शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

👉 ‘उपासना’ की सफलता ‘साधना’ पर निर्भर है। (भाग 3)

🔷 इस चिन्ता से तथाकथित धर्म गुरुओं के रचे भोंडे फूहड़ ग्रन्थ मुक्ति दिला देते हैं। उनका कहना है अमुक माला जपने वाले या अमुक पूजा अर्चा करने वाले को पाप कर्मों के दण्ड भुगतने से छुटकारा मिल जाता है। यह बहुत बड़ी बात है। यदि दण्ड का भय न रहे तो फिर पाप कर्मों द्वारा प्राप्त हो सकने वाले लाभों को छोड़ने को कोई कारण ही नहीं रह जाता। इस प्रकार उपरोक्त आश्वासनों पर विश्वास करने वाले यह मान बैठते हैं कि उनके पाप कट गये। अब वे कुकर्मों के दण्ड से पूर्णतया छुटकारा पा चुके। भूतकाल में किये हुये या भविष्य में किये जाने वाले पापों के दण्ड से वह देवता या मन्त्र बचा लेगा कि जिसे थोड़ा-सा जप, स्तवन, पूजन आदि करके या किसी दूसरे से कराके सहज ही बहकाया, फुसलाया और अनुकूल बनाया जा सकता है।

🔶 इस मिथ्या मान्यता का आज बहुत प्रचलन है। हर कोई इसी सस्ते नुस्खे को दुहराता है। मतवादी यही ढोल पीटते हैं कि हमारे सम्प्रदाय में भर्ती हो जाने पर हमारा खुदा सारे गुनाह माफ कर देगा। इस बहकावे में आये बाहर से बताते हुए ‘कर्मकाण्ड’ करते रहते हैं और भीतर से पाप कर्मों में निर्भय होकर प्रवृत्त रहते हैं। धर्म के नाम पर प्रस्तुत की गई मिथ्या मान्यताओं ने आज सर्वत्र यही स्थिति उत्पन्न कर दी है और सच्चा विश्लेषण करने पर पूजा-पाठ न करने वालों की अपेक्षा उस प्रक्रिया में निरत लोग अधिक अनैतिक और अवाँछनीय गतिविधियों में प्रवृत्त पाये जाते हैं। ऐसी स्थिति में आत्मिक प्रगति सर्वथा असम्भव है। जब साधना का प्रथम चरण ही पूरा नहीं किया गया तो उपासना का दूसरा चरण कैसे उठेगा। जब पहली मंजिल ही बन कर तैयार नहीं हुई तो भवन की दूसरी मंजिल बनाने की योजना कैसे पूर्ण होगी।

🔷 उपासना से पाप नष्ट होने का वास्तविक अर्थ यह है कि ऐसा व्यक्ति जीवन साधना के प्रथम चरण का परिपालन करते हुए दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों के दुष्परिणाम समझेगा और उनसे सतर्कता पूर्वक विरत हो जायेगा, पाप नष्ट होने का अर्थ है पाप-कर्म करने की प्रवृत्ति का नाश, पर उल्टा अर्थ कर दिया गया पाप-कर्मों के प्रतिफल का नाश। कदाचित ऐसी उलटबांसी सही होती तो फिर इस संसार में पाप को ही पुण्य और कर्तव्य माना जाने लगता। फिर कोई भी पाप से न डरता। राजदण्ड से बचने की हजार तरकीबें हैं। उन्हें अपना कर अनाचारी लोग सहज ही निर्द्वन्द्व निश्चिन्त रह सकते हैं दैव दण्ड ही एक मात्र बंधन था सो इन धर्मध्वजियों ने उड़ा दिया। अब असुरता को स्वच्छंद रूप से फलने-फूलने और फैलने का पूरा-पूरा अवसर मिल गया। पाप कर्मों के दण्ड से मुक्ति दिलाने का आश्वासन पूजा-पाठ की कीमत पर जिनने भी दिया है उनने मानवीय आदर्शों और अध्यात्म के मूलभूत आधारों के साथ व्यभिचार किया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1972 पृष्ठ 8

👉 "अपनापन"

🔶 "पापा मैंने आपके लिए हलवा बनाया है" 11साल की बेटी अपने पिता से बोली जो कि अभी office से घर मे घुसा ही था, पिता "वाह क्या बात है ,ला कर खिलाओ फिर पापा को,"

🔷 बेटी दौड़ती रसोई मे गई और बडा कटोरा भरकर हलवा लेकर आई .. पिता ने खाना शुरू किया और बेटी को देखा .. पिता की आँखों मे आँसू थे...

🔶 क्या हुआ पापा हलवा अच्छा नही लगा पिता- नही मेरी बेटी बहुत अच्छा बना है, और देखते देखते पूरा कटोरा खाली कर दिया; इतने मे माँ बाथरूम से नहाकर बाहर आई,
और बोली- "ला मुझे भी खिला तेरा हलवा"

🔷 पिता ने बेटी को 50 रु इनाम मे दिए , बेटी खुशी से मम्मी के लिए रसोई से हलवा लेकर आई मगर ये क्या जैसे ही उसने हलवा की पहली चम्मच मुंह मे डाली तो तुरंत थूक दिया और बोली- "ये क्या बनाया है, ये कोई हलवा है, इसमें तो चीनी नही नमक भरा है , और आप इसे कैसे खा गये ये तो जहर हैं , मेरे बनाये खाने मे तो कभी नमक मिर्च कम है तेज है कहते रहते हो ओर बेटी को बजाय कुछ कहने के इनाम देते हो...."

🔶 पिता-(हंसते हुए)- "पगली तेरा मेरा तो जीवन भर का साथ है, रिश्ता है पति पत्नी का जिसमें नौकझौक रूठना मनाना सब चलता है; मगर ये तो बेटी है कल चली जाएगी, मगर आज इसे वो एहसास वो अपनापन महसूस हुआ जो मुझे इसके जन्म के समय हुआ था। आज इसने बडे प्यार से पहली बार मेरे लिए कुछ बनाया है, फिर वो जैसा भी हो मेरे लिए सबसे बेहतर और सबसे स्वादिष्ट है; ये बेटियां अपने पापा की परियां , और राजकुमारी होती है जैसे तुम अपने पापा की हो..."

🔷 वो रोते हुए पति के सीने से लग गई।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 11 Feb 2018


👉 स्वाध्याय- एक योग

🔷 जीवन को सफल, उच्च एवं पवित्र बनाने के लिए स्वाध्याय की बड़ी  आवश्यकता है। किसी भी ऐसे व्यक्ति का जीवन क्यों न देख लिया जाये, जिसने उच्चता के सोपानों पर चरण रखा है। उसके जीवन में स्वाध्याय को विशेष स्थान मिला होगा। स्वाध्याय के अभाव में कोई भी व्यक्ति ज्ञानवान नहीं बन सकता। प्रतिदिन नियमपूर्वक सद्ïग्रन्थों का अध्ययन करते रहने से बुद्धि तीव्र होती है, विवेक बढ़ता है और अन्त:करण की शुद्धि होती है। इसका स्वस्थ एवं व्यावहारिक कारण है कि सद्ïग्रन्थों के अध्ययन करते समय मन उसमें रमा रहता है और ग्रन्थ के सद्ïवाक्य उस पर संस्कार डालते रहते हैं।
  
🔶 स्वाध्याय द्वारा अन्त:करण के निर्मल हो जाने पर मनुष्य के बाह्यï अन्तर पट खुल जाते हैं, जिससे वह आत्मा द्वारा परमात्मा को पहचानने के लिए जिज्ञासु हो उठता है। मनुष्य की यह जिज्ञासा भी स्वाध्याय के निरन्तर बढ़ती एवं बलवती होती रहती है और कर भी लेता है। परमात्मा के साक्षात्कार का उपाय भी स्वाध्याय से ही पता चल सकता है।
  
🔷 स्वाध्यायशील व्यकित का जीवन अपेक्षाकृत अधिक पवित्र हो जाता है। ग्रन्थों में सन्निहित सद्ïवाणी तो अपना प्रभाव एवं संस्कार डालती ही है, साथ ही अध्ययन में रुचि होने से व्यक्ति अपना शेष समय पढऩे में ही लगाता है। वह या तो अपने कमरे में बैठा हुआ एकांत अध्ययन करता है अथवा किसी पुस्तकालय अथवा वाचनालय में पुस्तकों के बीच रहता है। उसके पास फालतू समय नहीं रहता जिसमें जाकर इधर-उधर बैठे अथवा घूमें और फिर वायु मण्डल अथवा संगति से अवांछित संस्कार ग्रहण करें। जब मनुष्य निरर्थकों की संगति में न जाकर जीवनोपयोगी सद्ïसाहित्य के अध्ययन में ही संलग्न रहेगा तो उसका आचार शुद्ध हो जायेगा।
  
🔶 अध्ययनशील व्यक्ति स्वयं तो बेकार रहकर कहीं नहीं जाता, उसके पास बेकार के निठल्ले व्यक्ति भी नहीं आते और वे यदि कभी आ भी जाते हैं तो अध्ययनशील व्यक्ति के आस-पास का व्यस्त वायुमण्डल उनके अनुकूल नहीं होता और वे शीघ्र उसका अधिक समय खराब किये बिना खिसक जाते हैं। इस प्रकार फिजुल के व्यक्तियों के संग से उत्पन्न होने वाली विकृतियों से अध्ययनशील व्यक्ति सहज ही बच जाता है जिससे उसके आचार-विचार पर कुसंस्कार नहीं पडऩे पाते।
  
🔷 निरन्तर अध्ययन करते रहने से मनुष्य का ज्ञान जाग्रत रहता है जिसका उद्रेक उसकी वाणी द्वारा हुए बिना नहीं रहता। अस्तु अध्ययनशील व्यक्ति की वाणी सफल, सार्थक तथा प्रभावोत्पादक बन जाती है। वह जिस सभा समाज में जाता है, उसकी ज्ञान-मुखर वाणी उसे विशेष स्थान दिलाती है। अध्ययनशील व्यक्ति का ही कथन प्रामाणिक तथा तथ्यपूर्ण माना जा सकता है। स्वाध्याय सामाजिक प्रतिष्ठïा का संवाहक होता है।
  
🔶 संसार के इतिहास में ऐसे असंख्य व्यक्ति भरे हैं जिनको जीवन में विद्यालय के दर्शन न हो सके किन्तु स्वाध्याय के बल पर वे विश्व के विशेष विद्वान व्यक्ति बने हैं। साथ ही ऐसे व्यक्तियों की भी कमी नहीं है जिनकी जिन्दगी का अच्छा खासा भाग विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में बीता किन्तु उसके बाद स्वाध्याय में प्रमाद करने के कारण उनकी एकत्रित योग्यता भी उन्हें छोडक़र चली गयी और वे अपनी तपस्या का न तो कोई लाभ उठा पाये और न सुख योग्यता को बनाये रखने और बढ़ाने के लिए स्वाध्याय नितान्त आवश्यक है।
  
🔷 स्वाध्याय को मानसिक योग भी कहा गया है। जिस प्रकार प्रभु का नाम जपता हुआ योगी उस परमात्मा के प्रकाश रूप में तल्लीन हो जाता है उसी प्रकार एकाग्र होकर सद्ïविचारों के अध्ययन में तल्लीन हो जाने वाला अध्येता अक्षर ब्रह्मï की सिद्धि से ज्ञान रूप प्रकाश का अधिकारी बनता है।  

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 ध्यानयोग की सफलता शान्त मनःस्थिति पर निर्भर है (भाग 4)

🔷 जटिल संरचना वाले कोमल तारों एवं पुर्जा से बने यन्त्रों का उपयोग बहुत साज सँभाल के साथ किया जाता है। उन्हें झटके धक्के लगते रहे तो कुछ ही समय में गड़-बड़ी उत्पन्न हो जाती है। ट्रांजिस्टर, रेडियो, टेप रिकार्डर घड़ी आदि संवेदनशील यन्त्र भारी उठक-पटक बर्दाश्त नहीं कर सकते उन्हें ठीक रखना हो तो सावधानी के साथ उठाने, रखने बरतने का क्रम चलाना चाहिए। यही बात शरीर और मस्तिष्क के बारे में है, यदि उन्हें स्वस्थ स्थिति में रखना हो तो तनावों और आवेशों से उनकी समस्वरता को नष्ट होने से बचाना ही चाहिए।

🔶 शरीर को मृत समान निर्जीव करने- काया से प्राण को अलग मानने- अर्धनिद्रित स्थिति में माँस पेशियों को ढीला करके आराम कुर्सी जैसे किसी सुविधा-साधन के सहारे पड़े रहने को शिथिलीकरण मुद्रा कहते हैं। ध्यान-योग के लिए सही यही सर्वोत्तम आसन है। शरीर को इस प्रकार ढीला करने के अतिरिक्त मना को भी खाली करने की आवश्यकता पड़ता है। ऊपर नील आकाश-नीचे अनन्त नील जल-अन्य कोई पदार्थ, कोई जीव, कोई परिस्थिति कहीं नहीं, ऐसी भावना के साथ यदि अपने को निर्मल निद्रित मन वाले बालक की स्थिति में एकाकी होने की मान्यता मन में जमाई जाय तो मन सहज ही ढीला हो जाता है। इन दो प्रारम्भिक प्रयासों से सफलता मिल सके तो ही समझना चाहिए कि ध्यानयोग में आगे बढ़ने का पथ प्रशस्त हो गया।

🔷 संसारव्यापी शून्य नीलिमा की तरह ध्यानयोग में अपने हृदयाकाश को भी रिक्त करना पड़ता है। कामनायें-वासनायें-ऐषणाएं-आकांक्षाएँ , प्रवृत्तियाँ-भावावेश परक उद्विग्नतायें मन में जितनी उभर उफन रही होगी उतना ही अंतःक्षेत्र अशान्त रहेगा और एकाग्रता का-तन्मयता का-लय स्थिति का आधार अपनाकर हो सकने वाला ध्यान प्रयोजन पूरा न हो सकेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1973 पृष्ठ 50
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/March/v1.50

👉 व्यवहार में औचित्य का समावेश करें (भाग 4)

🔶 मध्यम श्रेणी के लोग अपने मतलब से मतलब रखते हैं। मतलब की कोई बात होती है तो ही उसे सुनते हैं, अन्यथा इस कान से उस कान निकाल देते हैं। ऐसे लोगों से कुछ बात कहते समय उनके मतलब का प्रसंग उठाकर ही कुछ आकर्षण उत्पन्न किया जा सकता है। बात वज्रमूर्ख पर अड़ती है। जो जानते भी नहीं और मानते भी नहीं, उन्हीं के लिए इस शब्द का उपयोग किया जाता है। अनगढ़ व्यक्तित्व के साथ में अहंकारी दुराग्रह मिल जाने पर एक तो करेला, दूसरे नीम चढ़ा होने की उक्ति लागू होती है। ऐसे लोग भय से ही कुछ नरम पड़ते हैं। दाल गलती नहीं दीखती है तो उस कड़ाई के सामने वे ऐंठ दिखाना बन्द कर देते हैं। बन्दर भगाने पर काटने दौड़ता है, पर जब कोई घूँसा तानकर खड़ा हो जाता है और सामना करने के लिए आगे बढ़ता है तो उसका तीसमारखाँपन भागते हुए देखा जाता है।

🔷 ऐसे लोग एकाकी देखकर ही शेर बनते हैं, पर जब उन्हें प्रतीत होता है कि सामने वालों का भी झुण्ड है तो उस शक्ति प्रदर्शन से भी ऐसे लोगों की नानी मरती है। अस्तु, जिनके लिए भी सम्भव हो अपनी स्थिति अकेलेपन की न रखें। ऐसे समूह के साथ जुड़े रहें जो बगलें बजाने जैसे कौतूहल ही न रचता रहे, वरन् जिसमें पराक्रम दिखा सकने जैसा भी दम−खम हो। व्यायामशाला एवं स्वयंसेवक स्तर के संगठन अपने मूल प्रयोजन के साथ-साथ एक काम यह भी करते हैं कि अपने अस्तित्व से लुटेरों के हौसले पस्त करते रहते हैं। स्पष्ट है कि अपराधी स्तर के लोग समूह को नहीं छेड़ते। भेड़िये और बाघ तक पैने सींग वाली गायों के झुण्ड से दूर रहते हैं।

🔶 बन्दरों के समूह को कौन छेड़ता है? बर्र के छत्ते में कौन हाथ डालता है? संगठित रहने के अनेक लाभों में से एक लाभ यह भी है कि उससे उद्दण्डों को आक्रमण करने से पहले हजार बार विचार करना पड़ता है। अकेलापन, भोलापन, पलायन, गिड़गिड़ाना, क्षमा और अहिंसा की दुहाई देना जैसी बातें ऐसी हैं जिन्हें जहाँ भी गुण्डे देखते हैं, वहीं चढ़ दौड़ते हैं। उनका निशाना ऐसे ही लोगों पर सही बैठता है। जो सिर हिलाते और सींग पैनाते हैं, आमतौर से उन्हें सस्ता शिकार बनने का दुर्दिन नहीं देखना पड़ता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How to live our life? (Part 2)

🔶 Karl marks used to tell the labours, ‘‘labours! Unite now for you have nothing to lose other than your poverty.’’ And I say, ‘‘O students on the path of spirituality! You have nothing to lose other than your timidity on this path. Here only one thing is lost and that is timidity of man and narrow-mindedness.’’ If you do not feel much pain in removing timidity and narrow-mindedness, I request you to kindly remove it and proceed on the path of greatness. Enter into a partnership with BHAGWAN. Associate yourself with BHAGWAN and if you succeed in doing it, you will find such partnership running usefully in your life.   
                                 
🔷 GANGA continued to associate itself with HIMALAAYA. GANGA & HIMAALAYA maintained this association & remained in tune and good relations with each other. GANGA continued to spend her water yet it never faced any scarcity of water only because it never alienated from HIMAALAYA. So if we too associate ourselves with HIMAALAYA, enter into relationship with BHAGWAN, we are not going to experience any scarcity, problems in our life as is the case with general masses today. GANGA’s water never dried but drain’s did for the later did not join any great entity. Drain begins to jump with flood water only to later remain without water and dried for nine long months but GANGA has been flowing with water for ages and still so and has never been without water.
                                           
🔶 If we link ourselves with HIMAALAYA, with BHAGWAN, we too will not face any dry situation but it is so only when we dare to do that. We can be of BHAGWAN, can get all the advantages of different dimensions of BHAGWAN provided we could dedicate ourselves to BHAGWAN and only condition being we dedicate ourselves, our wishes and ambitions to BHAGWAN. We should link ourselves with BHAGWAN in the same way as wooden puppet, kite and flute do and not like that we instruct BHAGWAN to do so and so for us and place each day before BHAGWAN a new desire to be fulfilled. It is not any kind of devotion.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (अन्तिम भाग)

🔷 अपनी जिन जिम्मेदारियों की भावना को ले करके जा रहे हैं, उसे ईमानदारी पूर्वक निभाने को आप काफी मान लेना। हमारे लिए यही काफी है और आपकी जीवात्मा के संतोष के लिए भी काफी है और हमारे भगवान के लिए भी काफी है। समाज में क्या सफलता मिली, क्या नहीं मिली, हम उसका लेखा-जोखा आपसे नहीं माँगने वाले हैं। आपके कार्यक्रम में कितने आदमी जाये, कितनी गुरुदक्षिणा मिली, कितना क्या मिला-यह सब जानकारी आप हमको मत भेजना। आप तो बस हमको यह भेजना कि हमारी निष्ठा में कोई कच्चाई तो नहीं आ गयी, कोई कमजोरी तो नहीं आ गयी। आपने अपने परिश्रम और पुरुषार्थ में कोई कमी तो नहीं रहने दी। आपने लोगों के अंदर निष्ठा जमाने में कहाँ तक सफलता पायी, हमारे लिए यही पर्याप्त है।

🔶 मित्रो! वास्तव में हम आपको लोकनिष्ठा जगाने के लिए भेजते हैं। हम आपको लोगों की मनःस्थिति बदलने के लिए भेजते हैं। हम आपको बड़े-बड़े आयोजन व उत्सव सम्पन्न कराने के लिए नहीं भेजते हैं। बड़े उत्सव सम्पन्न कराना होता, तो हमने आपको कष्ट नहीं दिया होता, फिर हम मालदारों की खुशामद करते और कहते कि एक लक्ष कुण्डीय यज्ञ होने वाला है। उसमें एक लाख रुपये लगने वाला है। तुम पाँच हजार रुपये दे दो। अच्छा गुरुजी! मैं दे दूँगा, पर यह बताइये कि मेरे सट्टे में फायदा हो जायेगा कि नहीं? हाँ बेटे, तेरे सट्टे में फायदा हो जायेगा, तू पाँच हजार रुपये निकाल दे और कहीं से इकट्ठा करवा दे। अच्छा गुरुजी! मैं टेलीफोन किए देता हूँ, उसके यहाँ से दो हजार आ जायेगा। दूसरा व्यक्ति भी हमारा मिलने वाला है, उसके यहाँ से भी पाँच हजार आ जायेगा।

🔷 मित्रो! हमें मालदार नहीं, निष्ठावान्, श्रद्धावान् व्यक्ति चाहिए। हम लोगों की निष्ठा जगाते हैं। निष्ठाएँ लोगों की खत्म हो गयी हैं, निष्ठाएँ मर गयी हैं। जो आस्तिकता मर गयी है, आध्यात्मिकता मर गयी, सो गयी है जो धर्म आदमी के भीतर से मर गया है, सो गया है, उसी को जगाने के लिए हम आपको भेजते हैं। मित्रो! आप जलते हुए दीपक की तरह से जाना और दूसरों को दीपक से दीपक की तरह जलाते हुए चले जाना। यही आपसे हमारी उम्मीद है और यही मेरी शुभकामना और यही आपके सहयोग का विश्वास और आश्वासन है। इन्हीं सब चीजों के साथ बड़े प्यार के साथ और बड़ी उम्मीदों के साथ और बड़ी आशाओं के साथ मैं आपको विदा करता हूँ। आपको मैं फिर मिलूँगा। अब आपसे विदा चाहूँगा।

🌹 आज की बात समाप्त।
🌹 ॐ शान्तिः
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 38)

👉 गुरु कृपा ने बनाया महासिद्ध

🔶गुरुगीता में बताया गया यह सत्य किसी भी तरह से बुद्धिगम्य नहीं है। बुद्धिपरायण, तर्कशील लोग इसे समझ नहीं सकते; किन्तु क्यों और कैसे? के प्रश्न कुहाँसे से इसे अनुभव नहीं किया जा सकता। इसे वही जान सकते हैं, समझ सकते हैं और आत्मसात् कर सकते हैं- जो साधना की डगर पर काफी दूर तक चल चुके हैं। ऐसे साधना परायण जनों के लिए ही यह गुरुदेव की महिमा नित्य अनुभव की वस्तु बन जाती है। महान् अघोर संत बाबा कीनाराम के साधना अनुभव से इस बात को बहुत ही स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। सिद्धों के, सन्तों के बीच बाबा कीनाराम का नाम बहुत ही आदर से लिया जाता है। बाबा कीनाराम का ज्यादातर समय काशी में बीता। वह अघोर तंत्र के महान् सिद्ध थे। उनके चमत्कारों, अति प्राकृतिक रहस्यों के बारे में ढेरों किंवदंतियाँ कही-सुनी जाती हैं।
  
🔷 बाबा कीनाराम उत्तरप्रदेश-राज्य के गाजीपुर के रहने वाले थे। उनमें जन्म-जन्मान्तर के साधना संस्कार थे। विवेकसार ग्रन्थ में उनकी जीवनकथा विस्तार से वर्णित है। इसमें लिखा है कि जब वह जूनागढ़ के परम सिद्धपीठ गिरनार गए, तो उन्हें स्वयं भगवान् दत्तात्रेय ने दर्शन दिए और उन्होंने कीनाराम को एक कुबड़ी देते हुए कहा- जहाँ यह कुबड़ी तुमसे कोई ले ले, वहीं तुम स्थायी रूप से रहना तथा उन्हीं को अपना अघोर गुरु बनाना। इसी के साथ भगवान् दत्तात्रेय ने उन्हें गुरुगीता में वर्णित उपर्युक्त महामंत्रों के रहस्य को समझाते हुए उनको गुरु महिमा के बारे में बताया।
  
🔶कीनाराम जब काशी पहुँचे, तो वहाँ हरिश्चन्द्र घाट पर बाबा कालूराम से उनकी भेंट हुई। पहली भेंट में कालूराम ने उनकी तरह-तरह से अनेकों परीक्षाएँ लीं। बड़ी कठिन और रहस्यमयी परीक्षाओं के बाद वह उन्हें अपना शिष्य बनाने के लिए तैयार हो गए। शिष्य बनने के बाद तंत्र साधना का एक परम दुर्लभ एवं अति रहस्यमय अनुष्ठान किया जाना था। इस अनुष्ठान के लिए कई तरह की सामग्री आवश्यक थी। जिन्हें साधना का थोड़ा सा भी ज्ञान है- वे जानते हैं कि तंत्र साधना में उपयोग की जाने वाली सामग्री कितनी दुर्लभ हुआ करती है। प्रश्न था- कहाँ से और कैसे लायी जाय। तंत्र अनुष्ठान की इस शृंखला में अनेक देवों, योगिनियों को संतुष्ट करना था। एक साथ यह सब कैसे हो?
  
🔷 इन प्रश्नों ने बाबा कीनाराम को आकुल कर दिया। शिष्य की चिन्ता से शिष्यवत्सल बाबा कालूराम द्रवित हो उठे। उन्होंने कहा- चिन्ता किस बात की रे! मैं हूँ न, तू मेरी ओर देख, मुझ में देख! उनके इस तरह कहने पर बाबा कीनाराम ने अपने गुरु की ओर देखा। आश्चर्य! परमाश्चर्य!! तंत्र साधना की सभी अधिष्ठात्री देव शक्तियाँ महासिद्ध कालूराम में विद्यमान थीं। सभी तंत्रपीठ उनमें समाहित थे। सद्गुरु चेतना में तंत्र साधना के समस्त तत्त्व दिखाई दे रहे थे। शिष्यवत्सल बाबा कालूराम की यह अद्भुत कृपा देखकर कीनाराम भक्ति विह्वल हो गए और ‘गुरुकृपा ही केवलम्’ कहते हुए उनके चरणों में गिर पड़े। अपने सद्गुरु के पूजन से ही उन्हें तंत्र की समस्त शक्तियाँ, सारी सिद्धियाँ मिल गयीं। गुरु कृपा ने उन्हें अघोरतंत्र का महासिद्ध बना दिया। सद्गुरु पूजन में सबका यजन है। सभी शिष्य साधक इस साधना रहस्य को भलीप्रकार जान लें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 63

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

👉 ‘उपासना’ की सफलता ‘साधना’ पर निर्भर है। (भाग 2)

🔷 रंगरेज कपड़ा रंगने की प्रक्रिया उसकी धुलाई से आरम्भ करता है। यदि मैला कपड़ा रंगने के लिए दिया जाये तो पहले उसे धोवेगा। धुले हुए कपड़े पर ही रंग चढ़ना या चढ़ाया जाना सम्भव होता है। उपासना को रंगाई कह सकते हैं और साधना को धुलाई। दोनों अन्योन्याश्रित हैं। इनमें प्रधान और गौण का वर्गीकरण करना हो तो साधना को प्रधान और उपासना को गौण मानना पड़ेगा। धुला वस्त्र बिना रंगे भी अपनी गरिमा बनाये रह सकता है पर मैला वस्त्र रंग को बर्बाद करेगा और रंगरेज को बदनाम। स्वयं तो उपहासास्पद बना ही रहेगा। मैले कपड़े पर रंग चढ़ाने की सूझ-बूझ भी भोंड़ी ही मानी जायेगी इस प्रकार का किया हुआ श्रम भी सार्थक न रहेगा।

🔶 आत्मिक प्रगति के पथिक आमतौर से यही भूल करते रहते हैं और असफलता का दोष उस पुण्य प्रक्रिया को देते हैं जिसे सही ढंग से अपनाने वाले सदा कृतकृत्य होते हैं। वस्तुतः यह भूल पथिकों की नहीं उनके मार्ग-दर्शकों की है जिन्होंने बहुमूल्य महंगी वस्तु को सस्ती बताकर लोगों को आकर्षित करने भर का ध्यान रखा और यह भूल गये कि अभीष्ट प्रतिफल न मिलने पर जो निराशा और अविश्वास भरी प्रतिक्रिया उत्पन्न होगी उसका क्या परिणाम होगा। सस्ते प्रलोभनों से भ्रमाया व्यक्ति आरम्भ में अति उत्साही हो सकता है पर उसकी निराशाजनक प्रतिक्रिया नास्तिकता के रूप में ही परिणत होकर रहेगी।

🔷 अध्यात्म तत्वज्ञान के मूल आधार से अपरिचित किन्तु उसकी ध्वजा उड़ाने वाले तथाकथित गुरु लोग औंधी सीधी पुस्तकें रचकर यह मिथ्या मान्यता फैलाते रहे हैं कि अमुक पूजा अर्चा करने से उन्हें पाप फल के दण्ड भुगतने की छूट मिल जायेगी। यह प्रतिपादन लोगों को बहुत ही आकर्षक लगता है। क्योंकि अनाचार अपनाने वाले प्रत्यक्षतः सदाचार परायण लोगों की अपेक्षा कहीं अधिक भौतिक सुख सुविधायें प्राप्त कर लेते हैं। छल-छद्म का परिणाम अन्ततः बुरा ही क्यों न हो पर तत्काल तो उन हथकण्डों से लाभ मिल ही जाता है। पाप-पथ अपनाने वाले असुर-देवताओं से अधिक बलिष्ठ रहे हैं यह स्पष्ट है। पीछे भले ही उनकी दुर्गति हुई हो पर आरम्भिक लाभ तो उन्हें ही मिलता है। देवत्व प्राप्ति का आरम्भिक कार्य तप साधना की कष्टकर प्रक्रिया से आरम्भ होता है। लम्बी दूर तक उस मार्ग पर चलने के बाद ही देव पुरुष आनन्द उल्लास प्राप्त करते हैं। ऐसी दशा में तात्कालिक लाभ को प्रधानता देने वाले-अदूरदर्शी लोग कुमार्गगामिता के सहारे तुरन्त लाभान्वित होने की रीति-नीति अपनाते हैं, पर उन्हें यह खुटका बना रहता है कि कभी न कभी इन कुकर्मों का कष्टकारक प्रतिफल भोगना पड़ेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1972 पृष्ठ 7

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1972/May/v1.7

👉 श्रद्धा और अहंकार

🔷 ये बात उस समय की है जब महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद पांडवो ने अश्मेघ यज्ञ किया! भगवान् श्रीकृष्ण जी ने कहा :- ये यज्ञ तब पूरा माना जायेगा जब इस धरा के सभी ऋषि यहाँ भोजन ग्रहण करेंगे और आसमान में घंटा बजेगा!

🔶 तब पांडवो ने सभी ऋषियों को भोजन करवाया परन्तु घंटा नहीं बजा, तब उन्होंने "भगवान् श्रीकृष्ण" जी से पूछा की कहाँ कमी रह गई! तब "भगवान् श्रीकृष्ण" जी ने अंतर्ध्यान हो कर देखाऔर कहा की:-

🔷 दूर एक जंगल में सुपच नाम के महामुनि बैठे है वो रह गए है इसलिये घंटा नहीं बजा! पांडवो ने दूत भेज कर महामुनि को भोजन के लिए निमंत्रण भेजा ऋषि सुपच ने दूत को कहा की उनको स्वयं आना चाहिए था और दूत को वापिस भेज दिया!

🔶 तब पांडवो ने स्वयं महामुन को भोजन के लिए निमंत्रण दिया! परन्तु ऋषि सुपच ने शर्त रखी की वे तब ही जायेंगे जब उन्हें १०० अश्वमेघ यज्ञो का फल मिलेगा पांडव परेशान हो कर वापिस आ गए सारी बात "भगवान् श्रीकृष्ण" जी को बताई!

🔷 जब ये बात द्रौपदी को पता लगी तो द्रौपदी ने कहा ये मेरे ऊपर छोड दो! तब द्रौपदी ने नंगे पैर कुए से पानी लाकर खाना पकाया और नंगे पैर चल कर ऋषि सुपच को बुलाने के लिए गई वहा ऋषि सुपच ने फिर वही शर्त बताई तो द्रौपदी ने कहा की मैंने आप जैसे किसी साधू से सुना है की..

🔶 जब कोई नंगे पैर आप जैसे किसी महान संत के दर्शन करने जाता है तो उसका एक एक कदम एक एक अश्वमेघ यज्ञ के बराबर है इस तरह आप अपने १०० अश्वमेघ यज्ञ का फल लेकर बाकि मुझे दे दे!

🔷 इस तरह मुनि सुपच जी द्रौपदी की बात सुनकर द्रोपदी के साथ आ गए जब उनको खाना परोसा गया तो उन्होंने पांडवो और सारी रानियों द्वारा बनाये गए खाने को मिला लिया और खाना शुरू कर दिया, ये सब देखकर द्रौपदी के मन आया की अगर एक एक करके खाते तो द्रौपदी द्वारा बनाये गए खाने के स्वाद का भी पता लगता की कितना स्वादिष्ट बना है!

🔶 इस दोरान ऋषि ने खाना समाप्त कर दिया परन्तु घंटा फिर भी नहीं बजा! तो पांडवो ने "भगवान् श्रीकृष्ण" जी से पूछा की अब क्या कमी रह गई?

🔷 "भगवान् श्रीकृष्ण" ने कहा की ये तो सुपच जी ही बतायेगे! इस पर ऋषिसुपच ने उन्हे जवाब दिया की ये तो द्रौपदी से पूछ लो की घंटा क्यों नहीं बजा!

🔶 इस तरह जब द्रौपदी को इस बात का अहसास हुआ तो उन्होंने सुपच जी से अपने अहंकार के लिए माफ़ी मांगी तो असमान में घंटा बजा और उनका यज्ञ पूरा हुआ!

🔷 इस वृतांत के ज़रिये संतो द्वारा बताया गया है की संत महात्मा स्वाद को महत्व न देकर श्रधा को देखते है और प्रभु से आत्मा के मिलाप में अहंकार सबसे बड़ा रोड़ा है....

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 10 Feb 2018


👉 हे मनुष्य! तुम महान हो!

🔶 तुम्हारा वास्तविक स्वरूप- तुम्हारे हिस्से में स्वर्ग की अगणित विभूतियाँ आई हैं न कि नर्क की कुत्सित। तुमको वही लेना चाहिये, जो तुम्हारे हिस्से में आया है। स्वर्ग तुम्हारी ही सम्पत्ति है। शक्ति तुम्हारा जन्म सिद्ध अधिकार है। तुमको केवल स्वर्ग में प्रवेश करना है तथा शक्ति का अर्जन करना है। स्वर्ग में सुख ही सुख है। वहाँ आत्मा को न तो किसी बात की चिन्ता रहती है और न किसी प्रकार की इच्छा। तूफान मचाने वाले विकारों की आसुरी लीला या भय के भूतों का लेश भी वहाँ नहीं है। वह ‘स्वर्ग’ इस संसार में ही है। वह तुम्हारे भीतर है। उसे खोजने का प्रयत्न करो, अवश्य तुम्हें प्राप्त हो जायगा।
  
🔷 संसार में फैले हुए पाप, निकृष्टता, भय, शोक तुम्हारे हिस्से में नहीं आये हैं। मोह, शंका, क्षोभ की तरंगें तुम्हारे मानस-सरोवर में नहीं उठ सकतीं क्योंकि विक्षोभ उत्पन्न करने वाली आसुरी प्रवृत्तियों से तुम्हारा कोई सम्बन्ध नहीं। संशय तथा शंकाओं से दबकर तुम्हें इधर-उधर मारा नहीं फिरना है। क्षण-क्षण उद्विग्र तथा उत्तेजित नहीं होना है। शान्त तथा पवित्र आत्मा में क्लेश, भय, दु:ख शंका का स्पर्श कैसे हो सकता है? यदि तुम इन कुत्सित वस्तुओं को अपनाओगे तो अवश्य ही ये तुम्हारे गले पड़ेगें और तुम्हारे जीवन की, तुम्हारी महत्वाकांक्षा की इति श्री कर देंगे।
  
🔶 तुम्हारा मनुष्य होना ही इस बात का प्रमाण है कि तुम्हारी शक्ति अपरिमित है। संसार की ओर आँख उठाकर देखो! प्रकृति पर मनुष्य का आधिपत्य है, बड़े से बड़े पशु उसके इङ्गित पर नृत्य करते हैं। ऊँची से ऊँची वस्तु पर उसका पूर्ण आधिपत्य है। उससे शक्तिशाली प्राणी पृथ्वी पर दूसरा नहीं है।
  
🔷 तुझमें शारीरिक शक्ति का भण्डार है, तेरे हाथ, पाँव, छाती, पट्ठों में शक्ति इसीलिए दी गई है कि कोई तुझे दबा न सके, तेरी बराबरी न कर सके। मनुष्य में असीम सामथ्र्य विद्यमान है, शक्ति का वृहत् पुञ्ज भरा पड़ा है। तुझे किसी के आगे हाथ पसार कर माँगने की आवश्यकता नहीं है। तू ईश्वर का महान पुत्र है। ईश्वर की शक्ति का ही तेरे अन्दर प्रकाश है। तू ईश्वर को ही अपने भीतर से कार्य करने दे। ईश्वर को स्वयं प्रकाशित होने दे। ईश्वर जैसा ही बन कर रह। ईश्वर होकर खा, पी, और ईश्वर होकर ही साँस ले, तभी तू अपनी महान् पैतृक सम्पत्ति का स्वामी बन सकेगा।
  
🔶 मनुष्य जीवन दिव्य सत्ता की एक बहुमूल्य धरोहर है, जिसे सौंपते समय उसकी सत्पात्रता पर विश्वास किया जाता है। मनुष्य के साथ यह पक्षपात नहीं है वरन् ऊँचे अनुदान देने के लिए यह प्रयोग परीक्षण है। अन्य जीवधारी शरीर भर की बात सोचते और क्रिया करते हैं, किन्तु मनुष्य को स्रष्टा का उत्तराधिकारी युवराज होने के नाते अनेकानेक कत्र्तव्य और उत्तरदायित्व निबाहने पड़ते हैं। उसी में उसकी गरिमा और सार्थकता है। यदि पेट प्रजनन तक, लोभ, मोह तक उसकी गतिविधियाँ सीमित रहें तो उसे नर-पशु के अतिरिक्त और क्या कहा जायेगा?

🔷 लोभ-मोह के साथ अहंकार जुड़ जाने पर तो बात और भी अधिक बिगड़ती है। महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए उभरी अहमन्यता अनेकों प्रकार के कुचक्र रचतीं और पतन पराभव के गर्त गिरती हैं। अहंता से प्रेरित व्यक्ति अनाचारी बनता है और आक्रामक भी। ऐसी दशा में उसका स्वरूप और भी भंयकर हो जाता है। दुष्ट दुरात्मा एवं नर पिशाच स्तर की आसुरी गतिविधियाँ अपनाता है। इस प्रकार मनुष्य जीवन जहाँ श्रेष्ठ-सौभाग्य का प्रतीक था, वहाँ वह दुर्भाग्य और दुर्गति का कारण ही बनता है। इसी को कहते हैं वरदान को अभिशाप बना लेना। दोनों ही दिशाएँ हर किसी के लिए खुली हैं। जो इनमेें से जिसे चाहता है उसे चुन लेता है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप जो है।   

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 ध्यानयोग की सफलता शान्त मनःस्थिति पर निर्भर है (भाग 3)

🔶 ध्यान भूमिका की साधना में शरीर को ढीला और मन को खाली रखना चाहिए। इसके लिए शिथिलीकरण मुद्रा तथा उन्मनी मुद्रा का अभ्यास करना पड़ता है। शिथिलीकरण का स्वरूप यह है कि देह को मृतक-निष्प्राण मूर्छित, निद्रित, निश्चेष्ट स्थिति में किसी आराम कुर्सी या किसी अन्य सहारे की वस्तु से टिका दिया जाय और ऐसा अनुभव किया जाय मानो शरीर प्रसुप्त स्थिति में पड़ा हुआ है। उसमें कोई हरकत हलचल नहीं हो रही है। यह मुद्रा शरीर को असाधारण विश्राम देती और तनाव दूर करती है। ध्यानयोग के लिए यही स्थिति सफलता का पथ प्रशस्त करती है।

🔷 मन मस्तिष्क को ढीला करने वाली उन्मनी मुद्रा यह है कि इस समस्त विश्व को पूर्णतया शून्य रिक्त अनुभव किया जाय। प्रलय के समय ऊपर नील आकाश, नीचे नील जल स्वयं अबोध बालक की तरह कमल पत्र पर पड़े हुए तैरना अपने पैर का अँगूठा अपने मुख से चूसना, इस प्रकार का प्रलय चित्र बाज़ार में भी बिकता है। मन को शान्त करने की दृष्टि से यह स्थिति बहुत ही उपयुक्त है संसार में कोई व्यक्ति, वस्तु , हलचल, समस्या, आवश्यकता है ही नहीं, सर्वत्र पूर्ण नीरवता ही भरी पड़ी है- यह मान्यता प्रगाढ़ होने पर मन के लिए भोगने, सोचने, चाहने का कोई पदार्थ या कारण रह ही नहीं जाता।

🔶 अबोध बालक के मन में कल्पनाओं की घुड़दौड़ की कोई गुँजाइश नहीं रहती। अपने पैर के अँगूठे में से निसृत अमृत का जब आप ही परमानन्द उपलब्ध हो रहा है तो बाहर कुछ ढूँढ़ने खोजने की आवश्यकता ही क्या रही? इस उन्मनी मुद्रा में आस्था पूर्वक यदि मन जमाया जाय तो उसके खाली एवं शान्त होने की कोई कठिनाई नहीं रहती। कहना न होगा कि शरीर को ढीला और मन को खाली करना ध्यानयोग के लिए नितान्त आवश्यक है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि ध्यानयोग का चुम्बकत्व ही आत्मा और परमात्मा की प्रगाढ़ घनिष्ठता को विकसित करके द्वैत को अद्वैत बनाने में सफल होता है। आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग जितना गहरा होगा उतना ही परस्पर लय होने की-सम्भावना बढ़ेगी इस एकता के आधार पर ही बिन्दु को सिन्धु बनने का अवसर मिलता है। जीव के ब्रह्म बनने का अवसर ऐसे ही लय समर्पण पर एकात्म भाव पर निर्भर रहता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1973 पृष्ठ 50
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/March/v1.50

👉 व्यवहार में औचित्य का समावेश करें (भाग 3)

🔷 अनगढ़ दुराग्रहियों के प्रति वैसा भाव रखा जाय जैसा रोगियों के प्रति रखा जाता है। मनोविकारग्रस्त या चरित्रभ्रष्ट व्यक्ति वस्तुतः एक प्रकार के रोगी ही हैं। उनके प्रति दृष्टिकोण ठीक उसी प्रकार का अपनाना चाहिए। बीमारियों या पागलों का इलाज तो कुशल चिकित्सक करते हैं पर उनके प्रति विद्वेष नहीं रखते। आवश्यकता पड़ने पर पागलों के हाथ-पैर भी बाँध देते हैं और सड़े फोड़ों में गहरा नश्तर भी लगाते हैं। उपदंश प्रायः वेश्यागमन से होता है। जिगर खराब करने में मद्यपान प्रधान कारण देखा गया है। कैन्सर की धूम्रपान से संगति बैठती है। डाकू भी किसी मुठभेड़ में घायल होते हैं। सेंध लगाते समय हाथ पैर तुड़वा लेने वाले चोरों की भी अस्पताल में भर्ती होती है। डाक्टर को इतनी फुरसत कहाँ जो इन कुकर्मियों का लेखा-जोखा रखे और घृणा-तिरस्कार के झंझट में पड़कर अपना सन्तुलन बिगाड़े। उसे उतना ही ध्यान रहता है कि व्याधिमुक्त करने के उत्तरदायित्व का निर्वाह किया जाय। क्षमा करने या दण्ड देने की बात वह शासन तन्त्र के जिम्मे छोड़ देता है।

🔶 अनगढ़ों के प्रति विज्ञजनों को चिकित्सक जैसा व्यवहार करना चाहिए। न तो उतना क्षमाशील बना जाय जिसमें पानी में बहने वाले बिच्छू को बार-बार निकालने और डंक-त्रास सहने जैसा अतिवाद अपनाया गया हो। साँप को दूध पिलाने पर हानि ही हानि है। दुष्टता की छूट मिलने पर वह चौगुनी उद्दण्डता बरतने पर उतारू होती है। इसलिए उपचार से विमुख नहीं होना चाहिए। न्यायाधीश यदि क्षमा करने की नीति अपनाये तो दुष्ट-दुरात्माओं से किसी सज्जन को जीवित बचा सकना कठिन है।

🔷 कर्तव्य के नाते सत्परामर्श तो हर किसी को हर स्थिति में देना चाहिए, किन्तु यह नहीं सोचना चाहिए कि कहना मान ही लिया जायेगा। हो सकता है कि श्रेष्ठ जनों की श्रेष्ठता हमसे ऊँचे स्तर की हो और अपने परामर्श व्यावहारिकता और सुविधा को ध्यान में रखकर दिये गये हों, जबकि आदर्शवादिता की कसौटी लाभ-हानि से कहीं ऊँची उठी होती है और उसमें उच्चस्तरीय निर्धारण एवं अनुकरणीय परम्परा का परिपोषण ही प्रधान होता है। इसके लिए आवश्यकतानुसार अपना विनम्र परामर्श इन्हें इस आशा से दिया जा सकता है कि कदाचित् इसका कोई भाग उन्हें अनुकूल पड़े। सूझबूझ की दृष्टि से कई बार बालक भी कोई ऐसी बात कह सकते हैं जो बड़ों के ध्यान में न आई हो, इसलिए परामर्श देने में और कुछ न सही, अपना मन तो हलका होता ही है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How to live our life? (Part 1)

🔷 We all are here in this world for the purpose of fulfilling our duties. We are expected to live happily and in good manner but mean time not to be so busy in it that objectives of life are neglected for we will die if we allow this world to trap us.
                                           
🔶 You would have heard the story of SIMBUN, a monkey found in Africa.  It is said that hunters succeed in killing that monkey in exchange of just a handful of gram. Grams are kept in metal-pitchers which appeal SIMBUN monkey. SIMBUN comes to eat that gram and in attempt to it gets his hands into the pitcher but cannot draw out his hands for he had grabbed grams in his fist. He desires to take out his fist, also cries and apply force but could not take out. He even does not dare to leave the gram so that he could take out his hand, this situation invites the hunter to come and kill the monkey in order to obtain the skin of monkey for commercial use. I and you are almost in same situation as that of African monkey SIMBUN.
                                             
🔷 We are seen trapped like those monkeys with grips of fulfilling avarices, longings and egos just to destroy the wealth of life which we are not expected to do. We should do something to save our life. We have to get rid of our timidity because by doing so we do not loose but earn even more.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 18)

🔶 मित्रो! हमें छोटे-बड़े सभी आयोजनों में बहुत सफलतायें मिलती रही हैं, जन सहयोग मिलता रहा है। एक बार एक सहस्रकुण्डीय यज्ञ में हमने तीस-चालीस हजार रुपया खर्च कर डाला। हमारे पास कानी-कौड़ी भी नहीं थी, पर न जाने कहाँ से सब कुछ आता हुआ चला गया। न जाने कहाँ से व्यवस्था होती चली गयी। हमको यकीन था कि कोई महाशक्ति हमारे पीछे बैठी है। इसी तरह जब हमको विदेश जाना पड़ा तो किराये-भाड़े में चालीस-पचास हजार रुपये खर्च हो गये। उस समय हमारे पास रुपये-पैसों की दिक्कत थी और दूसरी बहुत सी दिक्कतें थीं, लेकिन हम जानते थे कि हम अकेले नहीं हैं और हमारे पास बहुत जबरदस्त बैंकिंग है।

🔷 मित्रो! आप यकीन रखना कि यह सब आपके लिए भी सुरक्षित है, लेकिन शर्त केवल यही है कि आपको अपने को स्वयं सही सिद्ध करना होगा। अगर आप स्वयं सही सिद्ध न हो सके, तो ये जो बैंकिंग है, फिर आपको उसकी उम्मीद नहीं करनी चाहिए। फिर आपको यह आशा नहीं करनी चाहिए कि कहीं से कोई ऐसा समर्थन, बैंकिंग और सहायता आपको मिलेगी। अगर आप सही व्यक्ति होंगे और पूरी ईमानदारी से काम करते हुए चले जायेंगे, तो हम आपको यह आशीर्वाद दे करके विदा करते हैं कि आप यह पायेंगे कि आप समर्थ हो करके गये हैं। फिर आपके क्रियाकलापों का कोई सहयोगी न हो, ऐसी बात नहीं है। हम यहाँ से आपकी सहायता करेंगे और यहाँ से आपका समर्थन करेंगे और हम आपको आगे बढ़ायेंगे।

🔶 मित्रो! हम आपकी हर तरह से सहायता करेंगे और हर तरफ सफलता देंगे, शर्त केवल एक ही है कि आप अपने स्थान पर सही बने हुए रहें। अगर आप अपने स्थान पर सही नहीं रहेंगे, तो हमारी सहायता आपसे टक्कर खा करके वापस हमारे पास आती जायेगी। फिर आप वह काम करने में समर्थ न हो सकेंगे, जो हम आपसे कराना चाहते हैं और जिम्मेदारियाँ आप लेकर के जा रहे हैं, उसको भी आप पूरा नहीं कर सकेंगे। आप अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्यों को ध्यान में रखकर जायें। कहाँ क्या सफलता मिली और कहाँ नहीं मिली, इस पर बहुत धन मत देना। आप अपना स्वयं का कर्तव्य पूरा कर लेना।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 37)

👉 गुरु कृपा ने बनाया महासिद्ध
🔷 गुरुदेव भगवान् के महिमामय स्वरूप के अन्य रहस्यमय आयामों को प्रकट करते हुए भगवान् सदाशिव आदिमाता जगदम्बा से कहते हैं-

तस्यै दिशे सततमञ्जलिरेष आर्ये प्रक्षिप्यते मुखरितो मधुपैर्बुधैश्च।
जागर्ति यत्र भगवान् गुरुचक्रवर्ती विश्वोदयप्रलयनाटकनित्यसाक्षी॥ ५१॥
श्रीनाथादिगुरुत्रयं गणपतिं पीठत्रयं भैरवं सिद्धौघं बटुकत्रयं पदयुगं दूतीक्रमं मण्डलम्।
विरान् द्व्यष्ट-चतुष्क-षष्टि-नवकं-वीरावलीपञ्चकं श्रीमन्मालिनिमंत्रराजसहितं वन्दे गुरोर्मण्डलम्॥ ५२॥

🔶 गुरुतत्त्व के रहस्य को प्रकट करने वाले इन महामंत्रों में अनेक तरह की साधनाओं के रहस्यों का गूढ़ संकेतों में वर्णन है। भगवान् भोलेनाथ की वाणी शिष्यों के समक्ष इस रहस्य को प्रकट करती है कि गुरुदेव भगवान् में साधना, साध्य एवं सिद्धि के सारे मर्म समाए हैं। गुरुदेव सृष्टि में चल रहे उत्पत्ति एवं प्रलय रूप नाटक के नित्य साक्षी हैं। वे ही सम्पूर्ण सृष्टि के चक्रवर्ती स्वामी हैं। ऐसे गुरुदेव भगवान् जिस दिशा में भी विराज रहे हों, उसी दिशा में विद्वान् शिष्य को मन्त्रोच्चारपूर्वक सुगन्धित पुष्पों की अञ्जलि समर्पित करनी चाहिए॥ ५१॥

🔷 श्री गुरुदेव ही परमगुरु एवं परात्पर गुरु हैं। उनमें तीनों नाथ गुरु आदिनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ एवं गोरक्षनाथ समाये हैं। उन्हीं में भगवान् गणपति का वास है। उन परम प्रभु में तंत्र साधना के तीनों रहस्य-मय पीठ-कामरूप, पूर्णगिरि एवं जालंधर पीठ स्थित हैं। मन्मथ आदि अष्ट भैरव, सभी महासिद्धों के समूह, तंत्र साधना में सर्वोच्च कहा जाने वाला विरंचि चक्र उन्हीं में है। स्कन्दादि बटुकत्रय, योन्याम्बादि दूतीमण्डल, अग्निमण्डल, सूर्यमण्डल, सोममण्डल आदि मण्डल, प्रकाश व विमर्श के युगल पद के रहस्य उन्हीं में हैं। दशवीर, चौसठ योगिनियाँ, नवमुद्राएँ, पंचवीर तथा अ से क्ष तक सभी मातृकाएँ एवं मालिनीयंत्र गुरुदेव के चेतनामण्डल में ही स्थित हैं। सभी तत्त्वों से युक्त गुरु मण्डल को मेरा बारम्बार प्रणाम है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 61

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

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