सोमवार, 5 दिसंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 24) 5 Dec

  🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 क्रोध होने पर मनुष्य का ज्ञान नष्ट हो जाता है। क्रोधाक्रान्त मनुष्य यह नहीं समझ पाता कि वह क्या कह रहा है और क्या कर रहा है। क्रोध में आकर लोग अधिकतर अपनी ही हानि कर लेते हैं। दो परस्पर विरोधी व्यक्तियों में जो अपेक्षाकृत अधिक शान्त और संतुलित रहता है वही जीतता है। बुद्धिमान लोग अपने शत्रु को क्रोध से नहीं, शांति से नष्ट करते हैं। क्रोधी व्यक्ति जब एक बार किसी एक से क्रुद्ध हो जाता है तब उसका सन्तुलन यहां तक बिगड़ जाता है कि वह अन्य असम्बंधित व्यक्तियों से भी क्रोधपूर्ण व्यवहार एवं वार्ता करने लगता है और इस प्रकार और भी विरोधी बना लिया करता है।

🔴 क्रोधी व्यक्ति जब किसी पर क्रुद्ध होकर उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाता तो अपने पर क्रोध करने लगता है, अपने को दण्ड देने और अपनी ही हानि करने लगता है। क्रोध मनुष्य को पागल की स्थिति में पहुंचा देता है। बुद्धिमान और मनीषी व्यक्ति क्रोध का कारण उपस्थित होने पर भी क्रोध का आक्रमण अपने पर नहीं होने देते। वे विवेक का सहारा लेकर उस अनिष्टकर आवेग पर नियंत्रण कर लेते हैं और इस प्रकार संभावित हानि से बच जाते हैं।

🔵 प्रचेता एक ऋषि के पुत्र थे। स्वयं भी साधन थे, वेद-वेदांग के ज्ञाता थे, संयम और नियम से रहते थे। दिन-अनुदिन तप संचय कर रहे थे किन्तु उनका स्वभाव बड़ा क्रोधी था, जब-तब इससे हानि भी उठाते थे, किन्तु न जाने वे अपनी इस दुर्बलता को दूर क्यों नहीं करते थे। इसकी उपेक्षा करने से होता यह था कि एक लम्बी साधना से जो आध्यात्मिक शक्ति प्रचेता संचय करते थे वह किसी कारण से क्रोध करके नष्ट कर लेते थे। इसलिए साधना में रत रहते हुए भी वे उन्नति के नाम पर यथास्थान ही ठहरे रहते थे। होना तो यह चाहिए था कि अपनी प्रगति के इस अवरोध का कारण खोजते और उसको दूर करते, लेकिन वे स्वयं पर ही इस अप्रगति से क्रुद्ध रहा करते थे। अस्तु एक मानसिक तनाव बना रहने से वे जरा-जरा सी बात पर उत्तेजित हो उठते थे।

🌹 *क्रमशः जारी*
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 5 Dec 2016


रविवार, 4 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 1)

🌹 सार-संक्षेप  

🔴 इस सदी की समापन वेला में अब तक हुई प्रगति के बाद एक ही निष्कर्ष निकलता है कि संवेदना का स्रोत तेजी से सूखा है, मानवी अन्तराल खोखला हुआ है। भाव-संवेदना जहाँ जीवन्त-जाग्रत् होती है, वहाँ स्वत: ही सतयुगी वातावरण विनिर्मित होता चला जाता है। भाव-संवेदना से भरे-पूरे व्यक्ति ही उस रीति-नीति को समझ पाते हैं, जिसके आधार पर सम्पदाओं का, सुविधाओं का सदुपयोग बन पाता है।

🔵 समर्थता, कुशलता और सम्पन्नता की आए दिनों जय-जयकार होती देखी जाती है। यह भी सुनिश्चित है कि इन्हीं तीन क्षेत्रों में फैली अराजकता ने वे संकट खड़े किए हैं, जिनसे किसी प्रकार उबरने के लिए व्यक्ति और समाज छटपटा रहा है। इन तीनों से ऊपर उठकर एक चौथी शक्ति है— भाव-संवेदना यही दैवी अनुदान के रूप में जब मनुष्य की स्वच्छ अन्तरात्मा पर उतरती है तो उसे निहाल बनाकर रख देती है। इस एक के आधार पर ही अनेकानेक दैवी तत्त्व उभरते चले जाते हैं।

🔴 सतयुग की वापसी इसी संवेदना के जागरण, करुणा के उभार से होगी। बस एक ही विकल्प इन दिनों है— भाव-संवेदना का जागरण। उज्ज्वल भविष्य का यदि कोई सुनिश्चित आधार है तो वह एक ही है कि जन-जन की भाव संवेदनाओं को उत्कृष्ट, आदर्श और उदात्त बनाया जाए। इसी से यह विश्व उद्यान हरा-भरा फला-फूला व सम्पन्न बन सकेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 3 दिसंबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 36)


🌹 सभ्य समाज की स्वस्थ रचना
🔵 50. श्रम का सम्मान— श्रम का सम्मान बढ़ाया जाय। बौद्धिक श्रम करने वालों को धन और श्रम अधिक मिलता है और शारीरिक श्रमिकों को हेय दृष्टि से देखा जाता है। इस दृष्टिकोण में परिवर्तन होना चाहिए। शारीरिक श्रम एवं श्रमिकों को भी उचित सम्मान मिले। राजा जनक ने हल जोतकर अपनी जीविका कमाने का आदर्श रखा था और नसीरुद्दीन बादशाह टोपियां सींकर तथा कुरान लिखकर अपना गुजारा करता था।

🔴 हमारे समाज में सफाई करने वाले, कपड़े बुनने वाले, जूता बनाने वाले, कपड़े धोने वाले, इमारतें चिनने वाले, बोझा ढोने वाले, मजूरी करने वाले लोग इसीलिए नीच और अछूत माने गये कि वे शारीरिक श्रम करते हैं। थोड़ा-सा अपना बोझ ले चलने में बेइज्जती अनुभव करना आज के शिक्षित एवं सम्पन्न कहे जाने वाले लोगों का स्वभाव बन गया है। ऐसे लोगों की स्त्रियां भोजन बनाने, बर्तन मांजने, झाड़ू लगाने, बिस्तर बिछाने जैसे कामों में बेइज्जती समझती और इन छोटे-छोटे कामों के लिए नौकर चाहती हैं। अमीर लोग जूतों और कपड़े पहनने काम तक नौकरों से कराते हैं। इस प्रकार की प्रवृत्तियां किसी भी समाज के पतन का करण होती हैं।

🔵 श्रम का सम्मान घटने से इस ओर लोगों की अरुचि हो जाती है। आरामतलबी को श्रेय मिले तो सभी वैसा बनना चाहेंगे। प्रगति से सहयोग मिलता है, पर उसको साकार रूप तो श्रम से ही मिलता है। इसलिए श्रमिक को प्रोत्साहन भी मिलना चाहिए और सम्मान भी। हम में से हर व्यक्ति को शारीरिक दृष्टि से भी श्रमिक जैसी अपनी स्थिति और मनोभूमि बनानी चाहिए। सामाजिक प्रगति का बहुत कुछ आधार ‘श्रम के सम्मान’ पर निर्भर है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 *गृहस्थ-योग (भाग 23) 4 Dec*

🌹 *गृहस्थ योग से परम पद*

🔵 इन प्रश्नों की मीमांसा करते हुए पाठकों को यह बात भली प्रकार हृदयंगम कर लेनी चाहिए कि— पुण्य का पैसे से कोई सम्बन्ध नहीं है। पुण्य तो भावना से खरीदा जाता है। आध्यात्मिक क्षेत्र में रुपयों की तूती नहीं बोलती वहां तो भावना की प्रधानता है। दम्भ, अहंकार, नामवरी, वाहवाही, पूजा, प्रतिष्ठा के प्रदर्शन के लिए धर्म के नाम पर करोड़ रुपये खर्च करने पर भी उतना पुण्य फल नहीं मिल सकता जितना कि आत्म-त्याग, श्रद्धा एवं सच्चे अन्तःकरण से रोटी का एक टुकड़ा देने पर प्राप्त होता है।

🔴 स्मरण रखिये—सोने की सुनहरी चमक और चांदी के मधुर चमचमाहट आत्मा को ऊंचा उठाने में कुछ विशेष सहायक नहीं होती। आत्मिक क्षेत्र में गरीब और अमीर का दर्जा बिल्कुल बराबर है, वहां उसके पास समान वस्तु है—समान साधन है। भावना हर अमीर गरीब को प्राप्त है, उसी की अच्छाई बुराई के ऊपर पुण्य-पाप की सारी दारोमदार है। घटनाओं का घटाटोप, चौंधिया देने वाला प्रदर्शन, बड़े-बड़े कार्यों के विराट आयोजन रंगीन बादलों से बने हुए आकाश चित्रों की भांति मनोरंजक तो हैं पर उनका अस्तित्व कुछ नहीं।

🔵 सच्चे हृदय से किये हुए एक अत्यन्त छोटे और तुच्छ दीखने वाले कार्य का जितना महत्व है उतना दम्भपूर्ण किये हुए बड़े भारी आयोजन का किसी प्रकार नहीं हो सकता। ‘‘भावना की सच्चाई और सात्विकता के साथ आत्म-त्याग और कर्तव्य पालन’’ यही धर्म का पैमाना है। इस भावना से प्रेरित होकर काम करना ही पुण्य है। सद्भावना जितनी ही प्रबल होगी आत्म-त्याग उतना ही बड़ा होगा। पैसे वाला अपने पैसे को लगावेगा, जी खोलकर सत्कार्य में लगावेगा, इसी प्रकार गरीब के पास जो साधन हैं उसको ईमानदारी के साथ खर्च करेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
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👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 23) 4 Dec

🌹 दुष्टता से निपटें तो किस तरह?
🔵  कोई समय था जब शासन, समाज, न्याय-व्यवस्था आदि का कोई उचित प्रबन्ध नहीं था। उस आदिमकाल में प्रतिद्वन्दियों से भी स्वयं ही भुगतना पड़ता था। यह पिछले काल की व्यवस्था थी, अब हम विकसित समाज में रह रहे हैं और यहां न्यायालयों का भी हस्तक्षेप है। अनीति की रोकथाम के लिए पुलिस का ढांचा बना हुआ है और आक्रमण किस स्तर का था? किन परिस्थितियों में बन पड़ा? इसका पर्यवेक्षण करने की गुंजाइश है, भले ही वह प्रक्रिया दोषपूर्ण हो और उसे सुधारने में समय लगे तो भी धैर्य रखना चाहिए और कानून अपने हाथ में लेने का बर्बर तरीका अपनाने की अपेक्षा, न्याय का निर्देश और समाजगत यश-अपयश के सहारे ही काम चला लेना चाहिए।

🔴  क्षमा का समर्थन यहां सिद्धांत के रूप में नहीं किया जा रहा है। किसी को अपने कृत्य पर वास्तविक पश्चात्ताप हो और भविष्य में वैसा न कर गुजरने का कोई स्पष्ट कारण हो तो क्षमा की भी अपनी उपयोगिता है, वह समर्थों द्वारा दुर्बलों पर किया गया अहसान है। किन्तु यदि आक्रान्त अपने को सबल समझकर आक्रामकता अपना रहा है तो क्षमा की बात करना दुष्ट की दुष्टता को बढ़ाना और संसार में अनीति का अधिक विस्तार होने की संभावना को अधिकाधिक प्रबल बनाना है। उसका उपचार क्षमा के नाम पर कायरता अपनाने से नहीं हो सकता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (अन्तिम भाग)

 
🌞  चौथा अध्याय
🌹  एकता अनुभव करने का अभ्यास

🔴  दीक्षितों को इस चेतना में जग जाने के लिए हम बार-बार अनुरोध करेंगे, क्योंकि 'मैं क्या हूँ?' इस सत्यता का ज्ञान प्राप्त करना सच्चा ज्ञान है। जिसने सच्चा ज्ञान प्राप्त कर लिया है, उसका जीवन प्रेम, दया, सहानुभूति, सत्य और उदारता से परिपूर्ण होना चाहिए। कोरी कल्पना या पोथी-पाठ से क्या लाभ हो सकता है? सच्ची सहानुभूति ही सच्चा ज्ञान है और सच्चे ज्ञान की कसौटी, उसका जीवन व्यवहार में उतारना ही हो सकता है।

🌹 इस पाठ के मंत्रः

🔵  1- मेरी भौतिक वस्तुएँ महान् भौतिक तत्त्व की एक क्षणिक झाँकी हैं।

🔴  2- मेरी मानसिक वस्तुएँ अविच्छिन्न मानस तत्त्व का एक खण्ड हैं।

🔵  3- भौतिक और मानसिक तत्त्व निर्बाध गति से बह रहे हैं, इसलिए मेरी वस्तुओं का दायरा सीमित नहीं। समस्त ब्रह्माण्डों की वस्तुएँ मेरी हैं।

🔴  4- अविनाशी आत्मा परमात्मा का अंश है और अपने विशुद्घ रूप में वह परमात्मा ही है।

🔵  5- मैं विशुद्घ हो गया हूँ, परमात्मा और आत्मा की एकता का अनुभव कर रहा हूँ।


🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/book/Main_Kya_Hun/v4
 

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 4 Dec 2016


शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 3 Dec 2016


👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 47)

🌞  चौथा अध्याय
🌹  एकता अनुभव करने का अभ्यास

🔴  अपने शारीरिक और मानसिक वस्त्रों के विस्तार की भावना दृढ़ होते ही संसार तुम्हारा और तुम संसार के हो जाओगे। कोई वस्तु विरानी न मालूम पड़ेगी। यह सब मेरा है या मेरा कुछ भी नहीं, इन दोनों वाक्यों में तब तुम्हें कुछ भी अन्तर मालूम न पड़ेगा। वस्त्रों से ऊपर आत्मा को देखो- यह नित्य, अखण्ड, अजर, अमर, अपरिवर्तनशील और एकरस है। वह जड़, अविकसित, नीच प्राणियों, तारागणों, ग्रहों, समस्त ब्रह्माण्डों को प्रसन्नता और आत्मीयता की दृष्टि से देखता है। विराना, घृणा करने योग्य, सताने के लायक या छाती से चिपका रखने के लायक कोई पदार्थ वह नहीं देखता।

🔵  अपने घर और पक्षियों के घोंसले के महत्त्व में उसे तनिक भी अन्तर नहीं दीखता। ऐसी उच्च कक्षा का प्राप्त हो जाना केवल आध्यात्मिक उन्नति और ईश्वर के लिए ही नहीं वरन् संसारिक लाभ के लिए भी आवश्यक है। इस ऊँचे टीले पर खड़ा होकर आदमी संसार का सच्चा स्वरूप देख सकता है और यह जान सकता है कि किस स्थिति में, किससे क्या बर्ताव करना चाहिए? उसे सद्गुणों का पुञ्ज, उचित क्रिया, कुशलता और सदाचार सीखने नहीं पड़ते, वरन् केवल यही चीजें उसके पास शेष रह जाती हैं और वे बुरे स्वभाव न जाने कहाँ विलीन हो जाते हैं, जो जीवन को दुःखमय बनाये रहते हैं।

🔴  यहाँ पहुँचा हुआ स्थित-प्रज्ञ देखता है कि सब अविनाशी आत्माएँ यद्यपि इस समय स्वतंत्र, तेज स्वरूप और गतिवान प्रतीत होती हैं, तथापि उनकी मूल सत्ता एक ही है, विभिन्न घटों में एक ही आकाश भरा हुआ है और अनेक जलपात्रों में एक ही सूर्य का प्रतिबिम्ब झलक रहा है। यद्यपि बालक का शरीर पृथक् है, परन्तु उसका सारा भाग माता-पिता के अंश का ही बना है। आत्मा सत्य है, पर उसकी सत्यता परमेश्वर है। विशुद्ध और मुक्त आत्मा परमात्मा है, अन्त में आकर यहाँ एकता है। वहीं वह स्थिति है, जिस पर खड़े होकर जीव कहता है- 'सोऽहमस्मि' अर्थात् वह परमात्मा मैं हूँ और उसे अनुभूति हो जाती है कि संसार के सम्पूर्ण स्वरूपों के नीचे एक जीवन, एक बल, एक सत्ता, एक असलियत छिपी हुई है।

🌹 अगले अंक में समाप्त
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part4

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 22) 3 Dec

🌹 दुष्टता से निपटें तो किस तरह?

🔵  चिकित्सक वही बुद्धिमान माना जाता है जो रोग को मारे किन्तु रोगी को बचा ले। रोग और रोगी को साथ-साथ ही मार डालने का काम तो कोई गंवार ही कर सकता है। किन्तु मनुष्य जीवन असामान्य है, उसमें सृष्टा की सर्वोत्तम कलाकृति का नियोजन हुआ है। हो सकता है कि उसमें कुछ दोष-दुर्गुण किसी कारण घुस पड़ें, पर वह जन्मजात रूप से वैसा नहीं है। प्रकृतितः वह वैसा नहीं है। सृष्टा ने अपनी अनेक विशेषतायें भी दी हैं, ऐसी दशा में किसी को भी पूर्णतया हेय या दुष्ट नहीं माना जा सकता। मनुष्य को दुष्टता के ढांचे में ढालने का कुकृत्य हेय-दर्शन द्वारा ही होता है।

🔴  कुकृत्यों के लिए मूलतः कुविचार ही उत्तरदायी हैं और वे किसी के भी अन्तराल से नहीं निकलते, दूत की तरह बाहर से लगते हैं। संक्रामक रोगों की तरह उनका आक्रमण होता है—इस विपर्यय की यदि समय रहते रोकथाम हो सके तो मनुष्य की मौलिक श्रेष्ठता अक्षुण्ण ही बनी रह सकती है अथवा यदि वह मलेरिया की तरह चढ़ ही दौड़े तो उसे कड़वी कुनैन पिलाने भर से काम चल सकता है। इस अधिक उपयोगी और कारगर प्रक्रिया के रहते उस घृणा का उपयोग क्यों किया जाय जो शीतल जल की तरह विद्वेष को घटाने के काम नहीं आती वरन् ईंधन डालने की तरह आग को और बढ़ाती है।

🔵  कई बार मनुष्य इतना विद्वेषी नहीं होता जितना कि वह घृणा का तिरस्कार सहकर उद्धत हो उठता है और अपेक्षाकृत अधिक बड़ा प्रतिशोध लेने की चेष्टा करता है, जो एक तक ही सीमित न रहकर अनेकों को अपनी चपेट में लेता है। संसार में पहले से ही विद्वेष की कमी नहीं, उसे और अधिक भड़काने की अपेक्षा यह अधिक उपयुक्त है कि रोग को ही मरने दिया जाय। रोगी तो अच्छा होने पर उससे भी अधिक अच्छा सिद्ध हो सकता है जितना कि पिछले दिनों बुरा रह चुका है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 *गृहस्थ-योग (भाग 22) 3 Dec*

🌹  *गृहस्थ योग से परम पद*

🔵  अब दूसरी ओर चलिये किसी आदमी द्वारा भूल से, मजबूरी से, या गैर जानकारी से कोई अनुचित बात हो जाती है और जानकारी होने पर पता चलता है तो उस अनुचित बात के लिये भी क्षमा कर दिया जाता है। अदालतें भी अपराधी की नीयत पर मुख्यतया ध्यान रखती है। यदि अपराधी की नीयत बुरी न साबित हो तो अपराधी को कठोर दंड का भागी नहीं बनना पड़ता।

🔴  जीवन के हर एक काम की अच्छाई, बुराई कर्ता की भावना के अनुरूप होती है जीवन भले ही सादा हो पर यदि विचार उच्च हैं तो जीवन भी उच्च ही माना जायेगा। रुपये-पैसे या काम के बड़े आडम्बर से पुण्यफल का विशेष सम्बन्ध नहीं है। एक अमीर आदमी रुपये के बल से बड़े-बड़े ब्रह्मभोज, पाठ-पूजा, तीर्थ-यात्रा, कथा-पुराण, मन्दिर-मठ, कुआं-बावड़ी, सदावर्त, यज्ञ-हवन आदि की व्यवस्था आसानी से कर सकता है।

🔵  दस लाख रुपया अनुचित रीति से कमा कर दस हजार रुपया इस प्रकार के कार्यों में लगाकर धर्मात्मा बनता है। दूसरी ओर एक गरीब आदमी जो ईमानदारी की मेहनत मजदूरी करता है, वह थोड़े से पैसे कमाता है जिससे कुटुम्ब का भरण-पोषण कठिनाई से हो पाता है बचता कुछ नहीं, ऐसी दशा में वह बेचारा भला ब्रह्मभोज, तीर्थ-यात्रा, यज्ञ अनुष्ठान आदि की व्यवस्था किस प्रकार कर पावेगा? यदि वह नहीं कर पाता है तो क्या वह धर्महीन ही रह जायेगा? क्या दुनिया की भौतिक चीजों की भांति ही पुण्यफल भी रुपयों से ही खरीदा जाता है?

🌹  क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 35)

🌹 सभ्य समाज की स्वस्थ रचना

🔵 49. कंजूसी और विलासिता छूटे— धन का अनावश्यक संग्रह करने और देश के मध्यम स्तर से अधिक ऊंचा रहन-सहन बनाने को निरुत्साहित किया जाना चाहिए। इससे व्यक्तियों में अनेक दोष उत्पन्न होते हैं और सामाजिक स्तर गिरता है। लोग कमावें तो सही पर उसका न्यूनतम उपयोग अपने लिए करके शेष को समाज के लिए लौटा दें। समाज में जब कि अनेक दीन-दुःखी, अभावग्रस्त और पिछड़े हुए व्यक्ति भरे पड़े हैं, अनेकों समस्याएं समाज को परेशान कर रही हैं, इन सब की उपेक्षा करके अपने लिए अनावश्यक संग्रह करते जाना मानवीय आदर्श के प्रतिकूल है।

🔴 सन्तान को सुशिक्षित और सुयोग्य बनाने के लिए प्रयत्न करना उचित है पर उनको बैठे-ठाले, ब्याज भाड़े की कमाई पर निकम्मी जिन्दगी काटने की व्यवस्था सोचना भारी भूल है। इससे सन्तान का अहित होता है। कई व्यक्ति संतान न होने पर अपने धन को लोकहित के कामों में न लगा कर झूठी सन्तान ढूंढ़ते हैं, दूसरों के बच्चों को गोद रख कर बहकावा खड़ा करते हैं और उसी को जमा की हुई पूंजी देते हैं। ऐसी संकीर्णता जब तक बनी रहेगी समाज कभी पनपेगा नहीं।

🔵 कमाई को लोकहित में लगाने का गर्व और गौरव अनुभव कर सकने की प्रवृत्ति को जगाया जाना आवश्यक है। लोग उदार और दानी बनेंगे तो ही सत्प्रवृत्तियों का उत्पन्न होना और बढ़ाना सम्भव होगा। कंजूसी को घृणित पाप और विलासिता को पाषाण हृदयों के योग्य निष्ठुरता माना जाय, ऐसा लोक शिक्षण करना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 2 Dec 2016


👉 *मैं क्या हूँ? What Am I?* (भाग 45)

🌞  चौथा अध्याय
🌹  एकता अनुभव करने का अभ्यास
🔴  ध्यानास्थित होकर भौतिक जीवन प्रवाह पर चित्त जमाओ। अनुभव करो कि समस्त ब्रह्माण्डों में एक ही चेतना शक्ति लहरा रही है, उसी के समस्त विकार भेद से पंचतत्त्व निर्मित हुए हैं। इन्द्रियों द्वारा जो विभिन्न प्रकार के सुख-दुःखमय अनुभव होते हैं, वह तत्त्वों की विभिन्न रासायनिक प्रक्रिया हैं, जो इन्द्रियों के तारों से टकराकर विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न प्रकार की झंकारें उत्पन्न करती हैं। समस्त लोकों का मूल शक्ति तत्त्व एक ही है और उसमें 'मैं' भी उसी प्रकार गति प्राप्त कर रहा हूँ जैसे दूसरे। यह एक साझे का कम्बल है, जिसमें लिपटे हुए हम सब बालक बैठे हैं। इस सच्चाई को अच्छी तरह कल्पना में लाओ, बुद्घि को ठीक-ठीक अनुभव करने, समझने और हृदय को स्पष्टतः अनुभव करने दो।

🔵  स्थूल भौतिक पदार्थों की एकता का अनुभव करने के बाद सूक्ष्म मानसिक तत्त्व की एकता की कल्पना करो। वह भी भौतिक द्रव्य की भाँति एक ही तत्त्व है। तुम्हारा मन महामन की एक बूँद है। जो ज्ञान और विचार मस्तिष्क में भरे हुए हैं, वह मूलतः सार्वभौम ज्ञान और विचारधारा के कुछ परमाणु हैं और उन्हें पुस्तकों द्वारा, गुरु-मुख द्वारा या ईथर-आकाश में बहने वाली धाराओं से प्राप्त किया जाता है।

🔴  यह भी एक अखण्ड गतिमान शक्ति है और उसका उपयोग वैसे ही कर रहे हो, जैसे नदी में पड़ा हुआ कछुआ अविचल गति से बहते हुए जल-परमाणुओं में से कुछ को पीता है और फिर उसी में मूत्र रूप में त्याग देता है। इस सत्य को भी बराबर हृदयंगम करो और अच्छी तरह मानस-पटल पर अंकित कर लो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part4

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 21) 2 Dec

🌹 *दुष्टता से निपटें तो किस तरह?*
🔵  व्यक्ति पत्थर का नहीं—मिट्टी का, मोम का है। उसे तर्कों या भावनाओं से प्रभावित करके बदला जा सकता है। यहां तक कि धातुओं को गलाकर भी उसके उपकरण ढाले जा सकते हैं, पत्थर से भी प्रतिमायें गढ़ी जा सकती हैं। इसलिए यह मान बैठना उपयुक्त नहीं कि परिस्थितियों में परिवर्तन न होगा और जिन व्यक्तियों से आज घृणा की जा रही है वे अगले दिनों सुधरने या अनुकूल बनने की स्थिति में न होंगे। वाल्मीकि, अंगुलिमाल, अजामिल जैसे बुरे व्यक्ति जब अच्छे बन सकते हैं तो कोई कारण नहीं कि जो प्रतिकूलता आज है वह भविष्य में अनुकूलता में न बदल सकेगी।

🔴  यहां किसी को समदर्शी होने की अव्यवहारिक दार्शनिक भूल-भुलैयों में नहीं भटकाया जा रहा है और न यह कहा जा रहा है कि सन्त और दुष्ट की समान सम्मान के साथ आरती उतारी जाय। व्याघ्र-भेड़ियों में, सर्प-बिच्छुओं में एक ही आत्मा विद्यमान मानकर साष्टांग दण्डवत् करते रहने की बात भी यहां नहीं कही जा रही है। बुराई को रोकने और भलाई को बढ़ाने का सिद्धांत जब तक जीवित है तब तक समदर्शी रहने की आशा चन्द्र-सूर्य जैसे देवताओं से तो की जा सकती है, पर विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न प्रकार का उपाय अपनाने का धर्म सिद्धान्त ही मनुष्य के व्यवहार में आ सकता है।

🔵  क्या बिना घृणा किये किसी को बदला-सुधारा जा सकता है? इसका उत्तर हां में दिया जा सकता है। गांधीजी का सत्याग्रह आन्दोलन, प्रह्लाद का असहयोग इसी आधार पर सफल हुआ था, उसमें बिना प्रतिहिंसा के ही काम चल गया था। रोगी को बचाना और रोग को मारना—यह गलत सिद्धांत नहीं है। यह पूर्णतया शक्य है, कठिन इसलिए प्रतीत होता है, क्योंकि उसका प्रयोग-अभ्यास करने का अवसर हमें मिला नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 गृहस्थ-योग (भाग 21) 2 Dec

🌹  गृहस्थ योग से परम पद

🔵  यदि कोई आदमी साधारण काम करता है। मामूली व्यक्तियों की तरह जीवन यापन करता है, किन्तु उन साधारण कार्यों में भी उद्देश्य, मनोभाव और विचार ऊंचे रखता है तो वह साधारण काम भी तपस्या जैसा पुण्य फलदायक हो जाता है। यहीं तक नहीं—बल्कि यहां तक भी होता है कि बाहर से दिखने वाले अधर्म युक्त कार्य भी यदि सद्भावना से किये जाते हैं तो वे भी धर्म बन जाते हैं। जैसे हिंसा करना, किसी के प्राण लेना, हत्या या रक्तपात करना प्रत्यक्ष पाप है। परन्तु आततायी, दुष्ट और दुरात्माओं से संसार की रक्षा करने की सद्भावना से यदि दुष्टों को मारा जाता है तो वह पाप नहीं वरन् पुण्य बन जाता है।

🔴  भगवान कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के लिए प्रोत्साहित करके हजारों मनुष्यों को मरवा डाला पर इससे अर्जुन या कृष्ण को कुछ पाप नहीं लगा। राम रावण युद्ध में बहुत बड़ा भारी जन संहार हुआ परन्तु उन दुष्टों को मारने वाले पापी या हत्यारे नहीं कहलाये। यहां हिंसा प्रत्यक्ष है तो भी हिंसा करने वाले सद्भावना युक्त थे इसलिए उनके कार्य पुण्यमय ही हुए। इसी प्रकार झूठ, चोरी, छल आदि भी समयानुसार—सद् उद्देश्य से किये जाने पर धर्ममय ही होते हैं। उन्हें करने वाले को पाप नहीं लगता वरन् पुण्य फल ही प्राप्त होता है।

🔵  उपरोक्त पंक्तियों को पढ़कर पाठकों को किसी भ्रम में न पड़ना चाहिए। हम सत्कर्मों की निन्दा या असत् कार्यों की प्रशंसा नहीं कर रहे हैं। हमारा तात्पर्य तो केवल यह कहने का है कि काम का बाहरी रूप कैसा है, इससे दुनियां की स्थूल दृष्टि ही कुछ समय के लिए चकाचौंध में पड़ सकती है पर परमात्मा प्रसन्न नहीं हो सकता। आत्मा और परमात्मा के समक्ष तो भावना प्रधान है। संसार के लोगों की सूक्ष्म बुद्धि भी भावना को ही महत्व देती है। यदि किसी ने अपने किसी स्वार्थ-साधन के लिये कोई प्रीति भोज दिया हो या और कोई ऐसा काम किया हो तो जब लोगों को असली बात का पता चलता है तो लोग उसकी चालाकी के लिये मन ही मन मुसकराते हैं, कनखिया लेते हैं और मसखरी उड़ाते हैं, धर्मात्मा की बजाय उसे चालक ही समझा जाता है।

🌹  क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 34)


🌹 सभ्य समाज की स्वस्थ रचना

🔵 47. नैतिक कर्तव्यों का पालन— नैतिक एवं नागरिक कर्तव्यों का पालन, सामाजिक स्वस्थ परम्पराओं का समर्थन, धर्म और नीति के आधार पर आचरण, शिष्ट व्यवहार, वचन का पालन, सहयोग और उदारता का अवलम्बन, ईमानदारी और श्रम उपार्जित कमाई पर सन्तोष, सादगी और सचाई का जीवन—ऐसे ही सद्गुणों को अपनाना चाहिए। मानवता की रीति नीति को अपनाकर हमें सदा सन्मार्ग पर ही चलना चाहिए भले ही इसमें अभावों, असुविधाओं और कठिनाइयों का सामना करना पड़े।

🔴 आलसी नहीं बनना चाहिए और न समय का एक क्षण भी बर्बाद करना चाहिए। श्रम और समय का सदुपयोग यही सफलता के माध्यम हैं। जुआ, चोरी, बेईमानी, रिश्वत, मिलावट, धोखेबाजी जैसे अवांछनीय उपायों से कमाई करके बड़ा आदमी बनने की अपेक्षा ईमानदारी को अपना कर गरीबी का जीवन बिताना श्रेयस्कर समझना चाहिए। इसी अवस्था और गतिविधि को अपनाकर हम अपना और समाज का उत्थान कर सकते हैं, यह भली प्रकार समझ लिया जाय।

🔵 48. सहयोग और सामूहिकता— सहयोगपूर्वक, मिलजुल कर सम्मिलित कार्यक्रम को बढ़ाने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिलना चाहिए। आर्थिक क्षेत्र में सहयोग समितियों के आधार पर व्यापारिक औद्योगिक एवं उत्पादन के कार्यों को विकसित किया जाय। इसमें पूंजी की कठिनाई रहती है। बड़े पैमाने पर कार्य होने से चीजें सस्ती एवं अच्छी तैयार होती हैं। इससे उत्पादकों को भी लाभ मिलता है। उपभोक्ताओं की भी सुविधा बढ़ती है। कार्यकर्ताओं में पारस्परिक प्रेम भी बढ़ता है व्यक्तिगत स्वार्थ की अपेक्षा सामूहिक लाभ एवं संगठन की भावनाएं विकसित होती हैं।

🔴 पारस्परिक सहयोग के आधार पर ही जीवन के हर क्षेत्र में प्रगति हो सकती है। इसलिए सामूहिकता और संगठन के आधार पर संचालित प्रवृत्तियों में भाग लेना, योग देना और उन्हें बढ़ाना ही उचित है। सहयोग की नीति अपनाकर ही मानव जाति ने अब तक इतनी प्रगति की है। इन भावनाओं में शिथिलता आने से सामाजिक पतन और तीव्रता आने से उत्थान का मार्ग प्रशस्त होता है। इस तथ्य को भली प्रकार हृदयंगम करते हुए सहयोग एवं संगठन की प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन करना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

बुधवार, 30 नवंबर 2016

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 45)

🌞  चौथा अध्याय

🔴  उपरोक्त अनुभूति आत्मा के उपकरणों और वस्त्रों के विस्तार के लिए काफी है। हमें सोचना चाहिए कि यह सब शरीर मेरे हैं, जिनमें एक ही चेतना ओत-प्रोत हो रही है। जिन भौतिक वस्तुओं तक तुम अपनापन सीमित रख रहे हो, अब उससे बहुत आगे बढ़ना होगा और सोचना होगा कि 'इस विश्व सागर की इतनी बूँदें ही मेरी हैं, यह मानस भ्रम है। मैं इतना बड़ा वस्त्र पहने हुए हूँ, जिसके अंचल में समस्त संसार ढँका हुआ है।' यही आत्म-शरीर का विस्तार है। इसका अनुभव उस श्रेणी पर ले पहुँचेगा, जिस पर पहुँचा हुआ मनुष्य योगी कहलाता है। गीता कहती है :

सर्व भूतस्य चात्मानं सर्व भूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र सम दर्शनः।


🔵  अर्थात्- सर्वव्यापी अनन्त चेतना में एकीभाव से स्थित रूप योग से युक्त हुए आत्मा वाला तथा सबमें समभाव से देखने वाला योगी आत्मा को सम्पूर्ण भूतों में और सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में देखता है।

🔴  अपने परिधान का विस्तार करता हुआ सम्पूर्ण जीवों के बाह्य स्वरूपों में आत्मीयता का अनुभव करता है। आत्माओं की आत्माओं में तो आत्मीयता है ही, ये सब आपस में परमात्म सत्ता द्वारा बँधे हुए हैं। अधिकारी आत्माएँ आपस में एक हैं। इस एकता के ईश्वर बिलकुल निकट हैं। यहाँ हम परमात्मा के दरबार में प्रवेश पाने योग्य और उनमें घुल-मिल जाने योग्य होते हैं वह दशा अनिर्वचनीय है। इसी अनिर्वचनीय आनन्द की चेतना में प्रवेश करना समाधि है और उनका निश्चित परिणाम आजादी, स्वतन्त्रता, स्वराज्य, मुक्ति, मोक्ष होगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part4

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 1 Dec 2016


👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 20) 1 Dec

🌹 *दुष्टता से निपटें तो किस तरह?*

🔵  दुष्टता से निपटने के दो तरीके हैं—घृणा एवं विरोध। यों दोनों ही प्रतिकूल परिस्थितियों एवं व्यक्तियों के अवांछनीय आचरणों से उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रियायें हैं, पर दोनों में मौलिक अन्तर है। विरोध में व्यक्ति या परिस्थिति को सुधारने-बदलने का भाव है। वह जहां संघर्ष की प्रेरणा देता है वहां उपाय भी सुझाता है। स्थिति बदलने में सफलता मिलने पर शान्त भी हो जाता है। कई बार ऐसा भी होता है कि भ्रान्त सूचनाओं अथवा मन की साररहित कुकल्पनाओं से ही अपने को बुरा लगने लगे और उसका समग्र विश्लेषण किए बिना झगड़ पड़ने की स्थिति बन पड़े।

🔴  वह स्थिति ऐसी भयंकर भी हो सकती है जिसके लिए सदा पश्चाताप करना पड़े। इन बातों को ध्यान में रखते हुए विरोध के पीछे विवेक का भी अंश जुड़ा होता है और उसमें सुधार की, समझौते की गुंजाइश रहती है। बड़ा संघर्ष न बन पड़ने पर अन्यमनस्क हो जाने, असहयोग करने से भी विरोध अपना अभिप्राय किसी कदर सिद्ध कर ही लेता है।

🔵  हमें यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि सम्पर्क क्षेत्र के सभी व्यक्तियों का स्वभाव-आचरण हमारे अनुकूल होगा। जैसा हमने चाहा है, वैसा ही करेंगे—ऐसा तो स्वतन्त्र व्यक्तित्व न रहने पर ही हो सकता है। प्राचीनकाल में दास-दासियों को बाधित करके ऐसी अनुकूलता के लिए तैयार किया जाता था, पर वे भी शारीरिक श्रम करने तक ही मालिकों की आज्ञा मानते थे। मानसिक विरोध बना ही रहता है, उसकी झलक मिलने पर स्वामियों द्वारा सेवकों को प्रताड़ना देने का क्रम आये दिन चलता रहता था।

🔴  अब वह स्थिति भी नहीं रही, लोगों का स्वतन्त्र व्यक्तित्व जगा है और मौलिक अधिकारों का दावा विनम्र या अक्खड़ शब्दों में प्रस्तुत किया जाने लगा है। ऐसी दशा में बाधित करने वाले पुराने तरीके भी अब निरर्थक हो गये हैं। परस्पर तालमेल बिठाकर चलने के अतिरिक्त दूसरा यही मार्ग रह जाता है कि पूर्णतया सम्बन्ध विच्छेद कर लिया जाय। यह मार्ग भी निरापद नहीं है, क्योंकि सामने वाला अपने को अपमानित और उत्पीड़ित अनुभव करता है और जब भी दांव लगता है तभी हानि पहुंचाने के लिए कटिबद्ध हो जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 20) 1 Dec

🌹  गृहस्थ योग से परम पद

🔵  पुण्य और पाप किसी कार्य के बाह्य रूप से ऊपर नहीं वरन् उस काम को करने वाले की भावना के ऊपर निर्भर है। किसी कार्य का बाहरी रूप कितना ही अच्छा, ऊंचा या उत्तम क्यों न हो परन्तु यदि करने वाले की भीतरी भावनाएं बुरी हैं तो ईश्वर के दरबार में वह कार्य पाप में ही शुमार होगा। लोगों को धोखा दिया जा सकता है, दुनियां को भ्रम या भुलावे में डाला जा सकता है परन्तु परमात्मा को धोखा देना असंभव है। ईश्वर के दरबार में काम के बाहरी रूप को देखकर नहीं वरन् करने वाले की भावनाओं को परख कर धर्म अधर्म की नाप तोल की जाती  है।

🔴  आज हम ऐसे अनेक धूर्तों को अपने आस पास देखते हैं जो करने को तो बड़े बड़े अच्छे काम करते हैं पर उनका भीतरी उद्देश्य बड़ा ही दूषित होता है। अनाथालय, विधवाश्रम, गौशाला आदि पवित्र संस्थानों की आड़ में भी बहुत से बदमाश आदमी अपना उल्लू सीधा करते हैं। योगी, महात्मा साधु, संन्यासी का बाना पहने अनेक चोर डाकू लुच्चे लफंगे घूमते रहते हैं। यज्ञ करने के नाम पर, पैसा बटोर कर कई आदमी अपना घर भर लेते हैं।

🔵  बाहरी दृष्टि से देखने पर अनाथालय, विधवाश्रम, गौशाला चलाना, साधु, संन्यासी, महात्मा उपदेशक बनना, यज्ञ, कुआं, मन्दिर बनवाना आदि अच्छे कार्य हैं, इनके करने वाले की भावनाएं विकृत हैं तो यह अच्छे काम भी उसकी मुख्य सम्पदा में कुछ वृद्धि न कर सकेंगे। वह व्यक्ति अपने पापमय विचारों के कारण पापी ही बनेगा, पाप का नरक मय दंड ही उसे प्राप्त होगा।

🌹  क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 33)

🌹 सभ्य समाज की स्वस्थ रचना

🔵 45. सत्कार्यों का अभिनन्दन— प्रतिष्ठा की भूख स्वाभाविक है। मनुष्य को जिस कार्य में बड़प्पन मिलता है वह उसी ओर झुकने लगता है। आज धन और पद को सम्मान मिलता है तो लोग उस दिशा में आकर्षित हैं। यदि यह मूल्यांकन बदल जाय और ज्ञानी, त्यागी एवं पराक्रमी लोगों को सामाजिक प्रतिष्ठा उपलब्ध होने लगे तो इस ओर भी लोगों का ध्यान जायगा और समाज में सत्कर्म करने की प्रगति बढ़ेगी। हमें चाहिए कि ऐसे लोगों को मान देने के लिए सार्वजनिक अभिनन्दन करने के लिए समय-समय पर आयोजन करते रहें।

🔴 मानपत्र भेंट करना, सार्वजनिक अभिनन्दन, पदक-उपहार, समाचार पत्रों में उन सत्कर्मों की चर्चा, फोटो, चरित्र-पुस्तिका आदि का प्रकाशन हम लोग कर सकते हैं। उन सत्कर्मकर्ताओं को इसकी इच्छा न होना ही उचित है, पर दूसरों को प्रोत्साहन देने और वैसे ही अनुकरण की इच्छा दूसरों में जागृत हो, इस दृष्टि से सत्कर्मों के अभिनन्दन की परम्परा प्रचलित करना ही चाहिए। ऐसे आयोजन हलके कारणों को लेकर या झूठी प्रशंसा में न किए जांय, अन्यथा ईर्ष्या द्वेष की दुर्भावनाएं बढ़ेंगी। सभ्य समाज का निर्माण करने के लिए धन एवं शक्ति को नहीं, आदर्श को ही सम्मान मिलना चाहिए।

🔵  46. सज्जनता का सहयोग— यदि मानवता का स्तर ऊंचा उठाना हो तो सज्जनता के साथ सहयोग की नीति अपनाई जानी चाहिए सज्जनता को यदि सहयोग और प्रोत्साहन न मिले तो वह मुरझा जायगी। इसी प्रकार दुष्टता का विरोध न किया गया तो वह भी दिन-दिन बढ़ती चली जायगी। इसलिए प्रत्येक सभ्य नागरिक का कर्तव्य है कि वह अपनी नीति ऐसी रखे जिससे प्रत्यक्ष या परोक्ष में सत्प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि होती रहे और अनीति को निरुत्साहित होना पड़े।

🔴  परिस्थितिवश यदि दुष्टता का पूर्ण प्रतिरोध संभव न हो, इसमें अपने लिए खतरा दीखता हो तो कम से कम इतना तो करना ही चाहिए कि उनकी हां में हां मिलाने, सम्पर्क रखने या साथ में रहने से बचा जाय, क्योंकि इससे दूसरे प्रतिरोध करने वाले की हिम्मत टूटती है और अनीति का पक्ष मजबूत होता है। संभव हो तो तीव्र संघर्ष, न हो तो दुष्टता से असहयोग तो हर हालत में करने का साहस रखना ही चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

मंगलवार, 29 नवंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 30 Nov 2016


👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 44)

🌞  चौथा अध्याय

🔴  मन के तीनों अंग-प्रवृत्त मानस, प्रबुद्घ मानस, आध्यात्मिक मानस भी अपने स्वतंत्र प्रवाह रखते हैं अर्थात् यों समझना चाहिए कि
'नित्यः सर्वगतः स्थाणु रचलोऽयं सनातनः।' आत्मा को छोड़कर शेष सम्पूर्ण शारीरिक और मानसिक परमाणु गतिशील हैं। यह सब वस्तुएँ एक स्थान से दूसरे स्थानों को चलती रहती हैं। जिस प्रकार शरीर के पुराने तत्त्व आगे बढ़ते और नये आते रहते हैं, उसी प्रकार मानसिक पदार्थों के बारे में भी समझना चाहिए। उस दिन आपका निश्वय था कि आजीवन ब्रह्राचारी रहूँगा, आज विषय भोगों से नहीं अघाते। उस दिन निश्चय था अमुक व्यक्ति की जान लेकर अपना बदला चुकाऊँगा, आज उनके मित्र बने हुए हैं। उस दिन रो रहे थे कि किसी भी प्रकार धन कमाना चाहिए, आज सब कुछ त्याग कर सन्यासी हो रहे हैं। ऐसे असंख्य परिवर्तन होते रहते हैं। क्यों? इसलिए कि पुराने विचार चले गये और नये उनके स्थान पर आ गए।

🔵  विश्व की दृश्य-अदृश्य सभी वस्तुओं की गतिशीलता की धारणा, अनुभूति और निष्ठा यह विश्वास करा सकती है कि सम्पूर्ण संसार एक है। एकता के आधार पर उसका निर्माण है। मेरी अपनी वस्तु कुछ भी नहीं है या सम्पूर्ण वस्तुएँ मेरी हैं। तेज बहती हुई नदी के बीच धार में तुम्हें खड़ा कर दिया जाए और पूछा जाए कि पानी के कितने और कौन से परमाणु तुम्हारे हैं, तब क्या उत्तर दोगे? विचार करोगे कि पानी की धारा बराबर बह रही है। पानी के जो परमाणु इस समय मेरे शरीर को छू रहे हैं, पलक मारते-मारते बहुत दूर निकल जायेंगे। जल-धारा बराबर मुझसे छूकर चलती जा रही है, तब या तो सम्पूर्ण जल धारा को अपनी बनाऊँ या यह कहूँ कि मेरा कुछ भी नहीं है, यह विचार कर सकते हो।

🔴  संसार जीवन और शक्ति का समुद्र है। जीव इसमें होकर अपने विकास के लिए आगे को बढ़ता जाता है और अपनी आवश्यकतानुसार वस्तुएँ लेता और छोड़ता जाता है। प्रकृति मृतक नहीं है। जिसे हम भौतिक पदार्थ कहते हैं, उसके समस्त परमाणु जीवित हैं। वे सब शक्ति से उत्तेजित होकर लहलहा, चल, सोच और जी रहे हैं। इसी जीवित समुद्र की सत्ता के कारण हम सबकी गतिविधि चल रही है। एक ही तालाब की हम सब मछलियाँ हैं। विश्व व्यापी शक्ति, चेतना और जीवन के परमाणु विभिन्न अभिमानियों को झंकृत कर रहे हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part4

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 19) 30 Nov

🌹 *विवेक ही हमारा सच्चा मार्गदर्शक*

🔵  देश, काल, पात्र के अनुसार विधानों में परिवर्तन होता रहता है। भारत जैसे अन्य बहुत से देशों में शाकाहार ही मान्य है, पर उत्तरी ध्रुव के निवासी एस्किमो अन्न कहां पायें? उन्हें तो मांसाहार पर ही जीवित रहना है। सर्दी और गर्मी में एक जैसे वस्त्र नहीं पहने जा सकते। पहलवान और मरीज की खुराक एक जैसी नहीं हो सकती। देश, काल, पात्र की भिन्नता से बदलती हुई परिस्थितियां, विधि-व्यवस्था बदलती रहती हैं। स्मृतियां इसी कारण समय-समय पर नये ऋषियों द्वारा नई बदलती रही हैं। इनमें परस्पर भारी मतभेद है, यह मतभेद सत्य की दिशा में बढ़ते हुए कदमों ने उत्पन्न किये हैं।

🔴  आज जो सत्य समझा जाता है वही भविष्य में भी समझा जायेगा—ऐसा मानकर नहीं चलना चाहिए। क्रमिक विकास की दिशा में बढ़ते हुए हमारे कदम अनेकों प्राचीन मान्यताओं को झुठला चुके हैं। सत्यान्वेषी दृष्टि बिना किसी संकोच और दुराग्रह के सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार रही है। यदि ऐसा न होता तो विज्ञान के क्षेत्र में प्रचलित मान्यताओं को समर्थन न मिला होता। प्राचीनकाल के वैज्ञानिकों की मान्यताओं और आज की मान्यताओं में जमीन-आसमान जितना अन्तर है। फिर भी भूतकाल के मनीषियों की कोई अवज्ञा नहीं करता।

🔵  मान्यताओं-प्रथाओं का प्रचलन समय के अनुरूप निर्धारित किया और बदला जाता रहा है। जब कृषि योग्य भूमि बहुत और जनसंख्या कम थी, हिंस्रपशुओं और जन्तुओं को जोर था तब अधिक उत्पादन और अधिक सुरक्षा की दृष्टि से बहुपत्नी प्रथा प्रचलित हुई थी और बहुत बच्चे उत्पन्न होना सौभाग्य का चिन्ह था।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 गृहस्थ-योग (भाग 19) 30 Nov

🌹 *गृहस्थ धर्म तुच्छ नहीं है*
🔵  दार्शनिक लेटो ने कहा है— ‘‘सृष्टि आदि में मनुष्य अपंग था, वह पृथ्वी एक कोने में पड़ा खिसक रहा था। स्त्री ने ही उसे उठाया और पाल कर बड़ा किया। आज वही कृतघ्न उन स्त्रियों को पैरों की जूती समझता है।’’ कवि हारग्रच की अनुभूति है कि— ‘‘स्त्रियां भूलोक की कविता हैं। पुरुष के भाग्य का निस्तार उन्हीं के हाथों में है।’’ कार्लाइल कहा करते थे— ‘‘यदि तुम प्रेम के साक्षात दर्शन करना चाहते हो तो माता के गदगद नेत्रों को देखो।’’ सृष्टि के आरंभ काल का दिग्दर्शन करते हुए सन्त केलवैल ने कहा कि— ‘‘जब तक आदम अकेला है तब तक उसे स्वर्ग भी कण्टकाकीर्ण था। देवताओं के गीत, शीतल समीर और ललित वाटिकायें उसके लिये सभी व्यर्थ थीं, यह सब होते हुए भी वह उदास रहता था और आहें भरता था, परन्तु जब उसे हवा मिल गई तो सारा दुख दूर हो गया। कांटे फूलों में बदल गये।’’

🔴  जिन सन्तों ने अपने पवित्र नेत्रों से नारी को देखा है उन्हें उसमें ईश्वर की सजीव कविता मूर्तिमान दिखाई दी है। जिनकी आंखों में पाप है उनके लिये बहिन, बेटी और माता की समीपता में ही नहीं, प्रत्येक जड़ चेतन की समीपता में खतरा है। जिनके अंचल में आग बंधी हुई है उसके लिये सर्वत्र अग्निकाण्ड का खतरा है, जिसकी आंखों पर हरा ठंडा चश्मा है उसके लिए कड़ी धूप भी शीतल है। पाठको! अपना दृष्टिकोण पवित्र बनाओ। विश्वास रखो, राजा जनक की भांति आप भी गृहस्थ में रहते हुए सच्चे महात्मा बन सकते हैं।

🌹  क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 32)

🌹 सभ्य समाज की स्वस्थ रचना

🔵 43. सत्प्रवृत्ति का अभ्यास— परिवारों में पारस्परिक सहयोग, सभी का परिश्रमी होना, टूटी, पुरानी वस्तुओं की मरम्मत और सदुपयोग, कोने-कोने में सफाई, वस्त्रों के धोने का काम अधिकांश घर में होना, सभी सदस्यों का नियमित व्यायाम, घरेलू झगड़ों को सुलझाने की व्यवस्था, शिक्षा में सभी की अभिरुचि, स्वावलम्बन और बौद्धिक विकास के लिए सतत् प्रयत्न, मितव्ययिता और सादगी, कपड़ों की सिलाई आदि गृहउद्योगों का सूत्रपात, लोक हित के लिए नित्य नियमित दान जैसे अनेक कार्यक्रम घर की प्रयोगशाला में चलाये जा सकते हैं। यही प्रशिक्षण बड़े रूप से विकसित हों तो सारा समाज सभ्य और सुसंस्कृत बन सकता है।

🔴 44. सन्तान और उसकी जिम्मेदारी— नई पीढ़ी का निर्माण एक परम पवित्र और समाज सेवा का श्रेष्ठ साधन माना जाय। सन्तानोत्पादन को विलास का नहीं, राष्ट्रीय कर्तव्य की पूर्ति का एक देशभक्ति पूर्ण कार्य माना जाय। इसके लिए माता-पिता अपनी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक तैयारी बहुत पहले से ही आरम्भ करें। जो गुण-दोष माता-पिता में होते हैं वही सन्तान में आते हैं, इसलिए पति-पत्नी अपने सद्गुणों को ऊंची से ऊंची स्थिति तक चढ़ावें और अत्यन्त प्रेम एवं आत्मीयता से रहें। इसी एकता की उत्कृष्टता पर बालक का आन्तरिक विकास निर्भर रहता है।

🔵 परस्पर द्वेष अविश्वास एवं कलह रखने वाले माता-पिता दुष्टात्मा सन्तान को ही जन्म देते हैं। गर्भावस्था में माता की भावनाएं जिस प्रकार की रहती हैं वे ही संस्कार बच्चे में आते हैं। बालकों की शिक्षा माता के गर्भ-काल से तो आरम्भ हो ही जाती है, वस्तुतः वह इससे भी बहुत पहले होता है। माता-पिता के गुण, कर्म, स्वभाव, स्वास्थ्य, मनोभाव बौद्धिक स्तर का प्रभाव बालकों पर आता है। इसलिए सभ्य पीढ़ी उत्पन्न करने की क्षमता विचारशील पति-पत्नी को वैवाहिक जीवन के आरंभ से ही प्राप्त करने में लग जाना चाहिए। अधिक ब्रह्मचर्य से रहना चाहिए और दाम्पत्य जीवन को प्रत्येक दृष्टि से आदर्श बनाना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

सोमवार, 28 नवंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 29 Nov 2016


👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 31)

🌹 सभ्य समाज की स्वस्थ रचना

🔵 सामाजिक सुव्यवस्था के लिये हमें अपना वैयक्तिक और पारिवारिक जीवन भी ऐसा बनाना चाहिये कि उसका सत्प्रभाव सारे समाज पर पड़े। इसी प्रकार सामाजिक व्यवस्था में जहां व्यतिक्रम उत्पन्न हो गया है उसे सुधारना चाहिए। स्वस्थ परम्पराओं को सुदृढ़ बनाने और अस्वस्थ प्रथाओं को हटाने का ऐसा प्रयत्न करना चाहिये कि सभ्य समाज की रचना का लक्ष्य पूर्ण हो सके। नीचे कुछ ऐसे ही कार्यक्रम दिये गये हैं:—

🔴 41. सम्मिलित कुटुम्ब-प्रथा— सम्मिलित कुटुम्ब-प्रथा को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। व्यक्ति अपने आपको संकीर्ण दायरे तक ही सीमित न रखे। स्त्री-बच्चों को ही अपना न माने वरन् भाई, माता-पिता एवं अन्य सम्बद्ध कुटुम्बियों की प्रगति एवं सुव्यवस्था का भी आत्मीयतापूर्ण ध्यान रखना चाहिए। सब लोग मिल जुल कर रहें, एक दूसरे की सहायता करें, सहनशीलता, सहिष्णुता, त्याग और उदारता की सद्वृत्तियों को बढ़ावें, यही आत्म-विकास की श्रेष्ठ परम्परा है। स्वार्थ को परमार्थ में परिणत करने की परम्परा सम्मिलित कुटुम्ब में ही संभव है। अशान्ति और मनोमालिन्य उत्पन्न करने वाले कारणों को हटाना चाहिए किन्तु मूल आधार को नष्ट नहीं करना चाहिए। समाजवाद का प्राथमिक रूप सम्मिलित कुटुम्ब प्रथा ही है, उसे सुविकसित करना ही श्रेष्ठ है।

🔵 42. पारिवारिक विचारगोष्ठी— प्रत्येक परिवार में नित्य विचारगोष्ठी के रूप में सत्संग क्रम चला करे। कथा-कहानी, पुस्तकें पढ़ कर सुनाना सामयिक समाचारों की चर्चा करते हुए जीवन की विभिन्न समस्याओं के सुलझाने का प्रशिक्षण करना चाहिए। बड़ों के चरण छूकर प्रणाम करने की और छोटों की भी ‘तू’ न कह कर तुम या आप कहने की शिष्ट परम्पराएं हर परिवार में चलनी चाहिए। हर घर में उपासना कक्ष हो जहां बैठ कर कम से कम दस मिनट घर का हर सदस्य उपासना किया करे। घरेलू पुस्तकालय से विहीन कोई घर न रहे। जिन्दगी कैसे जिएं और नित्यप्रति सामने आती रहने वाली गुत्थियों को सुलझाने के लिए संजीवन विद्या का साहित्य बचपन से ही पढ़ा और सुना जाना चाहिए। उपासना स्वाध्याय और सत्संग की नियमित व्यवस्था रहे तो उसका प्रतिफल सुखी परिवारों के रूप में सामने आवेगा और सभ्य समाज की रचना का उद्देश्य आसानी से पूर्ण होगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 *गृहस्थ-योग (भाग 18) 29 Nov*

🌹 *गृहस्थ धर्म तुच्छ नहीं है*

🔵  मुद्दतों से शिक्षा, दीक्षा, अनुभव एवं सामाजिक कार्य क्षेत्र से पृथक एक छोटे पिंजड़े से घर में जीवन भर बन्द रहने और अपने जैसी अन्य मूर्खाओं की संगति मिलने के कारण वे बेचारी व्यावहारिक ज्ञान में बहुत कुछ पिछड़ गई हैं तो भी उनमें आत्मिक सद्गुण पुरुषों की अपेक्षा बहुत अधिक विद्यमान है। उनके सान्निध्य में नरक, पतन, माया, बन्धन जैसे किसी संकट के उत्पन्न होने की आशंका नहीं है। सच तो यह है कि उनके पवित्र अंचल की छाया में बैठकर पुरुष अपनी शैतानी आदतों से बहुत कुछ छुटकारा पा सकता है उनकी स्नेह गंगा के अमृत जल का आचमन करके अपने कलुष कषायों से, पाप तापों से छुटकारा पा सकता है।

🔴  जिनका अन्तःकरण पवित्र है वे कोमलता की अधिकता के कारण स्त्री में और भी अधिक सत् तत्व का अनुभव करते हैं। हजरत मुहम्मद साहब कहा करते थे कि ‘‘मेरी स्वर्ग मेरी माता के पैरों तले है’’ महात्मा विलियम का कथन है कि ‘‘ईश्वर ने स्त्री के नेत्रों में दो दीपक रख दिए हैं ताकि संसार में भूले भटके लोग उसके प्रकाश में अपना खोया हुआ रास्ता देख सकें’’ तपस्वी लोवेल ने एक बार कहा था ‘‘नारी का महत्व में इसलिए नहीं मानता कि विधाता ने उसे सुन्दर बनाया है, न उससे इसलिये प्रेम करता हूं कि वह प्रेम के लिये उत्पन्न की गई है। मैं तो उसे इसलिये पूज्य मानता हूं कि मनुष्य का मनुष्यत्व केवल उसी में जीवित है।’’ दिव्यदर्शी टेलर ने अपनी अनुभूति प्रकाशित की थी कि— ‘‘स्त्री की सृष्टि में ईश्वरीय प्रकाश है। वह एक मधुर सरिता है जहां मनुष्य अपनी चिन्ताओं और दुखों से त्राण पाता है।’’

🌹  क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
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👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 18) 29 Nov

🌹 *विवेक ही हमारा सच्चा मार्गदर्शक*

🔵  प्रत्येक सम्प्रदाय के अनुयायी अपने मार्गदर्शकों के प्रतिपादनों पर इतना कट्टर विश्वास करते हैं कि उनमें से किसी को झुठलाना उनके अनुयायियों को मर्मान्तक पीड़ा पहुंचाने के बराबर है। सभी मतवादी अपने मान्यताओं का अपने-अपने ढंग से ऐसा प्रतिपादन करते हैं कि मानो उनका विश्वास ही एकमात्र सत्य है। इसका अर्थ हुआ कि अन्य मतावलम्बी झूठे हैं, जिस एक को सत्य माना जाय वह भी अन्यों की दृष्टि में झूठा है। फिर परस्पर घोर विपरीतता लिए हुए प्रतिपादनों में से किसी को भी सत्य ठहराते नहीं बनता। वह कहानी उपहासास्पद है जिसमें अन्धों ने हाथी के कई अंगों को पकड़कर उसका वर्णन अपने अनुभवों के आधार पर किया था।

🔴  इस कहानी में यह बात नहीं है कि एक ही कान को पकड़कर हर अन्धे ने उसे अलग-अलग प्रकार का बताया था, यहां तो यही होता देखा जा सकता है। पशुबलि को ही लें, एक सम्प्रदाय को तो उसके बिना धर्म-कर्म सम्पन्न ही नहीं होता दूसरा जीव हिंसा को धर्म के घोर विपरीत मानता है। दोनों ही अपनी-अपनी मान्यताओं पर कट्टर हैं, एक वर्ग ईश्वर को साकार बताता है, दूसरा निराकार। अपने-अपने पक्ष की कट्टरता के कारण अब तक असंख्यों बार रक्त की नदियां बहती रही हैं और विपक्षी को धर्मद्रोही बताकर सिर काटने में ईश्वर की प्रसन्नता जानी जाती रही है।

🔵  समाधान जब कभी निकलेगा तब विवेक की कसौटी का सहारा लेने पर ही निकलेगा, अन्य सभी क्षेत्रों की तरह धर्मक्षेत्र में भी असली-नकली का समन्वय बेतरह भरा है। किस धर्म की मान्यताओं में कितना अंश बुद्धि संगत है? यह देखते हुए यदि खिले हुए फूल चुन लिए जांय तो एक सुन्दर गुलदस्ता बन सकता है। बिना दुराग्रह के यदि सार संग्रह की दृष्टि लेकर चला जाये और प्राचीन-नवीन का भेद न किया जाये तो आज की स्थिति में जो उपयुक्त है उसे सर्वसाधारण के लिए प्रस्तुत किया जा सकेगा। वही सामयिक एवं सर्वोपयोगी धर्म हो सकेगा, ऐसे सार-संग्रह में विवेक को—तर्क-तथ्य को ही प्रामाणिक मानकर चलना पड़ेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 43)

🌞  चौथा अध्याय

🔴  डाक्टर बताते हैं कि शारीरिक कोष हर घड़ी बदल रहे हैं, पुराने नष्ट हो जाते हैं और उनके स्थान पर नये आ जाते हैं। यद्यपि देखने में शरीर ज्यों का त्यों रहता है, पर कुछ ही समय में वह बिलकुल बदल जाता है और पुराने शरीर का एक कण भी बाकी नहीं बचता। वायु, जल और भोजन द्वारा नवीन पदार्थ शरीर में प्रवेश करते हैं और श्वाँस क्रिया तथा मल त्याग के रूप में बाहर निकल रहे हैं। भौतिक पदार्थ बराबर अपनी धारा में बह रहे हैं। नदी-तल में पड़े हुए कछुए के ऊपर होकर नवीन जलधारा बहती रहती है, तथापि वह केवल इतना ही अनुभव करता है कि पानी मुझे घेरे हुए है और मैं पानी में पड़ा हुआ हूँ।

🔵   हम लोग भी उस निरन्तर बहने वाली प्रकृति-धारा से भलीभाँति परिचित नहीं होते, तथापि वह पल भर भी ठहरे बिना बराबर गति करती रहती है। यह मनुष्य शरीर तक ही सीमित नहीं, वरन् अन्य जीवधारियों, वनस्पतियों और जिन्हें हम जड़ मानते हैं, उन सब पदार्थों में होती हुई आगे बढ़ती रहती है। हर चीज हर घड़ी बदल रही है। कितना ही प्रयत्न क्यों न किया जाए, इस प्रवाह की एक बूँद को क्षण भर भी रोककर नहीं रखा जा सकता यह भौतिक सत्य, आध्यात्मिक सत्य भी है। फकीर गाते हैं-'यह दुनियाँ आनी जानी है।'

🔴  भौतिक द्रव्य प्रवाह को तुम समझ गए होगे। यही बात मानसिक चेतनाओं की है। विचारधाराएँ, शब्दावलियाँ, संकल्प आदि का प्रवाह भी ठीक इसी प्रकार जारी है। जो बातें एक सोचता है, वही बात दूसरे के मन में उठने लगती है। दुराचार के अड्डों का वातावरण ऐसा घृणित होता है कि वहाँ जाते-जाते नये आदमी का दम घुटने लगता है। शब्दधारा अब वैज्ञानिक यन्त्रों के वश में आ गई है। रेडियो, बेतार का तार शब्द-लहरों का प्रत्यक्ष प्रमाण है। मस्तिष्क में आने-जाने वाले विचारों के अब फोटो लिए जाने लगे हैं, जिससे यह पता चल जाता है कि अमुक आदमी किन विचारों को ग्रहण कर रहा है और कैसे विचार छोड़ रहा है ? बादलों की तरह विचार प्रवाह आकाश में मँडराता रहता है और लोगों की आकर्षण शक्ति द्वारा खींचा व फेंका जा सकता है। यह विज्ञान बड़ा महत्वपूर्ण और विस्तृत है, इस छोटी पुस्तक में उसका वर्णन कठिन हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part4

रविवार, 27 नवंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 28 Nov 2016


👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 41)

🌞  चौथा अध्याय

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचित जगत्यां जगत्।
'संसार में जितना भी कुछ है वह सब ईश्वर से ओत-प्रोत है।'

🔴  पिछले अध्यायों में आत्म-स्वरूप और उसके आवरणों से जिज्ञासुओं को परिचित कराने का प्रयत्न किया गया है। इस अध्याय में आत्मा और परमात्मा का सम्बन्ध बताने का प्रयत्न किया जायेगा। अब तक जिज्ञासु 'अहम्' का जो रूप समझ सके हैं, वास्तव में वह उससे कहीं अधिक है। विश्वव्यापी आत्मा परमात्मा, महत् तत्व परमेश्वर का ही अंश है। तत्त्वतः उसमें कोई भिन्नता नहीं है।

🔵  तुम्हें अब इस तरह अनुभव करना चाहिए कि 'मैं' अब तक अपने को जितना समझता हूँ उससे कई गुना बड़ा हूँ। 'अहम्' की सीमा समस्त ब्रह्माण्डों के छोर तक पहुँचती है। वह परमात्म शक्ति की सत्ता में समाया हुआ है और उसी से इस प्रकार पोषण ले रहा है, जैसे गर्भस्थ बालक अपनी माता के शरीर से। वह परमात्मा का निज तत्त्व है। तुम्हें आत्मा परमात्मा की एकता का अनुभव करना होगा और क्रमशः अपनी अहन्ता को बढ़ाकर अत्यन्त महान् कर देने को अभ्यास में लाना होगा। तब उस चेतना में जग सकोगे, जहाँ पहुँच कर योग के आचार्य कहते हैं 'सोहम्'।

🔴  आइए, अब इसी अभ्यास की यात्रा आरम्भ करें। अपने चारों ओर दूर तक नजर फैलाओ और अन्तर नेत्रों से जितनी दूरी तक के पदार्थों को देख सकते हो देखो, प्रतीत होगा कि एक महान् विश्व चारों ओर बहुत दूर, बहुत दूर तक फैला हुआ है। यह विश्व केवल ऐसा ही नहीं है जैसा मोटे तौर पर समझा जाता है, वरन् यह एक चेतना का समुद्र है। प्रत्येक परमाणु आकाश एवं ईथर तत्त्व में बराबर गति करता हुआ आगे को बह रहा है। शरीर के तत्त्व हर घड़ी बदल रहे हैं। आज जो रासायनिक पदार्थ एक वनस्पत्ति में है, वह कल भोजन द्वारा हमारे शरीर में पहुँचेगा और परसों मल रूप में निकलकर अन्य जीवों के शरीर का अंग बन जाएगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part4

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 17) 28 Nov

🌹 *विवेक ही हमारा सच्चा मार्गदर्शक*

🔵  विवेकशीलता को ही सत्य की प्राप्ति का एकमात्र साधन कहा जा सकता है। सत्य को नारायण कहा गया है, भगवान का सर्वाधिक सारगर्भित नाम सत्यनारायण है। यथार्थता के हम जितने अधिक निकट पहुंचते हैं भगवान के सान्निध्य का, उसके दर्शन का उतना ही लाभ लेते हैं। हीरा पेड़ों पर फूल की तरह लटका नहीं मिलता, वह कोयले की गहरी खदानें खोदकर निकालना पड़ता है। सत्य किसी को अनायास ही नहीं मिल जाता, उसे विवेक की कुदाली से खोदकर निकालना पड़ता है।

🔴  दूध और पानी के अलग कर देने की आदत हंस में बताई जाती है। इस कथन में तो अलंकार मात्र है, पर यह सत्य है कि विवेक रूपी हंसवृत्ति उचित और अनुचित के चालू सम्मिश्रण में से यथार्थता को ढूंढ़ निकालती है और उस पर चढ़े हुए कलेवर को उतार फेंकती है।
शरीर की आंतरिक स्थिति का सामान्यतः कुछ भी पता नहीं चलता, पर रक्त ‘एक्सरे’ मल-मूत्र आदि के परीक्षण से उसे जाना जाता है। सत्य और असत्य का विश्लेषण करने के लिए विवेक ही एकमात्र परीक्षा का आधार है। मात्र मान्यताओं, परम्पराओं, शास्त्रीय आप्त वचनों से वस्तुस्थिति को जान सकना अशक्य है।

🔵  धर्मक्षेत्र का पर्यवेक्षण किया जाये तो पता चलता है कि संसार में हजारों धर्म सम्प्रदाय मत-मतान्तर प्रचलित हैं। उनकी मान्यतायें एवं परम्परायें एक दूसरे के सर्वथा विपरीत हैं, नैतिकता के थोड़े से सिद्धान्तों पर आंशिक रूप से वे जरूर सहमत होते हैं बाकी सृष्टि के इतिहास से लेकर ईश्वर की आकृति-प्रकृति अन्त उपासना तक के सभी प्रतिपादनों में घोर मतभेद है। प्रथा परम्पराओं के सम्बन्ध में कोई तालमेल नहीं, ऐसी दशा में किस शास्त्र को, किस अवतार को सही माना जाय—यह निर्णय नहीं हो सकता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 गृहस्थ-योग (भाग 17) 28 Nov

🌹 *गृहस्थ धर्म तुच्छ नहीं है*

🔵  वास्तविक बात यह है कि आत्मसाधना में जो विक्षेप पैदा होता है उसका कारण अपनी कुवासना, संकीर्णता, तुच्छता अनुदारता, और स्वार्थपरता है। यह दुर्भाव ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ या संन्यास जिस भी आश्रम में रहेंगे उसे ही पाप मय बना देंगे। इसके विपरीत यदि अपने मन में त्याग, सेवा, सत्यता, सृजनता, एवं उदारता की भावनाएं विद्यमान हों तो कोई भी आश्रम स्वर्ग दायक, मुक्ति प्रद, परम पद पा जाने वाला, हो सकता है। आध्यात्मिक साधकों को अपने मनी, वानप्र इस भ्रम को पूर्णतया बहिष्कृत कर देना चाहिए कि गृहस्थाश्रम कोई छोटा या गिराने वाला धर्म है। यदि समुचित रीति से उसका पालन किया जाय तो ब्रह्मचर्य या संन्यास की तरह वह भी सिद्धिदाता प्रमाणित हो सकता है।

🔴  गृहस्थ धर्म जीवन का एक पुनीत, आवश्यक एवं उपयोगी अनुष्ठान है। स्त्री और पुरुष के एकत्रित होने से दो अपूर्ण जीवन एक पूर्ण जीवन का रूप धारण करते हैं। पक्षी के दो पंखों की तरह, रथ के दो पहियों की तरह, स्त्री और पुरुष का मिलन एक दृढ़ता एवं स्थिरता की सृष्टि करता है। शारीरिक और मानसिक तत्व के आचार्य जानते हैं कि कुछ तत्वों की पुरुष में अधिकता और स्त्री में न्यूनता होती है इसी प्रकार कुछ तत्व स्त्री में अधिक और पुरुष में कम होते हैं। इस अभाव की पूर्ति दोनों के सहचरत्व से होती है। स्त्री पुरुष में एक दूसरे के प्रति जो असाधारण आकर्षण होता है उसका कारण वही क्षति पूर्ति है। मन की सूक्ष्म चेतना अपनी क्षति पूर्ति के उपयुक्त साधनों को प्राप्त करने के लिए विचलित होता है तब उसे संयोग की अभिलाषा कहा जाता है। अंध और पंगु मिलकर देखने और चलने के लाभों को प्राप्त कर लेते हैं ऐसे ही लाभ एक दूसरे की सहायता से दम्पत्ति को भी मिल जाते हैं।

🔵  मूलतः न तो पुरुष बुरा है न स्त्री। दोनों ही ईश्वर की पवित्र कृतियां है। दोनों में ही आत्मा का निर्मल प्रकाश जगमगाता है। पुरुष का कार्यक्षेत्र घर से बाहर रहने के कारण उसकी बाह्य योग्यतायें विकसित हो गई हैं वह बलवान, प्रभाव शाली, कमाऊ और चतुर दिखाई देता है, पर इसके साथ साथ ही आत्मिक सद्गुणों को इस बाह्य संघर्ष के कारण उसने बहुत कुछ खो दिया है। सरलता, सरसता, वफादारी, आत्म-त्याग, दयालुता, प्रेम तथा वात्सल्य की वृत्तियां आज भी स्त्रियों में पुरुषों की अपेक्षा बहुत अधिक देखी जाती हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 30)

🌹 जन-मानस को धर्म-दीक्षित करने की योजना

🔵 38. युग निर्माण के ज्ञान मन्दिर— जगह-जगह ऐसे केन्द्र स्थापित किये जांय जिनका स्वरूप ज्ञान मन्दिर जैसा हो। सद्भावना और सत्प्रवृत्ति की प्रतीक गायत्री माता का सुन्दर चित्र इन केन्द्रों में स्थापित करके, प्रातः सायं पूजा, आरती, भजन, कीर्तन की व्यवस्था करके इन केन्द्रों में मन्दिर जैसा धार्मिक वातावरण बनाया जाय। उसमें पुस्तकालय, वाचनालय रहें। सदस्यों के नित्य प्रति मिलने-जुलने, पढ़ने सीखने और विचार विनिमय करने एवं रचनात्मक कार्यों की योजनायें चलाने के लिये इसे एक क्लब या मिलन मन्दिर का रूप दिया जाय। योजना की स्थानीय प्रवृत्तियों के संचालक के लिये इस प्रकार के केन्द्र कार्यालय हर जगह होने चाहिए।

🔴 39. साधु ब्राह्मण भी कर्तव्य पालें— पंडित, पुरोहित, ग्राम गुरु, पुजारी, साधु, महात्मा, कथा वाचक आदि धर्म के नाम पर आजीविका चलाने वाले व्यक्तियों की संख्या भारतवर्ष में 60 लाख है। इन्हें जन सेवा एवं धर्म प्रवृत्तियों को चलाने के लिये प्रेरणा देनी चाहिए। ईसाई धर्म में करीब 1 लाख पादरी हैं जिनके प्रयत्न से संसार की तीन अरब आबादी में से करीब 1 अरब लोग ईसाई बन चुके हैं। इधर साठ लाख सन्त-महन्तों के होते हुए भी हिन्दू धर्म की संख्या और उत्कृष्टता दिन दिन गिरती जा रही है, यह दुःख की बात है। इस पुरोहित वर्ग को समय के साथ बदलने और जनता से प्राप्त होने वाले मान एवं निर्वाह के बदले कुछ प्रत्युपकार करने की बात सुझाई-समझाई जाय। इतने बड़े जन समाज को केवल आडम्बर के नाम पर समय और धन नष्ट करते हुये नहीं रहने देना चाहिये। यदि यह प्रयत्न सफल नहीं होता है तो धर्म-प्रचार के उत्तरदायित्व को हम लोग मिल जुल कर कंधों पर उठावें, हम में हर व्यक्ति धर्म प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने के लिये कुछ समय नियमित रूप से दिया करे।

🔵 40. वानप्रस्थ का पुनर्जीवन— जिन्हें पारिवारिक उत्तर-दायित्वों से छुटकारा मिल चुका है, जो रिटायर्ड हो चुके हैं या जिनके घर में गुजारे के आवश्यक साधन मौजूद हैं उन्हें अपना अधिकांश समय लोक-हित और परमार्थ के लिये लगाने की प्रेरणा उत्पन्न हो, ऐसा प्रयत्न किया जाय। वानप्रस्थ आश्रम पालन करने की प्रथा अब लुप्त हो गई है। उसे पुनः सजीव किया जाय। ढलती आयु में गृहस्थ के उत्तरदायित्वों से मुक्त होकर लोग घर में रहते हुए लोकसेवा में अधिक समय दिया करें तो सन्त-महात्माओं और ब्राह्मण पुरोहितों का आवश्यक उत्तरदायित्व किसी प्रकार अन्य लोग अपने कंधे पर उठाकर पूरा कर सकते हैं। वानप्रस्थ की पुण्य परम्परा का पुनर्जागरण युग-निर्माण की दृष्टि से नितांत आवश्यक है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

शनिवार, 26 नवंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 16) 27 Nov

🌹 गृहस्थ धर्म तुच्छ नहीं है

🔵  यह एक बिल्कुल ही बे सिर पैर का विचार है कि पुराने समय में ऋषि लोग अविवाहित ही रहते थे। यह ठीक है कि ऋषि मुनियों में कुछ ऐसे भी थे, जो बहुत समय तक अथवा आजीवन ब्रह्मचारी रहते थे पर उसमें से अधिकांश गृहस्थ थे। स्त्री बच्चों के साथ होने से तपश्चर्या में आत्मोन्नति में उन्हें सहायता मिलती थी। इसलिए पुराणों में पग-पग पर इस बात की साक्षी मिलती है कि भारतीय महर्षिगण, योगी, यती, साधु, तपस्वी, अन्वेषक, चिकित्सक, वक्ता, रचियता, उपदेष्टा, दार्शनिक, अध्यापक, नेता आदि विविध रूपों में अपना जीवन-यापन करते थे और अपने महान-कार्य में स्त्री बच्चों को भी भागीदारी बनाते थे।

🔴  आध्यात्मिक मार्ग पर कदम बढ़ाने वाले साधक के आज अज्ञान और अविवेक भरे मूढ़ विश्वासों ने एक भारी उलझन पैदा कर दी है। ‘‘आत्म साधना गृहस्थ से नहीं हो सकती, स्त्री नरक का द्वार है, कुटुम्ब परिवार माया का बन्धन है, इनके रहते भजन नहीं हो सकता, परमात्मा नहीं मिल सकता’’ इस प्रकार की अज्ञान जन्य भ्रम पूर्ण कल्पनाऐं साधक के मस्तिष्क में चक्कर लगाती हैं। परिणाम यह होता है कि या तो वह आत्म मार्ग को अपने लिये असंभव समझ कर उसे छोड़ देता है या फिर पारिवारिक महान् उत्तरदायित्व को छोड़कर भीख टूक मांग खाने के लिये घर से निकल भागता है।

🔵  यदि बीच में ही लटका रहा तो और भी अधिक दुर्दशा होती है। परिवार उसे गले में बंधे हुए चक्की के पाट की तरह भार रूप प्रतीत होता है। उपेक्षा, लापरवाही, गैर जिम्मेदारी के दृष्टि से बर्ताव करने के कारण उसके हर एक व्यवहार में कुरूपता एवं कटुता रहने लगती है। स्त्री बच्चे सोचते हैं कि यह हमारे जीवन को दुखमय बनाने वाला है, शत्रुता के भाव मन में जगते हैं, प्रतिशोध की वृत्तियां पैदा होती हैं, कटुता कलह, घृणा और तिरष्कार के विषैले वातावरण की सृष्टि होती है। उस वातावरण में रहने वाला कोई भी प्राणी स्वस्थता और प्रसन्नता कायम नहीं रख सकता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 29)

🌹 जन-मानस को धर्म-दीक्षित करने की योजना

🔵 35. जन्म-दिन समारोह— हर व्यक्ति का जन्मदिन समारोह मनाया जाय। उसके स्वजन सम्बन्धी बधाई और शुभ कामनाएं दिया करें। एक छोटा जन्मोत्सव मनाया जाया करे जिसमें वह व्यक्ति आत्म-निरीक्षण करते हुए शेष जीवन को और भी अधिक आदर्शमय बनाने के लिए कदम उठाया करे। बधाई देने वाले लोग भी कुछ ऐसा ही प्रोत्साहन उसे दिया करें। हर जन्म-दिन जीवन शोधन की प्रेरणा का पर्व बने, ऐसी प्रथा परम्पराएं प्रचलित की जानी चाहिये।

🔴 36. व्रतशीलता की धर्म धारणा— प्रत्येक व्यक्ति व्रतशील बने, इसके लिये व्रत आन्दोलन को जन्म दिया जाना चाहिए। भोजन, ब्रह्मचर्य, अर्थ उपार्जन, दिनचर्या, खर्च का निर्धारित बजट, स्वाध्याय, उपासना, व्यायाम, दान, सोना, उठना आदि हर कार्य की निर्धारित मर्यादाएं अपनी परिस्थितियों के अनुकूल निर्धारित करके उसका कड़ाई के साथ पालन करने की आवश्यकता हर व्यक्ति अनुभव करे, ऐसा लोक शिक्षण किया जाय। बुरी आदतों को क्रमशः घटाते चलना और सद्गुणों को निरन्तर बढ़ाते चलना भी इस आन्दोलन का एक अंग रहे। साधनामय, संयमी और मर्यादित जीवन बिताने की कला हर व्यक्ति को सिखाई जाय ताकि उसके लिये प्रगतिशील हो सकना संभव हो सके।

🔵 37. मन्दिरों को प्रेरणा-केन्द्र बनाया जाय— मन्दिर, मठों को नैतिक एवं धार्मिक प्रवृत्तियों का केन्द्र बनाया जाय। इतनी बड़ी इमारतों में प्रौढ़ पाठशालायें, रात्रि पाठशालायें, कथा-कीर्तन, प्रवचन, उपदेश, पर्व त्यौहारों के सामूहिक आयोजन, यज्ञोपवीत, मुण्डन आदि संस्कारों के कार्यक्रम, औषधालय, पुस्तकालय, संगीत, शिक्षा, आसन, प्राणायाम, व्यायाम की व्यवस्था, व्रत आन्दोलन जैसी युग-निर्माण की अनेकों गतिविधियों को चलाया जा सकता है। भगवान की सेवा पूजा करने वाले व्यक्ति ऐसे हों जो बचे हुए समय का उपयोग मन्दिर को धर्म प्रवृत्तियों का केन्द्र बनाये रहने और उनका संचालन करने में लगाया करें। प्रतिमा की आरती, पूजा, भोग, प्रसाद की तरह ही जन-सेवा के कार्यक्रमों को भी यज्ञ माना जाना चाहिए और इनके लिए मन्दिरों के संचालकों एवं कार्यकर्ताओं से अनुरोध करना चाहिए कि मन्दिरों को उपासना के साथ-साथ धर्म सेवा का भी केन्द्र बनाया जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 16) 27 Nov

🌹 *विवेक ही हमारा सच्चा मार्गदर्शक*

🔵  वस्तुस्थिति का सही मूल्यांकन कर सकना, कर्म के प्रतिफल का गम्भीरतापूर्वक निष्कर्ष निकलना, उचित-अनुचित के सम्मिश्रण में से जो श्रेयस्कर है उसी को अपनाना—यह विवेक बुद्धि का काम है। मोटी अकल इन प्रसंगों में बेतरह असफल होती है। अवांछनीयता में रहने वाला आकर्षण सामान्य चिन्तन को ऐसे व्यामोह में डाल देता है कि उसे तात्कालिक लाभ को छोड़ने का साहस ही नहीं होता, भले ही पीछे उसका प्रतिफल कुछ भी क्यों न भुगतना पड़े।

🔴  इसी व्यामोह में ग्रस्त होकर अधिकतर लोग आलस्य-प्रमाद से लेकर व्यसन-व्यभिचार तक और क्रूर कुकर्मों की परिधि तक बढ़ते चले जाते हैं। इन्द्रिय लिप्सा में ग्रस्त होकर लोग अपना स्वास्थ्य चौपट करते हैं। वासना-तृष्णा के गुलाम किस प्रकार बहुमूल्य जीवन का निरर्थक गतिविधियों में जीवन सम्पदा गंवाते हैं—यह प्रत्यक्ष है। आंतरिक दोष-दुर्गुणों, षडरिपुओं को अपनाये रहकर व्यक्ति किस प्रकार खोखला होता चला जाता है, इसका प्रमाण आत्म-समीक्षा करके हम स्वयं ही पा सकते हैं।

🔵  अनर्थ मूलक भ्रम-जंजाल से निकालकर श्रेयस्कर दिशा देने की क्षमता केवल विवेक में ही होती है। वह जिसके पास मौजूद है समझना चाहिए कि उसी के लिए औचित्य अपनाना सम्भव होगा और वही कुछ महत्वपूर्ण कार्य कर सकने में समर्थ होगा। विवेक शीलता की कमी अन्य किसी गुण से पूरी नहीं हो सकती, अन्य गुण कितनी ही बड़ी मात्रा में क्यों न हों, पर यदि विवेक का अभाव है तो वह सही दिशा का चुनाव न कर सकेगा। दिग्भ्रान्त मनुष्य कितना ही श्रम क्यों न करे अभीष्ट लक्ष्य तक पहुंच सकना उसके लिए सम्भव ही न होगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 27 Nov 2016


👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 40)

🌞  तीसरा अध्याय

🔴  संतोष और धैर्य धारण करो कार्य कठिन है, पर इसके द्वारा जो पुरस्कार मिलता है, उसका लाभ बड़ा भारी है। यदि वर्षों के कठिन अभ्यास और मनन द्वारा भी तुम अपने पद, सत्ता, महत्व, गौरव, शक्ति की चेतना प्राप्त कर सको, तब भी वह करना ही चाहिए। यदि तुम इन विचारों में हमसे सहमत हो, तो केवल पढ़कर ही संतुष्ट मत हो जाओ। अध्ययन करो, मनन करो, आशा करो, साहस करो और सावधानी तथा गम्भीरता के साथ इस साधन-पथ की ओर चल पड़ो।

🔵  इस पाठ का बीज मंत्र-

    'मैं' सत्ता हूँ। मन मेरे प्रकट होने का उपकरण है।
    'मैं' मन से भिन्न हूँ। उसकी सत्ता पर आश्रित नहीं हूँ।
    'मैं' मन का सेवक नहीं, शासक हूँ।
    'मैं' बुद्धि, स्वभाव, इच्छा और अन्य समस्त मानसिक उपकरणों को अपने से अलग कर सकता हूँ। तब जो कुछ शेष रह जाता है, वह 'मैं' हूँ।
    'मैं' अजर-अमर, अविकारी और एक रस हूँ।
    'मैं हूँ'।.......

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part3.4

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...