शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (अन्तिम भाग)

🔷 अपनी जिन जिम्मेदारियों की भावना को ले करके जा रहे हैं, उसे ईमानदारी पूर्वक निभाने को आप काफी मान लेना। हमारे लिए यही काफी है और आपकी जीवात्मा के संतोष के लिए भी काफी है और हमारे भगवान के लिए भी काफी है। समाज में क्या सफलता मिली, क्या नहीं मिली, हम उसका लेखा-जोखा आपसे नहीं माँगने वाले हैं। आपके कार्यक्रम में कितने आदमी जाये, कितनी गुरुदक्षिणा मिली, कितना क्या मिला-यह सब जानकारी आप हमको मत भेजना। आप तो बस हमको यह भेजना कि हमारी निष्ठा में कोई कच्चाई तो नहीं आ गयी, कोई कमजोरी तो नहीं आ गयी। आपने अपने परिश्रम और पुरुषार्थ में कोई कमी तो नहीं रहने दी। आपने लोगों के अंदर निष्ठा जमाने में कहाँ तक सफलता पायी, हमारे लिए यही पर्याप्त है।

🔶 मित्रो! वास्तव में हम आपको लोकनिष्ठा जगाने के लिए भेजते हैं। हम आपको लोगों की मनःस्थिति बदलने के लिए भेजते हैं। हम आपको बड़े-बड़े आयोजन व उत्सव सम्पन्न कराने के लिए नहीं भेजते हैं। बड़े उत्सव सम्पन्न कराना होता, तो हमने आपको कष्ट नहीं दिया होता, फिर हम मालदारों की खुशामद करते और कहते कि एक लक्ष कुण्डीय यज्ञ होने वाला है। उसमें एक लाख रुपये लगने वाला है। तुम पाँच हजार रुपये दे दो। अच्छा गुरुजी! मैं दे दूँगा, पर यह बताइये कि मेरे सट्टे में फायदा हो जायेगा कि नहीं? हाँ बेटे, तेरे सट्टे में फायदा हो जायेगा, तू पाँच हजार रुपये निकाल दे और कहीं से इकट्ठा करवा दे। अच्छा गुरुजी! मैं टेलीफोन किए देता हूँ, उसके यहाँ से दो हजार आ जायेगा। दूसरा व्यक्ति भी हमारा मिलने वाला है, उसके यहाँ से भी पाँच हजार आ जायेगा।

🔷 मित्रो! हमें मालदार नहीं, निष्ठावान्, श्रद्धावान् व्यक्ति चाहिए। हम लोगों की निष्ठा जगाते हैं। निष्ठाएँ लोगों की खत्म हो गयी हैं, निष्ठाएँ मर गयी हैं। जो आस्तिकता मर गयी है, आध्यात्मिकता मर गयी, सो गयी है जो धर्म आदमी के भीतर से मर गया है, सो गया है, उसी को जगाने के लिए हम आपको भेजते हैं। मित्रो! आप जलते हुए दीपक की तरह से जाना और दूसरों को दीपक से दीपक की तरह जलाते हुए चले जाना। यही आपसे हमारी उम्मीद है और यही मेरी शुभकामना और यही आपके सहयोग का विश्वास और आश्वासन है। इन्हीं सब चीजों के साथ बड़े प्यार के साथ और बड़ी उम्मीदों के साथ और बड़ी आशाओं के साथ मैं आपको विदा करता हूँ। आपको मैं फिर मिलूँगा। अब आपसे विदा चाहूँगा।

🌹 आज की बात समाप्त।
🌹 ॐ शान्तिः
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

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