स्वाध्याय की जोड़ी सत्संग से मिलती है। इसे नियमित रूप से जारी रखने के लिये मनन और चिन्तन को भी अपनी दैनिक क्रम व्यवस्था में सम्मिलित करना चाहिए। जीवन की विभिन्न समस्याओं को सुलझाने के लिये अपनी मान्यता और चेष्टा क्या है इसका गम्भीरता पूर्वक विश्लेषण करते रहना चाहिये और भूलों को सुधारने तक तथा प्रगति में प्रोत्साहित करने के लिये इसी चिन्तन में भविष्य की रूप रेखा निर्धारित करते रहना चाहिये। प्रस्तुत समस्याओं का क्रमशः समग्र चिन्तन और उनके आदर्शवादी समाधानों का निष्कर्ष यही मनन चिन्तन का मूलभूत प्रयोजन है। सत्संग की दैनिक आवश्यकता को यह क्रम अपनाकर पूरा किया जा सकता है।
मनन और चिन्तन का क्रम प्रातःकाल आँख खुलते ही और रात को सोने के लिये बिस्तर पर जाते ही आरम्भ किया जाना चाहिये। आँख खुलने और बिस्तर छोड़ने के बीच प्रातःकाल कुछ तो समय रहता है। आँख खुलते ही कोई तुरन्त नहीं उठ बैठता। कुछ समय ऐसे ही सब लोग पड़े रहते हैं। इस समय को मनन में लगाना चाहिये। अपने आपसे अपने और अपने शरीर के बीच का अन्तर, अपना स्वरूप, जीवन का उद्देश्य, परमेश्वर की मनुष्य से आकांक्षा, इस सुर दुर्लभ मनुष्य जन्म का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की बात पर प्रत्येक पहलू से विचार किया जाना चाहिये और समीक्षा की जानी चाहिये कि अपनी वर्तमान गतिविधियाँ आदर्श जीवन पद्धति से तालमेल खाती हैं या नहीं? यदि अन्तर है तो वह कहाँ है कितना है? इस अन्तर को दूर रखने के लिये जो किया जाना चाहिए वह किया जा रहा है या नहीं? यदि नहीं तो क्यों?
यह प्रश्न ऐसे है जिन्हें अपने आप से गम्भीरता पूर्वक पूछा जाना चाहिए और जहाँ सुधार की आवश्यकता हो उसके लिए क्या कदम किस प्रकार उठाया जाय, इसका निर्णय करना चाहिए। छोटे व्यापारी कारखानेदार प्रायः बराबर अपने कारीगर में रह रही खामी और प्रगति के लिए क्या किया जाना चाहिये, इन पर विचार करते हैं। फिर जीवन व्यवसाय जिसकी तुलना संसार की और किसी उपलब्धि के साथ नहीं की जा सकती, उसे अँधेरे में क्यों रखा जाय? उसके सम्बन्ध में स्पष्ट रूपरेखा क्यों न बने?
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
मनन और चिन्तन का क्रम प्रातःकाल आँख खुलते ही और रात को सोने के लिये बिस्तर पर जाते ही आरम्भ किया जाना चाहिये। आँख खुलने और बिस्तर छोड़ने के बीच प्रातःकाल कुछ तो समय रहता है। आँख खुलते ही कोई तुरन्त नहीं उठ बैठता। कुछ समय ऐसे ही सब लोग पड़े रहते हैं। इस समय को मनन में लगाना चाहिये। अपने आपसे अपने और अपने शरीर के बीच का अन्तर, अपना स्वरूप, जीवन का उद्देश्य, परमेश्वर की मनुष्य से आकांक्षा, इस सुर दुर्लभ मनुष्य जन्म का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की बात पर प्रत्येक पहलू से विचार किया जाना चाहिये और समीक्षा की जानी चाहिये कि अपनी वर्तमान गतिविधियाँ आदर्श जीवन पद्धति से तालमेल खाती हैं या नहीं? यदि अन्तर है तो वह कहाँ है कितना है? इस अन्तर को दूर रखने के लिये जो किया जाना चाहिए वह किया जा रहा है या नहीं? यदि नहीं तो क्यों?
यह प्रश्न ऐसे है जिन्हें अपने आप से गम्भीरता पूर्वक पूछा जाना चाहिए और जहाँ सुधार की आवश्यकता हो उसके लिए क्या कदम किस प्रकार उठाया जाय, इसका निर्णय करना चाहिए। छोटे व्यापारी कारखानेदार प्रायः बराबर अपने कारीगर में रह रही खामी और प्रगति के लिए क्या किया जाना चाहिये, इन पर विचार करते हैं। फिर जीवन व्यवसाय जिसकी तुलना संसार की और किसी उपलब्धि के साथ नहीं की जा सकती, उसे अँधेरे में क्यों रखा जाय? उसके सम्बन्ध में स्पष्ट रूपरेखा क्यों न बने?
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
































