शुक्रवार, 17 मई 2019

👉 आत्मचिंतन के क्षण 17 May 2019

■ अपने ऊपर आपत्ति व संकट को आया देखकर धैर्य खोना कायरता है। जब संसार के कोई दूसरे लोग दुःख में धैर्य रख सकते हैं, हँसते-खेलते हुए आपत्तियों को पार कर सकते हैं, तो हम ही क्येां उन्हें देखकर रोने-चिल्लाने लगें, जबकि परम पिता परमात्मा ने हमें भी साहस, आशा और धैर्य के साथ बुद्धि एवं विवेक का सम्बल उनकी तरह दे रखा है। अंतर केवल यह है कि जहाँ संसार के सिंह पुरुष अंधकार आते ही अपने गुणों के प्रदीप प्रज्वलित कर लेते हैं, वहाँ कायर पुरुष घबराकर उनको प्रदीप्त करना ही भूल जाते हैं।

◆ खेद का विषय है कि आज लोग संयम की महत्ता को भूलते जा रहे हैं। अधिकांश लोगों की धारणा बन गई है कि संयम अथवा ब्रह्मचर्य जैसे आदर्शों की शिक्षा मात्र कहने-सुनने की बातें हैं। कहना न होगा कि यह एक भयानक धारणा है। किसी बुराई को, किन्हीं विवशताओं के वश करते रहने पर भी जब तक वह बुराई ही मानी जाती है तब तक देर-सबेर सुधार की आशा की जा सकती है, किन्तु जब किसी विकृति अथवा दुर्बलता को स्वाभाविक मान लिया जाता है तब उसके सुधार की आशा धूमिल हो जाती है और दुबुर्द्धि के कारण लोग उसके कुफलगामी बनते हैं।

★ भलाई, शराफत, मृदुता का एक बार किया हुआ सद्व्यवहार वह धन है जो रात-दिन बढ़ता है। यदि दैनिक व्यवहार में आप यह नियम बना लें कि हम जिन लोगों के संपर्क में आयेंगे, उनमें से छोटे-बड़े सबके साथ सद्भावनायुक्त व्यवहार करेंगे, मधुर भाषण करेंगे, कटुता और आलोचना से बचते रहेंगे तो स्मरण रखिए आपके मित्र और हितैषियों की संख्या में उत्तरोत्तर अभिवृद्धि होगी।

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