सोमवार, 1 जुलाई 2019

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 July 2019


👉 आज का सद्चिंतन 1 July 2019


👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 19)

👉 चित्त के संस्कारों की चिकित्सा
चित्त के संस्कार कर्मबीज हैं। इन्हीं के अनुरूप व्यक्ति की मनःस्थिति एवं परिस्थिति का निर्माण होता है। जन्म और जीवन के अनगिन रहस्य इन संस्कारों में ही समाए हैं। जिस क्रम में संस्कार जाग्रत् होते हैं, कर्म बीज अंकुरित होते हैं, उसी क्रम में मनःस्थिति परिवर्तित होती है, परिस्थितियों में नए मोड़ आते हैं। जन्म के समय की परिस्थितियाँ, माता- पिता का चयन, गरीबी- अमीरी की स्थिति जीवात्मा के संस्कारों के अनुरूप बनती है। कालक्रम में इनकी नयी- नयी परतें खुलती हैं। अपनी परिपक्वता के क्रम में कर्मबीजों का अंकुरण होता है और जीवन में परिवर्तन आते रहते हैं। किसी भी आध्यात्मिक चिकित्सक के लिए इन संस्कारों के विज्ञान को जानना निहायत जरूरी है। यह इतना आवश्यक है कि इसके बिना किसी की आध्यात्मिक चिकित्सा सम्भव ही नहीं हो सकती।

किसी भी व्यक्ति का परिचय उसके व्यवहार से मिलता है। इसी आधार पर उसके गुण- दोष देखे- जाने और आँके जाते हैं। हालाँकि व्यवहार के प्रेरक विचार होते हैं और विचारों की प्रेरक भावनाएँ होती हैं। और इन विचारों और भावनाओं का स्वरूप व्यक्ति के संस्कार तय करते हैं। इस गहराई तक कम ही लोगों का ध्यान जाता है। सामान्य जन तो क्या विशेषज्ञों से भी यह चूक हो जाती है। किसी के जीवन का ऑकलन करते समय प्रायः व्यवहार एवं विचारों तक ही अपने को समेट लिया जाता है। मनोवैज्ञानिकों की सीमाएँ यहीं समाप्त हो जाती हैं। परन्तु अध्यात्म विज्ञानी अपने ऑकलन संस्कारों के आधार पर करते हैं। क्योंकि आध्यात्मिक चिकित्सा के आधारभूत ढाँचे का आधार यही है।

ध्यान रहे, व्यक्ति की इन अतल गहराइयों तक प्रवेश भी वही कर पाते हैं, जिनके पास आध्यात्मिक दृष्टि एवं शक्ति है। आध्यात्मिक ऊर्जा की प्रबलता के बिना यह सब सम्भव नहीं हो पाता। कैसे अनुभव करें चित्त के संस्कारों एवं इनसे होने वाले परिवर्तन को? तो इसका उत्तर अपने निजी जीवन की परिधि एवं परिदृश्य में खोजा जा सकता है। विचार करें कि अपने बचपन की चाहतें और रूचियाँ क्या थीं? आकांक्षाएँ और अरमान क्या थे? परिस्थितियाँ क्या थीं? इन सवालों की गहराई में उतरेंगे तो यह पाएँगे कि परिस्थितियों का ताना- बाना प्रायः मनःस्थिति के अनुरूप ही बुना हुआ था। मन की मूलवृत्तियों के अनुरूप ही परिस्थितियों का शृंगार हुआ था। और ये मूल वृत्तियाँ हमारे अपने संस्कारों के अनुरूप ही थीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1967 पृष्ठ 30

👉 इस आपत्ति−काल में हम थोड़ा साहस तो करें ही! (भाग 3)

साधु−संस्था को पुनर्जीवित करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं, जिसके सहारे आपत्ति ग्रस्त मानवता की प्राणरक्षा की जा सके। समस्याओं के काल−पाश में गर्दन फंसाये हुए इस सुन्दर विश्व को मरण से केवल साधु ही बचा सकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए एक दूसरे का मुँह न ताका जाय, वरन् इस आपत्ति−काल से जूझने के लिए अपना ही कदम बढ़ाया जाय।

अखण्ड−ज्योति परिवार की मणिमाला से एक से एक बढ़कर रत्न मौजूद है। समय आने पर उनके मूल्यवान् अस्तित्व का परिचय हर किसी को मिल सकता हे। अब उसी का समय आ पहुँचा। हमें समय की पुकार पूरी करने के लिए स्वयं ही आगे आना चाहिए।

यो साधु और ब्राह्मण का एक समान जीवन−क्रम होता है और उसी विधि से पूरी जिन्दगी की रूपरेखा बनाने की प्रथा है। पर आपत्ति धर्म के अनुसार सीमित समय के लिए उस क्षेत्र में प्रवेश करने और फिर वापिस अपने समय स्थान पर लौट आने की पद्धति अपनानी पड़ेगी। या तो पूरा या कुछ नहीं की, बात पर अड़ने की आवश्यकता सदा नहीं होती। मध्यम मार्ग पर चलने से कुछ तो लाभ होना ही है। पूरी न मिले तो अधूरी से काम चलाने की नीति है। युद्धकाल में प्रत्येक वयस्क नागरिक को बाधित रूप से सेना में भर्ती होने का आदेश दिया जा सकता है। जब तक संकट−काल रहता है तब तक वे सामान्य नागरिक सेना में भर्ती रहते है। स्थिति सुधरते ही वे सेना छोड़कर घर वापिस आ जाते है और अपने साधारण कार्यों में लग जाते है। साधु−संकट के इस महान् दुर्भिक्ष में भी हम सामान्य नागरिकों को थोड़े−थोड़े समय के लिए उन उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने के लिए आगे आना चाहिए। एक−एक घण्टा श्रमदान करके जब बड़े−बड़े सार्वजनिक प्रयोजन पूरे किये जा सकते है तो कोई कारण नहीं कि हम सब स्वल्प−कालीन व्रत धारण करके साधु−संस्था पर छाये हुए दुर्लभ संकट का निवारण करने के लिए कुछ न सके।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1974 पृष्ठ 23

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1974/January/v1.23

शनिवार, 29 जून 2019

👉 मजदूर के जूते Labor shoes

एक बार एक शिक्षक संपन्न परिवार से सम्बन्ध रखने वाले एक युवा शिष्य के साथ कहीं टहलने निकले उन्होंने देखा की रास्ते में पुराने हो चुके एक जोड़ी जूते उतरे पड़े हैं, जो संभवतः पास के खेत में काम कर रहे गरीब मजदूर के थे जो अब अपना काम ख़त्म कर घर वापस जाने की तयारी कर रहा था।

शिष्य को मजाक सूझा उसने शिक्षक से कहा,  गुरु जी क्यों न हम ये जूते कहीं छिपा कर झाड़ियों के पीछे छिप जाएं; जब वो मजदूर इन्हें यहाँ नहीं पाकर घबराएगा तो बड़ा मजा आएगा!!

शिक्षक गंभीरता से बोले, किसी गरीब के साथ इस तरह का भद्दा मजाक करना ठीक नहीं है क्यों ना हम इन जूतों में कुछ सिक्के डाल दें और छिप कर देखें की इसका मजदूर पर क्या प्रभाव पड़ता है!!

शिष्य ने ऐसा ही किया और दोनों पास की झाड़ियों में छुप गए।

मजदूर जल्द ही अपना काम ख़त्म कर जूतों की जगह पर आ गया उसने जैसे ही एक पैर जूते में डाले उसे किसी कठोर चीज का आभास हुआ, उसने जल्दी से जूते हाथ में लिए और देखा की अन्दर कुछ सिक्के पड़े थे, उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और वो सिक्के हाथ में लेकर बड़े गौर से उन्हें पलट -पलट कर देखने लगा फिर उसने इधर -उधर देखने लगा, दूर -दूर तक कोई नज़र नहीं आया तो उसने सिक्के अपनी जेब में डाल लिए अब उसने दूसरा जूता उठाया, उसमे भी सिक्के पड़े थे …मजदूर भावविभोर हो गया, उसकी आँखों में आंसू आ गए, उसने हाथ जोड़ ऊपर देखते हुए कहा – हे भगवान्, समय पर प्राप्त इस सहायता के लिए उस अनजान सहायक का लाख -लाख धन्यवाद, उसकी सहायता और दयालुता के कारण आज मेरी बीमार पत्नी को दावा और भूखें बच्चों को रोटी मिल सकेगी।

मजदूर की बातें सुन शिष्य की आँखें भर आयीं शिक्षक ने शिष्य से कहा –  क्या तुम्हारी मजाक वाली बात की अपेक्षा जूते में सिक्का डालने से तुम्हे कम ख़ुशी मिली?

शिष्य बोला, आपने आज मुझे जो पाठ पढाया है, उसे मैं जीवन भर नहीं भूलूंगा आज मैं उन शब्दों का मतलब समझ गया हूँ जिन्हें मैं पहले कभी नहीं समझ पाया था कि लेने की अपेक्षा देना कहीं अधिक आनंददायी है देने का आनंद असीम है देना देवत्त है।

👉 आज का सद्चिंतन Today's Thought 29 June 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 29 June 2019



👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 18)

👉 कर्मफल के सिद्धान्त को समझना भी अनिवार्य
इस सम्बन्ध में एक बड़ी मार्मिक घटना है। महाराष्ट्र का कोई व्यक्ति उनसे मिलने आया। उसकी आयु यही कोई ३०- ३५ वर्ष रही होगी। पर जिन्दगी की मार ने उसे असमय बूढ़ा कर दिया था। रुखे- उलझे सफेद बाल, हल्की पीली सी धंसी आँखें। चेहरे पर विषाद की घनी छाया। दुबली- पतली कद- काठी, सांवला रंग- रूप। बड़ी आशा और उम्मीद लेकर वह गुरुदेव के पास आया था। आते ही उसने प्रणाम करते हुए अपना नाम बताया उदयवीर घोरपड़े। साथ ही यह कहा कि वह महाराष्ट्र के जलगांव के पास के किसी गांव का रहने वाला है। इतना सा परिचय देने के बाद वह फफक- फफक कर रो पड़ा। और रोते हुए उसने अपनी विपद् कथा कह सुनायी।

सचमुच ही उसकी कहानी करुणा से भरी थी। लम्बी बीमारी से पत्नी की मृत्यु, डकैती में घर की सारी सम्पत्ति का लुट जाना और साथ ही सभी स्वजनों की नृशंस हत्या। वह स्वयं तो इसलिए बच गया क्योंकि कहीं काम से बाहर गया था। अब निर्धनता और प्रियजनों के विछोह ने उसे अर्ध विक्षिप्त बना दिया था। जीवन उसके लिए अर्थहीन था और मौत ने उसे अस्वीकार कर दिया था। अपनी कहानी सुनाते हुए उसने एक रट लगा रखी थी कि गुरुजी! मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ। मैंने तो किसी का भी कुछ नहीं बिगाड़ा था। भगवान ऐसा अन्यायी क्यों है? पूज्य गुरुदेव ने बड़े प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- बेटा! अभी तेरा मन ठीक नहीं है। मैं तुझे कुछ बताऊँगा भी तो तुझे समझ नहीं आएगा। 

अभी तो मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ। यह कहानी उस समय जन्मी जब भगवान श्रीकृष्ण पाण्डवों के दूत बनकर कौरव सभा में गए थे। और वहाँ उन्होंने उद्दण्ड दुर्योधन को डपटते हुए अपना विराट् रूप दिखाया। इस दिव्य रूप को भीष्म, विदुर जैसे भक्तों ने देखा। ऐसे में धृतराष्ट्र ने भी कुछ समय के लिए आँखों का वरदान माँगा, ताकि वह भी भगवान् की दिव्य छवि निहार सके। कृपालु प्रभु ने धृतराष्ट्र की प्रार्थना स्वीकार की। तभी धृतराष्ट्र ने कहा- भगवन् आप कर्मफल सिद्धान्त को जीवन की अनिवार्य सच्चाई मानते हैं। सर्वेश्वर मैं यह जानना चाहता हूँ, किन कर्मों के परिणाम स्वरूप मैं अन्धा हूँ।

भगवान ने धृतराष्ट्र की बात सुनकर कहा, धृतराष्ट्र इस सच्चाई को जानने के लिए मुझे तुम्हारे पिछले जन्मों को देखना पड़ेगा। भगवान के इन वचनों को सुनकर धृतराष्ट्र विगलित स्वर में बोले- कृपा करें प्रभु, आपके लिए भला क्या असम्भव है। कुरु सम्राट के इस कथन के साथ भगवान योगस्थ हो गए। और कहने लगे- धृतराष्ट्र मैं देख रहा हूँ कि पिछले तीन जन्मों में तुमने ऐसा कोई पाप नहीं किया है, जिसकी वजह से तुम्हें अन्धा होना पड़े? श्रीकृष्ण के इस कथन को सुनकर धृतराष्ट्र बोले- तब तो कर्मफल विधान मिथ्या सिद्ध हुआ प्रभु! नहीं धृतराष्ट्र अभी इतना शीघ्र किसी निष्कर्ष पर न पहुँचो और भगवान् धृतराष्ट्र के विगत जन्मों का हाल बताने लगे। एक- एक करके पैंतीस जन्म बीत गए।

सुनने वाले चकित थे। धृतराष्ट्र का समाधान नहीं हो पा रहा था। तभी प्रभु बोले- धृतराष्ट्र मैं इस समय तुम्हारे १०८ वें जन्म को देख रहा हूँ। मैं देख रहा हूँ- एक युवक खेल- खेल में पेड़ पर लगे चिड़ियों के घोंसले उठा रहा है। और देखते- देखते उसने चिड़ियों के सभी बच्चों की आँखें फोड़ दीं। ध्यान से सुनो धृतराष्ट्र, यह युवक और कोई नहीं तुम ही हो। विगत जन्मों में तुम्हारे पुण्य कर्मों की अधिकता के कारण यह पाप उदय न हो सका। इस बार पुण्य क्षीण होने के कारण इस अशुभ कर्म का उदय हुआ है।

इस कथा को सुनाते हुए परम पूज्य गुरुदेव ने उस युवक के माथे पर भौहों के बीच हल्का सा दबाव दिया। और वह निस्पन्द होकर किसी अदृश्य लोक में प्रविष्ट हो गया। कुछ मिनटों में उसने पता नहीं क्या देख लिया। जब वापस उसकी चेतना लौटी तो वह शान्त था। गुरुदेव उससे बोले- समझ गए न बेटा। वह बोला- हाँ गुरुजी मेरे ही कर्म हैं। यह सब मेरे ही दुष्कर्मों का फल है। कोई बात नहीं बेटा, जब जागो तभी सबेरा। अब से तुम अपने जीवन को संवारों। मैं तुम्हारा साथ दूँगा। क्या करना होगा, उस युवक ने पूछा। चित्त के संस्कारों को जानो और इनका परिष्कार करो। गुरुदेव के इस कथन ने उसके जीवन में नयी राह खोल दी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति

👉 इस आपत्ति−काल में हम थोड़ा साहस तो करें ही! (भाग 2)

वर्तमान साधु−ब्राह्मणों का दरवाजा खटखटाते हमें एक युग बीत गया। उन्हें नीच−ऊँच समझाने में जितना श्रम किया और समय लगाया, उसे सर्वथा व्यर्थ चला गया ही समझना चाहिए। निराश होकर ही हमें इस नतीजे पर पहुंचना पड़ा है कि सड़ी वस्तु को पुनः स्वस्थ स्थिति में नहीं लाया जा सकेगा। हमें नई पौध लगाने और नई हरियाली उगाने के लिए अभिनव प्रयत्न करने होंगे। उसी का आरम्भ कर भी रहे हैं।

विश्वास किया जाना चाहिए कि आदर्शवादिता अभी पूरी तरह अपंग नहीं हो गई हैं। महामानव स्तर की भावनायें सर्वथा को विलिप्त नहीं हो गई हैं। लोभ और मोह ने मनुष्य को जकड़ा तो जरूर है, पर वह ग्रहण पूरा खग्रास नहीं है। सूर्य का एक ऐसा कोना अभी भी खाली है और उतने से भी काम चलाऊ प्रकाश किरणें विस्तृत होती रह सकती है। ऋषि−रक्त की प्रखरता उसकी सन्तानों की नसों में एक बूँद भी शेष रही हो—ऐसी बात नहीं है। दम्भ का कलेवर आकाश छू रहा है—सो ठीक है,पर सत्य न अभी भी मरण स्वीकार नहीं किया है। अपराधी में हर व्यक्ति अन्धा हो रहा हैं पर ऐसा नहीं समझना चाहिए कि परमार्थ की परम्परा का अस्तित्व ही समाप्त हो गया।

देश,धर्म, समाज और संस्कृति की बात सोचने के लिए किसी के भी मस्तिष्क में गुंजाइश नहीं रहीं ही, अभी ऐसा अन्धकार नहीं छाया है। अब किसी के भी मन में दूसरों के लिए दर्द ने रह गया हों, दूसरों के सुख में अपना सुख देखने वाले हृदय सर्वथा उजड़−उखड़ गये हों, ऐसी बात नहीं है। धर्म के बीच नष्ट तो कभी भी नहीं हुए हैं। आत्म−सत्ता की वरिष्ठता का आत्यन्तिक मरण हो गया हो— ऐसी स्थिति अभी नहीं आई है। मनुष्य ने पाप और पतन के हाथों अपने को बेच दिया हो और देवत्व से उसका कोई वास्ता न रह गया हो— ऐसा नहीं सोचना चाहिए। मानवी महानता अभी कहीं न कहीं, किसी न किसी अंश में जीवित जरूर मिल जायगी। हम उसी को ढूंढ़ेंगे। जहाँ थोड़ी−सी साँस मिलेगी,यहाँ आशा के चीवर ढुलाऐंगे और कहेंगे—पशुता से ऊँचे उठकर देवत्व की परिधि में प्रवेश करने का प्रयत्न करो।

मरणोन्मुख मनुष्यता तुम्हारी बाट जोहती है। चलो,उसे निराश न करों। हमें आशा है कि कहीं न कहीं से ऐसी आत्मा ढूंढ़ ही निकाली जा सकेगी, जिनमें मानवी महानता जीवित बच रही हो। उन्हें युग की दर्द भरी पुकार सुनने के लिए अनुरोध करेंगे और कहेंगे—मनुष्य जाति को सामूहिक आत्महत्या करने से रोकने का अभी भी समय बाकी है। कुछ तो अभी किया जा सकता है, सो करना चाहिए। अपने को खोकर यदि संस्कृति को जीवित रखा जा सकता है तो इस सौदे को पक्का कर ही लेना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1974 पृष्ठ 22

http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1974/January/v1.22

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 28)

THE RELATIVITY OF VIRTUES AND SINS

On many occasions, I have succeeded in reconciling the differences between bitter adversaries by making them understand the triviality of the root cause, which had made a mountain out of a molehill. Such situations arise because of gap in communication. With mutual understanding, sharing of feelings and objective analysis of each other’s expectations, behaviour and psychological background, ninety percent of estrangements can be amicably resolved. In fact the factors responsible for such estrangements are very minor. We may compare their incidence with the quantity of salt in our food. Salt and pepper themselves are distasteful, but a small quantity of these makes food palatable. Occasional cooling off of warmth in close relationships is required to break the monotony of life. Given mutual trust, we bounce back into the relationship with deeper understanding and warmth. It has already been discussed that on human birth, the soul brings with it many imperfections and traits of its past lives including its embodiments in sub-human species.

The newly born human child is very little qualified to live amongst human beings. It falls asleep anytime during the day, keeps awake during nights, soils the clothes and makes loud hues and cries for its biological needs of fondling, food and water. Nevertheless, neither these babytantrums disturb the household, nor does addition of one more member make the house unlivable. On the contrary, the innocent and immature child becomes a means of entertainment for the family. The morally less evolved persons of the society should be treated in the same way.

For evolutionary soul growth, it is the duty of each enlightened soul to work for the progress of other persons, who are at lower stages of soul-growth and encourage them, to work for their own upliftment. Wickedness will always be there in this world. There is no reason to be afraid of it. Whosoever is desirous of self-enlightenment should learn to face and overcome the disturbances caused by the wicked. It is necessary to restrain the evil and prevent the beastly traits from polluting humane values. Flies have to be kept away from sweets. The efficiency of one’s karmas is demonstrated in preventing spread of sinful traits in the society. A great deal of caution is required in this endeavour. It is like walking on the razor’s edge. This truly is yog-the skill in works- equanimity in the face of all provocations.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 49

👉 आत्मचिंतन के क्षण Moments of self-expression 29 June 2019

■ अपने भाग्य को स्वयं बन जाने की राह देखना भूल ही नहीं, मूर्खता भी है। यह संसार इतना व्यस्त है कि लोगों को अपनी परवाह से ही फुरसत नहीं। यदि कोई थोड़ा सा सहारा देकर आगे बढ़ा भी दे और उतनी  योग्यता न हो तो फिर पश्चाताप, अपमान और अवनति का ही मुख देखना पड़ता है। स्वयं ही मौलिक सूझबूझ और परिश्रम से बनाये हुए भाग्य में इस तरह की कोई आशंका नहीं रहती, क्योंकि वैसी स्थिति में अयोग्य सिद्ध होने का कोई कारण नहीं होता।

◇ विश्वास बड़ा मूल्यवान् भाव है। जिस विषय में समझ-बूझकर विश्वास बना लिया जाय, उसका दृढ़तापूर्वक निर्वाह भी किया जाना चाहिए। आज विश्वास बनाया और कल तोड़ दिया, विश्वास का यह सस्तापन न तो योग्य है और न ही वांछनीय।

★ जिस प्रकार कमाना, खाना, सोना, नहाना जीवन के आवश्यक नित्य कर्म होते हैं, उसी प्रकार परमार्थ भी मानव जीवन का एक अत्यन्त आवश्यक धर्म कर्त्तव्य है। इसकी उपेक्षा करते रहने से आध्यात्मिक पूँजी घटती है, आत्मबल नष्ट होता है और अंतःभूमिका दिन-दिन निम्न स्तर की बनती चली जाती है। यही तो पतन है।

□ सत्कर्मों की पुण्य प्रवृत्ति कभी-कभी ही पैदा होती है। ऐसा उत्साह भगवान् की प्रेरणा और पूर्व संचित शुभ कर्मों का उदय होने पर ही जाग्रत् होता है, अन्यथा मनुष्य स्वार्थ और पाप की बातें सोचने में ही दिन गुजारता रहता है। इसलिए परमार्थ की पुण्य प्रवृत्तियाँ जब कभी उत्पन्न हों, तब कार्यान्वित करने के लिए साहस का प्रयोग ही कर डालना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Moments of self-expression 29 June 2019

◇ A wandering monk once visited the city of Mithila, ruled by the Sage King Janaka. “Who is the best teacher around here?” He asked We have to create strength where it does not exist; we have to change our natures, and become new men with new hearts, to be born again… We need a nucleus of men in whom the Shakti is developed to its uttermost extent, in whom it fills every corner of the personality and overflows to fertilize the earth. These, having the fire of Bhawani in their hearts and brains, will go forth and carry the flame to every nook and cranny of our land.
Sri Aurobindo

★ A student asked his teacher: "Who are the two angels who nurture life?" "Heart and tongue", was the reply. The next question was: “Who are the two demons who destroy life?" "Heart and tongue", was the reply again. The cruelty or tenderness of heart and tongue makes a person mean or great respectively.

■ It is already becoming clearer that a chapter which has a western beginning will have to have an Indian ending if it is not to end in the self-destruction of human race…. At this supremely dangerous moment in history, the only way of salvation for mankind is the Indian way.
Arnold Toynbee

□ By simplifying our lives, we rediscover our child-like stalk of innocents that reconnects us with the central resin of our innate humanity that knows truth and goodness. To see the world through a lens of youthful rapture is to see life for what it can be and to see for ourselves what we wish to become. In this beam of newly discovered ecstasy for life, we realize the splendor of love, life, and the unbounded beauty of the natural world.
Kilroy J. Oldste

शुक्रवार, 28 जून 2019

👉 10% का हक

एक बहुत अमीर आदमी ने रोड के किनारे एक भिखारी से पूछा.. "तुम भीख क्यूँ मांग रहे हो जबकि तुम तन्दुरुस्त  हो...??"

भिखारी ने जवाब दिया... "मेरे पास महीनों से कोई काम नहीं है...
अगर आप मुझे कोई नौकरी दें तो मैं अभी  से भीख मांगना छोड़ दूँ"

अमीर मुस्कुराया और कहा.. "मैं तुम्हें कोई नौकरी तो नहीं दे सकता ..
लेकिन मेरे पास इससे भी अच्छा कुछ है...
क्यूँ नहीं तुम मेरे बिज़नस पार्टनर बन जाओ..."

भिखारी को उसके कहे पर यकीन नहीं हुआ...
"ये आप क्या कह रहे हैं क्या ऐसा मुमकिन है...?"

"हाँ मेरे पास एक चावल का प्लांट है.. तुम चावल बाज़ार में सप्लाई करो और जो भी मुनाफ़ा होगा उसे हम महीने के अंत में आपस में बाँट लेंगे.."

भिखारी के आँखों से ख़ुशी के आंसू निकल पड़े...
" आप मेरे लिए जन्नत के फ़रिश्ते बन कर आये हैं मैं किस कदर आपका शुक्रिया अदा करूँ.."

फिर अचानक वो चुप हुआ और कहा.. "हम मुनाफे को कैसे बांटेंगे..?
क्या मैं 20% और आप 80% लेंगे ..या मैं 10% और आप 90% लेंगे..
जो भी हो ...मैं तैयार हूँ और बहुत खुश हूँ..."

अमीर आदमी ने बड़े प्यार से उसके सर पर हाथ रखा ..
"मुझे मुनाफे का केवल 10% चाहिए बाकी 90% तुम्हारा ..ताकि तुम तरक्की कर सको.."

भिखारी अपने घुटने के बल गिर पड़ा.. और रोते हुए बोला...
"आप जैसा कहेंगे मैं वैसा ही करूंगा... मैं आपका बहुत शुक्रगुजार हूँ ...।

और अगले दिन से भिखारी ने काम शुरू कर दिया ..उम्दा चावल और बाज़ार से सस्ते... और दिन रात की मेहनत से..बहुत जल्द ही उसकी बिक्री काफी बढ़ गई... रोज ब रोज तरक्की होने लगी....

और फिर वो दिन भी आया जब मुनाफा बांटना था.

और वो 10% भी अब उसे बहुत ज्यादा लग रहा  था... उतना उस भिखारी ने कभी सोचा भी नहीं था... अचानक एक शैतानी ख्याल उसके दिमाग में आया...

"दिन रात मेहनत मैंने की है...और उस अमीर आदमी ने कोई भी काम नहीं किया.. सिवाय मुझे अवसर देने की..मैं उसे ये 10% क्यूँ दूँ ...वो इसका
हकदार बिलकुल भी नहीं है..।

और फिर वो अमीर आदमी अपने नियत समय पर मुनाफे में अपना हिस्सा 10% वसूलने आया और भिखारी ने जवाब दिया
" अभी कुछ हिसाब बाक़ी है, मुझे यहाँ नुकसान हुआ है, लोगों से कर्ज की अदायगी बाक़ी है, ऐसे शक्लें बनाकर उस अमीर आदमी को हिस्सा देने को टालने लगा."

अमीर आदमी ने कहा के "मुझे पता है तुम्हे कितना मुनाफा हुआ है फिर कयुं तुम मेरा हिस्सा देनेसे टाल रहे हो ?"

उस भिखारी ने तुरंत जवाब दिया "तुम इस मुनाफे के हकदार नहीं हो ..क्योंकि सारी मेहनत मैंने की है..."

अब सोचिये...
अगर वो अमीर हम होते और भिखारी से ऐसा जवाब सुनते ..
तो ...हम क्या करते ?

ठीक इसी तरह.........
भगवान  ने हमें जिंदगी दी..हाथ- पैर..आँख-कान.. दिमाग दिया..
समझबूझ  दी...बोलने को जुबान दी...जज्बात दिए..."

हमें याद रखना चाहिए कि दिन के 24 घंटों में  10% भगवान का हक है....
हमें इसे राज़ी ख़ुशी भगवान के नाम सिमरन में अदा करना चाहिए.
अपनी Income से 10%  निकाल कर अछे कामो मे लगाना चाहिए और... भगवान का शुक्रिया अदा करना चाहिए जिसने हमें  जिंदगी दी सुख दिए ....

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 June 2019


👉 आज का सद्चिंतन 28 June 2019


👉 इस आपत्ति−काल में हम थोड़ा साहस तो करें ही! (भाग 1)

क्रिया या कलेवर एक जैसे होने पर भी व्यक्तियों की वास्तविकता एक जैसी नहीं हो सकती। किसी ऐतिहासिक व्यक्ति की फिल्म बनाने वाले सुरत का आदमी ढूँढ़ निकालते हैं और उससे ऐक्टिंग भी वैसा ही करा लेते हैं। इतने पर भी वह नर वैसा नहीं हो सकता, जैसा कि वह मृत व्यक्ति था। सूर, कबीर, मीरा, तुलसी, चैतन्य,विवेकानन्द, ज्ञानेश्वर आदि पर फिल्में बन चुकी हैं। जिनने पाठ किये है, वे देखने वाले को असली या नकली के भ्रम में डाल देते हैं। ’बहुरूपिये’ कई−कई तरह के वेष बदल कर दर्शकों को चक्कर में डाल देते हैं और अपनी कला का पुरस्कार पाते है। इतने पर भी वे उस असली के स्थान पर नहीं पहुँच सकते, जिसकी कि नकल बनाई गई थी।

आज साधु−ब्राह्मणों की नकल बनाने वाले बहुरूपियों की—ऐक्टरों की भरमार है। जटा, कमण्डल, धूनी, चिमटा, दाढ़ी, कोपीन सब ऐसी मानों महर्षि वेदव्यास अभी सीधे ही हिमालय से चले आ रहे हैं। ब्राह्मणों के तिलक−छाप, पगड़ी,दुपट्टा,कथा,मंत्रोच्चार ठीक वैसा ही गुरु−वशिष्ठ का आगमन अभी−अभी हो रहा है। बाहरी दृष्टि से सब कुछ ऐसा बन जाता है कि ‘टू कापी’ कहने में किसी को झिझकना पड़े। किन्तु आचार और विचार में जमीन−आसमान जितना अन्तर होने से उस नकल से कुछ प्रयोजन साधता नहीं—कुछ बात बनती नहीं।

अवाँछनीय लाभ उठाते रहने वाले वर्गों को कष्टसाध्य आदर्शवादी मार्ग पर चलने के लिए तैयार करना प्रायः असम्भव हो जाता है। राजा लोग समय रहते बदल सकते थे। ऐसा करके वे अपना प्रभाव और वर्चस्व भी बनाये रह सकते थे, जनता का हित कर सकते थे और दुर्गति से बच सकते थे, पर उनसे वैसा साहस करते बन नहीं पड़ा। जमींदार,रईस, सामन्त मिटते गये,पर बदले नहीं। जिन्हें मुफ्त में प्रचूर धन वैभव मिल रहा है। बिना तप, त्याग के पूजा−सम्मान पा रहे हैं, उनकी आत्मा इतनी बलिष्ठ न हों सकती कि आदर्शवादी जीवनचर्या अपना सकें, अहंकार को त्याग सकें और कष्टसाध्य सेवा साधना में आने को संलग्न कर सकें। यह इसलिए और भी अधिक कठिन है कि उन्हें आरम्भिक प्रेरणा व्यक्तिवादी स्वार्थपरता की पूर्ति से मिली है। उनका मन, मस्तिष्क इसी लाभ ने आकर्षित किया है। लोक में धन, सम्मान,परलोक में स्वर्ग−मुक्ति का लाभ तनिक −सा वेष बदलने भर से मिल सकता है। यही आकर्षण उन्हें इस राह पर खींच कर लाया है।

दूसरों का शोषण अपनी स्वार्थ −सिद्धि जिन्हें उपयुक्त जंची है, उन्हीं ने इस मार्ग पर छलाँग लगाई है। यदि उन्हें आरम्भ में ही तप, त्याग,संयम,सेवा की बात कही जाती तो कदाचित वे साधु बनने के लिए कदापि तैयार न होते। इस आन्तरिक दुर्बलता का लगातार पोषण ही होता रहा है, समर्थन ही मिलता रहा है। अब वे अपनी मूल मान्यताएँ बदलें तभी उन्हें सेवा−साधना की बात जँच−रुच। यह इतना कठिन है, जिसे लगभग असम्भव भी कहा जा सकता है। जो लोग संसार को माया कहते हैं, सेवा का शूद्रों का कार्य बताते रहे हैं, जिन्हें” तोहि बिरानी क्या पड़ी, तू अपनी निरबेर “ की बात आदि से अन्त तक सुनने को मिलती रही हैं, वे परम गहन सेवा−धर्म स्वीकार करने का, प्रभू समर्पित जीवन जीने का साहस कर सकेंगे,ऐसी आशा नहीं ही की जानी चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1974 पृष्ठ 22

http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1974/January/v1.22

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 17)

👉 कर्मफल के सिद्धान्त को समझना भी अनिवार्य

कर्मसु कौशलम् -- यानि कि कर्मों में कुशलता की सीख जरूरी है। और यह तभी सम्भव है, जब कर्मफल सिद्धान्त को समझा जाय। इसे समझे बिना आध्यात्मिक चिकित्सा सम्भव नहीं। जीवन की आध्यात्मिक दृष्टि कहती है कि उपयुक्त कारण के बिना कोई कार्य हो नहीं सकता। यदि जिन्दगी में कुछ घटित हो रहा है- तो इसके पीछे किन्हीं कारणों का होना आवश्यक है। फिर ये रोग- शोक पैदा करने वाली घटनाएँ हो अथवा हर्ष- उल्लास के उत्प्रेरक घटनाक्रम। जीवन की किसी घटना को संयोग कहकर टालने की कोशिश करना पूरी तरह से अवैज्ञानिक है। सच तो यह है कि प्रकृति के सम्पूर्ण परिदृश्य में कभी भी- कहीं भी संयोग घटित नहीं होते। प्रत्येक घटना उपयुक्त कारणों के गर्भ से जन्म लेती है। प्रत्येक फल बीज के समुचित विकास का परिणाम होता है।

कई बार ऐसा होता है कि हम किसी घटनाक्रम के लिए जिम्मेदार उपयुक्त कारणों को ढूँढने में असफल रहते हैं। और अपनी इस असफलता को संयोगों के मत्थे मढ़कर छुट्टी पा लेते हैं। लेकिन यह प्रक्रिया सिरे से गलत है। इसे गैर जिम्मेदारी के सिवा और कुछ नहीं कहा जा सकता। प्रत्येक वर्तमान का अतीत होता है, और इसका भविष्य भी। अतीत के गर्भ के बिना कोई वर्तमान अपना अस्तित्त्व नहीं पा सकता। इसी तरह वर्तमान के कार्यों की परिणति भविष्य में अपना सुफल अथवा कुफल प्रकट किए बिना नहीं रहेगी। घटना छोटी हो या बड़ी- प्रत्येक के साथ यही नियम विधान काम करता है। इसे अस्वीकारने अथवा झुठलाने की कोशिश अज्ञान जनित मूढ़ता के सिवा और कुछ नहीं।

कर्मफल विधान की यही सच्चाई हमारी अपनी जिन्दगी के साथ जुड़ी हुई है। हमारा यह जीवन- यह मनुष्य जन्म किन्हीं संयोगों के कारण नहीं उपजा या पनपा है। इसके पीछे हमारे ही द्वारा किए गए कुछ सुनिश्चित कर्म हैं। हमारी बचपन की किलकारियाँ, किशोरवय की कुहेलिकाएँ, यौवन का पौरूष, बुढ़ापे की लाचारी के जिम्मेदार हमारे अपने सिवा और कोई नहीं। परमात्मा कभी किसी के प्रति भेद- भाव नहीं करते। उनकी कृपा या कोप के पीछे हमारे अपने ही सत्कर्म या दुष्कर्म जिम्मेदार होते हैं। जिन्दगी में सुख आएँ अथवा दुःख उनके कारण केवल हम होते हैं। हमारी जिन्दगी की छोटी या बड़ी, सुखद अथवा दुःखद परिस्थितियों के लिए हमारे सिवा कोई भी दूसरा जिम्मेदार नहीं।

जो जीवन की, प्रकृति की, कर्मफल के नियम की, परमेश्वर के समर्थ विधान की इस सच्चाई को जानते हैं, उन्हीं को विवेकवान कहा जा सकता है। अपने जीवन की जिम्मेदारी स्वीकारने वाले ऐसे कुशल व्यक्ति ही इसे संवारने का सच्चा प्रयत्न कर पाते हैं। अन्यथा और लोग तो अपने गैर जिम्मेदाराना रवैये के कारण अपनी विपन्नताओं का दोष दूसरों के माथे थोपते रहते हैं। इनकी विषम परिस्थितियों के लिए कभी तो भगवान् जिम्मेदार होता है, तो कभी भाग्य, कभी कोई मित्र तो कभी कोई शत्रु। हां जब कोई सुखद परिस्थितियाँ इनके जीवन में आती हैं, तो इनकी अहंता का पारा यकायक चढ़ जाता है। और इसका श्रेय लेने में ये किसी भी तरह से नहीं चूकते। ऐसे लोगों का जीवन हमेशा ही विडम्बना भरी कहानी बना रहता है।

जिन्हें जिन्दगी की आध्यात्मिक चिकित्सा में रुचि या रस है, उनसे समझदारी की अपेक्षा है। इसके लिए वे पूरी ईमानदारी से अपनी जिन्दगी की जिम्मेदारी को स्वीकारें और बहादुरी से इसे निभाएँ। इस रीति को निभाए बगैर महानतम आध्यात्मिक चिकित्सक भी हमारी कारगर चिकित्सा न कर पाएगा। युगऋषि गुरुदेव का कहना था कि कर्मफल विधान आध्यात्मिक चिकित्सा का सर्वमान्य सिद्धान्त है। इसे समझे और स्वीकारे बिना किसी की कोई भी मदद सम्भव नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 27)

THE RELATIVITY OF VIRTUES AND SINS

Each individual has his own personal perspective of people, places, things and events. On account of the confusion of perspective, one finds the world bad, whereas the other sees only goodness in it. Throw away the cobwebs of your old biased perspectives. Use your third eye of wisdom to see through the illusions of your old world. Let your present wicked world (Kaliyug) destroy itself and in its place create your own Golden Age (Satyug) in your inner psyche. Stop being deluded by the darkness of the world (Tamogun) and focus your vision at the brightness (Satogun). You will find the world changing into heaven.

When you change your field of vision, you will find your disobedient son/ daughter changing into an obedient one. Your worst enemies, quarrelsome wife and hypocritic neighbours will appear totally different. Actually, the factor of negativity in the character or behaviour of a person is usually very small.

Antagonism in the mind of the observer magnifies it manifold. Suppose your husband or wife does not behave as per your expectations because of preoccupation or some other valid reason; when you are not aware of it, you are likely to take it as an affront and become resentful or angry. With the anger, the evil traits lying dormant in the inner recesses of your mind become activated and produce negative mental image of the subject. Darkness makes out a monster out of a bush. Similarly, anger, due to distortion caused by inner turbulence, produces a defiant, disobedient, disrespectful picture of an otherwise simple, innocent person who receives a harsh punishment for a small lapse. On the other hand, this unjust reaction also infuriates the recipient of the undeserved treatment. The counter-reacting angry person too begins to see wickedness, foolishness, cruelty and many other negative traits in the other person. On repetition of such trivial incidents, the two imaginary ghost personalities continue to grow and their confrontations convert two simple – hearted warmly related persons into bitter antagonists.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 48

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

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