नारद उवाच-
पप्रच्छ नारदो भगवन् स्पष्टतो विस्तरादपि।
किं नु कार्यं मया ब्रूहि मानवै: कारयामि किम्॥५२॥
श्री भगवानुवाच-
उवाच भगवाँस्तात ! हिमाच्छादित एकदा।
उत्तराखण्ड संशोभिन्यारण्यक शुभस्थले॥५३॥
तत्वावधाने प्राज्ञस्य पिप्पलादस्य नारद।
प्रज्ञासत्रसमारम्भो जात: पञ्चदिनात्मक:॥५४॥
अष्टावक्र : श्वेतकेतुरुद्दालकशृङ्गिणौ।
दुर्वासाश्चेति जिज्ञासा: पञ्चाकुर्वन् क्रमादिमे॥५५॥
तत्वदर्शी महाप्राज्ञस्तेषां संमुख एव स:।
संक्षिप्तं ब्रह्मविद्याया: प्रास्तौत्सारं सममृषि:॥५६॥
सर्वसाधारणोऽप्येनं ज्ञातुं बोधयितुं क्षम:।
इह लोके परे चायमृद्धिसिद्धिप्रद: स्मृत:॥५७॥
तं प्रसङ्ग स्मारयामि ध्यानेन हृदये कुरु।
प्रज्ञा पुरगारूपे च योजितं यन्त्रतस्तु तम्॥५८॥
वरिष्ठानामात्मानं तु पूर्व साधारणस्य च।
हृदयगंममेनं त्वं कारयाद्य महामुने ॥५९॥
टीका:- नारद ने पूछा-"भगवन्! और भी स्पष्ट करें कि क्या करना और क्या कराना है। "
भगवान् बोले-"हे तात्! एक बार उत्तराखण्ड के हिमाच्छादित एक शुभ आरण्यक में महाप्राज्ञ पिप्पलाद के तत्वाधान में पाँच दिवसीय 'प्रज्ञा-सत्र' हुआ था। उसमें क्रमश: अष्टावक्र, श्वेतकेतु, शृंगी, उद्दालक और दुर्वासा ने पाँच जिज्ञासाएँ की थीं। तत्वदर्शी महाप्राज्ञ ऋषि ने उनके समक्ष ब्रह्मविद्या का सार-संक्षेप प्रस्तुत किया था वह सर्वसाधारण के समझने-समझाने योग्य है साथ ही लोक- परलोक में उभय-पक्षीय ऋद्धि-सिद्धियाँ प्रदान करने वाला भी है। उस प्रसंग का तुम्हें स्मरण दिलाता हूँ। ध्यान-मग्न होकर हृदयंगम करो सुनियोजित करो और 'प्रज्ञा पुराण' के रूप में सर्वप्रथम वरिष्ठ आत्माओं को तदुपरान्त सर्वसाधारण को हृदयंगम कराओ॥५२-५९॥
व्याख्या:- अध्यात्म विज्ञान के व्यावहारिक शिक्षण की विस्तृत कार्य प्रणाली जानने को उत्सुक देवर्षि को भगवान् एक विशिष्ट प्रज्ञासत्र का स्मरण दिलाते हैं। यह ऋषि प्रणाली है कि किसी भी तथ्य का समर्थन, प्रतिपादन प्रत्यक्ष उदाहरणों द्वारा किया जाय। ध्यान मग्न नारद को भगवान ने ज्ञान सत्रों में हुई चर्चा को संक्षेप में अपनी परावाणी, विचार सम्प्रेषण द्वारा समझा दिया एवं अग्रदूतों तक इसे पहुँचाने, उन्हें इस ज्ञान आलोक से प्रकाशित करने का निर्देश भी दिया।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 24
पप्रच्छ नारदो भगवन् स्पष्टतो विस्तरादपि।
किं नु कार्यं मया ब्रूहि मानवै: कारयामि किम्॥५२॥
श्री भगवानुवाच-
उवाच भगवाँस्तात ! हिमाच्छादित एकदा।
उत्तराखण्ड संशोभिन्यारण्यक शुभस्थले॥५३॥
तत्वावधाने प्राज्ञस्य पिप्पलादस्य नारद।
प्रज्ञासत्रसमारम्भो जात: पञ्चदिनात्मक:॥५४॥
अष्टावक्र : श्वेतकेतुरुद्दालकशृङ्गिणौ।
दुर्वासाश्चेति जिज्ञासा: पञ्चाकुर्वन् क्रमादिमे॥५५॥
तत्वदर्शी महाप्राज्ञस्तेषां संमुख एव स:।
संक्षिप्तं ब्रह्मविद्याया: प्रास्तौत्सारं सममृषि:॥५६॥
सर्वसाधारणोऽप्येनं ज्ञातुं बोधयितुं क्षम:।
इह लोके परे चायमृद्धिसिद्धिप्रद: स्मृत:॥५७॥
तं प्रसङ्ग स्मारयामि ध्यानेन हृदये कुरु।
प्रज्ञा पुरगारूपे च योजितं यन्त्रतस्तु तम्॥५८॥
वरिष्ठानामात्मानं तु पूर्व साधारणस्य च।
हृदयगंममेनं त्वं कारयाद्य महामुने ॥५९॥
टीका:- नारद ने पूछा-"भगवन्! और भी स्पष्ट करें कि क्या करना और क्या कराना है। "
भगवान् बोले-"हे तात्! एक बार उत्तराखण्ड के हिमाच्छादित एक शुभ आरण्यक में महाप्राज्ञ पिप्पलाद के तत्वाधान में पाँच दिवसीय 'प्रज्ञा-सत्र' हुआ था। उसमें क्रमश: अष्टावक्र, श्वेतकेतु, शृंगी, उद्दालक और दुर्वासा ने पाँच जिज्ञासाएँ की थीं। तत्वदर्शी महाप्राज्ञ ऋषि ने उनके समक्ष ब्रह्मविद्या का सार-संक्षेप प्रस्तुत किया था वह सर्वसाधारण के समझने-समझाने योग्य है साथ ही लोक- परलोक में उभय-पक्षीय ऋद्धि-सिद्धियाँ प्रदान करने वाला भी है। उस प्रसंग का तुम्हें स्मरण दिलाता हूँ। ध्यान-मग्न होकर हृदयंगम करो सुनियोजित करो और 'प्रज्ञा पुराण' के रूप में सर्वप्रथम वरिष्ठ आत्माओं को तदुपरान्त सर्वसाधारण को हृदयंगम कराओ॥५२-५९॥
व्याख्या:- अध्यात्म विज्ञान के व्यावहारिक शिक्षण की विस्तृत कार्य प्रणाली जानने को उत्सुक देवर्षि को भगवान् एक विशिष्ट प्रज्ञासत्र का स्मरण दिलाते हैं। यह ऋषि प्रणाली है कि किसी भी तथ्य का समर्थन, प्रतिपादन प्रत्यक्ष उदाहरणों द्वारा किया जाय। ध्यान मग्न नारद को भगवान ने ज्ञान सत्रों में हुई चर्चा को संक्षेप में अपनी परावाणी, विचार सम्प्रेषण द्वारा समझा दिया एवं अग्रदूतों तक इसे पहुँचाने, उन्हें इस ज्ञान आलोक से प्रकाशित करने का निर्देश भी दिया।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 24

















































