सोमवार, 17 जुलाई 2017

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १७

🌹  बोलिए कम, करिए अधिक

🔵  ‘हमारी कोई सुनता नहीं, कहते कहते थक गए पर सुनने वाले कोई सुनते नहीं अर्थात् उन पर कुछ असर ही नहीं होता’- मेरी राय में इसमें सुनने वाले से अधिक दोष कहने वाले का है। कहने वाले करना नहीं चाहते। वे अपनी ओर देखें। आत्म निरीक्षण कार्य की शून्यता की साक्षी दे देगा। वचन की सफलता का सारा दारोमदार कर्मशीलता में है।

🔴 आप चाहे बोले नहीं, थोड़ा ही बोलें पर कार्य में जुट जाइये। आप थोड़े ही दिनों में देखेंगे कि लोग बिना कहे आपकी ओर खिंचे आ रहे हैं। अत: कहिए कम,, करिए अधिक। क्योंकि बोलने का प्रभाव तो क्षणिक होगा और कार्य का प्रभाव स्थाई होता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Lose Not Your Heart Day 17

🌹  Speak Less, Do More
🔵 Many people complain that no one listens to them. They say that their comments go unheeded and their thoughts unappreciated, and that they are tired of being ignored. The fault here lies in the speaker and not the listener. This is a demonstration of ignorance. Such people should first find their own faults by introspection. This will make their terrible lack of knowledge clear.

When you know how to carry out your work and lead by example, your instructions will be followed. Speak little, if at all, but above all involve yourself in your work, and your work will speak for you and call others to follow your example. Therefore speak less, do more: the effect pf speech is fleeting, whereas the effect of your work will be long-lasting.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आत्मचिंतन के क्षण 17 July

🔴 आकांक्षाओं के अनुरूप परिस्थितियाँ उपलब्ध कर लेना हर किसी के लिए संभव नहीं, ऐसे सुयोग तो किसी विरलों को ही मिलते हैं। आकाँक्षाओं पर कोई प्रतिबंध नहीं, एक गरीब आदमी बे रोक टोक राजा बनने के सपने देख सकता है। पर इसके लिए जिस योग्यता, परिस्थिति, एवं साधना सामग्री की जरूरत है उसे जुटा लेना कठिन है, हमारी आकाँक्षाएं बहुधा ऐसी होती हैं जिनका वर्तमान परिस्थितियों से मेल नहीं खाता इसलिए उनका पूरा होना प्रायः बहुत कठिन होता है। ऐसे बुद्धिमान लोग विरले ही होते हैं जो अपनी वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप आकाँक्षाएं करते हैं और उनके पूर्ण होने पर सफलता एवं प्रसन्नता का सुख अनुभव करते हैं।

🔵 दुख और क्लेशों की आग में जलने से बचने की जिन्हें इच्छा है उन्हें पहला काम यह करना चाहिए कि अपनी आकाँक्षाओं को सीमित रखें। अपनी वर्तमान परिस्थिति में प्रसन्न और संतुष्ट रहने की आदत डालें। गीता के अनासक्त कर्मयोग का तात्पर्य वही है कि महत्वाकांक्षायें वस्तुओं की न करके केवल कर्तव्य पालन की करें। यदि मनुष्य किसी वस्तु की आकाँक्षा करता है और उसे प्राप्त भी कर लेता है तो उस प्राप्ति के समय उसे बड़ी प्रसन्नता होती है। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति सर्वांगीण आत्मोन्नति के प्रयत्न कर कर्तव्य पालन करने की आकाँक्षा करे तो उसे सफलता मिलते समय मिलने वाले आनन्द की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती, वरन् जिस क्षण में कर्तव्य पालन आरम्भ करता है उसी समय से आकाँक्षा की पूर्ति आरम्भ हो जाती है और साथ ही सफलता का आनन्द भी मिलता चलता है।

🔴 वही दुःखी है जिसकी तृष्णा विशाल है, जो नित्य नई-नई चीजों, विलास सामग्रियों की कामना किया करता है रुपये की प्राप्ति की दुर्दमनीय इच्छा की पूर्ति के लिए दिन रात कोल्हू के बैल की तरह जुता रहता है। तृष्णा दुःख का मूल है। गरीब वह नहीं है, जिसके पास कम है, बल्कि वह जो अधिक चाहता है। धनवान होते हुए भी जिसकी धनेच्छा दूर नहीं हुई, वह सबसे अधिक अभागा है। वह भी एक प्रकार के नर्क में निवास करता है। जिसने अपनी कामनाओं और वासनाओं का दमन करके मन को जीत लिया है, उसने स्वर्ग पाया है।
                                        
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 लज्जा ही नारी का सच्चा आभूषण है

मगध की सौंदर्य साम्राज्ञी वासवदत्ता उपवन विहार के लिये निकली। आज का साज-शृंगार उस राज-वधू की तरह था जो पहली बार ससुराल जाती हैं।

एकाएक दृष्टि उपवन-ताल के किनारे स्फटिक शिला पर बैठे तरुण संन्यासी उपगुप्त पर गई। दीवारी ने बाह्य सौन्दर्य को अनिर्दिष्ट कर लिया था और उस आनन्द में कुछ ऐसा निमग्न हो गया कि उसे बाह्य जगत् की कोई सुध न रही थी।

हवा में पायल की स्वर झंकृति और सुगन्ध की लहरें पैदा करती वासवदत्ता समीप जा खड़ी हुई। भिक्षु के नेत्र खोले। वासवदत्ता ने चपल-भाव से पूछा-महामहिम बतायेंगे नारी का सर्वश्रेष्ठ आभूषण क्या है?”

“जो उसके सौंदर्य को सहज रूप से बड़ा दे-तपस्वी ने उत्तर दिया।

सहज का क्या अर्थ है? चंचल नेत्रों को उपगुप्त पर डालती वासवदत्ता ने फिर प्रश्न दोहराया।

उपगुप्त ने सौम्य मुस्कान के साथ कहा-देवि आत्मा जिन गुणों को बिना किसी बाह्य इच्छा, आकर्षण, भय, या छल के अभिव्यक्त करे, उसे ही सहज भाव कहते हैं, सौंदर्य को जो बिना किसी कृत्रिम साधन के बढ़ाता हो, नारी का वह भाव ही सच्चा आभूषण है।”

किन्तु वह भी वासवदत्ता समझ न सकी। उसने कहा-मैं स्पष्ट जानना चाहती हूँ, यों पहेलियों में आप मुझे न उलझायें।”

उपगुप्त अब कुछ गम्भीर हो गये और बोले-भद्रे यदि आप और स्पष्ट जानना चाहती हैं तो इन कृत्रिम सौंदर्य परिधान और आभूषणों को उतार फैकिये।”

पैरों की थिरकन के साथ वासव ने एक-एक आभूषण उतार दिये। संन्यासी निर्निमेष वह क्रीड़ा देख रहा था, निश्छल, मौन, विचार-मग्न वासवदत्ता ने अब परिधान उतारने भी प्रारम्भ कर दिये। साड़ी, चुनरी, लहंगा और कंचुकी सब उत्तर गये। शुभ्र निर्वसन देह के अतिरिक्त शरीर पर कोई पट-परिधान शेष नहीं रहा। तपस्वी ने कहा-देवि किंचित् मेरी ओर तो देखिये।” किन्तु इस बार वासवदत्ता लज्जा से आविर्भूत ऊपर को सिर न उठा सकी। तपस्वी ने कहा-देवि यही, लज्जा ही नारी का सच्चा आभूषण है।” और जब तक उसने वस्त्राभूषण पुनः धारण किये, उपगुप्त वहाँ से जा चुके थे।

अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1969 पृष्ठ 7

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👉 भगवान शिव और उनका तत्त्वदर्शन (भाग 3)

🔵 भगवान शंकर का अंतरंग रूप क्या है? उसकी फिलॉसफी क्या है? भगवान शंकर का रूप गोल बना हुआ है। गोल क्या है—ग्लोब। यह सारा विश्व ही तो भगवान् है। अगर विश्व को इस रूप में मानें तो हम उस अध्यात्म के मूल में चले जाएँगे जो भगवान राम और कृष्ण ने अपने भक्तों को दिखाया था। गीता के अनुसार जब अर्जुन मोह में डुबा हुआ था, तब भगवान ने अपना विराट् रूप दिखाया और कहा—यह सारा विश्व-ब्रह्माण्ड जो कुछ भी है, मेरा ही रूप है। एक दिन यशोदा कृष्ण को धमका रही थी कि तैने मिट्टी खाई है। वे बोले—नहीं, मैंने मिट्टी नहीं खाई और उन्होंने मुँह खोलकर सारा विश्व-ब्रह्माण्ड दिखाया और कहा—यह मेरा असली रूप है।

🔴 भगवान राम ने भी यही कहा था। रामायण में वर्णन आता है कि माता-कौशल्या और काकभुशुण्डि जी को उन्होंने अपना विराट् रूप दिखाया था। इसका मतलब यह है कि हमें सारे विश्व को भगवान की विभूति, भगवान का स्वरूप मानकर चलना चाहिए। शंकर की गोल पिंडी उसी का छोटा-सा स्वरूप है जो बताता है कि यह विश्व-ब्रह्माण्ड गोल है, एटम गोल है, धरती माता-विश्वमाता गोल है। इसको हम भगवान का स्वरूप मानें और विश्व के साथ वह व्यवहार करें जो हम अपने लिए चाहते हैं दूसरों से, तो मजा आ जाए। फिर हमारी शक्ति, हमारा ज्ञान, हमारी क्षमता वह हो जाए जो शंकर भक्तों की होनी चाहिए।

🔵 भगवान शंकर के स्वरूप का कैसा-कैसा सुन्दर चित्रण मिलता है? शिवजी की जटाओं में से गंगा प्रवाहित हो रही है। गंगा का मतलब है—ज्ञान की गंगा। पानी बालों में से प्रवाहित नहीं होता, यदि होगा तो आदमी डूब जाएगा, पैदल नहीं चल सकेगा। इसका मतलब यह है कि शंकर-भक्त के मस्तिष्क में से ज्ञान की गंगा प्रवाहित होनी चाहिए, उसकी विचारधारा उच्चकोटि की और उच्चस्तरीय होनी चाहिए। घटिया किस्म के आदमी जिस तरीके से विचार करते हैं, जिनकी जिंदगी का मकसद केवल एक ही है कि किसी तरीके से पेट भरना चाहिए और औलाद पैदा करनी चाहिए, शंकर जी के भक्त को उस तरह के विचार करने वाला नहीं होना चाहिए।

🔴 जो कोई ऊँची बात सोच नहीं सकते, देश की, समाज की, धर्म की, लोक-परलोक की बात, कर्तव्य-फर्ज की बात जिनकी समझ में नहीं आती, उनको इनसान नहीं हैवान कहेंगे और ज्ञान की गंगा जिन लोगों के मस्तिष्क में से प्रवाहित होती है, उनका नाम शंकर का भक्त होता है। हमारे और आपके मस्तिष्क में से भी ज्ञान की गंगा बहनी चाहिए, जो हमारी आत्मा को शांति और शीतलता दे सकती है और पड़ोस के लोगों को, समीपवर्ती लोगों को उसमें स्नान कराकर पवित्र बना सकती है। यदि हमारा मस्तिष्क ऐसा व्यवहार करता हो तो जानना चाहिए कि शंकर जी की छवि आपने घरों में टाँग रखी है, उसके मतलब को, उसकी फिलॉसफी को जान लिया और समझ लिया है।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 30)

🌹  समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविच्छिन्न अंग मानेंगे।

🔴 सुसंस्कारिता के लिए चार आधारों को प्रमुख माना गया है— (1) समझदारी, (२) ईमानदारी, (३) जिम्मेदारी, (४) बहादुरी। इन्हें आध्यात्मिक- आंतरिक वरिष्ठता की दृष्टि में उतना ही महत्त्वपूर्ण माना जाना चाहिए जितना कि शरीर के लिए अन्न, जल, वस्त्र और निवास को अनिवार्य समझा जाता है।

🔵 समझदारी का तात्पर्य है- दूरदर्शी विवेकशीलता का अपनाया जाना। आमतौर से लोग तात्कालिक लाभ को ही सब कुछ मानते हैं और उसके लिए अनाचार भी अपना लेते हैं। इससे भविष्य अंधकारमय बनता है और व्यक्तित्व का स्तर एक प्रकार से हेय ही बन जाता है। अदूरदर्शिता तुर्त- फुर्त अधिक सुविधा सम्पादन के लिए लालायित रहती है और इस उतावली में ऐसे काम करने में भी नहीं झिझकती, जिनकी भावी परिणति बुरे किस्म की हो सकती है। मूर्ख चिड़ियाँ और मछलियाँ इसी दुर्बुद्धि के कारण तनिक से प्रलोभन में अपनी जिंदगी देती देखी गई हैं।

🔴 चटोरे व्यक्ति इसी ललक में अपनी स्वास्थ्य संपदा को तहस- नहस कर लेते हैं। यौनाचार में अतिवाद बरतने वाले लोग, जवानी में ही बूढ़े खोखले होकर अकाल मृत्यु के मुँह में चले जाते हैं। अपराधी तत्त्वों में से अधिकांश लोग इसी मनोवृत्ति के होते हैं। पढ़ने का समय आवारागर्दी में गुजार देने वाले व्यक्ति जवानी में ही दर- दर की ठोकरें खाते हैं। नशेबाजी भी इसी मूर्खता को अपना कर धीमी आत्म हत्या करने में बेधड़क लगे रहते हैं। ऐसी नासमझी के रहते आज का, अभी का लाभ ही सब कुछ दीख पड़ता है और भविष्य की संभावनाओं की संदर्भ में सोचने तक की फुर्सत नहीं मिलती।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 125)

🌹  चौथा और अंतिम निर्देशन

🔵 चौथी बार गत वर्ष पुनः हमें एक सप्ताह के लिए हिमालय बुलाया गया। सन्देश पूर्ववत् सन्देश रूप में आया। आज्ञा के परिपालन में विलम्ब कहाँ होना था। हमारा शरीर सौंपे हुए कार्यक्रमों में खटता रहा है, किन्तु मन सदैव दुर्गम हिमालय में अपने गुरु के पास रहा है। कहने में संकोच होता है, पर प्रतीत ऐसा ही होता है कि गुरुदेव का शरीर हिमालय में रहता है और मन हमारे इर्द-गिर्द मँडराता रहता है। उनकी वाणी अन्तराल में प्रेरणा बनकर गूँजती रहती है। उसी चाबी के कसे जाने पर हृदय और मस्तिष्क का पेण्डुलम धड़कता और उछलता रहता है।

🔴 यात्रा पहली तीनों बार की ही तरह कठिन रही। इस बार साधक की परिपक्वता के कारण सूक्ष्म शरीर को आने का निर्देश मिला था। उसी काया को एक साथ तीन परीक्षाओं को पुनः देना था। साधना क्षेत्र में एक बार उत्तीर्ण हो जाने पर पिसे को पीसना भर रह जाता है। मार्ग देखा भाला था। दिनचर्या बनी बनाई थी। गोमुख से साथ मिल जाना और तपोवन तक सहज जा पहुँचना यही क्रम पुनः चला। उनका सूक्ष्म शरीर कहाँ रहता है, क्या करता है यह हमने कभी नहीं पूछा। हमें तो भेंट का स्थान मालूम है, मखमली गलीचा। ब्रह्मकमल की पहचान हो गई थी। उसी को ढूँढ़ लेते और उसी को प्रथम मिलन पर गुरुदेव के चरणों पर चढ़ा देते।

🔵 अभिवन्दन-आशीर्वाद के शिष्टाचार में तनिक भी देर न लगती और काम की बात तुरन्त आरम्भ हो जाती। यही प्रकरण इस बार भी दुहराया गया। रास्ते में मन सोचता आया कि जब भी जितनी बार भी बुलाया गया है तभी पुराना स्थान छोड़कर अन्यत्र छोड़कर अन्यत्र जाना पड़ा है। इस बार भी सम्भवतः वैसा ही होगा। शान्तिकुञ्ज छोड़ने के उपरान्त सम्भवतः अब इसी ऋषि प्रदेश में आने का आदेश मिलेगा और इस बार कोई काम पिछले अन्य कामों की तुलना में बड़े कदम के रूप में उठाना होगा। रास्ते के संकल्प विकल्प थे। अब तो प्रत्यक्ष भेंट हो रही थी।
  
🔴 अब तक के कार्यों पर उनने अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। हमने इतना ही कहा-‘‘काम आप करते हैं और श्रेय मुझ वानर जैसे को देते हैं। समग्र समर्पण कर देने के उपरान्त यह शरीर और मन दीखने भर के लिए ही अलग हैं, वस्तुतः यह सब कुछ आपकी ही सम्पदा है। जब जैसा चाहते हैं, तब वैसा तोड़-मोड़कर आप ही उपयोग कर लेते हैं।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.19

रविवार, 16 जुलाई 2017

👉 आज का सद्चिंतन 17 July 2017


👉 मुठ्ठी खोलो बंधन मुक्त हो जाओ:-

🔴 एक बार एक संत अपनी कुटिया में शांत बैठे थे, तभी उन्हें कुछ शोर सुनाई दिया जा कर देखा तो एक बंदर ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा था. उसका एक हाथ एक घड़े के अंदर था और वह बंदर अपना हाथ छुड़ाने के लिए चिल्ला रहा था।

🔵 संत को देख वह बंदर संत से आग्रह करने लगा के महाराज कृपया कर के मुझे इस बंधन से मुक्त करवाए संत ने बंदर को कहा के तुमने घड़े के अंदर हाथ डाला तो वह आसानी से उसमे चला गया....

🔴 परन्तु अब इसलिए बाहर नहीं निकल रहा है क्यूंकी तुमने अपने हाथ में लड्डू पकड़ा हुआ है जो की उस घड़े के अंदर है, अगर तुम वह लड्डू हाथ से छोड़ दो तो तुम आसानी से मुक्त हो सकते हो।

🔵 बंदर ने कहा के महाराज, लड्डू तो मैं नहीं छोड़ने वाला, अब आप मुझे बिना लड्डू छोड़े ही मुक्त होने की कोई युक्ति सुझाए।

🔴 संत मुस्कुराए और कहा के या तो लड्डू छोड़ दो अन्यथा तुम कभी भी मुक्त नही हो सकते।

🔵 हज़ार कोशिशों के बाद बंदर को इस बात का एहसास हुआ कि बिना लड्डू छोड़े मेरा हाथ इस घड़े से बाहर नही निकल सकता और मैं मुक्त नही हो सकता।

🔴 आख़िरकार बंदर ने वो लड्डू छोड़ा और सहजता से ही उस घड़े से मुक्त हो गया।

🔵 यह कहानी सिर्फ़ उस बंदर की ही नहीं बल्कि आज के हर उस इंसान की है जो की उस घड़े में (संसार में) फँसा बैठा है।

🔴 लड्डू (संसारिक वस्तुओं) को छोड़ना भी नहीं चाहता और उस घड़े (84 के फेरे से) से मुक्त भी होना चाहता है।

🔵 संत (सदगुरु) ने समझानें का कार्य कर दिया...... अब किसे कब समझ आए और वह कब मुक्त होगा यह उसकी समझ है।

👉 आपत्कालीन धर्म

 🔴 श्रावस्ती में भयंकर अकाल पड़ा। निर्धन लोग भूख मरने लगे। भगवान् बुद्ध ने संपन्न लोगों को बुलाकर कहा- भूख से पीड़ितों को बचाने के लिए कुछ उपाय करना चाहिये। संपन्न व्यक्तियों की कमी नहीं थी, पर कोई कह रहा था- मुझे तो घाटा हो गया, फसल पैदा ही नहीं हुई आदि।

🔵 उस समय सुप्रिया नामक लड़की खड़ी हुई और बोली- मैं दूँगी, सबको अन्न। लोगों ने कहा- लड़की तू! तू तो भीख माँगकर खाती है, दूसरों को क्या खिलाएगी? सुप्रिया ने कहा- हाँ मैं आज से इन पीड़ितों के लिए घर- घर जाकर भीख माँगकर लाऊँगी, पर किसी को मरने नहीं दूँगी। उसकी बात सुनकर दर्शक स्तब्ध रह गए और सबने उसे धन एवं अन्न देना प्रारंभ कर दिया।

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १६

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १६
🌹  सुख- दु:खों के ऊपर स्वामित्व

🔵 तुम सुख, दु:ख की अधीनता छोड़ उनके ऊपर अपना स्वामित्व स्थापन करो और उसमें जो कुछ उत्तम मिले उसे लेकर अपने जीवन को नित्य नया रसयुक्त बनाओ। जीवन को उन्नत करना ही मनुष्य का कर्तव्य है इसलिए तुम भी उचित समझो सो मार्ग ग्रहण कर इस कर्तव्य को सिद्ध करो। 

🔴 प्रतिकूलताओं से डरोगे नहीं और अनुकूलता ही केा सर्वस्व मान कर बैठे रहोगे तो सब कुछ कर सकोगे। जो मिले उसी से शिक्षा ग्रहण कर जीवन को उच्च बनाओ। यह जीवन ज्यों- ज्यों उच्च बनेगा त्यों- त्यों आज जो तुम्हें प्रतिकूल प्रतीत होता है वह सब अनुकूल दिखने लगेगा और अनुकूलता आ जाने पर दु:ख मात्र की निवृत्ति हो जावेगी।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://awgpskj.blogspot.in/2017/07/blog-post_31.html


👉 Lose Not Your Heart Day 16
🌹  Control over Happiness and Unhappiness

🔵 Instead of being controlled by happiness and unhappiness, establish your mastery over them. This will render your life more interesting and meaningful. It is every person's responsibility to uplift himself and better his life, and you should fully involve yourself in this task.

🔴 You can achieve a great deal if you take full advantage of favorable circumstances, and are not afraid of adverse ones. Learn from every circumstance and move forward. As you progress, whatever seemed adverse will seem favorable, and then when that time comes you will be free from your sadness.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya
http://awgpskj.blogspot.in/2017/07/lose-not-your-heart-day-16.html

👉 Lose Not Your Heart Day 16

🌹  Control over Happiness and Unhappiness

🔵 Instead of being controlled by happiness and unhappiness, establish your mastery over them. This will render your life more interesting and meaningful. It is every person's responsibility to uplift himself and better his life, and you should fully involve yourself in this task.

🔴 You can achieve a great deal if you take full advantage of favorable circumstances, and are not afraid of adverse ones. Learn from every circumstance and move forward. As you progress, whatever seemed adverse will seem favorable, and then when that time comes you will be free from your sadness.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १६

🌹  सुख- दु:खों के ऊपर स्वामित्व

🔵 तुम सुख, दु:ख की अधीनता छोड़ उनके ऊपर अपना स्वामित्व स्थापन करो और उसमें जो कुछ उत्तम मिले उसे लेकर अपने जीवन को नित्य नया रसयुक्त बनाओ। जीवन को उन्नत करना ही मनुष्य का कर्तव्य है इसलिए तुम भी उचित समझो सो मार्ग ग्रहण कर इस कर्तव्य को सिद्ध करो। 

🔴 प्रतिकूलताओं से डरोगे नहीं और अनुकूलता ही केा सर्वस्व मान कर बैठे रहोगे तो सब कुछ कर सकोगे। जो मिले उसी से शिक्षा ग्रहण कर जीवन को उच्च बनाओ। यह जीवन ज्यों- ज्यों उच्च बनेगा त्यों- त्यों आज जो तुम्हें प्रतिकूल प्रतीत होता है वह सब अनुकूल दिखने लगेगा और अनुकूलता आ जाने पर दु:ख मात्र की निवृत्ति हो जावेगी।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 15 जुलाई 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 July

🔴 इच्छा और आवश्यकता में यथेष्ट अन्तर है, यद्यपि अनेक व्यक्ति एक ही अर्थ में इनका प्रयोग करते हैं। इच्छा का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है। हम नाना प्रकार की वस्तुएं देखते हैं और लुभा कर उनकी इच्छा करने लगते हैं। ऐसी ही एक इच्छा हमारी आवश्यकता भी है। आवश्यकता केवल ऐसी इच्छा है जिसके बिना हम रह नहीं सकते, जिसके लिए हमारे पास पर्याप्त साधन हैं और जिसे प्राप्त करने से हमारी तृप्ति हो सकती है। कुछ आवश्यकताएं रुपये पैसे से, और कुछ उसके बिना भी पूर्ण हो सकती हैं। अनेक बार रुपये पैसे की कमी श्रम द्वारा पूर्ण हो जाती है।

🔵 महंगाई से बचने का एक उपाय है। आप अपनी आवश्यकताओं का अध्ययन करें। जो आराम, विलास, या फैशन की वस्तुएं हैं, उन्हें तुरन्त त्याग दें। अनावश्यक टीपटाप, दिखावा, सौंदर्य प्रतियोगिता, मिथ्या आडंबर, टायलेट का सामान, मादक द्रव्यों का सेवन छोड़ दें। नौकर छुड़ा दें और स्वयं उनका कार्य करें। अपने छोटे मोटे कार्य-कमरे की सफाई, जूता पालिश, साधारण कपड़े धोना, बाजार से सब्जी लाना, बच्चों या पत्नी को पढ़ाना, अपनी गाय भैंस की देख रेख-स्वयं कर लिया करें।

🔴 आवश्यकताओं को मर्यादा से बढ़ा देने का नाम अतृप्ति और दुःख है उन्हें कम कर पूर्ति करने से सुख और सन्तोष प्राप्त होता है। मनुष्य एक ही प्रकार के सुख से तृप्त नहीं रहता। अतः असंतोष सदैव बना रहता है। वह असंतोष निंदनीय है जिसमें किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए मनुष्य दिन रात हाय-हाय करता रहे और न पाने पर असंतुष्ट, अतृप्त, और दुःखी रहे। तृष्णाएं एक के पश्चात् दूसरी बढ़ेगी। एक आवश्यकता की पूर्ति होगी, तो दो नई आवश्यकताएं आकर उपस्थित हो जायेंगी। अतः विवेकशील पुरुष को अपनी आवश्यकताओं पर कड़ा नियंत्रण रखना चाहिए। इस प्रकार आवश्यकताओं को मर्यादा के भीतर बाँधने के लिए एक विशेष शक्ति-मनोनिग्रह की जरूरत है।
                                        
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 नारी का उत्तरदायित्व (अंतिम भाग)

🔴 नई सभ्यता के संस्पर्श से दिनों दिन नारी जाति अपने मूल कर्त्तव्य गृहस्थ-जीवन की जिम्मेदारियों और कार्यों में अरुचि अनुभव करने लगी हैं। घर का काम एक बला और बोझ-सा लगता है। जिन कामों को उन्हें स्वयं करना चाहिए, उनको नौकरों या पतियों से कराना चाहती हैं। इससे वह पुरुष की सहयोगिनी न होकर भार रूप बनती जा रही है। इससे पति-पत्नी के सम्बन्ध में भी खटास पैदा होने लगती है। आजकल ऐसे भाग्यशाली दंपत्ति बहुत ही कम हैं जिनका जीवन सब तरह से शान्त, सुखी और सन्तुष्ट माना जा सके।

🔵 उन परिवारों में पति-पत्नी के बीच का संघर्ष और भी तेज होता है, जहाँ नारियाँ बाहर कमाने जाती हैं। इससे घर के काम ठीक-ठीक नहीं हो पाते। बच्चों का शिक्षण और निर्माण भी भली प्रकार नहीं हो पाता। स्त्री पुरुष दोनों ही अपने-अपने काम से थके माँदे रहते हैं। परस्पर दाम्पत्य जीवन की तृप्ति, सुख, सन्तोष वहाँ नहीं रहता जहाँ नारी को आर्थिक स्रोतों का भी साधन बनना पड़ता है। वस्तुतः नारी का कार्य-क्षेत्र घर है। वह घर की रानी है। घर की सुव्यवस्था, सफाई, भोजन, पानी का सुप्रबन्ध, घर के कामों की पूर्णता आदि नाम के कार्य हैं। घर का स्वर्ग बनाने का काम नाम का है। इसी काम को नारियाँ भली-भाँति कर सकती हैं, यह उनकी प्राकृतिक और स्वाभाविक जिम्मेदारी है।

🔴 नारी का व्यवहार, स्वभाव, बोलचाल का संयत मधुर और शिष्ट होना आवश्यक है क्योंकि अनेकों परिवार अनेकों व्यक्तियों की संगम है। नारी के माध्यम से कई परिवार एक सम्बन्ध सूत्र में बँधते हैं। अतः नारी के व्यवहार की तनिक सी गड़बड़ी, इधर की उधर लगाने, एक घर की बात दूसरे घर में कहने की आदत से परिवारों के सम्बन्ध कटु और खराब हो जाते हैं। इसी तरह परिवार तथा बाहर के अनेकों व्यक्ति शरीर के सम्बन्ध में आते है। सास, ससुर, पति रिश्तेदार, पड़ौसी आदि भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को तृप्त और सन्तुष्ट रखना नारी का ही महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व है।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1963 पृष्ठ 38
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1963/July/v1.38

👉 भगवान शिव और उनका तत्त्वदर्शन (भाग 2)

🔵 अठारह पुराणों का अनुवाद मैंने संस्कृत से हिन्दी में किया है। उसमें से शिवपुराण की एक कथा मुझे याद आई, जिसने हमारी शंका का समाधान कर दिया कि भगवान शंकर सहायता क्यों नहीं करते हमारी? क्यों नहीं उनकी शक्ति का लाभ मिलता? क्यों उनके चमत्कार हमें दिखाई नहीं पड़ते? जबकि शंकर भगवान के भक्त जिन्होंने क्या से क्या अनुदान प्राप्त किए हैं, जो भी तप करने के लिए खड़ा हो गया वह न जाने क्या से क्या प्राप्त करता चला गया?

🔴 हम और आप जैसे शिव-उपासक उस शक्ति को प्राप्त न कर सकते हों सो ऐसी बात नहीं, पर कहीं न नहीं चूक रह जाती है, कहीं न कहीं भूल रह जाती है। उस भूल को हमें निकालना ही पड़ेगा और निकालना ही चाहिए। इसके बिना अध्यात्म का पूरा लाभ नहीं मिल सकेगा और दुनिया के सामने हम सिर ऊँचा उठा कर यह नहीं कह सकेंगे कि हम ऐसी शक्ति के उपासक हैं जो अपनी उँगली के इशारे से सारी दुनिया को हिला सकती है तो गलती और चूक कहाँ हो गई? चूक और गलती वहाँ हो गई जहाँ भगवान शिव और पार्वती का असली स्वरूप हमको समझ में नहीं आया। उसके पीछे जो फिलॉसफी है वह समझ में नहीं आई, मात्र उसका बाहरी स्वरूप समझ में आ गया।

🔵 भगवान शंकर का भी एक कलेवर है और एक प्राण, एक बहिरंग स्वरूप है और एक अंतरंग स्वरूप। जब हम दोनों को मिला देंगे तब पॉजिटिव और निगेटिव दोनों तारों को मिलाकर जिस तरीके से स्पार्क उठते हैं और करेंट चालू हो जाता है, उसी प्रकार से भगवान का करेंट चालू हो जाएगा। बहिरंग रूप के बारे में आप जानते हैं और जिस तक आप सीमित हो गए हैं, वह कलेवर है जो मंदिर में बैठा हुआ है। जिसके चरणों में हम मस्तक झुकाते हैं, जल चढ़ाते हैं, पूजा करते हैं, प्रार्थना करते हैं, आरती उतारते हैं और जय-जयकार करते हैं—वह बहिरंग कलेवर है जिसकी भी सख्त जरूरत है, परन्तु यही सब कुछ नहीं है। हमें अंतरंग रूप के बारे में भी जानना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 29)

🌹  मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।

🔴 भाषण करना है तो हमें ठीक समय पर पहुँचना और नियमित समय में ही पूरा करना चाहिए। समय का ध्यान न रखना, सुनने वालों के साथ बेइन्साफी है। दावत जिस समय की रखी है, उसी समय आरंभ कर देनी चाहिए। मेहमानों को घंटों प्रतीक्षा में बिठाए रहना, एक प्रकार से उनका समय बर्बाद करना है। जिसे धन की बर्बादी के समान ही हानिकारक समझा जाना चाहिए।

🔵 वस्तु का मूल्य और स्वरूप जो बताया गया है वही वस्तुतः होना चाहिए। असली में नकली की मिलावट कर देना, दामों में घिसा-पिटी करके कमीवेशी करना, व्यापार करने वालों के लिए सर्वथा अशोभनीय है। घिस-घिस कर कमी करना लिए सर्वथा अशोभनीय है। घिस-घिस कर कमी करना अपनी विश्वसनीयता तथा प्रामाणिकता पर कलंक लगाना है। असली और नकली वस्तुएँ अलग-अलग बेची जाएँ और उनके दाम वैसे ही महँगे, सस्ते स्पष्ट किए जाएँ तो व्यापारी की साख बढ़ेगी और ग्राहकों का समय बचेगा तथा संतोष होगा। ईमानदारी घाटे का सौदा नहीं है। वह प्रामाणिकता एवं विश्वसनीयता की परीक्षा भर चाहती है। इस कसौटी पर सही होना हर व्यवसायी का नागरिक कर्तव्य है। यह कर्तव्य पालन व्यक्ति का सम्मान भी बढ़ाता है और व्यवसाय भी।

🔴 दूसरों की असुविधा को ध्यान में रखते हुए अपनी सुविधा को सीमाबद्ध रखना, शिष्टता और सभ्यता भरा मधुर व्यवहार करना, मीठे वचन बोलना, वचन का पालन करना, प्रामाणिकता और विश्वस्तता की रीति-नीति अपनाना, समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को हम में से प्रत्येक को सीखना और पूरा करना ही चाहिए। चाहिए ताकि समाज में शिष्ट नागरिकों की तरह हम ठीक तरह से जी सकें और दूसरों को जीने दे सकें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.41

👉 Lose Not Your Heart Day 15

🌹  Forget Painful Memories

🔵 When you find yourself recalling painful memories, the best thing to do is forget and ignore them. The way to preserve your emotional stability is to replace your unpleasant memories with pleasant ones. If you wish to keep your physical, mental, and emotional health, then learn to remove unhealthy memories in this way.

🔴 Even if someone close to you has caused you grief, will you keep obsessing over your pain? Lose yourself in purposeful work and forget these painful experiences. The best way to free yourself from worry is to forget your misery.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १५

🌹  दुःखद स्मृतियों को भूलो  
🔵 जब मन में पुरानी दु:खद स्मृतियाँ सजग हों तो उन्हें भूला देने में ही श्रेष्टता है। अप्रिय बातों को भुलाना आवश्यक है। भुलाना उतना ही जरूरी है जितना अच्छी बात का स्मरण करना। यदि तुम शरीर से,, मन से और आचरण से स्वस्थ होना चाहते हो तो अस्वस्थता की सारी बातें भूल जाओ।

🔴 माना कि किसी ‘अपने ’ ने ही तुम्हें चोट पहुँचाई है,, तुम्हारा दिल दुखाया है, तो क्या तुम उसे लेकर मानसिक उधेड़बुन में लगे रहोगे। अरे भाई! उन कष्टकारक अप्रिय प्रसंगों को भूला दो, उधर ध्यान न देकर अच्छे शुभ कर्मों से मन को केंद्रीभूत कर दो।

चिंता से मुक्ति पाने का सर्वोत्तम उपाय दु:खों को भूलना ही है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 15 July 2017


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

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