गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 5)

🌹 सभी मानसिक स्फुरणाएं विचार नहीं

🔴 किन्तु मनुष्य की सभी मानसिक तथा बौद्धिक स्फुरणायें विचार ही नहीं होते। उनमें से कुछ विचार और कुछ मनोविकार तथा बौद्धिक विलास भी होता है। दुष्टता, अपराध तथा ईर्ष्या-द्वेष के मनोभाव, विकार तथा मनोरंजन, हास विलास तथा क्रीड़ा आदि की स्फुरणाएं बौद्धिक विलास मानी गई है। केवल मानसिक स्फुरणाएं ही विचारणीय होती हैं, जिनके पीछे किसी सृजन, किसी उपकार अथवा किसी उन्नति की प्रेरणा क्रियाशील रहती है। साधारण तथा सामान्य गतिविधि के संकल्प-विकल्प अथवा मानसिक प्रेरणायें विचार की कोटि में नहीं आती हैं। वे तो मनुष्य की स्वाभाविक वृत्तियां होती हैं, जो मस्तिष्क में निरन्तर आती रहती हैं।

🔵 यों तो सामान्यतया विचारों में कोई विशेष स्थायित्व नहीं होता । वे जल-तरंगों की भांति मानस में उठते और विलीन होते रहते हैं। दिन में न जाने कितने विचार मानव-मस्तिष्क में उठते और मिटते रहते हैं। चेतन होने के कारण मानव मस्तिष्क की यह प्राकृतिक प्रक्रिया है। विचार वे ही स्थायी बनते हैं, जिनसे मनुष्य का रागात्मक सम्बन्ध हो जाता है। बहुत से विचारों में से एक दो विचार ऐसे होते हैं, जो मनुष्य को सबसे ज्यादा, प्यारे होते हैं। वह उन्हें छोड़ने की बात तो दूर उनको छोड़ने की कल्पना तक नहीं कर सकता। 

🔴 यही नहीं, किसी विचार अथवा विचारों के प्रति मनुष्य रागात्मक झुकाव विचार को न केवल स्थायी अपितु अधिक प्रखर तेजस्वी बना देता है। इन विचारों की छाप मनुष्य के व्यक्तित्व तथा कर्तृत्व पर गहराई के साथ पड़ती है। रागात्मक विचार निरन्तर मथित अथवा चिन्तित होकर इतने दृढ़ और अपरिवर्तनशील हो जाते हैं कि वे मनुष्य के विषय व्यक्तित्व के अभिन्न अंग की भांति दूर से ही झलकने लगते हैं। प्रत्येक विचार जो इस सम्बन्ध में संस्कार बन जाता है, वह उसकी क्रियाओं में अनायास ही अभिव्यक्त होने लगता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 13)

🌹 दुरुपयोग के रहते अभाव कैसे मिटे

🔵 गए-गुजरे लोग किसी का बहुत भला नहीं कर सकते। उनके लिए अपनी गाड़ी घसीटना ही भारी पड़ता है। वे सब तो दरिद्रता, दुर्बलता और अशिक्षा के दल-दल में धँसे रहने के कारण किसी की कुछ भलाई भी नहीं कर सकते । सेवा सहायता का सुयोग उनसे बन ही नहीं पड़ता । इतने पर भी यह संतोष की बात है कि तथाकथित समर्थों की तरह वे अपनी चिनगारी को दावानल बनाकर, सुविस्तृत वन प्रदेशों को जला डालने की दृष्टता तो नहीं कर पाते।

🔴 लोक चिन्तन को दिग्भ्रान्त करने में जितना साहित्यकारों, कलाकारों, धर्मोपदेशकों, नेतृत्व करने वालों ने सर्वसाधारण को भड़काया है, उतना कदाचित् ही संसार के समस्त अशिक्षित कर सके हों। सम्पत्ति वालों ने, कलाकारों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों को अपने पैसे के बल पर खरीदा और कठपुतली की तरह नचाया है। कभी वैज्ञानिकों की स्वतन्त्र सत्ता रही होगी और वे लोकोपयोगी अविष्कार करते रहे होंगे, पर अब तो साधनों के सम्मुख उन्हें भी आत्मसमर्पण कर देना पड़ा है। वे वही सोचते-खोजते हैं, जो उनके अन्नदाता उनसे चाहते हैं। किसी की बुद्धिमत्ता ही नहीं, ईमान खरीद लेने तक का दावा तथाकथित सुसम्पन्न करने लगे हैं। उन्हें देवताओं और भगवानों को भी अपने साधनों के बल पर कुछ भी करने के लिए विवश करने की जुर्रत होने लगी है।  

🔵 साधनों की कमी पड़ने से कठिनाई बढ़ने की बात समझ में आती है, पर यह तथ्य और भी अधिक गम्भीरतापूर्वक समझा जाना चाहिए कि उनका बाहुल्य होने पर भी यदि दुरुपयोग चल पड़े, तो विपत्तियाँ और भी अधिक बढ़ेंगी। चाकू न होने पर शाक तरकारी काटने का काम अन्य किसी उपकरण से भी लिया जा सकता है , पर कोई चमकीला, धारदार तथा कीमती चाकू पेट में घुस पड़े, तो समझना चाहिए अभाव की तुलना में वह उपलब्धि और भी अधिक भारी पड़ी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 99)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 जातियों-संगठनों के वर्तमान स्वरूप और जाति-पांति से उत्पन्न होने वाली बुराइयों को ध्यान में रखते हुए तत्काल तो कोई भी विचारशील व्यक्ति इस प्रकार के प्रयत्नों का विरोध नहीं करेगा। जब उसे हमारे प्रयोजन का पता चलेगा और वस्तु स्थिति पर विचार करेगा तो उसे इसकी सामयिक उपयोगिता एवं आवश्यकता का महत्व भी स्वीकार करना पड़ेगा। कुएं में गिरना एक बात है और कुएं में गिरे हुये को निकालने के लिये कुएं में घुसना दूसरी बात है। जाति वाद की संकीर्णता से लड़ने के लिये और उस बुराई का उन्मूलन करने के लिये बनाये गये जातीय संगठन लहर एक जैसे दीख पड़ सकते हैं, पर वस्तुतः उनमें कुएं में गिरने वाले और निकालने के लिये उतरने वाले की तरह जमीन-आसमान का अन्तर है। हम संकीर्णता फैलाने के लिये नहीं वरन् उसके उन्मूलन के लिये जातीय संगठन बना रहे हैं। अस्तु इसका परिणाम भी हमारी भावना के अनुरूप ही होगा।

🔵 अखण्ड-ज्योति परिवार के लिये लोग अपने जातीय संगठन बनाने और उनके द्वारा आदर्श विचारों का प्रयोजन पूरा करने का प्रयत्न करें। इन संगठनों को अधिक सहायक बनाकर हम सामाजिक क्रान्ति की एक भारी आवश्यकता को पूरा भी कर सकते हैं।

🔴 1. संगठनों का नामकरण:-- इन जातीय संगठनों का निर्माण प्रगतिशीलता बढ़ाने के लिये किया जा रहा है। आज जातिवाद जिन कारणों से बदनाम है, उन्हें हटाना अपना उद्देश्य है। संकीर्णता, वंशगत अहंकार, अपनी जाति वालों के साथ पक्षपात, अपने वर्ग में प्रचलित रूढ़ियों का अन्ध-समर्थन जैसे कारणों से जातिवाद बदनाम हुआ है। हमें इन बातों से तनिक भी लगाव नहीं, अपना उद्देश्य तो जिस क्षेत्र में अपना अधिक परिचय, अधिक प्रभाव एवं अधिक सम्बन्ध रहता है, उसे अधिक सुविकसित, सुसंस्कृत एवं प्रगतिशील बनाना है। इसलिये अपने द्वारा संगठित सभाओं के साथ अनिवार्यतः ‘प्रगतिशील’ शब्द जुड़ा रहना चाहिये। ताकि अपने उद्देश्यों की प्राथमिकता और पुराने ढंग की जातीय सभाओं से अपनी भिन्नता सिद्ध कर सकें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 47)

🌹 ऋषि तंत्र से दुर्गम हिमालय में साक्षात्कार

🔴 मैं गुफा में से निकलकर शीत से काँपते हुए स्वर्णिम हिमालय पर अधर ही अधर गुरुदेव के पीछे-पीछे उनकी पूँछ की तरह सटा हुआ चल रहा था। आज की यात्रा का उद्देश्य पुरातन ऋषियों की तपस्थलियों का दिग्दर्शन करना था। स्थूल शरीर सभी ने त्याग दिए थे, पर सूक्ष्म शरीर उनमें से अधिकांश के बने हुए थे। उन्हें भेदकर किन्हीं-किन्हीं के कारण शरीर भी झलक रहे थे। नतमस्तक और करबद्ध नमन की मुद्रा अनायास ही बन गई। आज मुझे हिमालय पर सूक्ष्म और कारण शरीरों से निवास करने वाले ऋषियों का दर्शन और परिचय कराया जाना था। मेरे लिए आज की रात्रि जीवन भर के सौभाग्यशाली क्षणों में सबसे अधिक महत्त्व की वेला थी|

🔵 उत्तराखण्ड क्षेत्र की कुछ गुफाएँ तो जब तब आते समय यात्रा के दौरान देखीं थीं, पर देखी वही थीं, जो यातायात की दृष्टि से सुलभ थीं। आज जाना कि जितना देखा है, उससे अनदेखा कहीं अधिक है। इनमें जो छोटी थीं, वे तो वन्य पशुओं के काम आती थीं, पर जो बड़ीं थीं, साफ-सुथरी और व्यवस्थित थीं, वे ऋषियों के सूक्ष्म शरीरों के निमित्त थीं। पूर्व अभ्यास के कारण वे अभी भी उनमें यदा-कदा निवास करते हैं।

🔴 वे सभी उस दिन ध्यान मुद्रा में थे। गुरुदेव ने बताया कि वे प्रायः सदा इसी स्थिति में रहते हैं। अकारण ध्यान तोड़ते नहीं। मुझे एक-एक का नाम बताया और सूक्ष्म शरीर का दर्शन कराया गया। यही है सम्पदा, विशिष्टता और विभूति सम्पदा इस क्षेत्र की। गुरुदेव के साथ मेरे आगमन की बात उन सभी को पूर्व से ही विदित थी। सो हम दोनों जहाँ भी जिस-जिस समय पहुँचे, उनके नेत्र खुल गए। चेहरों पर हल्की मुस्कान झलकी और सिर उतना ही झुका, मानों वे अभिवादन का प्रत्युत्तर दे रहे हों। वार्तालाप किसी से कुछ नहीं हुआ। 
🔵 सूक्ष्म शरीर को कुछ कहना होता है, तो वे बैखरी, मध्यमा से नहीं परा और पश्यन्ति वाणी से, कर्ण छिद्रों के माध्यम से नहीं, अन्तःकरण में उठी प्रेरणा के रूप में कहते हैं, पर आज दर्शन मात्र प्रयोजन था। कुछ कहना-सुनना नहीं था। उनकी बिरादरी में एक नया विद्यार्थी भर्ती होने आया, सो उसे जान लेने और जब जैसी सहायता करने की आवश्यकता समझें, तब वैसी उपलब्ध करा देने का सूत्र जोड़ना ही उद्देश्य था। सम्भवतः यह उन्हें पहले ही बताया या चुका होगा कि उनके अधूरे कामों को समय की अनुकूलता के अनुसार पूरा करने के लिए यह स्थूल शरीर धारी बालक अपने ढंग से क्या-क्या कुछ करने वाला है एवं अगले दिनों इसकी भूमिका क्या होग|

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 47)

🌞  हिमालय में प्रवेश (सुनसान की झोंपड़ी)

🔵 लगा कि वह जल धारा कमल पुष्प सी सुन्दर एक देव कन्या के रूप में परिणित होती है। वह अलौकिक शांति, समुद्र सी सौम्य मुद्रा में ऐसी लगती थी मानो इस पृथ्वी की सारी पवित्रता एकत्रित होकर मानुषी शरीर में अवतरित हो रही हो। वह रुकी नहीं, समीप ही उस शिलाखण्ड पर आकर विराजमान हो गई। लगा—मानो जागृत अवस्था में ही यह सब देखा जा रहा हो।

🔴 उस देव कन्या ने धीरे-धीरे अत्यन्त शांत भाव से मुधर वाणी में कुछ कहना आरम्भ किया। मैं मन्त्र मोहित की तरह एकचित्त होकर सुनने लगा। वह बोली—नर तनु धारी आत्मा, तू अपने को इन निर्जन वन में अकेला मन मान। दृष्टि पसार कर देख चारों ओर तू ही बिखरा पड़ा है। मनुष्य तक अपने को सीमित मत मान। इस विशाल सृष्टि में मनुष्य भी एक छोटा-सा प्राणी है। उसका भी एक स्थान है, पर सब कुछ वही नहीं है। जहां मनुष्य नहीं वहां सूना है ऐसा क्यों माना जाय? अन्य जड़ चेतन माने जाने वाले जीव भी विश्वात्मा के वैसे ही प्रिय पुत्र हैं जैसा मनुष्य। तू उन्हें क्यों अपना सहोदर नहीं मानता? उनमें क्यों अपनी आत्मा नहीं देखता? उन्हें क्यों अपना सहचर नहीं समझता? इस निर्जन में मनुष्य नहीं है, पर अन्य अगणित जीवधारी मौजूद हैं। पशु-पक्षियों की, कीट-पतंगों की, वृक्ष वनस्पतियों की, अनेक योनियां इस गिरि कानन में निवास करती हैं। सभी में आत्मा है, सभी में भावना है। यदि तू इन अचेतन समझे जाने वाले चेतनों की आत्मा से अपनी आत्मा को मिला सके तो ए पथिक! तू अपनी खंड-आत्मा को समग्र-आत्मा के रूप में देख सकेगा।’’

🔵 धरती पर अवतरित हुई वह दिव्य सौंदर्य की अद्भुत प्रतिमा देव कन्या बिना रुके कहती ही जा रही थी—‘‘मनुष्य को भगवान् ने बुद्धि दी, पर वह अभागा उसका सुख कहां ले सका? तृष्णा और वासना में उसने इस दैवी वरदान का दुरुपयोग किया और जो आनन्द मिल सकता था उससे वंचित हो गया। वह प्रशंसा के योग्य प्राणी, करुणा का पात्र है। पर सृष्टि के अन्य जीव इस प्रकार की मूर्खता नहीं करते। उनमें चेतन की मात्रा न्यून भले ही हो पर भावना को उनकी भावना के साथ मिला कर तो देख। अकेलापन कहां-कहां है, सभी ही तेरे सहचर हैं। सभी तो तेरे बन्धु-बान्धव हैं।’’

🔴 करवट बदलते ही नींद की झपकी खुल गई। हड़बड़ा कर उठ बैठा। चारों ओर दृष्टि दौड़ाई तो वह अमृत-सा सुन्दर सन्देश सुनाने वाली देव कन्या वहां न थी। लगा मानों वह इसी सरिता में समा गई हो। मानुषी रूप छोड़कर जलधारा में परिणत हो गई हो। वे मनुष्य की भाषा में कहे गये शब्द सुनाई नहीं पड़ते थे, पर हर-हर कल-कल की ध्वनि में भाव वे ही गूंज रहे थे, संदेश वही मौजूद था। ये चमड़े वाले कान उसे सुन तो नहीं पा रहे थे पर कानों की आत्मा उसे अब भी समझ रही थी, ग्रहण कर रही थी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

👉 मन्त्र पूत जल का कमाल


🔴 इस बार की अमेरिका यात्रा में सघन कार्यक्रम थे। दिन में पाँच-छह प्रोग्राम। उसके बीच उन कार्यक्रम स्थलों की दूरी भी नापनी थी, साथ ही मिलने वाले आस्थावान, प्रश्रकर्ता भी विभिन्न प्रकार के। अतः शरीर थक कर चूर था। सोचा, रास्तें में आराम करेंगे। विराट वायुयान ३५० यात्री लेकर लॉस एन्जिल्स से उड़ान भरी, ताइवान, सिंगापुर होते हुए उसे दिल्ली पहुँचना था। बारह-तेरह घंटे की यात्रा थी। अतः लगा कि अब रात्रि आराम से कटेगी।

🔵 अचानक एक सवा घंटे बाद एक यात्री की तबियत अत्यधिक खराब हो गई। पायलट को कुछ सूझा नहीं। उसने एनाउन्स किया कि यदि वायुयान वापस ले जाते हैं तो तीन घंटे अतिरिक्त लगेंगे जाने-आने में, व आगे बढ़ते है तो यात्री की जान को खतरा है। अतः यदि वायुयान में कोई डाक्टर हो तो कृपया मदद करें।

🔴 उद्घोषणा सुनकर मैं तुरन्त पायलट के पास पहुंच गया। उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा। उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि यह व्यक्ति डॉक्टर हो सकता है। हम देवसंस्कृति का प्रचार करके जो लौट रहे थे। पीली धोती-कुर्ता, माथे पर तिलक, गले में रूद्राक्ष, हाथ में ब्रह्मदंड किसी सन्यासी से कम नहीं थे, सो उसने अपने विश्वास हेतु हमसे कुछ अंग्रेजी में पश्र पूछे। जब जवाब सही मिला विश्वास हुआ तब हमें मरीज तक ले जाया गया। हमने देखा उसे बहुत बेचैनी हो रही थी। थैले से निकाल कर हमने कुछ दर्दनाशक दवाईयाँ दी पर सब व्यर्थ। फिर थोड़ा तेल मंगवा कर उसके पैरों को मलने लगे। तब पायलट ने कहा- ‘‘आप तो बस बताते जाइये, परिचारिकाएँ हैं सब करेंगी।’’ फिर भी उसकी बेचैनी देखते हुए हम लगे रहे।
  
🔵 उसने जब हमें उसी बीच अकेला पाया तब कहा- ‘‘जरा सी कोकीन है क्या?’’ उसने समझा-सन्यासी है तो शायद कहीं इसके पास भी मिल जाय। आज के सन्यासियों के प्रति लोगों की मान्यता देखकर हमें बहुत संताप हुआ। पहले तो हमें उस व्यक्ति के ड्रग्स लेने का शक था लेकिन उसके इतना कहने पर अब तो पूर्ण विश्वास हो गया। अब हमने उसी के अनुरूप इलाज प्रारंभ किया।
  
🔴 गुरुसत्ता का स्मरण कर एक गिलास जल मँगाया। उसे गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित कर उसे पिला दिया। चूँकि  उसे नशे की काफी आदत थी इसलिये उसके बिना वह अधिक बेचैन था। सारी रात मालिश करते, नब्ज टटोलते, दवा देते व्यतीत हुई। अन्त में उसे नींद आई। तब तक पौ फट चुकी थी। लगभग आधे घंटे बाद सभी को स्थान छोड़ना था। 
  
🔵 ऋषिवर के मंत्रपूत जल ने अपना कमाल दिखा दिया था। हम सभी टोली के भाई गौरवान्वित थे एक भला कार्य सम्पन्न करके।

🌹 - डॉ०प्रणव पण्ड्या, देवसंस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से

प्रेरणादायक प्रसंग 9 Feb 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 32) 9 Feb

🌹 जीवन साधना के सुनिश्चित सूत्र   
🔴 क्या करें? प्रश्न के उत्तर में एक पूरक प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि क्या नहीं हो रहा है? और ऐसे क्या अनुपयुक्त हो रहा है, जिसे नहीं सोचा या नहीं किया जाना चाहिये था। किन्हीं सुविकसित और सुसंस्कृत बनने वालों के निजी दृष्टिकोण, स्वभाव और दिशा निर्धारण को समझते हुये यह देखा जाना चाहिये कि वैसा कुछ अपने से बन पड़ रहा है या नहीं? यदि नहीं बन पड़ रहा है तो उनका कारण और निवारण क्या हो सकता है? इस प्रकार के निर्धारण जीवन साधना के साधकों के लिये अनिवार्य रूप से आवश्यक है। जो अपनी त्रुटियों की उपेक्षा करता रहता है, जो अगले दिनों अधिक प्रखर और अधिक प्रामाणिक बनने की बात नहीं सोच सकता, उस प्रकार की योजना बनाकर उनके लिये कटिबद्ध होने की तत्परता नहीं दिखा सकता, उसके सम्बन्ध में यह आशा नहीं की जा सकती कि वह किसी ऐसी स्थिति में पहुँच सकेगा जिसमें अपने गर्व-गौरव अनुभव करने का अवसर मिल सके। साथ ही दूसरों का सहयोग, सम्मान पाकर अधिक ऊँची स्थिति तक पहुँच सकना सम्भव हो सके।

🔵 साधक के लिये आलस्य, प्रमाद, असंयम, अपव्यय एवं उन्मत्त और अस्त-व्यस्त रहना प्रमुख दोष है। अचिन्त्य चिन्तन और अकर्मों को अपनाना पतन-पराभव के यही दो कारण हैं। संकीर्ण स्वार्थपरता में अपने को जकड़े रहने वाले अपनी और दूसरों की दृष्टि में गिर जाते हैं। उत्कृष्टता और आदर्शवादिता से रिश्ता तोड़ लेने पर लोग समझते हैं कि इस आधार पर नफे में रहा जा सकेगा। पर बात यह है कि ऐसों को सर्वसाधारण की उपेक्षा सहनी पड़ती है और असहयोग की शिकायत बनी रहती है।                        

🔴 अपना चिन्तन, चरित्र, स्वभाव और व्यवहार यदि ओछेपन से ग्रसित हो तो उसे उसी प्रकार धो डालने का प्रयत्न करना चाहिये जैसे कि कीचड़ से सन जाने पर उस गन्दगी को धोने का अविलम्ब प्रयत्न किया जाता है। गन्दगी से सने फिरना किसी के लिये भी अपमान की बात है। इसी प्रकार मानवी गरिमा से अलंकृत होने पर भी क्षुद्रताओं और निकृष्टताओं का परिचय देना न केवल दुर्भाग्य सूचक है, वरन साथ में यह अभिशाप भी जुड़ता है कि कोई महत्त्वपूर्ण, उत्साहवर्द्धक और अभिनन्दनीय प्रगति कर सकने का आधार कभी हाथ ही नहीं आता।    

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अध्यवसायी-ईश्वरचंद्र

🔴 पं. ईश्वरचंद्र विद्यासागर के पिता दो-तीन रुपये मासिक के मजदूर थे। घर का गुजारा ही कठिनता से हो पाता था, तब पुत्र को पढ़ा सकने का प्रश्न ही न उठता था। किंतु उनकी यह इच्छा जरूर थी कि उनका पुत्र पढ़-लिखकर योग्य बने पर आर्थिक विवशता ने उन्हें इस इच्छा को महत्त देने से रोके रखा।

🔵 ईश्वरचंद्र जब कुछ सयाने हुए तो गाँव के लडकों को स्कूल जाता देखकर पिता से रोते हुए बोले- "मैं भी पढ़ने जाऊँगा।" पिता ने परिस्थिति बतलाते हुए कह- बेटा तेरे भाग्य में विद्या ही होती तो मेरे जैसे निर्धन के यही क्यों पैदा होता? कुछ और बडे होकर मेहनत मजदूरी करने की सोचना, जिससे ठीक तरह से पेट भर सके। पढ़ाई के विषय में सोचना फिजूल बात है।''

🔴 पिता की निराशापूर्ण बात सुनकर ईश्वरधंद्र मन मसोसकर रह गये। इससे अधिक वह बालक और कर भी क्या सकता था? पिता का उत्तर पाकर भी उसका उत्साह कम नहीं हुआ। उसने पढ़ने वाले अनेक छात्रों को मित्र बनाया और उनकी किताब से पूछकर पढ़ने लगा। इस प्रकार धीरे-धीरे उसने अक्षर-ज्ञान प्राप्त कर लिया और एक दिन कोयले से जमीन पर लिखकर, पिता को दिखलाया। पिता विद्या के प्रति उसकी लगन देखकर मन-ही मन निर्धनता को कोसने लगे। पुत्र को पढाने के लिए उनका हृदय अधीर हो उठा।

🔵 एक दिन कुछ अधिक कमाने के लिए वे ईश्वरचंद को लेकर कलकत्ता की ओर चल दिए। रास्ते में एक जगह सुस्ताने के लिए रुककर उन्होंने कहा-न जाने कितनी दूर चले आऐ हैं ? अनायास ही ईश्वरचंद्र बोल उठा- ६ मील पिताजी! उन्होंने आश्चर्य से पूछा- तुझे कैसे पता चला 'ईश्वरचंद्र ने बतलाया कि पास के मील पत्थर पर ६ लिखा है। पिता यह जानकर हर्ष-विभोर हो गये कि ईश्वरचंद्र ने चलते-चलते मील के पत्थरों से ही अंग्रेजी अंकों का ज्ञान कर लिया। वे उसे लेकर वही से घर वापस लौट पडे। रास्ते भर सोचते आए कि यदि ऐसे जिज्ञासु तथा उत्साही पुत्र को पढने से वंचित रखा तो यह बहुत बडा अपराध होगा। मैं एक वक्त खाऊँगा, घर को आधा पेट रखूँगा, किंतु ईश्वरचंद्र को पाठशाला अवश्य भेजूँगा। घर आकर उन्होंने ईश्वरचंद्र को गाँव की पाठशाला में भरती करा दिया।

🔴 गाँव से आगे पढा़ सकना तो पिता के लिये सर्वथा असंभव था। उन्होंने इनकार किया। इस पर ईश्वरचंद्र ने प्रार्थना की कि वे उसे किसी विद्यालय में भरती भर करा दें उसके बाद उसे कोई खर्च न दें। वह शहर में स्वयं उसका प्रबंध कर लेगा। पिता ने उनकी बात मान ली और उसे कलकत्ता के एक संस्कृत विद्यालय मे भरती करा दिया। विद्यालय में पहुँचकर ईश्वरचंद्र ने अपनी सेवा, लगन तथा योग्यता के बल पर शिक्षको को यही तक प्रसन्न कर लिया कि उनकी फीस माफ हो गई। पुस्तकों के लिए वह अपने सहपाठिर्यो का साझीदार हो जाता था।

🔵 अपनी इस व्यवस्था के साथ संतुष्ट रहकर ईश्वरचद्र ने अध्ययन में इतना परिश्रम किया कि उन्नीस वर्ष की आयु पहुंचते पहुँचते उन्होंने व्याकरण, साहित्य, अलंकार, स्मृति तथा वेदांत शास्त्र में निपुणता प्राप्त कर ली। उनकी असंदिग्ध विद्वता तथा तदनुकूल आचरण से प्रभावित होकर विद्वानों की एक सभा ने उन्हें मानपत्र के साथ "विद्यासागर" की उपाधि से विभूषित किया और उसके मूल्यांकन में अनुरोधपूर्वक फोर्ट विलियम संस्कृत कालेज में प्रधान पंडित के पद पर नियुक्त कर लिए गये। परिश्रम एवं पुरुषार्थ का सहारा लेने वाले ईश्वरचंद का जीवन ही बदल गया। वहाँ लोग उनके दो-चार रुपये मासिक का मजदूर बनने की सोच रहे थे और कही वे भारत के ऐतिहासिक व्यक्ति बनकर राष्ट्र के श्रद्धा पात्र बनकर अमर हो गये।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹  संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 17, 18

👉 बलि का तेज चला गया

🔴 राजा बलि असुर कुल में उत्पन्न हुए थे पर वे बड़े सदाचारी थे और अपनी धर्म परायपता के उनने बहुत वैभव और यश कमाया था। उनका पद इन्द्र के समान हो गया। पर धीरे- धीरे जब धन सें उत्पन्न होने वाले अहंकार, आलस्य, दुराचार जैसे दुर्गुण बढ़ने लगे तो उनके भीतर वाली शक्ति खोखली होने लगी।

🔵 एक दिन इन्द्र की बलि से भेंट हुई तो सबने देखा कि बलि के शरीर से एक प्रचण्ड तेज निकलकर इन्द्र के शरीर में चला गया है और बलि श्री विहीन हो गये।

🔴 उस तेज से पूछा गया कि आप कौन हैं? और क्यों बलि के शरीर से निकलकर इन्द्र की देह में गये? तो तेज ने उत्तर दिया कि मैं सदाचरण है। मैं जहां भी रहता हूँ वहीं सब विभूतियाँ रहती हैं।

🔵 बलि ने तब तक मुझे धारण किया जब तक उसका वैभव बढ़ता रहा था। जब इसने मेरी उपेक्षा कर दी तो मैं सौभाग्य को साथ लेकर, सदाचरण में तत्पर इन्द्र के यहाँ चला आया हूँ।

🔴 बलि का सौभाग्य सूर्य अस्त हो गया और इन्द्र का चमकने लगा, उसमें सदाचरण रूपी तेज की समाप्ति ही प्रधान कारण थी।

🔵 ऐसे भी व्यक्ति होतै हैं जो अपने व्यक्तित्व को ऊँचा उठाकर अपने को महामानव स्तर तक पहुँचा देते है, जन सम्मान पाते हैं। ऐसे निष्ठावानों से भारतीय- संस्कृति सदा से गौरवान्वित होती रही है।

🌹 प्रज्ञा पुराण भाग 1 पृष्ठ 12

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 4)

🌹 विचार शक्ति सर्वोपरि

🔴 ईश्वर के मन में, ‘एकोऽहं बहुस्यामि’ का विचार आते ही यह सारी जड़-चेतनमय सृष्टि बनकर तैयार हो गई, और आज भी वह उसको विचार के आधार पर ही स्थिति है और प्रलयकाल में विचार निर्धारण के आधार पर ही उसी ईश्वर में लीन हो जायेगी। विचारों में सृजनात्मक और ध्वंसात्मक दोनों प्रकार की अपूर्व, सर्वोपरि और अनन्त शक्ति होती है। जो इस रहस्य को जान जाता है, वह मानो जीवन के एक गहरे रहस्य को प्राप्त कर लेता है। विचारणाओं का चयन करना स्थूल मनुष्य की सबसे बड़ी बुद्धिमानी है। उनकी पहचान के साथ जिसको उसके प्रयोग की विधि विदित हो जाती है, वह संसार का कोई भी अभीष्ट सरलतापूर्वक पा सकता है।

🔵 संसार की प्रायः सभी शक्तियां जड़ होती हैं, विचार-शक्ति, चेतन-शक्ति है। उदाहरण के लिए धन अथवा जन-शक्ति ले लीजिये। अपार धन उपस्थित हो किन्तु समुचित प्रयोग करने वाला कोई विचारवान् व्यक्ति न हो तो उस धनराशि से कोई भी काम नहीं किया जा सकता। जन-शक्ति और सैनिक-शक्ति अपने आप में कुछ भी नहीं है। जब कोई विचारवान् नेता अथवा नायक उसका ठीक से नियन्त्रण और अनुशासन कर उसे उचित दिशा में लगता है, तभी वह कुछ उपयोगी हो पाती है अन्यथा वह सारी शक्ति भेड़ों के गले के समान निरर्थक रहती है। 

🔴 शासन, प्रशासन और व्यवसायिक सारे काम एक मात्र विचार द्वारा ही नियन्त्रित और संचालित होते हैं। भौतिक क्षेत्र में भी नहीं उससे आगे बढ़कर आत्मिक क्षेत्र में भी एक विचार-शक्ति ही ऐसी है, जो काम आती है। न शारीरिक और न साम्पत्तिक कोई अन्य-शक्ति काम नहीं आती। इस प्रकार जीवन तथा जीवन के हर क्षेत्र में केवल विचार-शक्ति का ही साम्राज्य रहता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 12)

🌹 दुरुपयोग के रहते अभाव कैसे मिटे

🔵 विभूतियों को सही गलत तरीके से अर्जित कर लेना एक बात है और उनका सदुपयोग कर सकना सर्वथा दूसरी। सम्पदाओं के संग्रहकर्ता इस संसार में असंख्यों भरे पड़े हैं, पर जो उनका सही सदुपयोग कर पाये, वे खोजने पर भी उँगलियों पर गिनने जितने ही मिलेंगे। इसे एक विडम्बना ही कह सकते हैं कि सफलताएँ अर्जित करने वाले को सदुपयोग नहीं आता और जो उसे सही प्रयोजनों में प्रयुक्त कर सकते हैं, वे पुरुषार्थ को अर्जन के स्तर तक पहुँचा सकने में समर्थ नहीं हो पाते। काश, प्रतिभा और सदाशयता का एक ही केन्द्र पर केन्द्रीकरण बन पड़ा होता, तो यह संसार कितना सुखी और समुन्नत दृष्टिगोचर होता?

🔴 सदुपयोग न बन पड़े तो इसमें भी किसी प्रकार संतोष किया जाता रह सकता है कि जो कमाया गया था, वह निरर्थक गुम गया, पर कष्ट तब होता है कि जिसके सदुपयोग से व्यक्ति और समाज का बहुत कुछ हित साधन हो सकता था, उसका ठीक उल्टा प्रयोग बन पड़ा और अनर्थ का वह सरञ्जाम जुटा, जिससे कम से कम बचा तो जा सकता था। 

🔵 समर्थ व्यक्ति ही उद्दण्डता अपनाते और अनाचार पर उतारू होते हैं। सम्पन्न लोग ही अपने वैभव को ऐसे प्रयोजनों में नियोजित करते हैं, जिनसे शोषण, उत्पीड़न और पतन-पराभव का माहौल बनें। संसार में छल, छद्म और प्रपञ्च के जाल बिछाने वालों में प्रधानतया वही लोग रहे हैं, जिन्हें विद्वान समझा और बुद्धिमान कहा जाता है। युद्धोन्माद भड़काने और असंख्यों पर अगणित विपत्तियाँ ढाने वालों में सत्ताधारी ही अग्रणी रहें हैं। अच्छा होता यह मूर्धन्य कहे जाने वाले सफल न होते। उस सफलता को क्या कहा जाये? जो विभूतियों के रूप में जब किसी पर विषम ज्वर की तरह चढ़ दौड़ती हैं, तो उसे एक प्रकार का उन्मादी बनाए बिना नहीं रहतीं। बदहवासी में लोग अधपगलों जैसी उद्दण्डता अपनाने के लिए उतारू हो उठते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 युग परिवर्तन (भाग 2)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी
🔴 अगर इसी क्रम से, इसी राह पर जिस पर आज हम चल रहे हैं, वैज्ञानिक उन्नति, मनुष्यों के भीतर स्वार्थपरता की वृद्धि, मनुष्यों की सन्तानों पर नियंत्रण का अभाव यही क्रम चला तो दुनिया नष्ट हो जायेगी। आप ध्यान रखना सौ वर्ष बाद हम तो जिंदा नहीं रहेंगे, आपमें से कोई जिंदा रह जाये तो देखना दुनिया का क्या हाल होता है, अगर ये स्थिति बनी रही तो। एक और स्थिति है, जिसका हम ख्वाब देखते हैं। सपने हम देखते हैं। हमारे स्वप्नों की दुनियाँ बड़ी खूबसूरत दुनियाँ है, ऐसी दुनियाँ है, जिसमें प्यार भरा हुआ है, मोहब्बत भरी हुई है, विश्वास भरे हुए हैं, एक-दूसरे के प्रति सहकार भरे हुए हैं, एक-दूसरे की सेवा भरी हुई है, इतनी मीठी, इतनी मधुर दुनियाँ है, हमारे दिमाग में घूमती है। अगर हमारे सपने कदाचित् साकार हो गये तो ये भरा हुआ विज्ञान, ये भरा हुआ धन, ये भरी हुई विद्या, ये भरी हुई सुविधाएँ, आदमी के लिये मैं सोचता हूँ स्वर्ग के वातावरण को उतार करके जमीन पे ले आयेगी।

🔵 हजारों-लाखों वर्ष पूर्व न सड़कें थीं, न बिजली थी, न रोशनी थी, न टेलीफोन था, न डाकखाना था, न कुछ भी नहीं था। ऐसे अभाव के जमाने में स्वर्गीय जिन्दगी जीया करते थे। आज बेहतरीन परिस्थितियों में दुनिया में इतनी शान्ति, इतनी सरसता, इतना सौंदर्य, इतना सुख पैदा कर सकते हैं कि हम नहीं कह सकते। जिस चौराहे पर हम खड़े हुए हैं, एक विनाश का चौराहा और एक उन्नति का चौराहा है। उन्नति में क्या होने वाला है, इसके लिये आपको भूमिका निभानी पड़ेगी। काष्टींग वोट आपका है। दो वोट बराबर होते हैं। एक वोट प्रेसीडेन्ट का होता है। प्रेसीडेन्ट दोनों वोट बराबर वाले में से जिसको चाहे उसके पक्ष में अपना डाल सकता है, उसी को जिता सकता है। आप लोग, आप लोग बैलेंसिंग पॉवर में हैं। आप चाहें तो अपना वोट उसकी ओर डाल सकते हैं, जो पक्ष विनाश की ओर जा रहा है। आप चाहें तो अपना पक्ष उसके पक्ष में डाल सकते हैं, जो सुख और शान्ति लाने के लिये जा रहा है।

🔴 मैं सोचता हूँ, आपको ऐसा ही करना चाहिये। सुख-शान्ति के लिये अपना वोट डालना चाहिये और आपको अपनी वर्तमान जिन्दगी, जानवरों के तरीके से नहीं जीनी चाहिये। आपको अपनी वर्तमान जिन्दगी मनुष्यों के तरीके से, विचारशीलों के तरीके से, समझदार के तरीके से खर्च करना चाहिये। ये विशेष समय है, ऐसा समय फिर आने वाला नहीं है।

🌹 आज की बात समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 98)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 आदर्श विवाह तभी सम्भव हो सकते हैं जब वर और कन्या दोनों पक्ष इसके लिये सहमत हों। एक पक्ष कितना ही आदर्शवादी क्यों न हो, बिना दूसरा पक्ष अपने अनुकूल मिले इन विचारों को कार्यान्वित न कर सकेगा। इसलिए यह आवश्यक है कि कोई ऐसा तन्त्र खड़ा किया जाय जिसके माध्यम से एक समान विचार और आदर्शों के लोगों को ढूंढ़ने की सुविधा मिल सके। यह प्रयोजन प्रगतिशील जातियों के संगठनों के माध्यम से ही पूरा हो सकता है।

🔵 अत्यधिक उत्साही लोग यह भी सोच कर सकते हैं कि अपनी जाति को छोड़कर अन्य जातियों में अपने विचार के लोगों को साथ विवाह क्यों न आरम्भ किये जाय? आदर्श के लिये यह विचार उत्तम हैं। ऊंचे घर के लोगों के लिये सम्भव भी है। पर भारत की वर्तमान स्थिति में सर्व साधारण के लिये इतना बड़ा कदम उठा लेने के बाद जो कठिनाइयां उपस्थित होती हैं, उन्हें नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता। प्रस्तुत योजना अखण्ड-ज्योति परिवार के लोगों को ध्यान में रखते हुए आरम्भ की गई है।

🔴 उनकी स्थिति हमें विदित है। इसलिये उन्हें अभी मितव्ययी विवाह के लिये ही जोर दे सकना उचित है। उन जातियों के बन्धन शिथिल करने के लिये ही उन्हें कहा जा सकता है। जिनमें अधिक साहस हो वे जाति-पांति की परवा किये बिना भी विवाह करें, पर जो एक बार भी उतना न कर सकेंगे वे अपनी जातियों में सम्बन्ध करने को उत्सुक होंगे। उनका काम इतने साहस से भी कहा जायगा। रूढ़ि ग्रसित समाज में आर्थिक सुधार ही सफल हो सकते हैं। अत्यधिक उत्साह आदर्शवाद की दृष्टि से प्रशंसनीय हो सकता है पर समय से पूर्व उठाये गए कदमों के असफल होने की ही संभावना ज्यादा रहती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 46)

🌹 ऋषि तंत्र से दुर्गम हिमालय में साक्षात्कार

🔴 नंदन वन में पहला दिन वहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य को निहारने, उसी में परम सत्ता की झाँकी देखने में निकल गया। पता ही नहीं चला कि कब सूरज ढला और रात्रि आ पहुँची। परोक्ष रूप से निर्देश मिला, समीपस्थ एक निर्धारित गुफा में जाकर सोने की व्यवस्था बनाने का। लग रहा था कि प्रयोजन सोने का नहीं, सुरक्षित स्थान पर पहुँचाने का है, ताकि स्थूल शरीर पर शीत का प्रकोप न हो सके। सम्भावना थी कि पुनः रात्रि को गुरुदेव के दर्शन होंगे। ऐसा हुआ भी।

🔵 उस रात्रि को गुफा में गुरुदेव सहसा आ पहुँचे। पूर्णिमा थी। चन्द्रमा का सुनहरा प्रकाश समूचे हिमालय पर फैल रहा था। उस दिन ऐसा लगा कि हिमालय सोने का है। दूर-दूर बर्फ के टुकड़े तथा बिन्दु बरस रहे थे, वे ऐसा अनुभव कराते थे, मानों सोना बरस रहा है। मार्गदर्शक के आ जाने से गर्मी का एक घेरा चारों ओर बन गया। अन्यथा रात्रि के समय इस विकट ठंड और हवा के झोंकों में साधारणतया निकलना सम्भव न होता। दुस्साहस करने पर इस वातावरण में शरीर जकड़ या ऐंठ सकता था।

🔴 किसी विशेष प्रयोजन के लिए ही यह अहैतुकी कृपा हुई, यह मैंने पहले ही समझ लिया, इसलिए इस काल में जाने का कारण पूछने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। पीछे-पीछे चल दिया। पैर जमीन से ऊपर उठते हुए चल रहे थे। आज यह जाना कि सिद्धि में ऊपर हवा में उड़ने की-अंतरिक्ष में चलने की क्यों आवश्यकता पड़ती है। उन बर्फीले ऊबड़-खाबड़ हिम खण्डों पर चलना उससे कहीं अधिक कठिन था, जितना कि पानी की सतह पर चलना। आज उन सिद्धियों की अच्छी परिस्थितियों में आवश्यकता भले ही न पड़े, पर उन दिनों हिमालय जैसे विकट क्षेत्रों में आवागमन की कठिनाई को समझने वालों के लिए आवश्यकता निश्चय ही पड़ती होगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 46)

🌞  हिमालय में प्रवेश (सुनसान की झोंपड़ी)

🔵 लगाम खींचने पर जैसे घोड़ा रुक जाता है उसी प्रकार वह सूनेपन को कष्ट कर सिद्ध करने वाला विचार प्रवाह भी रुक गया। निष्ठा ने कहा—एकान्त साधना की आत्म-प्रेरणा असत् नहीं हो सकती। निष्ठा ने कहा—जो शक्ति इस मार्ग पर खींच लाई है, वह गलत मार्ग-दर्शन नहीं कर सकती। भावना ने कहा—जीव अकेला आता है, अकेला जाता है, अकेला ही अपनी शरीर रूपी कोठरी में बैठा रहता है, क्या इस निर्धारित एकान्त विधान में उसे कुछ असुखकर प्रतीत होता है? सूर्य अकेला चलता है, चन्द्रमा अकेला उदय होता है, वायु अकेला बहती है। इसमें उन्हें कुछ कष्ट है?

🔴 विचार से विचार कटते हैं, इस मनः शास्त्र के सिद्धान्त ने अपना पूरा काम किया। आधी घड़ी पूर्व जो विचार अपनी पूर्णता अनुभव कर रहे थे, अब वे कटे वृक्ष की तरह गिर पड़े। प्रतिरोधी विचारों ने उन्हें परास्त कर दिया। आत्मवेत्ता इसी लिए अशुभ विचारों को शुभ विचारों से काटने का महत्व बताते हैं। बुरे से बुरे विचार चाहे वे कितने प्रबल क्यों न हों, उत्तम प्रतिपक्षी विचारों से काटे जा सकते हैं। अशुद्ध मान्यताओं को शुद्ध मान्यताओं के अनुरूप कैसे बनाया जा सकता है, यह उस सूनी रात में करवटें बदलते हुए मैंने प्रत्यक्ष देखा। अब मस्तिष्क एकांत की उपयोगिता, आवश्यकता और महत्ता पर विचार करने लगा।

🔵 रात धीरे-धीरे बीतने लगी। अनिद्रा से ऊबकर कुटिया से बाहर निकला तो देखा कि गंगा की धारा अपने प्रियतम समुद्र से मिलने के लिये व्याकुल प्रेयसी की भांति तीव्र गति से दौड़ी चली जा रही थी। रास्ते में पड़े हुए पत्थर उसका मार्ग अवरुद्ध करने का प्रयत्न करते पर वह उनके रोके रुक नहीं पा रही थी। अनेकों पाषाण खण्डों की चोट से उसके अंग प्रत्यंग घायल हो रहे थे तो भी वह न किसी की शिकायत करती थी और न निराश होती थी। इन बाधाओं का उसे ध्यान भी न था, अंधेरे का, सुनसान का उसे भय न था। अपने हृदयेश्वर के मिलन की व्याकुलता उसे इन सब बातों का ध्यान भी न आने देती थी। प्रिय के ध्यान में निमग्न ‘हर-हर, कल-कल’ का प्रेग-गीत गाती हुई गंगा निद्रा और विश्राम को तिलांजलि दे कर चलने से ही लौ लगाए हुए थी।

🔴 चन्द्रमा सिर के ऊपर आ पहुंचा था। गंगा की लहरों में उसके अनेकों प्रतिबिम्ब चमक रहे थे। मानो एक ही ब्रह्म अनेक शरीरों में प्रविष्ट होकर एक से अनेक होने की अपनी माया दृश्य रूप से समझा रहा हो। दृश्य बड़ा सुहावना था। कुटिया से निकल कर गंगातट के एक बड़े शिलाखण्ड पर जा बैठा और निर्निमेष होकर उस सुन्दर दृश्य को देखने लगा। थोड़ी देर में झपकी लगी और उस शीतल शिला खण्ड पर ही नींद आ गई।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

प्रेरणादायक प्रसंग 8 Feb 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 31) 8 Feb

🌹 जीवन साधना के सुनिश्चित सूत्र- 

🔴 हर व्यक्ति की मन:स्थिति परिस्थिति अलग होती है। यही बात दुर्गुणों और सद्गुणों की न्यूनाधिकता के सम्बन्ध में भी है। किसे अपने में क्या सुधार करना चाहिये और किन नई सत्प्रवृत्तियों का संवर्द्धन गुण, कर्म, स्वभाव के क्षेत्र में करना है? यह आत्म-समीक्षा के आधार पर सही विश्लेषण होने के उपरान्त ही सम्भव है। इसके लिये कोई एक निर्धारण नहीं हो सकता है। यह कार्य हर किसी को स्वयं करना होता है। दूसरों को तो थोड़ा-बहुत परामर्श ही काम दे सकता है।

🔵 नित्य-निरन्तर हर कोई किसी के साथ रहता नहीं। फिर रोग का कारण और निदान जानते हुए उपचार का निर्धारण कोई अन्य किस प्रकार कर सके? थोड़े समय तक सम्पर्क में आने वाला केवल उतनी ही बात जान सकता है, जितनी कि मिलन काल में उभरकर सामने आती है। यह सर्वथा अधूरी रहती है। इसलिये अन्यान्यों के परामर्श पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहा जा सकता। यह कार्य स्वयं अपने को ही करना पड़ता है। इसमें भी एक कठिनाई यह है कि मानसिक संरचना के अनुसार हर व्यक्ति अपने को निर्दोष मानता है, साथ ही सर्वगुण सम्पन्न भी समझता रहता है।                       

🔴 यह स्थिति सुधार और विकास दोनों में बाधक है? जब तक कमी का आभास न हो तब तक उसकी पूर्ति का तारतम्य कैसे बने? अस्तु, आत्मविकास के मार्ग पर चलने वाले, जीवन साधना के मार्ग पर अग्रसर होने के इच्छुक प्रत्येक व्यक्ति को चाहिये कि निष्पक्षता की मनोभूमि विकसित की जाये। खासतौर से अपने सम्बन्ध में उतना ही तीखापन होना चाहिये जितना कि आमतौर से दूसरों के दोष-दुर्गुण ढूँढ़ने में हर किसी का रहता है। आरोप लगाने और लांछित करने में हर किसी को प्रवीण पाया जाता है। इस सहज वृत्ति को ठीक उल्टा करने से आत्मसमीक्षा की वह प्राथमिक आवश्यकता पूरी होती है, जिसके बिना व्यक्तित्व का निखार प्राय: असम्भव ही बना रहता है। वह न बन पड़े तो किसी को भी महानता अपनाने और प्रगति के उच्च शिखर तक पहुँच सकने का अवसर मिल ही नहीं सकता।      

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 शिवजी कोढी बने

🔴 मनुष्य के चिन्तन और व्यवहार से ही आचरण बनता हैं। वातावरण से परिस्थिति बनती है और वही सुख-दुःख, उत्थान-पतन का निर्धारण करती हैं। जमाना बुरा है, कलयुग का दौर है, परिस्थितियाँ कुछ प्रतिकूल बन गयी हैं, भाग्य चक्र कुछ उल्टा चल रहा है-ऐसा कह कर लोग मन को हल्का करते हैं, पर इससे समाधान कुछ नहीं निकलता। जन समाज में से ही तो अग्रदूत निकलते हैं।

🔵 एक बार पार्वती ने शिवजी से पूछा-' भगवन्! लोग इतना कर्मकाण्ड करते हैं फिर भी इन्हें आस्था का लाभ क्यों नहीं मिलता? शिवजी बोले-धार्मिक कर्मकाण्ड होने पर भी मनुष्य जीवन में जो बने आडम्बर छाया है; यहीं अनास्था है। लोग धार्मिकता का दिखावा करते हैं, उनके मन वैसे नहीं है। परीक्षा लेने दोनों धरती पर आये।

🔴 मां पार्वती ने सुन्दरी साध्वी पत्नी का व शिवजी ने कोढ़ी का रूप धारण किया। मन्दिर की सीढ़ियों के समीप वे पति को लेकर बैठ गयीं। दानदाता दर्शनार्थ आते रहे व रुककर कुछ पल पार्वती जी को देखकर आगे बढ़ जाते। बेचारे शिवजी को गिनें चुनें कुछ सिक्के मिल पाये। कुछ दान दाताओं ने तो संकेत भी किया कि कहाँ इस कोढ़ी पति के साथ बैठी हो। इन्हें छोड दो। पार्वतीजी सहन नहीं कर पायीं, बोलीं-! प्रभु! लौट चलिए अब कैलाश पर। सहन नहीं होता इन पाखण्डियों के यह कुत्सित स्वरूप।

🔵 इतने में ही एक दीन-हीन भक्त आया, पार्वतीजी के चरण हुए और बोला- माँ! आप धन्य हैं जो पति परायण हो इनकी सेवा में लगी है। आइये! मैं इनके घावों को धो दूँ। फिर मेरे पास जो भी कुछ सतू आदि हैं, आप हम साथ-साथ खा लें। ब्राह्मण यात्री ने घावों पर पट्टी बाँधी, सतू थमा पुन: प्रणाम, कर ज्योंही आगे बढ़ा वैसे ही शिवजी ने कहा-' यही है भार्ये एकमात्र भक्त, जिसने मन्दिर में  प्रवेश से पूर्व निष्कपट भाव से सेवा धर्म को प्रधानता दी।

🔴 ऐसे लोग गिने चुने हैं। शेष तो सब आत्म प्रवंचना भर करते है व अवगति को प्राप्त होते हैं। शिव-पार्वती ने अपने वास्तविक स्वरूप में उस भक्त को दर्शन दिये। परमगति का अनुदान दिया व वापस लौट गये।

👉 पक्षपात किया जाए तो इस तरह

🔴 किसी ने आक्षेप लगाया संत विनोबा पर "विनोबा जी तो शत्रु का पक्ष लेने की बात कहते हैं।" विनोबा जी ने सुना और एक स्थान पर उसका स्पष्टीकरण भी दे दिया। उन्होंने बतलाया पक्ष न लिया जाए यह अच्छा है किन्तु यदि लेना पडे तो शत्रु का ही लेने योग्य है। मित्र का क्या पक्ष लिया जाए-वह तो अपना है ही। मित्र के पक्ष में तो बुद्धि सहज हो जाती? प्रयासपूर्वक शत्रु के पक्ष मे लगाने पर ही पक्षपात से आंशिक मुक्ति पाई जा सकती है।

🔵 समाधान बहुत प्रमाणिक तथा विवेकपूर्ण ढंग से किया गया है। संत विनोबा की बुद्धि तथा विवेक पर लोग लट्टू हो जाते है। होना भी चाहिए, किन्तु बुद्धि के केवल क्रियाशील होने से ही उसकी श्रेष्ठता प्रमाणित नहीं होती, उसकी दिशा भी सही होनी चाहिए। विनोबा जी की बुद्धि को जो श्रेष्ठता प्राप्त थी, वह उसकी सही दिशा के कारण ही है। तीव्र बुद्धि के व्यक्ति तो समाज में और भी बहुत हैं। अपने बौद्धिक चमत्कारों से दुनिया को नित नई समस्याओं में डालने वाले कम नहीं हैं। बुद्धि की दिशा गलत होने पर के कारण न उसका समाज को लाभ मिल पाता हे और न उन्हें ही श्रेय।

🔴 इस प्रकार की दिशा बुद्धि को दिए जाने का श्रेय विनोबा अपनी माता को देते थे। सामान्य जीवन में सहज घटित एक घटना ने उनके अंदर वह अंकुर पैदा कर दिया, जो उन्हें आज नई-नई सूझ इस दिशा में देता था।

🔵 घटना उनके बचपन की है। उनके साथ बहुधा कोइ सबंधी या मित्र बालक भी उनके घर में रहा करता था। उस बालक को भी धर में विनोबा के समान ही सुविधाएँ थी। भोजन आदि भी साथ-साथ समान स्तर का मिलता था।

🔴 कभी-कभी घरों मे बासी भोजन यथा रहना भी स्वाभाविक है। उनकी माता भोजन फेंके जाने के विरुद्ध थीं। अस्तु वह भोजन मिल-जुलकर थोडा़-थोडा़ खा लिया जाता था। ऐसे अवसर पर माता विनोबा को बासी भोजन देकर दूसरे को ताजा खिलाने का प्रयास करती थी। विनोबा को इस पर कोई आंतरिक विरोध नहीं था, सहज सद्भावना का शिक्षण उन्हें प्रारभ से ही मिला था। किंतु परिहास में एक दिन उन्होंने माँ से कहा आपके मन में अभी भेद है।'' माँ प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी ओर देख उठी। विनोबा ने हँसते हुए कहा हाँ देखो न आप मुझे बासी भोजन देती है तथा अमुक साथी को ताजा।

🔵 माँ की उदारता को पक्षपात की संज्ञा देकर विनोबा ने परिहास किया था, किंतु माता ने उसे दूसरे ही ढंग से लिया। बोली बेटा तू ठीक कहता है। मानवीय दुर्बलताऐं मुझमें भी है। तू मुझे अपना बेटा दीखता है तथा अभ्यागत अतिथि। इसे ईश्वर रूप अतिथि मानकर सहज ही मेरे द्वारा यह पक्षपात का व्यवहार हो जाता है। तुझे बेटा मानने के कारण तरे प्रति अनेक प्रकार का स्नेह मन में उठता है। जब तुझे भी सामान्य दृष्टि से देख सकूँगी, तब पक्षपात की आवश्यकता नहीं रह जायेगी।

🔴 बात कहीं की कहीं पहुँच गई थी, पर विनोबा को प्रसन्नता हुई। माता का एक और उज्जवल पक्ष उनके सामने आया था। समाज के संतुलन तथा आध्यात्मिकता की पकड़ का महत्वपूर्ण सूत्र उन्हें मिल गया था। लोग संतुष्टि के प्रयास में असतुष्ट होते क्यों दिखाई दिया करते हैं ? इसके कारण की वह खोज करते थे। आज उन्हें उसका एक विशिष्ट पक्ष दिखा। पक्षपात मनुष्य के अंतःकरण को सहन नहीं होता। व्यक्ति अभाव स्वीकार कर लेता है, पक्षपात नहीं। अपने को पक्षपात से मुक्त अनुभव करने वाला अंतकरण ही संतोष का अनुभव करता है। संत विनोबा ने माता की शिक्षा गाँठ में बाँध ली। आज वही गुण विकसित होकर, समाज में व्यापक प्रभाव डाल रहा है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹  संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 13, 14

👉 आत्मचिंतन के क्षण 8 Feb 2017

🔵 मनुष्य के चिन्तन और व्यवहार से ही आचरण बनता हैं। वातावरण से परिस्थिति बनती है और वही सुख- दुःख, उत्थान- पतन का निर्धारण करती हैं। जमाना बुरा है, कलयुग का दौर है, परिस्थितियाँ कुछ प्रतिकूल बन गयी हैं, भाग्य चक्र कुछ उल्टा चल रहा है- ऐसा कह कर लोग मन को हल्का करते हैं, पर इससे समाधान कुछ नहीं निकलता। जब समाज में से ही तो अग्रदूत निकलते हैं। प्रतिकूलता का दोषी मूर्धन्य राजनेताओं को भी ठहराया जा सकता है। पर भूलना नहीं चाहिए कि इन सबका उद्गम केन्द्र मानवों अन्तराल ही है। आज की विषम परिस्थितियों को बदलने की जो आवश्यकता समझते हैं, उन्हें कारण तह तक जाना होगा। अन्यथा सूखे पेड़, मुरझाते वृक्ष को हरा बनाने के लिए जड़ की उपेक्षा करके पत्ते सींचने जैसी विडम्बना ही चलती रहगी।

🔴 आप जीवन के प्रति अपनी धारणा बदल डालिए। विश्वास तथा ज्ञान में ही अपना जीवन भवन निर्माण कीजिए। यदि वर्तमान आपत्तिग्रस्त है, तो उसका यह अर्थ नहीं है कि भविष्य भी अन्धकारमय है। आपका भविष्य उज्ज्वल है। विचारपूर्वक देखिए कि जो कुछ आपके पास है, उसका सबसे अच्छा उपयोग कर रहे हैं अथवा नहीं? क्योंकि यदि प्रस्तुत साधनों का दुरुपयोग करते हैं, तो चाहे वह कितनी ही तुच्छ और सारहीन क्यों न हो, आप उसके भी अधिकारी न रहेंगे। वह भी आपसे दूर भाग जायेंगे या छीन लिए जावेंगे।

🔵 हर मनुष्य में अपने प्रति पक्षपात करने की दुर्बलता पाई जाती है। आँखें बाहर को देखती हैं, भीतर का कुछ पता नहीं। कान बाहर के शब्द सुनते हैं, अपने हृदय और फेफडों से कितना अनवरत ध्वनि प्रवाह गुंजित होता है, उसे सुन ही नहीं पाते। इसी प्रकार दूसरों के गुण-अवगुण देखने में रुचि भी रहती है और प्रवीणता भी, पर ऐसा अवसर कदाचित ही आता है जब अपने दोषों को निष्पक्ष रूप से देखा और स्वीकारा जा सके। आमतौर से अपने गुण ही गुण दीखते हैं, दोष तो एक भी नजर नहीं आता। कोई दूसरा बताता है तो वह शत्रुवत् प्रतीत होता है। आत्म समीक्षा कोई कब करता है। वस्तुतः दोष दुर्गुणों के सुधर के लिए अपने आपसे संघर्ष करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 3)

🌹 विचार शक्ति सर्वोपरि

🔴 यों संसार में शारीरिक, सामाजिक, राजनीतिक और सैनिक—बहुत सी शक्तियां विद्यमान हैं। किन्तु इन सब शक्तियों से भी बढ़कर एक शक्ति है, जिसे विचार-शक्ति कहते हैं। वह सर्वोपरि है।

🔵 उसका एक मोटा-सा कारण तो यह है कि विचार-शक्ति निराकार और सूक्ष्मातिसूक्ष्म होती है और अन्य शक्तियां स्थूलतर। स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म में अनेक गुना शक्ति अधिक होती है। पानी की अपेक्षा वाष्प और उससे उत्पन्न होने वाली बिजली बहुत शक्तिशाली होती है। जो वस्तु स्थूल से सूक्ष्म की ओर जितनी बढ़ती जाती है, उसकी शक्ति भी उसी अनुपात में बढ़ती जाती है।

🔴 मनुष्य जब स्थूल शरीर से सूक्ष्म, सूक्ष्म से कारण-शरीर, कारण-शरीर से आत्मा और आत्मा से परमात्मा की ओर ज्यों-ज्यों बढ़ता है, उसकी शक्ति की उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती है। यहां तक कि अन्तिम कोटि में पहुंच कर वह सर्वशक्तिमान बन जाता है। विचार सूक्ष्म होने के कारण संसार के अन्य किसी भी साधन से अधिक शक्तिशाली होते हैं। उदाहरण के लिए हम विभिन्न धर्मों के पौराणिक आख्यानों की ओर जा सकते हैं।

🔵 बहुत बार किसी ऋषि, मुनि और महात्मा ने अपने शाप और वरदान द्वारा अनेक मनुष्यों का जीवन बदल दिया। ईसाई धर्म के प्रवर्तक ईसा-मसीह के विषय में प्रसिद्ध है कि उन्होंने न जाने कितने अपंगों, रोगियों और मरणासन्न व्यक्तियों को पूरी तरह आशीर्वाद देकर ही भला-चंगा कर दिया। विश्वामित्र जैसे ऋषियों ने अपनी विचार एवं संकल्प शक्ति से दूसरे संसार की ही रचना प्रारम्भ कर दी थी। और इस विश्व ब्रह्माण्ड की, जिसमें हम रह रहे हैं, रचना भी ईश्वर के विचार-स्फुरण का ही परिणाम है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 11)

🌹 तीनों उद्यान फलेंगे और निहाल करेंगे

🔵 जिस तिस से सहारा पाने की भी समय कुसमय आवश्यकता पड़ सकती है, पर उसकी उपयोगिता उतनी ही स्वल्प है, जितनी संकट ग्रस्तों को कठिनाई से उबारने में कभी-कभी उदारचेताओं की सहानुभूति काम दे जाती है। उसी के सहारे जिन्दगी की लम्बी मञ्जिल को पार करना और बढ़ी चढ़ी सफलताओं के अनुदान-वरदान प्रस्तुत कर सकना सम्भव नहीं होता।

🔴 आज की अदृश्य किन्तु दो महती समस्याओं में से एक यह है कि लोग परावलम्बन के अभ्यस्त हो चले हैं। दूसरों का ऊटपटाँग अनुकरण करते ही उनसे बन पड़ता है। निजी विवेक इतना तक नहीं जागता कि स्वतन्त्र चिन्तन के सहारे जो उपयुक्त है, उसे अपनाने और जो अनुपयुक्त है, उसे बुहार फेंकने तक का साहस जुटा सकें। यह परावलम्बन यदि छोड़ते बन पड़े, तो मनुष्य का उपयुक्तता को अपनाने का साहस भीतर से ही उठ सकता है और ‘‘एकला चलो रे’’ का गीत गुनगुनाते हुए उपर्युक्त तीनों क्षेत्रों में निहाल कर सकने वाली सम्पदा उपार्जित कर सकता है।  

🔵 आज की सबसे बड़ी, सबसे भयावह समस्या एक ही है, मानवी चेतना का परावलम्बन, अन्त:स्फुरणा का मूर्छाग्रस्त होना, औचित्य को समझ न पाना और कँटीली झाड़ियों में भटक जाना। अगले दिन इस स्थिति से उबरने के हैं। उज्ज्वल भविष्य की समस्त सम्भावनाएँ इसी आधार पर विनिर्मित होंगी। अगले दिनों लोग दीन-हीन मनो-मलीन उद्विग्न-विक्षिप्त स्थिति में रहना स्वीकार न करेंगे। सभी आत्मावलम्बी होंगे और किसी एक पुरुषार्थ को अपनाकर ओजस्वी, तेजस्वी, वर्चस्वी बन सकने में पूरी तरह सफल होंगे। वातावरण मनुष्य को बनाता है, यह उक्ति गये गुजरें लोगों पर ही लागू होती है। वास्तविकता यह है कि आत्मबल के धनी, अपनी सङ्कल्प-शक्ति और प्रतिभा के सहारे अभीष्ट वातावरण बना सकने में पूरी तरह सफल होते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 युग परिवर्तन (भाग 1)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 थोड़ी सी बातें ऐसी, जो आपको गाँठ बाँध करके रखनी चाहिए और कभी भूलना नहीं चाहिये। इसको आप गाँठ बाँध करके रखना, कभी भूलना मत। एक बात मुझे आपसे ये कहनी थी, आप एक विशेष उद्देश्य को लेकर के, विशेष प्रयोजन के लिये, इस विशेष समय पर पैदा हुए हैं। ये युग के परिवर्तन की वेला है। आपको दिखाई तो नहीं पड़ता, पर मैं आपको कह सकता हूँ और मुझे कहना चाहिये। आप जिस समय में पैदा हुए हैं, ये साधारण समय नहीं है, असाधारण समय है। इस समय में युग तेजी के साथ में बदल रहा है। आपने देखा नहीं, किस तरीके से परिवर्तन विश्व की समस्याओं में बदलते हुए जा रहे हैं? विज्ञान की प्रगति को आप देख नहीं रहे क्या? ऐसी-ऐसी चीजें बनती हुई चली जा रही हैं। एक किरण-एक्स रे के तरीके से, एक्स-रे की किरण फेंकी जाती है।

🔵 किरण फेंकी जाय, न गैस फेंकने की जरूरत है, न कुछ फेंकने की जरूरत है, सारे का सारा इलाका जो मनुष्य रह रहा है, वहाँ बैठे के बैठे रह जायेंगे, उठे के उठे रह जायेंगे, चलने-फिरने के लिये कोई मौका नहीं आयेगा। ऐसे-ऐसे वैज्ञानिक हथियार तैयार हो रहे हैं, जो दुनिया का सफाया करना हो तो बहुत जल्दी सफाया हो सकता है। विनाश की दिशा में विज्ञान के बढ़ते हुए चरण जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, अगर चाहे तो एक खराब दिमाग का मनुष्य सारी दुनिया को इस सुन्दर वाले भूमण्डल को, जिसको बनाने में लाखों वर्षों तक मनुष्य को श्रम करना पड़ा, इसका सफाया किया जा सकता है। आज ऐसा वक्त है। इन्सान जितना घटिया होता चला जाता है, उतना घटिया आदमी पहले कभी नहीं हुआ था।

🔴 दुनिया के पर्दे में, इतिहास ये बताता है कि मनुष्य इतना घटिया आदमी कभी नहीं हुआ। आदमी समझदारी के हिसाब से बढ़ रहा है, विद्या उसके पास ज्यादा आ रही है, समझदारी उसके पास ज्यादा आ रही है, पैसा उसके पास ज्यादा आ रहा है, अच्छे मकान ज्यादा आ रहे हैं, सब चीज ज्यादा आ रही है, पर ईमान के हिसाब से और दृष्टिकोण के हिसाब से आदमी इतना कमजोर, इतना घटिया, इतना स्वार्थी, इतना चालाक, इतना बेईमान, इतना कृपण, इतना ठग होता हुआ चला जा रहा है, कि मुझे शक है कि आदमी की यही ठगी, यही कृपणता और यही स्वार्थपरता, जो आज हमारे और आपके ऊपर हावी हो गई है।

🔵 इसी हिसाब से, इसी क्रम से, चाल से चली तो एक आदमी, दूसरे आदमी को जिंदा निगल जायेगा। आदमी को अपनी छाया पर विश्वास नहीं रहेगा कि ये मेरी छाया है कि नहीं और ये मेरी छाया मेरी सहायता करेगी कि नहीं। आज ऐसी ही विचित्र स्थिति है बेटे! हम कुछ कह नहीं सकते। जैसी दुनिया की विचित्र स्थिति है, भयानकता, आज हमारे सामने खड़ी है। युग का एक पक्ष विनाश के लिये मुँह फाड़कर खड़ा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/amart_vachan_jivan_ke_sidha_sutra/yug_parivartan

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 97)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 (8) लोक सेवी युग-निर्माता की धर्म सेवा— संसार में जितने भी महत्वपूर्ण जन-आन्दोलन चले और सफल हुए हैं उनके पीछे भावनाशील, उच्च चरित्र, आदर्शवादी लोक सेवकों की शक्ति ही प्रधान आधार रही है। इस बल के अभाव में अन्य साधन कितने ही अधिक होने पर भी कोई बड़ा काम, खास तौर से नव-निर्माण जैसा महान अभियान सफल नहीं हो सकता। इसलिए हमें इस बात का घोर प्रयत्न करना होगा कि कुछ व्यक्ति भजन करके स्वर्ग प्राप्ति के लिए लाल कपड़े वाले बाबाजी नहीं वरन् युग रचना के लिए जनता जनार्दन की आराधना करने वाले विवेकशील त्यागी तपस्वी लोग कर्म क्षेत्र में उतरें और भौतिक एकताओं से ऊंचे उठकर सच्चे महामानवों की तरह अपनी हस्ती विश्व मंगल के लिए लगा दें।

🔵 जिनके बच्चे समर्थ होकर कमाने खाने लगे हैं, जिनके ऊपर ईश्वर की कृपा से ही कमाने की या बच्चों की जिम्मेदारी नहीं है वे वानप्रस्थ की तरह अपने घर रहते हुए भी अपने क्षेत्र में प्रकाश स्तम्भ की तरह काम कर सकते हैं। जिनके ऊपर पारिवारिक जिम्मेदारियां हैं वे भी अवकाश का थोड़ा बहुत समय समाज सेवा के लिए लगा सकते हैं। इन समयदानी लगनशील लोगों के भागीरथ प्रयत्नों से ही आदर्श विवाहों की प्रथा का प्रचलन सम्भव हो सकेगा।

🔴 युग-निर्माण योजना के सदस्यों को इस धर्म-सेना में सम्मिलित होना चाहिए। इस सेना में भर्ती की शर्त लोक मंगल के लिए नियमित रूप से समय दान करने लगना है। जो पारिवारिक जिम्मेदारियों से निवृत्त हैं उनका धर्म कर्तव्य यह है कि लोक और मोह के बन्धनों को काट कर जनता जनार्दन की सेवा के लिए एक सच्चे तपस्वी की तरह काम करने का व्रत धारण करलें। जिनके पास बहुत जिम्मेदारियां हैं वे भी एक दो घण्टे का समय तो नित्य लगा ही सकते हैं। अपना काम काज करते हुए भी सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों को इस मिशन की प्रेरणा दे सकते हैं। छुट्टी का पूरा दिन इस कार्य के लिए दे सकते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 45)

🌹 गुरुदेव का प्रथम बुलावा-पग-पग पर परीक्षा
🔴 वहीं बहते निर्झर में स्नान किया। संध्या वंदन भी। जीवन में पहली बार ब्रह्म कमल और देवकमल देखा। ब्रह्मकमल ऐसा जिसकी सुगंध थोड़ी देर में ही नींद कहें या योग निद्रा ला देती है। देवकंद वह जो जमीन में शकरकंद की तरह निकलता है। सिंघाड़े जैसे स्वाद का। पका होने पर लगभग पाँच सेर का, जिससे एक सप्ताह तक क्षुधा निवारण का क्रम चल सकता है। गुरुदेव के यही दो प्रथम प्रत्यक्ष उपहार थे। एक शारीरिक थकान मिटाने के लिए और दूसरा मन में उमंग भरने के लिए।

🔵 इसके बाद तपोवन पर दृष्टि दौड़ाई। पूरे पठार पर मखमली फूलदार गलीचा सा बिछा हुआ था। तब तक भारी बर्फ नहीं पड़ी थी। जब पड़ती है, तब यह फूल सभी पककर जमीन पर फैल जाते हैं, अगले वर्ष उगने के लिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 45)

🌞  हिमालय में प्रवेश (सुनसान की झोंपड़ी)

🔵 मस्तिष्क ने अब दार्शनिक ढंग से सोचना आरम्भ कर दिया—स्वार्थी लोग अपने आपको अकेला मानते हैं, अकेले के लाभ हानि की ही बात सोचते हैं, उन्हें अपना कोई नहीं दीखता, इसलिए वे सामूहिक के आनन्द से वंचित रहते हैं। उनका अन्तिम सूने मरघट की तरह सांय-सांय करता रहता है। ऐसे अनेकों परिचित व्यक्तियों के जीवन चित्र सामने आ खड़े हुए जिन्हें धन-वैभव की, श्री समृद्धि की कमी नहीं, पर स्वार्थ सीमित होने के कारण सभी उन्हें पराये लगते हैं, सभी की उन्हें शिकायत और कष्ट है।

🔴 विचार प्रवाह अपनी दिशा में तीव्र गति से दौड़ा चला जा रहा था। लगता था वह सूनेपन को अनुपयुक्त ही नहीं हानिकर और कष्टदायक भी सिद्ध करके छोड़ेगा। तब अभिरुचि अपना प्रस्ताव उपस्थित करेगी—इस मूर्खता में पड़े रहने से क्या लाभ? अकेले में रहने की अपेक्षा जन-समूह में रह कर ही जो काम्य है, वह सब क्यों न प्राप्त किया जाय?

🔵 विवेक ने मन की गलत दौड़ को पहचाना और कहा—यदि सूनापन ऐसा ही अनुपयुक्त होता तो ऋषि और मुनि, साधक और सिद्ध, विचारक और वैज्ञानिक क्यों उसे खोजते? क्यों उस वातावरण में रहते? यदि एकान्त में कोई महत्व न होता, तो समाधि-सुख और आत्म-दर्शन के लिये उसकी तलाश क्यों होती? स्वाध्याय और चिन्तन के लिए, तप और ध्यान के लिए क्यों सूनापन ढूंढ़ा जाता? दूरदर्शी महापुरुषों का मूल्यवान् समय क्यों उस असुखकर अकेलेपन में व्यतीत होता?

🔴 लगाम खींचने पर जैसे घोड़ा रुक जाता है उसी प्रकार वह सूनेपन को कष्ट कर सिद्ध करने वाला विचार प्रवाह भी रुक गया। निष्ठा ने कहा—एकान्त साधना की आत्म-प्रेरणा असत् नहीं हो सकती। निष्ठा ने कहा—जो शक्ति इस मार्ग पर खींच लाई है, वह गलत मार्ग-दर्शन नहीं कर सकती। भावना ने कहा—जीव अकेला आता है, अकेला जाता है, अकेला ही अपनी शरीर रूपी कोठरी में बैठा रहता है, क्या इस निर्धारित एकान्त विधान में उसे कुछ असुखकर प्रतीत होता है? सूर्य अकेला चलता है, चन्द्रमा अकेला उदय होता है, वायु अकेला बहती है। इसमें उन्हें कुछ कष्ट है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

प्रेरणादायक प्रसंग 7 Feb 2017


👉 रैदास के पैसे गंगाजी ने हाथ मे लिए

🔴 सन्त रैदास मोची का काम करते थे। काम को वें भगवान् की पूजा मानकर पूरी लगन एवं ईमानदारी से पूरा करते थे। एक साधु को सोमवती अमावस्या के दिन गंगा स्नान करने को साथ- साथ चलने के लिए उन्होंने आश्वासन दिया था। साधु सदा जप- तप में तल्लीन रहते थे।

🔵 अमावस्या के स्नान का दिन निकट था। साधु रैदास के पास पहुँचे। गंगा स्नान की बात याद दिलायी। रैदास लोगों के जूते सीने का काम हाथ में ले चुके थे। समय पर देना था। अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुए रैदास ने कहा 'महात्मन्! आप मुझे क्षमा करें। मेरे भाग्य में गंगा का स्नान नहीं है। यह एक पैसा लेते जाँय और गंगा माँ को मेरे नाम पर चढा देना। '

🔴 साधु गंगा सान के लिए संमय पर पहुँचे। स्नान करने के बाद उन्हें रैदास की बात स्मरण हो आयी। मन ही मन गंगा से बोले 'माँ यह पैसा रैदास ने भेजा है- स्वीकार करें। ' इतना कहना था कि गंगा की अथाह जल राशि से दो विशाल हाथ बाहर उभरे और पैसे को हथेली में ले लिया। साधु यह दृश्य देखकर विस्मित रह गये और सोचने लगे मैंने इतना जप- तप किया, गंगा आकर स्नान किया तो भी गंगा माँ की कृपा नहीं प्राप्त हो सकी, जब कि गंगा का बिना स्नान किए ही रैदास को अनुकुम्पा प्राप्त हो गयी।

🔵 वे रेदास के पास पहुँचे और पूरी बात बतायी। रैदास बोले- 'महात्मन्! यह सब कर्त्तव्य धर्म के निर्वाह का प्रतिफल है। इसकें मुझ अकिंचन के तप, पुरुषार्थ की कोई भूमिका नहीं।


🌹 प्रज्ञा पुराण भाग 1 पृष्ठ 8

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 30) 7 Feb

🌹 जीवन साधना के सुनिश्चित सूत्र-   

🔴 शरीर में मल, मूत्र, पसीना, कफ आदि के द्वारा सफाई होती है। स्नान का उद्देश्य भी यही है। सफाई से सम्बन्धित अनेक उपक्रम भी इसीलिये चलते हैं कि विषाणुओं का आक्रमण न होने पाये। सर्दी-गर्मी से बचने के लिये अनेक प्रयत्न भी इसी उद्देश्य से किये जाते हैं कि हानि पहुँचाने वाले तत्त्वों से निपटा जाता रहे। जीवन भी एक शरीर है, उसे गिराने के लिये पग-पग पर अनेकानेक संकट, प्रलोभन, दबाव उपस्थित होते रहते हैं। उनसे निपटने के लिये सतर्कता न बरती जाये तो बात कैसे बने? चोर-उचक्कों ठगों, उद्दण्डों की उपेक्षा न होती रहे, तो वे असाधारण क्षति पहुँचाये बिना न रहेंगे।                     

🔵 दुष्प्रवृत्तियाँ जन्म-जन्मान्तरों से संचित पशु-प्रवृत्तियों के रूप में स्वभाव के साथ गुँथी रहती है। फिर निकटवर्ती लोग जिस राह पर चलते और जिस स्तर की गतिविधियाँ अपनाते हैं, वे भी प्रभावित करती हैं और अपने साथ चलने के लिये ललचाती हैं। जो कुछ बहुत जनों द्वारा किया जाता दीखता है, अनुकरणप्रिय स्वभाव भी उसकी नकल बनाने लगता है। इतना विवेक तो किन्हीं विरलों में ही पाया जाता है कि वे उचित-अनुचित का विचार करें, दूरवर्ती परिणामों का अनुमान लगायें और सन्मार्ग पर चलने के लिये बिना साथियों की प्रतीक्षा किये एकाकी चल पड़ने का साहस जुटायें। आमतौर से लोग प्रचलित ढर्रे पर चलते देख गये हैं। पत्ते और धूलिकण हवा के रुख के साथ उड़ने लगते हैं। दिशाबोध उन्हें कहाँ होता है? यही स्थिति लोकमानस के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है। नीर-क्षीर की विवेक बुद्धि तो कम दीख पड़ने वाले राजहंसों में ही होती है। अन्य पक्षी तो ऐसे ही कूड़ा-कचरा और कीड़े-मकोड़े खाते देखे गये हैं।

🔴 किसी वस्तु को प्राप्त कर लेना एक बात है और उसका सदुपयोग बन पड़ना सर्वथा दूसरी। स्वास्थ्य सभी को मिला है, पर उसे बनाये रखने में समर्थ विरले ही होते हैं। अधिकांश तो असंयम अपनाते और उसे बरबाद ही करते हैं। बुद्धि का सदुपयोग कठिन है, चतुर कहे जाने वाले लोग भी उसे कहाँ कर पाते हैं? धन कमाते तो सभी हैं, पर उसका आधा चौथाई भाग भी सदुपयोग में नहीं लगता। उसे जिन कामों में जिस तरह खरचा जाता है, उससे खरचने वालों की, उनके सम्पर्क में आने वालों की तथा सर्वसाधारण की बरबादी ही होती है। प्रभाव का उपयोग प्राय: गिराने, दबाने, भटकाने में ही होता रहता है। इसे समझदार कहे जाने वाले मनुष्य की नासमझी ही कहा जायेगा। यह व्याधि सर्वसाधारण को बुरी तरह ग्रसित किये हुए है। इसी को कहते हैं राजमार्ग छोड़कर मृगतृष्णा में, भूल-भुलैयों में भटकना। जीवन सम्पदा के सम्बन्ध में भी यही बात है। जन्म से मरणपर्यन्त पेट प्रजनन जैसी सामयिक बातों में ही आयुष्य बीत जाता है। आवारागर्दी में दिन कट जाता है।        

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 शैतानियत से इस तरह निपटा जाए

🔴 अल कैपोन जिस रास्ते निकल जाता लोग रास्ता छोड देते। जिस पदाधिकरी से भेंट से जाती, उसके प्राण सूख जाते। पुलिस और न्यायाधीश उसकी दृष्टि से उसका बचाव करते थे। बड़ा खूंखार और बेईमान था वह व्यक्ति। उसके गिरोह में कितने बदमाश थे, इसका पता भी नहीं चल सकता था। वह अकेले अवैध शराब के धंधे में ही ३ करोड डालर प्रतिवर्ष कमाता था, पर क्या मजाल कि कोई अधिकारी उस पर चूँ कर जाए। सब उसकी कृपा-दृष्टि के लिए लालायित रहा करते थे।

🔵 स्वस्थ और बलवान् रहा होगा पर वह कोई भूत नहीं था जो उससे घबराया जाता, पर जब मनुष्य की संघर्ष और बुराइयों से मुकाबले की शक्ति समाप्त हो जाती है, तब कोई छोटा-सा साहसी बालक भी रौब गालिब कर सकता है। यदि १००-५० व्यक्ति भी संगठित होकर खड़े हो जाते तो अल कोपेन जैसे २० दुष्टों को मार कर रख देते पर प्राणों का अकारण मोह और पस्त हिम्मत खा जाती है मनुष्य को। जिस समाज के लोग बुराइयों से डरते है उनसे लड नहीं सकते वे उन अमेरिकनों की भाँति ही सताए जाते रहते है। चाहे चीनी हो या भारतवासी। हम भी तो आए दिन अवांछनीय लोगों द्वारा सताए जाते है, पर कही यह हिम्मत होती है उनसे लड पडने की ?

🔴 बात धीरे-धीरे अमेरिकन राष्ट्रपति हर्बर्ट हूवर के कानों तक पहुंच गई। हर्बर्ट हूवर हैरान थे कि एक व्यक्ति का मुकाबला करना भी लोगों को कठिन है, फिर यदि चारों तरफ ऐसे लोगो का फैलाव हो जाये तो क्या हो ? उन्होंने निश्चय कर लिया जो भी हो एक अमेरिकन राष्ट्रपति और भी गोली का शिकार हो जलेगा ? पर शैतानियत को खुलकर खेलने का अवसर नहीं दिया जायेगा। यदि कोपेन कुछ बुरे लोगो का मार्गदर्शन कर सकता है तो हम हजारो अच्छे लोगों को किस तरह बुराइयों से निबटा जाता है ? यह सिखाने की जिंदादिली भी रखते है।

🔵 अभी वे नये-नये ही राष्ट्रपति चुने गए हैं। जब लोगों को विजयोल्लास की सूझ रछ थी, तब राष्ट्रपति की आँखों में देशवासियों के इस संकट की किरकिरी खटक रही थी, मियामी के एक होटल में राष्ट्रपति के सम्मान में स्वागत दिया गया था। उनके हजारों प्रशंसक और पार्टीमेन सम्मिलित हुए थे। दैवयोग से राष्ट्रपति और अल-कोपेन की भेंट वहीं हो गई। उपस्थित अधिकारियों की उपेक्षा करता हुआ वह सिगरेट का धुँआ अभद्रता से छोड़ता हुआ निकल गया; सबकी आँखे उधर गई पर किसी को मी टोकने की हिम्मत न पडी़। उन्हें पता था उसे छेड़ने का मूल्य प्राणों से चुकना पड़ सकता है।

🔴 राष्ट्रपति हूवर ने पूछा-कौन है यह ?
'अल कैपोन' लोगों ने बताया। राष्ट्रपति का उबलकर आया हुआ क्रोध दब तो गया, पर वह इस निश्चय में बदल गया कि अब इस धूर्त को जल्दी से मिट्टी चखाना चाहिए।

🔵 साथियों, सलाहकारों ने समझाया कि उससे मोर्चा लेना आसान बात नहीं है। वह कोई भी कांड कर सकता है। इस पर राष्ट्रपति ने कहा मैं कब चाहता हूँ कि मैं केवल आसान बातें ही निबटाता रहूँ। मनुष्य को परमात्मा ने ऐसी शक्ति दी है कि हर किसी को असाधारण कार्य के लिए तैयार रहना चाहिए।

🔴 राष्ट्रपति ने सूचना विभाग का एक पूरा दस्ता उसके पीछे लगा दिया। उसे पता भी चल गया और किसी अपराध की पुष्टि नहीं हो रही थी, पर इनकम टैक्स के मामले में वह पकड़ में आ गया और राष्ट्रपति ने आगे आकर उसे गिरफ्तार करा दिया। इस बार न्यायधीशों के पास राष्ट्रपति की हिम्मत थी, सो उसे ११ वर्ष की कडी सजा दी गई। कैपोन जब जेल से छूटा तब एक ढी़ला डाला मजदूर मात्र रह गया था। उसके गिरोह का पता भी न था।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹  संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 11, 12

👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 Feb 2017

 
🔵 तू सूर्य और चन्द्र को अपने पास नहीं उतार सका इसका कारण उनकी दूरी नहीं, तेरी दूरी की भावना है। तू संसार को बदल नहीं पाया इसका कारण संसार की अपरिवर्तनशीलता नहीं, वरन् तेरे प्रयासों की शिथिलता है। जब तू यह कहता है कि मैं अपने में परिवर्तन नहीं कर सकता, तो इसे स्थिति और विवशता कहकर न टाल, साफ-साफ अपनी कायरता और अकर्मण्यता कह; क्योंकि इच्छा की प्रबलता ही कार्य की सिद्धि है।

🔴 गलती करना बुरा नहीं है; बल्कि गलती को न सुधारना बुरा है। संसार के महान् पुरुषों ने अनेक प्रकार की गलतियाँ की हैं। रावण जैसा विद्वान् अपने दुष्कृत्यों से राक्षस जैसा बन गया। वाल्मीकि डकैत रहे हैं। सुर, तुलसी, कबीर, मीरा, रसखान आदि सांसारिक जीवन में गलती करते रहे थे, लेकिन इन्होंने गलती को सुधारा और आगे बढ़कर महापुरुष बने। स्मरण रखिए कि एक गलती को सुधारकर आप किसी न किसी क्षेत्र में आगे बढ़ जाते हैं।

🔵 यदि हम क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या, लोभ आदि असंगत मानसिक दोषों के शिकार होते हुए भी उन्नति पूर्ण स्वस्थ जीवन की कल्पना करते हैं तो यह असम्भव बात का स्वप्र देखना मात्र है। यदि हम वास्तव में अपने जीवन को सुखी एवं उन्नतिशील देखना चाहते हैं तो क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या आदि कुविचारों को घटाने और हटाने के लिए प्रयत्न करना होगा।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 3) 7 Feb

🌹 मानव जीवन विचारों का प्रतिविम्ब

🔴 संसार एक शीशा है। इस पर हमारे विचारों की जैसी छाया पड़ेगी वैसा ही प्रतिविम्ब दिखाई देगा विचारों के आधार पर ही संसार सुखमय अनुभव होता है। पुरोगामी उत्कृष्ट उत्तम विचार जीवन को ऊपर उठाते हैं, उन्नति, सफलता, महानता का पथ प्रशस्त करते हैं तो हीन, निम्नगामी, कुत्सित विचार जीवन को गिराते हैं।

🔵 विचारों में अपार शक्ति है। जो सदैव कर्म की प्रेरणा देती है। वह अच्छे कार्यों में लग जाय तो अच्छे, और बुरे मार्ग की ओर प्रवृत्त हो जाय तो बुरे परिणाम प्राप्त होते हैं। विचारों में एक प्रकार की चेतना शक्ति होती है। किसी भी प्रकार के विचारों में एक स्थान पर केन्द्रित होते रहने पर उनकी सूक्ष्म चेतन शक्ति घनीभूत होती जाती है। प्रत्येक विचार आत्मा और बुद्धि के संसर्ग से पैदा होता है। बुद्धि उसका आकार-प्रकार निर्धारित करती है तो आत्मा उसमें चेतना फूंकती है। इस तरह विचार अपने आप में एक सजीव किन्तु सूक्ष्म तत्व है।

🔴 मनुष्य के विचार एक तरह की सजीव तरंगें हैं जो जीवन संसार और यहां के पदार्थों को प्रेरणा देती रहती हैं। इस सजीव विचारों का जब केन्द्रीयकरण हो जाता है तो एक प्रचण्ड शक्ति का अनुभव होता है। स्वामी विवेकानन्द ने विचारों की इस शक्ति का उल्लेख करते हुए बताया है— कोई व्यक्ति भले ही किसी गुफा में जाकर विचार करे और विचार करते-करते ही वह मर भी जाय तो वे विचार कुछ समय उपरान्त गुफा की दीवारों का विच्छेद कर बाहर निकल पड़ेंगे, और सर्वत्र फैल जायेंगे।

🔵 वे विचार तब सबको प्रभावित करेंगे।’’ मनुष्य जैसे विचार करता है, उनकी सूक्ष्म तरंगें विश्वाकाश में फैल जाती हैं। सम स्वभाव के पदार्थ एक दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं, इस नियम के अनुसार उन विचारों के अनुकूल दूसरे विचार आकर्षित होते हैं और व्यक्ति को वैसे ही प्रेरणा देते हैं। एक ही तरह के विचार घनीभूत होते रहने पर प्रचण्ड शक्ति धारण कर लेते हैं और मनुष्य के जीवन में जादू की तरह प्रकाश डालते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 10)

🌹 तीनों उद्यान फलेंगे और निहाल करेंगे  
🔵 तीसरा उद्यान है- अन्त:करण क्षेत्र का, जिसमें भाव संवेदनाएँ मान सरोवर की तरह लहराती और गंगा भागीरथी की तरह उत्ताल तरंगों के साथ बहती हैं। मात्र निष्ठुरता ही एक ऐसी चट्टान है, जो इन उद्गमों का द्वार बन्द किये रहती है। यही है वह उल्लास उद्गम जिसमें देवता रहते, महामानव विकसते और ऋषि मनीषियों की चेतना निवास करती है। संकीर्ण स्वार्थपरता ही एक ऐसी बाधा है, जो मनुष्य को उदारमना बनकर उच्चस्तरीय सेवा साधना के लिए अजस्र अवसर उपलब्ध नहीं होने देेती है।

🔴 मनुष्य भटका हुआ देवता है। यदि वह अपने इस भटकाव से छुटकारा पा सके और महानता के राजमार्ग पर चलते रहने की विवेकशीलता अपना सके, तो उतने भर से ही स्वयं पार उतरने और अनेकों को पार उतारने की स्थिति अनायास ही बन सकती है। इसके लिए विद्वान या पहलवान होना आवश्यक नहीं। कबीर, दादू, रैदास, मीरा, शबरी आदि ने विद्वता या सम्पन्नता के आधार पर वह श्रेय प्राप्त नहीं किया था, जिससे अब भी असंख्यकों को उच्चस्तरीय प्रेरणाएँ उपलब्ध करते देखा जाता है। 

🔵 मनुष्य के पास शरीर, मन और अन्त:करण यह तीन ऐसी खदानें हैं, जिनमें से इच्छानुसार मणिमुक्तक खोद निकाले जा सकते हैं। बाहरी सहयोग भी सत्पात्रों को अनायास ही मिल जाता है। अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होने वाले विद्यार्थियों को सहज छात्रवृत्तियाँ मिल जाती हैं। मात्र कुपात्र ही कभी भाग्य पर, कभी ग्रह नक्षत्रों पर और कभी जो भी सामने दीख पड़ते हैं, उसी पर दोष मढ़ते रहते हैं। गतिवानों को किसी ने रोका नहीं है। गंगा का प्रवाहमान सङ्कल्प, उसे महासागर के मिलन तक पहुँचाए बिना बीच में कहीं रुका नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 संकल्पवान्-व्रतशील बनें (भाग 3)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 आपका दुश्मन नम्बर एक-आपका मन और आपका दोस्त नम्बर एक-आपका मन। दुश्मन को दोस्त के रूप में बदलने के लिये जिस दबाव की जरूरत है, जिस आग की भट्ठी में नया औजार ढालने की जरूरत है, उस भट्ठी का नाम है-संकल्प, आत्मानुशासन। अपने आपका आत्मानुशासन स्थापित करने के लिये आपको व्रतशील होना चाहिए, संकल्पवान् होना चाहिए और संकल्पों में व्यवधान उत्पन्न न हो, इसलिये आपको कोई न कोई ऐसे नियम और व्रत समय-समय पर लेते रहना चाहिए। इसका अर्थ ये होता है कि जब तक अमुक काम न हो जायेगा, तब तक हम अमुक काम नहीं करेंगे।

🔵 संकल्पवान् बनिए। संकल्पवान् ही महापुरुष बने हैं, संकल्पवान् ही उन्नतिशील बने हैं, संकल्पवान् ही सफल हुए हैं और संकल्पवानों ने ही संसार की नाव को पार लगाया है। आपको संकल्पवान् और व्रतशील होना चाहिए। नेकी आपकी नीति होनी चाहिए। उदारता आपका फर्ज होना चाहिए। आपने अगर ऐसा कर लिया हो तब फिर आप दूसरा कदम ये उठाना कि हम ये काम नहीं किया करेंगे।

🔴 समय-समय पर सोच लिया कीजिए कि गुरुवार के दिन, नमक न खाने की बात, ब्रह्मचर्य से रहने की बात, दो घण्टे मौन रहने की बात, आप भी ऐसे व्रतशील होकर के कुछ नियम पालन करते रहेंगे और उसके साथ में किसी श्रेष्ठ कर्तव्य और उत्तरदायित्व का ताना-बाना जोड़ के रखा करेंगे तो आपके विचार सफल होंगे, आपका व्यक्तित्व पैना होगा और आपकी प्रतिभा तीव्र होगी और आप एक अच्छे व्यक्ति के रूप में शुमार होंगे। अगर आप आत्मानुशासन और अपनी व्रतशीलता का महत्त्व समझें और उसे अपनाने की हिम्मत बढ़ायें।

🌹 आज की बात समाप्त।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 96)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴  (7) सुधार प्रतिरोध और असहयोग— जहां विवाहों में अपव्यय करने का पागलपन गहराई तक जड़ जमाये बैठा हो, वहां यह आशा नहीं की जा सकती कि प्रचार से ही सब कुछ ठीक हो जायगा। इसके लिए उस किसान या माली से प्रेरणा लेनी पड़ेगी जो अवांछनीय झाड़-झंखाड़ों को उखाड़ फेंकने के लिए उनकी जड़ों पर अपने पैने औजारों के तीव्र प्रहार करता है। कूड़ा-करकट अपने आप नहीं हटता उसे झाड़ू से घसीट कर बाहर करना होता है। कुरीतियां अपने आप मिटने वाली नहीं हैं उनके विरुद्ध संघर्ष करना पड़ेगा। उस संघर्ष में अपने को कुछ चोट पहुंचती हो तो उसे धर्म वीरों की परम्परा के अनुसार त्याग बलिदान का छोटा-सा सौभाग्य मानने के लिए तैयार रहना चाहिए।

🔵 हम में से जिनका प्रभाव जहां हो, वहां उस प्रभाव का उपयोग करके इन कुरीतियों से बचने का प्रयत्न करना चाहिए। अपने घर, कुटुम्ब, मित्र एवं रिश्तेदारों में तो ऐसा सुझाव बलपूर्वक भी किया जा सकता है और यदि वे न मानें तो अपने असहयोग की, उस विवाह में सम्मिलित न होने की बात भी कही जा सकती है।

🔴 जिन विवाहों में अपने को सम्मिलित होने का अवसर मिले उनमें पूर्णतया न सही, जितना कुछ वश चले, 24 में से जितने भी सूत्र जितने अंशों में भी कार्यान्वित किये जा सकें उसके लिए जोर देना चाहिये, प्रयत्न करना चाहिये। जो अन्य प्रभावशाली व्यक्ति उस उत्सव में आते हों उनमें से कोई विचारवान दीखें तो उनके माध्यम से प्रभाव डलवाना चाहिये ताकि जितने अंशों में कुरीतियां हट सकें उतना तो किया ही जाय। आदर्श विवाह आन्दोलन के सम्बन्ध में छपे ट्रैक्ट भी ऐसे अवसरों पर रखने चाहिये और उन्हें पढ़ा सुनाकर ऐसा वातावरण बनाना चाहिये कि सुधारवादी विचारधारा के लिए कोई स्थान उनके मन में बने। यह सब काम बिना कटु संघर्ष के चतुरता एवं बुद्धिमत्ता द्वारा मधुरता के वातावरण में भी सम्पन्न हो सकते हैं।

🔵 असहयोग वहीं करना चाहिए जहां अपना दबाव हो। अन्य विवाहों में सम्मिलित होकर अपनी विचारधारा के पक्ष में जितना भी वातावरण बन सके उतना बनाना चाहिये। रूठ बैठना या ऐसे पुराने ढर्रे से जहां विवाह हो रहा हो वहां जाना ही नहीं इस प्रकार का असहयोग व्यर्थ है। वहां तो भीतर घुस कर ही कुछ काम हो सकता है।

🔴 यों कानून द्वारा भी दहेज, अधिक बारात ले जाने पर कड़े प्रतिबन्ध लगे हुए हैं, पर उनका प्रयोग न करे जहां तक सम्भव हो सके प्रेम, मधुरता, प्रचार, समझाना, धमकी, नाराजी आदि शस्त्रों से ही काम लेना चाहिये। जहां अनिवार्य हो जाय वहीं कानूनी सहायता ली जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 44)

🌹 गुरुदेव का प्रथम बुलावा-पग-पग पर परीक्षा

🔴 गंगोत्री तक राहगीरों के लिए बना हुआ भयंकर रास्ता है। गोमुख तक के लिए उन दिनों एक पगडण्डी थी। इसके बाद कठिनाई थी। तपोवन काफी ऊँचाई पर है। रास्ता भी नहीं है। अंतःप्रेरणा या भाग्य भरोसे चलना पड़ता है। तपोवन पठार चौरस है। फिर पहाड़ियों की ऊँची शृंखला है। इसके बाद नंदन वन आता है। हमें यहीं बुलाया गया था। समय पर पहुँच गए। देखा तो गुरुदेव खड़े थे। प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। हमारा भी और उनका भी। वे पहली बार हमारे घर गए थे, इस बार हम उनके यहाँ आए। यह सिलसिला जीवन भर चलता रहे, तो ही इस बँधे सूत्र की सार्थकता है।

🔵 तीन परीक्षाएँ इस बार होनी थीं, बिना साथी के काम चलाना-ऋतुओं के प्रकोप की तितिक्षा सहना, हिंस्र पशुओं के साथ रहते हुए विचलित न होना। तीनों में ही अपने को उत्तीर्ण समझा और परीक्षक ने वैसा ही माना।

🔴 बात-चीत का सिलसिला तो थोड़े ही समय में पूरा हो गया। ‘‘अध्यात्म शक्ति प्राप्त करने के लिए प्रचण्ड मनोबल सम्पादित करना, प्रतिकूलताओं को दबोचकर अनुकूलता में ढाल देना, सिंह व्याघ्र तो क्या-मौत से भी न डरना, ऋषि कल्प आत्माओं के लिए तो यह स्थिति नितांत आवश्यक है। तुम्हें ऐसी ही परिस्थितियों के बीच अपने जीवन का बहुत सा भाग गुजारना है।’’

🔵 उस समय की बात समाप्त हो गई। जिस गुफा में उनका निवास था, वहाँ तक ले गए। इशारे में बताए हुए स्थान पर सोने का उपक्रम किया, तो वैसा ही किया। इतनी गहरी नींद आई कि नियत क्रम की अपेक्षा दूना तीन गुना समय लग गया हो तो कोई आश्चर्य नहीं। रास्ते की सारी थकान इस प्रकार दूर हो गई, मानो कहीं चलना ही नहीं पड़ा था।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/gur.3

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 44)

🌞  हिमालय में प्रवेश (तपोवन का मुख्य दर्शन)

🔵 इस झोंपड़ी के चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ है। प्रकृति स्तब्ध। सुनसान का सूनापन अखर रहा था। दिन बीता, रात आई। अनभ्यस्त वातावरण के कारण नींद नहीं आ रही थीं। हिंस्र पशु, चोर, सांप, भूत आदि तो नहीं पर अकेलापन डरा रहा था। शरीर के लिये करवटें बदलने के अतिरिक्त कुछ काम न था। मस्तिष्क खाली था, चिन्तन की पुरानी आदत सक्रिय हो उठी। सोचने लगा—अकेलेपन का डर क्यों लगता है?

🔴 भीतर से एक समाधान उपजा—मनुष्य समष्टि का अंग है। उसका पोषण समष्टि द्वारा ही हुआ है। जल तत्त्व से ओत-प्रोत मछली का शरीर जैसे जल में ही जीवित रहता है वैसे ही समष्टि का एक अंग, समाज का एक घटक, व्यापक चेतना का एक स्फुल्लिंग होने के कारण उसे समूह में ही आनन्द आता है। अकेलेपन में उस व्यापक समूह चेतना से असंबद्ध हो जाने के कारण आन्तरिक पोषण बन्द हो जाता है, इस अभाव की बेचैनी ही सूनेपन का डर हो सकता है।

🔵 कल्पना ने और आगे दौड़ लगाई। स्थापित मान्यता की पुष्टि में उसने जीवन के अनेक संस्मरण ढूंढ़ निकाले। सूनेपन के, अकेले विचरण करने के अनेक प्रसंग याद आये, उनमें आनन्द नहीं था, समय ही काटा गया था। स्वाधीनता संग्राम में जेल यात्रा के उन दिनों की याद आई जब काल कोठरी में बन्द रहना पड़ा था। वैसे उस कोठरी में कोई कष्ट न था पर सूनेपन का मानसिक दबाव बहुत पड़ा था एक महीने बाद जब कोठरी से छुटकारा मिला तो शरीर पके आम की तरह पीला पड़ गया था। खड़े होने में आंखों तले अंधेरा आता था।

🔴 चूंकि सूनापन बुरा लग रहा था, इसलिए मस्तिष्क के सारे कल पुर्जे उसकी बुराई साबित करने में जी जान से लगे हुये थे। मस्तिष्क एक जानदार नौकर के समान ही तो ठहरा। अन्तस् की भावना और मान्यता जैसी होती है उसी के अनुरूप वह विचारों का, तर्कों, प्रमाणों, कारणों और उदाहरणों का पहाड़ जमा कर देता है। बात सही है या गलत यह निर्णय करना विवेक बुद्धि का काम है। मस्तिष्क की जिम्मेदारी तो इतनी भर है कि अभिरुचि जिधर भी चले उसके समर्थन के लिये, औचित्य सिद्ध करने के लिए आवश्यक विचार सामग्री उपस्थित कर दें अपना मन भी इस समय वही कर रहा था।।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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