शनिवार, 21 जनवरी 2017

👉 आप अपने आपको पहचान लीजिये (भाग 3)

🔴 अच्छा हनुमान् जी की बात मालूम है आपको कि नहीं मालूम हनुमान् जी को रामचंद्र जी ने कहा कि हमारे साथ- साथ चलो हमारा कुछ काम करो हनुमान् जी को फायदा हुआ कि नुकसान हुआ। क्या हुआ रामचंद्र जी की सीता जी से क्या रिश्ता रामचंद्र जी से क्या रिश्ता और उनके साथ जाने में जहाँ नौकरी का सवाल नहीं और सारी जिंदगी भर जब वह सयाने हो गये थे बड़े हो गये थे ब्याह होने दिया न शादी होने दी न अच्छे कपड़े पहनने दिये और रामचंद्र जी उनको ले गये। नुकसान किया कि नफा किया। नुकसान किया। 

🔵 किसी से पूछा रीछ बंदरों से क्यों भाई कहाँ जा रहे हो वहाँ जा रहे हैं रामचंद्र जी के यहाँ जा रहे हैं क्यों। क्या बात है रामचंद्र जी के यहाँ रामचंद्र जी स्त्री धर्मपत्नी को चोरी हो गई है और उनको हम तलाश करेंगे रावण से लड़ेंगे। अरे मरेगा क्या बेवकूफ किसने पट्टी पढ़ा दी है मालूम यह पड़ता है कि नुकसान की बात बताई जा रही है लेकिन क्या वास्तव में नुकसान की बात थी नहीं नुकसान की बात नहीं थी अगर नुकसान की बात रही होती तो हनुमान् जी ने समुद्र को छलांग कैसे लिया और पहाड़ उखाड़कर के कैसे ले आये और रामचंद्र जी को और लक्ष्मण जी को कंधे पर रखकर कैसे फिरे। लंका जलाने में समर्थ कैसे हुए। 

🔴 नुकसान था नुकसान नहीं था हनुमान् जी बहुत बड़े हो गये नहीं तो बंदर होते बंदर देखे हैं न आपने मदारियों के यहाँ नाचते रहते हैं बंदर आ जाते हैं तो कहते हैं मारो बंदर को भगाओ बंदर को। बंदर रह जाते लेकिन दूर की बात उनको दिखाई पड़ी कि नई इसमें मेरा लाभ है रामचंद्र जी के कहने में। उन्होंने देखा रामचंद्र जी वजनदार आदमी हैं। समझदार आदमी है। विश्वामित्र जी के बारे मे यही सोचा गया कि विश्वामित्र समझदार आदमी हैं बेअकल नहीं है बेवकूफ नहीं है हमारे बच्चों को ले जा रहे हैं तो मारने के लिए नहीं ले जा रहे हैं किसी बड़े काम के लिए ले जा रहे हैं। इस तरीके से ले गये लेकिन उस समय उनको नुकसान मालूम पड़ा था। बहुतों को मालूम पड़ा होगा। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 79)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 7—दहेज लोभ के लिए नहीं दक्षिणा के रूप में:- मांगलिक कार्यों में पूजा सामग्री के रूप में दक्षिणा का भी स्थान है। वर-पूजन के रूप में एक रुपया या ग्यारह रुपया, विशेष मांगलिक अवसरों पर दिया जा सकता है। अधिक से अधिक यह राशि 101 रु. हो सकती है।

🔵 विवाह में तीन ऐसे अवसर रह सकते हैं। पक्की, दरवाजे पर स्वागत, विदाई। इन तीन रस्मों में नकदी 300 रु. से अधिक न दी जानी चाहिए। यह विशुद्ध रूप से पूजा दक्षिणा मानी जाय, कोई लेन-देन ठहराव या लाभ, लोभ की दृष्टि से न गिने। इससे अधिक लेन-देन या ठहरौनी को अवांछनीय माना जाय। वर्तमान कानूनों के अनुसार वह एक अपराध तो है ही। उसमें जेलखाने जाने और कड़ा दंड भुगतने की व्यवस्था तो है ही। कानून के भय से नहीं, नैतिकता एवं मानवता के कर्तव्यों का ध्यान रखकर भी इस दहेज प्रथा को उन्मूलन करने के लिए प्राण-पण से प्रयत्न किया जाय जिसने हिन्दू जाति को आर्थिक दृष्टि से खोखला, नैतिक दृष्टि से बेईमान, मानसिक दृष्टि से चिन्तातुर एवं असहाय बना रखा है। इस सामाजिक पाप से कलंकित सवर्ण हिन्दुओं के मुख को धोने का प्रयत्न हमें विशेष भावनापूर्वक करना चाहिए।

🔴 लड़के के अभिभावक या लड़का धन या वस्तुओं की कोई मांग न करें।

🔵 8—वर पक्ष जेवर न चढ़ावें:- कीमती जेवर और कपड़े चढ़ाने की समस्या लड़के वालों के लिए उतनी ही विकट है जितनी लड़की वालों के लिए दहेज देने की। यह दोनों प्रथायें एक दूसरे के साथ घनिष्ठ रूप में जुड़ी हुई हैं। इसलिए दोनों को एक ही बार समाप्त करना होगा।

🔴 लड़की वाले यह आशा करते हैं कि लड़के की ओर से कीमती जेवर, कपड़े कन्या के लिए आवें। इसमें जो खर्च पड़ता है उसे लड़के वाला दहेज के रूप में वसूल करता है। लड़के की शिक्षा आदि में वह भी इतना खर्च कर चुका होता है कि इन दिखावे मात्र की बेकार चीजों में धन लुटाने के लिए उसके पास भी बचा नहीं होता। कन्या वालों को अपनी ही तरह लड़के वालों की भी कठिनाई समझनी चाहिए और उन्हें जेवर, कपड़े में धन खर्च करने की चिन्ता से मुक्त कर देना चाहिए।

🔵 विवाह में वर पक्ष की ओर से लड़की के लिए एक सोने की अंगूठी, पैरों के लिए चांदी के तोड़िए यह दो जेवर ही चढ़ाये जांय और एक सूती, एक रेशमी जोड़ी कपड़े हों। जो कुछ लड़की के लिए लाया गया है उसका दिखावा जरा भी न हो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 30)

🌞 दिए गए कार्यक्रमों का प्राण-पण से निर्वाह

🔴 स्वतन्त्रता संग्राम की कई बार जेलयात्रा, २४ महापुरश्चरणों का व्रत धारण, इसके साथ ही मेहतरानी की सेवा-साधना यह तीन परीक्षाएँ, मुझे छोटी उम्र में ही पास करनी पड़ीं। आन्तरिक दुर्बलताएँ और संबद्ध परिजनों के दुहरे मोर्चे पर एक साथ लड़ा। उस आत्म-विजय का ही परिणाम है कि आत्मबल संग्रह से अधिक लाभ से लाभान्वित होने का अवसर मिला। उन घटनाक्रमों से हमारा आपा बलिष्ठ होता चला गया एवं वे सभी कार्यक्रम हमारे द्वारा बखूबी निभते चले गए, जिनका हमें संकल्प दिलाया गया था।  महापुरश्चरणों की शृंखला नियमित रूप से चलती रही। जिस दिन गुरुदेव के आदेश से उस साधना का शुभारम्भ किया था, उसी दिन घृत दीप की अखण्ड ज्योति भी स्थापित की। उसकी जिम्मेदारी हमारी धर्मपत्नी ने सँभाली, जिन्हें हम भी माता जी के नाम से पुकारते हैं। छोटे बच्चे की तरह उस पर हर घड़ी ध्यान रखे जाने की आवश्यकता पड़ती थी। अन्यथा वह बच्चे की तरह मचल सकता था, बुझ सकता था। वह अखण्ड दीपक इतने लम्बे समय से बिना किसी व्यवधान के अब तक नियमित जलता रहा है। इसके प्रकाश में बैठकर जब भी साधना करते हैं, तो मनःक्षेत्र में अनायास ही दिव्य भावनाएँ उठती रहती हैं। कभी किसी उलझन को सुलझाना अपनी सामान्य बुद्धि के लिए सम्भव नहीं होता, तो इस अखण्ड ज्योति की प्रकाश किरण अनायास ही उस उलझन को सुलझा देती है।

🔵 नित्य ६६ माला का जप, गायत्री माता के चित्र प्रतीक का धूप, नैवेद्य, अक्षत, पुष्प, जल से पूजन। जप के साथ-साथ प्रातःकाल के उदीयमान सविता का ध्यान। अंत में सूर्यार्घ्यदान। इतनी छोटी सी विधि व्यवस्था अपनाई गई। उसके साथ बीज-मंत्र का सम्पुट आदि का कोई तांत्रिक विधि-विधान जोड़ा नहीं गया, किंतु श्रद्धा अटूट रही। सामने विद्यमान गायत्री माता के चित्र के प्रति असीम श्रद्धा उमड़ती रही। लगता रहा कि वे साक्षात सामने बैठी हैं। कभी-कभी उनके आँचल में मुँह छिपाकर प्रेमाश्रु बहाने के लिए मन उमड़ता। ऐसा नहीं हुआ कि मन न लगा हो। कहीं अन्यत्र भागा हो। तन्मयता निरंतर प्रगाढ़ स्तर की बनी रही। समय पूरा हो जाता, तो अलग अलार्म बजता। अन्यथा उठने को जी ही नहीं करता। उपासना क्रम में कभी एक दिन भी विघ्न न आया।

🔴 यही बात अध्ययन के सम्बन्ध में रही। उसके लिए अतिरिक्त समय न निकालना पड़ा। काँग्रेस कार्यों के लिए प्रायः काफी-काफी दूर चलना पड़ा। जब परामर्श या कार्यक्रम का समय आता, तब पढ़ना बंद हो जाता, जहाँ चलना आरम्भ हुआ, वहीं पढ़ना भी आरम्भ हो गया। पुस्तक साइज के चालीस पन्ने प्रति घण्टे पढ़ने की स्पीड रही। कम से कम दो घण्टे नित्य पढ़ने के लिए मिल जाते। कभी-कभी ज्यादा भी। इस प्रकार दो घण्टे में ८० पृष्ठ। महीने में २४०० पृष्ठ। साल भर में २८००० पृष्ठ। साठ वर्ष की कुछ अवधि में साढ़े अट्ठारह लाख पृष्ठ हमने मात्र अपनी अभिरुचि के पढ़े हैं। लगभग तीन हजार पृष्ठ नित्य विहंगम रूप से पढ़ लेने की बात भी हमारे लिए स्नान भोजन की तरह आसान व सहज रही है। यह क्रम प्रायः ६० वर्ष से अधिक समय से चलता आ रहा है और इतने दिन में अनगिनत पृष्ठ उन पुस्तकों के पढ़ डाले जो हमारे लिए आवश्यक विषयों से सम्बन्धित थे। महापुरश्चरणों की समाप्ति के बाद समय अधिक मिलने लगा। तब हमने भारत के विभिन्न पुस्तकालयों में जाकर ग्रंथों-पाण्डुलिपियों का अध्ययन किया। वह हमारे लिए अमूल्य निधि बन गई। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 30)

🌞  हिमालय में प्रवेश

गर्जन-तर्जन करती भेरों घाटी

🔵 सोचता हूं कि सोरों आदि स्थानों में जहां मीलों की चौड़ाई गंगा की है वहां जलधारा धीमे-धीमे बहती रहती है वहां प्रवाह में न प्रचण्डता होती है और न तीव्रता। पर इस छोटी घाटी के तंग दायरे में होकर गुजरने के कारण जल धारा इतनी तीव्र गति से बही। मनुष्य का जीवन विभिन्न क्षेत्रों में बंटा रहता है बहु सुखी रहता है उसमें कुछ विशेषता पैदा नहीं हो पाती पर जब एक विशिष्ट लक्ष को ले कर कोई व्यक्ति उस सीमित क्षेत्र में ही अपनी सारी शक्तियों को केन्द्रित कर देता है तो उसके द्वारा आश्चर्य जनक उत्साह वर्धक परिणाम उत्पन्न होते देखे जाते हैं। मनुष्य यदि अपने कार्य क्षेत्र को बहुत फैलाने, अनेक और अधूरे काम करने की अपेक्षा अपने लिये एक विशेष कार्य क्षेत्र चुन ले तो क्या वह भी इस तंग घाटी में गुजरते समय उछलती गंगा की तरह आगे बढ़ सकता है? उन्नति नहीं कर सकता?

🔴 जलधारा के बीच पड़े हुए शिला खण्ड पानी से टकराने के लिए विवश कर रहे थे। इसी संघर्ष में गर्जन-तर्जन हो रहा था और छोटे रुई के गुब्बारों के बने पहाड़ की तरह ऊपर उठ रहे थे। सोचता हूं यदि कठिनाइयां जीवन में न हो तो व्यक्ति की विशेषताएं बिना प्रकट हुए ही रह जायं। टकराने से शक्ति उत्पन्न होने का सिद्धान्त एक सुनिश्चित तथ्य है। आराम का शौक-मौज का जीवन विलासी जीवन निर्जीवों से कुछ ही ऊंचा माना जा सकता है।

🔵 कष्ट सहिष्णुता, तितीक्षा, तपश्चर्या एवं प्रतिरोधों से बिना खिन्नता मन में लाये वीरोचित भाव से लिपटने का साहस यदि मनुष्य अपने भीतर एकत्रित करले तो उसकी कीर्ति भी उस आज के स्थान की भांति गर्जन-तर्जन करती हुई दिग्दिगंत में व्याप्त हो सकती है, उसका विशेषतायुक्त व्यक्तित्व छींटों के उड़ते हुए फुवार की तरह से ही दिखाई दें सकता है। गंगा डरती नहीं, न शिकायत करती है, वह तंगी में होकर गुजरती है, मार्ग रोकने वाले रोड़ों से घबराती नहीं वरन् उनसे टकराती हुई अपना रास्ता बनाती है। काश हमारी अन्तःचेतना भी ऐसे ही प्रबल वेग से परिपूर्ण हुई होती तो व्यक्तित्व के निखरने का कितना अमूल्य अवसर हाथ लगता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 14) 21 Jan

🌹 त्रिविध भवबन्धन एवं उनसे मुक्ति
🔴 अध्यात्म विज्ञान के साधकों को अपने दृष्टिकोण में मौलिक परिवर्तन करना पड़ता है। उन्हें सोचना होता है कि मानव जीवन की बहुमूल्य धरोहर का इस प्रकार उपयोग करना है, जिससे शरीर का निर्वाह लोक व्यवहार भी चलता रहे, पर साथ ही आत्मिक अपूर्णता को पूरी करने का चरम लक्ष्य भी प्राप्त हो सके। ईश्वर के दरबार में पहुँचकर सीना तानकर यह कहा जा सके कि जो अमानत जिस प्रयोजन के लिये सौंपी गई थी, उसे उसी हेतु सही रूप में प्रयुक्त किया गया।           

🔵 इस मार्ग में सबसे बड़ी रुकावटें तीन हैं। इन्हीं को रावण, कुम्भकरण, मेघनाथ कहा गया है। यह दैवी भागवत के महिषासुर, मधुकैटभ, रक्तबीज हैं। ये प्राय: साथ लगे रहते हैं और पीछा नहीं छोड़ते। इन्हीं के कारण मनुष्य पतन और पराभव के गर्त में जा गिरता है। पशु, प्रेत और पिशाच की जिन्दगी जीता है। नर-वानर और नर-पामर के रूप में इन्हीं के चंगुल में फँसे हुए लोगों को देखा जाता है। ये तीन हैं-लोभ मोह एवं अहंकार। वासना, तृष्णा और कुत्सा इन्हीं के कारण उत्पन्न होती है।

🔴 लोक विजय के लिये सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त अपनाना पड़ता है। औसत नागरिक स्तर के निर्वाह में सन्तोष करना पड़ता है। ईमानदारी और परिश्रम की कमाई पर निर्भर रहना पड़ता है। लालची के लिये अनीति अपनाये बिना तृष्णा की पूर्ति कर सकना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं होता। जो व्यक्ति विलास में अधिक खर्च करता है, वह प्रकारान्तर से दूसरों को उतना ही अभावग्रस्त रहने के लिये मजबूर करता है। इसीलिये शास्त्रकारों ने परिग्रह को पाप बताया है। विलासी, संग्रही, अपव्ययी की भी ऐसी निन्दा की गई है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जिज्ञासु के लक्षण-श्रद्धा और नम्रता

🔴 एक बार राजा जातश्रुति के राजमहल की छत पर हंस आकर बैठे और आपस में बात करने लगे। एक हंस ने कहा जिसके राजमहल पर हम बैठे है, वह बड़ा धर्मात्मा और दानी है। इसकी कीर्ति दूर-दूर तक फैली हुई है। इस पर दूसरे हंस ने कहा- गाड़ीवान रैक्य की तुलना में यह न तो ज्ञानी है और न दानी।

🔵 इस वार्ता को जातश्रुति सुन रहे थे। उन्हें गाड़ीवान रैक्य से भेंट करने की इच्छा हुई। उनने चारों दिशाओं में दूत भेजे। पर वे निराश होकर लौटे। उनने कहा-राजन् हमने सभी नगर, मन्दिर, मठ ढूँढ़ डाले पर वे कही नहीं मिले। तब राजा ने विचार किया ब्रह्मज्ञानी पुरुषों का विषयी लोगों के बीच रहना कैसे हो सकता है। अवश्य ही वे कही साधना के उपयुक्त एकान्त स्थान में होंगे वही उन्हें तलाश कराना चाहिए।

🔵 अब की बार दूत फिर भेजे गये तो वे एक निर्जन प्रदेश में अपनी गाड़ी के नीचे बैठे मिल गये। यही उनका घर था। राजा उनके पास बहुत धन, आभूषण, गाऐं, रथ आदि लेकर पहुँचा। उसका विचार था कि रैक्य इस वैभव को देखकर प्रसन्न होंगे और मुझे ब्रह्मज्ञान का उपदेश देंगे। पर परिणाम वैसा नहीं हुआ। रैक्य ने कहा-अरे शूद्र! यह धन वैभव तू मेरे लिए व्यर्थ ही लाया है। इन्हें अपने पास ही रख।” ऋषि को क्रुद्ध देखकर राजा निराश वापिस लौट आया और सोचता रहा कि किस वस्तु से उन्हें प्रसन्न करूँ। सोचते-सोचते उसे सूझा कि विनय और श्रद्धा से ही सत्पुरूष प्रसन्न होते है। तब वह हाथ में समिधाएं लेकर, राजसी ठाठ-बाठ छोड़कर एक विनीत जिज्ञासु के रूप में उनके पास पहुँचा। रैक्य ने राजा में जिज्ञासु के लक्षण देखे तो वे गदगद हो उठे। उनने जातश्रुति को हृदय से लगा लिया और प्रेम पूर्वक ब्रह्म विद्या का उपदेश दिया।

🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961 पृष्ठ 25

👉 अपने चरित्र का निर्माण करो

🔵 जिसे तुम अच्छा मानते हो, यदि तुम उसे अपने आचरण में नहीं लाते तो यह तुम्हारी कायरता है। हो सकता है कि भय तुम्हें ऐसा नहीं करने देता हो, लेकिन इससे तुम्हारा न तो चरित्र ऊंचा उठेगा और न तुम्हें गौरव मिलेगा। मन में उठने वाले अच्छे विचारों को दबाकर तुम बार बार जो आत्म हत्या कर रहे हो आखिर उससे तुमने किस लाभ का अन्दाजा लगाया है?

🔴 शान्ति और तृप्ति, आचारवान व्यक्ति को ही प्राप्ति होती हैं। जो मन में है वही वाणी और कर्म में होने पर जैसी शान्ति मिलती है उसका एक अंश भी मन वाणी और कर्म में अन्तर रखने वाले व्यक्ति को प्राप्त नहीं होता। बल्कि ऐसा व्यक्ति घुट-घुट कर मरता है और दिन रात अशान्ति के ही चक्कर में पड़ा रहता है।

🔵 घुट-घुट कर लाख वर्ष जीने की अपेक्षा उस एक दिन का जीना अधिक श्रेयस्कर है जिसमें शान्ति है, तृप्ति है। परन्तु भय का भूत मनुष्य को न जिन्दा ही रहने देता है और न मरने ही देता है। भय की उत्पत्ति का कारण आशक्ति है, मोह है। शरीर का मोह, धन का मोह आदमी को कहीं का नहीं रहने देता, शरीर का चाहे जितना मोह करो उसे किसी न किसी दिन मिट्टी में मिलना ही है, अमर हो ही नहीं सकता तब फिर उसे आत्मोन्नति के साधन के लिए उपयोग में न लाकर जो लोग उसका भार ढोकर चलते रहना पसन्द करते हैं, पसन्द करते ही नहीं बल्कि चलते रहते हैं वे आत्मा को अन्धेरे की ओर ही गिराते हैं। धन और शरीर ये जीवन के लक्ष्य नहीं हैं, जीवन का लक्ष्य तो है आत्मा की उन्नति, आत्मा की प्राप्ति। इसलिए शरीर और धन का जो लोग इसके लिए उपयोग नहीं करते वे प्राप्त साधनों का दुरुपयोग न करके अपने भावी जीवन में किसी महान संकट के लिए निमन्त्रण देते हैं।

🌹 अगले अंक में समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति 1948 सितम्बर पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1948/September.3

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 30) 21 Jan

🌹 अखण्ड जप करें—अखण्ड यज्ञ नहीं

🔴 गायत्री जयन्ती, गुरु पूर्णिमा, बसन्त पंचमी आदि पर्वों पर अखण्ड गायत्री जप रखा जाता है। जिस समय से आरम्भ करते हैं उसी समय पर समाप्ति भी होती है। 24 घण्टे में प्रायः आधा समय दिन का और आधा रात्रि का होता है। दिन में मन्त्र उच्चारण सहित और रात्रि में मानसिक जप करने की परम्परा है। अखण्ड जप में एक ही विधि रखी जाती है। दिन में एक प्रकार और रात्रि में दूसरी प्रकार नहीं करते। इसलिए पूरा अखण्ड जप मानसिक ही होना उपयुक्त रहता है। इसमें एकरसता बनी रहती है। यों जहां कहीं दिन और रात्रि के अन्तर को ध्यान में रखते हुए वाचिक और मानसिक जप की भिन्नता रखी जा सके वहां वैसा भी हो सकता है। सरलता मानसिक जप में ही रहती है।

🔵 यज्ञ अखण्ड करने का विधान नहीं है। वह नियत समय में ही समाप्त होना चाहिए। यज्ञ का उपयुक्त समय दिन है। दिन में कीड़े-मकोड़े अग्नि में न जा पहुंचें, इसका ध्यान रखा जा सकता है। रात्रि में कृत्रिम प्रकाश उत्पन्न कर लेने पर भी ऐसी स्थिति नहीं बन पड़ती कि छोटे कीड़ों को पूरी तरह देख सकना या रोक सकना सम्भव हो सके। सर्व विदित है कि पतंगों से लेकर छोटे कृमि-कीटक दिन की अपेक्षा रात्रि में ही अपनी गति-विधियां अधिक विस्तृत करते हैं। इसलिए रात्रि में हिंसा की सम्भावना अधिक रहने, सतर्कता कम बन पड़ने की स्थिति को ध्यान में रखते हुए सूर्य की उपस्थिति में ही यज्ञ-कर्म करने की परम्परा है। ऐसे समय में रात्रि के समय भी यज्ञ जारी रखने का औचित्य नहीं है।

🔴 विवाह-शादियां प्रायः रात्रि के समय होने का ही प्रचलन है। उस समय अग्निहोत्र होता है, पर वह अपवाद है। यों विवाह विधि भी शास्त्र परम्परा के अनुसार दिन में ही होनी चाहिए और उसका अग्निहोत्र भाग भी दिन में ही निपटना चाहिए। पर लोगों ने सुविधा का ध्यान रखते हुए रात्रि को फुरसत में विवाह की धूमधाम करने का रास्ता निकाल लिया है। दिन में करने से दिन के अन्य कामों का हर्ज होता है। ऐसे ही कारणों से विवाह जैसे अवसरों पर अपवाद रूप से रात्रि में ही हवन होते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 24) 21 Jan

🌹 आत्मविश्वास क्या नहीं कर सकता?

🔵 दूसरे दिन सेना ने कूच कर दिया, सेना का नेतृत्व युद्ध अनुभवों से सर्वथा अपरिचित फकीर कर रहा था। थोड़ी ही दूर वे चले होंगे कि फकीर ने रुकने का संकेत किया, इस नये सेनापति के आदेश पर सेना रुक गई। सेनापति चाहे जो निर्णय ले, सभी सैनिक उसका अनुकरण करने पर मजबूर थे। युद्ध क्षेत्र अभी दूर था। बीच में अकारण रुककर समय बर्बाद करने का कोई औचित्य नजर नहीं आ रहा था। सैनिक असमंजस में पड़ गये। इसी बीच सामने के मन्दिर की ओर इशारा करते हुए कहा— ‘‘युद्ध से पूर्व इस मन्दिर के देवता से पूछ लेते हैं कि जीत होगी या हार। यदि देवता जीत के लिए कह देते हैं तो फिर किसी का डर नहीं। दुश्मन की सेना कितनी ही विकट क्यों न हो जीत निश्चित ही हमारी होगी। यदि नहीं तो फिर चलने से क्या लाभ!’’

🔴 सैनिकों ने कहा कि आप तो एकान्त में देवता से पूछेंगे। देवता क्या उत्तर देते हैं यह हमें कैसे पता चलेगा?’’ ‘‘नहीं! अकेले में नहीं पूछूंगा। तुम सबके सामने ही देवता के सामने मैं प्रश्न करूंगा।’’ यह कहते हुए फकीर ने झोली से एक चमकता हुआ सिक्का निकाला और बताया कि अगर यह सिक्का चित्त गिरता है तो जीत हमारी ही होगी, यदि पट गिरेगा तो हम वापिस लौट जायेंगे। फकीर ने सिक्का ऊपर उछाला— सिक्के के गिरने के साथ ही उनके भाग्य का निर्णय होना था। सब विस्फारित नेत्रों से एक टक सिक्के को देख रहे थे। सिक्के के गिरते ही सबकी आंखें चमक गयीं। सिक्का चित्त गिरा था—जीत सुनिश्चित थी फकीर ने सबको उत्साहित करते हुए कहा— ‘‘अब डरने की कोई बात नहीं, देवता का आश्वासन हमें मिल गया है।’’

🔵 दोनों पक्षों की भयंकर लड़ाई के बाद जीत जापान के पक्ष में हुई। युद्धोपरान्त सैनिकों ने मन्दिर के पास पहुंचकर कहा कि देवता को धन्यवाद दे दें जिसने हमें जिताया, फकीर ने कहा देवता को धन्यवाद देने की आवश्यकता नहीं बल्कि अपने आपको धन्यवाद दो। तुम स्वयं ही अपनी जीत के आधार हो।’

🔴 ‘‘जीत का देवता से कोई सम्बन्ध नहीं।’’ यह कहते हुए फकीर ने सिक्का पुनः झोली से निकालकर सैनिकों के हाथ पर रख दिया। सैनिकों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने देखा कि सिक्के के दोनों और चित्त के निशान थे। यह और कुछ नहीं सैनिकों के सोये आत्मविश्वास को जगाने की एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया भर थी जो अन्ततः जीत का कारण बनी।

🔵 संसार की महत्वपूर्ण सफलताओं का इतिहास आत्मविश्वास की गौरव गाथा से भरा पड़ा है। उत्कर्ष व्यक्ति का करना हो— समाज का अथवा राष्ट्र का, सर्वप्रथम आवश्यकता है अपने अन्दर सोये आत्मविश्वास रूपी देवता को जगाया जाये। अनुदान-वरदान सहज ही बरसते चले आयेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आप अपने आपको पहचान लीजिये (भाग 2)

🔴 इसी प्रकार से ढेरों की ढेरों बातें ऐसी होती है जिसमें गलती होती है विश्वामित्र आये और कहने लगे अपने दोनों बच्चों को हमारे सुपुर्द कर दीजिये हमको यज्ञ की रक्षा के लिये इनकी जरूरत है सारे घर में कुहराम मच गया मंत्रियों ने विरोध किया नौकरों ने विरोध किया हर एक ने विरोध किया अरे जरा- जरा से बच्चे हो इनको कहाँ ले जाते हो राक्षसों से लड़ाने ले जा रहे हो अरे यह राक्षसों से लड़ेंगे क्या। अरे यह तो मारे जायेंगे बेचारे अरे यह कैसा विश्वामित्र आ गया और कैसे इनके गुरु हैं सब लोगों ने एकदम शुरू से आखिरी तक निंदा की। लेकिन वास्तव में वह नफे की बात थी।

🔵 विश्वामित्र आये थे उस समय तो नहीं बताया था उन्होंने लेकिन पीछे बताया कि हमने तुम्हें बला विद्या और अतिबला विद्या दोनों को सिखाने के लिये हम लाये हैं गायत्री और सावित्री का रहस्य सिखाने के लिए लाये हैं इससे आपको दोनों फायदे होंगे। रामचंद्र जी को ढेरों के ढेरों फायदे हुए शंकर जी का धनुष बहुत भारी था उसको कोई उठा तक नहीं सकता था कितने राजा लगे थे लेकिन उठाने में समर्थ नहीं हो सके लेकिन रामचंद्र जी ने उठाया और उठाया ही नहीं तोड़कर फेंक दिया। और सीता जी से ब्याह हो गया। सीता जी से ब्याह करने के लिए रावण से लेकर कितने राजा महाराजा बैठे हुए थे सबके पल्ले नहीं पड़ी लेकिन रामचंद्र जी के पल्ले पड़ गई।

🔴 रावण जो न जाने कितने को तंग कर रहा था जिसकी सोने की लंका थी उस सारी की सारी को रामचंद्र जी ने तोड़ मरोड़कर फेंक दिया। और रामराज्य की स्थापना करने में समर्थ हो गये, कितने फायदे हुए। फायदा करना आये थे कि नुकसान करने आये थे। बताइये आप। मेरे ख्याल से अगर आपको दूर को देखना नहीं आता है तुरन्त का देखना आता है तो आप भी उन्हीं नौकरों की तरह से कहेंगे जो दशरथ जी के यहाँ नौकरी करते थे और उन सबने कहा था भेजना ठीक नहीं है रानियों ने मना किया था बच्चों को भेजना ठीक नहीं है। लेकिन वो तो नहीं माने और ले गये और ले गये तो नफा हुआ नुकसान नहीं हुआ। रामचंद्र जी की बात मालूम है न आपको मालूम है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/31

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 78)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 4— उपजातियों को बहुत महत्व न दिया जाय:- प्राचीन काल में चार वर्ण थे। प्रत्येक वर्ण के अन्तर्गत गोत्र बचाकर विवाह होते रहें। उपजातियों के कारण विवाह सम्बन्धी प्रतिबन्ध शिथिल किये जांय।

🔵 5— विधवा या विधुरों से लिए समान सुविधा-असुविधा:- पुरुष और स्त्री के अधिकारों और कर्तव्यों में बहुत कुछ समानता है। इसलिए विधवा और विधुरों को भी समान सुविधा-असुविधा उपलब्ध हों।

🔴 साथी के मरने के बाद शेष जीवन एकाकी व्यतीत करना दोनों के लिए प्रशंसनीय है। पर यदि वे पुनः विवाह करना चाहें तो उन्हें समान रूप से सुविधा रहे। विधुरों के लिए यही उचित है कि वे विधवा से विवाह करें। विधवाओं का विवाह उतना ही अच्छा या बुरा माना जाय जितना विधुरों का।

🔵 6—आर्थिक आदान प्रदान न हो:- न तो कन्या के मूल्य के रूप में लड़की वाले वर पक्ष से कुछ धन मांगें और न लड़के वाले वर की कीमत लड़की वाले से पाने की आशा करें।

🔴 आदिवासियों, वन्य-जातियों, पिछड़े लोगों और पहाड़ी लोगों में वह रिवाज है कि वे लड़की का मूल्य लड़के से वसूल करते हैं। ऊंचे वर्ण वालों में ऐसा तभी होता है जब बूढ़े या अयोग्य लड़के को कोई लोभी बाप अपनी कन्या देता है, पर पिछड़े लोगों में कन्या का मूल्य लेना आम रिवाज है। इसी प्रकार सर्वत्र लोगों में लड़के की कीमत लड़की वालों से दहेज के रूप में तय की जाती है और उसमें कमी रह जाय तो अवांछनीय उपायों से उसे वसूल किया जाता है।

🔵 यह दोनों ही रिवाज समान रूप से घृणित और गर्हित हैं। इन्हें अनैतिक एवं मानवीय आदर्शों के विपरीत भी कहा जा सकता है। इन दोनों ही जंगली रिवाजों को सभ्य समाज में पूर्णतया बहिष्कृत किया जाना चाहिए। विवाह जैसे दो आत्माओं के एकीकरण संस्कार को आर्थिक सौदे-बाजी से सर्वथा दूर रखा जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 29)

🌞 दिए गए कार्यक्रमों का प्राण-पण से निर्वाह

🔴 इस संदर्भ में प्रह्लाद का फिल्म चित्र आँखों के आगे तैरने लगा। वह समाप्त न होने पाया था कि ध्रुव की कहानी मस्तिष्क में तैरने लगी। इसका अंत न होने पाया कि पार्वती का निश्चय उछलकर आगे आ गया। इस आरम्भ के उपरान्त महामानवों की, वीर बलिदानियों की, संत सुधारक और शहीदों की अगणित गाथाएँ सामने तैरने लगीं। उनमें से किसी के भी घर-परिवार वालों ने, मित्र-सम्बन्धियों ने समर्थन नहीं किया था। वे अपने एकाकी आत्मबल के सहारे कर्तव्य की पुकार पर आरूढ़ हुए और दृढ़ रहे। फिर यह सोचना व्यर्थ है कि इस समय अपने इर्द-गिर्द के लोग क्या करते और क्या कहते हैं? उनकी बात सुनने से आदर्श नहीं निभेंगे। आदर्श निभाने हैं, तो अपने मन की ललक, लिप्साओं से जूझना पड़ेगा। इतना ही नहीं इर्द-गिर्द जुड़े हुए उन लोगों की भी उपेक्षा करनी पड़ेगी, जो मात्र पेट-प्रजनन के कुचक्र में ही घूमते और घुमाते रहे हैं।

🔵 निर्णय आत्मा के पक्ष में गया। मैं अनेक विरोध और प्रतिबंधों को तोड़ता, लुक-छिपकर निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचा और सत्याग्रही की भूमिका निभाता हुआ जेल गया। जो भय का काल्पनिक आतंक बनाया गया था, उसमें से एक भी चरितार्थ नहीं हुआ।

🔴 छुटपन की एक घटना इन दोनों प्रयोजनों में और भी साहस देती रही। गाँव में एक बुढ़िया मेहतरानी घावों से पीड़ित थी। दस्त भी हो रहे थे। घावों में कीड़े पड़ गए थे। बेतरह चिल्लाती थी, पर कोई छूत के कारण उसके घर में नहीं घुसता था। मैंने एक चिकित्सक से उपचार पूछा। दवाओं का एकाकी प्रबन्ध किया, उसके घर नियमित रूप से जाने लगा। चिकित्सा के लिए भी परिचर्या के लिए भी, भोजन व्यवस्था के लिए भी। यह सारे काम मैंने अपने जिम्मे ले लिए। मेहतरानी के घर में घुसना, उसके मल-मूत्र से सने कपड़े धोना आज से ६५ वर्ष पूर्व गुनाह था। जाति बहिष्कार कर दिया गया। घर वालों तक ने प्रवेश न करने दिया। चबूतरे पर पड़ा रहता और जो कुछ घर वाले दे जाते, उसी को खाकर गुजारा करता। इतने पर भी मेहतरानी की सेवा नहीं छोड़ी। यह पंद्रह दिन चली और वह अच्छी हो गई। वह जब तक जीवित रही, मुझे भगवान् कहती रही। उन दिनों १३ वर्ष की आयु में भी अकेला था। सारा घर और सारा गाँव एक ओर। लड़ता रहा, हारा नहीं। अब तो उम्र कई वर्ष और अधिक बड़ी हो गई थी। अब क्यों हारता?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 29)

🌞  हिमालय में प्रवेश

अपने और पराये

🔵 आज भेरों घाटी पार की। तिब्बत से व्यापार करने के लिए नैलंग घाटी का रास्ता यहीं से है। हर्षिल के जाड़ और खापा व्यापारी इसी रास्ते तिब्बत के लिए माल बेचने ले जाते हैं और बदले में उधर से ऊन आदि लाते हैं। चढ़ाई बहुत कड़ी होने के कारण थोड़ी-थोड़ी दूर चलने पर ही सांस फूलने लगता था और बार-बार बैठने एवं सुस्ताने की आवश्यकता अनुभव होती थी।

🔴 पहाड़ की चट्टान के नीचे बैठा सुस्ता रहा था। नीचे गंगा इतने जोर से गर्जन कर रही थी जितनी रास्ते भर में अन्यत्र नहीं सुना। पानी के छींटे उछल कर तीस-चालीस फुट तक ऊंचे आ रहे थे। इतना गर्जन-तर्जन, इतना जोश, इतना तीव्र प्रवाह यहां क्यों है, यह जानने की उत्सुकता बढ़ी और ध्यान पूर्वक नीचे झांककर देखा तथा दूर-दूर तक दृष्टि दौड़ाई।

🔵 दिखाई दिया कि यहां गंगा दोनों ओर सटे पहाड़ों के बीच बहुत छोटी सी चौड़ाई में होकर गुजरती है। यह चौड़ाई मुश्किल से पन्द्रह-बीस फुट होगी। इतनी बड़ी जलराशि इतनी तंग जगह में होकर गुजरे तो वहां प्रवाह की तीव्रता होनी ही चाहिये। फिर उसी मार्ग में कई चट्टानें पड़ी थीं, जिनसे जलधारा तेजी से टकराती थी उस टकराहट से ही घोर शब्द हो रहा था और इतनी ऊंची उछालें छींटों के रूप में मार रहा था। गंगा के प्रचण्ड प्रवाह का दृश्य यहां देखते नहीं बनता था।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 28)

🌞  हिमालय में प्रवेश

अपने और पराये

🔵 जितनी यात्रा करके हम थक जाते हैं उससे कहीं अधिक चढ़ने उतरने और चलने का काम इन्हें करना पड़ता है। कोई मनोरंजन के साधन भी नहीं। कहीं हाथ से कती ऊन के बने कहीं सूती फटे टूटे कपड़ों में ढके थे फिर भी वे सब बहुत प्रसन्न दीखते थे। खेतों पर काम करती हुई स्त्रियां मिलकर गीत गाती थीं। उनकी भाषा न समझने के कारण उन गीतों का अर्थ तो समझ में न आता था पर उल्लास और सन्तोष जो उनमें से टपका पड़ता है उसे समझने में कुछ भी कठिनाई नहीं हुई।

🔴 सोचता हूं अपने नीचे के प्रान्तों के लोगों के पास यहां के निवासियों की तुलना में धन, सम्पत्ति, शिक्षा, साधन, सुविधा, भोजन मकान सभी कुछ अनेक गुना अधिक है। उन्हें श्रम भी काफी कम करना पड़ता है फिर भी लोग अपने को दुःखी और असन्तुष्ट ही अनुभव करते हैं, हर घड़ी रोना ही रोते रहते हैं। दूसरी ओर यह लोग हैं कि अत्यधिक कठिन जीवन बिता के जो निर्वाह योग्य सामग्री प्राप्त हो जाती है उसी से काम चला लेते हैं और सन्तुष्ट रहकर शान्ति का जीवन व्यतीत करते हैं। ऐसा यह अन्तर क्यों है?

🔵 लगता है—असन्तोष एक प्रवृत्ति है जो साधनों से नहीं तृष्णा से सम्बन्धित है। साधनों से तृष्णा तृप्त नहीं होती वरन् सुरसा के मुंह की तरह और अधिक बढ़ती है। यदि ऐसा न होता तो इसे पहाड़ी जनता की अपेक्षा अनेक गुने सुख साधन रखने वाले असन्तोष क्यों रहते? और स्वल्प साधनों के होते हुए भी यह पहाड़ी लोग गाते बजाते हर्षोल्लास से जीवन क्यों बिताते?

🔴 अधिक साधन हों तो ठीक है। उनकी जरूरत भी है, पर वे जितने मिल सकें उतने से प्रसन्न रहने और परिस्थिति के अनुसार अधिक प्राप्ति करने का प्रयत्न करने की नीति को क्यों त्यागा जाय? और क्यों अशांत और असन्तुष्ट रहकर उपलब्ध ईश्वरीय उपहार का तिरष्कार किया जाय?

🔵 सभ्यता की अन्धी दौड़ में अधिक खर्च और अधिक असन्तुष्ट रहने का जो रास्ता हमने अपनाया है, वह सही नहीं है। इस तथ्य का प्रतिपादन यह पहाड़ी जनता करती है भले वह इस विषय पर भाषण न दे सके, भले ही वह इस आदर्श पर निबन्ध न लिख सके।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 28)

🌞 दिए गए कार्यक्रमों का प्राण-पण से निर्वाह

🔴 इसके बाद दूसरी परीक्षा बचपन में ही तब सामने आई जब काँग्रेस का असहयोग आंदोलन प्रारंभ हुआ। गाँधीजी ने सत्याग्रह आंदोलन का बिगुल बजाया। देश-भक्तों का आह्वान किया और जेल जाने और गोली खाने के लिए घर से निकल पड़ने के लिए कहा।

🔵 मैंने अन्तरात्मा की पुकार सुनी और समझा कि यह ऐतिहासिक अवसर है। इसे किसी भी कारण चुकाया नहीं जाना चाहिए। मुझे सत्याग्रहियों की सेना में भर्ती होना ही चाहिए। अपनी मर्जी से उस क्षेत्र के भर्ती केंद्र में नाम लिखा दिया। साधन सम्पन्न घर छोड़कर नमक सत्याग्रह के लिए निर्धारित मोर्चे पर जाना था। उन दिनों गोली चलने की चर्चा बहुत जोरों पर थी। लंबी सजाएँ-काला पानी होने की भी। ऐसी अफवाहें सरकारी पक्ष के, किराए के प्रचारक जोरों से फैला रहे थे, ताकि कोई सत्याग्रही बने नहीं। घर वाले उसकी पूरी-पूरी रोकथाम करें। मेरे सम्बन्ध में भी यही हुआ। समाचार विदित होने पर मित्र, पड़ोसी, कुटुम्बी, सम्बन्धी एक भी न बचा जो इस विपत्ति से बचाने के लिए जोर लगाने के लिए न आया हो। उनकी दृष्टि से यह आत्म-हत्या जैसा प्रयास था।

🔴 बात बढ़ते-बढ़ते जवाबी आक्रमण की आई। किसी ने अनशन की धमकी दी, तो किसी ने आत्म-हत्या की। हमारी माता जी अभिभावक थीं। उन्हें यह पट्टी पढ़ाई गई कि लाखों की पैतृक सम्पत्ति से वे मेरा नाम खारिज कराकर अन्य भाइयों के नाम कर देंगी। भाइयों ने कहा कि घर से कोई रिश्ता न रहेगा और उसमें प्रवेश भी न मिलेगा। इसके अतिरिक्त भी और कई प्रकार की धमकियाँ दीं। उठाकर ले जाया जाएगा और डाकुओं के नियंत्रण में रहने के लिए बाधित कर दिया जाएगा।

🔵 इन मीठी-कड़वी धमकियों को मैं शान्तिपूर्वक सुनता रहा। अंतरात्मा के सामने एक ही प्रश्न रहा कि समय की पुकार बड़ी है या परिवार का दबाव। अंतरात्मा की प्रेरणा बड़ी है या मन को इधर-उधर डुलाने वाले असमंजस की स्थिति। अंतिम निर्णय किससे कराता? आत्मा और परमात्मा दो को ही साक्षी बनाकर और उनके निर्णय को ही अंतिम मानने का फैसला किया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 77)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

आदर्श विवाहों की एक रूपरेखा नीचे प्रस्तुत की जा रही है—इसके जितने अंश जहां पूरे किये जा सकें वहां उसके लिये पूरा-पूरा प्रयत्न होना चाहिए।

🔴 1— वर-कन्या की आयु:- कन्या की आयु 14 और वर की 18 से कम न हो।
इससे कम आयु के विवाह कानून में भी ‘‘बाल विवाह-विरोधी एक्ट’’ के अनुसार दण्डनीय है और वर-कन्या के स्वास्थ को दुर्बल बनाने वाले हैं। इससे कम आयु के बच्चों का विवाह करना उनके जीवन के साथ खिलवाड़ करना है। इसलिए बाल विवाहों से सर्वथा बचा जाय। उत्तम विवाह तो 20 वर्ष की कन्या तथा 25 वर्ष के लड़कों का है। विवाह की जल्दी न करके बच्चों को शिक्षा तथा स्वास्थ्य की दृष्टि से विकसित होने देना चाहिये और परिपक्व आयु के होने पर ही उनका विवाह करना चाहिए।

🔵 2— अनमेल विवाह न हो:- कन्या वर में आयु शिक्षा, स्वभाव आदि की दृष्टि से उपयुक्तता का ध्यान रखा जाय। विवाह दोनों की सहमति से हो।
कन्या से वर की आयु 10 वर्ष से अधिक बड़ी न हो। जिनमें इससे अधिक अन्तर होता है वे अनमेल विवाह कहे जाते हैं। अनमेल विवाहों से दाम्पत्ति जीवन में गड़बड़ी उत्पन्न होती है। लड़की-लड़कों को एक दूसरे की स्थिति से भली प्रकार परिचित करा दिया जाय और वे बिना दबाव के उसे स्वीकार करते हों तो ही उसे पक्का किया जाय। अभिभावक यथा सम्भव उपयुक्त जोड़ा मिलाने का अधिक से अधिक ध्यान रखें।

🔴 3— दो परिवारों की सांस्कृतिक समानता:- वर-पक्ष और कन्या-पक्ष के परिवारों में विचार, आदर्श आहार-विहार, व्यवसाय आदि की समानता रहे।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि वर्णों के अन्तर्गत जो उपजातियां हैं, उनमें विवाह की रोक न हो। इससे उपयुक्त लड़की-लड़के ढूंढ़ने का क्षेत्र अधिक व्यापक हो जायगा। आजकल एक-एक वर्ण के अन्तर्गत दसियों उपजातियां हैं और वे परस्पर रोटी बेटी व्यवहार नहीं करतीं। कोई-कोई तो अपने को ऊंच और दूसरी समान उपजाति वाले को नीच मानते हैं। इस तरह की रूढ़िवादिता अब समाप्त करने की आवश्यकता है। हिन्दू समाज का चार भागों में बंटा रहना भी कम नहीं है, इससे अधिक खण्डों में उसे बांटने से हर दृष्टि से हम कमजोर होते चले जायेंगे। विवाह सम्बन्धी अनेक समस्याएं तो इसी प्रतिबन्ध के कारण उपजी हैं।

🔵 यह समानता वर-कन्या को एक दूसरे के लिये अनुकूल रखने में सहायक होती है। शाकाहारी, मांसाहारी, बहुत दूर, ठण्डे प्रान्त, गरम प्रान्त, आस्तिक, नास्तिक, भिन्न भाषा-भाषी, भिन्न धर्मावलंबी, भारतीय ढंग, पश्चिमी ढंग, सुधारवादी, अमीर-गरीब जैसी भिन्नताएं परिवारों में रहेंगी तो उनमें पले हुये लड़की-लड़के आपस में ठीक तरह घुल-मिल न सकेंगे। इसलिये समान स्थिति के सम्बन्ध करने में ही ध्यान रखा जाय। लोग अपने से बहुत अधिक ऊंचे स्तर के घर या लड़के न ढूंढ़ें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आप अपने आपको पहचान लीजिये (भाग 1)

🔴 भाइयों कई बार बड़े- बड़ों से गलती हो जाती है। लोग नफे को नुकसान समझ लेते हैं नुकसान को नफा समझ लेते हैं। लाटरी का नंबर यदि मैं आपसे बता दूँ कि फलाना नंबर खुलेगा और आपसे दो रुपये माँगूँ कि आप दो रुपये जमा कीजिये लाटरी का टिकट खरीदने के लिये तो आपको क्या लगेगा नुकसान लगेगा। जाने मिलेगा कि नहीं मिलेगा और मिल जाये तो तो तो फिर आपको नफा मालूम पड़ेगा इसी तरीके से बहुत सी बातें ढेरों की ढेरों जिंदगी में ऐसी है जिसे कि आदमी नुकसान समझता है पर उसमें नफा होता है। नफा होता है और वह नुकसान समझता है।

🔵 शेर का छोटा सा बच्चा भेड़ों के साथ में था शेर एक आ गया और उसने कहा तू तो मेरे साथ चल तू कहाँ भेड़ों में पड़ा है तो उसको बुरा लगा कि न जाने यह कौन है और मुझे कहाँ ले जा रहा है और जिनके साथ में हमेशा से रहा था उनसे मुझे छुड़ा रहा है यह मुझे बहुत गलत सलाह दे रहा है। लेकिन जब पानी में उसकी शकल दिखाई और उसको समझ में गया कि मैं शेर हूँ तो वह नफे में रहा नहीं तो सारी जिंदगी उसे भेड़ों की तरीके से रहना पड़ता। और गंदी जिंदगी जिया होता। लेकिन उस समय तो उसे नुकसान लगा होगा। बाद में फायदा लगा होगा।

🔴 बीज बोया जाता है जमीन में तो यह मालूम पड़ता है कि नुकसान हो गया। बीज चला गया। बीज कितने दाम का आता है महँगा आता है आजकल लेकिन बीज नुकसान हो गया लेकिन जब उसकी फसल तैयार होकर आती है कोठे और कुठीले भर जाते हैं तब मालूम पड़ता है कि नहीं गलती नहीं हुई थी यह ठीक सलाह दी गई थी हमको। हमको बीज बोने की सलाह देकर हमारा बीज छीना नहीं गया था नुकसान की तरफ ढकेल नहीं दिया गया था।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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गुरुवार, 19 जनवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 13) 20 Jan

🌹 त्रिविध भवबन्धन एवं उनसे मुक्ति
🔴 आवश्यकता हैं भ्रान्तियों से निकलने और यथार्थता को अपनाने की। इस दिशा में मान्यताओं को अग्रगामी बनाते हुए हमें सोचना होगा कि जीवन साधना ही आध्यात्मिक स्वस्थता और बलिष्ठता है। इसी के बदले प्रत्यक्ष जीवन में मरण की प्रतीक्षा किये बिना, स्वर्ग, मुक्ति और सिद्धि का रसास्वाद करते रहा जा सकता है। उन लाभों को हस्तगत किया जा सकता है, जिनका उल्लेख अध्यात्म विधा की महत्ता बताते हुए शास्त्रकारों ने विस्तारपूर्वक किया है। सच्चे सन्तों-भक्तों का इतिहास भी विद्यमान है। खोजने पर प्रतीत होता है कि पूजा-पाठ भले ही उनका न्यूनाधिक रहा है, पर उन्होंने जीवन साधना के क्षेत्र में परिपूर्ण जागरूकता बरती। इसमें व्यक्तिक्रम नहीं आने दिया। न आदर्श की अवज्ञा की और न उपेक्षा बरती। भाव-संवेदनाओं में श्रद्धा, विचार बुद्धि में प्रज्ञा और लोक व्यवहार में शालीन सद्भावना की निष्ठा अपनाकर कोई भी सच्चे अर्थों में जीवन देवता का सच्चा साधक बन सकता है। उसका उपहार, वरदान भी उसे हाथोंहाथ मिलता चला जाता है।          

🔵 ऋषियों, मनीषियों, सन्त-सुधारकों और वातावरण में ऊर्जा उभार देने वाले महामानवों की अनेकानेक साक्षियाँ विश्व इतिहास में भरी पड़ी हैं। इनमें से प्रत्येक को हर कसौटी पर जाँच-परखकर देखा जा सकता है कि उनमें से हर एक को अपना व्यक्तित्त्व उत्कृष्टता की कसौटी पर खरा सिद्ध करना पड़ा है। इससे कम में किसी को भी न आत्मा की प्राप्ति हो सकी न परमात्मा की, न ऐसों का लोक बना, और न परलोक। पूजा को श्रृंगार माना जाता रहा है। स्वास्थ्य वास्तविक सुन्दरता है। ऊपर से स्वस्थ व्यक्ति को वस्त्राभूषणों से, प्रसाधन सामग्री से सजाया भी जा सकता है।

🔴 इसे सोने में सुगन्ध का संयोग बन पड़ा माना जा सकता है। जीवन साधना समग्र स्वास्थ्य बनाने जैसी विधा है। उसके ऊपर पूजा-पाठ का श्रृंगार सजाया जाय तो शोभा और भी अधिक बढ़ेगी। इसमें सुरुचि तो है किन्तु यह नहीं माना जाना चाहिये कि मात्र श्रृंगार साधनों के सहारे किसी जीर्ण-जर्जर रुग्ण या मृत शरीर को सुन्दर बना दिया जाय तो प्रयोजन सध सकता है। इससे तो उलटा उपहास ही बढ़ता है। इसके विपरीत यदि कोई हृष्ट-पुष्ट पहलवान मात्र लँगोट पहनकर अखाड़े में उतरता है तो भी उसकी शोभा बढ़ जाती है। ठीक इसी प्रकार जीवन को सुसंस्कृत बना लेने वाले यदि पूजा-अर्चना के लिये कम समय निकाल पाते हैं तो भी काम चल जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आप अपने बारे में क्या सोचते हैं?

🔴 एक भिखारी किसी स्टेशन पर पैंसिलों से भरा कटोरा लेकर बैठा हुआ था। एक युवा व्यवसायी उधर से गुजरा और उसने कटोरे में 50 रुपए डाल दिए लेकिन उसने कोई पैंसिल नहीं ली। उसके बाद वह ट्रेन में बैठ गया। डिब्बे का दरवाजा बंद होने ही वाला था कि युवा व्यवसायी एकाएक ट्रेन से उतर कर भिखारी के पास लौटा और कुछ पैंसिलें उठाकर बोला, ‘‘मैं कुछ पैंसिलें लूंगा। इन पैंसिलों की कीमत है, आखिरकार तुम एक व्यापारी हो और मैं भी।’’ उसके बाद वह युवा व्यवसायी तेजी से ट्रेन में चढ़ गया।

🔵 कुछ वर्षों बाद वह व्यवसायी एक पार्टी में गया। वह भिखारी भी वहां मौजूद था। भिखारी ने उस व्यवसायी को देखते ही पहचान लिया। वह उसके पास जाकर बोला, ‘‘आप शायद मुझे नहीं पहचान रहे हैं लेकिन मैं आपको पहचानता हूं।’’ उसके बाद उसने उसके साथ घटी उस घटना का जिक्र किया। व्यवसायी ने कहा, ‘‘तुम्हारे याद दिलाने पर मुझे याद आ रहा है कि तुम भीख मांग रहे थे लेकिन तुम यहां सूट और टाई में क्या कर रहे हो?’’

🔴 भिखारी ने जवाब दिया, ‘‘आपको शायद मालूम नहीं है कि आपने मेरे लिए उस दिन क्या किया। मुझ पर दया करने की बजाय मेरे साथ सम्मान के साथ पेश आए। आपने कटोरे से पैंसिलें उठाकर कहा, ‘‘इनकी कीमत है, आखिरकार तुम भी एक व्यापारी हो और मैं भी।’’

🔵 आपके जाने के बाद मैंने बहुत सोचा, मैं यहां क्या कर रहा हूं? मैं भीख क्यों मांग रहा हूं? मैंने अपनी जिंदगी को संवारने के लिए कुछ अच्छा काम करने का फैसला लिया। मैंने अपना थैला उठाया और घूम-घूम कर पैंसिलें बेचने लगा। फिर धीरे-धीरे मेरा व्यापार बढ़ता गया। मैं कापियां-किताबें एवं अन्य चीजें भी बेचने लगा और आज पूरे शहर में मैं इन चीजों का सबसे बड़ा थोक विक्रेता हूं। मुझे मेरा सम्मान लौटाने के लिए मैं आपका तहेदिल से धन्यवाद करता हूं क्योंकि उस घटना ने आज मेरा जीवन ही बदल दिया।

🔴 आप अपने बारे में क्या सोचते हैं? अपने लिए आज आप क्या राय जाहिर करते हैं? क्या आप अपने आपको ठीक तरह से समझ पाते हैं? इन सारी चीजों को ही हम सीधे रूप से आत्मसम्मान कहते हैं। दूसरे लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं ये बातें उतनी मायने नहीं रखतीं या यूं कहें कि कुछ भी मायने नहीं रखतीं लेकिन आप अपने बारे में क्या राय जाहिर करते हैं, क्या सोचते हैं यह बात बहुत ही ज्यादा मायने रखती है लेकिन एक बात तय है कि हम अपने बारे में जो भी सोचते हैं उसका अहसास जाने-अनजाने में दूसरों को भी करवा ही देते हैं और इसमें कोई भी शक नहीं कि इसी कारण की वजह से दूसरे लोग भी हमारे साथ उसी ढंग से पेश आते हैं।

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 29)

🌹 एक के द्वारा दूसरे के लिए जप-अनुष्ठान

🔴 जहां तक हो सके अपनी साधना स्वयं ही करनी चाहिए। विपत्ति के समय वह दूसरे से भी कराई जा सकती है। पर उसकी आन्तरिक भावना और बाह्य आचरण प्रक्रिया साधु ब्राह्मण स्तर की ही होनी चाहिए। प्राचीन काल में ऐसे कृत्यों के लिए ब्राह्मण वर्ग के लोगों को महत्व दिया जाता था। उन दिनों के ब्राह्मण—ब्रह्म-तत्व के ज्ञाता—उच्च चरित्र और आचरण-व्यवहार में देवोपम रीति-नीति अपनाने वाले थे। इसलिए उनकी श्रेष्ठता स्वीकार की जाती थी और उन्हें देव कर्मों का उत्तरदायित्व सौंपा जाता था।

🔵 आज वैसे ब्राह्मण मिलने कठिन हैं जो वंश से नहीं गुण-कर्म-स्वभाव की कसौटी पर अपने स्तर के अनुरूप खरे उतरते हों। विशिष्टता न रहने पर विशिष्ट स्तर एवं विशेष अधिकार भी नहीं रहता। आज की स्थिति में ब्राह्मण-अब्राह्मण का अन्तर कर सकना कठिन है। वंश और वेष की प्रभुता प्राचीन काल में भी अमान्य थी और आज भी अमान्य ही रहेगी।

🔴 जहां तक अनुष्ठान का—उससे सम्बन्धित यज्ञादि कर्मों का सम्बन्ध है, उसे स्वयं ही करना सर्वोत्तम है। यदि दूसरे से कराना हो तो वंश-वेष को महत्व न देकर किसी चरित्रवान, निर्लोभ, निष्ठावान, साधक प्रकृति के व्यक्ति से ही उसे कराना चाहिए। ऐसा व्यक्ति किस वंश या कुल का है इसका महत्व नहीं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 23) 20 Jan

🌹 आत्मविश्वास क्या नहीं कर सकता?

🔵 जापान के एक छोटे से राज्य पर समीपवर्ती एक बड़े राज्य ने हमला कर दिया। अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित विशाल सेना देखकर जापान का सेनापति हिम्मत हार बैठा। उसने राजा से कहा—‘‘हमारी साधनहीन छोटी-सी सैन्य टुकड़ी इसका सामना कदाचित ही कर पायेगी। नाहक सैनिकों को खत्म करने के बजाय युद्ध न करना ही ठीक है। पर राजा बिना प्रयास के हार मानने के पक्ष में नहीं था। सोचने लगा कि क्या किया जाये? अचानक याद आया कि गांव में एक सिद्ध फकीर है शायद वही कुछ समाधान बता सके यही सोचकर राजा स्वयं फकीर से मिलने चल पड़ा। फकीर तम्बूरा बजाने में मस्त था। राजा ने फकीर की मस्ती तोड़ते हुए कहा कि हमारा राज्य मुसीबत में फंस गया है। दुश्मन ने देश पर आक्रमण कर दिया है और ऐसी विकट स्थिति में सेनापति भी निराश हो चुका है— उसने बताया कि जीत असम्भव है।

🔴 फकीर ने बिना विलम्ब किये उत्तर दिया कि ‘‘सबसे पहले तो आप सेनापति को पद से हटा दीजिये क्योंकि जिसने युद्ध से पहले ही हार की आशंका बता दी वह भला क्या जीत पायेगा? जो स्वयं निराशावादी है वह अपने अधीनस्थ सैनिकों  में कैसे उत्साह उमंग का संचार कर सकेगा।’’ राजा ने समर्थन करते हुए कहा, बात तो ठीक है। लेकिन अब उसका स्थान कौन सम्भलेगा। यदि उसे हटा भी दिया जाता है तो इतने कम समय में दूसरा सेनापति कहां मिलेगा? उसी सेनापति से काम चलाने के अतिरिक्त कोई विकल्प दिखाई नहीं देता।’’

🔵 इस पर फकीर ने उन्मुक्त हंसी हंसते हुए कहा—‘‘आप चिन्ता नहीं करें, सेनापति का स्थान मैं सम्भालूंगा।’’ राजा विस्मय में पड़ गया लेकिन इसके अतिरिक्त और कोई चारा भी तो नहीं था।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 27)

🌞  हिमालय में प्रवेश

अपने और पराये


🔵 गंगानानी चट्टी से आगे जहां वर्षा के कारण बुरी तरह फिसलन हो रही थी। एक ओर पहाड़ दूसरी ओर गंगा का तंग रास्ता—उस कठिन समय में इस लाठी ने ही कदम कदम पर जीवन मृत्यु की पहेली को सुलझाया। उसने भी यदि जूतों की तरह साथ छोड़ दिया होता तो कौन जाने आज या पंक्तियां लिखने वाली कलम और उंगलियों का कहीं पता भी न होता।

🔴 बड़ी आशा के साथ लिए हुए जूते ने काट खाया। जिन पैरों पर बहुत भरोसा था उनने भी दांत दिखा दिए। पर वे पैसे की लाठी इतनी काम आई कि कृतज्ञता से इसका गुणानुवाद गाते रहने को जी चाहता है।

🔵 अपनों से आशा थी पर उनने साथ नहीं दिया। इस पर झुंझलाहट आ रही थी कि दूसरे ही क्षण पराई लगने वाली लाठी की वफादारी याद आ गई। चेहरा प्रसन्नता से खिल गया। जिनने अड़चन पैदा की उनकी बजाय उन्हीं का स्मरण क्यों न करूं जिसकी उदारता और सहायता के बल पर यहां तक आ पहुंचा हूं। अपने पराये की क्या सोचूं? इस ईश्वर की दृष्टि से सभी अपने, सभी पराये हैं।

🔴 आज रास्ते भर पहाड़ी जनता के कष्ट साध्य जीवन को अधिक ध्यान से देखता आया और अधिक विचार करता रहा। जहां पहाड़ों में थोड़ी-थोड़ी चार-चार छः-छः हाथ जमीन भी काम की मिली है। वहां उतने ही छोटे खेत बना लिए हैं। बैलों की गुजर वहां कहां? कुदाली से ही मिट्टी को खोद कर जुताई की आवश्यकता पूरी कर लेते हैं। जब फसल पकती है तो पीठ पर लाद कर इतनी ऊंचाई पर बसे हुए अपने घरों में पहुंचते हैं और वहीं उसे कूट-पीट कर अन्न निकालते हैं। जहां झरने का पानी नहीं वहां बहुत नीचे गहराई तक को पानी सिर और पीठ पर लाद कर ले जाते हैं। पुरुष तो नहीं जहां तहां दीखते हैं सारा कृषि कार्य स्त्रियां ही करती हैं। ऊंचे पहाड़ों पर से घास और लकड़ी काट कर लाने का काम भी वे ही करती हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 27)

🌞 दिए गए कार्यक्रमों का प्राण-पण से निर्वाह
🔴 इस प्रथम साक्षात्कार के समय मार्गदर्शक सत्ता द्वारा तीन कार्यक्रम दिए गए थे। सभी नियमोपनियमों के साथ २४ वर्ष का २४ गायत्री महापुरश्चरण सम्पन्न किया जाना था। अखण्ड घृत दीपक को भी साथ-साथ निभाना था। अपनी पात्रता में क्रमशः कमी पूरी करने के साथ-साथ लोकमंगल की भूमिका निभाने हेतु साहित्य सृजन करना दूसरा महत्त्वपूर्ण दायित्व था। इसके लिए गहन स्वाध्याय भी करना था, जो एकाग्रता संपादन की साधना थी ।। साथ ही जन-संपर्क का भी कार्य करना था, ताकि भावी कार्यक्षेत्र को दृष्टिगत रखते हुए हमारी संगठन क्षमता विकसित हो। तीसरा महत्त्वपूर्ण दायित्व था स्वतंत्रता संग्राम में एक स्वयंसेवी सैनिक की भूमिका निभाना। देखा जाए तो सभी दायित्व शैली एवं स्वरूप की दृष्टि से परस्पर विरोधी थे, किंतु साधना एवं स्वाध्याय की प्रगति में इनमें से कोई बाधक नहीं बने, जबकि इस बीच हमें दो बार हिमालय भी जाना पड़ा। अपितु सभी साथ-साथ सहज ही ऐसे सम्पन्न होते चले गए कि हमें स्वयं इनके क्रियान्वयन पर अब आश्चर्य होता है। इसका श्रेय उस दैवी मार्गदर्शक सत्ता को जाता है, जिसने हमारे जीवन की बागडोर प्रारंभ से ही अपने हाथों में ले ली थी एवं सतत संरक्षण का आश्वासन दिया।

🔵 ऋषि दृष्टिकोण की दीक्षा जिस दिन मिली, उसी दिन यह भी कह दिया गया कि यह परिवार संबद्ध तो है, पर विजातीय द्रव्य की तरह है, बचने योग्य। इसके तर्क, प्रमाणों की ओर से कान बंद किए रहना ही उचित होगा। इसलिए सुननी तो सबकी चाहिए, पर करनी मन की ही चाहिए। उसके परामर्श को, आग्रह को वजन या महत्त्व दिया गया और उन्हें स्वीकारने का मन बनाया गया, तो फिर लक्ष्य तक पहुँचना कठिन नहीं रहा। श्रेय और प्रेय की दोनों दिशाएँ एक दूसरे के प्रतिकूल जाती हैं। दोनों में से एक ही अपनाई जा सकी है। संसार प्रसन्न होगा, तो आत्मा रूठेगी। आत्मा को संतुष्ट किया जाएगा, तो संसार की, निकटस्थों की नाराजगी सहन करनी पड़ेगी। आमतौर से यही होता रहेगा। कदाचित् ही कभी कहीं ऐसे सौभाग्य बने हैं, जब सम्बन्धियों ने आदर्शवादिता अपनाने का अनुमोदन दिया हो। आत्मा को तो अनेक बार संसार के सामने झुकना पड़ा है। ऊँचे निश्चय बदलने पड़े हैं और पुराने ढर्रे पर आना पड़ा है।

🔴 यह कठिनाई अपने सामने पहले दिन से ही आई। वसंत पर्व को जिस दिन नया जन्म मिला, उसी दिन नया कार्यक्रम भी। पुरश्चरणों की शृंखला के साथ-साथ आहार-विहार के तपस्वी स्तर के अनुबंध भी। तहलका मचा, जिसने सुना अपने-अपने ढंग से समझाने लगा। मीठे और कड़वे शब्दों की वर्षा होने लगी। मंतव्य एक ही था कि जिस तरह सामान्यजन जीवनयापन करते हैं, कमाते-खाते हैं, वही राह उचित है। ऐसे कदम न उठाए जाएँ जिनसे इन दोनों में व्यवधान पड़ता हो। यद्यपि पैतृक सम्पदा इतनी थी कि उसके सहारे तीन पीढ़ी तक घर बैठकर गुजारा हो सकता था, पर उस तर्क को कोई सुनने तक को तैयार नहीं हुआ। नया कमाओ, नया खाओ, जो पुराना है, उसे भविष्य के लिए, कुटुम्बियों के लिए जमा रखो। सब लोग अपने-अपने शब्दों में एक ही बात कहते थे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 76)

🌹 सामाजिक नव निर्माण के लिए

🔴 युग-निर्माण योजना— लौकिक दृष्टि से प्रस्तुत योजना सामाजिक क्रान्ति एवं बौद्धिक क्रान्ति की आवश्यकता पूरी करती है। आज की सबसे बड़ी आवश्यकताएं यही दो हैं। हमारी विचारणा और सामाजिकता इतनी दुर्बल हो गई है कि इसे बदला जाना आवश्यक है। राजनैतिक क्रान्ति हो चुकी। स्वराज्य प्राप्ति के द्वारा हमें अपने मानस को बनाने बिगाड़ने का अधिकार मात्र मिला है। स्वराज्य की—प्रजातन्त्र की सार्थकता तभी है जब प्रजातन्त्र सामाजिक एवं मानसिक दृष्टि से परिपुष्टि हो। पिछले दो हजार वर्षों के अज्ञानान्धकार से हमारी नस-नस को पराधीनता पाश से जकड़ रखा है। बौद्धिक दृष्टि से अभी भी हम पाश्चात्य बौद्धिकवाद के गुलाम हैं। आसुरी संस्कृति हमारे रोम-रोम में बसी हुई है। हर व्यक्ति पाशविक जीवन जीने की लालसा लिए हुए श्मशान वासी प्रेत पिशाच की तरह उद्विग्न फिर रहा है। सामाजिकता के मूल्य नष्ट हो रहे हैं और लोग अपने आत्मीय जनों से भी स्वार्थ सिद्धि का ही प्रयोजन रहे हैं। फलस्वरूप समाज एवं कुटुम्बों का सारा ढांचा बुरी तरह लड़खड़ाने लगा है।

🔵 इन विपन्न परिस्थितियों का बदला जाना आवश्यक है। बौद्धिक एवं सामाजिक क्रान्ति आज के युग की सब से बड़ी आवश्यकता है। इन्हें पूरा किए बिना हमारा आर्थिक विकास का प्रयोजन भी पूरा न होगा। कमाई यदि बढ़ भी जाय तो वह सामाजिक कुरीतियों दुर्व्यसनों में खर्च हो जायगी और मनुष्य फिर गरीब का गरीब, अभावग्रस्त का अभावग्रस्त रह जायगा। इसलिए आर्थिक योजनाओं से भी पहले सामाजिक एवं बौद्धिक युग-निर्माण को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

🔴 युग-निर्माण योजना इस प्रयोजन को पूरा करने के लिए केवल विचार ही नहीं देती वरन् कार्यक्रम भी प्रस्तुत करती है। कोई प्रयोजन तभी पूरा होता है जब उसे कार्य रूप में परिणत होने का अवसर मिले। आज हिंदू-समाज में सबसे बड़ी सामाजिक कुरीति—विवाह शादियों से होने वाला अपव्यय है। इन कार्यों में इसकी कमाई का प्रायः एक तिहाई भाग खर्च हो जाता है। कई बार तो उसे इन ही प्रयोजनों की पूर्ति के लिए बेईमानी द्वारा पैसा कमाने के अतिरिक्त और कोई चारा ही शेष नहीं रहता। नैतिक आचरण के मार्ग में यह एक बहुत बड़ी बाधा है। सामाजिक क्रान्ति का आरम्भ इस अत्यधिक खटकने वाली बुराई से लड़ने की मुहीम ठानने के रूप में कर देना चाहिए। अखण्ड ज्योति परिवार के तीस हजार सदस्य अपने दायरे से इस प्रक्रिया को कार्यान्वित करना आरम्भ करदें तो अन्य लोगों को भी उसके अनुसरण का साहस पैदा हो जाए और युग की एक बहुत बड़ी आवश्यकता पूरी हो सके।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 22) 19 Jan

🌹 आत्मविश्वास क्या नहीं कर सकता?

🔵 नेलसन ब्रिटेन का प्रसिद्ध राष्ट्रपति था। उसने अनेक युद्धों में विजय पाई। प्रचण्ड साहस और अटूट आत्मविश्वास ही उसकी विजय के आधार थे। नील नदी के युद्ध के लिए नेलसन ने पूर्व योजना बनाई और अपनी अधीनस्थ सैनिकों के सामने वह योजना रखी। इसी बीच कर्नल वेरी ने सन्देह प्रकट किया—‘‘यदि हमारी विजय नहीं हुई तो संसार का क्या कहेगा?’’ नेलसन ने रोषपूर्ण मुद्रा से तमककर उत्तर दिया—‘‘यदि के लिए नेलसन के पास कोई स्थान नहीं। मैंने जो कुछ निर्णय लिया है उसके अनुसार सभी जुट जायें। निश्चित रूप से विजय हमारी ही होगी यह बात अलग है कि हमारी विजय की कहानी कहने वाले हमसे से थोड़े ही रह जायें।’’

🔴 मोर्चे पर जाने से पूर्व नेलसन ने कप्तान से कहा, ‘‘कल इस समय से पूर्व या तो हमें विजय प्राप्त होगी या मेरे लिए वेस्टमिन्स्टर के गिरजे में कब्र तैयार हो जायेगी, जहां में शान्तिपूर्वक विश्राम करूंगा।’’ कैसे आत्मबल और आत्मविश्वास से भरे शब्द थे। जो अन्त में सत्य सिद्ध हुए। विजय नेलसन के हाथ लगी।

🔵 नेपोलियन का जीवन भी ऐसे दृढ़ संकल्प और मनोबल से भरा था। आल्पस पर्वत की सेण्ट वरनार्ड घाटी का निरीक्षण करके लौटे हुए इंजीनियरों से नेपोलियन ने पूछा ‘क्या रास्ता पार कर सकना संभव है?’ इंजीनियरों ने आशंका व्यक्त करते हुए कहा— ‘‘शायद, पार कर सकें।’’ नेपोलियन ने आगे की बात नहीं सुनी तुरन्त सिपाहियों को आदेश दिया ‘‘आगे बढ़ो!’’ इस दुस्साहसिक निर्णय पर इंग्लैण्ड और आस्ट्रेलिया के लोग आश्चर्य करने लगे कि यह नाटे कद का सामान्य सा व्यक्ति साठ हजार सैनिकों और हजारों मन युद्धास्त्र के साथ इतने ऊंचे आल्पस पर्वत को भला कैसे पार कर सकेगा?

🔴 दृढ़ इच्छा शक्ति और आत्मविश्वास के आधार पर वह आल्पस को भेदकर गन्तव्य तक पहुंचने में सफल हुआ, अन्य कई सेनानायकों के पास समर्थ सेना थी, हथियार वह अन्य उपयोगी साधन थे, पर उनमें वह आत्मविश्वास नहीं था जिसके कारण नेपोलियन का कलेजा कठिनाइयों को देखकर वज्र बन जाता था। वह स्वयं कहा करता था— ‘‘मेरे शब्दकोष में ‘असम्भव’ नामक कोई शब्द नहीं।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 28) 19 Jan

🌹 एक के द्वारा दूसरे के लिए जप-अनुष्ठान

🔴 जिस प्रकार एक व्यक्ति अपने धन-साधनों का अनुदान दूसरे अभाव-ग्रस्तों को दे सकता है, उसी प्रकार उपासना द्वारा अर्जित तप भी दूसरों के निमित्त उदारतापूर्वक किया जाता है। इसी प्रकार तप देने वाला जो कोष खोले होता है वह बदले में मिलने वाले पुण्य से फिर भर जाता है। दानी को पुण्य मिलता है। इस प्रकार वह एक वस्तु देकर बदले में दूसरी प्राप्त कर लेता है और घाटे में नहीं रहता। कष्ट पीड़ितों की व्यथा हरने वाला कोई व्यक्ति सत्प्रयत्नों को सफल बनाने के लिए, अपने जप-तप का दान देता रहे तो उसकी यह परमार्थ परायणता आत्मोन्नति में बाधक नहीं, सहायक ही सिद्ध होगी। वरदान, आशीर्वाद देने की परम्परा यही है। इसमें इतना ही ध्यान रखा जाय कि मात्र औचित्य को ही सहयोग दिया जाय। अनाचार को परिपुष्ट करने के लिए अपनाई गई उदारता भी प्रकारान्तर से स्वयं अनाचार करने की तरह ही पाप कर्म बन जाती है। इसलिए किसी की सहायता करते समय यह ध्यान भी रखना चाहिए कि इस प्रकार की सहायता से अनीति का पक्ष पोषण तो नहीं होता।

🔵 पैसा देकर बदले में कल्याण के निमित्त कराये गये जप, अनुष्ठानों में सफलता तभी मिलती है जब कि फीस पारिश्रमिक के रूप में नहीं वरन् कर्ता ने अनिवार्य निर्वाह के लिए न्यूनतम मात्रा में ही उसे स्वीकार किया हो। व्यवहार या लूट-खसोट की दृष्टि से मनमाना पैसा वसूल करने वाले लालची अनुष्ठान कर्ताओं का प्रयत्न नगण्य परिणाम ही प्रस्तुत कर सकता है।

🔴 अनुष्ठान आदि की विशिष्ट साधनाएं, चाहे स्वयं की गई हों या दूसरे किसी से कराई गई हों, उनमें हर हालत में तपश्चर्या के नियमों का पालन करना आवश्यक है। आहार की सात्विकता—ब्रह्मचर्य पालन—अपनी सेवा आप करना जैसे नियम हर अनुष्ठान कर्ता के लिए आवश्यक हैं, भले ही वह अपने निमित्त किया गया हो या दूसरे के लिए। इन नियमों का पालन न करने पर, मात्र जप-संख्या पूरी करने पर से अनुष्ठान का लाभ नहीं मिलता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 18 जनवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 12) 19 Jan

🌹 त्रिविध भवबन्धन एवं उनसे मुक्ति

🔴 साधना से तात्पर्य है- साध लेना, सधा लेना। पशु प्रशिक्षक यही करते हैं। अनगढ़ एवं उच्छृंखल पशुओं को वे एक रीति-नीति सिखाते हैं, उनको अभ्यस्त बनाते हैं और उस स्थिति तक पहुँचाते हैं, जिसमें उस असंस्कृत प्राणी को उपयोगी समझा जा सके। उसके बढ़े हुए स्तर का मूल्यांकन हो सके। पालने वाला अपने को लाभान्वित हुआ देख सके। सिखाने वाला भी अपने प्रयास की सार्थकता देखते हुए प्रसन्न हो सके।           

🔵 देखा यह जाता है कि भक्त भगवान् को साधता है। उसको मूर्ख समझते हुए उसकी गलतियाँ निकालता है। तरह-तरह के उलाहने देता है। साथ ही गिड़गिड़ाकर, नाक रगड़कर, खींसें निपोरकर अपना-अपना अनुचित उल्लू सीधा करने के लिये जाल-जंजाल बुनता है। प्रशंसा के पुल बाँधता है। छिटपुट भेंट चढ़ाकर उसे फुसलाने का प्रयत्न करता है। समझा जाता है कि सामान्य लोगों से व्यावहारिक जगत में आदान-प्रदान के आधार पर ही लेन-देन चलता है, पर ईश्वर या देवता ऐसे हैं जिन्हें वाणी की वाचालता तथा शारीरिक-मानसिक उचक-मचक करने भर से वशवर्ती नहीं किया जा सकता है। यह दार्शनिक भूल मनुष्य को एक प्रकार से छिपा हुआ नास्तिक बना देती है। प्रकट नास्तिक वे हैं जो प्रत्यक्षवाद के आधार पर ईश्वर की सत्ता स्पष्ट दृष्टिगोचर न होने पर उसकी मान्यता से इंकार कर देते हैं।

🔴 दूसरे छिपे नास्तिक वे हैं जो उससे पक्षपात की, मुफ्त में लम्बी-चौड़ी मनोकामनाओं की पूर्ति चाहते रहते हैं। मनुष्य विधि व्यवस्था को तोड़ता-छोड़ता रहता है, पर ईश्वर के लिये यह सम्भव नहीं कि अपनी बनाई कर्मफल व्यवस्था का उल्लंघन करे या दूसरों को ऐसा करने के लिये उत्साहित करे। तथाकथित भक्त लोग ऐसी ही आशाएँ किया करते हैं। अन्तत: उन्हें निराश ही होना पड़ता है। इस निराशा की खीज और थकान से वे या तो साधना-विधान को मिथ्या बताते हैं या ईश्वर के निष्ठुर होने की मान्यता बनाते हैं। कई पाखण्डी कुछ भी हस्तगत न होने पर भी प्रवंचना रचते हैं और नकटा सम्प्रदाय की तरह अपनी सिद्धि-सफलता का बखान करते हैं। आज का आस्तिकवाद इसी विडम्बना में फँसा हुआ है और वह लगभग नास्तिकवाद के स्तर पर जा पहुँचा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पत्नी त्याग - महापाप

🔵 उत्तानपाद के पुत्र और तपस्वी ध्रुव के छोटे भाई का नाम उत्तम था। यद्यपि वह धर्मात्मा राजा था फिर भी उसने एक बार अपनी पत्नी से अप्रसन्न होकर उसे घर से निकाल दिया और अकेला ही घर में रहने लगा।

🔴 एक दिन एक ब्राह्मण राजा उत्तम के पास आया और कहा- मेरी पत्नी को कोई चुरा ले गया है। यद्यपि वह स्वभाव की बड़ी क्रूर वाणी से कठोर, कुरूप और अनेक कुलक्षणों से भरी हुई थी, पर मुझे अपनी पत्नी की रक्षा, सेवा और सहायता करनी ही उचित है। राजा ने ब्राह्मण को दूसरी पत्नी दिला देने की बात कही पर उसने कहा- पत्नी के प्रति पति को वैसा ही सहृदय और धर्म परायण होना चाहिए जैसा कि पतिव्रता स्त्रियाँ होती है।

🔵 राजा ब्राह्मण की पत्नी को ढूँढ़ने के लिए चल दिया। चलते -चलते वह एक वन में पहुँचा जहाँ एक तपस्वी महात्मा तप कर रहे थे। राजा का अपना अतिथि ज्ञान ऋषि ने अपने शिष्य को अर्घ्य, मधुपर्क आदि स्वागत का समान लाने को कहा। पर शिष्य ने उनके कान में एक गुप्त बात कही तो ऋषि चुप हो गये और उनने बिना स्वागत उपचार किये साधारण रीति से ही राजा से वार्ता की।

🔴 राजा का इस पर आश्चर्य हुआ। उनने स्वागत का कार्य स्थगित कर देने का कारण बड़े दुःख, विनय और संकोच के साथ पूछा। ऋषि ने उत्तर दिया- राजन् आप ने पत्नी का त्याग कर वही पाप किया है। जो स्त्रियाँ किसी कारण से अपने पति का त्याग कर करती हैं। चाहे स्त्री दुष्ट स्वभाव की ही क्यों न हो पर उसका पालन और संरक्षण करना ही धर्म तथा कर्तव्य है। आप इस कर्तव्य से विमुख होने के कारण निन्दा और तिरस्कार के पात्र हैं। आपके पत्नी त्याग का पाप मालूम होने पर आपका स्वागत स्थगित करना पड़ा।

🔵 राजा को अपने कृत्य पर बड़ा पश्चाताप हुआ। उसने ब्राह्मण की स्त्री के साथ ही अपनी स्त्री को भी ढूँढ़ा और उनको सत्कार पूर्वक राजा तथा ब्राह्मण ने अपने अपने घर में रखा।
🔴 देवताओं की साक्षी में पाणिग्रहण की हुई पत्नी में अनेक दोष होने पर भी उसका परित्याग नहीं करना चाहिए। जैसे पतिव्रता स्त्री अपने सद् व्यवहार से दुर्गुणी पति को सुधारती है वैसे ही हर पुरुष को पत्नीव्रती होना चाहिए और प्रेम तथा सद् व्यवहार से उसे सुधारता चाहिए। त्याग करना तो कर्तव्यघात है।

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 21) 18 Jan

🌹 कठिनाइयों से डरिये मत, जूझिये

🔵 यह तो एक उदाहरण मात्र है जिसमें एक ने अपने आत्मविश्वास के कारण शरीर क्षमता में असमर्थ होते हुए भी दूसरे समर्थ और बलिष्ठ व्यक्ति पर विजय पाई जबकि दूसरा सक्षम और समर्थ होते हुए भी आत्मविश्वास खो देने से असफल रहा। आत्मविश्वास को जीवन और निराशा को मृत्यु कहा गया है। आत्मविश्वासी कठिन से कठिन परिस्थितियों को भी अपनी इस विशेषता के कारण उनसे जूझने एवं अनुकूल बनाने में समर्थ होते हैं। उनकी सफलता में परिस्थितियों का शरीर बल एवं बुद्धिबल का उतना महत्व नहीं होता, जितना कि स्वयं के मनोबल का।

🔴 सामान्यतः समझा यह जाता है कि साधनों के अभावों, गई-गुजरी परिस्थितियों और प्रतिकूलताओं के कारण ही मनुष्य असफल होता है। परन्तु वास्तविकता यह नहीं है। अपनी क्षीण निस्तेज अनुत्साही मनोवृत्ति के कारण ही लोग पग-पग पर ठोकरें खाते और असफलताओं का मुंह देखते हैं। कठिनाइयां प्रतिकूलतायें उन व्यक्तियों के लिए बाधक हैं जिन्हें अपने आप पर विश्वास नहीं। कुछ करने के लिए एक कदम बढ़ाने से पूर्व उनका मन अनिष्ट की आशंका से डरने लगता है। सफलता मिलेगी भी कि नहीं। इसके विपरीत आत्मविश्वास और मनोबल के धनी व्यक्ति पहाड़ जैसी विपदाओं को भी पैरों तले रौंदने की हिम्मत रखते हैं। प्रतिकूलताओं से प्रगति क्रम में विलम्ब तो हो सकता है पर यह कहना गलत है कि सफलता ही नहीं मिलेगी। यदि प्रचण्ड इच्छा शक्ति, तत्परता और साहसिकता बनी रहे तो अभीष्ट लक्ष्य तक अवश्य पहुंचा जा सकता है।

🔵 ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं जिसमें प्रतिकूलताओं के ऊपर आत्म-विश्वास ने विजय पाई। आत्मविश्वास के अभाव के कारण कितने ही व्यक्ति सामान्यतः पिछड़ेपन से ग्रस्त रहते और अवनति के गर्त में पड़े रहते हैं। कितने ही ऐसे भी होते हैं जो कठिनाइयों को चुनौती देते संघर्षों का आलिंगन करते अन्ततः अभीष्ट तक पहुंचते हैं। अन्तराल में छिपी क्षमतायें उन्हें किसी के आगे हाथ पसारने, गिड़गिड़ाने, दीन-हीन बने रहने के लिए बाध्य नहीं करती। सोया आत्मविश्वास जब जागता है छिपी क्षमतायें जब उभरती हैं— उत्साह जब उमड़ता है तो वह बाहरी सहयोग को भी अपनी आकर्षण शक्ति द्वारा खींच लेता है। तब वह हवाओं का रूप बदलने, दिशाओं को पलट देने, प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदल देने की सामर्थ्य रखता है। सीमित सामर्थ्यों के होते हुए भी आत्मविश्वास के बल पर कितने ही व्यक्ति सफलता के शिखर पर पहुंचे, इतिहास में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 अध्यात्म एक प्रकार का समर (अमृतवाणी) भाग 10

दृष्टि बदले, अपने आपे को संशोधित करें

🔴 बेटे, इन आँखों से देखने की जिस चीज की जरूरत हैं, वह माइक्रोस्कोप तेरे पास होना चाहिए। क्या देखना चाहता है? गुरुजी! सब कुछ देखना चाहता हूँ। बेटे, इन आँखों से नहीं देखा जा सकता। इसको देखने के लिए माइक्रोस्कोप के बढ़िया वाले लेंस चाहिए। कौन से बढ़िया वाले लेंस 'दिव्यं ददामि ते चक्षुः' तुझे अपनी आँखों में दिव्यचक्षु को फिट करना पड़ेगा। फिर देख कि तुझे भगवान दिखाई पड़ता है कि नहीं पड़ता। 'सीय राममय सब जग जानी' की अनुभूति होती है कि नहीं। फिर जर्रे- जर्रे में भगवान, पत्ते- पत्ते में भगवान तुझे दिखाई पड़ सकता है, अगर तेरी आँखों के लेंस सही कर दिए जाएँ तब। अगर लेंस यही रहें तो बेटे, फिर तुझे पाप के अलावा, शैतान के अलावा, हर जगह चालाकी, बेईमानी, हर जगह धूर्तता और दुष्टता के अलावा कुछ भी नहीं दिखाई पड़ सकता।

🔵 मित्रो! अध्यात्म पर चलने के लिए आत्मसंशोधन की प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। पूजा- उपासना के सारे कर्मकाण्ड, सारे के सारे क्रियाकृत्य आत्मसंशोधन की प्रक्रिया की ओर इशारा करते है। मैंने आपको जो समझाना था, यह सूत्र बता दिया। हमारा अध्यात्म यहीं से शुरू होता है। इसलिए यह जप नहीं हो सकता, भजन नहीं हो सकता, कुछ नहीं हो सकता। केवल यहीं से अर्थात आत्मसंशोधन से हमारा अध्यात्म शुरू होता है। आत्मसंशोघन के बाद ही देवपूजन होता है। देवता बनकर ही देवता की पूजा की जाती है।

🌹 आज की बात समाप्त ।।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 ।। ॐ शांति: ।।
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 75)

🌹 गीता के माध्यम से जन-जागरण

🔴 शाखाओं में, साप्ताहिक सत्संगों में गीता-कथा हुआ करे तो कितना अच्छा रहे। प्रतिदिन सायंकाल गीता के दो श्लोकों की व्याख्या का क्रम कहीं चलने लगे तो एक वर्ष में वह धर्मानुष्ठान विधिवत् पूरा हो सकता है। कुल 700 श्लोक हैं, दो श्लोक से 350 दिन में पूरे हो सकते हैं। बाहर के किसी को न सही अपने घर के लोगों को ही उसे नित्य सुनाया जाया करे तो परिवार-निर्माण की समस्या सुलझाने में महत्वपूर्ण योग मिल सकता है। इस प्रकार प्रचार कार्य के लिए बाहर न जा सकने वाले लोगों के लिए भी यह प्रशिक्षण बहुत मूल्यवान सिद्ध हो सकता है।

🔵 गीता समारोहों की श्रृंखला— कुछ समय पूर्व जिस प्रकार गायत्री-यज्ञ होते थे, अब उसी उत्साह से यह ‘गीता कथा सप्ताहों’ के आयोजन जगह-जगह होने चाहिए। शाखाओं को उसकी तैयारी में अभी से लग जाना चाहिए।

🔴 इन गीता सप्ताहों के धर्मानुष्ठानों में बहुत स्वल्प व्यय होगा। अनुमानित व्यय इस प्रकार है—गीता प्रवचन कर्त्ता को 7 दिन का पारिश्रमिक 40 रु. उसका मार्ग व्यय 10 रु. अन्तिम दिन सामूहिक गायत्री यज्ञ का अनुमानित व्यय 30 रु. कन्या भोज 30 रु. प्रचार, मण्डप, रोशनी आदि विविध खर्च 40 रु. इसका कुछ व्यय 150 रु. बैठता है। इसमें किफायत की जाय तो 100 रु. भी हो सकता है और थोड़ा अधिक फैल-फूट कर किया जाय तो यह 200 रु. तक पहुंच सकता है। इतने महत्वपूर्ण आयोजन के लिए इतनी रकम कोई अधिक नहीं है और ऐसी भी नहीं है, जो छोटे गांवों में भी इकट्ठी न की जा सके। शाखाओं के वार्षिकोत्सव इसी रूप में होते रह सकते हैं। इसके लिए कोई तिथियां हर साल के लिये निश्चित भी रह सकती हैं ताकि उन दिनों अवकाश निकालने की बात सदस्यों के मन में पहले से ही बनी रहे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 26)

🌞 मार्गदर्शक द्वारा भावी जीवन क्रम सम्बन्धी निर्देश

🔴  पूर्वकाल में ऋषिगण गोमुख से ऋषिकेश तक अपनी-अपनी रुचि और सुविधाओं के अनुसार रहते थे। वह क्षेत्र अब पर्यटकों, तीर्थयात्रियों और व्यवसाइयों से भर गया है। इसलिए उसे उन्हीं लोगों के लिए छोड़ दिया गया है। अनेक देव मंदिर बन गए हैं, ताकि यात्रियों का कौतूहल, पुरातन काल का इतिहास और निवासियों का निर्वाह चलता रहे।’’

🔵 हमें बताया गया कि थियोसोफी की संस्थापिका व्लैवेट्स्की सिद्ध पुरुष थीं। ऐसी मान्यता है कि वे स्थूल शरीर में रहते हुए भी सूक्ष्म शरीरधारियों के संपर्क में थीं। उनने अपनी पुस्तकों में लिखा है कि दुर्गम हिमालय में ‘‘अदृश्य सिद्ध पुरुषों की पार्लियामेंट’’ है। इसी प्रकार उस क्षेत्र के दिव्य निवासियों को ‘‘अदृश्य सहायक’’ भी कहा गया है। गुरुदेव ने कहा कि ‘‘वह सब सत्य है, तुम अपने दिव्य चक्षुओं से यह सब उसी हिमालय क्षेत्र में देखोगे, जहाँ हमारा निवास है।’’ तिब्बत क्षेत्र उन दिनों हिमालय की परिधि में आता था। अब वह परिधि घट गई है, तो भी व्लैवेट्स्की  का कथन सत्य है। स्थूल शरीरधारी उसे देख नहीं पाते, पर हमें अपने मार्गदर्शक गुरुदेव की सहायता से उसे देख सकने का आश्वासन मिल गया।

🔴 गुरुदेव ने कहा-‘‘हमारे बुलावे की प्रतीक्षा करते रहना। जब परीक्षा की स्थिति के लिए उपयुक्तता एवं आवश्यकता समझी जाएगी, तभी बुलाया जाएगा। अपनी ओर से उसकी इच्छा या प्रतीक्षा मत करना। अपनी ओर से जिज्ञासावश उधर प्रयाण भी मत करना। वह सब निरर्थक रहेगा। तुम्हारे समर्पण के उपरांत यह जिम्मेदारी हमारी हो जाती है।’’ इतना कहकर वे अंतर्ध्यान हो गए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 26)

🌞  हिमालय में प्रवेश

अपने और पराये

🔵 लगातार की यात्रा ने पैरों में छाले डाल दिये। आज ध्यान पूर्वक पैरों को देखा तो दोनों पैरों में कुल मिलाकर छोटे-बड़े दस छाले निकले। कपड़े का नया जूता इसलिये पहना था कि कठिन रास्ते में मदद देगा पर भले मानस ने भी दो जगह काट खाया। इन छाले और जख्मों में से जो कच्चे थे वे सफेद और जिनमें पानी पड़ गया यहां वे पीले हो गये हैं। चलने में दर्द करते हैं और दुखते हैं। लगता है पैर अपने सफेद पीले दांत निकाल कर चलने में लाचारी प्रकट कर रहे हैं।

🔴 मंजिल दूर है। गुरु पूर्णिमा तक हर हालत में नियत स्थान पर पहुंचना है। पर अभी से दांत दिखाएंगे तो कैसे बनेगी? लंगड़ा लंगड़ा कर कल तो किसी प्रकार चल लिया गया, पर आज मुश्किल मालूम पड़ती है। दो तीन छाले जो फूट गये, जख्म बनते जा रहे हैं। बढ़ गये तो चलना कठिन हो जायगा और न चला जा सका तो नियत समय पर लक्ष्य तक पहुंचना कैसे सम्भव होगा? इस चिन्ता ने आज दिन भर परेशान रखा।

🔵 नंगे पैर चलना और भी कठिन है। रास्ते भर ऐसी पथरीली कंकड़ियां बिछी हुई हैं कि वे जहां पैर में गढ़ जाती हैं कांटे की तरह दर्द करती हैं। एक उपाय करना पड़ा। आधी धोती फाड़ कर दो टुकड़े किये गये और उन्हें पैरों से बांध दिया गया। जूते उतार कर थैले में रख लिये। काम चल गया। धीरे-धीरे रास्ता कटने लगा।

🔴 एक ओर तो यह अपने पैर हैं जो आड़े वक्त में दांत दिखाने लगे दूसरी ओर यह बांस की लाठी है, जो बेचारी न जाने कहां जन्मी, कहां बड़ी हुई और कहां से साथ हो ली। यह सगे भाई जैसा काम दे रही है। जहां चढ़ाई आती है तीसरे पैर का काम करती है। जैसे बूढ़े बीमार को कोई सहृदय कुटुम्बी अपने कन्धे का सहारा देकर आगे ले चलता है वैसे ही थकान से जब शरीर चूर चूर होता है तब यह लाठी सगे सम्बन्धी जैसा ही सहारा देती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 27) 18 Jan

🌹 अनुष्ठान के नियमोपनियम

🔴 अनुष्ठान के दिनों में पांच तप-संयम साधने पड़ते हैं— [1] उपवास [2] ब्रह्मचर्य [3] अपनी सेवा अपने हाथ से [4] भूमिशयन [5] चमड़े का प्रयोग त्याग। अनुष्ठान के दिनों चमड़े के जूते आदि का प्रयोग न किया जाय। प्लास्टिक, रबड़, कपड़ा आदि की बनी वस्तुएं आजकल चमड़े के बजाय हर स्थान पर प्रयुक्त होती हैं। वही किया जाय। भूमि शयन सर्वोत्तम है। सीलन, कीड़े आदि का भय हो तो तख्त पर सोया जा सकता है। हजामत, कपड़े धोना जैसी दैनिक जीवन की शारीरिक आवश्यकताएं नौकरों से न करायें, स्वयं करें। भोजन अपने हाथ से बना सकना सम्भव न हो तो स्त्री, माता, बहिन आदि उन्हीं अति निकटवर्ती स्वजनों के हाथ का बनाया स्वीकार करें, जिनके साथ आत्मीयता का आदान-प्रदान चलता है।

🔵 बाजार से पका हुआ तो नहीं ही खरीदें। ब्रह्मचर्य अनुष्ठान के दिनों में आवश्यक है। शारीरिक ही नहीं मानसिक भी पाला जाना चाहिए। कामुक कुदृष्टि पर नियन्त्रण रखा जाय। सम्पर्क में आने वाली नारियों को माता, बहिन या पुत्रीवत् पवित्र भाव से देखा जाय। यही बात पुरुषों के सम्बन्ध में नारियों पर लागू होती है। पांचवीं तपश्चर्या भोजन की है। यह उपवास काल है। उपवास कई स्तर के होते हैं— [1] छाछ, दूध आदि पेय पदार्थों पर रहना [2] शाक, फल के सहारे काम चलाना [3] नमक, शकर का त्याग अर्थात् अस्वाद [4] एक समय आहार [5] दो खाद्य पदार्थों पर अनुष्ठान की अवधि काटना।

🔴 अनुष्ठान के यही मोटे नियम हैं। इसके अतिरिक्त जो तरह-तरह की बातें कही जाती हैं और परस्पर विरोधी नियम बताये जाते हैं उन पर ध्यान न दिया जाय।

🔵 अनुष्ठान में कोई भूल हो जाने पर, त्रुटि रहने पर भी किसी अनिष्ट की आशंका न करनी चाहिए फिर भी उन दिनों कोई विघ्न उत्पन्न न होने पाये इसके लिए संरक्षण और ज्ञात-अज्ञात में रही हुई त्रुटियों का परिमार्जन करने के लिए अनुष्ठान साधना के लिए कोई समर्थ संरक्षक नियुक्त कर लेना चाहिए। यह सेवा शांतिकुंज हरिद्वार से भी ली जाती है। अनुष्ठान करने वाले व्यक्ति का परिचय तथा समय लिख भेजने से संरक्षण, परिमार्जन सर्वथा निस्वार्थ भाव से होता रहता है। यह व्यवस्था करने पर साधना की सफलता और भी अधिक सुनिश्चित हो जाती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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