मंगलवार, 12 मार्च 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 34 से 36

सोत्सुकं नारदोSपृच्छद्देवात्र किमपेक्ष्यते ।
कथं ज्ञेया वरिष्ठास्ते किं शिक्ष्या:कारयामि किम् ॥३७॥
यैन युगसन्धिकाले ते मूर्धन्या यान्तु धन्यताम् ।
समयश्चापि धन्य: स्यात्तात तत्सृज युगविधिम् ॥३८॥
पूर्वसंचितसंस्कारा श्रुत्वा युगनिमन्त्रणम्।
मौना: स्थातुंन शख्यन्ति चौत्सुक्यात् संगतास्तत॥३९॥

टीका- तब नारद ने उत्सुकतापूर्वक पूछा-हे देव । इसके लिए क्या करने की आवश्यकता है? वरिष्ठों कों कैसे ढूँढा जाय? उन्हें क्या सिखाया जाय और क्या कराया जाय? जिससे युग-सन्धि की बेला में अपनी भूमिका से मूर्धन्य आत्माएँ स्वयं धन्य बन सकें और समय को धन्य बना सकें। भगवान् बोले- हे तात्! युग सृजन का अभियान आरम्भ करना चाहिए? जिनमें पूर्व संचित संस्कार होंगे वे युग निमन्त्रण सुनकर मौन बैठे न रह सकेंगे, उत्सुकता प्रकट करेंगे, समीप आवेंगे और परस्पर सम्बद्ध होंगे ॥३७-३९॥

व्याख्या- जागृत आत्माएँ कभी भी चुप बैठी नहीं रह सकती। उनके अर्जित संस्कार व सत्साहस युग की पुकार सुनकर उन्हें आगे बढ़ने व अवतार के प्रयोजनों हेतु क्रियाशील होने को बाध्य कर देते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 18

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