मंगलवार, 21 मई 2019

👉 How to Stay Happy? (Part 2)

It is not true that everything is going perfectly well in the life of a happy person. Everybody has to go through his/her share of difficult and challenging situations in life. All of us desire to have a better life, but we should not waste away whatever good things we already have in pursuit for something better. Instead we should utilize what we have to obtain what we desire further.

One might find happiness in the pages of an old book kept in one’s shelf or in something simple that a person cooked, while that recipe may not even be found in the menu of a 5-star restaurant. There could be times when a person might feel happy after keeping a vessel of water for birds to drink on a hot summer day, while he might not be satisfied with Rs. 500/- offering at a temple. In this way, one will realize that happiness is related to the emotions which make the mind happy and contented. Emotions which are disturbing, annoying and unpleasant can never give happiness.

In fact, most of our worries are centered on what others will think or say to what we do. If we want to lead a happy life, psychologists recommend that we stay connected to a goal instead of people and things. Another suggestion is that one should do what one’s conscience propels him to pursue instead of worrying about what others will say or think. It will be his great loss if he does not pursue his dream frightened of what others will think about it. Any worthy step that a person executes in a planned manner not only gives him/her happiness but also contentment. Positive thinking and diligent efforts are the keys to happiness.

To be continued...
📖 From Akhand Jyoti

👉 Krodh Ko Jito क्रोध को जीतो आत्मचिंतन के क्षण

■ क्रोध को क्रोध से जीतने का प्रयास करना बड़ा भारी बिगाड़ पैदा करना है। छोटे-छोटे उलाहने, शब्दों की मार, नुक्ताचीनी, ताने मारना, व्यंग्य करना, प्रतिशोध या घृणावश बुरे नहीं जान पड़ते, पर मन, मस्तिष्क और आत्मा पर इनका विषवत् दुष्प्रभाव पड़ता है। ये दोष शरीर को कमजोर बनाते हैं, मस्तिष्क को खोखला और आत्मा को अपवित्र करते हैं।

◇ मनुष्य यदि सामान्य रूप से सुखी रहना चाहता है तो उसे अपनी परिस्थिति से परे की महत्त्वाकाँक्षाओं का त्याग करना होगा। उसे अपनी सीमा में रहकर आगे के लिए प्रयास करना होगा। उन्हें प्रकृति के इस नियम में आस्था रखनी ही होगी कि मनुष्य का विकास क्रमपूर्वक होता है, सहसा ही कोई कामनाओं के बल पर ऊँचा नहीं उठ जाता। जीवन में सुख-शान्ति के लिए आवश्यक है कि अपनी सीमाओं के अनुरूप ही कामना की जाये, उसी में रहकर धीरे-धीरे विकास की ओर बढ़ा जाये।

★ संसार परमात्मा की लीला भूमि और मनुष्य की कर्मभूमि है। यहाँ  पग-पग पर प्रतियोगिता में-परीक्षा में अपने को डालकर पात्रता प्रमाणित करनी होती है। उसमें विजय प्राप्त करने पर  ही पुरस्कार मिलता है। परीक्षा तथा प्रतियोगिता उत्तीर्ण किए बिना न तो आज तक किसी को सफलता तथा श्रेय मिला है और न आगे ही मिलेगा। जिसे श्रेय एवं सफलता की आकाँक्षा है, वह अपने को प्रतियोगी मानकर इस कर्मभूमि में अपनी कर्मठता तथा कर्त्तव्यशीलता का प्रमाण दे और तब देखे कि उसे मनोवांछित फल मिलता है या नहीं।

□ संसार में बुराइयाँ इसलिए बढ़ रही हैं कि बुरे आदमी अपने बुरे आचरणों द्वारा दूसरों को ठोस शिक्षण देते हैं। उन्हें देखकर यह अनुमान लगा लिया जाता है कि इस कार्य पर इनकी गहरी निष्ठा है, जबकि सद्विचारों के प्रचारक वैसे उदाहरण अपने जीवन में प्रस्तुत नहीं कर पाते। वे कहते तो बहुत कुछ हैं, पर ऐसा कुछ नहीं कर पाते जिससे उनकी निष्ठा की सच्चाई प्रतीत हो।

सोमवार, 20 मई 2019

👉 जीवन साधना के त्रिविध पंचशील (भाग 6)

समाज निर्माणः-

(१) हममें से हर व्यक्ति अपने को समाज का एक अविच्छिन्न अंग मानें। अपने को उसके साथ अविभाज्य घटक मानें। सामूहिक उत्थान और पतन पर विश्वास करें। एक नाव में बैठे लोग जिस तरह एक साथ डूबते या पार होते हैं, वैसी ही मान्यता अपनी रहे। स्वार्थ और परमार्थ को परस्पर गुँथ दें। परमार्थ को स्वार्थ समझें और स्वार्थ सिद्धि की बात कभी ध्यान में आये तो वह संकीर्ण नहीं उदात्त एवं व्यापक हो। मिल जुलकर काम करने और मिल बाँटकर खाने की आदत डाली जाय।

(२)मनुष्यों के बीच सज्जनता, सद्भावना एवं उदार सहयोग की परम्परा चले। दान विपत्ति एवं पिछड़ेपन से ग्रस्त लोगों को पैरों पर खड़े होने तक के लिए दिया जाय। इसके अतिरिक्कत उसका सतत प्रवाह सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए ही नियोजित हो। साधारणतया मुफ्त में खाना और खिलाना अनैतिक समझा जाय। इसमें पारिवारिक या सामाजिक प्रीति भोजों का जहाँ औचित्य हो, वहाँ अपवाद रूप से छूट रहे। भिक्षा व्यवसाय पनपने न दिया जाय। दहेज, मृतक भोज, सदावर्त धर्मशाला आदि ऐसे दान जो मात्र प्रसन्न करने भर के लिये दिये जाते हैं और उस उदारता के लाभ समर्थ लोग उठाते हैं, अनुपयुक्त माने और रोके जायें। साथ ही हर क्षेत्र का पिछड़ापन दूर करने के लिए उदार श्रमदान और धनदान को अधिकाधिक प्रोत्साहित किया जाय।

(३) किसी मान्यता या प्रचलन को शाश्वत या सत्य न माना जाय, उन्हें परिस्थितियों के कारण बना समझा जाय। उनमें जितना औचित्य, न्याय और विवेक जुड़ा हो उतना ग्राह्य और जो अनुपयुक्त होते हुए भी परम्परा के नाम पर गले बंधा हो, उसे उतार फेंका जाय। समय- समय पर इस क्षेत्र का पर्यवेक्षण होते रहना चाहिये और जो असामयिक, अनुपयोगी हो उसे बदल देना चाहिये। इस दृष्टि से लिंग भेद, जाति भेद के नाम पर चलने वाली विषमता सर्वथा अग्राह्य समझी जाय।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन वाणी का संयम (Vani Ka Sanyam)


👉 प्रेरणादायक प्रसंग सेवा भाव ( Seva Bhav)


👉 Achchha Insaan अच्छा इंसान....

एक 6 वर्ष का लडका अपनी 4 वर्ष की छोटी बहन के साथ बाजार से जा रहा था। अचानक से उसे लगा कि, उसकी बहन पीछे रह गयी है। वह रुका, पीछे मुड़कर देखा तो जाना कि, उसकी बहन एक खिलौने के दुकान के सामने खडी कोई चीज निहार रही है।

लडका पीछे आता है और बहन से पूछता है, "कुछ चाहिये तुम्हें?" लडकी एक गुड़िया की तरफ उंगली उठाकर दिखाती है। बच्चा उसका हाथ पकडता है, एक जिम्मेदार बडे भाई की तरह अपनी बहन को वह गुड़िया देता है। बहन बहुत खुश हो गयी।

दुकानदार यह सब देख रहा था, बच्चे का प्रगल्भ व्यवहार देखकर आश्चर्यचकित भी हुआ। अब वह बच्चा बहन के साथ काउंटर पर आया और दुकानदार से पूछा, "सर, कितनी कीमत है इस गुड़िया की ?"

दुकानदार एक शांत और गहरा व्यक्ति था, उसने जीवन के कई उतार देखे थे, उन्होने बड़े प्यार और अपनत्व से बच्चे से पूछा, "बताओ बेटे, आप क्या दे सकते हो ?" बच्चा अपनी जेब से वो सारी सीपें बाहर निकालकर दुकानदार को देता है जो उसने थोड़ी देर पहले बहन के साथ समुंदर किनारे से चुन चुन कर बीनी थी!

दुकानदार वो सब लेकर यूँ गिनता है जैसे कोई पैसे गिन रहा हो।सीपें गिनकर वो बच्चे की तरफ देखने लगा तो बच्चा बोला,"सर कुछ कम हैं क्या?" दुकानदार : "नहीं - नहीं, ये तो इस गुड़िया की कीमत से भी ज्यादा है, ज्यादा मैं वापस देता हूँ" यह कहकर उसने 4 सीपें रख ली और बाकी की बच्चे को वापिस दे दी। बच्चा बड़ी खुशी से वो सीपें जेब मे रखकर बहन को साथ लेकर चला गया।

यह सब उस दुकान का कामगार देख रहा था, उसने आश्चर्य से मालिक से पूछा, "मालिक ! इतनी महंगी गुड़िया आपने केवल 4 सीपों के बदले मे दे दी?" दुकानदार एक स्मित संतुष्टि वाला हास्य करते हुये बोला, "हमारे लिये ये केवल सीप है पर उस 6 साल के बच्चे के लिये अतिशय मूल्यवान है और अब इस उम्र में वो नहीं जानता, कि पैसे क्या होते हैं?

पर जब वह बडा होगा ना.. और जब उसे याद आयेगा कि उसने सीपों के बदले बहन को गुड़िया खरीदकर दी थी। तब उसे मेरी याद जरुर आयेगी, और फिर वह सोचेगा कि, "यह विश्व अच्छे मनुष्यों से भी भरा हुआ है।"

यही बात उसके अंदर सकारात्मक दृष्टिकोण बढानेे में मदद करेगी और वो भी एक अच्छा इंन्सान बनने के लिये प्रेरित होगा।

👉 आत्मचिंतन के क्षण Moments of self-expression

■ मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा तथा कार्यों में अभिमान प्राप्त करने की इच्छा खाज की भाँति बड़ा सुहावना रोग है। इसके वश में हो जाने पर मनुष्य सत्कर्मों तक को अभिमान की अग्नि से भस्म कर देता है, प्रमादी बन जाता है। अपने भाग्य पर इतराता है और आत्मा का पतन करता है। अभिमान बड़ी संक्रामक बीमारी है, जो मनुष्य को अधोगति में पहुँचा सकती है।

◆ परिश्रम और केवल उचित परिश्रम ही सफलता का आधार है। इसके लिए परमात्मा की अनायास कृपा पर निर्भर करना अनधिकार चेष्टा है, जो किसी प्रकार पूरी नहीं हो सकती। परमात्मा कृपा करता अवश्य है, किन्तु उन्हीं पर जो पहले स्वयं अपने पर कृपा करते हैं। उस परमात्मा ने मनुष्य को पहले से ही बल, बुद्धि और विशेषताओं से भरा शरीर देकर महती कृपा कर दी है। अपनी योग्यता और पात्रता बढ़ाइए , अपना लक्ष्य निश्चित करिये और एकनिष्ठ होकर पुरुषार्थ में संलग्न हो जाइए। आपको सफलता अवश्य मिलेगी।
★ सामाजिक सुख-शान्ति और मानवता के मंगल के लिए आवश्यक है कि संसार से मांस भोजन की प्रथा को उठा दिया जाये। इसकी विकृति के कारण मनुष्य क्रोधी बनकर असामाजिक बन जाता है। समाज एवं राष्ट्र के उत्थान के लिए जिन सुंदर गुणों, सुकुमार भावनाओं और सद्प्रवृत्तियों की आवश्यकता होती है, मांसाहार के कारण उनका स्निग्ध विकास नहीं हो पाता। मांसाहार से मनुष्य में हिंसा की भावना बढ़ती है, जिससे समाज में अशान्ति और अमंगल की परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।

शुक्रवार, 17 मई 2019

Gayatri Anushthan Karane Ke Uddeshya गायत्री अनुष्ठान करने के उद्देश्य |...



Title

👉 जीवन साधना के त्रिविध पंचशील (भाग 5)

(४) पारिवारिक पंचशीलों में श्रमशीलता, मितव्ययिता, सुव्यवस्था, शालीन शिष्टता और उदार सहकारिता की गणना की गयी है। इन पाँच गुणों को हर सदस्य के स्वभाव में कैसे सम्मिलित किया जाय। इसके लिए उपदेश देने से काम नहीं चलता, ऐसे व्यावहारिक कार्यक्रम बनाने पड़ते हैं, जिन्हें करते रहने से वे सिद्धान्त व्यवहार में उतरें।

(५) उत्तराधिकार का लालच किसी के मस्तिष्क में नहीं जमने देना चाहिए, वरन् हर सदस्य के मन मे यह सिद्धान्त जमना चाहिए कि परिवार की संयुक्त सम्पदा में उसका भरण- पोषण, शिक्षण एवं स्वावलम्बन सम्भव हुआ है। इस ऋण को चुकाने में ही ईमानदारी है। बड़ों की सेवा और छोटों की सहायता के रूप में यह ऋण हर वयस्क स्वावलम्बी को चुकाना चाहिए। कमाऊ होते ही आमदनी जेब में रखना और पत्नी को लेकर मनमाना खर्च करने के लिए अलग हो जाना प्रत्यक्ष बेईमानी है। उत्तराधिकार का कानून मात्र कमाने में असमर्थों के लिए लागू होना चाहिए, न कि स्वावलम्बियों की मुफ्त की कमाई लूट लेने के लिए। अध्यात्मवाद और साम्यवाद दोनों ही इस मत के हैं कि पूर्वजों की छोड़ी कमाई को असमर्थ आश्रित ही तब तक उपयोग करें जब तक कि वे स्वावलम्बी नहीं बन जाते।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन अनीति नहीं बरते


👉 प्रेरणादायक प्रसंग बुद्धि की परीक्षा


👉 विक्रमादित्य राज्य त्याग में सुख क्यो

राजा विक्रमादित्य के राज्य में एक सदाचारी, सन्तोषी ब्राह्मण रहता था। वह निर्धन था। स्त्री की प्रेरणा से धन प्राप्ति के निमित्ति घर से निकला तो जंगल में एक महात्मा से भेंट हुई उन्होने उसे चिंतित देख आश्वासन दिया और विक्रमादित्य को प्रत्र लिखा कि तुम्हारी इच्छा पूर्ति का अब समय आ गया है। अपना राज्य इस ब्राह्मण को देकर यहाँ चले आओ।

वह पत्र विक्रमादित्य ने पढ़ा तो उन्हें बडी प्रसन्नता हुई और ब्राह्मण को राज्य साँपने की तैयारी की। ब्राह्मण ने राजा को राज्य- त्याग के लिए इतना उत्सुक और अत्यन्त आनन्दविभोर देखा तो सोचने लगा कि जब राजा ही राज्य सुख को लात मारकर योगी के पास जाने में विशेष आनन्द अनुभव कर रहे है तो योगी के पास अवश्य ही कोई राज्य से भी बड़ा सुख है। अत: उसने राजा से कहा कि -- '' महाराज। मै अभी महात्माजी के पास पुन : जा रहा हूँ,लौटकर राज्य लूँगा। '' यह कह कर योगी के पास पहुँचकर बोला कि '' भगवन्। राजा तो राज्य- त्याग कर आपके पास आने के लिए नितान्त उतावला और हर्ष विभोर हो गया। इससे जान पड़ता है कि आपके पास राज्य से भी बड़ी कोई वस्तु है, मुझे वही दीजिए। ''

महात्मा ने प्रसन्नचित्त हो ब्राह्मण देवता को आत्मविद्या सिखाई और उसे वह वैभव दे दिया जो उसे मोक्ष दिला गया। उस सुख की तुलना में सारे सांसारिक सुख नगण्य है।

जो आत्मावलम्बी बहुरंगीय दुनिया के सुख- आकर्षणों को ठुकराता है, अन्तत : वही इस श्रेय का भागी बनता है। जो क्षणिक सुख लाभ के मोह में उन्हीं में लिप्त हो जाते हैं थे अन्तत : त्रास ही पाते हैं, भले ही उन्हें उसमें तात्कालिक दृष्टि से सुख मिलता हो। उनकी उपमा तो उस बालक से ही दी जा सकती है जो खिलौनों से खेलकर सामयिक आनन्द पाने में ही रुचि लेता है। आयु की दृष्टि से बड़े  होने पर भी ऐसे मन्द बुद्धि बालकों का अनुपात जन समुदाय में अधिक ही होता है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1

👉 How to Stay Happy?

Why is it that some people are happy while some others are not? - This question has been eluding even the psychologists of the modern day. According to a recent survey, it has been found that people of Finland are the happiest people in the world. Countries like Denmark, Iceland, Switzerland and Norway are among the Top-5, while India’s position is 133rd in the list of 155 countries. In this survey, every year about 1000 people from each country are asked a few questions and based on their responses, the results are declared on World Happiness Day (20th March).

Being happy is a state of mind. It is not necessary to be rich to be happy. Practically every survey ever done has shown that those who are happy stay in families. Such people get along very well with their friends and family. According to Daniel Gilbert, the Happiness Expert at Harvard University, we are happy when we are with our family. If we have friends, then it is even better. In some way or the other, everything that contributes to our happiness comes through either family or friends. The biggest factor for one’s happiness and fulfillment in life is, basically, love. A scientific study has shown that having someone to rely on helps a person’s nervous system relax, helps his brain stay healthier for a longer time, and reduces both emotional as well as physical pain.

A long-time researcher on this topic, George Vaillant says – ‘What influences life the most is the quality of our relationships with others’. It is these precious relationships that bind us together and hence influence our happiness to a large extent.
It is also evident that material prosperity has made man hollow from within. In fact, man spends his entire life earning money and realizes at the end that the desire for money is never-ending and the joys of life cannot be bought with money. So, to whatever extent possible, we should spend our time in lovingly strengthening our social life and thus making it prosperous.

To be continued...
📖 From Akhand Jyoti

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 18)

PRARABDHA KARMAS
(Karmas done with strong emotional involvement):

It is obvious that this process is not unilateral. Divine justice makes souls of both the sinner and the sinned interact in complementary environment. This complex process at time takes several cycles of life and death. We know that in this world, too, it requires a long time and consideration of numerous factors before two individuals become life partners as husband and wife. (The popular saying that “Marriages are made in heaven” indirectly refers to the coincidence of samsakars of the bride and the groom. The pain of separation in a divorce, too, is a consequence of sinful karmas of past lives.)

We may further try to understand the course of divine justice by an analogy in a natural phenomenon. A shrub in Africa called Venus grows to a height of about three meters. Out of its branches spread out thin threadlike offshoots. These keep on growing and swaying in the air till they meet another shrub and they become mutually intertwined. Sometimes these shrubs meet each other barely after a growth of a few centimeters, whereas the others succeed in doing so after growing for a few meters. This is the way the fruits of karmas ripen for interaction over different spans of time.

The punishment for the exclusively physical sins is physical and is given without much delay. (Consumption of poison results in immediate death.) Mental chastisement, on the other hand, is neither instantaneous nor is it unilateral. For instance, if, because of his cruel nature, someone commits a murder and is caught red-handed, the state awards a death sentence. On the contrary, if the killer commits the offence secretly, the inner conscience does not punish him immediately. It would wait for an environment for creating in his psyche an aversion for violence, by making the sinner feel the same degree of pain, which was felt by his victim. That is why, at times, morally vile persons are found rejoicing and righteous ones suffering in life. The enforcer of Divine Law takes time in preparing an appropriate environment for dispensing just rewards and punishments.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 31

👉 आत्मचिंतन के क्षण 17 May 2019

■ अपने ऊपर आपत्ति व संकट को आया देखकर धैर्य खोना कायरता है। जब संसार के कोई दूसरे लोग दुःख में धैर्य रख सकते हैं, हँसते-खेलते हुए आपत्तियों को पार कर सकते हैं, तो हम ही क्येां उन्हें देखकर रोने-चिल्लाने लगें, जबकि परम पिता परमात्मा ने हमें भी साहस, आशा और धैर्य के साथ बुद्धि एवं विवेक का सम्बल उनकी तरह दे रखा है। अंतर केवल यह है कि जहाँ संसार के सिंह पुरुष अंधकार आते ही अपने गुणों के प्रदीप प्रज्वलित कर लेते हैं, वहाँ कायर पुरुष घबराकर उनको प्रदीप्त करना ही भूल जाते हैं।

◆ खेद का विषय है कि आज लोग संयम की महत्ता को भूलते जा रहे हैं। अधिकांश लोगों की धारणा बन गई है कि संयम अथवा ब्रह्मचर्य जैसे आदर्शों की शिक्षा मात्र कहने-सुनने की बातें हैं। कहना न होगा कि यह एक भयानक धारणा है। किसी बुराई को, किन्हीं विवशताओं के वश करते रहने पर भी जब तक वह बुराई ही मानी जाती है तब तक देर-सबेर सुधार की आशा की जा सकती है, किन्तु जब किसी विकृति अथवा दुर्बलता को स्वाभाविक मान लिया जाता है तब उसके सुधार की आशा धूमिल हो जाती है और दुबुर्द्धि के कारण लोग उसके कुफलगामी बनते हैं।

★ भलाई, शराफत, मृदुता का एक बार किया हुआ सद्व्यवहार वह धन है जो रात-दिन बढ़ता है। यदि दैनिक व्यवहार में आप यह नियम बना लें कि हम जिन लोगों के संपर्क में आयेंगे, उनमें से छोटे-बड़े सबके साथ सद्भावनायुक्त व्यवहार करेंगे, मधुर भाषण करेंगे, कटुता और आलोचना से बचते रहेंगे तो स्मरण रखिए आपके मित्र और हितैषियों की संख्या में उत्तरोत्तर अभिवृद्धि होगी।

गुरुवार, 16 मई 2019

गायत्री मंत्र की महिमा Gayatri Mantra Ki Mahima | डॉ चिन्मय पंड्या



Title

👉 आज का सद्चिंतन गायत्री मंत्र महा शक्तिशाली


👉 प्रेरणादायक प्रसंग मूर्ति पूजा में आस्था


👉 जीवन साधना के त्रिविध पंचशील (भाग 4)

परिवार निर्माणः-

(१) परिवार को अपनी विशिष्टताओं को उभारने अभ्यास करने एवं परिपुष्ट बनाने की प्रयोगशाला, पाठशाला समझे। इस उद्यान मे सत्प्रवृत्तियों के पौधे लगाये। हर सदस्य को स्वावलम्बी सुसंस्कारी एवं समाजनिष्ठ बनाने का भरसक प्रयत्न करें। इसके लिए सर्वप्रथम ढालने वाले साँचे की तरह आदर्शवान बने ताकि स्वयं कथनी और करनी की एकता का प्रभाव पड़े। स्मरण रहे सांचे के अनुसार ही खिलौने ढलते हैं। पारिवारिक उत्तरदायित्व में सर्वप्रथम है संचालक का आदर्शवादी ढांचे में ढलना। दूसरा है माली की तरह हरे पौधे का शालीनता के क्षेत्र में विकसित करना।

(२) परिवार की संख्या न बढ़ायें। अधिक बच्चे उत्पन्न न करें। इसमें जननी का स्वास्थ्य, सन्तान का भविष्य, गृहपति का अर्थ सन्तुलन एवं समाज में दारिद्र्य, असन्तोष बढ़ता है। दूसरों के बच्चे को अपना मानकर उनके परिपालन से वात्सल्य कहीं अधिक अच्छी तरह निभ सकता है। लड़की- लड़कों में भेद न करें। पिछली पीढ़ी और वर्तमान के साथियों के प्रति कर्तृत्व पालन तभी हो सकता है, जब नये प्रजनन को रोकें। अन्यथा प्यार और धन प्रस्तुत परिजनों का ऋण चुकाने में लगने की अपेक्षा उनके लिए बहने लगेगा, जिनका अभी अस्तित्व तक नहीं है। इसलिए उस सम्बन्ध में संयम बरतें और कड़ाई रखें।

(३) संयम और सज्जनता एक तथ्य के दो नाम हैं। परिवार में ऐसी परम्परायें प्रचलित करें जिसमें इन्द्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम और विचार संयम का अभ्यास आरम्भ से ही करते रहने का अवसर मिले। घर में चटोरेपन का माहौल न बनाया जाये। भोजन सात्विक बने और नियत समय पर सीमित मात्रा में खाने का ही अभ्यास बने। कामुकता को उत्तेजना न मिले, सभी की दिनचर्या निर्धारित रहे। समय के साथ काम और मनोयोग जुड़ा रहे। किसी को आलस्य- प्रमाद की आदत न पड़ने दी जाय और न कोई आवारागर्दी अपनाये व कुसंग में फिरे। फैशन और जेवर को बचकाना, उपहासास्पद माना जाय, केश विन्यास और अश्लील, उत्तेजक पोशाक कोई न पहनें और न जेवर आभूषणों से लदें। नाक, कान छेदने और उनके चित्र- विचित्र लटकन लटकाने का पिछड़ेपन का प्रतीत फैशन कोई महिला न अपनाये।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 17)

PRARABDHA KARMAS
(Karmas done with strong emotional involvement):

Mental karmas, which are voluntarily, deliberately performed under strong emotional stimuli, are known as Prarabdha Karmas. Being motivated by intense emotions, such karmas produce powerful samskars. Reactions of violent acts like murder, robbery, betrayal, felony or immoral passionate acts like adultery are very strongly felt by the inner conscience. Its innate spiritual purity is ever eager to get rid of this extraneous deleterious impurity at the earliest opportunity.

It has already been mentioned that our inner conscience keeps a constant watch over each of our karmas and determines greater or lesser punishment for each offence according to the nature of the act. A mental chastisement for a mental offence is however not possible without the help of other means. For giving an appropriate punishment, the inner conscience waits for a suitable environment in the subtle world (Sukshma Lok in spiritual parlance, where the divine system correlates samskars and creates environment for justice).

Occasionally this process is spread over a long time. For instance, for redemption of a mental sin of treachery, the sinner is required to be punished by grief. Chitragupta evaluates the grade of treachery to decide the degree of sorrow required for atonement. For punishing a murderer, the divine system will associate the soul of the sinner with the soul of an individual who, according to its own karmas, can inflict the same degree of pain and grief on the sinner, which latter has caused to the aggrieved person. For instance, Chitragupta may plan birth of a son or daughter in the family of the sinner, who (the new born) is destined to die at a young age according to its own past karmas. The inner conscience of the killer will wait for grief-producing event when the son/daughter meets death by disease or accident. In this way, for samskars carried over to next life, divine justice creates an environment for punishment equivalent to the sin.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 30

बुधवार, 15 मई 2019

👉 जीवन साधना के त्रिविध पंचशील (भाग 3)

(४) प्रतिदिन प्रज्ञायोग की साधना नियमित रूप से की जाय। उठते समय आत्मबोध, सोते समय तत्त्वबोध। नित्य कर्म से निवृत्त होकर जप, ध्यान। एकान्त सुविधा का चिन्तन- मनन में उपयोग। यही है त्रिविधि सोपानों वाला प्रज्ञायोग। यह संक्षिप्त होते हुए भी अति प्रभावशाली एवं समग्र है। अपने अस्त- व्यस्त बिखराव वाले साधना क्रम को समेटकर इसी केन्द्र बिन्दु पर एकत्रित करना चाहिये। महान के साथ अपने क्षुद्र को जोड़ने के लिए योगाभ्यास का विधान है। प्रज्ञा परिजनों के लिए सर्वसुलभ एवं सर्वोत्तम योगाभ्यास ‘प्रज्ञा योग’ की साधना है। उसे भावनापूर्वक अपनाया और निष्ठा पूर्वक निभाया जाय।

(५) दृष्टिकोण को निषेधात्मक न रहने देकर विधेयात्मक बनाया जाय। अभावों की सूची फाड़ फेंकनी चाहिये और जो उपलब्धियाँ हस्तगत है, उन्हें असंख्य प्राणियों की अपेक्षा उच्चस्तरीय मानकर सन्तुष्ट भी रहना चाहिये और प्रसन्न भी। इसी मनःस्थिति में अधिक उन्नतिशील बनना और प्रस्तुत कठिनाइयों से निकलने वाला निर्धारण भी बन पड़ता है। असन्तुष्ट, खिन्न, उद्विग्न रहना तो प्रकारान्तर से एक उन्माद है, जिसके कारण समाधान और उत्थान के सारे द्वार ही बन्द हो जाते है।

कर्तृत्व पालन को सब कुछ मानें। असीम महत्त्वाकांक्षाओं के रंगीले महल न रचें। ईमानदारी से किये गये पराक्रम से ही परिपूर्ण सफलता मानें और उतने भर से सन्तुष्ट रहना सीखें। कुरूपता नहीं, सौन्दर्य निहारें। आशंकाग्रस्त, भयभीत, निराश न रहें। उज्ज्वल भविष्य के सपने देखें। याचक नहीं दानी बने। आत्मावलम्बन सीखें। अहंकार तो हटायें पर स्वाभिमान जीवित रखें। अपना समय, श्रम, मन और धन से दूसरों को ऊँचा उठायें। सहायता करे पर बदले की अपेक्षा न रखें। बड़प्पन की तृष्णाओं को छोड़े और उनके स्थान पर महानता अर्जित करने की महत्वाकांक्षा सँजोये। स्मरण रखें, हँसते- हँसाते रहना और हल्की- फुल्की जिन्दगी जीना ही सबसे बड़ी कलाकारिता है।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 16)

SANCHIT KARMAS (Involuntary Mental Karmas):

Being extremely feeble, the samskars produced by Sanchit Karmas may remain in a dormant state in the psyche for thousands of years through successive births. These samskars generally remain inactive, but if a suitable stimulant is provided to them by deliberate, strong, conscious repetition of similar deeds, these, too become active. In the company of strong healthy horses,a lame horse too begins to trot.

With good soil and adequate rains even rotten seeds germinate. Association with identical samskars makes the week samskars gain strength, whereas if the past samskars repeatedly come in contact with the opposite type of samskars, the former are completely wiped out. If for a long duration evil samskars face a long continuous inflow of good samskars, the latter destroy them totally. As a matter of fact, the good as well as bad Sanchit Samskars bear fruit in favorable environments and are destroyed when confronted with an adverse milieu. Pilgrimages and rituals recommended in religious practices are meant to wipe out the weak, evil samskars accumulated as Sanchit Karmas.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 29

👉 आलसी का भविष्य आज का सद्चिंतन


👉 विजय और पराजय का रहस्य प्रेरणादायक प्रसंग


मंगलवार, 14 मई 2019

👉 Today Thought Gurudev Ki Asha


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Pehle Patrta Viksit Karo


👉 जीवन साधना के त्रिविध पंचशील (भाग 2)

प्रज्ञा साधकों के लिए उपरोक्त तीन क्षेत्र के लिए इस प्रकार हैः-

व्यक्तित्व का विकास

(१) प्रातः उठने से लेकर सोने तक की व्यस्त दिनचर्या निर्धारित करें। उसमें उपार्जन, विश्राम, नित्य कर्म, अन्यान्य काम- काजों के अतिरिक्त आदर्शवादी परमार्थ प्रयोजनों के लिए एक भाग निश्चित करें। साधारणतया आठ घण्टा कमाने, सात घण्टा सोने, पाँच घण्टा नित्य कर्म एवं लोक व्यवहार के लिए निर्धारित रखने के उपरान्त चार घण्टे परमार्थ प्रयोजनों के लिए निकालना चाहिए। इसमें भी कटौती करनी हो, तो न्यूनतम दो घण्टे तो होने ही चाहिये। इससे कम में पुण्य परमार्थ के, सेवा साधना के सहारे बिना न सुसंस्कारिता स्वभाव का अंग बनती है और न व्यक्तित्व का उच्चस्तरीय विकास सम्भव होता है।

(२) आजीविका बढ़ानी हो तो अधिक योग्यता बढ़ायें। परिश्रम में तत्पर रहें और उसमें गहरा मनोयोग लगायें। साथ ही अपव्यय में कठोरता पूर्वक कटौती करें। सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त समझें। अपव्यय के कारण अहंकार, दुर्व्यसन, प्रमाद बढ़ने और निन्दा, ईर्ष्या, शत्रुता पल्ले बाँधने जैसी भयावह प्रतिक्रियाओं का अनुमान लगायें। सादगी प्रकारान्तर से सज्जनता का ही दूसरा नाम है। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह ही अभीष्ट है। अधिक कमाने वाले भी ऐसी सादगी अपनायें जो सभी के लिए अनुकरणीय हो। ठाट- बाट प्रदर्शन का खर्चीला ढकोसला समाप्त करें।

(३) अहर्निश पशु प्रवृत्तियों को भड़काने वाले विचार ही अन्तराल पर छाये रहते है। अभ्यास और समीपवर्ती प्रचलन मनुष्य को वासना, तृष्णा और अहंकार की पूर्ति में निरत रहने का ही दबाव डालता है। सम्बन्धी मित्र परिजनों के परामर्श प्रोत्साहन भी इसी स्तर के होते हैं। लोभ, मोह और विलास के कुसंस्कार निकृष्टता अपनाये रहने में ही लाभ तथा कौशल समझते हैं। ऐसी ही सफलताओं को सफलता मानते हैं। इसे एक चक्रव्यूह समझना चाहिये। भव- बन्धन के इसी घेरे से बाहर निकलने के लिए प्रबल पुरुषार्थ करना चाहिये। कुविचारों को परास्त करने का एक ही उपाय है- प्रज्ञा साहित्य का न्यूनतम एक घण्टा अध्ययन अध्यवसाय। इतना समय एक बार न निकले तो उसे जब भी अवकाश मिले, थोड़ा- थोड़ा करके पूरा करते रहना चाहिये।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 13 मई 2019

👉 आज का सद्चिंतन Today Thought 13 May 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Pakshpaat Nahi Kare 13 May 2019


👉 जीवन साधना के त्रिविध पंचशील (भाग 1)

साधना चाहे घर पर की जाय अथवा एकान्तवास में रहकर, मनःस्थिति का परिष्कार उसका प्रधान लक्ष्य होना चाहिए। साधना का अर्थ यह नहीं कि अपने को नितान्त एकाकी अनुभव कर वर्तमान तथा भावी जीवन को नहीं, मुक्ति- मोक्ष को, परलोक को लक्ष्य मानकर चला जाय। साधना विधि में चिन्तन क्या है, आने वाले समय को साधक कैसा बनाने और परिष्कृत करने का संकल्प लेकर जाना चाहता है, इसे प्रमुख माना गया है। व्यक्ति, परिवार और समाज इन तीनों ही क्षेत्रों में बँटे जीवन सोपान को व्यक्ति किस प्रकार परिमार्जित करेंगे, उसकी रूपरेखा क्या होगी, इस निर्धारण में कौन कितना खरा उतरा इसी पर साधना की सफलता निर्भर है।

कल्प साधना में भी इसी तथ्य को प्रधानता दी गयी है। एक प्रकार से यह व्यक्ति का समग्र काया कल्प है, जिसमें उसका वर्तमान वैयक्तिक जीवन, पारिवारिक गठबंधन तथा समाज सम्पर्क तीनों ही प्रभावित होते हैं। कल्प साधकों को यही निर्देश दिया जाता है कि उनके शान्तिकुञ्ज वास की अवधि में उनकी मनःस्थिति एकान्त सेवी, अन्तर्मुखी, वैरागी जैसी होनी चाहिए। त्रिवेणी तट की बालुका में माघ मास की कल्प साधन फूस की झोपड़ी में सम्पन्न करते हैं। घर परिवार से मन हटाकर उस अवधि में मन को भगवद् समर्पण में रखते हैं। श्रद्धा पूर्वक नियमित साधना में संलग्न रहने और दिनचर्या के नियमित अनुशासन पालने के अतिरिक्त एक ही चिन्तन में निरत रहना चाहिये, कि काया कल्प जैसी मनःस्थिति लेकर कषाय- कल्मषों की कीचड़ धोकर वापस लौटना है। इसके लिए भावी जीवन को उज्ज्वल भविष्य की रूपरेखा निर्धारित करने का ताना- बाना बुनते रहना चाहिये।

व्यक्ति, परिवार और समाज के त्रिविध क्षेत्रों में जीवन बंटा हुआ हैं, इन तीनों को ही अधिकाधिक परिष्कृत करना इन दिनों लक्ष्य रखना चाहिये। इस सन्दर्भ में त्रिविध पंचशीलों के कुछ परामर्श क्रम प्रस्तुत हैं। भगवान बुद्ध ने हर क्षेत्र के लिए पंचशील निर्धारित किये थे।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 11 मई 2019

भक्ति के तीन पथ Bhakti Ke Teen Path | डॉ चिन्मय पंड्या



Title

👉 हीरों का हार

मित्रो ! हमारा मन है कि हमारे पास दस हजार ऐसे व्यक्ति हों, जिनकी हम #माला पहनें, जो हमारे साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलें। हमारी व उनकी एक आवाज हो, एक दिशा हो तथा लगातार मिलकर लक्ष्य की ओर बढ़ते रहें। उन्हें किसी बात का डर या भय न हो। इस वर्ष हमारी इच्छा दस हजार हीरे का हार पहनने की है। जब हमारा जुलूस निकले, तो जनता यह समझे कि यह बहुत मालदार आदमी है, बहुत शानदार आदमी है, वजनदार आदमी है।

यहाँ दस हजार हीरों से मेरा मतलब है कि दस हजार ऐसे साथी हो जाएँ, जो नियमित रूप से हमारे कार्य अर्थात् मिशन के लिए समयदान दे सकें। #पैसे की इच्छा नहीं है। इसका मतलब यह है कि हमारे हाथ-पाँव मजबूत हो जाएँ। हाथ-पाँव से हमारा मतलब आपसे है। आप हमारे चलते-फिरते हाड़-माँस के #शक्तिपीठ बन जाएँ। हमने जो उम्मीद शक्तिपीठों से लगाई थी, वह आप स्वयं पूरा करना शुरू कर दें। हमें ज्ञानरथ के लिए नौकर नहीं चाहिए। हमें इसके लिए आपका समयदान चाहिए। विवेकानंद, गाँधी, विनोबा का काम स्वयं उन्होंने किया। इसी तरह यह काम आपको करने होंगे। आपके पास चौबीस घंटे हैं। आठ घंटे काम के लिए, सात घंटे सोने के लिए, पाँच घंटे नित्य काम के लिए रख लें, तो भी आपके पास चार घंटे बचते हैं। आपको नियमित रूप से चार घंटे नित्य मिशन के लिए, समाज के लिए, भगवान् के लिए देना चाहिए।

प. पू. गुरुदेव द्वारा १९८५ में श्रावणी की
पूर्व संध्या पर दिये प्रवचन में से

👉 आज का सद्चिंतन 11 May 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 May 2019


👉 आत्मवत् सर्व भूतेषु:-

महामुनि मेतार्य ने कृच्छ चांद्रायण तप विधिवत सम्पन्न किया। अनुष्ठान काल में सम्पूर्ण एक मास केवल आँवला के फलों पर ही निर्वाह किया, इससे उनके शरीर में दुर्बलता तो थी किन्तु तपश्चर्या से अर्जित प्राण शक्ति और आँवले के कल्प के कारण उनके सम्पूर्ण शरीर में तेजोवलय स्पष्ट झलक रहा था।

अनुष्ठान समाप्त कर वे राजगृह की ओर चल पड़े। नियमानुसार वे दिन में एक बार किसी सद्गृहस्थ के घर भोजन ग्रहण कर लोक-कल्याण के कार्यों में जुटे रहते थे। उनकी लोक कल्याणकारी वृति देख कर मगध का हर नागरिक उनके आतिथ्य को अपना परम सौभाग्य मानता था।

आज वे राजगृह के स्वर्णकार के द्वार पर खड़े थे। स्वर्णकार कोई आभूषण बनाने के लिये स्वर्ण के छोटे-छोटे गोल, दाने बना कर ढेर करता जा रहा था। द्वार पर खड़े मेतार्य को देखा तो उसका हाथ वही रुक गया “ अतिथि देवोभव “ कहकर उसने मुनि मेतार्य का हार्दिक स्वागत किया। उनकी भिक्षा का प्रबन्ध करने के लिए जैसे ही वह अन्दर गया वृक्ष पर बैठे पक्षी उतर कर वहाँ आ गये जहाँ स्वर्णकार सोने के दाने गढ़ रहा था।

उन्होंने इन दानों को अन्न समझा सो जब तक स्वर्णकार वापस लौटे सारे दाने चुग डाले और उड़कर डाली में जा बैठे।

स्वर्णकार बाहर आया और सोने के बिखरे दानों को गायब पाया तो उसके गुस्से का ठिकाना न रहा। उसने देख द्वार पर मुनि मेतार्य चुपचाप बैठे है आतिथ्य भूल गया-पूछा- “आचार्य प्रवर यहाँ कोई आया तो नहीं|”

“नहीं तात! मेरे सिवाय और तो कोई नहीं आया|” मेतार्य ने सहज ही उत्तर दिया।

इस पर स्वर्णकार को क्रोध और भी बढ़ गया उसने निश्चय कर लिया मेतार्य ने ही वह स्वर्ण चुरा लिया और अब यहाँ ढोंग करके बैठा है।

मेतार्य से उसने पूछा- “स्वर्णकण तुमने चुराये हैं?”

इस पर वे कुछ न बोले। अब तो स्वर्णकार को और भी विश्वास हो गया कि मेतार्य ही वास्तविक चोर हैं सो उसने अन्य कुटुम्बियों को भी बुला लिया और उनकी अच्छी मरम्मत की। जितनी बार पूछा जाता- ‘तुमने स्वर्ण चुराया है|’ मेतार्य चुप रहते- कुछ भी न बोलते इससे उनका संदेह और बढ़ जाता।

अन्त में निश्चय किया गया कि मेतार्य के मस्तक पर गोले चमड़े की पट्टी बाँध कर चिल-चिलाती धूप में पटक दिया जाये। यही किया गया उनके मत्थे पर चमड़े की गीली पट्टी बाँध दी गई और धूप में कर दिया गया। जैसे जैसे पट्टी सूखती गई महर्षि का सिर कसता गया। शरीर पहले ही दुर्बल हो रहा था। पीड़ा सहन न हो सकी। वे चक्कर खाकर गिर पड़े। दिन उन्होंने प्राणान्तक पीड़ा में बिताया।

साँझ हो चली। वृक्ष पर बैठे पक्षियों ने बीट की तो वह दाने नीचे गिरे। किसी ने देखा तो कहा- “अरे सोने के दाने तो पक्षियों ने चुन लिये महर्षि को क्यों कष्ट दे रहे हो।“ स्वर्णकार हक्का बक्का रह गया।

उसने दौड़कर महर्षि के माथे की पट्टी खोली उन्हें जल पिलाया और दुःखी स्वर में पूछा- “महामहिम! आपने बता दिया होता कि स्वर्ण दाने पक्षियों ने चुगे हैं तो आपकी यह दुर्दशा क्यों होती?”

महर्षि मुस्कराये और बोले- “वैसा करने से जो दंड मैंने भुगता उससे भी कठोर दंड इन अज्ञानी पक्षियों को भुगतना पड़ता।“

महर्षि की इस महा दयालुता पर सबको रोमाँच हो आया। स्वर्णकार बोला- “जो प्राणिमात्र में अपनी तरह अपनी ही आत्मा को देखता है वही सच्चा साधु है।“

📖 अखण्ड ज्योति, मार्च-1971

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 15)

PASSIVE ACQUIESCENCE BEFORE EVIL ACTS IS ALSO SINFUL

It is seen that in a society the affluent and powerful exploiters suffer much less from natural disasters than the submissive, under – privileged masses. The brunt of excessive rains or droughts is mainly borne by the poor farmers. The laws of divine justice regard tolerance of a sin as a greater offence than its committal. There is a saying that “the father of a tyrant is a coward”. Cowardice and timidity tend to invite suppression and oppression from some quarter or the other. Big powerful fish is always on the prowl for the timid small fish. The latter may manage to escape from one but some other big fish will devour it.

Laws of divine justice consider cowardice, weakness and ignorance as grave sins. It is not surprising that these invite harsher punishments. Natural disasters should be taken as stealthy acts of divine grace. These are frequently manifested by the invisible Supreme Justice for removal of corruption from the society. Natural calamities are not aberrations of nature. Instead, these are reactions of out-of-tune actions of living beings themselves. It is like the process of refining in the blast furnace. Through such
loud warnings, God mercifully tells us again and again to work for eradicating sins from the society. In the next chapter we shall discuss how and when divine justice gives rewards and punishments for the various types of good and evil karmas.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 27

👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 May 2019

★ ये शिला देख रहे हैं आप ये वही शिला है जो आप मंदिरों में पाते हैं, जिसके समक्ष आप शीश झुकाते हैं, हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं, विनती करते हैं। अब सोचिये ये शिला बनती किससे है, पाषाण के एक खण्ड से, बिल्कुल साधारण सा पाषाण का खण्ड। यदि यही पाषाण का खण्ड आपको कहीं और मिल जाए तो आप क्या करोगे? ठोकर मार दोगे?? वो पाषाण आपके लिए अधिक महत्व नहीं रखता। अब यही मनुष्य के साथ भी होता है। अब या तो आप सम्मान पा सकते हैं या ठोकर खा सकते हैं, प्रयत्न आपका होगा। यदि आप अपने भीतर अच्छे विचार जगाएँ, शुभ कर्म करें, कठिनाइयों का, संकटों का सामना करें, सदाचार के मार्ग पर चलें तो आपको सम्मान अवश्य प्राप्त होगा अन्यथा विफलता का मार्ग तो आपके पास है ही।

◆ कहते हैं यदि भाग्य साथ न हो, यदि भाग्य ही खराब हो, नदी का पानी भी खारा बन जाता है। ये बात अनुचित है। हर बात के लिए, हर समस्या के लिए, भाग्य दोषी नहीं हो सकता। कई बार हमारी असावधानी भी होती है। सावधान रहना अत्यंत आवश्यक है। हम आने वाले समय के लिए सावधान नहीं रहते और जब अचानक संकट हमारे समक्ष आ जाता है, तो स्वयं को संभाल नहीं पाते, क्योंकि हम सज्ज नहीं रहते? उस परिस्थिति में हम हार जाते हैं? सावधानी अत्यंत आवश्यक है, जब आप किसी अंजान राह पर निकलते हैं, तो सर्वप्रथम अपना एक पैर अपनी धरा पर जमाए रखना और दूसरे पैर से आने वाली भूमि का आकलन करना जरूरी है। ये समस्या है ऐसा मानना सावधानी का अंत है। आने वाले भविष्य का आकलन करना क्योंकि कुछ भी कर लो आप आने वाली परिस्थिति को तो देख नहीं सकते। यदि भविष्य में आपके संकट ही लिखा है तो आने वाले संकट का सामना करने के लिए आप सावधानी की ढाल का तो उपयोग कर सकते हैं।

◇ विषपान करने के बाद भी महादेव देवों के देव महादेव कहलाते हैं? वहीं दूसरी ओर अमृतपान करने के पश्चात भी राहू और केतू असुर ही कहलाते हैं? क्यों?? इसका कारण है भाव। आपके कर्मों के पीछे जो आपका भाव है, अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये संसार किसी व्यक्ति को वहीं से तो जानता है, कर्मों के पीछे उसके भाव से। यदि कोई परोपकार करे और उसके पीछे भाव स्वार्थ का हो, तो वो परोपकारी मनुष्य अपने आप अपना महत्व खो देता है। यदि आपके कर्म के पीछे भाव उचित हो तो श्राप भी वरदान में परिवर्तित हो सकता है। यदि आपके कर्म का भाव अनुचित हो तो वरदान को श्राप का रूप लेने में अधिक समय नहीं लगता। ये सारा खेल है कर्मों का और भावों का।

शुक्रवार, 10 मई 2019

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 14)

SUFERINGS RESULTING FROM NATURAL CALAMITIES (Bhautik Dukhas):

Divine law expects man to abide by time-tested moral codes of conduct and also make maximum possible endeavor to prevent others from violating them. If some country or community or race does not make an effort to prevent or dissuade others from committing wrong deeds, in spite of being in a position to do so; or does not promote morality and ethics despite having the means to do so, the former too has to suffer its consequences. Such collective sins of inactivity or indifference invite combined punishment
from divine justice.

Earthquakes, deluge, drought, famine, world wars are consequences of collective sins of humanity, in which karmas for vested interests were given priority and welfare of the rest of the humanity was ignored. Examples are - spread of AIDS, drug abuse and alcoholism, disintegration of families, juvenile delinquency, terrorism, environmental pollution etc. The developed countries are suffering consequences of their smug indifference towards the welfare of the underprivileged masses elsewhere.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 26

👉 आज का सद्चिंतन 10 May 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 May 2019

👉 आत्मचिंतन के क्षण 10 May 2019

★ समस्त शुभ-अशुभ, सुख-दुःख की परिस्थितियों के हेतु तथा उत्थान-पतन के मुख्य कारक विचारों को वश में रखना मनुष्य का प्रमुख कर्त्तव्य है। विचारों को उन्नत कीजिए, उनको मंगल मूलक बनाइए, उनका परिष्कार एवं परिमार्जन कीजिए और वे आपको स्वर्ग की सुखद परिस्थितियों में पहुँचा देंगे। इसके विपरीत यदि आपने विचारों को स्वतंत्र छोड़ दिया, उन्हें कलुषित एवं कलंकित होने दिया तो आपको हर समय नरक की ज्वाला में जलने के लिए तैयार रहना चाहिए। विचारों की चपेट से आपको संसार की कोई शक्ति नहीं बचा सकती।

◆ आज हमारे समाज में काम का फल जल्दी से जल्दी पाने की प्रवृत्ति हो गई है। लोग खेत को बिना जोते ही-बिना बोए या सींचे ही शान्ति और सफलता रूपी फसल काटने को तैयार बैठे हैं। जब कारण ही नहीं तो कार्य कैसे हो? और जब कार्य नहीं तो उसका फल कैसे हो सकता है? शून्य से कुछ भी पाने की आशा नहीं की जा सकती है। हमारा मन एक उपजाऊ खेत है, जिससे जो वस्तु चाहो सीधे रास्ते से पैदा कर सकते हो। उसका उचित चिंतन कीजिए । जैसा बोयेंगे-वैसा ही काटेंगे।

◇ आत्मोन्नति का अर्थ है-पशुत्व से मनुष्यत्व की ओर आना। पशुत्व क्या है- मनोविकारों के ऊपर तनिक भी शासन न कर पाना, जब जैसा मनोविकार आया, उसे ज्यों का त्यों प्रकट कर दिया, काम क्षुधा, भूख, प्यास आदि वासनाएँ जैसे ही उत्पन्न  हुईं कि तुरन्त उनकी पूर्ति कर ली गई, यह  पशुत्व की स्थिति है। जब इन वासनाओं पर संयम आना प्रारंभ होता है और मानवता के उच्चतम गुण-प्रेम, सहानुभूति, करुणा, दया, सहायता, संगठन, सहयोग, समष्टि के लिए व्यक्ति में त्याग इत्यादि भावनाओं का उदय होता है, तो मनुष्य मनुष्यत्व के स्तर पर निवास करता है।

👉 The secret of happiness

Everyone has their own way of life. They live according to their choice and wisdom. They live according to their sacraments and don’t care much about the way they are living is justified. They just do whatever they like. According to them whatever they feel is right, whether it is right or wrong.

Example- Is it OK to drink alcohol? You will say, no this is not right.
Then why do lot of people drink. The answer is clear; they feel it is justified, hence they drink.  Drinking is not right but because they like it so they use to drink.
This is the way, the whole world is doing according to their own choice and liking. This is what happening all around.
But this is not the fact. The fact is something else. The fact is, if you violate Divine laws, then you will definitely get penalised.
Whether you wish or not, you will have to follow the Divine laws. This is the law of Divine that always give happiness to others, never hurt. Therefore, as far as possible, always do good deeds for others; it is for your own welfare. Avoid any sort of iniquities. Be blessed of God's grace. Do good deeds, be happy, and let others be happy. Take control of your wrong desires and try to eliminate completely. Only then will you will be blissed, otherwise no chance of any well-being.

गुरुवार, 9 मई 2019

👉 आत्मचिंतन के क्षण 9 May 2019

★ भाग्य और भविष्य परमात्मा की जबर्दस्त शक्तियाँ हैं। मनुष्य की शक्ति इनके आगे छोटी है, पर वह अपने विवेक से यह निर्णय अवश्य ले सकता है कि उसका जन्म किसलिए हुआ है और वह ईश्वरीय विधान में किस हद तक सहायक हो सकता है। यदि वह इसके लिए तैयार हो सके तो इसी जीवन में अनेक आध्यात्मिक शक्तियों का विकास करता हुआ प्रत्येक व्यक्ति आत्म कल्याण का पथ प्रशस्त कर सकता है।

◆ अच्छाई के विकास में चिन्ता, दुःख और भय भी हमारे सामने आयें तो भी उनके सुखप्रद परिणाम की आशा से हमें उस प्रक्रिया को बंद नहीं कर देना चाहिए। सरल, शुद्ध और सहन करने योग्य दुःखों ने सदैव आत्मा को बलवान् ही बनाया है-उसे ईश्वरीय दिव्य शक्तियों की अनुभूति ही कराई है। यदि ये दुःख,चिन्ता,भय,आदि अवरोध प्रेम, दया, कृतज्ञता और विश्वास का अंत करते हों तब हमें एक वीर योद्धा की भाँति उनका सामना भी करना चाहिए।

◇ सत्य की उपेक्षा और प्रेम की अवहेलना करके छल, कपट और दम्भ के बल पर कोई कितना ही बड़ा क्यों न बन जाये, किन्तु उसका वह बड़प्पन एक विडम्बना के अतिरिक्त और कुछ भी न होगा।

★ हर मनुष्य के जीवन में अवसर आता है, किन्तु एक बार निराश होने पर दुबारा नहीं आता है। किसी भी अवसर से यह आशा करना मृग मरीचिका के तुल्य है कि वह आपका द्वार दुबारा खटखटायेगा। बुद्धिमान् लोग अवसर को आगे से आलिंगन करते हैं, घेरते हैं और पकड़ते हैं, क्योंकि इसके दुम नहीं होती जो आगे बढ़ जाने पर पकड़ी जा सके।

◆ हमें यह भ्रम निकाल ही देना चाहिए कि बेईमानी कुछ कमा सकती है। वह शराब की तरह उत्तेजना मात्र है, जिससे ठगने वाला और ठगा जाने वाला बुद्धिभ्रम में ग्रस्त हो जाते हैं। नशा उतरने पर नशेबाज की जो खस्ता हालत होती है वही पोल खुलने पर बेईमानी की होती है। उसका न कारोबार रहता है, न कोई ग्राहक, सहयोगी। अतएव हमें इस कंटकाकीर्ण पगडण्डी पर चलने की अपेक्षा ईमानदारी के राजमार्ग पर ही चलना चाहिए।

👉 आज का सद्चिंतन 9 May 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 May 2019


बुधवार, 8 मई 2019

👉 विश्वास की दौलत

सऊदी अरब में बुखारी नामक एक विद्वान रहते थे। वह अपनी ईमानदारी के लिए मशहूर थे। एक बार वह समुद्री जहाज से लंबी यात्रा पर निकले। उन्होंने सफर के खर्च के लिए एक हजार दीनार अपनी पोटली में बांध कर रख लिए। यात्रा के दौरान बुखारी की पहचान दूसरे यात्रियों से हुई। बुखारी उन्हें ज्ञान की बातें बताते।

एक यात्री से उनकी नजदीकियां कुछ ज्यादा बढ़ गईं। एक दिन बातों-बातों में बुखारी ने उसे दीनार की पोटली दिखा दी। उस यात्री को लालच आ गया। उसने उनकी पोटली हथियाने की योजना बनाई। एक सुबह उसने जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया, ‘हाय मैं मार गया। मेरा एक हजार दीनार चोरी हो गया।’ वह रोने लगा। जहाज के कर्मचारियों ने कहा, ‘तुम घबराते क्यों हो। जिसने चोरी की होगी, वह यहीं होगा। हम एक-एक की तलाशी लेते हैं। वह पकड़ा जाएगा।’

यात्रियों की तलाशी शुरू हुई। जब बुखारी की बारी आई तो जहाज के कर्मचारियों और यात्रियों ने उनसे कहा, ‘अरे साहब, आपकी क्या तलाशी ली जाए। आप पर तो शक करना ही गुनाह है।’ यह सुन कर बुखारी बोले, ‘नहीं, जिसके दीनार चोरी हुए है उसके दिल में शक बना रहेगा। इसलिए मेरी भी तलाशी भी जाए।’ बुखारी की तलाशी ली गई। उनके पास से कुछ नहीं मिला।

दो दिनों के बाद उसी यात्री ने उदास मन से बुखारी से पूछा, ‘आपके पास तो एक हजार दीनार थे, वे कहां गए?’ बुखारी ने मुस्करा कर कहा, ‘उन्हें मैंने समुद्र में फेंक दिया। तुम जानना चाहते हो क्यों? क्योंकि मैंने जीवन में दो ही दौलत कमाई थीं- एक ईमानदारी और दूसरा लोगों का विश्वास। अगर मेरे पास से दीनार बरामद होते और मैं लोगों से कहता कि ये मेरे हैं तो लोग यकीन भी कर लेते लेकिन फिर भी मेरी ईमानदारी और सच्चाई पर लोगों का शक बना रहता। मैं दौलत तो गंवा सकता हूं लेकिन ईमानदारी और सच्चाई को खोना नहीं चाहता।

👉 बोझ

एक महात्मा ने पूछा कि सबसे ज्यादा बोझ कौन सा जीव उठा कर घुमता है ?........
किसी ने कहा गधा तो किसी ने बैल तो किसी ने ऊंट अलग अलग प्राणीयो के नाम बताए।
लेकिन महात्मा किसी के भी जवाब से संतुष्ट नहीं हुए।

महात्मा ने हंसकर कहा - गधे, बैल और ऊट के ऊपर हम एक मंजिल तक बोझ रखकर उतार देते हैं लेकिन, इंसान अपने मन के ऊपर मरते दम तक विचारों का बोझ लेकर घूमता है किसी ने बुरा किया है उसे न भूलने का बोझ, आने वाले कल का बोझ, अपने किये पापों का बोझ इस तरह कई प्रकार के बोझ लेकर इंसान जीता है।

जिस दिन इस बोझ को इंसान उतार देगा तब सही मायने मे जीवन जीना सीख जाएगा।

👉 आज का सद्चिंतन 8 May 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 May 2019


👉 The Absolute Law Of Karma (Part 14)

SUFERINGS RESULTING FROM NATURAL CALAMITIES (Bhautik Dukhas):

Of late, science has begun to appreciate the impact of lop-sided human activities on pervasive global life-sustaining elements of nature. Indiscriminate use of chloroflouro carbons by some developing countries is damaging the global atmosphere for entire humankind by producing the greenhouse effect. Reckless deforestation in certain parts of the world is creating worldwide ecological imbalances. Such examples illustrate that basic elements of nature are globally interdependent and local changes in them have universal implications. The following observations bring out this eternal truth.

“Pran”- the universal life force, is one of the vital elements of nature, which is an integral constituent of all animate beings. The entire human race is inter-connected with this allpervasive element. Each spark of life in the individual animate being, which is known as “Atma” in spiritual parlance, is part of the omnipresence of THAT universal life force. The science of spirituality maintains that karmas and samskars of all living beings are mutually interactive. In social milieu these reactions are quite prominent. A criminal brings shame to his parents and family as well.

The latter too suffer disgrace since disregarding their responsibilities by not performing the right karmas; they did not exert enough influence to make the person a good citizen. The responsibility for spiritual development of the child (a virtuous karma) lies with the parents and other adults of the family. Hence, though in the material world only the offender receives the punishment from the law enforcers and the society, the souls of the parents and other family
members too have to suffer partially for this dereliction of duty, which the divine jurisprudence considers as a sin. When the neighbor's house is on fire, you cannot remain a silent spectator, since soon you may also become a victim. If in spite of being capable of preventing, one looks on at acts of theft, burglary, rape, murder etc. indifferently, the society would look down upon such a person contemptuously and the law would also not spare him. The laws of divine justice too follow a similar norm.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 25

👉 आत्मचिंतन के क्षण 8 May 2019

★ ये है तलवार कुछ भी काट दे इतनी है धार, शत्रु का विनाश करने में सक्षम, दूसरी ओर है ये ढाल किसी भी प्रहार को सहपाने में सक्षम, शत्रु से रक्षा की ढाल, रक्षा की दीवार है। इन दोनों के कार्य भिन्न हैं, इन दोनों का उद्देश्य भिन्न है, लेकिन इन दोनों के मूल एक ही हैं। दोनों बने हैं लोहे से। लोहे के खण्ड से बनी है ये तलवार, लोहे के खण्ड से बनी है ये ढाल। तलवार का मंतव्य है प्रहार, और ढाल का मंतव्य है बचाव। अन्तर किसका है? अन्तर है केवल सोच का। ये सोच ही है जो सच बनकर सामने आती है, संसाधन कभी भी व्यक्ति को सुखी नहीं करते, किन्तु सोच व्यक्ति का व्यक्तित्व बनाती है। या तो आप इन संसाधनों का प्रयोग नाश करने के लिये करो, या इन संसाधनों का प्रयोग उद्धार करने के करो। चयन आपका है।

◆ इस वृक्ष को देख रहे हैं आप कितना अडिग, दिनभर धूप में खड़ा रहता है, धूप में बैठने वाले को छाया देने के लिए। अब जैसे-जैसे समय बीतता है वैसे-वैसे इस वृक्ष की टहनियों पर पत्तों के साथ-साथ फूल खिलने लगते हैं। ये फूल बाद में फल बन जाते हैं। अब समय के साथ-साथ जब ऋतु बदलता है, तो ये फल तोड़े जाते हैं। कुछ फल गिर जाते हैं। पतझर आने पर इस पेड़ के पत्ते तक इसका साथ छोड़ देते हैं। किन्तु ये वृक्ष अडिग रहता है। नये फलों के आने का इंतजार करता रहता है। न फलों के आने का उत्सव मनाता है, न पतझड़ के आने का शोक और हम इस वृक्ष की पूजा करते हैं। क्योंकि ये वृक्ष अपने स्थान पर अडिग रहता है। इसी प्रकार सुख और दुःख हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं। सुख और दुःख हमेशा रहेंगे, इसलिये न कभी सुख के आने पर अभिमान से भर जाएँ, न कभी दुःख के आने पर शोक मनाएँ। क्योंकि सुख और दुःख जीवनरूपी वृक्ष के फल हैं, ये आते रहेंगे-जाते रहेंगे लेकिन सुख और दुःख में व्यक्ति अडिग होगा, वही पूजनीय होगा।

◇ हीरा। हमारे लिए अत्यंत प्रिय, अत्यंत चमकदार, हीरे की चमक तो सभी जानते हैं। किन्तु ये चमक आती कैसे है? किसी दूसरे हीरे से इस हीरे को तराशा गया है। तब जाके ये संभव हो पाया है। कितनी अच्छी बात है। स्वयं से स्वयं को तराशो और स्वयं को ही और बेहतर बना दो। अब सोचिये क्या कीचड़ से कीचड़ को साफ किया जा सकता है? नहीं। उसके लिये आपको आवश्यकता होगी शुद्ध-निर्मल जल की। इसी प्रकार अच्छाई से अच्छाई को, और भी सुन्दर बनाया जा सकता है, किन्तु बुराई से बुराई को सुधारा नहीं जा सकता। सर्वप्रथम अपने मन को पावन करें, अपने मन को शुद्ध करें और फिर देखें इस दृष्टि से संसार को। ये संसार अपने आप शुद्ध लगने लगेगा। यदि किसी में आप विकार देखो तो शुभ कर्म करके उसका विकार दूर करो, उसकी सहायता करो। ना कि उसके विकार देख के स्वयं के मन में विकार लाओ। क्योंकि आप हीरे हो, किसी और हीरे को तराशने में उसकी सहायता करो। अच्छा लगेगा।

सोमवार, 6 मई 2019

👉 आत्मचिंतन के क्षण 6 May 2019

★ धर्म ग्रन्थों में मामूली से कर्म काण्ड के फल बहुत ही बढ़ा-चढ़ा कर लिखे गये हैं। जैसे गंगा स्नान से सात जन्मों के पाप नष्ट होना, व्रत उपवास रखने से स्वर्ग मिलना, गौदान से वैतरणी तर जाना, मूर्ति पूजा से मुक्ति प्राप्त होना, यह सब बातें तत्व ज्ञान की दृष्टि से असत्य हैं क्योंकि इन कर्मकाण्डों से मन में पवित्रता का संचार होना और बुद्धि का धर्म की ओर झुकना तो समझ में आता है, पर यह समझ में नहीं आता कि इतनी सी मामूली क्रियाओं का इतना बड़ा फल कैसे हो सकता है? यदि होता तो योग यज्ञ और तप जैसे महान साधनों की क्या आवश्यकता रहती? टके सेर मुक्ति का बाजार गर्म रहता।

◆ भिक्षा अनैतिक है। भिक्षा व्यवसायी की मनोभूमि दिन-दिन पतित होती जाती है। उसका शौर्य, साहस, पौरुष, गौरव सब कुछ नष्ट हो जाता है और दीनता मस्तिष्क पर बुरी तरह छाई रहती है। अपराधी की तरह उसका सिर नीचा रहता है। अपनी स्थिति का औचित्य सिद्ध करने के लिए उसे हजार ढोंग रचने पड़ते हैं और लाख तरह की मूढ़ताएँ फैलानी पड़ती हैं। यह भार जनमानस को विकृत बनाने की दृष्टि से और भी अधिक भयावह है। हर विचारशील का कर्त्तव्य है कि भिक्षा व्यवसाय को  निरुत्साहित करे। $कुपात्रों को वाणी मात्र से भी उत्साह न दें।

◇ यह नहीं देखना चाहिए कि बुराई से वैभव बढ़ता है। यदि ऐसा हुआ भी तो वह क्षणिक ही होगा। बुराई  जितनी जल्दी बढ़ती है, उतनी ही जल्दी नष्ट हो जाती है, साथ ही कर्त्ता को भी नष्ट कर डालती है। आकाश तक फैलती है और अंत में सिकुड़कर स्वयं बुराई करने वाले के सिर पर आकर पड़ती है।

■ दुष्ट विचार हमारा सबसे बड़ा शत्रु है। पाप का विचार, चोरी, कपट, ईर्ष्या, निराशा का विचार हमारा सर्वनाश कर सकता है। ईश्वर का एक मानसिक चित्र अंतःकरण में तैयार कर लें और सत्य, प्रेम, न्याय से अपना हृदय नित्य विकसित करते रहें। स्वतंत्रता, स्वच्छन्दता और शान्ति के विचार हमारे दोस्त  हैं। ये हमें सिखाएँगे कि जीवन पूर्ण सुखमय है तथा उसके अनुभवों से झगड़ना मूर्खता में शामिल है।

शनिवार, 4 मई 2019

👉 सच्चे मित्र

कोई भी व्यक्ति संसार में अकेला नहीं जी सकता, क्योंकि वह अल्पशक्तिमान् है। इसलिए अपने सारे काम स्वयं नहीं कर सकता। एक दूसरे की सहायता लेनी ही पड़ती है। और सब लोग, सब की सहायता करते नहीं। सहायता लेने देने के लिए एक आपसी संबंध होता है, जिसे मित्रता कहते हैं। मित्र का अर्थ होता है, स्नेह करने वाला. यह स्नेह संबंध चाहे मां बेटी में हो, चाहे पिता पुत्र में हो, चाहे पति-पत्नी में हो, चाहे दो दोस्तों में हो,  इन सब में जो स्नेह का संबंध है, वही मित्रता है।

मित्र ऐसा बनाएं, जो एक दूसरे के कष्ट को समझे, और हृदय से उस की समस्याओं को दूर करने का पूरा प्रयत्न करे।

संसार में आपको बहुत से ऐसे लोग मिलेंगे, जिनमें इस प्रकार की मित्रता देखी जाती है। उदाहरण के लिए यदि बेटा बीमार हो जाए, तो माता-पिता को नींद नहीं आती। दिन-रात उसकी सेवा करते हैं। और पूरी शक्ति लगाकर वैद्य डॉक्टरों की सहायता से उसे स्वस्थ बना देते हैं । ऐसे ही यदि माता पिता को कष्ट हो, यदि वे रोगी या वृद्ध हो जाएँ, तो बच्चों को भी वैसी ही सेवा करनी चाहिए, जैसी माता पिता अपने बच्चों की करते हैं। बस इसी संबंध का नाम सच्ची मित्रता है। अन्यथा बहुत से लोग मित्रता का केवल दिखावा करते हैं। सच्ची मित्रता, सच्चा स्नेह उनमें नहीं होता। ऐसे नकली मित्रों से और नकली रिश्तेदारों से सावधान रहें।

सब लोगों को पहचानें। जो हृदय से सेवा करते हैं, सच्चे मित्र हैं, उनके साथ ही जीवन जीने में, जीवन का सच्चा आनंद है।

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

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