शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

👉 घट-घट में बसै गुरु की चेतना

🔴 करीब २२- २३ साल पहले की बात है। तब मैं कॉलेज में पढ़ा करती थी। फरवरी का महीना था। मैं अपनी माँ के साथ ग्राम हर्री,जिला अनूपपुर में अन्नप्राशन संस्कार कराने गई थी। कार्यक्रम शाम का था। लौटने में थोड़ी देर हो गई। शहडोल की आखिरी बस छः बजे थी। हम जल्दी- जल्दी बस स्टैण्ड पहुँचे। लेकिन पता चला कि बस अभी ५ मिनट पहले ही जा चुकी है। यह सुनकर हम माँ बेटी दोनों के प्राण सूख गए। इसके बाद कोई दूसरी बस नहीं थी। माँ को वापस घर जैतहरी जाना था और मुझे शहडोल जाना था, क्योंकि मैं पढ़ाई कर रही थी। दूसरे दिन प्रैक्टिकल था। इसलिए जाना जरूरी था। माँ की बस आधा घंटे बाद थी, लेकिन वह हमें न अकेले छोड़ सकती थी न वापस साथ ले जा सकती थी। बस छूटने के थोड़ी देर बाद एक कार आई। उसे रुकने के लिए हाथ दिया।

🔵 क्योंकि कार में बैठे व्यक्ति बैंक मैनेजर थे जिनसे जान पहचान थी। लेकिन वे रुके नहीं, आगे बढ़ गए। अब कोई साधन नहीं था। थोड़ी ही देर में घर के तरफ की बस आनेवाली थी। चिंता थी कि उसे भी न छोड़ना पड़ जाए। इसलिए हम और परेशान हो रहे थे। कोई उपाय न देखकर हम दोनों मिलकर गुरु देव से प्रार्थना करने लगे कि गुरु देव हमें कोई रास्ता बताइए। इस स्थिति में अब क्या करें? आप ही कोई उपाय कीजिए। जाड़े का समय था। धीरे- धीरे अँधेरा बढ़ता जा रहा था। हम लोगों की परेशानी भी बढ़ती जा रही थी।

🔴 तभी अचानक दूसरी ओर से एक कार हमारे सामने आकर रुकी। हमने देखा ये तो मैनेजर साहब हैं। वे बोले- बेटा क्या बात है? कहाँ जाना है? मुझे लगा तुम लोगों को मेरे सहयोग की जरूरत थी। मैंने ध्यान नहीं दिया। मैं करीब दो किलोमीटर आगे चला गया था। लेकिन मुझे आभास हुआ कि तुम्हें सहयोग की जरूरत हैं इसलिए वापस चला आया। गुरु जी के असीम स्नेह को अनुभव कर हम धन्य हो गए। उसी दिन मैं यह जान पाई कि बच्चों की कितनी चिन्ता रहती है उन्हें। इस सज्जन में हमारे प्रति विशेष सद्भावना जगाकर 2 कि०मी० मी० से वापस बुला लाए।
  
🔵 मैनेजर साहब ने कहा- बेटी कहाँ तक जाओगी? मैंने कहा- चाचाजी मुझे शहडोल जाना है। मेरी बस छूट गई है। आप कहाँ जा रहे हैं? उन्होंने कहा- वैसे तो बुढ़ार तक जाना है, बैठो मैं छोड़ देता हूँ। आगे देखता हूँ। मेरी माँ मुझे कार में बैठाकर निश्चिन्त होकर दूसरी बस से घर के लिए रवाना हो गई। मैं जैसे ही बुढ़ार बस स्टैण्ड के पास पहुँची तो वहीं पर छूटी हुई बस भी खड़ी थी। बस का कण्डक्टर जोर- जोर से चिल्ला रहा था। शहडोल की आखिरी बस है। शहडोल की सवारी बस में आ जाएँ। मैं कार से उतर कर बस में बैठकर सकुशल अपने गंतव्य स्थान तक पहुँच गई। उस दिन की घटना से मेरा रोम- रोम गुरु देव के प्रति कृतज्ञ हो उठा। ऐसा था उनका साथ, संरक्षण, सहयोग जिसे हम शब्दों में नहीं व्यक्त कर सकते।
  
🌹 श्यामा राठौर शांतिकुंज (उत्तराखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 34) 11 Feb

🌹 साप्ताहिक और अर्द्ध वार्षिक साधनाएँ    

🔴 मोटर के पहियों में भरी हवा धीरे-धीरे कम होने लगती है। उसमें थोड़े समय के बाद नई हवा भरनी पड़ती है। रेल में कोयला-पानी चुकता है तो दुबारा भरना पड़ता है। पेट खाली होता है तो नई खुराक लेनी पड़ती है। जीवन का एक सा ढर्रा नीरस बन जाता है, तब उसमें नई स्फूर्ति संचारित करने के लिये नया प्रयास करना पड़ता है। पर्व-त्यौहार इसीलिये बने हैं कि एक नया उत्साह उभरे और उस आधार पर मिली स्फूर्ति से आगे का क्रिया-कलाप अधिक अच्छी तरह चले। रविवार की छुट्टी मनाने के पीछे भी नई ताजगी प्राप्त करना और अगले सप्ताह काम आने के लिये नई शक्ति अर्जित करना है। संस्थाओं के विशेष समारोह भी इसी दृष्टि से किये जाते हैं कि उस परिकर में आई सुस्ती का निराकरण किया जा सके। प्रकृति भी ऐसा ही करती रहती है। घनघोर वर्षा और खिलखिलाती वसन्त ऋतु ऐसी ही नवीनता भर जाती है। विवाह और निजी पुरुषार्थ की कमाई इन दो आरम्भों को भी मनुष्य सदा स्मरण रखता है उनमें उत्साहवर्द्धक नवीनता है।

🔵 जीवन साधना का दैनिक कृत्य बताया जा चुका है। उठते आत्मबोध, सोते तत्त्वबोध। प्रथम पहर भजन, तीसरे पहर मनन, ये चार विधायें नित्यकर्मों में सम्मिलित रहने लगे तो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के चारों आधार बन पड़ते हैं। चार पाये की चारपाई होती है और चार दीवारों की इमारत। चार दिशायें, चार वर्ण, चार आश्रमों , अन्त:करण चतुष्टय प्रसिद्ध हैं। प्रज्ञायोग की दैनिक साधना में उपरोक्त चार आधारों का सन्तुलित समन्वय है। उन सभी में कर्मकाण्ड घटा हुआ है और भाव चिन्तन बढ़ा हुआ। इससे लम्बे कर्मकाण्डों की उलझन में उद्देश्य से भटक जाने की आशंका नहीं रहती । भावना और आकांक्षा सही बनी रहने पर बुद्धि द्वारा निर्धारण सही होते रहते हैं। स्वभाव और कर्म-कौशल का क्रम भी सही चलता रहता है। नित्यकर्म की नियमितता स्वभाव का अंग बनती है और फिर जीवन क्रम उसी ढाँचे में ढलता चला जाता है।                          

🔴 जीवन साधना के दो विशेष पर्व हैं- एक साप्ताहिक दूसरा अर्द्ध वार्षिक। साप्ताहिक व्रत आमतौर से लोग रविवार, गुरुवार को रखते हैं। पर परिस्थितियों के कारण यदि कोई अन्य दिन सुविधाजनक पड़ता है तो उसे भी अपनाया जा सकता है। अर्द्धवार्षिक में आश्विन और चैत्र की दो नवरात्रियाँ आती हैं। इनमें साधना नौ दिन की करनी पड़ती है। इन दो पर्वों की विशेष उपासना को भी अपने निर्धारण में सम्मिलित रखने से बीच में जो अनुत्साह की गिरावट आने लगती है, उसका निराकरण होता रहता है। इनके आधार पर जो विशेष शक्ति उपार्जित होती है, उससे शिथिलता आने का अवसाद निपटता रहता है।     

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आराम नही काम चाहिए

🔴 एशिया के उद्योगशील और समृद्ध देशों में इन दिनों जापान की सर्वत्र चर्चा है। जानना चाहिये कि वही की समृद्धि का मूल कारण दैवी अनुकंपा नहीं वह श्रम और ईमानदारी है, जिसे जापानी नागरिक अपनी विरासत समझते है।

🔵 कुछ समय पूर्व एक अमेरिकन फर्म ने जापान में अपना व्यापार खोला। अमेरिका एक संपत्र देश है, वहाँ थोडे समय काम करके कम परिश्रम में भी लोग क्स्स्फी पैसा कमा लेते है, पर यह स्थिति जापान में कहाँ, वहाँ के लोग मेहनत-कश होते है, परिश्रम को वे शारीरिक संपत्ति मानते है। "जो मेहनत नही करता, वह अस्वस्थ होता है और समाज को विपन्न करता है" यह धारणा प्रत्येक जपानी नागरिक में पाई जाती है।

🔴 फर्म बेचारी को इसका क्या पता था? दूसरे देश में जाकर लोग आमतौर से अपने देश की उदारता ही दिखाने का प्रयास करते हैं। अमेरिका के उद्योगपति ने भी वही किया। उसने कर्मचारी जापानी ही रखने का फैसला किया, साथ ही यह भी निश्चय किया कि अमेरिकन कानून के अनुसार सप्ताह में केवल ५ दिन काम होगा। शनिवार और रविवार की छुट्टी रहेगी।

🔵 साहब बहादुर का विश्वास था कि इस उदारता से जापानियों पर बडा़ असर होगा, वे लोग प्रसन्न होकर दुआएँ देगे। पर एक दिन जब उन्होंने देखा कि फर्म के सभी कर्मचारी विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। अधिक से अधिक सहूलियतें दी गई हैं, फिर भी कर्मचारी विरोध कर रहे हैं, फर्म के मैनेजर एकाएक यह बात समझ नहीं सके।

🔴 यह तो अल्पबुद्धि के लोग होते हैं, जो अधिक आराम पाना सौभाग्य मानते हैं, पर आलस्य और अकर्मण्यता के कारण जो रोग और दारिद्रय छाए रहते हैं, उनकी ओर कदाचित् ध्यान ही नहीं जाता। यह बात समझ ली गई होती, तो आज सैकड़ों भारतवासी भी रोग, अस्वस्थता और कर्ज आदि से बच गए होते।

🔵 यह गुरु मंत्र कोई जापानी भाइयों से सीखे। आखिर विरोध का कारण जानने के लिये मैनेजर साहब ने कर्मचारियों के पास जाकर पूछा- ''आप लोगों को क्या तकलीफ है''।

🔴 तकलीफ! उन लोगों ने उत्तर दिया- 'तकलीफ यह है कि हमें दो छुट्टियाँ नही चाहिए। हमारे लिए एक ही छुट्टी पर्याप्त है।'' ऐसा क्यों ?'' पूछने पर उन्होंने आगे बताया आप जानते होंगे कि अधिक आराम देने से हमारी खुशी बढे़गी तो यह आपका भ्रम हे। अधिक छुट्टियाँ होने से हम आलसी बन जाएँगे। परिश्रम करने में हमारा मन नहीं लगेगा और उसका दुष्प्रभाव हमारे वैयक्तिक और राष्ट्रीय जीवन पर पड़ेगा। हमारा स्वास्थ्य खराब होगा। छुट्टी के कारण इधर उधर घूमने में हमारा अपव्यय बढेगा। जो छुट्टी हमारा स्वास्थ्य गिराए और हमे आर्थिक भार से दबा दे- ऐसी छुट्टी हमारे जीवन में बिलकुल नहीं खपती।

🔵 अमेरिक उद्योगपति उनकी इस दूरदर्शिता और आदर्शवाद पर मुस्कराए बिना न रह सके। उन्हें कहना ही पडा़ जापनी भाइयों! आपकी समृद्धि और शीघ्र सफलता का रहस्य हम आज समझे। सचमुच परिश्रम और पुरुषार्थ ही समृद्धि की कुंजी है। आप लोग कभी निर्धन ओर अस्वस्थ नहीं रह सकते।''

🔴 न जाने यह बात हमारे देश वाले कब तक सीख पाएँगे ?

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 21, 22

👉 बन्दा बैरागी की साधना

🔴 बन्दा वैरागी भी इसी प्रकार समय की पुकार की अवहेलना कर, संघर्ष में न लगकर एकान्त साधना कर रहे थे। उन्हीं दिनों गुरुगोविन्दसिंह की बैरागी से मुलाकात हुई। उन्होंने एकान्त सेवन को आपत्तिकाल में हानिकारक बताते हुए कहा- "बन्धु! जब देश, धर्म, संस्कृति की मर्यादाएँ नष्ट हो रही है और हम गुलामी का जीवन बिता रहे है, आताताइयों के अत्याचार हम पर हो रहे है उस समय यह भजन, पूजन, ध्यान, समाधि आदि किस काम के हैं?"

🔵 गुरुगोविन्दसिंह की युक्तियुक्त वाणी सुनकर बन्दा वैरागी उनके अनुयायी हो गए और गुरु की तरह उसने भी आजीवन देश को स्वतन्त्र कराने, अधर्मियों को नष्ट करने और संस्कृति की रक्षा करने की प्रतिज्ञा की। इसी उद्देश्य के लिए बन्दा वैरागी आजीवन प्रयत्नशील रहे। मुसलमानों द्वारा वैरागी पकड़े गये, उन्हें एक पिंजरें में बन्द किया गया। मौत या धर्म परिवर्तन की शर्त रखी गई, लेकिन वे तिल मात्र भी विचलित नहीं हुए। अन्तत: आतताइयों ने उनके टुकड़े- टुकडे कर दिये। बन्दा अन्त तक मुस्कराते ही रहे। भले ही बन्दा मर गये परन्तु अक्षय यश और कीर्ति के अधिकारी बने।

🌹 प्रज्ञा पुराण भाग 1 पृष्ठ 18

👉 हम अपने भीतर झाँक ना सीखें

🔵 व्यक्ति दूसरों के विषय में अधिकाधिक जानने का प्रयास करे अथवा उनकी भावनाओं से परिचित होना चाहे, उससे पहले अपने विषय में अधिकाधिक जान लेना चाहिए। अपने मन की भाषा को, आकांक्षाओं को-भावनाओं को बहुत स्पष्ट रूप से समझा, सुना और परखा जा सकता है। अपने बारे में जानकर अपनी सेवा करना, आत्म सुधार करना अधिक सरल है, बनिस्बत इसके कि हम औरों को-सारी दुनिया को बदलने का प्रयास करें। जितना हम अपने अन्तःकरण का परिमार्जन और सुधार कर लेंगे, यह संसार हमें उतना ही सुधरा हुआ परिलक्षित होने लगेगा।

🔴 हम दर्पण में अपना मुख देखते हैं एवं चेहरे की मलिनता को प्रयत्नपूर्वक साफ कर उसे सुन्दर बना डालते हैं। मुख उज्ज्वल-साफ और अधिक सुन्दर निकल आता है। मन की प्रसन्नता बढ़ जाती है। अन्तःकरण भी एक मुख है। उसे चेतना के दर्पण में देखने और उसे भली-भाँति परखने से उसकी मलिनताएँ भी दिखाई देने लगती हैं, साथ ही सौन्दर्य भी। कमियों को दूर करना, मलिनता को मिटाना और आत्म निरीक्षण द्वारा पर्त दर पर्त्त गन्दगी को हटाकर आत्मा के अनन्त सौन्दर्य को प्रकट करना ही सच्ची उपासना है। जब सारी मलिनताएँ निकल जाती हैं तो आत्मा का उज्ज्वल, साफ और सुन्दर स्वरूप परिलक्षित होने लगता है। फिर बहिरंग में सभी कुछ अच्छा-सत्, चित् आनन्दमय नजर आने लगता है।

🔵 हमें अपने आपसे प्रश्न करना चाहिए-क्या हमारे विचार गन्दे हैं? कामुकता के चिन्तन में हमारा मन रस लेता है, क्या हमें इन्द्रियजन्य वासनाओं से मोह है, क्या हम उस परमसत्ता के हमारे बीच होते हुए भी भयभीत हैं? यदि इस प्रश्न का उत्तर हाँ है तो हमें अपने सुधार में जुट जाना चाहिए। वस्तुतः अपना सुधार ही संसार की सबसे बड़ी सेवा है। जिस दिन हमें अपने ऊपर के प्रश्नों का उत्तर नहीं में मिलने लगेगा, उस दिन से हम संसार के सबसे सुखी व्यक्ति बन जाएँगे।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 11

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 6)

🌹 सभी मानसिक स्फुरणाएं विचार नहीं

🔴 अतएव आवश्यक है कि किसी विचार से रचनात्मक सम्बन्ध स्थापित करने से पूर्व इस बात ही पूरी परख कर लेनी चाहिए कि जिसे हम विचार समझकर अपने व्यक्तित्व का अंग बनाये ले रहे हैं, वह वास्तव में विचार है भी या नहीं? कहीं ऐसा न हो कि वह आपका कोई मनोविकार हो और तब आपका व्यक्तित्व उसके कारण दोषपूर्ण बन जाय। प्रत्येक शुभ तथा सृजनात्मक विचार व्यक्तित्व को उभारने और विकसित करने वाला होता है। और प्रत्येक अशुभ तथा ध्वंसात्मक विचार मनुष्य का जीवन गिरा देने वाला है।

🔵 किसी भी शक्ति का उपयोग रचनात्मक एवं ध्वंसात्मक दोनों ही रास्तों से होता है। विज्ञान की शक्ति से मनुष्य के जीवन में असाधारण परिवर्तन हुआ। असम्भव को सम्भव बनाया विज्ञान ने। किन्तु आज विज्ञान के विनाशकारी स्वरूप को देखकर मानवता का भविष्य ही अन्धकारमय दिखाई देता है। जनमानस में बहुत बड़ा भय व्याप्त है। ठीक इसी तरह विचारों की शक्ति भी है। उनके पुरोगामी होने से मनुष्य के उज्ज्वल भविष्य का द्वार खुल जाता है और प्रतिगामी होने पर वही शक्ति उसके विनाश का कारण बन जाती है। गीताकार ने इसी सत्य का प्रतिपादन करते हुए लिखा है ‘‘आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन’’ विचारों का केन्द्र मन ही मनुष्य का बन्धु है और यही शत्रु भी। 

🔴 आवश्यकता इस बात की है कि विचारों को निम्न भूमि से हटाकर उन्हें ऊर्ध्वगामी बनाया जाय जिससे मनुष्य दीन-हीन, क्लेश एवं दुखों से भरे नारकीय जीवन से छुटकारा पाकर इसी धरती पर स्वर्गीय जीवन की उपलब्धि कर सके। वस्तुतः सद्विचार ही स्वर्ग की और कुविचार ही नरक की एक परिभाषा है। अधोगामी विचार मन को चंचल, क्षुब्ध, असन्तुलित बनाते हैं उन्हीं के अनुसार दुष्कर्म होने लगते हैं। और उन्हीं में फंसा हुआ व्यक्ति नारकीय यन्त्रणाओं का अनुभव करता है। जबकि सद्विचारों में डूबे हुए मनुष्य को धरती स्वर्ग जैसी लगती है। विपरीतताओं में भी वह सनातन सत्य के आनन्द का अनुभव करता है। साधन सम्पत्ति के अभाव, जीवन के कटु क्षणों में भी वह स्थिर और शान्त रहता है। शुद्ध विचारों के अवलम्बन से ही सच्चा सुख मिलता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 14)

🌹 दुरुपयोग के रहते अभाव कैसे मिटे

🔵 पुरातन काल में साधन आज की अपेक्षा निश्चित ही बहुत कम थे। वैज्ञानिक अविष्कारों का तो तब सिलसिला तक नहीं चला था। इतने पर भी उन दिनों इतनी अधिक प्रसन्नता एवं सहकारिता का अनुभव होता था, जिसे देखते हुए वह समय सतयुग कहलाता था। मिल बाँटकर खाने की नीति अपनाए जाने पर जो था उसी में भली प्रकार काम चल जाता था, न कहीं विग्रह था, न संकट। ऐसे वातावरण में अभावों की अनुभूति तो हो ही कैसे सकती है?

🔴 मनुष्य की वास्तविक आवश्यकताएँ अत्यन्त स्वल्प हैं। उन्हें कुछ ही घण्टे के साधारण श्रम से सुविधापूर्वक उपलब्ध किया जा सकता है। हैरान तो वह तृष्णा करती है, जिसके पीछे दुरुपयोग की ललक लालसा जुड़ी होती है। यदि उस बौद्धिक विभ्रम से निपटा जा सके, तो गुजारे में कमी पड़ने का तो प्रश्न ही नहीं उठता, मनुष्य सहज ही इतना अधिक उपार्जन करता रह सकता है कि दूसरों की सहायता करने का भी सुयोग बनता रहे।

🔵 अनाचार की वृद्धि का एक ही कारण है, अनावश्यक एवं अतिशय मात्रा में सज्जा सजाना, विलासिता के साधन जुटाना एवं संग्रह की लिप्सा से लालायित रहना। आग में ईंधन पड़ने की तरह हविश बढ़ती ही जाती है। विलासिता और अहन्ता के व्यामोह में, जो कमाया गया था, वह कम पड़ता ही रहता है, साथ ही यह उत्सुकता चल पड़ती है कि किसी प्रकार अपनों या दूसरों के हक का जितना भी कुछ छीना झपटा जा सके, उसमें कोताही न की जाये।

🔴 इस प्रकार की ललक, संचय तो बहुत कर लेती है, पर उसका सदुपयोग सूझ नहीं पड़ता। भाव संवेदना एवं चिन्तन में उत्कृष्टता न होने पर मात्र अनियन्त्रित उपयोग ही एक मात्र मार्ग रह जाता है, जिसकी गहरी खाई कुबेर जैसी सम्पदा और इन्द्र जैसी प्रभुता पाकर भी पटती नहीं है। इस मन:स्थिति में सन्तोष कहाँ? चैन कैसा? प्रसन्नता और प्रफुल्लता का अनुभव कर सकना तो कोसों पीछे रह जाता है।   

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 एक विशेष समय (भाग 2)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी
🔴 पहला कदम आपको जो बढ़ाना पड़ेगा, वो यह बढ़ाना पड़ेगा कि जिस तरीके से सामान्य मनुष्य जीते हैं, उसी तरीके से जीने से इन्कार कर दें और यह कहें-हम तो विशेष व्यक्ति और महामानवों के तरीके से जीयेंगे। पेट तो ऐसे ही भरना है। केवल मात्र पेट ही भरना रहा तो गन्दे तरीके से हम क्यों भरें? शेष तरीके से हम क्यों न भरें? हम जो बाकी पेट भरने के अलावा कार्य कर सकते हैं, वह क्यों न करें? यह प्रश्न हमारे सामने ज्वलंत रूप से आ खड़ा होगा और हमको यह आवश्यकता मालूम पड़ेगी कि हम अपनी मनःस्थिति में हेर-फेर कर डालें, अपनी मनःस्थिति को बदल डालें और हम लौकिक आकर्षणों की अपेक्षा ये देखें कि इन्हीं में भटकते रहने की अपेक्षा भगवान् का पल्ला पकड़ लेना ज्यादा लाभदायक है। भगवान् का सहयोगी बन जाना ज्यादा लाभदायक है। भगवान् को अपने जीवन में रमा देना ज्यादा लाभदायक है। संसार का इतिहास बताता है कि भगवान् का पल्ला पकड़ने वाले और भगवान् को अपना सहयोगी बनाने वाले कभी घाटे में नहीं रहे और न रहेंगे। ये विश्वास करें तो यह एक बहुत बड़ी बात है। जानना चाहिये, हमने एक बहुत बड़ा प्रकाश पा लिया।

🔵 अगर हम यह अनुभव कर सकें कि अब मनःस्थिति बदलनी है और सांसारिकता का पल्ला पकड़े रहने की अपेक्षा भगवान् की शरण में जाना है। ये हमारा दूसरा कदम होगा, ऊँचा उठने के लिये। तीसरा वाला कदम आत्मिक उत्थान के लिये हमारा ये होना चाहिये कि हमारी महत्त्वाकांक्षाएँ, हमारी कामनाएँ, हमारी इच्छाएँ बड़प्पन के केन्द्र से हटें और महानता के साथ जुड़ जायें। हमारी महत्त्वाकांक्षाएँ ये नहीं होनी चाहिए कि हम वासनाओं को पूरा करते रहेंगे जिन्दगी भर और हम तृष्णा के लिये अपने समय, बुद्धि को खर्च करते रहेंगे और हम अपनी अहंता को, ठाठ-बाट को, रौब को और बड़प्पन को लोगों के ऊपर रौब-गालिब करने के लिये तरह-तरह के ताने-बाने बुनते रहेंगे। अगर हमारा मन इस बात को मान जाये और हमारा अंतःकरण स्वीकार कर ले, ये बचकानी बातें हैं, छिछोरी बातें हैं, छोटी बातें हैं। छिछोरापन, बचकानापन और ये छोटापन, क्षुद्रता का अगर हम त्याग कर सकें तो एक बात हमारे सामने खड़ी होगी कि अब हमको महानता ग्रहण करनी है।

🔴 महापुरुषों ने जिस तरीके से आचरण किये थे, महापुरुषों का चिंतन करने का जो तरीका था, वही तरीका हमारा होना चाहिये और हमारी गतिविधियाँ उसी तरीके से होनी चाहिये, जैसे कि श्रेष्ठ मनुष्यों की रही हैं और रहेंगी। ये विश्वास करने के बाद में हमको अपनी क्रियापद्धति में, दृष्टिकोण में ये मान्यताएँ ले आने के पश्चात्, इच्छाओं और आकांक्षाओं का केन्द्र बदल देने के बाद हमको व्यावहारिक जीवन में भी थोड़े से कदम उठाने चाहिये। साधकों के लिये यही मार्ग है। 

🌹 आज की बात समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/amart_vachan_jivan_ke_sidha_sutra/ek_vishesh_samay

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 100)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 2. उप जातियों के प्रथम संगठन:-- प्रगतिशील भटनागर सभा, प्रगतिशील श्रीवास्तव सभा, प्रगतिशील सक्सेना सभा जैसे छोटे संगठन अलग-अलग से बनेंगे। लेकिन वे अन्ततः ‘प्रगतिशील कायस्थ सभा’ के अन्तर्गत रहेंगे। इसी प्रकार अन्य जातियों के भी उप-जातियों के अलग-अलग संगठन होने चाहिए, ताकि उसी समुदाय के अन्तर्गत विवाह करने वाले या उसे छोड़कर अन्यों में करने वाले लोगों का विवाह सम्बन्ध करने में सुविधा रह सके। उप-जातियों के यह पृथक-पृथक संगठन अन्ततः अपनी मूल जाति के केन्द्रीय संगठन के अन्तर्गत रहेंगे। आरम्भिक गठन उप-जातियों के द्वारा शुरू करना चाहिए और पीछे उन सब प्रतिनिधियों को लेकर एक मूल जाति की प्रगतिशील सभा गठित कर लेनी चाहिए। जैसी—ब्राह्मणों की सनाढ्य गौड़, कान्यकुब्ज, सरयूपारीण, सारस्वत, औदीच्य, श्रीमाली, गौतम आदि उप-जातियों की अलग सभाएं बन गईं तो उनके दो-दो प्रतिनिधि लेकर एक केन्द्रीय प्रगतिशील ब्राह्मण सभा बना दी जायगी।

🔵 3. सदस्यता की शर्त:-- इन संगठनों के सदस्यों की भर्ती सामाजिक सुधारों को, विशेषतया विवाहों में होने वाले अपव्यय को रोकने के प्रति आस्थावान होने की शर्त पर की जानी चाहिए। भले ही 24 सूत्रीय आदर्श विवाहों की रूपरेखा को वे आज पूरी तरह कार्यान्वित करने की स्थिति में न हों, पर विचारों की दृष्टि से तो उसके औचित्य को पूर्णतया मानना ही चाहिए और अवसर आने पर समर्थन भी उन्हीं बातों का करना चाहिए। 24 सूत्रों में से कोई पूरी तरह न निभ सके तो उसे अपनी कमजोरी ही मानना चाहिए और उसके लिए दुःख एवं लज्जा अनुभव करनी चाहिए। उस दुर्बलता का उन्हें समर्थन कदापि न करना चाहिए।

🔴 ऐसे आस्थावान व्यक्तियों की सहमति:--
प्रतिज्ञा का एक फार्म होगा, जिस पर सदस्यगण अपने हस्ताक्षर करेंगे। इन हस्ताक्षर कर्त्ताओं के प्रार्थना-पत्र क्षेत्रीय संगठन द्वारा स्वीकार किये जाने पर उन्हें सदस्य घोषित किया जायगा और उन्हें प्रमाण-पत्र दिया जायगा। अवांछनीय, व्यक्तियों के सदस्यता-पत्र अस्वीकृत कर दिये जायेंगे। पीछे भी कभी कोई सदस्य संगठन को कलंकित करने वाले काम करता पाया गया तो उसकी सदस्यता क्षेत्रीय संगठन की सिफारिश पर केन्द्रीय संगठन रद्द कर देगा। सदस्यता की कोई फीस नहीं होगी। वयस्क नर-नारी सभा का सदस्य बन सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 48)

🌹 ऋषि तंत्र से दुर्गम हिमालय में साक्षात्कार

🔴 सूक्ष्म शरीर से अन्तःप्रेरणाएँ उमगाने और शक्तिधारा प्रदान करने का काम हो सकता है, पर जनसाधारण को प्रत्यक्ष परामर्श देना और घटनाक्रमों को घटित करना स्थूल शरीरों का ही काम है। इसलिए दिव्य शक्तियाँ किन्हीं स्थूल शरीर धारियों को ही अपने प्रयोजनों के लिए वाहन बनाती हैं। अभी तक मैं एक ही मार्गदर्शक का वाहन था, पर अब वे हिमालयवासी अन्य दिव्य आत्माएँ भी अपने वाहन के काम ले सकती थीं और तद्नुसार प्रेरणा, योजना एवं क्षमता प्रदान करती रह सकती थीं। गुरुदेव इसी भाव वाणी में मेरा परिचय उन सबसे करा रहे थे। वे सभी बिना लोकाचार, शिष्टाचार निबाहे, बिना समय-क्षेप किए एक संकेत में उस अनुरोध की स्वीकृति दे रहे थे। आज रात्रि की दिव्य यात्रा इसी रूप में चलती रही। प्रभात होने से पूर्व ही वे मेरी स्थूल काया को निर्धारित गुफा में छोड़कर अपने स्थान को वापस चले गए।

🔵 आज ऋषि लोक का पहली बार दर्शन हुआ। हिमालय के विभिन्न क्षेत्रों-देवालय, सरोवरों, सरिताओं का दर्शन तो यात्रा काल में पहले से भी होता रहा। उस प्रदेश को ऋषि निवास का देवात्मा भी मानते रहे हैं, पर इससे पहले यह विदित न था कि किस ऋषि का किस भूमि से लगाव है? यह आज पहली बार देखा और अंतिम बार भी। वापस छोड़ते समय मार्गदर्शक ने कह दिया कि इनके साथ अपनी ओर से सम्पर्क साधने का प्रयत्न मत करना। उनके कार्य में बाधा मत डालना। यदि किसी को कुछ निर्देशन करना होगा, तो वे स्वयं ही करेंगे। हमारे साथ भी तो तुम्हारा यही अनुबंध है कि अपनी ओर से द्वार नहीं खटखटाओगे।

🔴 जब हमें जिस प्रयोजन के लिए जरूरत पड़ा करेगी, स्वयं ही पहुँचा करेंगे और उसी पूर्ति के लिए आवश्यक साधन जुटा दिया करेंगे। यही बात आगे से तुम उन ऋषियों के सम्बन्ध में भी समझ सकते हो, जिनके कि दर्शन प्रयोजनवश तुम्हें आज कराए गए हैं। इस दर्शन को कौतूहल भर मत मानना, वरन् समझना कि हमारा अकेला ही निर्देश तुम्हारे लिए सीमित नहीं रहा। यह महाभाग भी उसी प्रकार अपने सभी प्रयोजन पूरा कराते रहेंगे, जो स्थूल शरीर के अभाव में स्वयं नहीं कर सकते। जनसम्पर्क प्रायः तुम्हारे जैसे सत्पात्रों-वाहनों के माध्यम से कराने की ही परम्परा रही है। आगे से तुम इनके निर्देशनों को भी हमारे आदेश की तरह ही शिरोधार्य करना और जो कहा जाए सो करने के लिए जुट पड़ना। मैं स्वीकृति सूचक संकेत के अतिरिक्त और कहता ही क्या? वे अंतर्ध्यान हो गए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 48)

🌞  हिमालय में प्रवेश (सुनसान की झोंपड़ी)

🔵 यह जागृत था या स्वप्न? सत्य था या भ्रम? मेरे अपने विचार थे या दिव्य संदेश? कुछ समझ नहीं पा रहा था। आंखें मलीं सिर पर हाथ फिराया। जो सुना, देखा था, उसे ढूंढ़ने का पुनः प्रयत्न किया। पर कुछ मिल नहीं पा रहा था, कुछ समाधान हो नहीं रहा था।

🔴 इतने में देखा कि उछलती हुई लहरों पर थिरकते हुये अनेक चन्द्र प्रतिबिम्ब एक रूप होकर चारों ओर से इकट्ठे हो रहे हैं और मुसकराते हुए कुछ कह रहे हैं। इनकी बात सुनने की चेष्टा की तो नन्हे बालकों जैसे वे प्रतिबिम्ब कहने लगे—हम इतने चन्द्र तुम्हारे साथ खेलने के लिये, हंसने-मुस्कराने के लिये मौजूद हैं। क्या तुम हमें अपना सहचर न मानोगे? क्या हम अच्छे साथी नहीं हैं? मनुष्य! तुम अपनी स्वार्थी दुनिया में से आये हो, जहां जिससे जिसकी ममता होती है, जिससे जिसका स्वार्थ सधता है वह प्रिय लगता है। जिससे स्वार्थ सधा वह प्रिय, वह अपना। जिससे स्वार्थ न सधा वह पराया, वह बिराना। यही तुम्हारी दुनिया का दस्तूर है न उसे छोड़ो। हमारी दुनिया का दस्तूर सीखो। यहां संकीर्णता नहीं, यहां ममता नहीं, यहां स्वार्थ नहीं, यहां सभी अपने हैं। सब में अपनी ही आत्मा है ऐसा सोचा जाता है। तुम भी इसी प्रकार सोचो। फिर हम इतने चन्द्र बिम्बों के सहचर रहते तुम्हें सूनापन प्रतीत ही न होगा।

🔵 तुम तो यहां कुछ साधन करने आये हो न! साधना करने वाली इस गंगा को देखते नहीं, प्रियतम के प्रेम में तल्लीन होकर उससे मिलने के लिये कितनी तल्लीनता और आतुरता से चली जा रही है। रास्ते के विघ्न उसे कहां रोक पाते हैं? अन्धकार और अकेलेपन को वह कहां देखती है? लक्ष की यात्रा से एक क्षण के लिये भी उसका मन कहां विरत होता है? यह साधना का पथ अपनाना है, तो तुम्हें भी यही आदर्श अपनाना होगा। जब प्रियतम को पाने के लिए तुम्हारी आत्मा भी गंगा की धारा की तरह द्रुतगामी होती तो कहां भीड़ में आकर्षण लगेगा और कहां सूनेपन में भय लगेगा? गंगा तट पर निवास करना है तो गंगा की प्रेम-साधना भी सीखो—साधक!

🔴 शीतल लहरों के साथ अनेक चन्द्र बालक नाच रहे थे। मानों अपनी मथुरा में कभी हुआ—रास, नृत्य प्रत्यक्ष हो रहा हो। लहरें गोपियां बनीं, चन्द्र ने कृष्ण का रूप धारण किया, हर गोपी के साथ एक कृष्ण! कैसा अद्भुत रास-नृत्य यह आंखें देख रही थीं। मन आनन्द से विभोर हो रहा था। ऋतम्भरा प्रज्ञा कह रही थी—देख, देख अपने प्रियतम की झांकी देख। हर काया में एक आत्मा उसी तरह नाच रही है जैसे गंगा की शुभ लहरों के साथ एक ही चन्द्रमा के अनेक बिम्ब नृत्य कर रहे हैं। सारी रात बीत गई। ऊषा की अरुणिमा प्राची से प्रकट होने लगी। जो देखा वह अद्भुत था। सूनेपन का भय चला गया। कुटो की ओर पैर धीरे-धीरे लौट रहे थे। सूनेपन का प्रश्न अब भी मस्तिष्क में मौजूद था।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 Feb 2017


👉 ऐसे थे पूज्य गुरुदेव

🔴 गुरुवर जो कहते उसे पूर्णतया स्वयं के जीवन में करके दिखाते। ‘‘दूसरों के प्रति उदारता स्वयं के प्रति कठोरता’’ उनके जीवन में सतत चरितार्थ तो थी ही, किन्तु उस समय वह चरम अवस्था में पहुँच गई, जब उनकी माता दानकुँवरि बाई का निधन हो गया।

🔵  मथुरा में जब वे अस्वस्थ थीं, उस समय भी आचार्य जी के कार्यक्रम सारे देश में अनवरत चल रहे थे। हर बार तपोभूमि के कार्यकर्ताओं (जिनमें मैं भी शामिल था) को देख- रेख करने की हिदायत देकर जाते थे; पर पता नहीं क्यों इस बार उन्होंने कहा कि यदि कुछ अनहोनी घट गई तो दोनों स्थान पर टेलीग्राम करना। जहाँ कार्यक्रम समाप्त हो व जहाँ प्रारंभ हो। साथ ही आवश्यक निर्देश देकर दौरे पर चले गए।

🔴  द्रष्टा की आँखों से भला कोई बात छिपी कैसे रह सकती है? वही हुआ जिसे समझा गए थे। उस समय छत्तीसगढ़ (पुराना मध्यप्रदेश) के महासमुंद में एक हजार एक कुण्डीय यज्ञ चल रहा था। प्रवचन के बीच में उन्हें टेलीग्राम दिया गया। टेलीग्राम पर नजर पड़ते ही वे सब कुछ समझ गए। एक मिनट के लिए आँखें मूँदकर उन्होंने दिवंगत आत्मा को श्रद्धाञ्जलि दी। पुनः सहज भाव से यथावत् अपनी विवेचना करने लगे। उस समय लोगों को कुछ समझ में नहीं आया, पर बाद में जब सभी ने सुना तो आश्चर्यचकित रह गए। ऐसा समाचार पाकर तनिक भी विचलित न होना, स्थिर भाव से अपना कार्य करते रहना किसी स्थितप्रज्ञ योगी के लिए ही संभव है।  
  
🔵 सबके मन में एक ही आशंका थी कि गुरुदेव मथुरा चले जाएँगे तब यहाँ यज्ञ का क्या होगा? किन्तु उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को निश्चिंत करते हुए स्वयं के प्रति कठोर बनकर स्पष्ट कर दिया कि आगे के सभी कार्यक्रम यथावत् होते रहेंगे। हम कहीं नहीं जा रहे, आप सभी के बीच ही रहेंगे। सबने आश्चर्य किया कि ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है ?’’ स्वयं की माताजी का श्राद्धकर्म चल रहा हो तो बेटा बाहर कैसे रह सकता है, पर महापुरुषों के सभी कार्य लौकिक नियमों के अनुसार सम्पन्न नहीं होते। उन्होंने तो अपनी ओर से श्राद्धकर्म उस एक मिनट में ही सम्पन्न कर लिया था।
  
🔴 कार्यक्रम आयोजक प्रसन्न थे, क्योंकि इस स्थिति में भी पूज्यवर सभी कार्यक्रमों में उपस्थित रहे। उनका कोई भी कार्यक्रम स्थगित नहीं हुआ। सभी कार्यक्रम यथावत् जारी रहे। अन्तिम संस्कार के सारे लौकिक कृत्य वंदनीया माताजी द्वारा सम्पन्न हुए। इस संबंध में उन्हें सूक्ष्म सम्पर्क से निर्देश मिल गए थे। उनके निर्देशानुसार स्वजनों, परिजनों, आगन्तुकों इष्ट मित्रों की उपस्थिति में अन्त्येष्टि संस्कार सम्पन्न किया गया।
  
🔵 इसके बाद परम वंदनीया माताजी ने कम से कम एक दिन के लिए इस असह्य दुःख में पूज्यवर की उपस्थिति चाही। इसके लिए उन्हें मनाने हेतु मुझे जाने के लिए कहा गया। एक तरफ वन्दनीया माताजी का सजल आग्रह, दूसरी ओर गुरुकार्य के प्रति पूज्यवर की दृढ़निष्ठा- मैं हतप्रभ खड़ा सोच रहा था क्या करूँ? गुरुदेव को उनके निश्चय से डिगाना कठिन ही नहीं असंभव था। उनके सामने जाकर यह बात कहनी पड़ेगी, यह सोचकर ही पसीने छूटने लगे। बचने की कोशिश में मैंने कहा- बलराम जी को भेज दें! पर उन्होंने कहा- ‘‘उन्हें तो मना करेंगे। उनसे आग्रह करना, आने की आवश्यकता बताना उनके वश की बात नहीं, इसलिए तुम्हें ही जाना पड़ेगा।’’ मैं निरुत्तर हो गया।

🔴 महासमुन्द के बाद बालाघाट में कार्यक्रम था। वहाँ यज्ञस्थल में पहुँचा तो देखा पूर्णाहुति चल रही थी। इधर प्रणाम का क्रम भी शुरू हो चुका था। मुझे वहाँ देखकर पूज्यवर सब कुछ समझ गये। बोले- ‘‘रास्ते में बात करेंगे, अभी जाकर नहा- धो लो’’ स्नान- ध्यान के बाद भोजन किया। मथुरा से बालाघाट पहुँचने में दो रात्रि का जागरण था, मगर विश्राम का अवसर नहीं था। क्योंकि अगला कार्यक्रम जबलपुर में था और हमें तत्काल जबलपुर के लिए प्रस्थान करना था। गाड़ी में बैठकर गुरुदेव ने विस्तार से सारी बातें सुनीं।
   
🔵 इसके बाद मैंने माताजी का आग्रह सुनाया और निवेदन किया कि केवल एक दिन के लिए चलें ताकि स्वजनों- परिजनों, इष्ट मित्रों का शिष्टाचार किया जा सके। गुरुदेव कुछ गम्भीर हुए। एक क्षण रुककर बोले- मैंने अपने बच्चों को समय दिया हुआ है। मैं अपने काम के लिए उनको निराश करूँ, यह सम्भव नहीं। रही बात शिष्टाचार की, तो अब ताई जी के बाद घर में सबसे बड़ा मैं ही हूँ। मुझे किसी से शिष्टाचार निभाने की आवश्यकता नहीं। मैं जो कहूँगा उसी को पालन करना सबका कर्तव्य होगा।
   
🔴 मैंने समझाने का प्रयास किया कि किसी कार्यक्रम को स्थगित करने की जरूरत नहीं होगी, जबलपुर के बाद बिलासपुर के निर्धारित कार्यक्रम के बीच एक दिन खाली है। इसलिए जबलपुर का कार्यक्रम सम्पन्न कर तुरन्त मथुरा की ओर प्रस्थान किया जाए तो वहाँ सभी से मिलकर निर्धारित समय पर बिलासपुर पहुँच जाएँगे या एक दिन विलम्ब हो तो भाई लोग मिलकर सँभाल लेंगे। दरअसल इस आशय की सूचना हमने बिलासपुर के कार्यक्रम आयोजक श्री उमाशंकर चतुर्वेदी जी को दे दी थी कि संभव है कि एक दिन विलंब हो जाय। ऐसी परिस्थिति में आप लोग मिलकर संभाल लें लेकिन यह बात मैंने गुरुदेव को नहीं बताई। इधर बालाघाट से रवाना होते समय बिलासपुर से चतुर्वेदी जी भाई साहब के सुपुत्र नरेन्द्र जी आ पहुँचे। वे पूज्यवर को लेने आए थे। उन्हें देखते ही गुरुदेव बोल उठे ‘तू चल, मैं आ जाऊँगा। मुझसे बोले- ‘‘कर दिया न तूने लड़के को परेशान’’ आखिर निराश होकर मुझे अकेले ही लौटना पड़ा।

🌹  वीरेश्वर उपाध्याय
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 33) 10 Feb

🌹 जीवन साधना के सुनिश्चित सूत्र 

🔴 पेट भरने और परिवार के लिये मरते-खपते रहना किसी भी गरिमाशील के लिये पर्याप्त नहीं हो सकता। इस नीति को तो पशु-पक्षी और कीट-पतंग ही अपनाते रहते हैं और मौत के दिन किसी प्रकार पूरे कर लेेते हैं। यदि मनुष्य भी इसी कुचक्र में पिसता और दूसरों को पीसता रहे, तो समझना चाहिये कि उसने मनुष्य जन्म जैसी देव दुर्लभ सम्पदा को कौड़ी मोल गँवा दिया।

🔵 नित्य आत्मविश्लेषण, सुधार, सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्द्धन का क्रम यदि जारी रखा जाये तो प्रगति के लक्ष्य उपलब्ध कराने की दिशा में अपने क्रम से बढ़ चलना सम्भव हो जाता है। इन्द्रियसंयम, समयसंयम, अर्थसंयम और विचारसंयम को व्यवहारिक जीवन की तपश्चर्या माना गया है। तप से सम्पत्ति और सम्पत्ति से सिद्धि प्राप्त होने का तथ्य सर्वविदित है। दुष्प्रवृत्तियों से अपने को बचाते रहने की संयमशीलता किसी को भी सशक्त बना सकने में समर्थ हो सकती है। यह राजमार्ग अपनाकर कोई भी समुन्नत होते हुए अपने आप को देख सकता है।                         

🔴 समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी के चार सद्गुण यदि अपने व्यक्तित्व के अंग बनाये जा सकें, उन्हें पुण्य परमार्थ स्तर का माना जा सके तो अपना आपा देखते-देखते इस स्तर का बन जाता है कि अपने सुख बाँटने और दूसरों के दु:ख बँटा लेने की उदार मनोदशा विनिर्मित होने लगे। जीवन साधना इसी आधार पर सधती है। मनुष्य जन्म को सार्थक इन्हीं आधारों को अपनाकर बनाया जा सकता है।     

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जगहित आपनि खोरि कराऊँ

🔴 संत रामानुजाचार्य ने श्रीरंगम के संन्यासी यतिराज से दीक्षा लेकर सन्यास आश्रम में प्रवेश किया। गुरुदेव ने उन्हें अष्टाक्षर नारायण मंत्र का उपदेश दिया और कहा वत्स! यह परम पवित्र मंत्र है। इसके निष्ठापूर्वक जप करने से साधु मोक्ष के अधिकारी होते हैं।

🔵 श्री यतिराज ने चलते समय यह भी कहा तात! यह मंत्र अधिकारी पात्र को ही दिया जाता है। इसका सस्वर उच्चारण मत करना। जिस किसी के कान में पड़ जाता है, वह पापी हो या पुण्यात्मा सभी पवित्र हो जाते हैं।

🔴 गुरुदेव से विदा होकर रामानुजाचार्य अपनी कुटिया में आए पर यह क्या! आज तो उनके मन में कल वाली शांति भी नहीं थी। मस्तिष्क में अंतर्द्वन्द चल रहा था।

🔵 उन्होंने विचार किया सारा संसार पाप की ज्वाला में जल रहा है। भगवान् की सृष्टि मे अमंगल नाम की कोई वस्तु नही है तो भी लोग पाप और बुरे कर्मो के कारण दुःखी हैं, यदि इन्हें पाप से बचाया जाना संभव हो तो क्यों संसार में किसी को कष्ट हो?

🔴 तभी गुरुदेव के वे शब्द याद आए- 'यह मंत्र जिसके कान में पड़ जाता है वही पवित्र हो जाता है।'' फिर यदि ऐसी शक्ति है इस मंत्र में तो उन्होंने उसे सस्वर उच्चारण के लिये मना क्यों किया। सन्यासी को एकमात्र लोकहित की चिंता होती है; फिर यह मंत्र जिसमें लोकहित का सार छुपा है, उसमें बंधन क्यों लगाया गया?

🔵 देर तक विचारमंथन चलता रहा। यदि गुरुदेव की आज्ञा मानता हूँ तो अपने सन्यास धर्म और संसार को पाप से बचाने के कर्तव्य से गिरता हूए अपनी हानि नहीं-पर लोक हानि होती है। यदि गुरुदेव की बात नहीं मानता तो आज्ञा उल्लंघन क पाप लगता है।

🔴 इस मानसिक संघर्ष में नीद नहीं आई। दो तिहाई रात ऐसे ही अंतर्द्वंद्व में बीती। प्रातःकाल होने को आया तो एकाएक रामानुजाचार्य उठे और मकान की छत पर चढ गये और खडे होकर जोर-जोर से-"ऊँ नमो नारायणाय"- "ऊँ नमो नारायणाय" चिल्लाने लगे। आसपास के सभी लोगों की नींद टूट गई। लोग चौंककर जाग बैठे। रामानुजाचार्य मंत्र भी चिल्लाते जाते थे और यह भी समझाते जाते थे- ''भाइयों! जो भी इस मंत्र का निष्ठापूवक जाप करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।'' एकदूसरे शिष्य को भेजकर गुरु यतिराज ने रामानुज को अपने पास बुलाया। रामानुज अपराधी की भाँति गुरुदेव के समीप जा खडे हुए। रात भर नींद न आने के कारण आँखें सूज रही थी।

🔵 नाराज स्वर मे गुरुदेव ने पूछा- रामानुज! तुझसे मना किया था, यह मंत्र किसी के कान मे नही पडना चाहिये, तूने मेरी आज्ञा का उल्लंघन कैसे किया ?

🔴 देव! रामानुजाचार्य ने विनम्र वाणी मैं कहा आपकी आझा का पालन न करने से मुझे महापातक लगेगा, यह मैं जानता हूँ; किन्तु भगवान के इस सुंदर संसार को पापी और दु़ःखी नही देखा जाता। इस मंत्र से सबका उद्धार हो जाए तो क्या बुरा, मुझे जो यातना मिलेगी वह सब सह लूंगा, पर संसार का तो कल्याण हो जाएगा।

🔵 यतिराज शिष्य क्य इस लोकमंगल की निष्ठा से गद्गगद् हो उठे। रामानुज को छाती से लगाकर उन्होंने कहा- "रामानुज! तू ही मेरा सच्चा शिष्य है। तू निश्चित ही एक दिन सारे संसार को प्रकाश देगा।"

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹  संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 19, 20

👉 जडे़ कमजोर थी

🔴 एक रात भयंकर तूफान आया। सैकड़ों विशालकाय वृक्ष धराशायी हो गये। अनेक किशोर वृक्ष भी थे जो बच तो गये थे, पर बुरी तरह सकपकाये खड़े थे।

🔵 प्रात:काल आया, सूर्य ने अपनी रश्मियाँ धरती पर फेंकी। डरे हुए पौधों को देखकर किरणों ने पूछा- 'बालको। तुम इतना सहमे हुए क्यों हो। ' किशोर पौधों ने कहा- देवियो! ऊपर देखो हमारे कितने पुरखे धराशायी पड़े हैं। रात के तूफान ने उन्हें उखाड़ फेंका। न जाने कब यही स्थिति हमारी भी आ बने।

🔴 किरणें हँसी और बच्चों से बोली- तात! आओ इधर देखो- यह वृक्ष तूफान के कारण नहीं जड़ें खोखली हो जाने के कारण गिरे, तुम अपनी जड़ें मजबूत रखना, तूफान तुम्हारा कुछ भी बिगाड़ नहीं पायेंगे।

🔵 मनुष्यों का दीन- हीन होना विचित्र बात है। जब बिना साधनों के जंगल के जानवर स्वस्थ, निरोग और आमोद- प्रमोद का जीवन जी लेते हैं तो मनुष्य दु:खों का रोना क्यों रोये। स्पष्ट है उसकी तृष्णा, वासनायें और अहंता ही उसे श्मशान के भूत की तरह सताती रहती हैं। यदि व्यक्ति अपने दायरे को संकीर्ण न बनाता, इन तृष्णाओं के चंगुल में न फँसता तो दीन- दु:खी जीवन जीने की नौबत ही क्यों आती?

🌹 प्रज्ञा पुराण भाग 1 पृष्ठ 13

👉 एक विशेष समय (भाग 1)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 हममें से प्रत्येक परिजन को कुछ मान्यताएँ अपने मन में गहराई तक उतार लेनी चाहिए, इसलिये कि जिस समय में हम और आप जीवित रह रहे हैं, एक ऐसा समय है, जिसमें युग बदल रहा है और युग परिवर्तन की वेला है। हम में से प्रत्येक साधक को यह मानकर चलना चाहिए कि हमारा व्यक्तित्व विशेष है। हमको भगवान् ने किसी विशेष काम के लिये भेजा है। कीड़े-मकोड़े और दूसरे सामान्य तरह के प्राणी पेट भरने के लिये और औलाद पैदा करने के लिये पैदा होते हैं। मनुष्यों में से भी बहुत सारे ऐसे ही नर-पामर और नरकीटक हैं, उनके जीवन का कोई लेखा-जोखा नहीं, पेट भरने के अलावा और औलाद पैदा करने के अलावा दूसरा कोई काम वो न कर सकेगा, लेकिन कुछ विशेष व्यक्तियों के ऊपर भगवान् विश्वास करते हैं और ये मानकर भेजते हैं कि ये हमारे भी कुछ काम आ सकते हैं, अपने ही गोरख-धंधे में ही नहीं फँसे रहेंगे।

🔵 युग निर्माण परिवार के हर व्यक्ति को अपने बारे में ऐसी मान्यता बनानी चाहिए कि हमको भगवान् ने कोई विशेष काम के लिये भेजा है। ये कोई विशेष समय है और हममें से हर आदमी को यह अनुभव करना चाहिए कि युग की आवश्यकताओं को पूरा करने का उत्तरदायित्व हमारे कंधे पर है। अगर ये विश्वास कर सकें तो आपकी प्रगति का द्वार खुल सकता है और आप महामानवों के रास्ते पर चल सकते हैं और इस अपने परिवार के निर्माण का उद्देश्य आप सफलतापूर्वक पूरा कर सकते हैं। आपको विशिष्ट व्यक्तित्व मिलेगा, जो सामान्य मनुष्यों जैसा नहीं होगा।

🔴 ये विशेष समय है, सामान्य जैसे शान्ति के समय होते हैं, वैसा नहीं। ये आपत्तिकाल जैसा समय है और आपत्तिकाल में आपातकालीन उत्तरदायित्व होते हैं। हमारे ऊपर की जिम्मेदारियाँ, सामान्य जिम्मेदारियाँ नहीं हैं। पेट भरने मात्र की जिम्मेदारियाँ नहीं हैं। इस युग की भी जिम्मेदारियाँ हैं, ये मानकर हमको चलना चाहिए और ये मानकर के चलना चाहिए कि रीछ-वानर जिस तरीके से विशेष भूमिका निभाने के लिये आये थे और ग्वाल-बाल, श्रीकृष्ण भगवान् के साथ में विशेष उत्तरदायित्व निभाने के लिये आये थे। आप लोग इस तरह का अनुभव और विश्वास कर सकें कि आप लोग उसी तरीके से जुड़े हुए हैं और विशेष उत्तरदायित्व महाकाल का सौंपा हुआ है, उसे पूरा करने के लिये हम लोग आये हुए हैं। अगर ये बात मान सके तो फिर आपके सामने नये प्रश्न उत्पन्न होंगे और नई समस्याएँ उत्पन्न होंगी और नये आधार और नये कारण उत्पन्न होंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/amart_vachan_jivan_ke_sidha_sutra/ek_vishesh_samay

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 5)

🌹 सभी मानसिक स्फुरणाएं विचार नहीं

🔴 किन्तु मनुष्य की सभी मानसिक तथा बौद्धिक स्फुरणायें विचार ही नहीं होते। उनमें से कुछ विचार और कुछ मनोविकार तथा बौद्धिक विलास भी होता है। दुष्टता, अपराध तथा ईर्ष्या-द्वेष के मनोभाव, विकार तथा मनोरंजन, हास विलास तथा क्रीड़ा आदि की स्फुरणाएं बौद्धिक विलास मानी गई है। केवल मानसिक स्फुरणाएं ही विचारणीय होती हैं, जिनके पीछे किसी सृजन, किसी उपकार अथवा किसी उन्नति की प्रेरणा क्रियाशील रहती है। साधारण तथा सामान्य गतिविधि के संकल्प-विकल्प अथवा मानसिक प्रेरणायें विचार की कोटि में नहीं आती हैं। वे तो मनुष्य की स्वाभाविक वृत्तियां होती हैं, जो मस्तिष्क में निरन्तर आती रहती हैं।

🔵 यों तो सामान्यतया विचारों में कोई विशेष स्थायित्व नहीं होता । वे जल-तरंगों की भांति मानस में उठते और विलीन होते रहते हैं। दिन में न जाने कितने विचार मानव-मस्तिष्क में उठते और मिटते रहते हैं। चेतन होने के कारण मानव मस्तिष्क की यह प्राकृतिक प्रक्रिया है। विचार वे ही स्थायी बनते हैं, जिनसे मनुष्य का रागात्मक सम्बन्ध हो जाता है। बहुत से विचारों में से एक दो विचार ऐसे होते हैं, जो मनुष्य को सबसे ज्यादा, प्यारे होते हैं। वह उन्हें छोड़ने की बात तो दूर उनको छोड़ने की कल्पना तक नहीं कर सकता। 

🔴 यही नहीं, किसी विचार अथवा विचारों के प्रति मनुष्य रागात्मक झुकाव विचार को न केवल स्थायी अपितु अधिक प्रखर तेजस्वी बना देता है। इन विचारों की छाप मनुष्य के व्यक्तित्व तथा कर्तृत्व पर गहराई के साथ पड़ती है। रागात्मक विचार निरन्तर मथित अथवा चिन्तित होकर इतने दृढ़ और अपरिवर्तनशील हो जाते हैं कि वे मनुष्य के विषय व्यक्तित्व के अभिन्न अंग की भांति दूर से ही झलकने लगते हैं। प्रत्येक विचार जो इस सम्बन्ध में संस्कार बन जाता है, वह उसकी क्रियाओं में अनायास ही अभिव्यक्त होने लगता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 13)

🌹 दुरुपयोग के रहते अभाव कैसे मिटे

🔵 गए-गुजरे लोग किसी का बहुत भला नहीं कर सकते। उनके लिए अपनी गाड़ी घसीटना ही भारी पड़ता है। वे सब तो दरिद्रता, दुर्बलता और अशिक्षा के दल-दल में धँसे रहने के कारण किसी की कुछ भलाई भी नहीं कर सकते । सेवा सहायता का सुयोग उनसे बन ही नहीं पड़ता । इतने पर भी यह संतोष की बात है कि तथाकथित समर्थों की तरह वे अपनी चिनगारी को दावानल बनाकर, सुविस्तृत वन प्रदेशों को जला डालने की दृष्टता तो नहीं कर पाते।

🔴 लोक चिन्तन को दिग्भ्रान्त करने में जितना साहित्यकारों, कलाकारों, धर्मोपदेशकों, नेतृत्व करने वालों ने सर्वसाधारण को भड़काया है, उतना कदाचित् ही संसार के समस्त अशिक्षित कर सके हों। सम्पत्ति वालों ने, कलाकारों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों को अपने पैसे के बल पर खरीदा और कठपुतली की तरह नचाया है। कभी वैज्ञानिकों की स्वतन्त्र सत्ता रही होगी और वे लोकोपयोगी अविष्कार करते रहे होंगे, पर अब तो साधनों के सम्मुख उन्हें भी आत्मसमर्पण कर देना पड़ा है। वे वही सोचते-खोजते हैं, जो उनके अन्नदाता उनसे चाहते हैं। किसी की बुद्धिमत्ता ही नहीं, ईमान खरीद लेने तक का दावा तथाकथित सुसम्पन्न करने लगे हैं। उन्हें देवताओं और भगवानों को भी अपने साधनों के बल पर कुछ भी करने के लिए विवश करने की जुर्रत होने लगी है।  

🔵 साधनों की कमी पड़ने से कठिनाई बढ़ने की बात समझ में आती है, पर यह तथ्य और भी अधिक गम्भीरतापूर्वक समझा जाना चाहिए कि उनका बाहुल्य होने पर भी यदि दुरुपयोग चल पड़े, तो विपत्तियाँ और भी अधिक बढ़ेंगी। चाकू न होने पर शाक तरकारी काटने का काम अन्य किसी उपकरण से भी लिया जा सकता है , पर कोई चमकीला, धारदार तथा कीमती चाकू पेट में घुस पड़े, तो समझना चाहिए अभाव की तुलना में वह उपलब्धि और भी अधिक भारी पड़ी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 99)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 जातियों-संगठनों के वर्तमान स्वरूप और जाति-पांति से उत्पन्न होने वाली बुराइयों को ध्यान में रखते हुए तत्काल तो कोई भी विचारशील व्यक्ति इस प्रकार के प्रयत्नों का विरोध नहीं करेगा। जब उसे हमारे प्रयोजन का पता चलेगा और वस्तु स्थिति पर विचार करेगा तो उसे इसकी सामयिक उपयोगिता एवं आवश्यकता का महत्व भी स्वीकार करना पड़ेगा। कुएं में गिरना एक बात है और कुएं में गिरे हुये को निकालने के लिये कुएं में घुसना दूसरी बात है। जाति वाद की संकीर्णता से लड़ने के लिये और उस बुराई का उन्मूलन करने के लिये बनाये गये जातीय संगठन लहर एक जैसे दीख पड़ सकते हैं, पर वस्तुतः उनमें कुएं में गिरने वाले और निकालने के लिये उतरने वाले की तरह जमीन-आसमान का अन्तर है। हम संकीर्णता फैलाने के लिये नहीं वरन् उसके उन्मूलन के लिये जातीय संगठन बना रहे हैं। अस्तु इसका परिणाम भी हमारी भावना के अनुरूप ही होगा।

🔵 अखण्ड-ज्योति परिवार के लिये लोग अपने जातीय संगठन बनाने और उनके द्वारा आदर्श विचारों का प्रयोजन पूरा करने का प्रयत्न करें। इन संगठनों को अधिक सहायक बनाकर हम सामाजिक क्रान्ति की एक भारी आवश्यकता को पूरा भी कर सकते हैं।

🔴 1. संगठनों का नामकरण:-- इन जातीय संगठनों का निर्माण प्रगतिशीलता बढ़ाने के लिये किया जा रहा है। आज जातिवाद जिन कारणों से बदनाम है, उन्हें हटाना अपना उद्देश्य है। संकीर्णता, वंशगत अहंकार, अपनी जाति वालों के साथ पक्षपात, अपने वर्ग में प्रचलित रूढ़ियों का अन्ध-समर्थन जैसे कारणों से जातिवाद बदनाम हुआ है। हमें इन बातों से तनिक भी लगाव नहीं, अपना उद्देश्य तो जिस क्षेत्र में अपना अधिक परिचय, अधिक प्रभाव एवं अधिक सम्बन्ध रहता है, उसे अधिक सुविकसित, सुसंस्कृत एवं प्रगतिशील बनाना है। इसलिये अपने द्वारा संगठित सभाओं के साथ अनिवार्यतः ‘प्रगतिशील’ शब्द जुड़ा रहना चाहिये। ताकि अपने उद्देश्यों की प्राथमिकता और पुराने ढंग की जातीय सभाओं से अपनी भिन्नता सिद्ध कर सकें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 47)

🌹 ऋषि तंत्र से दुर्गम हिमालय में साक्षात्कार

🔴 मैं गुफा में से निकलकर शीत से काँपते हुए स्वर्णिम हिमालय पर अधर ही अधर गुरुदेव के पीछे-पीछे उनकी पूँछ की तरह सटा हुआ चल रहा था। आज की यात्रा का उद्देश्य पुरातन ऋषियों की तपस्थलियों का दिग्दर्शन करना था। स्थूल शरीर सभी ने त्याग दिए थे, पर सूक्ष्म शरीर उनमें से अधिकांश के बने हुए थे। उन्हें भेदकर किन्हीं-किन्हीं के कारण शरीर भी झलक रहे थे। नतमस्तक और करबद्ध नमन की मुद्रा अनायास ही बन गई। आज मुझे हिमालय पर सूक्ष्म और कारण शरीरों से निवास करने वाले ऋषियों का दर्शन और परिचय कराया जाना था। मेरे लिए आज की रात्रि जीवन भर के सौभाग्यशाली क्षणों में सबसे अधिक महत्त्व की वेला थी|

🔵 उत्तराखण्ड क्षेत्र की कुछ गुफाएँ तो जब तब आते समय यात्रा के दौरान देखीं थीं, पर देखी वही थीं, जो यातायात की दृष्टि से सुलभ थीं। आज जाना कि जितना देखा है, उससे अनदेखा कहीं अधिक है। इनमें जो छोटी थीं, वे तो वन्य पशुओं के काम आती थीं, पर जो बड़ीं थीं, साफ-सुथरी और व्यवस्थित थीं, वे ऋषियों के सूक्ष्म शरीरों के निमित्त थीं। पूर्व अभ्यास के कारण वे अभी भी उनमें यदा-कदा निवास करते हैं।

🔴 वे सभी उस दिन ध्यान मुद्रा में थे। गुरुदेव ने बताया कि वे प्रायः सदा इसी स्थिति में रहते हैं। अकारण ध्यान तोड़ते नहीं। मुझे एक-एक का नाम बताया और सूक्ष्म शरीर का दर्शन कराया गया। यही है सम्पदा, विशिष्टता और विभूति सम्पदा इस क्षेत्र की। गुरुदेव के साथ मेरे आगमन की बात उन सभी को पूर्व से ही विदित थी। सो हम दोनों जहाँ भी जिस-जिस समय पहुँचे, उनके नेत्र खुल गए। चेहरों पर हल्की मुस्कान झलकी और सिर उतना ही झुका, मानों वे अभिवादन का प्रत्युत्तर दे रहे हों। वार्तालाप किसी से कुछ नहीं हुआ। 
🔵 सूक्ष्म शरीर को कुछ कहना होता है, तो वे बैखरी, मध्यमा से नहीं परा और पश्यन्ति वाणी से, कर्ण छिद्रों के माध्यम से नहीं, अन्तःकरण में उठी प्रेरणा के रूप में कहते हैं, पर आज दर्शन मात्र प्रयोजन था। कुछ कहना-सुनना नहीं था। उनकी बिरादरी में एक नया विद्यार्थी भर्ती होने आया, सो उसे जान लेने और जब जैसी सहायता करने की आवश्यकता समझें, तब वैसी उपलब्ध करा देने का सूत्र जोड़ना ही उद्देश्य था। सम्भवतः यह उन्हें पहले ही बताया या चुका होगा कि उनके अधूरे कामों को समय की अनुकूलता के अनुसार पूरा करने के लिए यह स्थूल शरीर धारी बालक अपने ढंग से क्या-क्या कुछ करने वाला है एवं अगले दिनों इसकी भूमिका क्या होग|

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 47)

🌞  हिमालय में प्रवेश (सुनसान की झोंपड़ी)

🔵 लगा कि वह जल धारा कमल पुष्प सी सुन्दर एक देव कन्या के रूप में परिणित होती है। वह अलौकिक शांति, समुद्र सी सौम्य मुद्रा में ऐसी लगती थी मानो इस पृथ्वी की सारी पवित्रता एकत्रित होकर मानुषी शरीर में अवतरित हो रही हो। वह रुकी नहीं, समीप ही उस शिलाखण्ड पर आकर विराजमान हो गई। लगा—मानो जागृत अवस्था में ही यह सब देखा जा रहा हो।

🔴 उस देव कन्या ने धीरे-धीरे अत्यन्त शांत भाव से मुधर वाणी में कुछ कहना आरम्भ किया। मैं मन्त्र मोहित की तरह एकचित्त होकर सुनने लगा। वह बोली—नर तनु धारी आत्मा, तू अपने को इन निर्जन वन में अकेला मन मान। दृष्टि पसार कर देख चारों ओर तू ही बिखरा पड़ा है। मनुष्य तक अपने को सीमित मत मान। इस विशाल सृष्टि में मनुष्य भी एक छोटा-सा प्राणी है। उसका भी एक स्थान है, पर सब कुछ वही नहीं है। जहां मनुष्य नहीं वहां सूना है ऐसा क्यों माना जाय? अन्य जड़ चेतन माने जाने वाले जीव भी विश्वात्मा के वैसे ही प्रिय पुत्र हैं जैसा मनुष्य। तू उन्हें क्यों अपना सहोदर नहीं मानता? उनमें क्यों अपनी आत्मा नहीं देखता? उन्हें क्यों अपना सहचर नहीं समझता? इस निर्जन में मनुष्य नहीं है, पर अन्य अगणित जीवधारी मौजूद हैं। पशु-पक्षियों की, कीट-पतंगों की, वृक्ष वनस्पतियों की, अनेक योनियां इस गिरि कानन में निवास करती हैं। सभी में आत्मा है, सभी में भावना है। यदि तू इन अचेतन समझे जाने वाले चेतनों की आत्मा से अपनी आत्मा को मिला सके तो ए पथिक! तू अपनी खंड-आत्मा को समग्र-आत्मा के रूप में देख सकेगा।’’

🔵 धरती पर अवतरित हुई वह दिव्य सौंदर्य की अद्भुत प्रतिमा देव कन्या बिना रुके कहती ही जा रही थी—‘‘मनुष्य को भगवान् ने बुद्धि दी, पर वह अभागा उसका सुख कहां ले सका? तृष्णा और वासना में उसने इस दैवी वरदान का दुरुपयोग किया और जो आनन्द मिल सकता था उससे वंचित हो गया। वह प्रशंसा के योग्य प्राणी, करुणा का पात्र है। पर सृष्टि के अन्य जीव इस प्रकार की मूर्खता नहीं करते। उनमें चेतन की मात्रा न्यून भले ही हो पर भावना को उनकी भावना के साथ मिला कर तो देख। अकेलापन कहां-कहां है, सभी ही तेरे सहचर हैं। सभी तो तेरे बन्धु-बान्धव हैं।’’

🔴 करवट बदलते ही नींद की झपकी खुल गई। हड़बड़ा कर उठ बैठा। चारों ओर दृष्टि दौड़ाई तो वह अमृत-सा सुन्दर सन्देश सुनाने वाली देव कन्या वहां न थी। लगा मानों वह इसी सरिता में समा गई हो। मानुषी रूप छोड़कर जलधारा में परिणत हो गई हो। वे मनुष्य की भाषा में कहे गये शब्द सुनाई नहीं पड़ते थे, पर हर-हर कल-कल की ध्वनि में भाव वे ही गूंज रहे थे, संदेश वही मौजूद था। ये चमड़े वाले कान उसे सुन तो नहीं पा रहे थे पर कानों की आत्मा उसे अब भी समझ रही थी, ग्रहण कर रही थी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

👉 मन्त्र पूत जल का कमाल


🔴 इस बार की अमेरिका यात्रा में सघन कार्यक्रम थे। दिन में पाँच-छह प्रोग्राम। उसके बीच उन कार्यक्रम स्थलों की दूरी भी नापनी थी, साथ ही मिलने वाले आस्थावान, प्रश्रकर्ता भी विभिन्न प्रकार के। अतः शरीर थक कर चूर था। सोचा, रास्तें में आराम करेंगे। विराट वायुयान ३५० यात्री लेकर लॉस एन्जिल्स से उड़ान भरी, ताइवान, सिंगापुर होते हुए उसे दिल्ली पहुँचना था। बारह-तेरह घंटे की यात्रा थी। अतः लगा कि अब रात्रि आराम से कटेगी।

🔵 अचानक एक सवा घंटे बाद एक यात्री की तबियत अत्यधिक खराब हो गई। पायलट को कुछ सूझा नहीं। उसने एनाउन्स किया कि यदि वायुयान वापस ले जाते हैं तो तीन घंटे अतिरिक्त लगेंगे जाने-आने में, व आगे बढ़ते है तो यात्री की जान को खतरा है। अतः यदि वायुयान में कोई डाक्टर हो तो कृपया मदद करें।

🔴 उद्घोषणा सुनकर मैं तुरन्त पायलट के पास पहुंच गया। उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा। उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि यह व्यक्ति डॉक्टर हो सकता है। हम देवसंस्कृति का प्रचार करके जो लौट रहे थे। पीली धोती-कुर्ता, माथे पर तिलक, गले में रूद्राक्ष, हाथ में ब्रह्मदंड किसी सन्यासी से कम नहीं थे, सो उसने अपने विश्वास हेतु हमसे कुछ अंग्रेजी में पश्र पूछे। जब जवाब सही मिला विश्वास हुआ तब हमें मरीज तक ले जाया गया। हमने देखा उसे बहुत बेचैनी हो रही थी। थैले से निकाल कर हमने कुछ दर्दनाशक दवाईयाँ दी पर सब व्यर्थ। फिर थोड़ा तेल मंगवा कर उसके पैरों को मलने लगे। तब पायलट ने कहा- ‘‘आप तो बस बताते जाइये, परिचारिकाएँ हैं सब करेंगी।’’ फिर भी उसकी बेचैनी देखते हुए हम लगे रहे।
  
🔵 उसने जब हमें उसी बीच अकेला पाया तब कहा- ‘‘जरा सी कोकीन है क्या?’’ उसने समझा-सन्यासी है तो शायद कहीं इसके पास भी मिल जाय। आज के सन्यासियों के प्रति लोगों की मान्यता देखकर हमें बहुत संताप हुआ। पहले तो हमें उस व्यक्ति के ड्रग्स लेने का शक था लेकिन उसके इतना कहने पर अब तो पूर्ण विश्वास हो गया। अब हमने उसी के अनुरूप इलाज प्रारंभ किया।
  
🔴 गुरुसत्ता का स्मरण कर एक गिलास जल मँगाया। उसे गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित कर उसे पिला दिया। चूँकि  उसे नशे की काफी आदत थी इसलिये उसके बिना वह अधिक बेचैन था। सारी रात मालिश करते, नब्ज टटोलते, दवा देते व्यतीत हुई। अन्त में उसे नींद आई। तब तक पौ फट चुकी थी। लगभग आधे घंटे बाद सभी को स्थान छोड़ना था। 
  
🔵 ऋषिवर के मंत्रपूत जल ने अपना कमाल दिखा दिया था। हम सभी टोली के भाई गौरवान्वित थे एक भला कार्य सम्पन्न करके।

🌹 - डॉ०प्रणव पण्ड्या, देवसंस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से

प्रेरणादायक प्रसंग 9 Feb 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 32) 9 Feb

🌹 जीवन साधना के सुनिश्चित सूत्र   
🔴 क्या करें? प्रश्न के उत्तर में एक पूरक प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि क्या नहीं हो रहा है? और ऐसे क्या अनुपयुक्त हो रहा है, जिसे नहीं सोचा या नहीं किया जाना चाहिये था। किन्हीं सुविकसित और सुसंस्कृत बनने वालों के निजी दृष्टिकोण, स्वभाव और दिशा निर्धारण को समझते हुये यह देखा जाना चाहिये कि वैसा कुछ अपने से बन पड़ रहा है या नहीं? यदि नहीं बन पड़ रहा है तो उनका कारण और निवारण क्या हो सकता है? इस प्रकार के निर्धारण जीवन साधना के साधकों के लिये अनिवार्य रूप से आवश्यक है। जो अपनी त्रुटियों की उपेक्षा करता रहता है, जो अगले दिनों अधिक प्रखर और अधिक प्रामाणिक बनने की बात नहीं सोच सकता, उस प्रकार की योजना बनाकर उनके लिये कटिबद्ध होने की तत्परता नहीं दिखा सकता, उसके सम्बन्ध में यह आशा नहीं की जा सकती कि वह किसी ऐसी स्थिति में पहुँच सकेगा जिसमें अपने गर्व-गौरव अनुभव करने का अवसर मिल सके। साथ ही दूसरों का सहयोग, सम्मान पाकर अधिक ऊँची स्थिति तक पहुँच सकना सम्भव हो सके।

🔵 साधक के लिये आलस्य, प्रमाद, असंयम, अपव्यय एवं उन्मत्त और अस्त-व्यस्त रहना प्रमुख दोष है। अचिन्त्य चिन्तन और अकर्मों को अपनाना पतन-पराभव के यही दो कारण हैं। संकीर्ण स्वार्थपरता में अपने को जकड़े रहने वाले अपनी और दूसरों की दृष्टि में गिर जाते हैं। उत्कृष्टता और आदर्शवादिता से रिश्ता तोड़ लेने पर लोग समझते हैं कि इस आधार पर नफे में रहा जा सकेगा। पर बात यह है कि ऐसों को सर्वसाधारण की उपेक्षा सहनी पड़ती है और असहयोग की शिकायत बनी रहती है।                        

🔴 अपना चिन्तन, चरित्र, स्वभाव और व्यवहार यदि ओछेपन से ग्रसित हो तो उसे उसी प्रकार धो डालने का प्रयत्न करना चाहिये जैसे कि कीचड़ से सन जाने पर उस गन्दगी को धोने का अविलम्ब प्रयत्न किया जाता है। गन्दगी से सने फिरना किसी के लिये भी अपमान की बात है। इसी प्रकार मानवी गरिमा से अलंकृत होने पर भी क्षुद्रताओं और निकृष्टताओं का परिचय देना न केवल दुर्भाग्य सूचक है, वरन साथ में यह अभिशाप भी जुड़ता है कि कोई महत्त्वपूर्ण, उत्साहवर्द्धक और अभिनन्दनीय प्रगति कर सकने का आधार कभी हाथ ही नहीं आता।    

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अध्यवसायी-ईश्वरचंद्र

🔴 पं. ईश्वरचंद्र विद्यासागर के पिता दो-तीन रुपये मासिक के मजदूर थे। घर का गुजारा ही कठिनता से हो पाता था, तब पुत्र को पढ़ा सकने का प्रश्न ही न उठता था। किंतु उनकी यह इच्छा जरूर थी कि उनका पुत्र पढ़-लिखकर योग्य बने पर आर्थिक विवशता ने उन्हें इस इच्छा को महत्त देने से रोके रखा।

🔵 ईश्वरचंद्र जब कुछ सयाने हुए तो गाँव के लडकों को स्कूल जाता देखकर पिता से रोते हुए बोले- "मैं भी पढ़ने जाऊँगा।" पिता ने परिस्थिति बतलाते हुए कह- बेटा तेरे भाग्य में विद्या ही होती तो मेरे जैसे निर्धन के यही क्यों पैदा होता? कुछ और बडे होकर मेहनत मजदूरी करने की सोचना, जिससे ठीक तरह से पेट भर सके। पढ़ाई के विषय में सोचना फिजूल बात है।''

🔴 पिता की निराशापूर्ण बात सुनकर ईश्वरधंद्र मन मसोसकर रह गये। इससे अधिक वह बालक और कर भी क्या सकता था? पिता का उत्तर पाकर भी उसका उत्साह कम नहीं हुआ। उसने पढ़ने वाले अनेक छात्रों को मित्र बनाया और उनकी किताब से पूछकर पढ़ने लगा। इस प्रकार धीरे-धीरे उसने अक्षर-ज्ञान प्राप्त कर लिया और एक दिन कोयले से जमीन पर लिखकर, पिता को दिखलाया। पिता विद्या के प्रति उसकी लगन देखकर मन-ही मन निर्धनता को कोसने लगे। पुत्र को पढाने के लिए उनका हृदय अधीर हो उठा।

🔵 एक दिन कुछ अधिक कमाने के लिए वे ईश्वरचंद को लेकर कलकत्ता की ओर चल दिए। रास्ते में एक जगह सुस्ताने के लिए रुककर उन्होंने कहा-न जाने कितनी दूर चले आऐ हैं ? अनायास ही ईश्वरचंद्र बोल उठा- ६ मील पिताजी! उन्होंने आश्चर्य से पूछा- तुझे कैसे पता चला 'ईश्वरचंद्र ने बतलाया कि पास के मील पत्थर पर ६ लिखा है। पिता यह जानकर हर्ष-विभोर हो गये कि ईश्वरचंद्र ने चलते-चलते मील के पत्थरों से ही अंग्रेजी अंकों का ज्ञान कर लिया। वे उसे लेकर वही से घर वापस लौट पडे। रास्ते भर सोचते आए कि यदि ऐसे जिज्ञासु तथा उत्साही पुत्र को पढने से वंचित रखा तो यह बहुत बडा अपराध होगा। मैं एक वक्त खाऊँगा, घर को आधा पेट रखूँगा, किंतु ईश्वरचंद्र को पाठशाला अवश्य भेजूँगा। घर आकर उन्होंने ईश्वरचंद्र को गाँव की पाठशाला में भरती करा दिया।

🔴 गाँव से आगे पढा़ सकना तो पिता के लिये सर्वथा असंभव था। उन्होंने इनकार किया। इस पर ईश्वरचंद्र ने प्रार्थना की कि वे उसे किसी विद्यालय में भरती भर करा दें उसके बाद उसे कोई खर्च न दें। वह शहर में स्वयं उसका प्रबंध कर लेगा। पिता ने उनकी बात मान ली और उसे कलकत्ता के एक संस्कृत विद्यालय मे भरती करा दिया। विद्यालय में पहुँचकर ईश्वरचंद्र ने अपनी सेवा, लगन तथा योग्यता के बल पर शिक्षको को यही तक प्रसन्न कर लिया कि उनकी फीस माफ हो गई। पुस्तकों के लिए वह अपने सहपाठिर्यो का साझीदार हो जाता था।

🔵 अपनी इस व्यवस्था के साथ संतुष्ट रहकर ईश्वरचद्र ने अध्ययन में इतना परिश्रम किया कि उन्नीस वर्ष की आयु पहुंचते पहुँचते उन्होंने व्याकरण, साहित्य, अलंकार, स्मृति तथा वेदांत शास्त्र में निपुणता प्राप्त कर ली। उनकी असंदिग्ध विद्वता तथा तदनुकूल आचरण से प्रभावित होकर विद्वानों की एक सभा ने उन्हें मानपत्र के साथ "विद्यासागर" की उपाधि से विभूषित किया और उसके मूल्यांकन में अनुरोधपूर्वक फोर्ट विलियम संस्कृत कालेज में प्रधान पंडित के पद पर नियुक्त कर लिए गये। परिश्रम एवं पुरुषार्थ का सहारा लेने वाले ईश्वरचंद का जीवन ही बदल गया। वहाँ लोग उनके दो-चार रुपये मासिक का मजदूर बनने की सोच रहे थे और कही वे भारत के ऐतिहासिक व्यक्ति बनकर राष्ट्र के श्रद्धा पात्र बनकर अमर हो गये।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹  संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 17, 18

👉 बलि का तेज चला गया

🔴 राजा बलि असुर कुल में उत्पन्न हुए थे पर वे बड़े सदाचारी थे और अपनी धर्म परायपता के उनने बहुत वैभव और यश कमाया था। उनका पद इन्द्र के समान हो गया। पर धीरे- धीरे जब धन सें उत्पन्न होने वाले अहंकार, आलस्य, दुराचार जैसे दुर्गुण बढ़ने लगे तो उनके भीतर वाली शक्ति खोखली होने लगी।

🔵 एक दिन इन्द्र की बलि से भेंट हुई तो सबने देखा कि बलि के शरीर से एक प्रचण्ड तेज निकलकर इन्द्र के शरीर में चला गया है और बलि श्री विहीन हो गये।

🔴 उस तेज से पूछा गया कि आप कौन हैं? और क्यों बलि के शरीर से निकलकर इन्द्र की देह में गये? तो तेज ने उत्तर दिया कि मैं सदाचरण है। मैं जहां भी रहता हूँ वहीं सब विभूतियाँ रहती हैं।

🔵 बलि ने तब तक मुझे धारण किया जब तक उसका वैभव बढ़ता रहा था। जब इसने मेरी उपेक्षा कर दी तो मैं सौभाग्य को साथ लेकर, सदाचरण में तत्पर इन्द्र के यहाँ चला आया हूँ।

🔴 बलि का सौभाग्य सूर्य अस्त हो गया और इन्द्र का चमकने लगा, उसमें सदाचरण रूपी तेज की समाप्ति ही प्रधान कारण थी।

🔵 ऐसे भी व्यक्ति होतै हैं जो अपने व्यक्तित्व को ऊँचा उठाकर अपने को महामानव स्तर तक पहुँचा देते है, जन सम्मान पाते हैं। ऐसे निष्ठावानों से भारतीय- संस्कृति सदा से गौरवान्वित होती रही है।

🌹 प्रज्ञा पुराण भाग 1 पृष्ठ 12

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 4)

🌹 विचार शक्ति सर्वोपरि

🔴 ईश्वर के मन में, ‘एकोऽहं बहुस्यामि’ का विचार आते ही यह सारी जड़-चेतनमय सृष्टि बनकर तैयार हो गई, और आज भी वह उसको विचार के आधार पर ही स्थिति है और प्रलयकाल में विचार निर्धारण के आधार पर ही उसी ईश्वर में लीन हो जायेगी। विचारों में सृजनात्मक और ध्वंसात्मक दोनों प्रकार की अपूर्व, सर्वोपरि और अनन्त शक्ति होती है। जो इस रहस्य को जान जाता है, वह मानो जीवन के एक गहरे रहस्य को प्राप्त कर लेता है। विचारणाओं का चयन करना स्थूल मनुष्य की सबसे बड़ी बुद्धिमानी है। उनकी पहचान के साथ जिसको उसके प्रयोग की विधि विदित हो जाती है, वह संसार का कोई भी अभीष्ट सरलतापूर्वक पा सकता है।

🔵 संसार की प्रायः सभी शक्तियां जड़ होती हैं, विचार-शक्ति, चेतन-शक्ति है। उदाहरण के लिए धन अथवा जन-शक्ति ले लीजिये। अपार धन उपस्थित हो किन्तु समुचित प्रयोग करने वाला कोई विचारवान् व्यक्ति न हो तो उस धनराशि से कोई भी काम नहीं किया जा सकता। जन-शक्ति और सैनिक-शक्ति अपने आप में कुछ भी नहीं है। जब कोई विचारवान् नेता अथवा नायक उसका ठीक से नियन्त्रण और अनुशासन कर उसे उचित दिशा में लगता है, तभी वह कुछ उपयोगी हो पाती है अन्यथा वह सारी शक्ति भेड़ों के गले के समान निरर्थक रहती है। 

🔴 शासन, प्रशासन और व्यवसायिक सारे काम एक मात्र विचार द्वारा ही नियन्त्रित और संचालित होते हैं। भौतिक क्षेत्र में भी नहीं उससे आगे बढ़कर आत्मिक क्षेत्र में भी एक विचार-शक्ति ही ऐसी है, जो काम आती है। न शारीरिक और न साम्पत्तिक कोई अन्य-शक्ति काम नहीं आती। इस प्रकार जीवन तथा जीवन के हर क्षेत्र में केवल विचार-शक्ति का ही साम्राज्य रहता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 12)

🌹 दुरुपयोग के रहते अभाव कैसे मिटे

🔵 विभूतियों को सही गलत तरीके से अर्जित कर लेना एक बात है और उनका सदुपयोग कर सकना सर्वथा दूसरी। सम्पदाओं के संग्रहकर्ता इस संसार में असंख्यों भरे पड़े हैं, पर जो उनका सही सदुपयोग कर पाये, वे खोजने पर भी उँगलियों पर गिनने जितने ही मिलेंगे। इसे एक विडम्बना ही कह सकते हैं कि सफलताएँ अर्जित करने वाले को सदुपयोग नहीं आता और जो उसे सही प्रयोजनों में प्रयुक्त कर सकते हैं, वे पुरुषार्थ को अर्जन के स्तर तक पहुँचा सकने में समर्थ नहीं हो पाते। काश, प्रतिभा और सदाशयता का एक ही केन्द्र पर केन्द्रीकरण बन पड़ा होता, तो यह संसार कितना सुखी और समुन्नत दृष्टिगोचर होता?

🔴 सदुपयोग न बन पड़े तो इसमें भी किसी प्रकार संतोष किया जाता रह सकता है कि जो कमाया गया था, वह निरर्थक गुम गया, पर कष्ट तब होता है कि जिसके सदुपयोग से व्यक्ति और समाज का बहुत कुछ हित साधन हो सकता था, उसका ठीक उल्टा प्रयोग बन पड़ा और अनर्थ का वह सरञ्जाम जुटा, जिससे कम से कम बचा तो जा सकता था। 

🔵 समर्थ व्यक्ति ही उद्दण्डता अपनाते और अनाचार पर उतारू होते हैं। सम्पन्न लोग ही अपने वैभव को ऐसे प्रयोजनों में नियोजित करते हैं, जिनसे शोषण, उत्पीड़न और पतन-पराभव का माहौल बनें। संसार में छल, छद्म और प्रपञ्च के जाल बिछाने वालों में प्रधानतया वही लोग रहे हैं, जिन्हें विद्वान समझा और बुद्धिमान कहा जाता है। युद्धोन्माद भड़काने और असंख्यों पर अगणित विपत्तियाँ ढाने वालों में सत्ताधारी ही अग्रणी रहें हैं। अच्छा होता यह मूर्धन्य कहे जाने वाले सफल न होते। उस सफलता को क्या कहा जाये? जो विभूतियों के रूप में जब किसी पर विषम ज्वर की तरह चढ़ दौड़ती हैं, तो उसे एक प्रकार का उन्मादी बनाए बिना नहीं रहतीं। बदहवासी में लोग अधपगलों जैसी उद्दण्डता अपनाने के लिए उतारू हो उठते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 युग परिवर्तन (भाग 2)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी
🔴 अगर इसी क्रम से, इसी राह पर जिस पर आज हम चल रहे हैं, वैज्ञानिक उन्नति, मनुष्यों के भीतर स्वार्थपरता की वृद्धि, मनुष्यों की सन्तानों पर नियंत्रण का अभाव यही क्रम चला तो दुनिया नष्ट हो जायेगी। आप ध्यान रखना सौ वर्ष बाद हम तो जिंदा नहीं रहेंगे, आपमें से कोई जिंदा रह जाये तो देखना दुनिया का क्या हाल होता है, अगर ये स्थिति बनी रही तो। एक और स्थिति है, जिसका हम ख्वाब देखते हैं। सपने हम देखते हैं। हमारे स्वप्नों की दुनियाँ बड़ी खूबसूरत दुनियाँ है, ऐसी दुनियाँ है, जिसमें प्यार भरा हुआ है, मोहब्बत भरी हुई है, विश्वास भरे हुए हैं, एक-दूसरे के प्रति सहकार भरे हुए हैं, एक-दूसरे की सेवा भरी हुई है, इतनी मीठी, इतनी मधुर दुनियाँ है, हमारे दिमाग में घूमती है। अगर हमारे सपने कदाचित् साकार हो गये तो ये भरा हुआ विज्ञान, ये भरा हुआ धन, ये भरी हुई विद्या, ये भरी हुई सुविधाएँ, आदमी के लिये मैं सोचता हूँ स्वर्ग के वातावरण को उतार करके जमीन पे ले आयेगी।

🔵 हजारों-लाखों वर्ष पूर्व न सड़कें थीं, न बिजली थी, न रोशनी थी, न टेलीफोन था, न डाकखाना था, न कुछ भी नहीं था। ऐसे अभाव के जमाने में स्वर्गीय जिन्दगी जीया करते थे। आज बेहतरीन परिस्थितियों में दुनिया में इतनी शान्ति, इतनी सरसता, इतना सौंदर्य, इतना सुख पैदा कर सकते हैं कि हम नहीं कह सकते। जिस चौराहे पर हम खड़े हुए हैं, एक विनाश का चौराहा और एक उन्नति का चौराहा है। उन्नति में क्या होने वाला है, इसके लिये आपको भूमिका निभानी पड़ेगी। काष्टींग वोट आपका है। दो वोट बराबर होते हैं। एक वोट प्रेसीडेन्ट का होता है। प्रेसीडेन्ट दोनों वोट बराबर वाले में से जिसको चाहे उसके पक्ष में अपना डाल सकता है, उसी को जिता सकता है। आप लोग, आप लोग बैलेंसिंग पॉवर में हैं। आप चाहें तो अपना वोट उसकी ओर डाल सकते हैं, जो पक्ष विनाश की ओर जा रहा है। आप चाहें तो अपना पक्ष उसके पक्ष में डाल सकते हैं, जो सुख और शान्ति लाने के लिये जा रहा है।

🔴 मैं सोचता हूँ, आपको ऐसा ही करना चाहिये। सुख-शान्ति के लिये अपना वोट डालना चाहिये और आपको अपनी वर्तमान जिन्दगी, जानवरों के तरीके से नहीं जीनी चाहिये। आपको अपनी वर्तमान जिन्दगी मनुष्यों के तरीके से, विचारशीलों के तरीके से, समझदार के तरीके से खर्च करना चाहिये। ये विशेष समय है, ऐसा समय फिर आने वाला नहीं है।

🌹 आज की बात समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 98)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 आदर्श विवाह तभी सम्भव हो सकते हैं जब वर और कन्या दोनों पक्ष इसके लिये सहमत हों। एक पक्ष कितना ही आदर्शवादी क्यों न हो, बिना दूसरा पक्ष अपने अनुकूल मिले इन विचारों को कार्यान्वित न कर सकेगा। इसलिए यह आवश्यक है कि कोई ऐसा तन्त्र खड़ा किया जाय जिसके माध्यम से एक समान विचार और आदर्शों के लोगों को ढूंढ़ने की सुविधा मिल सके। यह प्रयोजन प्रगतिशील जातियों के संगठनों के माध्यम से ही पूरा हो सकता है।

🔵 अत्यधिक उत्साही लोग यह भी सोच कर सकते हैं कि अपनी जाति को छोड़कर अन्य जातियों में अपने विचार के लोगों को साथ विवाह क्यों न आरम्भ किये जाय? आदर्श के लिये यह विचार उत्तम हैं। ऊंचे घर के लोगों के लिये सम्भव भी है। पर भारत की वर्तमान स्थिति में सर्व साधारण के लिये इतना बड़ा कदम उठा लेने के बाद जो कठिनाइयां उपस्थित होती हैं, उन्हें नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता। प्रस्तुत योजना अखण्ड-ज्योति परिवार के लोगों को ध्यान में रखते हुए आरम्भ की गई है।

🔴 उनकी स्थिति हमें विदित है। इसलिये उन्हें अभी मितव्ययी विवाह के लिये ही जोर दे सकना उचित है। उन जातियों के बन्धन शिथिल करने के लिये ही उन्हें कहा जा सकता है। जिनमें अधिक साहस हो वे जाति-पांति की परवा किये बिना भी विवाह करें, पर जो एक बार भी उतना न कर सकेंगे वे अपनी जातियों में सम्बन्ध करने को उत्सुक होंगे। उनका काम इतने साहस से भी कहा जायगा। रूढ़ि ग्रसित समाज में आर्थिक सुधार ही सफल हो सकते हैं। अत्यधिक उत्साह आदर्शवाद की दृष्टि से प्रशंसनीय हो सकता है पर समय से पूर्व उठाये गए कदमों के असफल होने की ही संभावना ज्यादा रहती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 46)

🌹 ऋषि तंत्र से दुर्गम हिमालय में साक्षात्कार

🔴 नंदन वन में पहला दिन वहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य को निहारने, उसी में परम सत्ता की झाँकी देखने में निकल गया। पता ही नहीं चला कि कब सूरज ढला और रात्रि आ पहुँची। परोक्ष रूप से निर्देश मिला, समीपस्थ एक निर्धारित गुफा में जाकर सोने की व्यवस्था बनाने का। लग रहा था कि प्रयोजन सोने का नहीं, सुरक्षित स्थान पर पहुँचाने का है, ताकि स्थूल शरीर पर शीत का प्रकोप न हो सके। सम्भावना थी कि पुनः रात्रि को गुरुदेव के दर्शन होंगे। ऐसा हुआ भी।

🔵 उस रात्रि को गुफा में गुरुदेव सहसा आ पहुँचे। पूर्णिमा थी। चन्द्रमा का सुनहरा प्रकाश समूचे हिमालय पर फैल रहा था। उस दिन ऐसा लगा कि हिमालय सोने का है। दूर-दूर बर्फ के टुकड़े तथा बिन्दु बरस रहे थे, वे ऐसा अनुभव कराते थे, मानों सोना बरस रहा है। मार्गदर्शक के आ जाने से गर्मी का एक घेरा चारों ओर बन गया। अन्यथा रात्रि के समय इस विकट ठंड और हवा के झोंकों में साधारणतया निकलना सम्भव न होता। दुस्साहस करने पर इस वातावरण में शरीर जकड़ या ऐंठ सकता था।

🔴 किसी विशेष प्रयोजन के लिए ही यह अहैतुकी कृपा हुई, यह मैंने पहले ही समझ लिया, इसलिए इस काल में जाने का कारण पूछने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। पीछे-पीछे चल दिया। पैर जमीन से ऊपर उठते हुए चल रहे थे। आज यह जाना कि सिद्धि में ऊपर हवा में उड़ने की-अंतरिक्ष में चलने की क्यों आवश्यकता पड़ती है। उन बर्फीले ऊबड़-खाबड़ हिम खण्डों पर चलना उससे कहीं अधिक कठिन था, जितना कि पानी की सतह पर चलना। आज उन सिद्धियों की अच्छी परिस्थितियों में आवश्यकता भले ही न पड़े, पर उन दिनों हिमालय जैसे विकट क्षेत्रों में आवागमन की कठिनाई को समझने वालों के लिए आवश्यकता निश्चय ही पड़ती होगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 46)

🌞  हिमालय में प्रवेश (सुनसान की झोंपड़ी)

🔵 लगाम खींचने पर जैसे घोड़ा रुक जाता है उसी प्रकार वह सूनेपन को कष्ट कर सिद्ध करने वाला विचार प्रवाह भी रुक गया। निष्ठा ने कहा—एकान्त साधना की आत्म-प्रेरणा असत् नहीं हो सकती। निष्ठा ने कहा—जो शक्ति इस मार्ग पर खींच लाई है, वह गलत मार्ग-दर्शन नहीं कर सकती। भावना ने कहा—जीव अकेला आता है, अकेला जाता है, अकेला ही अपनी शरीर रूपी कोठरी में बैठा रहता है, क्या इस निर्धारित एकान्त विधान में उसे कुछ असुखकर प्रतीत होता है? सूर्य अकेला चलता है, चन्द्रमा अकेला उदय होता है, वायु अकेला बहती है। इसमें उन्हें कुछ कष्ट है?

🔴 विचार से विचार कटते हैं, इस मनः शास्त्र के सिद्धान्त ने अपना पूरा काम किया। आधी घड़ी पूर्व जो विचार अपनी पूर्णता अनुभव कर रहे थे, अब वे कटे वृक्ष की तरह गिर पड़े। प्रतिरोधी विचारों ने उन्हें परास्त कर दिया। आत्मवेत्ता इसी लिए अशुभ विचारों को शुभ विचारों से काटने का महत्व बताते हैं। बुरे से बुरे विचार चाहे वे कितने प्रबल क्यों न हों, उत्तम प्रतिपक्षी विचारों से काटे जा सकते हैं। अशुद्ध मान्यताओं को शुद्ध मान्यताओं के अनुरूप कैसे बनाया जा सकता है, यह उस सूनी रात में करवटें बदलते हुए मैंने प्रत्यक्ष देखा। अब मस्तिष्क एकांत की उपयोगिता, आवश्यकता और महत्ता पर विचार करने लगा।

🔵 रात धीरे-धीरे बीतने लगी। अनिद्रा से ऊबकर कुटिया से बाहर निकला तो देखा कि गंगा की धारा अपने प्रियतम समुद्र से मिलने के लिये व्याकुल प्रेयसी की भांति तीव्र गति से दौड़ी चली जा रही थी। रास्ते में पड़े हुए पत्थर उसका मार्ग अवरुद्ध करने का प्रयत्न करते पर वह उनके रोके रुक नहीं पा रही थी। अनेकों पाषाण खण्डों की चोट से उसके अंग प्रत्यंग घायल हो रहे थे तो भी वह न किसी की शिकायत करती थी और न निराश होती थी। इन बाधाओं का उसे ध्यान भी न था, अंधेरे का, सुनसान का उसे भय न था। अपने हृदयेश्वर के मिलन की व्याकुलता उसे इन सब बातों का ध्यान भी न आने देती थी। प्रिय के ध्यान में निमग्न ‘हर-हर, कल-कल’ का प्रेग-गीत गाती हुई गंगा निद्रा और विश्राम को तिलांजलि दे कर चलने से ही लौ लगाए हुए थी।

🔴 चन्द्रमा सिर के ऊपर आ पहुंचा था। गंगा की लहरों में उसके अनेकों प्रतिबिम्ब चमक रहे थे। मानो एक ही ब्रह्म अनेक शरीरों में प्रविष्ट होकर एक से अनेक होने की अपनी माया दृश्य रूप से समझा रहा हो। दृश्य बड़ा सुहावना था। कुटिया से निकल कर गंगातट के एक बड़े शिलाखण्ड पर जा बैठा और निर्निमेष होकर उस सुन्दर दृश्य को देखने लगा। थोड़ी देर में झपकी लगी और उस शीतल शिला खण्ड पर ही नींद आ गई।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

प्रेरणादायक प्रसंग 8 Feb 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 31) 8 Feb

🌹 जीवन साधना के सुनिश्चित सूत्र- 

🔴 हर व्यक्ति की मन:स्थिति परिस्थिति अलग होती है। यही बात दुर्गुणों और सद्गुणों की न्यूनाधिकता के सम्बन्ध में भी है। किसे अपने में क्या सुधार करना चाहिये और किन नई सत्प्रवृत्तियों का संवर्द्धन गुण, कर्म, स्वभाव के क्षेत्र में करना है? यह आत्म-समीक्षा के आधार पर सही विश्लेषण होने के उपरान्त ही सम्भव है। इसके लिये कोई एक निर्धारण नहीं हो सकता है। यह कार्य हर किसी को स्वयं करना होता है। दूसरों को तो थोड़ा-बहुत परामर्श ही काम दे सकता है।

🔵 नित्य-निरन्तर हर कोई किसी के साथ रहता नहीं। फिर रोग का कारण और निदान जानते हुए उपचार का निर्धारण कोई अन्य किस प्रकार कर सके? थोड़े समय तक सम्पर्क में आने वाला केवल उतनी ही बात जान सकता है, जितनी कि मिलन काल में उभरकर सामने आती है। यह सर्वथा अधूरी रहती है। इसलिये अन्यान्यों के परामर्श पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहा जा सकता। यह कार्य स्वयं अपने को ही करना पड़ता है। इसमें भी एक कठिनाई यह है कि मानसिक संरचना के अनुसार हर व्यक्ति अपने को निर्दोष मानता है, साथ ही सर्वगुण सम्पन्न भी समझता रहता है।                       

🔴 यह स्थिति सुधार और विकास दोनों में बाधक है? जब तक कमी का आभास न हो तब तक उसकी पूर्ति का तारतम्य कैसे बने? अस्तु, आत्मविकास के मार्ग पर चलने वाले, जीवन साधना के मार्ग पर अग्रसर होने के इच्छुक प्रत्येक व्यक्ति को चाहिये कि निष्पक्षता की मनोभूमि विकसित की जाये। खासतौर से अपने सम्बन्ध में उतना ही तीखापन होना चाहिये जितना कि आमतौर से दूसरों के दोष-दुर्गुण ढूँढ़ने में हर किसी का रहता है। आरोप लगाने और लांछित करने में हर किसी को प्रवीण पाया जाता है। इस सहज वृत्ति को ठीक उल्टा करने से आत्मसमीक्षा की वह प्राथमिक आवश्यकता पूरी होती है, जिसके बिना व्यक्तित्व का निखार प्राय: असम्भव ही बना रहता है। वह न बन पड़े तो किसी को भी महानता अपनाने और प्रगति के उच्च शिखर तक पहुँच सकने का अवसर मिल ही नहीं सकता।      

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 शिवजी कोढी बने

🔴 मनुष्य के चिन्तन और व्यवहार से ही आचरण बनता हैं। वातावरण से परिस्थिति बनती है और वही सुख-दुःख, उत्थान-पतन का निर्धारण करती हैं। जमाना बुरा है, कलयुग का दौर है, परिस्थितियाँ कुछ प्रतिकूल बन गयी हैं, भाग्य चक्र कुछ उल्टा चल रहा है-ऐसा कह कर लोग मन को हल्का करते हैं, पर इससे समाधान कुछ नहीं निकलता। जन समाज में से ही तो अग्रदूत निकलते हैं।

🔵 एक बार पार्वती ने शिवजी से पूछा-' भगवन्! लोग इतना कर्मकाण्ड करते हैं फिर भी इन्हें आस्था का लाभ क्यों नहीं मिलता? शिवजी बोले-धार्मिक कर्मकाण्ड होने पर भी मनुष्य जीवन में जो बने आडम्बर छाया है; यहीं अनास्था है। लोग धार्मिकता का दिखावा करते हैं, उनके मन वैसे नहीं है। परीक्षा लेने दोनों धरती पर आये।

🔴 मां पार्वती ने सुन्दरी साध्वी पत्नी का व शिवजी ने कोढ़ी का रूप धारण किया। मन्दिर की सीढ़ियों के समीप वे पति को लेकर बैठ गयीं। दानदाता दर्शनार्थ आते रहे व रुककर कुछ पल पार्वती जी को देखकर आगे बढ़ जाते। बेचारे शिवजी को गिनें चुनें कुछ सिक्के मिल पाये। कुछ दान दाताओं ने तो संकेत भी किया कि कहाँ इस कोढ़ी पति के साथ बैठी हो। इन्हें छोड दो। पार्वतीजी सहन नहीं कर पायीं, बोलीं-! प्रभु! लौट चलिए अब कैलाश पर। सहन नहीं होता इन पाखण्डियों के यह कुत्सित स्वरूप।

🔵 इतने में ही एक दीन-हीन भक्त आया, पार्वतीजी के चरण हुए और बोला- माँ! आप धन्य हैं जो पति परायण हो इनकी सेवा में लगी है। आइये! मैं इनके घावों को धो दूँ। फिर मेरे पास जो भी कुछ सतू आदि हैं, आप हम साथ-साथ खा लें। ब्राह्मण यात्री ने घावों पर पट्टी बाँधी, सतू थमा पुन: प्रणाम, कर ज्योंही आगे बढ़ा वैसे ही शिवजी ने कहा-' यही है भार्ये एकमात्र भक्त, जिसने मन्दिर में  प्रवेश से पूर्व निष्कपट भाव से सेवा धर्म को प्रधानता दी।

🔴 ऐसे लोग गिने चुने हैं। शेष तो सब आत्म प्रवंचना भर करते है व अवगति को प्राप्त होते हैं। शिव-पार्वती ने अपने वास्तविक स्वरूप में उस भक्त को दर्शन दिये। परमगति का अनुदान दिया व वापस लौट गये।

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 2 Sep 2026

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