रविवार, 19 जनवरी 2020

👉 कुँठित भावनाओं को निकाल दीजिए (भाग २)

सेक्तमाहना की अतृप्ति से नैराश्य और उदासीनता उत्पन्न हो जाती है। कुछ स्त्री पुरुष तो अर्द्धविक्षिप्त से हो जाते हैं, कुछ का विकास रुक जाता है। औरतों में हिस्टीरिया, मिर्गी, पागलपन, त्वचा रोग हो जाते हैं। पुरुष गन्दी गालियाँ देते हैं। इस भावना का उदात्तीकरण ही उचित है। उच्च साहित्य के अध्ययन, भजन कीर्तन, पूजन, काव्य-निर्माण, चित्रकारी, समाज सेवा के नाना कार्यों द्वारा वृत्ति को तृप्त किया जा सकता है।

वह लड़का, जो छोटे जानवरों को पीटने या सताने में आनन्द लेता है, वास्तव में अपने छिपे पौरुष और शासन करने के भाव को गलत तरीके से प्रकट कर रहा है। इस मार्ग पर चलते-2 संभव है वह एक मारने पीटने वाले दुष्ट व्यक्ति के रूप में पनप जाये। इसके विपरीत यदि वह अपनी इन्हीं भावनाओं को सुनियंत्रण करे, तो एक नेता, सैनिक, सर्जन बन सकता है। जो बच्चे छोटे-2 खिलौने या खेलने के नए-2 आविष्कार करते रहते हैं, वे उन्हीं भावनाओं का विकास कर अच्छे इंजीनियर या वैज्ञानिक बन सकते हैं।

मान लीजिए एक युवक का विवाह उसकी प्रेमिका से तय हो चुका है। उसे उसमें नई प्रेरणा मिली है और वह नए जोश से अपना काम करने में लगा हुआ है। अक्समात वह सम्बन्ध टूट जाता है। उसे भारी निराशा का धक्का लगता है। संभव है आवेश में आकर वह आत्म हत्या कर डाले या किसी विध्वंसात्मक प्रवृत्ति में लग कर प्रतिशोध लेने पर उतारू हो जाय। यह भाव का गलत विकास है। इससे स्वयं उसके भी मस्तिष्क और शरीर को क्षति होगी। उसे किसी प्रिय कार्य में पूरी तरह प्रवृत्त होकर, तन्मय होकर आत्म-विस्मृति करनी चाहिए। भावात्मक शक्ति को उत्पादक मार्ग देना चाहिए जिससे स्वयं उनका और समाज का कुछ हित हो सके। महाकवि तुलसीदास, भक्त प्रवर सूरदास, प्रेम दिवानी मीराबाई, भावविह्वल भक्त कबीर, गुरु नानक आदि की भावनाएँ शाश्वत कवि के रूप में प्रवाहित हुई जिनसे युग दिव्य प्रेरणाएँ आज भी ले रहा है। तुलसी का प्रेम ईश्वरीय शक्ति के यशोगान में लगा, सूर के भजनों में आज भी उनकी आत्मा के दर्शन मिलते हैं। ये महामानव स्वयं अपने कार्य से ही प्रेम करने लगे थे। इन्होंने रुके हुए गुप्त भावों को प्रकट होने का स्वस्थ रूप दिया। हम स्वयं भी अपनी भावनाओं को प्रकट करने के लिए मनोनुकूल इच्छानुरूप, माध्यम ढूँढ़ सकते हैं।

आत्म-निरीक्षण कर देखिए कि किस प्रकार की भावात्मक शक्ति आप में जमी पड़ी है? और उसके विकास का सबसे स्वस्थ रूप क्या हो सकता है? किससे आपकी आन्तरिक तृप्ति होती है? क्रोध का ज्वालामुखी, घृणा का तूफान, आवेश की सुलगती अग्नि मनोनुकूल प्रिय कार्यों से लगने से शान्त होती है। जिस भावना से सम्बन्धित रुकी हुई शक्ति हो, उसके अनुकूल ही रुचिकर उत्पादक प्रिय कार्य का चुनाव कीजिए। इन माध्यमों पर सही सफलता निर्भर है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1960 पृष्ठ 22

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/March/v1.22

👉 QUERIES ABOUT JAP AND DAILY UPASANA (Part 5)

Q.11. How can one derive maximum benefit from daily Gayatri Upasana during mornings and evenings?

Ans. Regularity in morning and evening Gayatri Upasana must be strictly adhered to. Although total involvement and concentration are essential ingredients of Upasana, this alone is not enough. For keeping good health, one is required to perform a minimum amount of manual labour to digest and assimilate the meals taken during the day. Likewise, to reap the fruits of worship, it is essential to adopt Upasana and Sadhana simultaneously.   

To integrate Upasana, and Sadhana one is required to instill maximum degree of faith (Nistha) in Upasana. Nistha is reflected as steadfastness in keeping one’s words and maintaining discipline and regularity in habits. Incorporation of Nistha in Sadhana enhances steadfastness, which in turn provides strength  to the inherent power of resolution and sufficient spiritual strength. The cumulative effect of these attributes helps and inspires the Sadhak in adopting a strict self-discipline which is called Tapascharya. For Anusthans, these attributes are particularly essential. If  these attributes are incorporated in the day to day routine of worship the level of Sadhana rises to that of an Anusthan.

Q.12. How can I raise the level of my day-to-day Upasana to get the benefit of Anusthan?

Ans. It requires five hundred thousand Japs a year at the rate of 15 Malas per day. Sadhana of this type is known as an Abhiyan Sadhana. Although this number is achievable simply by 15 cycles of Mala each day, it is customary to supplement it with two ‘Laghu Anusthans’ of twenty four thousand Japs each during Navratari which falls in the month of Chaitra (15th March to 15th April )and Ashwin (15th August to 15th Sept.). Even otherwise, this practice is commonly followed by all Sadhaks. Additional Sadhana during Navratris (nine auspicious days occurring twice a year) further adds to the benefits of Abhiyan Sadhana.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 57

👉 मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है

भाग्य और पुरुषार्थ जिन्दगी के दो छोर हैं। जिसका एक सिरा वर्तमान में है तो दूसरा हमारे जीवन के सुदूर व्यापी अतीत में अपना विस्तार लिए हुए है। यह सच है कि भाग्य का दायरा बड़ा है, जबकि वर्तमान के पाँवों के नीचे तो केवल दो पग धरती है। भाग्य के कोष में संचित कर्मों की विपुल पूँजी है, संस्कारों की अकूत राशि है, कर्म बीजों, प्रवृत्तियों एवं प्रारब्ध का अतुलनीय भण्डार है। जबकि पुरुषार्थ के पास अपना कहने के लिए केवल एक पल है। जो अभी अपना होते हुए भी अगले ही पल भाग्य के कोष में जा गिरेगा।
  
भाग्य के इस व्यापक आकार को देखकर ही सामान्य जन सहम जाते हैं। अरे यही क्यों? सामान्य जनों की कौन कहे कभी-कभी तो विज्ञ, विशेषज्ञ और वरिष्ठ जन भी भाग्य के बलशाली होने की गवाही देते हैं। बुद्धि के सभी तर्क, ज्योतिष की समस्त गणनाएँ, ग्रह-नक्षत्रों का समूचा दल-बल इसी के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है। ये सभी कहते हैं कि भाग्य अपने अनुरूप शुभ या अशुभ परिस्थितियों का निर्माण करता है। और ये परिस्थतियाँ अपने आँचल में सभी व्यक्तियों-वस्तुओं एवं संयोगों-दुर्योगों को लपेट लेती हैं। ये सब अपना पृथक् अस्तित्त्व खोकर केवल भाग्य की छाया बनकर उसी की भाषा बोलने लग जाते हैं।
  
लेकिन इतने पर भी पुरुषार्थ की महिमा कम नहीं होती। आत्मज्ञानी, तत्त्वदर्शी, अध्यात्मवेत्ता सामान्य जनों के द्वारा कही-सुनी और बोली जाने वाली उपरोक्त सभी बातों को एक सीमा तक ही स्वीकारते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि पुरषार्थ आत्मा की चैतन्य शक्ति है, जबकि भाग्य केवल जड़ कर्मों का समुदाय। और जड़ कर्मों का यह आकार कितना ही बड़ा क्यों न हो चेतना की नन्हीं चिन्गारी इस पर भारी पड़ती है। जिस तरह अग्नि की नन्हीं सी चिन्गारी फूस के बड़े से बड़े ढेर को जलाकर राख कर देती है। जिस तरह छोटे से दिखने वाले सूर्य मण्डल के उदय होते ही तीनों लोकों का अँधेरा भाग जाता है। ठीक उसी तरह पुरुषार्थ का एक पल भी कई जन्मों के भाग्य पर भारी पड़ता है।
  
पुरुषार्थ की प्रक्रिया यदि निरन्तर अनवरत एवं अविराम जारी रहे तो पुराने भाग्य के मिटने व मनचाहे नए भाग्य के बनने में देर नहीं। पुरुषार्थ का प्रचण्ड पवन आत्मा पर छाए भाग्य के सभी आवरणों को छिन्न-भिन्न कर देता है। तब ऐसे संकल्प निष्ठ पुरुषार्थी की आत्मशक्ति से प्रत्येक असम्भव सम्भव और साकार होता है। तभी तो ऋषि वाणी कहती है- मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६४

शनिवार, 18 जनवरी 2020

👉 "विवेकशीलता का स्वर्ग"

एक सेनापति चीन के दार्शनिक नानुशिंगें के पास जिज्ञासा लेकर गया। उसने जाते ही पूछा-स्वर्ग और नरक के बारे में बताइए।

नानुशिंगे ने उसका परिचय पूछा तो अतिथि ने अपने को सेनापति बताया। सुनकर सन्त हँसे और बोले-शक्ल तो आपकी भिखारी जैसी है। सेनापति तो आप लगते नहीं।

सुनते ही वह लाल पीला हो गया और अपने अपमानों से उत्तेजित होकर तलवार खींच ली और सिर काटने पर उतारू हो गया।

नानुशिंगे ने फिर हँसते हुए कहा-तो तुम्हारे पास तलवार भी है? क्या सचमुच लोहे की है? क्या इस पर धार भी चढ़ी है और अगर है तो तुम्हारी कलाइयों में इतना दम-खम भी है कि मेरी गर्दन काट सको?

सेनापति आपे से बाहर हो गया। हाथ काँपने लगे। प्रतीत हुआ कि उसका वार होकर ही रहेगा।

नानुशिंगे गम्भीर हो गये। उनने कहा-योद्धा, यही है नरक, जिसकी बात तुम पूछ रहे थे।

योद्धा ठंडा पड़ गया। उसने तलवार म्यान में कर ली। इस पर नानुशिंगें ने ठंडी साँस खींचते हुए कहा-देखा, यही है विवेकशीलता का स्वर्ग।

जिज्ञासु का समाधान हो गया। वह घर वास लौट गया।

अखण्ड ज्योति जनवरी, 1987 

👉 पाप का फल भोगना पड़ता है।


👉 कुँठित भावनाओं को निकाल दीजिए (भाग १)

मन का भाव दब कर मन की एक ग्रन्थि बन जाता है। जो व्यक्ति अनेक मानसिक व्याधियों से ग्रस्त हैं उसका कारण यह दबे हुए नाना प्रकार के कुँठित भाव ही हैं। बचपन की किस कटु अनुभूति के कारण ये दलित भाव दुःख और व्याधि के कारण बनते हैं और मनुष्य को परेशान किए रहते हैं।

क्रोधी, चिड़चिड़ी, बात बात में झगड़ने वाली कर्कशा नारी के बिगड़े हुए स्वभाव का कारण बचपन में उस पर नाना प्रकार के दमन हैं। कठोर व्यवहार भी विकसित होकर गुप्त भावना ग्रन्थि का रूप धारण कर लेता है। जो नारी या पुरुष बच्चों को घृणा करता है, उसका कारण यह है कि उसमें मातृत्व या पितृत्व के सहज स्वाभाविक भाव पनपने नहीं पाये हैं। अनेक पाश्चात्य अविवाहित नारियाँ पालतू कुत्तों तथा बिल्लियों को अपने पास रखती हैं, उनका प्रेम से चुम्बन करती हैं और अपने मातृत्व के सहज वात्सल्य का माधुर्य लूटती हैं। जो कोमल स्नेह नारी की प्राकृतिक सम्पदा है जिससे मानव शिशु पलता - पनपता है, वह कुत्ते बिल्लियों पर न्यौछावर कर के तृप्त किया जाता है। वात्सल्य और प्रेम की इन भावनाओं को निकालने से पाश्चात्य नारियाँ कृत्रिम मातृत्व के सुख का अनुभव करती हैं तथा मन में आह्लादित रहती हैं।

जिन पुरुषों तथा नारियों में इस प्रकार की अन्य अनेक इच्छाएँ कुँठित पड़ी हैं, वे समाज के भय से दलित होकर मन में कुण्ठा उत्पन्न कर सकती हैं। महत्वाकाँक्षा, प्रसिद्धि, महत्ता आदि न मिलने से मनुष्य चोर, डाकू या शैतान बन सकता है। नारियों की सेक्स भावना अतृप्त रहने से उनमें हिस्टीरिया, प्रमाद, चिड़चिड़ापन उत्पन्न हो सकते हैं। अतः मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रत्येक स्वस्थ स्त्री पुरुष का अवरुद्ध भावनाओं को निकालने के मार्ग ढूँढ़िये। ऐसी नारियाँ समाज सेवा में तन मन लगा कर अपने हृदय का भार हलका कर सकती हैं अथवा यतीम खाने के अनाथ बच्चों की देख रेख, प्यार, सेवा, पालन, पोषण, सेवा, सुश्रूषा कर मातृत्व की सहज वृत्ति की तृप्ति कर सकती हैं। उन्हें चाहिए कि वे गरीबों की बस्तियों की ओर निकल जाया करें। वहाँ के अर्द्धनग्न और भूखे बच्चों की देख रेख किया करें। उन्हें स्नान करायें और स्वच्छ वस्त्र धारण करायें, उनके साथ खेलें, गायें, बातचीत करें। इस प्रेम से गुप्त भावनाओं को निकालने का स्वस्थ मार्ग मिलता है जो मानसिक स्वास्थ्य और सुख के लिए अमृत तुल्य है। आपके मन की कोई भी भावना, यदि अतृप्त है तो मानसिक संस्थान में भावना ग्रन्थि (काम्लेक्त) उत्पन्न करेंगी और नाना मनोविकारों में प्रस्फुटित होंगी। वह हमारे गुप्त प्रदेश में बाहर निकलने और तृप्ति प्राप्त करने के अवसर देखा करती हैं। जो उसे निर्दयता से कुचल डालते हैं, वे मानसिक रोगों के शिकार बनते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1960 पृष्ठ 21

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/March/v1.21

👉 QUERIES ABOUT JAP AND DAILY UPASANA (Part 4)

Q.9. On what should one concentrate during Upasana?

Ans. Those believing in Divinity ‘with form’ (Sakar) are advised to concentrate on an idol or picture of Gayatri, whereas those having faith in formless God (Nirakar) may concentrate in the central, part of the sun, all the while imagining that the ethereal solar energy is permeating and purifying the trio of, physical (Sthool) subtle (Sooksham)  and causal (Karan) bodies of the Sadhak). During Upasana, it is necessary to concentrate one’s thoughts exclusively on the deity. Persistent attempts should be made to restrain thoughts from wandering. Extraneous thoughts should not be allowed to enter the mind.

Q.10. How does one meditate on Savita?

Ans. Spiritual tradition in India considers Gayatri as the most powerful medium for invocation of Savita, the omnipresent cosmic energy of God operating the natural functions in the animate beings (flora and fauna) and in the inanimate objects (e.g. as fission and fusion, magnetism and gravity in planets and stars). Since this energy is manifestly (visibly) received all over this planet through solar (and invisible stellar) radiations, it is logical to consider the Sun as the representative of Savita. Experience shows that there is maximum absorption of this energy at dawn.

While meditating on the rising Sun, the devotee has the advantage of interacting with Savita with each of his/her three bodies. The physical body (Sthul Sharir) is conceptualised as being purified by permeation of solar energy through the millions of pores in the body. The process of conceptualisation as Savita interacting with the subtle body (Sukcham sharir), purifies the “Ideosphere” and deeply meditating about integrating one’s individual identity with the cosmic existence of Savita, the devotee interacts through the causal Body (Karan Sharir). (Ref. Upasana Ke Do Charan - Jap Aur Dhyan).

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 53

👉 लौकिक सफलताओं का आधार

तात्पर्य केवल इतना है कि नीति और अनीति के आधार पर प्रतिष्ठा−अप्रतिष्ठा, प्रेम, द्वेष, शान्ति−अशान्ति, दंड पुरस्कार, स्वर्ग−नरक मिलते हैं, पर लौकिक सफलताओं का आधार जागरुकता, पुरुषार्थ, लगन, साहस आदि गुण ही हैं। यह सभी गुण शरीर के नहीं, मन के हैं। मन को उपयोगी, अनुकूल, उचित आदतों का, विचार पद्धति का अभ्यस्त बना लेने से ही नाना प्रकार के उन गुणों का आविर्भाव होता है जो लौकिक एवं पारलौकिक सफलताओं के मूल आधार हैं।

शरीर को आलस, असंयम, उपेक्षा एवं दुर्व्यसनों में पड़ा रहने दिया जाय तो उसकी सारी विशेषताएँ नष्ट हो जायेंगी। इसी प्रकार मन को अव्यवस्थित पड़ा रहने दिया जाय, उसे कुसंस्कार−ग्रस्त होने से संभाला न जाय तो निश्चय ही वह हीन स्थिति को पकड़ लेगा। पानी का स्वभाव नीचे की तरफ बहना है, ऊपर उठाने के लिए बहुत प्रयत्न करते हैं तब सफलता मिलती है। मन का भी यही हाल है यदि उसे रोका, संभाला, समझाया, बाँधा और उठाया न जाय तो उसका कुसंस्कारी दुर्गुणी, पतनोन्मुखी, आलसी एवं दीन−दरिद्र प्रकृति का बन जाना ही निश्चित है। आज इसी प्रकार का मानसिक अवसाद चारों ओर फैल रहा है। शरीर की दुर्बलता और बीमारी जिस प्रकार व्यापक रूप से फैली दिखाई देती है वैसी ही हमारी मानसिक दुर्बलता एवं रुग्णता भी कम शोचनीय नहीं है। कलह प्रिय, क्रोधी, तुनक-मिज़ाज, असहिष्णु, ईर्ष्यालु, छिद्रान्वेषी, अहंकारी, उद्दण्ड, प्रकृति के लोगों से हमारा समाज भरा पड़ा है। इन दुर्गुणों के कारण पारस्परिक प्रेम−भावना, आत्मीयता एवं घनिष्ठता दिन−दिन नष्ट होती जाती है और एक आदमी दूसरे से दिन−दिन दूर पड़ता जाता है। प्रेम, सहयोग, प्रसन्नता, मुस्कान, नम्रता, उदारता, सहिष्णुता, शिष्टता, कृतज्ञता के गुणों से यदि मनोभूमि परिष्कृत हो तो परस्पर का प्रेम−भाव कितना बढ़े, कितना सुदृढ़ रहे और फलस्वरूप कितनी प्रगति एवं प्रसन्नता का वातावरण बन जाय?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962 पृष्ठ 23

👉 हम बदलेंगे-युग बदलेगा

जैसा हम औरों को बनाना-बदलना चाहते हैं, वैसा ही स्वयं को बनाना- बदलना होगा। दूसरों को बदलने के लिए स्वयं में बदलाव जरूरी है। अपने में आने वाले बदलाव से आसपास के लोग-वातावरण अपने आप ही बदलने लगते हैं। बिना स्वयं में परिवर्तन लाये औरों में परिवर्तन सम्भव नहीं।
  
जो स्वयं जाग्रत् है केवल वही दूसरों के जागरण में सहायक बन सकता है। स्वयं सोया हुआ भला औरों को किस तरह से जगा पाएगा? सच भी यही है कि जिनके भीतर स्वयं ही अंधकार का आवास है, वह कभी भी दूसरों के लिए प्रकाश का स्रोत नहीं हो सकता। दूसरों की सेवा केवल तभी सम्भव है, जब हम स्वयं का सृजन प्रारम्भ करें। लोक निर्माण-आत्म निर्माण के बिना असम्भव है।
  
किसी ने सन्त तिरुवल्लुवर से पूछा-मैं सेवा करना चाहता हूँ। वह मुस्कराकर बोले-‘पहले साधना-तब सेवा, क्योंकि जो तुम्हारे पास नहीं है, उसे तुम दूसरों को कैसे दोगे? साधना से जब पाया जा चुका हो-तभी उसे सेवा में बाँटा जा सकता है।’ हालाँकि उलटबासी यही है कि सेवा की चाहत बहुतों में होती है, पर स्व-साधना और आत्म सृजन की नहीं। यह तो वैसा ही हुआ कि जैसे कोई बीज तो न बोना चाहे, लेकिन फसल काटना चाहे, परन्तु यह प्रकृति के विधान के विपरीत है।
  
किसी अत्यन्त दीन-दुर्बल-दरिद्र व्यक्ति ने भगवान् महावीर से कहा-भगवन्! मैं मानवता की सेवा कैसे करूँ? वह व्यक्ति शरीर से नहीं आत्मा से दुर्बल था, वह दरिद्र धन से नहीं जीवन से था। भगवान् महावीर ने उसे बड़े ही करुण भाव से देखा और बड़ी दयाभाव से उससे बोले-क्या कर सकोगे तुम? उनका यह वचन बहुत छोटा था, परन्तु बड़ा गहरा मर्म था इसमें। अच्छा हो कि इसे हम सब अपने मन में दुहरावें? यह वचन हममें से हर एक को कहा गया है। सब करना स्वयं पर और स्वयं से प्रारम्भ होता है। स्वयं से पहले जो दूसरों के लिए कुछ करना चाहता है, वह भूल में है। स्वयं का जो कल्याण कर लेता है, वही औरों का कल्याण कर पाता है। अपने परिवर्तन में ही युग परिवर्तन का बीज निहित है। तभी तो युगऋषि की वाणी कहती है-‘हम बदलेंगे-युग बदलेगा’।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६३

शुक्रवार, 17 जनवरी 2020

👉 सच्ची साधना

पति का अकाल निधन साध्वी रोहिणी पर वज्राघात था, जिसे सहन कर सकना असम्भव था किन्तु पुत्र देव शर्मा के प्रति कर्त्तव्य और ममता ने उसे जीने के लिए विवश कर दिया। अभ्यास नहीं था तो भी उसने घोर परिश्रम किया और बेटे का न केवल पालन पोषण ही वरन् उसे वेदाँग के अध्ययन जैसी उच्च शिक्षा भी दिलाई। देवशर्मा माँ के प्रताप से अपने समय के श्रेष्ठ विद्वानों में गिना जाने लगा।

माँ वृद्धा हो गई थी नीति कहती थी अब बेटे को प्रत्युपकार-करना चाहिये पर दुष्ट कृतघ्नता को क्या कहा जाये-जहाँ भी उसका जन्म हुआ मर्यादायें, नीति और कर्त्तव्य भाव वहीं विश्रृंखलित हुये। संसार में यह जो कलह और अशाँति है कृतघ्नता ही उसका एक मात्र कारण है। बेटे के मन में यह समझ नहीं आई। अपनी मुक्ति, अपना स्वर्ग उसे अधिक आवश्यक लगा सो माँ और छोटी बहन को बिलखता छोड़कर देवशर्मा घर से भाग निकला और तीर्थाटन करते हुये नन्दिग्राम के एक मठ में जाकर तप करने लगा।

एक दिन देवशर्मा प्रातःकाल नदी के किनारे पहुँचे। स्नान कर अपना चीवर सूखने के लिये जमीन पर डाल दिया और स्वयं वहीं पर आसन डालकर ध्यान मग्न हो गये। प्रातःकालीन सन्ध्या समाप्त कर जैसे ही देवशर्मा उठे उन्होंने देखा एक कौवा और एक बकुल चीवर को चोंच में दबाकर उड़े जा रहे हैं। देवशर्मा के क्रोध का ठिकाना न रहा। उन्होंने बड़ी-बड़ी तान्त्रिक सिद्धियाँ प्राप्त की थी। शक्ति का मद बड़ा बुरा होता है। उन्होंने क्रोधपूर्ण दृष्टि से पक्षियों की ओर देखा। आँखों से अग्नि ज्वाला फूटी और दोनों पक्षी जलकर वहीं खाक हो गये। देवशर्मा अपनी सिद्धि देखकर फूले नहीं समाये। उन्हें लगा समस्त भूमंडल पर उन जैसा कोई दूसरा सिद्ध नहीं है।

अहंकार से भरे देवशर्मा मठ की ओर चल पड़े। मार्ग में नंदिग्राम पड़ता था सोचा आज की भिक्षा भी लेते चलें सो देवशर्मा ने एक सद् गृहस्थ के द्वार पर “भवति भिक्षाँ देहि” की पुकार लगाई और भिक्षा की प्रतीक्षा में वहीं खड़े हो गये।

भीतर से आवाज आ रही थी इससे पता चलता था कि गृह स्वामिनी अन्दर ही है पर कोई बाहर नहीं आ रहा यह देखकर देवशर्मा को बड़ा गुस्सा आया। उन्होंने दुबारा तिबारा और चौथी बार भी पुकारा पर हर बार भीतर से एक ही आवाज आई स्वामी जी ठहरिये! मैं अभी साधना कर रही हूँ साधना समाप्त कर लूँगी तक भिक्षा दूँगी तब तक आप खड़े रहिये। देवशर्मा का क्रोध सीमा पार गया। तड़प कर बोले-दुष्टा ! साधना कर रही है या परिहास-जानती नहीं इस अवहेलना का क्या परिणाम हो सकता है।

संयत और गम्भीर स्वर भीतर से बाहर आया- महात्मन् जानती हूँ आप शाप देना चाहेंगे किन्तु मैं कोई कौवा और बलाका नहीं, संत ! जो तुम्हारी कोप दृष्टि से जलकर नष्ट हो जाऊँगी। जिसने तुम्हें जीवन भर पाला उस माँ को त्यागकर अपनी मुक्ति चाहने वाले साधु ! आप मेरा कुछ भी तो बिगाड़ नहीं सकते ?

देवशर्मा का सिद्धि का अहंकार चूर-चूर हो गया। कुछ देर बाद गृह स्वामिनी घर से बाहर आई और भिक्षा देने लगी। देवशर्मा ने साश्चर्य पूछा-भद्रे ! आप मुझे यह बतादे कि आप कौन सी साधना करती हैं जिससे बिना देखे ही कौए के जलाने और माँ को असहाय छोड़ आने की घटना जान गई।

गृह स्वामिनी ने उत्तर दिया---कर्त्तव्य की साधना” महात्मन् ! म् अपने पति, अपने बच्चे, अपने परिवार, समाज और देश के प्रति कर्त्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करती हूँ। उसी की सिद्धि है यह। देवशर्मा का सिर लज्जा से नीचे झुक गया। भीख नहीं ली उन्होंने -चुपचाप जिस घर को छोड़कर आये थे चल पड़े उसी ओर छोड़ी हुई कर्त्तव्य की साधना पूरी करने।

अखण्ड ज्योति दिसम्बर, 1971    

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/December/v1.14

👉 दोनों साथ चलें

👉 QUERIES ABOUT JAP AND DAILY UPASANA (Part 3)

Q.7. Should one deliberate on the meaning of the Mantra during the Jap?  
Ans. As regards contemplation on the meaning of Mantra during the Jap, it is recommended that one should only meditate on the deity during Jap. The practical difficulty in thinking about meaning of Mantra at the time of Jap is that it takes time to form imaginary pictures in accordance with the meaning of every word and during this time Jap cannot be interrupted. Jap should be continuous, uninterrupted and non-stop like the flow of oil. Of course, the meaning of Gayatri Mantra should be thoroughly understood. If it is sought to form imaginary pictures of the meanings of different words, this can conveniently be done at some other time but not with Jap.

Q.8. Is taking a bath essential prior to Jap? What should one wear during the Jap?


Ans. It is more appropriate to sit in front of an altar after taking bath, wearing clean clothes and perform worship in the morning with due salutations and reverence. It keeps the mind happily steady and helps in its concentration. But when duty hours are odd, a person is sick or where it is not possible to arrange for water, one can perform mental Jap without the help of Mala. Scriptures recommend cleanliness of body and clothes as a pre-requisite for any religious practice or worship. Since a routine of wearing freshly-washed clothes during each session of Upasana, is to be maintained, one is advised to be clad only in a two-piece garment, one each for covering the upper and lower parts of the body e.g. Dhoti - Dupatta. However, for protection against cold an additional under-garment can be worn.
  
Though the pundits prescribe cleanliness of body and clothes, it is not considered mandatory for all occasions. Situations may arise when the worshipper finds it difficult to adhere to this rule strictly. Under such circumstances, one should not discontinue the routine of worship. Otherwise, the aspirant is totally deprived of even the partial benefit. Besides cleanliness, the objective of these preparatory rituals is to help the worshipper in getting rid of lethargy. A sick or weak person may wash his arms, feet and face, or if possible wipe the body with a wet cloth.  
  
Woollen or silken clothes do not absorb dirt and perspiration to the extent cotton wears do. Nevertheless, these too require cleaning at certain intervals. Since, now-a-days silk is obtained by boiling live silk worms, silk wears are no longer considered appropriate for a spiritual practice. These are not recommended for Upasana. The same holds true for animal hides. The ancient sages used hides of animals who died a natural death. This is no longer true. Animals are being killed for their hides. Now-a-days a variety of other floor-spreads (woollens, synthetics) are available ,which may be used; and cleaned by washing or through exposure to sun from time to time.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 52

👉 विचारों का प्रतिफल कर्म

कर्म जो आँखों से दिखाई देता है वह अदृश्य−विचारों का ही दृश्य रूप है। मनुष्य जैसा सोचता है वैसा करता है। चोरी, बेईमानी, दगाबाजी, शैतानी, बदमाशी कोई आदमी यकायक कभी नहीं कर सकता, उसके मन में उस प्रकार के विचार बहुत दिनों से घूमते रहते हैं। अवसर न मिलने से वे दबे हुए थे, समय पाते ही वे कार्य रूप में परिणत हो गये। बाहर के लोगों को किसी के द्वारा यकायक कोई दुष्कर्म होने की बात सुनकर इसलिए आश्चर्य होता है कि वे उसकी भीतरी स्थिति को नहीं जानते थे। इसी प्रकार कोई अधिक उच्चकोटि का सत्कर्म करने का भी आकस्मिक समाचार भले ही सुनने को मिले पर वस्तुतः उसकी तैयारी वह मनुष्य भीतर ही भीतर बहुत दिनों से कर रहा होता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति आज उन्नतिशील एवं सफलता सम्पन्न दिखाई पड़ते हैं वे अचानक ही वैसे नहीं बन गये होते वरन् चिरकाल से उनका प्रयत्न उसके लिए चल रहा होता है। भीतरी पुरुषार्थ को उनने बहुत पहले जगा लिया होता है। उनने अपने मनःक्षेत्र में भीतर ही भीतर वह अच्छाइयाँ जमा कर ली होती हैं जिनके द्वारा बाह्य जगत में दूसरों का सहयोग एवं उन्नति का आधार निर्भर रहता है। बाह्य−जीवन हमारे भीतरी जीवन का प्रतिबिम्ब मात्र है। पर्दे के पीछे दीपक जल रहा है तो उसका कुछ प्रकाश बाहर भी परिलक्षित होता है। इसी प्रकार भीतरी पर्दे में जिनमें कुछ अच्छाइयाँ हैं वे ही उनकी कीमत पर बाह्य−जगत में सुख साधनों को खरीद लेते हैं।

अनैतिक प्रकृति के लोग बहुधा अपनी चालाकी से धन कमा लेते या कोई उन्नति कर लेते देखे जाते हैं। इससे उस कमाई का सारा श्रेय अनैतिकता को नहीं दिया जा सकता। माना कि लोगों की कमजोरी और भोलेपन का लाभ कई शैतान उठा लेते हैं पर इस शैतानी के पीछे भी उनकी चतुरता, तीव्र−बुद्धि, तत्परता, सावधानी, लगन, हिम्मत, कष्ट सहिष्णुता आदि अनेक गुण छिपे रहते हैं। डाकुओं में भी पुरुषार्थ, हिम्मत, बहादुरी, कष्ट−सहिष्णुता, चतुरता, सावधानी अपने साथियों के प्रति वफादारी आदि अनेक मानसिक गुण भी होते हैं। यदि यह गुण किसी में न हों और वह केवल बेईमानी से ही कुछ लाभ उठाना चाहे तो उसका प्रयास एक कदम भी सफल नहीं हो सकता। अनैतिक लोगों की सफलता से चकित होकर कई लोग अनैतिकता को लाभ और सफलता का हेतु मानने लगते हैं यह भूल है। अनैतिकता के फलस्वरूप तो उन्हें सर्वत्र अविश्वास, घृणा, तिरस्कार, असहयोग एवं यथा अवसर राजकीय एवं ईश्वरीय दंड ही मिलता है। लाभ का श्रेय तो उस मनोभूमि को है जो प्रयत्नपूर्वक इतनी जल्दी बनाई गई कि अनैतिकता के दंड एवं लोगों की पकड़ से बचते हुए एक प्रकार की सफलता प्राप्त कर ली गई। बेवकूफ एवं आलसी, लापरवाह एवं अड़ियल प्रकृति के लोग अनैतिकता को अपनाकर भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। यदि पाप से ही कमाई होती हुई होती तो हर दुरात्मा को सफलता मिली होती। फिर जो लाखों अनैतिक मनोभूमि वाले भीख−टूक पर गुजारा करते दिखाई देते हैं वे सब के सब मालदार ही हो गये होते।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962 पृष्ठ 22

👉 सन्त का सान्निध्य

सन्त का सान्निध्य अनूठा है। इसके रहस्य गहरे हैं। सन्त के सान्निध्य में जो दृश्य घटित होता है वह थोड़ा है। लेकिन जो अदृश्य में घटता है वह ज्यादा है। उसका महत्त्व और मोल-अनमोल है। सन्त का सान्निध्य नियमित होता रहे, इसमें निरन्तरता बनी रहे तो अपने आप ही जीवनक्रम बदलने लगता है। मन में जड़ जमाये बैठी उल्टी आस्थाएँ-मान्यताएँ-आग्रह फिर से उलटकर सीधे होने लगते हैं। सन्त के सान्निध्य में विचार परिवर्तन-जीवन परिवर्तन के क्रांति स्फुलिंग यूँ ही उड़ते रहते हैं। इनके दाहक स्पर्श से जीवन की अवांछनीयताओं का दहन हुए बिना नहीं रहता।
  
सन्त के सान्निध्य में सत् का सत्य बोध अनायास हो जाता है। पर यह हो पाता है सन्त के चित् के कारण, उसके चैतन्य प्रवाह की वजह से। हालाँकि यह अदृश्य में घटित होता है, परन्तु इसकी अनुभूति आनन्द बनकर अस्तित्व में बरसती रहती है। यह आश्चर्यकारी परिवर्तन उन सभी में होता है जो सन्त के सान्निध्य में सजग होकर रहते हैं। यह ऐसा अनुभव है जिसे जब मन करे तभी पाया जा सकता है। बस इसके लिए चाहिए सन्त का सान्निध्य।
  
इस सम्बन्ध में बड़ा पावन प्रसंग है-सन्त फरीद के जीवन का। बिलाल नाम के एक व्यक्ति को कुछ षड्यन्त्रकारी लोगों ने उनके पास भेजा। उसने सन्त फरीद को कई तरह से परेशान करने की कोशिश की, पर वह सन्त शान्त रहे। सन्त की इस अचरज भरी शान्ति ने बिलाल के मन को छू लिया और वह उन्हीं के साथ रहने लगा। उसे सन्त के साथ रहते हुए कई वर्ष बीत गये। इन वर्षों में उसमें कई आध्यात्मिक परिवर्तन हुए। हालाँकि उसने इसके लिए कोई साधना नहीं की थी। बाबा फरीद के एक शिष्य ने थोड़ा हैरान होते हुए इसका रहस्य जानना चाहा। बाबा फरीद ने हँसते हुए कहा-सन्त का सान्निध्य स्वयं में साधना है। सन्त के सान्निध्य में अदृश्य आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह उमड़ता रहता है जो न चाहने पर भी पास रहने वाले के व्यक्तित्व के ऊपरी और भीतरी परतों को प्रभावित करता है। यह प्रक्रिया अदृश्य रूप में उसके चित्त एवं चेतना को घेरती है और परिणाम में अपने आप ही सन्त के सान्निध्य में आध्यात्मिक व्यक्तित्व जन्म पा जाता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६२

गुरुवार, 16 जनवरी 2020

Aastikata Aur Sajjanata Ki Riti Niti | आस्तिकता और सज्जनता की रीति नीति ...



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👉 पीला पत्ता क्यों गिरा?


👉 QUERIES ABOUT JAP AND DAILY UPASANA (Part 2)

Q.4. What is the most suitable time of the day for Upasana?  

Ans. Brahm Muhoort i.e. an hour before sunrise in the morning, and just before sunset in the evening to an hour thereafter bring forth maximum result. During day Upasana may be carried out any time according to one’s convenience. Although a fixed routine in timings is recommended yet it is not mandatory. As a matter of fact, mental Jap may be carried on even while walking, travelling or lying on the bed. (The movements of lips, vocal chord and tongue are forbidden in the latter case.)

Q.5. Is  Gayatri Jap permissible during night time?

Ans. Sages had advised Jap during the day-time for two reasons. One: the nights are meant exclusively for rest. Any activity during the night (including Upasana) is likely to affect one’s health.
Two: since Sun is the deity of Gayatri, the radiations from the Sun are readily obtained from sunlight during day. Nevertheless, Upasana during the night is not a taboo. One may choose his own convenient time for Jap without any apprehension regarding the procedure.

Q.6. Is Jap permissible along-with other activities?

Ans. One may perform Jap even while walking or without taking a bath or during other physical activities. On such occasions, however, it should only be a mental process without movement of lips, larynx and tongue. Instead of taking the help of a rosary, a clock may be used for keeping a count.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 52

👉 सच्ची सम्पदा एवं विभूतियाँ

धन, यश, स्वास्थ्य, विद्या, सहयोग आदि विभूतियों के आधार पर इस संसार में नाना प्रकार की सम्पदायें और सुविधायें प्राप्त की जाती हैं। और यह विभूतियाँ मनुष्य की मानसिक स्थिति के अनुरूप आती या चली जाती हैं। भाग्य, देवता, ईश्वर, परिस्थिति आदि को भी दुख−सुख का कारण माना जाता है, पर थोड़ी और गहराई तक जाने पर यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि भाग्य एवं ईश्वर का वरदान एवं अभिशाप भी मनुष्य के अपने विचारों एवं कार्यों के आधार पर ही प्राप्त होता है। न तो ईश्वर अन्यायी है और न भाग्य लिखने वाला विधाता बावला है जो जिसका प्रारब्ध बिना विचारे चाहे जैसा लिख डाला करे। इस बाह्य जगत में अव्यवस्था चल भी सकती है, यहाँ रिश्वत, पक्षपात या भूल−चूक की गुँजाइश रहती है, पर सूक्ष्म जगत में ईश्वरीय विधान एवं कार्यफल के क्षेत्र में किसी प्रकार की गड़बड़ी संभव नहीं। वहाँ मनुष्य का कर्तृत्व ही परखा जाता है और उसी आधार पर प्रारब्ध का निर्माण किया जाता है। वस्तुतः पुरुषार्थ ही प्रारब्ध बनकर सामने आया हुआ है। आज का पुरुषार्थ अगले कल प्रारब्ध बनने वाला है। कर्म और उसका फल मिलने में देर−सवेर का जो अंतर रह जाता है वही भाग्य और ईश्वर को हमारे कर्म से बाहर की कोई स्वतन्त्र वस्तु मानने का भ्रम पैदा करता है। वस्तुतः कर्म ही प्रधान है। उसी का नाम आगे−पीछे भाग्य बन जाता है। मीठे दूध का नाम गुण और रूप भी तो समयानुसार बदलकर खट्टे गाढ़े दही के रूप में हो जाता है। प्रारब्ध और पुरुषार्थ का अन्तर भी दूध और दही जैसा ही नाममात्र का है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962 पृष्ठ 21

👉 सद्गुरु प्रेम

प्रेम के दो पहलू हैं- विरह और मिलन। जिसने प्रेम किया है, वही इस सच को जान सकता है। प्रेम सद्गुरु से हो तो यह सच और भी सघन हो जाता है। प्रेम का पहला अनुभव विरह में होता है और इस अनुभव की पूर्णता मिलन में आती है। विरह न हो तो मिलन कभी होता ही नहीं है। ऐसे में सद्गुरु मिल भी जाय तो उनकी पहचान ही नहीं हो पाती। उन्हें अपने जैसा मनुष्य समझने का भ्रम बना रहता है। उनके अस्तित्व में व्याप्त गुरुतत्त्व से परिचय-पहचान और उसमें अपने व्यक्तित्व का समर्पण-विसर्जन-विलय नहीं बन पड़ता।
  
विरह में व्यक्तित्व पकता है- उसमें जन्म होता है साधक का, भक्त का और शिष्य का। इस अवस्था में चुभते हैं अनेक प्रश्न कंटक, होती हैं अनगिन परीक्षाएँ, तब आती है मिलन की उपलब्धि। सच यही है कि विरह तैयारी है और मिलन उपलब्धि। आँसुओं से रास्ते को पाटना पड़ता है तभी मिलता है सद्गुरु के मन्दिर का द्वार। रो-रोकर काटनी पड़ती है विरह की लम्बी रात, तभी आती है मिलन की सुबह। जिसकी आँखें जितनी ज्यादा रोती हैं, उसकी सुबह उतनी ही ताजा होती है। जितने आँसू बहे होते हैं, उतने ही सुन्दर सूरज का जन्म होता है।
  
शिष्य के विरह पर निर्भर है कि उसका सद्गुरु मिलन कितना प्रीतिकर, कितना गहन और कितना गम्भीर होगा। जो आसानी से मिलता है, वह आसानी से बिछुड़ता भी है। मिलकर कभी भी न बिछुड़ने वाले सद्गुरु बहुत रोने के बाद ही मिलते हैं। और आँसू भी साधारण आँसू नहीं, हृदय ही जैसे पिघल-पिघल कर आँसुओं में बहता है। जैसे रक्त आँसू बन जाता है, जैसे प्राण ही आँसू बन जाते हैं।
  
विरह अवस्था है पुकार की। शिष्य को भरोसा है कि सद्गुरु हैं तो अवश्य, पर न जाने क्यों दीख नहीं रहे। विरह का अर्थ है कि हम तुम्हें तलाशेंगे। कितनी ही हो कठिन यात्रा, कितनी ही दुर्गम क्यों न हो, हम सब दाँव पर लगाएँगे, मगर तुमसे मिलकर ही रहेंगे, शिष्य का हृदय चीत्कार कर हर पल यही कहता है, तुम जो अदृश्य हो तुम्हें दृश्य बनना ही होगा। तुम जो दूर स्पर्श के पार हो, तुमसे आलिंगन करना ही होगा।
  
अदृश्य हो चुके अपने सद्गुरु से आलिंगन की आकांक्षा, उनके अदृश्य रूप को अपनी आँखों में भर लेने की आकांक्षा विरह है। शिष्य के लिए इसमें कड़ी अग्नि परीक्षाएँ हैं। उसे गलना, जलना और मिटना पड़ता है। जिस दिन राख-राख हो जाता है उसका अस्तित्त्व, उस दिन उसी राख से सद्गुरु का मिलन प्रारम्भ हो जाता है। और तभी आती है सद्गुरु प्रेम की पूर्णता।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६२

मंगलवार, 14 जनवरी 2020

👉 यार~यार की लड़ाई

एक बार एक महात्मा जी बीच बाजार में से कहीँ जा रहे थे। वहीं पास के एक कोठे की छत पर एक वैश्या पान खा रही थी। अचानक उसने बेख्याली से उसने पान की पीक नीचे थूकी और वो पीक नीचे जा रहे महात्मा जी के ऊपर गिरी।

महात्मा जी ने ऊपर देखा वेश्या की ओर तथा मुस्करा कर आगे की और बढ़ गए। यह देखकर वैश्या को अपना अपमान समझ, गुस्सा आया। उसने वहीं पर बैठे अपने यार को कहा कि तुम्हारे होते, कोई मुझे देखकर मुस्कुरा रहा है और तुम यहाँ बैठे हो।

इतना सुनकर उसके यार ने वहीं पड़ा डंडा उठाया और नीचे उतरकर आगे जा रहे महातमा जी के सर पर जोर से दे मारा और वैश्या की तरफ देखकर मुस्कुराया, कि देख, मैंने बदला ले लिया है।

महात्मा जी ने अपना सर देखा जिसमे से खून निकल रहा था। तब भी महात्मा जी कुछ नहीं बोले और मुस्करा दिए और वहीं पास के एक पेड़ के नीचे बैठ गए। उस वैश्या का यार मुस्कुराता हुआ वापस लौटने लगा। जब वो कोठे की सीढ़ियां चढ़ रहा था, तो सबसे ऊपर की सीढ़ी से उसका पैर फिसला और वो सबसे नीचे आ गिरा और उसके बहुत ज्यादा चोट लगी।

ये सब वो वैश्या देख रही थी और वो समझ गई कि वो महात्मा जी बहुत ही नाम जपने वाले और सच्चे है। वो नीचे आई और महात्मा जी के पास जाकर पैरो में गिरकर बोली - महात्मा जी मुझे माफ़ कर दो मैंने ही आपके पीछे अपने यार को भेजा था। उसने ही आपके सर पर वार किया था मुझे माफ़ कर दो ।

तो उन महात्मा जी ने मुस्करा कर कहा कि बेटी इस सारे झगड़े में तू और मैं कहाँ से आ गए। इसमें  तुम्हारा और मेरा कोई दोष नहीं है ये यार~यार की लड़ाई है। "तुम्हारे यार से तुम्हारी बेइज्जती नहीं देखी गई" और मेरा यार जो वो ऊपरवाला है उससे मेरी तकलीफ नहीं देखी गई। इसलिए इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। और तुम्हारा यार तो तुम्हारे पास कभी कभी ही आता है कभी दिन में कभी रात में, लेकिन मेरा यार हर वक़्त मेरे साथ ही रहता है।

इसलिए तुम भी उसी की शरण लो जो हर वक़्त तुम्हारे साथ ही रहे। "जिंदगी में भी और जिंदगी के बाद भी "

👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (भाग 2)

सम्पत्ति के लिए रोने और चिन्तित होने वाला व्यक्ति यदि यह सोच ले कि अधिक सम्पत्ति उपार्जन के लिए मनुष्य को उचित एवं अनुचित साधनों का प्रयोग क...