रविवार, 27 अगस्त 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 55)

🌹  परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व देंगे

🔴 उचित- अनुचित का, लाभ- हानि का निष्कर्ष निकालने और किधर चलना, किधर नहीं चलना इसका निर्णय करने के लिए उपयुक्त बुद्धि भगवान् ने मनुष्य को दी है। उसी के आधार पर उसकी गतिविधियाँ चलती भी हैं, पर देखा यह जाता है कि दैनिक जीवन की साधारण बातों में जो विवेक ठीक काम करता है, वही महत्त्वपूर्ण समस्या सामने आने पर कुंठित हो जाता है। परम्पराओं की तुलना में तो किसी विरले का ही विवेक जाग्रत रहता है, अन्यथा आंतरिक विरोध रहते हुए भी लोग पानी में बहुत हुए तिनके की तरह अनिच्छित दिशा में बहने लगते हैं। भेड़ों को झुण्ड जिधर भी चल पड़े, उसी ओर सब भेड़ें बढ़ती जाती हैं। एक भेड़ कुँए में गिर पड़े तो पीछे की सब भेड़ें उसी कुँए में गिरती हुई अपने प्राण गँवाने लगती हैं। देखा- देखी की, नकल करने की प्रवृत्ति बंदर में पाई जाती है। वह दूसरों को जैसा करते देखता है, वैसा ही खुद भी करने लगता है। इस अंधानुकरण की आदत को जब मनुष्य का मन भी, इसी तरह मान लेने के लिए करता है, तो वह यह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि आदमी बंदर की औलाद है।
 
🔵 समाज में प्रचलित कितनी ही प्रथाएँ ऐसी हैं, जिनमें लाभ रत्ती भर भी नहीं, हानि अनेक प्रकार से हैं, पर एक की देखा- देखी दूसरा उसे करने लगता है। बीड़ी और चाय का प्रचार दिन- दिन बढ़ रहा है। छोटे- छोटे बच्चे बड़े शौक से इन्हें पीते हैं। सोचा यह जाता है कि यह चीजें बड़प्पन अथवा सभ्यता की निशानी हैं। इन्हीं पीना एक फैशन की पूर्ति करना है और अपने को अमीर, धनवान साबित करना है। ऐसी ही कुछ भ्रांतियों से प्रेरित होकर शौक, मजे, फैशन जैसी दिखावे की भावना से एक की देखा- देखी दूसरा इन नशीली वस्तुओं को अपनाता है और अंत में एक कुटेब के रूप में वह लत ऐसी बुरी तरह लग जाती है कि छुड़ाए नहीं छूटती।
 
🔴 चाय, बीड़ी, भाँग, गाँजा, शराब, अफीम आदि सभी नशीली चीजें भयंकर दुर्व्यसन हैं, इनके द्वारा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य नष्ट होता है और आर्थिक स्थिति पर बुरा प्रभाव पड़ता है। हर नशेबाज स्वभाव की दृष्टि से दिन- दिन घटिया आदमी बनता जाता है। क्रोध, आवेश, चिंता, निराशा, आलस्य, निर्दयता, अविश्वास आदि कितने ही मानसिक दुर्गुण उपज पड़ते हैं। समझाने पर या स्वयं विचार करने पर हर नशेबाज इस लत की बुराई को स्वीकार करता है, पर विवेक की प्रखरता और साहस की सजीवता न होने से कुछ कर नहीं पाता। एक अंध परम्परा में भेड़ की तरह चलता चला जाता है। क्या यही मनुष्य की बुद्धिमत्ता है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.76

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.14

👉 मनस्वी लोक सेवक चाहिए (अंतिम भाग)

🔵 अखण्ड-ज्योति परिवार में हर जाति एवं उपजाति के लोग मौजूद हैं। उसकी छाँट करके प्रारम्भिक रूप में प्रगतिशील जातीय सभाएं गठित कर दी जावेंगी, पर उतने थोड़े लोगों के संगठन किसी जाति पर व्यापक प्रभाव कहाँ डाल सकेंगे? उन्हें अपने-अपने संगठनों का व्यापक विस्तार करना होगा। प्रगतिशीलता का तात्पर्य और उद्देश्य समझाने के लिए उन्हें अपने-अपने कार्य क्षेत्र में दर दर मारा-मारा फिरता पड़ेगा। संगठन का उद्देश्य और कार्यक्रम समझ लेने पर ही तो कोई उससे प्रभावित होगा और उसमें सम्मिलित होने की तैयारी करेगा।

🔴 कहने पर से तो इन संस्थाओं के सदस्य सब लोग बन नहीं जायेंगे और यदि बन भी गये तो उनमें वह साहस कहाँ से आवेगा, जिसके बल बूते पर वह बहती नदी के प्रवाह को चीर कर उलटी चलने वाली मछली की तरह नवीन परम्परा स्थापित करने का आदर्श उपस्थित कर सकें निश्चय ही इसके लिए व्यापक प्रचार और प्रयास की जरूरत होगी। जन-संपर्क बनाने के लिए दौरे करने पड़ेंगे, उद्देश्य को समझा सकने वाला साहित्य-जनता तक पहुँचना पड़ेगा और उनके मस्तिष्क में वह भावना भरनी पड़ेगी जिससे वे युगधर्म को पहचान सकें और प्रतिगामिता की हानियों और प्रगतिशीलता के लाभों से परिचित हो सकें।

🔵 जातियों के क्षेत्र छोटे-छोटे हैं बिखरे हुए पड़े हैं, उन बिखरे हुए मन को को एक सूत्र में पिरोने में कितने मनोयोग की आवश्यकता है उसे कार्यक्षेत्र में उतरने वाले ही जानते हैं। कितना विरोध, कितना उपहास, कितना व्यंग सहना पड़ता है, कितना समय नष्ट करना पड़ता है उसे वही सहन कर सकेगा जिसमें त्यागी तपस्वी जैसी भावना विद्यमान हो। घर बैठे मुफ्त में यश को लूट भागने वाले बातूनी लोग इस प्रयोजन को पूरा कहाँ कर सकेंगे? इसलिए सबसे पहली आवश्यकता ऐसे भावनाशील लोगों की ही पड़ेगी, जो युग की सब से बड़ी आवश्यकता-सामाजिक क्रान्ति के लिए अपनी सच्ची श्रद्धा को अञ्जलि में लेकर संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए साहस पूर्ण कदम बढ़ा सकें।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च1964 पृष्ठ 52
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/March/v1.52

👉 आज का सद्चिंतन 27 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 Aug 2017


शनिवार, 26 अगस्त 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 53)

🌹  संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुण्य-प्रसार के लिए, अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहेंगे।

🔴 इस संसार में अनेक परमार्थ और उपकार के कार्य हैं, वे सब आवरण मात्र हैं, उनकी आत्मा में, सद्भावनाएँ सन्निहित हैं। सद्भावना सहित सत्कर्म भी केवल ढोंग मात्र बनकर रह जाते हैं। अनेक संस्थाएँ आज परमार्थ का आडम्बर करके सिंह की खाल ओढ़े फिरने वाले शृंगाल का उपहासास्पद उदाहरण प्रस्तुत कर रही हैं। उनसे लाभ किसी का कुछ नहीं होता, विडम्बना बढ़ती है और पुरुषार्थ को भी लोग आशंका एवं संदेह की दृष्टि से देखने लगते हैं। प्राण रहित शरीर कितने ही सुंदर वस्त्र धारण किए हुए क्यों न हो, उसे कोई पसंद न करेगा, न उससे किसी का कोई भला होगा। इसी प्रकार सद्भावना रहित जो कुछ भी लोकहित, जनसेवा के प्रयास किए जाएँगे, वे भलाई नहीं, बुराई ही उत्पन्न करेंगे।

🔵 बुराइयाँ आज संसार में इसलिए बढ़ और फल-फूल रही हैं कि उनका अपने आचरण द्वारा प्रचार करने वाले पक्के प्रचारक, पूरी तरह मन, कर्म, वचन से बुराई फैलाने वाले लोग बहुसंख्या में मौजूद हैं। अच्छाइयों के प्रचारक आज निष्ठावान् नहीं, बातूनी लोग ही दिखाई पड़ते हैं, फलस्वरूप बुराइयों की तरह अच्छाइयों का प्रसार नहीं हो पाता और वे पोथी के वचनों की तरह केवल कहने-सुनने भर की बातें रह जाती हैं। कथा-वार्ताओं को लोग व्यवहार की नहीं कहने-सुनने की बात मानते हैं और इतने मात्र से ही पुण्य लाभ की संभावना मान लेते हैं।

🔴 सत्प्रवृत्तियों को मनुष्य के हृदय में उतार देने से बढ़कर और कोई महत्त्वपूर्ण सेवा कार्य इस संसार में नहीं हो सकता। वस्तुओं की सहायता भी आवश्यकता के समय उपयोगी सिद्ध हो सकती है, पर उसका स्थाई महत्त्व नहीं है। आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न व्यक्ति के अतिरिक्त अन्य लोग ऐसी सेवा कर भी नहीं सकते। हर आदमी स्थायी रूप से अपनी समस्या, अपने पुरुषार्थ और विवेक से ही हल कर सकता है। दूसरों की सहायता पर जीवित रहना न तो किसी मनुष्य के गौरव के अनुकूल हे और न उससे स्थायी हल ही निकलता है। जितनी भी कठिनाइयाँ व्यक्तिगत तथा सामूहिक जीवन में दिखाई पड़ती हैं, उनका एकमात्र कारण कुबुद्धि है।

🔵 यदि मनुष्य अपनी आदतों को सुधार ले, स्वभाव को सही बना ले और विचारों तथा कार्यों का ठीक तारतम्य बिठा ले तो बाहर से उत्पन्न होती दीखने वाली सभी कठिनाइयाँ बात की बात में हल हो सकती हैं। व्यक्ति और समाज का कल्याण इसी में है कि सत्प्रवृत्तियों को अधिकाधिक पनपने का अवसर मिले। इसी प्रयास में प्राचीनकाल में कुछ लोग अपने जीवन के उत्सर्ग करते थे, उन्हें बड़ा माना जाता था और ब्राह्मण के सम्मानसूचक पद पर प्रतिष्ठित किया जाता था। चूँकि सत्प्रवृत्तियों को पनपना संसार का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है इसलिए उसमें लगे हुए व्यक्तियों को सम्मान भी मिलना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.73

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.13

👉 विशिष्ट प्रयोजन के लिये, विशिष्ट आत्माओं की विशिष्ट खोज (भाग 4)

🔵 इन विषम परिस्थितियों में बहुमुखी समस्याओं की जड़े लोक मानस में अत्यन्त गहराई में घुसी हुई होने के कारण, युग परिवर्तन अतीव कठिन है। गुण, कर्म, स्वभाव लोक धारा को उलटना-समुद्र के खारी जल को हिमालय की सम्पदा बना देना कितना कठिन है उसे हर कोई नहीं समझ सकता। उसे भुक्तभोगी बादल ही जानते हैं कि उसमें कितना साहस करने कितना भार ढोने कितना उड़ना, और कितना त्याग करना पड़ता है। युग परिवर्तन के भावी प्रयासों को लगभग इसी स्तर का माना जाना चाहिए।

🔴 युग सन्धि की अत्यन्त महत्वपूर्ण वेला है। इन वर्षो में महान परिवर्तन होंगे और विकट समस्याओं को समाधान करना होगा। बुझते दीपक की लौ, प्रभाव से पूर्व की सघन तमिस्रा मरणासन्न की साँस, चींटी के उगते पंख, हारे जुआरी के दाव को देख कर, मरता सो क्या न करता की उक्ति को चरितार्थ होते प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। असुरता अपनी अन्तिम घड़ियों में जीवन-मरण की लड़ाई लड़ेगी और संकट, विक्रह अपेक्षाकृत अधिक बढ़ेंगे। इसी प्रकार देवत्व की प्रतिष्ठापना के लिए भी बीजारोपण के साथ प्रचंड उत्साह के साथ काम करने वाले किसान जैसी भूमिका की दर्शनीय होगी।

🔵 दोनों पक्ष एक दूसरे से सर्वथा विपरीत होते हुए भी परम साहसकिता का परिचय देंगे। एक दूसरे के साथ टकराने से भी पीछे न हटेंगे। साँड़ लड़ते हैं तो खेत खलिहानों को तोड़-मरोड़ कर रख देते हैं। युग परिवर्तन प्रसव पीड़ा जैसे कष्ट कारक होते हैं उसमें डाक्टरों, नर्सो की पूर्णतया जागरुक रहना पड़ता है। प्रसूता की तो जान पर ही बीतती है। उसकी सुरक्षा सान्त्वना में अतिरिक्त इन लोगों को नव जात शिशुओं के लिए आवश्यक सुविधाएँ भी पहले से ही जुटानी होती है।

🔴 युग संधि में दुहरे उत्तरदायित्व जागृत आत्माओं को सँभालने पड़ते हैं। विनाशकारी परिस्थितियों से जूझना और विकास के सृजन प्रयोजनों को सोचना। किसान और माली को भी यही करना पड़ता है। खर पतवार उखाड़ना-बेतुकी डालियों को काटना- पशु पक्षियों से फसल को रखाना जैसी प्रतिरोध सुरक्षा की जागरुकता दिखाने पर ही उनके पल्ले कुछ पड़ेगा अन्यथा परिश्रम निरर्थक चले जाने की आशंका बनी रहेगी। उन्हें एक मोर्चा सृजन का भी सँभालना पड़ता है। बीज-बोना, खाद देना, सिंचाई का प्रबन्ध करना, रचनात्मक काम है। इसकी उपेक्षा की जाय तो उत्पादन की आशा समाप्त होकर ही रहेगी। इसे दो मोर्चो पर दुधारी तलवार से लड़ने के समतुल्य माना जा सकता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1980 पृष्ठ 47
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1980/February/v1.47

👉 आत्मचिंतन के क्षण 25 Aug 2017

🔴 साधारणतया मनुष्य दुख-सुख का कारण बाहरी वस्तुओं का संयोग एवं वियोग मानता है और इसी गलत धारण के कारण अनुकूल वस्तुओं व परिस्थितियों को उत्पन्न करने व जुटाने में एवं प्रतिकूल वस्तुओं को दूर करने में ही वह लगा रहता है। पर विचारकों ने यह देखा कि एक ही वस्तु की प्राप्ति से एक को सुख होता है और दूसरे को दुख। इतना ही नहीं परिस्थिति की भिन्नता हो तो एक ही वस्तु या बात एक समय में सुखकर प्रतीत होती हैं और अन्य समय में वही दुःखकर अनुभूत होती है इससे वस्तुओं का संयोग वियोग ही सुख-दुःख का प्रधान कारण नहीं कहा जा सकता और इसी के अनुसंधान में बाहरी दुखों एवं सुखों का समभाव रखने को महत्व दिया गया है।

🔵 आत्मोन्नति एकाँगी नहीं होती, केवल एक से ही वह पूरी नहीं हो सकती वरन् तत्संबन्धी सभी उपकरण जुटाने पड़ते हैं। पहलवान का इच्छुक व्यक्ति केवल मात्र व्यायाम पर जुटा रहे और पौष्टिक भोजन, तेल, मालिश, ब्रह्मचर्य, विश्राम आदि की उपेक्षा करे तो उसका सफल होना कठिन है। आत्मोन्नति के सुव्यवस्थित साधनों के संबंध में आध्यात्म विद्या के तत्वदर्शी आचार्य सदा से सावधान रहे हैं। उन्होंने अपने शिष्यों की सर्वांगीण उन्नति पर सदा से ही पूरा पूरा ध्यान रखा है और इस संबंध में बड़े नियमों प्रतिबंधों एवं उत्तरदायित्वों का शास्त्रों में अनेक प्रकार का वर्णन किया है। व्यवहारिक जीवन उदारता, कृतज्ञता, प्रत्युपकार, लोक सेवा एवं स्वार्थ त्याग से ओत-प्रोत आचरणों का अधिकाधिक अवसर आना उन अवसरों पर अपना उत्तरदायित्व सफलतापूर्वक पूरा किया जाना प्रत्येक साधके के लिए अत्यन्त आवश्यक है।

🔴 दूसरों के दुःख का असर होना इसको दया कहते हैं। अथवा दुःखी जीवों के प्रति जो प्रीति-भाव रखा जाता है, उसको दया कहते हैं। इस दयावृत्ति से संवेदना-शक्ति की उन्नति होती है। दयावृत्ति का भक्ति और प्रीति के साथ अतिघनिष्ठ सम्बन्ध है। जो मनुष्य प्राणीमात्र के अंतःकरण में ईश्वर का निवास मानकर भक्ति करता है वही सबसे प्रेम भाव रख सकता है, और उसी से दूसरों का दुःख नहीं देखा जाता। दूसरों के दुःख को देखकर उसको अपने अंतर में दुःख का असर होता है, जिससे तत्काल हृदय द्रवीभूत होकर अपने अंतर के दुःख की निवृत्ति के लिये दुःखी प्राणी की सहायता करने के लिये तत्पर होता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मनस्वी लोक सेवक चाहिए (भाग 3)

🔵 बुद्ध धर्म के शून्यवाद ने जब वैदिक परम्पराओं को ग्रस लिया था तब साँस्कृतिक दुर्दशा पर महल के झरोखे में बैठी आँसू बहाती हुई राजकुमारी की आँखों का पानी सड़क पर चलते हुए कुमारिल भट्ट के ऊपर पड़ा। उसने ऊपर आँख उठा कर देखा और कारण पूछा तो राजकुमारी ने कहा-को वेदान् उद्धरस्यसि? अर्थात् वेदों का उद्धार कौन करेगा? कुमारिल का पौरुष इस चुनौती को स्वीकार करने के लिए तैयार हो गया। उसने कहा कि मैं करूंगा? और सचमुच उस कर्मठ युवक ने वैदिक सभ्यता की रक्षा के लिए वह सब कुछ कर दिखाया जो कोई निष्ठावान व्यक्ति कर सकता है। आज विवाहों के अपव्यय ने भारतीय संस्कृति को उस घृणित एवं मरणोन्मुख परिस्थितियों में ला पटका है जिसमें कुछ दिन वह और पड़ी रही तो उसे अपनी मौत आप मर जाने के लिए ही विवश होना पड़ेगा। कुमारिल भट्ट की इस कुसमय की घड़ी में जितनी आवश्यकता है उतनी पहले कभी नहीं रही।

🔴 यज्ञों के नाम पर होने वाली पशु हिंसा के नाम पर चारों ओर व्याप्त नृशंसता का उन्मूलन करने के लिए गौतम बुद्ध की आत्मा विद्रोह कर उठी थी, उनने तप करके जो शक्ति प्राप्त की, उसे समाज की तत्कालीन प्रवृत्तियों को बदलने में लगा दिया। आज यज्ञों के नाम पर होने वाली पशु हिंसा से बढ़ कर विवाहों के नाम पर होने वाले अपव्यय की क्रूर बलिवेदी लाखों कन्याओं के रक्त स्नान से अभिषिक्त होती रहती है। इस नृशंसता का उन्मूलन करने के लिए सहस्रों युद्धों की आवश्यकता अनुभव की जा रही है पर सब ओर सन्नाटा देख कर ‘वीर विहीन मही’ होने की आशंका दिखाई पड़ने लगती है और भारतीय गौरव का मस्तक लज्जा से नीचा झुक जाता है।

🔵 युग-निर्माण के उपयुक्त अभिनव समाज रचना का महान अभियान आरम्भ करते हुए सबसे प्रथम यही आवश्यकता अनुभव की जा रही है कि प्रत्येक जाति में ऐसे तेजस्वी युवक निकलें जो संगठन की प्रारम्भिक भूमिका का ढाँचा खड़ा करने में अपना समय लगावें और साहसपूर्वक कुछ काम कर गुजरने की लगन लेकर आगे बढ़ें। इसके लिए घर छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। आजीविका कमाते हुए, बच्चों का पालन करते हुए भी कोई व्यक्ति थोड़ा समय पारमार्थिक कामों में लगाता रहे तो उतने में भी सामाजिक क्रान्ति का उद्देश्य बहुत हद तक पूरा हो सकता है। पूरा समय दे सकने वाले प्रतिभाशाली लोग वानप्रस्थों की तरह देश धर्म, समाज और संस्कृति की सेवा के लिए मिल सकें तब तो कहना ही क्या है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च1964 पृष्ठ 51-52

👉 आज का सद्चिंतन 26 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 Aug 2017


शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 52)

🌹  संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुण्य-प्रसार के लिए, अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहेंगे।

🔴 परमार्थ परायण जीवन जीना है तो उसके नाम पर कुछ भी करने लगना उचित नहीं। परमार्थ के नाम पर अपनी शक्ति ऐसे कार्यों में लगानी चाहिए जिनमें उसकी सर्वाधिक सार्थकता हो। स्वयं अपने अंदर से लेकर बाहर समाज में सत्प्रवृत्तियाँ पैदा करना, बढ़ाना इस दृष्टि से सबसे अधिक उपयुक्त है। संसार में जितना कुछ सत्कार्य बन पड़ रहा है, उन सबके मूल में सत्प्रवृत्तियाँ ही काम करती हैं। लहलहाती हुई खेती तभी हो सकती है, जब बीज का अस्तित्व मौजूद हो। बीज के बिना पौधा कहाँ से उगेगा? भले या बुरे कार्य अनायास ही नहीं उपज पड़ते, उनके मूल में सद्विचारों और कुविचारों की जड़ जमी होती है।

🔵 समय पाकर बीज जिस प्रकार अंकुरित होता और फलता-फूलता है, उसी प्रकार सत्प्रवृत्तियाँ भी अगणित प्रकार के पुण्य-परमार्थों के रूप में विकसित एवं परिलक्षित होती हैं। जिस शुष्क हृदय में सद्भावनाओं के लिए, सद्विचारों के लिए कोई स्थान नहीं मिला, उसके द्वारा जीवन में कोई श्रेष्ठ कार्य बन पड़े, यह लगभग असंभव ही मानना चाहिए। जिन लोगों ने कोई सत्कर्म किए हैं, आदर्श का अनुकरण किया है, उनमें से प्रत्येक को उससे पूर्व अपनी पाशविक वृत्तियों पर नियंत्रण कर सकने योग्य सद्विचारों का लाभ किसी न किसी प्रकार मिल चुका होता है।

🔴 कुकर्मी और दुर्बुद्धिग्रस्त मनुष्यों के इस घृणित स्थिति में पड़े रहने की जिम्मेदारी उनकी उस भूल पर है, जिसके कारण वे सद्विचारों की आवश्यकता और उपयोगिता को समझने से वंचित रहे, जीवन के इस सर्वोपरि लाभ की उपेक्षा करते रहे, उसे व्यर्थ मानकर उससे बचते और कतराते रहे। मूलतः मनुष्य एक प्रकार का काला कुरूप लोहा मात्र है। सद्विचारों का पारस छूकर ही वह सोना बनता है। एक नगण्य तुच्छ प्राणी को मानवता का महान् गौरव दिला सकने की क्षमता केवल मात्र सद्विचारों में है। जिसे यह सौभाग्य नहीं मिल सका, वह बेचारा क्यों कर अपने जीवन-लक्ष्य को समझ सकेगा और क्यों कर उसके लिए कुछ प्रयत्न-पुरुषार्थ कर सकेगा?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.72

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.13

👉 वीरांगना स्पेशल (स्वयं की सुरक्षा)

👉 महिलाऐं व लड़कियाँ संवेदना रहित इस समाज में स्वयं की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित कर सकती है

1. एक नारी को तब क्या करना चाहिये जब वह देर रात में किसी उँची इमारत की लिफ़्ट में किसी अजनबी के साथ स्वयं को अकेला पाये?

विशेषज्ञ का कहना है: जब आप लिफ़्ट में प्रवेश करें और आपको 13 वीं मंज़िल पर जाना हो, तो अपनी मंज़िल तक के सभी बटनों को दबा दें! कोई भी व्यक्ति उस परिस्थिति में हमला नहीं कर सकता जब लिफ़्ट प्रत्येक मंजिल पर रुकती हो!

2. जब आप घर में अकेली हों और कोई अजनबी आप पर हमला करे तो क्या करें?
तुरन्त रसोईघर की ओर दौड़ जायें

विशेषज्ञ का कहना है: आप स्वयं ही जानती हैं कि रसोई में पिसी मिर्च या हल्दी कहाँ पर उपलब्ध है! और कहाँ पर चक्की व प्लेट रखे हैं! यह सभी आपकी सुरक्षा के औज़ार का कार्य कर सकते हैं! और भी नहीं तो प्लेट व बर्तनों को ज़ोर- जोर से फैंके भले ही टूटे! और चिल्लाना शुरु कर दो! स्मरण रखें कि शोरगुल ऐसे व्यक्तियों का सबसे बड़ा दुश्मन होता है! वह अपने आप को पकड़ा जाना कभी भी पसंद नहीं करेगा!

3. रात में आटो या टैक्सी से सफ़र करते समय!

विशेषज्ञ का कहना है: आटो या टैक्सी में बैठते समय उसका नं० नोट करके अपने पारिवारिक सदस्यों या मित्र को मोबाईल पर उस भाषा में विवरण से तुरन्त सूचित करें जिसको कि ड्राइवर जानता हो! मोबाइल पर यदि कोई बात नहीं हो पा रही हो या उत्तर न भी मिल रहा हो तो भी ऐसा ही प्रदर्शित करें कि आपकी बात हो रही है व गाड़ी का विवरण आपके परिवार/ मित्र को मिल चुका है! . इससे ड्राईवर को आभास होगा कि उसकी गाड़ी का विवरण कोई व्यक्ति जानता है और यदि कोई दुस्साहस किया गया तो वह अविलम्ब पकड़ में आ जायेगा! इस परिस्थिति में वह आपको सुरक्षित स्थिति में आपके घर पहुँचायेगा! जिस व्यक्ति से ख़तरा होने की आशंका थी अब वह आपकी सुरक्षा क्षात्र धान रखेगा!

4. यदि ड्राईवर गाड़ी को उस गली/रास्ते पर मोड़ दे जहाँ जाना न हो और आपको महशूस हो कि आगे ख़तरा हो सकता है - तो क्या करें?

विशेषज्ञ का कहना है कि आप अपने पर्स के हैंडल या अपने दुपट्टा/ चुनरी का प्रयोग उसकी गर्दन पर लपेट कर अपनी तरफ़ पीछे खींचती हैं तो सैकिण्डो में उस व्यक्ति का असहाय व निर्बल हो जायेगा! यदि आपके पास पर्स या दुपट्टा न भी हो तो भी आप न घबरायें! आप उसकी क़मीज़ के काल़र रो पीछे से पकड़ कर खींचेंगी तो शर्ट का जो बटन लगाया हुआा है वह भी वही काम करेगा और  आपको अपने बचाव का मौक़ा मिल जायेगा!

5. यदि रात में कोई आपका पीछा करता है!

विशेषज्ञ का कहना है: किसी अभी नज़दीकी खुली दुकान या घर में घुस कर उन्हें अपनी परेशानी बतायें! यदि रात होने के कारण बन्द हों तो नज़दीक में एटीएम हो तो एटीएम बाक्स में घुस जायें क्योंकि वहाँ पर सीसीटीवी कैमरा सगे होते हैं! पहचान उजागर होने के भय से किसी की भी आप पर वार करने की हिम्मत  नहीं होगी!

आख़िरकार मानसिक रुप से ही जागरुक होना ही आपका आपके पास रहने वाला सबसे बड़ा हथियार सिद्ध होगा!

कृपया समस्त नारी शक्ति जिसका आपको ख़्याल है उन्हें न केवल बतायें बल्कि उन्हें जागरुक भी कीजिए! अपनी नारी शक्ति की सुरक्षा के लिये ऐसा करना! न केवल हम सभी का नैतिक उत्तरदायित्व है बल्कि कर्त्तव्य भी है! 

प्रिय मित्रों इससे समस्त नारी शक्ति -अपनी माताश्री, बहन, पत्नी व महिला मित्रों को अवगत करावें!


आप सभी से विनम्र निवेदन की इस संदेश को महिला शक्ति की जानकारी में अवश्य लायें यह समस्त नारी शक्ति की सुरक्षा के लिये सहायक सिद्ध होगा!

👉 मनस्वी लोक सेवक चाहिए (भाग 2)

🔵 यों कर्मठ व्यक्तियों की हर क्षेत्र में आवश्यकता रहती है पर सामाजिक क्रान्ति के गृह-युद्ध में पग-पग पर मोर्चा जमाये अड़े रहने वाले सैनिकों जैसी क्रान्तिकारी भावनाएं जिनके अन्दर विद्यमान हों ऐसे लोगों का अस्तित्व हो आशा का केन्द्र बन सकता हैं। पिछले दिनों स्वाधीनता संग्राम ही राजनैतिक क्रान्ति हो कर चुकी है। उसमें मातृभूमि के लिये एक से एक बढ़ कर उत्सर्ग करने वाले, अहिंसक एवं हिंसात्मक संघर्ष में भाग लेने वाले अगणित क्रान्तिकारियों का तप त्यागपूर्ण व्यक्तित्व ही सफलता का आधार बना था। ठीक वैसी ही आवश्यकता इस सामाजिक क्रान्ति के लिये भी अभीष्ट होगी।

🔴 एक माता की गोद से बच्चा छूट कर नदी की प्रबल धारा में बहने लगा। माता अपने शिशु की प्राण रक्षा के लिये सहायता को चीत्कार कर रही हैं। ‘होशियार’ लोग मौखिक सहानुभूति तो दिखा रहे थे पर करने को कुछ भी तैयार न थे। उसी समय एक नव-युवक उफनती नदी में अपने प्राण हथेली पर रख कर कूदा और बहते बच्चे को पकड़ कर किनारे पर ले आया। इस युवक का नाम था अब्राहम लिंकन जो अपनी ऐसी ही महानताओं के कारण अमेरिका का प्रेसीडेण्ट हुआ।

🔵 आज विवाहों का अपव्यय एक ऐसी उफनती नदी बना हुआ है जिसमें सारे समाज की बालिकाएं बही चली जा रही हैं और प्रत्येक अभिभावक उनको बचाने के लिए चीत्कार कर रहा है। यह दृश्य हम सब देखते सुनते तो हैं। मौखिक विरोध और दुख भी प्रकट करते हैं पर करने की बारी आती है तो ‘अक्लमन्द’ लोगों की तरह पल्ला झाड़ कर अलग खड़े हो जाते हैं। ऐसे कुसमय ये स्वर्गीय अब्राहम की आत्मा देखती है कि उसके जैसे उदार और साहसी लोगों से भारत की भूमि रहित क्यों हो गई?

🔴 कोई प्राण हथेली पर लेकर नदी में कूदने और इन बच्चियों को बचाने के लिए क्यों तैयार नहीं होता? आत्मा के अमर और शरीर को नश्वर मानने वाले, गीता-पाठी लोगों में से मोह और लोभ को छोड़ कर धर्म के लिए कुछ साहस कर सकने वाले लोग क्यों कहीं दृष्टिगोचर नहीं होते? इसका उत्तर युग की आत्मा हम से माँगती हैं और हम क्लीव, निर्जीव की तरह सिर नीचा किये मुरझाये- से खड़े हैं। इस धिक्कार योग्य स्थिति में पड़ी हुई अपनी पीढ़ी की मनोदशा पर आँसू ही बहाये जा सकते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च1964 पृष्ठ 51
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/March/v1.51

👉 आज का सद्चिंतन 25 Aug 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Aug 2017


गुरुवार, 24 अगस्त 2017

👉 आज का सद्चिंतन 24 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Aug 2017


👉 यश की लालसा :-

🔴 एक बार की बात है, राजा भोज दिन भर की व्यस्तता के बाद गहरी नींद में सोए हुए थे। स्वप्न में उन्हें दिव्य पुरुष के दर्शन हुए। उस दिव्य पुरुष के चारों ओर उजला आभामंडल था। भोज ने बड़ी विनम्रता से उनका परिचय पूछा।

🔵 मन्द - मन्द मुस्कुराते हुए वह बोले, "में सत्य हूँ। मैं तुम्हें तथाकथित उपलब्धियों का वास्तविक रूप दिखाने आया हूँ। चलो मेरे साथ।"

🔴 राजा उत्सुकता और खुशी से उनके साथ चल दिये। भोज खुद को बड़ा धर्मात्मा समझते थे। उन्होंने अपने राज्य में कई मंदिर, धर्मशालाएं , नहरें और कुएं आदि बनवाये थे। उनके मन में इन कामों के लिये अहम भी था।

🔵 दिव्य पुरुष भोज को उनके ही एक शानदार बगीचे में ले गए और बोले, "तुम्हें इस बगीचे का बड़ा अभिमान है न?" फ़िर उन्होंने एक पेड़ को छुआ और देखते हो देखते वह ठूंठ हो गया। वह एक - एक करके सभी सुन्दर फ़लों से लदे वृक्षों को छूते गए और वे सब ठूंठ होते चले गए। इसके बाद वह उन्हें भोज के एक स्वर्णजड़ित मंदिर के पास ले गए। भोज को वह मंदिर अति प्रिय था। दिव्य पुरुष ने जैसे ही उसे छुआ वह लोहे की तरह काला हो गया और खंडहर की तरह गिरता चला गया।

🔴 यह देख कर राजा के तो होश उड़ गए। वे दोनों उन सभी स्थानों पर गए जिन्हें राजा भोज ने चाव से बनवाया था।

🔵 दिव्य पुरुष बोले, "राजन! भ्रम में मत पड़ो। भौतिक वस्तुओं के आधार पर महानता नहीं आंकी जाती। एक ग़रीब आदमी द्वारा पिलाये गए एक लौटे जल की कीमत, उसका पुण्य किसी यशलोलुप धनी की करोड़ों मुद्राओं से कहीं अधिक है। "

🔴 इतना कहकर वह अंतर्ध्यान हो गए। राजा भोज ने स्वप्न पर गम्भीरता से विचार किया और फ़िर ऐसे कामों पर लग गये जिन्हें करते हुए उन्हें यश पाने की लालसा बिल्कुल नहीं रही।

👉 Whatever we have, is it less ?

🔴 A person went to a Mahatma and said, “Life is short. What all activities to do in such duration? You don’t have knowledge in childhood, old age is worse. You don’t get proper sleep and the diseases also bother. In the youth, we have to look after the family then how do we get the real knowledge? When do we do social service? Getting time in this life doesn’t seem happening.” Saying this he gets depressed and starts crying.

🔵 Seeing him, the Mahatma also starts crying. The man asked, “Why are you crying?” The Mahatma said, “Son, what to do, I need food grains to eat. But I don’t have the land to grow grains. I am dying of hunger. One part of God is Maya (illusion). One part of Maya has three qualities. One part of the qualities is the sky. Sky has air and the air has fire. One part of the fire has water. One hundredth of water is earth. Mountains cover half of the earth. Then there are so many rivers and forests here and there. God has not even left a small piece of land for me. Different people have already occupied whatever little land was there. Tell me will I not starve then?”

🔴 The person said to him,”In spite of all this you are alive, right? Then why do you cry?” The Mahatma said instantaneously, “You also have time and this invaluable life then why are you complaining that you don’t have enough time and life is getting spent away. From now on don’t complain about lack of time. At least use whatever you have.”

🔵 It doesn’t suit human being, the prince of God’s kingdom, to complain about lack of resources. The desire of converting one’s incompleteness into the complete is only acceptable and desirable if it pertains to the inner spiritual space. But such a complaint is uncalled for when the external resources are in plenty.

🌹 From Pragya Puran Page 4/17

👉 मनस्वी लोक सेवक चाहिए (भाग 1)

🔵 बड़े कार्यों के लिए बड़ी तैयारी करनी पड़ती है और बड़े साधन जुटाने पड़ते हैं। विवाहों में अपव्यय की कुरीति काफी व्यापक है, उसकी जड़ें काफी गहराई तक घुसी हुई हैं। उन्हें उखाड़ने में काफी खोद-बीन और उखाड़-पछाड़ करनी पड़ेगी। लोग आसानी से उस पुरानी रूढ़ि को छोड़ने का साहस न कर सकेंगे। औचित्य को स्वीकार करते हुए भी सामाजिक दबाव, घर वालों और रिश्तेदारों का विरोध, कंजूस या मूर्ख कहलाने का उपहास आदि अनेकों बाधाएं सामने रहेंगी। फिर उपयुक्त लड़की लड़के खोज निकालना और उनके अभिभावकों का वैसा ही विवेकशील एवं साहसी होना भी तो सरल कार्य नहीं है। इन अड़चनों को पार करने के लिए बहुमुखी योजना बनानी पड़ेगी और उसकी पूरी तैयारी करनी पड़ेगी। उथले कार्यक्रमों से काम न चलेगा।

🔴 सामाजिक क्रान्ति की दिशा में यह एक अत्यन्त ही व्यापक एवं महत्वपूर्ण कदम है। यह मोर्चा फतह हो गया तो अन्य रूढ़ियों का शमन-शोधन सर्वथा सरल हो जायगा। जिस कुरीति से सारा समाज दुखी है और जिसका नाश हर विचारशील व्यक्ति चाहता है उसके लिए आवश्यक वातावरण तो तैयार है पर उखाड़ फेंकने की क्रिया फिर भी काफी कष्ट-साध्य रहेगी। इस कठिन कार्य को करने के लिए उन व्यक्तियों की आवश्यकता है जिनमें शौर्य, साहस, तप, त्याग, लगन और उत्साह की समुचित मात्रा विद्यमान हो। ऐसे लोग आज कमजोर जरूर हैं पर उनका सर्वथा अभाव नहीं है। उपयुक्त सैनिकों की ही इस मोर्चे पर अड़ने के लिये सबसे प्रथम आवश्यकता पड़ेगी। प्रयत्न यह करना होगा कि जिनमें साहस हो वे मानवता की इस पुकार की पूर्ति करने के लिये बढ़ कर आगे आवें। हिन्दू-समाज पर लगे हुए इस भारी कलंक को अपने रक्त से धोने की हिम्मत कर सकें।

🔵 प्रगतिशील जातीय सभाओं का संगठन इन्हीं उत्साही और साहसी, प्रतिभाशाली, लोक-सेवकों के कंधों पर खड़ा किया जा सकेगा। नाम के भूखे, आलसी बातूनी और लम्बे-चौड़े सपने देखने वाले ऐसे अनेक व्यक्ति पाये जाते हैं जो घर बैठे ही तीनों लोकों के सुधारने की कल्पना करते और मन-मोदक खाते रहते हैं। ऐसे लोगों की सद्भावना एवं समर्थन मिले तो उसका भी कुछ उपयोग ही है पर उनसे वह प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता जो समाज की गति-विधियों को लौट पलट कर डालने जैसे महान कार्य को सम्पन्न करने के लिये आवश्यक हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च1964 पृष्ठ 50-51
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/March/v1.50

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

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