बुधवार, 13 फ़रवरी 2019

👉 ईमानदारी तथा बेईमानी

कुछ लोग संसार में ईमानदारी से जीते हैं, और बहुत से लोग झूठ छल कपट बेईमानी करते हैं। ईमानदार लोगों को धन, सम्मान आदि कम मिलता है। झूठे बेईमान लोग जैसे तैसे छल कपट से चालाकी से बहुत सा धन भी इकट्ठा कर लेते हैं और उनके बड़े-बड़े शौक भी पूरे हो जाते हैं।

ईमानदार लोगों के पास धन संपत्ति सुविधाएं कम होने से, वे अपने सारे शौक पूरे नहीं कर पाते। कोई बात नहीं।

किसी भी शौक को पूरा करने से जो सुख मिलता है वह क्षणिक होता है थोड़ी देर का होता है। उसमें पूर्ण तृप्ति का अनुभव नहीं होता। परंतु जो ईमानदारी से थोड़े साधन संपत्ति में भी संतोष करके जीते हैं, उनके सभी शौक भले ही पूरे नहीं होते, फिर भी वे चिंता रहित तनाव रहित मस्त जीवन जीते हैं।

यदि ईमानदारी तथा बेईमानी, इन दोनों की तुलना करें, तो ईमानदारी वाला जीवन अधिक अच्छा है। इसलिए ऐसे लोग सदा आनंदित रहते हैं। उनको भूख अच्छी लगती है, नींद अच्छी आती है, और वे अपने जीवन को सफलतापूर्वक जीते हैं। आप भी सोचिए दो में से कौन-सा जीवन अपनाना चाहेंगे।

मंत्र कैसे काम करता है
डॉ चिन्मय पंड्या
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https://youtu.be/BzPGs2I8iac

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2019

👉 दिल करीब होते हैं

एक हिन्दू सन्यासी अपने शिष्यों के साथ गंगा नदी के तट पर नहाने पहुंचा. वहां एक ही परिवार के कुछ लोग अचानक आपस में बात करते-करते एक दूसरे पर क्रोधित हो उठे और जोर-जोर से चिल्लाने लगे. संयासी यह देख तुरंत पलटा और अपने शिष्यों से पूछा; “क्रोध में लोग एक दूसरे पर चिल्लाते क्यों हैं ?”

शिष्य कुछ देर सोचते रहे, एक ने उत्तर दिया, “क्योंकि हम क्रोध में शांति खो देते हैं इसलिए !” “पर जब दूसरा व्यक्ति हमारे सामने ही खड़ा है तो भला उस पर चिल्लाने की क्या ज़रुरत है, जो कहना है वो आप धीमी आवाज़ में भी तो कह सकते हैं”, सन्यासी ने पुनः प्रश्न किया.
कुछ और शिष्यों ने भी उत्तर देने का प्रयास किया पर बाकी लोग संतुष्ट नहीं हुए.

अंततः सन्यासी ने समझाया…
“जब दो लोग आपस में नाराज होते हैं तो उनके दिल एक दूसरे से बहुत दूर हो जाते हैं. और इस अवस्था में वे एक दूसरे को बिना चिल्लाये नहीं सुन सकते… वे जितना अधिक क्रोधित होंगे उनके बीच की दूरी उतनी ही अधिक हो जाएगी और उन्हें उतनी ही तेजी से चिल्लाना पड़ेगा.
क्या होता है जब दो लोग प्रेम में होते हैं ? तब वे चिल्लाते नहीं बल्कि धीरे-धीरे बात करते हैं, क्योंकि उनके दिल करीब होते हैं, उनके बीच की दूरी नाम मात्र की रह जाती है.”

सन्यासी ने बोलना जारी रखा,” और जब वे एक दूसरे को हद से भी अधिक चाहने लगते हैं तो क्या होता है ? तब वे बोलते भी नहीं, वे सिर्फ एक दूसरे की तरफ देखते हैं और सामने वाले की बात समझ जाते हैं.”


गुरुदेव का आशीर्वाद जिस जिस को मिला वो निहाल हो गया।
डॉ चिन्मय पंड्या
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https://youtu.be/3NaRdsNuyxU

👉 “गुरु कृपा चार प्रकार से होती है ।”

01 स्मरण से
02 दृष्टि से
03 शब्द से
04 स्पर्श से

जैसे कछुवी रेत के भीतर अंडा देती है पर खुद पानी के भीतर रहती हुई उस अंडे को याद करती रहती है तो उसके स्मरण से अंडा पक जाता है।
ऐसे ही गुरु की याद करने मात्र से शिष्य को ज्ञान हो जाता है।
यह है स्मरण दीक्षा।।

दूसरा जैसे मछली जल में अपने अंडे को थोड़ी थोड़ी देर में देखती रहती है तो देखने मात्र से अंडा पक जाता है।
ऐसे ही गुरु की कृपा दृष्टि से शिष्य को ज्ञान हो जाता है।
यह दृष्टि दीक्षा है ।।

तीसरा जैसे कुररी पृथ्वी पर अंडा देती है,
और आकाश में शब्द करती हुई घूमती है तो उसके शब्द से अंडा पक जाता है।
ऐसे ही गुरु अपने शब्दों से शिष्य को ज्ञान करा देता है।
यह शब्द दीक्षा है।।

चौथा जैसे मयूरी अपने अंडे पर बैठी रहती है तो उसके स्पर्श से अंडा पक जाता है।
ऐसे ही गुरु के हाथ के स्पर्श से शिष्य को ज्ञान हो जाता है।
यह स्पर्श दीक्षा है।।


गायत्री मंत्र की महत्ता
डॉ चिन्मय पंड्या
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https://youtu.be/0R0E7FMA1RA

👉 कैसे बनें दिव्यकर्मी और कैसे हों बंधनमुक्त दिव्यकर्मी कौन?:-

जिसकी समस्त वासनाएँ ज्ञान की अग्रि में जलकर भस्म हो गई हों, जो कार्य करते हुए कभी उत्तेजित न हो  तथा जिस कार्य को भी हाथ में ले उसे दिव्यता के शिखर पर ले जाए—श्री भगवान् के अनुसार वह पंडित है, ज्ञानी है, बुद्धिमान है।

जब संकल्प व्यष्टि से हटकर समष्टि से जुड़ जाते हैं, तो कामनारहित हो जाते हैं। ऐसा व्यक्ति सही अर्थों में साधक बन जाता है। मात्र वह ज्ञानी ही नहीं होता, अंदर- बाहर से पवित्रता से घनीभूत हो वह ईश्वर का सच्चापुत्र भी बन जाता है। ऐसे दिव्यकर्मी के विषय में, स्वयं प्रभु श्रीकृष्ण बीसवें श्लोक में कहते हैं—

‘‘ऐसा व्यक्ति सब प्रकार की कर्मफल आसक्ति छोड़कर सदैव प्रभु में तृप्त रहता है, प्रभु के अतिरिक्त किसी अन्य पर आश्रित न होकर वह सब प्रकार के कर्मों को करता हुआ भी वस्तुतः कुछ भी नहीं करता’’ (कर्म में अकर्म)। (कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः) ४/२०।

एक दिव्यकर्मी के विषय में भगवान् कह रहे हैं कि वह अपनी स्वाध्यायजनित समझ- बूझ के माध्यम से हर क्षण प्रभु में ही लीन होकर कार्य करता है। वह जो भी कार्य करता है, चूँकि उसकी उसके फल के प्रति आसक्ति नहीं है, वह करता हुआ भी उसे न करने वाला बन जाता है।

संत वस्तुतः ऐसे ही व्यक्तियों को कहा जाता है। इन्हें दुनिया में दुःखी दिखाई देते हैं। वे दुःखों के निवारण का प्रयास करते हैं। दूसरी ओर दुःखी भी वे ही होते हैं, जिनकी कामनाएँ अतृप्त होती हैं। उन्हें भोग- विलास में ही सब कुछ नजर आता है। हमारे पास यह सब साधन होते तो कितना अच्छा होता! यही सब सोच- सोचकर वे दुःखी होकर विकर्म कर बैठते हैं और फिर पाप के भागी बनते हैं।

📖 अखण्ड ज्योति -मार्च 1942


संसार क्या है और हम कैसा जीवन जिये?
डॉ चिन्मय पंड्या
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https://youtu.be/LerMVZHI8CE

👉 आज का सद्चिंतन 12 Feb 2019



यज्ञीय प्रक्रिया क्यों आवश्यक है
डॉ चिन्मय पंड्या
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https://youtu.be/YrtGh36pgwY

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 Feb 2019


गुरुदेव गायत्री माता को लोगो के हृदय में बैठाना चाहते थे।
डॉ चिन्मय पंड्या
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https://youtu.be/7mTA7K4TAiU

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 1 से 4

॥अथ प्रथमोSघ्याय:॥
    
लोककल्याण-जिज्ञासा प्रकरण
लोककल्याणकृद् धर्मधारणासंप्रारक: ।
व्रती यायावरो मान्यो देवर्षिऋषिसत्तम: ॥१॥
अव्याहतगतिं प्राप गन्तुं विष्णुपदं सदा ।
नारदो ज्ञानचर्चार्थं स्थित्वा वैकुण्ठसन्निधौं॥२॥    
लोककल्याणमेवायमात्मकल्याणवद् यत:।
मेने परार्थपारीण: सुविधामन्यदुर्लभाम् ॥३॥
काले काले गतस्तत्र स्मस्या: कालिकी मृशन् ।
मतं निश्चित्य स्वीचक्रे भाविनीं कार्यपद्धतिम् ॥४॥

टीका:- लोक कल्याण के लिए जन-जन तक धर्म धारणा का प्रसार-विस्तार करने का व्रत लेकर निरन्तर विचरण करने वाले नारद ऋषियों में सर्वश्रेष्ठ गिने गये और देवर्षि के मूर्धन्य सम्मान से विभूषित हुए। एक मात्र उन्हीं को यह सुविधा प्राप्त थी किं कभी भी बिना किसी रोक-टोक विष्णुलोक पहुँचें और भगवान के निकट बैठकर अभीष्ट समय तक प्रत्यक्ष ज्ञानचर्चा करें। यह विशेष सुविधा उन्हें लोक-कल्याण को ही आत्म-कल्याण मानने की परमार्थ परायणता के कारण मिली? वे समय-समय पर भगवान् के समीप पहुँचते और सामयिक समस्याओं पर विचार करके तदनुरूप अपना मत बनाते और भावी कार्यक्रम निर्धारित करते॥१-४॥

व्याख्या:- परमार्थ में सच्ची लगन यदि किसी में हो तो उसे पुण्य अर्जन के अतिरिक्त आत्मकल्याण का लाभ मिलता हैं। ऐसे व्यक्ति दूसरों को तारते हैं, स्वयं अपनी नैया भी जीवन सागर में खेले जाते हैं।

नारद ऋषि को भगवान् की विशेष अनुकम्पा इसी कारण मिली कि उन्होंने परहित को अपना जीवनौद्दश्य माना। इसके लिए वे निरन्तर भ्रमण करते, जब चेतना जगाते व सत्परामर्श देकर लोगों को सन्मार्ग की राह दिखाते थे। ध्रुव, प्रह्लाद तथा पार्वती को अपने सामयिक मार्गदर्शन द्वारा उन्होंने लक्ष्य प्राप्ति की ओर अग्रसर किया। इसी लोक परायणता ने उन्हें देवर्षि पद सें सम्मानित करवाया तथा भगवान् के सामीप्य का लाभ भी उन्हें मिला। चूँकि वे सतत् जन सम्पर्क में रहते थे व लोक-कल्याण में रत रहते थे, इसी कारण सामयिक जन समस्याओं के समाधान हेतु वे परामर्श-मार्गदर्शन हेतु प्रभु के पास पहुँचते थे व मार्गदर्शन प्राप्त कर अपनी भावी नीति का क्रियान्वयन करते थे ऐसे परमार्थ परायण व्यक्ति जहाँ भी होते हैं, सदैव श्रद्धा-सम्मान पाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 5


!! यज्ञ किस भावना के साथ करे !!
डॉ चिन्मय पंड्या
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https://youtu.be/TiUc7lRYa78
 

👉 Self-confidence is the key to success

If you consider someone as happy and successful, then closely study the course of his life. If possible, ask him directly – ‘Have you never encountered any problems in your life?’ Then you will know that peace and prosperity have not been showered on him randomly from the sky. His life has also been tested and tried by difficulties and problems as yours is being tested now. When you realize this truth, again try to investigate – ‘Who liberated him from that web of distress?’ Did any magician come and wave his magic wand and all his problems vanished? On exploring deeply, you will find that it is his self-confidence that has been mainly helpful in overcoming the problems. When all the near and dear ones had left him alone, it was this self-confidence that assured him that there was hope and inspired him to resolutely go on trying against all odds.

Believe me! Your present problems are the result of your lack of will and self-confidence. You have accepted defeat without fight. You have developed a negative attitude that you cannot do anything; you cannot overcome the distress. You are finding darkness all around. There is no one to show you the light; there seems no way for you to get rid of the suffering. Now awaken your self-confidence, and with an optimistic attitude evaluate the resources at hand, though they might appear relatively meager, and try to utilize them to solve your problems. Within a short time you will find that the circumstances have started changing for the better; the hopelessness has turned into hope and failure has started turning into success.

📖 Pt. Shriram Sharma Acharya


आज हमारी मानवता किस दिशा में आगे बढ़ रही है
डॉ चिन्मय पंड्या
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https://youtu.be/CozPCrSnmtk

👉 कृष्ण के वरण की छूट

भगवान श्रीकृष्ण के पास दुर्योधनअर्जुन दोनों पहुँचे। महाभारत युद्ध पूर्व कौरव व पाण्डव दोनों ही कृष्ण को अपने पक्ष में करना चाहते थे। दुर्योधन पहले पहुँचे व अहंकारवश सो रहे श्रीकृष्ण के सिरहाने बैठ गये। बाद में अर्जुन आये व अपनी अहज श्रद्धा- भावना वश पैरों के पास बैठ गये। श्रीकृष्ण जागे। अर्जुन पर उनकी दृष्टि पडी। कुशल क्षेम पूछकर अभिप्राय पूछने ही जा रहे थे कि दुर्योधन बोल उठा- "पहले मैं आया हूँ, मेरी बात सुनी जाय। " श्रीकृष्ण असमंजस में पडे़। बोले- 'अर्जुन छोटे हैं इसलिए प्राथमिकता तो उन्हीं को मिलेगी, पर माँग तुम्हारी भी पूरी करुँगा। एक तरफ मैं हूँ, दूसरी तरफ मेरी विशाल चतुरंगिणी सेना। बोलो अर्जुन? तुम दोनों में से क्या लोगे?' चयन की स्वतन्त्रता थी-  यह विवेक पर निर्भर था, कौन क्या माँगता है- भगवत् कृपा अथवा उनका वैभव?

अर्जुन बोले- "भगवन्! मै तो आपको ही लूँगा। भले ही आप युद्ध न करें- बस साथ भर बने रहें। " दुर्योधन मन ही मन अर्जुन की इस मूर्खता पर प्रसन्न हुआ और श्रीकृष्ण की विशाल अपराजेय सेना पाकर फूला न समाया। अनीतिवादी दुर्योधन, ईश्वरीय समर्थन वाले अर्जुन जिसके पास श्रीकृष्ण भी निरस्त्र थे, से हारा ही नहीं महाभारत के युद्ध में बन्धु- बांधवों सहित मारा भी गया। दुर्योधन जैसे अनीति का चयन करने वाले एवं अर्जुन जैसे ईश्वरीय कृपा को वरण करने वाले तत्व हर मनुष्य के भीतर विद्यमान हैं- एक को विवेक या सुबुद्धि एवं दूसरे को अविवेक या दुर्बुद्धि कह सकते हैं। किसका चयन व्यक्ति करता है, यह उसकी स्वतन्त्रता है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १


!! हम कठिनाइयों का घबराएँ नहीं उनका सामना करे
डॉ चिन्मय पंड्या
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https://youtu.be/F3iq2Zk3FSg

👉 अशुभ चिंतन छोड़िये-भय मुक्त होइये (भाग 1)

अपने कार्यकारी जीवन में लोग कई तरह की अशुभ आशंकाओं से आतंकित रहते हैं। रोजगार ठीक से चलेगा या नहीं, कहीं व्यापार में हानि तो नहीं हो जाएगी, नौकरी से हटा तो नहीं दिया जायेगा, अधिकारी नाराज तो नहीं हो जायेंगे जैसी चिन्ताएँ लोगों के मन मस्तिष्क पर हावी होने लगती हैं तो वह जो काम हाथ में होता है, उसे भी सहज ढंग से नहीं कर पाता। इन अशुभ आशंकाओं के करते रहने से मन में जो स्थाई गाँठ पड़ जाती है उसकी का नाम भय है।

भय का एक सामान्य रूप यह भी होता है कि अन्धेरे में जाते ही डर लगता है, अकेले यात्रा करने में किसी अनिष्ट की सम्भावना दिखाई देती है, रोगी होने बीमार पड़ने पर रोग के ठीक न होने तथा उसी के कारण मृत्युद्वार तह पहुँच जाने का डर रहता है। यह भी भविष्य के प्रति अशुभ आशंकाओं का ही छोटा रूप है। अँधेरे में जाते समय जी क्यों काँपने लगाता है? इसलिए कि आशंका होती है कहीं कोई कीड़ा-काँटा न बैठा हो या कोई भूत-प्रेत ही न पकड़ ले। अकेले यात्रा करने में भी चोर डाकुओं द्वारा सताये जाने, लूट लेने की आशंका ही डराती है। इस तरह के डर भी एक तरह से भविष्य के प्रति अशुभ आशंकाओं के परिणाम ही हैं।

इस तरह की आशंकाएँ स्वभाव बन कर भय के रूप में परिणत हो जाती हैं और इन आशंकाओं या भयों का एक ही कारण है- मन की दुर्बलता। भय और कुछ नहीं मन की दुर्बलता से उत्पन्न हुआ भूत ही है। इस सम्बन्ध में एक जापानी लोक कथा प्रचलित है। किसी व्यक्ति को एक डरावना जिन्न सताया करता था। वह जागता था तो जिन्न सामने खड़ा रहता था और उसे तरह-तरह से सताया करता था, सोता था तो सपने में डरावनी हरकतों से उसे परेशान करता था। एक दिन उसने हिम्मत कर जिन्न से पूछ ही लिया, ‘तुम कहाँ से आ गए हो? क्यों मुझे इतना सताते रहते हो? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1981 पृष्ठ 21

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1981/January/v1.21


यह राह नहीं फूलो की (गीत)
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https://youtu.be/QPFMNdsWlno

सोमवार, 11 फ़रवरी 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग १) प्राक्कथन

👉 प्राक्कथन

भारतीय इतिहास-पुराणों में ऐसे अगणित उपाख्यान है, जिनसे मनुष्य के सम्मुख आने वाली अगणित समास्याओं के समाधान विघमान है। उन्हीं में से सामयिक परिस्थिति एवं आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए कुछ का ऐसा चयन किया गया है,जो युग समस्याओं के समाधान में आज की स्थिति के अनुरुप योगदान दे सकें।

सर्ववदित है कि दार्शनिक और विवेचनात्मक प्रवचन-प्रतिपादन उन्हीं के गले उतरते है,जिनकी सुविकसित मनोभूमि है, परंतु कथानकों की यह विशेषता है कि बाल, वृद्ध, नर-नारी, शिक्षित अशिक्षित सभी की समझ में आते है और उनके आधार पर ही किसी निष्कर्ष तक पहूँच सकना सम्भव होता है। लोकरंजन के साथ लोकमंगल का यह सर्वसुलभ लाभ है।

कथा साहित्य की लोकप्रियता के संबंध में कुछ कहना व्यर्थ होगा। प्राचीन काल १८ पुराण लिखे गए। उनसे भी कान न चला तो १८ उपपुराणों की रचना हुई। इन सब में कुल  मिलाकर १०,०००,००० श्लोक है,जबकी चारों वेदों में मात्र बीस हजार मंत्र है। इसके अतिरिक्त भी संसार भर में इतना कथा साहित्य सृजा गया है कि उन सबको तराजू के एक पलड़े पर रखा जाय और अन्य साहित्य को दूसरे पर तो  कथाएँ ही भरी पड़ेगी। फिल्मों की लोकप्रियता का कारण भी उनके कथानक ही है।

समय परिवर्तनशील है। उसकी परिस्थितियों मान्यताएँ, प्रथाएँ,समस्याएँ एवं आवश्यकताऐं भी बदलती रहती है। तदनुरुप ही उसके समाधान खोजने पड़ते है। इस शाश्वत सृष्टिक्रम को ध्यान में रखते हुए ऐसे युग साहित्य की आवश्यकता पड़ती रही है। जिसमें प्रस्तुत प्रसंगों से उपयुक्त प्रकाश एवं मार्गदर्शन उपलब्ध हो सके। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए अनुकानेक मन:स्थिति वालों के लिए उनकी परिस्थिति के अनुरुप समाधान ढूँढ़ निकालने में सुविधा दे सकने की दृष्टि से इस ग्रंथ के सृजन का प्रयास किया गया है।

भविष्य का हमारा कार्यक्रम एवं जीवन काल अनिश्चित है। लेखनी तो सतत क्रियाशील रहेगी, चिन्तन हमारा ही सक्रिया रहेगा, हाथ भले ही किन्हीं के भी हों । यदि अवसर मिल सका, तो और भी अनेकों खण्ड प्रकाशित होते चले जायेंगे। कामना तो यह है कि युग पुराण के प्रज्ञा-पुराणों  के भी पुरातन १८ पुराणों की तरह १८ खण्डों का सृजन बन पड़े।

संस्कृत श्लोकों तथा उसके अथों के उपनिषद् पक्ष के साथ उसकी व्याख्या एवं कथानकों के प्रयोजनों का स्पष्टीकरण करने का प्रयास इस पुराण में किया गया है। वस्तुत; इसमें युग दर्शन का मर्म निहित है। सिद्धांतों एवं तथ्यों को महत्व देने वालों के लिए यह अंग भी समाधानकारक होगा। जो संस्कृत नहीं जानते, उनके लिए अर्थ व उसकी व्याख्या पढ़ लेने से भी काम चल सकता है। इन श्लोकों की रचना नवीन है, पर जिन तथ्यों का समावेश किया गया है, वे शाश्वत है।

प्रस्तुत ग्रन्थ का पठन निजी स्वाध्याय के रूप में भी किया जा सकता है और सामूहिक सत्संग के रूप में भी। रात्रि के समय पारिवारिक लोक शिक्षण की दृष्टि से भी इसका उपयोग हो सकता है। बच्चे कथाऐं सुनने को उत्सुक रहते हैं। बड़ों को धर्म परम्पराऐं समझने की इच्छा रहती है। इनकी पूर्ति भी घर में इस आधार पर कथा क्रम और समय निर्धारित करके की जा सकती है।

प्रथम खण्ड में युग समस्याओं के कारण उद्भूत आस्था संकट का विवरण है एवं उससे उबर कर प्रज्ञा युग लाने की प्रक्रिया रूपी अवतार सत्ता द्वारा प्रणीत सन्देश है । भ्रष्ट चिन्तन एवं दुष्ट आचरण से जूझने हेतु अध्यात्म दर्शन को किस तरह व्यावहारिक रूप से अपनाया जाना चाहिए, इसकी विस्तृत व्याख्या है एवं अन्त में महाप्रज्ञा के अवलम्बन से संभावित सतयुगी परिस्थितियों की झाँकी है ।

✍🏻 प्रज्ञा पुराण (भाग १)
📖 श्रीराम शर्मा आचार्य


Sansaar Me Sabhi Tarah Ke Log Hai
Dr Chinmay Pandya
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https://youtu.be/pZ3oeh9CPp0

👉 इंकार,,

एक नदी के किनारे दो पेड़ थे,, उस रास्ते एक छोटी सी चिड़िया गुजरी और,, पहले पेड़ से पूछा,,

बारिश होने वाला है,, क्या मैं, और मेरे बच्चे तुम्हारे टहनी में घोसला बनाकर रह सकते हैं,, लेकिन उस पेड़ ने मना कर दिया,, चिड़िया फिर दूसरे पेड़ के पास गई और वही सवाल पूछा,,

दूसरा पेड़ मान गया,,
चिड़िया अपने बच्चों के साथ खुशी-खुशी दूसरे पेड़ में घोसला बना कर रहने लगी,,

एक दिन इतनी अधिक बारिश हुई कि बारिश की वजह से पहला पेड़ जड़ से उखड़ कर पानी मे बह गया,, जब चिड़िया ने उस पेड़ को बहते हुए देखा तो कहा,,

जब तुमसे मैं और मेरे बच्चे, शरण के लिये आये तब तुमने मना कर दिया था,, अब देखो तुम्हारे उसी रूखे बर्ताव की सजा तुम्हे मिल रही है,,

जिसका उत्तर पेड़ ने मुस्कुराते हुए दिया,, मैं जानता था मेरी जड़ें कमजोर है,, और इस बारिश में मै टिक नहीं पाऊंगा,, मैं तुम्हारी और बच्चे की  जान खतरे में नहीं डालना चाहता था,, मना करने के लिए मुझे क्षमा कर दो,, और ये कहते-कहते पेड़ बह गया,,

किसी के इंकार को, हमेशा उनकी कठोरता न समझे,, 
क्या पता उसके उसी इंकार से आप का भला हो,,
कौन किस परिस्थिति में है शायद हम नहीं समझ पाए,,


Adhyatam Ke Sutra
Dr Chinmay Pandya
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https://youtu.be/cWLiKhV9YiM
 

👉 कर सकते थे, किया नहीं

रावण तथा विभीषण एक ही कुल में उत्पन्न हुए सगे भाई थे, दोनों विद्वान- पराक्रमी थे। एक ने अपनी दिशा अलग चुनी व दूसरे ने प्रवाह के विपरीत चलकर अनीति से टकराने का साहस किया। धारा को मोड़ सकने तक की क्षमता भगवान ने मनुष्य को दी ही इसलिए है ताकि वह उसका सहयोगी बन सके।

भगवान ने मनुष्य को इच्छानुसार वरदान माँगने का अधिकार भी दिया है। रावण शिव का भक्त था। उसने अपने इष्ट से वरदान सामर्थ्यवान होने का माँगा पर साथ ही यह भी कि मरूँ तो मनुष्य के हाथों। उसकी अनीति को मिटाने, उसका संहार करने के लिए स्वयं भगवान को राम के रूप में जन्म लेना पड़ा। राम शिव के इष्ट थे। यदि असाधारण अधिकार प्राप्त रावण प्रकाण्ड विद्वान् होते हुए भी अपने इष्ट भगवान शिव से सत्परामर्श लेना नहीं चाहता तो अन्त तो उसका सुनिशित होगा ही। यह भगवान का सहज रूप है जो मनुष्य को स्वतन्त्र इच्छा देकर छोड़ देता है।

जीव विशुद्ध रूप में जल की बूँद के समान इस धरती पर आता है। एक ओर जल की बूँद धरती पर गिरकर कीचड बन जाती हैं व दूसरी ओर जीव माया में लिप्त हो जाता है। यह तो जीव के ऊपर है जो स्वयं को माया से दूर रख समुद्र में पडी बूंद के आत्म विस्तरण की तरह सर्वव्यापी हो मेघ बनकर समाज पर परमार्थ की वर्षा करे अथवा कीचड़ में पड़ा रहे।

मनुष्य को इस विशिष्ट उपलब्धि को देने के बाद विधाता ने यह सोचा भी नहीं होगा कि वह ऊर्ध्वगामी नहीं उर्ध्वगामी मार्ग चुन लेगा। अन्य जीवों, प्राणियों का जहाँ तक सवाल है वे तो बस ईश्वरीय अनुशासन- व्यवस्था के अन्तर्गत अपना प्राकृतिक जीवनक्रम भर पूरा कर पाते हैं। आहार ग्रहण, विसर्जन- प्रजनन यही तक उनका जीवनोद्देश्य सीमित रहता है। परन्तु बहुसंख्य मानव ऐसे होते हैं जो इन्हीं की तरह जीवन बिताते और अदूरदर्शिता का परिचय देते सिर धुन-  धुनकर पछताते देखे जाते हैं। इनकी तुलना चासनी में कूद पड़ने वाली मक्खी से की जा सकती है।

चासनी के कढाव को एक बारगी चट कर जाने के लिए आतुर मक्खी बेतरह उसमें कूदती है और अपने पर- पैर उस जंजाल में लपेट कर बेमौत मरती है। जबकि समझदार मक्खी किनारे पर बैठ कर धीरे- धीरे स्वाद लेती, पेट भरती और उन्मूक्त आकाश में बेखटके बिचरती है। अधीर आतुरता ही मनुष्य को तत्काल कुछ पाने के लिए उत्तेजित करती है और उतने समय तक ठहरने नहीं देती जिसमें कि नीतिपूर्वक उपयोगी आवश्यकताओं की पूर्ति सरलतापूर्वक सम्भव हो सके।

मछली वंशी में लिपटी आटे की गोली भर को देखती है। उसे उतना अवकाश या धीरज नहीं होता कि यह ढूँढ़- समझ सके कि इसके पीछे कहीं कोई खतरा तो नहीं है। घर बैठे हाथ लगा प्रलोभन उसे इतना सुहाता है कि गोली को निगलते ही बनता है। परिणाम सामने आने में देर नहीं लगती। काँटा आँतों में उलझता है और प्राण लेने के उपरान्त ही निकलता है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १



Hamara Samarpan Kitna Ghara Hai
Dr Chinmay Pandya
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https://youtu.be/rtRzgdg1Wxk

👉 आज का सद्चिंतन 11 Feb 2019

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 Feb 2019

👉 Scientific Spirituality

Scientific spirituality is a virtuous fusion of scientific outlook and spiritual vision. In the scientific attitude, there is no place for prejudice, traditions, superstitions or dogma. Herein only those thoughts and actions are honored that are logical, appropriate and aim at investigating the truth. Instead of a convention or tradition, only the results of experimental findings are considered authentic. In short, the scientific outlook relies more on discernment than tradition. The seer of Manduka Upnishada declares the same as ‘Satyameva Jayate’ (meaning -Truth alone triumphs).

This scientific outlook is perfected by the refined perception of the spiritual values of life. It is this perception that gives birth to all kinds of noble virtues. Wherever this perception is absent, nobility will also be absent there. Sometimes, due to confusion, the truth and this kind of inner vision are considered irreconcilably opposite. Truth and intuitive vision, like science and spirituality, are not opposite but complementary to each other. The truth makes the perception resolute and the perception makes truth purposeful.

The continuity of the experiments of scientific spirituality keeps the life busy in finding truth without losing the intuitive awareness of reality. It maintains a balance between the genius of a scientist and the intuition of a saint present in a human being. If this practice



Chota Sankalp Bhi Kese Bada Ho Sakta Hai
Dr Chinmay Pandya
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https://youtu.be/h7gipKIQeXQ

👉 तृष्णाएँ छोड़ो

कामनाएँ पूर्ण होने पर भी संतोष नहीं होता, वरन् पहले से भी और अधिक प्यास बढ़ती है। कहते हैं कि मनुष्य अपूर्ण हैं, किंतु यदि वह अपनी वासनाएँ छोड़ दे, तो इसी जीवन में पूर्ण हो सकता है। तृष्णा एक बंधन है, जो आत्मा को जन्म-मरण के जाल में जकड़े हुए हैं। जिसे सांसारिक वस्तुओं की तृष्णा हरदम सताती रहती है, भला वह भवबंधनों से किस प्रकार पार हो सकेगा? प्रपंच का फेरा तभी तब है जब तक कि विभिन्न प्रकार की इच्छाओं ने प्राणी को बाँध रखा है।

जिन्हें मुक्ति की आकांक्षा है, जिन्हें पूर्ण सत्य की खोज करनी है, उनके लिए सर्वोत्तम साधन यह है कि अपनी इच्छा को वश में करें। इस संसार में संतोष से बढ़ कर और कोई धन नहीं है। स्वर्ग में भी कोई संपदा इसकी समता नहीं कर सकती। कोई मनुष्य देखने में कितना ही स्वाधीन क्यों न प्रतीत हो, पर वह बेचारा वास्तव में एक कैदी के समान है, जिसके मन में तृष्णा का डेरा पड़ा हुआ है। चाहे वह कितना ही बड़ा धनी क्यों न हो, भिखारी से ही उसकी तुलना की जा सकती है।

यदि तुम संसार में कुछ श्रेष्ठ कर्म करना चाहते हो तो आवश्यक है कि तृष्णा और वासनाओं का परित्याग कर दो। कर्म करो, अपने कर्त्तव्य में त्रुटि मत रखो, परंतु फल के लिए प्यासे मत फिरो। जो करेगा उसे मिलेगा, किंतु जो पाने के लिए व्याकुल फिरेगा, उसे आपत्तियों के पहाड़ सिर पर उठाने पड़ेंगे।

📖 अखण्ड ज्योति -मार्च 1942


Bachho Jaisa Jivan Jiye
Dr Pranav Pandya
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https://youtu.be/282b7qWexVs

शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

👉 बेटे की शादी में केवल 18 हजार रुपये खर्च करेंगे आईएएस अधिकारी

हाइलाइट्स

IAS अधिकारी पी. बसंत कुमार बेटे की शादी में खर्च करेंगे 18 हजार

बेटी की शादी में मात्र 16 हजार तथा अपनी में ढाई हजार किया था खर्च

बैंक मैनेजर है बेटा और वधू डॉक्टर, दोनों पक्ष करेंगे 18-18 हजार खर्च

शोऑफ के इस जमाने में जहां सामान्य परिवार भी शादियों में लाखों रुपये खर्च करने से नहीं चूकते हैं, वहीं आंध्र प्रदेश के एक आईएएस अधिकारी अपने बेटे की शादी में मात्र 18 हजार रुपये खर्च करने जा रहे हैं। बसंत कुमार नामक अधिकारी ने अपनी शादी में भी ढाई हजार रुपये का ही खर्च किया था।

विशाखापत्तनम मेट्रोपॉलिटन रीजन डिवेलपमेंट अथॉरिटी (वीएमआरडीए) के आयुक्त पटनाला बसंत कुमार अपने बेटे की शादी पर सिर्फ 18 हजार रुपये खर्च करेंगे। पटनाला के बेटे की शादी 10 फरवरी को होनी है। बेटे अभिनव बैंक मैनेजर हैं, जबकि वधू लावन्या पेशे से डॉक्टर हैं। हमारे सहयोगी टीओआई से बातचीत में उन्होंने बताया, 'यह मेरे सहयोगियों, राधा स्वामी सत्संग सभा के सदस्यों तथा अन्य लोगों के सहयोग से ही संभव हुआ है।'

उन्होंने बताया, 'राधा स्वामी सत्संग का फॉलोअर होने की वजह से मैं बेटे की शादी में 18 हजार से अधिक की राशि खर्च नहीं कर सकता था। शादी में वर और वधू दोनों के परिवार 18 हजार रुपये प्रत्येक खर्च वहन करेंगे, जिसमें अतिथियों का दोपहर का भोज भी शामिल है। दोनों पक्ष मिलाकर 100 से अधिक गेस्ट नहीं होंगे। खाने-पीने पर भी 15 से 20 रुपये प्रति प्लेट का खर्च किया जाएगा। पुजारी को एक हजार रुपये दिए जाएंगे।'

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के राज्यपाल ई.एस.एल नरसिम्हन शुक्रवार को एक सादे समारोह में जोड़े को आशीर्वाद देंगे। बसंत कुमार ने 2017 में अपनी बेटी की शादी भी इसी सादगी के साथ सिर्फ 16,100 रुपये में की थी।

👉 अनमोल रिश्तें

"अच्छे अच्छे महलों मे भी एक दिन कबूतर अपना घोंसला बना लेते है...

सेठ घनश्याम के दो पुत्रों में जायदाद और ज़मीन का बँटवारा चल रहा था और एक चार पट्टी के कमरे को लेकर विवाद गहराता जा रहा था, एकदिन दोनो भाई मरने मारने पर उतारू हो चले, तो पिता जी बहुत जोर से हँसे। पिताजी को हँसता देखकर दोनो भाई  लड़ाई को भूल गये, और पिताजी से हँसी का कारण पुछा। तो पिताजी ने कहा-- इस छोटे से ज़मीन के टुकडे के लिये इतना लड़ रहे हो छोड़ो इसे आओ मेरे साथ एक अनमोल खजाना बताता हूँ मैं तुम्हे !

पिता घनश्याम जी और दोनो पुत्र पवन और मदन उनके साथ रवाना हुये पिताजी ने कहा देखो यदि तुम आपस मे लड़े तो फिर मैं तुम्हे उस खजाने तक नही लेकर जाऊँगा और बीच रास्ते से ही लौटकर आ जाऊँगा! अब दोनो पुत्रों ने खजाने के चक्कर मे एक समझौता किया की चाहे कुछ भी हो जाये पर हम लड़ेंगे नही प्रेम से यात्रा पे चलेंगे!

गाँव जाने के लिये एक बस मिली पर सीट दो की मिली, और वो तीन थे, अब पिताजी के साथ थोड़ी देर पवन बैठे तो थोड़ी देर मदन ऐसे चलते-चलते लगभग दस घण्टे का सफर तय किया फिर गाँव आया।

घनश्याम दोनो पुत्रों को लेकर एक बहुत बड़ी हवेली पर गये हवेली चारों तरफ से सुनसान थी। घनश्याम ने जब देखा की हवेली मे जगह जगह कबूतरों ने अपना घोसला बना रखा है, तो घनश्याम वहीं पर बैठकर रोने लगे। दोनो पुत्रों ने पुछा क्या हुआ पिताजी आप रो क्यों रहे है?

तो रोते हुये उस वृद्ध पिता ने कहा जरा ध्यान से देखो इस घर को, जरा याद करो वो बचपन जो तुमने यहाँ बिताया था, तुम्हे याद है पुत्र इस हवेली के लिये मैं ने अपने भाई से बहुत लड़ाई की थी, सो ये हवेली तो मुझे मिल गई पर मैंने उस भाई को हमेशा के लिये खो दिया, क्योंकि वो दूर देश में जाकर बस गया और फिर वक्त्त बदला और एक दिन हमें भी ये हवेली छोड़कर जाना पड़ा!

अच्छा तुम ये बताओ बेटा की जिस सीट पर हम बैठकर आये थे, क्या वो बस की सीट हमें मिल जायेगी? और यदि मिल भी जाये तो क्या वो सीट हमेशा-हमेशा के लिये हमारी हो सकती है? मतलब की उस सीट पर हमारे सिवा कोई न बैठे। तो दोनो पुत्रों ने एक साथ कहा की ऐसे कैसे हो सकता है, बस की यात्रा तो चलती रहती है और उस सीट पर सवारियाँ बदलती रहती है। पहले कोई और बैठा था, आज कोई और बैठा होगा और पता नही कल कोई और बैठेगा। और वैसे भी उस सीट में क्या धरा है जो थोड़ी सी देर के लिये हमारी है!
               
पिताजी फिर हँसे फिर रोये और फिर वो बोले देखो यही तो मैं तुम्हे समझा रहा हूँ, कि जो थोड़ी देर के लिये तुम्हारा है, तुमसे पहले उसका मालिक कोई और था बस थोड़ी सी देर के लिये तुम हो और थोड़ी देर बाद कोई और हो जायेगा।
              
बस बेटा एक बात ध्यान रखना की इस थोड़ी सी देर के लिये कही अनमोल रिश्तों की आहुति न दे देना, यदि कोई प्रलोभन आये तो इस घर की इस स्थिति को देख लेना की अच्छे अच्छे महलों में भी एक दिन कबूतर अपना घोसला बना लेते है। बस बेटा मुझे यही कहना था-- कि  बस की उस सीट को याद कर लेना जिसकी रोज उसकी सवारियां बदलती रहती है उस सीट के खातिर अनमोल रिश्तों की आहुति न दे देना जिस तरह से बस की यात्रा में तालमेल बिठाया था बस वैसे ही जीवन की यात्रा मे भी तालमेल बिठा लेना !

दोनो पुत्र पिताजी का अभिप्राय समझ गये, और पिता के चरणों में गिरकर रोने लगे !

शिक्षा :-

मित्रों, जो कुछ भी ऐश्वर्य - सम्पदा हमारे पास है वो सबकुछ बस थोड़ी देर के लिये ही है, थोड़ी-थोड़ी देर मे यात्री भी बदल जाते है और मालिक भी। रिश्तें बड़े अनमोल होते है छोटे से ऐश्वर्य या सम्पदा के चक्कर मे कहीं किसी अनमोल रिश्तें को न खो देना...


Yug Parivartan Ka Samay
Dr Chinmay Pandya
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👉 जानवर भी सिखाते है प्यार की भाषा

हर व्यक्ति के जीवन मे, उसके रिश्तो मे कभी न कभी उतार-चढाव अवश्य आते है। कुछ लोग अपने प्रेम, धैर्य व समझदारी से हर रिश्ते को आसानी से संजो लेते हैँ, वही कुछ लोग रिश्तोँ व प्यार मे खरे उतरने मे नाकाम हो जाते है। अगर आप भी रिश्तो को सम्भालने मे असमर्थ महसूस करते है तो एक बार अपने पालतू जानवर की ओर नजर घुमाकर देखिए। वह भी आपको प्यार का पाठ पढाएंगे। जरूरी नही है कि आप प्यार की भाषा सीखने के लिए किसी डॉक्टर या विशेषज्ञ के कमरे मे घंटो बिताएँ। आप चाहे तो इन पालतू जानवरो से भी बहुत कुछ सीख सकते है !

शर्तो मे रिश्ता नही

प्रेम व रिश्ते कभी भी शर्तो के आधार पर नही बनते। जिन रिश्तो मे शर्ते होती है, उनका लम्बे समय तक टिकना बेहद ही मुश्किल होता है। आपके पालतू जानवर भी जब आपको प्रेम देते है या आपके लिए कोई कार्य करते है तो उसके पीछे उनका कोई मकसद या शर्त नही होती। इतना ही नही, वह अपने फायदे के लिए न तो आपको धोखा देते है और न ही झूठ बोलते है। एक बार सोच कर देखिए कि यदि आपके रिश्ते भी इतने ही पाक हो तो वह आपको कितना सुकून पहुंचाएंगे।

सीखे माफ करना

दुनिया मे ऐसे बहुत कम मनुष्य ही है जो आसानी से दूसरो को माफ कर पाते है। गलतियाँ सभी से होती है, इसलिए उन्हे माफ करना भी सीखेँ। जिस मनुष्य मे क्षमा करने का गुण नही है तो वह दूसरो का नही बल्कि खुद का जीवन ही बेहद कठिन बना लेता है। लेकिन जानवर ऐसे नही होते। अगर आप कभी अपने पालतू जानवर को डांट भी दे तो भी वह आपसे गुस्सा नही होते बल्कि वह लौटकर आपके पास आते है और आपको बेशुमार प्यार करते हैँ।

समय से सीचे प्रेम

आपने कभी नोटिस किया है कि जब भी आप घर पर होते है तो आपके प्यारे पालतू आपको एक पल के लिए भी अकेला नही छोडते। किचन से लेकर ड्राइंग रूम यहाँ तक कि बेडरूम मे भी अक्सर वह आपके साथ खेल रहे होते है। चाहे आप परेशान हो या खुश, वह आपके साथ हर फीलिंग शेयर करते है। इतना ही नही, उनके साथ समय बिताकर आप अपनी परेशानी भूलकर एकदम फ्रेश हो जाते है। लेकिन रिश्तो को समय देने के लिए आपके पास वक्त नही होता। एक बात गांठ बान्ध ले कि जब तक आप अपने रिश्ते रूपी पौधे को समय व प्रेम की खाद से नही सीचेंगे तो वह कभी भी मजबूत पेड नही बनेगा।

रहे रियल

मनुष्य अपना जीवन कई मुखौटो के साथ जीता है, फिर चाहे बात घर की हो या बाहर की। हर जगह के लिए हमारे पास एक मुखौटा है। मुखौटो के साथ जीवन जीते हुए हम अपने वास्तविक चेहरे को ही नही पहचान पाते। लेकिन जानवर हमेशा रियल ही होते हैँ। वह जगह, लोग और अपनी सुविधा के अनुसार अपना व्यक्तित्व व व्यवहार नही बदलते। एक बार आप भी अपने रिलेशनशिप मे रियल होकर देखिए। यकीनन आपको प्यार की एक नई परिभाषा देखने को मिलेगी और आप पहले से काफी खुश रहना सीख जाएंगे।

Duniya Mai Kimat Asli Ki hai
Dr Chinmay Pandya
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👉 आज का सद्चिंतन 9 Feb 2019



Bhartiya Sanskirti Ke Mul Me Hai Adhyatam
Dr Chinmay Pandya
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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 Feb 2019


👉 Profit From Dishonesty - Merely An Illusion

Those who accept dishonesty as dignified, and adopt it to be their ideal, are failing to analyze the situation in a thorough enough manner. They are disillusioned. The truth is that money simply cannot be earned by dishonest means. Even when we do acquire some wealth temporarily, the wealth can not stay permanent and really be ours. True living can only be earned through courage, wisdom, discipline, dexterity, and skillfulness.

Dishonest earnings through inappropriate means lead to results that are not only unstable but that are also eventually painful. There might be temporary escape from direct punishment, but eventually, in the long term, dishonesty invariably leads to public anger, outrage, hate, isolation, and sadness. In practice, deceit and corruption must be sugar coated with a fake layer of honesty for it to work. Conning does require establishing trust and confidence. If any suspicion arises, the person being conned is likely to jump out of the trap. Once proven guilty, the con man loses credibility forever and ends up bearing more eventual losses than profits.

There could be scores of everyday examples where the people who are caught bribing, cheating, evading tax, doing back marketing, and illegally hoarding not only get severely punished by the law but they also loose their social status and prestige. Once their deeds become public, everyone starts hating them.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Aacharya
📖 Badein Aadmi Nahi, Mahamanav Baniyein (Not a Big-Shot, Be Super-Human), Page 14

Guru Ki Kripa Jeevan Badal Deti Hai
Dr Chinmay Pandya
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👉 मानव देवों से श्रेष्ठ या पशुओं से हीन?

एक सभा में वाद- विवाद चल रहा था। एक पक्ष ने कहा- 'मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है क्योंकि वह सभी जीवधारियों को वश में कर लेता है। ' दूसरा पक्ष कहता था' अन्य प्राणी श्रेष्ठ हैं, क्योकि वे जिन्दगी भर बिना कुछ माँगे मनुष्य की सेवा करते हैं। ' निर्णय नहीं हो पा रहा था। विवाद बढ़ता ही गया। एक ज्ञानी उधर से जा रहे थे। सबने उनकी सम्मति माँगी। ज्ञानी ने दोनों पक्षों की बात सुनी और बोले- भाई, मानवी स्वतन्त्रता की भी अपनी सीमा है। हर कोई जीवन जीने का मर्म नहीं जानता। मनुष्य जब तक सत्कर्म करता है तब तक ही श्रेष्ठ है और जब वह दुष्कर्म करने लगता है तो वह नीचे गिर जाता है। जब भी ऐसे चयन के अवसर आये- हैं, मानवी बुद्धिमत्ता की पूरी परीक्षा हुई।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १

Bhoutikta Ya Aadhyatmikta Kis Baat Ki Chinta jyada?
Dr Chinmay Pandya
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https://youtu.be/xcmgfUeKONo

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2019

👉 हृदय−परिवर्तन

शालिवाहन मृगया के लिये निकलते तो वनचरों में प्रलय मच जाती। लाशों के ढेर बिछ जाते उस दिन। शेर चीते जैसे हिंसक जंतु ही नहीं, हिरन, साँभर, नीलगाय जैसे कोमल प्रकृति के जीव−जंतु भी शालिवाहन की दृष्टि से न बचते। शालिवाहन की पशु निर्दयता दूर−दूर तक विख्यात हो गई।

महारानी वसुप्रिया मृगया से क्लान्त महाराज शालिवाहन की सेवा तो करतीं पर उस दिन वह जीव दया पर उपदेश देना भी न भूलतीं। वे कहतीं....
“जीव−जंतु विराट्−विश्वात्मा के ही परिजन हैं। किसी को मारने, जीवन देने का अधिकार परमात्मा को है। हम मनुष्यों पर उनके उपकार पहले ही कम नहीं है, अपनी क्षणिक तृष्णा और दम्भ के लिये उन बेचारों का वध क्यों करें? महाराज जिस तरह हम मनुष्य दूसरों के द्वारा सताया जाना बुरा मानते हैं, उसी तरह जीवों का जी दुःखाना भी पाप है। आप आत्मा के कोप भोजन न बनें। जीवों को न सताया करें, उससे दुर्गति होती है।"

शालिवाहन हँसते क्या—विद्रूप अट्टहास करते और कहते.....
“बावरी! हर शक्तिशाली अशक्त को मारकर खा जाता है, यह तो प्रकृति का नियम है, इसमें पाप क्या हो गया?”

महारानी उत्तर देतीं.....
“नहीं महाराज! हर महान् व्यक्ति, महान् आत्मा छोटों को प्रश्रय देती, सहयोग और सहानुभूति देती है। जब समुद्र, वारिद बनकर बरसता है, तब तो नदी−नद भरे रहते हैं, सूर्य तपता है, तभी तो सृष्टि चक्र चलता है। संसार दया और दान पर टिका है। हम यदि वह न कर सकें तो कम से कम अपने से गये−गुजरों को सतायें भी नहीं।”

शालिवाहन उपदेश सुनने के आदी नहीं थे। वह उन अहंकारी व्यक्तियों में से थे, जो स्वयं को भगवान् मानने जैसा दम्भ दिखाते रहते हैं पर इस संसार में अहंकार टिका किसका? कौन व्यक्ति क्रूरता करके महान् बन सका?

शालिवाहन दूसरे दिन ही मृगया के लिये निकल पड़े। असंख्य पशु−पक्षियों का वध किया उनने। जीवों के विलाप के कारण वन−शोकसागर में बदल गया। किसी पशु का वंशनाश ही हो गया तो किसी मृगी के छौने मारे गये। प्रलयकाल जैसा जीव संहार कर रहे शालिवाहन ने एक हिरणी के देखते−देखते उसके दो सुकुमार बच्चों का वध कर दिया। हिरणी भी वहाँ से हटी नहीं, उसकी आँखें कह रही थीं—निर्दयी और एक तीर निकाल और बेध मेरा वक्षस्थल तुझे यह तो पता चले कि जीवों के भी ममता होती है, उन्हें भी अपने बच्चे तुम मनुष्यों के समान ही प्यारे लगते हैं।

हाथ तूणीर पर गया तो वह बिलकुल रिक्त हो चुका था। एक भी तीर न बचा था तरकस में। शंख ध्वनि की गई और महाराज शालिवाहन विजयी की भाँति दल−बल के साथ राजवानी की ओर लौट पड़े।

उस दिन से नवरात्र प्रारम्भ होते थे। महारानी वसुप्रिया! भगवती दुर्गा के अभिषेक के लिये, राजमहल से निकलकर पर्वतीय उपत्यिका पर बने मन्दिर में जाया करती थीं। उस दिन उनके साथ राजकुमारी उत्पल भी थी। उत्पल की आयु तब कुल पाँच वर्ष की ही थी।

अभी वे पर्वत के समीप पहुँच ही पाई थीं कि झाड़ियों के एक ओर से नर−भक्षी बाघ झपटा और राजकुमारी को झपटकर उठा ले गया। अंगरक्षक सैनिक देखते ही रहे, बाघ क्षण भर में ही घने जंगल में धँस गया। शालिवाहन के भय से भयभीत सैनिक बाघ का पीछा करते ही गये। बाघ सैनिकों की आँख बचाकर एक झाड़ी में छुपना चाहता था पर उसका वहाँ रुकना भारी पड़ गया। शाम हो चली थी।

हिरणी जिसके दो बच्चे आज ही महाराज शालिवाहन द्वारा मृत्यु के घाट उतार दिये गये थे, ने राजकुमारी उत्पल की ओर कातर दृष्टि से देखा। एक बार अपने बच्चों की ममता फिर उमड़ पड़ी हिरणी के हृदय में। वह बाघ पर टूट पड़ी। थका हुआ बाघ उसका सामना न कर सका। सैनिकों का भय भी था उसे। उत्पल को वहीं छोड़कर वह भाग निकला। हिरणी ने उत्पल को झाड़ी के अन्दर सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया। रात हो गई, सैनिक भी निराश होकर घर लौट गये।

बाघ के पंजों के घाव जहाँ−जहाँ लगे थे, हिरणी उन−उन स्थानों को रात भर चाटती रही। बार−बार उसके हृदय में अपने बच्चों की ममता और करुणा उमड़ती, वह उतनी ही ममता से उत्पल को चाटती रही मानो उसे अब उत्पल में ही अपने बच्चों की आत्मा झाँकती दिखाई दे रही थी।

रात भर की सुश्रूषा से उत्पल चंगी हो गई। प्रहर रात रह गई थी, तब उत्पल की अचेतावस्था वापिस लौटी। हिरणी के ममत्व में वह राज−परिवार का स्नेह और ममत्व भूल गई। सूर्योदय तक वह हिरणों से ऐसी हिल−मिल गई जैसे वह उसके ही परिवार की एक सदस्या हो।

प्रातःकाल शालिवाहन स्वयं राजकुमारी की खोज में निकल पड़े। खोजते−खोजते वह उसी स्थान पर पहुँचे जहाँ उत्पल हिरणी से खेल रही थी। चुपचाप बैठी हिरणी को कुछ ध्यान ही नहीं था, कौन आया, कौन गया। क्रोधावेश में आकर
शालिवाहन ने तीर निकालकर प्रत्यंचा चढ़ाई। उसे कान तक खींचकर बाण को छोड़ना ही चाहते थे कि उत्पल ने देख लिया। वह हिरणी की ओट करके दोनों हाथ फैलाकर तीर अपनी छाती में चुभा लेने के लिये खड़ी हो गई। महाराज ने डाँटा—हट जा उत्पल एक ही तीर में दुष्ट हिरणी का वध कर देता हूँ।

उत्पल तब मूर्तिवत् खड़ी थी। बोली तो नहीं पर उसकी आंखें कह रही थीं— 'निर्दयी ! चला तीर। तुझे पता तो चले, किसी जीव के प्राण लेने का फल क्या होता है। तू ही पिता नहीं, इन जीवों के भी माता पिता हैं। इन्हें भी मालूम होने दे कि जो मनुष्य आज निर्दयतापूर्वक पशुओं को मार सकता है, वह कल मनुष्य को भी मार सकता है।'

चढ़ी हुई प्रत्यंचा ढीली पड़ गई। धनुष हाथ से छुट गया। शालिवाहन की आँखों से आँसू झरने लगे। वह खाली हाथ हिरणी के पास तक चले गये। हिरणी की आंखें झर-झर झर रही थीं। शालिवाहन ने निर्झर से जल लिया और प्रतिज्ञा की अब वे कभी किसी पशु-पक्षी का वध नहीं करेंगे।

उसी दिन से सारे राज्य में घोषणा कर दी गई, कोई भी किसी जीव को कष्ट नहीं देगा। यह विजय महारानी वसुप्रिया की विजय थी। उस दिन उन्होंने सारे नगर की गायों को भोजन भी कराया।

अखण्ड ज्योति, जनवरी-1970 से साभार


यज्ञ का ज्ञान विज्ञान भाग 1
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https://youtu.be/Wp1dshsjQ5I

👉 आज का सद्चिंतन 8 Feb 2019



यज्ञ की तीसरी शिक्षा
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https://youtu.be/jlJ0BVtpCu8

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 Feb 2019


आज के परिवेश में यज्ञ का महत्व
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https://youtu.be/cTaefG6VImc

👉 चार बार भागवत सुनी

वीतराग शुकदेव जी के मुँह से राजा परीक्षित ने भागवत पुराण की कथा सुनकर मुक्ति प्राप्त की थी। यह बात एक धनवान व्यक्ति ने सुनी तो उसके मन में भागवत पर बड़ी श्रद्धा हुई और वह भी मुक्ति के लिए किसी ब्राह्मण से कथा सुनने के लिए आतुर हो उठा।

खोज की तो भागवत के एक बहुत बड़े विख्यात पण्डितजी मिले। कथा- आयोजन का प्रस्ताव किया तो पण्डितजी बोले- यह कलियुग है। इसमें धर्मकृत्यों का पुण्य चार गुना कम हो जाता है, इसलिए चार बार कथा सुननी पड़ेगी। चार बार कथा- आयोजन की सलाह देने का कारण था पर्याप्त दान- दक्षिणा। पण्डित जी को फीस देकर धनी व्यक्ति ने चार- भागवत सप्ताह सुने परन्तु लाभ कुछ नहीं हुआ। धनी उच्चकोटि के सन्त से मिला। भागवत सुनने का लाभ परीक्षित कैसे ले सके और मुझे क्यों नहीं मिला? उन्होंने इसका कारण बताया कि परीक्षित मृत्यु को निश्चित जानकर, संसार से पूर्णतया विरक्त होकर कथा सुन रहे थे और मुनि शुकदेव सर्वथा निर्लोभ रहकर कथा सुना रहे थे।

जिस किसी को भी ज्ञान, उपदेश अथवा सत्परामर्श के रूप में सुनने को मिला है, वही श्रेय पर चल सका है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १


यज्ञ का ज्ञान विज्ञान भाग 2
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https://youtu.be/eaXql-08r48

बुधवार, 6 फ़रवरी 2019

👉 जो है वही क्या कम है

एक मनुष्य किसी महात्मा के पास पहुँचा व कहने लगा- 'जीवन अल्पकाल कौ है। इस थोडे़ से समय में क्या- क्या करें? बाल्यकाल में ज्ञान नहीं रहता। बुढ़ापा उससे भी बुरा होता है। रात- दिन नींद नहीं लगती है। रोगों का उपद्रव अलग बना रहता है। युवावस्था में कुटुम्ब का भरण- पोषण किये बिना नहीं चलता। तब भला ज्ञान कैसे मिले? लोक- सेवा कब की जाय? इस जिन्दगी में तो कभी समय मिलता दीखता ही नहीं। ' ऐसा कह और खिन्न होकर वह रोने लगा।

उसे रोते देखकर महात्मा भी रोने लगे। उस आदमी ने पूछा- आप क्यों रोते हैं?' महात्मा ने कहा- 'क्या करूँ बच्चा! खाने के लिए अन्न चाहिए। लेकिन अन्न उपजाने के लिए मेरे पास जमीन नहीं है। मैं भूख से मर रहा हूँ। परमात्मा के एक अंश में माया है। माया के एक अंश में तीन गुण है। गुणों के एक अंश में आकाश है। आकाश में थोड़ी- सी वायु है और वायु में बहुत आग है। आग के एक भाग में पानी है। पानी का शतांश पृथ्वी है। पृथ्वी के आधे हिस्से पर पर्वतों का कब्जा है। नदियों और जंगलों को जहाँ देखो, वहाँ अलग बिखरे पड़े है। मेरे लिए भगवान ने जमीन का एक नन्हा सा टुकड़ा भी नहीं छोडा। थोड़ी- सी जमीन थी भी, सो उस पर और- और लोग अधिकार जमाये बैठे हैं। तब बताओ मैं भूखो न मरुँगा ?'

उस मनुष्य ने कहा- 'यह सब होते हुए भी आप जिन्दा तो हो न? फिर रोते क्यों हँ?' महात्मा तुरन्त बोल उठे- "तुम्हें भी तो समय मिला है, बहुमूल्य जीवन मिला है, फिर 'समय नहीं मिलता है, जीवन समाप्त हो रहा है' इसकी रट लगाकर क्यों हाय- हाय करते हो। अब आगे से समय न मिलने का बहाना न करना। जो कुछ भी है उसका तो उपयोग करो। "

साधनों की न्यूनता की दुहाई देना, ईश्वर के राजकुमार को तो कदापि शोभा नहीं देता। अपनी अपूर्णता को पूर्णता में बदल देने की याचना यदि आत्मिक क्षेत्र के विषय में हो तो वह मानवोचित भी है, गरिमापूर्ण भी। पर यदि बाह्य साधन प्रचुर मात्रा में हों तब उसकी ऐसी शिकायत दुर्भाग्यपूर्ण ही है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १

👉 श्रेष्ठता की परीक्षा:-

“नहीं, नहीं, विरोचन। श्रेष्ठता का आधार वह तप नहीं जो व्यक्ति को मात्र सिद्धियाँ  और सामर्थ्य प्रदान करे। ऐसा तप तो शक्ति-संचय का साधन मात्र है। श्रेष्ठ तपस्वी तो वह है जो अपने लिये कुछ चाहे बिना समाज के शोषित, उत्पीड़ित, दलित और असहाय जनों को निरन्तर ऊपर उठाने के लिये परिश्रम किया करता है। इस दृष्टि से महर्षि कण्व की तुलना राजर्षि विश्वामित्र नहीं कर सकते। कण्व की सर्वोच्च प्रतिष्ठा इसलिये है कि वह समाज और संस्कृति, व्यष्टि और समष्टि के उत्थान के लिये निरंतर घुलते रहते हैं।” भगवान इन्द्र ने विनोद भाव से विरोचन की बात का प्रतिवाद किया।

पर विरोचन अपनी बात पर दृढ़ थे। उनका कहना था- तपस्वियों में तो श्रेष्ठ विश्वामित्र ही हैं। उन दिनों विश्वामित्र शिवालिक-शिखर पर सविकल्प समाधि अवस्था में थे और कण्व वहाँ से कुछ दूर आश्रम-जीवन ज्ञापन कर रहे थे। कण्व के आश्रम में बालकों का ही शिक्षण नहीं बालिकाओं को भी समानान्तर आध्यात्मिक, धार्मिक एवं साधनात्मक प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था।

विरोचन ने फिर वही व्यंग्य करते हुए कहा- “भगवान् आपको तो स्पर्धा का भय है किन्तु आप विश्वास रखिये विश्वामित्र त्यागी सर्व प्रथम है तपस्वी बाद में। उन्हें इन्द्रासन का कोई लोभ नहीं, तप तो वह आत्म-कल्याण के लिये कर रहे हैं। उन्होंने न झुकने वाली सिद्धियाँ अर्जित की हैं। उन सिद्धियों का लाभ तो समाज को भी दिया जा सकता है।“

भगवान् इन्द्र ने पुनः अपने तर्क के प्रमाणित किया- “विश्वामित्र की सिद्धियों को मैं जानता हूँ विरोचन! किन्तु सिद्धियाँ प्राप्त कर लेने के बाद यह आवश्यक नहीं कि वह व्यक्ति उनका उपयोग लोक-कल्याण में करे। शक्ति में अहंभाव का जो दोष है वह सेवा में नहीं इसलिये सेवा को मैं शक्ति से श्रेष्ठ मानता हूँ इसीलिये कण्व की विश्वामित्र से बड़ा मानता हूँ।“

बात आगे बढ़ती किन्तु महारानी शची के आ जाने से विवाद रुक गया। रुका नहीं बल्कि एक मोड़ ले लिया। शची ने हँसते हुए कहा- “अनुचित क्या है? क्यों न इस बात की हाथों-हाथ परीक्षा कर ली जाये।“

बात निश्चित हो गई। कण्व और विश्वामित्र की परीक्षा होगी, यह बात कानों-कान सारी इन्द्रपुरी में पहुँच गई। लोग उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करने लगे देखें सिद्धि की विजय होती है या सेवा की।

निशादेवी ने पहला पाँव रखा। दीप जले, देव-आरती से उनका स्वागत किया गया। दिव्य-ज्योतियों से सारा इन्द्रपुर जगमग-जगमग करने लगा। ऐसे समय भगवान् इन्द्र ने अनुचर को बुलाकर रुपसी अप्सरा मेनका को उपस्थित करने की आज्ञा दी। अविलम्ब आज्ञा का पालन किया गया। थोड़ी ही देर में मेनका वहाँ आ गई। इन्द्र ने उसे सारी बातें समझा दीं। वह रात इस तरह इन्द्रपुर में अनेक प्रकार की मनोभावों में ही बीती।

सबेरा हुआ। भगवती उषा का साम्राज्य ढलने लगा। भुवन भास्कर देव प्राची में अपनी दिव्य सभा के साथ उगने लगे। भगवती गायत्री के आराधना का यह सर्वोत्कृष्ट समय होता है। तपस्वी विश्वामित्र आसन, बंध और प्राणायाम समाप्त कर जप के लिये बैठे थे। उनके हृदय में वैराग्य की धारा अहर्निश बहा करती थी। जप और ध्यान में कोई कष्ट नहीं होता था। बैठते-बैठते चित्त भगवान् सविता के भर्ग से आच्छादित हो गया। एक प्राण भगवती गायत्री और राजर्षि विश्वामित्र। दिव्य तेज फूट रहा था उनकी मुखाकृति से। पक्षी और वन्य जन्तु भी उनकी साधना देख मुग्ध हो जाते थे।

उनकी यह गहन शान्ति और स्थिरता देखकर पक्षियों को कलरव करने का साहस न होता। जन्तु चराचर नहीं करते थे, उन्हें भय था कहीं ध्यान न टूट जाये और तपस्वी के कोप का भाजन बनना पड़े। सिंह तब दहाड़ना भूल जाते वे दिन के तृतीय प्रहर में ही दहाड़ते और वह भी विश्वामित्र की प्रसन्नता बढ़ाने के लिये क्योंकि वह उस समय वन-विहार के लिये आश्रम छोड़ चुके होते थे।

किन्तु आज उस स्तब्धता को तोड़ने को साहस किया किसी अबला ने। अबला नहीं अप्सरा। मेनका। इन्द्रपुर जिसकी छवि पर दीपक की लौ पर शलभ की भाँति जल जाने के लिये तैयार रहता था। आज उसने अप्रतिम शृंगार कर विश्वामित्र के आश्रम में प्रवेश किया था। पायल की मधुर झंकार से वहाँ का प्राण-पूत वातावरण भी सिहर उठा। लौध्र पुष्प की सुगन्ध सारे आश्रम में छा गई। जहाँ अब तक शान्ति थी, साधना थी वहाँ देखते-देखते मादकता, वैभव और विलास खेलने लगा।

दण्ड और कमण्डलु ऋषि ने एक ओर रख दिये। कस्तूरी मृग जिस तरह बहेलिये की संगीत-ध्वनि से मोहित होकर कालातीत होने के लिये चल पड़ता है। सर्प जिस तरह वेणु का नाद सुनकर लहराने लगता है। उसी प्रकार महर्षि विश्वामित्र ने अपना सर्वस्व उस रुपसी अप्सरा के अञ्चल में न्यौछावर कर दिया। सारे भारतवर्ष में कोलाहल मच गया कि विश्वामित्र का तप भंग हो गया।

एक दिन, दो दिन, सप्ताह, पक्ष और मास बीतते गये और उनके साथ ही विश्वामित्र का तप और तेज भी स्खलित होता गया। विश्वामित्र का अर्जित तप काम के दो कौड़ी दाम बिक गया। और जब तप के साथ उनकी शांति उनका यश और वैभव भी नष्ट हो गया तब उन्हें पता चला कि भूल नहीं अपराध हो गया। विश्वामित्र प्रायश्चित की अग्नि में जलने लगे।

क्रोधोच्छ्दासित विश्वामित्र ने मेनका को दंड देने का निश्चय किया पर प्रातःकाल होने तक मेनका आश्रम से जा चुकी थी, इतने दिन की योग-साधना का परिणाम एक कन्या के रूप में छोड़ कर। विश्वामित्र ने बिलखती आत्मजा के पास भी मेनका को नहीं देखा तो उनकी देह क्रोध से जलने लगी पर अब हो ही क्या सकता? मेनका इन्द्रपुर जा चुकी थी।

रोती-बिलखती कन्या को देखकर भी विश्वामित्र को दया नहीं आई। पाप उन्होंने किया था पश्चाताप भी उन्हें ही करना चाहिये था पर उनकी आँखों में तो प्रतिशोध छाया हुआ था। ऐसे समय मनुष्य को इतना विवेक कहाँ रहता है कि वह यह सोचे कि मनुष्य अपनी भूलें सुधार भी सकता है। और नहीं तो अपनी सन्तान, अपने आगे आने वाली पीढ़ी के मार्गदर्शन के लिये तथ्य और सत्य को उजागर ही रख सकता है। विश्वामित्र को आत्म-कल्याण की चिन्ता थी इसलिये उन्हें इतनी भी दया नहीं आई कि वह बालिका को उठाकर उसके लिये दूध और जल की व्यवस्था करते। बालिका को वही बिलखता छोड़कर वे वहाँ से चले गये।

मध्याह्न वेला। ऋषि कण्व लकड़ियाँ काटकर लौट रहे थे। मार्ग में विश्वामित्र का आश्रम पड़ता था। बालिका के रोने का स्वर सुनकर कण्व ने निर्जन आश्रम में प्रवेश किया। आश्रम सूना पड़ा था। अकेली बालिका दोनों हाथों के अंगूठे मुँह में चूसती हुई भूख को धोखा देने का असफल प्रयत्न कर रही थी।

कण्व ने भोली बालिका को देखा, स्थिति का अनुमान करते ही उनकी आंखें छलक उठीं। उन्होंने बालिका को उठाया, चूमा और प्यार किया और गले लगाकर अपने आश्रम की ओर चल पड़े। पीछे-पीछे उनके सब शिष्य चल रहे थे।

इन्द्र ने विरोचन से पूछा- “तात बोलो न। जिस व्यक्ति के हृदय में पाप करने वाले के प्रति कोई दुर्भाव नहीं, पाप से उत्पीड़ित के लिये इतना गहन प्यार की उसकी सेवा माता की तरह करने को तैयार वह कण्व श्रेष्ठ हैं या विश्वामित्र?”

विरोचन आगे कुछ न बोल सके। उन्होंने लज्जावश अपना सिर नीचे झुका लिया।

अखण्ड ज्योति,सितम्बर-1969 से साभार

👉 आज का सद्चिंतन 6 Feb 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 Feb 2019


👉 आत्मचिंतन के क्षण 6 Feb 2019

■ समाज के कल्याण की बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, किन्तु अपने जीवन के बारे में कभी कुछ सोचा है हमने? जिन बातों को भाषण, उपदेश, लेखों में हम व्यक्त करते हैं, क्या उन्हें कभी अपने अंतर में देखा है! क्या उन आदर्शों को हम अपने परिवार, पड़ोस और राष्ट्रीय जीवन में व्यवहृत करते हैं? यदि ऐसा होने लग जाय तो हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में महान् सुधार, व्यापक क्रान्ति सहज ही हो जाए।

□ नम्रता एक प्रबल पुरुषार्थ है जिसमें सबके हित के लिए अन्यायी को मिटाने की नहीं, वरन् उसके अत्याचार को सहन करके उसे सुधारने का ठोस विज्ञान है। यह भूल सुधार का एक साधन है, जिसमें दूसरों को कष्ट न देकर स्वयं कष्ट सहन करने की क्षमता है।

◆ सच्ची प्रगति झूठे आधार अपनाने से उपलब्ध नहीं हो सकती। स्थायी सफलता और स्थिर समृद्धि के लिए उत्कृष्ट मानवीय गुणों का परिचय देना पड़ता है। जो इस कसौटी पर कसे जाने से बचना चाहते हैं, जो जैसे बने तुरन्त-तत्काल बहुत कुछ प्राप्त करना चाहते हैं, उनके सपने न सार्थक होते हैं, न सफल।

◇ धर्म अफीम की गोली नहीं है। परस्पर विद्वेष और असहिष्णुता उत्पन्न करने वाली कट्टरता को साम्प्रदायिक कहा जा सकता है, पर जिसका एकमात्र उद्देश्य ही प्रेम, दया, करुणा, सेवा, उदारता, संयम एवं सद्भावना को बढ़ाना है, उस धर्म को न तो अनावश्यक कहा जा सकता है और न अनुपयोगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 निराश मत होइए

रे. क्राक जो भी काम करने बैठते उसमें असफल हो जाते। सबसे पहले उन्होंने फ्लोरिडा में रीयल एस्टेट बेचने की कोशिश की, किंतु उसमें उन्हें घाटा हो गया। रीयल एस्टेट में घाटा होने के बाद उन्होंने उस काम को छोड़ दिया और एक बैंड में पियानो बजाने लगे। लेकिन वहां भी उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली। कुछ समय खाली रहने के बाद वे काफी परेशान हो गए। जीविका चलाने के लिए कोई न कोई काम करना तो जरूरी था। जब उन्हें काफी कोशिशों के बाद भी काम नहीं मिला, तो वे फ्रांस में कार ड्राईवर बन गए। लेकिन इसमें भी उनका मन नहीं लगा। ड्राईवरी छोड़कर वे सेल्समैन बन गए। उन्हें यह समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर उनका काम में मन क्यों नहीं लगता है?

शायद मन कोई नया और साहसिक काम करना चाहता था। ये तरह-तरह के धंधे आजमाने के बाद उन्होंने अपनी एक कंपनी बनाई और तेरह वर्ष तक मल्टी मिक्सर्स बेचते रहे। इसी तरह समय के साथ-साथ उनकी आयु बढ़ती रही और उन्हें सबसे बड़ी सफलता अपने जीवन के बावन वर्ष बिताने के बाद मिली। उन्होंने देखा कि उनके मल्टी मिक्सर्स का सबसे बड़ा खरीददार एक ऐसा रेस्तरां है, जिसे दो भाई मिलकर चलाते हैं।

एक दिन रे. क्राक उस रेस्तरां में गए। वहां उन्होंने देखा कि लोग लाइन में खड़े होकर हैमबर्गर के लिए हल्ला मचा रहे हैं। वहां से वापस आने के बाद उन्होंने काफी सोच-विचार कर मैक डोनल्ड बंधुओं के फ्रेंचाइजी अधिकार खरीद लिए। इसके बाद धीरे-धीरे उन्होंने मैक डोनल्ड फ्रेंचाइजी चेन बनाकर पूरे विश्व में अपना व्यापार फैलाना शुरू किया और आज दुनिया के हर शहर में उनके बर्गर बिक रहे हैं। इस प्रकार रे. क्राक ने जीवन के उस समय में सफलता प्राप्त की, जब लोग कार्य करके और असफलता मिलने पर हार कर बैठ जाते हैं और अपना जीवन समाप्त समझते हैं।

👉 दलिया खाने के लाभ

■ दलिया में कम कैलोरी, कम वसा और उच्च फाइबर होता है जो शरीर के वजन को कम करने में मदद करता है।

□ दलिया में मौजूद अघुलनशील फाइबर कब्ज को रोकने और पाचन तंत्र के स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में मदद करता है। यह पेट के स्वास्थ्य को बनाए रखने और साथ ही साथ पेट के कैंसर के जोखिम को कम करने में मदद करता है।

◆ दलिया प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट का एक बड़ा स्रोत है जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करने में सहायक होता है।

◇ दलिया में फाइबर भरपूर मात्रा में पाया जाता है जो कैंसर के खिलाफ शरीर की रक्षा करने में मदद कर सकते हैं।

■ दलिया का सेवन करने से हृदय रोग, उच्च कोलेस्ट्रॉल और उच्च रक्तचाप का खतरा कम हो जाता है।

□ दलिया में एंटी ऑक्सीडेंट गुण होते हैं जो हानिकारक विषाक्त पदार्थों से शरीर की रक्षा करते है।

◆ दलिया का सेवन मधुमेह के रोगियों के लिए भी काफी फायदेमंद होता है।

◇ दलिया कैल्शियम और मैग्नीशियम का एक अच्छा स्रोत है जो हड्डियों को मजबूत बनाता है।

■ दलिया आयरन का एक अच्छा स्त्रोत है जो हीमोग्लोबिन निर्माण करने के लिए हमारे शरीर के लिए बहुत आवश्यक है। लोहा शरीर के तापमान और चयापचय को विनियमित करने में मदद करता है।

□ दलिया पित्त पथरी के गठन को रोकने में मदद करता है।

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019

👉 गेंहू के दाने: -

एक समय की बात है जब श्रावस्ती नगर के एक छोटे से गाँव में अमरसेन नामक व्यक्ति रहता था। अमरसेन बड़ा होशियार था, उसके चार पुत्र थे जिनके विवाह हो चुके थे और सब अपना जीवन जैसे-तैसे निर्वाह कर रहे थे परन्तु समय के साथ-साथ अब अमरसेन वृद्ध हो चला था! पत्नी के स्वर्गवास के बाद उसने सोचा कि अब तक के संग्रहित धन और बची हुई संपत्ती का उत्तराधिकारी किसे बनाया जाये?

ये निर्णय लेने के लिए उसने चारो बेटों को उनकी पत्नियों के साथ बुलाया और एक-एक करके गेहूं के पाँच दानें दिए और कहा कि मै तीरथ पर जा रहा हूँ और चार साल बाद लौटूंगा और जो भी इन दानों की सही हिफाजत करके मुझे लौटाएगा तिजोरी की चाबियाँ और मेरी सारी संपत्ती उसे ही मिलेगी, इतना कहकर अमरसेन वहां से चला गया।

पहले बहु- बेटे ने सोचा बुड्ढा सठिया गया है चार साल तक कौन याद रखता है हम तो बड़े हैं तो धन पर पहला हक़ हमारा ही है। ऐसा सोचकर उन्होंने गेहूं के दानें फेक दिये।

दूसरे ने सोचा की संभालना तो मुश्किल है यदि हम इन्हे खा लें तो शायद उनको अच्छा लगे और लौटने के बाद हमें आशीर्वाद देदे और कहे की तुम्हारा मंगल इसी में छुपा था और सारी संपत्ती हमारी हो जाएगी यह सोचकर उन्होंने वो पाँच दानें खा लिये।

तीसरे ने सोचा हम रोज पूजा पाठ तो करते ही हैं और अपने मंदिर में जैसे ठाकुरजी को सँभालते हैं, वैसे ही ये गेहूं भी संभाल लेंगे और उनके आने के बाद लौटा देंगे।

चौथे बहु- बेटे ने समझदारी से सोचा और पाचों दानो को एक एक कर जमीन में बो दिया और देखते-देखते वे पौधे बड़े हो गये और कुछ गेहूं ऊग आये फिर उन्होंने उन्हें भी बो दिया इस तरह हर वर्ष गेहूं की बढ़ोतरी होती गई पाँच दानें पाँच बोरी, पच्चीस बोरी,और पचासों बोरियों में बदल गए।

चार साल बाद जब अमरसेन वापस आया तो सबकी कहानी सुनी और जब वो चौथे बहु-बेटों के पास गया तो बेटा बोला , ” पिताजी , आपने जो पांच दाने दिए थे अब वे गेंहूँ की पचास बोरियों में बदल चुके हैं, हमने उन्हें संभल कर गोदाम में रख दिया है, उनपर आप ही का हक़ है। ” यह देख अमरसेन ने फ़ौरन तिजोरी की चाबियाँ सबसे छोटे बहु-बेटे को सौंप दी और कहा, तुम ही लोग मेरी संपत्ति के असल हक़दार हो।

इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि मिली हुई जिम्मेदारी को अच्छी तरह से निभाना चाहिए और मौजूद संसाधनो, चाहे वो कितने कम ही क्यों न हों, का सही उपयोग करना चाहिए। गेंहूँ के पांच दाने एक प्रतीक हैं, जो समझाते हैं कि कैसे छोटी से छोटी शुरआत करके उसे एक बड़ा रूप दिया जा सकता है।


आपको अपने परिवार में देखकर हमको बहुत प्रसन्नता होती है
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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https://youtu.be/UrTJjrUj7IU

👉 जैसे जैसे मेरी उम्र में वृद्धि होती गई

मुझे समझ आती गई कि अगर मैं Rs. 300 की घड़ी पहनूं या Rs. 30000 की, दोनों समय एक जैसा ही बताएंगी,

मेरे पास Rs. 300 का बैग हो या Rs. 30000 का, इसके अंदर के सामान में कोई परिवर्तन नहीं होंगा"

मैं 300 गज के मकान में रहूं या 3000 गज के मकान में, तन्हाई का एहसास एक जैसा ही होगा,

आख़िर में मुझे यह भी पता चला कि यदि मैं बिजनेस क्लास में यात्रा करूं या इक्नामी क्लास में, अपनी मंजिल पर उसी नियत समय पर ही पहुँचूँगा....

इसीलिए, अपने बच्चों को बहुत ज्यादा अमीर होने के लिए प्रोत्साहित मत करो बल्कि उन्हें यह सिखाओ कि वे खुश कैसे रह सकते हैं और जब बड़े हों, तो चीजों के महत्व को देखें, उसकी कीमत को नहीं,

फ्रांस के एक वाणिज्य मंत्री का कहना था -

ब्रांडेड चीजें व्यापारिक दुनिया का सबसे बड़ा झूठ होती हैं, जिनका असल उद्देश्य तो अमीरों की जेब से पैसा निकालना होता है, लेकिन गरीब और मध्यम वर्ग लोग इससे बहुत ज्यादा प्रभावित होते हैं।

क्या यह आवश्यक है कि मैं I phone लेकर चलूं फिरू, ताकि लोग मुझे बुद्धिमान और समझदार मानें?

क्या यह आवश्यक है कि मैं रोजाना Mac'd या KFC में खाऊँ ताकि लोग यह न समझें कि मैं कंजूस हूँ?

क्या यह आवश्यक है कि मैं प्रतिदिन Friends के साथ उठक-बैठक Downtown Cafe पर जाकर लगाया करूँ, ताकि लोग यह समझें कि मैं एक रईस परिवार से हूँ?

क्या यह आवश्यक है कि मैं Gucci, Lacoste, Adidas या Nike का ही पहनूं ताकि High Status वाला कहलाया जाऊँ?

क्या यह आवश्यक है कि मैं अपनी हर बात में दो चार अंग्रेजी शब्द शामिल करूँ ताकि सभ्य कहलाऊं?

क्या यह आवश्यक है कि मैं Adele या Rihanna को सुनूँ ताकि साबित कर सकूँ कि मैं विकसित हो चुका हूँ?

नहीं दोस्तों !!

मेरे कपड़े तो आम दुकानों से खरीदे हुए होते हैं।
Friends के साथ किसी ढाबे पर भी बैठ जाता हूँ।

भुख लगे तो किसी ठेले से ले कर खाने में भी कोई अपमान नहीं समझता।

अपनी सीधी सादी भाषा मे बोलता हूँ।

चाहूँ तो वह सब कर सकता हूँ जो ऊपर लिखा है।

लेकिन,

मैंने ऐसे लोग भी देखे हैं जो एक Branded जूतों की जोड़ी की कीमत में पूरे सप्ताह भर का राशन ले सकते हैं।

मैंने ऐसे परिवार भी देखे हैं जो मेरे एक Mac'd के बर्गर की कीमत में सारे घर का खाना बना सकते हैं,

बस मैंने यहाँ यह रहस्य पाया है कि बहुत सारा पैसा ही सब कुछ नहीं है, जो लोग किसी की बाहरी हालत से उसकी कीमत लगाते हैं, वह तुरंत अपना इलाज करवाएं"

मानव मूल की असली कीमत उसकी नैतिकता, व्यवहार, मेलजोल का तरीका, सहानुभूति और भाईचारा है, ना कि उसकी मौजुदा शक्ल और सूरत, सूर्यास्त के समय एक बार सूर्य ने सबसे पूछा, मेरी अनुपस्थिति में मेरी जगह कौन कार्य करेगा ?

समस्त विश्व मे सन्नाटा छा गया। किसी के पास कोई उत्तर नहीं था। तभी कोने से एक आवाज आई।

दीये ने कहा - "मै हूं  ना" मैं अपना पूरा प्रयास करुंगा"

आपकी सोच में ताकत और चमक होनी चाहिए
छोटा-बड़ा होने से फर्क नहीं पड़ता, सोच बड़ी होनी चाहिए,
मन के भीतर एक दीप जलाएं और सदा मुस्कुराते रहिए"

जियो और जीने दो 🙏 🙏


बड़े कार्य के लिये सहयोगी चाहिये
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👇👇👇
https://youtu.be/UZ2ypr0UAXE

👉 आज का सद्चिंतन 5 Feb 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 Feb 2019


👉 नारद मोह

एक बार नारद को काम वासना पर विजय पाने का अहंकार हो गया था। उन्होंने भगवान् विष्णु के समक्ष भी अभिमान सहित प्रकट कर दिया। भगवान् ने सोचा कि भक्त के मन में मोह- अहंकार नहीं रहने देना चाहिए। उन्होंने अपनी माया का प्रपंच रचा। सौ योजन वाले अति सुरम्य नगर में शीलनिधि नामक राजा राज्य करता था। उसकी पुत्री परम सुन्दरी विश्व मोहिनी का स्वयम्बर हो रहा था। उसे देखकर नारद के मन में मोह वासना जागृत हो गयी। वे सोचने लगे कि नृपकन्या किसी विधि उनका वरण कर ले। भगवान को अपना हितैषी जानकर नारद ने प्रार्थना की। भगवान प्रकट हो गए और उनके हित साधन का आश्वासन देकर चले गए।

मोहवश नारद भगवान की गढ़ बात को समझ नहीं सके। वे आतुरतापूर्वक स्वयंवर भूमि में पहुँचे। नृप बाला ने नारद का बन्दर का सा मुँह देखकर उधर से बिछल ही मुँह फेर लिया। नारद बार- बार उचकते- मचकते रहे। विष्णु भगवान नर- वेष में आये। नृप सुता ने उनके गले में जयमाला डाल दी। वे उसे ब्याह कर चल दिये। अपनी इच्छा पूरी न होने पर नारदजी को गुस्सा आ गया और मार्ग में नृप- कन्या के साथ जाते हुए विष्णु भगवान को शाप दे डाला। भगवान ने मुस्करा कर अपनी माया समेट ली। अब वे अकेले खड़े थे। नारदजी की आँखें खुली की खुली रह गयीं। उन्होंने बार- बार क्षमायाचना की, कहा- भगवन्। मेरी कोई व्यक्तिगत इच्छा न रहे, आपकी इच्छा ही मेरी अभिलाषा हो, लोकं- मंगल की कामना ही हमारे मन में रहे।

नारद भगवान से निर्देश- सन्देश लेकर जन- जन तक उसे पहुँचाने के लिए उल्लास के साथ धरती पर आये एवं व्यक्ति के रूप में नहीं अपितु समष्टि में संव्याप्त चेतन प्रवाह के रूप में व्यापक बने। आज ध्वंस की तमिस्रा के मध्य जो नव सृजन का आलोक बिखरा दिखाई पड़ रहा है, वह इसी का प्रतिफल है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १

👉 The Only Source of Inner Joy

God has set a marvelous interdependence within and between the conscious and the inanimate components of Nature in order to maintain the eternal beauty and harmonious functioning of His grand creation. The uncountable numbers of stars and planets revolving in the limitless Universe are mutually connected by natural forces of attraction. Any break in this connectivity would disturb the maintained equilibrium and stability and result in gigantic collision and devastation of the universal system.

The same is true of the mutual affinity of the living beings. Just imagine! If a mother does not have a feeling of love or affection for her child, or there is no binding of love between husband and wife, brother and brother, and other family members, then what will be the state of family institution? Lack of the feelings of affectionate caring, amity, cooperation, etc would ruin the entire social system as the letter is founded on these sentiments and consequent unity of its members. Dry-hearts and cruelty would destroy the sense of beauty from Nature…

A sublime spring of pure love is flowing deep within every heart. If we like to be happy, and prosper in an ambience of peace, we will have to awaken the feeling of love in our heart; this should not be an emotional excitement, rather, a feeling of compassion, generosity, honesty, humility, sensitivity, care and respect for others. Those who adopted this divine attitude on every front of their life are truly religious and followers of God. The world reciprocates to them accordingly. Every moment, every circumstance is auspicious for them.

Akhand Jyoti, Feb. 1944

हमारी निराशा को दूर करिये जिंदा शक्तिपीठ बनाईये
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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https://youtu.be/EUfOL150df4

👉 आत्मचिंतन के क्षण 5 Feb 2019

■ अनेक लोग जरा-सा संकट आते ही बुरी तरह घबरा जाते हैं। हाय-हाय करने लगते हैं, उसे ईश्वर का प्रकोप मानकर भला-बुरा कहने लगते हैं। निराश-हतोत्साह होकर ईश्वर के प्रति अनास्थावान् होने लगते हैं-यह ठीक नहीं। आपत्तियाँ संसार में सहज संभाव्य हैं। किसी समय भी आ सकती हैं। उन्हें ईश्वर का अपने बच्चों के साथ एक खेल समझना चाहिए। उनका आशय यही होता है कि बच्चे भयावह स्थितियों के अभ्यस्त हो जायें और डरने की उनकी आदत छूट जाये।

□ निर्भयता उत्कृष्ट मानसिक स्थिति का परिणाम है। यह एक नैतिक सद्गुण है, जो बड़े तप और त्याग से प्राप्त होता है। मन का जितना विकास होता जाएगा, उसी अनुपात से निर्भयता की उपलब्धि होगी। उत्कृष्ट आदर्श-सिद्धान्तों की रक्षा के लिए जितना उत्सर्ग, त्याग, कष्ट, सहिष्णुता होगी, उसी के अनुसार निर्भयता प्राप्त होती जाएगी।

◆ पाप कर्मों के लिए अपना अंतःकरण जिसे धिक्कारता और प्रताड़ित करता रहता है, वह मनुष्य सोते-जागते कभी चैन नहीं पा सकता। दमा और दर्द के रोगी की भाँति पापी को भी न रात में, न दिन में कभी भी चैन नहीं मिलता है। वह भीतर ही भीतर अपने आप ही अपनी शक्ति को कुतरता रहता है।

◇ भाग्य और कुछ नहीं, कल के लिए हुए पुरुषार्थ का आज का परिपक्व स्वरूप ही भाग्य है। जो आज भाग्यवान् दीखते हैं, उन्हें वह सौभाग्य अनायास ही नहीं मिला है। विधाता ने कोई पक्षपात भी उनके साथ नहीं किया है। उनके पूर्व पुरुषार्थ ही आज सौभाग्य के रूप में परिलक्षित हो रहे हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

आपके पूर्व संस्कारो से हमने आप को ढूंढा है
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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https://youtu.be/v-bV4h-X9Eg

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...