सोमवार, 21 नवंबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 24)

🌹 अशिक्षा का अन्धकार दूर किया जाय

🔵 26. नये स्कूलों की स्थापना— जहां स्कूलों की आवश्यकता है, वहां उसकी पूर्ति के लिये प्रयत्न किये जांय। जन सहयोग से नये विद्यालयों की स्थापना तथा आरम्भ करके पीछे उन्हें सरकार के सुपुर्द कर देने की पद्धति अच्छी है। स्कूल की इमारतों के लिये खाली जमीनें या मकान लोगों के बिना मूल्य प्राप्त करना, या जन सहयोग से नये सिरे से बनाना, उत्साही प्रयत्नशील लोगों की प्रेरणा से सुविधापूर्वक हो सकता है। अध्यापकों का खर्च भी फीस की तरह सहायता देकर लोग आसानी से चला सकते हैं। धनीमानी लोग इस दिशा में कुछ विशेष उत्साह दिखा सकें ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिये।

🔴 27. रात्रि पाठशाला चलाई जाएं— ऐसी रात्रि पाठशालाएं भी चलाई जांय जिनमें साधारण पढ़े-लिखे काम-काजी लोग अपने शिक्षा को आगे बढ़ा सकें। स्वल्प शिक्षित लोग जो अपनी पढ़ाई समाप्त कर चुके हैं और काम-काज में लग गये हैं, उनके लिए शिक्षा सम्बन्धी उन्नति के द्वारा प्रायः रुके हुए ही पड़े रहते हैं। इस कठिनाई को दूर किया जाना चाहिए। निरक्षरों को साक्षर बनाने के लिए जिस प्रकार प्रारम्भिक शिक्षा आवश्यक है, उसी प्रकार स्वल्प शिक्षितों को सुशिक्षित बनाने के ऐसे प्रयत्न भी चलने चाहिए जिनमें रात्रि को फुरसत के समय दो घण्टे पढ़ने की सुविधा प्राप्त कर लोग आगे उन्नति कर सकें। प्राइवेट पढ़कर परीक्षा देने की सुविधा कई सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं में होती है। हिन्दी साहित्य सम्मेलन पुरुषों के लिए और महिला विद्यापीठ की परीक्षायें स्त्रियों के लिए उपयोगी रहती हैं। प्राइमरी, मिडिल और हाई स्कूल तक की प्राइवेट परीक्षाएं सरकारी शिक्षा-विभाग भी स्वीकार कर लेता है। जहां जैसी सुविधा हो वहां उसी प्रकार की ऐसी पाठशालाएं चलें। ऐसी पाठशालाओं का खर्च चलाने के लिए छात्रों से फीस भी ली जा सकती है।

🔵 28. शिक्षित ज्ञानऋण चुकायें— शिक्षित लोग पांच व्यक्तियों को शिक्षित करना अपना एक ज्ञान-ऋण जैसा उत्तरदायित्व मानें, और उसे चुकाने के लिए प्रतिज्ञाएं लेकर जुट जावें, ऐसा लोक शिक्षण करना चाहिए। जिस प्रकार धनी लोग कुछ दान-पुण्य करते रहते हैं उसी प्रकार शिक्षा रूपी धन से भी दान-पुण्य करने की प्रथा आरम्भ करनी चाहिये।
तीर्थ यात्रा करके जब तक कोई व्यक्ति घर आकर कुछ दान-पुण्य, कथा, ब्रह्मभोज नहीं करता तब तक उसकी तीर्थ-यात्रा सफल नहीं मानी जाती। इसी प्रकार ज्ञान-ऋण चुकाये बिना किसी की शिक्षा को सफल एवं सार्थक न माने जाने की मान्यता जागृत की जाय। सरकारी टैक्स या उधार लिया हुआ कर्जा चुकाया जाना जिस प्रकार आवश्यक माना जाता है उसी प्रकार हर शिक्षित पांच अशिक्षितों को शिक्षित बनाने के लिए समय दान या धन दान देकर अपने को ऋणमुक्त करने का प्रयत्न करें। जो लोग समय नहीं दे सकते वे धन देकर अध्यापकों के वेतन के लिए दान दिया करें, यह भी हो सकता है और इस प्रकार भी ज्ञान-ऋण चुक सकता है।


🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 गृहस्थ-योग (भाग 10) 21 Nov

🌹 गृहस्थ में वैराग्य

🔵 गृहस्थ आश्रम की निन्दा करते हुए कोई कोई सज्जन ऐसा कहते हुए सुने जाते हैं कि— ‘‘घर गृहस्थी में पड़ना माया के बन्धन में फंसना है।’’ उनकी दृष्टि में घर गृहस्थी माया का पिटारा है और बिना गृहस्थी रहना स्वर्ग की निशानी है। परन्तु विचार करने पर प्रतीत होता है कि उपरोक्त कथन कुछ विशेष महत्व का नहीं है कारण यह है कि माया का बन्धन बाहरी वस्तुओं का बाहरी मनुष्यों में नहीं वरन् अपनी मनोवृत्तियों में है यदि मन अपवित्र है, काम, क्रोध, लोभ से भरा हुआ है तो जो बातें गृहस्थ में होती हैं वही संन्यास से बाहर भी हो सकती हैं।

🔴 हमने देखा है कि बहुत से बाबाजी कहलाने वाले महाराज भिक्षा मांग मांग कर धन जोड़ते हैं, मरने पर उनके पास प्रचुर धनराशि निकलती है। हमने देखा है कि गृह-विहीन लोगों की इन्द्रियां भी लोलुप होती हैं। शब्द, रस, रूप, गन्ध, स्पर्श में वे लोलुप रुचि प्रकट करते हैं, उनके आकर्षण से आकर्षित होते हैं। अपनी वस्तुओं से—कुटी, वस्त्र, पुस्तक, पात्र, शिष्य, साथी आदि से—ममता रखते हैं। यही सब बातें ही दूसरे रूप में गृहस्थों में होती है।

🔵 वैराग्य, त्याग, विरक्ति, इन महत्त्वों का सीधा सम्बन्ध अपने मनोभावों से हैं। यदि भावनाएं संकीर्ण हों, कलुषित हों, स्वार्थमयी हों तो चाहे जैसी उत्तम सात्विक स्थिति में मनुष्य क्यों न रहे मन का विकार वहां भी पाप की दुराचार की पुष्टि करेगा। यदि भावनाएं उदार एवं उत्तम हैं तो अनमिन और अनिष्टकारक स्थिति में भी मनुष्य पुण्य एवं पवित्रता उत्पन्न करेगा। महात्मा इमर्सन कहा करते थे कि ‘‘मुझे नरक में भेज दिया जाय तो मैं वहां अपने लिए स्वर्ग बना लूंगा।’’ वास्तविक सत्य यही है, हर आदमी अपनी भीतरी स्थिति का प्रतिविम्ब दुनियां के दर्पण में देखता है।

🔵 यदि उनके मन में माया है, तो घर, बाहर, वन, आरण्य, मन्दिर, स्वर्ग सब जगह माया ही माया है, माया के अतिरिक्त और कुछ नहीं। यदि मन साफ है, पवित्रता, प्रेम और परमार्थ की दृष्टि है तो घर का एक कोना पुनीत तपोवन से किसी भी प्रकार कम न रहेगा। राजा जनक प्रभृति अनेकों ऋषि हुए हैं जिन्होंने गृहस्थ में रहने की साधना की और परम पद पाया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 10) 21 Nov

🌹 प्रगति की महत्वपूर्ण कुंजी : नियमितता
🔵 जीवन के बहु आयामी विकास के लिए जो सद्गुण आवश्यक हैं, उनमें नियमितता प्रधान ही नहीं अनिवार्य भी है। समय और कार्य की योजनाबद्ध रूप से संयत दिनचर्या बनाने और उस पर आरूढ़ रहने का नाम ही ‘नियमितता’ है। इस तरह व्यवस्थित कार्यक्रम बनाकर चलने से शरीर और मन को उसमें संलग्न रहने की उमंग रहती है तथा प्रवीणता भी बढ़ती है। फलतः सूझबूझ के साथ निश्चित किया गया कार्य सरलता और सफलतापूर्वक भली प्रकार सम्पन्न होता चला जाता है।

🔴 संसार में विविध क्षेत्रों में जिन महामानवों ने प्रगति की, सफलता पाई उनके जीवन-पटल की गहनता-गम्भीरतापूर्वक अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि उनके जीवन का केन्द्रीय आधार नियमितता ही रही है।

🔵 राष्ट्रभाषा के कुशल शिल्पी, तत्कालीन सरस्वती के सम्पादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसकी महत्ता बताते हुए एक स्थान पर लिखा है कि जो लोग अवनति, असफलता का हर समय रोना रोया करते हैं, निश्चित ही उनने साफल्य प्रदायिनी विद्या ‘नियमितता’ की आराधना नहीं की। उन्होंने अपने निज के विकास का श्रेय भी इसी को दिया है। रेलवे की नौकरी, अन्यान्य गृह-कार्य, सामाजिक कार्य करते हुए उनने जिस विशाल ज्ञान राशि का संचय किया तथा परवर्ती काल में साहित्यिक क्षेत्र में जो असामान्य प्रगति की, उसका आधार यही है।

🔴  हरिभाऊ उपाध्याय ने अपने एक संस्मरण परक लेख में आचार्य द्विवेदी जी की नियमबद्धता की चर्चा करते हुए लिखा है कि आचार्य जी के हर कार्य का नियत समय था। उसमें भूल-चूक होने की कोई गुंजाइश नहीं थी। इसका पालन वह इतनी दृढ़ता से करते थे कि उनके सहयोगी, मिलने वाले उनके कार्य विशेष को देखकर अपनी घड़ी मिला लेते। क्योंकि उन सभी को विश्वास रहता था कि द्विवेदी जी के प्रत्येक कार्य का सुनिश्चित समय है, उसमें हेर-फेर का कोई स्थान नहीं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

रविवार, 20 नवंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 21 Nov 2016


👉 आत्म-विश्वास और सफलता

🔴 ईश्वर ने हमें अपनी सर्वोत्कृष्ट कृति के रूप से विनिर्मित किया है। वह अविश्वस्त एवं अप्रमाणिक नहीं हो सकता, इसलिए हमें अपने ऊपर विश्वास करना चाहिये। ईश्वर हमारे भीतर निवास करता है। जहाँ ईश्वर निवास करे, वहाँ दुर्बलता की बात क्यों सोची जानी चाहिए? जब छोटा-सा शस्त्र या पुलिस कर्मचारी साथ होता है, तो विश्वासपूर्वक निश्चिन्त रह सकना सम्भव हो जाता है, फिर जब कि असंख्य वज्रों से बढ़ कर शस्त्र और असंख्य सेनापतियों से भी अधिक सामर्थ्यवान् ईश्वर हमारे साथ है, तब किसी से डरने या आतंकित होने की आवश्यकता ही क्यों होनी चाहिए।

🔵 जो अपने ऊपर भरोसा करता है, उसी का दूसरे लोग भी भरोसा करते हैं। जो अपनी सहायता आप करता है, उसी की ईश्वर भी सहायता करता है। जिसने अपने हाथ पैर चलाना बन्द कर दिया, उसका डूबना निश्चित है। हो सकता है कि किसी निष्ठावान को भी कभी असफल होना पड़ा है पर संसार में आज तक जितने सफल हुए हैं, उनमें से प्रत्येक को आत्म विश्वासी बनकर ही आगे बढ़ना पड़ा है। हो सकता है किसी किसान की फसल मारी जाय, पर जिसे धान काटने का सौभाग्य मिला है, उनमें से प्रत्येक को बोने और सींचने की कठोर प्रक्रिया को अपनाना ही पड़ता है।

🔴 आत्म-विश्वास शक्ति का स्रोत है। उसी के सहारे किसी के लिए आगे बढ़ना सम्भव हो सकता है। भाग्य का निर्माण ईश्वर नहीं, आत्म-विश्वास करता है। जो निष्ठापूर्वक पुरुषार्थ में संलग्न है और हार-जीत की चिन्ता न करते हुए आगे ही बढ़ता जाता है, उस आत्म-विश्वासी के लिए पर्वतों को भी रास्ता देना पड़ता है।

🌹 - ईश्वरचन्द्र विद्यासागर
🌹 ~अखण्ड ज्योति फरवरी 1965 पृष्ठ 1

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 34)

🌞 तीसरा अध्याय

🔴 उन मानसिक वस्तुओं को पृथक करके तुम उन पर विचार कर रहे हो, इसी से सिद्घ होता है कि वह वस्तुएँ तुम से पृथक हैं। पृथकत्व की भावना अभ्यास द्वारा थोड़े समय बाद लगातार बढ़ती जाएगी और शीध्र ही एक महान आकार में प्रकट होगी।

🔵 यह मत सोचिए कि हम इस शिक्षा द्वारा यह बता रहे हैं कि भावनाएँ कैसे त्याग करें। यदि तुम इसी शिक्षा की सहायता से दुष्प्रवृत्तियों को त्याग सकने की क्षमता प्राप्त कर सको, तो बहुत प्रसन्नता की बात है, पर हमारा यह मन्तव्य नहीं है, हम इस समय तो यही सलाह देना चाहते हैं कि अपनी बुरी-भली सब दुष्प्रवृत्तियों को जहाँ की तहाँ रहने दो और ऐसा अनुभव करो कि 'अहम्' इन सबसे परे एवं स्वतंत्र है। जब तुम 'अहम्' के महान् स्वरूप का अनुभव कर लो, तब लौट आओ और उन वृत्तियों को जो अब तक तुम्हें अपनी चाकर बनाये हुए थीं, मालिक की भाँति उचित उपयोग में लाओ, अपनी वृत्तियों को अहम् से परे के अनुभव में पटकते समय डरो मत।

🔴 अभ्यास समाप्त करने के बाद फिर वापस लौट आओगे और उनमें से अच्छी वृत्तियों को इच्छानुसार काम में ला सकोगे। अमुक वृत्ति ने मुझे बहुत अधिक बाँध लिया है, उससे कैसे छूट सकता हूँ, इस प्रकार की चिन्ता मत करो। यह चीजें बाहर की हैं। इसके बंधन में बँधने से पहले 'अहम्' था और बाद में भी बना रहेगा, जब अपने को पृथक् करके उनका परीक्षण कर सकते हो, तो क्या कारण है कि एक ही झटके में उठाकर अलग नहीं फेंक सकोगे? ध्यान देने योग्य बात यह है कि तुम इस बात का अनुभव और विश्वास कर रहे हो कि 'मैं' बुद्घि और इन शक्तियों का उपयोग कर रहा हूँ। यही 'मैं' जो शक्तियों को उपकरण मानता हैं, मन का स्वामी 'अहम् 'है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part3.2

शनिवार, 19 नवंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 20 Nov 2016


👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 23)

🌹 अशिक्षा का अन्धकार दूर किया जाय

🔵 23. प्रौढ़ पाठशालाओं का आयोजन— सेवा भावी शिक्षित लोग मिल-जुल कर गांव-गांव और मुहल्ले-मुहल्ले में रात्रि को फुरसत के समय चलने वाली प्रौढ़ पाठशालाएं स्थापित करें। अशिक्षितों को समझा बुझाकर उनमें भर्ती करना और प्रेमपूर्वक पढ़ाना उन सरस्वती पुत्रों का काम होना चाहिए। धन उसी का धन्य है जो दूसरों की सुविधा बढ़ाने में काम आवे। शिक्षा उसी की धन्य है जो दूसरे अशिक्षितों को शिक्षित बनाने में प्रयुक्त हो। जिस प्रकार अशिक्षितों को पढ़ने के लिए सहमत और तत्पर करना एक बड़ा काम है, उसी प्रकार शिक्षा की आवश्यकता पूर्ण करने के लिये नित्य नियमित रूप से कुछ समय देते रहने वाले सेवा भावी सज्जनों को तैयार करना और फिर उनके उत्साह को बनाये रहना एक महत्वपूर्ण प्रयत्न है। दोनों ही वर्गों को प्रेरणा देकर जगह-जगह प्रौढ़ पाठशालाएं चालू कराई जानी चाहिये।

🔴 24. प्रौढ़ महिलाओं की शिक्षा व्यवस्था— महिलाओं की प्रौढ़ पाठशालाएं चलाने का समय दिन ढलते तीसरे पहर का ठीक रहता है। घर गृहस्थी के काम से निवृत्त होकर महिलाएं तीसरे पहर, प्रायः दो से चार बजे तक फुरसत में होती हैं। उनकी पाठशालाएं उसी समय चलें। अच्छा हो शिक्षित महिलाएं ही नारी शिक्षा का कार्य अपने हाथ में लें। पर यदि वैसा न हो सके तो 15-16 वर्ष से कम आयु के प्रतिभावान लड़के अथवा वयोवृद्ध सज्जन इसके लिए उपयुक्त रह सकते हैं।ने लगें। परिवार के साक्षर लोग मिलकर अपने घर की नारियों या अन्य अशिक्षितों को शिक्षा का महत्व समझाते हुए उन्हें पढ़ने के लिये रजामन्द करें।

🔵 25. शिक्षा के साथ दीक्षा भी— प्रौढ़ शिक्षा के लिये एक व्यवस्थित पाठ्य-क्रम बनाया जाय, इसके लिये ऐसी पुस्तकें उपयोग में लाई जावें जो ज्ञान-दीक्षा पूरा करती हों। अक्षर ज्ञान के साथ-साथ मानव-जीवन की समस्याओं पर प्रकाश डालने वाले पाठ इन पुस्तकों में रहें। विचार क्रान्ति, नैतिक उत्कर्ष एवं युग-निर्माण की विचार धारा इन पाठ्य पुस्तकों में आ जाये। शिक्षक पढ़ाते समय शिक्षार्थियों से उन पाठों में आये हुए विषयों पर विचार विनिमय भी किया करें। समाज शास्त्र, नागरिक शास्त्र, स्वास्थ्य, धर्म, सदाचार, राजनीति विश्व परिचय, आदि की मोटी-मोटी जानकारियों का इस शिक्षण में ऐसा समावेश रहे कि शिक्षार्थी आज की परिस्थितियों से, वर्तमान युग से और मानव जाति के सामने प्रस्तुत समस्याओं से भली प्रकार परिचित हो सके।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 गृहस्थ-योग (भाग 9) 20 Nov

🌹 दृष्टिकोण का परिवर्तन

🔵 कई व्यक्ति गृहस्थी पर ऐसा ही दोष लगाते हुए कुढ़ते रहते हैं, खिन्न रहते हैं एवं घर छोड़ कर भाग खड़े होते हैं। असल में यह दोष परिवार वालों का नहीं वरन् उनके अपने दृष्टिकोण का दोष है, पीला चश्मा पहनने वाले को हर एक वस्तु पीली ही दिखाई पड़ती है।

🔴 प्रत्येक मनुष्य अपूर्ण है। वह अपूर्णता से पूर्णता की ओर यात्रा कर रहा है। ऐसी दशा में यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि हमारे परिवार के सब सदस्य स्वर्ग के देवता, हमारे पूर्ण आज्ञानुवर्ती होंगे। जीव अपने साथ जन्म जन्मांतरों के संस्कारों को साथ लाता है, यह संस्कार धीरे धीरे, बड़े प्रयत्न पूर्वक बदले जाते हैं एक दिन में उन सबका परिवर्तन नहीं हो सकता, इसलिये यह आशा रखना अनुचित है कि परिवार वाले पूर्णतया हमारे आज्ञानुवर्ती ही होंगे।

🔵 उनकी त्रुटियों को सुधारने में, उन्हें आगे बढ़ाने में, उन्हें सुखी बनाने में संतोष प्राप्त करने का अभ्यास डालना चाहिए। अपनी इच्छाओं की पूर्ति से सुखी होने की आशा करना इस संसार में एक असंभव मांग करना है। दूसरे लोग हमारे लिये यह करें, परिवार वाले इस प्रकार का हमसे व्यवहार करें, इस बात के ऊपर अपनी प्रसन्नता को केन्द्रित करना एक बड़ी भूल है ऐसी भूल को जो लोग करते हैं उन्हें गृहस्थ के आनन्द से प्रायः पूर्णतया वंचित रहना पड़ता है।

🔵 स्मरण रखिये गृहस्थ का पालन करना एक प्रकार के योग की साधना करना है। इसमें परमार्थ, सेवा, प्रेम, सहायता, त्याग, उदारता और बदला पाने की इच्छा से विमुखता—यही दृष्टि कोण प्रधान है। जो इसको धारण किये हुए हैं वही ब्राह्मी स्थिति में हैं वह घर में रहते हुए भी संन्यासी हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
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👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 9) 20 Nov

🌹 समय का मूल्य पैसे से भी अधिक

🔵 जिनने विशेष अध्ययन, कलाकारिता, शोध जैसे महत्वपूर्ण कार्य किये हैं उन्हें अपने फैले हुए समय को सिकोड़ना पड़ा है

🔴 संसार में महापुरुषों को किसी महत्वपूर्ण प्रगति के लिए समय का केन्द्रीकरण और विचारों का केन्द्रीकरण करना पड़ता है। शरीर यात्रा के काम तो ऐसे ही चलते-फिरते हो जाते हैं। उन्हें भी तत्परतापूर्वक किया जाय तो दो घण्टे में रसोई आदि के नित्य कर्म पूरे हो जाते हैं। रात को जल्दी सोया जाय और सवेरे जल्दी उठा जाय तो वह सवेरे का बचा हुआ समय ऐसा सुविधाजनक होता है कि उसमें बौद्धिक काम दिन भर जितना निपट जाता है।

🔵 सबसे ज्यादा समय की बर्बादी यारवाशी करती है। ठलुआ देखते रहते हैं कि हमारे जैसा बेकार समय वाला आदमी कौन है? जब मन में आया तभी चल पड़ते हैं और इधर-उधर की बेकार बातें आरम्भ कर देते हैं। टालने पर टलते नहीं। बीच-बीच में चाय जलपान, ताश, शतरंज आदि के मन बहलाव मिलते रहें तब तो कहना ही क्या?

🔴 बड़े आदमी रिटायर होने पर आमतौर से बेकार हो जाते हैं और समझते हैं कि सब लोग भी हमारे जैसे बेकार होंगे। एक-दो बार सम्मानपूर्वक आदर सत्कार मिल जाय तो समझते हैं कि हमारे आगमन का अहसान माना गया। फिर वे जल्दी-जल्दी आने का सिल-सिला आरम्भ कर देते हैं। यह सिलसिला जिन घरों में भी चल पड़ेगा समझना चाहिए कि अपने साथ-साथ घर वालों की बर्बादी भी आरम्भ हुई। स्वागत-सत्कार भी अब कम महंगा नहीं है। एक के लिए बनाने पर घर के सभी सदस्यों के लिए बनाना पड़ता है। स्त्रियों के लिये तो बर्तन मांजने-धोने समेत उतना ही काम बढ़ जाता है जितना कि एक समय की रसोई बनाने का।

🔵 जिन्हें अपने समय का मूल्य विदित हो, जो उसे बचाना और किसी महत्वपूर्ण कार्य में लगाना चाहते हों, उन्हें ठाली रहने की तरह यारवाशी का चस्का लगाने से भी बचना चाहिए। दुर्व्यसनों में एक यह भी है कि ठाली लोगों के साथ दोस्ती बढ़ाई जाय और उनके साथ गपशप का सिलसिला चलाया जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 33)

🌞 तीसरा अध्याय

🔴 सुख और शान्तिपूर्वक स्थित होकर आदर के साथ उस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए बैठो, जो उच्च मन की उच्च कक्षा द्वारा तुम्हें प्राप्त होने को है।

🔵 पिछले पाठ में तुमने समझा था कि 'मैं' शरीर से परे कोई मानसिक चीज है, जिसमें विचार, भावना और वृत्तियाँ भरी हुई हैं। अब इससे आगे बढ़ना होगा और अनुभव करना होगा कि यह विचारणीय वस्तुएँ आत्मा से भिन्न हैं।

🔴 विचार करो कि द्वेष, क्रोध, ममता, ईर्ष्या, घृणा, उन्नति आदि की असंख्य भावनाएँ मस्तिष्क में आती रहती हैं। उनमें से हर एक को तुम अलग का सकते हो, जाँच कर सकते हो, विचार कर सकते हो, खण्डित कर सकते हो, उनके उदय, वेग और अन्त को भी जान सकते हो। कुछ दिन के अभ्यास से अपनी भावनाओं की परीक्षा करने का ऐसा अभ्यास प्राप्त कर लोगे मानो अपने किसी दूसरे मित्र की भावनाओं के उदय, वेग और अन्त का परीक्षण कर रहे हो। यह सब भावनाएँ तुम्हारे चिन्तन केन्द्र में मिलेंगी। उनके स्वरूप का अनुभव कर सकते हो और उन्हें टटोल तथा हिला-डुलाकर देख सकते हो। अनुभव करो कि यह भावनाएँ तुम नहीं हो। ये केवल ऐसी वस्तुएँ हैं, जिन्हें आप मन के थैले में लादे फिरते हो। अब उन्हें त्यागकर आत्म स्वरूप की कल्पना करो। ऐसी भावना सरलता पूर्वक कर सकोगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part3.2

'मणिकर्णिका' झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई

अंग्रेजी शोषण और दलन के खिलाफ तलवार उठा कर युद्ध के मैदान में उतर आने वाली वीरांगना, जिसने कहा था कि जब तक मेरे रक्त का एक बूँद भी मेरे शरीर में बाक़ी है, मैं यह किला अंग्रेजी फौज़ के हाथों में नहीं जाने दूँगी, उस 'मणिकर्णिका' यानि झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को उनके जन्मदिवस पर आकाश भर प्रणाम!

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 19 Nov 2016


👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 22)

🌹 अशिक्षा का अन्धकार दूर किया जाय
🔵 जीवन को सुविकसित करने के लिए जिस मानसिक विकास की आवश्यकता है उसके लिए ‘शिक्षा’ की भारी आवश्यकता होती है। माना कि शिक्षा प्राप्त करके भी कितने ही लोग उसका सदुपयोग नहीं करते। इस बुराई के रहते हुए भी यह मानना पड़ेगा कि मानसिक विकास के लिए शिक्षा की आवश्यकता है। ज्ञान का प्रकाश अन्तरात्मा में शिक्षा के अध्ययन से ही पहुंचता है। भौतिक विकास के लिये भी शिक्षा की आवश्यकता अनिवार्य रूप से अनुभव की जाती है। खेद की बात है कि देश में अभी तक चौथाई जनता भी साक्षर नहीं हो पाई है। युग-परिवर्तन के लिए साक्षरता को एक अनिवार्य आवश्यकता मानते हुए पूरे उत्साह से हमें ज्ञान यज्ञ का आयोजन करना चाहिये और देशव्यापी साक्षरता के लिए ऐसा प्रबल प्रयत्न करना चाहिए कि कोई वयस्क व्यक्ति निरक्षर न रहे। इस सम्बन्ध में दस कार्य-क्रम नीचे प्रस्तुत हैं—

🔴 21. बच्चों को स्कूल भिजवाया जाय—
जो बच्चे स्कूल जाने लायक हैं उन्हें पाठशालाओं में भिजवाने के लिए उनके अभिभावकों को सहमत करना चाहिए। जिन्होंने पढ़ना छोड़ दिया है उन्हें फिर पाठशाला में प्रवेश करने या प्राइवेट पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिये। वयस्कों को इसके लिए तैयार किया जाय कि वे प्रौढ़ पाठशालाओं में पढ़ने लगें। परिवार के साक्षर लोग मिलकर अपने घर की नारियों या अन्य अशिक्षितों को शिक्षा का महत्व समझाते हुए उन्हें पढ़ने के लिये रजामन्द करें।

🔵 22. शिक्षितों की पत्नी अशिक्षित न रहें—
शिक्षितों को इसके लिये तैयार किया जाय कि वे अपने घर के निरक्षरों को साक्षर बनाने के लिए उन्हें समझावें, सहमत करें, और पढ़ाने के लिये स्वयं नियमित रूप से समय निकालें। स्त्रियां अधिकांश घरों में अशिक्षित या स्वल्प शिक्षित होती हैं। शिक्षित पतियों का परम पवित्र धर्म-कर्तव्य यह है कि पत्नी को सच्चे अर्थों में अर्धांगिनी बनाने के लिए उन्हें शिक्षित बनाने का प्रयत्न करें। स्वयं न पढ़ा सकें तो दूसरे माध्यम से उनकी पढ़ाई का प्रबन्ध करें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 गृहस्थ-योग (भाग 8) 19 Nov

🌹 दृष्टिकोण का परिवर्तन

🔵 माली अपने ऊपर जिस बगीची की जिम्मेदारी लेता है उसे हरा भरा बनाने, सर सब्ज रखने का जी जान से प्रयत्न करता है। यही दृष्टिकोण एक सद् गृहस्थ का होना चाहिये। उसे अनुभव करना चाहिये कि परमात्मा ने इन थोड़े से पेड़ों को खींचने, खाद देने, संभालने और रखवाली करने का भार विशेष रूप से मुझे दिया है। यों तो समस्त समाज और समस्त जगत के प्रति हमारे कर्तव्य हैं, परन्तु इस छोटी बगीची का भार तो विशेष रूप से अपने ऊपर रखा हुआ है।

🔴 अपने परिवार के हर एक व्यक्ति को स्वस्थ रखने, शिक्षित बनाने, सद्गुणी सदाचारी और चतुर बनने की पूरी पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर समझते हुए, इसे ईश्वर को आज्ञा का पालन मानते हुए अपना उत्तरदायित्व पूरा करने का प्रयत्न करना चाहिए। अपने परिवार के सदस्यों की सेवा की परमार्थ, पुण्य, लोक सेवा, ईश्वर पूजा से किसी प्रकार कम नहीं है।

🔵 स्वार्थ और परमार्थ का मूल बीज अपने मनोभाव, दृष्टिकोण के ऊपर निर्भर है। यदि पत्नी के प्रति उसे अपनी नौकरानी, दासी, सम्पत्ति, भोग सामग्री समझ कर अपना मतलब गांठने, सेवायें लेने, शासन करने का भाव हो तो यह भाव ही स्वार्थ नरक, कलह, भार, दुख की ओर ले जाने वाला है। यदि उसे अपने उपवन का एक सुरम्य सरस वृक्ष समझ कर उसके प्रति सात्विक त्यागमय सेवा का, पुनीत उदारतामय प्रेम का भाव हो तो यह भाव ही दाम्पत्ति जीवन को, पत्नी सान्निध्य को परमार्थ, स्वर्ग, स्नेह और आनन्द का घर बनाया जा सकता है।

🔵 ‘‘देना कम लेना ज्यादा’’ यह नीति झगड़े की, पाप की कटुता की, नरक की जड़ है। ‘‘देना ज्यादा और लेना कम से कम’’ यह नीति—प्रेम, सहयोग, पुण्य और स्वर्ग की जननी है। बदला चाहने, लेने, स्वार्थ साधने, सेवा कराने की स्वार्थ दृष्टि से यदि पत्नी, पुत्र, पिता, भाई, माता, बुआ, बहिन को देखा जाय तो यह सभी बड़े स्वार्थी, खुदगर्ज, बुरे, रूखे, उपेक्षा करने वाले, उद्दंड दिखाई देंगे, उनमें एक से एक बड़ी बुराई दिखाई पड़ेगी और ऐसा लगेगा मानो गृहस्थ ही सारे दुखों, स्वार्थों और पापों का केन्द्र है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
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👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 8) 19 Nov

 🌹 समय का मूल्य पैसे से भी अधिक

🔵 अमीर साहूकारों की दिनचर्या पर ध्यान दें तो मालूम पड़ेगा कि समय काटने के लिए उनने भी एक टाइम टेबिल बना रखा है। थोड़ा-बहुत ही आगा-पीछा होता है कि कोई यार-दोस्त आ धमके तब, नहीं तो सबेरे से उठकर हाथ-मुंह धोने, हजामत बनाने, चाय पीने, अखबार पढ़ने, भोजन करके विश्राम के लिये चले जाने, उठने पर चाय पीने, ताश खेलने, रात का टी.वी. देखने, दस बजे भोजन करने और सवेरे आठ बजे तक का बना-बनाया कार्यक्रम रहता है। यार-दोस्तों के आ धमकने पर जो काम अकेले करते थे वह कइयों द्वारा मिल-जुलकर होने लगता है। कभी-कभी इसमें सैर-सपाटा भी शामिल हो जाता है। पूछने पर वे भी अपने को व्यस्त बताते हैं।

🔴 स्त्रियों में ढेरों ऐसी होती हैं जिनके जिम्मे दोनों समय की रसोई होती है—दो-तीन आदमियों की। इसको भी वे लापरवाही से इस तरह करती हैं कि सारा दिन उसी में घूम जाता है। कहने को वे भी यही कहती हैं कि दिनभर लगे रहते हैं, फुरसत ही नहीं मिलती।

🔵 समय काटने के लिए कोई भी इससे मिलता-जुलता कार्यक्रम बना सकता है। शरीर यात्रा अपने आप में एक काम है। बाजार जाकर घर की चीजें खरीदना भी ढेरों समय ले जाता है। ऐसी दशा में किसी महत्वपूर्ण काम के लिए समय निकालना मुश्किल है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 32)

 🌞 तीसरा अध्याय

🔴 तुम्हें यह भ्रम न करना चाहिए कि हम किसी मन की निन्दा और किसी की स्तुति करते हैं और भार या बाधक सिद्घ करते हैं। बात ऐसी नहीं है। हम सोचते तो यह हैं कि मन की सहायता से ही तुम अपनी वास्तविक सत्ता और आत्म-ज्ञान के निकट पहुँचे हो और आगे भी बहुत दूर तक उसकी सहायता से अपना मानसिक विकास कर सकोगे इसलिए मन का प्रत्येक विभाग अपने स्थान पर बहुत अच्छा है, बशर्ते कि उसका ठीक उपयोग किया जाए।

🔵 साधारण लोग अब तक मन के निम्न भागों को ही उपयोग में लाते हैं, उनके मानस-लोक में अभी ऐसे असंख्य गुप्त प्रकट स्थान हैं जिनकी स्वप्न में भी कल्पना नहीं की जा सकी है अतएव मन को कोसने के स्थान पर आचार्य लोग दीक्षितों को सदैव यह उपदेश देते हैं कि उस गुप्त शक्ति को त्याज्य न ठहराकर ठीक प्रकार से क्रियाशील बनाओ।

🔴 यह शिक्षा जो तुम्हें दी जा रही है मन के द्वारा ही क्रिया रूप में आ सकती है और उसी के द्वारा समझने, धारण करने एवं सफल होने का कार्य हो सकता है इसलिए हम सीधे तुम्हारे मन से बात कर रहे हैं, उसी से निवेदन कर रहे हैं कि महोदय! अपनी उच्च कक्षा से आने वाले ज्ञान को ग्रहण कीजिए और उसके लिए अपना द्वार खोल दीजिए। हम आपकी बुद्घि से प्रार्थना करते हैं- भगवती! अपना ध्यान उस महातत्त्व की ओर लगाइए और सत्य के अनुभवी, अपने आध्यात्मिक मन द्वारा आने वाली दैवी चेतनाओं में कम बाधा दीजिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part3.2

गुरुवार, 17 नवंबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 21)

🌹 युग-निर्माण योजना का शत-सूत्री कार्यक्रम

🔵 19. सन्तान की सीमा मर्यादा—
देश की बढ़ती हुई जनसंख्या, आर्थिक कठिनाई, साधनों की कमी और जन साधारण के गिरे हुए स्वास्थ्य के देखते हुए यही उचित है कि प्रत्येक गृहस्थ कम से कम सन्तान उत्पन्न करे। अधिक सन्तान उत्पन्न होने से माताएं दुर्बलता ग्रस्त होकर अकाल में ही काल कवलित हो जाती हैं। बच्चे कमजोर होते हैं और ठीक प्रकार पोषण न होने पर अस्वस्थता एवं अकाल मृत्यु के ग्रास बनते हैं। शिक्षा और विकास की समुचित सुविधा न होने से बालक भी अविकसित रह जाते हैं। इसलिए सन्तान को न्यूनतम रखने का ही प्रसार किया जाय। लोग ब्रह्मचर्य से रहें अथवा परिवार नियोजन विशेषज्ञों की सलाह लें। सन्तान के उत्तरदायित्वों एवं चिन्ताओं से जो व्यक्ति जितने हलके होंगे—वे उतने निरोग रहेंगे, यह तथ्य हर सद्गृहस्थ भली प्रकार समझ सके इसी में उसका कल्याण है।

🔴 20. प्राकृतिक चिकित्सा की जानकारी—
पंच तत्वों से रोग निवारण की प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति को लोक प्रिय बनाया जाना चाहिए। जगह-जगह ऐसे चिकित्सालय रहें। इनमें उपवास एनिमा, जल चिकित्सा, सूर्य, चिकित्सा, मिट्टी, भाप आदि साधनों की सहायता से शरीर का कल्प जैसा शोधन होता है और एक रोग की ही नहीं, समस्त रोगों की जड़ ही कट जाती है। सर्वसाधारण को इस पद्धति का इतना ज्ञान करा दिया जाय कि आवश्यकता पड़ने पर अपनी तथा अपने घर के लोगों की चिकित्सा स्वयं ही कर लिया करें।

🔵 यह सभी प्रयत्न ऐसे हैं जो सामूहिक रूप से ही प्रसारित किये जा सकते हैं। इन्हें आन्दोलन का रूप मिलना चाहिए और इनका संचालन ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवारों के सम्मिलित प्रयत्नों से होता रहना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

👉 गृहस्थ-योग (भाग 7) 18 Nov

🌹 दृष्टिकोण का परिवर्तन

🔵 आत्मीयता की उन्नति के लिए अभ्यास करने का सबसे अच्छा स्थान अपना घर है। नट अपने घर के आंगन में कला खेलना सीखता है। बालक अपने घर में खड़ा होना और चलना फिरना सीखता है योग की साधना भी घर से ही आरम्भ होनी चाहिए। प्रेम, त्याग और सेवा का, अभ्यास करने के लिये अपने घर का क्षेत्र सबसे अच्छा है। इन तत्वों का प्रकाश जिस स्थान पर पड़ता है वही चमकने लगता है।

🔴  जब तक आत्मीयता के भावों की कमी रहती है तब तक औरों के प्रति दुर्भाव, घृणा, क्रोध, उपेक्षा के भाव रहते हैं किन्तु जब अपने पन के विचार बढ़ते हैं तो हल्के दर्जे की चीजें भी बहुत सुन्दर दिखाई पड़ने लगती है। माता अपने बच्चे के प्रति आत्म भाव रखती है इसलिये यदि वह लाभदायक न हो तो भी उसे भरपूर स्नेह करती है, पतिव्रत पत्नियों को अपने काले कलूटे और दुर्गुणी पति भी इन्द्र जैसे सुन्दर और बृहस्पति जैसे गुणवान लगते हैं।

🔵 दुनियां में सारे झगड़ों की जड़ यह है कि हम देते कम हैं और मांगते ज्यादा हैं। हमें चाहिए कि दें बहुत और बदला बिलकुल न मांगें या बहुत कम पाने की आशा रखें। इस नीति को ग्रहण करते ही हमारे आस पास के सारे झगड़े मिट जाते हैं। आत्मीयता की महान साधना में प्रवृत्त होने वाले को अपना दृष्टिकोण—देने का—त्याग और सेवा का, बनाना पड़ता है। आप प्रेम की उदार भावनाओं से अपने अन्तःकरण को परिपूर्ण कर लीजिए और सगे सम्बन्धियों के साथ त्याग एवं सेवा का व्यवहार करना आरम्भ कर दीजिए।

🔵 कुछ ही क्षणों के उपरान्त एक चमत्कार हुआ दिखाई देने लगेगा। अपना छोटा सा परिवार जो शायद बहुत दिनों से कलह और क्लेशों का घर बना हुआ है—सुख शान्ति का स्वर्ग दीखने लगेगा। अपनी आत्मीयता की प्रेम भावनाएं परिवार के—आस पास के लोगों से टकराकर अपने पास वापिस लौट आती हैं और वे आनन्द की भीनी सुगन्धित फुहार से छिड़क कर मुरझाये हुए अन्तःकरण को हरा कर देती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 7) 18 Nov 2016

🌹 काम को टालिये नहीं

🔵 सुबह जब हम अपनी दिनचर्या आरम्भ करते हैं तो कठिन और श्रम साध्य कार्यों को सबसे पहले कर लेना एक अच्छी और प्रगतिदायी आदत है। इसकी अपेक्षा अनावश्यक कामों को पहले करने का स्वभाव थकाने वाला बन जाता है। और कठिन कार्य पड़े रह जाते हैं। यदि हम इस आलस्य की वृत्ति पर विजय नहीं प्राप्त कर सके तो निश्चित है कि हम औसत स्तर से रत्ती भर भी ऊंचा नहीं उठ सकेंगे और सफलता हमसे कोसों दूर रहेगी। हम जिन परिस्थितियों में हैं, प्रगतिशील व्यक्ति उनसे गई-गुजरी स्थिति में भी हमसे आगे बढ़ जाता है और फिर हम कुछ कर सकते हैं तो केवल ईर्ष्या।

🔴 कुछ बनने के लिए दृढ़ संकल्प के साथ अपने कार्यों में लगना चाहिए। यह बात ध्यान में रखी जानी चाहिए कि कठिन कार्यों में ही हमारी सामर्थ्य तथा योग्यता का विकास सम्भव है।

🔵 कार्य सभी समान होते हैं। करने से सब पूरे हो जाते हैं। यह हमारे मन का आलस्य ही कठिन और सरल का वर्गीकरण करता है। अपने भीतर छिपे बैठे इस घर के भेदी की बात मान ली तो फिर हमें सभी काम कठिन लगने लगेंगे। अतः पुरुषार्थी व्यक्तियों की दृष्टि में काम केवल काम होता है। कठिन सरल के वर्गीकरण के चक्कर में न पड़ते हुए वे उसे पूरा करने में जुट पड़ते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 31)

🌞 तीसरा अध्याय

🔴 प्रवृत्त मन से ऊपर दूसरा मन है, जिसे 'प्रबुद्ध मानस' कहना चाहिए। इस पुस्तक को पढ़ते समय तुम उसी मन का उपयोग कर रहे हो। इसका काम सोचना, विचारना, विवेचना करना, तुलना करना, कल्पना, तर्क तथा निर्णय आदि करना है। हाजिर जबावी, बुद्घिमत्ता, चतुरता, अनुभव, स्थिति का परीक्षण यह सब प्रबुद्घ मन द्वारा होते हैं। याद रखो जैसे प्रवृत्त मानस 'अहम्' नहीं है उसी प्रकार प्रबुद्घ मानस भी वह नहीं है। कुछ देर विचार करके तुम इसे आसानी के साथ 'अहम्' से अलग कर सकते हो। इस छोटी-सी पुस्तक में बुद्घि के गुण धर्मों का विवेचन नहीं हो सकता, जिन्हें इस विषय का अधिक ज्ञान प्राप्त करना हो, वे मनोविज्ञान के उत्तमोत्तम ग्रन्थों का मनन करें। इस समय इतना काफी है कि तुम अनुभव कर लो कि प्रबुद्घ मन भी एक आच्छादन है न कि 'अहम्'।

🔵 तीसरे सर्वोच्च मन का नाम 'अध्यात्म मानस' है। इसका विकास अधिकांश लोगों में नहीं हुआ होता। मेरा विचार है कि तुम में यह कुछ-कुछ विकसने लगा है, क्योंकि इस पुस्तक को मन लगाकर पढ़ रहे हो और इसमें वर्णित विषय की ओर आकर्षित हो रहे हो। मन के इस विभाग को हम लोग उच्चतम विभाग मानते हैं और आध्यात्मिकता, आत्म-प्रेरणा, ईश्वरीय सन्देश, प्रतिभा आदि के रूप में जानते हैं। उच्च भावनाएँ मन के इसी भाग में उत्पन्न होकर चेतना में गति करती हैं।

🔴 प्रेम, सहानुभूति, दया, करुणा, न्याय, निष्ठा, उदारता, धर्म प्रवृत्ति, सत्य, पवित्रता, आत्मीयता आदि सब भावनाएँ इसी मन से आती हैं। ईश्वरीय भक्ति इसी मन में उदय होती है।
गूढ़ तत्त्वों का रहस्य इसी के द्वारा जाना जाता है। इस पाठ में जिस विशुद्घ 'अहम्' की अनुभूति के शिक्षण का हम प्रयत्न कर रहे हैं, वह इसी 'अध्यात्म मानस' के चेतना क्षेत्र से प्राप्त हो सकेगी। परन्तु भूलिए मत, मन का यह सर्वोच्च भाग भी केवल उपकरण ही है। 'अहम्' यह भी नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part3

बुधवार, 16 नवंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 17 Nov 2016


👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 20)

🌹 युग-निर्माण योजना का शत-सूत्री कार्यक्रम

🔵 17. साप्ताहिक उपवास— साप्ताहिक छुट्टी पेट को भी मिलनी चाहिए। छह दिन काम करने के बाद एक दिन पेट को काम न करना पड़े, उपवास रखा जाया करे, तो पाचन क्रिया में कोई खराबी न आने पाये। विश्राम के दिन सप्ताह भर की जमा हुई कब्ज पच जाया करे और अगले सप्ताह अधिक अच्छी तरह काम करने के लिए पेट समर्थ हो जाया करे। देश में अन्न की वर्तमान कमी के कारण विदेशों से बहुत दुर्लभ विदेशी मुद्रा व्यय करके अन्न मंगाना पड़ता है। यदि सप्ताह में एक दिन उपवास का क्रम चल पड़े तो वह कमी सहज ही पूरी हो जाय। पूरे दिन न बन पड़े तो एक समय भोजन छोड़ने की व्यवस्था तो करनी ही चाहिए। जो लोग अधिक अशक्त होंवें, वे दूध, फल शाक आदि भले ही ले लिया करें, पर सप्ताह में एक समय अन्न छोड़ने—उपवास करने का तो प्रचलन किया जाय। उपवास का आध्यात्मिक लाभ तो स्पष्ट ही है, शारीरिक लाभ भी कम नहीं।

🔴 18. बड़ी दावतें और जूठन—ड़ी दावतों में अन्न का अपव्यय न होने देना चाहिए। प्रीतिभोजों, में खाने वालों की संख्या कम से कम रहे और खाने की वस्तुएं कम संख्या में ही परोसी जांय, जिससे अन्न की बर्बादी न हो।

🔵 थाली में जूठन छोड़ने की प्रथा बिलकुल ही बन्द की जाय। मेहतर या कुत्ते को भोजन देना हो तो अच्छा और स्वच्छ भोजन देना चाहिए। उच्छिष्ट भोजन कराने से तो उलटा पाप चढ़ता है। खाने वाले की भी शारीरिक और मानसिक हानि होती है। अन्न देवता का अपमान धार्मिक दृष्टि से भी पाप है। अन्न की बर्बादी तो प्रत्यक्ष ही है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 गृहस्थ-योग (भाग 6)

🌹 दृष्टिकोण का परिवर्तन

🔵 इस बात को भली प्रकार समझ रखना चाहिए कि योग का अर्थ अपनी तुच्छता संकीर्णता को महानता, उदारता और विश्वबन्धुत्व में जोड़ देना है। अर्थात् स्वार्थ को परिशोधन करके उसे परमार्थ बना लेना है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये असंख्य प्रकार के योगों की साधनायें की जाती हैं उन्हीं में से एक गृहस्थ योग ही साधना है। अन्य साधनाओं की अपेक्षा यह अधिक सुखद और स्वाभाविक है। इसलिये आचार्यों ने गृहस्थ योग का दूसरा नाम सहज योग भी रखा है। महात्मा कबीर ने अपने पदों में सहज योग की बहुत चर्चा और प्रशंसा की है।

🔴 किसी वस्तु को समुचित रीति से उपयोग करने पर वह साधारण होते हुए भी बहुत बड़ा लाभ दिखा देती है और कोई वस्तु उत्तम होते हुए भी यदि उसका दुरुपयोग किया जाय तो वह हानिकारक हो जाती है। दूध जैसे उत्तम पौष्टिक पदार्थ को भी यदि अवधि पूर्वक सेवन किया जाय तो वह रोग और मृत्यु का कारण बन सकता है। इसके विपरीत यदि जहर को भी उचित रीति से शोधन मारण करके काम में लाया जाय तो वह अमृत के समान रसायन का काम देता है। गृहस्थाश्रम के सम्बन्ध में भी यही बात है यदि उचित दृष्टिकोण के साथ आचरण किया तो गृहस्थाश्रम के रहते हुए भी ब्रह्म निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है जैसा कि अनेक ऋषि महात्मा योगी और तपस्वी पूर्वकाल में प्राप्त कर चुके हैं।

🔵 आजकल गृहस्थों को दुख, चिन्ता, रोग, शोक, आधि व्याधि, पाप ताप में ग्रसित अधिक देखा जाता है इससे ऐसा अनुमान न लगाना चाहिए कि इसका कारण गृहस्थाश्रम है, यह तो मानसिक विकारों को कुविचार और कुसंस्कारों का फल है। दूषित मनोवृत्तियों के कारण हर एक आश्रम में, हर एक वर्ण में, हर एक देश में ऐसे ही संकट, दुख उपस्थित होंगे। इसके लिये बेचारे गृहस्थाश्रम को दोष देना बेकार है। यदि वह वास्तव में ही दूषित, त्याज्य तथा तुच्छ होता तो संसार के महापुरुषों, अवतारों और युग निर्माताओं ने इससे अपने को अलग रखा होता, किन्तु हम देखते हैं विश्व की महानता का करीब, करीब समस्त इतिहास गृहस्थाश्रम की धुरी पर केन्द्रीभूत हो रहा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 7)

🌹 काम को टालिये नहीं:

🔵 यदि यह आदत डाल ली जाय तो जो काम सबसे कठिन दिखाई पड़ते हैं वे बहुत आसान लगने लगते हैं। वास्तव में कोई भी कार्य असाध्य व कठिन नहीं है। उन्हें हम ही कठिन बनाते हैं, अपनी टालने की वृत्ति से। इस वृत्ति के कारण आसान और सहज साध्य कार्य भी धीरे-धीरे कठिन लगने लग जाते हैं।

🔴 कम कठिनाई का कार्य पहले करने की आदत मनुष्य को प्रकृति का दास बना लेती है। जबकि वह अपने स्वभाव का, आदतों का दास नहीं स्वामी है। बहुत से व्यक्ति जो अपने जीवन में कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं कर पाते हैं, इसी आदत के दास होते हैं। ऐसी प्रकृति के हारे हुए व्यक्ति फिर कठिन कार्यों से ही नहीं, थोड़ी-सी कठिन परिस्थितियों में भी घबरा उठते हैं।

🔵 वे सरल कार्य पहले चुन-चुन कर लेते हैं। उनका सारा श्रम और कार्यक्षमता इन सरल कामों में लग जाती है। जब थक जाते हैं तब कार्य दीर्घ सूत्रता के शिकार हो जाते हैं। फिर करेंगे की भावना समस्या बन जाती है और काम का बोझ हमेशा खटकने लगता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 30)

🌞 तीसरा अध्याय

🔴 शरीर और आत्मा के बीच की चेतना मन है। साधकों की सुविधा के लिए मन को तीन भागों में बाँटा जाता है। मन के पहिले भाग का नाम प्रवृत्त मानस है। यह पशु-पक्षी आदि अविकसित जीवों और मनुष्यों में समान रूप से पाया जाता है। गुप्त मन और सुप्त मानस भी उसे कहते हैं। शरीर को स्वाभाविक और जीवन्त बनाये रखना इसी के हाथ में है। हमारी जानकारी के बिना भी शरीर का व्यापार अपने आप चलता रहता है। भोजन की पाचन क्रिया, रक्त का घूमना, क्रमशः रस, रक्त, माँस, मेदा, अस्थि, वीर्य का बनना, मल त्याग, श्वाँस-प्रश्वाँस, पलकें खुलना, बन्द होना आदि कार्य अपने आप होते रहते हैं।

🔵 आदतें पड़ जाने का कार्य इसी मन के द्वारा होता है। यह मन देर में किसी बात को ग्रहण करता है पर जिसे ग्रहण कर लेता है, उसे आसानी से छोड़ता नहीं। हमारे पूर्वजों के अनुभव और हमारे वे अनुभव जो पाशविक जीवन से उठकर इस अवस्था में आने तक प्राप्त हुए हैं, इसी में जमा हैं। मनुष्य एक अल्प बुद्घि साधारण प्राणी था। उस समय की ईर्ष्या, द्वेष, युद्घ-प्रवृत्ति, स्वार्थ, चिन्ता आदि साधारण वृत्तियाँ इसी के एक कोने में पड़ी रहती हैं। पिछले अनेक जन्मों के नीच स्वभाव जिन्हें प्रबल प्रयत्नों द्वारा काटा नहीं गया है, इसी विभाग में इकट्ठे रहते हैं।

🔴 यह एक अद्भुत अजाएबघर है, जिसमें सभी तरह की चीजें जमा हैं। कुछ अच्छी और बहुमूल्य हैं, तो कुछ सड़ी-गली, भद्दी तथा भयानक भी हैं। जंगली मनुष्यों, पशुओं तथा दुष्टों में जो लोभ, हिंसा, क्रूरता, आवेश, अधीरता आदि वृत्तियाँ होती हैं, वह भी सूक्ष्म रूपों में इसमें जमा हैं। यह बात दूसरी है कि कहीं उच्च मन द्वारा पूरी तरह से वे वश में रखी जाती हैं कहीं कम। राजस और तामसी लालसाएँ इसी मन से सम्बन्ध रखती हैं। इन्द्रियों के भोग, घमण्ड, क्रोध, भूख, मैथुनेच्छा, निद्रा आदि प्रवृत्त मानस के रूप है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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मंगलवार, 15 नवंबर 2016

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 29)

🌞 तीसरा अध्याय

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्घिर्यो बुद्घेः परतस्तु सः॥   
-गीता 3/42॥

🔴 शरीर से इन्द्रियाँ परे (सूक्ष्म) हैं। इन्द्रियों से परे मन है और मन से परे बुद्धि है और बुद्धि से परे आत्मा है। आत्मा तक पहुँचने के लिए क्रमशः सीढ़ियाँ चढ़नी होंगी। पिछले अध्याय में आत्मा को शरीर और इन्द्रियों से ऊपर अनुभव करने के साधन बताये गये थे। इस अध्याय में मन का स्वरूप समझने और उससे ऊपर आत्मा को सिद्घ करने का हमारा प्रयत्न होगा। प्राचीन दर्शनशास्त्र मन और बुद्घि को अलग-अलग गिनता है।

🔵 आधुनिक दर्शनशास्त्र मन की ही सर्वोच्च श्रेणी को बुद्घि मानता है। इस बहस में आपको कोई खास दिलचस्पी लेने की आवश्यकता नहीं है। दोनों का मतभेद इतना बारीक है कि मोटी निगाह से वह कुछ भी प्रतीत नहीं होता। दोनों ही मन तथा बुद्घि को मानते हैं। दोनों ही स्थूल मन से बुद्घि को सूक्ष्म मानते हैं। हम पाठकों की सुविधा के लिए बुद्घि को मन की ही उन्नत कोटि में गिन लेंगे और आगे का अभ्यास आरम्भ करेंगे।

🔴 अब तक तुमने यह पहचाना है कि हमारे भौतिक आवरण क्या हैं? अब इस पाठ में यह बताने का प्रयत्न किया जाएगा कि असली अहम् 'मैं ' से कितना परे है। वह सूक्ष्म परीक्षण है। भौतिक आवरणों का अनुभव जितनी आसानी से हो जाता है, उतना सूक्ष्म शरीर में से अपने वास्तविक अहम् को पृथक कर सकना आसान नहीं है। इसके लिए कुछ अधिक योग्यता और ऊँची चेतना होनी चाहिए।

🔵 भौतिक पदार्थों से पृथकता का अनुभव हो जाने पर भी अहम् के साथ लिपटा हुआ सूक्ष्म शरीर गड़बड़ में डाल देता है। बहुत से लोग मन को ही आत्मा समझने लगे हैं। आगे हम मन के रूप की व्याख्या न करेंगे, पर ऐसे उपाय बतावेंगे जिससे स्थूल शरीर और भद्दे 'मैं' के टुकड़े-टुकड़े कर सको और उनमें से तलाश कर सको कि इनमें अहम् कौन-सा है? और उनमें भिन्न वस्तुएँ कौन-सी हैं? इस विश्लेषण को तुम मन के द्वारा कर सकते हो और उसे इसके लिए मजबूर कर सकते हो कि इन प्रश्नों का सही उत्तर दे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 16 Nov 2016


👉 गृहस्थ-योग (भाग 5) 16 Nov

🔵 भगवान् मनु का कथन है कि— ‘‘पुरुष उसकी पत्नी और सन्तान मिलाकर ही एक ‘पूरा मनुष्य’ होता है।’’ जब तक यह सब नहीं होता तब तक वह अधकचरा, अधूरा और खंडित मनुष्य है। जैसे प्रवेशिका परीक्षा पास किये बिना कालेज में प्रवेश नहीं हो सकता, उसी प्रकार गृहस्थ की शिक्षा पाये बिना वानप्रस्थ संन्यास आदि में प्रवेश करना कठिन है। आत्मीयता का दायरा क्रमशः ही बढ़ता है। अकेले से, पति पत्नी दो में, फिर बालक के साथ तीन में, सम्बन्धियों में, पड़ौसियों में, गांव, प्रदेश, राष्ट्र, विश्व में यह आत्मीयता क्रमशः बढ़ती है।

🔴 आगे चलकर सारी मनुष्य जाति में आत्म भाव फैलता है फिर पशु पक्षियों में, कीट पतंगों में, जड़ चैतन्य में यह आत्म भाव विकसित हो जाता है। जो प्रगति एक से बढ़कर दो में, दो से तीन में हुई थी, वही उन्नति धीरे धीरे आगे बढ़ती जाती है और मनुष्य सम्पूर्ण चर अचर में आत्म सत्ता को ही समाया देखता है, उसे परमात्मा की दिव्य ज्योति सर्वत्र जगमगाती दीखती है। पत्नी तक अपने मन को जितने अंशों में फैलाया जाता है उतने अंशों में अपनी खुदगर्जी पर संयम होता है। बाल बच्चों के होने पर यह आत्म संयम और अधिक बढ़ता है अन्त में जीव पूर्णतया आत्म संयमी हो जाता है।

🔵 दूसरे के लिए अपने आप को भूलने का अभ्यास क्रमशः इतना अधिक पुष्ट हो जाता है कि अपना कुछ रहता ही नहीं, सब कुछ बिराना हो जाता है। ‘‘मेरा मुझको कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर’’ की ध्वनि अपने अन्दर से निकलने लगती है। खुदी मिटती जाती है और खुदा मिटता जाता है। ‘‘मैं’’ का अन्त होने से ‘‘तू’’ ही शेष रहता है। गृहस्थ योग की छोटी सी सर्व सुलभ साधना जब अपनी विकसित अवस्था तक पहुंचती है तो आत्मा, परमात्मा बन जाता है। अपूर्णता से छुटकारा पाकर पूर्णता उपलब्ध करता है और योग का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 6)

🌹 काम को टालिये नहीं:

🔵 कोई व्यक्ति यह कहकर ऋण चुकाने से इन्कार नहीं कर सकता कि साहब रुपये तो मेरी जेब में हैं परन्तु देने को जी नहीं चाहता। दुनिया ऐसे आदमी को क्या कहेगी? पास में पैसा होते हुए भी केवल यह बहाना करना कि देने की इच्छा नहीं है। यह बेवकूफी और मक्कारी दोनों का ही मिश्रण कहा जायगा। परन्तु जब हम कष्टसाध्य कर्तव्यों और कठिन कार्यों को न करने या बाद में करने को ठानते हैं तो हमारी स्थिति उस बुद्धिहीन व्यक्ति की तरह होती है।
🔴 आज का काम कल पर न टालना एक प्रशंसनीय सद्गुण है उसी प्रकार श्रम साध्य कार्य को सबसे पहले करने का निश्चय सफलता का स्वर्णिम सूत्र है। ऐसे आगत कर्तव्यों से छुटकारा नहीं पाया जा सकता। देर-सवेर उन कार्यों का पूरा करना ही पड़ता है फिर क्या जरूरी है कि हम दूसरे कामों में लगे रहकर कठिन कार्यों का बोझ अपने मन मस्तिष्क पर बनाये रखें।

🔵 सूक्ष्म दृष्टि से देखना चाहिए कि कहीं हममें कठिन कार्यों को टालने, श्रम साध्य कर्तव्यों से बचने की आदत तो नहीं पड़ गयी है। आत्म-निरीक्षण के द्वारा ऐसी स्थिति का पता चले तो दृढ़ निश्चय करना चाहिए कि जिन कार्यों को हम सबसे पीछे डालते रहे हैं उन्हें ही सबसे पहले कर लें। परीक्षा में कठिन प्रश्नों को सर्वप्रथम हल करके आसान सवालों का उत्तर उनके बाद करने की पद्धति सफलता प्राप्त करने का आसान उपाय है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 19)

🌹 युग-निर्माण योजना का शत-सूत्री कार्यक्रम

🔵 15. नशेबाजी का त्याग— नशेबाजी की बुराइयों को समझाने के लिए और इस बुरी आदत को छुड़ाने के लिए सभी प्रचार साधनों का उपयोग किया जाय। पंचायतों, धार्मिक समारोहों एवं शुभ कार्यों के अवसर पर इस हानिकारक बुराई को छुड़ाने के लिए प्रतिज्ञाएं कराई जायें।

🔴 16. व्यायाम और उसका प्रशिक्षण— आसन, व्यायाम, प्राणायाम, सूर्य नमस्कार, खेल-कूद, सवेरे का टहलना, अंग संचालन, मालिश आदि की विधियां सिखाने के लिए ‘वर्ग’ चलाये जांय। सामूहिक व्यायाम करने के लिये जहां सम्भव हो वहां दैनिक व्यवस्था की जाय। व्यायाम अपने आप में एक सर्वांगपूर्ण चिकित्सा शास्त्र है। चारपाई पर पड़े हुए रोगी भी कुछ खास प्रकार के अंग-संचालन, हलके व्यायाम करते हुए कठिन रोगों से छुटकारा पा सकते हैं। बूढ़े आदमी अपने बुढ़ापे को दस-बीस साल आगे धकेल सकते हैं। कमजोर प्रकृति के व्यक्ति, छोटे बच्चे, विद्यार्थी, किशोर, तरुण स्त्रियां, लड़कियां, यहां तक कि गर्भवती स्त्रियों के लिए भी उनकी स्थिति के उपयुक्त व्यायाम बहुत ही आशाजनक प्रतिफल उत्पन्न कर सकता है। इस प्रकार का ज्ञान हम लोग प्राप्त करें और उसको सर्व साधारण को दें। समय-समय पर ऐसे आयोजन करते रहें जिन्हें देखकर लोगों में इस प्रकार की प्रेरणा स्वयं पैदा हो।

🔵 अखाड़े, व्यायामशाला, क्रीड़ा-प्रांगण आदि स्वास्थ्य-संस्थानों की जगह-जगह स्थापना की जानी चाहिए। लाठी, भाला, तलवार, छुरा, धनुष आदि हथियार चलाने की शिक्षा जहां स्वास्थ्य सुधारती है, व्यायाम की आवश्यकता पूर्ण करती है, वहीं वह मनोबल और साहस भी बढ़ाती एवं आत्म रक्षा की क्षमता उत्पन्न करती है। इस प्रकार के प्रशिक्षण देने वाले तैयार करना तथा लोगों में उसके लिए आवश्यक उत्साह पैदा करना हमारा काम होना चाहिए। कुश्ती, दौड़, तैराकी, रस्साकशी, लम्बी कूद, ऊंची छलांग, कबड्डी, गेद आदि का दंगल, एवं प्रतियोगिता आयोजनों और पुरस्कार व्यवस्था करवाने से भी इन कार्यों में लोगों का उत्साह बढ़ता है। ऐसे सम्मेलन यदि ईर्ष्या-द्वेष से बचाये रखे जांय और गलत प्रतिस्पर्धा न होने दी जाय तो पारस्परिक प्रेम भाव बढ़ाने एवं गुण्डागर्दी के विरुद्ध एक शक्ति प्रदर्शन का भी काम दे सकते हैं।

🔴 डम्बल, मुगदर, लेजम, खींचने के स्प्रिंग, तानने के रबड़ के घेरे, गेंद बल्ला, आदि व्यायाम सम्बन्धी उपकरण तथा साहित्य हर जगह मिल सके ऐसी विक्रय व्यवस्था भी हर जगह रहनी चाहिए। ‘फर्स्ट एड’ की शिक्षा का प्रबन्ध हर जगह रहना चाहिए और उसे विधिवत् सीखने तथा रैड क्रास सोसाइटी का प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए उत्साह पैदा करना चाहिए। स्काउटिंग की भी भावना और शिक्षा का प्रसार होना आवश्यक है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

सोमवार, 14 नवंबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 18)

🌹 युग-निर्माण योजना का शत-सूत्री कार्यक्रम

🔵 14. गन्दगी का निराकरण— सार्वजनिक सफाई का प्रश्न सरकार के हाथों छोड़ देने से ही काम न चलेगा। लोगों को अपनी गन्दी आदतें छोड़ने के लिये और सार्वजनिक सफाई में दिलचस्पी लेने की प्रवृत्ति पैदा करनी पड़ेगी। बच्चों को घर से बाहर सार्वजनिक स्थानों पर एवं नालियों पर टट्टी करने बिठा देना, सड़कों तथा गलियों पर घर का कूड़ा बखेर देना, धर्मशालाओं में, प्लेटफार्मों, रेल के डिब्बों और सार्वजनिक स्थानों को फलों के छिलके तथा नाक-थूक, रद्दी कागज, दौने, पत्तल आदि डाल कर गन्दा करना बुरी आदतें हैं, इससे बीमारी और गन्दगी फैलती है।

🔴 देहातों में टट्टी-पेशाब के लिए उचित स्थानों की व्यवस्था नहीं होती। गांव के निकटवर्ती स्थानों तथा गली कूचों में इस प्रकार की गन्दगी फैलती है। जिन कुएं तालाबों का पानी पीने के काम आता है वहां गन्दगी नहीं रोकी जाती। यह प्रवृत्ति बदली जानी चाहिए। लकड़ी के बने इधर से उधर रखे जाने वाले शौचालय यदि देहातों में काम आने लगें तो खेती को खाद भी मिले, गन्दगी भी न फैले और बेपर्दगी भी न हों।

🔵 खुरपी लेकर शौच जाना और गड्ढा खोद कर उसमें शौच करने के उपरान्त मिट्टी डालने की आदत पड़ जाय तो भी ग्रामीण जीवन में बहुत शुद्धि रहे। गड्ढे खोदकर उसमें कंकड़ पत्थर के टुकड़े डाल कर सोखने वाले पेशाब घर बनाये जांय और उनमें चूना फिनायल पड़ता रहे तो जहां-तहां पेशाब करने से फैलने वाली बीमारियों की बहुत रोकथाम हो सकती है। इसी प्रकार पशुओं के मलमूत्र की सफाई की भी उचित व्यवस्था रहे तो आधे रोगों से छुटकारा मिल सकता है। सार्वजनिक गन्दगी की समस्या देखने में तुच्छ प्रतीत होने पर भी वस्तुतः बहुत बड़ी है। लोकसेवकों को जनता की आदतें बदलने के लिये इस सम्बन्ध में कुछ न कुछ करना ही होगा, अन्यथा बढ़ते हुए रोग घट न सकेंगे।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 गृहस्थ-योग (भाग 4) 15 Nov

🔵 प्राचीन समय में अधिकांश ऋषि गृहस्थ थे। वशिष्ठ जी के सौ पुत्र थे, अत्रि जी की स्त्री अनुसूया थीं, गौतम की पत्नी अहिल्या थी, जमदग्नि के पुत्र परशुराम थे, च्यवन की स्त्री सुकन्या थी, याज्ञवल्क्य की दो स्त्री गार्गी और मैत्रेयी थी, लोमश के पुत्र श्रृंगी ऋषि थे। वृद्धावस्था में संन्यास ही लिया हो यह बात दूसरी है परन्तु प्राचीन काल में जितने भी ऋषि हुए हैं वे प्रायः सभी गृहस्थ रहे हैं। गृहस्थ में ही उन्होंने तप किये हैं और ब्रह्म निर्वाण पाया है। योगिराज कृष्ण और योगेश्वर दोनों को ही हम गृहस्थ रूप में देखते हैं। प्राचीन काल में बाल रखने, नंगे बदन रहने, खड़ाऊ पहनने, मृगछाला बिछाने का आत्म रिवाज था, घनी आबादी होने के कारण छोटे गांव और छोटी कुटिया होती थीं। इन चिह्नों के आधार पर गृहस्थ ऋषियों को गृहत्यागी मानना अपने अज्ञान का प्रदर्शन करना है।

🔴  आत्मोन्नति करने के लिये गृहस्थ धर्म एक प्राकृतिक, स्वाभाविक, आवश्यक और सर्व सुलभ योग है। जब तक लड़का अकेला रहता है तब उसकी आत्म भावना का दायरा छोटा रहता है। वह अपने ही खाने, पहनने, पढ़ने, खेलने तथा प्रसन्न रहने की सोचता है। उसका कार्य क्षेत्र अपने आप तक ही सीमित रहता है। जब विवाह हो जाता है तो यह दायरा बढ़ता है, वह अपनी पत्नी की सुख सुविधाओं के बारे में सोचने लगता है, अपने सुख और मर्जी पर प्रतिबन्ध लगाकर पत्नी की आवश्यकतायें पूरी करता है, उसकी सेवा सहायता और प्रसन्नता में अपनी शक्तियों को खर्च करता है। कहने का तात्पर्य है कि आत्म भाव की सीमा बढ़ती है, एक से बढ़कर दो तक आत्मीयता फैलती है।
🔵 इसके बाद एक छोटे शिशु का जन्म होता है। इस बालक की सेवा शुश्रूषा और पालन पोषण में निस्वार्थ भाव में इतना मनोयोग लगता है कि अपनी निज सुख सुविधाओं का ध्यान मनुष्य भूल जाता है और बच्चे की सुविधा का ध्यान रखता है। इस प्रकार यह सीमा दो से बढ़कर तीन होती है। क्रमशः यह मर्यादा बढ़ती है। पिता कोई मधुर मिष्ठान्न लाता है तो उसे खुद नहीं खाता वरन् बच्चों को बांट देता है, खुद कठिनाई में रहकर भी बालकों की तंदुरुस्ती, शिक्षा और प्रसन्नता का ध्यान रखता है। दिन दिन खुदगर्जी के ऊपर अंकुश लगाता जाता है, आत्म संयम सीखता जाता है और स्त्री, पुत्र, सम्बन्धी, परिजन आदि में अपनी आत्मीयता बढ़ाता जाता है। क्रमशः आत्मोन्नति की ओर चलता जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 5)

🌹 समय का सदुपयोग करना सीखें

🔵  इस ‘कल’ से बचने के लिए सन्त कबीर ने चेतावनी देते हुए कहा है— ‘काल करै सो आज कर, आज करै सो अब। पल में परलै होयगी, बहुरि करेगा कब।’’ अर्थात् कल पर अपने काम को न टाल। जिन्हें आज करना हो वे अभी ही पूरा कर लें। स्मरण रखा जाना चाहिए कि प्रत्येक काम का अपना अवसर होता है और अवसर वही है जब वह काम अपने सामने पड़ा है। अवसर निकल जाने पर काम का महत्व ही समाप्त हो जाता है तथा बोझ भी बढ़ता जाता है। मनीषी कहते हैं—‘‘बहुत से लोगों ने अपना काम कल पर छोड़ा है और वे संसार में पीछे रह गये, अन्य लोगों द्वारा प्रतिद्वन्दिता में हरा दिये गये।’’

🔴 नेपोलियन ने आस्ट्रिया को इसलिए हरा दिया कि वहां के सैनिकों ने उसका सामना करने में कुछ ही मिनटों की देर कर दी थी। लेकिन वहीं नेपोलियन वाटरलू के युद्ध में पराजित हुआ और बन्दी बना लिया गया क्योंकि उसका एक सेनापति ग्रुशी पांच मिनट विलम्ब से आया। इसी अवसर का सदुपयोग करके अंग्रेजों ने उसे कैद कर लिया। समय की उपेक्षा करने पर देखते-देखते विजय का पासा पराजय में पलट जाता है। लाभ हानि में बदल जाता है।

🔵 समय की चूक पश्चात्ताप की हूक बन जाती है। जीवन में प्रगति की इच्छा रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने किसी भी कर्तव्य को भूलकर भी कल पर न डालें जो आज किया जाना चाहिए। आज के काम के लिए आज का ही दिन निश्चित है और कल के काम के लिए कल का दिन निर्धारित है। आज का काम कल पर डाल देने से कल का भार दो गुना हो जायगा, जो निश्चित ही कल के समय में पूरा नहीं हो सकता। इस प्रकार आज का काम कल पर और कल का काम परसों पर ठेला हुआ काम इतना बढ़ जायगा कि वह फिर किसी भी प्रकार पूरा नहीं किया जा सकता। इतना ही नहीं जो काम हमें आज करने हैं, वह कल भी उतने ही महत्व के रहेंगे, यह नहीं कहा जा सकता। परिस्थितियां क्षण-क्षण बदलती रहती हैं और पिछड़े कार्यों का कोई महत्व नहीं रह जाता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 28)

🌞 दूसरा अध्याय

🔴 बार-बार समझ लो। प्राथमिक शिक्षा का बीज मंत्र 'मैं' है। इसका पूरा अनुभव करने के बाद ही आध्यात्मिक उन्नति के पथ पर अग्रसर हो सकोगे। तुम्हें अनुभव करना होगा मेरी सत्ता शरीर से भिन्न है। अपने को सूर्य के समान शक्ति का एक महान् केन्द्र देखना होगा, जिसके इर्द-गिर्द अपना संसार घूम रहा है। इससे नवीन शक्ति आवेगी, जिसे तुम्हारे साथी प्रत्यक्ष अनुभव करेंगे। तुम स्वयं स्वीकार करोगे, अब मैं सुदृढ़ हूँ और जीवन की आँधियाँ मुझे विचलित नहीं कर सकतीं। केवल इतना ही नहीं इससे भी आगे है। अपनी उन्नति के आत्मिक विकास के साथ उस योग्यता को प्राप्त करता हुआ भी देखोगे जिसके द्वारा जीवन की आँधियों को शान्त किया जाता है और उन पर शासन किया जाता है।

🔵 आत्म-ज्ञानी दुनियाँ के भारी कष्टों की दशा में भी हँसता रहेगा और अपनी भुजा उठाकर कष्टों से कहेगा-'जाओ, चले जाओ, जिस अन्धकार से तुम उत्पन्न हुए हो उसी में विलीन हो जाओ।' धन्य है वह जिसने 'मैं' के बीज मंत्र को सिद्घ कर लिया है।

🔴 जिज्ञासुओ! प्रथम शिक्षा का अभ्यास करने के लिए अब हमसे अलग हो जाओ। अपनी मन्द-गति देखो, तो उतावले मत होओ। आगे चलने में यदि पाँव पीछे फिसल पड़े तो निराश मत होओ। आगे चलकर तुम्हें दूना लाभ मिल जाएगा। सिद्घि और सफलता तुम्हारे लिए है, वह तो प्राप्त होनी ही है। बढ़ो, शांति के साथ थोड़ा प्रयत्न करो।

इस पाठ के मंत्रः


मैं प्रतिभा और शक्ति का केन्द्र हूँ।
मैं विचार और शक्ति का केन्द्र हूँ।
मेरा संसार मेरे चारों ओर घूम रहा है।
मैं शरीर से भिन्न हूँ।
मैं अविनाशी हूँ, मेरा नाश नहीं हो सकता।
मैं अखण्ड हूँ, मेरी क्षति नहीं हो सकती।.........

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part2.6

रविवार, 13 नवंबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 17)

🌹 युग-निर्माण योजना का शत-सूत्री कार्यक्रम

🔵 12. पकाने की पद्धति में सुधार— भाप से भोजन पकाने के बर्तन एवं चक्कियां उपलब्ध हो सकें ऐसी निर्माण और विक्रय की व्यवस्था रहे। इनका मूल्य सस्ता रहे जिससे उनकी लोकप्रियता बढ़े। अब बाल बियरिंग लगी हुई चक्की बनने लगी हैं जो चलने में बहुत हलकी होती हैं तथा घण्टे में काफी आटा पीसती हैं। इनका प्रचलन घर-घर किया जाय और इनकी टूट-फूट को सुधारने तथा चलाने सम्बन्धी आवश्यक जानकारी सिखाई जाय। खाते-पीते घरों की स्त्रियां चक्की पीसने में अपमान और असुविधा समझने लगी हैं, उन्हें चक्की के स्वास्थ्य सम्बन्धी लाभ समझाये जायें। पुरुष स्वयं पीसना आरम्भ करें। लोग हाथ का पिसा आटा खाने का ही व्रत लें तो चक्की का प्रचलन बढ़ेगा। इसी प्रकार भाप से भोजन पकने लगा तो वह 70 फीसदी अधिक पौष्टिक होगा और खाने में स्वाद भी लगेगा। इनका प्रसार आन्दोलन के ऊपर ही निर्भर है।

🔴 13. सात्विक आहार की पाक विद्या—
तली हुई, भुनी और जली हुई अस्वास्थ्यकर मिठाइयों और पकवानों के स्थान पर ऐसे पदार्थों का प्रचलन किया जाय जो स्वादिष्ट भी लगें और लाभदायक भी हों। लौकी की खीर, गाजर का हलुआ, सलाद, कचूमर, श्रीखण्ड, मीठा दलिया अंकुरित अन्नों के व्यंजन जैसे पदार्थ बनाने की एक स्वतन्त्र पाक विद्या का विकास करना पड़ेगा जो दावतों में भी काम आ सके और हानि जरा भी न पहुंचाते हुए स्वादिष्ट भी लगें। चाय पीने वालों की आदत छुड़ाने के लिये गेहूं के भुने दलिये की या जड़ी बूटियों से बने हुए क्वाथ की चाय बनाना बताया जा सकता है। पान सुपाड़ी के स्थान पर सोंफ और धनिया संस्कारित करके तैयार किया जा सकता है। प्राकृतिक आहार के व्यंजनों की पाक विद्या का प्रसार हो सके तो स्वास्थ्य रक्षा की दिशा में बड़ी सहायता मिले।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 गृहस्थ-योग (भाग 3) 14 Nov

🔵 अनेक प्रकार के योगों में एक ‘‘गृहस्थ योग’’ भी है। गम्भीरता पूर्वक इसके ऊपर जितना ही विचार किया जाता है यह उतना ही अधिक महत्वपूर्ण, सर्व सुलभ तथा स्वल्प श्रम साध्य है। इतना होते हुए भी इससे प्राप्त होने वाली जो सिद्धि है वह अन्य किसी भी योग से कम नहीं वरन् अधिक ही है। गृहस्थाश्रम अन्य तीनों आश्रमों की पुष्टि और वृद्धि करने वाला है, दूसरे शब्दों में यों कहा जा सकता है ‘कि ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास यह तीनों ही आश्रम गृहस्थाश्रम को सुव्यवस्थित और सुख शान्तिमय बनाने के लिये हैं।

🔴  ब्रह्मचारी इसलिये ब्रह्मचर्य का पालन करता है कि उसका भावी गृहस्थ जीवन शक्तिपूर्ण और समृद्ध हो। वानप्रस्थ और संन्यासी लोग, लोक हित की साधना करते हैं, संसार को अधिक सुख शांतिमय बनाने का प्रयत्न करते हैं। यह ‘लोक’ और ‘संसार’ क्या है? दूसरे शब्दों में गृहस्थाश्रम ही है। तीनों आश्रम एक ओर—और गृहस्थाश्रम दूसरी ओर- यह दोनों पलड़े बराबर हैं। यदि गृहस्थाश्रम की व्यवस्था बिगड़ जाय तो अन्य तीनों आश्रमों की मृत्यु ही समझिये।

🔵 गृहस्थ धर्म का पालन करना धर्मशास्त्रों के अनुसार मनुष्य का आवश्यक कर्तव्य है। लिखा है कि—संतान के बिना नरक को जाते हैं, उनकी सद्गति नहीं होती। लिखा है कि— सन्तान उत्पन्न किये बिना पितृ ऋण से छुटकारा नहीं मिलता। कहते हैं कि—जिसके सन्तति न हो उनका प्रातःकाल मुख देखने से पाप लगता है। इस प्रकार के और भी अनेक मन्तव्य हिन्दू धर्म में प्रचलित हैं जिनका तात्पर्य यह है कि गृहस्थ धर्म का पालन करना आवश्यक है। इतना जोर क्यों दिया गया है? इस बात पर जब तात्विक दृष्टि से गंभीर विवेचना की जाती है तब प्रकट होता है कि गृहस्थ धर्म एक प्रकार की योग साधना है जिससे आत्मिक उन्नति होती है, स्वर्ग मिलता है, मुक्ति प्राप्त होती है और ब्रह्म निर्वाण की सिद्धि मिलती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 4) 14 Nov

🌹 समय का सदुपयोग करना सीखें

🔵 सचमुच जो व्यक्ति काम से बचने, जी चुराने के कारण अब के काम को तब के लिए टालकर अपने बहुमूल्य क्षणों को आलस्य-प्रमाद, विलास-विनोद में व्यर्थ नष्ट करते रहते हैं। निश्चय ही समय उन्हें अनेकों सफलताओं से वंचित कर देता है। फसल की सामयिक आवश्यकताओं को तत्काल पूरा न कर आगे के लिए टालने वाले किसान की फसल चौपट होना स्वाभाविक है। जो विद्यार्थी वर्ष के अन्त तक अपनी तैयारी का प्रश्न टालते रहते हैं, सोचते हैं—‘‘अभी तो काफी समय पड़ा है फिर पढ़ लेंगे’’ वे परीक्षा काल के नजदीक आते ही बड़े भारी क्रम को देखकर घबरा जाते हैं और कुछ भी नहीं कर पाते।

🔴 फलतः उनकी सफलता की आशा दुराशा मात्र बनकर रह जाती है। कुछ भाग-दौड़ करके सफल भी हो जांय तो भी वे दूसरों से निम्न श्रेणी में ही रहते हैं। अपने वायदे सौदे, लेन-देन आदि को आगे के लिए टालते रहने वाले व्यापारी का काम-धन्धा चौपट हो जाय तो इसमें कोई संदेह नहीं। यही बात वेतन भोगी कर्मचारियों पर भी लागू होती है। टालमटोल की आदत के कारण उन्हें प्रस्तुत कार्य से सम्बन्धित व्यक्तियों एवं अपने बड़े अफसरों का कोपभाजन तो बनना ही पड़ता है, साथ ही विश्वसनीयता भी जाती रहती है।

🔵 कई लोगों में अच्छी प्रतिभा, बुद्धि होती है, शक्ति-सामर्थ्य भी होती है। उन्हें जीवन में उचित अवसर भी मिलते हैं किन्तु टालमटोल की अपने बुरी आदत के कारण वे अपनी इन विशेषताओं से कोई लाभ नहीं उठा पाते और दीन-हीन अवस्था में ही पड़े रहते हैं। साहित्यकार, कलाकार आदि का गया हुआ समय जिसमें वे नव रचना, नव सृजन करके जीविकोपार्जन कर सकते थे, वह लौटकर फिर कभी नहीं आता। निश्चय ही किसी काम को आगे के लिए टालते रहना दुष्परिणाम ही प्रस्तुत करता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 27)

🌞 दूसरा अध्याय

🔴 ध्यानावस्था में आत्म-स्वरूप को देह से अलग करो और क्रमशः उसे आकाश, हवा, अग्नि, पानी, पृथ्वी की परीक्षा में से निकलते हुए देखो। कल्पना करो कि मेरी देह की बाधा हट गई है और अब मैं स्वतंत्र हो गया हूँ। अब तुम आकाश में इच्छापूर्वक ऊँचे-नीचे पखेरुओं की तरह जहाँ चाहे उड़ सकते हो। हवा के वेग से गति में कुछ भी बाधा नहीं पड़ती और न उसके द्वारा जीव कुछ सूखता ही है।

🔵 कल्पना करो कि बड़ी भारी आग की ज्वाला जल रही है और तुम उसमें होकर मजे में निकल जाते हो और कुछ भी कष्ट नहीं होता है। भला जीव को आग कैसे जला सकती है? उसकी गर्मी की पहुँच तो सिर्फ शरीर तक ही थी। इसी प्रकार पानी और पृथ्वी के भीतर भी जीव की पहुँच वैसे ही है जैसे आकाश में। अर्थात् कोई भी तत्त्व तुम्हें छू नहीं सकता और तुम्हारी स्वतन्त्रता में तनिक भी बाधा नहीं पहुँचा सकता।

🔴 इस भावना से आत्मा का स्थान शरीर से ऊँचा ही नहीं होता बल्कि उसको प्रभावित करने वाले पंच-तत्त्वों से भी ऊपर उठता है। जीव देखने लगता है कि मैं देह ही नहीं वरन् उसके निर्माता पंच-तत्त्वों से भी ऊपर हूँ। अनुभव की इस चेतना में प्रवेश करते ही तुम्हें प्रतीत होगा कि मेरा नया जन्म हुआ है। नवीन शक्ति का संचार अपने अन्दर होता हुआ प्रतीत होगा और ऐसा भी न होगा कि पुराने वस्त्रों की तरह भय का आवरण ऊपर से हटा दिया गया है। अब ऐसा विश्वास हो जाएगा कि जिन वस्तुओं से मैं अब तक ही डरा करता था वे मुझे कुछ भी हानि नहीं पहुँचा सकतीं। शरीर तक ही उनकी गति है। सो ज्ञान और इच्छा शक्ति द्वारा शरीर से भी इन भयों को दूर हटाया जा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part2.5

👉 गृहस्थ-योग (भाग 2) 13 Nov



🔵 ‘योग’ का अर्थ है— ‘जोड़ना’—‘मिलना’। मनुष्य की साधारण स्थिति ऐसी होती है जिसमें वह अपूर्ण होता है। इस अपूर्णता को मिटाने के लिए वह किसी दूसरी शक्ति के साथ अपने आप को जोड़कर अधिक शक्ति का संचय करता है, अपनी सामर्थ्य बढ़ाता है और उस सामर्थ्य के बल से अपूर्णता को दूर कर पूर्णता की ओर तीव्र गति से बढ़ता जाता है, यही योग का उद्देश्य है। उस उद्देश्य की पूर्ति के लिये हठयोग, राजयोग, जपयोग, लययोग, तन्त्रयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, स्वरयोग, ऋजुयोग, महायोग, कुंडलिनी योग, बुद्धियोग, समत्वयोग, प्राणयोग, ध्यानयोग, सांख्ययोग, जड़योग, सूर्ययोग, चन्द्रयोग, सहजयोग, प्रणवयोग, नित्ययोग आदि 84 प्रसिद्ध योग और 700 अप्रसिद्ध योग हैं।

🔴 इन विभिन्न योगों की कार्य प्रणाली, विधि व्यवस्था और साधना पद्धति एक दूसरे से बिलकुल भिन्न है तो भी इन सबकी जड़ में एक ही तथ्य काम कर रहा है। माध्यम सबके अलग अलग हैं पर उन सभी माध्यमों द्वारा एक ही तत्व ग्रहण किया जाता है। तुच्छता से महानता की ओर, अपूर्णता से पूर्णता की ओर, असत् से सत् की ओर, तम से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर, जो प्रगति होती है उसी का नाम योग है। अणु आत्मा का परम आत्मा बनाने का प्रयत्न ही योग है। यह प्रयत्न जिन जिन मार्गों से होता है उन्हें योग मार्ग कहते हैं।

🔵 एक स्थान तक पहुंचने के लिये विभिन्न दिशाओं से विभिन्न मार्ग होते हैं, आत्म विस्तार के भी अनेक मार्ग हैं। इन मार्गों में स्थूल दृष्टि से भिन्नता होते हुए भी सूक्ष्म दृष्टि से पूर्ण रूपेण एकता है। जैसे भूख बुझाने के लिये कोई रोटी, कोई चावल, कोई दलिया, कोई मिठाई, कोई फल, कोई मांस खाता है। यह सब चीजें एक दूसरे से पृथक प्रकार की हैं तो भी इन सबसे ‘‘भूख मिटाना’’ यह एक ही उद्देश्य पूर्ण होता है। इसी प्रकार योग के नाना रूपों का एक ही प्रयोजन है—आत्म भाव को विस्तृत करना—तुच्छता को महानता की पूंछ के साथ बांध देना।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 3) 13 Nov

🌹 समय का सदुपयोग करना सीखें

🔵 फ्रेंकलिन ने कहा है—‘समय को बर्बाद मत करो क्योंकि समय से ही जीवन बना है।’ इसकी महत्ता का प्रतिपादन करते हुए मनीषी जैक्सन ने कहा है— ‘सांसारिक खजानों में सबसे मूल्यवान खजाना समय का है।’ उसका सदुपयोग करके दुर्बल सबल बन सकता है, निर्धन धनवान और मूर्ख विद्वान बन सकता है। वह ईश्वर प्रदत्त एक ऐसी सुनिश्चित एवं अमूल्य निधि है जिसमें एक क्षण भी वृद्धि कर सकना किसी के लिए भी असम्भव है। वह किसी का दास नहीं वरन् अपनी गति से आगे बढ़ता रहता है और कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखता।

🔴 समय का मूल्यांकन करते हुए आक्सफोर्ड की प्रसिद्ध घड़ी ‘आल्सीसोल्ज’ के डायल पर महत्वपूर्ण पंक्तियां अंकित हैं। उस पर लिखा हुआ है— ‘हमें जो घण्टे सौंपे गये हैं, वे नष्ट हो जाते हैं। काल अनन्त है। मनुष्य के हिस्से में काल का केवल एक छोटा सा अंश ही आया है। जीवन की भांति ही बीते हुए समय को भी वापिस कभी नहीं बुलाया जा सकता।’ निःसंदेह वक्त और सागर की लहरें किसी की प्रतीक्षा नहीं करतीं। हमारा कर्तव्य है कि हम समय का पूरा-पूरा सदुपयोग करें।

🔵 वस्तुतः हर कार्य को निर्धारित वक्त पर करना ही समय का सदुपयोग है। जीवन में प्रगति करने का यही राजमार्ग है, पर हममें से कितने ही यह जानते हुए भी समय को बर्बाद करते रहते हैं और किसी काम को आगे के लिए टाल देते हैं। ‘आज नहीं कल करेंगे।’ इस कल के बहाने हमारा बहुत-सा वक्त नष्ट हो जाता है। बड़ी योजनायें कार्य रूप में परिणित होने की प्रतीक्षा में धरी रह जाती हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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