मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 45)

🌹 विभूतिवान व्यक्ति यह करें

🔴 63. प्रत्येक भाषा में प्रकाशन— युग निर्माण के लिए आवश्यक एवं उपयुक्त साहित्य प्रकाशित करने के लिए देश की प्रत्येक भाषा में प्रकाशक उत्पन्न किये जांय, जो व्यवसाय ही नहीं मिशन भावना भी अपने कार्य-क्रम में सम्मिलित रखें और इसी दृष्टि से अपना कार्य-क्रम चलावें। देश में 14 भाषाएं राष्ट्र भाषा का स्थान प्राप्त कर चुकी हैं। पन्द्रहवीं अंग्रेजी है। इन सभी भाषाओं में युग-निर्माण साहित्य स्वतन्त्र रूप से प्रकाशित और प्रचारित होने लगे, उसके लिए आवश्यक प्रयत्न किया जाना चाहिये।

🔵 64. अनुवाद कार्य का विस्तार— जो व्यक्ति कई भाषाएं जानते हैं वे एक भाषा का सत्साहित्य दूसरी भाषा में अनुवाद करें और उस भाषा के प्रकाशकों के लिए एक बड़ी सुविधा उत्पन्न करें। भाषाओं की भिन्नता के कारण उच्च कोटि का ज्ञान सीमाबद्ध न पड़ा रहे इसलिये यह अनुवाद कार्य भी स्वतन्त्र लेखन से कम महत्वपूर्ण नहीं है। संसार के महान मनीषियों ने जो ज्ञान अपनी-अपनी भाषाओं में प्रस्तुत किया है उसका लाभ सीमित क्षेत्र में न रहकर समस्त भाषा-भाषी लोगों के लिए उपलब्ध हो ऐसा प्रयास करने से ही एक बड़ी आवश्यकता पूर्ण हो सकेगी। हिन्दी भाषा में परिवार के साहित्यकार जो उत्कृष्ट रचनाएं प्रस्तुत करें, उनका अनुवाद जल्दी ही देश की 15 भाषाओं में हो जाया करे तो विचार विस्तार का क्षेत्र बहुत व्यापक हो सकता है। आगे चल कर तो यही प्रक्रिया विश्वव्यापी बननी है। संसार के किसी भी कोने में किसी भाषा में छपे उत्कृष्ट विचार विश्व भर की जनता को उपलब्ध हो सकें ऐसे प्रकाशन तन्त्र का विकास होना आवश्यक है और वह हम भी करेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 32) 13 Dec

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र

🔵 गृहस्थ योग की अपनी साधना आरम्भ करते हुए आप इस बात के लिए कमर कस कर तैयार हो जाइए कि भूलों त्रुटियों कठिनाइयों और असफलताओं का आपको नित्य सामना करना पड़ेगा, नित्य उनसे लड़ना पड़ेगा, नित्य उनका संशोधन और परिमार्जन करना होगा, और अन्त में एक ना एक दिन सारी कठिनाइयों को परास्त कर देना होगा।

🔴 जैसे भूख, निद्रा, मल त्याग आदि नित्य कर्मों में रोज करते हैं तो भी दूसरे दिन फिर उनकी जरूरत पड़ती है, इस रोज रोज के झमेले से कोई निराशा या अनुत्साहित नहीं होता वरन् धैर्य पूर्वक नित्य ही उसकी व्यवस्था की जाती है। इसी प्रकार गृहस्थ योग की साधना में अपनी या दूसरों की कमजोरी से जो भूलें हों उनसे डरना या निराश न होना चाहिए वरन् अधिक दृढ़ता एवं उत्साह से परिमार्जन का धैर्य पूर्वक प्रयत्न करते रहना चाहिए।

🔵 पूर्ण रूप से सुधार हुआ है या नहीं यह देखने की उपेक्षा यह देखना चाहिए कि पहले की अपेक्षा सात्विकता में कुछ वृद्धि हुई है या नहीं? यदि थोड़ी बहुत भी बढ़ोतरी हुई हो तो यह आशा, उत्साह, प्रसन्नता और सफलता की बात है। बूंद बूंद से घड़ा भर जाता है, कन कन जमा होने से मन जमा हो जाता है, राई राई इकट्ठा करने से पर्वत बन जाता है, यदि प्रति दिन थोड़ी थोड़ी सफलता भी मिले तो हमारे शेष जीवन के असंख्य दिनों में वह सफलता बड़ी भारी मात्रा में जमा हो सकती है। यह सम्पत्ति किसी प्रकार नष्ट होने वाली नहीं है। यह जमा होने का क्रम अगले जन्म में भी जारी रहेगा और लक्ष तक एक न एक दिन पहुंच ही जाया जायेगा, धीरे धीरे सफलता मिले तो अधिक उत्साह से काम करना चाहिए। निराश होकर छोड़ बैठने की कोई आवश्यकता नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 32)

🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें
🔵 गम्भीर रहना वैसे सामान्यतया बुरा माना जाता है और समझा जाता है कि हंसना-हंसाना, हल्के-फुल्के रहना अच्छा होता है। इसमें कोई शक नहीं कि मनुष्य को प्रसन्न चित्त रहना चाहिए किन्तु गम्भीर रहना भी एक कला है। यहां पर गम्भीरता से तात्पर्य जीवन के प्रति गम्भीर दृष्टिकोण अपनाने से है। प्राचीनकाल से ही जीवन के प्रति गम्भीर दृष्टिकोण अपनाने की नीति प्रचलित थी, इस चिन्तन को प्रकारान्तर से दूरदर्शितापूर्ण कहा जा सकता है।

🔴 मनीषी, दार्शनिक तथा महत्वपूर्ण कार्यों में संलग्न लोग हमेशा जीवन के प्रति गम्भीर दृष्टिकोण अपनाने के पक्षधर रहे हैं। वर्तमान युग में लोग चिन्तित रहते हैं गम्भीर नहीं। चिन्तित रहना एक बात है और गम्भीर रहना दूसरी।

🔵 आधुनिक युग में लोग चिन्ता और तनाव से बचने के लिए हल्के-फुल्के मनोरंजन तथा नशाखोरी का सहारा लेते रहते हैं। ठाली बैठकर गपशप करना, हल्के-फुल्के तथा गन्दे मजाक करना, ठिठोली करना और उसी में समय काट देना ही एक उनका उद्देश्य होता है। ऐसे लोग अन्दर से चिन्तित तथा तनावग्रस्त होते हैं और बाहर से सस्ते मनोरंजन का आधार लेकर प्रसन्न रहते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 12 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 Dec 2016


👉 सतयुग की वापसी (भाग 8) 13 Dec

🌹 विभीषिकाओं के पीछे झाँकती यथार्थता 

🔴 अहंकारी यदुवंशी आपस में ही लड़-मरकर खप गए थे। उन पर बाहर से कोई वज्रपात नहीं हुआ था। आग सबसे पहले उसी स्थान को जलाती है, जहाँ से वह प्रकट होती है। उद्दीप्त वासना, अनियंत्रित तृष्णा और उन्माद जैसी अहंकारिता का त्रिदोष, जब महाग्राह की तरह मानवी गरिमा को निगलता-गटकता चला जा रहा हो, तब बच सकने की आशा यत्किंचित ही शेष रह जाती है। वर्तमान में उफनते तूफानी अनाचार को देखते हुए लगता है कि सचमुच हम महाविनाश प्रलय-प्रक्रिया की ओर सरपट चाल से दौड़े चले जा रहे हैं।  

🔵 प्रचण्ड प्रवाह को रोक सकने वाला बाँध विनिर्मित करने, जलधारा को नहरों के माध्यम से खेत-बगीचे तक पहुँचाने का काम तो निश्चय ही बड़ा कष्टसाध्य और श्रमसाध्य है। पर करने वाले जब प्राणपण से अपने पुरुषार्थ को सृजन की सदाशयता के साथ सम्बद्ध करते हैं तो उनकी साधना भी कम चमत्कारी परिणाम उत्पन्न नहीं करती। फरहाद, शीरी को पाने के लिए पहाड़ खोदकर लम्बी नहर निकाल सकने में, एकाकी प्रयासों के बलबूते ही सफल हो गया था। गंगा को स्वर्ग से घसीटकर जमीन पर बहने के लिए बाधित करने में भगीरथ अकेले ही सफल हो गए थे। व्यापक अन्धकार पर छोटा दीखने वाला सूरज ही विजय प्राप्त कर लेता है, अस्तु यह आशा भी की जा सकती है कि मनुष्य में उत्कृष्टता का उदय होगा, तो यह वातावरण भी बदल जाएगा, जो हर दृष्टि से भयंकर-ही-भयंकर दीख पड़ रहा है।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 44)

🌹 विभूतिवान व्यक्ति यह करें

🔴 विशिष्ट प्रतिभावान व्यक्ति अपने विशेष व्यक्तित्व के द्वारा युग-निर्माण की दिशा में विशेष कार्य कर सकते हैं। कलाकारों का योग इस सम्बन्ध में विशेष रूप से अभीष्ट है। लेखक, कवि, वक्ता, संगीतज्ञ, चित्रकार, धनी, विद्वान, राजनीतिज्ञ, यदि चाहें तो अपनी विभूतियों का सदुपयोग करके नव-निर्माण के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। इस प्रकार के प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तियों के सामने युग-निर्माण योजना निम्न सुझाव प्रस्तुत करती है:—

🔵 61. लेखकों और पत्रकारों से अनुरोध— देश की विभिन्न भाषाओं में जो लेखक और कवि आज कल लेखन कार्य में लगे हुए हैं, उनसे सम्पर्क बना कर यह प्रेरणा दी जाय कि वे युग-निर्माण की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर लिखा करें। इसी प्रकार जो पुस्तक प्रकाशक एवं पत्रकार साहित्य प्रकाशन का कार्य हाथ में लिए हुए हैं, उन्हें मानव जीवन में प्रकाश भरने वाला साहित्य छापने की प्रेरणा की जाय। समाचार-पत्र एवं पुस्तक-विक्रेताओं से भी यही अनुरोध किया जाय कि उन वस्तुओं के विक्रय में विशेष ध्यान दें जो जन कल्याण के लिए उपयोगी एवं आवश्यक है। इसी प्रकार वर्तमान साहित्य क्षेत्र में लगे हुए लोगों से सम्पर्क स्थापित करके उन्हें युग की आवश्यकता पूर्ण करने की प्रेरणा दी जाय।

🔴 62. युग-साहित्य के नव निर्माता— इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र में विशेष मनोयोग-पूर्वक युग की आवश्यकता पूर्ण करने के लिए मिशनरी ढंग से काम करने वाले लेखकों एवं कवियों का एक विशेष वर्ग तैयार किया जाय जो साहित्य-निर्माण कार्य को अपना प्रधान सेवा-साधन बनाकर तत्परतापूर्वक इसी कार्य में लग सकें। ऐसे अनेक व्यक्ति मौजूद हैं जिनमें इस प्रकार की प्रतिभा और सेवा भावना पर्याप्त मात्रा में मौजूद है, पर आवश्यक साधन, मार्ग दर्शन एवं प्रोत्साहन न मिलने से वे अविकसित ही पड़े रहते हैं। अपना प्रयत्न ऐसे लोगों को संगठित एवं विकसित करने का हो। इस अभिरुचि एवं योग्यता के लोगों को ढूंढ़ना, उन्हें इकट्ठा करना और आवश्यक प्रशिक्षण देकर इस योग्य बनाना हमारा काम होगा कि वे कुछ ही दिनों में युग-निर्माता साहित्यकारों की एक भारी आवश्यकता की पूर्ति कर सकें। ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ में इस प्रतिभा के जो लोग होंगे उन्हें सर्व-प्रथम तैयार करेंगे और उनको आवश्यक शिक्षा देने के लिए जल्दी-जल्दी ही शिविरों की श्रृंखला आरम्भ करेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 14)

🌹 तीन दुःख और उनका कारण

🔵 शरीर द्वारा किए हुए चोरी, डकैती, व्यभिचार, अपहरण, हिंसा, आदि में मन ही प्रमुख है। हत्या करने में हाथ का कोई स्वार्थ नहीं है वरन् मन के आवेश की पूर्ति है, इसलिए इस प्रकार के कार्य, जिनके करते समय इंद्रियों को सुख न पहुँचता हो, मानसिक पाप कहलाते हैं। ऐसे पापों का फल मानसिक दुःख होता है। स्त्री-पुत्र आदि प्रियजनों की मृत्यु, धन-नाश, लोक निंदा, अपमान, पराजय, असफलता, दरिद्रता आदि मानसिक दुःख हैं, उनसे मनुष्य की मानसिक वेदना उमड़ पड़ती है, शोक संताप उत्पन्न होता है, दुःखी होकर रोता-चिल्लाता है, आँसू बहाता है, सिर धुनता है।
         
🔴 इससे वैराग्य के भाव उत्पन्न होते हैं और भविष्य में अधर्म न करने एवं धर्म में प्रवृत्त रहने की प्रवृत्ति बढ़ती है। देखा गया है कि मरघट में स्वजनों की चिता रचते हुए ऐसे भाव उत्पन्न होते हैं कि जीवन का सदुपयोग करना चाहिए। धन नाश होने पर मनुष्य भगवान को पुकारता है। पराजित और असफल व्यक्ति का घमण्ड चूर हो जाता है। नशा उतर जाने पर वह होश की बात करता है, मानसिक दुःखों का एकमात्र उद्देश्य मन में जमे हुए ईर्ष्या, कृतघ्नता, स्वार्थपरता, क्रूरता, निर्दयता, छल, दम्भ, घमण्ड की सफाई करना होता है। दुःख इसलिए आते हैं कि आत्मा के ऊपर जमा हुआ प्रारब्ध कर्मों का पाप संस्कार निकल जाय। पीड़ा और वेदना की धारा उन पूर्व कृत्य प्रारब्ध कर्मों के निकृष्ट संस्कारों को धोने के लिए प्रकट होती है।

🔵 दैविक-मानसिक कष्टों का कारण समझ लेने के उपरांत अब दैहिक-शारीरिक कष्टों का कारण समझना चाहिए। जन्मजात अपूर्णता एवं पैतृक रोगों का कारण पूर्व जन्म में उन अंगों का दुरुपयोग करना है। मरने के बाद सूक्ष्म शरीर रह जाता है। नवीन शरीर की रचना इस सूक्ष्म शरीर द्वारा होती है । इस जन्म में जिस अंग का दुरुपयोग किया जा रहा है, वह अंग सूक्ष्म शरीर में अत्यंत निर्बल हो जाता है, जैसे कोई व्यक्ति अति मैथुन करता हो, तो सूक्ष्म शरीर का वह अंग निर्बल होने लगेगा, फलस्वरुप सम्भव है कि वह अगले जन्म में नपुंसक हो जाय। यह नपुंसकता केवल कठोर दण्ड नहीं है, वरन् सुधार का एक उत्तम तरीका भी है।

🔴 कुछ समय तक उस अंग को विश्राम मिलने से आगे के लिए वह सचेत और सक्षम हो जाएगा। शरीर के अन्य अंगों के शारीरिक लाभ के लिए पापपूर्ण, अमर्यादित, अपव्यय करने पर आगे के जन्म में वे अंग जन्म से ही निर्बल या नष्ट प्रायः होते हैं। शरीर और मन के सम्मिलित पापों के शोधन के लिए जन्मजात रोग मिलते हैं। या बालक अंग-भंग उत्पन्न होते हैं। अंग-भंग या निर्बल होने से उस अंग को अधिक काम नहीं करना पड़ता, इसलिए सूक्ष्म शरीर का वह अंग विश्राम पाकर अगले जन्म के लिए फिर तरोताजा हो जाता है, साथ ही मानसिक दुःख मिलने से मन का पाप-भार भी धुल जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/theen.2

👉 गृहस्थ-योग (भाग 31) 12 Dec

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र

🔵 साधक सोचता है, इतने दिन से प्रयत्न कर रहा हूं, पर स्वभाव पर विजय ही नहीं मिलती, नित्य गलतियां होती है, ऐसी दशा में साधना चल नहीं सकती। कभी सोचता है हमारे घर वाले उजड्ड, गंवार, मूर्ख और कृतघ्न हैं यह लोग मुझे परेशान और उत्तेजित करते हैं और मेरे जीवन को साधना की नियत दिशा में चलने देते तो साधन व्यर्थ है, इस प्रकार के निराशाजनक विचारों से प्रेरित होकर वह अपने व्रत को छोड़ देता है।

🔴 उपरोक्त कठिनाई से हर साधक को आगाह हो जाना चाहिए। मनुष्य स्वभाव में त्रुटियां और कमजोरियां रहना निश्चित है। जिस दिन मनुष्य पूर्ण रूपेण त्रुटियों से परे हो जायेगा उसी दिन वह परम पद को प्राप्त कर लेगा, जीवन मुक्त हो जायेगा। जब तक उस मंजिल तक नहीं पहुंच जाता, जब तक मनुष्य योनि में है, देव योनि से पीछे है, तब तक यही मानना पड़ेगा कि मनुष्य त्रुटिपूर्ण हैं। जहां कई ऐसे व्यक्तियों का सम्मिलन है जिसमें कोई तो आध्यात्मिक भूमिका में बहुत आगे, कोई बहुत पीछे है ऐसे क्षेत्र में नित नई त्रुटियों का कठिनाइयों का सामने आना स्वाभाविक है। इन में से कुछ अपनी गलती के कारण उत्पन्न हुई होंगी कुछ अन्यों की गलती से।

🔵 यह क्रम धीरे दूर होता जाता है पर यह कठिन है कि अपना परिवार पूर्ण रूपेण देव परिवार हो जाय, इसके लिए बहुत कठिनाई से डरने घबराने या विचलित होने की कुछ भी आवश्यकता नहीं है। समाज का अर्थ ही— ‘‘त्रुटियों के सुधार का अभ्यास’’ है। अभ्यास को निरन्तर जारी रखना चाहिए। योगीजन नित्य प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा-ध्यान आदि की साधना करते हैं, क्योंकि उनको मनोभूमि अभी दोषपूर्ण है, जिस दिन उनके दोष सर्वथा समाप्त हो जायेंगे उसी दिन, उसी क्षण वे ब्रह्म निर्वाण को प्राप्त कर लेंगे।

🔴 दोषों का सर्वथा अभाव, यह अन्तिम सीढ़ी का सिद्ध अवस्था का लक्षण है। वहां तक पहुंच जाने पर तो कुछ करना ही बाकी नहीं रह जाता। साधकों को यह आशा न करनी चाहिये कि थोड़े ही समय में इच्छित भावनाएं पूर्ण रूप से क्रिया में आ जायेंगी। विचार क्षण भर में बन जाता है पर उसे संस्कार का रूप धारण करने में बहुत समय लगता है हथेली पर सरसों नहीं जमती। पत्थर पर निशान करने के लिए रस्सी की रगड़ बहुत समय तक जारी रहनी चाहिए। स्मरण रखिए से सर्वथा मुक्ति—लक्ष है, ध्येय है, सिद्ध अवस्था है। साधक का आरंभिक लक्षण यह नहीं है। आम का पौधा उगते ही यदि मीठे आम तोड़ने के लिए उसके पत्तों को टटोलेंगे तो मनोकामना पूर्ण न होगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 31) 12 Dec

🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 आवेशग्रस्त लोगों का एक और भी तरीका है कि वे आत्महत्या या पलायन की बात सोचते हैं और यह कल्पना करते हैं कि उनके न रहने पर प्रतिपक्षी को कितनी व्यथा सहनी पड़ेगी या कठिनाई उठाने पड़ेगी? जिनको आक्रमण की अपेक्षा आत्मघात सरल प्रतीत होता है वे उस रीति को अपना लेते हैं और जो भी तरीका समझ में आता है उससे आत्मघात कर बैठते हैं।

🔴 हत्या या आत्महत्या मनुष्य के हेय व्यक्तित्व का उभार है। मनुष्य में श्रेष्ठता और दुष्टता दोनों के अंश होते हैं। प्रयत्नपूर्वक उसकी करुणा और सहृदयता भी जगाई जा सकती है, जिससे प्रेरित होकर वह सेवा-सहायता जैसी सत्प्रवृत्तियां भी अपना सकता है, पर इसके लिए जन्मजात संस्कार ही नहीं वातावरण और प्रशिक्षण भी ऐसा मिलना चाहिए जिसके प्रभाव से सज्जनता उभरे। ऐसे छोटे-छोटे काम उसे आरम्भ में ही सौंपे जाय, जिसके सहारे सहानुभूति और संवेदना उभरे तथा निजी महत्वाकांक्षाओं के आवेशों पर नियन्त्रण करने का अभ्यास पड़े।

🔵  इसके विपरीत जिन्हें दुश्चिंतन का आधार मिलता है उन्हें कुकर्मियों के दुस्साहसों में शौर्य-पराक्रम ढूंढ़ने की आदत पड़ जाती है। वह दुर्बलों पर अनीति बरतते-बरतते इतने निष्ठुर हो जाते हैं जो दूसरों का अहित करने की तरह अपने आपको भी प्रतिशोध और आत्म प्रताड़ना का दुहरा काम सहने के लिए बाधित करे—इस मार्ग पर आने की रोकथाम किशोरावस्था में ही करनी चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 11 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 Dec 2016


👉 सतयुग की वापसी (भाग 7) 12 Dec

🌹 विभीषिकाओं के पीछे झाँकती यथार्थता

🔴 यही है अपने समय के मनुष्य का तात्त्विक पर्यवेक्षण। मूर्खता को कहने-सुनने में तो उपहासास्पद बताया जाता है पर वस्तुत: वह इतनी प्रबल एवं आतुर होती है कि उसके आवेश को रोक सकना अच्छे-अच्छों के लिए भी कठिन हो जाता है। यह उन्माद जब सामूहिकता के साथ जुड़ जाता है तो फिर स्थिति उस विशालकाय पागलखाने जैसी हो जाती है, जिसमें रोगी एक-दूसरे को उकसाने, भड़काने, गिराने, सताने जैसी विडम्बनाओं में ही लगे रहते हैं। वे सभी मात्र हानि ही हानि उठाते हैं।

🔵 गीताकार ने सच कहा है कि जब दुनिया सोती है, तब योगी जागते हैं। यह अनबूझ पहेली तभी प्रामाणिक सिद्ध हो सकती है, जब यह सोचा जाए कि असंख्यों अवांछनीयताओं की लहरें उठाते चलने वाले प्रस्तुत प्रवाह के साथ-साथ बढ़ते रहने की अपेक्षा कोई आश्रय दे सकने वाला किनारा खोजा जाए। प्रचलनों से हटकर नए तौर-तरीके अपनाकर, यथार्थता का आश्रय लेने वाली उमंग उमगे, अन्यथा अच्छे-भले नदी-नालों वाली जल सम्पदा, खारे समुद्र में गिरकर अपेय ही बनती चली जाएगी  

🔴 वर्तमान में तो सर्वत्र कुहासा छाया दीखता है। पतझड़ की तरह सर्वत्र ठूँठों ही ठूँठों का जमघट दीख पड़ता है। पतन और पराभव का नगाड़ा बजता सुनाई देता है। भविष्य अन्धकारमय प्रतीत होता है और लगता है कि मनुष्य समुदाय अब सामूहिक आत्महत्या करने पर ही उतारू आवेश से बुरी तरह ग्रसित हो रहा है। चूहों और खरगोशों की संख्या जब असाधारण रूप से बढ़ जाती है और उनके लिए खाने, पीने, रहने कि लिए सहारा शेष नहीं रहता, तो वे किसी बड़े जलाशय में डूब मरने के लिए बेतहाशा दौड़ लगाते देखे जाते हैं। चल रही गतिविधियों की समीक्षा करने पर लगता है मानो एक ऐसा तूफान उभर रहा है कि मानवी सत्ता, महत्ता, सम्पदा और प्रगति जैसे संचय में से कुछ भी उनकी चपेट से बचकर रह नहीं सकेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 Dec 2016


👉 सतयुग की वापसी (भाग 6)

🌹 विभीषिकाओं के पीछे झाँकती यथार्थता

🔴 वासना और तृष्णा की खाई इतनी चौड़ी और गहरी है कि उसे पाटने में कुबेर की सम्पदा और इन्द्र की समर्थता भी कम पड़ती है। तृष्णा की रेगिस्तानी जलन को बुझाने के लिए साधन सामग्री का थोड़ा-सा पानी, कुछ काम नहीं करता। अतृप्ति जहाँ की तहाँ बनी रहती है। थोड़े से उपभोग तो उस ललक को और भी तेजी से आग में ईंधन पड़ने की तरह भड़का देते हैं।

🔵 मन के छुपे रुस्तम का तो कहना ही क्या? वह यक्ष राक्षस की तरह अदृश्य तो रहता है, पर कौतुक-कौतूहल इतने बनाता-दिखाता रहता है कि उस व्यामोह में फँसा मनुष्य दिग्भ्रान्त बनजारे की तरह, इधर-उधर मारे-मारे फिरने में ही अपनी समूची चिन्तन क्षमता गँवा-गुमा दे। तृष्णा तो समुद्र की चौड़ाई और गहराई से भी बढ़कर है। उसे तो भस्मासुर, वृत्रासुर, महिषासुर जैसे महादैत्य भी पूरी न कर सके, फिर बेचारे मनुष्य की तो बिसात ही क्या है, जो उसे शान्त करके सन्तोष का आधार प्राप्त कर सके।

🔴 दिग्भ्रान्त मनुष्य अपने आप को शरीर तक सीमित मान बैठा है क्योंकि प्रत्यक्ष तो इतना ही कुछ दीख पड़ता है। मन यद्यपि अदृश्य है, पर वह भी शरीर का एक अवयव है। इसे ग्यारहवीं इन्द्रिय भी कहा जाता है। वासना, तृष्णा इन्हीं दोनों का मिला-जुला खेल है जो अनन्त काल तक चलते रहने पर भी कभी समाप्त नहीं हो सकता। इसी उलझन के भवबन्धनों में बँधा हुआ जीव, चित्र-विचित्र प्रकार के अभाव अनुभव करता, असन्तुलित रहता और उद्विग्नता, चिन्ता, आशंका के त्रास सहता रहता है। आश्चर्य इस बात का है कि अवांछनीय जाल-जंजालों से अपने को उबारने के लिए कुछ करना तो दूर, सोचने तक का मनुष्य प्रयास नहीं कर पाता, उलटे अनाचारों पर उतारू होकर दूसरों को भी वैसा ही करते रहने के लिए उकसाता रहता है, भले ही वह अनर्थ स्तर का ही घृणित क्यों न हो?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 30)

🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 आक्रमण के बदले में क्या दण्ड मिलते हैं? इसे जानते हुए भी वह उस सम्बन्ध में भी विचार नहीं करता और जिसके साथ चाहे जैसा व्यवहार कर बैठता है। एक ही पक्ष पर आरूढ़ रहता है, दूसरे विकल्प का विचार नहीं करता—ऐसा व्यक्ति शत्रुता को देर तक जकड़े रहता है। साधारणतया प्रेम और द्वेष के आवेश कुछ समय में उतर जाते हैं, पर जब घृष्टता चरम सीमा पर होती है तो उसका दुष्प्रयोजन एक निश्चय की तरह जड़ जमा लेता है और अपनी दृष्टि में जिसे भी अपराधी ठहरा लिया है, उससे प्रतिशोध लिए बिना नहीं मानता।

🔴 आमतौर से हत्याकाण्ड ऐसी ही आवेशग्रस्त मनःस्थिति में होते हैं। दूसरा कारण है—लालच। जिस उपाय से कोई बड़ी पूंजी हाथ लगे उसे कर गुजरने में भी निर्भय लोग चूकते नहीं। उसे यह सोचने की क्षमता नहीं होती कि जिसे सताया जा रहा है उस पर क्या बीतेगी? आवेशग्रस्तों की तरह निर्ममता या नृशंसता भी ऐसा ही मनोविकार है जो संवेदना रहित होता है। उसे दूसरों की पीड़ा के प्रति कोई सहानुभूति नहीं होती, वे ऐसे कुकृत्य कर बैठते हैं जिससे अपने राई भर लाभ के लिए दूसरों को भले ही मर्मांत पीड़ा सहनी पड़े।

🔵  यह अपराधी मनोवृत्ति का चिन्ह है जो संगति और सहमति से पनपती है। हत्याओं-अपराधों का साहित्य बाजार में भरा पड़ा है, अपनी शेखी बघारने के लिए क्रूरकर्मी दूसरे के सामने भी अपने कुकृत्यों की बढ़ी-चढ़ी शेखी बघारते हैं और बताते हैं कि उस शौर्य के बदले उनने कितना लाभ उठाया। ऐसे लोगों की संगति से भी आदर्श विहीन लोगों का मन उस ओर ढुलक जाता है और कौतूहलवश ऐसे कुकृत्य करते-करते वे उस व्यवसाय में कसाइयों की भांति नृशंस हो जाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 30)

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र
🔵 रात्रि को सोने से पूर्व दिन भर के कार्यों पर विचार करना चाहिए।
(1) आज परिवार से सम्बन्ध रखने वाले क्या क्या कार्य किये?
(2) उसमें क्या भूल हुई?
(3) स्वार्थ से प्रेरित होकर क्या अनुचित कार्य किया?
(4) भूल के कारण क्या अनुचित कार्य हुआ
(5) क्या क्या कार्य अच्छे, उचित और गृहस्थ योग की मान्यता के अनुरूप हुए?

🔴 इन पांच प्रश्नों के अनुसार दिन भर के पारिवारिक कार्यों का विभाजन करना चाहिए और आगे से त्रुटियों के सुधार का उपाय सोचना चाहिए।

(1) भूल की तलाश करना
(2) उसे स्वीकार करना,
(3) गलती के लिए लज्जित होना और
(4) उसे सुधारने का सच्चे मन से प्रयत्न करना

🔵 यह चार बातें जिसे पसन्द हैं, जो इस मार्ग पर चलता है, उसकी गलतियां दिन दिन कम होती जाती हैं और वह शीघ्र ही दोषों से छुटकारा पा लेता है।

🔴 गृहस्थ योग की साधना के मार्ग पर चलते हुए साधक के मार्ग में नित नई कठिनाइयां आती रहती हैं। कभी अपनी भूल से, कभी दूसरों की भूल से, ऐसी घटनाएं घटित हो जाती हैं जिनका नियत सिद्धान्त से मेल नहीं खाता। इच्छा रहती है कि अपना हर एक आचरण ठीक रहे, हर प्रक्रिया सिद्धान्तानुकूल हो, परन्तु अक्सर भूलें होती रहती हैं, साधक कुछ दिन तक सोचता है कि दस बीस दिन में या महीने में यह दूर हो जायेगी और मेरी सम्पूर्ण क्रियायें सिद्धान्ताकूल होने लगेंगी, पर जब काफी समय बीत जाता है और तब भी भूलें समाप्त नहीं होती तो चिन्ता, निराशा और पराजय की भावनाएं मन में घूमने लगती हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 43)

🌹 इन कुरीतियों को हटाया जाय

🔵 60. भूत-पलीत और बलि प्रथा— भूत-पलीतों का मानसिक विभ्रम पैदा करके सयाने दिवाने और ओझा लोग भोली जनता का मानसिक और आर्थिक शोषण बुरी तरह करते हैं। मानसिक रोगों, शारीरिक कष्टों एवं दैनिक जीवन में आती रहने वाली साधारण-सी बातों को भूत की करतूत बना कर व्यर्थ ही भोले लोग भ्रमित होते हैं। उस भ्रम का इतना घातक प्रभाव पड़ता है कि कई बार तो उस प्रकार के विश्वास से जीवन-संकट तक उपस्थित हो जाते हैं।

🔴 धर्म-ग्रन्थों में जिन देवी देवताओं का वर्णन है, उनकी संख्या भी पर्याप्त है। पर उतने से भी सन्तोष न करके लोगों ने जाति-जाति के, वंश-वंश के, गांव-गांव के, इतने अधिक देवता गढ़ लिए हैं कि आश्चर्य होता है। उन पर मुर्गे, अण्डे, भैंसे, बकरे, सुअर आदि चढ़ाते हैं। यह कैसी विडम्बना है कि दया और प्रेम लिए बने हुए देवता अपने ही पुत्र—पशु-पक्षियों का खून पीवें।

🔵 हमें एक परमात्मा की ही उपासना करनी चाहिए और इन भूत-पलीतों के भ्रम जंजाल से सर्वथा दूर रहना चाहिए। जन-समाज को भी इससे बचाना चाहिए।

🔴 और भी अनेकों कुरीतियां विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न रूपों में पाई जाती हैं। हानिकारक और अनैतिक बुराइयों का उन्मूलन करना ही श्रेयस्कर है। सभ्य समाज को विवेकशील ही होना चाहिए और इन उपहासास्पद विडम्बनाओं से जल्दी ही अपने को मुक्त कर लेना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 13)

🌹 तीन दुःख और उनका कारण

🔵 दुःख तीन प्रकार के होते हैं- (1) दैविक, (2) दैहिक, (3) भौतिक। दैविक दुःख वे कहे जाते हैं, जो मन को होते हैं, जैसे चिंता, आशंका, क्रोध, अपमान, शत्रुता, बिछोह, भय, शोक आदि। दैहिक दुःख होते हैं, जो शरीर को होते हैं, जैसे रोग, चोट, आघात, विष आदि के प्रभाव से होने वाले कष्ट। भौतिक दुःख वे होते हैं, जो अचानक अदृश्य प्रकार से आते हैं, जैसे भूकंप, दुर्भिक्ष, अतिवृष्टि, महामारी, युद्ध आदि। इन्हीं तीन प्रकार के दुःखों की वेदना से मनुष्यों को तड़पता हुआ देखा जाता है। यह तीनों दुःख हमारे शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कर्मों के फल हैं। मानसिक पापों के परिणाम से दैविक दुःख आते हैं, शारीरिक पापों के फलस्वरूप दैहिक और सामाजिक पापों के कारण भौतिक दुःख उत्पन्न होते हैं।
         
🔴 दैविक दुःख-  मानसिक कष्ट, उत्पन्न होने के कारण वे मानसिक पाप हैं, जो स्वेच्छापूर्वक तीव्र, भावनाओं से प्रेरित होकर किए जाते हैं, जैसे ईर्ष्या, कृतघ्नता, छल, दंभ, घमण्ड, क्रूरता, स्वार्थपरता आदि। इन कुविचारों के कारण जो वातावरण मस्तिष्क में घुटता रहता है, उससे अंतःचेतना पर उसी प्रकार का प्रभाव पड़ता है, जिस प्रकार के धुएँ के कारण दीवार काली पड़ जाती है या तेल से भीगने पर कपड़ा गंदा हो जाता है। आत्मा स्वभावतः पवित्र है, वह अपने ऊपर इन पाप-मूलक कुविचारों, प्रभावों को जमा हुआ नहीं रहने देना चाहती, वह इस फिक्र में रहती है कि किस प्रकार इस गंदगी को साफ करूँ?

🔵 पेट में हानिकारक वस्तुएँ जमा हो जाने पर पेट उसे कै या दस्त में निकाल बाहर करता है। इसी प्रकार तीव्र इच्छा से, जानबूझ कर किए गए पापों को निकाल बाहर करने के लिए आत्मा आतुर हो उठती है। हम उसे जरा भी जान नहीं पाते, किंतु आत्मा भीतर ही भीतर उसके भार को हटाने के लिए अत्यंत व्याकुल हो जाती है। बाहरी मन, स्थूल बुद्धि को अदृष्य प्रक्रिया का कुछ भी पता नहीं लगता, पर अंर्तमन चुपके ही चुपके ऐसे अवसर एकत्रित करने में लगा रहता है, जिससे वह भार हट जाय। अपमान, असफलता, विछोह, शोक, दुःख आदि यदि प्राप्त होते हों, ऐसे अवसरों को मनुष्य कहीं से एक न एक दिन, किसी प्रकार खींच लाता है, ताकि उन दुर्भावनाओं का, पाप संस्कारों का इन अप्रिय परिस्थितियों में समाधान हो जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 5) 10 Dec

🌹 विभीषिकाओं के पीछे झाँकती यथार्थता

🔴 वैभव को कमाया तो असीम मात्रा में भी जा सकता है, पर उसे एकाकी पचाया नहीं जा सकता। मनुष्य के पेट का विस्तार थोड़ा-सा ही है। यदि बहुत कमा लिया गया है तो उस सब को उदरस्थ कर जाने की ललक-लिप्सा कितनी ही प्रबल क्यों न हो, पर वह सम्भव हो नहीं सकेगी। नियत मात्रा से अधिक जो भी खाया गया है, वह दस्त, उलटी, उदरशूल जैसे संकट खड़े करेगा, भले ही वह कितना ही स्वादिष्ट क्यों न लगे।

🔵 शारीरिक और मानसिक दोनों ही क्षेत्र, भौतिक पदार्थ संरचना के आधार पर विनिर्मित हुए हैं। उनकी भी अन्य पदार्थों की तरह एक सीमा और परिधि है। जीवित रहने और अभीष्ट कृत्यों में निरत रहने के लिए सीमित ऊर्जा, सक्रियता एवं साधन सामग्री ही अभीष्ट है। इसका उल्लंघन करने की ललक तटबन्धों को तोड़कर बहने वाली बाढ़ की तरह अपनी उच्छृंखलता के कारण अनर्थ ही अनर्थ करेगी। उस उन्माद के कारण पानी तो व्यर्थ जाएगा ही, खेत खलिहानों, बस्तियों आदि को भी भारी हानि उठानी पड़ेगी। यों चाहे तो नदी इसे अपने स्वेच्छाचार और अहंकार दर्प-प्रदर्शन के रूप में भी बखान सकती है, पर जहाँ कहीं, जब कभी इस उन्माद की चर्चा चलेगी तब उसकी भर्त्सना ही की जाएगी।

🔴 उपयोग की दृष्टि से थोड़े साधनों में भी भली प्रकार काम चल सकता है, पर अपव्यय की कोई सीमा मर्यादा नहीं। कोई चाहे तो लाखों के नोट इकट्ठे करके उनमें माचिस लगाकर, होली जलाने जैसा कौतूहल करते हुए प्रसन्नता भी व्यक्त कर सकता है, पर इस अपव्यय को कोई भी समझदार न तो सराहेगा और न उसका समर्थन करेगा। बेहद चाटुकार तो कुल्हाड़ियों से अपना पैर काटने के लिए उद्यत अतिवादी की भी हाँ में हाँ मिला सकते हैं।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 29)

🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 किन्तु आतुर व्यक्ति उतावला होता है, इच्छा पूर्ति न होने पर किसी न किसी को दोषी ठहराता है। यह नहीं सोचता कि इसमें अपनी गलती भी हो सकती है और उसे सुधारने के लिए दूसरे उपाय अपनाये जा सकते हैं।

🔴 इच्छा से करने का हर किसी को अधिकार है, पर उसे उतना उतावला नहीं होना चाहिए कि जो चाहा गया है वह नियत अवधि के अन्दर या नियत तरीके से ही पूरा होना चाहिए। अनुकूल अवसर पर इच्छा पूरी या अधूरी मात्रा में पूरी हो सके—इसके लिए धैर्य रखने और प्रतीक्षा करने की आवश्यकता है। परिस्थितियां नहीं बदलतीं तो मनःस्थिति को बदल लेना भी एक उपाय है। संसार में अनेक इच्छित वस्तुयें या परिस्थितियां हैं वे सभी पूरी नहीं होती हैं तो अधीर होने की अपेक्षा यही अच्छा है कि जितना उपलब्ध है उससे ही सन्तोष करें। हर किसी की हर इच्छा तुर्त-फुर्त पूरी होनी ही चाहिए—यह संसार का नियम नहीं है।

🔵 किसी जमाने में तानाशाह ऐसे होते थे जो न्याय या परिस्थितियों पर विचार करने की अपेक्षा अपनी हविश पूरी न होने को ही बढ़ा-चढ़ा अपराध मानते थे और उसके बदले मृत्युदण्ड सुना देते थे। सहकारियों में से किसी की इतनी हिम्मत नहीं होती थी कि उस निर्देश के सम्बन्ध में ननुनच कर सके। ऐसी पूछताछ करने में भी उस अहंकारी का अपमान होता था, वह समय अब नहीं रहा। जिस पर आरोप लगाया गया है उसे अपनी बात कहने, सफाई देने का अवसर दिया जाता है किन्तु अव्यवस्थित व्यक्ति को इतना भी अवसर देने की गुंजाइश नहीं रहती। प्रतिपक्षी को अपराधी ही निश्चित करता है और अपराध के बदले में मृत्युदण्ड से हल्की सजा भी हो सकती? यह वह नहीं सोच पाता कि ऐसा घातक निर्णय कर गुजरने पर अपने ऊपर क्या बीतेगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 29) 10 Dec

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र
🔵 उपरोक्त मंत्र हर गृहस्थ योगी को भली प्रकार हृदयंगम कर लेना चाहिये। दिन में कई बार इस मन्त्र को दुहराना चाहिए। एक छोटे कार्ड पर सुन्दर अक्षरों में लिखकर इस मन्त्र को अपने पास रख लेना चाहिये और जब भी अवकाश मिले एक एक शब्द का मनन करते हुए इस मन्त्र को पढ़ना चाहिये। हो सके तो अक्षरों में लिख कर सुन्दर चित्र की भांति इसे अपने कमरे में लगा लेना चाहिए।

🔴  प्रातः निद्रा त्यागने पर पलंग पर पड़े-पड़े ही कई बार इस मन्त्र को मन ही मन दुहराना चाहिए और निश्चय करना चाहिए कि आज दिन भर इन भावनाओं को अधिक से अधिक मात्रा में सतर्कता पूर्वक ध्यान रखूंगा। इस निश्चय के साथ शय्या त्याग करने का अवसर दिन भर रहता है प्रातःकाल जो आदेश अन्तर्मन को दिये हैं अधिक गहरे उतर जाते हैं, वे जल्दी विस्मरण नहीं होते और यथा अवसर वे ठीक समय पर स्मरण हो आते हैं। इसलिए प्रातःकाल इस मन्त्र का नियमित रूप से अवश्य ही दुहराना चाहिए—

🔵 ‘‘मैं गृहस्थ योगी हूं। मेरा जीवन साधनामय है। दूसरे कैसे हैं क्या करते हैं, क्या सोचते हैं, क्या कहते हैं, इसकी मैं तनिक भी परवाह नहीं करता। अपने आप में सन्तुष्ट रहता हूं, मेरी कर्तव्य पालन की सच्ची साधना इतनी महान है, इतनी शांतिदायिनी, इतनी तृप्तिकारक है कि उसमें मेरी आत्मा आनन्द में सराबोर हो जाती है। मैं अपनी आनन्दमयी साधना को निरन्तर जारी रखूंगा गृह क्षेत्र में परमार्थ भावनाओं के साथ ही काम करूंगा।’’ यह संकल्प दृढ़तापूर्वक मन में जमा रहना चाहिए। जब भी मन विचलित होने लगे, जब भी पैर पीछे डिगने की संभावना प्रतीत हो तभी इस संकल्प को मनोयोग पूर्वक दृढ़ करना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 42)

🌹 इन कुरीतियों को हटाया जाय

🔵 58. मृत्यु-भोज की व्यर्थता— किसी के मरने के बाद उस घर में दो सप्ताह के भीतर विवाह शादियों जैसी दावत का आयोजन होना दिवंगत व्यक्ति के प्रति अपमान है। दावतें तो खुशी में उड़ाई जाती हैं। मृत्यु को शोक का चिन्ह मानते हैं तो फिर दावतों का आयोजन किस उद्देश्य से? मृतक के मित्रों और सम्बन्धियों के लिये भी यही उचित है कि इस क्षति-ग्रस्त परिवार की कोई सहायता न कर सकते हों तो कम-से-कम दावतों की सलाह देकर उसका आर्थिक अहित तो न करें।

🔴 मृतक की आत्मा को शान्ति देने के लिए धार्मिक कृत्य कराये जांय, सहानुभूति प्रकट करने वाले लोग यदि दूर से आये हैं तो वे भी ठहरें, घर, परिवार और सम्बन्धी लोग श्राद्ध के दिन एक चौके में खायें। यहां तक तो बात समझ में आती है। पर बड़े-बड़े मृत्यु भोज सर्वथा असंगत हैं। उनकी न कोई उपयोगिता है और न आवश्यकता। यदि हो सके तो ऐसे शुभ कार्यों में जिनसे मानवता की कोई सेवा होती हो, श्राद्ध के उपलक्ष्य में कितना ही बड़ा दान किया जा सकता है। वही सच्ची श्रद्धा का प्रतीक होने से सच्चा श्राद्ध कहा जा सकता है।

🔵 59. जेवरों में धन की बर्बादी— जेवरों में धन की बर्बादी प्रत्यक्ष है, जो पैसा किसी कारोबार में या ब्याज पर लगने से बढ़ सकता था वह जेवरों में कैद होने पर दिन-दिन घिसता और कैद पड़ा रहता है। टूट-फूट, मजूरी, टांका-बट्टा में काफी हानि सहनी पड़ती है। पहनने वाले का अहंकार बढ़ता है। दूसरों में ईर्ष्या जगती है। चोर लुटेरों को अवसर मिलता है। जिस अंग में उन्हें पहनते हैं वहां दबाव और अस्वच्छता बढ़ने से स्वास्थ्य को हानि पहुंचती है। चमड़ी कड़ी पड़ जाती है और पसीने के छेद बन्द होते हैं। नाक के जेवरों से तो सफाई में भी अड़चन पड़ती है। विवाह शादियों के अवसर पर तो वह एक समस्या बन जाते हैं। दहेज जैसी हानिकारक प्रथा का मूल भी जेवरों में रहता है। लड़की वाले जब तक जेवरों की आवश्यकता अनुभव करेंगे, तब तक लड़के वाले दहेज भी मांगते रहेंगे। जेवरों का शौक हर दृष्टि से हानिकारक है, इसे छोड़ने में ही लाभ है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 12)

🌹 तीन दुःख और उनका कारण

🔵 पिछले पृष्ठों में बताया जा चुका है कि आकस्मिक सुख-दुःख हर व्यक्ति के जीवन में आया करते हैं। इनसे सुर-मुनि, देव-दानव कोई नहीं बचता। भगवान राम तक इस कर्म-गति से छूट न सके। सूरदास ने ठीक कहा है-
कर्मगति टारे नाहि टरे।
गुरु वशिष्ट पण्डित बड़ ज्ञानी, रचि पचि लगन धरै ।
पिता मरण और हरण सिया को, वन में विपति परै।।

          
🔴 वशिष्ट जैसे गुरु के होते हुए भी राम कर्म गति को टाल न सके। उन्हें भी पिता का मरण, सिया का हरण एवं वन की विपत्तियाँ सहन करनी पड़ीं। यह विपत्तियाँ कहीं से अकस्मात् टूट पड़ती हैं या ईश्वर नाराज होकर दुःख-दण्ड देता है, ऐसा समझना ठीक न होगा। ‘पंचाध्यायी’ का निश्चित मत है कि सब प्रकार के दुःख अपने ही बुलाने से आते हैं। रामायण का मत भी इस सम्बन्ध में यही है-
काहु न कोउ दुःख सुखकर दाता।
निज-निज कर्म भोग सब भ्राता।।


🔵 दूसरा कोई भी प्राणी या पदार्थ किसी को दुःख देने की शक्ति नहीं रखता। सब लोग अपने ही कर्मों का फल भोगते हैं और उसी भोग से रोते, चिल्लाते रहते हैं। जीव की पीछे से ऐसी कठोर व्यवस्था बँधी हुई है, जो कर्मों का फल तैयार करती रहती है। मछली पानी में तैरती है, उसकी पूँछ पानी को काटती हुई पीछे-पीछे एक रेखा-सी बनाती चलती है। साँप रेंगता जाता है और रेत पर उसकी लकीर बनती जाती है, जो काम हम करते हैं, उनके संस्कार बनते जाते हैं। बुरे कर्मों के संस्कार स्वयं बोई हुई कँटीली झाड़ी की तरह अपने लिए ही दुःखदायी बन जाते हैं।

🔴 अब हम तीन प्रकार के कर्म, उनके तीन प्रकार के स्वभाव एवं तीन तरह के फल की चर्चा आरम्भ करते हैं। सुख तो मनुष्य की स्वाभाविक स्थिति है। सुकर्म करना स्वभाव है, इसलिए सुख प्राप्त करना भी स्वाभाविक ही है। कष्ट दुःख में होता है। दुःख से ही लोग डरते-घबराते हैं, उसी से छुटकारा पाना चाहते हैं। इसलिए दुःखों का ही विवेचन यहाँ होना उचित है। आरोग्यवर्द्धक शास्त्र और चिकित्सा-शास्त्र दो अलग-अलग शास्त्र हैं। इसी प्रकार सुख-दुःख के भी दो अलग विज्ञान हैं। सुख-वृद्धि के लिए धर्माचरण करना चाहिए जैसे कि स्वास्थ्य वृद्धि के लिए पौष्टिक पदार्थों का सेवन किया जाता है। दुःख निवृत्ति के लिए, रोग का निवारण करने के लिए उसका निदान और चिकित्सा जानने की आवश्यकता है। कर्म की गहन गति की जानकारी प्राप्त करने से दुःखों का मर्म समझ में आता है। दुःखों के कारण को छोड़ देने से सहज ही दुःखों से निवृत्ति हो जाती है। आइए, अब हम दुःखों का स्वरूप आपके सामने रखने का प्रयत्न करें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 9 Dec 2016


👉 सतयुग की वापसी (भाग 4)

🌹 लेने के देने क्यों पड़ रहे हैं? 

🔴 आश्चर्य इस बात का है कि आखिर यह सब हो क्यों रहा है एवं कैसे हो रहा है? इसे कौन करा रहा है? आखिर वह चतुराई कैसे चुक गई, जो बहुत कुछ पाने का सरंजाम जुटाकर अलादीन का नया चिराग जलाने चली थी। पहुँचना तो उसे प्रकृति विजय के लक्ष्य तक था, पर यह हुआ क्या कि तीनों लोक तीन डगों में नाप लेने की दावेदारी, करारी मोच लगने पर सिहरकर बीच रास्ते में ही पसर गई। उसे भी आगे कुआँ पीछे खाई की स्थिति में आगे पग बढ़ाते नहीं बन रहा है। साँप-छछून्दर की इस स्थिति से कैसे उबरा जाए, जिसमें न निगलते बन रहा है और न उगलते।  

🔵 फूटे घड़े में पानी भरने पर वह देर तक ठहरता नहीं है। चलनी में दूध दुहने पर दुधारू गाय पालने वाला भी खिन्न-विपन्न रहता है। ऐसी ही कुछ भूल मनुष्य से भी बन पड़ी है, जिसके कारण अत्यन्त परिश्रमपूर्वक जुटाई गई उपलब्धियों को हस्तगत करने पर भी, लेने के देने पड़ रहे हैं, परन्तु स्मरण रहे कि असमंजस की स्थिति लम्बे समय तक टिकती नहीं है। मनुष्य की बुद्धि इतनी कमजोर नहीं है कि वह उत्पन्न संकटों का कारण न खोज सके और शान्तचित्त होने पर उनके समाधान न खोज सके।  

🔴 बड़प्पन को कमाना ही पर्याप्त नहीं होता, उसे सुस्थिर रखने और सदुपयोग द्वारा लाभान्वित होने के लिए और समझदारी, सतर्कता और सूझबूझ चाहिए। भाव-संवेदनाओं से भरे-पूरे व्यक्ति ही उस रीति-नीति को समझते हैं, जिनके आधार पर सम्पदाओं का सदुपयोग करते बन पड़ता है। अपने समय के लोग इन्हीं भाव-संवेदनाओं का महत्त्व भूल बैठे और उन्हें गिराते-गँवाते चले जा रहे हैं। यही है वह कारण, जो उपलब्धियों को भी विपत्तियों में परिणत करके रख देता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेम, पवित्रता, क्षमा और सद्भावना

🔵 हजरत मोहम्मद जब भी नमाज पढ़ने मस्जिद जाते तो उन्हें नित्य ही एक वृद्धा के घर के सामने से निकलना पड़ता था। वह वृद्धा अशिष्ट, कर्कश और क्रोधी स्वभाव की थी। जब भी मोहम्मद साहब उधर से निकलते, वह उन पर कूड़ा-करकट फेंक दिया करती थी। मोहम्मद साहब बगैर कुछ कहे अपने कपड़ों से कूड़ा झाड़कर आगे बढ़ जाते। प्रतिदिन की तरह जब वे एक दिन उधर से गुजरे तो उन पर कूड़ा आकर नहीं गिरा। उन्हें कुछ हैरानी हुई, किंतु वे आगे बढ़ गए।

🔴 अगले दिन फिर ऐसा ही हुआ तो मोहम्मद साहब से रहा नहीं गया। उन्होंने दरवाजे पर दस्तक दी। वृद्धा ने दरवाजा खोला। दो ही दिन में बीमारी के कारण वह अत्यंत दुर्बल हो गई थी। मोहम्मद साहब उसकी बीमारी की बात सुनकर हकीम को बुलाकर लाए और उसकी दवा आदि की व्यवस्था की। उनकी सेवा और देखभाल से वृद्धा शीघ्र ही स्वस्थ हो गई।

🔵 अंतिम दिन जब वह अपने बिस्तर से उठ बैठी तो मोहम्मद साहब ने कहा- अपनी दवाएं लेती रहना और मेरी जरूरत हो तो मुझे बुला लेना। वृद्धा रोने लगी। मोहम्मद साहब ने उससे रोने का कारण पूछा तो वह बोली, मेरे र्दुव्‍यवहार के लिए मुझे माफ कर दोगे? वे हंसते हुए कहने लगे- भूल जाओ सब कुछ और अपनी तबीयत सुधारो। वृद्धा बोली- मैं क्या सुधारूंगी तबीयत? तुमने तबीयत के साथ-साथ मुझे भी सुधार दिया है। तुमने अपने प्रेम और पवित्रता से मुझे सही मार्ग दिखाया है। मैं आजीवन तुम्हारी अहसानमंद रहूंगी।

🔴 जिसने स्वयं को प्रेम, क्षमा व सद्भावना में डुबोकर पवित्र कर लिया, उसने संत-महात्माओं से भी अधिक प्राप्त कर लिया।

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 28)

🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 मस्तिष्कीय ज्वर की भांति ही आवेश एक ऐसी उत्तेजना है जो पैर पटकने, सिर धुनने की तरह कुछ न कुछ अनर्थ करके ही विराम लेता है। आवेशग्रस्त व्यक्ति परिस्थितियों को अपने अनुकूल-अनुरूप ही देखना चाहता है, पर यह व्यवहार में संभव नहीं। हर व्यक्ति की अपनी स्वतन्त्र प्रकृति और विचारधारायें हैं। इसी प्रकार परिस्थितियां अनेक उलझनों के बीच निकलती हुई अपना ढांचा बनाती हैं, उन पर इतना अधिकार किसी का नहीं कि इच्छा मात्र से अनुकूलन को आमंत्रित कर सके और उसे सदा वशवर्ती बनाये रह सके।

🔴 आतुर व्यक्ति में इतना धैर्य नहीं होता कि वह परिस्थितियों की अनुकूलता के लिए आवश्यक चिंतन या प्रयास कर सके। वह किसी तानाशाह की तरह तुरन्त अपनी इच्छा या आकांक्षा को कार्यान्वित होते देखना चाहते हैं, पर चाहने भर से आकांक्षा की पूर्ति कहां होती है।

🔵 होना यह चाहिए कि व्यक्ति धैर्य रखे और तालमेल बिठाने के उपाय करे। इच्छित परिस्थितियों के बिना काम चलाये अथवा इतना धैर्य रखे कि परिवर्तन में जो समय लगे उसकी प्रतीक्षा बन पड़े। उत्तेजना को यह समझ करके भी शान्त किया जा सकता है कि संसार केवल हमारी ही इच्छा के अनुरूप चलने के लिए नहीं बनाया गया है, उनके साथ और भी कितने ही प्रयोजन जुड़े हुए हैं। उनमें से जितनी सुविधायें जब मिल सकें तब तक के लिए धैर्य रखना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 28)

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र

🔵 गृहस्थ योग के साधक के मन में यह विचारधारा चलती रहनी चाहिये कि— ‘‘यह परिवार मेरा स्थान क्षेत्र है। इस वाटिका को सब प्रकार सुन्दर, सुरभित और पल्लवित बनाने के लिये सच्चे हृदय से सदा शक्ति भर प्रयत्न करते रहना मेरा कर्मकाण्ड है। भगवान ने जिस वाटिका को सींचने का भार मुझे दिया है, उसे ठीक तरह सींचते रहना मेरी ईश्वर परायणता है। घर का कोई भी सदस्य ऐसा हीन दर्जे का नहीं है जिसे मैं तुच्छ समझूं, उपेक्षा करूं या सेवा से जी चुराऊं, मैं मालिक, नेता, मुखिया या कमाऊं होने का अहंकार नहीं करता यह मेरा आत्म निग्रह है।

🔴 हर एक सदस्य के विकास में अपनी सेवाएं लगाते रहना मेरा परमार्थ है। बदले की जरा सी भी इच्छा न रखकर विशुद्ध कर्तव्य भाव से सेवा में तत्पर रहना मेरा आत्म त्याग है। अपनी सुख-सुविधाओं की परवाह न करते हुए, औरों को सुख सुविधा बढ़ाने का प्रयत्न करना मेरा तप है। घर के हर सदस्य को सद्गुणी, सत् स्वभाव का, सदाचारी एवं धर्म परायण बना कर विश्व की सुख शान्ति में वृद्धि करना मेरा यज्ञ है। सबके हृदयों पर जिसका मौन उपदेश हो, अनुकरण से सुसंस्कार बनें, अपना आचरण ऐसा पवित्र एवं आदर्शमय रखना मेरा व्रत है।

🔵  धर्म उपार्जित अन्न से जीवन निर्वाह करना और कराना यह मेरा संयम है। प्रेम उदारता सहानुभूति की भावना से ओत-प्रोत रहना और रखना, प्रसन्नता, आनन्द और एकता की वृद्धि करना मेरी आराधना है। मैं अपने गृह-मन्दिर में भगवान की चलती फिरती प्रतिमाओं के प्रति अगाध भक्ति भावना रखता हूं। सद्गुण, सत् स्वभाव और सत् आचरण के दिव्य श्रृंगार से इन प्रतिमाओं को सुसज्जित करने का प्रयत्न ही मेरी पूजा है। मेरा साधन सच्चा है, साधना के प्रति मेरी भावना सच्ची है, अपनी आत्मा के सम्मुख मैं सच्चा हूं। सफलता असफलता की जरा भी परवाह न करके सच्चे निष्काम कर्मयोगी की भांति मैं अपने प्रयत्न की सचाई में संतोष अनुभव करता हूं। मैं सत्य हूं, मेरी साधना सत्य है। मैंने सत्य का आश्रय ग्रहण किया है उसे सत्यता पूर्वक निबाहने का प्रयत्न करूंगा।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 41)

🌹 इन कुरीतियों को हटाया जाय

🔵 56. बाल विवाह और अनमेल विवाह— बाल विवाहों की भर्त्सना की जाय और उनकी हानियां जनता को समझाई जाय। स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन, आगामी पीढ़ी एवं जीवन विकास के प्रत्येक क्षेत्र पर इनका बुरा असर पड़ता है। लड़की-लड़के जब तक गृहस्थ का उत्तरदायित्व अपने कंधों पर संभालने लायक न हों तब तक उनके विवाह नहीं होने चाहिए। इस संबंध में जल्दी करना अपने बालकों का भारी अहित करना ही है। अशिक्षित और निम्न स्तर के लोगों में अभी भी बाल विवाह का बहुत प्रचलन है। उन्हें समझाने-बुझाने से या कानूनी भय बता कर इस बुराई से विरत करना चाहिए। अनमेल विवाहों को भी रोका जाना और उनके विरुद्ध वातावरण बनाना आवश्यक है।

🔴 57. भिक्षा व्यवसाय की भर्त्सना— समर्थ व्यक्ति के लिये भिक्षा मांगना उसके आत्म गौरव और स्वाभिमान के सर्वथा विरुद्ध है। आत्म गौरव खोकर मनुष्य पतन की ओर ही चलता है। खेद है कि भारतवर्ष में यह वृत्ति बुरी तरह बढ़ी है और उसके कारण असंख्य लोगों का मानसिक स्तर अधोगामी बना है।

🔵 जो लोग सर्वथा अपंग असमर्थ हैं, जिनके परिजन या सहायक नहीं, उनकी आजीविका का प्रबन्ध सरकार को या समाज के दान-संस्थानों को स्वयं करना चाहिए, जिससे इन अपंग लोगों को बार-बार हाथ पसार कर अपना स्वाभिमान न खोना पड़े और बचे हुए समय में कोई उपयोगी कार्य कर सकें। अच्छा हो ऐसी अपंग संस्थाएं जगह-जगह खुल जांय और उदार लोग उन्हीं के माध्यम से वास्तविक दीन-दुखियों की सहायता करें।

🔴 बहानेबाज समर्थ लोगों को भिक्षा नहीं देनी चाहिए। इससे आलस और प्रमाद बढ़ता है, जनता को अनावश्यक भार सहना पड़ता है और आडम्बरी लोग दुर्गुणों से ग्रस्त होकर तरह-तरह से जनता को ठगते एवं परेशान करते हैं। भजन का उद्देश्य लेकर चलने वालों के लिए भी यही उचित है कि वे अपनी आजीविका स्वयं कमायें और बाकी समय में भजन करें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 11)

🌹 आकस्मिक सुख-दुःख

🔵 सही बात को न समझने के कारण लोगों के हृदयों में ऐसे ऊटपटाँग विश्वास घर जमा लेते हैं। अनेक व्यक्ति तो भाग्य की वेदी पर कर्तव्य की बलि चढ़ा देते हैं। उनका विश्वास होता है कि इस जीवन में भी हानि-लाभ होगा, वह भाग्य के अनुसार होगा। अब जो कर्म किए जा रहे हैं, उनका फल अगले जन्म में भले मिले, पर यह जीवन तो प्रारब्ध के रस्सों में ही जकड़ा हुआ है। जब उपाय करने, प्रयत्न या उद्योग करने की बात चलती है, तो वे यही कहते हैं कि जो भाग्य में लिखा होगा सो होगा, ब्रह्मा की लकीर को कौन मेट सकता है, जो ईश्वर को करनी होगी वह होकर रहेगी, होनी बड़ी प्रबल है, इन शब्दों का प्रयोग वास्तव में इसलिए है कि जब आकस्मिक दुर्घटना पर अपना वश नहीं चलता और अनहोने प्रसंग सामने आ खड़े होते हैं। तो मनुष्य का मस्तिष्क बड़ा विक्षुब्ध, किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है।
          
🔴 सामने कोई दोषी तो दिखाई नहीं पड़ता पर आघात लगने के कारण रोष आता ही है। आवेश में बुद्धि ठिकाने नहीं रहती, सम्भव है कि वह दोष किसी निर्दोष पर बरस पड़े और अनर्थ उपस्थित कर दे इसलिए उस क्षोभ को शांत करके किसी प्रकार संतोष धारण किया जाता है, परंतु हम देखते हैं कि आज अनेक व्यक्ति उस आपत्तिकाल के मन समझाव को कर्तव्य के ऊपर कुल्हाड़ी की तरह चलाते हैं। होते-होते यह लोग उद्योग के विरोधी हो जाती हैं और अजगर और पक्षी की उपमा देकर भाग्य के ऊपर निर्भर रहते हैं, यदि यह सज्जन बड़े-बूढ़े हुए तो अपने प्रभाव से निकटवर्ती अल्पज्ञान वाले तरुणों और किशोरों को भी इसी भाग्यवाद की निराशा के दलदल में डाल देते हैं।

🔵  पाठक समझ गये होंगे कि आकस्मिक घटनाओं के वास्तविक कारण की जानकारी न होने से कैसी-कैसी अनर्थकारक ऊटपटांग धारणाएँ उपजती हैं और वे लोगों के मनों में जब गहरी घुस बैठती हैं, तो जीवन प्रवाह को उलटा, विकृत एवं बेहूदा बना देती हैं। मनुष्य जाति ‘कर्म की गहन गति’ को चिरकाल से जानती है और उसके उन कारणों को जानने के लिए चिरकाल से प्रयत्न करती रही है। उसके कई हल भी अब तक तत्त्वदर्शियों ने खोज निकाले हैं। पंचाध्यायीकार ने उपरोक्त श्लोक में ‘गहना कर्मणोगति’ पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि यह दैविक, दैहिक और भौतिक घटनाएँ, तीन प्रकार के आकस्मिक सुख-दुःख, संचित, प्रारब्ध और क्रियमान कर्मों के आधार पर होते हैं। दूध एक नियत समय में एक विशेष प्रक्रिया द्वारा दही या घी बन जाता है। इसी प्रकार त्रिविध कर्म भी तीन प्रकार के फलों को उत्पन्न करतें हैं। वे आकस्मिक घटनाएँ किस प्रकार उत्पन्न करते हैं, इसका पूरा, विस्तृत एवं वैज्ञानिक विवेचन आगे करेगें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/chir.3

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 8 Dec 2016


👉 सतयुग की वापसी (भाग 3) 8 Dec

🌹 लेने के देने क्यों पड़ रहे हैं? 

🔴 यहाँ उपलब्धियों, आविष्कारों के सदुपयोग-दुरुपयोग की विवेचना नहीं की जा रही है, यह स्पष्ट है कि इन दिनों विभिन्न क्षेत्रों में जो प्रगति हुई वह असाधारण एवं अभूतपूर्व है। विकास विस्तार तो हर भले-बुरे उपक्रम पर लागू हो सकता है। इन अर्थों में आज की प्रगतिशीलता की दावेदारी को स्वीकार करना ही पड़ता है। फिर भी एक प्रश्न सर्वथा अनसुलझा ही रह जाता है कि यह तथाकथित प्रगति, अपने साथ दुर्गति के असंख्यों बवण्डर क्यों और कैसे घसीटती, बटोरती चली जा रही है?

🔵 प्रदूषण, युद्धोन्माद, खाद्य-संकट अपराधों की वृद्धि आदि समस्याएँ समस्त तटबन्ध तोड़ती चली जा रही हैं। अस्वस्थता, दुर्बलता, कलह, विग्रह, छल-प्रपञ्च जैसे दोष, व्यवहार तथा चिन्तन को धुआँधार विकृतियों से भरते क्यों चले जा रहे हैं? निकट भविष्य के सम्बन्ध में मूर्द्धन्य विचारक यह भविष्यवाणी कर रहे हैं कि स्थिति यही रही, रेल इसी पटरी पर चलती रही, तो विपन्नता बढ़ते-बढ़ते महाप्रलय जैसी स्थिति में पहुँचा सकती है। वे कहते हैं कि हवा और पानी में विषाक्तता इस तेजी से बढ़ रही है कि उसे धीमी गति से सर्वभक्षी आत्महत्या का नाम दिया जा सकता है।
🔴 बढ़ता हुआ तापमान यदि ध्रुवों की बरफ पिघला दे और समुद्र में भयानक बाढ़ ला दे तो उससे थल निवासियों के लिए डूब मरने का संकट उत्पन्न कर सकता है। वनों का कटना, रेगिस्तान का द्रुतगामी विस्तार, भूमि की उर्वरता का ह्रास, खनिजों के बेतरह दोहन से उत्पन्न हुआ धरित्री असन्तुलन, मौसमों में आश्चर्यजनक परिवर्तन, तेजाबी मेघ वर्षण, अणु विकिरण, बढ़ती हुई जनसंख्या के अनुरूप जीवनसाधन न बढ़ पाने का संकट जैसे अनेकानेक जटिल प्रश्न हैं। इनमें से किसी पर भी विचार किया जाए तो प्रतीत होता है कि तथाकथित प्रगति ही उन समस्त विग्रहों के लिए पूरी तरह उत्तरदायी है। वह प्रगति किस काम की, जिसमें एक रुपया कमाने के बदले सौ का घाटा उठाना पड़े।
 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 27)

🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा. जे. एस्टर ने क्रोध से पीड़ित मनःस्थिति का अध्ययन किया तथा यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि ‘पन्द्रह मिनट के क्रोध से शरीर की जितनी शक्ति नष्ट हो जाती है उससे व्यक्ति नौ घण्टे तक कड़ी मेहनत करने में समर्थ हो सकता है, इसके अतिरिक्त क्रोध शरीर सौष्ठव को भी नष्ट करता है। भरी जवानी में बुढ़ापे का लक्षण, आंखों के नीचे चमड़ी का काला होना, आंखों में लाल रेखाओं का उद्भव तथा शरीर में जहां-तहां नीली नसों का उभरना क्रोध के ही परिणाम है।’

🔴 न्यूयार्क के वैज्ञानिकों ने चूहों के ऊपर एक प्रयोग किया है। उसमें क्रोधी मनुष्य के रक्त को चूहे के शरीर में डाला गया तथा उसके परिणामों का अध्ययन किया गया। 22 मिनट के उपरान्त ही चूहे में आक्रोश का भाव देखा गया, वह मनुष्य को काटने दौड़ा। लगभग 35 मिनट बाद उसने स्वयं को ही काटना शुरू किया और अन्ततः एक घण्टे के बाद मर गया।

🔵 वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि क्रोध के कारण विषाक्तता उत्पन्न होती है जो पाचन-शक्ति के लिए अत्यन्त खतरनाक सिद्ध होता है। क्रोधी स्वभाव की माताओं का दूध भी विषाक्त पाया गया है, उससे बच्चे के पेट में मरोड़ की शिकायत उत्पन्न होती है तथा कभी-कभी तो अधिक विषाक्तता के कारण बच्चे की मृत्यु तक हो जाती है। आमतौर से आत्महत्या की घटनायें भी क्रोध से ही अभिप्रेरित होती हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 27) 8 Dec

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र

🔵 यदि गृहस्थ बन्धन कारक, नरक मय होता तो उससे पैदा होने वाले बालक पुण्यमय कैसे होते। बड़े बड़े योगी यती इस मार्ग को क्यों अपनाते? निश्चय ही गृहस्थ धर्म एक पवित्र, आत्मोन्नति कारक, जीवन को विकसित करने वाला, धार्मिक अनुष्ठान है, एक सत् समन्वित आध्यात्मिक साधना है। गृहस्थ का पालन करने वाले व्यक्ति को ऐसी हीन भावना मन में लाने की कुछ भी आवश्यकता नहीं हैं कि वह अपेक्षाकृत नीचे स्तर पर है या आत्मिक क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है या कमजोर है। अविवाहित जीवन और विवाहित जीवन में तत्वतः कोई अन्तर नहीं है।

🔴 यह अपनी-अपनी सुविधा, रुचि और कार्य प्रणाली की बात है, जिसे जिसमें सुविधा पड़ती हो वह वैसा करे। जिसका कार्यक्रम देशाटन का हो उन्हें स्त्री बच्चों का झंझट पालने की आवश्यकता नहीं परन्तु जिन्हें एक स्थान पर रहना हो उसके लिये विवाहित होने में ही सुविधा है। इसमें पिछड़े हुए और बढ़े हुए की कुछ चीज नहीं, दोनों का दर्जा बिल्कुल बराबर है। मानसिक स्थिति और कार्य प्रणाली के आधार पर तुच्छता और महानता होती है। जहां भी ऊंचा दृष्टिकोण होगा वहां ही महानता होगी।

🔵 जीवन का परम लक्ष आत्मा को परमात्मा में मिला लेना है, व्यक्तिगत स्वार्थ को प्रधानता न देते हुए लोकहित की भावना से काम करना, यही आध्यात्मिक साधना है। इस साधना को क्रियात्मक जीवन में लाने के लिए भिन्न भिन्न तरीके हो सकते हैं। इन तरीकों में से एक तरीका गृहस्थ योग भी है। बालक, घर  में से ही आरम्भिक क्रियाएं सीखता है। जीवन के लिये जितने काम चलाऊ ज्ञान की आवश्यकता है उसका आधे से अधिक भाग घर में ही प्राप्त होता है।

🔴 हमारी सात्विक साधना भी घर से ही प्रारंभ होनी चाहिये। जीवन को उच्च, उन्नत, संस्कृत, संयमित, सात्विक, सेवामय एवं परमार्थ पूर्ण बनाने की सबसे अच्छी प्रयोगशाला अपना घर ही हो सकता है। स्वाभाविक प्रेम, उत्तरदायित्व, कर्तव्य पालन, परस्पर अवलम्बन, आश्रय, स्थान, स्थिर क्षेत्र, लोक लाज आदि अनेक कारणों से यह क्षेत्र ऐसा सुविधाजनक हो जाता है कि आत्मत्याग और सेवामय दृष्टिकोण के साथ काम करना इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत अधिक सरल होता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 40)

🌹 इन कुरीतियों को हटाया जाय

🔵 54. अश्लीलता का प्रतिकार— अश्लील साहित्य, अर्ध-नग्न युवतियों के विकारोत्तेजक चित्र, गन्दे उपन्यास, कामुकता भरी फिल्में, गन्दे गीत, वेश्यावृत्ति, अमर्यादित कामचेष्टाएं, नारी के बीच रहने वाली शील संकोच मर्यादा का व्यक्ति-क्रम, दुराचारों की भोंड़े ढंग से चर्चा, आदि अनेक बुराइयां अश्लीलता के अन्तर्गत आती हैं। इनसे दाम्पत्य-जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ता है और शरीर एवं मस्तिष्क खोखला होता है। शारीरिक व्यभिचार की तरह यह मानसिक व्यभिचार भी मानसिक एवं चारित्रिक संतुलन को बिगाड़ने में दावाग्नि का काम करता है। उसका प्रतिकार किया जाना चाहिए। ऐसे चित्र, कलेण्डर, पुस्तकें, मूर्तियां तथा अन्य उपकरण हमारे घरों में न रहें जो अपरिपक्व मस्तिष्कों में विकार पैदा करें। शाल और शालीनता की रक्षा के लिए उनकी विरोधी बातों को हटाया जाना ही उचित है।

🔴 55. विवाहों में अपव्यय— संसार के सभी देशों और धर्मों के लोग विवाह शादी करते हैं, पर इतनी फिजूलखर्ची कहीं नहीं होती, जितनी हम लोग करते हैं। इससे आर्थिक सन्तुलन नष्ट होता है, अधिक धन की आवश्यकता उचित रीति से पूरी नहीं हो सकती तो अनुचित मार्ग अपनाने पड़ते हैं। इन खर्चों के लिए धन जोड़ने के प्रयत्न में परिवार की आवश्यक प्रगति रुकती है, अहंकार बढ़ता है तथा कन्याएं माता पिता के लिए भार रूप बन जाती हैं। विवाहों का अनावश्यक आडम्बरों से भरा हुआ और खर्चीला शौक बनाये रहना सब दृष्टियों से हानिकारक और असुविधाजनक है।

🔵 दहेज की प्रथा तो अनुचित ही नहीं अनैतिक भी है। कन्या-विक्रय, वर-विक्रय का यह भोंड़ा प्रदर्शन है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस प्रथा के कारण कितनी कन्याओं को अपना जीवन नारकीय बनाना पड़ता है और कितने ही अभिभावक इसी चिन्ता में घुल-घुल कर मरते हैं। इस हत्यारी प्रथा का जितना जल्दी काला मुंह हो सके उतना ही अच्छा है।

🔴 विचारशील लोगों का कर्तव्य है कि वे इस दिशा में साहसपूर्ण जन-नेतृत्व करें। उन रूढ़ियों को तिलांजलि देकर अत्यन्त सादगी से विवाह करें। परम्पराओं से डर कर—उपहास के भय से ही अनेक लोग साहस नहीं कर पाते, यद्यपि वे मन से इस फिजूलखर्ची के विरुद्ध होते हैं। ऐसे लोगों का मार्ग-दर्शन उनके सामने अपना उदाहरण प्रस्तुत करके ही किया जा सकता है। युग-निर्माण परिवार के लोग अपने ही विचारों के वर कन्या तथा परिवार ढूंढ़ें और सादगी के साथ आदर्श विवाहों का उदाहरण प्रस्तुत करें, इससे हिन्दू समाज की एक भारी समस्या हल हो सकेगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 10)

🌹 आकस्मिक सुख-दुःख

दैविकं दैहिकं चापि भौतिकं च तथैव हि।
आयाति स्वयमाहूतो दुःखानामेष संचयः।।   
            
-पंचाध्यायी
(दैविकं) दैविक (अपि च) और (दैहिकं) दैहिक (तथैव च) उसी प्रकार (च) और (भौतिकं) भौतिक (दुखानां) दुःखों का (एष) यह (संचयः) समूह (स्वयमाहूतः) अपने आप बुलाया हुआ (आयाति) आता है।

🔵 अनेक बार ऐसे अवसर आ उपस्थित होते हैं जो प्राकृतिक नियमों के बिल्कुल विपरीत दिखाई देते हैं। एक मनुष्य उत्तम जीवन बिताता है, पर अकस्मात् उसके ऊपर ऐसी विपत्ति आ जाती है मानो ईश्वर किसी घोर दुष्कर्म का दण्ड दे रहा हो। एक मनुष्य बुरे से बुरे कर्म करता है, पर वह चैन की वंशी बजाता है, सब प्रकार के सुख-सौभाग्य उसे प्राप्त होते हैं। एक निठल्ले को लॉटरी में, जुआ में या कहीं गढ़ा हुआ धन मिल जाता है, किंतु दूसरा अत्यंत परिश्रमी और बुद्धिमान मनुष्य अभाव में ही ग्रसित रहता है। एक व्यक्ति स्वल्प परिश्रम में ही बड़ी सफलता प्राप्त कर लेता है, दूसरा घोर प्रयत्न करने और अत्यंत सही तरीका पकड़ने पर भी असफल रहता है। ऐसे अवसरों पर ‘प्रारब्ध’, ‘भाग्य’ आदि शब्दों का प्रयोग होता है। इसी प्रकार महामारी, बीमारी, अकाल मृत्यु, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बिजली गिरना, भूकंप, बाढ़ आदि दैवी प्रकोप भी भाग्य, प्रारब्ध कहे जाते हैं। आकस्मिक दुर्घटनाएँ, मानसिक आपदा, वियोग आदि वे प्रसंग जो टल नहीं सकते, इसी श्रेणी में आ जाते हैं।
          
🔴  यह ठीक है कि ऐसे प्रसंग कम आते हैं, प्रयत्न से उलटा फल होने को आकस्मित घटना घटित हो जाने के अपवाद चाहे कितने ही कम क्यों न हों, पर होते जरूर हैं और वे कभी-कभी ऐसे कठोर होते हैं कि उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। ऐसे अवसरों पर हम में से साधारण श्रेणी के ज्ञान रखने वाले बहुत ही भ्रमित हो जाते हैं और ऐसी-ऐसी धारणा बना लेते हैं, जो जीवन के लिए बहुत ही घातक सिद्ध होती है। कुछ लोग तो ईश्वर पर अत्यंत कुपित होते हैं। उसे दोषी ठहराते हैं और भरपूर गालियाँ देते हैं, कई तो नास्तिक हो जाते हैं, कहते हैं कि हमने ईश्वर का इतना भजन-पूजन किया पर उसने हमारी कुछ भी सहायता नहीं की, ऐसे ईश्वर को पूजना व्यर्थ है, कई महामानव लाभ की इच्छा से साधु-संत, देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। यदि संयोगवश इसी बीच में कुछ हानिकर प्रसंग आ गए, तो उस पूजा के स्थान पर निंदा करने लगते हैं।

🔵 ऐसा भी देखा गया है कि ऐसे आकस्मिक प्रसंग आने के समय ही यदि घर में कोई नया प्राणी आया हो, कोई पशु खरीदा हो, बालक उत्पन्न हुआ हो, नई बहू आई हो, तो उस घटना का दोष या श्रेय उस नवागंतुक प्राणी पर थोप दिया जाता है। यह नया बालक बड़ा भाग्यवान् हुआ जो जन्मते ही इतना लाभ हुआ, यह बहू बड़ी अभागी आई कि आते ही सत्यानाश कर दिया, इस श्रेयदान या दोषारोपण के कारण कभी-कभी घर में ऐसे दुःखदायी क्लेश-कलह उठ खड़े होते हैं कि उनका स्मरण होते ही रोमांच हो जाता है। हमारे परिचित एक सज्जन के घर में नई बहू आई, उन्हीं दिनों घर का एक जवान लड़का मर गया। इस मृत्यु का दोष बेचारी नई बहू पर पड़ा, सारा घर यही तानाकसी करता-‘यह बड़ी अभागी आई है, आते ही एक बलि ले ली।’ कुछ दिन तो इस अपमान को बेचारी निर्दोष लड़की विष के घूँट की तरह पीती रही, पर जब हर वक्त का अपमान, घरवालों का नित्यप्रति का दुर्व्यवहार सहन न कर सकी, तो मिट्टी का तेल छिड़क कर जल मरी। बेचारी निरपराध विधवाओं को अभागी, कलमुँही, डायन की उपाधि मिलने का एक आम रिवाज है। इसका कारण भाग्यवाद के सम्बन्ध में मन में जमी हुई अनर्थमूलक धारणा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/aakas

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 9)

🌹 चित्रगुप्त का परिचय

🔵 इस सम्बन्ध में एक और महत्त्वपूर्ण बात जान लेने की है कि हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग कानून व्यवस्था है। रिश्वत के मामले में एक चपरासी, एक क्लर्क, एक मजिस्ट्रेट तीन आदमी पकड़े जाएँ, तो तीनों को अलग-अलग तरह की सजा मिलेगी। सम्भव है चपरासी को डाँट-डपट सुना कर ही छुटकारा मिल जाय, पर मजिस्ट्रेट बर्खास्त हुए बिना नहीं रह सकता, क्योंकि उसकी बड़ी जिम्मेदारी है। एक असभ्य भील शिकार मारकर पेट पालता है, अपराध उसका भी है, परंतु अहिंसा का उपदेश करने वाला पंडित यदि चुपचाप बूचर दुकान में जाता है, तो पंडित को उस भील की अपेक्षा अनेक गुणा पाप लगेगा। कारण यह है कि ज्ञान वृद्धि करता हुआ जीव जैसे-जैसे आगे बढ़ता चलता है, वैसे ही वैसे उसकी अंतःचेतना अधिक स्वच्छ हो जाती है।
          
🔴 मैले कपड़े पर थोड़ी-सी धूल पड़ जाय, तो उसका कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता, परंतु दूध के समान स्वच्छ धुले हुए कपड़े पर जरा सा धब्बा लग जाए, तो वह दूर से ही चमकता है और बहुत बुरा मालूम पड़ता है। छोटा बच्चा कपड़ों पर टट्टी फिर देता है, पर उसे कोई बुरा नहीं कहता और न बच्चे को कुछ शर्म आती है, किंतु यदि कोई जवान आदमी ऐसा कर डाले, तो उसे बुरा कहा जाएगा और वह खुद भी लज्जित होगा। बच्चे और बड़े ने आचरण एक-सा किया, पर उसके मानसिक विकास में अंतर होने के कारण बुराई की गिनती कम-ज्यादा की गई। इसी प्रकार अशिक्षित, अज्ञानी, असभ्य व्यक्ति को कम पाप लगता है। ज्ञान वृद्धि के साथ-साथ भला-बुरा समझने की योग्यता बढ़ती जाती है, सत्-असत् का कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेक प्रबल होता जाता है, अंतःकरण की पुकार जोरदार भी बनती है, इस प्रकार आत्मोन्नति के साथ-साथ सदाचरण की जिम्मेदारी भी बढ़ती जाती है।

🔵 हुकुम-उदली करने पर मामूली चपरासी को सौ रुपया जुर्माना हो जाता है, परंतु फौजी अफसर हुक्म-अदूली करे, तो कोर्ट मार्शल द्वारा गोली से शूट कर दिया जाएगा। ज्ञानवान, विचारवान और भावनाशील हृदय वाले व्यक्ति जब दुष्कर्म करते हैं, तो उनका चित्रगुप्त उस करतूत को बहुत भारी पाप की श्रेणी में दर्ज कर देता है। गौदान से लोग वैतरणी पार कर जाते हैं। पर राजा नृप जैसा विवेकवान थोड़ी गलती करने पर ही नरक में जा पहुँचा। अज्ञानी व्यक्ति अपराध करे तो यह उतना महत्त्व नहीं रखता, किंतु कर्तव्यच्युत ब्राह्मण तो घोर दण्ड का भागी बनता है। राजा बनना सब दृष्टियों में अच्छा है, पर राजा की जिम्मेदारी भी सबसे ऊँची है। ज्ञानवानों का यह कठोर उत्तरदायित्व है कि सदाचार पर दृढ़ रहें, अन्यथा सात मंजिल ऊँची छत पर से गिरने वाले को जो कष्ट होता है, उन्हें भी वही दुःख होगा।

कर्मों का फल किस प्रकार मिलता है? पाठकों को यह रहस्य भी आगे के लेखों में समझाया जाएगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/chir.3

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 39)

🌹 इन कुरीतियों को हटाया जाय

🔵 53. नर-नारी का भेदभाव— जातियों के बीच बरती जाने वाली ऊंच-नीच की तरह पुरुष और स्त्री के बीच रहने वाली ऊंच-नीच की भावना निन्दनीय है। ईश्वर के दाहिने बांये अंगों की तरह नर-नारी की रचना हुई है। दोनों का स्तर और अधिकार एक है। इसलिए सामाजिक न्याय और नागरिक अधिकार भी दोनों से एक होने चाहिए। प्राचीन काल में था भी ऐसा ही। तब नारी भी नर के समान ही प्रबुद्ध और विकसित होती थी। नई पीढ़ियों की श्रेष्ठता कायम रखने तथा सामाजिक स्तर की उत्कृष्टता बनाये रखने में उसका पुरुष के समान ही योगदान था।

🔴 आज नारी की जो स्थिति है वह अमानवीय और अन्यायपूर्ण है। उसके ऊपर पशुओं जैसे प्रतिबन्धों का रहना और सामान्य नागरिक अधिकारों से वंचित किया जाना भारतीय धर्म की उदारता, महानता और श्रेष्ठता को कलंकित करने के समान है। पुरुषों के लिए भिन्न प्रकार की और स्त्रियों के लिए भिन्न प्रकार की न्याय-व्यवस्था रहना अनुचित है। दाम्पत्य-जीवन में सदाचार का दोनों पर समान प्रतिबन्ध होना चाहिए। शिक्षा और स्वावलम्बन के लिए दोनों को समान अवसर मिलने चाहिए।

🔵 पुत्र और पुत्रियों के बीच बरते जाने वाले भेद-भाव को समाप्त करना चाहिए। दोनों को समान स्नेह, सुविधा और सम्मान मिले। पिछले दिनों जो अनीति नारी के साथ बरती गई है उसका प्रायश्चित यही हो सकता है कि नारी को शिक्षित और स्वावलम्बी बन सकने में उचित योग्यता प्राप्त करने का अधिकाधिक अवसर प्रदान किया जाय। सरकार ने पिछड़े वर्गों को संविधान में कुछ विशेष सुविधाएं दी है, ताकि वे अपने पिछड़ेपन से जल्दी छुटकारा प्राप्त कर सकें। सामाजिक न्याय के अनुसार नारी को शिक्षा और स्वावलम्बन की दिशा में ऐसी ही विशेष सुविधा मिलनी चाहिए ताकि उनका पिछड़ापन अपेक्षाकृत जल्दी ही प्रगति में बदल सके।

🔴 पर्दा प्रथा उस समय चली जब यवन लोग बहू-बेटियों पर कुदृष्टि डालते और उनका अपहरण करते थे। अब वैसी परिस्थितियां नहीं रहीं तो पर्दा भी अनावश्यक हो गया। यदि उसे जरूरी ही समझा जाय तो स्त्रियों की तरह पुरुष भी घूंघट किया करें! क्योंकि चारित्रिक पतन के सम्बन्ध में नारी की अपेक्षा नर ही अधिक दोषी पाये जाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 26) 7 Dec

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र
🔵 पिछले पृष्ठों पर बताया जा चुका है कि परमार्थ और स्वार्थ, पुण्य और पाप, धर्म, अधर्म यह किसी कार्य विशेष पर निर्भर नहीं, वरन् दृष्टिकोण पर अवलम्बित है। दुनिया का स्थूल बुद्धि-कार्यों का रूप देखकर उसकी अच्छाई-बुराई का निर्णय करती हैं परन्तु परमात्मा के दरबार में काम के बाहरी रूप का कुछ महत्व नहीं वहां तो भावना ही प्रधान है। भावना का आरोपण मनुष्य की आन्तरिक पवित्रता से सम्बन्धित है। बनावट, धोखेबाज और प्रवंचना बाहर तो चल सकती है पर अपनी आत्मा के सामने नहीं चल सकती।

🔴 अन्तःकरण स्वयमेव जान लेता है कि अमुक कार्य किस दृष्टिकोण से किया जा रहा है, वहां कोई छिपाव या दुराव काम नहीं दे सकता। वरन् जो बात सत्य है वह ही मनोभूमि में स्वच्छ पट्टिका पर स्पष्ट रूप से अंकित होती है। जिस कार्य प्रणाली के द्वारा अन्तःकरण में आत्म-त्याग, सेवा, प्रेम एवं सद्भाव का संचार होता हो वह कार्य सच्चा और पक्का परमार्थ है। वह कार्य निस्संदेह स्वर्ग और मुक्ति की ओर ले जाने वाला होगा, चाहे उस कार्य का बाह्य रूप कैसा ही साधारण या असाधारण, सीधा या विचित्र, छोटा या बड़ा क्यों न हो।

🔵 गृहस्थ संचालन के सम्बन्ध में भी दो दृष्टिकोण हैं। एक तो ममता, मालिकी, अहंकार और स्वार्थ का, दूसरा आत्म-त्याग, सेवा, प्रेम और परमार्थ का। पहला दृष्टिकोण बन्धन, पतन, पाप और नरक की ओर ले जाने वाला है। दूसरा दृष्टिकोण मुक्ति, उत्थान, पुण्य और स्वर्ग को प्रदान करता है। शास्त्रकारों ने, सन्त पुरुषों ने, जिस गृहस्थ की निन्दा की है, बन्धन बताया है और छोड़ देने का आदेश दिया है वह आदेश स्वर्ग मय दृष्टिकोण के सम्बन्ध में है। परमार्थ मय दृष्टिकोण का गृहस्थ तो अत्यन्त उच्चकोटि का आध्यात्मिक साधना है। उसे तो प्रायः सभी ऋषि, मुनि, महात्मा, योगी, यती, तथा देवताओं ने अपनाया है और उसकी सहायता से आत्मोन्नति का मार्ग प्रशस्त किया है। इस मार्ग को अपनाने से उनमें से न तो किसी को बन्धन में पड़ना पड़ा और न नरक में जाना पड़ा

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 26) 7 Dec

🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 जिसके साथ मतभेद हुआ या विवाद चला है, उसके ऊपर एकाएक बरस पड़ने से गुत्थी सुलझती नहीं वरन् और भी अधिक उलझ जाती है। लड़ पड़ना किसी को अपना प्रत्यक्ष शत्रु बना लेना है और इस बात के लिए उत्तेजित करना है कि वह भी बदले में वैसा ही अपमानजनक व्यवहार करे। आक्रोश और प्रतिशोध का एक कुचक्र है जो सहज ही टूटता नहीं।

🔴 क्रोध करके हम दूसरे को कितनी क्षति पहुंचा सके, दबाव देकर अपनी मनमर्जी किस हद तक पूरी कर सके—यह कहना कठिन है, पर इतना निश्चित है कि उससे अपना रक्त-मांस जलने से लेकर मानसिक संतुलन गड़बड़ाने जैसी कितनी ही हानियां तत्काल होती हैं। गलती किसी की कुछ भी क्यों न हो, पर जब दर्शक किसी को आप से बाहर होते देखते हैं तो उसी को दोषी मानते हैं। जो अपनी शालीनता गंवा चुका उसके साथ किसी को सहानुभूति नहीं हो सकती। इस प्रकार क्रोधी कारण विशेष पर उत्तेजित होते हुए भी अपने आपको अकारण अपराधी बना लेता है।

🔵 दार्शनिक सोना का मत है कि ‘‘क्रोध शराब की तरह मनुष्य को विचार शून्य और लकवे की तरह शक्तिहीन कर देता है। दुर्भाग्य की तरह यह जिसके पीछे पड़ता है उसका सर्वनाश ही करके छोड़ता है।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...