शुक्रवार, 20 दिसंबर 2019

👉 प्रवाह में न बहें, उत्कृष्टता से जुड़े (भाग ४)

स्वाध्याय की जोड़ी सत्संग से मिलती है। इसे नियमित रूप से जारी रखने के लिये मनन और चिन्तन को भी अपनी दैनिक क्रम व्यवस्था में सम्मिलित करना चाहिए। जीवन की विभिन्न समस्याओं को सुलझाने के लिये अपनी मान्यता और चेष्टा क्या है इसका गम्भीरता पूर्वक विश्लेषण करते रहना चाहिये और भूलों को सुधारने तक तथा प्रगति में प्रोत्साहित करने के लिये इसी चिन्तन में भविष्य की रूप रेखा निर्धारित करते रहना चाहिये। प्रस्तुत समस्याओं का क्रमशः समग्र चिन्तन और उनके आदर्शवादी समाधानों का निष्कर्ष यही मनन चिन्तन का मूलभूत प्रयोजन है। सत्संग की दैनिक आवश्यकता को यह क्रम अपनाकर पूरा किया जा सकता है।

मनन और चिन्तन का क्रम प्रातःकाल आँख खुलते ही और रात को सोने के लिये बिस्तर पर जाते ही आरम्भ किया जाना चाहिये। आँख खुलने और बिस्तर छोड़ने के बीच प्रातःकाल कुछ तो समय रहता है। आँख खुलते ही कोई तुरन्त नहीं उठ बैठता। कुछ समय ऐसे ही सब लोग पड़े रहते हैं। इस समय को मनन में लगाना चाहिये। अपने आपसे अपने और अपने शरीर के बीच का अन्तर, अपना स्वरूप, जीवन का उद्देश्य, परमेश्वर की मनुष्य से आकांक्षा, इस सुर दुर्लभ मनुष्य जन्म का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की बात पर प्रत्येक पहलू से विचार किया जाना चाहिये और समीक्षा की जानी चाहिये कि अपनी वर्तमान गतिविधियाँ आदर्श जीवन पद्धति से तालमेल खाती हैं या नहीं? यदि अन्तर है तो वह कहाँ है कितना है? इस अन्तर को दूर रखने के लिये जो किया जाना चाहिए वह किया जा रहा है या नहीं? यदि नहीं तो क्यों?

यह प्रश्न ऐसे है जिन्हें अपने आप से गम्भीरता पूर्वक पूछा जाना चाहिए और जहाँ सुधार की आवश्यकता हो उसके लिए क्या कदम किस प्रकार उठाया जाय, इसका निर्णय करना चाहिए। छोटे व्यापारी कारखानेदार प्रायः बराबर अपने कारीगर में रह रही खामी और प्रगति के लिए क्या किया जाना चाहिये, इन पर विचार करते हैं। फिर जीवन व्यवसाय जिसकी तुलना संसार की और किसी उपलब्धि के साथ नहीं की जा सकती, उसे अँधेरे में क्यों रखा जाय? उसके सम्बन्ध में स्पष्ट रूपरेखा क्यों न बने?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 श्रद्धा, सिद्धान्तों के प्रति हो (भाग ३)

यह नहीं करेंगे तो क्या हो जाएगा? यदि आपकी श्रद्धा कायम रही तो फिर एक नई चीज पैदा होगी। तो उसमें से अंकुर जरूर पैदा होगा। फिर क्या पैदा होगा—आपको काम करने की लगन पैदा होगी। काम करने की ऐसी लगन कि आपने जो काम शुरू किया है उसको पूरा करने के लिए कितने मजबूत कदम उठाए जाएँ, कितने तेज कदम उठाए जाएँ, यह आपसे करते ही बनेगा। आप फिर यह नहीं कहेंगे कि हमने छह घण्टे काम कर लिया, चार घण्टे काम कर लिया। यहाँ बैठे हैं, वहाँ बैठे हैं। ओवरटाइम लाइए और ज्यादा काम हम क्यों करेंगे? नहीं, फिर आप काम किए बिना रह नहीं सकेंगे।

हमारा भी यही हुआ। श्रद्धा जब उत्पन्न हुई तो हमने यह सोचा कि कहीं ऐसा न हो कि प्रलोभन हमको खींचने लगे। तो वहाँ से घर की सम्पत्ति को त्याग करने से लेकर के स्त्री के जेवरों से लेकर के और जो कुछ भी था, सबको त्याग करते चले आए कि कहीं प्रलोभन खींचने नहीं लगें। प्रलोभन खींचने नहीं पाएँ और वह श्रद्धा हमको निरन्तर बढ़ाती हुई चली आई। फिर उसने लगन को कम नहीं होने दिया। घीयामण्डी के मकान में १७ वर्ष तक बिना बिजली के हमने काम किया। न उसमें पंखा था, न उसमें बल्ब। मकान मालिक से झगड़ा हो गया था, सो मकान मालिक कहता था कि मकान खाली करो तो उसने बिजली के सेंक्शन पर साइन नहीं किये थे और बिजली हमको नहीं मिली। १७ वर्षों तक हम केवल मिट्टी के तेल की बत्ती जलाकर रात के दो बजे से लेकर सबेरे तक अपना पूजा-पाठ से लेकर के और अपना लेखन-कार्य तक बराबर करते रहे। पंखा था नहीं, घोर गर्मियों के दिनों में लू में भी काम करते रहे। १८ घण्टे काम करते रहे। यह काम हमने किया।

अब क्या बात रह गईं— दो बातों के अलावा। दो बातों में से आप में से हर आदमी को देखना चाहिए कि हमारी श्रद्धा कमजोर तो नहीं हुई। एक ओर हमारी लगन कमजोर तो नहीं हुई अर्थात् परिश्रम करने के प्रति जो हमारी उमंग और तरंग होनी चाहिए, उसमें कमी तो नहीं आ रही। किसान अपने घर के काम समझता है तो सबेरे से उठता है और रात के नौ-दस बजे तक बराबर घर के कामों में लगा रहता है। वह १८ घण्टे काम करता है। किसी से शिकायत नहीं करता कि हमको १८ घण्टे रोज काम करना पड़ता है। हमें अवकाश नहीं मिला या हमको इतवार की छुट्टी नहीं मिली और हमको यह नहीं हुआ, वह नहीं हुआ, इसकी कोई शिकायत नहीं करता क्योंकि वह समझता है कि हमारा काम है। यह हमारी जिम्मेदारी हे। खेत को रखना, जानवरों को रखना और बाल-बच्चों की देख−भाल करना यह हमारा काम है। जिम्मेदारी हर आदमी को दिन-रात काम करने के लिए लगन लगाती है और वह आपके प्रति भी है। आपको भी व्यक्तिगत जीवन में अपनी श्रद्धा को कायम रखना—एक और अपनी लगन को जीवंत रखना—दो काम तो आपके व्यक्तिगत जीवन के है, वह आपको करने चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गुरुवर की वाणी

गायत्री परिवार के प्रत्येक सदस्य को आपसी खींचतान में अनावश्यक समय नष्ट नहीं करना चाहिए।

जन्म-जन्मांतर से संग्रहीत उनकी उच्च आत्मिक स्थिति आज अग्नि परीक्षा की कसौटी पर कसी जा रही है। महाकाल अपने संकेतों पर चलने के लिए बार-बार हमें पुकार रहा है।

रीछ-वानरों की तरह हमें उनके पथ पर चलना ही चाहिए। आत्मा की पुकार अनसुनी करके वे लोभ-मोह के पुराने ढर्रे पर चलते रहे, तो आत्म-धिक्कार की इतनी विकट मार पड़ेगी कि झंझट से बच निकलने और लोभ-मोह को न छोड़ने की चतुरता बहुत मँहगी पड़ेगी।

अंतर्द्वन्द्व उन्हें किसी काम का न छोड़ेगा। मौज-मजा का आनन्द आत्म-प्रताड़ना न उठाने देगी और साहस की कमी से ईश्वरीय निर्देश पालन करते हुए जीवन को धन्य बनाने का अवसर भी हाथ से निकल जाएगा।

हमारी युग निर्माण योजना जनवरी 1978

👉 QUERIES ABOUT THE MANTRA (Part 2)

Q.2. Is it permissible to chant other Mantras or worship other deities along with Gayatri?      
  
Ans. Central theme of any form of worship is meditation. The exclusive objective of Jap and meditation in Upasana is to establish an intimate emotional bond between the devotee and God. Spirituality in India permits a free choice amongst a multitude of symbols (as deities) for meditating on attributes of the Creator. Once a particular deity is chosen as one’s Ishtadeo (Exclusive representative deity for worship), it is considered mandatory to follow the rituals and Mantras of Upasana pertaining to the Ishtadeo only and pursue Upasana - Sadhana - Aradhna strictly according to the procedure laid down by the Guru. During Sadhana, the Ishtadeo is treated like a living person, as one’s most intimate relative, as father - mother - brother - helper - master - friend, all  rolled into one (Twameva Mata, cha, Pita Twameva....). Only after cultivating such an intimate relationship with God, can one expect His / Her grace.

Because of ignorance, many devotees decorate their place of worship with assorted forms, (photographs etc.) of deities, chant many Mantras and say prayers to please them. Disregarding the Oneness of God (Brahma), they try to establish some relationship with many deities in expectation of multifarious benefits from each of them. In the field of spirituality such a practice becomes counterproductive. The deities represent streams of that ‘One fountainhead’ of God. Interaction with some particular attributes of God (deity) may be necessary for a particular purpose, but for an allround spiritual progress one should choose Gayatri as Ishtadeo. (Ref. Upasana Ke Do Charan Jap or Dhyan).

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 37

गुरुवार, 19 दिसंबर 2019

Gayatri Upasana | गायत्री उपासना | Pt Shriram Sharma Acharya



Title

👉 भगवान का अस्तित्व

एक दिन कोई व्यक्ति नाई की दुकान में अपने सिर के बाल कटवाने गया। नाई और उस व्यक्ति के बीच में ऐसे ही बातें शुरु हो गईं और वे लोग बातें करते करते 'भगवान' के विषय पर बातें करने लगे।

तभी नाई ने कहा - "मैं भगवान के अस्तित्व को नहीं मानता और इसीलिए तुम मुझे नास्तिक भी कह सकते हो?"

"तुम ऐसा क्यों कह रहे हो?" उस व्यक्ति ने पूछा।

नाई ने कहा - "बाहर जब तुम सड़क पर जाओगे तो तुम समझ जाओगे कि भगवान का अस्तित्व नहीं है। अगर भगवान होते तो क्या इतने सारे लोग भूखे मरते ? क्या इतने सारे लोग बीमार होते ? क्या दुनिया में इतनी हिंसा होती? क्या कष्ट या पीड़ा होती? मैं ऐसे निर्दयी ईश्वर की कल्पना नहीं कर सकता, जो इन सबकी अनुमति दे।"

उस व्यक्ति ने थोड़ा सोचा, लेकिन वह कोई वाद-विवाद नहीं करना चाहता था। इसलिए चुप रहा और नाई की बातें सुनता रहा। नाई ने अपना काम खत्म किया और वह व्यक्ति नाई को पैसे देकर दुकान से बाहर आ गया। वह जैसे ही नाई की दुकान से बाहर निकला तो उसने सड़क पर एक लम्बे घने बालों वाले एक व्यक्ति को देखा, जिसकी दाढ़ी भी बढ़ी हुई थी और ऐसा लगता था शायद उसने कई महीनों तक अपने बाल नहीं कटवाए हों।

अब वह व्यक्ति वापिस मुड़कर दोबारा नाई की दुकान में गया और उसने नाई से कहा - "क्या तुम्हें पता है? नाइयों का अस्तित्व नहीं होता?"

नाई ने कहा - "तुम कैसी बेकार की बातें कर रहे हो? क्या तुम्हें मैं दिखाई नहीं दे रहा हूँ ? मैं यहाँ हूँ और मैं एक नाई हूँ और मैंने अभी अभी तुम्हारे सिर के बाल काटे हैं।"

उस व्यक्ति ने कहा - "नहीं, नाई होते ही नहीं हैं, अगर होते तो क्या बाहर उस व्यक्ति के जैसे कोई भी लम्बे बाल व बढ़ी हुई दाढ़ी वाला होता क्या?"

नाई ने कहा - "अगर वह व्यक्ति किसी नाई के पास बाल कटवाने जाएगा ही नहीं तो नाई कैसे उसके बाल काटेगा?"

उस व्यक्ति ने कहा - "तुम बिल्कुल सही कह रहे हो, यही बात है। भगवान भी होते हैं, लेकिन कुछ लोग भगवान पर विश्वास ही नहीं करते तो भगवान उनकी सहायता करेंगे कैसे? विश्वास ही सत्य है, जो लोग भगवान पर विश्वास करते हैं, उन्हें उसकी अनिभूति हर पल होती है और जो विश्वास नहीं करते उनके लिए वो कहीं भी नहीं हैं।"

भगवान दूध में मक्खन की तरह विराजमान हैं, जो दिखाई नहीं देते। दूध में मक्खन होते हुए भी दिखाई नहीं देता, पर मक्खन दिखाई भी दे सकता है, जब हम दूध बिलोयेंगे, तब। इसी तरह भगवान भी हैं, पर वे होते हुए भी दिखाई नहीं देते । लेकिन भगवान दिखाई दे सकते हैं, जब हम अपनी आत्मा का मंथन करेंगे, तब। इसके लिए हमें आत्म मंथन करने की आवश्यकता है।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 19 Dec 2019



👉 प्रवाह में न बहें, उत्कृष्टता से जुड़े (भाग ३)

यदि आत्मबोध से उत्पन्न प्रकाश ज्योति को स्थिर रखना हो तो उस दीपक में स्वाध्याय का तेल निरन्तर डालते रहना चाहिये। यह तेल जब तक पड़ता रहेगा तब तक उसके बुझने की आशंका न रहेगी। एक बार भावावेश में बहुत कुछ सोच डाला और आदर्शवाद की उड़ान उड़ ली, पर उस उमंग को नियमित परिपोषण न मिला तो हवा के साथ उड़ने वाले बादलों की तरह वह जोश आवेश भी कुछ समय में तिरोहित हो जायेगा तब अपनी प्रतिज्ञा न निभ सकने की, इच्छा के कार्यान्वित न होने की कमजोरी निश्चित ही अपने रहे बचे मनोबल को भी तोड़ देगी और आगे फिर उन दिव्य आकाँक्षाओं को पुनर्जीवित करना भी कठिन हो जायेगा। इस स्थिति से बचने के लिए प्रत्येक आदर्शवादी को स्वाध्याय को अपना जीवन साथी एवं अभिन्न सहचर बना लेना चाहिए।

स्वाध्याय भी आजकल एक रूढ़ि बन गई है। कथा पुराणों की पुस्तकों को बार-बार उलटते पलटते रहने का नाम स्वाध्याय कहलाता है और आमतौर से लोग इसी लकीर को पीटकर आत्म प्रवंचना कर लेते हैं। स्वाध्याय उन्हीं पुस्तकों का होना चाहिए जो आज की उलझनों से भरे हुए मनुष्य को बुद्धि संगत और व्यावहारिक मार्गदर्शन कर सके। इस तरह का प्रखर साहित्य यों बहुत ही कम मात्रा में मिलता है। पर उसका सर्वथा अभाव नहीं है। तलाश करने पर वह अपने आसपास भी मिल सकता है। स्नान, भोजन, शयन आदि की ही तरह स्वाध्याय को भी अन्तःकरण की एक महती आवश्यकता मानना चाहिए और इस आत्मिक भोजन को जुटाने के लिए समय और पैसा निकालना चाहिए।

स्वाध्याय का प्रयोजन महामानवों द्वारा लिखित जीवन विद्या के समग्र स्वरूप पर प्रकाश डालने वाले साहित्य को पढ़ने से ही पूरा होता है। उसका एक दूसरा पक्ष है उसे सत्संग कहते हैं। अशिक्षित व्यक्ति सत्संग से ही स्वाध्याय की आवश्यकता पूरी कर सकते हैं। वे दूसरे की आँखों से ग्रन्थों को पढ़ाकर कानों से सुनते रहें तो भी वह आवश्यकता पूरी हो जाती है। कभी-कभी सुलझे हुए विचारों के और परिष्कृत दृष्टिकोण सम्पन्न व्यक्ति परामर्श एवं प्रवचन के लिये भी उपलब्ध हो जाते हैं। पर यह उपलब्धि सदा सम्भव नहीं। धर्म और अध्यात्म के नाम पर जहाँ-तहाँ कूड़ा कचरा ही बिखरा पड़ा है। मूढ़ता, अन्ध श्रद्धा, अत्युक्ति और असम्मति से भरे हुए विचार ही अक्सर सत्संग के नाम पर सुनने को मिलते हैं। विक्षिप्त एवं सनकी स्तर के लोग एकाकी बातें सुनाकर अक्सर सुनने वाले को और अधिक उलझन में डाल देते हैं। सही सत्संग भी आज की परिस्थिति में यदा-कदा ही किसी को मिल सकता है। तो उसका उपयोग भी करना चाहिये और जो सुना या बताया गया है उसमें से जो उपयोगी तत्व हो उसे ग्रहण कर लेना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 श्रद्धा, सिद्धान्तों के प्रति हो (भाग २)

भस्मासुर का पुराना नाम बताऊँ आपको। मारीचि का पुराना नाम बताऊँ आपको। ये सभी योग्य तपस्वी थे। पहले जब उन्होंने उपासना-साधना शुरू की थी, तब अपने घर से तप करने के लिए हिमालय पर गए थे। तप और पूजा-उपासना के साथ-साथ में कड़े नियम और व्रतों का पालन किया था, तब वे बहुत मेधावी थे, लेकिन समय और परिस्थितियों के भटकाव में वे कहीं के मारे कहीं चले गए। भस्मासुर का क्या हो गया? जिसको प्रलोभन सताते हैं, वे भटक जाते हैं और कहीं के मारे कहीं चले जाते हैं।

तो श्रद्धा आदमी को टिकाऊ बनाए रखने के लिए एक रस्सी या एक सम्बल है, जिसके सहारे, जिसको पकड़ करके मनुष्य सीधी राह पर चलता हुआ चला जाता है। भटक नहीं पाता। आप भटकना मत। घर से आप चले थे न, यह विचार लेकर चले थे न कि हम लोककल्याण के लिए, जनमंगल के लिए घर छोड़कर चले गए हैं। आप जब कभी भी भटकन आए तो आप अपने उस दिन को, उस समय की मनःस्थिति को याद कर लेना जबकि आपके भीतर से श्रद्धा का एक अंकुर उगा था और अंकुर उगकर के फिर आपके भीतर एक उमंग पैदा हुई थी और उमंग को लेकर आप यहाँ आ गए थे। आपको याद है जब आप यहाँ आए थे, जिस दिन आप आए थे उसी मन को याद रखना।

साधु-बाबाजी जिस दिन घर से निकलते हैं, उस दिन यह श्रद्धा लेकर निकलते हैं कि हमको संत बनना है, महात्मा बनना है, ऋषि बनना है, तपस्वी बनना है। लेकिन थोड़े दिनों बाद वह जो उमंग होती है, वह ढीली पड़ जाती है और ढीली पड़ने के बाद में संसार के प्रलोभन उनको खींचते है। किसी की बहिन-बेटी की ओर देखते हैं, किसी से पैसा लेते हैं। किसी को चेला-चेली बनाते हैं। किसी की हजामत बनाते हैं। फिर जाने क्या से क्या हो जाता है? पतन का मार्ग यहीं से आरम्भ होता है। ग्रैविटी—गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की हर चीज को ऊपर से नीचे की ओर खींचती है। संसार भी एक ग्रैविटी है, जो ऊपर से नीचे की ओर खींचती है। आप लोगों से सबसे मेरा यह कहना है कि आप ग्रैविटी से खिंचना मत। रोज सवेरे उठकर भगवान् के नाम के साथ में यह विचार किया कीजिए कि हमने किन सिद्धान्तों के लिए समर्पण किया था? और पहला कदम जब उठाया था तो किन सिद्धान्तों के आधार पर उठाया था? उन सिद्धान्तों को रोज याद कर लिया कीजिए। रोज याद किया कीजिए कि हमारी उस श्रद्धा में, और उस निष्ठा में, उस संकल्प और उस त्यागवृत्ति में कही फर्क तो नहीं आ गया। संसार ने हमको खींच तो नहीं लिया। वातावरण ने हमको गलीज तो नहीं बना दिया। कहीं हम कमीने लोगों की नकल तो नहीं करने लगे। आप यह मत करना।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 QUERIES ABOUT THE MANTRA (Part 1)

Q.1. How does the ‘Gayatri Mantra’ as a Vedmantra differ from other ‘Laukik mantras’?        

Ans. Gayatri Mantra is the primordial Mantra self-manifested by the projection of the will (sankalp) of Omnipotent Divine to bring into existence the present cycle of creation (Varah Kalpa). According to Hindu mythology there are infinite cosmic cycles of expansion and contraction known as Shrishti and Pralaya. At the time of  Mahapralaya or Doom’s Day, all matter and energy present in the cosmos gets contracted into elementary ‘Akash’ and ‘Pran”. In the succeeding cycle, these expand to constitute the multitude of energies and forces which operate on the elemental Akash to produce animate and inanimate objects of the ‘Creation’.
  
Vedas, in which Gayatri Mantra is mentioned several times (Rigveda 3.62.10, Yajurveda 3.35.22.9, 36.3, Samveda 462) are considered divine revelation (Apaurusheya).  The Laukik Mantras, are, on the other hand, composition of rishis – i.e. they are man-made (Paurusheya). Hence the supremacy of Gayatri Mantra.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 36

बुधवार, 18 दिसंबर 2019

👉 श्रद्धा, सिद्धान्तों के प्रति हो (भाग १)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

अपने बच्चों से, साथियों से, मिशन के कार्यकर्ताओं से मिलने का मेरा बड़ा मन था। पर संयोग नहीं मिल पा रहा था। पहले मन यह था कि यहाँ बुलाऊँ और बुला करके एक-एक से बात करूँ और अपने मन को खोलकर आप सबके सामने रखूँ और आपकी नब्ज़ भी देखूँ पर अब यह सम्भव नहीं रहा। कितने कार्यकर्ता हैं? यहाँ शान्तिकुञ्ज के स्थायी कार्यकर्ता एवं सामयिक स्वयंसेवक आए हुए हैं। एक समुदाय जो शुरू में आया था वह समुदाय, न केवल यहाँ का, वरन् गायत्री तपोभूमि का, वह भी हमारा समुदाय है। सब लोगों को बुलाने के लिए मैं विचार करता रहा कि क्या ऐसा सम्भव है कि एक-एक करके आदमियों को बुलाऊँ और अपने जीवन के अनुभव आऊँ और अपनी इच्छा और आकांक्षा बताऊँ। लेकिन एक-एक करके बुलाने में तो मालूम पड़ा कि यह संख्या तो इतनी बड़ी है कि इनको बुलाने में महीनों लगाऊँ तो भी पूरा नहीं हो सकेगा। इसलिए आप यह मानकर चलिए कि आप से व्यक्तिगत बात की जा रही है और एकांत में, अकेले में बुलाकर के, कन्धे पर हाथ रखकर के और आप से ही कहा जा रहा है किसी और से नहीं।

आप इन बातों को अपने जीवन में प्रयोग करेंगे तो मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि आपकी ऐसी उन्नति होती चली जाएगी जैसी कि एक छोटे-से देहात में जन्म लेने के बाद हम उन्नति करते चले आए और उन्नति के ऊँचे शिखर पर जा पहुँचे। आपके लिए भी यह रास्ता खुला हुआ है। आपके लिए भी सड़क खुली हुई है। लेकिन अगर आप ऐसा नहीं कर पाएँगे तो आप यह विश्वास रखिए कि आप घटिया आदमी रहे होंगे किसी भी समय में और घटिया ही रहकर जाएँगे। भले से ही आप शान्तिकुञ्ज में रहें। आपकी कोई कहने लायक महत्त्वपूर्ण प्रगति न हो सकेगी और आप वह आदमी न बन सकेंगे जैसे कि बनाने की मेरी इच्छा है।

अब क्या करना चाहिए? आपको वह काम करना चाहिए जो कि हमने किया है। क्या किया है आपने? क्रिया-कलाप गिनाऊँ आपको? नहीं क्रिया-कलाप नहीं गिनाऊँगा। क्रियाकलाप गिनाऊँगा तो मुझे वहाँ से चलना पड़ेगा जहाँ से काँग्रेस का वालंटियर हुआ और फिर यहाँ आकर के होते-होते वहाँ आ गया, जहाँ अब हूँ। वह बड़ी लम्बी कहानी है। उन सब कहानियों का अनुभव और निष्कर्ष निकालना आपके लिए मुश्किल हो जाएगा। उस पर तो ध्यान नहीं देता, लेकिन मैं सैद्धान्तिक रूप से बताता हूँ। हमने आस्था जगाई, श्रद्धा जगाई, निष्ठा जगाई। निष्ठा, श्रद्धा और आस्था किसके प्रति जगाई? व्यक्ति के ऊपर? व्यक्ति तो माध्यम होते है। हमारे प्रति, गुरुजी के प्रति श्रद्धा है। बेटा, यह तो ठीक है, लेकिन वास्तव में सिद्धान्तों के प्रति श्रद्धा होती है।

आदमियों के प्रति श्रद्धा, मूर्तियों के प्रति श्रद्धा, देवताओं के प्रति श्रद्धा टिकाऊ नहीं होती। इसका कोई ज्यादा महत्त्व नहीं। महत्त्वपूर्ण वह जो सिद्धान्तों के प्रति निष्ठा होती है। हमारी सिद्धान्तों के प्रति निष्ठा रही। आजीवन वहाँ से जहाँ से चले, जहाँ से विचार उत्पन्न किया है, वहाँ से लेकर निरन्तर अपनी श्रद्धा की लाठी को टेकते-टेकते यहाँ तक चले आए और यहाँ तक आ पहुँचे। अगर यह श्रद्धा की लाठी हमने पकड़ी न होती तो तब सम्भव है कि हमारा चलना, इतना लम्बा सफर पूरा न होता। यदि सिद्धान्तों के प्रति हम आस्थावान न हुए होते तो सम्भव है कि कितनी बार भटक गए होते और कहाँ से कहाँ चले गए होते और हवा का झोंका उड़ाकर हमको कहाँ ले गया होता? लोभों के झोंके, मोहों के झोंके, नामवरी के झोंके, यश के झोंके, दबाव के झोंके ऐसे हैं कि आदमी को लम्बी राह पर चलने के लिए मजबूर कर देते है और कहीं से कहीं घसीट ले जाते हैं। हमको भी घसीट ले गए होते। ये आदमियों को घसीट ले जाते हैं। बहुत-से व्यक्ति थे जो सिद्धान्तवाद की राह पर चले और कहाँ से कहाँ जा पहुँचे?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 17 दिसंबर 2019

Apna Vyaktitva Kaise Nikharen | अपना व्यक्तित्व कैसे निखारे | Shantikunj...



Title

👉 दर्द अपनेपन का

पचास वर्षीय राजेश बाबू ने सुबह सुबह करवट ली और हमेशा की तरह अपनी पत्नी मीता को चाय बनाने को कहा और फिर रजाई ढक कर करवट ले ली। कुछ पल उन्होने इंतजार की पर कोई हलचल ना होने पर उन्होने दुबारा आवाज दी..

ऐसा कभी भी नही हुआ था इसलिए राजेश बाबू ने लाईट जलाई और मीता को हिलाया पर कोई हलचल ना होने पर ना जाने वो घबरा से गए। रजाई हटाई तो मीता निढाल सी एक ओर पडी थी. ना जाने रात ही रात मे क्या हो गया..

अचानक मीता का इस तरह से उनकी जिंदगी से हमेशा हमेशा ले लिए चले जाना …. असहनीय था। धीरे धीरे जैसे पता चलता रहा लोग इकठठे होते रहे और उसका अंतिम संस्कार कर दिया..

एक हफ्ता किस तरह बीता उन्हे कुछ याद ही नही। उन का एक ही बेटा था जो कि अमेरिका रहता था। पढाई के बाद वही नौकरी कर ली थी। बेटा आकर जाने की भी तैयारी कर रहा था..

उसने अपने पापा को भी साथ चलने को कहा और वो तैयार भी हो गए। पर मीता की याद को अपने दिल से लगा लिया था। अब उन्हे हर बात मे उसकी अच्छाई ही नजर आने लगी। उन्हे याद आता कि कितना ख्याल रखती थी मीता उनका पर वो कोई भी मौका नही चूकते थे उसे गलत साबित करने का। ना कभी उसकी तारीफ करते और ना कभी उसका मनोबल बढाते बल्कि कर काम मे उसकी गलती निकालने मे उन्हे असीम शांति मिलती थी..

उधर मीता दिनभर काम मे जुटी रहती थी। एक बार् जब काम वाली बाई 2 महीने की छुट्टी पर गई थी तब भी मीता इतने मजे से सारा काम बिना किसी दर्द और शिकन के आराम से गुनगुनाते हुए किया जबकि कोई दूसरी महिला होती तो अशांत हो जाती। दिन रात राजेश बाबू उनकी यादो के सहारे जीने लगे। काश वह तब उसकी कीमत जान पाते। काश वो तब उसकी प्रशंसा कर पाते. काश …. !!!

पर अब बहुत देर हो चुकी थी.. आज राजेश अमेरिका जाने के लिए सामान पैक कर रहे थे। पैक करते करते मीता की फोटो को देख कर अचानक फफक कर रो पडे और बोले मीता, मुझे माफ कर दो। प्लीज वापिस आ जाओ। मै तुम्हारे बिना कुछ नही हूं। आज जान गया हूं कि मै तुमसे कितना कितना प्यार करता हूं….

तभी उन्हें किसी ने पीठ से झकोरा। इससे पहले वो खुद को सम्भाल पाते अचानक उनकी आखं खुल गई। मीता उन्हे घबराई हुई आवाज मे उठा रही थी। वो सब सपना था..

एक बार तो उन्हे विश्वास ही नही हुआ पर दूसरे पल उन्होने मीता का हाथ अपने हाथो मे ले लिया पर आखो से आसूं लगातार बहे जा रहे थे, और मीता नम हुई आखो से अपलक राजेश को ही देखे जा रही थी…

👉 प्रवाह में न बहें, उत्कृष्टता से जुड़े (भाग २)

ऐसी विषम परिस्थितियों में, ऐसे विकट वातावरण में किसी का सच्चे अर्थों में आदर्शवादी बने रहना वस्तुतः भारी शूरवीरता का काम है। मछली ही एक ऐसा जल जन्तु है जो पानी की धारा को चीरते हुए उल्टी चाल चल सके अन्यथा शेष सभी को प्रवाह की दिशा में बहना पड़ता है। दुर्बल मनोभूमि के सामान्य मनुष्य बहते हुए प्रवाह में ही घिसटते चले जाते हैं। आदर्शवाद की बात कह सुन लेना ही उनके लिये पर्याप्त होता है, उसे अपनाने का साहस कर नहीं पाते। व्यवहार में उतारना उसे सब अशक्य ही मानते हैं।

इन दुष्प्रवृत्तियों के आँधी तूफान में कोई कैसे कब तक आदर्शवाद की चट्टान पर खड़ा रहे? मनस्वी और आत्मबल सम्पन्न व्यक्तियों की बात दूसरी है जो हर आँधी तूफान का मुकाबला कर सकते हैं और प्रलोभनों को चुनौती दे सकते हैं। साधारणतया आज की जैसी स्थिति में कुछ सहारा चाहिए। जिन पेड़ों की जड़ें गहरी होती हैं वे ही झंझावातों को सहन करते हैं। पहाड़ पर चढ़ने के साथ सहारे के लिये हाथ में लाठी की जरूरत पड़ती है। एकाकी ऊँची चढ़ाई कठिन पड़ती है। आदर्शवादिता को एक पहाड़ ही समझना चाहिये जिस पर चढ़ने के लिए सहारा चाहिये और वह सहारा है-स्वाध्याय।

धूर्त दुनियाँ के आकर्षणों का प्रतिरोध करने के लिए महामानवों का परामर्श और उदाहरण एक सबल प्रतिद्वंद्वी के रूप में खड़ा होता है और जिसने श्रद्धा पूर्वक उस आप्त विचारधारा को पढ़ना अपना अत्यावश्यक नित्यकर्म बना लिया है और जो उसको मनोरंजन की तरह नहीं, जानकारी के लिए पढ़ने के लिए नहीं वरन् उन मनीषियों के महान व्यक्तित्व को सामने उपस्थित मानकर उनके विचारों को गम्भीर परामर्श की तरह मनोयोग पूर्वक पढ़ता है उसके लिये वह स्वाध्याय परिपुष्ट साथी और सहायक का काम देता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 परमात्मा में प्रवेश

कभी भी कहीं से परमात्मा में प्रवेश सम्भव है, क्योंकि वह सर्वत्र है। बस उसने प्रकृति की चादर ओढ़ रखी है। यह चादर उघड़ जाय तो प्रति घड़ी-प्रतिक्षण उसका अनुभव होने लगता है। एक श्वास भी ऐसी नहीं आती-जाती, जब उससे मिलन की अनुभूति न की जा सके। जिधर भी आँख देखती है उसी की उपस्थिति महसूस होती है। जहाँ भी कान सुनते हैं, उसी का संगीत सुनायी देता है।
  
उन सर्वव्यापी प्रभु को देखने की कला भर आना चाहिए। उसे निहारने वाली आँख चाहिए। इस आँख के खुलते ही वह सब दिशाओं में और सभी समयों में उपस्थित हो जाता है। रात में जब सारा आकाश तारों से भर जाय, तो उन तारों के बारे में सोचो मत, उन्हें देखो। महासागर के विशाल वक्ष पर जब लहरें नाचती हों, तो उन लहरों को सोचो मत, देखो। विचार थमे, शून्य एवं नीरव अवस्था में मात्र देखना सम्भव हो सके, तो एक बड़ा राज खुल जाता है।
  
और तब प्रकृति के द्वार से उस परम रहस्य में प्रवेश होता है, जो कि परमात्मा है। प्रकृति परमात्मा पर पड़े आवरण से ज्यादा और कुछ भी नहीं है। और जो इस रहस्यमय,आश्चर्यजनक एवं बहुरंगे घूँघट को उठाना जानते हैं, वे बड़ी आसानी से जीवन के सत्य से परिचित हो जाते हैं। उनका परमात्मा में प्रवेश हो जाता है।
  
सत्य का एक युवा खोजी किसी सद्गुरु के पास गया। सद्गुरु से उसने पूछा- मैं परमात्मा को जानना चाहता हूँ। मैं धर्म को, इसमें निहित सत्य को पाना चाहता हूँ। आप मुझे बताएँ कि मैं कहाँ से प्रारम्भ करूँ? सद्गुरु ने कहा, क्या पास के पर्वत से गिरते झरने की ध्वनि सुनायी पड़ रही है? उस युवक ने हां में उत्तर दिया। इस पर सद्गुरु बोले, तब वहीं से प्रवेश करो। यही प्रारम्भ बिन्दु है।
  
सचमुच ही परमात्मा में प्रवेश का द्वार इतना ही निकट है। पहाड़ से गिरते झरनों में, हवाओं में डोल रहे वृक्षों के पत्तों में, सागर पर क्रीड़ा करने वाली सूर्य की किरणों में। लेकिन हर प्रवेश द्वार पर प्रकृति का पर्दा पड़ा है। और बिना उठाए वह नहीं उठता। और थोड़ा गहरे उतरकर अनुभव करें तो पाएँगे कि यह परदा प्रवेश द्वारों पर नहीं, हमारी अपनी दृष्टि पर है। इस तरह अपनी दृष्टि पर पड़े इस एक परदे ने अनन्त द्वारों पर पर्दा कर दिया है। यह एक पर्दा हम हटा सकें, तो हमारा परमात्मा में प्रवेश हो।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १४४

👉 गुरुवर की वाणी

■ आज उस समय की उन मान्यताओं का समर्थन नहीं किया जा सकता जिनमें संतान वालों को सौभाग्यवान और संतानरहित को अभागी कहा जाता था। आज तो ठीक उलटी परिभाषा करनी पड़ेगी। जो जितने अधिक बच्चे उत्पन्न् करता है, वह संसार में उतनी ही अधिक कठिनाई उत्पन्न करता है और समाज का उसी अनुपात से भार बढ़ाता है, जबकि करोड़ों लोगों को आधे पेट सोना पड़ता है, तब नई आबादी बढ़ाना उन विभूतियों के ग्रास छीनने वाली नई भीड़ खड़ी कर देना है। आज के स्थित में संतानोत्पादन को दूसरे शब्दों में समाज द्रोह का पाप कहा जाय तो तनिक भी अत्युक्ति नहीं होगी। 

□  राजनैतिक परतंत्रता दूर हो गई, पर आज जीवन के हर क्षेत्र में बौद्धिक पराधीनता छाई हुई है। गरीबी, बीमारी, अशिक्षा, अनैतिकता, अधार्मिकता, अनीति, उच्छृंखलता, नशेबाजी आदि अगणित दुष्प्रवृत्तियों से लोहा लेने की आवश्यकता है। यह कार्य भी यदि कोई पूरा कर सकता है तो वह नई पीढ़ी ही हो सकती है। अगले दिनों जिन प्रभा संपन्न महापुरुषों की राष्ट्र को आवश्यकता पड़ेगी, वह वर्तमान पीढ़ी से ही निकलेंगे, पर यह कसौटी यह होगी कि वे सामाजिक क्रान्ति के लिए कितनी हिम्मत रखते हैं। दहेज विरोधी आन्दोलन उसका एक आवश्यक अंग है, इससे युवकों  की विचारशीलता एवं समाज के प्रति दर्द का प्रमाण मिलेगा। 

◆ अपनी तपश्चर्या और ईमानदारी में कहीं कोई कमी ही होगी जिसके कारण जिन व्यक्तियों के साथ पिछले ढेरों वर्षों से संबन्ध बनाया, उनमें कोई आध्यात्मिक साहस उत्पन्न न हो सका। वह भजन किस काम का, जिसके फलस्वरूप आत्मनिर्माण एवं परमार्थ के लिए उत्साह उत्पन्न न हो ।। किन्हीं को हमने भजन में लगा भी दिया है पर उनमें भजन का प्रभाव बताने वाले उपरोक्त दो लक्षण उत्पन्न न हुए हों तो हम कैसे माने कि उन्हें सार्थक भजन करने की प्रक्रिया समझाई जा सकी? हमारा परिवार संगठन तभी सफल कहा जा सकता था जब उसमें ये सम्मिलित व्यक्ति उत्कृष्टता और आदर्शवादिता की कसौटी पर खरे सिद्ध होते चलते। अन्यथा संख्या वृद्धि की विडम्बना से झूँठा मन बहलाव करने से क्या कुछ बनेगा?

◇ आपको वह काम करना चाहिए, जो कि हमने किया है। हमने आस्था जगाई, श्रद्धा जगाई, निष्ठा जगाई। निष्ठा, श्रद्धा और आस्था किसके प्रति जगाई? व्यक्ति के ऊपर? व्यक्ति तो माध्यम होते हैं। हमारे प्रति, गुरुजी के प्रति श्रद्धा है। बेटा! यह तो ठीक है, लेकिन वास्तव में सिद्धांतों के प्रति श्रद्धा होती है। हमारी सिद्धान्तों के प्रति निष्ठा रही। वहाँ से जहाँ से हम चले, जहाँ से विचार उत्पन्न किया है, वहाँ से लेकर आजीवन निरन्तर अपनी श्रद्धा की लाठी को टेकते-टेकते यहाँ तक चले आए। यदि सिद्धान्तों के प्रति हम आस्थावान न हुए होते तो सम्भव है कि कितनी बार भटक गए होते और कहाँ से कहाँ चले गए होते और हवा का झोंका उड़ाकर हमको कहाँ ले गया होता? लोभों के झोंके, मोहों के झोंके, नामवरी के झोंके, यश के झोंके, दबाव के झोंके ऐसे हैं कि आदमी को लम्बी राह पर चलते हुए भटकने के लिए मजबूर कर देते हैं और कहीं से कहीं घसीट ले जाते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 MISCONCEPTIONS ABOUT ELIGIBILITY FOR GAYATRI SADHANA (Part 7)

Q.7. Is Yagyopaveet essential for Gayatri worship? What is its significance ?

Ans.  It cannot be made mandatory that those alone who put an Yagyopveet can perform Gayatri Jap. However, since Yagyopaveet  is an image of Gayatri it is better if its worshipper puts it on.

Yagyopaveet is a form of Gayatri. It is preferable to perform worship sitting in a temple in front of a deity. It, however, does not mean that if there is no temple or deity, worship should not be performed. Gayatri Sadhana can be performed even, without putting on the Yagyopaveet.

Yagyopaveet is, in fact, a symbol of Gayatri mahamantra. The nine threads in it represent the nine words of Gayatri Mantra. Three strands indicate threefold achievements. Similarly the three knots (Vyahritis) and the large knot (Om) are also part of the Mantra. In a nutshell, Yagyopaveet is the sacred symbol of Gayatri, wearer of which (across the left shoulder near the heart) constantly remembers the pledge he has taken to follow the doctrine of Gayatri Sadhana. Just as one derives greater benefit by worshipping before a deity in a temple, but can also pray anywhere, Yagyopaveet is recommended but is not mandatory.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 35

Pragya Band Gayatri Vidya Peeth | प्रज्ञा बैंड गायत्री विद्या पीठ | Shan...



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सोमवार, 16 दिसंबर 2019

Todo Nahi Jodo | तोड़ो नहीं जोड़ो | Motivational Stories



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👉 सरलता ही भक्ति का एक मात्र स्रोत

एक आलसी लेकिन भोलाभाला युवक था आनंद। दिन भर कोई काम नहीं करता बस खाता ही रहता और सोए रहता। घर वालों ने कहा चलो जाओ निकलो घर से, कोई काम धाम करते नहीं हो बस पड़े रहते हो। वह घर से निकल कर यूं ही भटकते हुए एक आश्रम पहुंचा। वहां उसने देखा कि एक गुरुजी हैं उनके शिष्य कोई काम नहीं करते बस मंदिर की पूजा करते हैं। उसने मन में सोचा यह बढिया है कोई काम धाम नहीं बस पूजा ही तो करना है।

गुरुजी के पास जाकर पूछा, क्या मैं यहां रह सकता हूं, गुरुजी बोले हां, हां क्यों नहीं? लेकिन मैं कोई काम नहीं कर सकता हूं गुरुजी: कोई काम नहीं करना है बस पूजा करनी होगी आनंद : ठीक है वह तो मैं कर लूंगा...

अब आनंद महाराज आश्रम में रहने लगे। ना कोई काम ना कोई धाम बस सारा दिन खाते रहो और प्रभु मक्ति में भजन गाते रहो। महीना भर हो गया फिर एक दिन आई एकादशी। उसने रसोई में जाकर देखा खाने की कोई तैयारी नहीं। उसने गुरुजी से पूछा आज खाना नहीं बनेगा क्या गुरुजी ने कहा नहीं आज तो एकादशी है

तुम्हारा भी उपवास है। उसने कहा नहीं अगर हमने उपवास कर लिया तो कल का दिन ही नहीं देख पाएंगे हम तो.... हम नहीं कर सकते उपवास... हमें तो भूख लगती है आपने पहले क्यों नहीं बताया? गुरुजी ने कहा ठीक है तुम ना करो उपवास, पर खाना भी तुम्हारे लिए कोई और नहीं बनाएगा तुम खुद बना लो। मरता क्या न करता गया रसोई में, गुरुजी फिर आए ''देखो अगर तुम खाना बना लो तो राम जी को भोग जरूर लगा लेना और नदी के उस पार जाकर बना लो रसोई। ठीक है, लकड़ी, आटा, तेल, घी, सब्जी लेकर आंनद महाराज चले गए, जैसा तैसा खाना भी बनाया, खाने लगा तो याद आया गुरुजी ने कहा था कि राम जी को भोग लगाना है।

वह भजन गाने लगा...आओ मेरे राम जी, भोग लगाओ जी प्रभु राम आइए, श्रीराम आइए मेरे भोजन का भोग लगाइए..... कोई ना आया, तो बैचैन हो गया कि यहां तो भूख लग रही है और राम जी आ ही नहीं रहे। भोला मानस जानता नहीं था कि प्रभु साक्षात तो आएंगे नहीं। पर गुरुजी की बात मानना जरूरी है। फिर उसने कहा , देखो प्रभु राम जी, मैं समझ गया कि आप क्यों नहीं आ रहे हैं। मैंने रूखा सूखा बनाया है और आपको तर माल खाने की आदत है इसलिए नहीं आ रहे हैं.... तो सुनो प्रभु ... आज वहां भी कुछ नहीं बना है, सबकी एकादशी है, खाना हो तो यह भोग ही खालो...

श्रीराम अपने भक्त की सरलता पर बड़े मुस्कुराए और माता सीता के साथ प्रकट हो गए। भक्त असमंजस में। गुरुजी ने तो कहा था कि राम जी आएंगे पर यहां तो माता सीता भी आईं है और मैंने तो भोजन बस दो लोगों का बनाया हैं। चलो कोई बात नहीं आज इन्हें ही खिला देते हैं। बोला प्रभु मैं भूखा रह गया लेकिन मुझे आप दोनों को देखकर बड़ा अच्छा लग रहा है लेकिन अगली एकादशी पर ऐसा न करना पहले बता देना कि कितने जन आ रहे हो, और हां थोड़ा जल्दी आ जाना। राम जी उसकी बात पर बड़े मुदित हुए। प्रसाद ग्रहण कर के चले गए। अगली एकादशी तक यह भोला मानस सब भूल गया। उसे लगा प्रभु ऐसे ही आते होंगे और प्रसाद ग्रहण करते होंगे। फिर एकादशी आई। गुरुजी से कहा, मैं चला अपना खाना बनाने पर गुरुजी थोड़ा ज्यादा अनाज लगेगा, वहां दो लोग आते हैं। गुरुजी मुस्कुराए, भूख के मारे बावला है। ठीक है ले जा और अनाज लेजा। अबकी बार उसने तीन लोगों का खाना बनाया। फिर गुहार लगाई प्रभु राम आइए, सीताराम आइए, मेरे भोजन का भोग लगाइए...

प्रभु की महिमा भी निराली है। भक्त के साथ कौतुक करने में उन्हें भी बड़ा मजा आता है। इस बार वे अपने भाई लक्ष्मण, भरत शत्रुघ्न और हनुमान जी को लेकर आ गए। भक्त को चक्कर आ गए। यह क्या हुआ। एक का भोजन बनाया तो दो आए आज दो का खाना ज्यादा बनाया तो पूरा खानदान आ गया। लगता है आज भी भूखा ही रहना पड़ेगा। सबको भोजन लगाया और बैठे-बैठे देखता रहा। अनजाने ही उसकी भी एकादशी हो गई। फिर अगली एकादशी आने से पहले गुरुजी से कहा, गुरुजी, ये आपके प्रभु राम जी, अकेले क्यों नहीं आते हर बार कितने सारे लोग ले आते हैं? इस बार अनाज ज्यादा देना। गुरुजी को लगा, कहीं यह अनाज बेचता तो नहीं है देखना पड़ेगा जाकर। भंडार में कहा इसे जितना अनाज चाहिए दे दो और छुपकर उसे देखने चल पड़े।

इस बार आनंद ने सोचा, खाना पहले नहीं बनाऊंगा, पता नहीं कितने लोग आ जाएं। पहले बुला लेता हूं फिर बनाता हूं। फिर टेर लगाई प्रभु राम आइए , श्री राम आइए, मेरे भोजन का भोग लगाइए... सारा राम दरबार मौजूद... इस बार तो हनुमान जी भी साथ आए लेकिन यह क्या प्रसाद तो तैयार ही नहीं है। भक्त ठहरा भोला भाला, बोला प्रभु इस बार मैंने खाना नहीं बनाया, प्रभु ने पूछा क्यों? बोला, मुझे मिलेगा तो है नहीं फिर क्या फायदा बनाने का, आप ही बना लो और खुद ही खा लो.... राम जी मुस्कुराए, सीता माता भी गदगद हो गई उसके मासूम जवाब से... लक्ष्मण जी बोले क्या करें प्रभु... प्रभु बोले भक्त की इच्छा है पूरी तो करनी पड़ेगी। चलो लग जाओ काम से। लक्ष्मण जी ने लकड़ी उठाई, माता सीता आटा सानने लगीं। भक्त एक तरफ बैठकर देखता रहा। माता सीता रसोई बना रही थी तो कई ऋषि-मुनि, यक्ष, गंधर्व प्रसाद लेने आने लगे। इधर गुरुजी ने देखा खाना तो बना नहीं भक्त एक कोने में बैठा है। पूछा बेटा क्या बात है खाना क्यों नहीं बनाया? बोला, अच्छा किया गुरुजी आप आ गए देखिए कितने लोग आते हैं प्रभु के साथ..... गुरुजी बोले, मुझे तो कुछ नहीं दिख रहा तुम्हारे और अनाज के सिवा भक्त ने माथा पकड़ लिया, एक तो इतनी मेहनत करवाते हैं प्रभु, भूखा भी रखते हैं और ऊपर से गुरुजी को दिख भी नहीं रहे यह और बड़ी मुसीबत है। प्रभु से कहा, आप गुरुजी को क्यों नहीं दिख रहे हैं? प्रभु बोले : मैं उन्हें नहीं दिख सकता। बोला : क्यों  वे तो बड़े पंडित हैं, ज्ञानी हैं विद्वान हैं उन्हें तो बहुत कुछ आता है उनको क्यों नहीं दिखते आप? प्रभु बोले, माना कि उनको सब आता है पर वे सरल नहीं हैं तुम्हारी तरह। इसलिए उनको नहीं दिख सकता....

आनंद ने गुरुजी से कहा, गुरुजी प्रभु कह रहे हैं आप सरल नहीं है इसलिए आपको नहीं दिखेंगे, गुरुजी रोने लगे वाकई मैंने सबकुछ पाया पर सरलता नहीं पा सका तुम्हारी तरह, और प्रभु तो मन की सरलता से ही मिलते हैं। प्रभु प्रकट हो गए और गुरुजी को भी दर्शन दिए। इस तरह एक भक्त के कहने पर प्रभु ने रसोई भी बनाई, भक्ति का प्रथम मार्ग सरलता है!

👉 प्रवाह में न बहें, उत्कृष्टता से जुड़े (भाग १)

अपने चारों ओर फैला हुआ संसार हमें न जाने प्रत्यक्ष परोक्ष रूप से क्या-क्या सिखाता रहता है और अनायास ही न जाने किधर से किधर घसीटता रहता है। आँखें सर्वत्र धन वैभव की चमक-दमक देखती हैं और सम्पन्न लोगों को मौज-मजा करते हुए पाती हैं। भले ही कोई कुछ कहता न हो, पर यह वैभव हमारी अन्तःचेतना को अनायास ही सम्पत्तिवान बनने के लिए आकर्षित करता है।

धन के संग्रह और अभिवर्धन का जहाँ तक सम्बन्ध है नीति शास्त्र ने उसे सदा निरुत्साहित किया है। धर्म और अध्यात्म का, मानवीय आदर्शवादिता का प्रतिपादन धनियों के लिए अपरिग्रहण है। सौ हाथों से कमाया जाय किन्तु साथ ही उसे हजार हाथ से खर्च भी कर दिया जाय। कोई व्यक्ति अधिक कमा तो सकता है पर उसे अपने लिए उस देश के नागरिकों के सामान्य स्तर से अधिक खर्च अपने लिए नहीं करना चाहिए। सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के लिए, पिछड़े हुओं को ऊँचा उठाने के लिये उस उपार्जन को दान रूप में समाज को ही वापिस कर देना चाहिए। आदर्श यही है। पर इसे मानता कौन है? किसी भी तरीके से उचित अनुचित को ध्यान में रखे बिना अधिक से अधिक कमाया जाय और उससे अधिक से अधिक ठाट-बाट का विलासिता का उपयोग किया जाय, अधिक से अधिक शान-शौकत भरी अहन्ता का रोपण किया जाय। आज सर्वत्र यही हो रहा है।

विलासिता के इतने अधिक आकर्षण बढ़ते जाते हैं और उनका उपभोग करने वाले इतने चहकने लगते हैं कि अपना मन भी अनायास उसी ओर लालायित होता है। बाहर से आदर्शवाद की बातें कहने वाले भी भीतर-भीतर उसी लिप्सा में डूबे रहते हैं। जीवन का वास्तविक आनन्द विलास है। उसे प्राप्त करना हो तो नीति-अनीति का विचार छोड़ देना चाहिए। नीति से वैभव कैसे जुड़ेगा। उदारता बरतने से अपने पास क्या रहेगा? इसलिये निष्ठुर, विलासी, दुष्ट एवं अपराधी बनकर भी वैभव और विलास को अधिकाधिक मात्रा में उपलब्ध करना चाहिए, यही आज के वातावरण का हर व्यक्ति के लिए शिक्षण है। उस समर्थन में भाषण नहीं किये जाते, लेख नहीं छपते तो क्या, प्रस्तुत परिस्थितियों की प्रत्येक तरंग मस्तिष्क को यही सिखाती है। सो आमतौर से मनुष्य उसी भीख को स्वीकार भी करते हैं। लोक प्रवाह को हम उसी धारा में प्रवाहित होते हुए देखते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्वर्ग - नरक

स्वर्ग और नरक की कथाओं से धर्मग्रन्थ भरे पड़े हैं। जहाँ स्वर्ग की चर्चा है, वहाँ खुशियों के अनगिनत साधन हैं। प्रसन्नतादायक दृश्य हैं, आह्लादकारी वस्तुएँ एवं परिस्थितियाँ हैं। इसके विपरीत नरक की चर्चा दुःखों के आँसुओं से भीगी है। वहाँ के दृश्य पीड़ादायक हैं एवं वस्तुएँ व परिस्थितियाँ भयावह हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि धर्मग्रन्थों को पढ़ने वाले के मन में स्वर्ग की चाहत और नरक की दहशत भर जाय। कुछ ऐसा ही शेख रमीज़ के साथ हुआ। धर्मग्रन्थों के इस विवरण को पढ़ने के बाद पहले तो वह सोचता रहा, फिर उसने हिम्मत जुटाकर बाबा फरीद से पूछा- बाबा! मैं इस बात की सच्चाई जानना चाहता हूँ कि वास्तव में स्वर्ग और नरक कैसे हैं?
  
उसके इस सवाल पर बाबा फरीद हँस कर बोले- बस इतनी सी बात, चलो आँखें बन्द करो और देखो। उसने आँखें बन्द की और शान्त शून्यता में चला गया। फिर बाबा फरीद बोले, ‘अब स्वर्ग देखो’ और फिर थोड़ी देर बाद बोले ‘अब नरक’। जब शेख रमीज़ ने आँखें खोली तो उनमें अचरज था। उनके गुरु ने उनसे पूछा, क्या देखा? वह बोला, स्वर्ग में मैंने वह कुछ भी नहीं देखा, जिसकी कि लोग चर्चा करते हैं। न तो वहाँ अमृत की नदियाँ थीं और न ही स्वर्ण के महल थे, वहाँ तो ऐसा कुछ भी नहीं था। इसी तरह नरक में भी वैसा कुछ नहीं था- न वहाँ अग्नि ज्वालाएँ थीं और न पीड़ितों का रुदन। इसका कारण क्या है? क्या मैंने स्वर्ग और नरक नहीं देखे, या फिर सारे धर्मग्रन्थ झूठे हैं।
  
बाबा फरीद अपने इस शिष्य की बात पर हल्के से मुस्करा दिए और कहने लगे धर्मग्रन्थ भी सच है और तुमने भी निश्चय ही स्वर्ग और नरक देखें हैं। लेकिन अमृत की नदियाँ और स्वर्ण के महल अथवा फिर अग्नि की ज्वालाएँ और पीड़ा का रुदन खुद को ही वहाँ ले जाने पड़ते हैं। वे वहाँ नहीं मिलते। जो हम अपने साथ ले जाते हैं, वही वहाँ हमें उपलब्ध हो जाता है। हम ही स्वर्ग हैं और हम ही नरक हैं। व्यक्ति जो अपने अन्तस में होता है, उसे ही अपने बाहर भी पाता है। बाहरी दुनियाँ, आन्तरिक जगत् का ही प्रक्षेपण है। भीतर स्वर्ग है तो बाहर भी स्वर्ग है। और भीतर नरक हो तो बाहर भी नारकीय यातनाएँ ही मिलती हैं। स्वयं में ही सब कुछ छिपा हुआ है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १४३

👉 MISCONCEPTIONS ABOUT ELIGIBILITY FOR GAYATRI SADHANA (Part 6)

Q.6. Is Gayatri worship permissible for the non-vegetarians and those who take liquors?

Ans. It is said that Gayatri is a sacred Mantra and those who worship it should live a life of inner and outer purity. They should not take liquor, meat etc. It is good not to indulge in intoxicants. It is better to remain pure as far as possible. This, however, does not mean that no medicines should be given to a person living in unhealthy conditions. It is the speciality of Gayatri Mantra that by its worship, defects and vices of a person start falling off from the Sadhak’s nature. By taking a dip in the Ganga every living being becomes pure. None, not even a cow, buffalo, donkey, horse is prevented from entering into this sacred river. In the same way any person of any social status can perform Sadhana of Gayatri Mantra without any restrictions, whatsoever. His vices, defects will automatically go on reducing in the course of time. Just as the argument that a patient should not be given medicine is wrong, so also the statement that Gayatri Mantra should not be adopted if food and daily routine of a person are defective is fallacious.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 34

रविवार, 15 दिसंबर 2019

गीता का कर्म योग | Gita Ka Karm Yog | Pt Shriram Sharma Acharya



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👉 दिवमारूहत तपसा तपस्वी

व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक बन्धन और सामाजिक संवेदन−तीनों अध्याय एक−एक कर दृश्यपटल पर घूमते जाते हैं। महाश्रमण महावीर के धर्मोपदेश उस प्रकाश की तरह हैं जिसमें इन तीनों के उज्ज्वल पृष्ठ ही नहीं कषाय−कल्मषों के कथानक भी एक के ऊपर एक उभरते चले आते हैं। मेघ अनुभव करते हैं कि तृष्णाओं, वासनाओं और अहंताओं के जाल में जकड़ा जीवन नष्ट होता चला जा रहा है, पर लिप्साएँ शान्त नहीं हो पा रही वरन् और अधिक बढ़ती हैं उनकी पूर्ति के लिये और अधिक अनैतिक कृत्य पापों की गठरी बढ़ रही है काल दौड़ा आ रहा है जहाँ से उपभोग का अन्त हो जायेगा शरीर को नाश कर देने वाला क्षण अब आया कि तब आया तब फिर पश्चाताप के अतिरिक्त हाथ कुछ लगने वाला नहीं। विषय वासनाओं के कीचड़ में फँसे जीवन को विवेक−ज्योति से देखने पर निज का जीवन ही अत्यधिक घृणास्पद लगा। मेघ ने उधर से दृष्टि फेर ली।

काम, क्रोध, मद, मोह, द्वेष, द्वंद्व, घृणा तिरष्कार अनैतिकता अवांछनीयतायें यदि यही संसार है तो इसमें और नरक में अन्तर ही क्या। कुविचारों की कुत्सा में झुलसते मायावी जीवन में भी भला किसी को शान्ति मिल सकती है। हमारे महापुरुष महावीर यही तो कहते हैं कि मनुष्य को आध्यात्मवादी होना चाहिये, उसके बिना लोक−जप सम्भव नहीं। मुझे तप का जीवन जीना चाहिये।

निश्चय अटल हो गया। श्रेणिक पुत्र मेघ ने भगवान् महावीर से मन्त्र दीक्षा ली और महाश्रमण के साथ ही रहकर तपस्या में लग गये?

विरक्त मन को उपासना से असीम शान्ति मिलती है। कूड़े से जीवन में मणि−मुक्ता की−सी ज्योति झलझलाने लगती है, मन वाणी चित्त अलौकिक स्फूर्ति से भर जाते हैं, साधक को रस मिलने लगता है सो मेघ भी अधिकांश समय उसी में लगाते। किन्तु आर्य श्रेष्ठ महावीर की दृष्टि अत्यन्त तीखी थी वह जानते थे रस−रस सब एक हैं−चाहे वह भौतिक हों या आध्यात्मिक। रस की आशा चिर नवीनता से बँधी है इसीलिये जब तक नयापन है तब तक उपासना में रस स्वाभाविक है किन्तु यदि आत्मोत्कर्ष की निष्ठा न रही तो मेघ का मन उचट जायेगा, अतएव उसकी निष्ठा को सुदृढ़ कराने वाले तप की आवश्यकता है। सो वे मेघ को बार−बार उधर धकेलने लगे।

मेघ ने कभी रूखा भोजन नहीं किया था अब उन्हें रूखा भोजन दिया जाने लगा, कोमल शैया के स्थान पर भूमि शयन, आकर्षक वेषभूषा के स्थान पर मोटे वत्कल वस्त्र और सुखद सामाजिक सम्पर्क के स्थान राजगृह आश्रम की स्वच्छता, सेवा व्यवस्था एक एक कर इन सब में जितना अधिक मेघ को लगाया जाता उनका मन उतना ही उत्तेजित होता, महत्वाकांक्षाएं सिर पीटतीं और अहंकार बार−बार आकर खड़ा होकर कहता−ओ रे मूर्ख मेघ! कहाँ गया वह रस जीवन के सुखोपभोग छोड़कर कहाँ आ फँसा। मन और आत्मा का द्वन्द्व निरंतर चलते−चलते एक दिन वह स्थिति आ गई जब मेघ ने अपनी विरक्ति का अस्त्र उतार फेंका और कहने लगे तात! मुझे तो साधना कराइये, तप कराइये जिससे मेरा अन्तःकरण पवित्र बने।

तथागत मुस्कराये और बोले−तात! यही तो तप है। विपरीत परिस्थितियों में भी मानसिक स्थिरता−यह गुण जिसमें आ गया वही सच्चा तपस्वी−वही स्वर्ग विजेता−उपासना तो उसका एक अंग मात्र है।

मेघ की आंखें खुल गई और वे एक सच्चे योद्धा की भाँति मन से लड़ने को चल पड़े।
 

👉 ज्ञान की प्यास

ज्ञान की प्यास हम सबमें है। अन्तस् में कुछ जल रहा है, जो शान्त होना चाहता है। इस शान्ति के लिए अनेकों कोशिशें की जाती हैं। इंसान कितनी ही दिशाओं में इसे खोजता है। शायद अनगिनत जन्मों से यह खोज चल रही है। किसी मायामृग की खोज में उसका चित्त भटकता रहता है। लेकिन हर कदम पर उसे निराशा के अलावा और कुछ भी हाथ नहीं आता। कोई राह उसे मंजिल पर पहुँचाती हुई प्रतीत नहीं होती। गति होती है, पर गन्तव्य नजर नहीं आता। क्या जिन्दगी के ये टेढ़े-मेढ़े रास्ते कहीं भी नहीं ले जाते?
  
इस सवाल के उत्तर में तर्क पूर्ण व्याख्याएँ प्रस्तुत नहीं करनी हैं। जीवन की गहन-गहराइयों में उतरकर ज्ञान का शीतल स्रोत खोजना है, समाधान के सुरीले स्वर सुनने हैं। ज्ञान वाक् जाल में नहीं है। तर्कपूर्ण शब्दों में भी इसे नहीं पाया जा सकता। सच तो यह है कि बौद्धिक उत्तर खोजने में, उसके कुँहासे में वास्तविक उत्तर खो जाता है। बुद्धि मौन हो तो अनुभूति बोलती है। विचार चुप हो तो विवेक जगता है।
  
सच तो यह है कि जिन्दगी के मूलभूत प्रश्नों के उत्तर बौद्धिक तर्कों से नहीं मिलते। बौद्धिक तर्कों में ज्ञान का आभास तो है, पर ज्ञान नहीं है। ज्ञान के लिए तो ऋषिवाणी कहती है-‘न प्रवचनेन, न मेधया, न बहुना श्रुतेन’ यानि कि न प्रवचन से, न मेधा से और न बहुत सुनने से। ज्ञान तो ‘अनन्तं निर्विकल्पं’ है। शान्त और शून्य होने पर प्रकट होता है। तभी समस्याएँ गिर जाती हैं, प्रश्न पेड़ के सूखे पत्तों की तरह झड़ जाते हैं।
  
समाधान समाधि के शून्य से आता है। ज्ञान की इस किरण के फूटते ही चेतना के एक नये आयाम पर जीवन का प्रवेश हो जाता है। यही भाव दशा तो समाधि है। इसके लिए पूछें और शान्त हो जायें। गहरी शून्यता में डूबें। समाधि में समाधान को आने दें, फलने दें। चित्त की इस निस्तरंग-निर्विकल्प स्थिति में उसका दर्शन करें-जो है, सो मैं हूँ। स्वयं को जाने बिना ज्ञान की प्यास नहीं मिटती। स्वयं को खोजे बिना अन्तस् की जलन नहीं घटती। स्वयं को जानना ज्ञान है, बाकी सब जानकारी है। चित्त जिस क्षण भटकन भरी बौद्धिकता को छोड़कर चुप और थिर हो जाता है, उसी क्षण ‘सत्यम् ज्ञानम् अनन्तम् ब्रह्म’ के द्वार खुल जाते हैं। दिशा-शून्य चेतना प्रभु में विलीन हो जाती है। और ज्ञान की प्यास का अन्त केवल प्रभु मिलन में है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १४२

👉 MISCONCEPTIONS ABOUT ELIGIBILITY FOR GAYATRI SADHANA (Part 5)

Q.5. What are the basic reasons for the anti-women stance of some sects  in India?

Ans. During the medieval period there occurred overall degeneration and corruption in Indian society. Resources and power were usurped by a handful of corrupt rulers who ruthlessly exploited the poor and the downtrodden to fulfil their coffers and maintain a high style of living. It was the period of high tide  of corrupt practices. Bonded labour, keeping concubines, abduction, feudal wars, mass-murders and so many other vices took deep roots in the society. The scholars dependent on the feudal lords were force, or to write and insert spurious verses in the ancient scriptures to please their masters.
  
Women, too, could not escape this oppression. To exploit their youth, physical and intellectual capabilities, the social codes of conducts were modified and she was systematically brainwashed and subdued. The rulers, along with the so-called scholars, gave a religious justification for the traditions established by them. The women and the “untouchables” in India thus continuously suffered from dual oppression, from within the country and from the foreign invaders. Woman was made to accept the ‘virtues’ of ‘purdah’ (veil) and submissively follow the just and unjust demands of her ‘God-husband’. She was even compelled to commit suicide by forced immolation on the funeral pyre of her dead husband (the ancient tradition of sati). Depriving a woman from worship of  Gayatri was also part of this conspiracy.      

Ancient Indian history and scriptural disciplines provide ample evidence to show that the religion in India did not permit any discrimination whatsoever between the rights of men and women. On the contrary, woman was always considered superior to man and worthy of reverence. In ancient times, the Rishikas (nuns) participated  as equal with men in all religious rituals. When Gayatri herself has been symbolised as a female deity, what is the logic in denial of right of Gayatri worship to a woman?

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 33

शनिवार, 14 दिसंबर 2019

👉 बड़ा आदमी

बाहर बारिश हो रही थी, और अन्दर क्लास चल रही थी.
तभी टीचर ने बच्चों से पूछा - अगर तुम सभी को 100-100 रुपया दिए जाए तो तुम सब क्या क्या खरीदोगे?
किसी ने कहा - मैं वीडियो गेम खरीदुंगा..
किसी ने कहा - मैं क्रिकेट का बेट खरीदुंगा..
किसी ने कहा - मैं अपने लिए प्यारी सी गुड़िया खरीदुंगी..
तो, किसी ने कहा - मैं बहुत सी चॉकलेट्स खरीदुंगी..

एक बच्चा कुछ सोचने में डुबा हुआ था
टीचर ने उससे पुछा - तुम
क्या सोच रहे हो, तुम क्या खरीदोगे?
बच्चा बोला -टीचर जी मेरी माँ को थोड़ा कम दिखाई देता है तो मैं अपनी माँ के लिए एक चश्मा खरीदूंगा !
टीचर ने पूछा - तुम्हारी माँ के लिए चश्मा तो तुम्हारे पापा भी खरीद सकते है तुम्हें अपने लिए कुछ नहीं खरीदना ?
बच्चे ने जो जवाब दिया उससे टीचर का भी गला भर आया !
बच्चे ने कहा -- मेरे पापा अब इस दुनिया में नहीं है
मेरी माँ लोगों के कपड़े सिलकर मुझे पढ़ाती है, और कम दिखाई देने की वजह से वो ठीक से कपड़े नहीं सिल पाती है इसीलिए मैं मेरी माँ को चश्मा देना चाहता हुँ, ताकि मैं अच्छे से पढ़ सकूँ बड़ा आदमी बन सकूँ, और माँ को सारे सुख दे सकूँ.!

टीचर -- बेटा तेरी सोच ही तेरी कमाई है! ये 100 रूपये मेरे वादे के अनुसार और, ये 100 रूपये और उधार दे रहा हूँ। जब कभी कमाओ तो लौटा देना और, मेरी इच्छा है, तू इतना बड़ा आदमी बने कि तेरे सर पे हाथ फेरते वक्त मैं धन्य हो जाऊं !

20 वर्ष बाद..........

बाहर बारिश हो रही है, और अंदर क्लास चल रही है !
अचानक स्कूल के आगे जिला कलेक्टर की बत्ती वाली गाड़ी आकर रूकती है स्कूल स्टाफ चौकन्ना हो जाता हैं!
स्कूल में सन्नाटा छा जाता हैं!

मगर ये क्या?
जिला कलेक्टर एक वृद्ध टीचर के पैरों में गिर जाते हैं, और कहते हैं -- सर मैं .... उधार के 100 रूपये लौटाने आया हूँ!
पूरा स्कूल स्टॉफ स्तब्ध!
वृद्ध टीचर झुके हुए नौजवान कलेक्टर को उठाकर भुजाओं में कस लेता है, और रो पड़ता हैं!

👉 आदर्शवादी साहसिकता का उपयुक्त अवसर

मनुष्य अनुचित सोचते और अकर्म करते हैं तो सन्तुलन बिगड़ता है। व्यक्ति दुःख पाता है और समाज संकटग्रस्त होता है। स्थिति उसी प्रकार चलती रहे तो महाविनाश के गर्त में गिरना पड़ेगा। मानवी प्रयास जब अवांछनीयता को रोकने में उपेक्षा बरतते हैं अथवा अपने को असमर्थ समझते हैं तो महाकाल को स्थिति अपने हाथ में लेनी पड़ती है। सृष्टा को अपना यह विश्व उद्यान दुष्प्रवृत्तियों के कुचक्र में फँसकर नष्ट हो जाने देना स्वीकार नहीं। वे भूलोक की अपनी अनुपम कलाकृति को विनाश के गर्त में गिरने देता नहीं चाहते। अस्तु समय रहते सन्तुलन बनाने वाली शक्तियों का अवतरण होता है। वे जागृत आत्माओं के अन्तःकरणों में अपनी प्रकाश किरणें फेंकती हैं। उन्हें कठपुतली जैसा माध्यम बनाकर परिवर्तन का तूफान उत्पन्न करती है।

स्थिति की विषमता को सम्भालने के लिए भगवान इसी रूप में अवतार लेते हैं। युगान्तर चेतना के रूप में उसका अवतरण होता है। उसे कार्यान्वित करने में जो अग्रिम पंक्ति में खड़े होते हैं वे श्रेय पाते हैं। किन्तु उसमें योगदान असंख्यों का होता है। राम के रीछ बानर−कृष्ण के ग्वाल−बाल, बुद्ध के परिव्राजक−गान्धी के सत्याग्रही अवतार भूमिका के उपकरण कहे जा सकते हैं। श्रेय किसको मिला यह संयोग की बात है। परिवर्तन विचारधारा के तूफानी प्रवाह के रूप में आता है और असंख्यों को अपने प्रभाव से उद्वेलित करता है। जागृत आत्माओं को ऐसे अवसरों पर विशेष भूमिका निभानी पड़ती है। जो युग धर्म को समझते हैं−युग देवता का आह्वान सुनते हैं वे धन्य बनते हैं। उन दिनों जो असमंजस में पड़े रहते हैं उन्हें समय को न पहचान सकने की सदा पश्चात्ताप की आत्म प्रताड़ना ही सहन करनी पड़ती हैं।

अरुणोदय का पूर्वाभास पाकर मुर्गा पहले बाँग लगाता है, इस जागरुकता ने उसे प्रख्यात कर दिया। देर से तो सभी पक्षी जगते हैं, पर वे वैसी ख्याति नहीं पाते। उगते सूर्य को नमस्कार किया जाता है पीछे तो वह दिन भर ही बना सकता है। शुक्ल पक्ष में सर्वप्रथम निकलने वाले दौज के चन्द्रमा का दर्शन करने के लिए सब आतुर रहते हैं। पीछे तो वह महीने भर घटता बढ़ता बना ही रहता है। जन्म का पहला दिन स्मरणीय रहता है ऐसे तो जिन्दगी में हजारों दिन आते और चले जाते हैं। पर्वत चोटियों के बारे में प्रथम शोध करने वालों के नाम पर एवरेस्ट आदि शिखरों के नाम रखे गये हैं। नेपच्यून, प्लूटो आदि के नाम भी उनके शोधकर्त्ताओं के नाम पर रखे गये हैं। पीछे तो उनके शोध करने वाले अनेक पैदा होते रहे हैं। फोटो में साफ तस्वीर उनकी आती है जो ग्रुप की अगली पंक्ति में खड़े होते हैं। साहस उन्हीं का सराहनीय है जो दूसरों की प्रतीक्षा न करके अपनी साहसिकता का परिचय देते हैं।

युग परिवर्तन अगले दिनों की सुनिश्चित सच्चाई है। ईश्वरीय प्रयोजन पूरे होने हैं। गीता में भगवान अर्जुन को यही समझाते हैं कि यह कौरव दल तो मरा रखा है। तेरे पीछे हटने पर भी वह दूसरी प्रकार से मरेगा। सुनिश्चित सफलता के श्रेय को उपलब्ध करना ही बुद्धिमत्ता है। युग देवता की पुकार सुनने, माँग पूरी करने और प्रेरणा का अनुसरण करने के लिए तो देर सवेर में अभी को हाथ उठाने और पैर बढ़ाने पड़ेंगे। सराहना उनकी है जो समय रहते चेतते हैं। स्वतन्त्रता संग्राम में थोड़े−थोड़े दिन के लिए जेल गये लोग शासन सम्भालते और पेन्शन पाते देखे जा सकते हैं। जो उस समय चूक गये उनके लिए वह संयोग कभी भी आ नहीं सका। जागृत आत्माओं को युग देवता ने पुकारा है और कहा है वे अग्रिम पंक्ति में खड़े हों। हनुमान, अंगद की−भीम, अर्जुन की भूमिका सम्पन्न करें। जो स्वीकार करेंगे वे न भौतिक दृष्टि से घाटे में रहेंगे न आत्मिक दृष्टि से। जो असमंजस में पड़े रहेंगे उन्हें पश्चात्ताप ही पल्ले बाँध कर प्रयास करना पड़ेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1978 पृष्ठ 40

👉 MISCONCEPTIONS ABOUT ELIGIBILITY FOR GAYATRI SADHANA (Part 4)

Q.4. Are women entitled to take up Gayatri Sadhana?
Ans. For countering the oft-repeated arguments against women’s right to Gayatri worship, let us try to understand the basic principles of ancient Indian culture. It propounds a global religion, for the entire humanity. Nowhere does it support the illogical inequalities based on differentiation of caste, sex etc. The code of conduct in Hindu religion assigns equality of status to all human beings in all respects with unity and compassion as its basic tenets. Thus, the abridgement of natural human civil and religious rights of women is, therefore, not in conformity with authentic Indian spiritual tradition. On the contrary, Hindu culture regards the female of human species as superior to its male counterpart. How could then the wise sages of India deprive the women of practice of Gayatri Sadhana? The spirit of Indian ethos is totally against any such discrimination. Gayatri is accessible to every individual of human species. Any thought or belief contrary to this concept is sheer nonsense and should not be given any importance.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 31

👉 मन ही मन भगवान से क्या बातें करें...क्या मांगे।

1. हे मेरे स्वामी! मेरी इच्छा कभी पूर्ण न हो सदैव आपकी ही इच्छा पूर्ण हो.क्योंकि मेरे लिए क्या सही है ये मुझसे बेहतर आप जानते हैं।

2. हे नाथ! मेरे मन, कर्म और वचन से कभी किसी को भी थोड़ा सा भी दुःख न पहुँचे यह कृपा बनाये रखे।

3. हे नाथ! मैं कभी न पाप करूँ, न होता देखूं सुनू और न ही कभी किसी के पाप का बखान करूँ।

4. हे नाथ! शरीर के सभी इन्द्रियों से आठो पहर केवल आपके प्रेम भरी लीला का ही आस्वादन करता रहूँ।

5. हे नाथ! प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थिति में भी आपके मंगलमय विधान देख सदैव प्रसन्न रहूँ।

6. हे नाथ! अपने ऊपर महान से महान विपत्ति आने पर भी दूसरों को सदैव सुख ही दिया करू।

7. हे नाथ! अगर कभी किसी कारणवश मेरे वजह से किसी को दुःख पहुँचे तो उसी समय उससे हाथ जोड़कर क्षमा माँग लू।

8. हे नाथ! आठो पहर रोम रोम से केवल आपके नाम का ही जप होता रहे।

9. हे नाथ! मेरे आचरण श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस के अनुकूल हो।

10. हे नाथ! हर एक परिस्थिति में मुझे आपके ही दर्शन हो।

बुधवार, 11 दिसंबर 2019

👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोजन कर रहे थे, कि अचानक राजा ने बातों ही बातों मे अपनी तीनों पुत्रियो से कहा- एक बात बताओ, तुम तीनो अपने भाग्‍य से खाते-पीते हो या मेरे भाग्‍य से?"

दो बडी पुत्रियो ने कहा कि- "पिताजी हम आपके भाग्‍य से खाते हैं। यदि आप हमारे पिता महाराज न होते, तो हमें इतनी सुख-सुविधा व विभिन्‍न प्रकार के व्‍यंजन खाने को नसीब नहीं होते। ये सब आपके द्वारा अर्जित किया गया वैभव है, जिसे हम भोग रहे हैं।"

पुत्रियों के मुँह से यह सुन कर राजा को अपने आप पर बडा गर्व और खु:शी हो रही थी लेकिन राजा की सबसे छोटी पुत्री ने इसी प्रश्‍न के उत्‍तर में कहा कि- "पिताजी मैं आपके भाग्‍य से नहीं बल्कि अपने स्‍वयं के भाग्‍य से यह सब वैभव भोग रही हुँ।" छोटी पुत्री के मुँख से ये बात सुन राजा के अहंकार को बडी ठेस लगी। उसे गुस्‍सा भी आया और शोक भी हुआ क्‍योंकि उसे अपनी सबसे छोटी पुत्री से इस प्रकार के जवाब की आशा नहीं थी।

समय बीतता गया, लेकिन राजा अपनी सबसे छोटी पुत्री की वह बात भुला नहीं पाया और समय आने पर राजा ने अपनी दोनो बडी पुत्रियो की विवाह दो राजकुमारो से करवा दिया परन्‍तु सबसे छोटी पुत्री का विवाह क्रोध के कारण एक गरीब लक्‍कडहारे से कर दिया और विदाई देते समय उसे वह बात याद दिलाते हुए कहा कि- "यदि तुम अपने भाग्‍य से राज वैभव का सुख भोग रही थी, तो तुम्‍हें उस गरीब लकड़हारे के घर भी वही राज वैभव का सुख प्राप्‍त होगा, अन्‍यथा तुम्‍हें भी ये मानना पडे़गा कि तुम्‍हे आज तक जो राजवैभव का सुख मिला, वह तुम्‍हारे नहीं बल्कि मेरे भाग्‍य से मिला।"

चूंकि, लक्‍कडहारा बहुत ही गरीब था, इसलिए निश्चित ही राजकुमारी को राजवैभव वाला सुख तो प्राप्‍त नहीं हो रहा था। लक्‍कड़हारा दिन भर लकडी काटता और उन्‍हें बेच कर मुश्किल से ही अपना गुजारा कर पाता था। सो, राजकुमारी के दिन बडे ही कष्‍ट दायी बीत रहे थे लेकिन वह निश्चित थी, क्‍योंकि राजकुमारी यही सोचती कि यदि उसे मिलने वाले राजवैभव का सुख उसे उसके भाग्‍य से मिला था, तो निश्चित ही उसे वह सुख गरीब लक्‍कड़हारे के यहाँ भी मिलेगा।

एक दिन राजा ने अपनी सबसे छोटी पुत्री का हाल जानना चाहा तो उसने अपने कुछ सेवको को उसके घर भेजा और सेवको से कहलवाया कि राजकुमारी को किसी भी प्रकार की सहायता चाहिए तो वह अपने पिता को याद कर सकती है क्‍योंकि यदि उसका भाग्‍य अच्‍छा होता, तो वह भी किसी राजकुमार की पत्नि होती।

लेकिन राजकुमारी ने किसी भी प्रकार की सहायता लेने से मना कर दिया, जिससे महाराज को और भी ईर्ष्‍या हुई अपनी पुत्री से। क्राेध के कारण महाराज ने उस जंगल को ही निलाम करने का फैसला कर लिया जिस पर उस लक्‍कड़हारे का जीवन चल रहा था।

एक दिन लक्‍कडहारा बहुत ही चिंता मे अपने घर आया और अपना सिर पकड़ कर झोपडी के एक कोने मे बैठ गया। राजकुमारी ने अपने पति को चिंता में देखा तो चिंता का कारण पूछा और लक्‍कड़हारे ने अपनी चिंता बताते हुए कहा कि- "जिस जंगल में मैं लकडी काटता हुँ, वह कल निलाम हो रहा है और जंगल को खरीदने वाले को एक माह में सारा धन राजकोष में जमा करना होगा, पर जंगल के निलाम हो जाने के बाद मेरे पास कोई काम नही रहेगा, जिससे हम अपना गुजारा कर सके।"

चूंकि, राजकुमारी बहुत समझदार थी, सो उसने एक तरकीब लगाई और लक्‍कडहारे से कहा कि- "जब जंगल की बोली लगे, तब तुम एक काम करना, तुम हर बोली मे केवल एक रूपया बोली बढ़ा देना।"

दूसरे दिन लक्‍कड़हारा जंगल गया और नीलामी की बोली शुरू हुई और राजकुमारी के समझाए अनुसार जब भी बोली लगती, तो लक्‍कड़हारा हर बोली पर एक रूपया बढा कर बोली लगा देता। परिणामस्‍वरूप अन्‍त में लक्‍कड़हारे की बोली पर वह जंगल बिक गया लेकिन अब लक्‍कड़हारे को और भी ज्‍यादा चिंता हुई क्‍योंकि वह जंगल पांच लाख में लक्‍कड़हारे के नाम पर छूटा था जबकि लक्‍कड़हारे के पास रात्रि के भोजन की व्‍यवस्‍था हो सके, इतना पैसा भी नही था।

आखिर घोर चिंता में घिरा हुआ वह अपने घर पहुँचा और सारी बात अपनी पत्नि से कही। राजकुमारी ने कहा- "चिंता न करें आप, आप जिस जंगल में लकड़ी काटने जाते है वहाँ मैं भी आई थी एक दिन, जब आप भोजन करने के लिए घर नही आये थे और मैं आपके लिए भोजन लेकर आई थी। तब मैंने वहाँ देखा कि जिन लकडियों को आप काट रहे थे, वह तो चन्‍दन की थी। आप एक काम करें। आप उन लकड़ीयों को दूसरे राज्‍य के महाराज को बेंच दें। चुंकि एक माह में जंगल का सारा धन चुकाना है सो हम दोनों मेहनत करके उस जंगल की लकडि़या काटेंगे और साथ में नये पौधे भी लगाते जायेंगे और सारी लकड़ीया राजा-महाराजाओ को बेंच दिया करेंगे।"

लक्‍कड़हारे ने अपनी पत्नि से पूंछा कि "क्‍या महाराज को नही मालुम होगा कि उनके राज्‍य के जंगल में चन्‍दन का पेड़ भी है।"

राजकुमारी ने कहा- "मालुम है, परन्‍तु वह जंगल किस और है, यह नही मालुम है।"

लक्‍कड़हारे को अपनी पत्नि की बात समझ में आ गई और दोनो ने कड़ी मेहनत से चन्‍दन की लकड़ीयों को काटा और दूर-दराज के राजाओं को बेंच कर जंगल की सारी रकम एक माह में चुका दी और नये पौधों की खेप भी रूपवा दी ताकि उनका काम आगे भी चलता रहे।

धीरे-धीरे लक्‍कड़हारा और राजकुमारी धनवान हो गए। लक्‍कड़हारा और राजकुमारी ने अपना महल बनवाने की सोच एक-दूसरे से विचार-विमर्श करके काम शुरू करवाया। लक्‍कड़हारा दिन भर अपने काम को देखता और राजकुमारी अपने महल के कार्य का ध्‍यान रखती। एक दिन राजकुमारी अपने महल की छत पर खडी होकर मजदूरो का काम देख रही थी कि अचानक उसे अपने महाराज पिता और अपना पूरा राज परिवार मजदूरो के बीच मजदूरी करता हुआ नजर आता है।

राजकुमारी अपने परिवारवालों को देख सेवको को तुरन्‍त आदेश देती है कि वह उन मजदूरो को छत पर ले आये। सेवक राजकुमारी की बात मान कर वैसा ही  करते हैं। महाराज अपने परिवार सहित महल की छत पर आ जाते हैं और अपनी पुत्री को महल में देख आर्श्‍चय से पूछते हैं कि तुम महल में कैसे?

राजकुमारी अपने पिता से कहती है कि- "महाराज… आपने जिस जंगल को निलाम करवाया, वह हमने ही खरीदा था क्‍योंकि वह जंगल चन्‍दन के पेड़ों का था।"

और फिर राजकुमारी ने सारी बातें राजा को कह सुनाई। अन्‍त में राजा ने स्‍वीकार किया कि उसकी पुत्री सही थी।

👉 शक्ति पूजा का रहस्य

शक्ति पूजा के लिए जरूरी है- शक्ति संचय। इसके बिना न तो शक्ति पूजा बन पड़ती है और न ही जीवन में इसके सुफल मिल पाते हैं। जहाँ शक्ति का संचय होता है, वहीं सुख-सत्कार व शान्ति के पुष्प बरसते हैं। इसके विपरीत जहाँ शक्ति का अभाव होता है, वहाँ दुःख, तिरस्कार व कलह के काँटे ही बिखरे रहते हैं। जो शक्ति का संचय करते हैं, उन्हें ही समर्थ, बलवान्, बुद्धिमान् व सौभाग्यशाली कहा जाता है। शक्ति संचय की उपेक्षा करने वाले तो असहाय, अशक्त, निर्बल, दुर्बल व दरिद्र कहकर पग-पग पर अपने दुर्भाग्य की यातना सहते हैं।
  
जो शक्ति पूजा के इच्छुक हैं, उन्हें शक्ति संचय के लिए भी कमर कसनी पड़ेगी। उनको अभी और इसी क्षण से माँ महाशक्ति की पूजा के लिए पंचोपचार की तैयारी करनी होगी। इन पंचोपचारों के क्रम में पहली है- शारीरिक शक्ति, २. मानसिक शक्ति, ३. भावनात्मक शक्ति, ४. आर्थिक शक्ति एवं ५. आध्यात्मिक शक्ति। इन पाँच शक्तियों का अभाव ही मानव को पीड़ा की प्रताड़ना सहने के लिए विवश करता है। इन्हीं पाँच शक्तियों की बर्बादी मनुष्य को पतन के गहरे अँधेरों में धकेलती है। जबकि इन पाँचों शक्तियों के संचय से व्यक्ति की प्रसन्नता शतगुणित होती है और सत्कर्मों में इनके सद्व्यय से वह निरन्तर उत्थान के सोपान चढ़ता है।
  
नवरात्रि के नौ दिन शक्ति पूजा के इसी रहस्य को समझने के दिन हैं। इन नौ दिनों में हमें अपनी संचित शक्ति से माँ भगवती की पूजा करनी है। इन नौ दिनों में यूं तो अनगिन रहस्य समाये हैं किन्तु प्रधानतया इन रहस्यों की संख्या नौ ही है, जो गायत्री के महामंत्र के नौ शब्दों १. तत्, २. सवितुः, ३. वरेण्यं, ४. भर्गो, ५. देवस्य, ६. धीमहि, ७. धियो, ८.योनः ९. प्रचोदयात् में समाहित हैं। इन्हीं नौ शब्दों की महिमा से भूः भुवः स्वः के रूप में स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण इन तीन शरीरों की सभी शक्तियों का जागरण होता है और इसी के फलस्वरूप ॐकार के परम पद की प्राप्ति होती है। पर ऐसा होता उन्हीं के जीवन में है, जो अपने जीवन के क्षण-क्षण में शक्ति के कण-कण का संचय करते हैं और साथ ही सत्कर्मों के रूप में इसका सद्व्यय करके विश्व-व्यापिनी माँ जगदम्बा गायत्री की अर्चना-आराधना करते हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १४१

👉 MISCONCEPTIONS ABOUT ELIGIBILITY FOR GAYATRI SADHANA (Part 3)

Q.3. Do Brahmans have a special privilege to do Gayatri Sadhana?

Ans. The professed proprietary right of Brahmans (by birth) on Gayatri worship is ridiculous. Credit for embodiment and elaboration of mysticism of Mahamantra Gayatri goes to rishi Vishwamitra, who belonged to Kshatriya caste by birth. Thus, even if the caste is considered essential for Gayatri worship, the Kshatriyas should have priority over other castes.
  
The concept of Brahmanism has an entirely different connotation. A Brahman is one who conforms to the wisdom of Brahma (Brahmaparayan) and has an exemplary character. Only such persons of refined character can derive maximum advantage from Gayatri worship. It has been said that Gayatri is Kamdhenu of Brahmans. In several Sanskrit couplets, Dwijs alone have been described as entitled to worship Gayatri.

Traditionally, the words Dwij and Brahman have been considered as synonymous. In this way each Dwij or Brahman was supposed to have the exclusive privilege of worship of Gayatri. Does it mean that individuals belonging to other castes were scripturally prohibited from worshipping Gayatri?

The confusion has arisen because of misunderstanding of the meanings of words like Brahman, Dwij and caste, which are being misconstrued as hereditary distinctions conferred by God on various classes of society. Nothing can be more absurd than considering the Creator as  discriminative and partial, making people take birth in a family of high or low caste.

When scriptures declare that Gayatri is kamdhenu of Brahmans i.e. Gayatri fulfils all desires of a Brahman, they mean that any human being who diligently aspires to be a Brahman by following righteousness in thoughts, words and  deeds gets an access to the benefits of Gayatri. That is to say, Brahmanism is a pre-requisite for Gayatri worship.

As regards the world Dwij it literally means ‘born again’. The initiation to Gayatri is the spiritual birth of a person, who has otherwise taken birth as any other animal. This initiation or Diksha is like ‘Baptism’ amongst the Christians and is akin  to admission in the primary class of the school of spirituality. The concept of caste has been grossly distorted, misunderstood and misappropriated by vested interests. In Vedic times, division of civic responsibilities into four classes of people who were given education and training pertaining to their respective assignments was considered expedient. Each of this class was referred to as a varna. In course of time, when successive generations began to follow the same profession varnas got ossified into ‘castes’. With the  change in social environment, certain castes assumed greater prominence in the society and in order to retain their supremacy propagated the concept of caste by birth as a God-given status.    

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 30

👉 तेरा विश्वास शक्ति बने, याचना नहीं

हे प्रभो! मेरी केवल एक ही कामना है कि मैं संकटों से डर कर भागूं नहीं, उनका सामना करूं। इसलिए मेरी यह प्रार्थना नहीं है कि संकट के समय तुम मेरी रक्षा करो बल्कि मैं तो इतना ही चाहता हूँ कि तुम उनसे जूझने का बल दो। मैं यह भी नहीं चाहता कि जब दुःख सन्ताप से मेरा चित्त व्यथित हो जाय तब तुम मुझे सान्त्वना दो। मैं अपनी अञ्जलि के भाव सुमन तुम्हारे चरणों में अर्पित करते हुए इतना ही माँगता हूँ कि तुम मुझे अपने दुःखों पर विजय प्राप्त करने की शक्ति दो।

जब किसी कष्टप्रद और संकट की घड़ी में मुझे कहीं से कोई सहायता न मिले तो मैं हिम्मत न हारूं। किसी और स्रोत से सहायता की याचना न करूँ, न उन घड़ियों में मेरा मनोबल क्षीण होने पाये। हे प्रभो! मुझे ऐसी दृढ़ता और शक्ति देना जिससे कि मैं कठिन से कठिन घड़ियों में भी−संकटों और समस्याओं के सामने भी दृढ़ रह सकूँ और तुम्हें हर घड़ी अपने साथ देखते हुए उन्हें हँसी खेल समझ कर अपने चित्त को हल्का रखूँ। मैं बस यही चाहता हूँ।

चाहे जैसी ही प्रतिकूलताएँ हों, व्यवहार में मुझे कितनी ही हानि क्यों न उठानी पड़े इसकी मुझे जरा भी परवाह नहीं है। लेकिन प्रभु मुझे इतना कमजोर मत होने देना कि मैं आसन्न संकटों को देखकर हिम्मत हार बैठूँ और यह रोने बैठ जाऊँ कि अब क्या करूँ मेरा सर्वस्व छिन गया।

प्रभु तुम्हारा और केवल तुम्हारा विश्वास ग्रहण कर लोगों ने अकिंचन अवस्था में रहते हुए भी इतिहास की श्रेष्ठ उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। मैं इतना ही चाहता हूँ कि तुम्हारा विश्वास मेरे लिए शक्ति बने याचना नहीं, सम्बल बने−क्षीणता नहीं। बस इतनी ही कृपा करना।

रवींद्रनाथ टैगोर
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1978 पृष्ठ 1

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1978/March/v1/

मंगलवार, 10 दिसंबर 2019

👉 परम मित्र कौन है?

एक व्यक्ति था उसके तीन मित्र थे। एक मित्र ऐसा था जो सदैव साथ देता था। एक पल, एक क्षण भी बिछुड़ता नहीं था।

दूसरा मित्र ऐसा था जो सुबह शाम मिलता।

और तीसरा मित्र ऐसा था जो बहुत दिनों में जब तब मिलता।

एक दिन कुछ ऐसा हुआ की उस व्यक्ति को अदालत में जाना था और किसी कार्यवश साथ में किसी को गवाह बनाकर साथ ले जाना था। अब वह व्यक्ति अपने सब से पहले अपने उस मित्र के पास गया जो सदैव उसका साथ देता था और बोला :- "मित्र क्या तुम मेरे साथ अदालत में गवाह बनकर चल सकते हो?

वह मित्र बोला :- माफ़ करो दोस्त, मुझे तो आज फुर्सत ही नहीं। उस व्यक्ति ने सोचा कि यह मित्र मेरा हमेशा साथ देता था। आज मुसीबत के समय पर इसने मुझे इंकार कर दिया।

अब दूसरे मित्र की मुझे क्या आशा है। फिर भी हिम्मत रखकर दूसरे मित्र के पास गया जो सुबह शाम मिलता था, और अपनी समस्या सुनाई।

दूसरे मित्र ने कहा कि :- मेरी एक शर्त है कि मैं सिर्फ अदालत के दरवाजे तक जाऊँगा, अन्दर तक नहीं।

वह बोला कि :- बाहर के लिये तो मै ही बहुत हूँ मुझे तो अन्दर के लिये गवाह चाहिए। फिर वह थक हारकर अपने तीसरे मित्र के पास गया जो बहुत दिनों में मिलता था, और अपनी समस्या सुनाई।

तीसरा मित्र उसकी समस्या सुनकर तुरन्त उसके साथ चल दिया।

अब आप सोच रहे होंगे कि...
वो तीन मित्र कौन है...?

तो चलिये हम आपको बताते है इस कथा का सार।

जैसे हमने तीन मित्रों की बात सुनी वैसे हर व्यक्ति के तीन मित्र होते हैं। सब से पहला मित्र है हमारा अपना 'शरीर' हम जहा भी जायेंगे, शरीर रुपी पहला मित्र हमारे साथ चलता है। एक पल, एक क्षण भी हमसे दूर नहीं होता।

दूसरा मित्र है शरीर के 'सम्बन्धी' जैसे :- माता - पिता, भाई - बहन, मामा -चाचा इत्यादि जिनके साथ रहते हैं, जो सुबह - दोपहर शाम मिलते है।

और तीसरा मित्र है :- हमारे 'कर्म' जो सदा ही साथ जाते है।

अब आप सोचिये कि आत्मा जब शरीर छोड़कर धर्मराज की अदालत में जाती है, उस समय शरीर रूपी पहला मित्र एक कदम भी आगे चलकर साथ नहीं देता। जैसे कि उस पहले मित्र ने साथ नहीं दिया।

दूसरा मित्र - सम्बन्धी श्मशान घाट तक यानी अदालत के दरवाजे तक "राम नाम सत्य है" कहते हुए जाते हैं तथा वहाँ से फिर वापिस लौट जाते है।

और तीसरा मित्र आपके कर्म हैं।
कर्म जो सदा ही साथ जाते है चाहे अच्छे हो या बुरे।

अब अगर हमारे कर्म सदा हमारे साथ चलते है तो हमको अपने कर्म पर ध्यान देना होगा अगर हम अच्छे कर्म करेंगे तो किसी भी अदालत में जाने की जरुरत नहीं होगी।

और धर्मराज भी हमारे लिए स्वर्ग का दरवाजा खोल देगा।

रामचरित मानस की पंक्तियां हैं कि...
"काहु नहीं सुख-दुःख कर दाता।
निजकृत कर्म भोगि सब भ्राता।।"

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तमसो मा ज्योतिर्गमय
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👉 MISCONCEPTIONS ABOUT ELIGIBILITY FOR GAYATRI SADHANA (Part 2)

Q.2. Is it true that Gayatri Sadhana is permissible to a particular caste only ?

Ans. The concept of caste is grossly misunderstood in the modern society. Ancient Indian Culture did not relate the caste system to one’s parentage or ancestry. In those days, defaulters of basic codes of social conduct were deprived of normal civil rights. They were compelled by the society to undertake specific duties along with deprivation of the right to worship Gayatri. The caste of a person thus denoted the field of his activity rather than his parentage. Denial of worship was, therefore, a punishment to the guilty. In the present context, the codes for “social punishment” have changed. Work-assignments have also undergone a sea-change. Under these circumstances, all human beings, owing their existence to the one Supreme Being, are entitled to worship Gayatri irrespective of their ancestry, parentage or belief.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 28

👉 कुछ ख़ास बातें..

1. आप कुछ नहीं करेंगे..
तो आप को कोई कुछ नहीं कहेगा..!!

2. आप अगर सक्रिय हैँ..
तो हमेशा आप पर उँगलियाँ उठेगी..!!

3. अगर आप ये नहीं सोचेंगे..
कि श्रेय किसको मिलेगा..
तो आप बहुत कुछ कर सकते हैँ..!!

4. आपके जितने विरोधी होंगे..
आपका उतना बड़ा कद होगा..!!

5. आप जितना ज्यादा काम करेंगे..
उतना ज्यादा और काम करना पड़ेगा..!!

6. जिम्मेदारी उसी की तरफ खिंची आती हैं..
जो उन्हें उठाना चाहता है..!!

7. आप जो भी प्रोजेक्ट करेंगे..
उसकी सफलता का श्रेय संस्था को मिलेगा..
और असफलता की जवाबदेही आपकी होगी..!!

8. जो आपका सबसे अच्छा हितैषी है..
वो आपके मुँह पर आपकी आलोचना करेगा.!!

9. आप को प्रशंसा जब मिलेगी..
जब आप उसकी अपेक्षा करना बंद कर देंगे..!!

10. आप लोकप्रिय तब होंगे..
जब अपने साथियों के कार्यों को सराहेंगे..
और उनका उत्साह बढ़ाएंगे..!!

11. आप कब सही थे..कोई याद नहीं रखेगा, आप कब गलत थे..कोई नहीं भूलेगा..!!

12. आप जितना नियम मान कर चलेंगे..
आप पर उतना ज्यादा नियम मानने का दबाव बनाया जायेगा..!!

सबसे ख़ास बात..
सामाजिक कार्यों का उद्देश्य मन की संतुष्टि होता है..और इस के लिए बहुत कुछ सहना होता है..और आत्मसंतुष्टि से बढ़कर कुछ नहीं है...!!!

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा

आध्यात्मिक चिकित्सा- बोध, निदान एवं विज्ञान का पूर्ण तंत्र है। इसमें जीवन की दृश्य-अदृश्य संरचना का सम्पूर्ण बोध है। इसी के साथ यहाँ जीवन के दैहिक-दैविक एवं आध्यात्मिक रोगों के निदान की सूक्ष्म विधियों का समग्र ज्ञान है। इतना ही नहीं इसमें इन सभी रोगों के सार्थक समाधान का प्रायोगिक विज्ञान भी समाविष्ट है, जो मानव जीवन की सम्पूर्ण चिकित्सा के ऋषि संकल्प को दुहराता है।
  
यह वही महासंकल्प है, जो ऋग्वेद के दशम मण्डल के रोग निवारण सूक्त के पंचम मंत्र के ऋषि विश्वामित्र की अन्तर्चेतना में गूँजा था। नवयुग की नवीन सृष्टि करने वाले ब्रह्मर्षि विश्वामित्र उन क्षणों में चिन्तन में निमग्न थे। तभी उन्हें एक करूण, आर्त स्वर सुनाई दिया। यह विकल स्वर एक दुःखी नारी का था, जिसे उनका शिष्य जाबालि लिए आ रहा था। इस युवती नारी को रोगों ने असमय वृद्ध बना दिया था।
  
पास आते ही ब्रह्मज्ञानी महर्षि ने उसकी व्यथा के सारे सूत्र जान लिए। और जाबालि को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा- वत्स! चिकित्सा की सारी प्रचलित विधियाँ एवं औषधियाँ इस पर नाकाम हो गयी हैं, यही कहना चाहते हो न। हँं आचार्यवर...। वह अभी आगे कुछ कह पाता तभी ऋषि बोले-वत्स! अभी एक चिकित्सा विधि बाकी है- और वह है आध्यात्मिक चिकित्सा। तुम्हारे सम्मुख मैं आज इसका प्रयोग करूँगा।
  
शिष्य जाबालि अपने आचार्य की अनन्त आध्यात्मिक शक्तियों से परिचित थे, सो वे शान्त रहे। फिर भी उनमें जिज्ञासा तो थी ही। जिसका समाधान करते हुए अन्तर्यामी ब्रह्मर्षि बोले- पुत्र जाबालि, सफल चिकित्सा के लिए जीवन का समग्र बोध आवश्यक है। और जीवन मात्र देह नहीं है। इसमें इन्द्रिय, प्राण, मन, चित्त, बुद्धि, अहं एवं अन्तरात्मा की अन्य अदृश्य कड़ियाँ भी हैं। रोग के सही निदान के लिए इनका पारदर्शी ज्ञान होना चाहिए। तभी समाधान का विज्ञान कारगर होता है। यह कहते हुए महर्षि ने उस पीड़ित नारी को सामने बिठाकर उसे अपने महातप के एक अंश का अनुदान देने का संकल्प करते हुए कहा- आ त्वागमं शंतातिभिरथो अरिष्टातातिभिः। दक्षं त उग्रमाभारिषं परा यक्ष्मं सुवामि ते॥
  
अर्थात्- ‘आपके पास शान्ति फैलाने वाले तथा अविनाशी साधनों के साथ आया हूँ। तेरे लिए प्रचण्ड बल भर देता हूँ। तेरे रोग को दूर भगा देता हूँ।’ महर्षि के इस संकल्प ने उस पीड़ित नारी को स्वास्थ्य का वरदान देने के साथ आध्यात्मिक चिकित्सा की पुण्य परम्परा का प्रारम्भ भी किया।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३५

Jeevan Ki Bagdor Aapke Hath Mai | जीवन की बागडोर आपके हाथ में | Pt Shrir...



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👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (अंतिम भाग)

सुख-दुःख के प्रति यदि मनुष्य का दृष्टिकोण सम हो जाये तो उसके लिये चिन्ता, शोक, व्यग्रता तथा विकलता के सारे ही कारण समाप्त हो जायें। अपने प्र...