षेत्र की किस शाखा मे अनुसंधान तथा विशेषता प्राप्त करनी चाहिए, उन्होंने पाया कि आजकल मनुष्यों में कृत्रिमता का बहुत प्रवेश हो गया है। लोग अप्राकृतिक जीवन के अभ्यस्त हो गए हैं। उनके खानपान में अनेक अखाद्य पदार्थ शामिल हो गये हैं, जो शरीर के लिये बहुत घातक सिद्ध होते है। इसके साथ तंबाकू शराब और अन्य बहुत-से नशों के कारण भी मानव स्वास्थ्य बुरी तरह चौपट होता जा रहा है। इन सारे व्यसनों तथा अनियमितताओं का सीधा प्रभाव हृदय पर पडता है इसीलिये अधिकांश रोगी दिल की किसी न किसी बीमारी से ग्रस्त रहते हैं हार्टफेल्यौर की बीमारी का कारण भी उनका यही अनुपयुक्त रहन-सहन तथा आहार-विहार है।

🔴 डॉ० डेवा ने इस अयुक्तता पर दु़ःखी होते हुए एक हृदय संबंधी अनुसंधान तथा चिकित्सा में विशेषता प्राप्त करने के लिए जीवन का बहुत बडा भाग लगा दिया। उन्होंने एक लंबी अवधि के प्रयोग चिकित्सा, उपचार तथा अनुसंधान परीक्षणों के बाद अपनी साधना का मूल्य पाया और खराब दिल निकालकर उसके स्थान पर प्लास्टिक का दिल लगा सकने में सफल हो गए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 25, 26

👉 आस्तिकता का यथार्थ

🔵 आम लोगों की सामान्य धारणा यही है कि भगवान् मोर-मुकुट धारी रूप में होते हैं व समय-समय पर पाप बढ़ने पर पौराणिक प्रस्तुति के अनुसार वे उसी रूप में आकर राक्षसों से मोर्चा लेते व धर्म की स्थापना करते हैं। बहिरंग के पूजा कृत्यों से उनका प्रसन्न होना व इस कारण उतने भर को धर्म मानना, यह एक जन-जन की मान्यता है व इसी कारण कई प्रकार के भटकाव भरे धर्म के दिखाने वाले क्रिया-कलाप अपनी इस धरती पर दिखाई देते हैं। जोरों से आरती गाई जाती है, नगाड़े-शंख आदि बजाए जाते हैं, एवं चरणों पर मिष्ठान्न के ढेर लगा दिए जाते हैं। सवा रूपये व चंद अनुष्ठानों के बदले भी उनकी अनुकम्पा खरीदने के दावे किये जाते हैं। प्रश्न यह उठता है कि आस्तिकता के बढ़ने का क्या यही पैमाना है जो आज बहिर्जगत् में हमें दिखाई दे रहा है? विवेकशीलता कहती है कि ‘‘नहीं’’।

🔴 ईश्वर विश्वास तब बढ़ता हुआ मानना चाहिए जब समाज में जन-जन में आत्मविश्वास बढ़ता हुआ दिखाई पड़े। आत्मावलंबन की प्रवृत्ति एवं श्रमशीलता की आराधना से विश्वास अभिव्यक्त होता दीखने लगे। आस्तिकता संवर्धन तब होता हुआ मानना चाहिए जब एक दूसरे के प्रति प्यार-करुणा-ममत्व के बढ़ने के मानव मात्र के प्रति पीड़ा की अनुभूति के प्रकरण अधिकाधिक दिखाई देने लगें एवं वस्तुतः समाज के एक-एक घटक में ईश्वरीय आस्था परिलक्षित होने लगे। कोई भी अभावग्रस्त हो एवं अपना अन्तःकरण उसे ऊँचा उठाने के लिए छलछला उठे तो समझना चाहिए कि वास्तव में भगवत् सत्ता वहाँ विद्यमान है।

🔵 अनीति-शोषण होता हुआ देखकर भी यदि कहीं किसी के मन में किसी की सहायता का आक्रोश नहीं उपज रहा है तो मानना चाहिए कि बहिरंग का आस्तिक यह समुदाय अभी अन्दर से उतना ही दिवालिया, भीरु व नास्तिक है। जब ईश्वरीय सत्ता पर विश्वास बढ़ने लगता है, तो देखते-देखते लोगों के आत्मबलों में अभिवृद्धि, संवेदना की अनुभूति के स्तर में परिवर्तन तथा सदाशयता का जागरण एक सामूहिक प्रक्रिया के रूप में चहुँ ओर होता दीखायी पड़ने लगता है।

🔴 आज का समय ईश्वरीय सत्ता के इसी रूप के प्रकटीकरण का समय है। प्रसुप्त संवेदनाओं का जागरण ही भगवत् सत्ता का अन्तस् में अवतरण है। आस्था संकट की विभीषिका इसी से मिटेगी व यही आस्तिकता का संवर्धन कर जन-जन के मनों के सन्ताप को मिटाएगी। हमें इसी प्रज्ञावतार को आराध्य मानकर अपने क्रियाकलाप तदनुरूप ही नियोजित करने चाहिए।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 13

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 8)

🌹 विचारों का महत्व और प्रभुत्व

🔴 जिस तरह के हमारे विचार होंगे उसी तरह की हमारी सारी क्रियायें होंगी और तदनुकूल ही उनका अच्छा-बुरा परिणाम हमें भुगतना पड़ेगा। विचारों के पश्चात ही हमारे मन में किसी वस्तु या परिस्थिति की चाह उत्पन्न होती है और तब हम उस दिशा में प्रयत्न करने लगते हैं। जिसकी हम सच्चे दिल से चाह करते हैं, जिसकी प्राप्ति के लिए अन्तःकरण से अभिलाषा करते हैं, उस पर यदि दृढ़ निश्चय के साथ कार्य किया जाय, तो इष्ट वस्तु की प्राप्ति अवश्यम्भावी है। जिस आदर्श को हमने सच्चे हृदय से अपनाया है, यदि उस पर मनसा-वाचा-कर्मणा से चलने को हम कटिबद्ध हैं तो हमारी सफलता निःसन्देह है।

🔵 जब हम विचार द्वारा किसी वस्तु या परिस्थिति का चित्र मन पर अंकित कर उसके लिए प्रयत्नशील होते हैं, उस पर यदि दृढ़ निश्चय के साथ हमारा सम्बन्ध जुड़ना आरम्भ हो जाता है। यदि हम चाहते हैं कि हम दीर्घ काल तक नवयुवा बने रहें तो हमें चाहिए कि हम सदा अपने मन को यौवन के सुखद विचारों के आनन्द-सागर में लहराते रहें। यदि हम चाहते हैं कि हम सदा सुन्दर बने रहें, हमारे मुख-मण्डल पर सौन्दर्य का दिव्य प्रकाश हमेशा झलका करे तो हमें चाहिए कि हम अपनी आत्मा का सौन्दर्य के सुमधुर सरोवर में नित्य स्नान कराते रहें।

🔴 यदि आपको संसार में महापुरुष बनकर यश प्राप्त करना है, तो आप जिस महापुरुष के सदृश होने की अभिलाषा रखते हैं, उनका आदर्श सदा अपने सामने रक्खें। आप अपने मन में दृढ़ विश्वास जमा लें कि आप में अपने आदर्श की पूर्णता और कार्य सम्पादन शक्ति पर्याप्त मात्रा में मौजूद है। आप अपने मन से सब प्रकार की हीन भावना को हटा दें और मन में कभी निर्बलता, न्यूनता, असमर्थता और असफलता के विचारों को न आने दें। आप अपने आदर्श की पूर्ति हेतु मन, वचन, कर्म से पूर्ण दृढ़तापूर्वक प्रयत्न करें और विश्वास रक्खें कि आपके प्रयत्न अन्ततः सफल होकर रहेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 16)


🌹 साधनों से भी अधिक सद्गुणों की आवश्यकता

🔵 जहाँ भी आवश्यकताओं और अभावों की चर्चा होती है, वहाँ साधन-संवर्धन के लिए प्रयत्नरत होने का सुझाव दिया जाता है। इसमें कुछ अनुचित भी नहीं है। बढ़े हुए साधनों के सहारे अनेकों उपयोगी कार्य किये जा सकते हैं। इसलिए आप्तजन ‘‘सौ हाथों से कमाने’’ का उत्साह उभारते हैं, पर उनके साथ ही ‘‘हजार हाथों से खर्च करने’’ का निर्देश भी दिया जाता है। यहाँ दुरुपयोग कर गुजरने के लिए नहीं वरन् सदाशयता भरे प्रगतिशील प्रयोजन के लिए उस उपार्जन को नियोजित करने के लिए प्रोत्साहन दिया गया है। वैसा अनावश्यक संचय न किया जाये, जिसकी परिणति आमतौर से दुर्व्यसनों के लिए ही होती है, जो ईर्ष्या उभारती है और दूसरों को भी उसी अवाञ्छनीय मार्ग पर चल पड़ने के लिए बरगलाती है। 

🔴 पारा पचता नहीं। वह शरीर के विभिन्न अंगों में से फूट-फूट कर निकलता है। इसी प्रकार अनावश्यक और बिना परिश्रम का कमाया हुआ अथवा निष्ठुरता की मानसिकता से विलासिता, जैसे दुष्प्रयोजनों में उड़ाया गया धन, हर हालत में अनर्थ ही उत्पन्न करेगा। इसके दुष्परिणाम ही सामने आयेंगे। खुले तेजाब को, जलती आग को कोई कपड़ों में लपेट कर नहीं रखता। इसी प्रकार उत्पादन में लगी हुई पूँजी के अतिरिक्त, निजी खर्च के लिए मौज मजे में उड़ाने के लिए कुछ सञ्चय जमा नहीं किया जाना चाहिए, अन्यथा उससे मात्र गलत परम्पराएँ ही जन्म लेंगी। अमीरों की सन्तानें, आमतौर से आरामतलब, निकम्मी और दुर्गुणी ही देखी गयी हैं। जो कुछ परिश्रमपूर्वक ईमानदारी से नहीं कमाया गया है, जिसे उपयोगी प्रयोजन में लगाने से रोककर अनियन्त्रित संकीर्ण स्वार्थपरता के लिए जमा कर रखा गया है, उसकी अवाञ्छनीय प्रतिक्रिया न केवल सञ्चयकर्ता को, वरन् उससे किसी भी रूप में प्रभावित होने वाले को भी पतनोन्मुख प्रवृत्तियों में धकेले बिना न रहेंगी।

🔵 दुरुपयोग की तरह निष्क्रियता-निरुत्साह भी अनिष्टकारक है। आलसी-प्रमादी ही आमतौर से दरिद्र पाये जाते हैं। उत्साह का अभाव ही उन्हें शिक्षा से वंचित रखता है। सभ्यता के अनुशासन को अभ्यास में न उतार पाने के कारण ही लोग अनगढ़ और पिछड़ी स्थिति में पड़े रहते हैं। यदि उनके इन दोष दुर्गुणों को हटाया घटाया जा सके, तो इतने भर से निजी प्रतिभा में नया उभार आ सकता है और उस दरिद्रता से छुटकारा मिल सकता है, जिसके कारण कि आए दिन अभावों, असन्तोषों और अपमानों का दबाव सहना पड़ता है।  
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 सामाजिक क्रान्ति (भाग 2)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 भगवान् का अवतार जहाँ कहीं भी होता है, वहाँ ये मान्यता निश्चित रूप से रहती है कि भगवान् के अवतार जितने भी हुए हैं, अधर्म का विनाश और धर्म की स्थापना करने के लिये, हमारे भीतर भगवान् की प्रेरणा आये तो दोनों ही क्रियाकलाप हमको समान रूप से अपनाने पड़ेंगे। श्रेष्ठ आचरण अपने में और दूसरों में स्थापित करना, साथ ही साथ में अवांछनीयता और अनैतिकताएँ अपने भीतर अथवा अपने आस-पास के वातावरण में अगर हमको दिखाई पड़ती हैं तो उनसे संघर्ष करने के लिये डट जाना चाहिये। अनीति के सामने हम सिर न झुकायें। जहाँ कहीं भी अनाचार हमको दिखाई पड़ता हो उससे लोहा लेने के लिये अपनी परिस्थिति के अनुसार असहयोग, विरोध अथवा जो भी सम्भव हो, उसे करने के लिये साहस एकत्रित करें। समाज की सुव्यवस्था इसी प्रकार से सम्भव है।

🔵 डरपोक आदमी, कायर आदमी और मुसीबत से डरने वाले आदमी, पाप से भयभीत होने वाले आदमी, गुंडागर्दी से अपना मुँह छिपाने वाले आदमी कभी उन बुराइयों को दूर न कर सकेंगे और समाज में जहाँ सुव्यवस्था की आवश्यकता है और जहाँ अनीति के निराकरण की आवश्यकता है, वो पूरी न हो सकेगी। सामाजिक क्रान्ति के लिये हमको ऐसा शौर्य और साहस जन-मानस में जगाने की आवश्यकता है, भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिये।

🔴 मनुष्य जाति सामूहिक आत्महत्या के लिये बढ़ती सी मालूम पड़ती है, उसको रोकने के लिये हमको धर्मतंत्र को पुनर्जीवंत करना चाहिए। बड़ा काम बड़े साधनों से ही होता है और बड़े साधन केवल बड़े व्यक्तित्व ही जुटा सकने में सम्भव होते हैं। यही हमारा लक्ष्य है, जिसके अनुरूप हम चाहते हैं, हर व्यक्ति के अन्दर महानता जागृत हो। हर व्यक्ति अपनी वैयक्तिक सुख-सुविधाओं की अपेक्षा सामाजिक जीवन के लिये कुछ अधिक त्याग-बलिदान करने की हिम्मत जुटाये। पुनर्गठन से हमारा यही मतलब है कि हम नया व्यक्ति बनायें, नया समाज बनायें, नया युग लायें। इसके लिये आवश्यकता है कि हम सब व्यक्ति निर्माण करने के कार्य पे जुट जायें और व्यक्ति को श्रेष्ठ-समुन्नत बनाने के लिये भरसक प्रयत्न करें।

🌹 आज की बात समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 102)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 6. संगठन-कर्त्ता की आवश्यकता:-- अच्छा यही हो कि क्षेत्रीय प्रचार के लिए कम से कम एक वैतनिक या अवैतनिक पूरे समय का कार्यकर्त्ता नियत हो। वह अपना पूरा समय उसी कार्य के लिए लगाता रहे। अपने साथ एक-दो सक्रिय प्रभावशाली सदस्यों को लेकर वह जन-सम्पर्क के लिए प्रयत्न करता रहे। लोगों को इकट्ठा करने, समझाने तथा प्रभावित करने का गुण कार्यकर्त्ता में अवश्य होना चाहिए। संकोची, दब्बू प्रकृति के या आलसी व्यक्ति इस कार्य को ठीक तरह नहीं कर सकते। इसलिए संगठनकर्त्ता नियत करते समय यह बातें देख लेनी चाहिए।

🔵 क्षेत्रीय शाखा का एक कार्यालय नियत होना चाहिए। यथा-सम्भव उसे प्रधान या मन्त्री के निकट होना चाहिए। किसी उदार व्यक्ति का कमरा इस कार्य के लिए प्राप्त करना चाहिए। उसमें दफ्तर तथा सदस्यों के विचार विनिमय कर सकने जैसी गुंजाइश होनी चाहिए। जहां संगठनकर्ता की नियुक्ति सम्भव न हो, वहां क्षेत्रीय संगठन के सदस्य गण स्वयं ही थोड़ा-थोड़ा समय देकर वह कार्य करते रहें। कोई भी उपाय क्यों न हो, इस कार्य में समय की नितान्त आवश्यकता है, सो लगाने के लिए किसी न किसी प्रकार व्यवस्था बननी ही चाहिए।

🔴 7. दोनों कार्यक्रम एक दूसरे से पूरक:-- युग-निर्माण केन्द्रों और इन जातीय संगठनों में कोई प्रतिद्वन्द्विता या भिन्नता नहीं होनी चाहिये। वस्तुतः दोनों को एक ही समझना चाहिए। यह भिन्नता केवल विवाह शादियों की सुविधा की दृष्टि से की गई है। सो हर जगह इन जातीय संगठनों को अपना सम्मिलित स्वरूप युग-निर्माण शाखाओं के रूप में भी रखना चाहिए। एक व्यक्ति उन दो संगठनों का सदस्य आसानी से रह सकता है, जो परस्पर एक दूसरे के पूरक हैं। इस प्रकार युग-निर्माण योजना के सदस्यों को दो उत्तरदायित्व वहन करने पड़ेंगे। एक सभी जाति, धर्मों का सम्मिलित युग-निर्माण आन्दोलन चलाने का—दूसरा समाज सुधार के लिये अपने व्यक्तिगत प्रभाव-क्षेत्र में जाति की ओर ध्यान देने का। इनमें परस्पर कोई भिन्नता या झंझट नहीं। वरन् एक दूसरे के पूरक हैं। रोटी खाना और पानी पीना देखने में दो अलग प्रकार के काम हैं, उनका दृश्य स्वरूप भी भिन्न प्रकार का है, पर वस्तुतः वे दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, इसलिए किसी रोटी खाने वाले को पानी पीना कोई अलग काम या भिन्न प्रकार का झंझट मालूम नहीं पड़ता। इसी प्रकार युग-निर्माण आन्दोलन और जातीय-संगठनों में बाहर से देखने का ही अन्तर है, वस्तुतः युग-निर्माण की सामाजिक क्रान्ति योजना का एक पहलू या मोर्चा भर जातीय संगठन है।

🔵 अस्तु हर जगह इस प्रकार का खांचा मिलाया जाना चाहिए कि दोनों कार्य एक ही साथ चलते रहें। प्रत्येक कार्यकर्त्ता दोनों कार्य करता रहे। यह दोनों आपस में टकराते नहीं। दुहरा झंझट तभी तक मालूम पड़ेगा, जब तक उसे व्यवहार में न लाया जाय। जो उसे कार्यान्वित करेंगे, वे देखेंगे कि युग-निर्माण योजना की शत-सूत्री योजना का जातीय संगठन भी एक अंग मात्र है। जिस प्रकार प्रौढ़ पाठशाला, पुस्तकालय, वृक्षारोपण, हवन आदि में एक ही व्यक्ति कई प्रवृत्तियों में एक साथ भाग लेता रहा सकता है, उसी प्रकार यह दोनों कार्यक्रम एक साथ चलाये जा सकने में पूर्णतया सरल एवं शक्य हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 49)

🌹 भावी रूपरेखा का स्पष्टीकरण

🔴 नन्दन वन के प्रवास का अगला दिन और भी विस्मयकारी था। पूर्व रात्रि में गुरुदेव के साथ ऋषिगणों के साक्षात्कार के दृश्य फिल्म की तरह आँखों के समक्ष घूम रहे थे। पुनः गुरुदेव की प्रतीक्षा थी, भावी निर्देशों के लिए। धूप जैसे ही नन्दन-वन के मखमली कालीन पर फैलने लगी, ऐसा लगा जैसे स्वर्ग धरती पर उतर आया हो। भाँति-भाँति के रंगीन फूल ठसाठस भरे थे और चौरस पठार पर बिखरे हुए थे। दूर से देखने पर लगता था कि मानों गली चा बिछा हो।

🔵 सहसा गुरुदेव का स्थूल शरीर रूप में आगमन हुआ उन्होंने आवश्यकतानुसार पूर्व रात्रि के प्रतिकूल अब वैसा ही स्थूल शरीर बना लिया था जैसा कि प्रथम बार प्रकाश पुंज के रूप में पूजा घर में अवतरित होकर हमें दर्शन दिया था।

🔴 वार्तालाप को आरम्भ करते हुए उन्होंने कहा-‘‘हमें तुम्हारे पिछले सभी जन्मों की श्रद्धा और साहसिकता का पता था। अब की बार यहाँ बुलाकर तीन परीक्षाएँ ली और जाँचा कि बड़े कामों का वजन उठाने लायक मनोभूमि तुम्हारी बनी या नहीं। हम इस पूरी यात्रा में तुम्हारे साथ रहे और घटनाक्रम तथा उनके साथ उठती प्रतिक्रिया को देखते रहे तो और भी अधिक निश्चिंतता हो गई। यदि स्थिति सुदृढ़ और विश्वस्त न रही होती, तो इस क्षेत्र के निवासी सूक्ष्म शरीरधारी ऋषिगण तुम्हारे समक्ष प्रकट न होते और मन की व्यथा न कहते’’ उनके कथन का प्रयोजन यही था कि काम छूटा हुआ है, उसे पूरा किया जाए। समर्थ देखकर ही उनने अपने मनोभाव प्रकट किए, अन्यथा दीन, दुर्बल, असमर्थों के सामने इतने बड़े लोग अपना मन खोलते ही कहाँ हैं?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 50)

🌞  हिमालय में प्रवेश 

🔵 झींगुर ने बड़ा मधुर गान गाया। उसका गीत मनुष्य की भाषा में न था पर भाव वैसे ही मौजूद जैसे मनुष्य सोचता है। उसने गाया ‘‘हम असीम क्यों न बनें? असीमता का आनन्द क्यों न लें? सीमा ही बन्धन है, असीमता में मुक्ति का तत्व भरा है। जिसका इन्द्रियों में ही सुख सीमित है, जो कुछ चीजें और कुछ व्यक्तियों को ही अपना मानता है, जिसका स्वार्थ थोड़ी सी कामनाओं तक ही सीमित है, वह बेचारा क्षुद्र प्राणी, इस असीम परमात्मा के असीम विश्व में भरे हुए असीम आनन्द का भला कैसे अनुभव कर सकेगा? जीव तू असीम हो, आत्मा का असीम विस्तार कर, सर्वत्र आनन्द ही आनन्द बिखरा पड़ा है। उसे अनुभव कर और अमर हो जा।’’

🔴 इकतारे पर जैसे वीतराग ज्ञानियों की मण्डली मिल-जुल कर कोई निर्वाण पद गा रही हो वैसे ही यह झींगुर अपना गान निर्विघ्न होकर गा रहे थे। किसी को सुनाने के लिए नहीं। स्वान्तः सुखाय ही उनका यह प्रयास चल रहा था। मैं भी उसी में विभोर हो गया। वर्षा के कारण क्षतिग्रस्त कुटिया से उत्पन्न असुविधा विस्मरण हो गई। सुनसान में शान्ति शील गाने वाले सहचरों ने उदासीनता को हटा कर उल्लास का वातावरण उत्पन्न कर दिया।

🔵  पुरानी आदतें छूटने लगीं। मनुष्यों तक सीमित आत्मीयता ने बढ़ कर प्राणिमात्र तक विस्तृत होने का प्रयत्न किया तो अपनी दुनिया बहुत चौड़ी हो गई। मनुष्य के सहवास में सुख की अनुभूति ने बढ़कर अन्य प्राणियों के साथ भी वैसी ही सुखानुभूति करने की प्रक्रिया सीख ली। अब इस निर्जन वन में भी कहीं सूनापन दिखाई नहीं देता।

🔴 आज कुटिया से बाहर निकल कर इधर-उधर भ्रमण करने लगा तो चारों ओर सहचर दिखाई देने लगे। विशाल वृक्ष पिता और पितामह जैसे दीखने लगे। कषाय वत्कल धारी भोज-पत्र के पेड़ ऐसे लगते थे मानों गेरुआ कपड़े पहने कोई तपस्वी महात्मा खड़े होकर तप कर रहे हों। देवदारु और चीड़ के लम्बे-लम्बे पेड़ प्रहरी की तरह सावधान खड़े थे मानों मनुष्य जाति में प्रचलित दुर्बुद्धि को अपने समाज में न आने देने के लिए कटिबद्ध रहने का व्रत उनने लिया हुआ हो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 Feb 2017


👉 गुरु चिन्तन से मिली कारागार से मुक्ति

🔴  यह घटना तुलसीपुर पुरानी बाजार जिला बलरामपुर उ.प्र. की है। श्री घनश्याम वर्मा दो भाई थे। बड़े भाई सीताराम जी थे, जिनके बच्चे नहीं थे। घनश्याम वर्मा जी के चार बच्चे सन्तोष, अशोक, रवि टिंकू एवं एक बच्ची थी। सीताराम जी के बच्चे न होने के कारण सम्पत्ति को लेकर भारी विवाद था। परिवार के अलावा अन्य लोग भी उनकी सम्पत्ति को हड़पना चाहते थे। दोनों परिवार में बँटवारा था। अलग बनाते खाते थे। मेरा इस परिवार से परिचय कुछ ही दिन पूर्व हुआ था। वर्मा जी के यहाँ बच्चे का जन्म दिवस संस्कार था। यज्ञ के माध्यम से संस्कार सम्पन्न हुआ। संस्कार के माध्यम से मैंने गुरुदेव एवं मिशन की जानकारी दी। उस समय मथुरा से एक ग्रन्थ प्रकाशित हुआ था ‘‘ऋषि चिन्तन के सान्निध्य में’’। इस ग्रन्थ की स्थापना घर- घर में कराई जा रही थी। मैंने इस ग्रन्थ का एक पृष्ठ पढ़कर सुनाया, जिससे प्रभावित होकर उन्होंने भी अपने घर में ग्रन्थ को स्थापित किया। इसके बाद नियमित उपासना एवं ‘‘ऋषि चिन्तन के सान्निध्य में’’ ग्रन्थ का नियमित स्वाध्याय का क्रम चल पड़ा।

🔵 घटना 2003- 04  की है। सीताराम जी किसी कार्यवश बाहर गए हुए थे। जाने का प्रयोजन किसी को मालूम नहीं था। वे कब जाते, कब आते इस विषय में भाई के परिवार में किसी को कुछ मालूम नहीं रहता था; क्योंकि दोनों परिवार के निकास द्वार अलग- अलग दिशा में थे। एक दिन पड़ोस के एक व्यक्ति ने घनश्याम जी से सीताराम जी के बारे में पूछा कि कहाँ है, तो घनश्याम जी ने अनभिज्ञता जताई। पड़ोस के व्यक्ति ने कहा कि कई दिन से दिखाई नहीं पड़ रहे हैं और घर में ताला भी नहीं लगा है। लोगों ने घर के आस- पास जाकर देखा घर से अजीब- सी दुर्गन्ध आ रही थी। उन्होंने घनश्याम वर्मा के घर में यह बात बताई। घनश्याम वर्मा जी का बड़ा लड़का अन्य कुछ व्यक्तियों को साथ लेकर घर में घुसा। घर में सभी जगह देखा- कुछ नहीं मिला, जिससे दुर्गन्ध का कारण मालूम हो सके। काफी देर बाद देखा कि बाथरूम के दरवाजे में ताला लगा था। ताला तोड़ कर देखा तो सीताराम जी की लाश पड़ी थी। कई दिनों से पड़े रहने के कारण लाश से दुर्गन्ध आ रही थी। तुरन्त पुलिस स्टेशन को सूचित किया। यह घटना हवा की तरह चारों तरफ फैल चुकी थी। काफी भीड़ इकट्ठी हो गयी थी। पुलिस आई। सभी लोगों के सामने लाश को बाहर निकाला गया। लाश को पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। पुलिस छानबीन करने लगी।

🔴 घटना के दो तीन दिन बाद पुलिस आई और घनश्याम वर्मा जी के दो पुत्र सन्तोष और अशोक को पकड़ ले गई। उनके दोनों बच्चे एक एम.एससी. दूसरा बी.एससी कर रहा था। साथ ही वे सिविल परीक्षा की तैयारी भी कर रहे थे। काफी छान- बीन हुई। जाँच के परिणाम स्वरूप अदालत ने दोनों बच्चों को दोषी मानकर गोण्डा भेजा। उसके पश्चात् आदर्श कारागार लखनऊ भेज दिया गया। इतनी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद दोनों बच्चों की श्रद्धा कम नहीं हुई, बल्कि उस समय को वे स्वाध्याय एवं जप में लगाते। लेख भी लिखते और हमेशा प्रसन्न रहते। इस घटना को ईश्वरीय इच्छा और परीक्षा की घड़ी भर मानकर चलते रहे। कहते हैं कि जो सच्चा आध्यात्मिक होता है वह सुख दुःख से परे होता है। उसका दुःख तपस्या के समान होता है। ऐसा ही कुछ इन बच्चों के साथ हो रहा था।  
  
🔵 एक दिन जेलर राउण्ड लगा रहे थे। सभी जगह चेक करने के बाद वे सन्तोष के कमरे में पहुँचे तो देखा एक युवक बहुत शान्त भाव में बैठा कुछ अध्ययन कर रहा है। जेलर मन ही मन सोचने लगे कि जेल में कैदी हमेशा परेशान, उद्विग्न और चिंतित रहते हैं। कुछ तो ऐसे विकराल होते हैं कि उनका जीवन कभी सुधरता नहीं है। सामान्य कैदियों को भी वे अपने जैसा बना लेते हैं। उन्होंने अपने चिन्तन को विराम दिया और अनायास ही सन्तोष के पास पहुँच गए। जेलर ने पूछा- क्या हाल है? बच्चे ने सहज भाव से उत्तर दिया सब कुछ गुरुदेव की कृपा से ठीक है। उनकी कृपा से स्वाध्याय एवं ध्यान का अच्छा अवसर मिला है, वही कर रहा हूँ। बच्चे के विश्वास भरे शब्दों को सुनकर जेलर दंग रह गए। सोचा लोग अपनी परेशानी बताते हैं, मैं उनकी परेशानी दूर करता हूँ। इसे तो कोई परेशानी ही नहीं है। वे सोच में पड़ गए। उत्सुकता बढ़ी। उन्होंने पूछा कि कौन हैं तुम्हारे गुरुदेव? और यह स्वाध्याय और ध्यान कैसा? उस बच्चे ने ‘ऋषि चिन्तन के सान्निध्य में’ पुस्तक का हवाला दिया और पुस्तक का एक पृष्ठ पढ़कर सुनाया- किसी परिस्थिति में विचलित न हों (पृष्ठ सं. ६७)। सुनकर जेलर बहुत प्रभावित हुए और उस पुस्तक के लिए अनुरोध किया कि कुछ दिन के लिए मुझे दे दो। बच्चे ने कहा कि यह पुस्तक मेरे गुरुजी ने दी है, इसे नहीं दे सकता। परन्तु जब मेरे पिताजी मुझसे मिलने आएँगे तो दूसरी पुस्तक आपके लिए मँगवा दूँगा। इस घटना से जेलर को उन बच्चों से आत्मिक लगाव हो गया।

🔴 जेलर प्रतिदिन दोनों बच्चों से मिलने आते। हाल−चाल पूछते और गुरुदेव के चिन्तन को सुनकर जाते, जो उस दिन का चिन्तन होता। अन्ततः परिणाम यह हुआ कि जेलर ने स्वयं सिफारिश कर बच्चों को जेल से रिहा करवा दिया। जेलर बच्चों के गुणों से परिचित हो चुके थे उन्हें विश्वास हो चुका था कि ये बच्चे निर्दोष हैं। बच्चों ने जेलर को गुरुदेव का वह अनुपम ग्रन्थ भेंट किया। जेलर ने भी गुरुदेव के साहित्य से प्रभावित होकर गुरुसत्ता से जुड़ने का सुयोग प्राप्त किया। इस प्रकार घनश्याम जी के दोनों बच्चे गुरुकृपा से अपने जीवन को संस्कारित करने के साथ औरों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन गए। गुरुकृपा की शक्ति की पहचान बहुत ही सहज ढंग से उनने कई लोगों को करा दी।
  
🌹 चन्द्रमणि शुक्ला दे.सं.वि.वि., हरिद्वार (उत्तराखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से

👉 संकल्प तोड़ना ठीक बात नहीं

 🔴 कांग्रेस के इतिहास में शोलापुर कांड लगभग जलियाँ वाला कांड जैसा ही था। वहाँ मार्शल ला लगा दिया गया था। देश भर से वालंटियर वहाँ जाते थे और गोलियां की बौछार द्वारा चने की तरह भून दिये जाते थे।

🔵 लालबहादुर शास्त्री ने भी अपना नाम वालंटियरों में भेज दिया। यह खबर टंडन जी को लगी तो उन्हें शास्त्रीजी के जीवनरक्षा की चिंता हुई। उन्होंने शास्त्रीजी की माता जी को खबर भेजी किसी तरह शास्त्रीजी को वहाँ जाने से तुम्हीं रोको वह और किसी की बात मानने वाले नहीं।''

🔴 भारतीय माताओं का वात्सल्य और मोह अन्यतम कहा जा सक्ता है। विशेषकर ऐसी स्थिति में जबकि जीवन-मरण की समस्या प्रस्तुत हुई हो उनका मोह उग्र होना स्वाभाविक ही कहा जा सकता है, वे हर संभव प्रयास करती हैं कि बच्चा रूक जाए, अमुक कार्य न करे, जिससे कोई हानि हो या जीवन को खतरा उत्पत्र हो।

🔵 शास्त्री जी की माता जी ग्रामीण जीवन में पली थीं। यह आशा थी कि वे इस समाचार से व्याकुल हो उठेंगी और शास्त्रीजी को शोलापुर न जाने देंगी।

🔴 पर हुआ कुछ दूसरा ही। जैसे ही उनके पास यह खबर पहुँची, वह रोष में भरकर बोलीं- मेरे बच्चे ने जो संकल्प लिया है उसे पूरा करना ही चाहिए। मैं उसे रोक नहीं सकती। बच्चे का शहीद होना सौभाग्य मानूँगी, पर उसे कर्तव्य से गिरते सहन नहीं कर सकती। प्रतिज्ञाऐं किन्हीं महत्वपूर्ण कार्यों की पूर्ति के लिये की जाती हैं, उन्हें निभाना मनुष्य का परम धर्म है। जो उसकी अवहेलना करता है उसकी आत्मा कमजार होती है। मेरा बच्चा कमजोर आत्मा वाला कायर और कर्तव्यद्युत कहलाए, यह हमारी शान के प्रतिकूल है। मैं उसे सहर्ष शोलापुर जाने की आज्ञा देती हूँ।

🔵 धर्म और आदर्शों की रक्षा ऐसी ही माताओं से होती है, जो बेटे के स्थूल शरीर की अपेक्षा उसके गुणों से मुहब्बत रखती हैं, जिन्हें चाम प्यारा नहीं होता, आत्माभिमान प्यारा होता है। माता जी की इस दृढ मनस्विता को ही श्रेय दिया जा सकता है, जो सामान्य परिस्थितियों से बढकर शास्त्री जी भारतीय इतिहास आकाश में उज्ज्वल नक्षत्र की तरह चमके। कर्तव्यपालन की अडिगता धैर्य, निर्भीकता और संकल्प-ज्ञयता के भाव उनकी माता जी के ही देन थे।

🔴 यह आदर्श हर भारतीय माता का आदर्श होना चाहिए। बच्चों के आत्म-विकास में चरित्र और गुणों का स्थान सर्वोपरि है, यदि बच्चे को ऐसी किसी कसौटी से गुजरना पडे़ तो माताओं को उनके गुण-गौरव को ही प्रोत्साहन देना चाहिए, भले ही भौतिक दृष्टि से हानि ही क्यों न हो?

🔵 शास्त्रीजी रोक दिये गये होते तो उनकी आत्मा आत्महीनता और प्रायश्चित के बोझ से दब गई होती। दबी हुई आत्माएँ तो सच्ची और न्याय की बात भी स्पष्ट नहीं कह पाती देश और समाज को राह दिखाना उन बेचारों के बूते कहाँ? जो प्रतिज्ञाएँ करते है और मरकर भी उन्हें पूरा करने का प्रयत्न करते है, एसे दृढ स्वभाव के व्यक्ति आगे चलकर कुछ बडे काम कर पाते है।

🔴 शास्त्रीजी शोलापुर गये। उन्होंने मृत्यु की परवाह नहीं की। जेल चले गए यातनाएँ सहीं, पर उन्होंने की हुई प्रतिज्ञाओं से कभी पीछे कदम न हटाया। कर्तव्यपालन की इस दृढता ने एक छोटे-से आदमी को बडा बना दिया। साधारण ग्रामीण को अंतराष्ट्रीय ख्याति का प्रधानमंत्री बना दिया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 23, 24

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 35) 12 Feb

🌹 साप्ताहिक और अर्द्ध वार्षिक साधनाएँ  

🔴 साप्ताहिक विशेष साधना में चार विशेष नियम विधान अपनाने पड़ते हैं। ये हैं- १ उपवास, (२) ब्रह्मचर्य, (३) मौन तथा (४) प्राण संचय। इनमें से कुछ ऐसे हैं जिनके लिये मात्र संयम ही अपनाना पड़ता है। दो के लिये कुछ कृत्य विशेष करने पड़ते हैं। जिह्वा और जननेन्द्रिय, यही दो दसों इन्द्रियों में प्रबल हैं। इन्हें साधने से इन्द्रियसंयम सध जाता है। यह प्रथम चरण पूरा हुआ तो समझना चाहिये कि अगले मनोनिग्रह में कुछ विशेष कठिनाई न रह जायेगी। 

🔵 जिह्वा का असंयम अतिमात्रा में अभक्ष्य भक्षण के लिये उकसाती है। कटु, असत्य, अनर्गल और असत् भाषण भी उसी के द्वारा बन पड़ता है। इसलिये एक ही जिह्वा को रसना और वाणी इन दो इन्द्रियों के नाम से जाना जाता है। जिह्वा की साधना के लिये अस्वाद का व्रत लेना पड़ता है। नमक, मसाले, शक्कर, खटाई आदि के स्वाद जिह्वा को चटोरा बनाते हैं। सात्विक और सुपाच्य पदार्थों की उपेक्षा करते हैं। तले, भुने, तेज मसालों वाले, मीठे पदार्थों में जो चित्र-विचित्र स्वाद मिलते हैं, उनके लिये जीभ ललचाती रहती है।
                      
🔴 इस आधार पर अभक्ष्य ही रुचिकर लगता है। ललक में अधिक मात्रा उदरस्थ कर ली जाती है, फलत: पेट खराब रहने लगता है। सड़न से रक्त विषैला होता है और दूषित रक्त अनेकानेक बीमारियों का निमित्त कारण बनता है। इस प्रकार जिह्वा की विकृतियाँ जहाँ सुनने वालों को पतन के विक्षोभ के गर्त में धकेलती हैं, वहाँ अपनी स्वस्थ्यता पर भी कुठाराघात करती हैं। इन दोनों विपत्तियों से बचाने में जिह्वा का संयम एक तप साधना का प्रयोजन पूरा करता है। नित्य न बन पड़े तो सप्ताह में एक दिन तो जिह्वा को विश्राम देना ही चाहिये, ताकि वह अपने उपरोक्त दुर्गुणों से उबरने का प्रयत्न कर सके।     

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सफलता के मणिमुक्तक पाएँ, तो कैसे?

🔵 सफलता पानी है तो उसके लिए प्रबल संकल्प शक्ति तथा सतत् अध्यवसाय एक अनिवार्य शर्त है। स्वतः हम हर कार्य में सफल होते चले जाएँगे, कोई दैवी अनुकम्पा किसी के आशीर्वाद से, कुछ तन्त्र-मन्त्र-कर्मकाण्डादि से हम पर  बरसती चली जाएगी, यह आशा करना तो शेखचिल्ली का सपना भर है। सफलता के मणिमुक्तक यूँ ही धूल में बिखरे हुए नहीं पड़े हैं। उन्हें पाने के लिए गहरे में उतरने की हिम्मत इकट्टी करनी होगी, कठोर परिश्रम करने व करते रहने की शपथ लेनी होगी। कठोर, दमतोड़ और टपकते स्वेद कणों वाला परिश्रम ही जीवन का सबसे श्रेष्ठ उपहार है। इसी के फलस्वरूप लौकिक जीवन की समस्त सफलताओं-विभूतियों को पाया जा सकता है।

🔴 सुअवसर की प्रतीक्षा में बैठे रहना, कुछ न कर काहिली में उपलब्ध समय रूपी सम्पदा को गँवा बैठना तो मानव जीवन की सबसे बड़ी मूर्खता है। उद्यम के लिए हर घड़ी हरपल एक शुभ मुहूर्त है, सुअवसर है। सस्ती सफलता-शीघ्र सिद्धि प्राप्त करने की ललक के फेर में पड़े रहने से वस्तुतः कुछ भी लाभ नहीं। कुण्डली, फलित ज्योतिष-सर्वार्थ सिद्धि योग आदि में समयक्षेप अवसर चूक जाने के बाद काफी फछतावा देता है। चिरस्थायी प्रगति के लिए राजमार्ग पर अनवरत परिश्रम और अपराजेय साहस को साथ लेकर चलना होगा।

🔵 पगडण्डियाँ या ‘‘शार्टकट’’ ढूँढ़ना बेकार है। वे भटका सकती हैं। जिनने भी कुछ सफलता पायी है, जिसे इतिहास में लिखा गया, उन्हें गहराई तक खोदने व उतरने के लिए कटिबद्ध होना पड़ा है। विजय श्री का वरण करने के लिए कमर कसना, आस्तीन चढ़ाना और खोदने की प्रक्रिया आरम्भ कर देना आवश्यक है, पर ध्यान यह भी रखा जाना चाहिए कि अनावश्यक उतावली से कहीं कुदाली से पैर ही न कट जायँ।

🔴 परिस्थितियाँ, साधन एवं क्षमता का समन्वय करके आगे बढ़ना ही समझदारी है। यही सफलता के लिए अपनायी गयी सही रीति-नीति है, किन्तु यह तथ्य गाँठ बाँध लिया जाना चाहिए कि सफलता केवल समझदारी पर ही तो निर्भर नहीं है, उसका मूल्य माथे से टपकने वाले श्रम-सीकरों से ही चुकाना पड़ता है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 12

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 15)

🌹 विचारों का महत्व और प्रभुत्व

🔴 शुभ हो या अशुभ, मनुष्य के हर विचार का एक निश्चित मूल्य तथा प्रभाव होता है। यह बात रसायन-शास्त्र के नियमों की तरह प्रामाणिक है। सफलता-असफलता सम्पर्क में आने वाले दूसरे लोगों से मिलने वाले सुख-दुःख का आधार विचार ही माने गये हैं। विचारों को जिस दिशा में उन्मुख किया जाता है उस दिशा में तदनुकूल तत्व आकर्षित होकर मानव मस्तिष्क में एकत्रित हो जाते हैं। सारी सृष्टि में एक सर्वव्यापी जीवन-तरंग आन्दोलित हो रही है। प्रत्येक मनुष्य के विचार उस तरंग में सब ओर प्रवाहित होते रहते हैं, जो उस तरंग के समान ही सदाजीवी होते हैं। वह एक तरंग ही समस्त प्राणियों के बीच से होती हुई बहती है। जिस मनुष्य की विचार-धारा जिस प्रकार की होती है, जीवन-तरंग में मिले जैसे विचार उसके साथ उसके मानस में निवास बना लेते हैं। मनुष्य का दूषित अथवा निर्दोष विचार सर्वव्यापी जीवन तरंग से अपने अनुरूप अन्य विचारों को आकर्षित कर उन्हें अपने साथ बसा लेगा और इस प्रकार अपनी जाति की वृद्धि कर लेगा।

🔵 मनुष्य का समस्त जीवन उसके विचारों के सांचे में ही ढलता है। सारा जीवन आन्तरिक विचारों के अनुसार ही प्रकट होता है। कारण के अनुरूप कार्य के नियम के समान ही प्रकृति का यह निश्चित नियम है कि मनुष्य जैसा भीतर होता है, वैसा ही बाहर। मनुष्य के भीतर की उच्च अथवा निम्न स्थिति का बहुत कुछ परिचय उसके बाह्य स्वरूप को देखकर पाया जा सकता है। जिसके शरीर पर अस्त-व्यस्त, फटे-चीथड़े और गन्दगी दिखलाई दे, समझ लीजिये कि यह मलीन विचारों वाला व्यक्ति है, इसके मन में पहले से ही अस्त-व्यस्तता जड़ जमाये बैठी है।

🔴 विचार-सूत्र से ही आन्तरिक और बाह्य-जीवन का सम्बन्ध जुड़ा हुआ है। विचार जितने परिष्कृत, उज्ज्वल और दिव्य होंगे, अन्तर भी उतना ही उज्ज्वल तथा दैवी सम्पदाओं से आलोकित होगा। वही प्रकाश स्थूल कार्यों में प्रकट होगा। जिस कलाकार अथवा साहित्यकार की भावनायें जितनी ही प्रखर और उच्चकोटि की होंगी, उनकी रचना भी उतनी ही उच्च और उत्तम कोटि की होगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 7)

🌹 विचारों का महत्व और प्रभुत्व

🔴 शुभ हो या अशुभ, मनुष्य के हर विचार का एक निश्चित मूल्य तथा प्रभाव होता है। यह बात रसायन-शास्त्र के नियमों की तरह प्रामाणिक है। सफलता-असफलता सम्पर्क में आने वाले दूसरे लोगों से मिलने वाले सुख-दुःख का आधार विचार ही माने गये हैं। विचारों को जिस दिशा में उन्मुख किया जाता है उस दिशा में तदनुकूल तत्व आकर्षित होकर मानव मस्तिष्क में एकत्रित हो जाते हैं। सारी सृष्टि में एक सर्वव्यापी जीवन-तरंग आन्दोलित हो रही है। प्रत्येक मनुष्य के विचार उस तरंग में सब ओर प्रवाहित होते रहते हैं, जो उस तरंग के समान ही सदाजीवी होते हैं। वह एक तरंग ही समस्त प्राणियों के बीच से होती हुई बहती है। जिस मनुष्य की विचार-धारा जिस प्रकार की होती है, जीवन-तरंग में मिले जैसे विचार उसके साथ उसके मानस में निवास बना लेते हैं। मनुष्य का दूषित अथवा निर्दोष विचार सर्वव्यापी जीवन तरंग से अपने अनुरूप अन्य विचारों को आकर्षित कर उन्हें अपने साथ बसा लेगा और इस प्रकार अपनी जाति की वृद्धि कर लेगा।

🔵 मनुष्य का समस्त जीवन उसके विचारों के सांचे में ही ढलता है। सारा जीवन आन्तरिक विचारों के अनुसार ही प्रकट होता है। कारण के अनुरूप कार्य के नियम के समान ही प्रकृति का यह निश्चित नियम है कि मनुष्य जैसा भीतर होता है, वैसा ही बाहर। मनुष्य के भीतर की उच्च अथवा निम्न स्थिति का बहुत कुछ परिचय उसके बाह्य स्वरूप को देखकर पाया जा सकता है। जिसके शरीर पर अस्त-व्यस्त, फटे-चीथड़े और गन्दगी दिखलाई दे, समझ लीजिये कि यह मलीन विचारों वाला व्यक्ति है, इसके मन में पहले से ही अस्त-व्यस्तता जड़ जमाये बैठी है।

🔴 विचार-सूत्र से ही आन्तरिक और बाह्य-जीवन का सम्बन्ध जुड़ा हुआ है। विचार जितने परिष्कृत, उज्ज्वल और दिव्य होंगे, अन्तर भी उतना ही उज्ज्वल तथा दैवी सम्पदाओं से आलोकित होगा। वही प्रकाश स्थूल कार्यों में प्रकट होगा। जिस कलाकार अथवा साहित्यकार की भावनायें जितनी ही प्रखर और उच्चकोटि की होंगी, उनकी रचना भी उतनी ही उच्च और उत्तम कोटि की होगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सामाजिक क्रान्ति (भाग 1)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 धर्मतंत्र का तीसरा कार्य जो करने का है, जिससे कि मनुष्य की अन्तःचेतना विकसित होती हो, वो है ‘सामाजिक क्रान्ति’। समाज की छुट-पुट बुराइयाँ जो सामने दिखाई पड़ती हैं, इनको दूर करने के लिये विरोध और आंदोलन करने की तो जरूरत है ही, लेकिन श्रेष्ठ समाज बनाने के लिये जिन रचनात्मक वस्तुओं को जीवन में धारण करने की जरूरत है, वो उच्चस्तरीय सिद्धान्त हैं, जो व्यक्ति को समाजपरक बनाते हैं। ‘‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’’ की मान्यता जन-जन के अन्तःकरण में जगायी जानी चाहिए। हरेक के मन में ये विश्वास होना चाहिये कि जो हम दूसरों से अपेक्षा करते हैं, वही हमें दूसरों के साथ में व्यवहार करना चाहिए। सामाजिक क्रान्ति के लिये ये सिद्धान्त आवश्यक है कि हर आदमी के मन में गहराई तक प्रवेश कर जाए।

🔵 हममें से हर आदमी के मन में एक विचार उत्पन्न किया जाना चाहिये कि ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ ‘सारा विश्व ही हमारा कुटुम्ब है’। दो-पाँच आदमी नहीं, बल्कि यह सारी वसुधा ही हमारा कुटुम्ब है और जिस तरीके से अपने घर का और बाल-बच्चों का हम ध्यान रखते हैं, उसी तरीके से समस्त विश्व में सुख और शान्ति के लिये ध्यान रखना और प्रयत्न करना आवश्यक है। सामाजिक क्रान्ति के लिये उन आध्यात्मिक सिद्धान्तों को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए, जिसमें कि महत्त्वपूर्ण ऐसे सिद्धान्त बने हुए हैं, जिसमें व्यक्ति अपने व्यक्तिवाद के ऊपर अंकुश करके समाजपरक बनता चला जाये।

🔴 ‘आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाम् नः समाचरेत्’ का सिद्धान्त अगर हम अपने जीवन में धारण कर लें तो हमारे सामाजिक जीवन में श्रेष्ठता का आ जाना स्वाभाविक है। मिल-बाँट कर खाने की वृत्ति अगर हमारे भीतर हो तो जो आज हम सबके पास है, उसी से सबका गुजारा बड़े मजे से हो सकता है। हम उदारता से उपार्जन करें। उपार्जन का उपयोग करना सीखें, उपभोग नहीं।
 
🔵 समता हमारे जीवन का अंग रहनी चाहिए। सर्व समाजों में समता। जिसमें नर-नारी की समता और आर्थिक समता का भी ऊँचा स्थान होना चाहिये। हममें से प्रत्येक व्यक्ति को श्रेष्ठ नागरिक बनना चाहिये और सहकारिता के सिद्धान्तों को अपनाकर पारिवारिक जीवन में और सामाजिक जीवन में हर काम की व्यवस्था बनानी चाहिए। अनीति और अन्याय जहाँ कहीं भी दिखाई पड़े, उससे लड़ने के लिये हमको जटायु जैसा साहस एकत्रित करना चाहिए।   

🌹 आज की बात समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/amart_vachan_jivan_ke_sidha_sutra/samajik_karnti

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 101)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 4. कार्य का आरम्भ:-- यह प्रगतिशील जातीय सभाओं का संगठन-कार्य अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों द्वारा आरम्भ किया जा रहा है। इसलिए प्रेरक सदस्यों की तरह आरंभ में वे ही अपनी-अपनी उपजाति का क्षेत्रीय संगठन बना लें। क्षेत्र की परिधि साधारणतया 50-50 मील चारों ओर होनी चाहिए। सौ मील लम्बे और सौ मील चौड़े क्षेत्र में भी सैकड़ों गांव कस्बे होते हैं, उतने क्षेत्र को ठीक तरह संगठित कर सकना भी कठिन नहीं है। इसलिए आरम्भ में भले ही यह क्षेत्र अधिक विस्तृत हों, पर अन्त में इनका कार्य-क्षेत्र उतना ही बड़ा रहना चाहिए, जितने में कि कार्यकर्त्ता गण आसानी से आपस में मिलते-जुलते रह सकें। इस दृष्टि से सौ-सौ मील की लम्बाई-चौड़ाई का क्षेत्र पर्याप्त है। विशेष परिस्थिति होने पर ही उसे घटाया-बढ़ाया जाय।

🔵 अखण्ड-ज्योति सदस्यों के यह उपजातियों के आधार पर क्षेत्रीय संगठन तुरन्त बन जाने चाहिए। इसके लिए कुछ अधिक सेवा-भावी व्यक्तियों को आगे आना चाहिए और इन सब सदस्यों से मिलकर उन्हें मीटिंग के लिए आमन्त्रित करना चाहिए। सब लोग इकट्ठे होकर अपनी-अपनी सदस्यता को नियमित कर लें। दस व्यक्तियों की कार्य-समिति गठित करलें और प्रधान-मन्त्री तथा कोषाध्यक्ष चुन लें। युग-निर्माण केन्द्रों में पांच व्यक्तियों की कार्य-समिति होती है और एक शाखा संचालक ही पदाधिकारी रहता है, पर इन जातीय संगठनों में उपरोक्त तीन पदाधिकारी और 10 सदस्य रहने चाहिए, क्योंकि इनका कार्य-क्षेत्र बड़ा है।

🔴 5. क्षेत्रीय संगठनों का विस्तार:-- यह प्रारम्भिक गठन हो जाने के बाद इन प्रेरक सदस्यों को अपने-अपने कार्य-क्षेत्र में सदस्य बनाने के लिए छोटी-छोटी मित्र-मण्डलियों के रूप में नये सदस्य भर्ती करने निकल पड़ना चाहिए। जिन गांवों में कम से कम पांच सदस्य भी बन जांय, वहां ग्राम सभाएं बना दी जांय। प्रयत्न यह होना चाहिए कि जहां भी जिस उपजाति के लोग हों, उनकी एक-एक ग्राम-सभा वहां गठित रहे। क्षेत्रीय सभाओं के अन्तर्गत जितनी ग्राम सभाएं होंगी, वह उतनी ही सफल मानी जायेंगी और उनकी गतिविधियां उतनी ही बढ़ सकेंगी। इसलिए क्षेत्रीय संगठनों के कार्यकर्त्ताओं को दौरा करके अपना कार्य-क्षेत्र सुगठित कर लेने के लिए तत्परतापूर्वक लग जाना ही पड़ेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://awgpskj.blogspot.in/2017/02/100-11-feb.html

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 49)

🌹 भावी रूपरेखा का स्पष्टीकरण

🔴 नन्दन वन के प्रवास का अगला दिन और भी विस्मयकारी था। पूर्व रात्रि में गुरुदेव के साथ ऋषिगणों के साक्षात्कार के दृश्य फिल्म की तरह आँखों के समक्ष घूम रहे थे। पुनः गुरुदेव की प्रतीक्षा थी, भावी निर्देशों के लिए। धूप जैसे ही नन्दन-वन के मखमली कालीन पर फैलने लगी, ऐसा लगा जैसे स्वर्ग धरती पर उतर आया हो। भाँति-भाँति के रंगीन फूल ठसाठस भरे थे और चौरस पठार पर बिखरे हुए थे। दूर से देखने पर लगता था कि मानों गली चा बिछा हो।

🔵 सहसा गुरुदेव का स्थूल शरीर रूप में आगमन हुआ उन्होंने आवश्यकतानुसार पूर्व रात्रि के प्रतिकूल अब वैसा ही स्थूल शरीर बना लिया था जैसा कि प्रथम बार प्रकाश पुंज के रूप में पूजा घर में अवतरित होकर हमें दर्शन दिया था

🔴 वार्तालाप को आरम्भ करते हुए उन्होंने कहा-‘‘हमें तुम्हारे पिछले सभी जन्मों की श्रद्धा और साहसिकता का पता था। अब की बार यहाँ बुलाकर तीन परीक्षाएँ ली और जाँचा कि बड़े कामों का वजन उठाने लायक मनोभूमि तुम्हारी बनी या नहीं। हम इस पूरी यात्रा में तुम्हारे साथ रहे और घटनाक्रम तथा उनके साथ उठती प्रतिक्रिया को देखते रहे तो और भी अधिक निश्चिंतता हो गई। यदि स्थिति सुदृढ़ और विश्वस्त न रही होती, तो इस क्षेत्र के निवासी सूक्ष्म शरीरधारी ऋषिगण तुम्हारे समक्ष प्रकट न होते और मन की व्यथा न कहते’’ उनके कथन का प्रयोजन यही था कि काम छूटा हुआ है, उसे पूरा किया जाए। समर्थ देखकर ही उनने अपने मनोभाव प्रकट किए, अन्यथा दीन, दुर्बल, असमर्थों के सामने इतने बड़े लोग अपना मन खोलते ही कहाँ हैं?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/bhavi

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 49)

🌞  हिमालय में प्रवेश (सुनसान की झोंपड़ी)

🔵 मनुष्य की यह एक अद्भुत विशेषता है कि वह जिन परिस्थितियों में रहने लगता है उनका अभ्यस्त भी हो जाता है। जब मैंने इस निर्जन वन की सुनसान कुटियों में प्रवेश किया तो सब ओर सूना ही सूना लगता था। अन्तर का सूनापन जब बाहर निकल पड़ता तो सर्वत्र सुनसान ही दीखता था। पर अब जबकि अन्तर की लघुता धीरे-धीरे विस्तृत होती जा रही है, चारों ओर अपने ही अपने हंसते-बोलते नजर आते हैं। अब सूनापन कहां? अब अन्धेरे में डर किसका?

🔴 अमावस्या की अंधेरी रात, बादल घिरे हुए, छोटी-छोटी बूंदें, ठण्डी वायु का कम्बल को पार कर भीतर घुसने का प्रयत्न। छोटी-सी कुटिया में पत्तों की चटाई पर पड़ा हुआ यह शरीर आज फिर असुखकर अनभ्यस्तता अनुभव करने लगा। नींद आज फिर उचट गई। विचारों का प्रवाह फिर चल पड़ा। स्वजन सहचरों से भरे सुविधाओं से सम्पन्न घर और इस सघनतामिस्र की चादर लपेटे वायु के झोकों से थर-थर कांपती हुई जल से भीग कर टपकती पर्ण कुटी की तुलना होने लगी। दोनों के गुण-दोष गिने जाने लगे।

🔵 शरीर असुविधा अनुभव कर रहा था। मन भी उसी का सहचर ठहरा। वही क्यों इस असुविधा में प्रसन्न होता? दोनों की मिली भगत जो है। आत्मा के विरुद्ध ये दोनों एक हो जाते हैं। मस्तिष्क तो इनका खरीदा हुआ वकील है। जिसमें इनकी रुचि होती है उसी का समर्थन करते रहना इसने अपना व्यवसाय बनाया हुआ है। राजा के दरबारी जिस प्रकार हवा का रुख देखकर बात करने की कला में निपुण होते थे, राजा को प्रसन्न रखने, उसकी हां में हां मिलाने में दक्षता प्राप्त किये रहते थे, वैसा ही यह मस्तिष्क भी है। मन की रुचि देखकर उसी के अनुकूल यह विचार प्रवाह को छोड़ देता है। समर्थन में अगणित कारण हेतु, प्रयोजन और प्रमाण उपस्थित कर देना इसके बायें हाथ का खेल है। सुविधाजनक घर के गुण और इस कष्टकारक निर्जन के दोष बताने में वह बैरिस्टरों के कान काटने लगा। सनसनाती हुई हवा की तरह उसका अभिभाषण भी जोरों से चल रहा था।

🔴 इतने में सिरहाने की ओर छोटे से छेद में बैठे हुए झींगुर ने अपना मधुर संगीत गान आरम्भ कर दिया। एक से प्रोत्साहन पाकर दूसरा बोला। दूसरे की आवाज सुनकर तीसरा, फिर उससे चौथा, इस प्रकार उसी कुटी में अपने-अपने छेदों में बैठे कितने ही झींगुर एक साथ गाने लगे। उनका गायन यों उपेक्षा बुद्धि से तो अनेकों बार सुना था। उसे कर्कश, व्यर्थ और मूर्खतापूर्ण समझा था, पर आज मन के लिए कुछ और काम न था। वह ध्यान पूर्वक इस गायन के उतार, चढ़ावों को परखने लगा। निर्जन की निन्दा करते-करते वह थक भी गया था। इस चंचल बन्दर को हर घड़ी नये-नये प्रकार के काम जो चाहिए। झींगुर की गान-सभा का समा बंधा तो उसी में रस लेने लगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 Feb 2017


👉 घट-घट में बसै गुरु की चेतना

🔴 करीब २२- २३ साल पहले की बात है। तब मैं कॉलेज में पढ़ा करती थी। फरवरी का महीना था। मैं अपनी माँ के साथ ग्राम हर्री,जिला अनूपपुर में अन्नप्राशन संस्कार कराने गई थी। कार्यक्रम शाम का था। लौटने में थोड़ी देर हो गई। शहडोल की आखिरी बस छः बजे थी। हम जल्दी- जल्दी बस स्टैण्ड पहुँचे। लेकिन पता चला कि बस अभी ५ मिनट पहले ही जा चुकी है। यह सुनकर हम माँ बेटी दोनों के प्राण सूख गए। इसके बाद कोई दूसरी बस नहीं थी। माँ को वापस घर जैतहरी जाना था और मुझे शहडोल जाना था, क्योंकि मैं पढ़ाई कर रही थी। दूसरे दिन प्रैक्टिकल था। इसलिए जाना जरूरी था। माँ की बस आधा घंटे बाद थी, लेकिन वह हमें न अकेले छोड़ सकती थी न वापस साथ ले जा सकती थी। बस छूटने के थोड़ी देर बाद एक कार आई। उसे रुकने के लिए हाथ दिया।

🔵 क्योंकि कार में बैठे व्यक्ति बैंक मैनेजर थे जिनसे जान पहचान थी। लेकिन वे रुके नहीं, आगे बढ़ गए। अब कोई साधन नहीं था। थोड़ी ही देर में घर के तरफ की बस आनेवाली थी। चिंता थी कि उसे भी न छोड़ना पड़ जाए। इसलिए हम और परेशान हो रहे थे। कोई उपाय न देखकर हम दोनों मिलकर गुरु देव से प्रार्थना करने लगे कि गुरु देव हमें कोई रास्ता बताइए। इस स्थिति में अब क्या करें? आप ही कोई उपाय कीजिए। जाड़े का समय था। धीरे- धीरे अँधेरा बढ़ता जा रहा था। हम लोगों की परेशानी भी बढ़ती जा रही थी।

🔴 तभी अचानक दूसरी ओर से एक कार हमारे सामने आकर रुकी। हमने देखा ये तो मैनेजर साहब हैं। वे बोले- बेटा क्या बात है? कहाँ जाना है? मुझे लगा तुम लोगों को मेरे सहयोग की जरूरत थी। मैंने ध्यान नहीं दिया। मैं करीब दो किलोमीटर आगे चला गया था। लेकिन मुझे आभास हुआ कि तुम्हें सहयोग की जरूरत हैं इसलिए वापस चला आया। गुरु जी के असीम स्नेह को अनुभव कर हम धन्य हो गए। उसी दिन मैं यह जान पाई कि बच्चों की कितनी चिन्ता रहती है उन्हें। इस सज्जन में हमारे प्रति विशेष सद्भावना जगाकर 2 कि०मी० मी० से वापस बुला लाए।
  
🔵 मैनेजर साहब ने कहा- बेटी कहाँ तक जाओगी? मैंने कहा- चाचाजी मुझे शहडोल जाना है। मेरी बस छूट गई है। आप कहाँ जा रहे हैं? उन्होंने कहा- वैसे तो बुढ़ार तक जाना है, बैठो मैं छोड़ देता हूँ। आगे देखता हूँ। मेरी माँ मुझे कार में बैठाकर निश्चिन्त होकर दूसरी बस से घर के लिए रवाना हो गई। मैं जैसे ही बुढ़ार बस स्टैण्ड के पास पहुँची तो वहीं पर छूटी हुई बस भी खड़ी थी। बस का कण्डक्टर जोर- जोर से चिल्ला रहा था। शहडोल की आखिरी बस है। शहडोल की सवारी बस में आ जाएँ। मैं कार से उतर कर बस में बैठकर सकुशल अपने गंतव्य स्थान तक पहुँच गई। उस दिन की घटना से मेरा रोम- रोम गुरु देव के प्रति कृतज्ञ हो उठा। ऐसा था उनका साथ, संरक्षण, सहयोग जिसे हम शब्दों में नहीं व्यक्त कर सकते।
  
🌹 श्यामा राठौर शांतिकुंज (उत्तराखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 34) 11 Feb

🌹 साप्ताहिक और अर्द्ध वार्षिक साधनाएँ    

🔴 मोटर के पहियों में भरी हवा धीरे-धीरे कम होने लगती है। उसमें थोड़े समय के बाद नई हवा भरनी पड़ती है। रेल में कोयला-पानी चुकता है तो दुबारा भरना पड़ता है। पेट खाली होता है तो नई खुराक लेनी पड़ती है। जीवन का एक सा ढर्रा नीरस बन जाता है, तब उसमें नई स्फूर्ति संचारित करने के लिये नया प्रयास करना पड़ता है। पर्व-त्यौहार इसीलिये बने हैं कि एक नया उत्साह उभरे और उस आधार पर मिली स्फूर्ति से आगे का क्रिया-कलाप अधिक अच्छी तरह चले। रविवार की छुट्टी मनाने के पीछे भी नई ताजगी प्राप्त करना और अगले सप्ताह काम आने के लिये नई शक्ति अर्जित करना है। संस्थाओं के विशेष समारोह भी इसी दृष्टि से किये जाते हैं कि उस परिकर में आई सुस्ती का निराकरण किया जा सके। प्रकृति भी ऐसा ही करती रहती है। घनघोर वर्षा और खिलखिलाती वसन्त ऋतु ऐसी ही नवीनता भर जाती है। विवाह और निजी पुरुषार्थ की कमाई इन दो आरम्भों को भी मनुष्य सदा स्मरण रखता है उनमें उत्साहवर्द्धक नवीनता है।

🔵 जीवन साधना का दैनिक कृत्य बताया जा चुका है। उठते आत्मबोध, सोते तत्त्वबोध। प्रथम पहर भजन, तीसरे पहर मनन, ये चार विधायें नित्यकर्मों में सम्मिलित रहने लगे तो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के चारों आधार बन पड़ते हैं। चार पाये की चारपाई होती है और चार दीवारों की इमारत। चार दिशायें, चार वर्ण, चार आश्रमों , अन्त:करण चतुष्टय प्रसिद्ध हैं। प्रज्ञायोग की दैनिक साधना में उपरोक्त चार आधारों का सन्तुलित समन्वय है। उन सभी में कर्मकाण्ड घटा हुआ है और भाव चिन्तन बढ़ा हुआ। इससे लम्बे कर्मकाण्डों की उलझन में उद्देश्य से भटक जाने की आशंका नहीं रहती । भावना और आकांक्षा सही बनी रहने पर बुद्धि द्वारा निर्धारण सही होते रहते हैं। स्वभाव और कर्म-कौशल का क्रम भी सही चलता रहता है। नित्यकर्म की नियमितता स्वभाव का अंग बनती है और फिर जीवन क्रम उसी ढाँचे में ढलता चला जाता है।                          

🔴 जीवन साधना के दो विशेष पर्व हैं- एक साप्ताहिक दूसरा अर्द्ध वार्षिक। साप्ताहिक व्रत आमतौर से लोग रविवार, गुरुवार को रखते हैं। पर परिस्थितियों के कारण यदि कोई अन्य दिन सुविधाजनक पड़ता है तो उसे भी अपनाया जा सकता है। अर्द्धवार्षिक में आश्विन और चैत्र की दो नवरात्रियाँ आती हैं। इनमें साधना नौ दिन की करनी पड़ती है। इन दो पर्वों की विशेष उपासना को भी अपने निर्धारण में सम्मिलित रखने से बीच में जो अनुत्साह की गिरावट आने लगती है, उसका निराकरण होता रहता है। इनके आधार पर जो विशेष शक्ति उपार्जित होती है, उससे शिथिलता आने का अवसाद निपटता रहता है।     

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आराम नही काम चाहिए

🔴 एशिया के उद्योगशील और समृद्ध देशों में इन दिनों जापान की सर्वत्र चर्चा है। जानना चाहिये कि वही की समृद्धि का मूल कारण दैवी अनुकंपा नहीं वह श्रम और ईमानदारी है, जिसे जापानी नागरिक अपनी विरासत समझते है।

🔵 कुछ समय पूर्व एक अमेरिकन फर्म ने जापान में अपना व्यापार खोला। अमेरिका एक संपत्र देश है, वहाँ थोडे समय काम करके कम परिश्रम में भी लोग क्स्स्फी पैसा कमा लेते है, पर यह स्थिति जापान में कहाँ, वहाँ के लोग मेहनत-कश होते है, परिश्रम को वे शारीरिक संपत्ति मानते है। "जो मेहनत नही करता, वह अस्वस्थ होता है और समाज को विपन्न करता है" यह धारणा प्रत्येक जपानी नागरिक में पाई जाती है।

🔴 फर्म बेचारी को इसका क्या पता था? दूसरे देश में जाकर लोग आमतौर से अपने देश की उदारता ही दिखाने का प्रयास करते हैं। अमेरिका के उद्योगपति ने भी वही किया। उसने कर्मचारी जापानी ही रखने का फैसला किया, साथ ही यह भी निश्चय किया कि अमेरिकन कानून के अनुसार सप्ताह में केवल ५ दिन काम होगा। शनिवार और रविवार की छुट्टी रहेगी।

🔵 साहब बहादुर का विश्वास था कि इस उदारता से जापानियों पर बडा़ असर होगा, वे लोग प्रसन्न होकर दुआएँ देगे। पर एक दिन जब उन्होंने देखा कि फर्म के सभी कर्मचारी विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। अधिक से अधिक सहूलियतें दी गई हैं, फिर भी कर्मचारी विरोध कर रहे हैं, फर्म के मैनेजर एकाएक यह बात समझ नहीं सके।

🔴 यह तो अल्पबुद्धि के लोग होते हैं, जो अधिक आराम पाना सौभाग्य मानते हैं, पर आलस्य और अकर्मण्यता के कारण जो रोग और दारिद्रय छाए रहते हैं, उनकी ओर कदाचित् ध्यान ही नहीं जाता। यह बात समझ ली गई होती, तो आज सैकड़ों भारतवासी भी रोग, अस्वस्थता और कर्ज आदि से बच गए होते।

🔵 यह गुरु मंत्र कोई जापानी भाइयों से सीखे। आखिर विरोध का कारण जानने के लिये मैनेजर साहब ने कर्मचारियों के पास जाकर पूछा- ''आप लोगों को क्या तकलीफ है''।

🔴 तकलीफ! उन लोगों ने उत्तर दिया- 'तकलीफ यह है कि हमें दो छुट्टियाँ नही चाहिए। हमारे लिए एक ही छुट्टी पर्याप्त है।'' ऐसा क्यों ?'' पूछने पर उन्होंने आगे बताया आप जानते होंगे कि अधिक आराम देने से हमारी खुशी बढे़गी तो यह आपका भ्रम हे। अधिक छुट्टियाँ होने से हम आलसी बन जाएँगे। परिश्रम करने में हमारा मन नहीं लगेगा और उसका दुष्प्रभाव हमारे वैयक्तिक और राष्ट्रीय जीवन पर पड़ेगा। हमारा स्वास्थ्य खराब होगा। छुट्टी के कारण इधर उधर घूमने में हमारा अपव्यय बढेगा। जो छुट्टी हमारा स्वास्थ्य गिराए और हमे आर्थिक भार से दबा दे- ऐसी छुट्टी हमारे जीवन में बिलकुल नहीं खपती।

🔵 अमेरिक उद्योगपति उनकी इस दूरदर्शिता और आदर्शवाद पर मुस्कराए बिना न रह सके। उन्हें कहना ही पडा़ जापनी भाइयों! आपकी समृद्धि और शीघ्र सफलता का रहस्य हम आज समझे। सचमुच परिश्रम और पुरुषार्थ ही समृद्धि की कुंजी है। आप लोग कभी निर्धन ओर अस्वस्थ नहीं रह सकते।''

🔴 न जाने यह बात हमारे देश वाले कब तक सीख पाएँगे ?

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 21, 22

👉 बन्दा बैरागी की साधना

🔴 बन्दा वैरागी भी इसी प्रकार समय की पुकार की अवहेलना कर, संघर्ष में न लगकर एकान्त साधना कर रहे थे। उन्हीं दिनों गुरुगोविन्दसिंह की बैरागी से मुलाकात हुई। उन्होंने एकान्त सेवन को आपत्तिकाल में हानिकारक बताते हुए कहा- "बन्धु! जब देश, धर्म, संस्कृति की मर्यादाएँ नष्ट हो रही है और हम गुलामी का जीवन बिता रहे है, आताताइयों के अत्याचार हम पर हो रहे है उस समय यह भजन, पूजन, ध्यान, समाधि आदि किस काम के हैं?"

🔵 गुरुगोविन्दसिंह की युक्तियुक्त वाणी सुनकर बन्दा वैरागी उनके अनुयायी हो गए और गुरु की तरह उसने भी आजीवन देश को स्वतन्त्र कराने, अधर्मियों को नष्ट करने और संस्कृति की रक्षा करने की प्रतिज्ञा की। इसी उद्देश्य के लिए बन्दा वैरागी आजीवन प्रयत्नशील रहे। मुसलमानों द्वारा वैरागी पकड़े गये, उन्हें एक पिंजरें में बन्द किया गया। मौत या धर्म परिवर्तन की शर्त रखी गई, लेकिन वे तिल मात्र भी विचलित नहीं हुए। अन्तत: आतताइयों ने उनके टुकड़े- टुकडे कर दिये। बन्दा अन्त तक मुस्कराते ही रहे। भले ही बन्दा मर गये परन्तु अक्षय यश और कीर्ति के अधिकारी बने।

🌹 प्रज्ञा पुराण भाग 1 पृष्ठ 18

👉 हम अपने भीतर झाँक ना सीखें

🔵 व्यक्ति दूसरों के विषय में अधिकाधिक जानने का प्रयास करे अथवा उनकी भावनाओं से परिचित होना चाहे, उससे पहले अपने विषय में अधिकाधिक जान लेना चाहिए। अपने मन की भाषा को, आकांक्षाओं को-भावनाओं को बहुत स्पष्ट रूप से समझा, सुना और परखा जा सकता है। अपने बारे में जानकर अपनी सेवा करना, आत्म सुधार करना अधिक सरल है, बनिस्बत इसके कि हम औरों को-सारी दुनिया को बदलने का प्रयास करें। जितना हम अपने अन्तःकरण का परिमार्जन और सुधार कर लेंगे, यह संसार हमें उतना ही सुधरा हुआ परिलक्षित होने लगेगा।

🔴 हम दर्पण में अपना मुख देखते हैं एवं चेहरे की मलिनता को प्रयत्नपूर्वक साफ कर उसे सुन्दर बना डालते हैं। मुख उज्ज्वल-साफ और अधिक सुन्दर निकल आता है। मन की प्रसन्नता बढ़ जाती है। अन्तःकरण भी एक मुख है। उसे चेतना के दर्पण में देखने और उसे भली-भाँति परखने से उसकी मलिनताएँ भी दिखाई देने लगती हैं, साथ ही सौन्दर्य भी। कमियों को दूर करना, मलिनता को मिटाना और आत्म निरीक्षण द्वारा पर्त दर पर्त्त गन्दगी को हटाकर आत्मा के अनन्त सौन्दर्य को प्रकट करना ही सच्ची उपासना है। जब सारी मलिनताएँ निकल जाती हैं तो आत्मा का उज्ज्वल, साफ और सुन्दर स्वरूप परिलक्षित होने लगता है। फिर बहिरंग में सभी कुछ अच्छा-सत्, चित् आनन्दमय नजर आने लगता है।

🔵 हमें अपने आपसे प्रश्न करना चाहिए-क्या हमारे विचार गन्दे हैं? कामुकता के चिन्तन में हमारा मन रस लेता है, क्या हमें इन्द्रियजन्य वासनाओं से मोह है, क्या हम उस परमसत्ता के हमारे बीच होते हुए भी भयभीत हैं? यदि इस प्रश्न का उत्तर हाँ है तो हमें अपने सुधार में जुट जाना चाहिए। वस्तुतः अपना सुधार ही संसार की सबसे बड़ी सेवा है। जिस दिन हमें अपने ऊपर के प्रश्नों का उत्तर नहीं में मिलने लगेगा, उस दिन से हम संसार के सबसे सुखी व्यक्ति बन जाएँगे।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 11

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 6)

🌹 सभी मानसिक स्फुरणाएं विचार नहीं

🔴 अतएव आवश्यक है कि किसी विचार से रचनात्मक सम्बन्ध स्थापित करने से पूर्व इस बात ही पूरी परख कर लेनी चाहिए कि जिसे हम विचार समझकर अपने व्यक्तित्व का अंग बनाये ले रहे हैं, वह वास्तव में विचार है भी या नहीं? कहीं ऐसा न हो कि वह आपका कोई मनोविकार हो और तब आपका व्यक्तित्व उसके कारण दोषपूर्ण बन जाय। प्रत्येक शुभ तथा सृजनात्मक विचार व्यक्तित्व को उभारने और विकसित करने वाला होता है। और प्रत्येक अशुभ तथा ध्वंसात्मक विचार मनुष्य का जीवन गिरा देने वाला है।

🔵 किसी भी शक्ति का उपयोग रचनात्मक एवं ध्वंसात्मक दोनों ही रास्तों से होता है। विज्ञान की शक्ति से मनुष्य के जीवन में असाधारण परिवर्तन हुआ। असम्भव को सम्भव बनाया विज्ञान ने। किन्तु आज विज्ञान के विनाशकारी स्वरूप को देखकर मानवता का भविष्य ही अन्धकारमय दिखाई देता है। जनमानस में बहुत बड़ा भय व्याप्त है। ठीक इसी तरह विचारों की शक्ति भी है। उनके पुरोगामी होने से मनुष्य के उज्ज्वल भविष्य का द्वार खुल जाता है और प्रतिगामी होने पर वही शक्ति उसके विनाश का कारण बन जाती है। गीताकार ने इसी सत्य का प्रतिपादन करते हुए लिखा है ‘‘आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन’’ विचारों का केन्द्र मन ही मनुष्य का बन्धु है और यही शत्रु भी। 

🔴 आवश्यकता इस बात की है कि विचारों को निम्न भूमि से हटाकर उन्हें ऊर्ध्वगामी बनाया जाय जिससे मनुष्य दीन-हीन, क्लेश एवं दुखों से भरे नारकीय जीवन से छुटकारा पाकर इसी धरती पर स्वर्गीय जीवन की उपलब्धि कर सके। वस्तुतः सद्विचार ही स्वर्ग की और कुविचार ही नरक की एक परिभाषा है। अधोगामी विचार मन को चंचल, क्षुब्ध, असन्तुलित बनाते हैं उन्हीं के अनुसार दुष्कर्म होने लगते हैं। और उन्हीं में फंसा हुआ व्यक्ति नारकीय यन्त्रणाओं का अनुभव करता है। जबकि सद्विचारों में डूबे हुए मनुष्य को धरती स्वर्ग जैसी लगती है। विपरीतताओं में भी वह सनातन सत्य के आनन्द का अनुभव करता है। साधन सम्पत्ति के अभाव, जीवन के कटु क्षणों में भी वह स्थिर और शान्त रहता है। शुद्ध विचारों के अवलम्बन से ही सच्चा सुख मिलता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 14)

🌹 दुरुपयोग के रहते अभाव कैसे मिटे

🔵 पुरातन काल में साधन आज की अपेक्षा निश्चित ही बहुत कम थे। वैज्ञानिक अविष्कारों का तो तब सिलसिला तक नहीं चला था। इतने पर भी उन दिनों इतनी अधिक प्रसन्नता एवं सहकारिता का अनुभव होता था, जिसे देखते हुए वह समय सतयुग कहलाता था। मिल बाँटकर खाने की नीति अपनाए जाने पर जो था उसी में भली प्रकार काम चल जाता था, न कहीं विग्रह था, न संकट। ऐसे वातावरण में अभावों की अनुभूति तो हो ही कैसे सकती है?

🔴 मनुष्य की वास्तविक आवश्यकताएँ अत्यन्त स्वल्प हैं। उन्हें कुछ ही घण्टे के साधारण श्रम से सुविधापूर्वक उपलब्ध किया जा सकता है। हैरान तो वह तृष्णा करती है, जिसके पीछे दुरुपयोग की ललक लालसा जुड़ी होती है। यदि उस बौद्धिक विभ्रम से निपटा जा सके, तो गुजारे में कमी पड़ने का तो प्रश्न ही नहीं उठता, मनुष्य सहज ही इतना अधिक उपार्जन करता रह सकता है कि दूसरों की सहायता करने का भी सुयोग बनता रहे।

🔵 अनाचार की वृद्धि का एक ही कारण है, अनावश्यक एवं अतिशय मात्रा में सज्जा सजाना, विलासिता के साधन जुटाना एवं संग्रह की लिप्सा से लालायित रहना। आग में ईंधन पड़ने की तरह हविश बढ़ती ही जाती है। विलासिता और अहन्ता के व्यामोह में, जो कमाया गया था, वह कम पड़ता ही रहता है, साथ ही यह उत्सुकता चल पड़ती है कि किसी प्रकार अपनों या दूसरों के हक का जितना भी कुछ छीना झपटा जा सके, उसमें कोताही न की जाये।

🔴 इस प्रकार की ललक, संचय तो बहुत कर लेती है, पर उसका सदुपयोग सूझ नहीं पड़ता। भाव संवेदना एवं चिन्तन में उत्कृष्टता न होने पर मात्र अनियन्त्रित उपयोग ही एक मात्र मार्ग रह जाता है, जिसकी गहरी खाई कुबेर जैसी सम्पदा और इन्द्र जैसी प्रभुता पाकर भी पटती नहीं है। इस मन:स्थिति में सन्तोष कहाँ? चैन कैसा? प्रसन्नता और प्रफुल्लता का अनुभव कर सकना तो कोसों पीछे रह जाता है।   

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 एक विशेष समय (भाग 2)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी
🔴 पहला कदम आपको जो बढ़ाना पड़ेगा, वो यह बढ़ाना पड़ेगा कि जिस तरीके से सामान्य मनुष्य जीते हैं, उसी तरीके से जीने से इन्कार कर दें और यह कहें-हम तो विशेष व्यक्ति और महामानवों के तरीके से जीयेंगे। पेट तो ऐसे ही भरना है। केवल मात्र पेट ही भरना रहा तो गन्दे तरीके से हम क्यों भरें? शेष तरीके से हम क्यों न भरें? हम जो बाकी पेट भरने के अलावा कार्य कर सकते हैं, वह क्यों न करें? यह प्रश्न हमारे सामने ज्वलंत रूप से आ खड़ा होगा और हमको यह आवश्यकता मालूम पड़ेगी कि हम अपनी मनःस्थिति में हेर-फेर कर डालें, अपनी मनःस्थिति को बदल डालें और हम लौकिक आकर्षणों की अपेक्षा ये देखें कि इन्हीं में भटकते रहने की अपेक्षा भगवान् का पल्ला पकड़ लेना ज्यादा लाभदायक है। भगवान् का सहयोगी बन जाना ज्यादा लाभदायक है। भगवान् को अपने जीवन में रमा देना ज्यादा लाभदायक है। संसार का इतिहास बताता है कि भगवान् का पल्ला पकड़ने वाले और भगवान् को अपना सहयोगी बनाने वाले कभी घाटे में नहीं रहे और न रहेंगे। ये विश्वास करें तो यह एक बहुत बड़ी बात है। जानना चाहिये, हमने एक बहुत बड़ा प्रकाश पा लिया।

🔵 अगर हम यह अनुभव कर सकें कि अब मनःस्थिति बदलनी है और सांसारिकता का पल्ला पकड़े रहने की अपेक्षा भगवान् की शरण में जाना है। ये हमारा दूसरा कदम होगा, ऊँचा उठने के लिये। तीसरा वाला कदम आत्मिक उत्थान के लिये हमारा ये होना चाहिये कि हमारी महत्त्वाकांक्षाएँ, हमारी कामनाएँ, हमारी इच्छाएँ बड़प्पन के केन्द्र से हटें और महानता के साथ जुड़ जायें। हमारी महत्त्वाकांक्षाएँ ये नहीं होनी चाहिए कि हम वासनाओं को पूरा करते रहेंगे जिन्दगी भर और हम तृष्णा के लिये अपने समय, बुद्धि को खर्च करते रहेंगे और हम अपनी अहंता को, ठाठ-बाट को, रौब को और बड़प्पन को लोगों के ऊपर रौब-गालिब करने के लिये तरह-तरह के ताने-बाने बुनते रहेंगे। अगर हमारा मन इस बात को मान जाये और हमारा अंतःकरण स्वीकार कर ले, ये बचकानी बातें हैं, छिछोरी बातें हैं, छोटी बातें हैं। छिछोरापन, बचकानापन और ये छोटापन, क्षुद्रता का अगर हम त्याग कर सकें तो एक बात हमारे सामने खड़ी होगी कि अब हमको महानता ग्रहण करनी है।

🔴 महापुरुषों ने जिस तरीके से आचरण किये थे, महापुरुषों का चिंतन करने का जो तरीका था, वही तरीका हमारा होना चाहिये और हमारी गतिविधियाँ उसी तरीके से होनी चाहिये, जैसे कि श्रेष्ठ मनुष्यों की रही हैं और रहेंगी। ये विश्वास करने के बाद में हमको अपनी क्रियापद्धति में, दृष्टिकोण में ये मान्यताएँ ले आने के पश्चात्, इच्छाओं और आकांक्षाओं का केन्द्र बदल देने के बाद हमको व्यावहारिक जीवन में भी थोड़े से कदम उठाने चाहिये। साधकों के लिये यही मार्ग है। 

🌹 आज की बात समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/amart_vachan_jivan_ke_sidha_sutra/ek_vishesh_samay

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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