गुरुवार, 9 अगस्त 2018

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 24)

👉 प्रतिभा संवर्धन का मूल्य भी चुकाया जाए
  
🔷 यह युगसंधि का प्रभात पर्व ऐसा है, जिसमें महाकाल को प्राणवान प्रतिभाओं की असाधारण आवश्यकता पड़ रही है। दैवी प्रयोजन महामानवों के माध्यम से ही क्रियान्वित होते हैं। अदृश्य शक्तियाँ तो उनमें प्रेरणा भर भरती हैं। यह व्यक्ति का स्वतंत्र निर्धारण होता है कि उन्हें अपनाए या ठुकराए। कृष्ण ने अर्जुन को कहा था कि ‘‘दुष्ट कौरव तो पहले से ही मरे पड़े हैं। मैनें उनका पहले ही तेजहरण कर लिया है। तुझे तो धर्मयुद्ध में निरत होकर मात्र श्रेय भर गले में धारण करना है।’’ वस्तुतः युग की विकृतियों का शमन होना ही है।

🔶 नवसृजन का ऐसा महायज्ञ जाज्वल्यमान होना है, जिससे आगामी लंबे समय तक सुख शांति और प्रगति का वातावरण बना रहे, एकता और समता को मान्यता मिले, ध्वंस का स्थान सृजन ग्रहण करे और चेतना तथा भौतिक शक्तियों का नियोजन मात्र सत्प्रयोजनों के निमित्त होता रहे। इसी उज्ज्वल भविष्य को ‘सतयुग की वापसी’ नाम दिया गया है। अनीति की असुरता का दमन देवताओं की सामूहिक शक्ति-संघशक्ति दुर्गा के अवतरण से संभव हुआ था। लगभग उसी पुरातन प्रक्रिया का प्रत्यावर्तन नये सिरे से, नये रूप में इन दिनों संपन्न होने जा रहा है। उस प्रवाह में सम्मिलित होने वाले सामान्य पत्तों की तरह हलके होते हुए भी सरिता की धाराओं पर सवार होकर बिना कुछ विशेष प्रयास के ही महानता के महासमुद्र में जा मिलने में सफल हो सकेंगे।
  
🔷 अपने काम से, किसी से कुछ पाने के लिए कहीं जाना एक बात है और किसी समर्थ सत्ता द्वारा अपने सहायक के रूप में बुलाए जाने पर वहाँ पहुँचना सर्वथा दूसरी। पहली में एक पक्ष की दीनता और दूसरे पक्ष की स्वाभाविक उपेक्षा भर रहती है पर आमंत्रित अतिथि को लेने स्टेशन पर माला लेकर पहुँचना और सम्मानपूर्वक ठहराया जाता है। उसके वार्तालाप को भी प्रमुखता दी जाती है और ऐसा आधार खड़ा किया जाता है कि आमंत्रित व्यक्ति में निमंत्रण का उद्देश्य समझने और उसमें सहभागी बनने की प्रतिक्रिया उत्पन्न हो। महाकाल द्वारा प्रज्ञा-परिजनों के भेजे गए आमंत्रण को इसी रूप में देखा-समझा जाना चाहिए।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 30

👉 Personality, personality, personality

🔷 This body is begotten and born of parents, there is really nothing different about the process of human birth, it is the same as in other animals. But on the other hand a personality has to be birthed with great care and resourcefulness.

🔶 Everyone, from a scientist to a philosopher has held human life in high regards; they sing praises to its greatness. The object of this praise is not a person, but a persona - the personality.

🔷 Yes, we do hear of someone inheriting a huge fortune, but its quite impossible to inherit - a great personality.

🔶 To make a personality is to relentlessly fight the battle of self-improvement with firm determination.

🔷 When a person becomes great, becomes extraordinary, outwardly he appears to be the same - but something does change, which makes him extraordinary from ordinary and that is - his personality.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Jivan Devta ki sadhana-aradhana Vangmay 2 Page 2.2

👉 व्यक्ति नहीं, व्यक्तित्व

🔷 व्यक्ति की शरीर रचना तो माता-पिता के सम्भोग से अन्य प्राणियों की ही भाँति हो जाती है, किन्तु व्यक्तित्व की रचना बड़ी सावधानी और सूझ-बूझ के साथ करनी होती है।

🔶 दार्शनिकों से लेकर वैज्ञानिक तक ने मनुष्य जीवन की महत्ता के जो गीत गाए हैं उनका केन्द्र व्यक्ति नहीं व्यक्तित्व ही रहा है।

🔷 यह तो हो सकता है कि किसी को धन सम्पदा विरासत में मिली हो, पर चरित्र आज तक किसी को भी विरासत में नहीं मिला।

🔶 यह निरंतर आत्म-सुधार की प्रक्रिया से लोहा लेने से ही संभव हुआ है।

🔷 कोइ सामान्य मनुष्य जब असामान्य बन जाता है, उसके बाह्य आकार, बनावट में उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं होता, जो वस्तु बदलती है वह व्यक्तित्व ही है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 जीवन देवता की साधना-आराधना वांग्मय 2 पृष्ठ 2.2

बुधवार, 8 अगस्त 2018

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 23)

👉 प्रतिभा संवर्धन का मूल्य भी चुकाया जाए
  
🔶 गाँधी युग में जो सत्याग्रही उभरकर आगे आए वे स्वतंत्रता सेनानी कहलाये, यशस्वी बने। ताम्रपत्र, पेंशन और आवागमन के मुफ्त पास प्राप्त करने के लाभों से गौरवान्वित हुए। जो उनमें वरिष्ठ और विशिष्ट थे, वे देश का शासन सूत्र संचालन करने वाले मूर्द्धन्य बने। बापू के संपर्क में रहे नेहरू, पटेल जैसे अनेकों रत्न ऐसे हैं जिनके स्मारकों को नमन किया जाता है। इतिहास के पृष्ठों पर यशोगाथा पढ़कर भाव-विभोर हुआ जाता है। यह उनकी प्रचंड प्रतिभा का प्रतिफल मात्र है। यदि वे संकीर्ण स्वार्थ परायणों की तरह अपने मतलब से ही मतलब रखते, तो मात्र कुछ सुख-साधनों से मन बहला पाते, प्रकाश स्तंभ बनने के सुयोग सौभाग्य से तो उन्हें वंचित ही रहना पड़ता। जो उन दिनों कृपणता धारण किए रहे वे अग्रगामियों के साथ अपनी तुलना करने पर ‘माया मिली न राम’ वाली अपनी मूर्खता पर पश्चाताप ही करते रहते हैं, पर बीता हुआ समय पुनः लौटता कहाँ है?

🔷 बुद्ध, गाँधी, दयानंद, विवेकानंद, बिनोवा जैसों की महान उपलब्धियाँ स्मरण करके हर विचारशील का अंत:करण उमंगता है कि यदि उन्हें ऐसा ही श्रेय मिल सका होता तो कितना अच्छा होता। उस अवसर को गँवाकर वे जिस ललक-लिप्सा की पूर्ति का दिवा-स्वप्न देखते रहते हैं, उसे भी कौन साकार कर पाता है? तृष्णा मरते समय तक प्रौढ़ ही बनी रहती है। शेखचिल्लियों का समुदाय कुबेर जैसा धनाढ्य और इंद्र जैसा प्रतापी बनने के सपने देखता है, पर अब निष्कर्ष की बेला में मात्र इतना ही प्रतीत होता है कि कोल्हू के बैल की तरह पिलते और पिसते हुए समय बीतता गया। श्मशान के भूत-पलीत की तरह डरते और डराते रहने के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगा।
  
🔶 भाग्यवान वे हैं, जिन्होंने आदर्शों के साथ रिश्ता जोड़ा, महानता का मार्ग अपनाया और ऐसा कुछ कर दिखाया, जिसका अनुकरण करते हुए असंख्यों को गौरव-गरिमा का लक्ष्य प्रदान करने वाला ऊर्जा भरा प्रकाश उपलब्ध होता रहे। मूर्खता और बुद्धिमत्ता के चयन के लिए इसी चौराहे पर सही निर्णय करने का अवसर है। वैसा अवसर सुयोग भी इन्हीं दिनों है, जिसका लाभ भगीरथ और अर्जुन ने अपनी उदात्त साहसिकता के बदले खरीदा था। वरदान अनायास ही किसी को कहाँ मिलते हैं? देवता कुपात्रों और असमर्थों पर कृपा कहाँ करते हैं। पात्रता की गहराई रहने पर ही वर्षा का पानी विशाल जलाशय के रूप में लहराता है।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 30

👉 Two powers influencing human life

🔶 Religion and politics are the two main factors influencing human life at large. One offers zeal and the other awes with authority. One influences the outer worldly life of the masses while the other have an effect on the very depth of their inner being, thus giving them vision and direction. Both are immensely powerful having an extraordinary influence in their own respective field.The aforesaid comparison is not meant to prove or disprove which one of them is weak or strong, useful or useless. Both are in fact complementary to one another. Each one of them can facilitate the success of the other even though they work in their own discreet fields.

🔷 Humanity suffers when both of them happen to be at odds with one another. Harmony between religion and politics can indeed do wonder to humanity. Unfortunately, such harmony is lacking these days.

🔶 Even though both are complementary to each other, religion remains to be of greater importance as it influences the inner core of human being which then produces corresponding outside physical situations. Therefore, we should rely on dharma to educate and bring worthy changes in the hearts and minds of the masses rather than pleading help from the government administration which should be better left alone to get on with its duty of serving people in the physical field. We should utilise dharma more than ever to educate mind of the masses to rouse, guide, improve and excel their thoughts and feelings. The great luminaries who have been able to transform the world actually came from from the world of dharma

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana: Darsana, swarupa va karyakrama Vangmay 66 Page 1.1

👉 मानव-जीवन को प्रभावित करने वाले दो आधार

🔶 धर्मतंत्र और राजतंत्र, दो ही मानव-जीवन को प्रभावित करने वाले आधार हैं। एक उमंग पैदा करता है तो दूसरा आतंक प्रस्तुत करता है। एक जन-साधारण के भौतिक जीवन को प्रभावित करता है और दूसरा अन्त:करण के मर्मस्थल को स्पर्श करके दिशा और दृष्टि का निर्धारण करता है। दोनों की शक्ति असामान्य है। दोनों का प्रभाव अपने-अपने क्षेत्र में अद्भुत है।

🔷 दोनों की तुलना यहाँ इस दृष्टि से नहीं की जा रही कि इसमें कौन कमजोर है; कौन बलवान; कौन महत्त्वपूर्ण है; कौन निरर्थक। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों का क्षेत्र बॅंटा हुआ होते हुए भी वस्तुत: एक के द्वारा दूसरे के सफल प्रयोजन होने में सहायता मिलती है।

🔶 दोनों एक दूसरे की विपरीत दिशा में चलें तो जनसाधारण को हानि ही उठानी पड़ती है। राज-सत्ता अपने हाथ में नहीं, वह दूसरों के हाथ में है। धर्म और राजनीति का समन्वय हो सका तो उसका परिणाम अति सुखद होता, पर आज की स्थिति में वह कठिन है। भले ही दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, फिर भी धर्मतंत्र का महत्व राजतंत्र से ऊपर ही है, क्योंकि अन्तरंग जीवन के अनुरूप ही भौतिक परिस्थिति में हेर-फेर होता है। अस्तु, भावनात्मक नवनिर्माण के लिए हमें राजसत्ता का सहारा टटोलने की अपेक्षा धर्मसत्ता का ही आश्रय लेना चाहिए। सरकार को अपने अन्य भौतिक उत्तरदायित्व निर्वाहों के लिए छुट्टी देनी चाहिए। हमें जन-मानस को स्पर्श करने के लिए विशेष रूप से धर्म-सत्ता का ही उपयोग करना होगा। उसके माध्यम से जनभावनाओं को जगाया, मोड़ा, सुधारा और उठाया जा सकता है। संसार को पलटकर रख देने वाले महामानव धर्मक्षेत्र के उद्यान में ही उपजे हैं।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-वांग्मय 66 पृष्ठ 1.1

👉 बिना उसकी कृपा के हम कुछ भी नही

🔶 कोई भी छोटा-बड़ा काम करो तो तुम ये कभी मत समझना की ये मैं कर रहा हुं या उसे अपने नाम से कभी मत रखना!

🔷 एक धार्मिक स्थान पर एक सेठ जी भंडारा करते थे एक बार एक संत श्री वहाँ प्रसाद ग्रहण करने आये तो उन्होने देखा की सेठजी के मन मे अहंकार का उदय हो रहा है तो उन्होने कहा सेठजी बिना उसकी कृपा के हम कुछ भी नही कर सकते है और तो बहुत दुर की बात जौगर उसकी कृपा न हो तो खिलाना तो बहुत दुर की बात सामने परोसी हुई थाली अरे थाली क्या हाथ मे लिया ग्रास भी हाथ मे रह जाता है

🔶 सेठजी आप यही सोचना की दाने दाने पर लिखा होता है खाने वाले का नाम अरे ये तो उसकी महानता है जो कर तो वो रहा है और नाम हमें दे रहा है! सेठजी जो काम रामजी को करना है वो तो वो करेंगे आप तो ये समझना की उन्होने इस धर्म-कर्म के लिये मुझे चुना है यही मेरा परम सौभाग्य है!

🔷 सन्त श्री तो कहकर चले गये पर सेठजी को ये हज़म नही हुआ की दाने दाने पर भी भला खाने वाले का नाम लिखा होता है क्या? सेठजी को भूख लग रही थी वो भण्डार कक्ष मे गये एक थाली मे भोजन लिया और मन मे सोचने लगे की इस भोजन पर मेरा नाम लिखा है देखता हुं की मुझे कौन रोकता है सेठजी ने जैसै ही पहला ग्रास हाथ मे लिया तो दुसरे हाथ मे जो फोन था उसपे घंटी बजी फोन उठाया तो उन्हे सूचना मिली की बेटे का एक्सीडेंट हो गया और वो हॉस्पिटल मे भर्ती है सेठजी तत्काल रवाना हुये।

🔶 हॉस्पिटल मे सेठजी की पत्नी ने कहा की बेटा अब ठीक है बेटे को कुशल मंगल देखकर वही बैठे पत्नी के हाथ में चावल का एक दोना था तो सेठजी भूख से व्याकुल थे उन्होंने दोना लिया और चावल खाने लगे खाने के बाद सेठजी ने पूछा अरे तुमने खाया या नही तो पत्नी ने कहा की लेकर तो मैं अपने लिये ही लाई थी पर शायद इस प्रसाद पर रामजी ने आपका नाम लिखा था!

🔷 अब सेठजी को सन्त श्री की वो सारी बाते याद आई और फिर जीवन मे कभी उन्होने अपने नाम से कुछ भी न चलाया सब रामजी के नाम से चलाया!

🔶 मित्रों, जिन्दगी मे ये सदा याद रखना की यदि कोई अच्छा कार्य, विशेष कार्य अथवा कोई शुभ-कर्म सम्पन्न हो जाये तो ये कभी न सोचना की मैं कर रहा हुं बस यही सोचना की मेरे राम मुझसे करवा रहे है और जिसने भी ये समझने की भुल की कि मैं कर रहा हुं, मैं हुं वो रामजी से दुर हो गया यदि रामजी का सामीप्य चाहते हो तो हमेशा यही समझना कि मैं नही कर रहा हुं मैं नही हुं जो कुछ भी है वो सियाराम है और वही मुझसे करवा रहे है वो मुझे निमित्त बना रहे है और मैं सिर्फ एक निमित्त हुं इससे ज्यादा और कुछ भी नही !

"निज चरणन की भक्ति हॆ नाथ मुझे दे दो
वाणी मे भी शक्ति हॆ नाथ मुझे दे दो
तेरी सेवा मिलती रहे इतनी सी कृपा कर दो "

👉 आज का सद्चिंतन 8 August 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 August 2018


मंगलवार, 7 अगस्त 2018

👉 अध्ययन की महिमा

🔷 देवरात का पुत्र ब्रह्रारात बाल्यावस्था से ही बड़ा मेधावी, कुशाग्र बुद्धि और कर्मशील था। उसकी माता ने उसे विद्याध्ययन के लिए अपने भाई वैशम्पायन ऋषि के पास भेज दिया था। वहाँ कुछ ही समय में उसने समस्त शिक्षा प्राप्त कर ली और गुरु की सेवा भी इतनी संलग्नता के साथ की कि वे उस पर बड़े प्रसन्न रहने लगे। एक दिन घटना वंश गुरु जी को ऋषि सभा में जाने में देर हो गई और जब वे जल्दी जल्दी जाने लगे तो भूल से एक छोटे शिशु पर पैर पड़ जाने से वह मर गया। इस पाप का प्रायश्चित करने की आज्ञा उन्होंने शिष्यों को दी।

🔶 ब्रह्रारात ने प्रार्थना की कि ये शिष्य असमर्थ है अगर आज्ञा हो तो मैं अकेला ही प्रायश्चित को पूर्ण कर दूँ। उसकी बात को अभिमान पूर्ण समझ कर वैशम्पायन बड़े क्रोध में आये और बोले कि तुझमें ऐसी ही सामर्थ्य है तो मेरी पढ़ाई यजुर्वेद विद्या को वापस कर दे। ब्रह्रारात ने उसे वमन कर दिया जिसे अन्य शिष्य तीतर बनकर चुग गये जिससे उसका नाम ‘तैत्तिरीय’ शाखा पड़ गया। तत्पश्चात ब्रह्ररात ने मानव गुरुओं से विरक्त होकर सूर्य की उपासना से स्वयं ही वेद विद्या को प्राप्त किया और उसका नाम माध्यन्दिनी शाखा रखा। उस समय से ब्रह्रारात का नाम याज्ञवल्क्य हो गया और वे अपने समय के सर्वश्रेष्ठ वेदवेदान्त और ब्रह्मविद्या के ज्ञाता माने गये। बाद में श्रेष्ठ ज्ञानी राजा जनक ने उनको अपना गुरु बनाया। उन्होंने अपने उदाहरण से दिखला दिया कि जो व्यक्ति अध्ययन और मनन में निरन्तर संलग्न रहेगा, वह सब प्रकार के ज्ञान को निश्चय ही प्राप्त कर सकता है।

📖 अखण्ड ज्योति 1961 जुलाई

👉 ईमानदारी ही सबसे बड़ा धन है

🔷 मुरारी लाल अपने गाँव के सबसे बड़े चोरों में से एक था। मुरारी रोजाना जेब में चाकू डालकर रात को लोगों के घर में चोरी करने जाता। पेशे से चोर था लेकिन हर इंसान चाहता है कि उसका बेटा अच्छे स्कूल में पढाई करे तो यही सोचकर बेटे का एडमिशन एक अच्छे पब्लिक स्कूल में करा दिया था।

🔶 मुरारी का बेटा पढाई में बहुत होशियार था लेकिन पैसे के अभाव में 12 वीं कक्षा के बाद नहीं पढ़ पाया। अब कई जगह नौकरी के लिए भी अप्लाई किया लेकिन कोई उसे नौकरी पर नहीं रखता था।

🔷 एक तो चोर का बेटा ऊपर से केवल 12 वीं पास तो कोई नौकरी पर नहीं रखता था। अब बेचारा बेरोजगार की तरह ही दिन रात घर पर ही पड़ा रहता। मुरारी को बेटे की चिंता हुई तो सोचा कि क्यों ना इसे भी अपना काम ही सिखाया जाये। जैसे मैंने चोरी कर करके अपना गुजारा किया वैसे ये भी कर लेगा।

🔶 यही सोचकर मुरारी एक दिन बेटे को अपने साथ लेकर गया। रात का समय था दोनों चुपके चुपके एक इमारत में पहुंचे। इमारत में कई कमरे थे सभी कमरों में रौशनी थी देखकर लग रहा था कि किसी अमीर इंसान की हवेली है।

🔷 मुरारी अपने बेटे से बोला – आज हम इस हवेली में चोरी करेंगे, मैंने यहाँ पहले भी कई बार चोरी की है और खूब माल भी मिलता है यहाँ। लेकिन बेटा लगातार हवेली के आगे लगी लाइट को ही देखे जा रहा था। मुरारी बोला – अब देर ना करो जल्दी अंदर चलो नहीं तो कोई देख लेगा। लेकिन बेटा अभी भी हवेली की रौशनी को निहार रहा था और वो करुण स्वर में बोला – पिताजी मैं चोरी नहीं कर सकता।

🔶 मुरारी – तेरा दिमाग खराब है जल्दी अंदर चल

🔷 बेटा – पिताजी, जिसके यहाँ से हमने कई बार चोरी की है देखिये आज भी उसकी हवेली में रौशनी है और हमारे घर में आज भी अंधकार है। मेहनत और ईमानदारी की कमाई से उनका घर आज भी रौशन है और हमारे घर में पहले भी अंधकार था और आज भी मैं भी ईमानदारी और मेहनत से कमाई करूँगा और उस कमाई के दीपक से मेरे घर में भी रौशनी होगी। मुझे ये जीवन में अंधकार भर देने वाला काम नहीं करना। मुरारी की आँखों से आंसू निकल रहे थे। उसके बेटे की पढाई आज सार्थक होती दिख रही थी।

🔶 मित्रों। बेईमानी और चोरी से इंसान क्षण भर तो सुखी रह सकता है लेकिन उसके जीवन में हमेशां के लिए पाप और अंधकार भर जाता है। हमेशा अपने काम को मेहनत और ईमानदारी से करें। बेईमानी की कमाई से बने पकवान भी ईमानदारी की सुखी रोटी के आगे फीके हैं। कुछ ऐसा काम करें कि आप समाज में सर उठा के चल सकें।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 7 August 2018

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 23)

👉 युगसृजन के निमित्त प्रतिभाओं को चुनौती
   
🔷 तूफानों, भूकंपों, विस्फोटों, आंदोलनों का उद्गम कहीं भी क्यों न रहा हो, जब वे गति पकड़े हैं, तो व्यापक बनते चले जाते हैं। राजक्रांतियों का सिलसिला इसी प्रकार चला था और असंख्यों राजमुकुट अनायास ही धराशायी होते चले गए। सृजन की भी अपनी लहर है। कभी सतयुग में ऐसा ही प्रभावोत्पादक मानसून उठा होगा, उसने धरती पर मखमली फर्श बिछाते हुए स्वर्ग जैसा वातावरण विनिर्मित कर दिया होगा।    
  
🔶 रात्रि की तमिस्रा सदा नहीं रहती। दिन को भी प्रकट होने का अवसर मिलता है। तब छोटे पक्षी ही नहीं, गजराज भी अपनी चिंघाड़ और वनराज अपनी दहाड़ से दिशाओं को गुंजित करते दिखाई देते हैं। ऐसा ही सुयोग इन दिनों आ रहा है, यह आशा सबको रखनी चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 28

👉 Five gifts which need to be invested to fulfil divine objectives

🔷 Talking on Vibhuti Yoga in the sacred text of Bhagwad Geeta, The Lord says that one should see His greater presence wherever they see or perceive divine excellencies. Only a few and not everyone among the masses are blessed with divine gifts and excellencies (e.g. intellect, talents, artistic skills, riches). This disparity only implies that the divine gifts or excellencies are purely special grants which have been given to enable those blessed individuals to carry on developing and embellishing His beloved creation, the world. Even if the gifted individuals were to believe that they have been blessed with those divine gifts just because of their own past good deeds, the objective would still remain the same that they should keep doing good to the world with even greater passion and reap even greater rewards, thus maintaining the momentum of their progress and expediting their journey towards fulfilling the aim of life.

🔶 One of the most important task of Yug Nirman Yojna is to impart this message to every gifted individuals. A fire brigade would be expected to take rapid actions in case of fire. They may get criticised if they show any sloppiness. The message of the urgent need of current time is being conveyed to everyone abounding in divine gifts to let them know that this is the exactly right moment to make as much use as possible of their divine gifts for doing good to community.

🔷 It goes without saying that there is no other greater noble objective than to inspire and facilitate inner development (i.e. the development of noble feelings) of the masses. There are five divine gifts namely noble feelings, knowledge, talents, wealth and art. Anyone anywhere having these divine gifts should feel within their heart that they have been truly blessed with God’s exceptional art, abilities, talents and extra grace. They should feel themselves to be really fortunate and blessed with God’s special grace to have received special gifts which the common men and women couldn’t get.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana- Darshan, swaroop, va Karyakrma- Vangmay 66 Page 1.30

👉 Learn to Share

🔷 You are really fortunate if God has endowed you with vigor, brilliance, knowledge, power, prosperity and glory. Then your life must be progressive and joyful in the worldly sense. But this success or joy would be momentary and won’t be fulfilling, if you keep your resources and belongings closed to your chest and use them only for your selfish interests. Your joy, your satisfaction would expand exponentially if you learn to distribute them and share whatever you have with many others.

🔶 Try to spend at least a fraction of your wealth, your resources for the needy. Your help will not only give them support to rise and progress, more importantly, it will bestow the spiritual benefits of being kind and altruistic. This will augment your happiness manifold. Those being helped by you will also be happy and thus the stock of joy in the world will also expand.

🔷 Distributing and sharing with a sight of altruistic wisdom and a feel of compassion provide the golden key to unalloyed joy. God has been so kind to you; you should also be kind to others. God is defined as the eternal source of infinite bliss because HIS mercy pervades everywhere for all creatures, for everything; HIS divine powers are omnipresent; every impulse of joy is an expression of HIS beatitude.

🔶 You should see the dignity of HIS divine creation in this world. God has also given you an opportunity to glorify your life by selflessly spreading HIS auspicious grace…

📖 Akhand Jyoti, April 1943

सोमवार, 6 अगस्त 2018

👉 माता-पिता का साया

🔶 एक पिता ने अपने पुत्र की बहुत अच्छी तरह से परवरिश की! उसे अच्छी तरह से पढ़ाया, लिखाया, तथा उसकी सभी सुकामनांओ की पूर्ती की! कालान्तर में वह पुत्र एक सफल इंसान बना और एक मल्टी नैशनल कंपनी में सी.ई.ओ. बन गया! उच्च पद, अच्छा वेतन, सभी सुख सुविधांए उसे कंपनी की और से प्रदान की गई!

🔷 समय गुजरता गया उसका विवाह एक सुलक्षणा कन्या से हो गया, और उसके बच्चे भी हो गए । उसका अपना परिवार बन गया! पिता अब बूढा हो चला था! एक दिन पिता को पुत्र से मिलने की इच्छा हुई और वो पुत्र से मिलने उसके ऑफिस में गया.....!!!

🔶 वहां उसने देखा कि..... उसका पुत्र एक शानदार ऑफिस का अधिकारी बना  हुआ है, उसके ऑफिस में सैंकड़ो कर्मचारी  उसके अधीन कार्य कर रहे है... ! ये सब देख कर पिता का सीना गर्व से फूल गया! वह बूढ़ा पिता बेटे के चेंबर में  जाकर उसके कंधे पर हाथ रख कर खड़ा हो गया!

🔷 और प्यार से अपने पुत्र से पूछा... "इस दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान कौन है"? पुत्र ने पिता को बड़े प्यार से हंसते हुए कहा "मेरे अलावा कौन हो सकता है पिताजी"!

🔶 पिता को इस जवाब की आशा नहीं थी, उसे विश्वास था कि उसका बेटा गर्व से कहेगा पिताजी इस दुनिया के सब से शक्तिशाली इंसान आप हैैं, जिन्होंने मुझे इतना योग्य बनाया!

🔷 उनकी आँखे छलछला आई! वो चेंबर के गेट को खोल कर बाहर निकलने लगे! उन्होंने एक बार पीछे मुड़ कर पुनः बेटे से पूछा एक बार फिर बताओ इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान कौन है ???

🔶 पुत्र ने इस बार कहा "पिताजी आप हैैं, इस दुनिया के सब से शक्तिशाली इंसान "! पिता सुनकर आश्चर्यचकित हो गए उन्होंने कहा "अभी तो तुम अपने आप को इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान बता रहे थे अब तुम मुझे बता रहे हो " ???

🔷 पुत्र ने हंसते हुए उन्हें अपने सामने बिठाते  हुए कहा "पिताजी उस समय आप का हाथ मेरे कंधे पर था, जिस पुत्र के कंधे पर या सिर पर पिता का हाथ हो वो पुत्र तो दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान ही होगा ना,,,,,

🔶 बोलिए पिताजी" ! पिता की आँखे भर आई उन्होंने अपने पुत्र को कस कर के अपने गले लग लिया !

🔷 सच है जिस के कंधे पर या सिर पर माता-पिता का हाथ होता है, वो इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान होता है!

🔶 सदैव बुजुर्गों का सम्मान करें!!!! हमारी सफलता के पीछे वे ही हैं..

🔷 हमारी तरक्की उन्नति से जब सभी लोग जलते हैं तो केवल माँ बाप ही हैं जो खुश होते हैं।

👉 अतिथि सत्कार की महिमा

🔶 दुर्दान्त नाम का व्याध एक दिन जंगल में शिकार को गया। अनेक व्यक्तियों को मार कर तथा कुछ को पकड़कर वह संध्या समय घर वापस जाने लगा तो अचानक बड़े जोर का तूफान आया और ओलों की वर्षा होने लगी। इस विपत्ति का देखकर वह भागा और बहुत कष्ट सहकर एक पेड़ के नीचे जाकर गिर गया। उसकी दुर्दशा देखकर पेड़ के ऊपर रहने वाले एक कबूतर को तरस आया। उसकी कबूतरी को पहले ही व्याद्या ने पकड़ रखा था। फिर भी कबूतर ने अतिथि धर्म को स्मरण करके उसको ठंड से बचाने के लिए इधर उधर से आग लाकर उसे जला दिया। फिर यह देखकर कि वह भूखा भी है कबूतर और कबूतरी दोनों यह कहकर अग्नि में गिर गये कि आप इस समय हमारे अतिथि हो हम आपकी और कोई सेवा तो कर नहीं सकते, पर आप हमारे शरीर को ग्रहण करके अपनी क्षुधा निवारण करो।

🔷 उनके इस अपूर्व त्याग के प्रभाव से देवताओं का आसन हिल गया और स्वर्ग से एक विमान उनको ले जाने को उतरा। इस घटना को देखकर व्याध भी चकित रह गया और उन दोनों से अपने उद्धार का मार्ग पूछने लगा। कबूतर से कहा अब तुम निर्दयता के कार्ये को त्याग भगवान की आराधना करो और सदैव यथाशक्ति अतिथि सत्कार का ध्यान रखो। जो निःस्वार्थ बुद्धि से अतिथि सेवा में संलग्न रहता है वह अवश्य ही भव सागर से पार होता है।

📖 अखण्ड ज्योति 1961 जुलाई

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 6 August 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 22)

👉 युगसृजन के निमित्त प्रतिभाओं को चुनौती
   
🔶 सम्राट अशोक ने जो प्रेरणा पाई थी उसी को अपनाने के लिए अपने सुपुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को परिव्राजक के रूप में धर्मप्रचार के लिए समर्पित कर दिया था। स्वयं बुद्ध भी तो अपने पुत्र राहुल को इसी स्तर की दीक्षा दे चुके थे। बुद्ध परंपरा में आम्रपाली से लेकर कुमारजीव तक ऐसे अनेकों प्रतिभाशाली हुए जो भौतिक सुख, भोगों से कोसों दूर रहकर धर्म प्रयोजनों में ही लगे रहते थे। मध्यपूर्व को भारतीय संस्कृति की छत्रछाया में लाने का श्रेय महाभाग कौडिन्य को जाता है, जिन्होंने उच्च लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जीवन भर प्रयास जारी रखा।
  
🔷 उन पुराण ग्रंथियों की गली-कूचों में भरमार है, जिन्होंने वैभव बढ़ाने, सुविधा भोगने, दर्प दिखाने और औलाद के लिए भरे खजाने छोड़कर मरने जैसी सफलताएँ अर्जित कीं। श्रम संभवतः उन्हें भी महापुरुषों से कम न करना पड़ा होगा, पर संकीर्ण स्वार्थपरता की परिधि से ऊँचे न उठने के कारण सुरदुर्लभ जीवन संपदा के व्यर्थ नियोजन पर पश्चाताप करते ही मरे होंगे। इसके विपरीत महर्षि कर्वे, हीरालाल शास्त्री, बाबासाहब आमटे, महामना मालवीय जी, भामाशाह, स्वामी श्रद्धानन्द अहिल्या बाई, सुभाषचंद्र बोस जैसी विभूतियों को प्रात: स्मरणीय समझा जाता है, जिन्होंने स्वयं तो रोटी कपड़े पर निर्वाह किया, पर अपने समूचे वर्चस को परमार्थ प्रयोजनों के लिए नियोजित कर दिया।

🔶 विदेशी प्रतिभाओं में जापान के गाँधी कागावा, स्काउट आन्दोलन के जन्मदाता बेडेन पॉवेल, रूस के मार्क्स लेनिन आदि को संसार के इतिहास में जगमगाते हीरों की तरह आँका जाता है। वस्तुतः प्रतिभाएँ संसार के हर क्षेत्र में मौजूद हैं। धनाढ्यों, शासनाध्यक्षों, कलाकारों, व्यवसायियों, वैज्ञानिकों और मनीषियों को अपने-अपने ढंग से काम करते हुए देखा जा सकता है। उन्हें जो भी उत्तरदायित्व मिला, उसे उनकी प्रखरता और प्रचंडता ने आश्चर्यजनक सफलता के साथ संपन्न किया है। इन वर्गों को युगचेतना अछूता नहीं छोड़ेगी, उन्हें झकझोरने और समय के अनुरूप बदलने के लिए बाधित करेगी। अब तक वे भले ही स्वार्थपरता और प्रमाद को प्रोत्साहित करते रहे हों, पर आगे उन्हें अपनी क्षमता को मोड़ना मरोड़ना और सृजन प्रयोजनों के लिए नियोजित करना ही होगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 27

👉 When is a Prayer Granted?

🔶 Our prayers deserve to be heard by the Almighty only when we take care of making use of the potentials he has already bestowed upon us. Accumulation of negative tendencies of lethargy, dullness, escapism from duties, ignorance, etc makes one hazardous – for his own life – like a balloon full of concentrated acid, which is most likely to explode anytime or ruin due to the acidic burning.

🔷 The rules in the system of God work like a vigilant gardener who uproots the useless and harmful wild growth and carefully nurses the saplings of the useful vegetation. If a field is not ploughed and is full of useless grass or shrubs etc, how can it yield a crop (even if the soil is fertile)? Who will praise a farmer, who lets his field be destroyed without bothering to clean it? The system of God certainly can’t allow its field of Nature to be left unguarded. The rules of the Omnipresent are such that the vices, the evils, the futile, get eliminated continuously so that the perfection and eternal beauty of HIS creation remains unperturbed. If you expect your calls to be heard, you will also have to constantly strive for self-refinement.

🔶 The best way to get the response to your prayers is to awaken your selfconfidence and follow the path of duties. Then alone your inner self will awake.

🔷 The opening to the path to the Light Divine lies deep within the realm of soul and enlightened inner self provides the only bridge to reach this sublime source. Those who don’t have faith in the dignity of their own souls, who keep ignoring the inner voice and hunt in the external world to quench their wishes are lost in the smog of passions and confusions and invite adversities for themselves. Those who scorn their own (inner) selves are also rebuked at God’s end and their prayers evaporate in the void…

📖 Akhand Jyoti, March 1943

👉 No Escape From Our Actions

🔶 We are bound to endure the fruits of our actions – good or bad. Never think that you are spared from the fruits of your past actions even if the result is delayed. It is an eternal law of cause and effect; the result of your actions will certainly catch you tomorrow, if not today. Sometimes we observe delay in the result, because God wants to test whether man has learnt any lesson and realized his own duty to behave with wisdom. The man who always does good and refrains from bad actions, even without fear of punishment, has passed the test and is surely progressing towards piousness.

🔷 An animal can be driven in any direction with the fear of a stick. If God had forced man to choose a specific path, then human intelligence would have never developed to the level of independent thinking, and man would not have been anything more than an animal. But, God bestowed upon man the freedom to choose between good and bad actions, so that he learns to differentiate between the two.

🔶 Thus, he may protect himself from the results of sinful acts and may enjoy the sweet fruits of benevolent and good acts. So, God is quite justified in allotting man the freewill to do good or bad deeds, considering that man is the most wise and responsible creation on the earth. God also wanted to test man’s capability to fulfill this responsibility and to judge how perfect man is. So, according to his system, there can be a delay in justice, but the result is bound to come in the end. So perfect are His balance and plans that one has to be prepared to accept the results of one’s own actions.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana- Darshan, swaroop, va Karyakrma- 66 Page 6.17

👉 कर्म-फल आज नहीं तो कल भोगना ही पड़ेगा

🔶 यदि कर्म का फल तुरन्त नहीं मिलता तो इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि उसके भले-बुरे परिणाम से हम सदा के लिए बच गयें। कर्म-फल एक ऐसा अमिट तथ्य है जो आज नहीं तो कल भुगतना अवश्य ही पड़ेगा। कभी-कभी इन परिणामों में देर इसलिये होती है कि ईश्वर मानवीय बुद्धि की परीक्षा करना चाहता है कि व्यक्ति अपने कर्त्तव्य -धर्म समझ सकने और निष्ठापूर्वक पालन करने लायक विवेक बुद्धि संचित कर सका या नहीं। जो दण्ड भय से डरे बिना दुष्कर्मों से बचना मनुष्यता का गौरव समझता है और सदा सत्कर्मों तक ही सीमित रहता है, समझना चाहिए कि उसने सज्जनता की परीक्षा पास कर ली और पशुता से देवत्व की और बढऩे का शुभारम्भ कर दिया।

🔷 लाठी के बल पर जानवरों को इस या उस रास्ते पर चलाया जाता है और अगर ईश्वर भी बलपूर्वक अमुक मार्ग पर चलने के लिए विवश करता तो फिर मनुष्य भी पशुओं की श्रेणी में आता, इससे उसकी स्वतंत्र आत्म-चेतना विकसित हुई या नहीं इसका पता ही नहीं चलता। भगवान ने मनुष्य को भले या बुरे कर्म करने की स्वतंत्रता इसीलिए प्रदान की है कि वह अपने विवेक को विकसित करके भले-बुरे का अन्तर करना सीखे और दुष्परिणामों के शोक-संतापों से बचने एवं सत्परिणामों का आनन्द लेने के लिए स्वत: अपना पथ निर्माण कर सकने में समर्थ हो।

🔶 अतएव परमेश्वर के लिए यह उचित ही था कि मनुष्य को अपना सबसे बड़ा बुद्धिमान और सबसे जिम्मेदार बेटा समझकर उसे कर्म करने की स्वतंत्रता प्रदान करे और यह देखे कि वह मनुष्यता का उत्तरदायित्व सम्भाल सकने मे समर्थ है या नहीं? परीक्षा के बिना वास्तविकता का पता भी कैसे चलता और उसे अपनी इस सर्वश्रप्ठ रचना मनुष्य में कितने श्रम की सार्थकता हुई यह कैसे अनुभव होता। आज नहीं तो कल उसकी व्यवस्था के अनुसार कर्मफल मिलकर ही रहेगा। देर हो सकती है अन्धेर नहीं। ईश्वरीय कठोर व्यवस्था, उचित न्याय और उचित कर्म-फल के आधार पर ही बनी हुई है सो तुरन्त न सही कुछ देर बाद अपने कर्मों का फल भोगने के लिए हर किसी को तैयार रहना चाहिए।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम- वांग्मय 66 पृष्ठ 6.17

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 5 अगस्त 2018

👉 स्वर्ग का द्वार:-

🔷 सुबह का समय था। स्वर्ग के द्वार पर चार आदमी खड़े थे। स्वर्ग का द्वार बंद था। चारों इस इंतजार में थे कि स्वर्ग का द्वार खुले और वे स्वर्ग के भीतर प्रवेश कर सकें।
थोड़ी देर बाद द्वार का प्रहरी आया। उसने स्वर्ग का द्वार खोल दिया। द्वार खुलते ही सभी ने द्वार के भीतर जाना चाहा- लेकिन प्रहरी ने किसी को भीतर नहीं जाने दिया।

🔶 प्रहरी ने उन आदमियों से प्रश्र किया- ‘‘तुम लोग यहां क्यों खड़े हो?’’ उन चारों आदमियों में से तीन ने उत्तर दिया- ‘‘हमने बहुत दान-पुण्य किए हैं। हम स्वर्ग में रहने के लिए आए हैं।’’ चौथा आदमी मौन खड़ा था। प्रहरी ने उससे भी प्रश्न किया- ‘‘तुम यहां क्यों खड़े हो?’’

🔷 उस आदमी ने कहा- ‘‘मैं सिर्फ स्वर्ग को झांक कर एक बार देखना चाहता था। मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि मैं स्वर्ग में रहने के काबिल नहीं हूँ क्योंकि मैंने कोई दान-पुण्य नहीं किया।’’

🔶 प्रहरी ने चारों आदमियों की ओर ध्यान से देखा। फिर उसने पहले आदमी से प्रश्र किया- ‘‘तुम अपना परिचय दो और वह काम बताओ, जिससे तुम्हें स्वर्ग में स्थान मिलना चाहिए।’’

🔷 वह आदमी बोला- ‘‘मैं एक राजा हूँ। मैंने तमाम देशों को जीता। मैंने अपनी प्रजा की भलाई के लिए बहुत से मंदिर, मस्जिद, नहर, सड़क, बाग-बगीचे आदि का निर्माण करवाया तथा ब्राह्मणों को दान दिए।’’

🔶 प्रहरी ने प्रश्र किया- ‘‘दूसरे देशों पर अधिकार जमाने के लिए तुमने जो लड़ाइयां लड़ीं, उनमें तुम्हारा खून बहा कि तुम्हारे सैनिकों का? उन लड़ाइयों में तुम्हारे परिवार के लोग मरे कि दोनों ओर की प्रजा मरी?’’

🔷 ‘‘दोनों ओर की प्रजा मरी।’’ उत्तर मिला। ‘‘तुमने जो दान किए, प्रजा की भलाई के लिए सड़कें, कुएं, नहरें आदि बनवाई, वह तुमने अपनी मेहनत की कमाई से किया या जनता पर लगाए गए ‘कर’ से?’’

🔶 इस प्रश्न पर राजा चुप हो गया। उससे कोई उत्तर न देते बना। प्रहरी ने राजा से कहा- ‘‘लौट जाओ। यह स्वर्ग का द्वार तुम्हारे लिए नहीं खुल सकता।’’ अब बारी आई दूसरे आदमी की। प्रहरी ने उससे भी अपने बारे में बताने को कहा।

🔷 दूसरे आदमी ने कहा- ‘‘मैं एक व्यापारी हूँ। मैंने व्यापार में अपार धन संग्रह किया। सारे तीर्थ घूमे। खूब दान किए।’’ ‘‘तुमने जो दान किए, जो धन तुमने तीर्थों में जाने में लगाया, वह पाप की कमाई थी। इसलिए स्वर्ग का द्वार तुम्हारे लिए भी नहीं खुलेगा।’’ प्रहरी ने व्यापारी से कहा।

🔶 अब प्रहरी ने तीसरे आदमी से अपने बारे में बताने को कहा- ‘‘तुम भी अपना परिचय दो और वह काम भी बताओ जिससे तुम स्वर्ग में स्थान प्राप्त कर सको।’’ तीसरे आदमी ने अपने बारे में बताते हुए कहा- ‘‘मैं एक धर्म गुरु हूँ। मैंने लोगों को अच्छे-अच्छे उपदेश दिए। मैंने हमेशा दूसरों को ज्ञान की बातें बताई एवं अच्छे मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित किया।’’

🔷 प्रहरी ने धर्मगुरु से कहा- ‘‘तुमने चंदे के पैसों से पूजा स्थलों का निर्माण करवाया। तुमने लोगों को ज्ञान और अच्छाई की बातें तो जरूर बताईं मगर तुम स्वयं उपदेशों के अनुरूप अपने आपको न बना सके। क्या तुमने स्वयं उन उपदेशों का पालन किया? स्वर्ग का द्वार तुम्हारे लिए भी नहीं खुलेगा।’’

🔶 अब चौथे आदमी की बारी आई। प्रहरी ने उससे भी उसका परिचय पूछा। उस आदमी ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया- ‘‘मैं एक गरीब किसान हूँ। मैं जीवन भर अपने परिवार के भरण-पोषण हेतु स्वयं पैसों के अभाव में तरसता रहा। मैंने कोई दान-पुण्य नहीं किया। इसलिए मैं जानता हूँ कि स्वर्ग का द्वार मेरे लिए नहीं खुल सकता।’’

🔷 प्रहरी ने कहा- ‘‘नहीं तुम भूल रहे हो। एक बार एक भूखे आदमी को तुमने स्वयं भूखे रह कर अपना पूरा खाना खिला दिया था, पक्षियों को दाना डाला और प्यासे लोगों के लिए पानी का इंतजाम किया था।’’

🔶 ‘‘हां मुझे याद है- लेकिन वे काम तो कोई बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं थे। मुझे बस थोड़ा सा स्वर्ग में झांक लेने दीजिए।’’ किसान ने विनती की। प्रहरी ने किसान से कहा- ‘‘नहीं तुम्हारे ये काम बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। आओ! स्वर्ग का द्वार तुम्हारे लिए ही खुला है।’’

🔷 गुरुदेव ने हमेशा यही कहा कि अपनी मेहनत की कमाई से भलाई के कार्य करो, दूसरों का सुधार करने की अपेक्षा स्वयं का सुधार करो। हम सब गुरु के वचनों को अपने जीवन में उतारे।

👉 महाराज सगर की न्यायशीलता

🔷 सूर्य वंश में महा सगर बड़े प्रतापी और विख्यात नरेश हो गये है। संतान के लिए उन्होंने अनेक साधु सन्तों की सेवा की तो उनको संतान की प्राप्ति हुई। पर भाग्यवश उनका बड़ा पुत्र बड़े दुष्ट स्वभाव का निकला। वह बालकों को पकड़कर अकारण ही सरयू नदी में डुबा देता था। जब प्रजा ने इस बात की शिकायत राजा से की तो उन्होंने राजपुत्र को न्यायालय के समक्ष बुलाया। यद्यपि मंत्रियों ने उसे पागल बताकर क्षमा करने का आग्रह किया, पर राजा ने उसे दोषी पाकर अपने राज्य से निकाल दिये जाने का दण्ड दिया। साथ ही उन्होंने यह भी आज्ञा दे दी कि “जो कोई उसे ठहरा कर उसकी किसी प्रकार की सहायता करेगा वह भी दण्डनीय होगा।”

🔶 राजा की दूसरी रानी से और भी बहुत से पुत्र हुये थे पर वे कपिल मुनि से दुर्व्यवहार करने के कारण भस्म किये जा चुके थे। रानियों ने इस पुत्र को क्षमा करने के लिए बहुत कहा पर सगर न्याय पथ से विचलित न हुए उनने पुत्र को देश निकाला दे ही दिया। राजा सगर ने असमंजस के पुत्र अंशुमान् को बुलाकर अपने पराये का विचार न करते हुए उसे अच्छी तरह शिक्षा दी और राज्य सिंहासन का उत्तराधिकारी नियत किया। अन्याय मूलक काम चाहे अपने सगे सम्बन्धियों द्वारा ही क्यों न किया जाय, उसे सहन करना अन्याय को प्रोत्साहन देना है।

📖 अखण्ड ज्योति 1961 जुलाई

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 5 August 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 21)

👉 युगसृजन के निमित्त प्रतिभाओं को चुनौती
   
🔷 देवताओं ने सिद्धार्थ को राजकुमार न रहकर धर्म-चक्र-प्रवर्तन में संलग्न होने का परामर्श दिया था। सिद्ध पुरुष माने जाने वाले गोरखनाथ, मत्स्येंद्र नाथ के तप-वैभव के अधिकारी बने थे। रामानंद ने, कबीर को स्वर्ण खान कहीं नहीं सौंपी थी वरन् वह प्रतिभा प्रदान की थी जिसके कारण कुलीनता और विद्वत्ता के अभाव में भी अपने समय के प्रचंड प्रवर्तक के रूप में प्रख्यात हुए। भगवान के भक्तों में सर्वोपरि नारद माने जाते हैं। उन्हें वह ललक मिली थी कि जन-जन में भाव-संवेदना का बीजारोपण करते हुए अनवरत रूप से संलग्न रह सकें। पवन ने अपने पुत्र हनुमान् को वह वर्चस प्रदान किया था कि रामचरित्र में मेरुदंड जैसी भूमिका का निर्वाह कर सके।
  
🔶 गाँधी ने अपने प्रिय बिनोवा को महान प्रयोजनों के लिए मर मिटने की भाव-संवेदना प्रदान की थी। उनके संपर्क में आने वाले अन्य लोगों ने भी जुझारू प्रतिभा पाई और अपने चरित्र तथा कर्तृत्व से जनमानस पर गहरी छाप छोड़ने में सफल हो सके।
  
🔷 महर्षि अगस्त्य ने भगीरथ को राज-पाट छोड़कर गंगावतरण के महाप्रयास में संलग्न होने के लिए नियोजित किया था। लक्ष्य इतना उच्चस्तरीय था कि उनकी सफलता में योगदान देने के लिए स्वयं शंकर जी को कैलाश छोड़कर आना पड़ा था। योगी भर्तृहरि ने अपने भाई विक्रमादित्य को आदर्श शासक और भाँजे गोपीचंद को तत्त्वदर्शन के अवगाहन में संलग्न किया था। इससे अधिक और कुछ कोई अपने स्वजन संबंधियों को दे ही क्या सकता है?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 26

👉 Generous Like the Clouds

🔷 Stingy fellows, who keep their resources only to themselves and remain apathetic to others’ sufferings, are in fact accounting sins for their future destiny. Those who have stocked heaps of wealth in their possession but never use it are mere ‘guards’ of money. Such fellows are burden on this earth that can do nothing for anyone. Even materialistically, they don’t enjoy anything; the thirst of gaining more, the worries and tensions of safeguarding the possession and the miserly attitude do not let them live in peace; they neither eat well nor can give anything to others. Despite having millions or billions of riches, they remain poor, beggars… Thirst for more and more of selfish possession does not even let one see what are the right or wrong means of piling the stocks of wealth. Prosperity earned by unfair means cannot let one prosper… One dies empty handed and later one all that ‘dead property’ possessed by him does no good to even to those who grabs it afterwards…

🔶 On the contrary, those who earn honestly and spend magnanimously and wisely in good, constructive and auspicious activities are always prospering. They are like clouds, which enshower generously; even if emptied today, the clouds are filled again and return back tomorrow with same dignity.

🔷 Integrity, benevolence, caring and helping sociability – are virtues of greatness, which can make the entire world your own. No one can forget the warmth of meeting such amicable personalities. But, the selfish fellows, howsoever talented and affluent they might be, remain aloof and virtually isolated; their state is like that of milk kept in a dirty pot, which is thrown without use…

📖 Akhand Jyoti, Feb. 1943

👉 आत्म निर्माण-जीवन का प्रथम सोपान (अन्तिम भाग)

🔷 दूसरा आध्यात्मिक तथ्य है- मानव जीवन को ईश्वर का सर्वोपरि उपहार मानना। इसे लोकमंगल के लिए दी हुई परम पवित्र अमानत स्वीकार करना। स्पष्ट है कि प्राणिमात्र को ईश्वर की सन्तान मानना। निष्पक्ष न्यायकारी पिता समान रूप से ही अपने सब बालकों को अनुदान देता है। मनुष्य को इतने सुविधा साधन वह विलासिता और अहन्ता की पूर्ति के लिए देकर पक्षपाती और अन्यायी नहीं बन सकता। जो मिला वह खजांची के पास रहने वाली बैंक अमानत की तरह है। संसार को सुखी समुन्नत बनाने के लिए ही मनुष्य को विभिन्न सुविधाएँ मिली हैं। उनमें से निर्वाह के लिए न्यूनतम भाग अपने लिये रखकर शेष को लोकमंगल के लिए ईश्वर के इस सुरम्य उद्यान को अधिक सुरम्य सुविकसित बनाने के लिए खर्च किया जाना चाहिए।

🔶 तीसरा महासत्य है- अपूर्णता को पूर्णता तक पहुँचाने का जीवन लक्ष्य प्राप्त करना। दोष-दुर्गुणों का निराकरण करते चलने और गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता बढ़ाते चलने से ही ईश्वर और जीव के बीच की खाई पट सकती है। इन्हीं दो कदमों को साहस और श्रद्धा के साथ अनवरत रूप से उठाते रहने पर जीवन लक्ष्य तक पहुँचना सम्भव हो सकता है। उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की नीति अपनाकर ही आत्मा को परमात्मा बनने और नर को नारायण स्तर तक पहुँचाने का अवसर मिल सकता है। स्वर्ग, मुक्ति, आत्मदर्शन, ईश्वर प्राप्ति आदि इसी अपूर्णता के निराकरण का काम है।

🔷 चौथा महासत्य है-इस विश्व ब्रह्माण्ड को ईश्वर की साकार प्रतिमा मानना। श्रम सीकरों और श्रद्धा सद्भावना के अमृत जल से उसका अभिषेक करने की तप साधना करना। दूसरों के दुःख बटाने और अपने सुख बाँटने की सहृदयता विकसित करना। आत्मीयता का अधिकाधिक विस्तार करना। अपनेपन को शरीर परिवार तक सीमित न रहने देकर उसे विश्व सम्पदा मानना और अपने कर्तव्यों को छोटे दायरे में थोड़े लोगों तक सीमित न रख कर अधिकाधिक व्यापक बनाना।

🔶 यह चार सत्य-चार तथ्य ही समस्त अध्यात्म विज्ञान के, साधना विधान के केन्द्र बिन्दु हैं। चार वेदों का सार तत्व यहीं है। इन्हीं महासत्यों को हृदयंगम करने और उन्हें व्यवहार में उतारने से परम लक्ष्य की प्राप्ति होती है। जीवनोद्देश्य पूर्ण होता है। इन महासत्यों को जितनी श्रद्धा और जागरूकता के साथ अपनाया जायेगा आत्म-निर्माण उतना ही सरल और सफल होता चला जायेगा। युग निर्माण की दिशा में बढ़ते हुए हमें सर्वप्रथम आत्म-निर्माण पर ही ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 जीवन-साधना से लाभ?

🔷 मनुष्य विद्युत-शक्ति का भण्डार है। उसमें प्राण तत्व इतनी प्रचुर मात्रा में भरा हुआ है कि उसके आधार पर असम्भव और आश्चर्यजनक कार्यों को भी पूरा किया जा सकता है, किन्तु हम उसका सदुपयोग करना सीख जायें, तो जीवन की दिशा दूसरी हो सकती है। मानवीय विद्युत का समुचित उपयोग करना, सीखना वैसा ही उपयोगी है, जैसे बैंक में जमा हुए रुपये को निकालने की जानकारी रखना। वे मनुष्य बड़े अभागे हैं, जिनकी विपुल सम्पत्ति बैंक में जमा है, किन्तु उसे निकालने की विधि नहीं जानते और पैसे-पैसे को मुहताज फिरते हैं। आध्यात्मिक साधना का यह प्रथम फल बहुत ही महत्त्वपूर्ण है कि अपनी अपरिमेय शक्ति का समुचित उपयोग करना मालूम हो जाय।
  
🔶 दु:खों को दूर करने और सुख प्राप्त करने का हम सतत प्रयत्न करते हैं, सारा जीवन इन्हीं दोनों की उलट-पुलट में व्यतीत हो जाता है, किन्तु मनोकामना पूरी नहीं होती। यदि कोई ऐसा उद्ïगम प्राप्त हो जाय, जहाँ से सुख और दु:ख का उदय होता है और वहाँ अपनी इच्छानुसार चाहे जिसे ले लेने की सुविधा हो, तो क्या इसे मामूली चीज समझना चाहिए? विद्या, धन, स्वास्थ्य, स्त्री, सन्तान प्राप्त करने पर भी जिस सुख को हम नहीं प्राप्त कर सकते उसकी सच्ची स्थिति प्राप्ति का सच्चा मार्ग केवल आध्यात्मिक साधना द्वारा ही प्राप्त हो सकता है।
  
🔷 अपनी शक्ति को विकसित करना यह कितना महान लाभ है। मानवीय अन्त:स्थल में ऐसे-ऐसे अस्त्र-शस्त्र छिपे पड़े हैं जो भौतिक विज्ञान द्वारा अब तक न तो बन सके हैं और न भविष्य में बनने की संभावना है। यह हथियार वाल्मीकि जैसे डाकुओं को ऋषि के रूप में परिणित करने की भी शक्ति रखते हैं। सुदामा और नरसी जैसे दरिद्रों के सामने क्षण भर में स्वर्ण सम्पदा के पर्वत खड़े कर सकते हैं, कोढिय़ों को स्वर्णकाय बना सकते हैं और डूबते दरिद्रों को पार कर सकते हैं। यह दिव्य शक्तियाँ भी आत्म-साधना द्वारा ही सम्भव हैं।
  
🔶 हम स्वयं क्या हैं? संसार क्या है? स्वर्ग और मुक्ति क्या है? इनका ठीक ज्ञान के बजाय साधना तत्व के बारे में जान लिया जाय। कारण हजारों मन सिद्धान्तों के ज्ञान से एक छटाक भर साधनों का आचरण अधिक लाभप्रद है। इसलिए अपने दैनिक जीवन में योग, धर्म एवं दर्शन शास्त्रों में बताए हुए साधनों का अभ्यास कीजिए, जिससे मनुष्य जीवन के चरम लक्ष्य- ‘आत्म-साक्षात्कार’ की शीघ्र प्राप्ति हो।
  
🔷 इस साधनपट में उपरोक्त साधनों का तत्व एवं सनातन धर्म का विशुद्ध स्वरूप ३२ शिक्षाओं द्वारा दिया गया है। उनका अभ्यास वर्तमान काल के अत्यन्त कार्यग्रस्त स्त्री पुरुषों के लिए भी सुशक्य है। उनके समय और परिमाण में यथानुकूल परिवर्तन कर लीजिए और उनकी मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाते जाइये। आप अपने चरित्र या स्वभाव में एकाएक परिवर्तन नहीं कर सकेंगे, इसलिए आरम्भ में इनमें थोड़ी ऐसी शिक्षाओं के आचरण का संकल्प कीजिए, जिनसे आपके वर्तमान स्वभाव और चरित्र में थोड़ा निश्चित सुधार हो। क्रमश: इन साधनों का समय और परिमाण बढ़ाते जाइये। यदि किसी दिन बीमारी, सांसारिक कार्यों की अधिकता या किसी अनिवार्य कारणों से आप निश्चित साधनाओं को न कर सकें तो उनके बदले पूरे समय या यथासम्भव ईश्वर नाम स्मरण या जप कीजिए, जो चलते-फिरते या अपने सांसारिक कर्म करते हुए भी किया जा सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 4 अगस्त 2018

👉 द्वेष बुद्धि का दुष्परिणाम

🔶 वसिष्ठ और विश्वामित्र प्राचीन युग के सुप्रसिद्ध ऋषि थे। ये दोनों ही परम ज्ञानी और विद्या बुद्धि के भंडार थे, पर इनमें ऐसी शत्रुता का भाव उत्पन्न हो गया था कि एक दूसरे को देखते ही अपशब्द कहने लगते थे। एक बार वशिष्ठ इन्द्र के यज्ञ में जाने के लिए जैसे ही आश्रम से बाहर निकले कि उनका विश्वामित्र से सामना हो गया। दोनों एक दूसरे पर अपशब्दों की बौछार करने लगे और अन्त में वशिष्ठ ने विश्वामित्र ने भी आप देकर उनको ‘आडी’ नाम का पक्षी बना दिया। वे दोनों ही एक सरोवर के तट पर घोंसला बना कर रहने लगे और पूर्व बैर को स्मरण करके नित्य प्रति युद्ध करने लगे। उनके जो बच्चे और सम्बन्धी थे वे भी लड़ाई में भाग लेने लगे।

🔷 यह युद्ध बहुत वर्षों तक चलता रहा जिसके कारण वह रमणीक सरोवर और आस पास का दर्शनीय प्रदेश घृणित रूप में परिवर्तित हो गया। इस दुर्दशा को देखकर पितामह ब्रह्मा वहाँ पधारे और उन्होंने वशिष्ठ तथा विश्वामित्र दोनों को शाप मुक्त करके बहुत डाँटा- फटकारा कि तुम ज्ञानी और तपस्वी होकर यह कैसा मूर्खों का सा कार्य कर रहे हो जिससे असंख्यों व्यक्ति दुःख पा रहे हैं और निन्दा कर रहे हैं। उन्होंने दोनों को खूब समझा दिया कि इस प्रकार की द्वेष बुद्धि रखना बड़ी अधर्मता की बात है। ज्ञानी तो दूसरे की दो अनुचित बातें भी सहन कर लेता है और क्षमा वृत्ति से काम लेता है। ब्रह्मा जी का आदेश को मानकर वे दोनों प्रेम पूर्वक मिले और भविष्य में कभी ऐसे निर्बुद्धिता का कार्य न करने की प्रतिज्ञा की।

📖 अखण्ड ज्योति 1961 जुलाई

👉 सोच का फ़र्क

🔶 दोस्तों कभी कभी हम किसी मुश्किल में इस तरह फंस जाते हैं कि उस मुश्किल का बहुत छोटा सा उपाय होता है और हम बड़े बड़े और फालतू के उपाय करते रहते हैं जिससे हमारा समय और पैसा दोनों ही नष्ट होते हैं।  और हमारी सोचने विचारने की शक्ति लगभग ख़त्म सी हो जाती है।

🔷 एक शहर में एक धनी सेठ रहता था, उसके पास बहुत पैसा था और उसे इस बात पर बहुत घमंड भी था। एक बार किसी कारण से उसकी आँखों में इंफेक्शन हो गया।

🔶 आँखों में बुरी तरह जलन होती थी, वह डॉक्टर के पास गया लेकिन डॉक्टर उसकी इस बीमारी का इलाज नहीं कर पाया। सेठ के पास बहुत पैसा था, उसने बहुत सारे नीम- हकीम और देश विदेश से डॉक्टर बुलाए| एक बड़े डॉक्टर ने बताया कि आपकी आँखों में एलर्जी है। आपको कुछ दिन तक सिर्फ़ हरा रंग ही देखना होगा और कोई और रंग देखेंगे तो आपकी आँखों को परेशानी होगी।

🔷 अब क्या था, सेठ ने बड़े बड़े पेंटरों को बुलाया और अपने पूरे घर  को हरे रंग से रंगने के लिए कहा। वह बोला- मुझे हरे रंग के अलावा कोई और रंग दिखाई नहीं देना चाहिए। मैं जहाँ से भी गुजरूँ, हर जगह हरा रंग ही दिखाई देना चाहिए।

🔶 इस काम में बहुत पैसा खर्च हो रहा था लेकिन फिर भी सेठ की नज़र किसी अलग रंग पर पड़ ही जाती थी क्यूंकी पूरे नगर को हरे रंग से रंगना तो संभव नहीं था, सेठ दिन प्रतिदिन पेंट कराने के लिए पैसा खर्च करता जा रहा था।

🔷 वहीं शहर के एक सज्जन पुरुष गुजर रहे थे उन्होंने चारों तरफ हरा रंग देखकर लोगों से कारण पूछा। सारी बात सुनकर वह सेठ के पास गए और बोले, सेठ जी आपको इतना पैसा खर्च करने की ज़रूरत नहीं है मेरे पास आपकी परेशानी का एक छोटा सा हल है.. आप हरा चश्मा क्यूँ नहीं खरीद लेते फिर आपको सब कुछ हरा ही दिखाई देगा।

🔶 सेठ की आँख खुली की खुली रह गयी, उसके दिमाग़ में यह शानदार विचार आया ही नहीं वह बेकार में इतना पैसा खर्च किए जा रहा था।

🔷 दोस्तों, जीवन में हमारी सोच और देखने के नज़रिए पर भी बहुत सारी चीज़ें निर्भर करतीं हैं कई बार परेशानी का हल बहुत आसान होता है लेकिन हम परेशानी में फँसे रहते हैं। तो अगर आप भी कभी किसी परेशानी में फंस जाओ तो शांत मन से उस परेशानी से निकलने का रास्ता खोजिये, अपनी सोच को सकारात्मक रखिये….फिर आप देखेंगे कि आपको आपकी परेशानी का हल मिल गया है।

👉 आज का सद्चिंतन 4 August 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 August 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 20)

👉 युगसृजन के निमित्त प्रतिभाओं को चुनौती
   
🔶 भगवान शंकर ने परशुराम को काल कुठार थमाया था कि पृथ्वी को अनाचारियों से मुक्त करायें। उन्होंने पृथ्वी को इक्कीस बार अनाचारियों से मुक्त कराया। सहस्रबाहु की अदम्य समझी जाने वाली शक्ति का दमन उसी के द्वारा संभव हुआ था। प्रजापति ने दधीचि की अस्थियाँ माँगकर इंद्र को वज्रोपम प्रतिभा प्रदान की थी, जिससे वृत्रासुर जैसे अजेय दानव से निपटा जा सका। अर्जुन को गाण्डीव देवताओं से मिला था। क्षत्रपति शिवाजी की भवानी तलवार देवी द्वारा प्रदान की गई बताई जाती है। वस्तुतः यह किन्हीं अस्त्र-शस्त्रों का उल्लेख नहीं है, वरन् उस समर्थता का उल्लेख है, जो लाठियों या ढेलों से भी अनीति को परास्त कर सकती है। गाँधी के सत्याग्रह में उसी स्तर के अनुयायियों की आवश्यकता पड़ी थी।
  
🔷 ऋद्धियों-सिद्धियों द्वारा किसी को न तो बाजीगर बनाया जाता है और न कौतुक दिखाकर मनोरंजन किया जाता है। विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को यज्ञ के बहाने अपने आश्रम में ले गए थे। वहाँ उन्हें बला-अतिबला विद्या प्रदान की थी। उनके सहारे वे शिव धनुष तोड़ने सीता स्वयंवर जीतने, लंका की असुरता मिटाने और रामराज्य के रूप में सतयुग की वापसी संभव कर दिखाने में समर्थ हुए थे। विश्वामित्र ने ही अपने एक दूसरे शिष्य हरिश्चंद्र को ऐसा कीर्तिमान स्थापित करने का साहस प्रदान किया था, जिसके आधार पर वे तत्कालीन युगसृजन योजना को सफल बनाने में समर्थ हुए थे साथ ही साथ हरिश्चंद्र के यश को भी उस स्तर तक पहुँचा सके थे, जिसकी सुगंध पर मोहित होकर देवता भी आरती उतारने धरती पर आए।
  
🔶 चाणक्य ने चंद्रगुप्त को कोई गड़ा खजाना खोदकर नहीं थमाया था, वरन् ऐसा संकल्पबल उपलब्ध कराया था जिसके सहारे वे आक्रमणकारियों का मुँह तोड़ जवाब देकर चक्रवर्ती कहला सके थे। समर्थ गुरु रामदास ने शिवाजी के हौंसले इतने बुलंद किए थे कि वे अजेय समझे जाने वाले शासन को नाकों चने चबवाते रहे। छत्रसाल ने सिद्धपुरुष प्राणनाथ महाप्रभु से ही वह प्राण दीक्षा प्राप्त की थी, जिसके सहारे वह हर दृष्टि से राजर्षि कहला सके।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 25

👉 आत्म निर्माण-जीवन का प्रथम सोपान (भाग 5)

🔶 ऊपर की पंक्तियों में कुछ मोटे सुझाव संकेत भर हैं। विचार करने पर अनेकों प्रसंग ऐसे सामने आते हैं जिनमें विधि निषेध की आवश्यकता पड़ती है। क्या छोड़ना, क्या अपनाना इसका महत्त्वपूर्ण निर्णय करना पड़ता है। यह हर दिन प्रस्तुत परिस्थितियों और आवश्यकताओं को देखते हुए किया जाना चाहिए। यह मान्यता हृदयंगम की जानी चाहिए कि आत्म-निर्माण का महान लक्ष्य प्राप्त करने के लिए अवांछनीयताओं का क्रमशः परित्याग करना ही पड़ेगा और उपयोगी गुण, कर्म, स्वभाव को व्यावहारिक जीवन में समाविष्ट करने का साहसपूर्ण प्रयास करना ही होगा। विधि और निषेध के दो कदम क्रमबद्ध रूप से निरन्तर उठाते चलने की व्रतशीलता ही हमें आत्मिक प्रगति के उच्च लक्ष्य तक पहुँचा सकने में समर्थ हो सकती है।

🔷 आत्म-निर्माण के मूलभूत चार दार्शनिक सिद्धांतों पर हर दिन बहुत गम्भीरता के साथ बहुत देर तक मनन-चिन्तन करना चाहिए। जब भी समय मिले चार तथ्यों को चार वेदों का सार तत्त्व मानकर समझना और हृदयंगम करना चाहिए। यह तथ्य जितनी गहराई तक अन्तःकरण में प्रवेश कर सकेंगे, प्रतिष्ठित हो सकेंगे, उसी अनुपात से आत्म-निर्माण के लिए आवश्यक वातावरण बनता चला जायेगा।

🔶 आत्म-दर्शन का प्रथम तथ्य है आत्मा को परमात्मा का परम पवित्र अंश मानना और शरीर एवं मन को उससे सर्वथा भिन्न मात्र वाहन अथवा औजार भर समझना। शरीर और आत्मा के स्वार्थों का स्पष्ट वर्गीकरण करना। काया के लिए उससे सम्बन्धित पदार्थों एवं शक्तियों के लिए हम किस सीमा तक क्या करते हैं, इसकी लक्ष्मण रेखा निर्धारित करना और आत्मा के स्वार्थों की पूर्ति के लिए अपनी क्षमताओं का एक बड़ा अंश बचाना, उसे आत्म कल्याण के प्रयोजनों में लगाना।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 उपासना का स्वरूप और मर्म

🔶 पूजा-विधि में लोग आमतौर से अपनी-अपनी रुचि और सुविधा के अनुरूप जप, ध्यान और प्राणायाम का अवलम्बन अपनाते हैं। इन तीनों का प्राण-प्रवाह तभी वरदान बन कर अवतरित होता है, जब इन तीनों के पीछे अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई प्रेरणाओं को अपनाया जाये।

🔷 नाम जप का तात्पर्य है- जिस परमेश्वर को-उसके विधान को आमतौर से हम भूले रहते हैं, उसको बार-बार स्मृति पटल पर अंकित करें, विस्मरण की भूल न होने दें। सुर-दुर्लभ मनुष्य जीवन की महती अनुकम्पा और उसके साथ जुड़ी हुई स्रष्टा की आकांक्षा को समझने, अपनाने की मानसिकता बनाए रहने का नित्य प्रयत्न करना ही नाम-जप का महत्त्व और माहात्म्य है। साबुन रगड़ने से शरीर और कपड़ा स्वच्छ होता है। घिसाई-रँगाई करने से निशान पड़ने और चमकने का अवसर मिलता है। जप करने वाले अपने व्यक्तित्व को इसी आधार पर विकसित करें।

🔶 ध्यान जिनका किया जाता है, उन्हें लक्ष्य मानकर तद्रूप बनने का प्रयत्न किया जाता है। राम, कृष्ण, शिव आदि की ध्यान-धारणा का यही प्रयोजन है कि उस स्तर की महानता से अपने को ओत-प्रोत करें। परिजन प्रायरू गायत्री मन्त्र का जप और उदीयमान सूर्य का ध्यान करते हैं। गायत्री अर्थात् सामूहिक विवेकशीलता। इस प्रक्रिया से अनुप्राणित होना ही गायत्री जप है। सूर्य की दो विशेषताएँ सुपरिचित हैं-एक ऊर्जा, दूसरी आभा। हम ऊर्जावान अर्थात् प्रगतिशील, पुरुषार्थ परायण बनें। ज्ञान रूपी प्रकाश से सर्वत्र प्रगतिशीलता का, सत्प्रवृत्तियों का विस्तार करें। स्वयं प्रकाशित रहें, दूसरों को प्रकाशवान् बनाएँ। गर्मी और आलोक की आभा जीवन के हर क्षण में, हर कण में ओत-प्रोत रहे, यही सूर्य ध्यान का मुख्य प्रयोजन है। ध्यान के समय शरीर में ओजस्, मस्तिष्क में तेजस् और अन्तरूकरण में वर्चस् की अविच्छिन्न वर्षा जैसी भावना की जाती है। इस प्रक्रिया को मात्र कल्पना-जल्पना भर मानकर छोड़ नहीं दिया जाना चाहिए, वरन् तद्नुरूप अपने आपको विनिर्मित करने का प्रयत्न भी प्राण-पण से करना चाहिए।

🔷 प्राणायाम में नासिका द्वारा ब्रह्माण्डव्यापी प्राण-तत्त्व को खींचने, धारण करने और घुसे हुए अशुभ को बुहार फेंकने की भावना की जाती है। संसार में भरा तो भला-बुरा सभी कुछ है, पर हम अपने लिए मात्र दिव्यता प्राप्ति को ही उपयुक्त समझें। जो श्रेष्ठ-उत्कृष्ट है, उसी को पकड़ने और सत्ता में प्रतिष्ठित करने का प्रयत्न करें। नितान्त निरीह, दुर्बल, कायर-कातर न रहें, वरन् ऐसे प्राणवान् बनें कि अपने में और सम्पर्क क्षेत्र में प्राण-चेतना का उभार-विस्तार करते रहने में संलग्न रह सकें।

🔶 जप, ध्यान और प्राणायाम की क्रिया-प्रक्रिया साधक बहुत दिनों से अपनाते चले आ रहे हैं। कुछ शंका हो, तो निकटवर्ती किसी जानकार से पूछकर उस कमी को पूरा किया जा सकता है। अपने सुविधानुसार समय एवं कृत्य में आवश्यक हेर-फेर भी किया जा सकता है, परन्तु यह नहीं भुलाया जाना चाहिए कि प्रत्येक कर्मकाण्डों के पीछे आत्मविकास एवं समाज उत्कर्ष की जो अभिव्यंजनाएँ भरी पड़ी हैं, उन्हें प्रमुख माना जाये और लकीर पीटने जैसी नहीं, वरन् प्रेरणा से भरी-पूरी मानसिकता को उस आधार पर समुन्नत-परिष्कृत किया जाये।

🔷 एक प्रचलन साधना के साथ यह भी जुड़ा हुआ है कि गुरुवार को हल्का-भारी उपवास किया जाये और ब्रह्मचर्य पाला जाये। दोनों के पीछे संयम साधना का तत्त्वज्ञान समाविष्ट है। इन्द्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम और विचार संयम वाली प्रक्रिया यदि बढ़ने, फलने-फूलने दी जाये, तो वह उपर्युक्त चतुर्विध संयमों की पकड़ अधिकाधिक कड़ी करते हुए साधकों को सच्चे अर्थों में तपस्वी, बनने की स्थिति तक घसीट ले जाती है। ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी बनने के त्रिविध लक्ष्य प्राप्त करने के लिये किये गये प्रयत्नरतों को ही सच्चे अर्थों में तपस्वी कहते हैं। तप की दिव्य शक्ति सामर्थ्य से अध्यात्म क्षेत्र का हर अनुयायी भली प्रकार परिचित एवं प्रभावित होना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 3 अगस्त 2018

👉 भगवान तो परोपकार से प्रसन्न होते हैं

🔷 एक बार एकनाथ जी अन्य सन्तों के साथ प्रयाग से गंगाजी का जल काँवर में लेकर रामेश्वर जा रहे थे। रास्ते में एक रेतीला मैदान आया। गधा प्यास के मारे छटपटा रहा था। एकनाथ जी ने तुरन्त काँवर से लेकर गंगा जल गधे के मुख में डाला। गधा प्यास से तृप्त, स्वस्थ होकर वहाँ से चल दिया। एकनाथ के साथी संत प्रयाग के गंगाजल का इस प्रकार उपयोग होते देख क्रुद्ध हुए। एकनाथ ने उन्हें समझाया, “अरे सज्जनवृन्द! आप लोगों ने तो बार-बार सुना है कि भगवान् घट-घट-वासी है। तब भी ऐसे भोले बनते हो। जो वस्तु या ज्ञान समय पर काम न आवे वह व्यर्थ है। काँवर का जो जल गधे ने पिया, वह सीधे श्रीरामेश्वर पर चढ़ गया।

👉 क्षमा करने वाला सुख की नींद सोता है

🔷 क्षमा उठाती है ऊँचा आप को: व्यक्ति बदला लेकर दूसरे को नीचा दिखाना चाहता है, पर इस प्रयास में वो खुद बहुत नीचे उतर जाता है।

🔶 एक बार एक धोबी नदी किनारे की सिला पर रोज की तरह कपडे धोने आया। उसी सिला पर कोई महाराज भी ध्यानस्थ थे। धोबी ने आवाज़ लगायी, उसने नहीं सुनी। धोबी को जल्दी थी, दूसरी आवाज़ लगायी वो भी नहीं सुनी तो धक्का मार दिया।

🔷 ध्यानस्थ की आँखें खुली, क्रोध की जवाला उठी दोनों के बीच में खूब मार -पिट और हाथा पायी हुयी। लूट पिट कर दोनों अलग अलग दिशा में बेठ गए। एक व्यक्ति दूर से ये सब बेठ कर देख रहा था। साधु के नजदीक आकर पूछा, महाराज आपको ज्यादा चोट तो नहीं लगी, उसने मारा बहुत आपको। महाराज ने कहा, उस समय आप छुडाने  क्यों नहीं आए? व्यक्ति ने कहा, आप दोनों के बीच मे जब युद्ध हो रहा था उस समय में यह निर्णय नहीं कर पाया की धोबी कोन है और साधू कौन है?

🔶 प्रतिशोध और बदला साधू को भी धोबी के स्तर पर उतार लाता है। इसीलिए कहा जाता है की, बुरे के साथ बुरे मत बनो, नहीं तो साधू और शठ की क्या पहचान। दूसरी तरफ, क्षमा करके व्यक्ति अपने स्तर से काफी ऊँचा उठ जाता है। इस प्रकिर्या में वो सामने वाले को भी ऊँचा उठने और बदलने की गुप्त प्रेरणा या मार्गदर्शन देता है।

🔷 “प्रतिशोध और गुस्से से हम कभी कभार खुद को नुक्सान पहुचां बैठते हैं जिस से हमें बाद में खुद बहुत पछतावा होता है।

🔶 आईये हम कुछ बातें बताते हैं इस से जुडी हुयी.”

👉 1. दोस्तों गुस्से में लिया गया फैसला अक्सर करके गलत ही साबित होता है, तो इसीलिए हमें खुद पर काबू रखना बहुत जरुरी है।

👉 2. क्षमा करने से सामने वाले व्यक्ति के नजर में हमारी इज्जत, सम्मान और बढ़ जाती है।

👉 3. गुस्सा करने वाला व्यक्ति हमेशा खुद का ही नुक्सान पंहुचाता है।

👉 4. गुस्से में हमेशा अक्सर करके वो काम हो जाता है जिस से हम दूसरों को और खुद को भी नुक्सान पहुचाने के साथ साथ लोगों के दिलों में नफरत पैदा कर देते हैं।

👉 5. दोस्तों आपको जब भी गुस्सा आये या किसी के ऊपर गुस्सा हो तो हमें चाहिए की उस समय  हम अपने दिमाग और मन को शांत रखें (नियंत्रण करना सीखें) या फिर हम वहां से कहीं दूसरी जगह पर चले जाएँ।

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 3 August 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 19)

👉 युगसृजन के निमित्त प्रतिभाओं को चुनौती
   
🔷 प्रतिभाओं का प्रयोग जहाँ कहीं भी, जब कभी भी औचित्य की दिशा में हुआ है, वहाँ उन्हें हर प्रकार से सम्मानित-पुरस्कृत किया गया है। अच्छे नंबर लाने वाले छात्र पुरस्कार जीतते और छात्रवृत्ति के अधिकारी बनते हैं। सैनिकों में विशिष्टता प्रदर्शित करने वाले वीरता पदक पाते हैं। अधिकारियों की पदोन्नति होती है। लोकनायकों के अभिनंदन किए जाते हैं। संसार उन्हें महामानव का सम्मान देता है तथा भगवान उन्हें हनुमान्, अर्जुन जैसा अपना सघन आत्मीय वरण करते है।
  
🔶 युगसृजन बड़ा काम है। उसका संबंध किसी व्यक्ति, क्षेत्र, देश से नहीं वरन् विश्वव्यापी समस्त मानव जाति के चिंतन, चरित्र और व्यवहार में आमूल-चूल परिवर्तन करने से है। पतनोन्मुख प्रवृत्तियाँ तो आँधी-तूफान की तरह गति पकड़ लेती हैं, पर उन्हें रोकना और तदुपरान्त उत्कृष्टता की दिशा में उछाल देना असाधारण दुस्साहस भरा प्रयत्न है। कैंसर के मरीज को रोगमुक्त करना और नीरोग होने पर उसे पहलवान स्तर का समर्थ बनाना एक प्रकार से चमत्कारी कायाकल्प है। ऐसे उदाहरण सम्राट अशोक स्तर के अपवाद स्वरूप ही दीख पड़ते हैं, पर जब यही प्रक्रिया सार्वभौम बनानी हो तो कितनी दुरूह होगी, इसका अनुमान वे ही लगा सकते हैं, जिन्हें असंभव को संभव कर दिखाने का प्रण पूरा करना हो, जिन्हें करना कुछ न हो उनकी समीक्षा तो बाल-विनोद ही हो सकती है।
    
🔷 दुस्साहस पर, प्रतिभाएँ उतरती हैं-विशेषतया जब वे सृजनात्मक हों। कटे हुए अंगों के घाव भरना, उनमें दूसरे प्रत्यारोपण जोड़कर पूर्व स्थिति में लाना, मुश्किल सर्जरी का ही काम है। युग की समस्याओं को सुलझाने के लिए अनौचित्य को निरस्त करने और सृजन का अभिनव उद्यान खड़ा करने के लिए ऐसे व्यक्ति चाहिए जो परावलंबन की हीनता से, स्वार्थपरता की संकीर्णता से ऊँचे उठकर अपने को परिष्कृत करने के साथ-साथ वातावरण को संस्कार संपन्न बना सकने की उत्कंठा सेू अंत:करण को भाव-संवेदनाओं से ओत-प्रोत कर सकें।

🔶 आत्मबल बढ़ाने के लिए उपासना को सब कुछ माना जाता है और उसी के सहारे मनोकामनाओं की पूर्ति से लेकर स्वर्ग-मुक्ति तक, देवताओं और भगवानों से अपनी मान्यताओं के अनुरूप छवि बनाकर दर्शन देने की अपेक्षा की जाती है। ऋद्धि-सिद्धियों की आशा भी कितने ही लोग लगाए रहते हैं और सफलता की कसौटी यह मानते हैं कि उन्हें चित्र-विचित्र कौतुक-कौतूहल दृष्टिगोचर होते रहते हैं। चमत्कार देखने और चमत्कार दिखाने तक ही उनकी सफलता सीमित रहती है, पर बात वस्तुतः ऐसी है नहीं। यदि आत्मशक्ति जागी तो उसका दर्शन आदर्शवादी प्रतिभा में ही अनुभव होगा। उसी में ध्वंस से निपटने और सृजन को चरितार्थ कर दिखाने की सामर्थ्य होती है। यही दैवी वरदान है। इसी को सिद्ध पुरुषों का अनुदान भी कह सकते हैं। यथार्थ खोजों-अन्वेषणों में भी यही तथ्य उभरकर आते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 24

👉 Acquisition of knowledge

🔷 Sagacious (truly learned) people are like soothing fragrance of flowers. They carry an aura of serene joy with them wherever they go and spread it unconditionally. Their benevolence is for everyone; every place is home to them. Vidya (pure knowledge) is the real wealth. Everything else is negligible against it. This treasure is immortal. It remains with the individual self even in the later
lives… The intelligence enlightened by vidya continues to evolve and gradually transmutes to the omniscient level; the individual self eventually sees the light of the soul and attains ultimate realization.

🔶 The deeper you dig a well, the more water you would find in it. Similar is the case with acquisition of knowledge. The more you  learn, the deeper you question and attempt to know… the greater will be your knowledge. What is the reality of the world? What are the sources of peace and happiness? Only those who have attained vidya would know the answers. Vidya alone can accomplish the eternal quest of the individual self. Then why are we so idle and indifferent towards earning this invaluable wealth? Age is never a bar in learning. No matter if you are old or even lying on death bed, so long as your mind is alive, your consciousness is present, you should have the will and zeal to acquire higher, greater knowledge, because this is a sublime treasure that you can carry along
with your subtle and astral bodies in the lives after death…

🔷 They are indeed pitiable, fortune-less, who escape from learning. Remember! Knowledge is the key to strength and success in the ascent of life. Even if you have to beg before a noble teacher to learn it, you should do it because acquisition of knowledge and inner enlightenment is your dignified duty (as a human being)…

📖 Akhand Jyoti, Dec. 1942

👉 आत्म निर्माण-जीवन का प्रथम सोपान (भाग 4)

🔷 मन को, मस्तिष्क को अस्त-व्यस्त उड़ने की छूट नहीं देनी चाहिए। शरीर की तरह उसे भी क्रमबद्ध और उपयोगी चिन्तन के लिए सधाया जाना चाहिए। कुसंस्कारी मन बनैले सुअर की तरह कहीं भी किधर भी दौड़ लगाता रहता है शरीर भले ही विश्राम करे पर मन तो कुछ सोचेगा ही। यह सोचना भी शारीरिक श्रम की तरह ही उत्पादक होता है। समय की बर्बादी की तरह ही अनुपयोगी और निरर्थक चिन्तन भी हमारी बहुमूल्य शक्ति को नष्ट करता है। दुष्ट चिन्तन तो आग से खेलने की तरह है। आज परिस्थितियों में जो सम्भव नहीं वैसी आकाश पाताल जैसी कल्पनाएँ करते रहने, योजनाएँ बनाते रहने से मनुष्य अव्यावहारिक बनता जाता है।

🔶 व्यभिचार, आक्रमण, षड्यन्त्र जैसी कल्पनाएँ करते रहने से मन निरन्तर कलुषित होता चला जाता है और उपयोगी योजनायें बनाने के लिए गहराई तक प्रवेश कर सकना उसके लिए सम्भव नहीं रहता। उद्धत आचरण शरीर को नष्ट करते हैं और उद्धत विचार मन मस्तिष्क का सत्यानाश करके रख देते हैं। मनोनिग्रह का योगाभ्यास में बहुत माहात्म्य गाया गया है। उस चित्त निरोध का व्यावहारिक स्वरूप यही है कि जिस दिशा को हम उपयोगी मानते हैं और जिस सन्दर्भ में सोचना आवश्यक समझते हैं उसी निर्देश पर हमारी विचारणा गतिशील रहे। वैज्ञानिकों, बुद्धिजीवियों और योगाभ्यासियों में यही विशेषता होती है कि वे अपने मस्तिष्क को निर्धारित प्रयोजन पर ही लगाये रहते है। अस्त-व्यस्त उड़ानों में उसे तनिक भी नहीं भटकने देते।

🔷 यह आदत हमें डालनी चाहिए कि चिन्तन का क्षेत्र निर्धारित करके उस पर मन को केन्द्रित करने की आदत यदि डाली जा सके तो मस्तिष्कीय प्रखरता का, मनोबल सम्पादन का द्वार खुल जायेगा और मन्दबुद्धि जैसी मस्तिष्कीय बनावट रहते हुए भी अपने चिन्तन क्षेत्र में निष्णात बन जायेंगे। समय की दिनचर्या में बाँधकर शरीर का श्रेष्ठतम उपयोग किया जा सकता है। मन का महत्त्व शरीर से कम नहीं अधिक है। उसका भटकाव रोककर उसे उपयोगी निर्दिष्ट चिन्तन में यदि सधाया जाना सम्भव हो सके तो मस्तिष्क की विचारशक्ति से बहुमूल्य लाभ उठाया जा सकता है। समुन्नत जीवन विकास में यह शरीर और मन पर बन्धन लगाने की साधना सही रूप से तप तितीक्षा का, व्रत संयम का उच्चस्तरीय लाभ दे सकती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

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